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	<title>property Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>​​अगर &#8216;कागज सही है&#8217; तो &#8216;महारानियों की मृत्यु के बाद संपत्ति महाराजा के भतीजे शुभेश्वर सिंह (अब दिवंगत) के संतानों को मिलेगा&#8217;, लेकिन &#8216;नेपथ्य में कुछ और हो रहा है&#8217; </title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 30 Apr 2026 11:52:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / दरभंगा : &#8220;एंड व्हेरेऐज आई हैव नो इस्सू&#8221; इस छः शब्दों को अपने वसीयत के दूसरे पन्ने पर लिखते, लिखाते समय दरभंगा के अंतिम महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की आत्मा &#8220;दो-फांक&#8221; में अवश्य हो गयी होगी। परन्तु, महाराजाधिराज अपनी उस वसीयत में जिस प्रकार बहुत ही प्रमुखता, सम्मान, अपनापन के साथ यह [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/when-maharaja-darbhanga-soad-painfully-and-whereas-i-have-no-issue">​​अगर &#8216;कागज सही है&#8217; तो &#8216;महारानियों की मृत्यु के बाद संपत्ति महाराजा के भतीजे शुभेश्वर सिंह (अब दिवंगत) के संतानों को मिलेगा&#8217;, लेकिन &#8216;नेपथ्य में कुछ और हो रहा है&#8217; </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / दरभंगा : &#8220;एंड व्हेरेऐज आई हैव नो इस्सू&#8221; इस छः शब्दों को अपने वसीयत के दूसरे पन्ने पर लिखते, लिखाते समय दरभंगा के अंतिम महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की आत्मा &#8220;दो-फांक&#8221; में अवश्य हो गयी होगी। परन्तु, महाराजाधिराज अपनी उस वसीयत में जिस प्रकार बहुत ही प्रमुखता, सम्मान, अपनापन के साथ यह उद्धृत किये कि &#8220;मेरे सबसे करीबी, मेरी अपनी दो पत्नियां हैं &#8211; महारानी राज्यलक्ष्मी और महारानी कामसुंदरी और मेरे दिवंगत भाई राजा बहादुर बिशेश्वर सिंह के तीन पुत्र &#8211; राज कुमार जीवेश्वर सिंह, राज कुमार येणेश्वर सिंह और राजकुमार शुभेश्वर सिंह, जिसमें पहला सबसे बड़ा है और शेष दो अभी नाबालिग है&#8221;; आज की स्थिति में शायद ही कोई लिखता होगा, अपने भतीजों को &#8216;अपना&#8217; कहता होगा, अपने सगे-सम्बन्धियों को &#8216;अपना स्वीकारता&#8217; होगा। </strong></p>
<p>लेकिन महाराजाधिराज की मृत्यु के 64-साल और उनकी तीसरी महारानी कामसुंदरी देवी की 12 जनवरी, 2026 को अंतिम सांस लेने के 89-वें दिन (10 अप्रैल 2026) को बिहार सरकार के राजस्व और भूमि सुधार विभाग में महारानी की सम्पत्तियों पर आधिपत्य ज़माने के लिए शतरंज का गोटी बिछना शुरू हो गया था। अगर ऐसा नहीं होता तो पीआर-001312 (राजस्व)/2026-27 संख्या से अरविन्द कुमार, सरकार के अवर सचिव के नाम से सार्वजनिक सूचना जारी नहीं होता। इस अधिसूचना के निर्गत होने के तारीख के नौवें दिन, अर्थात 18 अप्रैल 2026 को बिहार के प्रादेशिक अख़बारों में प्रकाशित नहीं होता। कोई तो है, कुछ तो कारण है जो नेपथ्य से कार्य कर रहा है। </p>
<blockquote><p>पटना सचिवालय के साथ-साथ दरभंगा जिला के राजस्व और भूमि सुधार विभाग के &#8216;होठ सिले कर्मचारियों&#8217; का कहना है कि &#8216;वे सभी बहुत ही छोटे-छोटे कर्मचारी हैं। यह बड़े-बड़े (शिक्षा से नहीं, अपितु धन से) लोगों, अधिकारियों, नेताओं का खेला है। यह कहना बहुत मुश्किल है कि कौन-कौन लोग इस खेला में खिलाड़ी हैं। लेकिन एक बात तो तय है कि महाराजा की सम्पत्तियों पर सबकी निगाहें गिद्ध जैसी लगी है। हो भी क्यों नहीं। मुफ्त की संपत्ति है। सभी अपनी-अपनी पारी खेल रहे हैं।&#8221;</p></blockquote>
<p>जिस दिन पटना के राजस्व विभाग में इस अधिसूचना को अख़बारों में प्रकाशित करने संबधी आदेश पर हस्ताक्षर हुआ था, बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुख्यमंत्री कार्यालय से निकलने के लिए सज्ज हो रहे थे। तारीख 10 अप्रैल 2026 था। उस समय बिहार का राजस्व और भूमि सुधार विभाग उनके मंत्रिमंडल में भारतीय जनता पार्टी के उप-मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा के पास था। नितीश कुमार 14 अप्रैल को त्यागपत्र दिए। अगले दिन, यानी 15 अप्रैल 2026 को भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री पद का शपथ लिए और राजस्व तथा भूमि सुधार विभाग के साथ-साथ 29 अन्य विभागों को अपने पास रखे। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने के तीसरे दिन, यानी 18 अप्रैल 2026 को प्रादेशिक अख़बारों में यह विज्ञापन प्रकाशित हुआ।</p>
