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	<title>samar shail natural farm Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>&#8216;प्राकृतिक आपदाओं&#8217; से बचने के लिए &#8216;बंजर भूमि&#8217; को &#8216;हरा-भरा&#8217;, &#8216;कृषि योग्य&#8217; बनाना होगा और इसके लिए प्राकृतिक कृषि ही एकमात्र विकल्प है (भाग-4)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 17 Jul 2023 02:50:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>पूर्णिया / पटना / नई दिल्ली : आज देश में पर्यावरण को बचाने सम्बन्धी जितने ढ़ोल &#8211; नगाड़े पिटे जाएँ, सरकारी कोषागार से पैसे पानी की तरह बहाया जाए, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि देश में &#8216;वनों से भरी&#8217; भूमि की तुलना में &#8216;बंजर&#8217; भूमि की फीसदी अधिक है और [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/agriculture/barren-land-has-to-be-made-green-cultivable-to-avoid-natural-calamities">&#8216;प्राकृतिक आपदाओं&#8217; से बचने के लिए &#8216;बंजर भूमि&#8217; को &#8216;हरा-भरा&#8217;, &#8216;कृषि योग्य&#8217; बनाना होगा और इसके लिए प्राकृतिक कृषि ही एकमात्र विकल्प है (भाग-4)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पूर्णिया / पटना / नई दिल्ली : आज देश में पर्यावरण को बचाने सम्बन्धी जितने ढ़ोल &#8211; नगाड़े पिटे जाएँ, सरकारी कोषागार से पैसे पानी की तरह बहाया जाए, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि देश में &#8216;वनों से भरी&#8217; भूमि की तुलना में &#8216;बंजर&#8217; भूमि की फीसदी अधिक है और बढ़ रही है । आज कृषि के क्षेत्र में हम भले &#8216;आत्मनिर्भरता&#8217; की बात करें, लेकिन सरकारी आंकड़े यह भी कहते हैं कि देश में आज सिर्फ 51 फीसदी जमीन पर खेती होती है, जबकि चार फीसदी भूमि पर चरागाह है। आज देश में 21 फीसदी जमीनों पर ही &#8216;वन&#8217; है जबकि &#8216;बंजर&#8217; भूमि की फीसदी 24 फीसदी है। यह आंकड़े मैं नहीं, सरकारी दस्तावेजों में अंकित है। </strong></p>
<p>इन दशाओं और दुर्दशाओं के मद्दे नजर देश में एक ऐसी खेती की जरूरत है जो न केवल पर्यावरण के अनुकूल हो, उसे मजबूत और समृद्ध करने वाली हो; बल्कि लागत की दृष्टि से भी कम हो, आर्थिक तौर पर कृषकों पर कम भार डाले, किसान आत्म हत्या नहीं करे, उन्नत किस्म का फसल उत्पन्न करे और समाज के साथ देश भी आत्मनिर्भर हो। यही कारण है कि आज देश-विदेश में लाखों, अरबों की कमाई करने वाले युवक, युवतियां, जिनके गाँव में अपनी जमीन है, अथवा पट्टे पर ही सही जमीन प्राप्त होने की सुविधा है, भारत की गाँव की ओर आ रहे हैं &#8211; प्राकृतिक खेती करने के लिए। </p>
<p>प्राकृतिक खेती एक ऐसी खेती है जो प्रकृति की जीवन से मेल खाती है। यह उत्पादन प्रणालियों और फसल उत्पादन को नियोजित तो करती ही है, साथ ही, प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र में सूर्य के प्रकाश, नमी, मिट्टी, फसलों, जीवित प्राणियों और रोगाणुओं के बीच परस्पर समन्वय रखकर बेहतर पैदावार करती है। प्राकृतिक खेती की ओर आकर्षण आज की पीढ़ियों को आत्मविश्वास जगा रहा है। यह सच है कि आज भी भारत के जिन 51 फीसदी जमीनों पर खेती होती है, उस पर काम करने वाले किसानों की शिक्षा और तकनीकी योग्यता &#8216;शून्य&#8217; ही है और अधिकतर मामले में वे अपने &#8216;अनुभवों&#8217; के आधार पर खेती करते आ रहे हैं, कर रहे हैं। </p>
<figure id="attachment_4997" aria-describedby="caption-attachment-4997" style="width: 780px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-7.jpeg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-7.jpeg" alt="" width="780" height="1040" class="size-full wp-image-4997" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-7.jpeg 780w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-7-225x300.jpeg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-7-768x1024.jpeg 768w" sizes="(max-width: 780px) 100vw, 780px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4997" class="wp-caption-text">हल्दी का पौधा</figcaption></figure>
