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	<title>shivnath Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>नेताओं ने तो हमेशा &#8216;छात्रों&#8217; का इस्तेमाल किया है &#8216;सत्ता के लिए&#8217;, फिर केबी सहाय का गोली कांड हो या जेपी का आंदोलन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 May 2022 14:08:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इंटरव्यू]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना : विगत दिनों पटना के एक मित्र किसी बात के सिलसिले में &#8220;सोडा फाउंटेन&#8221; की चर्चा किये। सुनते ही 26 वां स्वाधीनता दिवस का महीना याद आ गया। साल सन 1973 था और अगली सुबह पटना से प्रकाशित &#8216;आर्यावर्त&#8217;, &#8216;इण्डियन नेशन&#8217;, &#8216;सर्चलाइट&#8217;, &#8216;प्रदीप&#8217; अखबार खूब बेचे थे। सुबह-सवेरे पटना के गाँधी मैदान में पटना [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना : विगत दिनों पटना के एक मित्र किसी बात के सिलसिले में &#8220;सोडा फाउंटेन&#8221; की चर्चा किये। सुनते ही 26 वां स्वाधीनता दिवस का महीना याद आ गया। साल सन 1973 था और अगली सुबह पटना से प्रकाशित &#8216;आर्यावर्त&#8217;, &#8216;इण्डियन नेशन&#8217;, &#8216;सर्चलाइट&#8217;, &#8216;प्रदीप&#8217; अखबार खूब बेचे थे। सुबह-सवेरे पटना के गाँधी मैदान में पटना से बाहर जाने वाले बस यात्रियों के हाथों तो बेचे ही थे, गाँधी मैदान से पटना विश्वविद्यालय के रानी घाट प्राध्यापक आवासीय क्षेत्र तक इतने अखबार बेचे थे कि जेब में &#8216;रेजकी&#8217; (खुदरा पैसा) दोनों तरफ इस कदर लटक गया था, जैसे बारह वर्ष की आयु में &#8216;हाइड्रोसील&#8217; बिमारी हो गया हो। बुशर्ट से &#8216;सेप्टिपिन&#8217; निकालकर जेब में लगा लिया था ताकि मेहनत की कमाई सड़क पर न गिरे। साईकिल की गति भी धीमी गति की समाचार जैसी हो गयी थी। कहने के लिए तो &#8220;छात्रों का कमाल&#8221; था, लेकिन भीड़ में &#8220;छात्र को पहचानना&#8217; मुश्किल ही नहीं &#8216;नामुमकिन&#8217; उस दिन भी होता था, आज तो सार्वभौमिक सत्य है क्योंकि बिहार ही नहीं, देश के कोने-कोने के राजनेता किस करवट बैठकर कुर्सी के लिए &#8216;वायुत्याग&#8217; करेंगे कोई नहीं समझता।</strong> <br />
 <br />
भारत के लाल किले पर 15 अगस्त को झंडोत्तोलन होने से कोई तीन माह पूर्वं, यानी 12 मई, 1947 को पटना के गांधी मैदान के पास तत्कालीन &#8216;एलिफिंस्टन और रीजेंट सिनेमा हॉल&#8217; के बीच दाहिने कोने पर सत्यनारायण झुनझुनवाला एक खुला रेस्तरां खोले। इस रेस्तरां के दाहिने तरफ तो छोटा-मोटा भवन आकार का रेस्तरां था, लेकिन खुले गार्डननुमा मैदान में टेबुल-कुर्सी लगी होती थी। शाम के समय पटना के लोग बाग़, संभ्रांत महामानव सहित, यहाँ सपरिवार आकर जलपान, चाय, काफी, या अन्य भोज्य पदार्थों का आनंद लेते थे। पटना शहर में एक विशेष जगह बन गया था यह स्थान।</p>
<p>झुनझुनवाला साहेब लन्दन से एक मशीन मंगाए थे &#8211; नाम था सोडा फाउंटेन &#8211; और उसी मशीन के नाम पर इस रेस्तरां का नामकरण हो गया। क्या रिक्शावाला, क्या बस वाला, क्या नेता, क्या मंत्री, क्या छात्र, क्या अध्यापक, क्या डाक्टर, क्या व्यापारी, क्या हज़ामत बनाने वाला &#8211; सभी इस रेस्तरां के ग्राहक थे। गाँधी मैदान के इस छोड़पर &#8216;सोडा फाउंटेन&#8217; और &#8216;खादी ग्रामोद्योग&#8217; दोनों &#8216;आइकॉन&#8217; बन गया था। सत्ताईस अगस्त, 1973 की रात में झुनझुनवाला साहेब पूरे दिन की बिक्री का हिसाब-किताब कर &#8216;गद्दी&#8217; से उतड़े अगली सुबह दूकान खोलने की तैयारी करने के लिए। अगली सुवह भी सब ठीक-ठाक था। लेकिन इधर सूर्यदेव जैसे-जैसे ब्रह्माण्ड में ऊपर चढ़ रहे थे, &#8216;सोडा फाउंटेन&#8217; का अस्तित्व खतरे की ओर उन्मुख हो रहा था &#8211; शांति पूर्वक। कहीं कोई आभास नहीं था अगले पल क्या होने वाला है। </p>