<p><strong>ज्ञातव्य हो कि तत्कालीन जिलाधिकारी, दरभंगा के प्रतिवेदन के अनुसार स्थिति इस प्रकार थी: अंतिम दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह की मृत्यु दिनांक 1-10-1962 को हुई। मृत्यु के पूर्व 05-07-1961 को उन्होंने एक वसीयत बनाया था ,जिसके अनुसार तीन अनुसूचियों के अनुरूप अपनी संपत्तियों को बांटे। वसीयत के अनुसार ⅓ हिस्सा पब्लिक चैरिटेबल के उद्देश्य से दिया गया था। बाद में महाराज के कई पारिवारिक सदस्यों ने कई मुकदमे महाराज के पैतृक कोर्ट ( कलकत्ता उच्च न्यायालय ) में किये। अंततः यह मामला माननीय उच्चतम न्यायालय में गया और 05-10-1987 को फॅमिली सेटलमेंट हुआ। इस सेटलमेंट के अनुसार रेसिडुअरी एस्टेट के पब्लिक चैरिटेबल कार्य हेतु जो संपत्ति रखी गयी, उसमे प्रश्नगत भूमि भी शामिल है। रेसिडुअरी एस्टेट में वर्णित सम्पत्ति की देख – भाल ट्रस्ट के द्वारा किए जाने की व्यवस्था थी। रेसिडुअरी एस्टेट में जो सम्पति चैरिटेबल प्रॉपर्टी के लिए रखी गयी थी, उसकी व्यवस्था महाराजा कामेश्वर सिंह चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा की जानी चाहिए थी। बाद में, 25-03-1992 को ट्रस्टी ने महाराजा कामेश्वर सिंह चैरिटेबल ट्रस्ट और दरभंगा निबंधन कार्यालय में एक डीड कार्यान्वित किया, जिसमें ट्रस्ट का एम्स एवं ऑब्जेक्ट निर्धारित किया गया।</strong></p>
<p>महाराजाधिराज की मृत्यु के 26 वर्ष बाद, 27 मार्च, 1987 को सम्बद्ध लोगों के बीच हुए फेमिली सेटेलमेंट को लेकर दायर अपील को सर्वोच्च न्यायालय दिनांक 15 अक्टूबर, 1987 को &#8220;डिक्री&#8221; देते हुए ख़ारिज कर दिया। तदनुसार, फेमिली सेटेलेमनट के क्लॉज 1 के अनुसार, सिड्यूल II में वर्णित शर्तों को मद्दे नजर रखते, महारानी अधिरानी कामसुन्दरी सिड्यूल II में उल्लिखित सभी सम्पत्तियों की स्वामी बन गयी। स्वाभाविक है, उन सम्पत्तियों पर उनका एकल अधिकार हो गया। </p>
<p><strong>इसी तरह, फॅमिली सेटलमेंट के क्लॉज 2 के अनुसार, कुमार शुभेश्वर सिंह के दोनों पुत्र, यानी राजेश्वर सिंह, जो उस समय बालिग हो गए थे, और उनके छोटे भाई, कपिलेश्वर सिंह, जो उस समय नाबालिग थे, शेड्यूल III में वर्णित शर्तों को मद्दे नजर रखते शेड्यूल III में उल्लिखित संपत्तियों के मालिक हो गए। आगे इसी तरह, फैमिली सेटेलमेंट के क्लॉज 3 के अंतर्गत शेड्यूल IV में वर्णित सभी नियमों के अनुरूप में सभी शेड्यूल IV में उल्लिखित सम्पत्तियों का मालिक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टी हो गए। फेमिली  सेटेलमेंट के क्लॉज 5 के अधीन, श्रीमती कात्यायनी देवी, श्रीमती दिव्यायानी देवी, श्रीमती नेत्रयानी देवी (कुमार जीवेश्वर सिंह के सभी बालिग पुत्रियां) और सुश्री चेतना दाई, सुश्री दौपदी दाई, सुश्री अनीता दाई (कुमार जीवेश्वर सिंह के सभी नाबालिग पुत्रियां), श्री रत्नेश्वर सिंह, श्री रश्मेश्वर सिंह (उस समय मृत), श्री राजनेश्वर सिंह (कुमार याजनेश्वर सिंह) सिड्यूल V में उनके नामों के सामने उल्लिखित, साथ ही, उसी शेड्यूल में उल्लिखित शर्तों के अनुरूप, सम्पत्तियों के मालिक होंगे।</strong></p>
<p>फेमिली सेटेलमेंट के क्लॉज 5 के तहत, पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टीज को यह अधिकार दिया गया कि वे सिड्यूल I में वर्णित &#8216;लायबिलिटीज&#8217; को समाप्त करने के लिए, सिड्यूल VI में उल्लिखित सम्पत्तियों को बेचकर धन एकत्रित कर सकते हैं, साथ ही, परिवार के लोगों में फेमिली सेटेलमेंट के अनुरूप शेयर रखने का अधिकार दिया गया। साथ ही, फेमिली सेटेलमेंट के क्लॉज 6 के अनुसार, महारानी अधिरानी कामसुंदरी और राज कुमार शुभेश्वर सिंह या उनके नॉमिनी (दूसरे क्षेत्र के लाभान्वित लोगों के प्रतिनिधि) द्वारा बनी एक कमेटी लिखित रूप से संपत्तियों की बिक्री, शेयरों का वितरण आदि से संबंधित निर्णयों को लिखित रूप में ट्रस्टीज को देंगे जहाँ तक व्यावहारिक हो, परन्तु किसी भी हालत में पांच वर्ष से अधिक नहीं या फिर न्यायालय द्वारा जो भी समय सीमा निर्धारित हो।<br />
