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	<title>Sanitation Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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		<title>पटना कालेज @ 160 : पटना विश्वविद्यालय के दो समाजशास्त्री जिन्होंने समाज शास्त्र को पुनः परिभाषित किये (10)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Apr 2022 05:26:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विदेश में बिहारी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना विश्वविद्यालय के दो महान समाजशास्त्री जिन्होंने समाज शास्त्र को पुनः परिभाषित किये सामाजिक सरोकार के मद्दे नजर &#8211; डॉ हेतुकर झा अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी कृतियां आज भी अमर है &#8211; सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक और पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के मेधावी समाजशास्त्री डॉ बिंदेश्वर पाठक को [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>पटना विश्वविद्यालय के दो महान समाजशास्त्री जिन्होंने समाज शास्त्र को पुनः परिभाषित किये सामाजिक सरोकार के मद्दे नजर &#8211; डॉ हेतुकर झा अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी कृतियां आज भी अमर है &#8211; सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक और पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के मेधावी समाजशास्त्री डॉ बिंदेश्वर पाठक को 80वें जन्मदिन पर भारतीय समाज की ओर से शुभकामनाएं ।</p>
<p>माँ कहती थी &#8216;जब मनुष्य के शरीर की हड्डी से मांस लटकने लगे, त्वचाओं में झुर्रियां और शिराएं दिखने लगे, तो यह मत समझना कि वह मनुष्य वृद्ध हो गया है । यह सोचकर समझने के कोशिश करना कि वह अपने जीवन के कितने वसंतों की पीड़ाओं को सहकर, स्वयं को उस मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक, शैक्षिक और मानवीय उत्कर्ष पर पहुंचा पाया है, जहाँ समाज के बिरले लोग पहुंच पाते हैं। उसके शरीर के एक-एक नश, एक-एक शिराएं, त्वचा की झुर्रियां जीवन-पर्यन्त उसका चश्मदीद गवाह होता है।</p>
<p>माँ यह भी कहती थी तुम्हें तुम्हारे जीवन काल में समाज में वैसे जीतने भी जीवित प्राणी दिखें, उन्हें अन्तः मन से सम्मान करना क्योंकि वैसे मनुष्यों की माताएं &#8216;अशिक्षित&#8217;, &#8216;अनपढ़&#8217;, &#8216;निरक्षर&#8217; ही मिलेंगी, मेरी तरह। वे सभी माताएं अपने बच्चों को शिक्षा के उत्कर्ष पर देखने के लिए खुद अशिक्षित रहना श्रेयस्कर समझीं। वे अपनी भाषाओँ को छोड़कर, किसी भी अन्य भाषाओँ को नहीं जानती हैं; नहीं पहचानती, नहीं पढ़ पाती। लेकिन अपने बच्चों के होठों की गतियों को, शारीरिक हलचलों को पढ़ना जानती हैं और समझ जाती हैं की आखिर उनका संतान क्या चाहता है। आने वाले समय में ऐसे मनुष्यों की किल्लत होगी। समाज में दृष्टान्त देना तो मुश्किल होगा ही।</p>
<p>बहरहाल, यह तस्वीर माँ की समस्त बातों को समेटे हुए है। ये दो महामानव पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के हस्ताक्षर हैं। उच्चतर शिक्षा के प्रारंभिक वर्षों में दोनों सहपाठी थे, मित्र थे। एक ही कक्षा में पढ़ते थे स्नातक तक । लेकिन समय के आगे किसका चला है। समाज को बेहतर बनाने हेतु समय दोनों को दो धाराओं की ओर उन्मुख किया और समयांतराल जो सम्मान कर रहे हैं (सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संथापक डॉ बिंदेश्वर पाठक), वे छात्र हो गए और जो सम्मानित हो रहे हैं (डॉ हेतुकर झा) वे शिक्षक ।</p>
<p>पाटलिपुत्र के गंगा तट पर स्थित वाणिज्य महाविद्यालय के द्वितीय तल्ले में पटना विश्वविद्यालय का समाजशास्त्र विभाग, उसके दीवारें, ईंट-पत्थर, ब्लेक-बोर्ड, कक्षाओं की कुर्सी-टेबल सभी इनकी अद्वितीय मित्रता, एक दूसरे के प्रति सम्मान, आदर, विश्वास का चश्मदीद गवाह है। जीवन में उस अद्भुत मित्रता की डोर न कभी कमजोर हुई और न ही टूटी। जब तक शिक्षक महोदय अपनी जीवन की अंतिम सांस लेकर इस लोक से अपनी अनंत यात्रा पर निकले, मित्र हताश अवश्य हुए, आज भी हैं, लेकिन प्रकृति और प्रारब्ध के नियमों के किसका चला है यह तस्वीर महज एक तस्वीर नहीं है, बल्कि माँ की बातों का शायद &#8216;अंतिम दृष्टान्त&#8217; भी है हमारे समाज में। डॉ पाठक विगत 2 अप्रैल को अपना 80 जन्मोत्सव मनाए हैं। हम सभी कामना करते हैं कि वे स्वस्थ रहें, मुस्कुराते रहे, सुलभ के आगंतुकों को कहते हैं &#8220;मुस्कुराइए &#8230; आप सुलभ में हैं।&#8221;</p>
<p>विगत सप्ताह कबीर खान द्वारा निर्देशित और रणवीर सिंह, दीपिका पादुकोण, पंकज त्रिपाठी, बोमन ईरानी, ताहिर राज भसीन, जीवा, साकिब सलीम, जतिन सरना जैसे कलाकारों द्वारा अभिनीत &#8220;फिल्म 83&#8221; देखा। इस फिल्म को देखकर मैं अश्रुपूरित था। कपिल देव की गेंद मुझे अपने जीवन के चालीस वर्ष पीछे लेकर चला गया। वह दिन एक तरह से मेरे जीवन का मार्मिक दिन अवश्य था, लेकिन &#8216;सकारात्मक&#8217; समय की शुरुआत के लिए &#8211; कपिल देव की तरह।</p>
