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	<title>rajya sabha Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>देश के 143+ करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले विधायक, सांसद जब &#8216;विधानसभा और संसद में असंवैधानिक शब्दों का प्रयोग&#8217; करेंगे, तो भारत के बच्चे क्या सोचेंगे</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/what-will-the-children-of-india-think-when-mlas-mps-use-unconstitutional-words</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 Jun 2025 12:21:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>रायसीना पहाड़ (नई दिल्ली) : भारत के राष्ट्रकवि रामधारी सिंह &#8216;दिनकर&#8217; जब शब्दों का विन्यास कर भारत का गौरव गुणगान करने के लिए &#8216;किसको नमन करूँ मैं भारत &#8211; किसको नमन करूँ मैं&#8221; लिखे होंगे, उनके मन के किसी कोने में कोई शक नहीं हुआ होगा कि आने वाले दिनों में इस देश के प्रजातान्त्रिक [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/what-will-the-children-of-india-think-when-mlas-mps-use-unconstitutional-words">देश के 143+ करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले विधायक, सांसद जब &#8216;विधानसभा और संसद में असंवैधानिक शब्दों का प्रयोग&#8217; करेंगे, तो भारत के बच्चे क्या सोचेंगे</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रायसीना पहाड़ (नई दिल्ली) : भारत के राष्ट्रकवि रामधारी सिंह &#8216;दिनकर&#8217; जब शब्दों का विन्यास कर भारत का गौरव गुणगान करने के लिए &#8216;किसको नमन करूँ मैं भारत &#8211; किसको नमन करूँ मैं&#8221; लिखे होंगे, उनके मन के किसी कोने में कोई शक नहीं हुआ होगा कि आने वाले दिनों में इस देश के प्रजातान्त्रिक मंदिर में, चाहे प्रदेश में विधान सभा हो हो अथवा दिल्ली के रायसीना पहाड़ी पर लोकसभा, में चयनित विधायक और सांसद &#8216;असंसदीय&#8217; शब्दों का प्रयोग कर संसद ही नहीं, भारत की गरिमा को, प्रजातंत्र की रीढ़ को कमजोर बनाएंगे। </strong></p>
<p>दिनकर ने लिखा भी : </p>
<p><strong>भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है,<br />
एक देश का नहीं शील यह भूमंडल भर का है।<br />
जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है,<br />
देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्वर है!<br />
निखिल विश्व की जन्म-भूमि-वंदन को नमन करूँ मैं?<br />
किसको नमन करूँ मैं भारत! किसको नमन करूँ मैं?</strong></p>
<blockquote><p>खैर। देश के बड़े-बड़े शोधकर्ता इस कार्य में लगे है कि आखिर समाज में नैतिकता का पतन क्यों हो रहा है ?  भारत के कुल 780 जिलों के जिला परिषदों, 28 राज्यों और केंद्र शाषित प्रदेशों के विधान सभाओं, लोक सभा या राज्य सभा में बैठे चयनित सदसयगण भी आखिर इसी समाज से जाते हैं और समाज की व्यवस्था का उन पर प्रभाव नहीं पड़ेगा, यह हो नहीं सकता, तभी तो कहीं वे देश के सरकारी अधिकारियों का गरेवान पकड़ रहे हैं, कहीं जिला परिषद्, विधान सभा और लोकसभा में टेबुल-कुर्सी पटक रहे हैं, अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। अततः विश्व के सर्वश्रेष्ठ प्रजातंत्र के संसद को इन वारदातों पर नियंत्रण हेतु अनुशासनिक कार्रवाई भी करनी पड़ती है और असंवैधानिक शब्दों के प्रयोग पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने हेतु निर्णय लेना पड़ता है।</p></blockquote>
<p>आज विजय-चौक पर बैठे-बैठे सोच रहा हूँ कि देश की आवादी 1952 में मात्र 38 करोड़ थी, आज 143.81+ करोड़ है। उन दिनों लोक सभा में सीटों की संख्या 489 थी, आज 543 है। साल 1952 में लोक सभा में प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद आठ लाख लोगों के बीच से आते थे, आज यह संख्या 25 लाख से भी अधिक हो गयी है। संसद बनने के बाद पहला अविश्वास प्रस्ताव 1963 में पहली बार पेश किया गया था, और 1967 के बाद आज तक कुल 39 अविश्वास प्रस्ताव/विश्वास प्रस्ताव पेश किए गए, जिसमें साल 1979, 1990, 1996, 1997 और 1999 में, कुल पांच बार तत्कालीन प्रधानमंत्री सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाए। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-2.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-2.jpg" alt="" width="2200" height="1263" class="aligncenter size-full wp-image-6702" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-2.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-2-300x172.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-2-1024x588.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-2-768x441.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-2-1536x882.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-2-2048x1176.jpg 2048w" sizes="(max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>यह भी सोच रहा था कि कहने को तो देश में साक्षरता दर लगातार बढ़ रही है। स्वतंत्रता के समय भारत की केवल 14% आवादी साक्षर थी, जबकि आज रायसीना पहाड़ी के आंकड़े 76.32+% बता रहे हैं। आखिर इन विगत वर्षों में कुछ तो गलत हो रहा है, जिससे समाज भी प्रदूषित हो रही है और समाज से चयनित लोग भी प्रजातंत्र के मंदिरों को प्रदूषित कर रहे हैं। </p>
<p><strong>रायसीना पहाड़ी से नीचे लुढ़कती सड़क कर्तव्य पथ, जो विजय चौक से इण्डिया गेट परिसर की ओर जाती है, पूरे इलाके को तो दो फांक में बाँटती ही है, भारत के 543 लोकसभा क्षेत्रों से चयनित होकर आने वाले सम्मानित सांसदों की मानसिकता को भी सहस्त्र फांकों में शायद बांट दी है। यह अलग बात है कि भारत के लोकतांत्रिक परिदृश्य के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर यह है कि नव-निर्वाचित 18वीं लोकसभा में कोई भी निरक्षर सांसद नहीं है, लेकिन उनके व्यवहार और संसद में असंवैधानिक शब्दों का प्रयोग भी गहन शोध की ओर इशारा करता है। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/G-1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/G-1.jpg" alt="" width="1917" height="1308" class="aligncenter size-full wp-image-6709" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/G-1.jpg 1917w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/G-1-300x205.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/G-1-1024x699.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/G-1-768x524.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/G-1-1536x1048.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/G-1-218x150.jpg 218w" sizes="(max-width: 1917px) 100vw, 1917px" /></a></p>
<p>कहते हैं कि 2024 के लोकसभा चुनावों में खुद को निरक्षर घोषित करने वाले सभी 121 उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सके। 18वीं लोकसभा में नवनिर्वाचित सांसदों में बहुत बड़ा हिस्सा उच्च शिक्षित है, केवल एक सांसद ने खुद को साक्षर बताये। बाकी चुने गए प्रतिनिधियों के पास शिक्षा की विभिन्न डिग्री हैं, जो प्राथमिक विद्यालय से लेकर उच्च शिक्षा तक की योग्यता को दर्शाती हैं। वैसे इसी संसद में लगभग 105 या 19 प्रतिशत ने अपनी शैक्षणिक योग्यता कक्षा 5वीं पास और कक्षा 12वीं के बीच है। </p>
<p>इतना ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 240 सांसदों में 64 स्नातक और 49 स्नातकोत्तर हैं। 99 सीटों वाली कांग्रेस में 24 स्नातक, 27 स्नातकोत्तर और 21 सांसदों के पास पेशेवर स्नातक की डिग्री है। जनता दल (यूनाइटेड) के एक सांसद एकमात्र साक्षर सांसद हैं, जो नई लोकसभा में सबसे कम शैक्षणिक योग्यता रखते हैं। कुल 147 सांसदों के पास स्नातक की डिग्री है, और अन्य 147 के पास स्नातकोत्तर योग्यता है। इसके अतिरिक्त, 98 सांसद स्नातक पेशेवर और डिप्लोमा योग्यता वाले हैं। 5 प्रतिशत सांसदों के पास डॉक्टरेट की डिग्री है, जिसमें तीन महिला सांसद शामिल हैं। लेकिन यह बात समझ से परे है कि इन शिक्षित सांसदों का भी व्यवहार कभी-कभी इधर-उधर क्यों हो जाता है ?</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-4.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-4.jpg" alt="" width="2200" height="1263" class="aligncenter size-full wp-image-6703" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-4.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-4-300x172.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-4-1024x588.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-4-768x441.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-4-1536x882.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-4-2048x1176.jpg 2048w" sizes="(max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>इसी 18वीं लोकसभा में चुने गए सांसदों की औसत आयु 56 वर्ष है, जो 17वीं लोकसभा में 59 वर्ष से थोड़ी कम है। 11 प्रतिशत सांसद 40 वर्ष या उससे कम आयु के हैं, और 38 प्रतिशत 41 से 55 वर्ष की आयु के हैं। लगभग 52 प्रतिशत सांसद 55 वर्ष से अधिक आयु के हैं और सबसे बुजुर्ग सांसद 82 वर्ष के हैं। लेकिन इन सांसदों की मानसिकता में इतनी गिरावट क्यों आ गयी या आ रही है कि भारतीय प्रजातंत्र के इस मंदिर को सांसदों द्वारा प्रयोग की जाने वाली शब्दों पर नियंत्रण लगाने की बात सोचने पड़ी। वैसे, यह पहली बार नहीं है, विगत कई वर्षों में &#8216;असंसदीय अभिव्यक्ति&#8217; के लिए सदन द्वारा उचित कार्रवाई हुयी हैं, लेकिन शिष्टाचार बढ़ने के बजाय अधोगति क्यों हो रहा है &#8211; यह गहन शोध का विषय है। </p>
<p><strong>ज्ञातव्य हो कि कुछ समय पहले 13 जुलाई, 2022 को संसद द्वारा &#8216;असंसदीय शब्दों&#8217; की एक सूची जारी की गयी। कुछ असंसदीय शब्दों में &#8216;जुमलाजीवी, कोविड फैलाने वाला, स्नूपगेट, बाल बुद्धि&#8217; शामिल हैं। इसमें &#8216;शर्मिंदा, विश्वासघात, पाखंड, गाली, ड्रामा और अक्षम&#8217; जैसे शब्द भी शामिल हैं। जैसे ही यह सूची जारी हुई, लोकसभा सचिवालय की अद्यतन पुस्तिका पर तीखी प्रतिक्रिया शुरू हो गई। पुस्तिका में कुछ ऐसे शब्दों की सूची दी गई है, जिन्हें लोकसभा के साथ-साथ राज्यसभा में भी असंसदीय माना जाता है।लोकसभा के अध्यक्ष के अनुसार, यह सूची केवल उन शब्दों का संकलन है, जिन्हें पिछले दिनों रिकॉर्ड से हटा दिया गया था। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/G-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/G-2.jpg" alt="" width="1897" height="876" class="aligncenter size-full wp-image-6711" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/G-2.jpg 1897w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/G-2-300x139.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/G-2-1024x473.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/G-2-768x355.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/G-2-1536x709.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1897px) 100vw, 1897px" /></a></p>
<p>कहते हैं कि पहले सचिवालय कागजों की बर्बादी से बचने के लिए ऐसे असंसदीय शब्दों की एक पुस्तक जारी करता था। अब सरकार ने इस सूची को इंटरनेट पर डाल दिया है। यह सूची पहले 1954, 1986, 1992, 1999, 2004, 2009, 2010 में जारी की जा चुकी है। वर्ष 2010 में इसे वार्षिक आधार पर जारी करना शुरू किया गया। इसमें शकुनि, तानाशाह, तानाशाह, विनाश पुरुष, खून की खेती, जयचंद जैसे शब्दों का उल्लेख है, जिन्हें बहस के दौरान या अन्य किसी भी तरह से इस्तेमाल किए जाने पर हटा दिया जाएगा। दोहरा चरित्र, नौटंकी, बेहरी सरकार, ढिंढोरा पीटना जैसे शब्दों के साथ भी इसी तरह का व्यवहार किया जाएगा। हालांकि, शब्दों और अभिव्यक्तियों को हटाने के बारे में राज्यसभा के सभापति और लोकसभा के अध्यक्ष का अंतिम निर्णय होगा। </p>
<p>जुमलाजीवी, बाल बुद्धि, बहरी सरकार, उल्टा चोर कोतवाल को डांटे, उचक्के, अहंकार, कांव-कांव करना, काला दिन, गुंडागर्दी, गुलछर्रा, गुल खिलाना, गुंडों की सरकार, दोहरा चरित्र, चोर-चोर मौसेरे भाई, चौकड़ी, तड़ीपार, तलवे चाटना, तानाशाह, दादागिरी, दंगा सहित कई अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल भी अब लोकसभा या राज्यसभा में बहस के दौरान कार्यवाही में शामिल नहीं किया जायेगा। <br />
अंग्रेज़ी शब्दों की फ़ेहरिस्त में अब्यूज़्ड, ब्रिट्रेड, करप्ट, ड्रामा, हिपोक्रेसी और इनकॉम्पिटेंट, कोविड स्प्रेडर और स्नूपगेट शामिल हैं। इसके अलावा अध्यक्ष पर आक्षेप को लेकर इस्तेमाल किए गए कई वाक्यों को भी असंसदीय अभिव्यक्ति की श्रेणी में रखा गया है, मसलन- आप मेरा समय खराब कर रहे हैं, आप हम लोगों का गला घोंट दीजिए, चेयर को कमज़ोर कर दिया गया है, मैं आप सब से यह कहना चाहती हूं कि आप किसके आगे बीन बजा रहे हैं? </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-3.jpg" alt="" width="2200" height="1263" class="aligncenter size-full wp-image-6704" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-3.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-3-300x172.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-3-1024x588.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-3-768x441.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-3-1536x882.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-3-2048x1176.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>सूत्रों का कहना है कि यह सूची लोकसभा-राज्यसभा के साथ ही विधानसभा की कार्यवाहियों के दौरान अमर्यादित घोषित किए गए शब्दों को मिलाकर बनती है। इसे प्रत्येक वर्ष संशोधित भी किया जाता है। सूची लोकसभा के अधिकारी निकालते हैं लेकिन ये राज्यसभा के लिए भी लागू होती है। असंसदीय शब्द अपमानजनक या असभ्य शब्द या अभिव्यक्ति हैं जिन्हें संसद में उपयोग के लिए अनुपयुक्त माना जाता है। असंसदीय शब्दों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 (2) के अनुसार विनियमित किया जाता है। </p>
<p><strong>अनुच्छेद 105 (2) </strong>के तहत, संसद में एक सांसद का भाषण संसदीय नियमों के अनुशासन और सदस्यों की अच्छी समझ के अधीन है। सदन के अध्यक्ष या अध्यक्ष को इस पर नज़र रखने का अधिकार है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सांसद संसद के अंदर &#8216;अपमानजनक या अशोभनीय असंसदीय शब्दों&#8217; का इस्तेमाल न करें। &#8216;लोकसभा में प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियम&#8217; के नियम 380 और नियम 381 &#8216;विलोपन (असंसदीय शब्दों को हटाना)&#8217; से संबंधित है। </p>
<p>भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105(2) के तहत संसद सदस्यों को संसद में उनके बयान के लिये न्यायालयी कार्यवाही से सुरक्षा प्राप्त है। यानी संसद में या किसी समिति में संसद के किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिये गए किसी मत के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी और किसी व्यक्ति के विरुद्ध संसद के किसी सदन के प्राधिकार द्वारा या उसके अधीन किसी प्रतिवेदन, पत्र, या कार्यवाहियों के प्रकाशन के संबंध में इस प्रकार की कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी। एक संसद सदस्य जो कुछ भी कहता है वह संसद के नियमों के अनुशासन, सदस्यों की अच्छी समझ और पीठासीन अधिकारी द्वारा कार्यवाही के नियंत्रण के अधीन है। </p>
<p>यह सुनिश्चित करता है कि संसद सदस्य सदन के अंदर &#8216;अपमानजनक या अभद्र या अनिर्दिष्ट या असंसदीय शब्द&#8217; का उपयोग नहीं कर सकते हैं। लोकसभा की प्रक्रिया और कार्य सञ्चालन नियमों के नियम संख्या 380 के तहत अध्यक्ष को वाद-विवाद में प्रयुक्त मानहानिकारक, अशोभनीय अथवा असंसदीय शब्द या अभिव्यक्ति को हटाने का अधिकार प्राप्त है। लोकसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालक विषयक नियम 381 के अनुसार, &#8216;सदन की कार्यवाही का वह भाग जो समाप्त हो गया है, तारांकन द्वारा चिन्हित किया जाएगा और कार्यवाही में एक व्याख्यात्मक टीका इस प्रकार डाला जाएगा: &#8216;अध्यक्ष द्वारा आदेशित’।&#8217; </p>
<blockquote><p>यदि पीठासीन अधिकारी महिला है तो कोई भी संसद सदस्य उसे &#8220;प्रिय अध्यक्ष&#8217; के रूप में संबोधित नहीं कर सकता है। </p></blockquote>
<p>सरकार या किसी अन्य संसद सदस्य पर &#8216;झांँसा देने&#8217; का आरोप नहीं लगाया जा सकता। रिश्वत, ब्लैकमेल, रिश्वतखोर, चोर, डाकू, लानत, धोखा, नीच, और डार्लिंग जैसे शब्द असंसदीय हैं। इनका प्रयोग संसद सदस्यों के लिये नहीं किया जा सकता।संसद सदस्य या पीठासीन अधिकारियों पर &#8220;कपटी&#8221; होने का आरोप भी नहीं लगाया जा सकता है। एक संसद सदस्य को ठग, कट्टरपंथी, चरमपंथी, भगोड़ा नहीं कहा जा सकता। किसी भी सदस्य या मंत्री पर जान-बूझकर तथ्यों को छिपाने, भ्रमित करने या जानबूझकर भ्रमित होने का आरोप नहीं लगाया जा सकता है। किसी भी अनपढ़ संसद सदस्य को ‘अंँगूठा छाप’ नहीं कहा जा सकता है।</p>
<p>विशेषज्ञों के अनुसार, सदन की कार्यवाही के दौरान जब सत्ता पक्ष या विपक्ष के सांसद ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जो संसदीय शिष्टाचार के अनुरूप न हो तो पीठासीन अधिकारी को स्वयं अथवा संसद के किसी अन्य सदस्य द्वारा जताई गई आपत्ति के मद्देनजर ऐसे शब्दों को विधायिका (संसद व विधानसभाएं) की मुद्रित एवं दृश्य-श्रव्य कार्यवाही से हटाने का अधिकार होता है। कुछ मामलों में कार्यवाही से आपत्तिजनक शब्द हटाने का निर्णय हाथों हाथ हो जाता है तो कुछ में ऐसा होता है कि स्पीकर सदन में हुई बहस का पाठ्य रूपांतरण पढ़ने के बाद निर्णय लेते हैं। </p>
<p>संसदीय सचिवालय समय-समय पर अस्वीकार्य अभिव्यक्तियों को संकलित कर उनकी सूची जारी करता है ताकि भविष्य के लिए सदस्यों के समक्ष संदर्भ रहे। समय के साथ ऐसे शब्दों और अभिव्यक्तियों की संख्या बढ़ गई है, जिन्हें असंसदीय माना गया। हिन्दी-अंग्रेजी के असंसदीय शब्दों की नवीनतम सूची 40 से अधिक पृष्ठों की है। समय के साथ यह अवधारणा भी बदली है कि असंसदीय क्या है और इस सूची में कई शब्द जुड़ते चले गए। जैसे 1950 के दशक में &#8216;नाटकीय&#8217; शब्द का सदन में प्रयोग अनुचित माना गया। 70 व 80 के दशक में विधान सभाओं और संसद के कई अध्यक्षों ने पाया कि &#8216;एक झूठ&#8217;, &#8216;झूठ&#8217; और &#8216;पूरा झूठ&#8217; असंसदीय शब्द हैं। गैर अनुमति शब्दों की नई सूची में शामिल हैं &#8211; &#8216;बचकाना&#8217;, &#8216;असत्य&#8217; और &#8216;ड्रामा&#8217;। </p>
<figure id="attachment_6705" aria-describedby="caption-attachment-6705" style="width: 1739px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-4-jharkhand.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-4-jharkhand.jpg" alt="" width="1739" height="1254" class="size-full wp-image-6705" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-4-jharkhand.jpg 1739w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-4-jharkhand-300x216.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-4-jharkhand-1024x738.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-4-jharkhand-768x554.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-4-jharkhand-1536x1108.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-4-jharkhand-324x235.jpg 324w" sizes="auto, (max-width: 1739px) 100vw, 1739px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6705" class="wp-caption-text">झारखण्ड विधान सभा का दृश्य</figcaption></figure>
<p>विशेषज्ञ कहते हैं कि हालांकि लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला के स्पष्टीकरण के बाद विवाद थम गया लेकिन दो सवाल अहम हैं। </p>
<p><strong>पहला,</strong> हमारे सांसदों-विधायकों को सदन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि वे आक्रामक/रोषपूर्ण भाषा का प्रयोग कर सकते हैं। पीठासीन अधिकारी विधायिका के संरक्षक होते हैं और सदन की व्यवस्था बनाए रखना व गौरव का संरक्षण करना इनका दायित्व है। वे कैसे ऐसा संतुलन स्थापित करें कि सांसदों को सदन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार मिले और विधायिका की गरिमा भी अक्षुण्ण रहे। इस सवाल का जवाब देना आसान है। परस्पर सम्मान बनाए रखना ही संसदीय चर्चा में शिष्टाचार का मुख्य आधार है। असंसदीय अभिव्यक्तियों को सदन की चर्चा में तभी स्थान मिलता है, जब चर्चा मुद्दों पर केंद्रित न हो कर व्यक्तिगत हो जाए। सांसद व विधायक सदन में जिस भाषा का इस्तेमाल करते हैं, वह समाज में बहस का स्तर तय करते हैं। इसलिए जनप्रतिनिधियों का दायित्व है कि वे इस प्रकार चर्चा करें जो न केवल बहस की गुणवत्ता बढ़ाए बल्कि हमारी विधायी संस्थाओं का गौरव भी बढ़ाए। </p>
