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	<title>protein Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>​अंडा क्या जाने मुर्गी का क्या होगा? 😢 क्योंकि एक मुर्गी/मुर्गा 160/180 ग्राम प्रोटीन का मालिक होता है और भारत में तक़रीबन 73 फीसदी लोगों में प्रोटीन की कमी नहीं, किल्लत है 😢</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/business/about-73-of-people-in-india-have-protein-deficiency</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Apr 2025 04:27:21 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[व्यापार]]></category>
		<category><![CDATA[chicken]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मुर्गा मंडी &#8211; गाजीपुर (पूर्वी दिल्ली का अंतिम छोड़) : राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के पूर्वी छोड़ पर स्थित मुर्गा मंडी में देश की राजनीति अथवा बॉलीवुड के अदाकार और अदाकारा की बात नहीं होती। आर्थिक, समाजिक, राजनीतिक उठा-पटकों के बारे में कोई चर्चा नहीं करता। भारत के संसद से करीब 13 किलोमीटर और दिल्ली सचिवालय [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मुर्गा मंडी &#8211; गाजीपुर (पूर्वी दिल्ली का अंतिम छोड़) : राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के पूर्वी छोड़ पर स्थित मुर्गा मंडी में देश की राजनीति अथवा बॉलीवुड के अदाकार और अदाकारा की बात नहीं होती। आर्थिक, समाजिक, राजनीतिक उठा-पटकों के बारे में कोई चर्चा नहीं करता। भारत के संसद से करीब 13 किलोमीटर और दिल्ली सचिवालय से करीब 11 किलोमीटर दूर स्थित मुर्गा मंडी के इस बदबूदार इलाके में, जहाँ एक आम आदमी अपनी नाकों के ऊपर से रुमाल हटाकर सांस भी नहीं ले सकता, यहाँ के व्यापारी आम लोगों के, उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के बारे में चर्चा अवश्य करता हैं। एक मनुष्य को नित्य कितना प्रोटीन लेना चाहिए, इसके बारे में जिक्र अवश्य करता है। हरी सब्जियां पर व्यापारी और सब्जी मंडी के माफियाओं का वर्चस्व और बढ़ती कीमतों के कारण गले से उतरना आम लोगों की सोच से परे हो; लेकिन जिस पक्षी के नाम से यह मंडी अंकित है, यहाँ के अनपढ़, अशिक्षित व्यापारियों की भरसक कोशिश होती है कि देश के गरीब-गुरबों के बच्चों को &#8216;मुर्गा&#8217; या उसके अंग उपलब्ध अवश्य हों &#8211; क्योंकि कम कीमत पर इससे अधिक प्रोटीन अन्यत्र उपलब्ध नहीं हो सकता है, चाहे मुर्गों का पंख ही क्यों न हो । </strong></p>
<p>आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भारत में औसतन प्रति व्यक्ति चिकन मीट की खपत लगभग 5 से 6 किलोग्राम प्रति वर्ष है, लेकिन आज भी ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की तुलना में शहरी लोग चिकन का मांस अधिक खाते हैं। इतना ही नहीं, इंटरनेट के विकास के साथ, ग्रामीण क्षेत्रों के लोग भी अब &#8216;प्रोटीन&#8217; शब्द के जानकार हो गए हैं। वे यह जानते हैं कि चिकन का टंगरी भले न मिले, छाती, पैर का निचला हिस्सा, पंख को सिर्फ नमक और हल्दी के साथ उबालकर खाने या उस तरल को पीने से शरीर को प्रचुर मात्रा में प्रोटीन मिलता है, जो अनेकानेक बीमारियों का शर्तिया इलाज है। एक त्वचा रहित पका हुआ चिकन जांघ (111 ग्राम) में 27 ग्राम प्रोटीन होता है। यह प्रति 100 ग्राम 25 ग्राम प्रोटीन के बराबर है। चिकन जांघों में भी प्रति जांघ 195 कैलोरी होती है, या प्रति 100 ग्राम 176 कैलोरी। </p>