<p><strong>लेकिन आज शैक्षिक और तकनिकी योग्यताधारी जब उन किसानों का हाथ पकड़ रहे हैं, उत्पादन की गुणवत्ता के साथ-साथ उत्पादन की मात्रा में भी वृद्धि होना स्वाभाविक है। कभी बिहार-बंगाल-उड़ीसा राज्यों का काला पानी कहा जाने वाला &#8216;पूर्णिया&#8217; जिला के रामनगर इलाके में सैकड़ों एकड़ भूमि पर &#8216;प्राकृतिक खेती&#8217; को अनुवादित करने वाले मुद्दत तक देश के &#8216;कॉर्पोरेट घरानों, खासकर रिलायंस में वरिष्ठ पदों को सँभालने वाले श्री हिमकर मिश्रा एक दृष्टान्त है। श्री हिमकर मिश्रा आज न केवन राष्ट्रीय, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय कृषि-विशेषज्ञों को अपनी ओर आकर्षित भी कर रहे हैं।</strong>   </p>
<p>प्राकृतिक खेती को &#8220;कीटनाशक मुक्त खेती&#8221; भी कहा जा सकता है । यह एक कृषि-पारिस्थितिक रूप से मजबूत कृषि प्रणाली है जिसमें फसलें, पेड़ और पशुधन शामिल हैं, जो कार्यात्मक जैव विविधता के सर्वोत्तम उपयोग की अनुमति देता है। यह मिट्टी की उर्वरता बहाली, वायु गुणवत्ता, और न्यूनतम और/या ग्रीनहाउस गैस जैसे कई अन्य लाभ प्रदान करते हुए किसानों की आय बढ़ाने का वादा करता है। </p>
<p>श्री मिश्रा कहते हैं: &#8220;आज 48 वर्ष हो रहे हैं प्राकृतिक खेती को जमीनी सतह पर अनुवादित करने को। यह खेती प्राकृतिक कृषि के अन्वेषक, जापानी किसान और दार्शनिक  <strong>मासानोबू फ़ुकुका</strong> के सिद्धांतों पर आधारित है। मसानोबू फुकुओका एक जापानी किसान और दार्शनिक थे। सं 1975 में उनके उपन्यास &#8220;द वन-स्ट्रॉ रेवोल्यूशन&#8221; में इस कृषि पद्धति को लोकप्रिय बनाया। प्राकृतिक खेती को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पृथ्वी की रक्षा के लिए एक प्रकार के पुनर्स्थापनात्मक कृषि व्यवसाय योजना के रूप में मान्यता प्राप्त है।&#8221;</p>
<figure id="attachment_4998" aria-describedby="caption-attachment-4998" style="width: 810px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16.jpeg"><img decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16.jpeg" alt="" width="810" height="810" class="size-full wp-image-4998" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16.jpeg 810w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16-300x300.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16-150x150.jpeg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16-768x768.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16-24x24.jpeg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16-48x48.jpeg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16-96x96.jpeg 96w" sizes="(max-width: 810px) 100vw, 810px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4998" class="wp-caption-text">हल्दी</figcaption></figure>
<p>श्री मिश्रा आगे कहते हैं कि &#8220;आज देश की सरकार भी एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में प्राकृतिक खेती को स्वीकार की है। और यही कारण है कि आज किसानों को रसायन मुक्त खेती अपनाने के लिए प्रेरित करने और प्राकृतिक खेती की पहुंच बढ़ाने के लिए , सरकार ने भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (बीपीकेपी) को बढ़ाकर 2023-24 तक एक अलग और स्वतंत्र योजना के रूप में प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन (एनएमएनएफ) तैयार किया है।&#8221;</p>