<p><strong>दूसरा सवाल</strong>, क्या यह संभव है कि कोई शब्द असंसदीय है या नहीं, यह तय करने के लिए एक कठोर रूपरेखा अपनाई जाए? यह मुश्किल है क्योंकि जो कुछ भी बोला गया है, वह संदर्भ पर निर्भर करता है और इस बात पर कि पीठासीन अधिकारी ने किस शब्द को अस्वीकार्य माना। हो सकता है एक विधानसभा में जिस शब्द को एक पीठासीन अधिकारी असंसदीय करार दे, दूसरी में कोई अन्य पीठासीन अधिकारी न दे। 1926 में भारत की विधायिकाओं के पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में यह मुद्दा उठाया गया था। तय किया गया कि असंसदीय अभिव्यक्ति &#8216;ऐसा विषय है, जिस पर कोई कठोर व सशक्त नियम लागू नहीं होते और ये प्रत्येक मामले की परिस्थिति पर निर्भर करता है।&#8217; 1969 में जब कुछ अभिव्यक्तियों को असंसदीय घोषित करने के लिए दिशा-निर्देश बनाने की बात आई तब भी यही बात दोहराई गई। </p>
<figure id="attachment_6706" aria-describedby="caption-attachment-6706" style="width: 1736px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-6-JK.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-6-JK.jpg" alt="" width="1736" height="1136" class="size-full wp-image-6706" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-6-JK.jpg 1736w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-6-JK-300x196.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-6-JK-1024x670.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-6-JK-768x503.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-6-JK-1536x1005.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1736px) 100vw, 1736px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6706" class="wp-caption-text">जम्मू और कश्मीर विधानसभा का दृश्य</figcaption></figure>
<p>ऐसा नहीं हो सकता कि बोला गया शब्द सुना न जाए। इतना ही किया जा सकता है कि कोई असंसदीय टिप्पणी आधिकारिक रेकॉर्ड से हटा दी जाए। सीधे प्रसारण एवं सोशल मीडिया के जमाने में विधायक एवं सांसद असंसदीय को मिटा तो सकेंगे लेकिन उनके लिए ऐसा करना मुश्किल होगा कि जनता को पता ही न चले कि हमारे सदनों में ऐसे शब्दों का प्रयोग होता है। असंसदीय शब्दों को कार्यवाही से हटाने के बावजूद विधायिका की कार्यवाही जनता से छिपी नहीं रहती। बीते वर्षों में लोकसभा और राज्यसभा में सदस्यों ने असंसदीय व्यवहार कर कामकाज में बाधा पहुंचाई, नारे लगाए, बैनर दिखाए, कागज फाड़े और उछाले। </p>
<p>ज्ञातव्य हो कि 2022 में संसद के मानसून सत्र के पहले सप्ताह में महंगाई व जीएसटी पर चर्चा की मांग के बीच कामकाज बार-बार स्थगित हुआ। लोकसभा में 15 प्रतिशत तो राज्यसभा में 23 प्रतिशत ही कामकाज हुआ। पिछले साल के मानसून सत्र में भी ऐसा ही हुआ था। व्यापक पैमाने पर तुलना की जाए तो पिछली (16वीं) लोकसभा का 16 प्रतिशत कामकाजी समय अवरोधों की भेंट चढ़ गया तो 15वीं लोकसभा का 37 प्रतिशत। विधायिका के लोकतांत्रिक संचालन में बाधाएं पहुंचाने से होने वाले नुकसान की भरपाई किसी भी तरह नहीं की जा सकती। लिखित संसदीय रेकॉर्ड को असंसदीय शब्द हटा कर साफ किया जा सकता है, पर असंसदीय व्यवहार के दृश्य लम्बे समय तक हमारे मानसपटल पर अंकित रहेंगे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-5-jharkhand.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-5-jharkhand.jpg" alt="" width="1736" height="1136" class="aligncenter size-full wp-image-6707" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-5-jharkhand.jpg 1736w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-5-jharkhand-300x196.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-5-jharkhand-1024x670.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-5-jharkhand-768x503.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Par-5-jharkhand-1536x1005.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1736px) 100vw, 1736px" /></a></p>
<p>विडंबना यह है कि उस अधिसूचना के बाद लोकसभा सचिवालय ने सांसदों को सूचित किया कि ‘असंसदीय अभिव्यक्ति 2009’ शीर्षक से प्रकाशन बिक्री के लिये उपलब्ध है जिसमें भारत की संविधान सभा, अंतरिम संसद, पहली से लेकर चौदहवीं लोकसभा (1952 से फरवरी 2009), राज्यसभा, राज्य विधानमंडलों एवं राष्ट्रमंडल के कुछ देशों की संसदों में ‘असंसदीय घोषित शब्दों एवं अभिव्यक्तियों’ का संकलन है। इस संकलन की कीमत 1700 रूपये है । हालांकि सांसदों को 25 प्रतिशत की छूट दी जायेगी और वे निजी उपयोग के लिये इसकी केवल एक प्रति खरीद सकेंगे। जो संसद भवन में लोकसभा सचिवालय के बिक्री काउंटर पर उपलब्ध होगा। कहा जाता है कि इस संकलन की इतनी बिक्री नहीं हुई जितनी अपेक्षा थी। खैर। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/what-will-the-children-of-india-think-when-mlas-mps-use-unconstitutional-words">देश के 143+ करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले विधायक, सांसद जब &#8216;विधानसभा और संसद में असंवैधानिक शब्दों का प्रयोग&#8217; करेंगे, तो भारत के बच्चे क्या सोचेंगे</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>​काश 😢 दरिभंगा के महाराजाधिराज महिलाओं को आगे बढ़ाते 😢 आज दरभंगा किले के पुरषों में थोथी की दरिद्रता है, दुःखद 😢</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b2/the-maharajadhiraj-of-darbhanga-had-encouraged-women</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Dec 2024 12:08:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बहिरा नाचे अपने ताल]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[constitution]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दिल्ली गेट परिसर के बाएं हाथ बकरी चराने के लिए जाता एक नौजवान, जो आगामी विधानसभा चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग पहली बार करेगा, बुदबुदाकर कहता है: &#8220;अच्छा हुआ महाराजाधिराज मृत्यु को प्राप्त किये। आज अगर जीवित होते तो फफककर रोते। संतानहीन महाराजाधिराज के घर में कोई वैसा पुरुष या महिला नहीं हुआ जो [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b2/the-maharajadhiraj-of-darbhanga-had-encouraged-women">​काश 😢 दरिभंगा के महाराजाधिराज महिलाओं को आगे बढ़ाते 😢 आज दरभंगा किले के पुरषों में थोथी की दरिद्रता है, दुःखद 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दिल्ली गेट परिसर के बाएं हाथ बकरी चराने के लिए जाता एक नौजवान, जो आगामी विधानसभा चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग पहली बार करेगा, बुदबुदाकर कहता है: &#8220;अच्छा हुआ महाराजाधिराज मृत्यु को प्राप्त किये। आज अगर जीवित होते तो फफककर रोते। संतानहीन महाराजाधिराज के घर में कोई वैसा पुरुष या महिला नहीं हुआ जो भारतीय राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक ब्रह्माण्ड पर महाराजाधिराज का प्रतिनिधित्व के साथ-साथ उनकी गरिमा को ढ़ोल-नगारा पीट कर दुनिया को बताते। दुर्भाग्य। जो हैं उनमें थोथी ही नहीं है &#8211; न पुरुष में और ना ही महिला में। महिलाओं को दोष नहीं देंगे क्योंकि महिलाओं को तो महाराजा ने भी पनपने नहीं दिए।&#8221; तभी बकरी भी मिमियाने लगी, जैसे बकरी भी अपने मालिक की बातों का समर्थन कर रही हो।</strong></p>
<p>बकरी की शारीरिक भाषा और बार-बार अपने स्वामी के तरफ नजर उठाकर देखने से ऐसा लग रहा था जैसे वह कह रही हो कि &#8216;एक बात समझ से परे है कि संविधान के बारे में चर्चा काल में झा साहेब अपने राजनीतिक स्वामी नीतीश कुमार का नाम, उनकी जेल यात्रा को क्यों दोहरा रहे थे। नीतीश कुमार उन हज़ारों-लाखों क्रांतिकारियों में एक थे जो आपातकाल के समय कारावास में बंद हुए थे। जयप्रकाश नारायण की क्रांति जिसने भी पटना में, बिहार में देखा है, जो जीवित हैं, वे सभी जानते हैं कि उस आंदोलन में नीतीश कुमार की कितनी भूमिका थी? लेकिन जो प्रथम द्रष्टा हैं वे अपनी बात अगली पीढ़ी को बताएँगे नहीं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अनुकम्पा से राजनीति में आने वाले, पहले प्रदेश के ऊपरी सदन और फिर बाद में देश के ऊपरी सदन में सांसद बनने वाले श्री संजय झा संविधान पर अपना विचार दे रहे थे, मिथिला में जयजयकार हो रहा था। दरभंगा के टॉवर चौक से मिथिला विश्वविद्यालय परिसर स्थित दिल्ली गेट तक सभी कह रहे थे कि संजय झा आज महाराजाधिराज का नाम लेकर, महाराजाधिराज का संविधान के प्रति सोच को दोहराकर जयजयकार कर दिए हैं। ऐसा लग रह था जैसे मुद्दत बाद संसद में मिथिला के राजा का नाम लिया गया हो। </p>
<p><strong>विगत दिनों जब संसद में जवाहरलाल विश्वविद्यालय के दो राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करने वाले दो पूर्ववर्ती छात्र दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. कामेश्वर सिंह की भारतीय संविधान के प्रति भूमिका का मंत्रोच्चारण कर रहे थे तो महाराजा का पार्थिव शरीर सामने आ गया। सन् 1962 में जब उनका हँसता-मुस्कुराता शरीर सुबह-सवेरे पार्थिव हो गया था। गाँव से हज़ारों लोग ट्रेन पकड़कर दरभंगा भागे। महाराज की मृत्यु मिथिला की मृत्यु थी। सामाजिक क्षेत्र से लेकर शैक्षिक क्षेत्र तक, चिकित्सा के क्षेत्र से लेकर सांस्कृतिक क्षेत्र तक संपदा को बढ़ाने, सुरक्षित रखने वाले लोगों के चेहरों पर हतासी था। संतानहीन महाराजाधिराज के पार्थिव शरीर को दरभंगा में आनन फ़ानन में अग्नि को सुपुर्द किया गया था। </strong></p>
<p>जो उस दृश्य को देखे थे, भाव विह्वल थे। सभी एक दूसरे का चेहरा देख रहे थे। उसी क्षण दरभंगा का भविष्य देख रहे थे वे सभी जो निर्लोभ थे और महाराज के साथ आत्मीय संबंध रखते थे। उन्हें  महाराजा की ज़मीन से कोई लोभ था और ना ही उनके ज़ेवरों से। उनके लिए  महाराजा के मुख से निकला दो शब्द ही गंगा जल जैसा पवित्र और हीरे-जवाहरात जैसा बहुमूल्य था। कल जब मणिकर्णिका घाट से दशास्वमेध घाट, दरभंगा घाट, दिगपतिया घाट, कर्नाटक घाट के रास्ते तुलसी घाट होते अस्सी घाट के तरफ़ उन्मुख था अपने किताब को पूर्णता प्रदान करने के लिए तो बाबूजी की बातें, महाराजा का चेहरा याद आ रहा था। संसद, संविधान और नेताओं की बातें याद आ रही थी। सोच रहा था दरभंगा घाट के रास्ते मणिकर्णिका से तुलसी तक गंगा उल्टी बहती है। यह गंगा को भी पता है और महादेव को भी और इस पृथ्वी के लोग समझते हैं सबसे अधिक ज्ञाता वे ही हैं जो बनारस में गंगा उल्टी बहती है का मुहावरा लिखकर, बोलकर चापलूसी की दुकानदारी चला रहे हैं। </p>
<p>उधर, महाराजा रामेश्वर सिंह के कालखंड में निर्मित विशालकाय भवन के  दीवार पर लिखा दरभंगा घाट के दाहिने हाथ मंदिर के चबूतरे पर बैठे एक महात्मा कहते हैं: “बऊ यौ !! दोसरक पत्नी सबके निक लगैत छै। मिथिला में बिना लोभ कें कोई केकरो प्रसंशा नै करै छै, चाहे अधिकारी होइथ, पदाधिकारी, नेता, अभिनेता, मंत्री, मुख्यमंत्री अथवा प्रधान मंत्री। आई यदि महाराजाधिराज के एक टा संतान होईतईन ते आई मिथिला के हाल बेहाल नई होईते। अनपढ़, अज्ञानी, चापलूस के हाथ में मुफ़्त में धन दौलत भेट गेलई यानी आँहरा के हाथ में बटेर, जेकरा स्वयं विधान सभा आ संसद में महाराजक प्रतिनिधित्व करैक चाहि, थोथिक अभाव में पुरुख से भेंट नहि करै छै .… समय बदैल रहल अछि । देखब दरभंगा में नबका नबका ठग आवि गेल अछि । महात्मन के शब्दों में दम था। ​&#8221;</p>
<p><strong>बहरहाल, भारत में संविधान लागू होने के 74 साल के बाद संसद में संविधान सभा के उस सदस्य का नाम पहली बार गूंजा जिसने भरे सदन में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को कहा था कि वह फ्रीडम ऑफ स्पीच के संसोधन की आड़ में आप कार्यकारी अत्याचार के बीज बो रहे हैं। संविधान के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर राज्यसभा में चल रही जोरदार बहस के बीच नेहरू के घोर आलोचक बिहार के इस राजनेता का जिक्र राज्य सभा में बार बार हो रहा है।  वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण से लेकर जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा तक ने कामेश्वर सिंह के भाषण को खूब उधृत किया। यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिल्ली की गद्दी पर बैठने या फिर नीतीश कुमार को प्रदेश का मुख़्यमंत्री होने का रिकार्ड बनाने के बाद आज तक दरभंगा में जितने भी कार्यक्रम हुए, महाराजा के परिवार और परिजनों को उस कार्यक्रम से मीलों दूर रखा गया है, यहाँ तक कि हवाई अड्डे के सञ्चालन के समय भी। इतना ही नहीं, कामेश्वर सिंह को भारतीय राजनीतिक इतिहास के पन्नों से हटा दिया गया। दुर्भाग्य यह है कि महजराजाधीरज की मृत्यु के बाद विगत 62 वर्षों में दरभंगा राज से जुड़े लोगों में, जॉन उनकी समपत्तियों का हिस्सेदार बने, थोथी से सभी दरिद्र रहे।</strong> </p>
<p>राज्यसभा में संविधान पर चर्चा की शुरुआत करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अंबेदकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बाद कामेश्वर सिंह का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कामेश्वर सिंह जो संविधान सभा के सदस्य थे, उन्होंने नेहरू के पहले संविधान संशोधन को यह कहते हुए विरोध किया था कि यह अंतरिम सरकार है और इसे जनता का जनादेश इस काम के लिए नहीं मिला है। संविधान सभा के सदस्य कामेश्वर सिंह ने कहा था: ”यह संसद, एक अस्थायी है. यह लोगों की इच्छा को प्रतिबिंबित नहीं कर रही है। जिस तरह से संविधान चाहता है कि संसद इसे प्रतिबिंबित करे।  इस तरह की सरकार या संसद के लिए जनता की राय का संदर्भ दिए बिना संविधान में इस तरह के मूलभूत परिवर्तन करना बेहद अनुचित है, और वह भी एक कठिन संसदीय सत्र के अंतिम चरण में और लगभग आम चुनाव की पूर्व संध्या पर।”</p>
<p><strong>उपसभापति हरिवंश के आसन को संबोधित करते हुए निर्मला सीतारमन ने कामेश्वर सिंह के भाषण को आगे उद्धृत करते हुए कहा कि कामेश्वर सिंह कहते हैं: “क्या वे संविधान के प्रति घोर उपेक्षा नहीं दिखाते जब वे इसमें संशोधन करने का प्रयास सिर्फ इसलिए करते हैं, क्योंकि कुछ कानूनों की आलोचना की गई है और न्यायपालिका द्वारा उन्हें अमान्य पाया गया है?”  कामेश्वर सिंह आगे कहते हैं, ‘मैं यह कहने के लिए बाध्य हूं कि प्रधानमंत्री कार्यकारी निरंकुशता का बीज बो कर और पार्टी के फायदे के लिए संविधान की सर्वोच्चता के साथ खेलकर एक बुरी मिसाल कायम कर रहे हैं.इसलिए, इसमें कोई संदेह नहीं था कि संशोधन पार्टी, प्रधान मंत्री या सरकार की छवि के लिए लाया गया था।” लेकिन सवाल यह है कि जो आज हो रहा है क्या सही है? अथवा महाराजाधिराज की बातों को यदि आज के समय में उद्धृत कर देखा जाय तो यह (संविधान में संसोधन) कितना तर्कसंगत दीखता है? यह शोध का विषय है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अगर उन दिनों की बात को &#8216;स्वहित&#8217; में आज उद्धृत किया जा रहा है तो आने वाले कल में भी आज की बात को उद्धृत किया जायेगा।</strong> </p>
<p>इससे पहले, बहस में हिस्सा लेते हुए नीतीश कुमार के &#8216;चहेते&#8217; और जदयू सांसद संजय झा ने भी नेहरू के इस कट्टर विरोधी को सदन में न केवल याद किया बल्कि उनकी बातों का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे दरभंगा के महाराजा कामेश्वर सिंह भी संविधान सभा के सदस्य थे और बाद में वो जीवन के अंतिम क्षण तक राज्य सभा के सदस्य रहे। कामेश्वर सिंह को उद्धृत करते हुए संजय झा ने कहा, कामेश्वर सिंह ने कहा था, ” मैं यह स्पष्ट रूप से कहता हूं कि प्रधानमंत्री जी कार्यकारी सत्ता के अत्याचार के बीज बो रहे हैं और संविधान की सर्वोच्चता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, ताकि पार्टी की लाभ को प्राथमिकता दी जा सके। वह एक खराब मिशाल स्थापित कर रहे हैं और यह भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरनाक रुझान है।&#8221; काश कामेश्वर सिंह के परिवार में आज तथाकथित रूप से स्वयंभू संभ्रांत मानने वाले लोग महाराजाधिराज की गरिमा को बरकरार रख पाते। </p>
<p>बहरहाल, ​भारत में जिस तरह मुग़ल साम्राज्य और ब्रितानिया सरकार का अभ्युदय, उत्कर्ष और पतन हुआ, ‘कुछ अपवाद छोड़कर’ उत्तर बिहार के दरभंगा राज और वहां के राजाओं-महाराजाओं की कथा-व्यथा, अभ्युदय, उत्कर्ष और पतन लगभग वैसे ही है। मुग़ल सल्तनत में जिस तरह अकबर, शाहजहां, जहाँगीर और औरंगजेब का नाम इतिहास के पन्नों से नहीं मिटाया जा सकता है, दरभंगा राज में भी, राजा महिनाथ ठाकुर, राजा राघव सिंह, राजा नरेंद्र सिंह को अपने-अपने साम्राज्यों को बचाने, बढ़ाने के लिए नहीं भुलाया जा सकता। दरभंगा राज के स्थापना काल से इसके पतन तक सिर्फ ये ही तीन राजाओं का नाम उल्लिखित दीखता है, जो अपने प्रान्त को बचाने के लिए, अपने नागरिकों के जान-माल की रक्षा के लिए, उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए, आर्थिक, सामाजिक समृद्धि सुरक्षित करने के लिए अपनी “अंतिम साँसों” का परवाह किये, हथियार उठाये, जान की बाजी लगाए, और युद्ध-क्षेत्र में सज्ज हो गए। इन राजाओं के बाद, दरभंगा राज में जितने भी राजा-महाराजा, यहाँ तक की महाराजाधिराज हुए, किन्ही का नाम आधुनिक भारत के इतिहास में “योद्धा” के रूप में उल्लिखित नहीं है, महाराणा प्रताप की तरह। हाँ, मुगलिया शासन के बाद, ब्रितानिया शासन में अपने भी “दानशीलता” को लेकर, सेवा-सुश्रुषा को लेकर ही जाने गए – योद्धा के रूप में नहीं। </p>
<p>वैसे भारत में शिक्षा के क्षेत्र के विकास में दरभंगा के महाराजाओं, महाराजाधिराज की भूमिका अक्षुण है। यह बात कल भी लोग मानते थे, आज भी स्वीकार करते हैं और आने वाले समय में भी मानने पर विवश होंगे। लेकिन एक बात पर अगर विचार करेंगे तो शायद देश के लोगों की आँखें अश्रुपूरित हो जाएगी और फिर महाराजाधिराज की ओर, उनके परिवारों के तरफ एक विपरीत निगाहों से देखेंगे, सोचने पर विवश हो जायेंगे। वैसे आज तक किसी ने भी यह लिखने की, कहने की हिम्मत नहीं किये – लेकिन सच तो यही है की दरभंगा राज के चहारदीवारी के बाहर महाराजाधिराज चाहे शिक्षा के क्षेत्र में जो भी भूचाल लाये हों, जितने भी महत्वपूर्ण कार्य किये हों; चहारदीवारी के भीतर अपने ही परिवार की महिलाओं को आधुनिक शिक्षा, आधुनिक सोच से वंचित रखे या वे सभी महिलाएं “शिक्षा के महत्व” को “महत्वहीन” समझी। अगर उनकी नजरों में महाराजाधिराज की सम्पत्तियों के आगे शिक्षा का महत्व हुआ होता, शब्दों का तबज्जो उनकी नज़रों में हुआ होता, महाराजाधिराज जैसी शैक्षिक-सोच का महत्व वे समझी होती, तो शायद वे सभी अपने वजूद को​ नेश्तोनाबूद नहीं होने देते। </p>
<p><strong>आज़ादी के आन्दोलन में, भारत का इतिहास के निर्माण में देश की अनपढ़, अशिक्षित, गरीब, महिलाओं ने अपने पति के सम्मानार्थ जो भी की, आज इतिहास में दर्ज है। भारत का इतिहास उन महिलाओं के नामों के साथ कभी छेड़-छाड़ नहीं कर सकता है। लेकिन दरभंगा राज के मामले, महाराजाधिराज के घर की महिलाएं उन्हें वो सम्मान नहीं दे सकी, जिसके वे हकदार थे। अगर वे महिलाएं खुद आगे कदम बढ़ाई होती तो शायद आज राज दरभंगा नेश्तोनाबूद नहीं होता। और यही कारण है कि उस ज़माने में भी अनपढ़, अशिक्षित, अज्ञानी महिलाएं अपने पति के लिए, अपने परिवार के लिए, समाज के लिए, राष्ट्र के लिए चट्टान की तरह खड़ी होती थी, अंतिम सांस तक लड़ती थी, योद्धा कहलाती थी – नहीं तो आज भी भारत के इतिहास में विधवा रानी लक्ष्मी बाई, अरुणा असफ अली, सरोजनी नायडू, मैडम बीकाजी कामा, एनी बेसेंट, कमला नेहरू, विजय लक्ष्मी पंडित, कैप्टन लक्ष्मी सहगल, मूलमती, कित्तूर वरणी चेनम्मा, झलकारी बाई, कस्तूरबा गाँधी, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, बेगम हज़रात महल, सावित्री बाई फुले, नीली सेनगुप्ता, उमाबाई कुंडापुर, उदा देवी, जम्मू स्वामीनाथन, मातंगिनी हज़रा, सुचेता कृपलानी आदि जैसी सैकड़ों-हज़ारों महिलाएं भारत के इतिहास में – पति के जीवित रहते अथवा विधवा जीवन में भी अपने पति के सम्मानार्थ उनके पीछे खड़ी होने के लिए –  अमर नहीं होती। आज स्वतंत्र भारत के इतिहास में, बिहार के इतिहास में, मिथिलांचल के इतिहास में और दरभंगा के इतिहास में महाराजा सर कामेश्वर सिंह की तीनो पत्नियों को या फिर उन सात महिला लाभार्थियों को कौन जानता है ? आने वाली पीढ़ी को मिथिला के लोग क्या कहेंगे?​</strong> </p>
<p>वैसे, दरभंगा राज का इतिहास राजा महेश ठाकुर से प्रारम्भ होता है। राजा महेश ठाकुर की राजधानी मधुबनी जिला के भउर ग्राम में थी। साल था 1556 और वे कुल 13 वर्ष तक, यानी 1569 तक राजगद्दी पर विराजमान रहे। भारत में मुगलों का इतिहास भी बाबर से ही प्रारम्भ होता है और साल रहता है 1526 । बाबर को जब मध्य एशिया से अपने पैतृक प्रान्त से बाहर निकाल दिया जाता है तब वह भारत की ओर उन्मुख होता है। काबुल में अपना ठिकाना बनाता है और फिर आगे बढ़ने के लिए तैयारी करता है। पानीपत की पहली लड़ाई में वह इब्राहिम लोदी को हारता है। वैसे लोदी का साम्राज्य उस समय तक कमजोर हो गया होता है। लेकिन वह युद्ध भारत के लिए ऐतिहासिक होता है और मुग़ल साम्राज्य की स्थापना का नींव उत्तर भारत में रखा जाता है। बाबर, काबुल से अपनी राजधानी हटाकर आगरा आ जाता है। मुग़ल साम्राज्य बाबर के साम्राज्य से भारत में प्रारम्भ होता है और कोई 300 साल तक, यानी अंग्रेजों के आने तक भारत में राज करता है। </p>