<p>&#8216;सोडा फाउंटेन&#8217; में खचाखच ग्राहक थे। खुले गार्डेन में गरमा-गरम समोसे, पकौड़ियाँ हरी-हरी चटनियों के साथ लोग बाग़ आनंद ले रहे थे। आसमान में बादल बन रहा था। तापमान भी शारीरिक सहज के अधीन था। तभी &#8216;गद्दी&#8217; (कैश काउंटर) पर बैठे सज्जन की आवाज धीरे-धीरे ऊँची होने लगी थी और सामने खड़े चार-पांच छात्रों की आवाज उस आवाज को दबाते, ऊपर उठ रहा था। मामला महज &#8216;साढ़े-सात&#8217; रुपये की पिछले बकाये राशि की थी जिसे गद्दी पर बैठे महानुभाव सामने खड़े ग्राहक से मांग रहे थे। इसलिए कहते हैं &#8220;उधार प्रेम की कैंची है।&#8221;</p>
<p>ग्राहक पटना विश्वविद्यालय के छात्र थे और गद्दी पर बैठे सज्जन से गलती यह हो गई कि वे &#8220;पटना के छात्र&#8221; से &#8220;बकाये पैसे मांग लिए&#8221; &#8211; देखते ही देखते वह &#8216;साढ़े सात रुपये की राशि सोडा फाउंटेन के लिए साढ़ेसाती बन गया। पहले मुंह चल रहा था, फिर हाथ चला, फिर हॉस्टल के कमरों में लगी मच्छरदानी का डंडा, फिर असली डंडा, फिर हौक्की का डंडा, फिर तोड़-फोड़, फिर माचिस की एक छोटी तिल्ली ने सोडा फाउंटेन का नामोनिशान मिटा दिया। हज़ारों छात्रों के गुस्सा को सोडा फाउंटेन के झुनझुनवाला साहेब नहीं झेल सके। देखते ही देखते &#8216;सोडा फाउंटेन&#8217; अगले दिन प्रकाशित अख़बारों के पन्नों पर तस्वीरों के साथ प्रकाशित हुई। </p>
<p>वैसे कई वर्ष पहले फिर सोडा फाउंटेन अपने स्वरूप में आ गया लेकिन कल सोडा फाउंटेन के संस्थापक सम्मानित श्री सत्यनारायण झुनझुनवाला साहेब के पोते श्री समीर झुनझुनवाला से बात करने की कोशिश किये ताकि उन्हें कहानी में समेट सकूँ, वे बहुत व्यस्त थे। कहते हैं: &#8220;सन्डे से पहले तो बात हो ही नहीं सकती, बहुत अधिक व्यस्तता है।&#8221; मैं उनकी बातों का सम्मान करते फोन रख दिया। अब उन्हें कैसे कहते कि &#8216;हम भी बेरोजगार नहीं हैं। देश में शब्दों की कीमत भले नहीं हो, विद्यार्थियों की कीमत आज भी है।&#8221; खैर। </p>
<p><strong>&#8216;सोडा फाउंटेन&#8217; के पास एक घटना सं 1973 की घटना से भी अधिक कष्टदायक थी जब साथ चल रहे एक छात्र के सिर पर बिहार की पुलिस गोली अचानक टकराती है। गोली अपना काम कर जाती है। कुछ सेकेण्ड पहले हँसते छात्र का शरीर &#8216;पार्थिव&#8217; हो जाता है। तक़रीबन 59 राउंड गोलियां चलाई गई थी तत्कालीन बिहार पुलिस के द्वारा और बुद्ध &#8211; महावीर &#8211; गुरु गोविन्द सिंह &#8211; चाणक्य &#8211; चन्द्रगुप्त &#8211; कुंवर सिंह के बिहार का नेतृत्व कर रहे थे बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय और साल सन 1967 था और जनवरी महीना का 5 तारीख । कहते हैं इस गोली कांड के बाद बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय यानी केबी सहाय कभी राजनीतिक गलियारे में नहीं दिखे, सत्ता और शासन की बात तो मीलों दूर। </strong></p>
<p>उस गोलीकांड का चश्मदीद गवाह थे तत्कालीन &#8216;दी इण्डियन नेशन&#8217; अखबार के संवाददाता श्री जनार्दन ठाकुर, असित सेन और किशोर जी। असित सेन और किशोर जी &#8216;छायाकारी&#8217; का भी कलाकारी जानते थे। कितने लोग मरे उस गोली कांड में, यह तो &#8216;माँ गंगा&#8217; भी नहीं बता सकी जिनके आँगन में तत्कालीन प्रशासन के प्रशासक पार्थिव शरीरों को उठाकर गंगा को समर्पित कर रहे थे। लेकिन असित सेन और किशोर जी&#8217; का कैमरा सब कुछ देख रहा था। </p>
<p>जिस छात्र के सिर पर गोली लगी थी, उसके &#8216;सहपाठी&#8217; से आज <strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> बात किया। दोनों पटना के अशोक राजपथ पर स्थित टी के घोष अकादमी का छात्र थे। उस दिन दोनों घर के कुछ कार्य करने के लिए गांधी मैदान की ओर आये थे और कार्य समाप्त करने के बाद &#8216;हँसते-खेलते&#8221; घर जा रहे थे। सत्तर+ वर्षीय अशोक कुमार झा उस घटना को याद करके आज भी हरकम्पित हो गए। अशोक जी &#8216;दी इण्डियन नेशन&#8217; अखबार के तत्कालीन &#8216;एसोसिएट एडिटर&#8217;, जो बाद में संपादक भी बने और बिहार की पत्रकारिता में अपना हस्ताक्षर भी किये, दिवंगत श्री दीनानाथ झा के पुत्र हैं। पेशे से पटना उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। </p>