<p>दिलचस्प बात यह है कि चिकन के जांघों का रंग छाती से थोड़ा गहरा होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसके पैर अधिक सक्रिय होते हैं और उनमें अधिक मायोग्लोबिन होता है। यह अणु सक्रिय मांसपेशियों को ऑक्सीजन प्रदान करने में मदद करता है और उन्हें लाल भी बनाता है। चिकन को भले कई तरह से काटा जाय, लेकिन प्रति 100 ग्राम चिकन मांस में 24 से 32 ग्राम प्रोटीन प्रदान करता है। स्तन में सबसे अधिक प्रोटीन होता है। यह फिटनेस के प्रति उत्साही लोगों के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय है क्योंकि यह प्रोटीन का एक बड़ा स्रोत है। कहते हैं कि साल 2023 की तुलना में भले पोल्ट्री मीट की खपत में तनिक कमी हुई हो, भारत आज भी दुनिया में पोल्ट्री मीट के अग्रणी उत्पादकों में से एक है। यहाँ औसत आय और शहरी आबादी में वृद्धि के कारण पोल्ट्री की मांग में जबरदस्त वृद्धि हुई है और पिछले कुछ वर्षों में खपत में लगातार वृद्धि हुई है। विगत वर्ष, यानी 2024 में, भारत में पोल्ट्री मीट की खपत चार मिलियन मीट्रिक टन से अधिक पाई गई।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Screenshot-2025-04-22-at-9.41.54-AM.png"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Screenshot-2025-04-22-at-9.41.54-AM.png" alt="" width="1731" height="973" class="aligncenter size-full wp-image-6349" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Screenshot-2025-04-22-at-9.41.54-AM.png 1731w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Screenshot-2025-04-22-at-9.41.54-AM-300x169.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Screenshot-2025-04-22-at-9.41.54-AM-1024x576.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Screenshot-2025-04-22-at-9.41.54-AM-768x432.png 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Screenshot-2025-04-22-at-9.41.54-AM-1536x863.png 1536w" sizes="(max-width: 1731px) 100vw, 1731px" /></a></p>
<p>पोल्ट्री विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में पोल्ट्री की आबादी तेजी से बढ़ी है। 2003 में, भारत में पोल्ट्री और पशुधन की आबादी लगभग समान थी, लेकिन तब से पोल्ट्री क्षेत्र में तुलनात्मक रूप से बहुत अधिक वृद्धि हुई है। 2019 में, भारत में पोल्ट्री की आबादी 800 मिलियन से अधिक थी। यह पिछले पांच वर्षों में 16 प्रतिशत की वृद्धि थी। 2019 में, भारतीय राज्य तमिलनाडु में भारत में पोल्ट्री की सबसे बड़ी आबादी थी, जो 100 मिलियन से अधिक थी। सूत्रों के अनुसार, भारत ने अन्य देशों को 7,000 मीट्रिक टन से अधिक पोल्ट्री मांस का निर्यात किया।आज भी मान वृद्धि की ओर उन्मुख है। </p>
<blockquote><p>दिल्ली में प्रतिदिन लगभग 4 लाख मुर्गियों की खपत होने का अनुमान है। प्रमुख पोल्ट्री बाज़ार गाजीपुर मंडी प्रतिदिन लगभग 5 लाख ब्रॉयलर चिकन की आपूर्ति करता है।  यह मांग उत्तरोत्तर बढ़ रही है . इसका मुख्य कारण है स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होना। सूत्रों के अनुसार दिल्ली में प्रतिदिन लगभग 4 लाख मुर्गियों के साथ-साथ 10,000 बकरियाँ, 1,000 भैंसें और 500 सूअरों की आवश्यकता होती है। दिल्ली की ब्रॉयलर आवश्यकताओं की पूर्ति हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल से आपूर्ति द्वारा की जाती है।</p></blockquote>