इसी फैमिली सेटलमेंट के शेड्यूल iv के अनुसार न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशन्स लिमिटेड के 100 रुपये का 5000 शेयर दरभंगा राज के रेसिडुअरी इस्टेट चेरिटेबल कार्यों के लिए अपने पास रखा। कोई 20,000 शेयर अन्य लाभान्वित होने वाले लोगों द्वारा रखा गया &#8211; मसलन: 100 रुपये मूल्य का 7000 शेयर (रुपये 7,00,000 मूल्य का) महरानीअधिरानी कामसुन्दरी साहेबा को मिला।  राजेश्वर सिंह और कपिलेशर सिंह (पुत्र: कुमार शुभेश्वर सिंह) को 7000 शेयर, यानी रुपये 7,00,000 मूल्य का इन्हे मिला। </p>
<p>महाराजा कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट को 5000 शेयर, यानी रुपये 5,00,000 का मिला। श्रीमती कात्यायनी देवी को 100 रुपये मूल्य का 600 शेयर, यानि 60000 मूल्य का मिला। इसी तरह श्रीमती दिब्यायानी देवी को भी 100 रुपये मूल्य का 600 शेयर, यानि 60000 मूल्य का मिला। रत्नेश्वर सिंह, रामेश्वर सिंह और राजनेश्वर सिंह को 100 रुपये मूल्य का 1800 शेयर, यानि 180000 मूल्य का मिला। जबकि नतरयाणी देबि, चेतानी देवी, अनीता देवी और सुनीता देवी को 100 रुपये मूल्य का 3000 शेयर, यानि 3,00,000 मूल्य का मिला। यह सभी शेयर उन्हें इस शर्त पर दिया गया कि वे किसी भी परिस्थिति में अपने-अपने शेयर को किसी और के हाथ नहीं हस्तानांतरित करेंगे, सिवाय फेमिली सेटेलमेंट के लोगों के।</p>
<figure id="attachment_7700" aria-describedby="caption-attachment-7700" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-9.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-9.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7700" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-9.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-9-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-9-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-9-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-9-1026x1536.jpg 1026w" sizes="(max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7700" class="wp-caption-text">महाराजा की तीसरी और अंतिम पत्नी (दिवंगत) महारानी काम सुंदरी देवी</figcaption></figure>
<p><strong>अब आइये बिहार सरकार के विज्ञापन पर </strong></p>
<p>विज्ञापन के अनुसार: सार्वजनिक सूचना यह है कि जहाँ यह प्रतिवेदन एवं अभिलेखों से परिलक्षित है कि दरभंगा राज के तत्कालीन महाराजा सर कामेश्वर सिंह द्वारा  द्वारा  विधि सम्मत वसीयत (विल) के अधीन उनकी चल एवं अचल संपत्तियां उनकी दो महारानियों,, कुछ निकट सम्बन्धियों एवं पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट हेतु प्राप्त हुयी थी। </p>
<p>* और जहाँ महाराजा की अंतिम जीवित पत्नी महारानी कामसुन्दरी देवी का निधन 12-01-2026 को निःसंतान अवस्था में हो गया है। <br />
* और जहाँ विभागीय अभिलेखों, उपलब्ध साख्यों एवं अब तक की जांच के आधार पर यह तथ्य स्थापित होता है कि उक्त अंतिम महारानी द्वारा निष्पादित किसी वैद्य वसीयत का कोई अभिलेख या प्रमाण उपलब्ध नहीं है। <br />
* और जहाँ उपलब्ध साख्यों एवं अब तक की जांच के आधार पर यह तथ्य स्थापित होता है कि राज दरभंगा के तत्कालीन महाराजा के वसीयत नामा के प्रोबेट के पश्चात् कई दशकों से कई न्यायालयीय वाद विभिन्न बेनिफिसियरीज एवं ट्रस्टीज के बीच चल रहा है। <br />
* यह की विवादों के निपटारे हेतु माननीय सर्वोच्च न्यायालय में वर्ष 1987 में विभिन्न पक्षकारों के बीच हुए पारिवारिक समझौतों के आधार पर डिक्री हुयी, तथापि अद्यतन परिवारिक समझौताभी पूर्णतः लागू नहीं हो सका। <br />
* और जहां उपर्युक्त परिस्थितियों में यह प्रथम दृष्टया (प्रेम फेसी ) प्रतीत होता है कि स्वर्गीय महारानी कामसुन्दरी देवी को प्राप्त चल-अचल संपत्ति बिना वैद्य उत्तराधिकारी के अवस्थित है तथा महाराजा की वसीयत एवं तदोपरांत परिपरिक समझौतों के उपरांत माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित डिक्री का क्रियान्वयन पूर्ण नहीं हुआ है, तथा राज दरभंगा की परिसंपत्तियों के निर्विवाद वारिस नहीं है, तथा महाराजा कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट एवं अन्य ट्रस्ट का प्रबंधन, सम्बंधित ट्रस्ट डीड, भारतीय ट्रस्ट अधिनियम  एवं अन्य लागू विधियों के अधीन होना परीक्षण का विषय है। <br />
