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	<title>ragini singh Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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		<title>मोदीजी का नारा &#8220;पढ़ेगा इण्डिया-तो बढ़ेगा इण्डिया&#8221; झरिया (झारखण्ड) के भाजपा विधानसभा अभ्यर्थी पर लागू नहीं होता है, झरिया विधानसभा की मिट्टी गवाह है (भाग-2)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/modis-padhega-india-badhega-india-slogan-not-apply-for-jharia-candidate</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Nov 2024 11:09:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>झरिया (धनबाद) : झरिया और घनबाद के स्थानीय लोग, यहाँ तक कि भाजपा के कार्यकर्त्ता भी यह कहते नहीं थक रहे हैं कि &#8216;प्रधानमंत्रो नरेंद्र मोदी का &#8220;पढ़ेगा इण्डिया तो बढ़ेगा इण्डिया&#8221; का नारा झरिया विधान सभा के मतदाताओं के कानों तक पहुंचा भले हो, लेकिन भाजपा के अभ्यर्थी के कानों तक नहीं पहुंचा। शिक्षा के महत्व को [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/modis-padhega-india-badhega-india-slogan-not-apply-for-jharia-candidate">मोदीजी का नारा &#8220;पढ़ेगा इण्डिया-तो बढ़ेगा इण्डिया&#8221; झरिया (झारखण्ड) के भाजपा विधानसभा अभ्यर्थी पर लागू नहीं होता है, झरिया विधानसभा की मिट्टी गवाह है (भाग-2)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>झरिया (धनबाद) : झरिया और घनबाद के स्थानीय लोग, यहाँ तक कि भाजपा के कार्यकर्त्ता भी यह कहते नहीं थक रहे हैं कि &#8216;प्रधानमंत्रो नरेंद्र मोदी का &#8220;पढ़ेगा इण्डिया तो बढ़ेगा इण्डिया&#8221; का नारा झरिया विधान सभा के मतदाताओं के कानों तक पहुंचा भले हो, लेकिन भाजपा के अभ्यर्थी के कानों तक नहीं पहुंचा। शिक्षा के महत्व को दर्शाते हुए पांच वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में इस नारा को बुलंद किये थे। दुर्भाग्य यह रहा कि पिछले विधानसभा चुनाव में हार के 1825 दिन बाद भी श्रीमती रागिनी सिंह को शिक्षा के प्रति लालसा जागृत नहीं हो पाया, वे विद्यालय/महाविद्यालय तक नहीं पहुँच सकीं।</strong></p>
<p>आगामी 20 नवम्बर को 18 वर्ष की आयु और अधिक के मतदाता जो अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे, का कहना है कि &#8216;अगर रागिनी सिंह चाहती तो इन विगत वर्षों में अपनी शैक्षिक योग्यता में इजाफा अवश्य कर लेती। अगर चयनित उम्मीदवार शिक्षित नहीं होगा तो क्षेत्र में शिक्षा का प्रचार-प्रसार कैसे करेगा? ऐसे स्थिति में भाजपा का यह नारा &#8216;पढ़ेगा इण्डिया तो बढ़ेगा इण्डिया&#8217; झरिया विधानसभा क्षेत्र में तो लागु नहीं होता है। यह दुर्भाग्य है। </p>
<blockquote><p>मतदाताओं का माने तो उनकी बातों में दम है। लोगबाग तो यह भी कह रहे हैं कि शिक्षा के मामले में झरिया से कांग्रेस के उम्मीदवार और श्रीमती रागिनी सिंह के देवर (दिवंगत) की पत्नी श्रीमती पूर्णिमा नीरज सिंह का जबाब नहीं है। इतना ही नहीं, मतदाता तो यह भी कह रहे हैं कि &#8216;जिस सुरक्षा कवच में उनके प्रतिनिधि (श्रीमती रागिनी सिंह) मतदाताओं से मुखातिब होती हैं, वह मतदाता-मत-और मतदान के बीच बहुत बड़ा फासला को दर्शाता है। यह अलग बात है कि 2019 विधानसभा चुनाव में भाजपा की रागिनी सिंह कांग्रेस की श्रीमती पूर्णिमा सिंह से महज आठ फीसदी मतों से पीछे रही। खैर। राजनीति में शिक्षित लोगों की जरूरतअब रही कहाँ जब से राजनीति का अपराधीकरण हो गया या फिर अपराधियों का राजनीतिकरण होने लगा और झरिया-धनबाद कोयलांचल की मिट्टी से अधिक गवाही और कौन दे सकता है। </p></blockquote>
<p>बहरहाल, पैंतालीस वर्ष बीत गए। उस दिन मार्च महीने का 28 तारीख था और साल 1979 था। धनबाद के गांधी नगर स्थित आवास सह कार्यालय में सिन्हा साहेब रेकर्ड प्लेयर पर अपने पोते गौतम के साथ गाना सुन रहे थे। घर में उस वक्त आसपास के चार-पांच लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचे। अचानक दो-तीन लोग बरामदे में पहुंचे और एक ने पूछा साहेब हैं? जवाब &#8216;हां&#8217; में मिलने पर वे लोग लौट गये। इस बीच अचानक बिजली गुल हो गयी और कुछ सेकेंड में बिजली आ भी गयी। सिन्हा साहेब को पूछने वाले लोग इतने में ही 10-11 व्यक्तियों को साथ ले कर बरामदे में शोर करते हुए प्रवेश किये। शोर सुन कर साहेब पूछते हैं कौन आया है? क्या हो रहा है? जवाब मिलता है डाकू आये हैं। इतने में सिन्हा साहेब जैसे ही कमरे से बाहर निकलते हैं मोटा सा एक आदमी लाइट मशीन गन से गोलियों की बौछार करने लगा। करीब सौ गोलियां चली । सिन्हा साहेब के शरीर को तब तक कई गोलियां बेध चुकी होती थी। सिन्हा साहेब खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़े थे। शरीर पार्थिव हो गया था। उस वक्त उनकी उम्र करीब 70 साल रही होगी।</p>
<p>धनबाद ही नहीं, कोयलांचल से लेकर तत्कालीन कलकत्ता तक, पटना के रास्ते दिल्ली तक कोहराम मच गया। सिन्हा साहेब की हत्या धनबाद कोयलांचल में कोयला माफिया और राजनीति के गठबंधन के इतिहास की पहली बड़ी घटना थी। बंदूक व बाहुबल की ताकत के समानांतर ताकत रखने वाले सिन्हा साहेब की हत्या में उनके करीबी कई लोगों का नाम आया। सिन्हा साहब का ‘अंत’, सूर्यदेव सिंह का ‘सूर्योदय’ था। सम्पूर्ण कोयलांचल सूर्यदेव सिंह की ऊँगली पर चलने लगी और भारत कोकिंग कोल मुख्यालय जाने के प्रवेश द्वार से कोई 100 कदम पर स्थित सिंह मैंशन इतिहास रचना प्रारम्भ कर दिया। व्हाइट हाउस का नामोनिशान समाप्त हो गया है। समय सब देख रहा था। सभी समय के सीसीटीवी कैमरा में थे। </p>