<p>सन 1983 के जून महीने में 9 जून से 25 जून तक इंग्लैंड और वेल्स में वर्ल्ड कप के लिए मैच हो रहा था। सेमी फ़ाइनल में इंग्लैंड, पाकिस्तान, वेस्ट इंडीज और भारत आया था और 25 जून को लॉर्ड्स में भारत और वेस्ट इंडीज के बीच फ़ाइनल मैच खेले जाने वाला था। उन दिनों मैं पटना से प्रकाशित आर्यावर्त-इण्डियन नेशन अखबार में कार्य करता था। इण्डियन नेशन के सम्पादकीय विभाग में उप-संपादक के रूप में कार्यरत था। दफ्तर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी थी। कर्मचारियों को वेतन हेतु कैशियर के काउंटर पर पहुंचे महीनों बीत गए थे। कई लोगों के घरों में चूल्हे की आंच धीमी हो गयी थी। कई कर्मचारियों की बेटियों का विवाह तय होने के बाद भी, टूट गया था। बच्चों के विद्यालयों में शुल्क शैक्षिक-शुल्क की राशि भी उत्तरोत्तर बढ़ रही थी। पटना की सड़कों पर तापमान एक ओर जहाँ आसमान छू रहा था, हमारे दफ्तर में सामान्य कर्मचारियों का जीवन जमीन के अंदर दबा जा रहा था।</p>
<p>उन दिनों हमारे दफ्तर में थे सुधाकर भाई (सुधाकर झा) जो संवाददाता तो थे ही, खेल-कूद, विशेषकर क्रिकेट में उन्हें बहुत अभिरुचि थी। उन दिनों अख़बारों में इलस्ट्रेशन दिल्ली से &#8216;केबीके&#8217; का छपता था जो डाक से आने के कारण औसतन तीन दिन बाद आता था। उस दिन बृहस्पतिवार था और तारीख 23 जून। मैं 9 जून से उस तारीख तक वर्ल्ड कप में खेले गए सभी देशों की अंक-तालिका बना लिया था। मेरी इक्षा थी की जब फ़ाइनल मैच हो, उस दिन उस तालिका को प्रकाशित करेंगे &#8216;केबीके&#8217; के आने से पहले। फ़ाइनल मैच में विजय देश का स्थान छोड़कर, एक बेहतरीन अंक तालिका बनाया। यह सोच लिया था जैसे ही खेल ख़त्म होगा, विजय देश का नाम लिखकर अंक तालिका का ब्लॉक बनाकर प्रकाशित करेंगे।</p>
<p>इस पूरे कार्य में सुधाकर भाई का पूरा सहयोग था। उन दिनों पटना के दो-पहिये वाहन जैसे स्कूटर, मोटर साईकिल आदि के अगले और पिछले हिस्से पर नंबर लिखा होना &#8216;बाध्यकारी&#8217; हो गया था। ट्रैफिक डीएसपी थे बनबारी बाबू। एक बेहतरीन इंसान, लेकिन अनुशाषित। मैं 10 रुपये में अनंत लोगों की गाड़ियों पर नंबर लिखा। पैसे आने से घर में चूल्हे जलने में मदद मिलता था। सुधाकर भाई हमेशा हमारे कार्य में पीछे खड़े होते थे। जब तालिका बना लिया तब सोचा कि अगर कोई इसे &#8216;स्पॉन्सर&#8217; कर दे तो &#8216;दो पैसे की आमदनी&#8217; मुझे भी हो जाएगी और संस्थान को तो होगी ही। मैं तत्कालीन विज्ञापन व्यवस्थापक और मुद्रक तथा प्रकाशक गिरीन्द्र मोहन भट्ट (अब दिवंगत) के पास पहुंचा। तालिका दिखाया और मार्गदर्शन के लिए याचना किया। भट्ट जी मेरी आंखों में मेरी भावना को पढ़ लिए। आखिर वे भी तो एक पिता थे और भूख से होने वाली पेट-पीड़ा से वे भी अवगत थे। उन्होंने एक रास्ता बताया &#8211; &#8216;आप सुलभ शौचालय के बिंदेश्वर पाठक जी के पास चले जाएँ, उन्हें दिखाएँ और कहें की भट्ट जी भेजे हैं।&#8217; उन दिनों सुलभ &#8216;शौचालय&#8217; ही था।</p>
<p>23 जून। वर्ल्ड कप फ़ाइनल से 48 घंटा पूर्व। पटना की सड़कों पर तापमान कोई 48+ डिग्री। और मैं उन्मुख था पाटलिपुत्र कॉलोनी स्थित बिंदेश्वर पाठक के आवास की ओर। सड़कों पर मुझ जैसे &#8216;अभागा&#8217; ही चलते-फिरते दिख रहा था। कहीं कोई रिक्शावाला, तो कहीं ठेला पर सामन लिए मजदूर। बीच-बीच में अपने चेहरे को छुपाए स्कूटर, मोटर साईकिल पर लोग दिख रहे थे। सूर्यदेव सर के कुछ डिग्री पश्चिम गाल को सेक रहे थे। माँ-बाबूजी कहते थे: &#8220;समय परीक्षा की घोषणा नहीं करता। वह जीवन में कभी भी समय परीक्षा ले सकता है। इसलिए हमेशा सज्ज रहना।&#8221; माँ-बाबूजी की बातें हमारे लिए &#8216;ब्रह्मवाक्य&#8217; था और हम भी सज्ज थे। मन में कई तरह की बातें आ रही थी लेकिन साईकिल अपनी दिशा की ओर उन्मुख थी।</p>
<p>पाटलिपुत्र कालोनी में प्रवेश के बाद सड़क की बायीं ओर एक छोटे-मैदान के पास बिंदेश्वर पाठक का घर था। बाहर एक पेड़ में साईकिल को सिक्कड़ से बांधकर, चेहरे को पोछते, हनुमान चालीसा पढ़ते मैं दरवाजे पर दस्तक दिया। प्रवेश द्वार के दाहिने कोने पर स्थित &#8216;कॉल-बेल&#8217; को दबाया &#8211; ट्रिंग &#8211; ट्रिंग। कुछ ही क्षण में दरवाजा खुला। दरवाजा खुलते ही अंदर से आलू-परवल की सब्जी, बासमती चावल, अरहर दाल और अन्य भोज्य पदार्थों का सुगंध एक ही बार नाक के रास्ते मस्तिष्क तक पहुंचा। माँ कहती थी &#8216;चाहे तुम कितना भी भूखा रहो, चेहरे पर शिकन नहीं आने देना।&#8217;</p>
<p>सामने एक सज्जन आये और उनके पीछे घर के अंदर डाइनिंग टेबल के पास हाथ पोछते बिंदेश्वर पाठक साहब दिखे। मैं सज्जन को कहा कि &#8216;मैं शिवनाथ हूँ और भट्ट जी भेजे हैं।&#8217; पाठक जी तक्षण बाहर निकले और अंदर आने को कहा। मैं कोने पर ही खड़े-खड़े उन्हें पूरी बातें बताया, तालिका दिखाया और कहा कि &#8216;परसो विश्व कप का फ़ाइनल मैच है। यह तालिका उसी से सम्बंधित है। जो जीतेगा उसका नाम लिखकर, ब्लॉक बनाकर इसे दोनों अखबार में प्रकाशित करेंगे।&#8217;</p>
<p>पाठक जी आर्यावर्त-इण्डियन नेशन संस्थान की स्थिति से अवगत थे। वे वहां के कर्मचारियों की स्थिति को भली-भांति जानते थे। मेरी भावना और उस गर्मी में सड़क नापने का उद्देश्य वे जानते थे। आखिर वे भी वे पिता थे। पाठक जी फिर पूछते हैं: &#8220;कौन जीतेगा?&#8221; मैं सहज शब्दों में कहा: कपिल देव। मेरे तालिका के पीछे उन्होंने हस्ताक्षर कर दिए और कहे कि भट्ट जी को कहियेगा कि बिल दफ्तर में भेज देंगे।&#8217; फिर अपने कुर्ता के जेब में हाथ दिए और जो भी द्रव्य था (1600/- रुपये) वे मेरे हाथ में रखते कहते हैं: &#8216;यह आपकी मेहनत और सोचने की अलग दृष्टि का पुरस्कार है।&#8221; मैं भी उसे अपनी जेब में रखा लिया और उन्हें धन्यवाद देते, प्रणाम करते विदा लिया। बाहर आते ही जब सूर्यदेव पर नजर गयी तो ऐसा लगा कि सूर्यदेव मुस्कुरा रहे हैं। शायद उनकी नजर में मैं उत्तीर्ण था। मैं साईकिल का पैडल मारते सीधा अपने घर की ओर उन्मुख हो गया।</p>