* और जहाँ, सरकार का यह समाधान हो गया है की उक्त स्थिति में स्वर्गीय महारानी कामसुंदरी देवी को महाराजा के वसीयत नामा / पारिवारिक समझौते से प्राप्त होने वाली चल-अचल संपत्ति, राज दरभंगा के विभिन्न ट्रस्टों से सम्बंधित संपत्ति तथा कोषागार एवं बैंकों में रखी गयी संपत्ति, जो बिहार राज्य में एवं राज्य की अधिसीमा से बाहर भी स्थित है, principle of escheat / bona vacantia के अंतर्गत राज्य निहित हो सकती है। <br />
* यह कि इस लोक सूचना के माध्यम से सर्व साधारण को सरकार के इस विषय पर लोकहित में इरादा।/ नियत स्पष्ट की जा रही है। <br />
* यह कि इस लोक सूचना द्वारा सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि कोई भी व्यक्ति, संस्था, ट्रस्ट जो उपर्युक्त सम्पत्तियों पर उत्तराधिकार, स्वामित्व अथवा अन्य विधिक अधिकार का दावा करता / करती हों, वह साख्यों  / दस्तावेजों की अभिप्रमाणित प्रति के साथ सूचना के प्रकाशन के 30 दिनों के भीतर  निम्न पते पर अपना दावा उपस्थित होकर / निबंधित डाक के माध्यम से प्रस्तुत करें। </p>
<p><strong>कार्यालय प्रधान सचिव <br />
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग <br />
बिहार पटना <br />
पुराना सचिवालय <br />
पटना &#8211; 15 </strong> </p>
<p>निर्धारित अवधि में यदि दावा नहीं प्राप्त होता है अथवा प्राप्त दावा विधि सम्मत एवं संतोषजनक नहीं पाया जाता है तो संबंधित सम्पत्तियाँ विधि के अनुसार राज्य सरकार में  escheat / bona vacantia के रूप में वेस्ट होने हेतु आवश्यक अग्रेतर कार्रवाई की जाएगी। </p>
<p><strong>अरविन्द कुमार <br />
सरकार के अवर सचिव </strong></p>
<figure id="attachment_7701" aria-describedby="caption-attachment-7701" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-5.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7701" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7701" class="wp-caption-text">रत्नेश्वर सिंह अपनी परदादी महारानी काम सुंदरी देवी (जब जीवित थी) के साथ<br />​</figcaption></figure>
<p><strong>आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम</strong> महाराजा के अनुज राजबहादुर विश्वेश्वर सिंह के सबसे छोटे पुत्र कुमार शुभेश्वर सिंह के पुत्र <strong>कुमार कपिलेश्वर सिंह</strong>, जो  दरभंगा राज की संपत्तियों के मालिक हैं, संपर्क करने की कोशिश किया। लेकिन विफल रहा। उन्हें ईमेल के माध्यम से भी इस विषय पर अपना मंतव्य कहने को  कहा, विफल रहा। इनके बड़े भाई <strong>राजेश्वर सिंह</strong> का संपर्क प्राप्त नहीं होने के कारण उन तक नहीं पहुँच सका। इस बीच दरभंगा राज के तीसरी पीढ़ी के वंशजों में सबसे बड़े पुत्र <strong>रत्नेश्वर सिंह</strong> से संपर्क करने पर उन्होंने कहा कि <strong>&#8220;कोई मिस्चिफ करना चाह रहा है। बिहार सरकार के राजस्व और भूमि सुधार द्वारा जारी यह अधिसूचना &#8216;इरेलीवेंट&#8217; है। हम सभी इसका जवाब दे दिए हैं। बिहार सरकार जवाब पर विचार जरूर करेगी, अगर ऐसा नहीं हुआ, तो हम सभी सरकार के इस अधिसूचना के खिलाफ न्यायालय जायेंगे।&#8221;</strong></p>
<p>कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत झा को महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह के इस वसीयतनामा को लागू करने का एकमात्र अधिकार दिया गया । मिथिलांचल के लोगों का मानना है कि अगर महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह का अपना कोई संतान होता, अथवा किसी को भी अपना उत्तराधिकारी घोषित कर देते, तो शायद दरभंगा राज की सम्पत्तियों का उनकी मृत्यु के पश्चात जो हश्र हुआ, वह नहीं होता। मिथिलांचल की स्थिति गर्त में पहुंची, वह नहीं अग्रसर होती। वसीयतनामा के लागु होने के बाद, अनेकानेक ट्रस्टों के निर्माण के बाद, जो-जो महानुभाव उसके कर्ता-धर्ता बने, सदस्य बने, संरक्षक बने, कोई भी महाराजाधिराज की आर्थिक, मानसिक, सामाजिक, राजनीतिक, मानवीय, सांस्कृतिक गरिमा को एक कदम भी आगे ले जाने में सफल नहीं हुए। वजह था &#8211; सोच की किल्लत और सम्पत्तियों पर एकाधिकार ज़माने का होड़ ।</p>