<figure id="attachment_5831" aria-describedby="caption-attachment-5831" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-1.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-1.jpg" alt="" width="2048" height="1152" class="size-full wp-image-5831" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-1.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-1-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-1-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-1-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-1-1536x864.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5831" class="wp-caption-text">भाजपा के श्रीमती रागिनी सिंह (तस्वीर उनके फेसबुक पृष्ठ से) साथ खड़े हैं श्री सिद्धार्थ सिंह गौतम, सूर्यदेव सिंह के सबसे छोटे पुत्र</figcaption></figure>
<p><strong>आज साढ़े चार दशक बाद सिंह मैंशन के &#8216;गौतम&#8217; अपने दो भाभियों की राजनीतिक युद्ध में अपनी चचेरी भाभी कांग्रेस की अभ्यर्थी श्रीमती पूर्णिमा नीरज सिंह के विरुद्ध अपनी भाभी श्रीमती रागिनी सिंह के साथ खड़े हैं। एक तरफ &#8216;हार&#8217; और दूसरे तरफ &#8216;जीत&#8217; के बीच चुनाव की धारा बाह रही है। श्रीमती पूर्णिमा सिंह के पति और झरिया के पूर्व विधायक नीरज सिंह (गौतम के चचेरे भाई) की हत्या के जुर्म में श्रीमती रागिनी सिंह के पति संजीव सिंह (गौतम के सगे भाई) जेल में बंद हैं। आज सिंह मैंशन में भले भारतीय जनता पार्टी का झंडा लहराते-फहराते दिखे, लेकिन अन्तःमन से सभी सूर्यदेव सिंह की ताकत से आशीष की प्रार्थना कर रहे हैं। वैसे चुनाव में झरिया का मतदाता किसके पक्ष में अपना मतदान करेगा यह तो मतदाता जाने।</strong></p>
<figure id="attachment_5832" aria-describedby="caption-attachment-5832" style="width: 1614px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Purnima-Singh.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Purnima-Singh.jpg" alt="" width="1614" height="1350" class="size-full wp-image-5832" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Purnima-Singh.jpg 1614w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Purnima-Singh-300x251.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Purnima-Singh-1024x857.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Purnima-Singh-768x642.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Purnima-Singh-1536x1285.jpg 1536w" sizes="(max-width: 1614px) 100vw, 1614px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5832" class="wp-caption-text">कांग्रेस की अभ्यर्थी श्रीमती पूर्णिमा नीरज सिंह</figcaption></figure>
<p>कोयलांचल की काली, लेकिन रक्तरंजित मिट्टी आज भी पिछले छह दशकों का खुनी इतिहास याद रखे है। झरिया विधान सभा की मिट्टी आज भी कहती है कि सन 1967 में रामदेव सिंह, फिर 1967 में ही चमारी पासी, 1977 में श्रीराम सिंह की हत्या हुई। सं 1978 में बीपी सिन्हा को गोली मारी गयी। पांच साल बाद सन 1983 में शफी खान, फिर 1984 में मो असगर, 1985 में लालबाबू सिंह, 1986 में मिथिलेश सिंह, 1987 में जयंत सरकार की हत्या हुई। हत्या का सिलसिला अभी रुका नहीं था। इसके बाद 1986 में अंजार, 1986 में शमीम खान, 1988 में उमाकांत सिंह, 1989 में मो सुल्तान की हत्या हुई। उसी वर्ष 1989 में ही राजू यादव को मौत के घाट उतारा गया। 15 जुलाई, 1998 को धनबाद जिले के कतरास बाजार स्थित भगत सिंह चौक के पास दिन के उजाले में मारुति कार पर सवार कुख्यात अपराधियों ने अत्याधुनिक हथियारों से अंधाधुंध गोलियां चलाकर विनोद सिंह की हत्या कर दी।</p>
<p>25 जनवरी, 1999 को दोपहर के लगभग साढ़े बारह बजे सकलदेव सिंह सिजुआ स्थित अपने आवास से काले रंग की टाटा जीप पर धनबाद के लिए निकले ही थे। हीरक रोड पर पहुंचते ही दो टाटा सूमो (एक सफेद) सकलदेव सिंह की गाड़ी के समानांतर हुई। सूमो की पिछली खिड़की का काला शीशा थोड़ा नीचे सरका और उसमें से एक बैरेल सकलदेव सिंह को निशाना साधकर दनादन गोलियां उगलने लगी। जवाब में सकलदेव सिंह की गाड़ी से भी फायरिंग होने लगी। दोनो गाड़ियां काफी तेज चल रही थी और साथ में फायरिंग भी हो रही थी और अंतत : बंदूक की गोलियों ने सकलदेव सिंह को हमेशा के लिए खामोश कर दिया।</p>
<p>कोयलांचल में खून की होली के लिए ‘होली पर्व’ का होना आवश्यक नहीं है। यहाँ वर्चस्व स्थापित करने के लिए, वर्चस्व बनाये रखने के लिए कभी भी, कहीं भी खून की होली हो जाती है। सं 1994 में मणींद्र मंडल, 1998 मो नजीर, 1998 में ही विनोद सिंह की हत्या हुई। सन 2000 में रवि भगत, 2001 जफर अली और नजमा व शमा परबीन, 2002 गुरुदास चटर्जी की हत्या हुई। उसी वर्ष 2002 में ही सुशांतो सेनगुप्ता की हत्या हुई। सन 2003 प्रमोद सिंह, फिर 2003 में राजीव रंजन सिंह, 2006 में गजेंद्र सिंह, 2009 में वाहिद आलम, 2011 में इरफान खान, सुरेश सिंह, 2012 में इरशाद आलम उर्फ सोनू और 2014 में टुन्ना खान तथा 2017 में रंजय सिंह की हत्या हुई।</p>
<p>आठ दिसंबर, 2011 की रात लगभग साढ़े नौ बजे करोड़पति कोयला व्यवसायी और कांग्रेस नेता सुरेश सिंह (55) की धनबाद क्लब में गोली मार कर हत्या कर दी गयी। इतना ही नहीं, अनेकों बार एस के राय जो इंटक के नेता भी थे, पर हमला हुआ। कोयलांचल की इसी खुनी होली और कोयले से कमाई के कारण ही बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन आदि नेता भी बने। इसी कमाई के कारण अविभाजित बिहार और बाद में झारखण्ड के साथ-साथ देश के सभी राज्यों के नेताओं की नजर, केंद्र में बैठे मंत्रियों की पैनी नजर इस काले सोने की ओर लगी होती है। काला होने के बाद भी सभी इसे प्यार करते हैं।</p>