<p>अशोक जी कहते हैं: &#8220;के बी सहाय के गोलीकांड के सामने सोडा फाउंटेन की सं 1973 की घटना तो नगण्य है। सन 1973 में तो एक जिद ने सोडा फाउंटेन को नेस्तनाबूद कर दिया। उस घटना में कोई मरा नहीं। लेकिन उस गोली कांड में कितने लोग मरे, आज तक कोई नहीं जान पाया है। मैं अपने मित्र के साथ बात करते चला जा रहा था। नवमी कक्षा में पढता था। आस-पास कुछ भीड़-भाड़ अवश्य थी, काफी संख्या में लोग एकत्रित भी थे, खासकर खादी ग्रामोद्योग के पास, लेकिन उस क्षण तक यह अंदाजा नहीं था कि कुछ क्षण बाद क्या होने वाला है। अचानक भगदड़ हुई। खादी ग्रामोद्योग को अग्नि को सुपुर्द कर दिया गया। तभी मेरे साथ चलते मित्र का शरीर खून से लथपथ जमीन पर गिर गया। उसके माथे में गोली लगी थी। सभी भाग रहे थे। हम भी अपने बाए हाथ भागे जो आगे एक बड़ा नाला की ओर जाता था।&#8221;</p>
<p>अशोक जी आगे कहते हैं: &#8220;उस समय किसी को भी यह होश नहीं था कि नाले की गहराई कितनी है &#8211; एक तरह से जलियाँवाला बाग़ के उस कुएं जैसा था। यही नाला आगे अशोक राज पथ को लांघते, बी एन कालेज छात्रावास के बगल से तत्कालीन अंटाघाट होते गंगा में मिलती थी, आज भी मिलती हैं। सैकड़ों लोग कूदे थे उस नाले में। पैर में चप्पल कहीं रास्ते में ही निकल गया था। पूरा शरीर नाले की गंदगी से तर-बतर था। उन दिनों न तो सुलभ शौचालय जन्म लिया था और ना ही सफाई-स्वच्छता शब्द का राजनीतिकरण, व्यवसायीकरण हुआ था। उसी नाले में पैखाना भी फेका था। कई घंटों के बाद बाकरगंज की पतली गली के रास्ते, उस समय के इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भवन के पीछे से, गलियों से रोते-बिलखते एग्जिविशन रोड के नुक्कड़ पर पहुंचे थे। फिर बाएं हाथ लालजी टोला के लिए बढे।&#8221;</p>
<p>झा साहब कहते हैं: &#8220;लालजी टोला में नुक्कड़ पर भारतीय वायु सेना का दफ्तर था और गली आगे जहाँ बाएं मुड़ती थी, &#8216;पैरागाओं ड्रिंक्स&#8217; का दफ्तर था। उस गोली कांड का प्रभाव पूरे पटना शहर पर अब तक हो गया था। पूरा शहर पुलिस की गिरफ्त में थी तो जरूर, लेकिन उपद्रवकारियों का क्रिया कलाप भी कम नहीं था। अब तक &#8216;पैरागाओं ड्रिंक्स&#8217; का हज़ारों बोतल सड़क पर, दफ्तरों के शीशों पर टूट चुके थे। यहाँ से मेरा घर अधिक दूर नहीं था, फिर भी पैर में चप्पल नहीं होने के कारण और गली-सड़क पर शीशे का कार्पेट बिछा होने के कारण चलना मुश्किल था। उधर, घर पर कोहराम मचा हुआ था। मरने वालों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ रही थी। माँ गली में खड़ी थी। पिताजी दफ्तर में थे। मोहल्ले के लोग चिंतित थे। उस गली का मैं एकमात्र बच्चा था जो अब तक बाहर था। जैसे ही माँ मुझे देखी, मेरी ओर दौड़कर मुझे पकड़ी और बिना मेरी दशा को देखे मारना शुरू कर दी। बहुत मार लगी थी उस शाम। आज भी जब उस घटना को याद करता हूँ, मन भर जाता है।&#8221;</p>
<p>अशोक जी कहते हैं: &#8220;उस ज़माने के ही नहीं, उसके बाद आज तक शायद जो पत्रकारिता &#8216;जनार्दन ठाकुर जी किये थे, उस गोली कांड और उसके बाद का, शायद अब तक किसी भी पत्रकार ने नहीं किया होगा। उस समय का &#8216;बेस्ट इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म&#8217; था। ठाकुर जी, असित सेन और किशोर जी उस समय के बहुत ही बेहतरीन पत्रकार-छायाकार थे। जनार्दन ठाकुर तो मुख्यमंत्री कार्यालय से कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों को निकालकर अपने अखबार में प्रकाशित किये थे। जनार्दन ठाकुर &#8211; असित सेन का रिपोर्टिंग इतना भयावह था कि के.बी. सहाय की कुर्सी तो गई ही, वे कभी प्रदेश की राजनीतिक गलियारे में दिखे भी नहीं। इस घटना के बाद ही जनार्दन ठाकुर दिल्ली की ओर कूच किये और असित सेन भी बिहार की सीमा रेखा से बाहर निकल गए। जनार्दन ठाकुर पटना से प्रकाशित &#8216;सर्चलाइट&#8217; अखबार में पत्रकारिता प्रारम्भ किये थे। साल 1959 था। बाद में &#8216;इण्डियन नेशन&#8217; आये और फिर आगे आनंद बाजार पत्रिका समूह के रास्ते भारतीय पत्रकारिता का एक स्तम्भ बन गए। सत्तर के दशक में राजनेताओं और अधिकारियों द्वारा किस कदर सत्ता का दुरुपयोग किया गया, उनके द्वारा लिखित &#8220;ऑल द प्राइम मिनिस्टर मैन&#8221; गवाह है। जनार्दन ठाकुर का देहांत 12 जुलाई, 1999 को हुआ।&#8221;</p>