<p><strong>&#8220;समर शैल प्राकृतिक फार्म&#8221;</strong> के संस्थापक श्री हिमकर मिश्रा का कहना है कि &#8220;आत्मनिर्भर भारत हमारे प्रधानमंत्री जी का सपना है। आत्मनिर्भर तभी बन सकते हैं जब हमारी कृषि, हमारा एक-एक किसान आत्मनिर्भर हो। ऐसा तभी संभव है जब हम रासायनिक कृषि की जगह प्राकृतिक कृषि के सिद्धांतो को आत्मसाध करें एवं प्राकृतिक खेती को एक जन आंदोलन का स्वरुप दें। प्राकृतिक कृषि भारत के लिए कोई नई चीज़ नहीं है। यह प्राचीनकाल से भारतीय संस्कृति, भारतीय सभ्यता और हमारी परंपराओं का अंग है। हमारे वेदों, पुराणों, उपनिषदों में प्राकृतिक खेती के ज्ञान का खजाना मिलता है। यह खेती हमारी जड़ों से जुड़ी है। हमारे पूर्वज सदियों पहले से प्राकृतिक खेती करते रहे हैं।&#8221;</p>
<p>उनका मानना है कि प्राकृतिक कृषि इन चार सिद्धांत &#8211; हल नहीं, जुताई-निंदाई नहीं, कोई रासायनिक उर्वरक या तैयार की हुई खाद नहीं, हल द्वारा निराई, गुड़ाई नहीं तथा रसायनों पर कोई निर्भरता नहीं &#8211; पर आधारित है। इस कृषि व्यवस्था में हम प्रकृति के आदेशों का पालन करते हैं। प्राकृतिक खेती को रसायन मुक्त खेती के रूप में भी परिभाषित कर सकते हैं, जिसमें केवल प्राकृतिक आदानों का उपयोग करता है। श्री मिश्रा का मानना है कि &#8220;जब तक हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे, हम प्राकृतिक आपदाओं का शिकार होते रहेंगे। विश्व आज जहाँ ग्लोबल वार्मिंग की बात कर रहा है, हम सबों को मिलकर &#8216;बंजर भूमि&#8217; को &#8216;हरा-भरा&#8217; कृषि योग्य&#8217; बनाना होगा और इस क्रिया में प्राकृतिक कृषि ही एक मात्र विकल्प है।&#8221; </p>
<figure id="attachment_4999" aria-describedby="caption-attachment-4999" style="width: 1040px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-17.jpeg"><img decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-17.jpeg" alt="" width="1040" height="780" class="size-full wp-image-4999" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-17.jpeg 1040w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-17-300x225.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-17-1024x768.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-17-768x576.jpeg 768w" sizes="(max-width: 1040px) 100vw, 1040px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4999" class="wp-caption-text">समर शैल प्राकृतिक फार्म में काम करती महिलाएं</figcaption></figure>
<p>उनके अनुसार, प्राकृतिक खेती में अन्य जिन सिद्धांतों को अपनाया जाता है, उससे अधिक महत्वपूर्ण &#8216;सात-सतह पर्यावरणीय सिद्धांत का अपनाना है। आम तौर पर हम ध्यान नहीं देते लेकिन खुले आसमान से लेकर जमीन और उसके अंदर तक जाने वाली सूर्य की रोशनी और उसका तप पेड़-पौधों से लेकर फसल और फलों के साथ-साथ सम्पूर्ण कृषि व्यवस्था को प्रभावित करता है। इसे दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि परिपक्व पारिस्थितिक तंत्र के घटक भागों के बीच बड़ी संख्या में संबंध होते हैं। जैसे पेड़, ग्राउंड कवर, मिट्टी, कवक, कीड़े और जानवर। ये प्राकृतिक परतें (सूर्य की अपेक्षित रौशनी) परतें कार्यात्मक पारिस्थितिकी प्रणालियों को डिजाइन और कार्यान्वित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले कई उपकरणों में से एक हैं जो टिकाऊ हैं और मनुष्यों के लिए प्रत्यक्ष लाभ हैं।</p>
<p><strong>उसी सात-सतही प्राकृतिक सिद्धांत के अंतिम सिंद्धांत का उत्पाद है &#8211; हल्दी </strong>और जमीन के अंदर उत्पन्न होने वाली वस्तुएं।आप भले माने अथवा नहीं, दुनिया भर में हल्दी की जितनी खपत होती है, भारत अकेले उसका 80 फीसदी उत्पादन करता है। भारत दुनिया में हल्दी का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। भारत से फ्रांस, जापान, अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, नीदरलैंड, अरब और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में हल्दी का निर्यात किया जाता है। दुनिया का 60% हल्दी एक्सपोर्ट भारत से किया जाता है। हल्दी का भारतीय रसोई घरों में एक प्रमुख स्थान है। भोजन में हल्दी को शामिल करने से हम कई तरह की बीमारियों से बच सकते हैं क्योंकि यह शरीर की इम्युनिटी को बढ़ाने में मददगार साबित होता है। </p>