<p>पिछले दिनों सूर्यदेव सिंह के भाई को बाहुबली रामधीर सिंह को धनबाद की एक अदालत ने विनोद सिंह हत्याकांड के मामले में कोई रियायत नहीं दी। रामधीर सिंह बाहुबली सकलदेव सिंह और उनके भाई बिनोद सिंह की हत्या का अपराधी थे। वैसे 25 जनवरी 1999 को भूली मोड़ के पास सकलदेव सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।  उस मुकदमें में धनबाद के जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रिजवान अहमद की अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए उनकी रिहाई का फैसला सुनाया था, लेकिन आज वे बिनोद सिंह हत्या कांड के अपराध में कारावास में ही रहे। उन्हें उम्र कैद की सजा है। विनोद सिंह बिहार जनता खान मजदूर संघ के महामंत्री और जनता दल के नेता सकलदेव सिंह के भाई थे। उनकी हत्या 15 जुलाई, 1998 को की गई। कहते हैं सकलदेव सिंह – विनोद सिंह के पिता मुखराम सिंह अविभाजित बिहार के छपरा ज़िले के उरहर पुर गांव से धनबाद के सिजुआ आये थे रोजी-रोटी की तलाश में।</p>
<p>15 जुलाई, 1998 को कतरास हटिया शहीद भगत सिंह चौक के पास ताबड़तोड़ गोलियों से हमला कर विनोद सिंह और उनके चालक मन्नु अंसारी को मौत के घाट उतार दिया गया था। उस समय सुबह का कोई 8.40 बजा था। विनोद सिंह कोल डंप जाने के लिए अपनी नई एम्बेसडर कार से निकले थे। उस कार को मन्नु अंसारी चला रहा था। पंचगढी बाजार में गाडियां जाम में थोडी देर फंसी रही। सुबह-सवेरे जैसे ही कतरास हटिया भगत सिंह चौक के पास जैसे ही पहुंचे, एक सादे रंग की मारुति कार दोनों गाडियों को ओवरटेक कर आगे रुकी, मारुति से तीन लोग उतरे और विनोद सिंह की गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। विनोद सिंह और मन्नु खून से लथपथ गिरे हुए थे। कहते हैं उस हमलावरों में रामधीर सिंह और राजीव रंजन सिंह शामिल थे। रामधीर सिंह झरिया के पूर्व विधायक स्वर्गीय सूर्यदेव सिंह के पांच भाइयों में सबसे छोटे है। रामधीर सिंह को ‘सिंह मेन्शन’ के रणनीतिकार के रूप में देखा जाता रहा है।</p>
<p>कहते हैं वे सूर्य देव सिंह के द्वारा स्थापित जनता मजदूर संघ के वह अध्यक्ष भी रह चुके है। लेकिन सजायाफ्ता होने के बाद उन्हें इस पद से हटा दिया गया। विनोद सिंह हत्याकांड में लोअर कोर्ट ने 2015 में रामधीर सिंह को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। डेढ़ साल से अधिक समय तक फरार रहने के बाद उन्होंने धनबाद कोर्ट में सरेंडर किया था। विधि का विधान देखिये उनकी पत्नी इंदू देवी धनबाद नगर निगम की मेयर रह चुकी हैं। विनोद सिंह हत्याकांड में विगत 25 अगस्त को झारखंड हाईकोर्ट की डिवीजन-बेंच ने रामधीर सिंह की अपील पर सुनवाई पूरी कर ली थी और फैसला सुरक्षित रख लिया था। इतना ही नहीं, रामधीर सिंह के बेटे शशि सिंह पर कोयला कारोबारी व कांग्रेस नेता सुरेश सिंह की हत्या का भी आरोप है। सुरेश सिंह की हत्या 7 दिसंबर 2011 को हुई थी। इस हत्या के बाद शशि सिंह धनबाद से फरार हो गए। धनबाद पुलिस अभी भी शशि सिंह को ढूंढ रही है। सुरेश सिंह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से चुनाव भी लड़ चुके थे। </p>
<p>सिंह मेंशन हमेशा सुर्खियों में रहा और कोयला कारोबार से लेकर राजनीति तक इस परिवार का दबदबा रहा। एक रिपोर्ट के अनुसार सियासत में मजबूत दखल का प्रमाण यह है कि धनबाद नगर निगम की कुर्सी इन्हीं परिवारों के बीच रही। धीरे-धीरे नीरज सिंह भी राजनीति में तेजी से उभरने लगे। पिछले विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से खड़े हुए थे, जबकि उसके चचेरे भाई संजीव सिंह भाजपा के टिकट पर। इस चुनाब के बाद परिवार के बीच विवाद और खुलकर सामने आ गया। नीरज सिंह 2019 के लोकसभा चुनाव में खड़े होने वाले थे, लेकिन नीरज सिंह की हत्या करा दी गई।</p>
<p><strong>सूर्यदेव सिंह के निधन के बाद उनकी पत्नी कुंती देवी को लोगों ने धनबाद जिले के झरिया विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक बनाया। उनकी राजनीतिक जमीन झरिया में इतनी पुख्ता थी कि उनके बेटे संजीव सिंह को लोगों ने विधानसभा भेजा। सूर्यदेव सिंह का धनबाद में बना आवास सिंह मेंशन आज भी है, फर्क सिर्फ इतना ही है कि सिंह मेंशन में रहने वाले पांच भाइयों में चार का कुनबा आज बिखर गया है। सूर्यदेव सिंह पांच भाई थे। विक्रमा सिंह अपने पैतृक गाँव बलिया में ही रह गये। जबकि राजन सिंह (अब दिवंगत) बच्चा सिंह (अब दिवंगत) और रामधीर  सिंह (आजीवन कारावास) सूर्यदेव सिंह (अब दिवंगत) के साथ रहे। उन दिनों सूर्यदेव सिंह पर प्रशासन अपनी पकड़ बना रही थी, उसी काल खंड में सूर्यदेव सिंह आरा लोक सभा से चुनाव लड़ने लगे। उधर चन्द्रमा सिंह बलिया लोक सभा से निर्दलीय चुनाव लड़ने को ठान लिए। उन दिनों बलिया में सूर्यदेव सिंह के राजनितिक गुरु चंद्रशेखर चाहते थे कि चन्द्रमा सिंह अपनी उम्मीदवारी वापस ले ले। वजह यह था कि बलिया में चंद्रशेखर के अभ्यर्थी चुनावी मैदान में थे। </strong></p>
<p>चंद्रशेखर सूर्यदेव सिंह को बात-बार कहे कि चन्द्रमा सिंह को उम्मीदवारी वापस लेने को कहो। सूर्यदेव सिंह के कहने पर भी चन्द्रमा सिंह ऐसा नहीं किये। बाद में जब सूर्यदेव सिंह चंद्रशेखर से बात करना चाहे तो चंद्रशेखर बात करने से मन कर दिए और यहीं अंत हो गया सूर्यदेव सिंह का सूर्य। उधर सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद बच्चा सिंह झरिया के विधायक बने और सिंह मैंशन के तर्ज पर &#8216;सूर्योदय&#8217; बना लिया और राजन सिंह का परिवार ने रघुकुल। रामधीर सिंह का बलिया-धनबाद आना-जाना लगा रहा, लेकिन उनकी पत्नी इंदू देवी और बेटा शशि सिंह मेंशन में ही रहती रही । सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद &#8216;सूर्योदय&#8217; और &#8216;सिंह मैंशन&#8217;  में कभी मधुर सम्बन्ध नहीं रहा, जहाँ तक नयी पीढ़ियों का सवाल है। नवम्बर 1990 में जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे, तब वह सूर्यदेव सिंह से मिलने धनबाद आये थे। जून 15 सन 1991 में हार्ट अटैक से हुई उनकी मौत के बाद परिवार के बीच ही विवाद हो गया और सभी भाइयों के बीच वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई। अब बच्चा सिंह नहीं हैं। </p>