<p>सूत्रों के अनुसार, महाराष्ट्र 2020 में चिकन मीट (632.32 सौ मीट्रिक टन) का अग्रणी उत्पादक था, जिसका प्रतिशत हिस्सा (15.57 प्रतिशत) था, उसके बाद हरियाणा (478.63 सौ मीट्रिक टन) का स्थान था, जिसका प्रतिशत हिस्सा (11.78 प्रतिशत) था। पश्चिम बंगाल (475.42 सौ मीट्रिक टन) और तमिलनाडु (467.51 सौ मीट्रिक टन) क्रमशः 11.70 प्रतिशत और 11.61 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ तीसरे और चौथे स्थान पर हैं। भारत में वर्ष 2021 में कुल पोल्ट्री मांस की खपत (4,107.00 हजार मीट्रिक टन) थी। पिछले वर्षों की तुलना में, 2013 से 2021 तक हर साल पोल्ट्री मांस की कुल खपत में वृद्धि हुई है। भारत सरकार के अनुसार, भारत अंडा उत्पादन के लिए दुनिया में तीसरे और चिकन मांस के लिए दुनिया में 5वें स्थान पर है। प्रति व्यक्ति अंडे की वार्षिक खपत 101 (डीएडीएफ) और चिकन मांस 4.8/5 किलोग्राम। </p>
<p><strong>मुर्गा मंडी में इस बात की चर्चा अधिक है कि चिकन मांस का सेवन निम्न आय वर्ग के लोगों में अधिक आम है। भारत की सबसे गरीब 20% आबादी के दस में से लगभग नौ लोग मांस खाते हैं, जबकि सबसे अमीर 20% लोगों में से दस में से लगभग सात लोग मांस खाते हैं। महिलाओं के बीच यह अंतर और भी ज़्यादा है, ख़ास तौर पर ग्रामीण इलाकों में। ग्रामीण भारत में सबसे अमीर समूह की महिलाओं में से सिर्फ आधे से ज़्यादा महिलाएं मांस खाती हैं, जबकि तीन-चौथाई पुरुष मांस खाते हैं। केवल चार राज्यों में शाकाहारी लोगों की बहुलता है &#8211; पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात। तटीय राज्यों में बहुत कम शाकाहारी हैं। हाल के दशकों में भारत की आर्थिक वृद्धि और सामाजिक सुधार कुपोषण के लगातार दोहरे बोझ के साथ-साथ मौजूद रहे हैं। पोषक तत्वों की कमी और कुपोषण देश में बौनेपन, मृत्यु और एनीमिया के लिए शीर्ष जोखिम कारकों में से रहे हैं आबादी के आहार की गुणवत्ता और पोषण संबंधी परिणामों को बेहतर बनाने के लिए आहार में पशु स्रोत खाद्य पदार्थों के उचित स्तरों को शामिल करना, विशेष रूप से कम संसाधन वाले देशों में बच्चों के लिए, कई अध्ययनों में उजागर किया गया है।</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Screenshot-2025-04-22-at-9.41.36-AM.png"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Screenshot-2025-04-22-at-9.41.36-AM.png" alt="" width="1444" height="757" class="aligncenter size-full wp-image-6350" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Screenshot-2025-04-22-at-9.41.36-AM.png 1444w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Screenshot-2025-04-22-at-9.41.36-AM-300x157.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Screenshot-2025-04-22-at-9.41.36-AM-1024x537.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Screenshot-2025-04-22-at-9.41.36-AM-768x403.png 768w" sizes="(max-width: 1444px) 100vw, 1444px" /></a></p>
<p>औसतन,  एक व्यक्ति मांस की वस्तुओं पर प्रति माह 216 रुपये खर्च करता है, जो कुल खाद्य व्यय का 10% है।  ग्रामीण क्षेत्रों में, औसत खर्च प्रति माह 200 रुपये से थोड़ा अधिक है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 250 रुपये प्रति माह के करीब है।भारत में मांस, मुर्गी, समुद्री भोजन और अंडे का व्यापक रूप से सेवन किया जाता है। 15-49 वर्ष की आयु के दस में से आठ लोग किसी न किसी रूप में पशु स्रोत प्रोटीन (डेयरी को छोड़कर) खाते हैं। मांस खाने वाले लोगों की की हिस्सेदारी पुरुषों में 87% है, जबकि महिलाओं में यह 75% है। पिछले कुछ वर्षों में, मांस खाने वाले भारतीय वयस्कों की हिस्सेदारी थोड़ी बढ़ी है, जो 2006 में 74% से बढ़कर 2021 में 80% हो गई है।</p>