<p>कहा जाता है कि कामराज प्लान के अधीन सं 1963 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विनोदानंद झा मुख्यमंत्री कार्यालय से बाहर निकाले गए। उनके इस्तीफे से पटना की राजनीति गर्म हो गयी।  तत्कालीन नेताओं ने अपना-अपना पासा फेंकना शुरू कर दिया। झा जी को सत्ता के गलियारे में चक्कर लगाना चाहते थे। पूरे प्रकरण को अपने हाथ में रखना चाहते थे। वे मुख्यमंत्री पद के लिए वीरचंद पटेल का पासा फेंके तो सही, लेकिन दूसरे ही क्षण उन्हें ऐसा लगा कि पटेल साहब &#8216;गुजरात&#8217; से नहीं बल्कि बिहार के कुर्मी समुदाय से आते हैं। उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि वीरचंद के नाम पर सभी पिछड़ा वर्ग के लोग एकजुट हो जाएंगे। साथ ही, ब्राह्मण समुदाय भी उनके साथ खड़ा रहेगा। लेकिन खेल तो आकर्षण-विकर्षण का था। तत्कालीन राजपूत समुदाय के नेता सत्येंद्र नारायण सिंह पटेल साहब के नाम पर सहमत नहीं थे। भूमिहार समुदाय के महेश प्रसाद सिन्हा भी मौका के फ़िराक में थे। </p>
<p>समय बदल रहा था। ब्राह्मण, राजपुत, भूमिहार, पिछड़ा, अगला सभी सुतुर्मुर्ग की तरह एक पैर पर खड़े थे। कई लोग के बी सहाय के पक्ष में खड़े दिखने लगे। इस बीच, रामलखन यादव पिछड़े वर्ग के विधायकों को एकजुट करने लगे और अंततः  के.बी. सहाय बिहार के चौथे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले लिए। सहाय साहब कोई साढ़े तीन साल मुख्यमंत्री रहे। इस बीच बिहार में &#8216;कनखजूरा&#8217; का उत्पादन भी बढ़ गया था राजनीतिक गलियारे में और दिल्ली में आ गई थी श्रीमती इंदिरा गाँधी। सहाय साहब के विरुद्ध पटना से क़्वींटल के भाव में शिकायतें दिल्ली पहुँचने लगी। उनके मंत्रियों मसलन, रामलखन सिंह यादव, महेश प्रसाद सिन्हा, राघवेन्द्र नारायण सिंह, सत्येन्द्र नारायण सिंह और खुद के बी सहाय पर भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी को बढ़ावा देने का आरोप लग रहा था। </p>
<p>बहरहाल, अन्य वर्षों की तरह उस वर्ष भी तत्कालीन राजनीतिक गलियारे के खिलाड़ियों ने &#8216;बिहार के, खासकर पटना विश्वविद्यालय के छात्रों का प्रयोग किया &#8211; ब्रह्मास्त्र के रूप में। प्रदेश में प्रशासन से जुड़ी सैकड़ों मुद्दे थे, लेकिन छात्रों का उपयोग &#8216;कालेज शुल्क&#8217;, &#8216;वर्ग&#8217;, &#8216;शिक्षकों की उपस्थिति&#8217; आदि बातों पर निशाना साध कर सड़क पर उतार दिया। इस्तेमाल करने वाले राजनेता अपने-अपने घरों में प्राकृतिक आनंद ले रहे थे। किसान, मजदूर, गरीब-गरमा, अर्थहीन, दीन माता-पिता एक उम्मीद से अपने-अपने बेटा-बेटियों को पढ़ने के लिए कालेज भेजे थे। सोचे थे अगर पढ़ लेगा तो जीवन सुधर जायेगा। उन्हें क्या पता कि उनके बाल-बच्चे किताबों से दूर और राजनेताओं के करीब आ गए हैं। खैर। </p>
<p><strong>उस दिन 5 जनवरी था और साल सन 1967- प्रदर्शन शांतिपूर्वक चल रही थी। के बी सहाय का नाम मुख्यमंत्री कार्यालय के बाहर गोदना जैसा लिखा था जो तत्कालीन नेताओं को हजम नहीं हो रहा था। दो दिन बाद, यानी नया साल का मुबारकबाद देने-लेने के बाद (यह कहा जाता है) प्रदर्शन का रुख बदला और पटना के गांधी मैदान के कोने पर खादी भंडार को निशाना बनाया गया। यह भी कहा जाता है कि कुछ लोग (जो तत्कालीन राजनीतिक गलियारे में चहलकदमी करते थे) खादी भंडार के छत से प्रदर्शनकारियों पर, पुलिस पर पत्थर बरसाने लगे और अंदर से ही किसी व्यक्ति ने खादी भंडार में माचिस की एक तिल्ली राजनीति के नाम पर फेंक दी।</strong> </p>
<p>बस क्या था। गोलियां चलने लगी, लोग जख्मी होते गए, कई दर्जन लोगों की सांसे भी बंद हुई। राजनेताओं का क्या &#8211; आज &#8216;विपक्ष&#8217; में हैं, कल &#8216;पक्ष&#8217; में हो गए &#8211; प्रदर्शनकारियों को भरपूर मदद किये &#8216;स्वहित&#8217; में। पटना से दूर केबी सहाय के पैतृक घर हजारीबाग और नवादा में भी हल्ला बोला गया, हमला किया। सहाय &#8216;निःसहाय&#8217; हुए, सरकार गिरी और फिर पटना पश्चिम विधान सभा क्षेत्र से विजय उम्मीदवार महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री कार्यालय में रखी कुर्सी पर विराजमान हुए। केबी सहाय सरकार के भ्रष्टाचार की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस टी एल वेंकटराम अय्यर की अध्यक्षता में एक आयोग बैठाया गया और पटना की सड़कों पर, गली-कूचियों में कुल 330 दिनों तक &#8220;मैय्या-बाबू (महामाया बाबू) जिंदाबाद&#8221; का नारा छोटे-छोटे बच्चे लगते रहे।</p>