<p>उन दिनों सूर्यदेव सिंह अपने उत्कर्ष पर थे। उत्तर प्रदेश के बलिया से आकर एक साधारण कोयला मजदूर के रूप में काम शुरू करने वाले सूर्यदेव सिंह ने कोयला मजदूरों की ट्रेड यूनियन की अगुवाई कर इतनी शोहरत हासिल की कि धनबाद की धरती पर पत्ता भी उनकी इक्षा के बिना नहीं हिलता था। जितने दबंग, उतने ही सामाजिक कार्यों में रुचि दिखाने वाले सूर्यदेव सिंह की लोकप्रियता का आलम रहा। चंद्रशेखर अब तक प्रधान मंत्री बने नहीं थे और जब प्रधानमंत्री बने तब भी सूर्यदेव सिंह को अपना परम-मित्र ही माना और कहा भी। चंद्रशेखर से नजदीकी के कारण उनका राजनीतिक रसूख परवान पर था। 1977 में सूर्यदेव सिंह पहली बार झरिया से विधायक बने।</p>
<p>एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार कोयलांचल में आठ बड़े गैंग में चार सौ करोड़ रुपए से भी अधिक की रंगदारी को लेकर खूनी खेल चलता रहता है। पिछले तीन दशकों में 350 से भी ज्यादा लोगों की हत्याएं माफियाओं ने कर दी, जबकि छोटे-छोटे प्यादे तो लगभग रोज ही मारे जाते हैं। कोयलांचल में 40 वैध खदाने हैं, जबकि इससे कहीं अधिक अवैध खनन। इन वैध खदानों से लगभग 1.50 लाख टन कोयले का उत्पादन होता है, जबकि इस उत्पादन में लोडिंग, अनलोडिंग और तस्करी में लगभग 400 करोड़ रुपए की रंगदारी माफिया के गुर्गे करते हैं। वैसे पिछले 50 साल से कोयलांचल में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है, हर रोज एक छोटा गैंग उभरकर सामने आ जाता है। पर कोयलांचल में अभी भी ‘‘सिंह मेंशन’’ का ही दबदबा है, अब फर्क सिर्फ यह हो गया है कि सिंह मेंशन में भी बंटवारा हो गया और चारों भाईयों एवं उनके बेटों का अलग गैंग हो गया है।</p>
<p>खैर। कहने वाले तो कह रहे हैं कि इतने समय के बाद भी, इतने पैसे के बाद भी, इतनी हत्याओं के बाद भी, इतने नेताओं की उपस्थिति के बाद भी धनबाद में कोई ‘आमूल’ परिवर्तन नहीं हुआ। जिस अधिकारी के सेवा काल में सूर्यदेव सिंह पर कमान कैसा गया, सैकड़ों अधिकारी आये, दर्जनों डिप्टी कमिश्नर बदले गए, दर्जनों पुलिस अधीक्षक आये-गए; सैकड़ों – हज़ारों नेता बने, कोई पटना एक्सपोर्ट हुए तो कोई रांची और कोई दिल्ली।</p>
<p><strong>आगे जारी है &#8230;&#8230;&#8230;</strong></p>
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		<title>झरिया के सूर्यदेव सिंह &#8216;गलत&#8217; सिद्ध हुए, आज &#8216;दो&#8217; भाई की &#8216;दो&#8217; बहुएं चुनावी मैदान में हैं &#8216;झरिया पर आधिपत्य के लिए&#8217; (भाग-1)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 02 Nov 2024 07:29:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>झरिया (धनबाद), झारखंड: आज के झारखंड और कल के दक्षिण बिहार के धनबाद लोकसभा क्षेत्र के छः विधानसभा क्षेत्रों में एक झरिया विधानसभा क्षेत्र आज फिर गर्म है। इस क्षेत्र से चार बार विजयश्री का प्रमाण पत्र लेकर प्रदेश के विधानसभा में बैठे थे कोयला सरगना सूर्यदेव सिंह। बलिया के एक साधारण पहलवान से देश के एक [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>झरिया (धनबाद), झारखंड: आज के झारखंड और कल के दक्षिण बिहार के धनबाद लोकसभा क्षेत्र के छः विधानसभा क्षेत्रों में एक झरिया विधानसभा क्षेत्र आज फिर गर्म है। इस क्षेत्र से चार बार विजयश्री का प्रमाण पत्र लेकर प्रदेश के विधानसभा में बैठे थे कोयला सरगना सूर्यदेव सिंह। बलिया के एक साधारण पहलवान से देश के एक असाधारण विधायक होने वाले सूर्यदेव सिंह देश के बड़े-बड़े राजनीतिक नेताओं, मंत्रियों, अधिकारियों, पदाधिकारियों, विशेषज्ञों को अपने शब्दों और आर्थिक ताकतों से वसीभूत करने की क्षमता रखते थे। वचन के पक्के थे। मिलनसार थे। जिन पर विश्वास जम गया, उनके जीवन पर्यन्त हो गए। कुछ खास और कुछ अलग गुणों के स्वामी थे सूर्यदेव सिंह। आज उन गुणों की घोर किल्लत है सिंह मैन्सन में भी और झरिया विधानसभा क्षेत्र में भी &#8211; आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी। </strong></p>
<p>आज सूर्यदेव सिंह की बातें झरिया में गलत सिद्ध होते देख रहा हूँ। वे कहते थे कि उनके सभी भाइयों में आपसी तालमेल, सम्बन्ध खून से भी अधिक गहरा था और जीवन पर्यन्त गहरा रहेगा। अपने राजनितिक जीवन काल में घर-परिवार, गाँव, मोहल्ला, क़स्बा, अंचल की महिलाओं को राजनीति से मीलों दूर रखने वाले सूर्यदेव सिंह जैसे ही अंतिम सांस लिए, गाँव-परिवार के लोग झरिया पर कब्ज़ा करने, सत्ता ज़माने के क्रम में एक दूसरे से न केवल अलग हो गए, बल्कि एक दूसरे के खून के प्यासे भी हो गए। कुछ प्यास भी बुझाये। दोस्ती, मित्रता, विश्वास, अपनापन मीलों दूर चली गयी। </p>
<blockquote><p>सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद, विगत तीन दशकों में उनके ऐतिहासिक &#8216;सिंह मैन्सन&#8217; की एकीकृत शक्ति का सहस्त्र खंड होना, भाई-भाई का दुश्मन होना, दुश्मनी से झरिया का लहू-लहान होना, परिवार में पुरुषों की संख्या का उत्तरोत्तर कम होते जाना, झरिया विधानसभा क्षेत्र के साथ-साथ अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए परिवार की महिलाओं का राजनीतिक कुरुक्षेत्र में उतरना, उनकी बहुओं द्वारा सत्ता में वर्चस्व बनाने के लिए चाणक्य की नीतियों को व्यावहारिक रूप देना &#8211; आज एक गहन शोध का विषय हो गया है। बातों और तथ्यों को जब एक साथ देखता हूँ तो सूर्यदेव सिंह का अपने परिवार, परिवार के लोगों पर उनका विश्वास खंडित दिखता है। वे गलत थे, आज महसूस होता है।</p></blockquote>