<figure id="attachment_5000" aria-describedby="caption-attachment-5000" style="width: 1080px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-12.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-12.jpeg" alt="" width="1080" height="810" class="size-full wp-image-5000" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-12.jpeg 1080w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-12-300x225.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-12-1024x768.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-12-768x576.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1080px) 100vw, 1080px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5000" class="wp-caption-text">अपने फ़ार्म में कार्य करते समर शैल प्राकृतिक फार्म के संस्थापक श्री हिमकर मिश्रा</figcaption></figure>
<p>श्री मिश्रा कहते हैं: &#8220;इस फार्म में हल्दी के उत्पादन पर भी विशेष दिए दिए हैं। कई एकड़ों में फैले इस प्राकृतिक फार्म में हल्दी प्रचुर मात्रा में उपजाया जाता है।&#8221; वैसे देश के कई इलाके में किसान हल्दी की खेती की ओर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं और इसको लेकर तरह-तरह के प्रयोग व तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। कहते हैं कि अगर सही तकनीक और बीज की मदद से हल्दी की खेती की जाय तो एक एकड़ में 65-100 क्विंटल तक हल्दी उगा सकते हैं। आज भारत के बाज़ारों में हल्दी  60 से 100 रुपये प्रति किलो बिक रही है । हल्दी के कई किस्में है, मसलन भारत में हल्दी की लगभग 30 किस्में पाई जाती है इनमें लकाडोंग, अल्लेप्पी, मद्रास, इरोड, सांगली, सोनिया, गौतम, रश्मि, सुरोमा, रोमा, कृष्णा, गुन्टूर, मेघा, सुकर्ण, कस्तूरी, सुवर्णा, सुरोमा और सुगना, पन्त पीतम्भ आदि । </p>
<p>श्री मिश्रा का कहना है कि &#8220;हल्दी में प्रोटीन, वसा, पानी, कार्बोहाइड्रेट, रेशा और खनिज लवण की भी पर्याप्त मात्रा पायी जाती है। हल्दी में बहुत सारे औषधीय गुण होते हैं। ये फसल छायादार वाली जगह पर भी लगा सकते हैं। औषधीय गुण होने के कारण हल्दी को जानवर भी नहीं खाता है। इसके अलावा आयुर्वेदिक उपचार में भी हल्दी को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।जिसके कारण आयुर्वेदिक दवाइयों को बनाने के लिए भी इसका उपयोग अधिक मात्रा में कर रहे हैं। </p>
<p>उनका मानना है कि हल्दी उत्पादन के मामले में भारत को  विश्व में पहला स्थान प्राप्त होने के साथ-साथ सबसे बड़ा निर्यातक भी कहा जाता है | दुनिया के नीदरलैंड, यूनाइटेड किंगडम, जापान, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, सउदी अरब, जर्मनी और अमेरिका देशों में भारत से हल्दी का निर्यात किया जाता है। भारत में हल्दी की खेती पश्चिम बंगाल, केरल, मेघालय, तमिलनाडु, ओडिशा, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक राज्य में मुख्य तौर पर की जाती है, तथा अकेले आंध्र प्रदेश में 40 प्रतिशत हल्दी का उत्पादन किया जाता है। </p>