<p>राजा महेश ठाकुर (1556-1569) राजा गोपाल ठाकुर (1569-1581) राजा परमानन्द ठाकुर, राजा शुभंकर ठाकुर, राजा पुरुषोत्तम ठाकुर (1617-1641) के समय में भारत में ईस्ट इण्डिया कंपनी का आगमन हो चुका था और उस समय तक मुग़ल शासक जहाँगीर गद्दी पर बैठ जाता है । जहांगीर ने कंपनी राज को भारत में व्यापार करने के लिए आमंन्त्रित कर चूका था। जहांगीर के बाद शाहजहाँ पाँचवे मुग़ल बादशाह  (1628-1658) बने । शाहजहाँ अपनी न्यायप्रियता और वैभव विलास के कारण अपने काल में बड़े लोकप्रिय रहे। उनके शासनकाल को मुग़ल शासन का स्वर्ण युग और भारतीय सभ्यता का सबसे समृद्ध काल बुलाया गया है।शाहजहां के बाद इधर मुग़ल सिंघासन पर औरंगजेब सत्ता पर आसीन हुआ (1658-1707) और शाहजहां को जीवन पर्यन्त उनकी मृत्यु तक कैद रखा। उनकी मृत्यु 1666 में हुयी। </p>
<p>औरंगजेब के समय में भारत में अनेकानेक राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक  उथल पुथल हुए, लेकिन मुग़ल साम्राज्य का विस्तार भी इसी के समय में हुआ। सन 1707 में औरंगजेब की मृत्त्यु के बाद भारत के अनेकानेक राजाओं ने मुग़ल शासन के विरुद्ध बिगुल बजा दिए। औरंगजेब के शासनकाल में दरभंगा के चार राजा रहे – राजा सुन्दर ठाकुर (1641-1668), राजा महिनाथ ठाकुर (1668-1690), राजा नरपति ठाकुर (1690-1700), राजा राघव सिंह (1700-1739) – औरंगजेब के बाद भारत में एक और जहाँ अंग्रेजी हुकुमार का बोल बाला होने लगा, मुग़ल सल्तनत का पतन भी स्वाभाविक था। मुग़ल सल्तनत में बहादुर शाह – 1 राज गद्दी पर बैठे और अनेकानेक प्रशासनिक सुधार लाने की बात किये।  परन्तु 1712 में उनकी मृत्यु हो गई। मुग़ल साम्राज्य भी जिस गति से ऊपर आया था, उसी गति से नीचे गिरा भी। सन 1712 और 1719 के बीच चार राजा गद्दी पर आये और चले गए। उस समय दरभंगा के राजा थे राजा राघव सिंह।​ </p>
<p>सं 1719-1748 के बीच मुग़ल का कमान मुहम्मद शाह के हाथों था। लेकिन अब तक मुग़ल साम्राज्य में कमजोर राजा के कारण साम्राज्य का क्षेत्र सीमित होने लगा था। मध्य भारत के अनेकानेक राजा और उनका साम्राज्य मुग़ल से मराठा के हाथों ख़िसक रहा था । दरभंगा राज के राजा राघव सिंह (1700-1739), राजा बिष्नु सिंह (1739-1743), राजा नरेंद्र सिंह (1743-1770) थे उस समय । कहा जाता है कि राजा नरेंद्र सिंह के दत्‍तक पुत्र प्रताप सिंह भी नि:संतान थे और उन्‍होंने माधव सिंह को दत्‍तक पुत्र बनाकर तिरहुत का युवराज घोषित किया था। राजा नरेंद्र सिंह की रानी पद्मावती प्रताप सिंह के इस फैसले से नाराज हुई और उन्होंने माधव सिंह को तत्कालीन राजधानी भौडागढी में प्रवेश प्रतिबंध लगा दिया। कहा जाता है कि माधव सिंह की हत्या की साजिश भी रची गयी और माधव सिंह इस दौरान बनैली राज घराने में पनाह पाये थे। अपने दत्‍तक पुत्र माधव सिंह के लिए प्रताप सिंह ने तिरहुत की राजधानी भौडा गढी से दरभंगा स्थानांतरित किया। रामबाग स्थित परिसर को नूतन राजधानी क्षेत्र के रूप में विकसित किया। सिंहासन संभालने के बाद माधव सिंह ने न केवल राज्य की सीमा का विस्तार किया, बल्कि खजाना भी बडा किया। </p>
<p>रानी पद्मावती के निधन के बाद भोडा गढी से राज खजाना दरभंगा स्थानांतरित हुआ, लेकिन खजाने के लिए ढांचागत आधारभूत संरचना महाराजा छत्र सिंह के कार्यकाल में ही बन पाया। महाराजा छत्र सिंह डच वास्‍तुशिल्‍प से अपने लिए छत्र निवास पैलेस, एक तहखाना और 14 सौ घूर सैनिकों के लिए एक अस्‍तबल का निर्माण कराया। यानी दरभंगा राज के स्थापना काल से रानी पद्मावती तक राजा महिनाथ ठाकुर, राजा राघव सिंह और राजा नरेंद्र सिंह को ही अपने-अपने साम्राज्यों को बचाने, बढ़ने के लिए तत्कालीन अन्य प्रान्त के राजाओं से युद्ध करना पड़ा और विजय भी हुए। यानी अब तक के बारह राजाओं में महज तीन राजा अपने अपने साम्राज्य की सुरक्षा-विस्तार के लिए युद्ध क्षेत्र में गए, शेष नौ को कभी युद्ध की परिस्थिति का सामना नहीं करना पड़ा। </p>
<p><strong>उधर 1757 में पलासी का युद्ध, 1764 में बक्सर का युद्ध से कंपनी की शक्ति मजबूत हुई। और शाह आलम की नियुक्ति बंगाल का राजस्व कलेक्टर, बिहार और उड़ीसा। यानी कंपनी राज गंगा के तटवर्ती इलाकों पर अपना झंडा गाड़ दिया।  फिर समयांतराल  दक्षिण भारत के बड़े क्षेत्रों के नियंत्रण स्थापित कर लिया। रानी पद्मावती के बाद, दरभंगा राज का कमान राजा प्रताप सिंह (1778-1785), राजा माधव सिंह (1785-1807), महाराजा छत्र सिंह (1807-1839), महाराजा रूद्र सिंह (1839-1850), महाराजा महेश्वर सिंह (1850-1860) इनकी मृत्यु के पश्चात् कुमार लक्ष्मीश्वर सिंह के अवयस्क होने के कारण दरभंगा राज को कोर्ट ऑफ वार्ड्स के तहत ले लिया गया। जब कुमार लक्ष्मीश्वर सिंह बालिग हुए तब अपने पैतृक सिंहासन पर आसीन हुए। ये काफी उदार, लोक-हितैषी, विद्या एवं कलाओं के प्रेमी एवं प्रश्रय देते थे। रामेश्वर सिंह इनके अनुज थे।  फिर आये महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह (1880-1898) महाराजाधिराज रामेश्वर सिंह (1898-1929) इन्हें ब्रिटिश सरकार की ओर से ‘महाराजाधिराज’ का अन्य उपाधियाँ मिलीं। अपने अग्रज की भाँति ये भी विद्वानों के संरक्षक, कलाओं के पोषक एवं निर्माण-प्रिय अति उदार थे। इन्होंने भारत के अनेक नगरों में अपने भवन बनवाए तथा अनेक मन्दिरों का निर्माण करवाया। वर्तमान मधुबनी जिले के राजनगर का अवशेष भवन और सूखता पोखर गवाह है उन दिनों का। नौलखा भवन 1926 ई. में बनकर तैयार हुआ था।  कहा जाता है कि राज की राजधानी दरभंगा से राजनगर लाने का प्रस्ताव था,  लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ये माँ काली के भक्त थे और तंत्र विद्या के ज्ञाता भी थे। जून 1929 में इनकी मृत्यु हो गयी। </strong></p>
<p>और अंत में, महाराजा रामेश्वर सिंह के बाद  महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह दरभंगा राज के  गद्दी पर बैठे। महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह के समय में ही भारत स्वतंत्र हुआ और जमींदारी प्रथा समाप्त हुई। देशी रियासतों का अस्तित्व समाप्त हो गया। वे अपनी शान-शौकत के लिए पूरी दुनिया में विख्यात थे। अंग्रेज शासकों ने इन्हें ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि दी थी। वे अनेकानेक कंपनियों की शुरुआत किये थे जिससे प्रान्त का विकास हो, लोगों को रोजगार मिले, शिक्षा मिले। आय के नये स्रोत बने। प्रदेश में इन्होने दो अख़बारों का प्रकाशन प्रारम्भ किये – आर्यावर्त और इण्डियन नेशन तथा मैथिलि के विकास के लिए मिथिला मिहिर नमक पत्रिका। वे संगीत और अन्य ललित कलाओं के बहुत बड़े संरक्षक थे। शिक्षा के क्षेत्र में दरभंगा राज का योगदान अतुलनीय है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय, कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और कई संस्थानों को काफी दान दिया। स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में काफी योगदान किया। महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह बहादुर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक सदस्य थे। अंग्रेजों से मित्रतापूर्ण संबंध होने के बावजूद वे कांग्रेस की काफी आर्थिक मदद करते थे। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, अबुल कलाम आजाद, सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गांधी से उनके घनिष्ठ संबंध थे। सन् 1892 में कांग्रेस इलाहाबाद में अधिवेशन करना चाहती थी, पर अंग्रेज शासकों ने किसी सार्वजनिक स्थल पर ऐसा करने की इजाजत नहीं दी। यह जानकारी मिलने पर दरभंगा महाराजा ने वहां एक महल ही खरीद लिया। उसी महल के ग्राउंड पर कांग्रेस का अधिवेशन हुआ।​ </p>
<p>​इतना ही नहीं, यह भी कहा जाता है कि महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू दरभंगा राज से 15 मन सोना मांगे थे और पंडित ​लक्ष्मीकांत झा एक कार्यक्रम के तहत नेहरू को दिया भी था गया। लेकिन दुर्भाग्य यह था कि पंडित नेहरू महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद “एक अक्षर का भी शोक सन्देश राज दरभंगा अथवा महाराजा की विधवा पत्नी को नहीं भेजे थे। सर कामेश्वर सिंह की मृत्यु 1 अक्टूबर, 1962 को होती है और तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु 27 मई, 1964 को, यानी दोनों की मृत्यु तारीखों के बीच महज 20-माह का अंतर होता है। आम तौर पर, महाराजाधिराज दरभंगा जैसे व्यक्ति की मृत्यु के साथ ही, कोई भी प्रधान मंत्री, उसमें भी पंडित नेहरू जैसा, तक्षण सोने की मांग तो नहीं करेंगे !! अब सवाल यह है कि क्या सच में राजकीय कोष में दरभंगा राज का 15 किलो सोना गया था? अगर प्रधानमंत्री कार्यालय/आवास पर आया तो भारत सरकार के राजकोष में या प्रधान मंत्री नेहरू के किसी दस्तावेज में इस बात का उद्धरण है क्या? आज की तारीख में भारत का सूचना अधिकार तो बता ही सकता है कि आखिर दरभंगा राज का 15 मन सोना राजकोष में उस 20-महीनों के बिच जमा हुआ था क्या? </p>
<p>​<strong>बहरहाल, लन्दन आर्काइव्स के दस्तावेजों के अनुसार दरभंगा के अंतिम महाराजा सर कामेश्वर सिंह हिंदुस्तान के बेहतरीन धनाढ्य, मानवीय, संवेदनशील, अनुशासित महाराजाओं में सर्वश्रेष्ठ थे। लन्दन आर्काइव्स के दस्तावेजों के अनुसार, लन्दन के संग्रहालयों में आज भी दरभंगा महाराजाओं का नाम उद्धृत हैं – उसमें सर्वश्रेष्ठ गवाह है “स्वर्ण और चाँदी में बना हॉउस ऑफ़ लॉर्ड्स की कुर्सी का रेप्लिका” की प्रस्तुति जिसे उन्होंने उपहार-स्वरुप स्वतंत्र भारत सरकार के माध्यम से दिया था। तकलीफ इस बात की है कि स्वतंत्र भारत में दरभंगा राज और महाराजाओं की अनगिनत ऐतिहासिक कार्यों को उनके ही परिवार के लोगों ने समाप्त कर दिया। वे तत्कालीन अविभाजित और विभाजित भारतीय समाजों के कल्याणार्थ ऐसे अनेकानेक ऐतिहासिक कार्य किये, दान दिए, उपहार दिए, जिसे स्वतंत्र भारत में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए था। परन्तु ऐसा नहीं हुआ।​ </strong></p>
<p>लन्दन के एक सूत्र के मुताबिक सन 1947 के पूर्व सार्वजनिक रूप से भारत से जितने भी चलनशील वस्तुओं/सामग्रियों/जेवरातों/अमूल्य निधियों को अंग्रेजी अधिकारियों द्वारा लाया गया था, यहाँ के ऐतिहासिक संग्रहालयों में “पब्लिक डिस्प्ले” पर रखा है। सूत्र का यह भी कहना है कि ब्रिटिश नियमों के मुताबिक जितनी भी सामग्रियां “पब्लिक डिस्प्ले” पर रखीं है और उसके लिए यदि दर्शकों से राशि ली जाती है तो सम्पूर्ण एकत्रित राशि का एक अहम् हिस्सा उस संपत्ति के वास्तिविक  मालिकों के आज के वंशजों के निमित होता है जो सम्बंधित देश में रहते हैं। अंग्रेजी हुकूमत समाप्ति के के दौर में और उसके बाद भी भारत से बहुत सरे अमूल्य वस्तुएं गयी थी। सूत्रों के अनुसार वेस्टमिंस्टर महल के लॉर्ड्स कक्ष में, जहाँ  हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स के सत्र का परिचालन होता है, और जिस सिंघासन से संबोधित करके संसद का उद्घाटन किया जाता है, उस सिंघासन का रेप्लिका महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने सम्मानार्थ पेश किया था। वैसे इस स्पीकर चेयर का डिजाईन सम्भतः 1849 में हुआ था। लेकिन सं 1941 में हॉउस ऑफ़ कॉमन में बनबार्डिंग के कारण वह कुर्सी ख़राब हो गयी थी। संसद के कार्य को सुचारु रूप से चलने के लिए एक “तत्कालीन कुर्सी” की व्यवस्था की गयी थी।  </p>
<p>महाराजाधिराज एक दूरदर्शी मनुष्य थे और वे भविष्य में भारत-ब्रिटेन राजनयिक सम्बन्धों के महत्वों को समझते थे, इसलिए उन्होंने हॉउस ऑफ़ लॉर्ड्स की उस कुर्सी का एक रेप्लिका बनाने को सोचा। इस रेप्लिका का निर्माण स्वर्ण-चांदी में हुआ था। आज़ाद भारत में भारत सरकार के माध्यम से यह रेप्लिका प्रस्तुत किया गया था। लेकिन फिर क्या हुआ इस बात की जानकारी शायद दरभंगा राज के पास नहीं है।  सूत्रों के अनुसार दरभंगा के महाराजधिराक सर कामेश्वर सिंह अविभाजित भारत के कौंसिल ऑफ़ स्टेट के करीब 13 वर्ष तक (सन 1933-1946) तक सदस्य थे। साथ ही, वे भारत के संविधान सभा के भी पांच वर्ष (1947-1952) तक सदस्य थे। इतना ही नहीं, आज से 88-वर्ष पूर्व उन्हें 1 जनबरी सं 1933 को आई ई सी से प्रोन्नत कर “नाईट कमाण्डर ऑफ़ दी मोस्ट एमिनेंट ऑर्डर ऑफ़ दी इण्डियन इम्पायर बनाया गया था। आज़ाद भारत में वे अपने जीवन के अंतिम सांस तक भारतीय संसद के ऊपरी सदन के सदस्य रहे। महाराजाधिराज की मृत्यु अक्टूबर 1962 में एक उत्तराधिकारी का नाम लिए बिना उनका निधन हो गया।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b2/the-maharajadhiraj-of-darbhanga-had-encouraged-women">​काश 😢 दरिभंगा के महाराजाधिराज महिलाओं को आगे बढ़ाते 😢 आज दरभंगा किले के पुरषों में थोथी की दरिद्रता है, दुःखद 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जानते हैं &#8216;एनडीए गठबंधन कमजोर&#8217; हो गया है, &#8216;संख्या का अभाव&#8217; है, परन्तु &#8216;एक राष्ट्र &#8211; एक चुनाव&#8217; ब्रह्मास्त्र बना रहे हैं भाजपा के लिए</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Sep 2024 12:30:35 +0000</pubDate>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>विजय चौक (नई दिल्ली) : इंडिया गेट से कर्तव्य पथ के रास्ते रायसीना पहाड़ी और संसद की ओर जाने वाली सड़कों की मिलन स्थल पर बहुत तरह की चर्चाएं आम हो रही है। अन्य बातों के अलावे देश के दूरदरस्त इलाकों से रायसीना पहाड़ी पर स्थित भारत के प्रथम नागरिक के आवास से लेकर प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, वित्त मंत्री, रक्षा मंत्री जैसे देश के शीर्षस्थ नेताओं के कार्यालयों और नव-निर्मित संसद भवन देखने आने वाले सैकड़ों, हज़ारों भारतीय मतदाता कुछ क्षण के लिए लिए सही, चर्चाएं अवश्य करते हैं कि क्या भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए &#8216;प्रवक्ता&#8217; बन गए हैं? क्या मोदी जी 75 वर्ष आयु के बाद भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान रहेंगे? क्या एक राष्ट्र-एक चुनाव विधेयक को कानून बनते ही प्रधानमंत्री संसद भंग कर देंगे आम चुनाव के लिए? आप क्या सोचते हैं कि 240 अंक से मोदी जी प्रसन्न हैं? क्या मोदी जी, उनके मंत्रिमंडल और नेतृत्व के प्रति भारत के मतदाताओं के मन में कोई शंका हो गई है? </strong></p>
<p>राष्ट्रीय राजधानी में भ्रमण-सम्मेलन करने वाले लोगों का मानना है कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा 2014 के चुनाव में 282 अंक प्राप्त करती है। उस कालखंड में चुनावी मैदान में न तो अटल बिहारी वाजपेयी थे, न लालकृष्ण आडवाणी थे और न अन्य भाजपा के अधिष्ठाता। उस चुनाव में जो भी अंक आये थे वह नरेंद्र मोदी के नाम पर आया था। 2019 के चुनाव में वह अंक 303 तक चढ़ा। लोगों का मानना है कि जिस कदर 282 से अंक 303 चढ़े, भाजपा के नेताओं के तेवर भी चढ़ने लगे, जो अप्रत्यक्ष रूप से मतदाताओं के हितों के विपरीत था। परिणाम यह हुआ कि 2024 के चुनाव में भाजपा सांसदों की संख्या 240 पर लुढ़क गयी। भाजपा की संख्या का कम होना और विपक्ष की संख्या का बढ़ना, राजनीतिक दृष्टिकोण से सत्तारूढ़ पार्टी, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और कार्य शैली पर प्रश्नचिन लगा दिया। सत्ता के गलियारे में इस बात की चर्चाएं हैं कि प्रधानमंत्री इस &#8216;धब्बा&#8217; को मिटाना चाहते हैं और अब तक के लोकसभा के चुनाव में 404 की संख्या से ऊपर चढ़ा जाय। </p>
<p>लोगों का कहना है कि &#8211; &#8216;एक राष्ट्र &#8211; एक चुनाव&#8217; की बात बेहद सुन्दर है। इससे समय, अर्थ दोनों का बचत होगा। यह भी कहते हैं कि &#8216;सिफारिश&#8217; को मानना इस बात का द्योतक है कि इस दिशा में कार्य बहुत शीघ्रता से होंगी। इन सिफारिशों के आधार पर अब विधेयक का प्रारूप बनेगा जिसे राज्य सभा और लोक सभा में पेश किया जायेगा। भले आगामी सत्र में इसलिए पेशी न हो सके, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि बजट सत्र आते-आते देश में कुछ राजनीतिक सरगर्मी शुरू हो जाएगी । जैसे ही विधेयक कानून का रूप ले लेता है, तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि 2029 लोकसभा चुनाव से पूर्व देश को आम चुनाव के साथ-साथ राज्यों के विधानसभाओं को भी चुनाव में झोंक दिया जाय।  </p>
<p><strong>उन मतदाताओं, जिसमें अवकाश प्राप्त नौकरशाहों के अलावे अनुभवी राजनीतिक विशेषज्ञ भी अपने-अपने परिवारों के साथ भ्रमण-सम्मेलन करने आते हैं, यह भी स्पष्ट किये कि पिछले दिनों केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह सार्वजनिक रूप से कहे थे: &#8220;मैं अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी और इंडिया ब्लॉक से यह कहना चाहता हूं कि बीजेपी के संविधान में ऐसा कुछ भी (75 साल पुरानी सीमा नियम का) उल्लेख नहीं है। पीएम मोदी न केवल यह कार्यकाल पूरा करने जा रहे हैं बल्कि पीएम मोदी भविष्य में भी नेतृत्व करना जारी रखेंगे। देश में इसे लेकर कोई भ्रम नहीं है।” वैसी स्थिति में अगर अमित शाह की बात सत्य है तो आगामी कई चुनाव ही नहीं, आने वाले सभी चुनावों में, जब तक परदेश भाजपामय नहीं हो जाएगा, नरेंद्र मोदी भाजपा का प्रधानमंत्री पद के  लिए दावेदार बने रहेंगे, नेतृत्व करेंगे। </strong></p>
<p>राष्ट्रीय राजधानी में भ्रमणकारी मतदाताओं का मानना है कि अगले वर्ष, यानी 2025 में सिर्फ दिल्ली और बिहार में विधानसभा का चुनाव होना है। जबकि 2026 में चार राज्यों &#8211; असम, पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और केरल में विधानसभा का चुनाव निश्चित है। उसके अगले साल, यानी 2027 में भारत के राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति के अलावे सात राज्यों &#8211; गोवा, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनाव होना निश्चित है। वैसी स्थिति में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अधिक दिनों तक &#8216;अन्य राजनीतिक पार्टियों की सहयोग से केंद्र में सरकार नहीं चलना पसंद करेंगे। उनकी नज़रों में संख्या का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है, खासकर जब अपने दूसरे कालखंड में ही उन्होंने अपने बलबूते पर ऐतिहासिक संख्या को प्राप्त किया था। </p>
<figure id="attachment_5768" aria-describedby="caption-attachment-5768" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/MODI.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/MODI.jpg" alt="" width="2200" height="1730" class="size-full wp-image-5768" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/MODI.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/MODI-300x236.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/MODI-1024x805.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/MODI-768x604.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/MODI-1536x1208.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/MODI-2048x1610.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5768" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी</figcaption></figure>
<p>यह अलग बात है कि वर्त्तमान संसद और सरकार में, उन्हें किसी भी सहयोगी राजनीतिक पार्टियों से कोई मनमुटाव नहीं है, कोई भी अब तक उनके कार्यों में दखलंदाजी नहीं किये हैं, लेकिन संख्या का होना अलग बात है। वजह यह है कि 2014 में जब पहली बार नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत कर चुनाव लड़ा गया था, भाजपा को 282 अंक प्राप्त हुए थे। साथ ही अन्य सहयोगी पार्टियों के भी अच्छे अंक थे। विपक्ष में कांग्रेस का हश्र सोचनीय हो गया था। 2019 के चुनाव में देश के मतदाता नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी को जबरदस्त विजयश्री दिया। 282 के अंक बढ़कर 303 हो गया। वैसे यह अंक लोक सभा चुनाव में भाजपा के लिए बहुत अधिक था, लेकिन राजीव गाँधी की अगुआई में कांग्रेस की संख्या इससे बहुत अधिक थी। </p>
<p>2019 चुनाव में 303 का अंक ऐतिहासिक था। लेकिन 2024 आम चुनाव में एक ओर जहाँ भाजपा या उसकी सहयोगी पार्टी की संख्या लुढ़की, विपक्ष, खासकर कांग्रेस पार्टी की संसद में संख्या में अप्रत्यासित इजाफा हुआ। विगत 2024 आम चुनाव में भाजपा का 303 से लुढ़क कर 240 पर आना, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनितिक पुरुषत्व को एक चुनौती दे दिया। लोगों का मानना है कि भले नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रिमंडल के लोग पिछले दस वर्षों में मोदी की अगुआई में कार्य सम्पादित, निष्पादित करने के आंकड़े बनायें, हकीकत यह है कि लोगों का उनमें, उनकी सरकार में विश्वास डगमगा गया। और यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंदर से भयभीत हो गए हैं, टूट गए हैं। वे चाहते हैं कि देश के मतदाताओं का विश्वास पुनः जीता जाय, वह भी उनके मतों से, चुनाव से। इसी बहाने एक राष्ट्र एक चुनाव का मुद्दत बाद परीक्षण भी हो जायेगा पोकरण की तरह। </p>
<p><strong>भ्रमणकारी मतदाता इस बात पर भी चर्चा करते हैं कि देश के उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि बनाने और निखारने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं । कल की ही तो बात है। उपराष्ट्रपति ने गांधीनगर (गुजरात) में चौथे ग्लोबल री-इन्वेस्ट, 2024 के समापन समारोह में इस बात पर जोर दिया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में आशा और संभावना का माहौल पैदा किया है। </strong></p>