<p>उन दिनों मैं पटना के भीखना पहाड़ी मोहल्ला के सैदपुर छात्रावास के सामने रहता था। सामने एक स्कूल और स्कुल परिसर में एक विशाल पीपल का बृक्ष और उस बृक्ष के नीचे हनुमान की प्रतिमा। सूर्यदेव अस्ताचल की ओर उन्मुख थे। तेज और तप दोनों कम हो गया था। माँ बीच वाले कमरे के दरवाजे का ओट लिए बैठी थी। दरवाजा खुला था। सूर्य की किरणें उसके चेहरे के साथ क्रीड़ा कर रही थी। पीपल के पेड़ के पत्तों के बीच से सूर्य की किरणें कभी-कभी छनकर आती थी। माँ मेरी साईकिल की घंटी से अवगत थी। उसे चिंता थी कि मुझे दफ्तर जाने का समय हो रहा है और मैं अब तक वापस नहीं आया हूँ। तभी साईकिल की ट्रिंग-ट्रिंग घंटी बजी। गली के नुक्कड़ से दरवाजे की दूरी महज 20 कदम था। माँ मेरे चेहरे को पढ़ ली। &#8216;नाउम्मीद&#8217; मन आकाशमात उम्मीदों से भर गया। माँ समझ गई &#8211; कुछ अच्छा हुआ है। मैं साइकिल लगाकर माँ के हाथों में 1600/- रुपये रखा। अपनी आँचल की खूंट से अपनी आंखों को पोछते वे कहती हैं: &#8220;जुग-जुग जीबैथ बिंदेश्वर बाबू।&#8221; उस द्रव्य से कोई तीन महीने हम सभी &#8216;भर-पेट खाना खाये।</p>
<p>उस घटना के कोई तीन दशक बाद जब भारत के पूर्व कप्तान और विश्व कप &#8211; 1983 के विजेता कपिल देव से नोयडा स्थित उनके नवनिर्मित गगनचुम्बी अट्टालिका में भारतीय स्वाधीनता संग्राम के गुमनाम क्रांतिकारियों का वीर-गति प्राप्त सेनानियों के आज के वंशजों की खोज से संबंधित प्रयास को लेकर मिला और उन्हें पटना की उस घटना को बताया, बिंदेश्वर पाठक जी के बारे में बताया। मेरी बातों को वे बहुत धैर्य के साथ सुने। वे निःशब्द थे। लगता था वे मेरी भावना को पढ़ रहे हैं। उन दिनों मैं ऑस्ट्रेलिआ से उदघोषित स्पेशल ब्रॉडकास्टिंग सर्विस (एसबीएस रेडियो, हिंदी सेवा) के लिए कार्य करता था। मेरी बातों को सुनने के बाद भारत के कप्तान कहते हैं: &#8220;हमें उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिए। न मैं खेल के मैदान में उस दिन उम्मीद छोड़ा था और ना ही आज। आपकी बातें एक पाठ है आज को युवाओं के लिए। आप बहुत बेहतरीन कार्य कर रहे हैं। इस कार्य को सभी नहीं समझेंगे। मैं पाठक जी को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ। पाठक जी बहुत बेहतरीन इंसान हैं। आज़ाद भारत में वे एकमात्र व्यक्ति हैं जिन्होंने सफाई के समाजशात्र को पुनः परिभाषित किया। उन्होंने जो किया, आज तक किसी ने नहीं किया। आप भी उम्मीद नहीं छोड़ें। कोई नहीं जानता आपका अंतिम प्रयास ही आपको विश्वव्यापी बना दे।&#8221; खैर।</p>
<p>आज ही नहीं, कल भी “मेरी आवाज ही पहचान है” – ये पांच शब्द सुनते ही दिवंगत लता मंगेशकर जी याद आएँगी। “मिसाईल” सुनते ही महान वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत ए पी जे अब्दुल कलाम साहब याद आएंगे। क्रिकेट के मैदान में जब भी वर्ल्ड कप की चर्चा होगी पहले कपिल देव ही नाम लिया जायेगा। उसी तरह आज ही नहीं, कल भी और आने वाले समय में भी, जब भारत में स्वच्छता और भंगी-मुक्ति आंदोलन, यानी “सामाजिक बदलाव” और “मानवीय विकास” के अग्रणी का नाम लिया जायेगा, तो सबों के जुबान पर एक ही नाम आएगा &#8216;सुलभ&#8217; और उनके संस्थापक डॉ बिन्देश्वर पाठक &#8211; और जब डॉ बिंदेश्वर पाठक अपने आप से पूछेंगे तो शायद अपने परम मित्र, सहपाठी, शिक्षक और प्राथमिक सलाहकार डॉ हेतुकर झा को कभी नहीं भूलेंगे।</p>
<p>जब भी &#8216;सोशियोलॉजी ऑफ़ सेनिटेशन&#8217; पर चर्चा की जाएगी डॉ पाठक के साथ-साथ उनके मित्र-सह-शिक्षक-सह-सलाहकार डॉ हेतुकर झा का नाम स्वतः मुख पर आ जायेगा। यही कारण है कि डॉ पाठक की तुलना इब्राहिम लिंकन से भी लोगों ने किया। जिस तरह लिंकन अमेरिका में काले-गोरों में भेदभाव को मिटाने के लिए याद किये जाते हैं, डॉ पाठक भारत में समाज के दबे-कुचले, समाज से उपेक्षित सर पर मैला ढोने वाले महिला-पुरुषों को समाज की मुख्यधाराओं में जोड़ने के लिए याद किये जायेंगे। और उन्ही यादों में &#8216;सोसिओलोजी ऑफ़ सेनिटेशन&#8217; के रचयिता डॉ हेतुकर झा का नाम भी आएगा। यदि सही कहा जाय तो पटना में डॉ पाठक और उनके मित्र डॉ हेतुकर झा पटना के रास्ते, अपने प्रदेश, देश और विश्व में सोसिओलोजी ऑफ़ सेनिटेशन&#8217; की बुनियाद को मजबूत किये।</p>
<p>साठ के दशक के मध्य की बात है। हेतुकर बाबू पटना के राजेंद्र नगर इलाके में रोड नंबर 16 में रहते थे। पटना के ऐतिहासिक मोइनुल हक़ स्टेडियम के ठीक सामने। इनका आवास दूसरे तल्ले पर था। उसी मकान में नीचे बेचन बाबू रहते थे। आम तौर पर उन दिनों हेतुकर बाबू अपने आवास से विश्वविद्यालय रिक्शा से जाते थे। यदि रास्ता ठीक-ठाक रहा तो रिक्शा सैदपुर स्थित राष्ट्रभाषा परिषद् कार्यालय से होते हुए भिखना पहाड़ी स्थित डॉ कमला आचारी के घर के सामने से या तो रमना रोड होते विश्वविद्यालय परिसर आती थी अथवा साइंस कालेज के सामने निकल कर अशोकराज पथ से विभाग पहुँचते थे। वे अपने छात्र-जीवन में वे पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव भी लड़े थे । पद था उपाध्यक्ष।</p>