<p>इसका ज्वलंत दृष्टांत है विगत दस वर्षों में आये तूफ़ान और उस तूफ़ान के कारण सूर्यदेव सिंह की बहु श्रीमती रागिनी सिंह और सूर्यदेव सिंह के भाई राजन सिंह की बहु श्रीमती पूर्णिमा सिंह का झरिया विधानसभा चुनाव में आमने-सामने होना। यह दूसरी बार है जब झरिया विधानसभा क्षेत्र में सत्ता पर कब्ज़ा करने के लिए सिंह परिवार की दो बहुएं आमने सामने हैं। आज झरिया का काला पत्थर भी भयभीत है कहीं सत्ता पर बर्चस्वता ज़माने के क्रम में उसके अपने रंग पर भी आंच न आ जाय। एक समय था जब सूर्यदेव सिंह से बात करने सिंह मैंशन जाते थे तो उन दिनों महिलाएं सामने वाले बैठकी में नहीं आती थी। प्रवेश &#8216;वर्जित&#8217; नहीं था, परन्तु सम्मान के कारण महिलाएं कक्ष में नहीं आती थी। आज समय बदल गया है। आज मुंबई सीनेमा उग्योग के साहूकार भी कलम खोले धनबाद कोयलांचल पर आधुनिक दृष्टि से कहानियां गढ़ रहे हैं। आखिर पैसे का सवाल है, नाम का सवाल है, शोहरत का सवाल है। इसे कहते हैं &#8211; समय। खैर। </p>
<p>उस दिन जमीन पर चतुर्दिक फैला कोयला भी धीरे-धीरे अपने शीत को समाप्त कर तप रहा था। अक्टूबर महीना का अंत हो गया था और कैलेण्डर पर नवम्बर महीने का पन्ना लटक गया था। मौसम में चुनावी हवा तो चल ही रहा था, प्राकृतिक हवा में भी बदला-बदला था। पुरुषों की मानसिक दशा में बदलाव नहीं हुआ था। भाई-भाई दुश्मन नहीं बने थे। गोलियों की बौछार नहीं होती थी। सबों के चेहरों पर मुस्कान था &#8211; प्रेम का, सम्मान का, आदर का। </p>
<p>उन दिनों मैं कलकत्ता से प्रकाशित &#8216;दी टेलीग्राफ&#8217; अखबार के लिए कार्य करता था। दफ्तर से नित्य फोन की घंटी बजती थी यह पूछने के लिए कि आज क्या-क्या कहानी है? अगर कोयलांचल और धनबाद में उन दिनों सूर्यदेव सिंह और उनके भाइयों की तूती बोलती थी, तो कलकत्ता से प्रकाशित दी टेलीग्राफ अखबार के शब्दों का सम्मान भी अपने उत्कर्ष पर था। अगर सूर्यदेव सिंह से लोग डरते थे, तो उस अखबार के शब्दों से भी बड़े-बड़े सूरमाओं की हेंकड़ी समाप्त हो जाती थी, चाहे कोयला माफिया हों, पुलिस अधिकारी हों, प्रशासन के लोग हों या कॉल इण्डिया के पदाधिकारी, दलाल हों।  </p>
<p>धनबाद जैसे शहर में मेरा निजी तौर पर कोई वजूद नहीं था। समाचार ढूंढने के क्रम में पैदल चल-चलकर दर्जनों चप्पल सड़क के किनारे फेंका था। हीरापुर स्थित धनबाद बुक डिपो में श्री गौतम की दूकान से दर्जनों कलम खरीदता था ताकि लिखते समय कलम बंद न हो जाय। उन दिनों कंप्यूटर महाशय का आगमन हुआ तो था, लेकिन हम जैसे पत्रकारों की पहुँच उन तक नहीं हुयी थी। कलम, कागज, टाइपराइटर, टेलीप्रिंटर, टेलेक्स यही साधन थे समाचार भेजने के लिए या फिर ट्रंक कॉल। अख़बार के पन्नों पर प्रकाशित समाचार के साथ मेरा नाम ही मेरा वजूद था, मेरी पहचान थी। और यही कारण था कि तत्कालीन समय में कोयलांचल के पर्यायवाची, जिनके पीठ पर लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के साथ-साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का भी हाथ था, मुझे बहुत सम्मान करते थे क्योंकि दी टेलीग्राफ अखबार में सच प्रकाशित होता था।   </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/rsz_dhanbad_surdev.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/rsz_dhanbad_surdev.jpg" alt="" width="2039" height="949" class="aligncenter size-full wp-image-5824" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/rsz_dhanbad_surdev.jpg 2039w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/rsz_dhanbad_surdev-300x140.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/rsz_dhanbad_surdev-1024x477.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/rsz_dhanbad_surdev-768x357.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/rsz_dhanbad_surdev-1536x715.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2039px) 100vw, 2039px" /></a></p>
<p><strong>उस दिन झरिया में सूर्यदेव सिंह के दफ्तर के बाहर कंधे पर आधुनिक बन्दूक और कमर में गोलियों का डरकश से सज्ज चौकन्ना सुरक्षाकर्मी और पहलवान जैसा व्यक्ति मुझे देखकर मुस्कुराये। उनकी हंसी में अनुशासन भी था और प्रशासन भी।  मैं भी मुस्कुराकर अभिवादन किया । अपने सहयोगियों से घीरे सूर्यदेव सिंह सामने की कुर्सी पर बैठे थे। वही शारीरिक भाषा। वही तेवर। चेहरे पर वही चमक। बाएं हाथ की कलाई पर चमकती घड़ी। सफ़ेद धोती, कुर्ता पहने धनबाद के सैकड़ों-हज़ारों कोयला मजदूरों के मसीहा बैठे थे। अपने  दाहिने हाथ की पहली और बूढ़ी उँगलियों को एक साथ सटाते – जैसे हम सभी एक चुटकी का संकेत देते हैं – दिखाते मुझे  बैठने का इशारा किये। आज समय और सोच में इतना बदलाव है कि झरिया कुरुक्षेत्र के चुनावी मैदान में खड़ी महिला अभ्यर्थीद्वय फोन और संवाद का भी जवाब नहीं देते। शायद इसी को परिवर्तन कहते हैं। खैर।  </strong></p>
<p>उस नवम्बर के पहले सप्ताह में कुछ क्षण में सबों से बातचीत कर उन्हें विदा किये और फिर मेरी और मुखातिब हुए। फिर एक क्षण रुके और कहे थे : “झाजी !!! उस दिन आप सवाल पूछे थे कि मैं संसद का चुनाव क्यों नहीं लड़ता जबकि धनबाद में मुझे चाहने वाले, समर्थकों की कमी नहीं है। संभव है कुछ प्रेम से वोट देंगे, कुछ भय से – लेकिन वोट तो आपको ही देंगे।&#8221; आपका प्रश्न बहुत ही सटीक था। आप उस प्रश्न में मेरे सम्पूर्ण व्यक्तित्व का चित्रण कर दिया। फिर वे कहे कि धनबाद में छः विधानसभा क्षेत्र हैं और एक लोक सभा क्षेत्र। लेकिन जब चुनाव आता है, पटना से दिल्ली तक सभी लोगों की निगाहें झरिया पर ही टिकी होती है। </p>