<p>महाराजाधिराज की मृत्यु पहली अक्टूबर, 1962 को हुई। कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा 27 जून, 1963 को न्यायमूर्ति श्री लक्ष्मीकांत झा को एकमात्र एस्क्यूटर घोषित किया गया। मिथिलांचल के बड़े-बुजुर्ग, जिन्होंने महाराजाधिराज के समय-काल का प्रथम दृष्टा रहे हैं, उनके क्रिया-कलापों को देखे हैं, भले स्वीकार करें अथवा नहीं; लेकिन आज की पीढ़ी इस बात को कतई मानने को तैयार नहीं होगी कि महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद राज परिवार के लोगों ने महाराजा द्वारा स्थापित विरासतों को आगे बढ़ाने की कोशिश किये।</p>
<p><strong>महाराजा की नजर में कुमार शुभेश्वर सिंह </strong></p>
<p><strong>दस्तावेज भी गवाह है की महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की नजर में राजकुमार शुभेश्वर सिंह का क्या महत्व था। दस्तावेजों को उद्धृत करते सूत्र का कहना है कि &#8220;जब महाराजाधिराज के सबसे बड़े भतीजे दूसरी शादी कर लिए, महाराजाधिराज तनिक सचेत हो गए। इसलिए महाराजाधिराज अपने मृत्यु से पूर्व जब वसीयतनामा बनाये या बनबाये, उस वसीयतनामे में सम्पत्तियों के प्रारंभिक बंटबारे के साथ साथ, इस बात का विशेष ध्यान रखे की उनकी पत्नियों को जीते-जी किसी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं हो, यहाँ तक सम्पत्तियों का प्रश्न है। </strong></p>
<blockquote><p>हाँ, उनकी महारानियों की मृत्यु के पश्चात महारानियों की सम्पत्तियों (वसीयतनामे का सिड्यूल ए और सिड्यूल बी) पर उनके सबसे छोटे भतीजे, यानी कुमार शुभेश्वर सिंह का आधिपत्य होगा। साथ ही, उनकी महारानियों की मृत्यु के बाद सम्पूर्ण सम्पत्तियों का एक-तिहाई हिस्सा राजकुमार शुभेश्वर सिंह के बच्चों का होगा, बशर्ते राज कुमार शुभेश्वर सिंह अपनी शादी अपने ब्राह्मण समुदाय में करें और बच्चे उसी ब्राह्मण समुदाय की पत्नी से जन्म ले। और एक-तिहाई हिस्सा अन्य भतीजों के संतानों को मिलेगा।&#8221; ध्यान रहे कि अन्य भतीजों के संतानों के बारे में महाराजाधिराज ने कोई भी ऐसी शर्त नहीं रखे की बच्चे की माँ ब्राह्मण समुदाय की ही हो।  राजकुमार शुभेश्वर सिंह की मृत्यु सन 2004 में हुई जबकि उनकी पत्नी उनसे पहले महादेव के शरण में अपनी उपस्थिति लगा दी थी।</p></blockquote>
<p>फैमली सेटेलमेंट के तहत,  महाराजाधिराज के उस सम्पूर्ण संपत्ति स्वरुप सिक्के को जिन चार भागों में विभक्त किया गया उसमें एक &#8211; चौथाई भाग महाराजाधिराज पत्नी महारानी कामसुन्दरी को मिला। एक &#8211; चौथाई हिस्सा राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह को मिला।  एक &#8211; चौथाई हिस्सा राजकुमार जीवेश्वर सिंह और यज्ञेश्वरा सिंह को मिला और अंतिम एक &#8211; चौथाई टुकड़ा चेरिटेबल ट्रस्ट के हिस्से आया। सेटेलमेंट के क्लॉज 11 के तहत, यह बात स्पष्ट किया गया कि &#8216;समय आने पर ट्रस्ट का निर्माण&#8217; किया जायेगा जिसका नाम &#8216;कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट&#8217; होगा और इस ट्रस्ट के सभी सदस्यों का चयन, रखरखाव आदि-आदि नियमानुसार होगा। आगे, फेमिली सेटेलमेंट के क्लॉज 14 के अधीन न्यायालय के आदेश केदिनांक 15 अक्टूबर, 1987 से  पांच साल के अंदर इस सेटेलमेंट को लागू करना था। बाद में, दिनांक 7 मई, 1993 को न्यायलय ने सेटेलमेंट को दिनांक 15 अक्टूबर, 1995 तक बढ़ा दिया।</p>
<p>बहरहाल,  दरभंगा राज की सम्पत्तियों को नेस्तोनाबूद करने में महाराजाधिराज के विल को क्रियान्वित करने वाले तत्कालीन अधिकारीयों और ट्रस्टियों का हाथ उत्कर्ष पर रहा ही; लेकिन सत्तर के दसक में स्थानीय प्रशासन के सहयोग से दरभंगा राज के मुख्यालय को जिस तरह मिथिला विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने कब्ज़ा किया, राज दरभंगा के लोगों की कमजोरी/मिलीभगत को दृष्टिगोचित करता है। </p>