<p>26 जनवरी, 1968 को पटना विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति के.के.दत्ता का लिखा और हस्ताक्षरित यह पत्र हेतुकर बाबू के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का दृष्टान्त देता है। के.के.दत्ता लिखता हैं: &#8221; Shri Hetukar Jha has been intimately known to me as a student of the Patna University. I have been favourably impressed with all that I have seen of him. With good academic record he has developed a liberal and cultural outlook. He is intelligent, industrious and conscientious. What I liked most in him is his genuine interest of creative activities and as Vice-President of the Patna University Students Union he has rendered valuable services to me in fostering a feeling of fellowship in the University campus. Hias manners and conducts are excellent. I wish him all success in his life.&#8221;</p>
<p>हेतुकर बाबू से हमारा रिश्ता पारिवारिक था। साथ ही, नोवेल्टी एंड कंपनी के कारण पटना विश्वविद्यालय के लगभग सभी प्राध्यापकों को जानते थे। उन दिनों पाठक जी साइकिल से हेतुकर बाबू के घर राजेंद्र नगर आते थे। एक मित्र के रूप में दोनों ढ़ेर सारी बातें करते थे। बातों का ध्रुवीकरण सामाजिक क्षेत्र के कार्यों से जुड़ा होता था। पाठक जी के मन में प्रारम्भ से ही समाज में एक बदलाव लाने की तम्मन्ना थी और उस कार्य में हेतुकर बाबू की भूमिका को आज तक पाठक साहब भी नहीं भुला पाए। जैसे-जैसे समय में बदलाव आ रहा था, पाठक जी पहले एक पुरानी मोटरसाइकिल (राजदूत) की सवारी करने लगे फिर एक पुराना एम्बेसेडर कर। उन दिनों भी हेतुकर बाबू के पास एक आसमानी रंग फिएट (DHA 6200) हुआ करता था । दोनों की मित्रता एक शिक्षक-छात्र से अधिक एक अद्वितीय मित्र के रूप में था। पटना कालेज ही नहीं, पटना विश्वविद्यालय के ही नहीं, बल्कि बिहार से दिल्ली तक, जहाँ भी सामाजिक सरोकार पर, स्वच्छता पर, अछूतों के उत्थान पर, उन्हें समाज के मुख्य धाराओं में जोड़ने की बात पर चर्चा होती थी; पाठक जी और हेतुकर बाबू का नाम अवश्य आता था। यदि कहा जाय तो दोनों की मित्रता, सम्मान, सम्बन्ध बहुत ही उत्कर्ष का था। उसे शब्दों में नहीं लिखा जा सकता है।</p>
<p>जब डॉ. पाठक ने 1970 में बिहार में सुलभ शौचालय संस्थान के नाम से एक स्वयंसेवी और लाभ निरपेक्ष संस्था की आधारशिला रखी, पटना विश्वविद्यालय के समाज शास्त्र विभाग के अध्यापक हेतुकर बाबू उनके पीछे खड़े थे। हेतुकर बाबू को अपने मित्र पर अटूट विश्वास था और उन्हें यह भी विश्वास था कि आने वाले समय में पाठक जी न केवल पटना, बिहार या भारत, अपितु विश्व के अन्य देशों में, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर &#8216;समाजशात्र&#8217; की परिभाषा को पुनः लिखेंगे। वे गाँधी की विचारधाराओं, जिससे वे अधिक प्रभावित थे, को अक्षरसः व्यवहार में अनुवाद करेंगे । आज भी याद है इन महान समाजशास्त्रियों के सुयोग्य नेतृत्व में कमाऊ शौचालयों को कम लागत वाले फ्लश शौचालयों अर्थात् ‘सुलभ शौचालयों’ में बदलने का एक क्रान्तिकारी अभियान शुरू किया। उन दिनों परम्परागत कमाऊ शौचालय पर्यावरण को प्रदूषित करते थे और दुर्गन्ध फैलाते थे। साथ ही, उन्हें साफ करने के लिए सफाई कर्मियों की आवश्यकता पड़ती थी। कम लागत वाले सुलभ शौचालय उपयोग की दृष्टि से व्यावहारिक थे, आज भी हैं और उन्हें साफ करने के लिए सफाई कर्मियों की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस प्रकार यह एक व्यवहार्य विकल्प है जो इसका उपयोग करने वालों के साथ ही सफाई कर्मियों के लिए भी वरदान सिद्ध हुआ है।</p>
<p>उन दिनों पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रोफ़ेसर मुसी राजा साहब, प्रोफ़ेसर सरदार देवनंदन सिंह साहब, प्रोफ़ेसर सतीश कुमार साहब, प्रोफ़ेसर आनंद कुमार साहब, प्रोफ़ेसर (श्रीमती) फुलोरा सिंह, प्रोफ़ेसर ज़ियाउद्दीन अहमद जैस समाजशात्र के महान हस्ताक्षर थे। प्रोफ़ेसर हेतुकर बाबू की हमेशा इक्षा होती थी की समाज में उनके द्वारा, उनके सहयोग से कुछ ऐसी संस्थागत व्यवस्था हो जो आने वाली पीढ़ियों के लिए, खासकर उनकी शिक्षा-शोध में लाभकारी हो। परिणाम यह हुआ कि हेतुकर बाबू-पाठक जी के सहयोग से मिथिला में पंजीकरण व्यवस्था पर शोध कर कार्य करने की बात हुई। इस सिलसिले में देश के कई विश्वविद्यालयों से भी वार्तालाप हुई। इतना ही नहीं, पटना में समाजशास्त्र और सामाजिक व्यवस्था पर उच्चस्तरीय शोध के लिए दोनों ने सुलभ इंस्टीटूट ऑफ़ सोसल स्टडीज की स्थापना की गई जिसका कोई ढ़ाई साल तक हेतुकर बाबू ऑर्जेनाइजिंग डाइरेक्टर भी थे। दोनों यह चाहते थे कि पटना में एक ऐसे संस्थान की स्थापना की जाय जो भविष्य में सामाजिक क्षेत्र के कार्यों पर शोध करने वाले शोधार्थी को मदद मिल सके &#8211; एक केंद्रीय संस्था के रूप में। लेकिन तत्कालीन व्यवस्था और हुकुमनानों के साथ &#8216;तालमेल नहीं बैठने के कारण पटना में स्थापित होने वाला वह संस्था दिल्ली आ गया।</p>
<p>समयांतराल हेतुकर बाबू &#8220;सोसिऑलोजी ऑफ़ सेनिटेशन&#8221; नामक मुलभुत किताब की रचना किये जिसे पाठक जी ने प्रकाशित भी किया। यह किताब वस्तुतः &#8216;सेनिटेशन&#8217; के मामले में एक इन्साइक्लोपीडिया है जो किसी भी शोधार्थी के लिए महत्वपूर्ण है। इन तमाम कार्यों में डॉ पाठक की भूमिका अद्वितीय है। यही कारण है कि जब सत्तर के दशक का सुलभ शौचालय समयांतराल सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन बना, सामाजिक क्षेत्र में हेतुकर बाबू की भूमिका के सम्मानार्थ डॉ पाठक नजरअंदाज नहीं किये।</p>