<figure id="attachment_5001" aria-describedby="caption-attachment-5001" style="width: 1536px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-9.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-9.jpeg" alt="" width="1536" height="2048" class="size-full wp-image-5001" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-9.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-9-225x300.jpeg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-9-768x1024.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-9-1152x1536.jpeg 1152w" sizes="auto, (max-width: 1536px) 100vw, 1536px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5001" class="wp-caption-text">समर शैल प्राकृतिक फार्म</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, <strong>बेहतरीन औषधीय गुणों के कारण</strong> इस प्राकृतिक फार्म में <strong>काली हल्दी</strong> की खेती पर भी ध्यान दिया जा रहा है। काली हल्दी अपनी औषधीय गुणों के चलते प्रसिद्ध है। आयुर्वेद, होम्योपैथी और कई जरूरी दवाइयों के निर्माण में हल्दी का इस्तेमाल किया जाता है। विगत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर &#8216;कोरोना&#8217; बीमारी के फैलने के बाद पूरे विश्व में हल्दी की मांग बहुत अधिक हो गई है। कहते हैं हल्दी &#8216;इम्यूनिटी&#8217; को बढ़ता है, यानि यह एक प्रकार का &#8216;प्राकृतिक बूस्टर&#8217; है। स्वाभाविक है कि इस फसल के उत्पादन की ओर लोगों का आकर्षण। ज्ञातव्य हो कि काली भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में काली हल्दी की कीमत 500 से 4,000 रुपये प्रति किलो है। और इसका उत्पादन भी लोग अधिक नहीं कर पा रहे हैं। </p>
<p>कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि <strong>काली हल्दी</strong> के लिए भुरभुरी दोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती है। इसकी खेती करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि खेत में बारिश का पानी ना रुके। एक हेक्टेयर में काली हल्दी के करीब 2 क्विंटल बीज लग जाते हैं। इसकी खेती के लिए जून का महीना बेहतर माना जाता है। इसकी फसल को ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं रहती है। इसके औषधीय गुणों के कारण इसमें कीट नहीं लगते हैं। </p>
<p><strong>क्रमशः </strong></p>
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		<title>भारत में &#8216;कदम्ब&#8217; के वृक्षों/फलों का आकलन करने में &#8216;उदारता&#8217; नहीं दिखाए, परिणाम: &#8216;कम स्पर्म, चीनी, कैंसर, वेजाइना जैसी बीमारियों (भाग-2)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/agriculture/plant-one-kadamb-plant</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Jul 2023 05:45:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कृषि]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>रामनगर / पटना / नई दिल्ली :  सम्मानित श्री अमिताभ बच्चन साहब भले &#8216;चीनी कम&#8217; फिल्म बनायें, फिल्म के पट-कथा का जो भी अर्थ हो, लेकिन शाब्दिक अर्थ में भारत ही नहीं, विश्व के लोग तो यही समझेंगे कि मनुष्य को &#8216;चीनी कम&#8217; प्रयोग करना चाहिए। परन्तु, यह सन्देश &#8216;सार्थक&#8217; सिद्ध नहीं हुआ। अगर होता [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/agriculture/plant-one-kadamb-plant">भारत में &#8216;कदम्ब&#8217; के वृक्षों/फलों का आकलन करने में &#8216;उदारता&#8217; नहीं दिखाए, परिणाम: &#8216;कम स्पर्म, चीनी, कैंसर, वेजाइना जैसी बीमारियों (भाग-2)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रामनगर / पटना / नई दिल्ली :  सम्मानित श्री अमिताभ बच्चन साहब भले &#8216;चीनी कम&#8217; फिल्म बनायें, फिल्म के पट-कथा का जो भी अर्थ हो, लेकिन शाब्दिक अर्थ में भारत ही नहीं, विश्व के लोग तो यही समझेंगे कि मनुष्य को &#8216;चीनी कम&#8217; प्रयोग करना चाहिए। परन्तु, यह सन्देश &#8216;सार्थक&#8217; सिद्ध नहीं हुआ। अगर होता तो भारत में तक़रीबन 80 मिलियन लोग &#8216;चीनी की बिमारी&#8217; के शिकार नहीं होते। </strong></p>