<p>भारतीय आहार दिशानिर्देशों में आहार में अंडे और चिकन मांस को शामिल करने की सिफारिश की गई है। हालांकि, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय  के हालिया अनुमानों से पता चलता है कि भारत में प्रति व्यक्ति खपत प्रति वर्ष केवल 69 अंडे और 3.35 किलोग्राम चिकन है। भारत दक्षिण एशिया के अन्य देशों की तुलना में 24 महीने से कम उम्र के बच्चों में अंडे की खपत के सबसे कम प्रचलन वाले देशों में से एक है। यह माना जा रहा है कि ग्रामीण परिवार, विशेष रूप से गरीब परिवार प्रोटीन कुपोषण से पीड़ित थे, जिसकी विशेषता आमतौर पर बच्चों में विकास में कमी थी। मुर्गी पालन जीवन निर्वाह गतिविधि बन रही है। इतना ही नहीं, मुर्गी पालन ने मक्का और सोया किसानों को बेहतर मूल्य भी निर्धारित कर रहा है। </p>
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<p>मंडी में लोगों का मानना है कि वैसे देश में आज भी 60 प्रतिशत से अधिक आबादी का प्रमुख व्यवसाय है। पशुधन क्षेत्र ग्रामीण परिवारों के सामाजिक-आर्थिक विकास और पोषण सुरक्षा को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन, मुर्गी पालन पशुधन के महत्वपूर्ण घटकों में से एक बन गया है जो बड़े पैमाने पर रोजगार प्रदान कर रहा है। आंकड़ों के अनुसार, 2019 (20वीं पशुधन जनगणना) में मुर्गी पालन की कुल संख्या में 16.81% की वृद्धि हुई है और देश में कुल मुर्गी पालन की उपलब्धता 851.81 मिलियन है। 2020 में भारत में पोल्ट्री मांस की खपत 3.9 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक थी आज उत्कर्ष पर है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के कारण प्रोटीन युक्त भोजन की मांग और बेहतर उपभोक्ता क्रय शक्ति ने पोल्ट्री मांस की खपत में वृद्धि की है। पोल्ट्री मांस का उत्पादन और खपत भारत दुनिया में ब्रॉयलर मांस का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत में प्रति व्यक्ति चिकन मांस की खपत लगभग 3.1 किलोग्राम प्रति वर्ष होने का अनुमान है, जो कि विश्व औसत लगभग 17 किलोग्राम प्रति वर्ष की तुलना में कम है। </p>
<p><strong>वैसे जी एन घोष, जो पॉल्ट्री रिव्यू के संपादक हैं, का मानना है कि वर्तमान प्रशासन पोल्ट्री उद्योग के प्रति अपने दृष्टिकोण में एक तरह की ढुलमुल नीति प्रदर्शित करता है। भारत में पोल्ट्री फार्मिंग देश में लाखों लोगों की प्रोटीन संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए अंडे और चिकन मीट जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थों के उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, इस उद्योग को संघ और राज्य दोनों स्तरों पर असंगत सरकारी नीतियों से चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जो अक्सर एक अस्पष्ट और जटिल विनियामक वातावरण बनाते हैं।&#8217; उनके अनुसार, &#8216;हाल के घटनाक्रमों ने अधिकारियों द्वारा प्रदूषण को नियंत्रित करने और पशुओं के प्रति क्रूरता को रोकने के प्रयासों को उजागर किया है, जो अक्सर पोल्ट्री क्षेत्र को लक्षित करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में, पोल्ट्री किसानों को प्रदूषण को नियंत्रित करने या पशु कल्याण सुनिश्चित करने के लिए नियामक निकायों से विभिन्न दंड और निष्कासन आदेशों का सामना करना पड़ा है। इसने पोल्ट्री फार्मिंग में शामिल लोगों के लिए महत्वपूर्ण बाधाएँ पैदा की हैं। एक विरोधाभासी कदम में, केंद्र और कई राज्य सरकारों ने हाल ही में ग्रामीण जिलों में छोटे पैमाने के पोल्ट्री फार्मों के लिए पर्याप्त समर्थन और सब्सिडी शुरू की है। इन पहलों का उद्देश्य व्यक्तियों को घरेलू पोल्ट्री फार्मिंग में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना है, जो देश के बढ़ते पोल्ट्री उद्योग में योगदान दे।&#8217;</strong></p>