<p>सूर्यदेव सिंह का कहना था कि उनके लिए झरिया महज विधान सभा क्षेत्र नहीं है, बल्कि एक जीवन मुकाम है। एक घर है। एक परिवार है। यहाँ की मिट्टी में उन्हें, उनके परिवार, गाँव के लोग, समाज के लोग, सगे-सम्बन्धी ही नहीं, बल्कि कोयला क्षेत्र में सांस लेने वाला प्रत्येक मजदुर, उसका परिवार, उसके बाल-बच्चे पला है, बड़ा हुआ है, बड़ा हो रहा है। उनकी यह दुनिया भले झरिया विधान सभा के नाम से जाना जाता हो, लेकिन यही दुनिया उन सबों के लिए ब्रह्माण्ड है। इस ब्रह्माण्ड पर हज़ारों लोगों की निगाहें टिकी है। सभी झरिया पर राज करना चाहते हैं और हम चाहते हैं कि हम सभी, परिवार के लोग, झरिया के लोग, घनबाद के लोग मिलजुल कर, हंसी-ख़ुशी अपना-अपना कार्य कर जीवन यापन करें।</p>
<p>लेकिन आप ही बताएं कि जहाँ की मिट्टी में हम सभी पले, बड़े हुए, उसे छोड़कर सांसद क्यों बने? वैसे भी मैं भारतीय संसद के लिए नहीं बना हूँ। हम बिहार विधान सभा के लिए ही ठीक हैं, संतुष्ट हैं। सन 1990 के विधानसभा चुनाव के समय झरिया विधानसभा के अभ्यर्थी सूर्यदेव सिंह भी थी। सूर्यदेव सिंह तत्कालीन चुनाव से पूर्व तीन बार &#8211; 1977, 1980 और 1985 &#8211; में झरिया विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। सन नब्बे के विधानसभा चुनाव में भी वे विजय अभ्यर्थी के रूप में चुनाव का आधिकारिक रस्म पूरा कर रहे थे। </p>
<p>सूर्यदेव सिंह का कहना था कि उनके सभी भाइयों में बहुत एकता है। उनके लिए बिक्रमा सिंह, रामधारी सिंह, बच्चा सिंह, राजन सिंह सभी भाई ही नहीं, भाई से बढ़कर हैं। ह्रदय का रिश्ता है सबों में। सभी एक दूसरे के प्रति समर्पित हैं। हमारा खून का सम्बन्ध तो है ही, उससे भी बढ़कर भावनात्मक और संवेदनात्मक सम्बन्ध है। अगर हम सभी झरिया को छोड़ देंगे तो कोई और लपक लेगा। प्रकृति का यही नियम है। झरिया हमारी कर्मभूमि है। हम सबों की पहचान है। झरिया में हम सबों की परछाई साथ नहीं छोड़ती, बल्कि दिखती थी। </p>
<p>हम टकटकी निगाहों से उन्हें देख भी रहे थे और उनकी बातों को सुनते कागज पर लिख भी रहे थे। &#8216;दी टेलीग्राफ&#8217; अखबार की सम्पादकीय विभाग की एक खास विशेषता थी कि कहानी लिखने के क्रम में व्यक्ति विशेष की कुछ बातों को उन्हीं की भाषा में, उनके ही शब्दों में लिखा जाता था। फिर मैं बहुत ही शालीनता से उनसे पूछा कि अगर आप संसदीय चुनाव कभी नहीं लड़ना चाहते, तो यह मान लूँ की आप अरुण बाबू  (अरुण कुमार रॉय @ए के रॉय) को मदद कर रहे हैं? वे क्षणभर रुके और लंबी उच्छ्वास के साथ कहे:  “रॉय साहब बहुत ही सम्मानित हैं। शिक्षित हैं। एक अभियंता है। एक अधिवक्ता के पुत्र हैं। आज के युग में पढ़ा लिखा आदमी कहाँ किसी मजदुर के हक़ के लिए लड़ता है।” मैं सूर्यदेव सिंह का इशारा समझ गया था। </p>
<p>बीच-बीच में लोगों का, मजदूरों का, उनके शुभचिंतकों का, उनके समर्थकों का, आतंरिक-सूचना देने वालों का, खाकी वस्त्र पहने लोगों का, सफ़ेद कुरता-पैजामा पहने मूछों की निकलती रेखाओं जैसी नए-नए नेताओं का, मदद मांगने वालों का आना-जाना जारी था। कुछ पास जाकर अपनी बात कहते थे, तो कुछ कान में फुस-फुसाकर। सूर्यदेव सिंह उनके कार्यों को निष्पादित करने में तनिक भी बिलम्ब नहीं करते थे। लेकिन जैसे ही वह कार्य समाप्त होता था, मेरे साथ उनकी बातचीत का सिलसिला उन्ही शब्दों के साथ प्रारम्भ होता था, जहाँ के उसे छोड़े होते थे। सूर्यदेव सिंह का कहना था कि रॉय साहेब के साथ उनकी बहुत अधिक सैद्धांतिक मतभेद है और जीवन पर्यन्त रहेगा। लेकिन इस बात को भी तो इंकार नहीं किया जा सकता है वे उनके सामने अशिक्षित थे । रॉय साहब कोयला अंचल में बहुत शिक्षित मजदूर नेता थे । उनकी भाषा  और शब्द बहुत सुसज्जित थी । आप लिख लीजिये इस संसदीय चुनाव में राय साहब ही जीतेंगे। </p>
<p>ज्ञातव्य हो कि राय साहब के माता-पिता ब्रिटिश विरोधी कार्यकर्ता थे। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था। कारावास की सजा काटे थे। सन 1966-1967 में श्रमिकों की हड़ताल हुई और उस हड़ताल के समर्थन में राय बाबू नौकरी छोड़ मजदूरों के समर्थन में राजनीति में कदम रखे।  राय साहब कभी विवाह नहीं किये। कोयला क्षेत्र का मजदुर और उसका परिवार ही उनका परिवार था। वे झारखंड की क्षेत्रीय पार्टी मार्क्सवादी समन्वय समिति (एमसीसी) के संस्थापक तो थे ही, वे 1967, 1969 और 1972 में बिहार विधानसभा में सिंदरी सीट का प्रतिनिधित्व किया तथा 1977, 1980 और 1989 में भारतीय संसद (लोकसभा) में धनबाद लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया जब तक राम का नाम लिखा ईंट धनबाद में नहीं पदार्पित हुआ था और तत्कालीन पुलिस अधीक्षक आतंकवादियों के गोली के निशाने पर नहीं आये थे। उसके बाद तो राजनीति का भी राजनीतिकरण हो गया। </p>
<p>आज 34-वर्ष बाद जब सूर्यदेव सिंह की अन्तःमन की बातों को याद करता हूँ, उन शब्दों पर विचार करता हूँ, शोध करता हूँ और सोचता हूँ तो समस्त बातें, एक-एक शब्द गलत लगता है। यह भी सोचने पर विवश हो जाता हूँ कि अपनी अंतिम सांस के बाद सूर्यदेव सिंह अपने सभी रिश्तों के साथ अनंत यात्रा पर निकल गए। वेदना, संवेदना, भावना सभी उनके वियोग में सिंह मैन्सन में मिट्टी में मिल गए। अगर ऐसा नहीं होता तो सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद झरिया विधानसभा सहस्त्र विचारधाराओं के लोगों के हाथों नहीं फिसलता। करोड़ों आलोचना के बाद भी झरिया कोयला क्षेत्र के मजदूर, शिक्षित, अशिक्षित लोग सूर्यदेव सिंह के तरफ आशा की नजर से नहीं देखते। आज सिंह मैंशन की सोच बिलकुल भिन्न है। आज झरिया के मतदाता, लोग दुःखी हैं। </p>