<p>इसी क्रम में <strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> पटना के बहुत पुराने छायाकार इश्तियाक अहमद साहब से बात किया। अहमद साहेब पटना में मौर्या के सामने &#8216;डेफोडिल्स स्टूडियो&#8217; का मालिक हैं। अहमद साहेब बनारस के रहने वाले हैं। नेशनल हाई स्कूल, बनारस से मैट्रिक पास किये थे। साल सन 1954 था। अहमद साहेब कहते हैं: &#8220;एक तो मैं पढ़ने में बहुत तेज-तर्राक नहीं था और दूसरे उन दिनों बनारस में पढ़ने के साधन भी नहीं थे हम जैसे गरीब-गुरबा परिवारों के लिए। किसी तरह मैट्रिक पास कर लिए और काम की तलास में जुट गए। जिनसे मिलने जाते थे काम नहीं देते थे और दौड़ाते भी थे। सभी पूछते थे क्या करोगे? जब कहता था कि &#8216;कुछ&#8217; भी काम करूँगा, कुछ बोलते नहीं थे। मन खिन्न हो गया था। परिवार से काम करने का दबाव अलग।&#8221;</p>
<p>इश्तियाक जी कहते हैं कि उन दिनों बनारस में धर्मवीर जी नामक एक व्यक्ति थे। धर्मवीर जी का एक स्टूडियो था। उन दिनों वे पूरे बनारस में सबसे अव्वल थे अपने क्षेत्र में। जब उनके पास पहुंचा तो वे आंखों में आंखें डालकर पूछे &#8211; क्या काम करोगे? फोटोग्राफी सीखोगे? डार्करूम का काम सीखोगे? यह सभी शब्द मेरे लिए बिलकुल नया था। मैं &#8216;हां&#8217; कह दिया और धर्मवीर जी का हो गया, उनके स्टूडियो और डार्क रूम का हो गया। दो साल तक उनसे बहुत कुछ सीखा। इतना सीखा की हम अपने पैर पर खड़े हो सकते थे। आज जो भी हूँ उनके सिख के कारण ही हूँ।&#8221;</p>
<p>अहमद साहेब आगे कहते हैं: सं 1964 में मैं बनारस से पटना आ गया। पूरा इलाका खाली दिखता था। बिहार की राजधानी होने के बाद भी शहर बिलकुल शांत दिखती थी। उन दिनों पटना की सड़कों पर फोटोग्राफर नामक जीव नहीं दीखते थे। अखबार तो छपता ही था &#8211; आर्यावर्त, इण्डियन नेशन, सर्चलाइट, प्रदीप &#8211; और अख़बारों में तस्वीरें भी छपती थी, लेकिन तस्वीर कौन देता था, कौन फोटोग्राफर था, यह नहीं जान पाता था। </p>
<p>&#8220;इसी बीच किसी एक कार्यक्रम में इण्डियन नेशन अखबार के रिपोर्टर केशव कुमार जी से मुलाकात हो गई। केशव जी पटना सिटी के रहने वाले थे। छोटे-नाटे कद के, लेकिन दुरुस्त। व्यायाम वाला शरीर था। एक क्षण में ही वे घुलमिल गए और कहा कि  इण्डियन नेशन में फोटो दोगे ? मेरी वही स्थिति थी कि एक भूखा आदमी को एक रोटी और एक गिलास ठंडा पानी मिल जाय। मेरी आंखें भर आई थी जब वे पूछे थे। उस दिन के बाद से जीवन पर्यन्त वे मेरे &#8216;अभिभावक&#8217; रहे। मैं अन्तःमन से उन्हें प्रणाम करता रहा। उनका सम्मान करता रहा और वे अपने एक छोटे भाई की तरह मुझे संरक्षित करते गए। वे जहाँ भी जाते थे, मुझे मिलाते थे, ताकि आने वाले समय में अगर उन्हें तस्वीर से सम्बंधित कोई कार्य पड़े, मुझे याद करें। डॉ एस एन उपाध्याय, डॉ ए एन पाण्डे, डॉ बी मुखोपाध्याय, डॉ लाला सूर्यनन्दन सभी लोगों से उन्होंने ही मिलवाया और मैं भी जीवन पर्यन्त उनका सेवक बना रहा। किसी को भी किसी भी काम की जरुरत होती थी &#8211; बनारसी को बुलाओ &#8211; कहते थे। &#8221;</p>
<p>इश्तियाक साहब कहते हैं: &#8220;उस दिन यानी 5 जनवरी को जब गांधी मैदान के पास गोलियां चल रही थी, पटना सचिवालय के सामने भी छात्रों का प्रदर्शन, नारे वाजी और अन्य बातें चल रही थी। उन दिनों पुलिस की संख्या भी उतनी अधिक नहीं थी, जितनी आज है। प्रदर्शनकारियों को इस बात की खबर हो गयी थी की गांधी मैदान के पास गोलियां चली है। वे भी उग्र हो रहे थे। लेकिन उग्रता को दबाने के,लिए पुलिस आंसू गैस के गोले छोड़ रही थी। मैं सचिवालय के मुख्य द्वार के पास ही खड़ा था। उन दिनों &#8216;प्रेस&#8217; नाम का कोई हौआ तो था नहीं, सड़क कर्मभूमि होने के कारण लोग नाम से, चेहरे से जानते थे; इसलिए खतरा का कोई प्रश्न नहीं रहता था।&#8221;</p>