<p>इतना ही नहीं, भारत में महिलाओं को &#8216;गर्भ धारण&#8217; नहीं हो पाने की एक भयंकर बीमारी सामने आ रही है। आम तौर पर वैसे कई कारणों से &#8216;गर्भ धारण&#8217; नहीं हो पाता, लेकिन एक सबसे महत्वपूर्ण कारण &#8216;कम शुक्राणुओं की संख्या&#8217; होती है। यह समस्या कुछ पुरुषों में, अंतर्निहित होती है। जैसे विरासत में मिली क्रोमोसोमल असामान्यता, हार्मोनल असंतुलन, फैली हुई वृषण नसें या ऐसी स्थिति जो शुक्राणु के मार्ग को अवरुद्ध करती है। इसके अलावे, कम सेक्स ड्राईव, इरेक्शन बनाये रखने में कठिनाई, अंडकोष के आस-पास दर्द या सूजन, गांठ, शरीर पर बालों की अधिक संख्या या फिर हार्मोन की असामान्यता भी हो सकते हैं। बातें छोटी-छोटी होती हैं लेकिन लोग &#8216;छुपाते&#8217; हैं &#8211; कोई अपने &#8216;पुरुषार्थ&#8217; पर आंच नहीं आने देते, तो कोई अपनी स्त्रीत्व पर। </p>
<p>इसी तरह, भारतीय आयुर्विज्ञान की सांख्यिकी अगर सही है तो हमारे देश में तक़रीबन प्रत्येक नौ व्यक्तियों में एक व्यक्ति के शरीर में &#8216;कैंसर&#8217; के लक्षण विकसित हो रहे हैं। सांख्यिकी के अनुसार वर्ष 2022 में भारत मेंकैंसर के मामलों की अनुमानित संख्या 14,61,427(क्रूड रेट: 100.4 प्रति 100,000)पाई गई। भारत में, नौ मेंसे एक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में कैंसर होने की संभावना है। फेफड़े और स्तनकैंसर क्रमशः पुरुषों और महिलाओं में प्रमुख स्थान बना रहे हैं। बचपन (0-14 वर्ष)के कैंसर में, लिम्फोइडल्यूकेमिया (लड़के: 29.2% और लड़कियां: 24.2%) अग्रणी स्थान हो रहा है । 2020 की तुलना में2025 में कैंसर के मामलों में 12.8 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है। </p>
<p>इतना ही नहीं,  भारत दुनिया की लगभग 17.31% आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। इसका अर्थ है कि इस ग्रह पर छह में से एक व्यक्ति भारत में रहता है। लगभग 72.2% आबादी लगभग 638,000 गांवों में रहती है और शेष 27.8% लगभग 5,480 कस्बों और शहरी समूहों में रहती है। जनसंख्या जनगणना से यह स्पष्ट है कि जनसंख्या अनुपात प्रति 1,000 पुरुषों पर 940 महिलाओं का है। इसके अलावे, भारत में जीवन प्रत्याशा 68 वर्ष है, महिलाओं के लिए जीवन प्रत्याशा 69.6 वर्ष और पुरुषों के लिए 67.3 वर्ष है।</p>
<p>सांख्यिकी यह भी कहता है कि भारत में अनुपात के संदर्भ में बहुत सारी असमानताएं सामने आती हैं, जिनमें से एक मौखिक स्वास्थ्य का क्षेत्र है। ग्रामीण क्षेत्रों में दंत चिकित्सक-से-जनसंख्या अनुपात निराशाजनक रूप से कम है और 72% ग्रामीण आबादी के लिए 2% से भी कम दंत चिकित्सा उपलब्ध हैं। आंकड़े गंभीर वास्तविकता प्रस्तुत करते हैं कि भारत में 95% आबादी पेरियोडोंटल बीमारी से पीड़ित है, केवल 50% टूथब्रश का उपयोग करते हैं, और केवल 2% दंत चिकित्सक के पास जाते हैं;  भारत में 291 डेंटल कॉलेजों में 23,690 स्नातक और 1,138 स्नातकोत्तर छात्र शिक्षित हैं। </p>
<p>इन विषयों और सांख्यिकी को हम इसलिए यहाँ उद्धृत कर रहे हैं कि हमारे देश में एक ऐसा वृक्ष और उसका फल है जो इन तमाम बीमारियों को जड़ से मिटाने की अद्भुत क्षमता रखता है। लेकिन देश के लोग उस वृक्ष और उसके फल को कभी तबज्जो नहीं दिए। आज भी उसकी स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। आधुनिक भाषा में कहें तो इस वृक्ष और उसके फलों को देश के समाज में, कृषि के क्षेत्र में वह स्थान नहीं मिला जिसका वह &#8216;हकदार&#8217; था। यानी उसका मूल्यांकन &#8216;कम आँका&#8217; गया। जानते हैं उस वृक्ष का नाम क्या है &#8211; कदम्ब का वृक्ष और उसके फल कदम्ब। </p>