<p>चौथे ग्लोबल री-इन्वेस्ट, 2024 के समापन समारोह को संबोधित करते हुए, श्री धनखड़ ने कहा, “मैं श्री नरेन्द्र मोदी की यात्रा का वर्णन तीन पहलुओं में करता हूँ। पहला, 2014 में वे एक रॉकेट की तरह थे जिसने उड़ान भरी। बहुत प्रयास की आवश्यकता थी। देश निराशा के मूड में था। उनका उद्देश्य आशा और संभावना का माहौल पैदा करना था। अंतर बहुत बड़ा था। 2019 में आशा और संभावना का माहौल पैदा करके यह गुरुत्वाकर्षण बल से से परे चला गया। 2024 में, छह दशकों के बाद पहली बार लगातार तीसरे कार्यकाल में प्रधान मंत्री बनकर इतिहास रचने के बाद, रॉकेट अब गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव में नहीं है। रॉकेट अंतरिक्ष में है और इसलिए उपलब्धियां खगोलीय होनी चाहिए।”</p>
<figure id="attachment_5769" aria-describedby="caption-attachment-5769" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Dhankhar.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Dhankhar.jpg" alt="" width="2200" height="1238" class="size-full wp-image-5769" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Dhankhar.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Dhankhar-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Dhankhar-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Dhankhar-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Dhankhar-1536x864.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Dhankhar-2048x1152.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5769" class="wp-caption-text">उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़</figcaption></figure>
<p>घनखड़ ने तो यहाँ तक कहा कि &#8220;यह गर्व की बात है कि बहुत लंबे समय के बाद भारत का कोई नेता वैश्विक विमर्श में छाया हुआ है। हम इस समय सौभाग्यशाली हैं कि इस देश से बहुत लंबे समय के बाद, इस देश का कोई नेता वैश्विक चर्चा में छाया हुआ है। उनकी आवाज हर जगह सुनी जाती है, वे मानवता और वैश्विक हित के मुद्दों पर बात करते हैं और इसलिए मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस देश ने पिछले एक दशक में उन क्षेत्रों में सफलता की जो गाथा देखी है, वह तीन दशक और उससे भी पहले चौंका देने वाली थी।&#8221; </p>
<p>इतना ही नहीं, &#8220;भारत को विश्व में सद्भाव लाने का केंद्र बिंदु बताते हुए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हैसियत को बताते हुए श्री धनखड़ ने कहा,  कि वे इस ग्रह पर व्याप्त संकटों का समाधान कर सकते हैं, &#8220;अगर भारत नेतृत्व करता है, अगर भारत के नेता प्रधानमंत्री मोदी कोई आह्वान करते हैं, तो वे इसे पूरा करके दिखाते हैं। पिछले 10 वर्षों में उन्होंने जो कुछ भी कहा है, वह जमीनी हकीकत है, यहां एक ऐसा व्यक्ति है जो न केवल आधारशिला रखता है बल्कि उनका उद्घाटन भी करता है, वह हमेशा समय से आगे की सोचता है&#8230; भारतीय नेता की आवाज को विश्व स्तर पर सम्मान के साथ सुना जाता है। उन्हें ग्रह पर एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में देखा जाता है जो इस समय ग्रह पर व्याप्त संकटों का समाधान कर सकता है।&#8221; </p>
<p><strong>उधर, X प्लेटफॉर्म पर पोस्ट्स की एक श्रंखला में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत परिवर्तनकारी सुधारों का साक्षी बन रहा है। उन्होंने कहा कि आज, इस दिशा में, केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा One Nation One Election पर उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों को स्वीकार करने के साथ भारत ने ऐतिहासिक चुनाव सुधारों की तरफ एक बड़ा कदम उठाया है। श्री शाह ने कहा कि यह निर्णय स्वच्छ और वित्तीय रूप से कुशल चुनावों के माध्यम से हमारे लोकतंत्र को मजबूत करने और संसाधनों के अधिक उत्पादक आवंटन के माध्यम से आर्थिक विकास में तेजी लाने की प्रधानमंत्री मोदी की दृढ़ इच्छाशक्ति को दर्शाता है।</strong></p>
<figure id="attachment_5771" aria-describedby="caption-attachment-5771" style="width: 1417px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Amit-Shah-1-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Amit-Shah-1-1.jpg" alt="" width="1417" height="1462" class="size-full wp-image-5771" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Amit-Shah-1-1.jpg 1417w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Amit-Shah-1-1-291x300.jpg 291w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Amit-Shah-1-1-992x1024.jpg 992w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Amit-Shah-1-1-768x792.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Amit-Shah-1-1-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1417px) 100vw, 1417px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5771" class="wp-caption-text">केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, कैबिनेट ने कल एक देश एक चुनाव के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी । अब देश की 543 लोकसभा सीट और सभी राज्यों की कुल 4130 विधानसभा सीटों पर एक साथ चुनाव कराने की राह खुल गई। एक देश एक चुनाव पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित कमेटी की रिपोर्ट के बाद प्रस्ताव को कैबिनेट ने मंजूरी दी है। एक देश एक चुनाव का विचार कम से कम 1983 से ही चला आ रहा है, जब चुनाव आयोग ने पहली बार इस पर विचार किया था। हालांकि, 1967 तक, भारत में एक साथ चुनाव कराना एक आदर्श नियम था। </p>
<p>वर्तमान में, राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव अलग-अलग आयोजित किए जाते हैं। इससे उत्पन्न होने वाली समस्याओं के कारण, चुनाव आयोग ने एक प्रणाली के गठन का सुझाव दिया ताकि राज्य विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ हो सकें।एक साथ चुनाव कराने का विचार 2016 में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा फिर से पेश किया गया था। तब से सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने एक साथ चुनाव कराने के लिए एक मजबूत तर्क दिया है। 2017 में नीति आयोग द्वारा एक साथ चुनाव पर वर्किंग पेपर तैयार किया गया था। यहां तक कि कानून आयोग भी 2018 में एक वर्किंग पेपर लेकर आया था और कहा था कि एक साथ चुनाव कराने की संभावना के लिए कम से कम पांच संवैधानिक बदलावों की आवश्यकता होगी। यह कहा जाता है कि एक साथ चुनाव सम्पन्न कराने पर चुनाव माध में खर्च होने वाली राशि में न्यूनतम 30 फीसदी की कमी होगी।</p>
<p>लेकिन, <strong>वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक राजीव रंजन नाग</strong> कहते हैं कि &#8220;बीजेपी के पास पिछले दो कार्यकालों के विपरीत लोकसभा में इस दफा बहुमत नहीं है। विधेयकों को पारित करवाने के लिए उसे एनडीए के सहयोगियों और मित्र दलों पर निर्भर रहना होगा। लोकसभा में संख्या बल के लिहाज से, ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ प्रस्ताव का समर्थन करने वाली पार्टियों के निचले सदन में 271 सांसद हैं, जिनमें 240 बीजेपी से हैं। समिति को अपनी राय देते हुए एक साथ चुनाव का विरोध करने वाली 15 पार्टियों के 205 लोकसभा सांसद हैं। इसमें विपक्षी दल इंडिया ब्लॉक का प्रतिनिधित्व करने वाले 203 सांसद शामिल हैं। कुल मिलाकर, इंडिया ब्लॉक और वे पार्टियाँ जिन्होंने पैनल के समक्ष अपनी राय नहीं रखी, उनके 234 लोकसभा सांसद हैं।&#8221;</p>
<figure id="attachment_5772" aria-describedby="caption-attachment-5772" style="width: 370px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Nag-fotor-20240919173412.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Nag-fotor-20240919173412.jpg" alt="" width="370" height="359" class="size-full wp-image-5772" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Nag-fotor-20240919173412.jpg 370w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Nag-fotor-20240919173412-300x291.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Nag-fotor-20240919173412-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/Nag-fotor-20240919173412-48x48.jpg 48w" sizes="auto, (max-width: 370px) 100vw, 370px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5772" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक राजीव रंजन नाग</figcaption></figure>
<p>नाग आगे कहते हैं कि &#8220;एनडीए, जिसमें टीडीपी और अन्य दल शामिल हैं, जो अब तक एक साथ चुनावों पर तटस्थ रहे हैं, के पास लोकसभा में 293 सांसदों की ताकत है। हालांकि, अगर मोदी सरकार को 543 की पूरी ताकत मिलती है, तो उसे बिलों को पारित कराने के लिए लोकसभा में 362 वोट (सांसदों) या दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। इस प्रकार बिलों को दो-तिहाई बहुमत तभी मिल सकता है, जब 100 से अधिक सांसद मतदान से दूर रहें, जिससे लोकसभा की ताकत कम हो जाए।&#8221;</p>
<p>जहाँ तक राज्य सभा के आंकड़े का प्रश्न है, नाग का कहना है कि &#8220;मोदी सरकार राज्य सभा में बेहतर स्थिति में है, लेकिन बिलों को पारित कराने के लिए संख्या पर्याप्त नहीं है। बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के पास राज्य सभा में 115 सांसद हैं। इसके अलावा छह मनोनीत सदस्य भी हैं, जिससे एनडीए के पास उच्च सदन में 121 सांसद हैं। राज्य सभा में इंडिया ब्लॉक के 85 सांसद हैं। यह हमारे लोकतंत्र को और भी अधिक जीवंत और सहभागी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि मतदान के दौरान राज्य सभा के सभी 250 सदस्य मौजूद हों, तो साधारण बहुमत 125 होगा और दो-तिहाई बहुमत 164 सांसद होंगे। वर्तमान में, राज्य सभा में 234 सांसद हैं। उनकी स्थिति को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार के लिए संसद के आगामी सत्रों में &#8216;एक राष्ट्र, एक चुनाव&#8217; प्रस्ताव को लागू करने वाला विधेयक पारित करना आसान नहीं होगा।</p>
<p><strong>लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के लिए पहला आम चुनाव 1951-52 में एक साथ आयोजित किया गया था। यह प्रथा 1957, 1962 और 1967 में हुए तीन आम चुनावों में भी जारी रही। हालांकि, 1968 और 1969 में कुछ विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने के कारण यह चक्र बाधित हो गया।इंदिरा गांधी ने साल 1970 में लोकसभा भंग करवा दी थी और तय समय से 15 महीने पहले ही 1971 में आम चुनाव करवा दिए थे। इंदिरा अल्पमत सरकार चला रही थीं और पूर्ण सत्ता चाहती थीं। उनके इस फैसले ने राज्य विधानसभा चुनावों को आम चुनाव से अलग कर दिया था। अलग-अलग समय में चुनाव करने से सरकार और अन्य हितधारकों द्वारा बहुत अधिक व्यय, ऐसे निर्वाचनों में लगाए गए सुरक्षा बलों और अन्य निर्वाचन अधिकारियों की उनकी महत्वपूर्ण रूप से लंबी कालावधि के लिए अपने मूल कर्तव्यों से भिन्न अन्यत्र तैनाती, आदर्श आचार संहिता, आदि के लंबी अवधि तक लागू रहने के कारण, विकास कार्य में दीर्घ अवधियों के लिए व्यवधान के रूप में होता है।</strong></p>
<p>ज्ञातव्य हो कि भारत के विधि आयोग ने निर्वाचन विधियों में सुधार पर अपनी 170 वीं रिपोर्ट में यह संप्रेक्षण किया है कि  &#8220;प्रत्येक वर्ष और बिना उपयुक्त समय के निर्वाचनों के चक्र का अंत किया जाना चाहिए। हमें उस पूर्व स्थिति का फिर से अवलोकन करना चाहिए जहां लोक सभा और सभी विधान सभाओं के लिए निर्वाचन साथ-साथ किए जाते हैं। यह सत्य है कि हम सभी स्थितियों या संभाव्यताओं के विषय में कल्पना नहीं कर सकते हैं या उनके लिए उपबंध नहीं कर सकते हैं, चाहे अनुच्छेद 356 के प्रयोग के कारण (जो उच्चतम न्यायालय के एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ के विनिश्चय के पश्चात् सारवान् रूप से कम हुआ है) या किसी अन्य कारण से उत्पन्न हो सकेंगी, किसी विधान सभा के लिए पृथक निर्वाचन आयोजित करना एक अपवाद होना चाहिए न कि नियम नियम यह होना चाहिए कि &#8216;लोकसभा और सभी विधानसभाओं के लिए पांच वर्ष में एक बार में एक निर्वाचन&#8217; ।&#8221; </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/politics/prime-minister-narendra-modi-knows-that-nda-alliance-has-become-weak-there-is-lack-of-numbers">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जानते हैं &#8216;एनडीए गठबंधन कमजोर&#8217; हो गया है, &#8216;संख्या का अभाव&#8217; है, परन्तु &#8216;एक राष्ट्र &#8211; एक चुनाव&#8217; ब्रह्मास्त्र बना रहे हैं भाजपा के लिए</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>एको अहं, द्वितीयो नास्ति: मैं समय हूँ, मैं सत्तारूढ़ हूँ, मैं ही विपक्ष हूँ, मैं ही पार्टी हूँ, मैं ही कार्यकर्त्ता हूँ, मैं ही सेवक हूँ, मैं ही स्वामी हूँ &#8230; शेष सब मिथ्या है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 12 Aug 2024 03:48:55 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>रफ़ी मार्ग &#8211; रायसीना रोड &#8211; राजेंद्र प्रसाद रोड और नवनिर्मित संसद का गोल चक्कर (नई दिल्ली): भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और रायसीना पहाड़ी के नाम से अंकित सड़कें जब नवनिर्मित संसद द्वार के सामने वाले गोल चक्कर से टकराती है, प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के अंतिम छोड़ पर जमीन पर खड़े [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/i-am-the-time-i-am-the-ruling-i-am-the-opposition-i-am-the-party-i-am-the-worker-i-am-the-servant-i-am-the-master">एको अहं, द्वितीयो नास्ति: मैं समय हूँ, मैं सत्तारूढ़ हूँ, मैं ही विपक्ष हूँ, मैं ही पार्टी हूँ, मैं ही कार्यकर्त्ता हूँ, मैं ही सेवक हूँ, मैं ही स्वामी हूँ &#8230; शेष सब मिथ्या है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रफ़ी मार्ग &#8211; रायसीना रोड &#8211; राजेंद्र प्रसाद रोड और नवनिर्मित संसद का गोल चक्कर (नई दिल्ली): भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और रायसीना पहाड़ी के नाम से अंकित सड़कें जब नवनिर्मित संसद द्वार के सामने वाले गोल चक्कर से टकराती है, प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के अंतिम छोड़ पर जमीन पर खड़े राजनीति शास्त्र के दो धनुर्धर राष्ट्र की वर्तमान स्थिति के बारे में चर्चा कर रहे हैं। आगे-पीछे-सामने से आती-जाती दो पैर वाले मानव से लेकर चार-आठ पहिये वाले वाहनों का पों-पां-पों-पां उनके वार्तालाप में तनिक भी खलल नहीं दे पा रहा है। बीच-बीच में भारत के संसद की ओर से निकलकर आम रास्ता पर चलने वाली गाड़ियों से सायरन की आवाज गूंजती हैं, तो कभी सामने पीपल पेड़ के नीचे सफ़ेद-बैगनी वस्त्र में दिल्ली यातायात पुलिस की सिटी वातावरण की हवाओं को बेध रहा है। आसमान में सूर्यदेव पृथ्वी पर सत्ता के इस पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले लोगों के बाएं  कनपट्टी को सेक रहे हैं। </strong> </p>
<p>मैं एक कंधे पर झोला और दूसरे पर कैमरा लटकाये खड़ा हूँ। आवक-जावक में कई परिचित चेहरे है तो कई अपरिचित। दिल्ली शहर ही नहीं, देश में भले पत्रकारिता का स्तर पाठकों और दर्शकों की नज़रों में दिल्ली नगर निगम के अवरुद्ध नालों जैसा हो गया हो, लेकिन आज भी ऐसे सम्मानित पाठक और दर्शक हैं जो पत्रकारों को देखकर सम्मान के साथ मुस्कुराते हैं। मेरी सफ़ेद मूंछ शायद मेरी पत्रकारिता जीवन का दृष्टान्त दे रहा है उनकी नज़रों में। इस क्षण मुझे भी कुछ ऐसा ही अनुभव हो रहा है। इस सल्तनत में कोयला सी काली मूंछ लेकर तत्कालीन दक्षिण बिहार के कोयलांचल से आया था। </p>
<p><strong>इसी पों-पां के बीच कभी चश्मे को नाक पर चढ़ाते तो कभी नाक से उतारते एक शास्त्रार्थी कहते हैं : &#8220;वैसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 95(1) के अनुसार यदि लोकसभा अध्यक्ष का पद रिक्त है तो अध्यक्ष के पद के कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए उपाध्यक्ष की आवश्यकता होती है। संसदीय नियमों में अध्यक्ष के सभी अधिकारों को उपाध्यक्ष के लिए भी समान माना जाता है, क्योंकि जब वह सदन की अध्यक्षता करता है तो उपाध्यक्ष के पास भी अध्यक्ष के समान सामान्य शक्तियां होती है। अब अगर तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी श्री ओम बिरला को दूसरी पारी खेलने के लिए चयन कर ही लिए और अध्यक्ष की कुर्सी खाली नहीं है, तो फिर उपाध्यक्ष की आवश्यकता क्या है? </strong></p>
<figure id="attachment_5677" aria-describedby="caption-attachment-5677" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/2.jpg" alt="" width="2200" height="1263" class="size-full wp-image-5677" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/2.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/2-300x172.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/2-1024x588.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/2-768x441.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/2-1536x882.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/2-2048x1176.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5677" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री सम्मानित नरेंद्र मोदी नवनिर्मित संसद भवन में &#8211; तस्वीर: पीआईबी</figcaption></figure>
<p>शास्त्रार्थी पूर्वपंथी, पश्चिमपंथी, दक्षिणपंथी या उत्तरपंथी नहीं दिख रहे थे। सड़क पर खड़े हैं और पैरों में धीसा-पीटा चप्पल था जो इस बात का साक्षात् गवाही दे रहा था कि वे भारत का एक आम नागरिक हैं, एक आम मतदाता हैं। उनका कहना है कि पिछली लोकसभा में भी उपाध्यक्ष की कुर्सी किसी को बैठने के लिए तरस गई थी। मोदी जी चाहते हैं कि जो प्रक्रिया उनके आने के पहले से पूर्व के प्रधानमंत्रियों के द्वारा चलाया जा रहा था, यह जरुरी नहीं है कि चले &#8211; संविधान में परिवर्तन हो सकता है तो संवैधानिक पदों को भी परिवर्तित किया जा सकता है।&#8221;</p>
<p>तभी लोकसभा के प्रथम अध्यक्ष जीवी मावलंकर (15 मई, 1952 से 27 फरवरी, 1956) और तत्कालीन उपाध्यक्ष (जो बाद में लोकसभा के अध्यक्ष 8 मार्च, 1956-31 मार्च, 1962 भी बने) के नाम से अलंकृत मावलंकर हॉल और डिप्टी स्पीकर हॉल के तरफ से तीन विदुषी आते दिखाई दीं। क्षण भर में वे तीनों इन दो महानुभावों से मिलकर पांच हो गए। बातचीत का सिलसिला कुछ क्षण के लिए रुका, लेकिन आगे बढ़ाते फिर कहते हैं &#8220;प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से विद्वान, दूरद्रष्टा, कर्मशील, लोक कल्याण कारक आज़ादी के बाद भारत को नहीं मिला था। यह भारत का भाग्य है कि ऐसे व्यक्ति यहाँ की भूमि पर जन्म लिए। यह पहले व्यक्ति है जो अपने घर जाने वाली सड़क को भी कल्याणकारी शब्द से अलंकृत कर लोक कल्याण मार्ग कर दिए। यह उनकी भलेमानुषता का दृष्टान्त है कि उस सड़क पर आज भी लोगों का आना-जाना प्रतिबंधित नहीं है।</p>
<figure id="attachment_5678" aria-describedby="caption-attachment-5678" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/3.jpg" alt="" width="2200" height="1496" class="size-full wp-image-5678" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/3.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/3-300x204.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/3-1024x696.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/3-768x522.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/3-1536x1044.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/3-2048x1393.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5678" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री सम्मानित नरेंद्र मोदी नवनिर्मित संसद भवन में &#8211; तस्वीर: पीआईबी</figcaption></figure>
<p><strong>उनमें एक महिला कांग्रेस के युवा नेता राहुल गाँधी और समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव का नाम लेकर कहती हैं कि मोदी जी भले अपने को युवा समझें, लेकिन सच तो यह है कि वे 74+ वर्ष हैं। वैसे उनकी योग्यता के बारे में, शिक्षा के बारे में वर्षों अख़बारों के पन्ने रंगे रहे, आधिकारिक उम्र तो यही कहता है। वे भले अपने को &#8216;सेवक&#8217; कह लें, लेकिन भारत सरकार में कार्य करने वाले सरकारी सेवक से लेकर न्यायपालिका के न्यायविदों तक, सभी तो 60 वर्ष आते आते घर की ओर उन्मुख होना पड़ता है। लेकिन 75 वर्ष की आयु में भी राष्ट्र को संभालना और प्रत्येक माह अपने मन की बात बताकर स्वयं हल्का करना और दूसरे को अश्रुपूरित कर देना, उन्हें अपना-अपना कर्तव्यबोध याद दिलाना &#8211; यह भी तो पृथ्वीराज कपूर या राजकपूर जैसे कलाकार ही कर सकते हैं। </strong></p>
<p>पिछले लोकसभा में न तो राहुल गाँधी और ना ही अखिलेश यादव का कोई राजनीतिक वजूद था संसद में। लेकिन इस 18 वीं लोकसभा में दोनों युवाओं ने यह तो सिद्ध कर दिया कि उनसे वे दोनों अधिक युवक हैं। कल तक दोनों को जिस दृष्टि से देखा जाता था, या फिर मोदी जी देखे थे, आज नहीं देख पा रहे हैं। संसद में 99 और 37 कुर्सियों पर आधिपत्य जमाकर बैठना और आँख में आँख डालकर मुस्कुराना &#8211; यह मजाक तो नहीं है। वैसे भी मोदी जी का चेहरा आगे कर ही 2019 लोक सभा चुनाव में  303 सीट जीता गया था। विगत लोकसभा में अगर 303 की संख्या 240 हो गई तो यह भी इस बात का प्रमाण है कि चेहरे की सुंदरता, भव्यता का असली स्वरुप भारत के मतदाता आंक लिए है। राहुल गांधी अपना चेहरा आगे लाकर 99 की संख्या किए तो यह भी मजाक नहीं है। </p>