<p>कुछ क्षण रुकने के बाद, एक लम्बी सांस लेते इश्तियाक जी कहते हैं: &#8220;लेकिन उस दिन गाँधी मैदान के पास जो भी हुआ वह ह्रदय विदारक था। अगले दिन के अख़बारों में जिस तरह लिखा गया था, एक-एक शब्द ह्रदय को चीर रहा था। मैं उस दिन अपने भगवान् से, अल्लाह से दुआ किये की आने वाले समय में कभी कोई ऐसी घटना नहीं हो। दर्जनों से अधिक माताओं की कोख़ सुनी हो गयी। पिता का पुत्र मृत्यु को प्राप्त किया। केबी सहाय उस गोली कांड के बाद जो गए, फिर नहीं दिखे।&#8221;</p>
<p><strong>बहरहाल, इश्तियाक साहब के पास बिहार के राजनेताओं की तस्वीरों का विशाल भण्डार है। सं 1979 में वे अजय भवन के कोने पर &#8216;बनारस फोटो गैलरी&#8217; नामक एक दूकान खोले। आज उनके दो बेटे हैं फ़ैज़ अहमद और फ़िरोज अहमद। फ़ैज़ साहब को एक बेटा एक बेटी हैं जबकि फिरोज साहव को दो बेटे हैं। बनारस से रिस्ता आज भी है क्योंकि बनारस के बिना तो इस पृथ्वी पर जी ही नहीं सकता लोग, लेकिन इश्तियाक साहब के बाद &#8216;कैमरे&#8217; और फोटो से रिस्ता अगली पीढ़ी को नहीं है। </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/interview/politicians-always-used-students-for-power">नेताओं ने तो हमेशा &#8216;छात्रों&#8217; का इस्तेमाल किया है &#8216;सत्ता के लिए&#8217;, फिर केबी सहाय का गोली कांड हो या जेपी का आंदोलन</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>कलयुग में भी &#8220;चैतन्य महाप्रभु&#8221; आते है, विस्वास नहीं है तो मथुरा-वृन्दावन में &#8216;अन्तिम साँस</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 21 May 2018 11:15:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[malnutrition]]></category>
		<category><![CDATA[mass movement]]></category>
		<category><![CDATA[rehabilitation]]></category>
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		<category><![CDATA[Sulabh]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आप ही नहीं, कोई भी विस्वास नहीं करेगा की कलयुग में भी ईश्वर अथवा ईश्वर-तुल्य मनुष्य जन्म लेता है &#8220;चैतन्य महाप्रभु&#8221; जैसा​ मथुरा-वृन्दावन में​। परन्तु जब आप कृष्ण की नगरी, राधा की नगरी मथुरा-वृन्दावन में कृष्ण से मिलने, उनके प्रेम-पिपासु सहस्त्रकाल से प्रतीक्षा करती चली आ रही विधवाओं को देखेंगे, जो अपने जीवन की एक-एक [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>आप ही नहीं, कोई भी विस्वास नहीं करेगा की कलयुग में भी ईश्वर अथवा ईश्वर-तुल्य मनुष्य जन्म लेता है &#8220;चैतन्य महाप्रभु&#8221; जैसा​ मथुरा-वृन्दावन में​। परन्तु जब आप कृष्ण की नगरी, राधा की नगरी मथुरा-वृन्दावन में कृष्ण से मिलने, उनके प्रेम-पिपासु सहस्त्रकाल से प्रतीक्षा करती चली आ रही विधवाओं को देखेंगे, जो अपने जीवन की एक-एक साँस को जोड़ते-छोड़ते जी रही हैं, उन विधवाओं से मिलकर पूछेंगे की आखिर जीवन के अन्तिम बसन्त को वे क्यों देखना चाहती हैं? क्यों अब जीना चाहती हैं ? क्यों जीने की अभिलाषा मरने के समय बढ़ती जा रही है? क्यों उनसे मिलने के लिए मन बेचैन रहता हैं? आपको उत्तर मिल जायेगा &#8211; क्योंकि ​उनका &#8220;अभागा&#8221; सन्तान अपनी &#8220;विधवा माता&#8221; को​ ​मथुरा-वृन्दावन की तंग गलियों में, सड़कों पर मरने के लिए छोड़ ​दिया है और अब उनकी रक्षा &#8221;कलयुग के चैतन्य&#8221; कर रहे हैं, जो उनके लिए &#8220;महाप्रभु&#8221; हैं। </p>
<p>​भले भारत के लोगों के ह्रदय में, खासकर उन सन्तानों के ह्रदय में जीवन के अन्तिम बसंत में सांस- जोड़ती, सांस-तोड़ती माताओं के लिए कोई स्पन्दन नहीं हो, और अगर होता तो चैतन्य महाप्रभु के युग से आजतक मथुरा-वृन्दावन में विधवाएं नहीं आतीं रहतीं, पटकी नहीं जाती सड़कों-गलियों में भीख मांगने के लिए। लेकिन इसी देश का एक सन्तान उन विधवा माताओं को जीवन के अंतिम दिनों में वह सभी सुख दे रहा हैं जो दसकों बाद उन्हें जीने की लालच बढ़ा रही है। कलयुग के चैतन्य महाप्रभु है सुलभ इंटरनेशनल सोसल सर्विस ऑर्गेनिजेशन के संस्थापक पद्मश्री-पद्मभूषण उपाधि से अलंकृत डॉ बिन्देशवर पाठक। </p>