<figure id="attachment_5825" aria-describedby="caption-attachment-5825" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/GbNoAghXEAEQ0t-.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/GbNoAghXEAEQ0t-.jpeg" alt="" width="2048" height="1366" class="size-full wp-image-5825" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/GbNoAghXEAEQ0t-.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/GbNoAghXEAEQ0t--300x200.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/GbNoAghXEAEQ0t--1024x683.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/GbNoAghXEAEQ0t--768x512.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/GbNoAghXEAEQ0t--1536x1025.jpeg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5825" class="wp-caption-text">कांग्रेस के श्रीमती पूर्णिमा नीरज सिंह (तस्वीर उनके X पृष्ठ से)</figcaption></figure>
<p><strong>आइए, वापस झरिया चलते हैं। सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद 1995 में श्रीमती आबो देवी (जनता दल) 45271 मतों से जीतकर विधायक हुई। अगले विधानसभा के चुनाव यानी 2000 चुनाव में सूर्यदेव सिंह के भाई बच्चा सिंह समता पार्टी के टिकट पर 56401 मतों से जीतकर झरिया विधानसभा के विधायक बने। इस चुनाव में आबो देवी (राष्ट्रीय जनता दल) को महज 14577 मत मिले। सन 2005 और 2009 के विधानसभा चुनाव में झरिया बच्चा सिंह के हाथ से फिसलकर सूर्यदेव सिंह की पत्नी श्रीमती कुन्ती सिंह के हाथ आ गयी। श्रीमती सिंह को क्रमश 43% और 40 % मत मिले थे। सन 2014 विधानसभा चुनाव में झरिया का भार माता कुंती अपने पुत्र संजीव सिंह को दे दी। </strong></p>
<p>अब तक सूर्यदेव सिंह का सिंह मैन्सन, जो कभी &#8216;जनता मजदूरों&#8217; के &#8216;संघ&#8217; के रूप में जाना जाता था, &#8216;भारतीय जनता पार्टी&#8217; के नाम से अंकित हो गया था। यह पहला &#8216;वैचारिक&#8217; और &#8216;राजनीतिक&#8217; पतन था सिंह मैंशन का। सूर्यदेव सिंह के कालखंड में जहाँ सिंह मैंशन सत्ता के गलियारे में एक निर्णायक भूमिका अदा करता था, कालांतर में अशिक्षा, बेहतर सोच, बेहतर लोगों के साथ बात-विचार की कमी के कारण अपने अस्तित्व को समेटने लगा, टकटकी निगाहों से प्रदेश और देश के राजनेताओं की ओर देखने लगा। श्रीमती कुंती सिंह दोनों बार भारतीय जनता पार्टी की  टिकट पर ही चुनाव जीती थी। इतना ही नहीं, सूर्यदेव सिंह के पुत्र संजीव सिंह भी 2014 में भाजपा के नाम पर ही चुनाव जीते थे। </p>
<p>इधर समय बदल रहा था। सन 2014 के चुनाव में भाजपा के संजीव सिंह का टकराव कांग्रेस के अभ्यर्थी नीरज सिंह के साथ हुई थी। नीरज सिंह श्री राजन सिंह के पुत्र थे और श्री राजन सिंह सूर्यदेव सिंह के अपने सगे भाई थे। उस चुनाव में कांग्रेस के नीरज सिंह को भले 26 % मत पड़े थे और भाजपा के संजीव सिंह को 48 % मत, लेकिन टकराव आमने-सामने था। राजनीतिक लड़ाई इस कदर बढ़ी कि भाई-भाई का दुशमन हो गया। 21 मार्च 2017 को नीरज सिंह की हत्या हो गयी । कहते हैं उन्हें 67 गोलियां मारी गई थी। संजीव सिंह अपने चचेरे भाई नीरज सिंह की हत्या करने में दोषी पाए गए। वर्तमान में वे कारावास में हैं।</p>
<p>नीरज सिंह धनबाद के डिप्टी मेयर भी थे। उनकी हत्या के साथ साथ चार और लोगों की हत्या हुयी थी। विगत दिनों झारखण्ड उच्च न्यायालय ने संजीव सिंह की जमानत याचिका को रद्द कर दिया।झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस रंजन मुखोपाध्याय की अदालत ने संजीव सिंह की ओर से दायर जमानत याचिका पर तीन दिन पहले सुनवाई की थी। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों को सुनने के बाद संजीव सिंह की जमानत पर फैसला सुरक्षित रख लिया गया था। अदालत इस मामले में 28 अक्टूबर को अपना फैसला सुनाने की बात कही थी। सूर्यदेव सिंह की बात यहाँ गलत सिद्ध हो गयी &#8211; सभी भाई संवेदनात्मक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हैं।</p>
<p>नीरज सिंह की हत्या के बाद उनकी पत्नी पूर्णिमा नीरज सिंह ने राजनीति में कदम रखा। उन्हें उनके दादा गिरीश नंदन सिंह भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी का आशीष मिला अपने जीवन निर्माण में। वे एक शिक्षिका भी रहीं। संचार-संवाद के क्षेत्र में स्नातकोत्तर की उपाधि भी ली। अपने पति के जीवनकाल में शायद अपने जीवन के बारे में कुछ और सोची होंगी, लेकिन समय कुछ और चाहता था। कहते हैं कि 38-वर्षीय पूर्णिमा सिंह सामाजिक क्षेत्र में स्वामी विवेकानंद और ईश्वरचंद्र विद्यासागर को भी अपना आदर्श मानती हैं। वहीं साहित्य के क्षेत्र में विलियम वडर्सवर्थ , रामधारी सिंह दिनकर, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, माखनलाल चतुर्वेदी, विलियम शेक्सपीयर, जॉन मिल्टन और रवीन्द्रनाथ ठाकुर उनके आदर्श हैं। </p>