<p>वे मानते हैं कि &#8216;हालांकि, इन उद्यमों को कड़े सरकारी नियमों का पालन करना होगा, भले ही कई किसानों के पास पर्यावरणीय प्रभावों के प्रबंधन में सीमित अनुभव हो। प्रदूषण नियंत्रण इन उद्यमियों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। राज्यों में एक समान नीति की कमी भ्रम को बढ़ाती है, क्योंकि प्रदूषण नियंत्रण नियम एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में काफी भिन्न होते हैं। यह असंगतता अक्सर नियमों की प्रभावशीलता और निष्पक्षता के बारे में सवाल उठाती है, जिससे प्रशासन का कम अनुकूल पक्ष सामने आता है। जटिल और कभी-कभी विरोधाभासी नीतियाँ पोल्ट्री किसानों के लिए बाधाएँ पैदा करती हैं, जो अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग आवश्यकताओं को पूरा करने और अनुपालन बनाए रखने के लिए संघर्ष करते हैं।&#8217;</p>
<p>बहरहाल, वित्त वर्ष 2023 में, भारत भर में पशुधन क्षेत्र में पोल्ट्री मांस से जोड़ा गया सकल मूल्य 1.8 ट्रिलियन भारतीय रुपये से अधिक था। पिछले वित्तीय वर्षों की तुलना में यह उल्लेखनीय वृद्धि थी। उसी वर्ष मांस उत्पादों का कुल GVA लगभग चार ट्रिलियन भारतीय रुपये था। सूत्रों के अनुसार, सामाजिक और धार्मिक समूहों के अनुसार उपभोग के पैटर्न भी अलग-अलग होते हैं। खान-पान की आदतों में धर्म की भी भूमिका होती है। लगभग सभी मुस्लिम (99%), ईसाई (99%) और बौद्ध/नव-बौद्ध (97%) आबादी मांस खाती है। हिंदुओं में, तीन-चौथाई से थोड़ा ज्यादा लोग मांस खाते हैं, जबकि जैन और सिखों में शाकाहारियों की संख्या सबसे ज़्यादा है। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों में, क्रमशः 87% और 88% लोग मांस खाते हैं, जबकि अन्य समूहों में यह आंकड़ा 72% है।</p>
<p><strong>ग्रामीण परिवारों में, मांस पर खाद्य व्यय का हिस्सा आय के साथ बढ़ता है। कुछ राज्यों में औसत खाद्य व्यय का एक बड़ा हिस्सा मांस पर खर्च होता है। उदाहरण के लिए, पूर्वोत्तर राज्य अपने खाद्य बजट का लगभग 20-25% हिस्सा अंडे, मछली और मांस पर खर्च करते हैं &#8211; जो देश में सबसे ज्यादा है। पश्चिम बंगाल और केरल में खाद्य बजट का 20% से ज़्यादा हिस्सा मांस पर खर्च होता है। दरअसल, केरल, गोवा और नागालैंड में मांस पर खर्च सब्जियों पर खर्च से दोगुना है। हालाँकि, शहरी क्षेत्रों में, यह प्रवृत्ति उलट है, जहाँ सबसे धनी समूह मांस की वस्तुओं पर शुद्ध खाद्य व्यय का एक छोटा हिस्सा खर्च करते हैं। कुछ राज्यों में औसत खाद्य व्यय का एक बड़ा हिस्सा मांस पर खर्च होता है। उदाहरण के लिए, पूर्वोत्तर राज्य अपने खाद्य बजट का लगभग 20-25% हिस्सा अंडे, मछली और मांस पर खर्च करते हैं &#8211; जो देश में सबसे ज़्यादा है। पश्चिम बंगाल और केरल में खाद्य बजट का 20% से ज़्यादा हिस्सा मांस पर खर्च होता है। दरअसल, केरल, गोवा और नागालैंड में मांस पर खर्च सब्जियों पर खर्च से दोगुना है।</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/business/about-73-of-people-in-india-have-protein-deficiency">​अंडा क्या जाने मुर्गी का क्या होगा? 😢 क्योंकि एक मुर्गी/मुर्गा 160/180 ग्राम प्रोटीन का मालिक होता है और भारत में तक़रीबन 73 फीसदी लोगों में प्रोटीन की कमी नहीं, किल्लत है 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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