<figure id="attachment_7702" aria-describedby="caption-attachment-7702" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Madh-Copvr.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Madh-Copvr.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7702" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Madh-Copvr.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Madh-Copvr-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Madh-Copvr-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Madh-Copvr-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Madh-Copvr-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7702" class="wp-caption-text">दरभंगा राज की तीन महारानियाँ और एक पुत्रबधु (सभी दिवंगत)</figcaption></figure>
<p>एक अधिकारिक दस्तावेज के अनुसार जिलाधिकारी, दरभंगा के आदेश संख्या 1835 /एल  दिनांक 16.08. 1975 के द्वारा एक्सेकूटर लक्ष्मी कान्त झा को डिफेन्स ऑफ़ इंडिया रूल 1971 के सुसंगत प्रावधान के आलोक में दरभंगा राज के भवन एवं भूमि अधिगृहित करने की सूचना दी गयी जिसके खिलाफ पंडित लक्ष्मीकांत झा ने माननीय पटना उच्च न्यायालय में सी . डब्लू .जे . सी . नंबर 1786 /75 दाखिल की।वाद के निपटारा से पूर्व हीं बिहार सरकार और दरभंगा राज के बीच समझौता हुई और जिलाधिकारी के आदेश और उक्त वाद को वापस ले लिया गया और 12 -09-1975  को हुई इस समझौता के आलोक में 133 एकड़ भूमि और भवन विस्वविद्यालय हेतु दी गयी।</p>
<p><strong>कहा जाता है कि सं 1980 में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि महारानी-अधिरानी कामसुन्दरी “रेसिडुअरी इस्टेट” का एक-तिहाई हिस्से का हक़दार होंगी। कलकत्ता उच्च न्यायालय के इस फैसले के विरुद्ध कुमार शुभेश्वर सिंह सर्वोच्च न्यायालय गए और न्यायालय को बताया की वे अपने दो अवयस्क बच्चों के हितों के रक्षार्थ कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ लड़ रहे हैं। शुभेश्वर सिंह को अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए महाराजा की जीवित पत्नी महारानी अधिरानी कामसुन्दरी के साथ अनेकानेक मुक़दमे लड़ने पड़े। सम्भवतः आज भी कई मुक़दमे माननीय न्यायालय में लंबित होंगे। शुभेश्वर सिंह महाराजा के छोटे भतीजे थे।</strong></p>
<p>इसका वजह यह था कि महाराजा के वसीयत के क्लॉज 4 में इस बात को स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि शुभेश्वर सिंह के बच्चे उसी हालात में महाराजा की सम्पत्तियों के लिए दावा कर पाएंगे अगर उनकी माँ ब्राह्मण परिवार की होंगी। शुभेश्वर सिंह सन 1965 में महाराजा की इक्षा और उनके वसीयत में लिखे शब्दों के सम्मानार्थ “ब्राह्मण महिला” से ही विवाह किये और उनके दो पुत्र – श्री राजेश्वर सिंह और श्री कपिलेश्वर सिंह – हुए । लेकिन उन्होंने इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी किया था की “वे बहुत ही तेज जीवन जीये हैं। उनकी जितनी भी बुराईयां थीं, अवगुण थे; सभी के सभी विवाह के साथ समाप्त हो गए, छोड़ दिए। लेकिन एक कमजोरी है जिसे वे नहीं त्याग नहीं सके, और वह है – शराब पीना।</p>
<p><strong>इसी फेमिली सेटेलमेंट के सिड्यूल iv के अनुसार न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशन्स लिमिटेड के 100 रुपये का 5000 शेयर दरभंगा राज के रेसिडुअरी इस्टेट चेरिटेबल कार्यों के लिए अपने पास रखा। कोई 20,000 शेयर अन्य लाभान्वित होने वाले लोगों द्वारा रखा गया &#8211; मसलन: 100 रुपये मूल्य का 7000 शेयर (रुपये 7,00,000 मूल्य का) महरानीअधिरानी कामसुन्दरी साहेबा को मिला।  राजेश्वर सिंह और कपिलेशर सिंह (पुत्र: कुमार शुभेश्वर सिंह) को 7000 शेयर, यानी रुपये 7,00,000 मूल्य का इन्हे मिला। महाराजा कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट को 5000 शेयर, यानी रुपये 5,00,000 का मिला। श्रीमती कात्यायनी देवी को 100 रुपये मूल्य का 600 शेयर, यानि 60000 मूल्य का मिला। इसी तरह श्रीमती दिब्यायानी देवी को भी 100 रुपये मूल्य का 600 शेयर, यानि 60000 मूल्य का मिला। रत्नेश्वर सिंह, रामेश्वर सिंह और राजनेश्वर सिंह को 100 रुपये मूल्य का 1800 शेयर, यानि 180000 मूल्य का मिला। जबकि नेत्रयानी देवी, चैत्रायणि देवी, अनीता देवी और सुनीता देवी को 100 रुपये मूल्य का 3000 शेयर, यानि 3,00,000 मूल्य का मिला। यह सभी शेयर उन्हें इस शर्त पर दिया गया कि वे किसी भी परिस्थिति में अपने-अपने शेयर को किसी और के हाथ नहीं हस्तांतरित करेंगे, सिवाय फेमिली सेटेलमेंट के लोगों के।</strong></p>