<figure id="attachment_5679" aria-describedby="caption-attachment-5679" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/4.jpg" alt="" width="2200" height="1410" class="size-full wp-image-5679" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/4.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/4-300x192.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/4-1024x656.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/4-768x492.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/4-1536x984.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/4-2048x1313.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5679" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री सम्मानित नरेंद्र मोदी नवनिर्मित संसद भवन में &#8211; तस्वीर: पीआईबी</figcaption></figure>
<p>राजनीतिक विशेषज्ञ  को उद्धृत करते शास्त्रार्थी कहते है कि अपवाद छोड़कर भाजपा में बहुत सांसद हैं जिनकी अपनी छवि नहीं है और वे मोदी जी का मुखौटा पहनकर संसद पहुँचे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो इतने सांसद हारते कैसे? या ग़ैर भाजपा राजनीतिक पार्टी के लोग जीतते क़ैसे? अगर इतने वर्षों का जनसंघ या भारतीय जानता पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं का योगदान, यहाँ तक की आडवाणी जी का योगदान, आज नरेंद्र मोदी के योगदान के सामने बौना हो गया है और सभी मोदी है तो मुमकिन है का नारा बुलंद कर रहे हैं, तो यही बात ग़ैर भाजपा पार्टी के साथ भी लागू हो सकता है। नेहरू, इंदिरा राजीव अगर ग़लत किए, जैसा की भाजपा कहती है, इसमें राहुल गांधी का क्या दोष ? अगर आज 240 सांसद मोदी के कारण जीते तो 99 सांसद भी राहुल के पीछे जीते। लम्बी सांस लेते एक शाश्त्रार्थी कहते हैं कि असल में मोदी जी अपनी जीत के आगे किसी और की विजय देखना नहीं चाहते । </p>
<p><strong>मैं समझ नहीं पा रहा था कि दोनों महानुभाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के आलोचक हैं या प्रसंशक। शब्दों की कबड्डी भी सीमा रेखा पर ही थी। शारीरिक भाषा का भी तारतम्य ख़राब नहीं था। शब्दों का शास्त्रार्थ गीता में लिखे श्लोकों जैसा था  &#8211; ऐसा होने से ऐसा और ऐसा नहीं होने से ऐसा । उनकी बातों को सुनकर और उन्हें उन महिलाओं के साथ छोड़कर मैं आगे पत्रकारिता की दुनिया का कभी मक्का माने जाने वाला आईएनएस बिल्डिंग की ओर बढ़ गया। साढ़े तीन दशक पहले इसी भवन से दिल्ली में पत्रकारिता का क ख ग घ सीखा था। लेकिन आज यह भी वीरान है। यहाँ से भी तो पत्रकार बन्धु बांधव के कार्यालयों में वह तेज नहीं रहा, जो पहले था । पहले यहाँ नीम के पेड़ के नीचे संजय की चाय की चुस्की लेते महिला-पुरुष पत्रकार फर्राटेदार अंग्रेजी उवाचते थे, आज कल भाई साहब का बोलबाला हो गया है। संजय भी, जो कभी श्रम शक्ति भवन के प्रवेश द्वार पर श्रम करता था, सड़क के पार चला गया है। ख़ैर। समय के साथ बदलाव आवश्यक है और सम्मानित मोदी जी अगर &#8216;सोच बदलो &#8211; देश बदलेगा&#8217; सोचते हैं तो क्या खराबी है।</strong> </p>
<figure id="attachment_5680" aria-describedby="caption-attachment-5680" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/5.jpg" alt="" width="2200" height="1463" class="size-full wp-image-5680" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/5.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/5-1024x681.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/5-768x511.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/5-1536x1021.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/5-2048x1362.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5680" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री सम्मानित नरेंद्र मोदी नवनिर्मित संसद भवन में &#8211; तस्वीर: पीआईबी</figcaption></figure>
<p>उधर, नवनिर्मित संसद की ओर से निकलने वाले सांसदों के मुख पर वह चमक नहीं दिख रहा था जो विश्व के महानतम प्रजातंत्र के सांसदों का होना चाहिए। तीन-सतही मंत्रिमंडल में केंद्रीय, राज्य और स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्रियों के मुख मण्डल पर वह दमक नहीं दिखा रहा है जो 23,59,73,935 करोड़ यानी 36.56 फीसदी मतदाताओं द्वारा चयनित पार्टी के मंत्रियों का होना चाहिए। एक तो पिछले लोक सभा की तुलना में 58 सीटों की करारी हार है, और दूसरे सत्तारूढ़ पार्टी के निगरानी कर्ता (मॉनिटर) का कड़ा प्रहरी &#8211; आप सिर्फ मंत्री हैं कुर्सी पर रहें, आनंद लें, शेष कार्य हम कर लेंगे। कहते हैं पिछले दिनों तो प्रधानमंत्री और एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री, जो सामान्यतया प्रधानमंत्री पद के दावेदार भी थे/हैं अपनी शालीनता, ज्ञान, व्यवहार के कारण, ठन गई थी । आख़िर पार्टी से ऊपर कोई व्यक्ति कैसे हो सकता? लेकिन यहाँ धारणा यह हो गई की मैंने तीन से तीन सौ तीन किया, इसलिए मेरे कारण ही पार्टी है। वैसी स्थिति में इस चौराहे पर चतुर्दिक &#8216;एको अहं, द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति!&#8217; यानी मैं ही हूँ शेष सब मिथ्या है। न मेरे जैसा कभी कोई आया न आ सकेगा, हवाओं में अपना अधिपत्य जमाये बैठा है। </p>
<p>ज्ञातव्य हो कि पिछली लोक सभा के 53 मंत्री जो चुनाव में गए, सिर्फ 35 ही जीत कर आये, शेष को मतदाताओं ने निरस्त कर दूसरे को मौका दिया अपनी समस्याओं के समाधान के लिए। इस 18वीं लोकसभा में 41 राजनीतिक पार्टियों के लिए कुर्सियां लगी है जबकि 2019 वाले लोकसभा में 36 पार्टियां लोकसभा में थी। राष्ट्रीय पार्टियां 64 फीसदी सीट जीतकर 346 स्थानों का अधिकार प्राप्त की, जबकि राज्य की राजनीतिक पार्टियां 33 फीसदी सीट जीतकर 179 कुर्सियों का हकदार बनी। भारतीय जनता पार्टी 240 स्थान पाकर सबसे बड़ी पार्टी बनी और सरकार बनायीं जबकि राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी 99 कुर्सियां और समाजवादी पार्टी 37 कुर्सियां अपने नाम सुरक्षित की। 18वीं  संसद में महिलाओं की संख्या (74) 17 वीं लोकसभा की तुलना में गिर गई (78) है, भले इनमें से 41 फीसदी यानी 30 महिला सांसद पिछली लोकसभा में ही क्यों न हों, पिछली लोकसभा की तुलना में 37 फीसदी सांसदों के करारी हार के कारण सत्तारूढ़ पार्टी के निगरानी कर्ता के चेहरे पर हंसी कैसे आएगी। </p>
<figure id="attachment_5681" aria-describedby="caption-attachment-5681" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/6.jpg" alt="" width="2200" height="1675" class="size-full wp-image-5681" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/6.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/6-300x228.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/6-1024x780.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/6-768x585.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/6-1536x1169.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/6-2048x1559.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5681" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री सम्मानित नरेंद्र मोदी नवनिर्मित संसद भवन में &#8211; तस्वीर: पीआईबी</figcaption></figure>
<p><strong>करारी हार के बाद भी विजय श्री का माला पहने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पुनः 18 वीं लोकसभा में तीसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में 9 जून, 2024 को शपथ ग्रहण किये। वर्तमान लोकसभा का प्रथम सत्र 24 जून से प्रारम्भ हुआ और 3 जुलाई को समाप्त हुआ। साथ ही, राज्य सभा का 264 वां सत्र भी 27 जून से प्रारम्भ होकर 3 जुलाई को समाप्त हुआ। बीजेपी सांसद ओम बिरला दूसरी बार लोकसभा अध्यक्ष चुन लिए गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के विशेष सत्र में लोकसभा स्पीकर पद के लिए ओम बिरला के नाम का प्रस्ताव रखा तो वहां मौजूद सांसदों ने ध्वनि मत से उन्हें अपना अध्यक्ष चुन लिया। यह भी एक राजनीतिक इतिहास ही बना। लगातार दूसरी बार अध्यक्ष बनकर बलराम जाखड़, जीएम बालयोगी और पीए संगमा की सूची में शामिल हो गए हैं। जब ओम बिरला अध्यक्ष बने पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने यह मांग उठाई थी कि अध्यक्ष सत्ता पक्ष का तो उपाध्यक्ष विपक्षी दलों का होना चाहिए। लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन &#8211; एनडीए ने उपाध्यक्ष पद की मांग के लिए विपक्ष की आलोचना की और बताया कि जिन राज्यों में विपक्ष सत्ता में है, वहां उपाध्यक्ष का पद सत्तारूढ़ दल ने बरकरार रखा है।</strong> </p>
<figure id="attachment_5682" aria-describedby="caption-attachment-5682" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/10.jpg" alt="" width="2200" height="1332" class="size-full wp-image-5682" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/10.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/10-300x182.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/10-1024x620.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/10-768x465.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/10-1536x930.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/10-2048x1240.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5682" class="wp-caption-text">ओम बिरला दूसरी बार लोकसभा अध्यक्ष</figcaption></figure>
<p>लोक सभा के गठन के बाद से अब तक एमए अयंगर, हुकुम सिंह, एसवी कृष्णामूर्ति राव, रघुनाथ केशव खालीदकर, जीजी स्वेल, गोडे मुरहरि, जी लक्ष्मण, एम थंबीदुरै, शिवराज पाटिल, एस मल्लिका जुनैयाह, सूरज भान, पीएम सईद, चंद्रजीत सिंह अटवाल, करिया मुंडा, एम थंबीदुरै लोकसभा के उपाध्यक्ष के पद पर विराजमान रहे। पिछली बार से लोकसभा उपाध्यक्ष का पद खाली चल रहा है। वैसे अभी तक परंपरा रही है कि लोकसभा का उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को दिया जाता है। लेकिन 17वीं लोकसभा में विपक्ष लगभग नहीं के बराबर था। इसलिए उपाध्यक्ष की जरूरत ही नहीं पड़ी। लेकिन इस बार लोकसभा में विपक्ष की ताकत बढ़ने से सभी इस बात पर बल दे रहे हैं कि उपाध्यक्ष का पद विपक्ष के पास आये। 16वीं लोकसभा में 2014-19 के दौरान बीजेपी की सहयोगी अन्नाद्रमुक के नेता एम. थंबी दुरई उपाध्यक्ष थे। यहाँ एक सवाल उठता है कि आखिर मोदी जी विपक्ष को ताकतवर क्यों बनने दें ?</p>
<p>उधर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार ने भी कहा कि लोकसभा स्पीकर निर्विरोध चुना जाना चाहिए। लेकिन संसदीय परंपरा के अनुसार विपक्षी को उपाध्यक्ष का पद मिलना चाहिए।  निश्चित रूप से, छठी लोकसभा से 16वीं लोकसभा तक उपाध्यक्ष का पद विपक्ष के पास था। 16वीं लोकसभा में ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम- एआईएडीएमके के वरिष्ठ नेता एम. थंबीदुरई उपाध्यक्ष थे और बीजेपी की सुमित्रा महाजन स्पीकर थीं। 17वीं लोकसभा में यह पद खाली रहा। लोकसभा के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि 17वीं लोकसभा के दौरान कोई भी डिप्टी स्पीकर नहीं था। </p>
<figure id="attachment_5683" aria-describedby="caption-attachment-5683" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/7.jpg" alt="" width="2200" height="1356" class="size-full wp-image-5683" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/7.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/7-300x185.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/7-1024x631.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/7-768x473.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/7-1536x947.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/7-2048x1262.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/7-356x220.jpg 356w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5683" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री सम्मानित नरेंद्र मोदी नवनिर्मित संसद भवन में &#8211; तस्वीर: पीआईबी</figcaption></figure>
<p><strong>संविधान के अनुच्छेद 95 के अनुसार, अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष ही लोकसभा की कार्रवाई देखता है। अगर अध्यक्ष अपने पद से इस्तीफा देते हैं तो वह इसके लिए उपाध्यक्ष को संबोधित करेंगे। आजादी के बाद पहली लोकसभा से लेकर चौथी लोकसभा तक अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, दोनों ही पद कांग्रेस के पास हुआ करते थे। लोकसभा के पहले उपाध्यक्ष एम.अनंतशायनम थे। उनका कार्यकाल 1952 से 1956 तक रहा। उनके बाद सरदार हुकुम सिंह, एस.वी.कृष्णमूर्ति राव और आर.के.खानडीलकर 1969 तक उपाध्यक्ष बने। ये सभी कांग्रेस के ही सांसद थे। साल 1969 में कांग्रेस ने ऑल पार्टी हिल लीडर्स के नेता गिलबर्ट जी स्वेल को उपाध्यक्ष बनाया गया। स्वेल शिलॉन्ग से सांसद थे। तभी से यह परंपरा बनी की उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को दिया जाएगा। लेकिन राजनीतिक गलियारे की गुफ्तगू से यह स्पष्ट है कि लोकसभा के उपाध्यक्ष पद विपक्ष को क्यों दिया जाय? सत्तारूढ़ पार्टी की यह प्रवल चेष्टा है कि &#8216;विपक्ष&#8217; शब्द को ही समाप्त कर दिया जाय। लेकिन देश में जनतांत्रिक व्यवस्था होने के कारण, आम चुनाव होने के कारण अंतिम निर्णय मतदाता करता है, वैसी स्थिति में अगर मतदाता दूसरे पार्टी के लोगों को चुनकर संसद भेजता है तो सरकार या संविधान क्या कर सकता है ?</strong></p>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा लोकसभा में विपक्ष की ताकत में उल्लेखनीय वृद्धि के साथ, इसके सदस्य उपाध्यक्ष पद के लिए सक्रिय रूप से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। संवैधानिक रूप से अनिवार्य न होने के बावजूद, एक लंबे समय से चली आ रही संसदीय परंपरा यह तय करती है कि विपक्ष का कोई सदस्य लोकसभा में यह भूमिका निभाए। हालांकि, 2019 से 2024 तक 17वीं लोकसभा की पूरी अवधि के दौरान किसी भी उपाध्यक्ष की नियुक्ति नहीं की गई, जिसकी विशेषज्ञों और विपक्षी नेताओं ने आलोचना की और इस कदम को अलोकतांत्रिक बताया। अटकलों के अलावा, सरकार की ओर से इस बात का कोई औपचारिक संकेत नहीं मिला है कि 18वीं लोकसभा में भी इस पद को भरा जाएगा। हम उपसभापति की नियुक्ति की प्रक्रिया के साथ-साथ इस महत्वपूर्ण संवैधानिक पद से जुड़ी जिम्मेदारियों और चुनौतियों पर भी गहराई से चर्चा करेंगे। </p>
<figure id="attachment_5684" aria-describedby="caption-attachment-5684" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/8.jpg" alt="" width="2200" height="1461" class="size-full wp-image-5684" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/8.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/8-300x199.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/8-1024x680.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/8-768x510.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/8-1536x1020.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/8-2048x1360.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5684" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री सम्मानित नरेंद्र मोदी नवनिर्मित संसद भवन में &#8211; तस्वीर: पीआईबी</figcaption></figure>
<p>इससे पहले 12वीं लोकसभा में चुनाव के बाद से सदन 269 दिनों तक बिना किसी उपाध्यक्ष के काम किया है। पीआरएस द्वारा संकलित आंकड़ों से पता चलता है कि भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली 12वीं लोकसभा का कार्यकाल केवल 13 महीने, 10 मार्च 1998 से 26 अप्रैल 1999 तक चला था। जीएमसी बालयोगी मार्च 1998 में 12वीं लोकसभा के अध्यक्ष चुने गए, जबकि कांग्रेस के पीएम सईद उसी वर्ष दिसंबर में उपाध्यक्ष चुने गए। नौवीं लोकसभा में, जिसका कार्यकाल 2 दिसंबर 1989 को शुरू हुआ, रवि राय दिसंबर 1989 में अध्यक्ष चुने गए, जबकि शिवराज पाटिल मार्च 1991 में उपाध्यक्ष बने। </p>
<p><strong>18वीं लोकसभा में दस साल में पहली बार विपक्ष का नेता हुआ । पिछली दो लोकसभाओं में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस को यह पद नहीं मिल पाया था, क्योंकि उसके पास आवश्यक संख्या नहीं थी, जो सदन की कुल संख्या का दसवां हिस्सा है। 16वीं लोकसभा में कांग्रेस के 44 सांसद थे, जबकि 17वीं लोकसभा में 55 सांसद थे। विधायी कार्यप्रणाली न केवल लिखित प्रक्रिया नियमों पर निर्भर करती है, बल्कि मिसाल और परंपरा पर भी निर्भर करती है। वैसे विधानमंडलों में विपक्ष के नेता का पद महत्वपूर्ण होता है। उनकी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि विधायी कामकाज में विपक्ष की आवाज प्रभावी ढंग से पहुंचाई जाए। यह पद विपक्ष को बहस में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली आवाज प्रदान करता है और उसे मान्यता देता है। इसी को मान्यता देते हुए विपक्ष के नेता को अधिक दर्जा देने तथा प्रमुख पदों की चयन समितियों में स्थान देने के लिए कानून बनाए गए हैं।</strong></p>
<figure id="attachment_5685" aria-describedby="caption-attachment-5685" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/9.jpg" alt="" width="2200" height="1406" class="size-full wp-image-5685" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/9.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/9-300x192.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/9-1024x654.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/9-768x491.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/9-1536x982.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/9-2048x1309.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5685" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री सम्मानित नरेंद्र मोदी नवनिर्मित संसद भवन में &#8211; तस्वीर: पीआईबी</figcaption></figure>
<p>विपक्ष के नेता का पद 1969 तक मान्यता प्राप्त नहीं था, जब राम सुभग सिंह लोकसभा के पहले मान्यता प्राप्त विपक्ष के नेता बने।इस पद को संसद में विपक्ष के नेताओं के वेतन और भत्ते अधिनियम, 1977 के माध्यम से वैधानिक मान्यता प्राप्त हुई, जिसके अनुसार &#8216;विपक्ष के नेता&#8217; की परिभाषा लोकसभा या राज्य सभा के उस सदस्य के रूप में की गई है, जो उस समय, सरकार के विपक्षी दल के उस सदन का नेता होता है, जिसके पास संख्या बल सबसे अधिक होता है और जिसे राज्य सभा के सभापति या लोक सभा के अध्यक्ष द्वारा मान्यता दी जाती है। इस बार, 99 सांसदों के साथ लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता को विपक्ष का नेता माना जाएगा। </p>
<p>भारतीय रिजर्व बैंक के पिछवाड़े लोकसभा के प्रथम अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के नाम से अंकित दो ऐतिहासिक भवनों &#8211; मावलंकर हॉल और डिप्टी स्पीकर हॉल &#8211; के सामने खड़े होकर गेडुआ रंग में नवनिर्मित संसद भवन को टुकुर-टुकुर देखकर सोच रहा हूँ कि क्या इस नए भवन का भाग्य को तो सत्तारूढ़ पार्टी के लोग कहीं कोस तो नहीं रहे हैं। इस भवन के निर्माण के बाद सत्तारूढ़ पार्टी की सांसदों की संख्या में बेतहासा कमी हो गई। कल तक दहाड़ने वाली पार्टी के नेता सम्मानित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को डगरा का बैगन जैसा नीतीश कुमार या फिर हैदराबाद-सिकंदराबाद को सॉफ्टवेयर के लिए साइबर सिटी बनाने वाले चद्रबाबू नायडू का, दिवंगत बिहारी नेता रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान जैसे लोगों का सहारा लेना पड़ा, मंत्री बनाना पड़ा, पहली बारिस में ही संसद भवन चुने लगा, मिंटोरोड (मिंटो पुल) के नीचे वाली सड़क में जमे पानी जैसा नए संसद भवन में भी जल जमाव हो गया, इतने दिन होने के बाद अब तक लोकसभा के उपाध्यक्ष की कुर्सी पर किसी को बैठने का अधिकार नहीं दिया गया &#8211; इस नव संसद भवन के शुभ संकेत है क्या? <strong>खैर, शायद आगामी 15 अगस्त को लाल किले के ऊपरी पटल से प्रधानमंत्री सम्मानित नरेंद्र मोदी जी कुछ खुलासा कर दें। </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/i-am-the-time-i-am-the-ruling-i-am-the-opposition-i-am-the-party-i-am-the-worker-i-am-the-servant-i-am-the-master">एको अहं, द्वितीयो नास्ति: मैं समय हूँ, मैं सत्तारूढ़ हूँ, मैं ही विपक्ष हूँ, मैं ही पार्टी हूँ, मैं ही कार्यकर्त्ता हूँ, मैं ही सेवक हूँ, मैं ही स्वामी हूँ &#8230; शेष सब मिथ्या है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>संसद मार्ग के नुक्कड़ पर चाय की दूकान पर बैठा वह 80 वर्षीय वृद्ध नरेंद्र मोदी को कहता है: सांसद निधि बंद करें, परिजीवियों को हटाएँ, तभी 2029 और 2034 का सपना देख सकते हैं&#8230;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 17 Jun 2024 06:19:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[finance ministry]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[lok sabha]]></category>