<blockquote><p>2019 के चुनाव में झरिया विधानसभा में पहली बार दो महिला यानी सिंह मैन्सन की दो बहुएं &#8211; जेठानी और देवरानी &#8211; एक साथ झरिया की राजनीति में अपनी-अपनी किस्मत आजमाई थी &#8211; रागिनी सिंह और पूर्णिमा नीरज सिंह। सूर्यदेव सिंह के ज़माने में झरिया में महिला मतदाता तो थी, बहुत सम्मान करते थे सूर्यदेव सिंह और उनके सभी भाई, कार्यकर्त्ता; लेकिन महिला राजनीति में नहीं थी। पुरुषों का प्रभुत्व था। सन 2019 के चुनाव में ही झरिया में सूर्यदेव सिंह गलत सिद्ध हो गए। परंपरा आज भी जारी है। अगर सांख्यिकी को देखा जाय तो 2019 के चुनाव में कांग्रेस की पूर्णिमा नीरज सिंह को 79786 मत मिले थे (50.34 फीसदी), जबकि भाजपा के श्रीमती रागिनी सिंह को कुल 67732 मत (42.73 फीसदी) मिले थे। 2014 विधानसभा चुनाव में संजीव सिंह 74062 मत प्राप्त कर विजय हुए थे। अब सवाल यह है कि क्या आगामी 20 नवम्बर, 2024 को होने वाले चुनाव में श्रीमती रागिनी सिंह अपने प्रतिद्वंदी को हराने के लिए पिछले चुनाव का 8+ फीसदी कम मत को पूरा कर आगे बढ़ पाएंगी? क्या पूर्णिमा नीरज सिंह पिछले पांच वर्षों में कुछ ऐसे कार्य किये जिससे झरिया के मतदाता पुनः उन्हें चुने ? सवाल बहुत बड़ा है। </p></blockquote>
<figure id="attachment_5827" aria-describedby="caption-attachment-5827" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2.jpg" alt="" width="2048" height="1152" class="size-full wp-image-5827" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Ragini-singh2-1536x864.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5827" class="wp-caption-text">और भाजपा के श्रीमती रागिनी सिंह (तस्वीर उनके फेसबुक पृष्ठ से)<br /></figcaption></figure>
<p>बैंक मोड़ पर बैटरी से संचालित ऑटो चलने वाले ड्राइवर का कहना है कि &#8221;आखिर सिंह मैन्सन के लोग ही झरिया से चुनाव क्यों जीतें ? क्या अन्य समुदाय के लोग इस योग्य नहीं हैं? सन 1977 से 2024 तक प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से तो सिंह मैन्सन के लोग, कभी पुरुष, कभी महिला, कभी पुत्र तो कभी बहु &#8211; यही तो चुने गए हैं? ऐसा क्यों ? हम पिछले चार दशक से कभी रिक्सा चला रहे हैं, कभी चाय की दूकान चलकर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने में सक्षम नहीं हो पाए। तभी वह मोबाइल पर उन लोगों के द्वारा चुनाव आयोग को दिए गए संपत्ति का ब्यौरा दिखाते  कहता है कि हम गलत हो सकते हैं, क्या यह दस्तावेज गलत है ?</p>
<p>रागिनी सिंह और पूर्णिमा सिंह कुछ आधारभूत फ़र्क़ है, शैक्षिक, पारिवारिक आदि। सबसे बड़ा फ़र्क़ है सामाजिक। एक तरफ़ पूर्णिमा सिंह जिस परिवार से आती हैं वह बहुत शिक्षित है। स्वयं भी अच्छी पढ़ी लिखी हैं। लेकिन रागिनी सिंह के साथ ऐसी बात नहीं है। वे सामान्य परिवार से आती हैं। शिक्षा में भी हाथ कमजोर है। सामाजिक दृष्टि से दोनों के पति हादसे के शिकार हुए। रागिनी सिंह के साथ हुई घटना &#8211; उनके पति राजीव रंजन सिंह संदिग्ध अवस्था में गायब हुए, पुलिस जांच-पड़ताल हुई, सीबीआई की भी जांच हुई, लेकिन नहीं मिले &#8211; के बाद सूर्यदेव सिंह का पूरा परिवार खड़ा हो गया। अपनी भाभी के सम्मानार्थ घर के सभी लोग उनका विवाह राजीव रंजन के छोटे भाई संजीव के साथ करा दी। संजीव सिंह झरिया के विधायक रह चुके हैं। साथ ही, वर्तमान में वे अपने चचेरे भाई नीरज सिंह की हत्या के मामले में जेल में हैं। </p>
<p>जबकि रागिनी सिंह साधारण किसान परिवार की बेटी हैं। वैसे लोगों का कहना है कि पिछले हार के बाद रागिनी सियासत के हर रंग को समझने लगी है। अपने पति के छोटे भाई सिद्धार्थ गौतम को मजदूर की राजनीति में पिता जैसा सबल बनाने की कोशिश कर रही है। इतना ही नहीं, रामाधीर सिंह की पत्नी इंदू देवी का आशीर्वाद लेने में भी कामयाब रही हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या वे अपनी जेठानी की राजनीतिक शतरंजी चाल को चुनाव में पछाड़ सकने में सक्षम हैं? क्योंकि सूर्यदेव सिंह और आज के समय में बहुत परिवर्तन हो गया है। दूसरी और तीसरी पीढ़ी के लोग मतदाता बन गए हैं। कागज पर ही सही, शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ है, झरिया के लोग जब दूसरे शहरों में रोजी-रोजगार के लिए ही आते-जाते हैं तो उनकी सोच में बदलाव आया है। वैसी स्थिति में एक शिक्षित महिला और अशिक्षित महिला में प्रतिनिधि का चुनाव करना महत्वपूर्ण हो जाता है। </p>
<p>पीकेरॉय महाविद्यालय के एक पूर्व प्राध्यापक कहते हैं कि झारखंड में ८० विधान सभा की कुर्सी है। आप तो पुराने पत्रकार हैं, धनबाद के चप्पे चप्पे से वाक़िफ़ हैं। आख़िर भारत के संसद के लोग, राजनेता मंत्री धनबाद ही क्यों आते हैं? क्योंकि यहाँ पैसा है। चाहे विधायक हों या सांसद, सभी मतदाताओं को ठग रहे हैं। मतदाता भी निरीह है, गरीब है, अशिक्षित हैं। कोई भी नेता यह नहीं चाहता है. चाहे महिला हो या पुरुष, कि उसके क्षेत्र में शिक्षा को विकास हो। अगर शिक्षित होगा तो सोच बदलेगा &#8211; संभव है वह उनके पक्ष में मतदान नहीं करे। </p>
<p>जिला समाहरणालय में एक अधिवक्ता कहते है की जब तक हम वेदना और संवेदना राजनीतिक बाजार में बेचते रहेंगे राजनीति का यही हश्र होगा। उनका कहना है कि हम मतदाता की संवेदना के साथ खिलवाड़ करते आ रहे हैं। मतदाता के सामने कोई विकल्प नहीं छोड़ते। उसे अपने मत का सही उपयोग करने का भी अधिकार नहीं देते। हम कब तक ऐसे ही प्रतिनिधि को चुनते रहेंगे जिनका क्षेत्र के विकास में शून्य का योगदान हो। नब्बे के दशक में रणधीर वर्मा की शहादत को भुनाया गया लोक सभा के चुनाव में। आज झरिया में हत्या की संवेदना को भुनाया जा रहा है। झरिया हो या धनबाद या अन्यत्र, हत्याएं सभी जगह होती है लेकिन क्या सभी हत्यारे को सजा मिल पाती है या भुक्तभोगी के परिवार को चुनाव में टिकट दिया जाता है।  नहीं  ना !! राजनीतिक पार्टियां गिद्ध जैसा देखती रहती है कब किसी नामी व्यक्ति की हत्या हो जिससे उसके घर के किसी सदस्य को पार्टी का टिकट देकर विधानसभा और संसद में अपनी संख्या बधाई जाय। </p>
<p><strong>क्रमशः भाग-2 </strong></p>
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