<p>कहते हैं डॉ पाठक का जन्म 1943 में बिहार के वैशाली जिले के एक गांव में एक रूढि़वादी ब्राह्णण परिवार में हुआ था। विगत चार दशकों और अधिक समय में पाठक जी से अनेकों बार सुना: “जब मैं 6 वर्ष का था तो मैंने एक कथित अस्पृश्य महिला को छू दिया और रूढि़वादी अस्पृश्यता को मानने वाली मेरी दादी ने शुद्ध करने की बात कहकर जबरन मुझे गाय का गोबर और गौ मूत्र पिलाया , जिसका कड़वा स्वाद आज भी मेरे मुंह में है।” डॉ पाठक के अनुसार वे जिस घर में पीला-बढे उसमे वैसे नौ कमरे तो थे, परन्तु एक भी शौचालय नहीं था। जब वे सोते थे तो सुबह-सवेरे अर्धनिद्रा में कुछ आवाजें सुनते थे, कोई बाल्टी उठा रहा होता था, कोई पानी भर रहा होता था और महिलाएं सूर्योदय से पहले शौच के लिए बाहर जा रही होती थीं। कोई महिला बीमार पड़ जाती तो उसे एक मिट्टी के बर्तन में ही शौच करना पड़ता था। कई महिलाओं के सिर में दर्द रहता क्योंकि उन्हें दिनभर अपने शौच को रोककर रखना पड़ता था। यह कहानी महज उनके घर या गाँव की नहीं बल्कि यही कहानी भारत के 7,00,000 गांवों और सैकड़ों शहरों की थी। उनकी शिक्षा चार स्कूलों में हुई और दुर्भाग्यवश किसी में भी शौचालय नहीं था।</p>
<p>पटना विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातक करने के बाद उन्हें 1968-69 में बिहार गांधी जन्म शताब्दी समारोह समिति के भंगी मुक्ति विभाग में काम करने का मौका मिला। समिति ने उन्हें सुरक्षित और सस्ती शौचालय तकनीक विकसित करने और दलितों के सम्मान के लिए काम करने को कहा ताकि उन्हें मुख्यधारा में शामिल किया जाय। ब्राह्मण परिवार के जन्म लिए एक व्यक्ति के लिए यह सबसे “नीच कार्य” समझा जाता था, परन्तु डॉ पाठक इसे सहर्ष स्वीकार किया – यह स्वीकार्यता न केवल उनके व्यक्तित्व में बदलाव लाया परन्तु उनके जीवन को एक नयी दिशा भी दिया। डॉ पाठक के जीवन में नया मोड़ तब आया, जब वे बेतिया की दलित बस्ती में तीन महीने के लिए उनके बीच रहने गए।</p>
<p>उस समय देश में जाति-प्रथा उत्कर्ष पर थी। उनके साथ रहते हुए डॉ पाठक ने जो देखा-सीखा-पीड़ा का अनुभव किया, वह सभी बातें इन्हे अपने जीवन को स्कैवेंजरों के लिए समर्पित करने की ओर उन्मुख कर दिया – पश्चिमी देशों में इस्तेमाल हो रही महंगी कलश और सीवर व्यवस्था के विकल्प के रूप में प्रभावी और सस्ती शौचालय व्यवस्था का विकास कैसे किया जाए, ताकि स्कैवेंजिंग प्रथा रोकी जा सके और उन्हें किसी दूसरे कार्य में पुनर्वासित किया जा सके। आज उन्होंने मानवीय सिद्धांतों के साथ तकनीकी नवाचार को मिलाकर संगठन शिक्षा के माध्यम से मानव अधिकारों, पर्यावरण स्वच्छता, ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों, अपशिष्ट प्रबंधन और सामाजिक सुधारों को बढ़ावा देने के लिए काम करता है। संगठन 50,000 स्वयंसेवकों की गिनती करता है।</p>
<p>पटना विश्वविद्यालय का यह समाजशात्री आज भारत सरकार के पद्मभूषण से अलंकृत है। उनका नाम ग्लोबल 500 रोल ऑफ़ ऑनर, स्टॉकहोम जल पुरस्कार, लीजेंड ऑफ़ प्लेनेट पुरस्कार, इंडियन अफेयर्स सोशल रिफॉर्मर ऑफ द ईयर 2017 का पुरस्कार, ऑर्डर पटेल अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार, न्यूयॉर्क शहर के मेयर बिल डी ब्लासियो ने 14 अप्रैल को बिंदेश्वर पाठक दिवस के रूप में घोषित किये। आज प्रोफेसर हेतुकर बाबू नहीं हैं, लेकिन दोनों समाजशास्त्रियों की स्वच्छता सम्बन्धी सोच ने भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में एक मिसाल कायम कर दी। करीब पांच दशक जिस अभियान को शुरू किया गया था, वह एक विशाल आंदोलन के रूप में, सामाजिक क्रांति के रूप में, सामाजिक चेतना के रूप में विश्व में अवतरित हुआ।</p>
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		<title>&#8220;ईक्षाशक्ति&#8221; की घोर किल्लत है सरकारी क्षेत्रों में; फिर कार्य कैसे होगा, ​कौन करेगा ? ​</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Nov 2018 06:23:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[Sanitation]]></category>
		<category><![CDATA[sever lines]]></category>
		<category><![CDATA[Sulabh]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली : ​आप शायद विस्वास नहीं करेंगे, लेकिन यह सत्य है। भारत में जहाँ प्रत्येक ७०९ लोगों पर एक पुलिसकर्मी है, वहीँ प्रत्येक ४०० व्यक्तियों पर एक-एक गैर-सरकारी संगठन भी हैं। यदि आंकड़ों को माना जाय तो वर्तमान समय में देश में जितने प्राथमिक से माध्यमिक शिक्षा तक के विद्यालय हैं, उनसे दो-गुना अधिक [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>नई दिल्ली : ​आप शायद विस्वास नहीं करेंगे, लेकिन यह सत्य है। भारत में जहाँ प्रत्येक ७०९  लोगों पर एक पुलिसकर्मी  है, वहीँ प्रत्येक ४०० व्यक्तियों पर एक-एक गैर-सरकारी संगठन भी हैं। यदि आंकड़ों को माना जाय तो वर्तमान समय में देश में जितने प्राथमिक से माध्यमिक शिक्षा तक के विद्यालय हैं, उनसे दो-गुना अधिक और यक़ीनन सरकारी अस्पतालों से २५० गुना अधिक गैर-सरकारी संगठन कागज़ पर &#8221;भाग-मिल्खा-भाग&#8221; कर रहे हैं, दौड़ रहे हैं।</p>
<p>भारत में ३१ लाख से अधिक गैर-सरकारी संगठन देश के २६ राज्यों में निबन्धित हैं जो सरकारी और अन्य क्षेत्रों से मिलने वाली राशियों में से न्यूनतम २० प्रतिशत राशि &#8220;कुर्सी के नीचे से&#8221; सम्बंधित विभागाध्यक्षों, कर्मचारियों को देकर जीवित हैं, फल -फूल रहे हैं। हाँ, विशेष परिस्थिति में कईयों को ब्लैकलिस्ट भी किया गया है। लेकिन हथकंडों के विभिन्न रूपों का इस्तेमाल कर &#8221;व्हाईट लिस्ट&#8221; में शामिल होने में इन्हे देर नहीं लगता। इस ३१ लाख गैर-सरकारी संगठनो के अतिरिक्त केंद्र शासित प्रदेशों में इनकी संख्या लगभग ८२,००० है। </p>