		<category><![CDATA[narendra modi]]></category>
		<category><![CDATA[rajya sabha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>संसद मार्ग (नई दिल्ली) : विगत वर्ष 2023 तक दिल्ली सल्तनत में ही नहीं, भारतवर्ष की सडकों पर, गली-कूचियों में, सामाजिक क्षेत्र के मीडिया घरानों पर चतुर्दिक पढ़ने, सुनने को मिलता था &#8220;मोदी है तो मुमकिन है।&#8221; परन्तु विगत 4 जून, 2024 को जब 18 वीं लोकसभा चुनाव का परिणाम आया तो अचानक एक सवाल आया [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/stop-mp-funds-remove-parasites">संसद मार्ग के नुक्कड़ पर चाय की दूकान पर बैठा वह 80 वर्षीय वृद्ध नरेंद्र मोदी को कहता है: सांसद निधि बंद करें, परिजीवियों को हटाएँ, तभी 2029 और 2034 का सपना देख सकते हैं&#8230;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>संसद मार्ग (नई दिल्ली) : विगत वर्ष 2023 तक दिल्ली सल्तनत में ही नहीं, भारतवर्ष की सडकों पर, गली-कूचियों में, सामाजिक क्षेत्र के मीडिया घरानों पर चतुर्दिक पढ़ने, सुनने को मिलता था &#8220;मोदी है तो मुमकिन है।&#8221; परन्तु विगत 4 जून, 2024 को जब 18 वीं लोकसभा चुनाव का परिणाम आया तो अचानक एक सवाल आया कि &#8220;मोदी जी अकेले कितना मुमकिन कर सकते हैं? उनके चारो तरफ तो &#8216;परजीवी&#8217; चिपके हैं। यहाँ तो उनके चेहरे पर परजीवी के रूप में नेताओं के साथ-साथ लाखो-करोड़ों लोग चिपके हैं, जिनका अपना कोई वजूद नहीं है मतदाताओं की नजरों में। यही कारण है कि 17वीं लोकसभा में जो सम्मानित सांसद महोदय इत्र-परफ्यूम से नहाकर नए संसद भवन में विराजे थे, नया संसद भवन में उनका पैर &#8216;शुभ&#8217; नहीं हुआ उनके लिए। कई दर्जन कर्तव्यपथ से दूर फेंके चले गए। उनके नामों के आगे &#8216;भूतपूर्व&#8217; लग गया। हाँ, उन्हें &#8216;सेवानिवृति कोष&#8217; (पेंशन) अवश्य मिलता रहेगा। </strong></p>
<p>लेकिन कल संसद मार्ग पर पर स्थित प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया और श्रमशक्ति भवन के पीछे &#8216;आम आदमियों के मुख से जब सुना&#8217; तो &#8220;मोदी है तो मुमकिन है&#8221; का नारा एक बार फिर &#8220;प्रश्नवाचक चिन्ह&#8221; लगा दिया। क्योंकि दिल्ली की सड़कों पर  पत्थर पर बैठकर, दो बिस्कुट और चाय पीकर अपना और अपने परिवार का जीवन यापन करने वाला भारत का एक &#8216;आम मतदाता&#8217; कभी गलत नहीं हो सकता है। यह बात अलग है कि दिल्ली ही नहीं, भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यालयों में वातानुकूलित कक्षों में बैठकर &#8216;अशिक्षित&#8217;, &#8216;अनपढ़&#8217;, &#8216;सामाजिक सरोकार से मीलों दूर&#8217; रहने वाले समाज के तथाकथित संभ्रातों की बातों पर सम्मानित प्रधानमंत्री अधिक विश्वास करते रहे हैं, कर रहे हैं। इतना ही नहीं ये सभी लोग &#8216;ठेकेदारी&#8217; प्रथा के तहत &#8216;कार्य करने&#8217; और &#8216;गुणगान&#8217; करने हेतु लाये होते है। अब सम्मानित मोदी जी को कहाँ इतनी फुर्सत है कि वे इस बात की तहकीकात करें कि कौन &#8216;अपना&#8217; है और कौन &#8216;ठेका&#8217; पर आया है। </p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=xxB8lYTeOyc&#038;t=1183s" rel="noopener" target="_blank">Rs. 65,315Cr. &#8216;भ्रष्टाचारी घोटाला&#8217; है, 4549 विधायक/793 सांसद &#8216;निधि&#8217; के रूप में</a></p>
<p><strong>बहरहाल, कोई अस्सी वसंत देखे, या यूँ कहें कि स्वतंत्र भारत के प्रथम आम चुनाव से 18 लोकसभा चुनाव तक उत्तर प्रदेश और दिल्ली सल्तनत में मतदान का साक्षात्कार किये एक वुजूर्ग के मुख से जब सुना कि &#8220;किसी काम को संपन्न करने के लिए &#8216;संख्या&#8217; नहीं &#8216;कलेजा&#8217; चाहिए और सम्मानित प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को अगर 2029 और 2034 लोकसभा का चुनाव जीतना है तो उन्हें भारत के सांसदों और विधायकों को उनके संसदीय और विधानसभा क्षेत्र के विकास के नाम पर दी जाने वाली निधि को बंद करना होगा। उन्हें वास्तविक रूप से अपना कलेजा दिखाना होगा। स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में वे अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में लिख दिए हैं, तीसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेकर गोदना गोदा दिए हैं। इस अभिलेख (रिकार्ड) को तोड़ने में भारत के नेताओं को कई दशक लग जायेंगे। अतः देश में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए शुरुआत उन्हें संसद से करना होगा, सांसदों को मिलने वाली निधि को समाप्त करना होगा। 543 संसदीय क्षेत्रों से आने वाले सांसदों को अपने-अपने क्षेत्रों में अपना चेहरा बनाना होगा। यह न केवल भ्रष्टाचार को समाप्त करेगा, बल्कि एक मजबूत प्रजातंत्र का भी निर्माण करेगा। इतना ही नहीं, मोदीजी को सबसे पहले भाजपा के नाम पर, उनके नाम के साथ, चेहरे के साथ चिपके परजीवियों को हटाना होगा। अगर ऐसा हुआ तो 2029 क्या 2034 तक भी रहेंगे, अन्यथा&#8230;&#8230;..&#8221;</strong><strong></p>
<p>लम्बी सांस लेते भारत का वह मतदाता कहता है: &#8220;चलो, 2014 में भले जनता के बैंक लेखा में 15-15 लाख रूपये काला धन नहीं आया हो &#8230;. सम्मानित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली 18 लोकसभा में राष्ट्रहित में सबसे बड़ा फैसला उन्हें लेना होगा &#8211; लोकसभा और राज्यसभा के सभा सांसदों को उनके संसदीय क्षेत्र के विकास के नाम पर जो 25 करोड़ प्रत्येक मिलता था, बंद कर दें। साथ ही, राज्यों के मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्षों से भी कहें कि वे इस दिशा में ठोस कदम उठायें। राज्यों सहित देश के सभी संसदीय एयर विधान सभा क्षेत्रों के सम्पूर्ण विकास का जबाबदेही सरकार की होनी चाहिए और सरकार सभी 806 जिलों के जिलाधिकारियों के माध्यम से विकास का कार्य कराये &#8211; विश्वास के साथ। सोचने लगा की देश में भ्रष्टाचार रोकने का यह सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र होगा। </p>
<p>उस मतदाता की बात को मुद्दत पहले लोकसभा के पूर्व (अब दिवंगत) अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी ने कहा था कि सांसद निधि भ्रष्टाचार का जड़ है, इसे तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया जाय। लेकिन कौन सुनता है।आखिर संसद में, चाहे लोकसभा हो या राज्य सभा, या फिर राज्यों के विधान सभाओं और विधान परिषदों में बैठे सम्मानित विधायकगण हों, कोई क्यों चाहेगा &#8216;सरकारी धन के स्रोतों को बंद करना ?&#8221;</p>
<p>देश के सभी राज्यों में से सिर्फ छह राज्यों में विधान परिषद है। मसलन आंध्र प्रदेश में 58 विधान परिषद के विधायक हैं। बिहार में 75, कर्नाटक में 75, महाराष्ट्र में 78, तेलंगाना में 40 और उत्तर प्रदेश में 100 विधायक विधान परिषद के हैं। यानी इन छह राज्यों को मिलकर विधान परिषद के सदस्यों की संख्या 426 है। यानी 426+4123 = कुल 4549 विधायक हैं। राज्यों में विधायकों को प्रतिवर्ष अपने-अपने विधान सभा क्षेत्रों के विकास के लिए 2 करोड़ रुपये मिलते हैं। यानी सरकारी कोषागार से 4549 x 2 करोड़ प्रतिवर्ष = 9098 करोड़ प्रतिवर्ष। देश में कितना भी राजनितिक उठापटक होता है, राज्यों का विधान सभा जोड़-तोड़ कर पांच साल चलता ही है। अतः 9098 करोड़ रुपये x 5 वर्ष = 45,490 करोड़ रुपये विकास के नाम पर विधान सभा और विधान परिषद् के सम्मानित सदियों को दिया जाता है। </p>
<blockquote><p>अब गणित पर ध्यान दें :<br />
लोक सभा के सम्मानित सदस्य : 543 + राज्य सभा के सम्मानित सदस्य : 250 = 793 सम्मानित सदस्य गण।  एक सदस्य को प्रतिवर्ष 5 करोड़ मिलता है यानी 793 x 5 करोड़ = 3,965 करोड़ प्रतिवर्ष और पांच वर्ष के संसदीय अवधि में (वसर्ते सम्मानित सांसद या सम्मानित विधायक की मृत्यु नहीं हो जाय) एक सांसद को 25 करोड़ और कुल 793 सांसदों को 793 x 25 करोड़ = 19, 825 करोड़ रुपये केन्द्री कोषागार से संसद के आदेश से निकलता है। यानी 19, 825 करोड़ + 45, 490 करोड़ (विधान सभा/परिषद् के सामनित सदस्यों के लिए) = 65,315 करोड़ रुए देश के 5342 लोगों को दिया जाता है &#8216;कर-रहित&#8217; और यह राशि सरकारी कोशों से उनके वेतन, रखरखाव, आवास, भ्रम-सम्मेलन, भत्ता, गाड़ी, घोड़ा आदि सुख-सुविधाओं के अलावे हैं। तभी तो लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी ने कहा भी था कि सांसदों को मिलने वाली राशि से देश में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है। अतः राष्ट्रहित में इसे तक्षण प्रभाव से निरस्त कर देना चाहिए। </p></blockquote>
<p>पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ऐसे ही नहीं कहा था इसे निरस्त करने के लिए। वे जानते थे कि यह राशि देश में भ्रष्टाचार बढ़ने के लिए बुनियाद को बहुत मजबूत बना रहा है। एक दृष्टान्त देते हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी लिखते हैं: &#8220;मोदी की पहली सरकार में श्रम राज्य मंत्री रहे गंगवार से साल 2014 में किसी कार्यक्रम का वक्त मांगने एक सुबह कुछ लोग पहुंचे। गंगवार के पास लोगों की भीड़ लगी थी। लोगों के बीच ही साधारण से कप में चाय पीते हुए उन्होंने कार्यक्रम के दिन की बाबत पूछा। वह दिन शनिवार था। गंगवार ने हाथ खड़े कर दिए। उनका कहना था कि वे हर शुक्रवार की रात अपने निर्वाचन क्षेत्र बरेली के लिए निकल जाते हैं और बहुत जरूरी काम नहीं रहा तो सोमवार की सुबह ही वे दिल्ली लौटते हैं। हर हफ्ते के आखिरी दिन चुनाव क्षेत्र के लोगों के साथ सुबह से लेकर रात तक बीतता है। यही उनकी पूंजी है और इसी के दम पर वे 1989 से लगातार सांसद हैं। सवाल यह है कि बीजेपी में ऐसे कितने सांसद रहे, जो जनता के सुख-दुख के साथी बने रहने का दावा कर सकते हैं?&#8221; </p>
<figure id="attachment_5547" aria-describedby="caption-attachment-5547" style="width: 554px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/06/umesh.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/06/umesh.jpeg" alt="" width="554" height="554" class="size-full wp-image-5547" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/06/umesh.jpeg 554w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/06/umesh-300x300.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/06/umesh-150x150.jpeg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/06/umesh-24x24.jpeg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/06/umesh-48x48.jpeg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/06/umesh-96x96.jpeg 96w" sizes="auto, (max-width: 554px) 100vw, 554px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5547" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार श्री उमेश चतुर्वेदी</figcaption></figure>
<p>श्री चतुर्वेदी आगे कहते हैं : &#8220;जानकार इस बात पर एकमत हैं कि मौजूदा चुनाव नतीजों में बीजेपी की हालत खराब होने की एक बड़ी वजह उसके ज्यादातर सांसदों के खिलाफ एंटीइनकंबेंसी भी रही है। आंकड़े भी इस तथ्य की गवाही देते हैं। पार्टी के पास बीती लोकसभा में 300 सांसद रह गए थे, जिनमें से पार्टी ने 168 सांसदों को दोबारा मैदान में उतारा, उनमें से 66 फीसद यानी 111 सांसदों को जनता ने नकार दिया, सिर्फ 57 ही दोबारा लोकसभा का मुंह देख पा रहे। पार्टी ने जिन 132 जगहों पर नए उम्मीदवार उतारे थे, उनमें से 95 को जीत मिली। हारे हुए सांसदों में से ज्यादातर के बारे में धारणा है कि 2014 में चली मोदी लहर के सहारे ही एक बार फिर अपनी चुनावी नैया पार होने की उम्मीद लगाए हुए थे। उन्हें लगता था कि जिस तरह दो आम चुनावों में सिर्फ और सिर्फ उनके नेता मोदी के नाम का उन्हें फायदा मिला था, वैसा ही एक बार फिर होगा। मोदी के चेहरे के दम पर अपने वोटरों को ठेंगे पर रखने के उनके रवैये की वजह से इस बार का चुनाव उनके लिए काठ की हांड़ी साबित हुआ।&#8221;</p>
<p>चतुर्वेदी जी का मानना है कि &#8220;हार को लेकर सांसद कई बातें बना रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि लोक की सेवा के लिए उनके पास तमाम अवसरों के अलावा एक अहम जरिया सांसद निधि भी है। कुछ सांसदों ने जहां इस निधि को ठीक से खर्च भी किया है तो कई ने इसे खर्च करने को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई। बहरहाल मोटे तौर पर मान लेते हैं कि अपनी सांसद निधि को तमाम सांसदों ने संतोषजनक ढंग से खर्च किया है। यह रकम भी कोई छोटी-मोटी नहीं है। साल 2011-12 के वित्तीय वर्ष से हर सांसद के हिस्से पांच करोड़ सालाना रकम खर्च करने का अधिकार होता है। इस लिहाज से हर लोकसभा सांसद को अपने पांच साल में 25 करोड़ खर्च करने का अधिकार है। लोकसभा में 543 सदस्य होते हैं। इस लिहाज से एक साल में सांसद निधि में ही 2515 करोड़ रूपए मिलते हैं। लोकसभा के कार्यकाल में यह रकम 12 हजार 575 करोड़ रुपए होती है। सवाल यह है कि अगर यह रकम हर सांसद के जरिए खर्च हो जाए तो आम लोगों की तमाम छोटी समस्याओं का समाधान हो सकता है।</p>
<p>संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना 23 दिसंबर, 1993 को लागू किया गया। प्रारंभ में, इस योजना का प्रशासन ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन था लेकिन बाद में, अक्टूबर 1994 में, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय इस कार्य को देखने लगा। इतिहास को तनिक पीछे रखकर यदि वर्तमान को ही देखें तो लोकसभा के सांसद 543 x 25 करोड़ = 13,575 करोड़। इसी तरह राज्यसभा के सांसद 250 x 25 करोड़ = 6,250 करोड़। २८ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मिलकर विधानसभा के विधायक 4123 x 10 करोड़ = 41,230 करोड़ और विधान परिषद् के विधायक 426 x 10 करोड़ = 4260 करो। यानी पांच वर्षों में 793 सांसद/4549 विधायक निधिपर कुल 65315 करोड़ रूपया खर्च होता है। </p>
<p>वैसे सांसदों और विधायकों के मामले में उनके संसदीय या विधान सभा क्षेत्र के विकास के निमित्त यह राशि दी जाती है जो सैद्धांतिक रूप में भागीदारी विकास के सिद्धांत पर आधारित विकेंद्रीकृत विकास के चरित्र के रूप में पेश करता है। लेकिन यह सभी कागज पर शोभायमान है। भागीदारी के स्तर को मापने के लिए कोई संकेतक उपलब्ध नहीं है। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) &#8211; एक निकाय जो केंद्र और राज्य सरकारों और उनके द्वारा वित्त पोषित निकायों की प्राप्तियों और व्यय का लेखा-जोखा करता है &#8211; ने अपनी 2010 की रिपोर्ट में पाया कि स्थानीय जरूरतों को समझने के लिए सांसदों के निर्वाचन क्षेत्र में विभिन्न घटकों जैसे कि निवास मंच या स्थानीय गैर सरकारी संगठनों की भागीदारी को नजरअंदाज किया गया।</p>
<p>श्री चतुर्वेदी जी का कहना है कि &#8220;भौगोलिक क्षेत्रफल के लिहाज से छोटे लोकसभा क्षेत्रों के लिए यह रकम बड़ी साबित हो सकती है। अगर हर सांसद नियमित रूप से गहन चर्चा के बाद ईमानदारी से अपने हिस्से की रकम खर्च करे तो अपने इलाके की जनता की छोटी-मोटी समस्याओं का निदान कर सकेगा। बदले में उसे लोक सहयोग की अनमोल निधि मिलेगी। लेकिन लगता है कि इस फंड की जमीनी हकीकत कुछ और ही है। अगर सांसद महज इसी रकम को ईमानदारी से अपने क्षेत्र विशेष में संतुलित रूप से खर्च कर रहे होते तो बीजेपी के मौजूदा सांसदों की हार के आंकड़ों की चर्चा की जरूरत ही नहीं रहती। ऐसे में सवाल यह है कि इस निधि को जारी ही क्यों रखा जाए। क्यों न इतनी बड़ी रकम को सरकार की दूसरी विकास योजनाओं में समाहित कर दिया जाए। ताकि उसका फायदा जमीनी स्तर तक पहुंच सके। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि इस निधि को जारी ही क्यों रखा जाए? </p>
<p>सांसदों की नाकामी और कारगुजारियों पर चर्चा से पहले इस योजना के बारे में भी जान लेते हैं। इसकी शुरुआत नरसिंह राव शासनकाल में साल 1993-94 में लागू की गई थी। तब इसके तहत सांसदों को हर साल पांच लाख रूपए अलॉट किए जाते थे। जिसे सांसदों ने तब नाकाफी बताया था। उनकी मांग के बाद इसे अगले ही साल यानी वित्तीय वर्ष 1994-95 में बढ़ाकर एक करोड़ रुपये सालाना कर दिया। बिना किसी बाधा के स्थानीय विकास के छोटे-मोटे कार्यों को करने के लिए शुरू की गई इस योजना में जल्द ही भ्रष्टाचार बढ़ने लगा। तब सांसदों ने सरकार से दबाव समूह के तौर पर एकजुट होकर काम शुरू किया। फिर इस रकम को बढ़ाने की मांग हुई और वाजपेयी सरकार के दौरान साल 1998-99 के वित्तीय वर्ष में इसे दोगुना करके सालाना दो करोड़ रुपए कर दिया गया। फिर मनमोहन सरकार ने वित्तीय वर्ष 2011-12 से इसे पांच करोड़ रुपये प्रति वर्ष पर कर दिया गया।</p>
<p>बाद में एआईएडीएमके सांसद थंबीदुरई की अध्यक्षता में बनी सांसदों की एक समिति इसे बढ़ाकर पच्चीस करोड़ सालाना करने की मांग कर चुकी है। यहां याद रखने की बात है कि कोविड महामारी के चलते इस फंड को 6 अप्रैल 2020 से 9 नवंबर 2021 तक निलंबित किया गया था। साल 2020-21 के लिए योजना के लिए कोई धन आवंटित नहीं किया गया था। वित्त वर्ष 2021-22 की बाकी अवधि यानी 10 नवंबर 2021 से 31 मार्च2022 के लिए हर सांसद महज दो करोड़ रुपए दिए गए। दिलचस्प यह है कि इस योजना में जारी भ्रष्टाचार के चलते लोकसभा का स्पीकर रहते सोमनाथ चटर्जी ने 2008 में इसे बंद करने की बात कही थी। कांग्रेसी सांसद वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाला दूसरा प्रशासनिक सुधार आयोग भी इस योजना को बंद करने का सुझाव दे चुका है। </p>
<p>चतुर्वेदी जी का कहना है की &#8220;सवाल यह है कि जिस योजना का जनता को कोई फायदा नहीं मिल रहा, जिसे लागू करने की रस्म सांसद निभा रहे हैं, अगर वे चाहते तो महज इसी योजना के ईमानदार क्रियान्वयन के जरिए संसद लौट सकते, उन्हें अपने केंद्रीय नेतृत्व के चेहरे की जरूरत नहीं होती, उस योजना को क्यों जारी रखा जाए? सवाल यह भी उठता है कि सांसद और प्रशासनिक गठजोड़ के जरिए जिस फंड का मनमाना निजी इस्तेमाल होता है, जिसके जरिए लोकसेवा के बुनियादी लोकतांत्रिक सहयोग का उद्देश्य पूरा ना हो पा रहा हो, उस योजना को जारी रखने की जरूरत क्या है? जब सांसदों को अपनी बजाय किसी और के काम पर भरोसा हो, जो काम करना ही नहीं चाहते हों, जो एक बार जीतकर सत्ता की हनक का इस्तेमाल करते रहे हों, उन्हें यह फंड क्यों दिया जाना चाहिए। जनता की गाढ़ी कमाई की इस रकम का इस्तेमाल लोक के लिए किसी और जरिए से क्यों नहीं किया जाना चाहिए। कितने ऐसे सांसद हैं, जिन्हें गंगवार की तरह जनता के बीच रहना पसंद है, कितने सांसदों के दरवाजे उनके वोटरों के लिए हमेशा खुले रहते हैं..इस पर भी विचार किया जाना चाहिए। लोक से दिल से तार जब सांसद जोड़ नहीं सकते, लोक निधि उनके लिए इसका बेहतर जरिया हो सकती थी तो फिर इस निधि की निरंतरता क्यों? </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/stop-mp-funds-remove-parasites">संसद मार्ग के नुक्कड़ पर चाय की दूकान पर बैठा वह 80 वर्षीय वृद्ध नरेंद्र मोदी को कहता है: सांसद निधि बंद करें, परिजीवियों को हटाएँ, तभी 2029 और 2034 का सपना देख सकते हैं&#8230;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8216;महिला ही महिलाओं की दुश्मन हैं&#8217; कहावत को झुठलाना होगा, खेत-खलिहानों की महिलाओं के हितों के बारे में भी सोचना होगा संसद में बैठने वाली महिलाओं को</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/the-saying-women-are-the-enemies-of-women-must-be-refuted</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 Feb 2024 01:23:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली : सोचता हूँ कि आने वाले दिनों में जब 181 महिलाएं &#8216;देशी-विदेशी सुगन्धित इत्र, परफ्यूम से स्नान कर, वस्त्रों पर छिड़क कर संसद में बैठेंगी तो कहीं पुरुष पूछ न बैठें &#8216;यह कौन सा इत्र है मोहतरमा?&#8217; यह भी हो सकता कि महिलाओं की उतनी बड़ी तायदात देख वे हीन भावना से ग्रसित [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली : सोचता हूँ कि आने वाले दिनों में जब 181 महिलाएं &#8216;देशी-विदेशी सुगन्धित इत्र, परफ्यूम से स्नान कर, वस्त्रों पर छिड़क कर संसद में बैठेंगी तो कहीं पुरुष पूछ न बैठें &#8216;यह कौन सा इत्र है मोहतरमा?&#8217; यह भी हो सकता कि महिलाओं की उतनी बड़ी तायदात देख वे हीन भावना से ग्रसित हो जाएँ। यह फिर सोचने लगे कि नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री क्यों नहीं बने, महिला सशक्तिकरण के लिए विधेयक पहले क्यों नहीं आया? क्योंकि कुर्सियों पर महिला बैठेंगी तो कितना खूबसूरत संसद होगा। </strong></p>
<p>राष्ट्र की राजधानी नई दिल्ली में नवनिर्मित संसद भवन और कर्तव्य पथ के बीच रायसीना हिल की ओर टुकुर-टुकुर देख रहा था। जहाँ मैं बैठा था वही सामने उस क्षेत्र में अखबार बांटने वाले अख़बार विक्रेता अपनी साईकिल को रखते मुस्कुरा रहे थे। मेरे बाएं हाथ में मोबाईल कैमरा अपने स्टैंड से जुड़ा था और कुछ कागजात भी हाथ की उंगलियों के बीच लटका था। झोला बगल में रखा था। मन में कई बातें उठ रही थी। खुद प्रश्नकर्ता था, खुद उत्तरदाता भी। </p>