<figure id="attachment_7703" aria-describedby="caption-attachment-7703" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7703" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7703" class="wp-caption-text">​महाराजधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह के अनुज राजबहादुर विश्वेश्वर सिंह। इनके ही वंशज (पुरुषों में) आज दरभंगा राज में हैं</figcaption></figure>
<p>दस्तावेज के अनुसार, नब्बे के दशक के उत्तरार्ध कलकत्ता उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति  विशेश्वर नाथ खरे और उनके सहयोगी न्यायमूर्तियों के समक्ष एक याचिका प्रस्तुत होता है। यह याचिका सिविल प्रोसेड्यूर कोड के सेक्शन 90 और आदेश 36 के तहत, सन 1963 के प्रोबेट प्रोसीडिंग्स संख्या 18 के तहत, दरभंगा के महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह बहादुर के वसीयत नामा के अधीन नियुक्त ट्रस्टियों के द्वारा इण्डियन ट्रस्ट एक्ट के सेक्शन 34, 37, 39, 60 और 74 के अधीन प्रस्तुत किया जाता है। प्रस्तुतकर्ता होते हैं द्वारका नाथ झा, मदन मोहन मिश्र और कामनाथ झा। ये सभी ट्रस्टी न्यायालय से निवेदन करते हैं कि महाराजाधिराज की मृत्यु 1 अक्टूबर, 1962 को होती है। अपनी मृत्यु से पूर्व वे दिनांक 5 जुलाई, 1961 को एक वसीयत बनाते हैं जिसमें लक्ष्मी कांत झा को &#8220;सोल एस्क्यूटर&#8221; बनाते हैं। इसके बाद दिनांक 26 सितम्बर, 1963 उक्त वसीयतनामा को &#8220;प्रोबेट&#8221; करने का अधिकार लक्ष्मी कांत झा को दिया जाता है। लक्ष्मी कांत झा उक्त कार्य को सम्पन्न करते हुए 3 मार्च, 1978 को मृत्यु को प्राप्त करते हैं।</p>
<p><strong>महाराजा की बड़ी बहन श्रीमती लक्ष्मी दाईजी के वंशज </strong></p>
<p>दरभंगा के महाराजा रमेश्वर सिंह के तीन बच्चे थे – श्रीमती लक्ष्मी दाईजी, श्री कामेश्वर सिंह और श्री विश्वेश्वर सिंह। श्रीमती लक्ष्मी दाईजी महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की बड़ी बहन थीं। श्रीमती लक्ष्मी दाई जी का विवाह श्री मुकुंद झा से हुआ था। श्री मुकुंद झा को एक पुत्र था श्री कन्हैया झा। कन्हैया झा का विवाह श्रीमती कृष्णलता बुआसिन से हुआ था। इन दोनों के दो बच्चे थे – एक पुत्र श्री शंकर झा और एक पुत्री श्रीमती द्वितीया झा। श्री शंकर झा का विवाह श्रीमती कमला झा (श्रीमती शंकरलता बुआसिन) से हुआ था और श्रीमती द्वितीया झा का विवाह श्री कृष्णानंद झा साथ हुआ था। </p>
<p><strong>बहरहाल, शंकर झा की पुत्री यानी श्रीमती लक्ष्मी डाईजी परपोती वसुधा झा कहती हैं: &#8220;इतिहास अतीत में खत्म नहीं होता—वह वर्तमान में गूंजता रहता है। राज दरभंगा का पतन केवल बाहरी राजनीतिक बदलावों या ज़मींदारी उन्मूलन का परिणाम नहीं था। यह एक ऐसी आंतरिक संस्कृति का भी परिणाम था, जिसने धीरे-धीरे सत्य से अपना रिश्ता खो दिया। इस क्षरण के केंद्र में थी चापलूसी—लगातार की जाने वाली चमचागिरी।&#8221; वसुधा झा आगे कहती है कि &#8221; इस कहानी को और अधिक मार्मिक बनाता है यह तथ्य कि वर्तमान पीढ़ी इस इतिहास से ऊपर उठ नहीं पाई है। बल्कि, वही विरासत में मिली बीमारी आज भी उनके व्यवहार में दिखती है—और अब वही उनके अपने सामने लौटकर खड़ी है। </strong></p>
<figure id="attachment_7698" aria-describedby="caption-attachment-7698" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Darbhanga-Cover2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Darbhanga-Cover2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7698" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Darbhanga-Cover2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Darbhanga-Cover2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Darbhanga-Cover2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Darbhanga-Cover2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Darbhanga-Cover2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7698" class="wp-caption-text">सुश्री वसुधा झा।  ये महाराजा दसर. सर कामेश्वर सिंह की बहन श्रीमती लक्ष्मी दाईजी की परपोती हैं </figcaption></figure>