<p>पिछले दिनों आधुनिक भारत के स्वच्छता अभियान के अधिष्ठाता डॉ बिन्देश्वर पाठक, देश में पहली बार एक गैर-सरकारी संगठन &#8211; सुलभ इंटरनेशनल सोसल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन &#8211; की ओर से सीवर-लाइनों की सफाई में जुड़े लाखों कर्मचारियों को यह आस्वस्त किये की सफाई करने के दौरान किसी भी कर्मचारी की अब मृत्यु नहीं होगी, उनकी पत्नियां अब विधवा नहीं होंगी, उनके बच्चे अब अनाथ होंगे, सीवर लाईन कभी भी जाम नहीं होगा &#8211; बसर्ते इस सफाई कार्य के लिए जिम्मेदार विभाग, अधिकारीगण, अन्य महानुभाव उन कर्मचारियों के जीवन &#8211; मोल को समझें। डॉ पाठक का कहना था की अब वे यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते की देश में ऐसे उपरकण नहीं है, जो सीवर लाइनों की सफाई कार्य में मदद कर सके और जान-माल को रोक सके। </p>
<p><figure id="attachment_836" aria-describedby="caption-attachment-836" style="width: 300px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/11/2-1.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/11/2-1-300x200.jpg" alt="भारत में स्वच्छता के अधिष्ठाता डॉ बिन्देश्वर पाठक ​जिन्होंने सर पर मैला धोने की कुप्रथा का अंत किये ​" width="300" height="200" class="size-medium wp-image-836" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1-910x607.jpg 910w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1-696x464.jpg 696w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/2-1-630x420.jpg 630w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /></a><figcaption id="caption-attachment-836" class="wp-caption-text">भारत में स्वच्छता के अधिष्ठाता डॉ बिन्देश्वर पाठक ​जिन्होंने सर पर मैला धोने की कुप्रथा का अंत किये ​</figcaption></figure><br />
&#8220;मैं, यानि सुलभ, सीवर की सफाई के दौरान सफाई कर्मचारियों की होने वाली मौत की रोकथाम के लिए स्वदेशी तकनीक से विकसित अत्याधुनिक ‘सीवर सफाई मशीन’ ​लेकर उपस्थित हूँ। यह मशीन देश पहली बार आया है, जिसे मैं लेकर आया हूँ। ​यह मशीन कैमरा और अन्य सुविधाओं से लैस ​है और ​इस मशीन से मैनहोल को साफ किया जा सकेगा।​ इससे सीवर के अंदर जाकर सफाई की जा ​सकती तथा जहरीली गैस से लोगों की होने वाली मौत पर नियंत्रण लगाया जा ​सकता है ।​ यदि मैनहोल के अंदर लोगों को जाना भी पड़े तो उसके लिए सुरक्षा उपकरणों को भी लगाया गया है।​ अब यह सम्बद्ध विभाग, सरकारी संस्थाओं, सरकारों, नगर निगमों की  ईक्षा शक्ति पर निर्भर करता है कि वे इस मशीन को प्राथमिकता दें, या कर्मचारियों की जान-माल को नजर-अंदाज करें। अब वे यह नहीं कह सकते की आधुनिक उपकरण देश में ;उपलब्ध नहीं है, क्योंकि सुलभ मानव जीवन को नुकसान पहुंचाये बिना गहरे सीवरों की सफाई सुनिश्चित करने के लिए एक अनूठा उपकरण खरीदा है।​&#8221;</p>
<p>उन्होंने कहा कि विशेषज्ञों ने सुरक्षा उपायों के सुझाव दिये और इस कार्य को करने के लिए आवश्यक उपकरणों की व्यवस्था की गयी।​ डॉ पाठक ​के अनुसार नयी मशीन मैनहोल के आवधिक यांत्रिक सफाई के लिए आदर्श है​, इसमें शक्तिशाली जेट पंप लगा है जो प्रति मिनट 150 लीटर पानी के प्रवाह के लिए सक्षम है​ और विशेष रूप से डिजाइन किए गए लचीले स्टील रॉड का उपयोग करके डी-चोकिंग सीवर लाइन में भी सक्षम है।​ ​नयी सुलभ सीवर सफाई मशीन वाहन सुरक्षा, इलेक्ट्रो-हाइड्रोलिक रूप से संचालित​ है।  यह सीवर जेटिंग सह रॉडिंग सह मैकेनिकल मैनहोल डिस्लीटिंग मशीन के साथ​ व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों और सीवर त्वरित दृश्य पाइप निरीक्षण कैमरा के साथ है​, जो सीएनजी चालित है जिसे आठ फुट चौड़ी गलियों में भी ले जाया जा सकता है।​ ज्ञातब्य है कि ​पिछले तीन वर्षों के दौरान,सीवर लाइनों की​सफाई के दौरान 1300 से ज्यादा सफाई कर्मचारियों की मौत हुई हैं।</p>
<p>​पिछली जनगणना के अनुसार देश में कुल ७९३५ शहर हैं​,​ जिसमे करीब ३७७ मिलियन लोग, यानि देश की आवादी का ३१.२ फ़ीसदी रहते हैं। देश में करीब २०५ नगर निगमें हैं। </p>
<p>शहर विकास मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि जब तक सरकार, चाहे केंद्र​ की सरकार हो या राज्यों ​की; नगर निगमों में बैठे अधिकारीगण किसी के जीवन के महत्व को नहीं समझेंगे, इस उपकरण का इस्तेमाल होना प्रश्नवाचक चिन्ह लगाता है और इसका सबसे बड़ा कारण है इस कार्य के निमित्त आवण्टित राशियों का बन्दर-बाँट।<br />
<figure id="attachment_837" aria-describedby="caption-attachment-837" style="width: 300px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/11/3-1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/11/3-1-300x200.jpg" alt="​बच्चों को स्वच्छता के बारे में बताते डॉ पाठक ​" width="300" height="200" class="size-medium wp-image-837" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1-910x607.jpg 910w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1-696x464.jpg 696w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/11/3-1-630x420.jpg 630w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /></a><figcaption id="caption-attachment-837" class="wp-caption-text">​बच्चों को स्वच्छता के बारे में बताते डॉ पाठक ​</figcaption></figure><br />