<p>फिर सोचने लगा सन 1911 के बाद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि इतनी बुरी हार के एक साल बाद ही मोहम्मद गौरी वापस आएगा। लेकिन तक़रीबन 832 साल पहले सन 1192 में मोहम्मद गौरी लौट आया। समय बदल रहा था और हवाओं में गद्दारी की बू भी आने लगी थी। दृष्टान्त जयचंद की गद्दारी थी जो मोहम्मद गौरी से जा मिला था। इतिहासकार कहते हैं कि उन दिनों पृथ्वीराज चौहान के साथ मोहम्मद गौरी की लड़ाई हुई। कहते हैं 18वीं बार हुए उस युद्ध में मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को मात दिया और उन्हें बंदी बनाकर अपने साथ ले गया। </p>
<p>मैं वायु सेना भवन-मौलाना आज़ाद रोड, उद्योग भवन, करियप्पा मार्ग से रफ़ी मार्ग के रास्ते आती-जाती वाहनों को देख रहा था। कभी कभार लाल-नीली बत्ती वाली पों-पां करती चार पहिया वाहन भी आ-जा रही थी। फिर सोचने लगा कि उस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान के साथ उनके मित्र चंदबरदाई को भी बंदी बना लिया था मोहम्मद गौरी ने। इतिहासकार कहते हैं कि सजा के तौर पर गर्म सलाखों से पृथ्वीराज की आंखें फोड़ दी थी। </p>
<p>मेरे बाबूजी कभी कभार गीता के उपदेश और श्लोकों से अलग हटकर पृथ्वीराज चौहान की भी बातें कहते थे दृष्टान्त के तौर पर। बाबूजी कहते थे &#8216;हिम्मत-ए  मर्दा &#8211; मदद ए खुदा&#8217; पर हमेशा विश्वास रखना। हिम्मत कभी नहीं हारना। हिम्मत को कभी भी पस्त नहीं होने देना। जीवन में आगे ही बढ़ोगे। रफ़ी मार्ग पर बैठकर बाबूजी और उनका पटना का अशोक राजपथ बहुत याद आ रहा था। </p>
<p><strong>सोच रहा रहा उस घायल अवस्था में, जबकि आँखें फूटी हुई थी, पृथ्वीराज चौहान की हिम्मत पूजनीय है, वंदनीय है, तभी तो आज 832+ वर्ष के बाद भी वे जीवित हैं। यहाँ तो लोग बाग पार्थिव शरीर के अंतिम संस्कार में जब शमशान जाते हैं तो बात-बार घडी देखते रहते हैं। इतना ही नहीं, तेरहवीं के बाद तो अच्छे-अच्छे लोग अच्छे-अच्छों को भूल जाते हैं।  कहते भी हैं &#8216;लाइफ गोज ऑन।&#8221; खैर। </strong></p>
<p>मोहम्मद गोरी को पृथ्वीराज चौहान के शब्दभेदी बाण चलाने वाली कला के बारे में पता था। आखिरी इच्छा के रूप में चंदबरदाई के कहने पर इसके प्रदर्शन की इजाजत दे दी। यहीं पर “चार बांस, चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण &#8230; .. ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान” ऐतिहासिक शब्द, दोहा प्रयोग हुआ था जो आज भी जीवित है। मन ही मन हंसी भी आ रही थी। सामने बस स्टैंड के पास कुछ सुन्दर बालाएं कड़ी हो गई थी अब तक।  वे सभी दक्षिण दिल्ली की ओर जाने वाली बसों का इन्तजार कर रही थी। </p>
<p>पृथ्वीराज चौहान के लिए मोहम्मद गोरी की दूरी मापने के लिए चंदबरदाई का यह संकेत काफी था। मोहम्मद गौरी ने जैसे ही शाबाश बोला, आवाज सुनकर पृथ्वीराज चौहान ने शब्द भेदी बाण चला डाला और मोहम्मद गौरी की मृत्यु हो गई। </p>
<p>पीछे जलाशय, आगे रायसीना हिल पर राष्ट्रपति भवन, बाएं-दाहिने रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, संसद के सामने इस कदर बैठना मेरे लिए भी उसी जीत के बराबर ही थी। मैं भी अशोक राजपथ पटना से जीवन की शुरुआत कर भारत के करोड़ों-करोड़ लोगों में, लाखो लाख अख़बार विक्रेताओं में अकेले समस्याओं से जूझते, समस्याओं को चीरते-फाड़ते मेहनत करते आगे निकला था तभी तो एक अखबार विक्रेता से देश-विदेश के पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टीवी के लिए कहानी लिख सका और आज एक संवादताता के रूप में यहाँ बैठा था &#8211; फक्र से। मैं तो अपना पीठ खुद थपथपाता हूँ, सदैव। </p>
<p><strong>फिर सोचने लगा कि क्या भारत के &#8216;पुरुष सांसद&#8217; या &#8216;पुरुष विधायक&#8217; आने वाले दिनों में, संसद और विधान सभा में अपनी कुर्सी के बगल में बराबरी की ताकत रखने वाली महिलाओं को देख पाएंगे? भारत के इस पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को तो &#8216;पैर की जूती&#8221; समझते हैं (अपवाद छोड़कर), कहते भी हैं खुलेआम। </strong></p>
<p>लड़कियों के ससुराल में जब बहु को बच्चा होता है तो बेटी होने पर लाखों यातनाएं आज भी देते हैं। सभी सास को &#8216;पोता&#8217; ही चाहिए। अब पढ़ी होती तो शायद समझ जाती कि उनके बेटे का क्रोमोजोम कमजोर है। शराब पीता है, सिगरेट पीता है तो क्रोमोजोम कहाँ से ताकतवर होगा। कमजोर होता है तो &#8216;हार&#8217; जाता है अपनी पत्नी के क्रोमोजोम से। स्वाभाविक है बेटा नहीं, बेटी होगी। </p>
<p>मन-ही-मन संसद के सामने बैठकर संसद भवन में रखी कुर्सियों को देख रहा था। सोच रहा था कि आने वाले दिनों में संसद में प्रत्येक चौथी कुर्सी के बाद महिला की कुर्सी होगी। अब तक सत्रह लोक सभा में महिला संसद किसी कोने में दिखती थी। </p>
<p>यह तो संसद की बात हुई अपना बिहार में 243 कुर्सी वाली विधान सभा में प्रत्येक तीसरी कुर्सी के बाद कोई माथे पर पल्लू लिए, तो कोई सलवार सूट में, कोई आधुनिक जींस और कुर्ती में, माथे पर काले चश्मा चढ़ाई महिलाएं जब पुरुष विधायक को दिखेंगी पुरुषों का क्या हाल होगा। उन्हें तो विधान सभा में &#8216;अपशब्द&#8217; के इस्तेमाल, मार-पीट, गाली-गलौज, कुर्सी &#8211; टेबुल का फेका फेंकी बंद करना होगा। &#8216;अपवाद&#8217; छोड़कर। </p>
<p>वजह भी है &#8211; आज कल तो संसद और विधान सभा की कार्रवाई लाइव दिखता है। उनके घर में उनकी पत्नी, उनके बच्चे सभी &#8216;पप्पा&#8217; का कमाल, धमाल देख्नेगे। क्योंकि अखबारवाला, टीवी वाला, खासकर कैमरामैन तो किसी का नहीं होता। अनेकानेक बातें मन में चल रही थी क्योंकि महिला आरक्षण बिल तो लोक सभा में पेश हो गया है 128 वे संविधान संशोधन विधेयक, 2023 के रूप में। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल इस ऐतिहासिक को किये थे। इस विधेयक के कानून बनने के बाद लोक सभा में 181 महिला सांसद हो जाएँगी। </p>
<figure id="attachment_5329" aria-describedby="caption-attachment-5329" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/02/Cover2-fotor.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/02/Cover2-fotor.jpg" alt="" width="2200" height="1321" class="size-full wp-image-5329" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/02/Cover2-fotor.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/02/Cover2-fotor-300x180.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/02/Cover2-fotor-1024x615.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/02/Cover2-fotor-768x461.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/02/Cover2-fotor-1536x922.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/02/Cover2-fotor-2048x1230.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5329" class="wp-caption-text">नए संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वर्तमान महिला सांसद</figcaption></figure>
<p><strong>बिल का उद्देश्य राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर नीति-निर्माण में महिलाओं की अधिक भागीदारी को सक्षम बनाना है। इसमें कहा गया है कि परिसीमन प्रक्रिया शुरू होने के बाद आरक्षण लागू होगा और 15 वर्षों तक जारी रहेगा। विधेयक के अनुसार, प्रत्येक परिसीमन प्रक्रिया के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की अदला बदली होगी। पारित हो जाने के बाद परिसीमन प्रक्रिया शुरू होगी और उसके बाद महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित की जाएंगी। </strong></p>
<p>इस प्रक्रिया में बिहार की कुल 243 सीटों में से 81 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। 243 में से 38 सीटें अनुसूचित जाति और दो सीट अनूसूचित जनजाति के लिए पहले से ही आरक्षित हैं। इस तरह राज्य में कुल 121 सीटें आरक्षित हो जाएंगी, जो कुल सीटों का करीब 50 फीसदी है। <br />
इसी तरह, उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं। इममें से 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए और दो सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। महिला आरक्षण लागू होने के बाद 134 सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित हो जाएंगी। इस तरह 403 सीटों में से कुल 220 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी। यह 50 फीसदी के मनोवैज्ञानिक स्तर से ज्यादा है।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि 17वीं लोकसभा के लिए देश ने सबसे अधिक 78 महिला सदस्य चुनकर भेजी थीं । हाल ही में राज्यसभा में 61 नए सांसद चुने गए हैं। इनमें 4 महिला सांसद भी हैं। नई महिला सांसदाें के साथ ही संसद में कुल महिला सदस्यों की संख्या 103 हाे गई है। जिसमें लोकसभा में 78 और राज्यसभा में 25  महिला सांसद हैं। </p>
<p>राजस्थान से महिला सांसद जसकौर मीणा मानती है कि संसद में उनकी भागीदारी संसद में बढ़ती हुई उनकी भागीदारी का आजाद भारत में महिला सशक्तिकरण का एक बेजोड़ नमूना है । उन्होंने माना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में महिलाओं की समाज में भागीदारी तेजी से बढ़ रही है। महिला सांसदों को सदन में प्रतिशत के रूप में देखें तो लोकसभा में 14.36% और राज्यसभा में 10% से अधिक महिला सदस्य हाे गई हैं। लोकसभा में 1951 से 2019 तक लगातार महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ी है। </p>
<p>नई नीति के मुताबिक आंध्रप्रदेश में कुल सीट 175 है और आरक्षण के बाद महिलाओं की संख्या 58 होगी। अरुणाचल प्रदेश में कुछ सीट 60 और आरक्ष्ण के बाद महिलाऐं 20 कुर्सियों पर बैठेंगी। असम में 126 कुल  सीटों में 42 सीट महिलाओं के लिए होंगी। बिहार में 243 में 81 स्थान महिलाओं के लिए, जबकि छत्तीसगढ़ में 90 में 30 सीट महिलाओं की होंगी। दिल्ली में 70 में 23 स्थान महिलाओं की होगी। गोआ में 40 में 13 स्थान महिलाओं के लिए। गुजरात में 182 सीटों में 61 सीट महिलाओं के लिए सुरक्षित होंगी। </p>
<p>इसी तरह हरियाणा में 90 में 30, हिमाचल प्रदेश में 68 में 23, जम्मू कश्मीर में 90 में 30 झारखंड में 81 में 27, कर्नाटक में 224 में 75, केरल में 140 में 47 और मध्यप्रदेश में 230 में 77 सीटें महिलाओं के लिए होंगी। महाराष्ट्र में 288 में 96, मणिपुर में 60 में 20, मेघालय में 60 में 20, मिजोरम में 40 में 13, नागालैंड में 60 में 20, ओडिशा में 147 में 49, पुडुचेरी में 30 में 10, पंजाब में 117 में 39, राजस्थान में 200 में 67, सिक्किम में 32 में 11, तमिलनाडु में 234 में  78,  तेलंगाना में 119 में 40, त्रिपुरा में 60 में 20, उत्तराखंड में 70 में 23 और पश्चिम बंगाल में 294 में 98 कुर्सियां महिलाओं के लिए। </p>
<p>लोकसभा के लिए निर्वाचित महिलाओं की सबसे कम संख्या 1977 में थी जब केवल 19 महिलाएँ निचले सदन तक पहुँचीं, जो कुल लोकसभा सीटों (उस समय 542) का केवल 3.50% थी। 1996 में सबसे अधिक 599 महिला उम्मीदवार मैदान में थीं, उसके बाद 2009 में 556 महिला उम्मीदवार और 2004 में 355 महिला उम्मीदवार मैदान में थीं। </p>
<p>चुनाव लड़ने में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की तुलना में काफी कम रही है। नौवें आम चुनाव तक महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की तुलना में 30 गुना कम थी, हालांकि दसवें आम चुनाव के बाद भागीदारी में सुधार हुआ। लेकिन मजेदार बात यह है कि पहले चुनाव से पंद्रहवीं लोकसभा के गठन तक महिला प्रतियोगियों की जीत का प्रतिशत हमेशा पुरुष प्रतियोगियों की तुलना में अधिक रहा है। </p>
<p><strong>आज की तारीख तक लोक सभा के लिए सत्रह आम चुनाव हुए हैं। पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर, 1951 से 21 फरवरी, 1952 तक होने के बाद 17 अप्रैल, 1952 को पहला लोक सभा का गठन हुआ और लोक सभा का प्रथम सत्र 13 मई 1952 को आरम्भ हुआ। जी. वी. मावलंकर लोकसभा (15 मई 1952 – 27 फरवरी 1956) के प्रथम अध्‍यक्ष थे। इसके बाद दूसरा आम चुनाव 24 फरवरी से 14 मार्च, 1957 तक और तीसरा 19 से 25 फरवरी 1962 तथा चौथा 17 से 21 फरवरी 1967, पांचवां 1 से 10 मार्च 1971, छठा 16 से 20 मार्च 1977, सातवां 3 से 6 जनवरी 1980, आठवां 24 से 28 दिसम्बर 1984, नौवां 22 से 26 नवम्बर 1989, दसवां 20 मई से 15 जून 1991, ग्‍यारहवां 27 अप्रैल से 30 मई 1996, बारहवां 16 फरवरी से 23 फरवरी 1998, तेरहवां 5 सितंबर से 6 अक्टूबर 1999, चौदहवां 20 अप्रैल से 10 मई 2004, पंद्रहवाँ 16 अप्रैल से 13 मई 2009 के बीच, सोलहवाँ 7 अप्रैल 2014 से 12 मई 2014 के बीच और सत्रहवाँ आम चुनाव 11 अप्रैल से 19 मई 2019 के बीच हुआ था। और देश अठारहवाँ आम चुनाव के लिए सज्ज हो रहा है। </strong></p>
<p>वर्तमान लोकसभा का कार्यकाल 16 जून 2024 को समाप्त होने वाला है। पिछले आम चुनाव अप्रैल-मई 2019 में हुए थे। चुनाव के बाद, भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने केंद्र सरकार बनाई, जिसमें नरेंद्र मोदी दूसरी बार प्रधान मंत्री बने। सभी 543 निर्वाचित सांसद फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट वोटिंग का उपयोग करके एकल सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों से चुने जाते हैं। संविधान के 104वें संशोधन ने उन दो सीटों को प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया जो एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए आरक्षित थीं। आज लोक सभा में भारतीय जनता पार्टी  के 301 सदस्य हैं जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 53 सदस्य है।</p>
<p>विगत दिनों वरिष्ठ पत्रकार के.विक्रम राव  दृष्टान्त दिया था। लोकसभा से बड़ी संख्या में सदस्यों के निष्कासन पर ब्रिटिश विचारक जान स्टुअर्ट मिल का कथन अनायास ही याद आता है। उन्होंने कहा था : “निन्यानबे लोगों को भी यह अधिकार नही है कि वे किसी एक असहमत व्यक्ति की अभिव्यक्ति का अधिकार छीन लें।” वर्तमान संदर्भ में सांसदों को सदन से सस्पेंड करने का मतलब यह हुआ कि उनके लाखों वोटरों की आवाज दबाना। अब वे आम जन की आवाज नहीं उठा पाएंगे। इसीलिए राजनीति शास्त्र के छात्र होने के नाते, मेरा यह विचार है कि अध्यक्ष ओम विरला को ऐसा विरला निर्णय करने के पूर्व भली भांति परामर्श करना चाहिए था। आखिर संसद राष्ट्रीय इच्छा की अभिव्यक्ति का माध्यम तो ही है। </p>
<p>वे कहते हैं कि विगत दिनों के संसदीय हादसे से 15 मार्च 1989 की घटना याद आती है जब अध्यक्ष बलराम झाखड़ ने एक झटके में 63 सदस्यों को सदन से निष्कासित कर दिया था। यह वाकया इंदिरा गांधी की हत्या के ठीक बाद हुआ था। प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। सुप्रीम कोर्ट के जज न्यायमूर्ति मनोहरलाल प्राणलाल ठक्कर की अध्यक्षता में न्यायिक जांच समिति बनी। इसमें कई तथ्यों का उल्लेख किया जो रोमहर्षक थे। </p>
<p>वे कहते हैं कि एक संदर्भ था कि न्यायमूर्ति ने संदेह की सुई दिवंगत प्रधानमंत्री के वर्षों तक निजी सचिव रहे राजिन्दर कुमार धवन की ओर दिखायी थी। हत्या के षड्यंत्र में धवन की संलिप्तता का जिक्र था। सदन में 63 सदस्यों ने इस मसले पर बवाल उठाया था। राजीव गांधी प्रधानमंत्री के रूप में अपने निजी सचिव पर कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं थे। </p>
<p>नतीजन सदन में शोर शराबा हुआ था। अध्यक्ष बलराम झाखड ने सभी 63 को निष्कासित कर दिया। यह कदम झाखड ने नियम 373 के तहत उठाया था। अर्थात यदि लोकसभा स्पीकर को ऐसा लगता है कि कोई सांसद लगातार सदन की कार्रवाई बाधित कर रहा है तो वह उसे उस दिन के लिए सदन से बाहर कर सकते हैं, या बाकी बचे पूरे सेशन के लिए भी सस्पेंड कर सकते हैं। वहीं इससे ज्यादा अड़ियल सदस्यों से निपटने के लिए स्पीकर रूल 374 और 374-ए के तहत कार्रवाई कर सकते हैं। </p>
<p>लोकसभा स्पीकर उन सांसदों के नाम का ऐलान कर सकते हैं, जिसने आसन की मर्यादा तोड़ी हो या नियमों का उल्लंघन किया हो। जानबूझकर सदन की कार्यवाही में बाधा पहुंचाई हो। जब स्पीकर ऐसे सांसदों के नाम का ऐलान करते हैं, तो वह सदन के पटल पर एक प्रस्ताव रखते हैं। प्रस्ताव में हंगामा करने वाले सांसद का नाम लेते हुए उसे सस्पेंड करने की बात कही जाती है। इसमें सस्पेंशन की अवधि का जिक्र होता है। </p>
<p>यह अवधि अधिकतम सत्र के खत्म होने तक हो सकती है। सदन चाहे तो वह किसी भी समय इस प्रस्‍ताव को रद्द करने का आग्रह भी कर सकता है। ठीक 5 दिसंबर 2001 को रूल बुक में एक और नियम जोड़ा गया था। इसे ही रूल 374ए कहा जाता है। यदि कोई सांसद स्पीकर के आसन के निकट आकर या सभा में नारे लगाकर या अन्य प्रकार से कार्यवाही में बाधा डालकर जानबूझकर नियमों का उल्लंघन करता है तो उस पर इस नियम के तहत कार्रवाई की जाती है। </p>
<p>लोकसभा स्पीकर द्वारा ऐसे सांसद का नाम लिए जाने पर वह पांच बैठकों या सत्र की शेष अवधि के लिए (जो भी कम हो) स्वतः निलंबित हो जाता है। स्पीकर को किसी सांसद को सस्पेंड करने का अधिकार है, लेकिन सस्पेंशन को वापस लेने का अधिकार उसके पास नहीं है। यह अधिकार सदन के पास होता है। सदन चाहे तो एक प्रस्ताव के जरिए सांसदों का सस्पेंशन वापस ले सकता है।</p>
<p><strong>अब गौर कर लें इंदिरा गांधी हत्या पर हुई ठक्कर जांच समिति की रपट के उस वाक्य पर जिसमें धवन का उल्लेख था। न्यायमूर्ति ने कहा : “कई सूचक मिलते हैं, यह इंगित करते हैं कि प्रधानमंत्री की हत्या में धवन संलिप्त रहे।” इस वाकायांश पर पूरा सदन उत्तेजित हो गया था क्योंकि तब राजीव गांधी ने भी धवन को अपना विश्वस्त सहायक नियुक्त कर दिया था। बाद में धवन सांसद और मंत्री तक बने थे। अब इन 63 सांसदों का उत्तेजित होकर सदन में हंगामा करना स्वाभाविक था। पर अपने अपार (400 से अधिक सदस्यों) के बल पर राजीव गांधी ने 63 सांसदों को सदन के बाहर करा दिया।</strong></p>
<p>वह मसला तो आज की घटना की तुलना में बहुत कम गंभीर है। इस बार तो केवल चंद सिरफिरे युवाओं की बेजा और घृणित सस्ती हरकत के मामले पर सदन में रोष व्यक्त किया गया। तब तो (1989 में) प्रधानमंत्री की हत्या की न्यायिक जांच रपट में इन्दिरा गांधी के निजी सहायक धवन पर शक की सुई की चर्चा थी। </p>
<p>फिर भी तुलनात्मक रूप से देखें तो इतनी बड़ी संख्या में सांसदों का निष्कासन न तो तब (1989) और न तो अब (2023) में स्वीकार्य हो सकता है। अर्थात अब अध्यक्ष महोदय को स्वयं उपाय खोजने होंगे कि सदन की गरिमा संजोई रहे। आखिर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है सामान्य वोटरों पर। कहा था डॉ. राममनोहर लोहिया ने कि “सड़क खामोश हो जाएगी तो संसद आवारा हो जाएगी।” आज ठीक उल्टा हो रहा है। संसद उद्विग्न हो रही है, तो वोटरों के असंतोष का उद्रेक तो बढ़ेगा ही। समाधान सदन में है। स्पीकर के पास है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/the-saying-women-are-the-enemies-of-women-must-be-refuted">&#8216;महिला ही महिलाओं की दुश्मन हैं&#8217; कहावत को झुठलाना होगा, खेत-खलिहानों की महिलाओं के हितों के बारे में भी सोचना होगा संसद में बैठने वाली महिलाओं को</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>वरुण गांधी:  सांसदों को मिलने वाली पेंशन, अन्य सभी सुविधाओं को खत्म पर चर्चा क्यों नहीं होती ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Aug 2022 05:43:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[government]]></category>
		<category><![CDATA[loksabha]]></category>
		<category><![CDATA[parliament]]></category>
		<category><![CDATA[pension]]></category>
		<category><![CDATA[policy]]></category>
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		<category><![CDATA[rajya sabha]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली :  सांसदों को मिलने वाली पेंशन, अन्य सभी सुविधाओं को खत्म पर चर्चा क्यों नहीं होती, सिर्फ जनता को मिलने वाली मुफ्त की सुविधाओं पर सवाल क्यों उठता है ? यह बात विगत दिनों भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद वरुण गांधी ने कहा। भाजपा नेता के अनुसार &#8220;आम जनता को मिलने वाले मुफ्त की [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली :  सांसदों को मिलने वाली पेंशन, अन्य सभी सुविधाओं को खत्म पर चर्चा क्यों नहीं होती, सिर्फ जनता को मिलने वाली मुफ्त की सुविधाओं पर सवाल क्यों उठता है ? यह बात विगत दिनों भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद वरुण गांधी ने कहा। भाजपा नेता के अनुसार &#8220;आम जनता को मिलने वाले मुफ्त की सुविधाओं पर सवाल उठाने से पहले क्यों न चर्चा की शुरुआत सांसदों को मिलने वाली पेंशन और अन्य सभी सुविधाओं को खत्म करने से हो।&#8221;</strong></p>
<p>वरुण गांधी और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी द्वारा ‘‘मुफ्तखोरी की संस्कृति’’ समाप्त किए जाने के बारे में राज्यसभा में चर्चा की मांग किए जाने संबंधी नोटिस का उल्लेख करते हुए वरुण ने एक ट्वीट में कहा कि जनता को मिलने वाली राहत पर उंगली उठाने से पहले &#8216;हमें अपने गिरेबां&#8217; में जरूर झांक लेना चाहिए। क्यों न चर्चा की शुरुआत सांसदों को मिलने वाली पेंशन समेत अन्य सभी सुविधाएं खत्म करने से हो?’’</p>