<figure id="attachment_4981" aria-describedby="caption-attachment-4981" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/P2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/P2.jpg" alt="" width="2048" height="1365" class="size-full wp-image-4981" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/P2.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/P2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/P2-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/P2-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/P2-1536x1024.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4981" class="wp-caption-text">कदम्ब के फल</figcaption></figure>
<p><strong>और यही कारण है कि पिछले दिनों देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर मोदी ने देश के लोगों को आह्वान किया था कि जहाँ तक संभव हो सकते, जहाँ भी खाली स्थान, जमीन, खेत, खलिहान मिले, &#8216;कदम्ब&#8217; का एक पौधा अवश्य लगाएं। वजह भी स्पष्ट था। &#8216;कदम्ब&#8217; के पेड़ों की संख्या देश में बहुत कम है और उत्तरोत्तर नीचे की ओर ही उन्मुख है।</strong> </p>
<p>देश के शीर्षस्थ वास्तुकारों का मानना है कि पेड़-पौधे घर की वास्तु स्थिति पर सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। घर में सुख-शांति और समृद्धि के लिए वास्तु के अनुसार ही पेड़-पौधे लगाना शुभ होता है। कदम का वृक्ष एक ऐसा वृक्ष है जिसके फल से न केवल उपरोक्त सभी बिमारियों का निदान हो सकता है, बल्कि इस वृक्ष को लगाने से दरिद्रता भी दूर होती है। वैसे भी अगर यूनाइटेड नेशन्स मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स प्रोग्राम के आंकड़े को माना जाय तो भारत में तक़रीबन 1.2 बिलियन आबादी, यानी देश का तक़रीबन 7 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे दबा-कुचला जीवन जी रहा है। धार्मिक दृष्टि से यह माना जाता है कि कदम्ब के पेड़ भगवान श्री कृष्ण को सबसे अधिक प्रिय था। वास्तु शास्त्र के अनुसार कदंब का पेड़ कुंडली में मौजूद गुरु दोष से भी निजा दिलाता है। </p>
<p><strong>बहरहाल, अविभाजित बिहार के कल के प्राकृतिक और भौगोलिक इतिहास में &#8220;काला पानी&#8221; से अलंकृत &#8216;पूर्णिया&#8217; जिला में एक प्राकृतिक या ऋषि खेती को मजबूत बनाया जा रहा है। इस प्राकृतिक खेती से आने वाले समय में पूर्णिया के रामनगर क्षेत्र में कोई 50 से 60 एकड़ भूमि में प्राकृतिक घेराबन्धी के तहत कदम्ब ही कदम्ब का वृक्ष दिखेगा।</strong> </p>
<p>इस <strong>प्राकृतिक कृषि के सूत्रधार श्री हिमकर मिश्रा</strong> का कहना है कि &#8220;हमारी पूरी कोशिश है कि हम इस इलाके में इस ऋषि खेती के द्वारा कदम्ब के इतने वृक्ष लगाएं, उससे उतने अधिक फल प्राप्त करें और उसके प्राकृतिक स्वरुप को बदलकर भारत के साथ-साथ विश्व के कोने-कोने में &#8216;कम शुक्राणु की बीमारी&#8217;, &#8216;चीनी की बीमारी&#8217;, &#8216;कैंसर के बढ़ते स्वरुप&#8217;, &#8216;पाइरिया&#8217; की बीमारी, &#8216;भूख&#8217; नहीं लगने की बीमारी, महिलाओं को स्तन-पान में दुघ की कमी होने जैसे बीमारी को, शारीरिक दर्द जैसी बीमारी, खांसी, वैजाइना संबधी बीमारी, मूत्र सम्बन्धी बीमारी, मोटापा, दस्त आदि जैसी बिमारियों पर नियंत्रण पा सकें।&#8221;</p>
<figure id="attachment_4982" aria-describedby="caption-attachment-4982" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/P5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/P5.jpg" alt="" width="2048" height="1365" class="size-full wp-image-4982" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/P5.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/P5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/P5-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/P5-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/P5-1536x1024.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4982" class="wp-caption-text">समर शैल प्राकृतिक फार्म के सूत्रधार श्री हिमकर मिश्रा और कदम्ब के पौधे</figcaption></figure>