कोई भी व्यक्ति, जिनके हाथों में अधिकार है (अपवाद छोड़कर) कभी नहीं चाहेंगे की वे इस नवीन उपकरण को लगाकर खुद आर्थिक रूप से कमजोर होते चले जाएँ। उनका कहना है कि सम्पूर्ण आवंटित राशियों में से न्यूनतन २० फीसदी राशि इन अधिकारीयों के लिए सुरक्षित हो जाता है ​निर्गत होने से पहले ही ​- दूसरे शब्दों में, अगर किसी ठेकेदार​ को किसी तरह का कार्य, चाहे सफाई ही क्यों न हो​, आवंटित किया जाता है तो उसे २० प्रतिशत राशि &#8220;देना पड़ता&#8221; है​ ​। अब बचे ८० फीसदी राशि में कितना कार्य होगा और कितना बंदरबाँट​,​ यह सम्पूर्ण रूप से ठेकेदारों के विवेक पर निर्भर करता है। </p>
<p>​अधिकारी का कहना है इस नवीनतम मशीन की कीमत अगर ४० लाख है तो देश के सभी २०५ नगर निगम खरीद सकते हैं &#8211; एक मशीन नहीं, दस-दस मशीन। लेकिन उन्हें २० फीसदी राशि नहीं मिल पायेगी, क्योंकि इसकी कीमत सर्वविदित है। अगर २० फीसदी दिए बिना खरीदने बात नहीं होती है तो स्वाभाविक है की मशीन की गुणवत्ता ख़राब होगी। आखिर वह भी कहाँ से पैसा देगा ?</p>
<p><iframe width="696" height="392" src="https://www.youtube.com/embed/llXr85LJmIo?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture" allowfullscreen></iframe></p>
<p>जब डॉ पाठक से इस विषय पर पूछा तो उनका कहना था की सरकार को, नगर निगमों को देश में जो &#8221;सफ़ेद गैर-सरकारी संस्थाएं&#8221; हैं, जो सरकार को अपनी कमाई का एक-एक पैसे का हिसाब देती है, समय पर कर चुकाती है, जिनकी छवियों पर कोई दाग नहीं है, देश का दो-दो शहरों में सफाई का सम्पूर्ण कार्य &#8211; सीवर लाइनों की सफाई सहित &#8211; उन्हें दे दें। अब यदि सरकारी आंकड़ों को देखें तो देश में कोई ३००० ऐसे गैर-सरकारी संस्थाएं तो जरूर हैं जो &#8220;बेदाग़&#8221; हैं और जिनके कार्य-कलापों पर कोई ऊँगली नहीं उठा सकते। लेकिन इसके लिए &#8220;ईक्षाशक्ति&#8221; का होना नितांत आवश्यक है।  </p>
<p>डॉ पाठक एक बात और कहे: उनका कहना था की जिस किसी भी अधिकारी की लापरवाही के कारण सीवर लाइनों में कार्य करने वाले कर्मचारियों की मृत्यु हो; सम्बद्ध नगर निगम मृतक के परिवारों का भरण-पोषण, बच्चों की शिक्षा का सम्पूर्ण जबाबदेही ले, साथ ही, उस अधिकारी को न्यूनतम २० वर्षों की सजा हो। </p>
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		<title>अगर &#8220;सुलभ&#8221; नहीं होता तो आज भी &#8216;समाज का एक विशाल समुदाय&#8217; अपने माथों पर देश के सम्भ्रान्तो का मल-मूत्र ढोता रहता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 20 May 2018 08:35:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[स्वास्थ]]></category>
		<category><![CDATA[Banaras]]></category>
		<category><![CDATA[Campaign]]></category>
		<category><![CDATA[Clean]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
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		<category><![CDATA[Ministry]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आज भारत सरकार और देश की विभिन्न राज्य सरकारें &#8220;स्वच्छ भारत अभियान&#8221; के नाम का &#8220;ताल&#8221; चाहे जितना &#8220;ठोक&#8221; ले, इस अभियान के नाम पर चाहे जितना &#8220;कबड्डी खेल&#8221; ले, अभियान की सफलता का चाहे जितना &#8220;चौका&#8221; &#8220;छक्का&#8221; फेंके; सच तो यही है कि आज से पचास साल पूर्व अगर &#8220;सुलभ शौचालय&#8221; दसकों से चली [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>आज भारत सरकार और देश की विभिन्न राज्य सरकारें &#8220;स्वच्छ भारत अभियान&#8221; के नाम का &#8220;ताल&#8221; चाहे जितना &#8220;ठोक&#8221; ले, इस अभियान के नाम पर चाहे जितना &#8220;कबड्डी खेल&#8221; ले, अभियान की सफलता का चाहे जितना &#8220;चौका&#8221; &#8220;छक्का&#8221; फेंके; सच तो यही है कि आज से पचास साल पूर्व अगर &#8220;सुलभ शौचालय&#8221; दसकों से चली आ रही एक घृणित और अमानवीय कार्य के प्रति देशव्यापी आन्दोलन नहीं चलाया होता, अपनी सोच को जमीन पर क्रियान्वित नहीं किया होता, तो आज भी समाज का एक विशाल समुदाय, एक विशाल मतदादातों का समूह, जो राजनीतिक बाज़ार में सरकार बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वह, उसकी पत्नियाँ, उसके बेटे-बेटियाँ, बहुएँ अपने-अपने सर पर भारतीय सम्भ्रान्तों का &#8220;मल-मूत्र-टट्टी-पैखाना उठाते रहता&#8221; और दरवाजे से दूर रात की बची रोटियाँ लोगबाग फेंककर उसे देते रहते। पढ़ने-पढ़ाने शिक्षित होने, रोजगार-नौकरी पाने की बात तो वह अपने सपने में भी नहीं सोच सकता था &#8211; न जीवित और न ही मरणोपरान्त।  </p>
<p>यदि देखा जाय तो ​आज गाँधी के विचार और उनके सपने राजनीतिक बाजार में बिक रहे हैं, खुलेआम। जबकि सच तो यह है कि कोई भी शाशन, व्यवस्था या सरकार कभी भी भंगी-समाज का सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक उत्थान चाहती ही नहीं थी। और अगर ऐसा नहीं था तो आज़ादी के बाद भी सरकार इस विशाल समुदाय को विकास की मुख्यधारा में क्यों जोड़ी &#8211; पूर्णतः। </p>
<p><iframe loading="lazy" width="560" height="315" src="https://www.youtube.com/embed/A8SfTWVE5zw" frameborder="0" allow="autoplay; encrypted-media" allowfullscreen></iframe></p>