<p>सांख्यिकी के अनुसार, अगर भारत में भूतपूर्व-सांसदों से लेकर अवकाश-प्राप्त सरकारी शौचालय में मैला साफ़ करने वाले सफ़ाई कर्मचारी तक, दोनों में “समानता” को आंकें, तो एक जबरदस्त समानता है; चाहे वे किसी भी जाति, धर्म, सम्प्रदाय के हों – दोनों भारत \ सरकार और राज्य सरकारी खजाने से प्रतिमाह पेंशन लेते हैं। आपको सहज “हज़म” भले न हों क्योंकि आपने कभी अपने के अलावे दूसरों (अपने परिवार-परिजनों सहित) का भी भला हो, सोचा ही नहीं।  भारत सरकार के ख़जाने से  सन 1991 से 2018 वित्तीय वर्ष तक 4,000,000,000,000+ न्यूनतम रुपये सिर्फ, और सिर्फ, सरकारी-सेवा अवकाश-प्राप्त महानुभावों के पेंशन पर खर्च किया गया है। यह राशि छोटी नहीं है !!</p>
<p><strong>एक ट्वीट में वरुण गांधी ने पिछले पांच सालों में बड़ी संख्या में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (पीएमयूवाई) के लाभार्थियों द्वारा सिलेंडर दोबारा न भरवाने का मुद्दा उठाया और कहा कि पिछले पांच सालों में 4.13 करोड़ लोग सिलेंडर को दोबारा भरवाने का खर्च एक बार भी नहीं उठा सके, जबकि 7.67 करोड़ ने इसे केवल एक बार भरवाया। उन्होंने कहा, ‘‘घरेलू गैस की बढ़ती कीमतें और नगण्य सब्सिडी के साथ गरीबों के &#8216;उज्जवला के चूल्हे&#8217; बुझ रहे हैं। स्वच्छ ईंधन, बेहतर जीवन देने के वादे क्या ऐसे पूरे होंगे?’’ जबकि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्यमंत्री रामेश्वर तेली ने एक अगस्त को राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में बताया था कि पिछले पांच सालों में पीएमयूवाई के 4.13 करोड़ लाभार्थियों ने एक बार भी सिलेंडर रिफिल नहीं कराया जबकि 7.67 करोड़ लाभार्थियों ने एक ही बार सिलेंडर भरवाया।</strong></p>
<p>बहरहाल, यदि पेंशन योजनाओं की शुरूआती तारीखों से इन अवकाश-प्राप्त सांसदों और सरकारी मुलाजिमों को देय पेंशन राशि की गणना की जाय तो, सम्भवतः भारत ही नहीं, विश्व के गणितज्ञ और सांख्यिकी बनाने वाले, सांख्यिकी एकत्रित करने वाले इस कार्य को नहीं कर पाएंगे – वैसे भी “इस अनुत्पादक” राशि, जो किसी राष्ट्र के लिए “एसेट्स” नहीं है, और ना ही होगा, समयान्तराल इन राशियों में “कमी” होने के सम्भावना भी नहीं है – राष्ट्र के निर्माण में दीमक जैसा है, जो उस समय की पीढ़ी के युवक-युवतियों के जीवन-निर्माण के अवसरों को छीनती ही नहीं, बल्कि अपने-अपने पैरों तले अपने परिवार के सदस्यों, परिजनों का भविष्य भी रौंदती है । नेता तो चाहेंगे ही की मतदाताओं के सामने  “रोटी” फेंक दें, शासन की गद्दी पर बैठे रहें – लेकिन कभी आपने सोचा क्या सही है या क्या गलत ? शायद नहीं।  अगर सोचा होता तो आज 73 वर्ष की आज़ादी के बाद देश का जीडीपी सन 2020 के जनबरी-मार्च में 3.1 फीसदी नहीं होता। </p>
<figure id="attachment_4268" aria-describedby="caption-attachment-4268" style="width: 760px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/40-varun-gandhi.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/40-varun-gandhi.jpeg" alt="" width="760" height="443" class="size-full wp-image-4268" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/40-varun-gandhi.jpeg 760w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/40-varun-gandhi-300x175.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 760px) 100vw, 760px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4268" class="wp-caption-text">&#8220;आम जनता को मिलने वाले मुफ्त की सुविधाओं पर सवाल उठाने से पहले क्यों न चर्चा की शुरुआत सांसदों को मिलने वाली पेंशन और अन्य सभी सुविधाओं को खत्म करने से हो। -फोटो संजय अहलावत जी के सौजन्य से इंटरनेट  से</figcaption></figure>
<p>आज़ादी के विगत 75-सालों में जिस तरह प्रति-वर्ष गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, शिप्रा, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा, ब्रह्मपुत्र, अलकनंदा, भागीरथी, सरयू, चम्बल, बेतबा, सिंध, काली, घाघरा, चिनाव, गंडक, ताप्ती, पेरियार, तीस्ता और अन्य भारतीय नदियों में पानी के अनवरत बहाव का हम सदुपयोग नहीं सके; भूतपूर्व- सांसदों और अवकाश-प्राप्त सरकारी मुजाजिमों पर भी “अनुत्पादक राशि” खर्च कर उन्हें राष्ट्र का पैरासाईट बनाते चले गए – महज अपनी-अपनी राजनीति लिए, वोट-बैंक के लिए। आश्चर्य तो तब होता है जब सन 1994 में केन्द्रीय सरकारी क्षेत्र में कुल “ऑर्गेनाइज्ड वर्कफोर्स” जो 12.4 फीसदी था, सन 2012 में घटकर महज़ 8.5 फीसदी हो गया, और 2020 में दो फीसदी और कम।  सन 2014 में 14 लाख आर्म्ड फ़ोर्स के साथ केंद्रीय सरकारती क्षेत्र में 47 लाख कर्मचारी थे, जिसमे मिलियरी 30 %, रेलवे 28 % – सन 2006 और 2014 के बीच केंद्र सरकार के सभी क्षेत्रों में मुलाजिमों  की  संख्या में बृद्धि हुयी, सिवाय गृह-मंत्रालय  कार्य करने वाले मुलाजिमों को छोड़कर, जिसमें पारा-मिलिट्री फ़ोर्स भी सम्मिलित हैं। </p>
<p>यदि आंकड़ों को देखा जाय तो भारत में केंद्रीय सरकारी क्षेत्र में कार्य करने वाले कर्मचारियों से अधिक अवकाश-प्राप्त कर्मचारी हैं, जो अपने कार्यकाल में सरकार द्वारा प्रदत्त सभी सुविधाओं का लाभ तो उठाये ही, तनखाह भी लिए; साथ अवकाश प्राप्त करने के बाद जीवन पर्यन्त सरकारी कोष से प्रत्येक माह पेंशन भी लेते हैं – लेकिन उत्पादकता पर किसी ने कभी भी कोई प्रश्न नहीं किया। सवाल यह है कि इन भूतपूर्व-सांसदों को,  सरकारी मुलाजिमों को मिलने वाली पेंशन राशि का इस्तेमाल यदि देश में बड़े पैमाने पर उद्योगों को स्थापित करने, स्वास्थ सुविधा हेतु आधुनिक उपकरणों से  युक्त अस्पताल खोलने  में, या सरकारी क्षेत्रों में शैक्षिक-व्यवस्था को मजबूत बनाने  की दिशा में इस्तेमाल किया गया होता, या किया जाय तो आज की पीढ़ी को ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी उत्तम शैशणिक वातावरण,  स्वास्थ व्यवस्था उपलब्ध होगा। </p>
<p>वजह यह है कि निजी क्षेत्रों में आज जो भी सुविधाएँ उपलब्ध हैं वह इसलिए की सरकार, सरकार के लोग, सरकारी अधिकारी, उद्योगपति, कॉर्पोरेट, बिचौलियों के ‘मिली-भगत’ के कारण ही है। अन्यथा सरकारी क्षेत्रों की यह दशा नहीं होती। देश को लूटने में सिर्फ राजनेतागण ही नहीं, उनके कार्यरत चमचे / अधिकारी ही नहीं, उनके ब्रोकर ही नहीं हैं।  भारत का एक विशाल समुदाय इस कार्य में लगा है जो राष्ट्र की नींव को खोखला कर रहा है –  यानी अवकाश के बाद पेंशन लेने वाले भी हैं अन्यथा  4,000,000,000,000+ रुपये उन्हें पेंशन देने में खर्च किया गया होता, किया जाता –  इसलिए की वे सरकारी नौकरी में थे।  यह सहज पच्य नहीं है कि भारत में इन 52 लाख पेंशन-भोक्तओं के लिए तकरीबन चार दर्जन से अधिक एसोसिएशन्स / यूनियन्स / संगठन कार्य  करते हैं। अगर राजनीतिक दृष्टि से अवलोकन करें तो इन 52 लाख + मतदाताओं के लिए बहुत ही मसक्कत करती है राजनीतिक पार्टियां, और बाद में सत्ता में आने पर सरकार। </p>
<p>जरा दूसरे  पक्ष भी निहारिये – आंकड़ों अनुसार देश में केंद्रीय सरकार के विभिन्न संस्थानों, विभागों के अधीन कोई 7.47 लाख नौकरियाँ रिक्त हैं। सबसे अधिक राजस्व विभाग में है। राजस्व विभाग में कुल अनुशंसित स्थानों में कोई 45 फीसदी स्थान रिक्त हैं। इतना ही नहीं, भारतीय रेल में कोई 2,50,000 स्थान रिक्त पड़े हैं। लेकिन उन्हें क्या? अगर सन 1991 से 2018 वित्तीय वर्षों का रेवेन्यू एक्सपेंडिचर का इतिहास देखेंगे तो आपका माथा फट जायेगा यह पढ़कर की वर्षों में पेंशन और अन्य अवकाश प्राप्त सुविधाओं पर भारत सरकार /  राज्य सरकारों ने  सिर्फ चार ट्रीलियन रूपया है। ये राशि न तो कोई एसेट्स बनाया और ना ही  सरकारी कोषागार पर पड़ने वाले भार को कम किया आज तक।  अपितु, बढ़ते ही जा रहा है । </p>
<p>अभी हाल  में  ही, महाराष्ट्र सरकार यह चिंता दिखाई की सन 2010-2011 में जहाँ अपने 19 लाख कर्मचारियों के वेतन और पेंशन राशि में उसे 51 632 करोड़ रुपये खर्च होते थे, 2020-2021 वित्तीय वर्ष में इस राशि में 202 . 4 फीसदी की वृद्धि होकर यह 1,55,940 करोड़ हो गयी है – जो चिंताजनक है। यह स्थिति सिर्फ महाराष्ट्र की ही नहीं है, बल्कि  राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कोषागारों का है। पिछले दिनों भारतीय रेल यह आंकने की मुहिम चलाई की वास्तव में रेलवे द्वारा दी जाने वाली पेंशन राशि में भोक्ता जीवित हैं अथवा नहीं, विशेषकर जो 80 और 100 के उम्र के हैं ? इसलिए रेलवे ने सभी वेलफेयर इंस्पेक्टरों को पेंशन प्राप्त  करने वाले कर्मचारियों के घर-घर भेजना प्रारम्भ की। वजह थी – पैसों की कमी। रेलवे में कोई 13,75,483 अवकाश प्राप्त कर्मचारी हैं जिनपर रेलवे, यानी सरकार, प्रत्येक वर्ष 8000 करोड़ पेंशन राशि पर खर्च करती हैं। आपको सुखद आश्चर्य होगा को भारतीय रेल में आज 2,86,000 कर्मचारी ऐसे हैं जो 80 और 100 वर्ष के बीच के  और सरकारी पेंशन का मजा ले रहे हैं। </p>
<p>वैसे वर्तमान काल में तो भारत में ”लाईफ एक्सपेक्टेंसी” औसतन 69.16 माना जाता है, लेकिन देश-विदेश के विद्वानों और चिकित्सकों का मानना है की आने वाले समय में  भारत में लाईफ एक्सपेक्टेंसी औसतन 80 वर्ष हो जायेगा – यानि अपने-अपने भविष्य को आज ही आंक लें। वजह आप जानते ही है – चुनाब जीतने के लिए नेता लोग “वादा” करेंगे ही, जीतने के बाद यदि विधान सभा-विधान परिषद्-लोक सभा और राज्य सबा में आये तो सबसे पहले अपनी सुरक्षा करेंगे ही जीवन पर्यन्त और मरने के बाद भी। </p>
<p>एक बार संसद सदस्य बन गए तो सोना पर सुहागा, पेंशन संसद वाला भी मिलने लगेगा। वजह यह है कि भारत में विगत वर्षों तक, आगे भी, भारत सरकार पेंशन के मद पर 4,000,000,000,000+ रुपये प्रतिवर्ष खर्च करती हैं जो भारत के सभी विधान सभाओं, राज्य सभा, लोक सभा, विधान परिषद आदि के सदस्य रहे और किसी गली कूची की सरकारी कार्यालयों से लेकर राष्ट्रपति भवन कार्यालय में सेवा अर्पित किये हैं । श्री उद्धव ठाकरे साहब का नाम भी महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में सूचीबद्ध हो गया – यानी वे भी अब पेंशन के हकदार हो गए। </p>
<p>यह तो सरकारी अवकाश-प्राप्त मुलाजिमों और सांसदों की बात है। अगर विभिन्न सरकारों द्वारा घोषित विभिन्न-प्रकार की पेन्शन-योजनाओं, चाहे प्रधान मंत्री के नाम पर हो, या किसी वृद्ध व्यक्ति के निमित्त या बीमार भारतीय के निमित्त या विधवाओं के निमित्त – बहुत बड़ा, यानि बहुत बड़ा “स्कैम” है। खासकर भारत ऐसे आर्थिक-रूप से कमजोर देश, जहाँ प्रत्येक घंटे बड़े-बड़े अधिकारियों, सफेदपोश नेताओं, समाज के दबगों, कारपोरेट घरानों के मालिकों / मालकिनों की मिली-भगत से कोई-न-कोई मौद्रिक-स्कैम होता आ है, चाहे बैंक स्कैम हो या बारूद-स्कैम; उसी देश में सरकारी खजाने से प्रत्येक वर्ष भूतपूर्व-सांसदों पर कुल 840 करोड़ रुपये और सरकारी अवकाशप्राप्त मुलाजिमों को 1.68 लाख करोड़ “पेंशन के रूप में” भुगतान होता है। </p>
<p>यदि पेंशन योजनाओं की शुरूआती तारीखों से इन अवकाश-प्राप्त सांसदों और सरकारी मुलाजिमों को देय पेंशन राशि की गणना की जाय तो, सम्भवतः भारत ही नहीं, विश्व के गणितज्ञ और सांख्यिकी बनाने वाले, सांख्यिकी एकत्रित करने वाले इस कार्य को नहीं कर पाएंगे – वैसे भी “इस अनुत्पादक” राशि, जो किसी राष्ट्र के लिए “एसेट्स” नहीं है, और ना ही होगा, समय अंतराल इन राशियों में “कमी” होने के सम्भावना भी नहीं है – राष्ट्र के निर्माण में दीमक जैसा है, जो उस समय की पीढ़ी के युवक-युवतियों के जीवन-निर्माण के अवसरों को छीनती ही नहीं, बल्कि अपने-अपने पैरों तले अपने परिवार के सदस्यों, परिजनों का भविष्य भी रौंदती है । नेता तो चाहेंगे ही की मतदाताओं के सामने  “रोटी” फेंक दें, शासन की गद्दी पर बैठे रहें – लेकिन कभी आपने सोचा क्या सही है या क्या गलत ? शायद नहीं।  </p>
<p>आश्चर्य तो तब होता है जब सन 1994 में केन्द्रीय सरकारी क्षेत्र में कुल “ऑर्गेनाइज्ड वर्कफोर्स” जो 12.4 फीसदी था, सन 2012 में घटकर महज़ 8.5 फीसदी हो गया, और 2020 में दो फीसदी और कम।  सन 2014 में 14 लाख आर्म्ड फ़ोर्स के साथ केंद्रीय सरकारती क्षेत्र में 47 लाख कर्मचारी थे, जिसमे मिलिट्री 30 %, रेलवे 28 % – सन 2006 और 2014 के बीच केंद्र सरकार के सभी क्षेत्रों में मुलाजिमों  की  संख्या में वृद्धि हुयी, सिवाय गृह-मंत्रालय  कार्य करने वाले मुलाजिमों को छोड़कर, जिसमें पारा-मिलिट्री फ़ोर्स भी सम्मिलित हैं। यदि आंकड़ों को देखा जाय तो भारत में केंद्रीय सरकारी क्षेत्र में कार्य करने वाले कर्मचारियों से अधिक अवकाश-प्राप्त कर्मचारी हैं, जो अपने कार्यकाल में सरकार द्वारा प्रदत्त सभी सुविधाओं का लाभ तो उठाये ही, तनख्वाह भी लिए; साथ अवकाश प्राप्त करने के बाद जीवन पर्यन्त सरकारी कोष से प्रत्येक माह पेंशन भी लेते हैं – लेकिन उत्पादकता पर किसी ने कभी भी कोई प्रश्न नहीं किया। </p>
<p>सवाल यह है कि इन भूतपूर्व-सांसदों को,  सरकारी मुलाजिमों को मिलने वाली पेंशन राशि का इस्तेमाल यदि देश में बड़े पैमाने पर उद्योगों को स्थापित करने, स्वास्थ्य सुविधा हेतु आधुनिक उपकरणों से  युक्त अस्पताल खोलने  में, या सरकारी क्षेत्रों में शैक्षिक-व्यवस्था को मजबूत बनाने  की दिशा में इस्तेमाल किया गया होता, या किया जाय तो आज की पीढ़ी को ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी उत्तम शैक्षणिक वातावरण,  स्वास्थ्य व्यवस्था उपलब्ध होगा। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/why-is-there-no-discussion-on-pension-of-mps">वरुण गांधी:  सांसदों को मिलने वाली पेंशन, अन्य सभी सुविधाओं को खत्म पर चर्चा क्यों नहीं होती ?</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>कपिल सिब्बल तो 16 साल पहले ही उत्तर प्रदेश के हो गए थे &#8230;&#8230; चुनाव भले नहीं लड़े थे, करोड़ों लोगों का दिल जीते थे</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/culture/kapil-sibal-had-won-the-hearts-of-crores-of-people</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 May 2022 13:23:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[Banaras]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बनारस: आप माने या नहीं। लेकिन बनारस का सराय हरहा का वह तीन-तल्ला मकान का छत, दीवारें और भारत रत्न शहनाई उस्ताद की ऐतिहासिक शहनाई गवाह है कि वरिष्ठ अधिवक्ता और तत्कालीन कांग्रेस के नेता, मंत्री कपिल सिब्बल आज से सोलह वर्ष पूर्व बनारस के रास्ते उत्तर प्रदेश के हो गए थे। उत्तर प्रदेश के [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बनारस: आप माने या नहीं। लेकिन बनारस का सराय हरहा का वह तीन-तल्ला मकान का छत, दीवारें और भारत रत्न शहनाई उस्ताद की ऐतिहासिक शहनाई गवाह है कि वरिष्ठ अधिवक्ता और तत्कालीन कांग्रेस के नेता, मंत्री कपिल सिब्बल आज से सोलह वर्ष पूर्व बनारस के रास्ते उत्तर प्रदेश के हो गए थे। उत्तर प्रदेश के संसदीय क्षेत्र से आम चुनाव जीतकर भले भारत के संसद में नहीं आये थे, लेकिन भारत के करोड़ों लोगों का, खासकर जिन्हे संगीत से प्रेम है, जो गंगा जमुनी तहजीब की बात करते हैं, देश में एकता की बात करते हैं &#8211; दिल जीत लिए थे।</strong> </p>
<p>दो दशक पूर्व देश का कमान तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथ में था। मुरली मनोहर जोशी बनारस के सांसद थे और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अपने जीवन के अंतिम वसंत में वाजपेयी जी से मदद की गुहार किये। फिर क्या था। लखनऊ से दिल्ली तक के पत्रकारों ने अख़बारों को रंग दिए। टीवी पर बिस्मिल्लाह खान की बातें आसमान में छेद करने लगी। बनारस के पत्रकार बंधु-बांधव कुछ क्षुब्ध थे, कुछ हैरान थे अख़बारों में पढ़कर, टीवी में वक्ताओं को सुनकर। फिर बिस्मिल्लाह खान के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया और कुछ आर्थिक मदद की गयी। </p>
<p>देश के संगीतज्ञ हैरान थे। शहनाई बजाकर कमाए धन को &#8216;मदद&#8217; कहा जा रहा था। लिखा जा रहा था। लोग कह रहे थे &#8216;यह तो पारिश्रमिक है शहनाई बजाने के लिए &#8230;.. फिर मदद की बात कैसे हो रही है। आवाज घरों में, बैठकी में बंद था। एक पत्रकार के रूप में, बिस्मिल्लाह खान का बिहार और दरभंगा से सम्बन्ध होने के कारण, एक भारतीय होने के कारण और उससे भी अधिक जिसने लाल किले से भारत की स्वतंत्रता को सं 1947 में अभिनन्दन किये थे &#8211; कुछ करूँ। मुझे अपनी आर्थिक औकात मालूम था। भारत को आज़ाद होने के 59 साल बाद शायद अधिवक्ता-सह-राजनेता कपिल सिब्बल पहला व्यक्ति थे जो फाल्गुन की समाप्ति के साथ शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के जन्मदिन के अवसर पर उनके ह्रदय में चैती गुनगुनाये थे &#8211; वह भी तीन किलो चांदी की शहनाई से। इतना ही नहीं, आजीवन हाथ पकड़े रहने का वादा भी था। बिस्मिल्लाह खान प्रसन्न थे। आखों से अश्रुपात हो रहा था।<br />
 <br />
<strong>शहनाई उस्ताद अश्रुपूरित आँखों से सिब्बल साहब को बधाई दिए थे। चांदनी चौक की गली में स्थित एक स्वर्णकार ने उस ऐतिहासिक चांदी की शहनाई को गढ़ा था। तारीख था 25 मार्च और स्थान था बनारस का सराय हरहा स्थित बिस्मिल्लाह खान के कमरे के बाहर का हिस्सा। स्थानीय लोगों का, पत्रकारों का, लेखकों का, छायाकारों का खचाखच भीड़ और उस भीड़ में चमचमाता चांदी की वह शहनाई और बिस्मिल्लाह खान का चमकता चेहरा। कपिल सिब्बल तो उत्तर प्रदेश का उसी दिन हो गए थे जब उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की दिल्ली के इण्डिया गेट पर शहनाई बजने की इक्षा को कार्यरूप देने के लिए हमारे प्रयास को जी भरकर मदद किये। </strong></p>
<p>बहरहाल, विगत दिनों जब कांग्रेस नेतृत्व को लेकर राजनीतिक गरमाहट गरमा-गरम हो रही थी, अनेकानेक बार उन्हें लिखा था: &#8220;या तो कांग्रेस का नेतृत्व संभालें या फिर कांग्रेस को अंतिम नमस्कार करें।&#8221; आज वह भी साफ़ हो गया और कपिल सिब्बल &#8216;पूर्व कांग्रेस नेता&#8217; हो गए। वे दस दिन पहले कांग्रेस पार्टी के सांसद के रूप में राज्य सभा से इस्तीफा दे चुके और आज उत्तर प्रदेश के समाजवादी पार्टी के पूर्ण समर्थन में एक निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में राज्य सभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया है। नामांकन के समय समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ साथ पार्टी के प्रमुख महासचिव रामगोपाल यादव तथा अन्य वरिष्ठ नेता मौजूद थे। </p>
<p>नामांकन दाखिल करने के बाद सिब्बल ने स्पष्ट किया &#8220;मैंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर नामांकन भरा है और मैं अखिलेश जी का धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने हमें समर्थन दिया है।&#8221; सिब्बल ने यह भी बताया कि वह पिछली 16 मई को ही कांग्रेस से इस्तीफा दे चुके हैं और अब वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नहीं हैं। उत्तर प्रदेश की 11 राज्यसभा सीटों के लिए नामांकन की प्रक्रिया मंगलवार को शुरू हुई है। इस चुनाव के लिए मतदान आगामी 10 जून को होगा। प्रदेश की 403 सदस्यीय विधानसभा में सपा के 111 सदस्य हैं और वह तीन उम्मीदवारों को आसानी से राज्यसभा भेज सकती है। पार्टी ने फिलहाल सिब्बल को अपना समर्थित प्रत्याशी घोषित किया है। बाकी दो सीटों पर अपने उम्मीदवारों को लेकर सपा ने अभी खुलासा नहीं किया है। </p>
<p>सिब्बल ने कहा &#8220;हम विपक्ष में रह कर एक गठबंधन बनाना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि 2024 में ऐसा माहौल बने कि मोदी सरकार की जो खामियां हैं उन्हें जनता तक पहुंचाया जाए।&#8221; सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सिब्बल को समर्थन देने के औचित्य का जिक्र करते हुए कहा &#8220;कपिल सिब्बल देश के जाने माने अधिवक्ता हैं। वह लोकसभा में या राज्यसभा में रहे हों, उन्होंने बातों को अच्छी तरह रखा है। हमें उम्मीद है कि देश में जो बड़े-बड़े सवाल हैं&#8230; जैसे&#8230; आज देश किस रास्ते पर है, महंगाई रुक नहीं रही है और चीन लगातार हमारी सीमाओं पर आगे बढ़ता जा रहा है&#8230; इन तमाम बड़े-बड़े सवालों पर कपिल सिब्बल समाजवादी पार्टी के और अपने विचारों को आगे रखेंगे।&#8221; गौरतलब है कि सिब्बल को सपा की ओर से राज्यसभा प्रत्याशी बनाए जाने की अटकलें मंगलवार से ही लगाई जा रही थीं। हालांकि पार्टी ने इसकी पुष्टि नहीं की थी। </p>
<p>सिब्बल ने, भ्रष्टाचार तथा अनेक अन्य आरोपों में लगभग 27 महीने तक सीतापुर जेल में बंद रहे सपा के वरिष्ठ नेता एवं विधायक आजम खां को उच्चतम न्यायालय से जमानत दिलवाने में उनके वकील के तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। खां अपने प्रति कथित बेरुखी को लेकर सपा नेतृत्व से नाराज हैं। माना जा रहा है कि सिब्बल को समर्थन देकर इस नाराजगी को दूर करने की कोशिश की गई है। सिब्बल के अतिरिक्त करीब दो दर्जन कांग्रेसी नेता पार्टी के नेतृत्व में आमूल परिवर्तन चाहते थे। यह अलग बात है कि कांग्रेस के वर्तमान नेता, जो पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं, उनका न तो मत से और ना ही मतदाताओं से कोई सीधा नाता है। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/kapil-sibal-had-won-the-hearts-of-crores-of-people">कपिल सिब्बल तो 16 साल पहले ही उत्तर प्रदेश के हो गए थे &#8230;&#8230; चुनाव भले नहीं लड़े थे, करोड़ों लोगों का दिल जीते थे</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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