<p>भारत में विद्वानों की कमी नहीं है। धनाढ्यों की किल्लत नहीं है। नेताओं का अपार भण्डार है। समाजसेवियों का कारखाना है &#8211; लेकिन जिनके ह्रदय में मानवता और मानवीयता हो, ऐसे महापुरुषों का भारत-राष्ट्र में घोर अकाल है। और अगर ऐसा नहीं होता तो १२५ करोड़ की आवादी देश में भारत का सर्वोच्च न्यायालय डॉ पाठक और उनके ​संस्थान &#8220;सुलभ&#8221; के सामने यह प्रस्ताव क्यों लाती &#8211; क्या आप उन विधवाओं को दो वक्त की रोटी का बंदोबस्त ​उनकी मृत्यु तक कर सकते हैं? क्या आप बीमारी की  उन्हें दबाइयाँ दे सकते हैं ? क्या आप उनकी मृत्यु के पश्चयात सम्पूर्ण विधि-विधान से उनका दाह &#8211; संस्कार कर सकते हैं ? ​बहुत ही विचित्र, परन्तु सत्य बात है। </p>
<p>कहा जाता है कि विधवाओं की बुरी हालत को देखकर कृष्ण भक्त मध्यकालीन कवि चैतन्य महाप्रभु ने विधवाओं को जीवन के आखिरी पल वृंदावन में कृष्ण भक्ति करते हुए गुजारने की परम्परा डाली और विधवाओं को लेकर वृंदावन आ गए। तब मकसद यह था कि अपने परिवारों की उपेक्षा झेल रही विधवाओं को मन्दिर और आश्रम आसरा देंगे और उनकी जिन्दगी गुजर जाएगी। लेकिन कालांतर में हालात सामान्य नहीं रहे। परिवारों ने अपनी ही अजीज रही विधवाओं को खुद पर बोझ मानना शुरू किया और वृंदावन लाकर उन्हें अपने हाल पर जीने के लिए छोड़ने लगे। कुछ साल पहले तक वृंदावन में विधवाएँ सड़कों पर भीख माँगते दिख जाती थीं।  </p>
<p><iframe width="560" height="315" src="https://www.youtube.com/embed/eHaYcR5t4ug" frameborder="0" allow="autoplay; encrypted-media" allowfullscreen></iframe></p>
<p>इतना ही नहीं &#8220;अमानवीयता का पराकाष्ठा इस बात से लगाया जा सकता है कि गरीबी के कारण जब उनकी मौत हो ​जाती थी तो उन्हें सामान्य और सहज अन्तिम संस्कार भी नसीब नहीं होता था। उनके शव को टुकड़ों में काटकर बोरी में बाँधकर यमुना में ​फेंक दिया जाता था। </p>
<p>इस बात की खबर एक स्वयंसेवी संगठन को पता चली तो उसने सुप्रीम कोर्ट में विधवाओं की हालत सुधारने के लिए जनहित याचिका दायर कर दी। इसी जनहित याचिका पर सुनवाई करते वक्त जब विधवाओं की बदहाली की जानकारी हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने साल 2012 में राष्ट्रीय महिला आयोग, उत्तर प्रदेश महिला आयोग, उत्तर प्रदेश सरकार, मथुरा जिला प्रशासन और सम्बन्धित विभागों को जबर्दस्त लताड़ लगाई थी। इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और यूयू ललित की सामाजिक पीठ ने कोर्ट के एमिकस क्यूरी से पूछा कि क्या विधवाओं को राहत दिलाने के लिए सुलभ इंटरनेशनल से बात की जा सकती है। </p>
<p>जब इस पर सहमति बनी तो डॉक्टर पाठक के पास वृंदावन की विधवाओं की मदद के लिए अगस्त 2012 में चिट्ठी आई। तब डॉक्टर पाठक को द्वारका में प्रसाद मिली कृष्ण की बाँसुरी की याद आई और उन्होंने अपने सुलभ होप फाउण्डेशन के जरिए वृंदावन की विधवाओं को पहले एक हजार रुपए महीना और बाद में दो हजार रुपए महीने की सहायता देनी शुरू की। इससे वृंदावन की विधवाओं की हालत सुधर गई है। अब उन्हें भोजन के लिए भीख माँगने की जरूरत नहीं पड़ती। वृंदावन में उदासीन बाबा का आश्रम अब सुबह-शाम सुलभ की सहायता से चलने वाले भजन कार्यक्रमों से गूंजता रहता है। इतना ही नहीं इनमें जो जवान और काम करने लायक हालत में विधवाएँ हैं, उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए सिलाई-कढ़ाई जैसे कामों की ट्रेनिंग दी जा रही है। इसके अलावा अशिक्षित विधवाओं को पढ़ाने का काम भी किया जा रहा है।</p>