<p>श्री मिश्रा का कहना है कि कदम्ब दक्षिण एशिया में आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण और तेजी से बढ़ने वाला पेड़ है। भारत में इसका उपयोग सदियों से किया जाता रहा है और इसका धार्मिक महत्व भी है। इसका उल्लेख विभिन्न धार्मिक पुस्तकों जैसे ग्राम पद्धति और भागवत पुराण में किया गया है। कदम्ब का पेड़ आमतौर पर कागज, लुगदी और लकड़ी उद्योग में उपयोग किया जाता है। इस फल का उपयोग आदिवासी लोगों के द्वारा विभिन्न खाद्य पदार्थों में किया जाता है और इसके रस का उपयोग बच्चों में गैस्ट्रिक जलन के इलाज के लिए किया जाता है। भारत में इस फल के उपयोग पर बहुत कम काम किया गया है।कदम फल के विभिन्न स्वास्थ्य लाभ हैं। </p>
<p><strong>समर शैल प्राकृतिक फार्म</strong> के सूत्रधार श्री मिश्रा का कहना है कि जैसे-जैसे कदम्ब के पेड़ों की संख्या में इजाफा होता जायेगा, फलों की मात्रा भी बढ़ती जाएगी। हमारी कोशिश होगी कि हम इसके फलों का पाउडर बनाकर न केवल भारत, बल्कि विश्व के कोने-कोने तक लोगों को पहुंचाएं। कदम्ब के फल में 75.25–80.60% नमी, 1.79–2.39% वसा, 1.74–2.11% प्रोटीन और 1.31–1.46% राख है। यह फल आयरन (28.3 मिलीग्राम/100 ग्राम), कैल्शियम (123.7 मिलीग्राम/100 ग्राम), जिंक (11.05 मिलीग्राम/100 ग्राम), तांबा (4.19 मिलीग्राम/100 ग्राम), मैग्नीशियम (71.04 मिलीग्राम/100 ग्राम) पोटेशियम (36.7 मिलीग्राम/100 ग्राम), सोडियम (10.7 मिलीग्राम/100 ग्राम), और मैंगनीज (13.7 मिलीग्राम/100 ग्राम) जैसे खनिजों से भरपूर है। </p>
<p>श्री मिश्रा आगे कहते हैं: &#8220;आज के इस इंटरनेट के युग में हम बिहार के एक कोने में, खेत में बैठकर भी विश्व के कोने में बैठे बड़े-बड़े एलोपैथी, आयुर्वेद के चिकित्सकों, वैज्ञानिकों से बातचीत कर सकते हैं, करते हैं। हम उन्हें आमंत्रित करते हैं ताकि वे इस खेती को देखकर विश्व को इन भयंकर बीमारियों से निजात दिला सकें। कदंब की पत्तियों के सेवन से शुगर को कंट्रोल किया जा सकता है। इसमें एंटी डायबिटिक के गुण पाए जाते हैं। साथ ही कदंब के पत्तों में मेथनॉलिक अर्क भी पाया जाता है। त्वचा रोगों का इलाज करने के लिए कदंब का पेड़ किसी जादुई छड़ी से कम नहीं। प्राचीन काल में त्वचा रोगों का उपचार करने के लिए इस पेड़ के अर्क का पेस्ट बनाकर इस्तेमाल किया जाता था। अर्क एंटीफंगल और एंटीबैक्टीरिया गुणों से भरपूर होता है, जो कई प्रकार के बैक्टीरिया, जैसे एस्चेरिचिया कोलाई, प्रोटीस मिराबिलिस से लड़ने में कारगर होता है।&#8221;</p>
<p>उनका कहना है कि &#8220;नियमित तौर पर इसका लेप लगाने से चेहरे पर निखार आता है। साथ ही दाग, धब्बे और मुहासे खत्म होते हैं। लिवर शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। आपका लिवर जितना स्वस्थ होगा आप उतने ही तंदुरुस्त होंगे। लेकिन खानपान और जीवनशैली में बदलाव के कारण आजकल अधिकतर लोग लिवर की समस्या से ग्रस्त है। ऐसे में कदंब का पेड़ लिवर के स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद होगा ।&#8221;</p>
<p>कदम्ब का 10-20 मी ऊँचा पेड़ भारत के शुष्क वनों में पाया जाता है। इसके फूल आकार में छोटे सफेद रंगों के होते हैं। जो सूखने पर भूरे-काले रंग के हो जाते हैं तथा पूरे साल वृक्ष पर लगे रहते हैं। कदम्ब की एक विशेष बात ये है कि इसके पत्ते बहुत बड़े होते है और इसमें से गोंद निकलता है। इसके फल नींबू की तरह होते हैं। कदम के फूलों का अपना अलग ही महत्व है। प्राचीन वेदों और रचनाओं में इन सुगन्धित फूलों का उल्लेख भी मिलता है।आयुर्वेद में कदम्ब की कई जातियों यानि राजकदम्ब, धारा कदम्ब, धूलिकदम्ब तथा भूमिकदम्ब आदि उल्लेख प्राप्त होता है। चरक, सुश्रुत आदि प्राचीन ग्रन्थों में कई स्थानों पर कदम्ब का वर्णन मिलता है।</p>
<p><strong>क्रमशः </strong></p>
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