<p>वैसे सरकार और व्यवस्था के अनुसार भारतीय संविधान के मद्दे नजर अस्पृश्यता, दहेज, बाल विवाह, जाति व्यवस्था और अन्य अनेक सामाजिक बुराइयों को खत्म कर दिया गया है। लेकिन धरातल पर ये सभी कुप्रथाएं आज भी समाज में विद्यमान है। इतना ही नहीं, मानव मल-मूत्र की सफाई की प्रथा को खत्म करने के लिए भी कानून बना है, लेकिन व्यवहार में सरकारी और सामाजिक उदासीनता के कारण वह प्रभावी नहीं हो पाया कोई पचास के दसक और उसके बाद भी जब तक &#8221;सुलभ&#8221; ने सामाजिक आंदोलन नहीं चलाया, शौचालय की उपयोगिता को नहीं बताया, इन भंगी-परिवारों को समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास नहीं किया ।  </p>
<p>कल तक जो लोग, विशेषकर समाज  व्यवस्था के संभ्रांत लोग, अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्त्ता, कॉर्पोरेट, मंत्री, अधिकारी और न जाने कौन-कौन, अपने &#8220;खाने के मेज पर शौच की बात करना मानवीयता और मनुष्यता के खिलाफ समझते थे; आज शहरों और महानगरों, यहाँ तक की कारपोरेट घरानों, सरकारी कार्यालयों में &#8220;भोजनावकाश&#8221; के समय &#8220;भोजन करते लोग मल-मूत्र के बारे में बात करते हैं, शौचालय की बात करते हैं। और इसका मुख्य कारण है कि सुलभ ने अपने पांच-दसक के प्रयास से न केवल गाँधी का सपना साकार किया जमीन पर, बल्कि &#8220;भारत से मैला ढोने की कुप्रथा को भी समाप्त किया।&#8221;</p>
<p>अब तो जो हो रहा है विभिन्न अभियानों के तहत, वह तो महज &#8220;शौचालयों का राजनीतिकरण&#8221; है और अगर ऐसा नहीं है तो १२० करोड़ की आवादी वाले देश में, ऐसा अनुमान है कि प्रत्येक १४०० व्यक्तियों पर एक शौचालय है। वैसे केंद्र सरकार के लोग बाग़ यह कहते नहीं थक रहे हैं कि आगामी २०१९ तक प्रत्येक घरों में शौचालय हो जायेगा। इसके लिए तो ब्रह्माण्ड से विश्वकर्मा को ही धरती पर अवतरित होना होगा। </p>
<p>बहरहाल, डॉ पाठक ने लगभग अपना सारा जीवन स्वच्छता के क्षेत्र में और हाथ से मानव-मल-मूत्र उठाने  की समस्या को खत्म करने की कोशिश में लगाया । उन्होंने इसी विषय पर अपनी पीएचडी की और अन्य शिक्षा संबंधी कार्य उस वक्त शुरू किए, जब उन्होंने 1970 में सुलभ शौचालय संस्थान की स्थापना की जो बाद में सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाईजेशन बन गया। </p>
<p>जब संडेपोस्ट उनसे पूछा: &#8220;अगर सुलभ, जिसने स्वच्छता अभियान की नीव ५० वर्ष पहले डाली थी, नहीं होता तो &#8220;भारत में स्वच्छता का हश्र क्या होता?&#8221; इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा: &#8220;इस बात का उत्तर मैं नहीं दे सकता, लेकिन इतना जरूर कहूंगा की अगर सुलभ नहीं होता तो देश में भंगी-मुक्ति नहीं हो पाता और आज भी उस समुदाय के लोग अपने सर पर मैला उठाते रहते।&#8221; </p>
<p>कुछ समाज शास्त्रियों का मानना है कि ‘खुले में शौच की प्रथा को खत्म करने का पहला सर्वाधिक प्रभावकारी तरीका है सुलभ शौचालय का निर्माण जिसका आधार है दो गड्ढों वाला (टू पीट फोर फ्लश) शौचालय, जिसमें मौके पर ही बिना हाथ लगाए सफाई हो जाती है। यह किफायती है, सांस्कृतिक दृष्टि से स्वीकार्य और विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और जलवायु संबंधित स्थितियों के लिए उपयुक्त है। मैले की मौके पर सफाई एक नई अवधारणा है जिसे यदि वैश्विक स्तर पर स्वीकार कर लिया जाए तो वह बहुत बड़े पैमाने पर हमारी नदियों को प्रदूषण मुक्त और शहरों को साफ-सुथरा रखेगी। </p>
<p>उनका कहना है कि अभी तक तो हमारे पास सीवेज अपजल निस्तारण विधि रही है, जो कि मंहगी है, प्रदूषण पैदा करती है और जिसके लिए स्कैवेंजर की जरुरत होती है। सुलभ की दो गड्ढे वाली शौचालय प्रणाली इन सभी समस्याओं का निदान है और यही कारण है कि सुलभ की इस तकनीक को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली हुई है। उसे निजी घरों और सार्वजनिक शौचालय परिसरों में लगाया गया है।</p>
<p>अकेले कानून हाथों से की जाने वाली स्कैवेंजिंग को खत्म नहीं कर सकता । राज्य-सरकारों तथा केंद्र-सरकार ने कानून बनाए हैं- स्कैवेंजरों के पुनर्वास के लिए निधि की व्यवस्था भी की है, लेकिन यह उस स्तर तक कारगर साबित नहीं हुआ है, जितना कि होना चाहिए। सरकार ने हाथ से सफाई करने वाले स्कैवेंजरों के लिए १०० करोड़ रुपए की व्यवस्था की थी, लेकिन किसी भी राज्य से धन नहीं लिया क्योंकि यह जानते ही नहीं थे कि हाथों से सफाई करने वाले स्कैवेंजरों को किस तरह पुनर्वासित किया जाए।</p>
<p>इसलिए जब हम शौचालय की बात करते हैं, तब हम समूची सभ्यता की बात करते हैं- अर्थव्यवस्था सामाजिक मूल्य, विचारधारा, धार्मिक विश्वास, राजनीतिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाएं। सामाजिक परिवर्तन घटित होने में समय लगता है, क्योंकि वह सामाजिक विकास, आर्थिक विकास, शिक्षा और सामाजिक मूल्य से जुड़ा होता है। अब हमें वह प्रक्रिया शुरू करनी है। वह हमने कर ली है। हमने सामाजिक परिवर्तन की राह में लंबी दूरी तय की है, उसके लिए एक संपूर्ण स्वच्छता व्यवस्था गठित करके। (क्रमशः)</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/health/easy-toilets-of-india">अगर &#8220;सुलभ&#8221; नहीं होता तो आज भी &#8216;समाज का एक विशाल समुदाय&#8217; अपने माथों पर देश के सम्भ्रान्तो का मल-मूत्र ढोता रहता</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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