<figure id="attachment_602" aria-describedby="caption-attachment-602" style="width: 624px" class="wp-caption alignright"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/05/dr-bindeshwar-pathak-and-his-wife-shrimati-amola-pathak-1.jpg" alt="डॉ बिन्देश्वर पाठक और उनकी पत्नी श्रीमती अमोला पाठक जो पिछले ५४ सालों से उनके मानवीय प्रयास में साथ दे रहीं हैं ​" width="624" height="868" class="size-full wp-image-602" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/dr-bindeshwar-pathak-and-his-wife-shrimati-amola-pathak-1.jpg 624w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/dr-bindeshwar-pathak-and-his-wife-shrimati-amola-pathak-1-216x300.jpg 216w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/05/dr-bindeshwar-pathak-and-his-wife-shrimati-amola-pathak-1-302x420.jpg 302w" sizes="(max-width: 624px) 100vw, 624px" /><figcaption id="caption-attachment-602" class="wp-caption-text">डॉ बिन्देश्वर पाठक और उनकी पत्नी श्रीमती अमोला पाठक जो पिछले ५४ सालों से उनके मानवीय प्रयास में साथ दे रहीं हैं ​</figcaption></figure>
<p>वृंदावन की तरह काशी भी विधवाओं के लिए मशहूर रहा है। हालाँकि यहाँ विधवाओं की संख्या वृंदावन की तुलना में कम है। काशी के बारे में एक कहावत भी मशहूर है- रांड़, सांड़, सीढ़ी, सन्यासी / इनते बचैं तो सेवैं काशी… लेकिन यह भी सच है कि यहाँ की विधवाओं की हालत वृंदावन की विधवाओं जितनी खराब नहीं है और ना ही वृंदावन जितनी विधवाएँ यहाँ हैं भी। फिर भी सुलभ होप फाउण्डेशन वाराणसी की भी विधवाओं को मासिक सहायता देता है।</p>
<p>विधवाओं की नगरी के रूप में वृन्दावन शहर में अब हालात बदल रहे हैं।​ कुछ वर्ष पहले तक जहाँ मथुरा-वृन्दावन में गलियों में, सड़कों पर, चौराहों पर,<br />
 शहर के हर कोने और चौक ​पर वृद्ध विधवा स्त्रियां दिखाई ​देती थी अपने-अपने जीवन-मरण को देखती, महसूस करती, अब नहीं हैं। अब सभी विधवाएं आश्रमों में रहती हैं, टीवी देखती हैं, भजन गाती हैं। उनके लिए वहां जीवन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं।&#8217;</p>
<p>सुलभ ने वृंदावन के मंदिरों में सुबह भजन गाकर जीविका कमाने वाली विधवा स्त्रियों को सम्मान दिलाने और कई कदम ​उठाये हैं। ​देश में स्वच्छता अभियान चलाने वाली प्रमुख गैर सरकारी संस्था सुलभ ने वृंदावन की विधवाओं की मूलभूत जरूरतों भोजन से लेकर स्वास्थ्य का ध्यान रखने ​लगा है। ​उनके ​रहने खाने की व्यवस्था मुफ़ ​है। विधवाओ को सिलाई बुनाई इत्यादि ​का भी प्रशिक्षण दिया जाता है। ​<br />
​<br />
इसके आलावा अगरबती बनाना, कपडे सिलना, फूल के माला बनाना​,​ मोमबती ​बनाना। इससे जो आमदनी ​होती है वह उनके सर्वांगीण विकास पर खर्च की जाती है ताकि उन चेहरे पर प्रसन्नता रहे। </p>
<p>गौरालब है की ​कुछ वर्ष पहले तक वृंदावन में बड़ी संख्या में विधवा स्त्रियां सफेद साड़ी में मंदिरों में भटकते हुए और भीख मांगते देखी जाती थीं। भगवान कृष्ण की नगरी कहे जाने वाले शहर में निर्धन और कुपोषण की शिकार इन विधवाओं में से कई इतनी कमजोर थीं कि सिर्फ हड्डियों और मांस का ढांचा मात्र रह गई थीं।​ ​</p>
<p>​संडेपोस्ट से बातचीत करते डॉ पाठक कहते हैं: &#8220;​यह सुलभ आंदोलन के लिए सौभाग्य की बात है कि सर्वोच्च न्यायालय ने विधवाओं की दुर्दशा पर सुनवाई के वक्त सुलभ को महत्व दिया। सरकार से सुलभ से पूछकर बताने को कहा गया कि हम बदहाल विधवाओं को खिलाने का इंतजाम कर सकती है या नहीं। न्यायमूर्ति के जेहन से इस नेक काम के लिए सुलभ का जिक्र होना हमारे लिए गौरव की बात है। हम मैला ढोने वाली महिलाओं को समाजिक हक दिलाने के लिए पहले से सक्रिय थे। सर्वोच्च न्यायालय ने समाज की परित्यक्ता बनकर जीने के विवश वृंदावन औऱ वाराणसी की विधवाओं की मदद के लिए हमें उतार दिया। यहां की आश्रमों में रहने वाली विधवाओं के लिए खाने- पीने, पहनने ओढने की समस्या के साथ अंतिम संस्कार तक में समुचित सम्मान नहीं मिलने की मुसीबत थी। सर्वोच्च न्यायालय में मरने के बाद इन विधवाओं के शरीर को बोटी बोटी कर यमुना में फेंके जाने के मामले की सुनवाई के लिए पहुंचा था। सुलभ के प्रयास से आज यहां के आश्रमों में रहने वाली विधवाओं को दो हजार रुपए प्रतिमाह का अनुदान दिया जा रहा है। हालत में बदलाव के लिए हिंदी, अंग्रेजी और बांगला में शिक्षा का इंतजाम किया गया है। पुनर्वास के अन्य जरूरी सुविधाओं का ख्याल रखा जा रहा है।​&#8221;​</p>
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