<p>उनका कहना है कि 18 अप्रैल 2026 को बिहार सरकार ने एक नोटिस जारी किया कि यदि महारानी कामसुंदरी के उत्तराधिकारी 30 दिनों के भीतर सामने नहीं आते, तो उनकी सारी संपत्ति ‘Escheat’ और ‘Bona Vacantia’ के कानूनी प्रावधानों के तहत सरकार में निहित हो जाएगी।  यह केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है—यह एक अवसरवाद है। बिहार सरकार भली-भांति देख रही है कि राज दरभंगा के उत्तराधिकारी एकजुट होने विरासत को संभालने में पूरी तरह असमर्थ हैं। व्यक्तिगत लालच, परिवार के सदस्यों की प्रगति से ईर्ष्या, और चाटुकारों के प्रति गहरा लगाव—इनसबने उन्हें इतना संकीर्ण बना दिया है कि वे बड़ी तस्वीर देखने में असफल हैं।&#8221;</p>
<p>महाराजाधिराज दिनांक 1 अक्टूबर, 1962 को मृत्यु को प्राप्त हुए। वे दुर्गा पूजा के अवसर पर कलकत्ता से अपने राज दरभंगा आये थे। वे अपने निवास दरभंगा हाउस, मिड्लटन स्ट्रीट, कलकत्ता से अपने रेलवे सैलून से नरगोना स्थित अपने रेलवे टर्मिनल पर कुछ दिन पूर्व उतरे थे। सभी बातें सामान्य थी उस सुबह, लेकिन क्या हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ जैसे अनेकानेक कारणों के बीच  पहली अक्टूबर, 1962 को नरगौना पैलेस के अपने सूट के बाथरूम के नहाने के टब में उनका जीवित शरीर &#8220;पार्थिव&#8221; पाए गया । सर कामेश्वर सिंह की तीन पत्नियां थीं &#8211; महारानी राज लक्ष्मी, महारानी कामेश्वरी प्रिया और महारानी कामसुंदरी। </p>
<p>महारानी कामेश्वरी प्रिय की मृत्यु आज़ाद भारत से पूर्व और अंग्रेज भारत छोड़ो आंदोलन के समय सं 1942 में हुई। महाराजाधिराज बहुत दुःखी थे उनकी मृत्यु के बाद, जैसा लोग कहते हैं। जिस सुबह महाराजाधिराज अंतिम सांस लिए, उसके बाद उनकी दोनों पत्नियां &#8211; महारानी राजलक्षी और महारानी कामसुन्दरी दाह संस्कार में उपस्थित थी, यह भी लोग कहते हैं। महारानी राजलक्ष्मी की मृत्यु सन 1976 में, यानि महाराजा की मृत्यु के 14 वर्ष बाद हुई और महारानी कामसुंदरी 1961 से विधवा जीवन जीते अंततः 12 जनवरी 2026 को मृत्यु को प्राप्त की। </p>
<p>साख्य और दस्तावेज इस बात का गवाह है की महाराजाधिराज को चाहने वाले, उनके हितैषी, उनके मित्र, उनके प्रशंसक भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के प्रत्येक कोने में थे, आज भी हैं। लेकिन उनके पार्थिव शरीर को, जैसा कहा जाता है, देश के किसी भी गणमान्य व्यक्तियों के आने का इंतज़ार किये बिना, आनन फानन में माधवेश्वर में इनका दाह संस्कार दोनों महारानी की उपस्थिति में कर दिया गया।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-7.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="aligncenter size-full wp-image-7704" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-7.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-7-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-7-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-7-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-7-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p><strong>अब यहाँ एक सवाल महाराजा की मृत्यु के 64-वर्ष बाद भी उठना स्वाभाविक है &#8211; है &#8211; क्या उस समय जीवित महाराजा की दोनों पत्नियां स्थानीय प्रशासन, प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री विनोदानंद झा से, देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, जो चौथे कार्यकाल (2 अप्रैल, 1962-27 मई, 1964), तत्कालीन गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री (25 फरवरी, 1961 &#8211; 1 सितम्बर, 1963) से राज दरभंगा का कोई भी व्यक्ति, यहाँ तक की महाराजाधिराज की विधवाएं अगर आवाज लगाती तो शायद दिल्ली से पटना और दरभंगा तक अन्वेषणकर्ताओं की लम्बी कतार लग जाती।  लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्यों नहीं हुआ इसके लिए तत्कालीन &#8220;नाबालिग&#8221; लोगों को तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन जो &#8220;बालिग&#8221; थे, उनका व्यवहार प्रश्नवाचक चिन्ह के अधीन हो गया। महाराजा कामेश्वर सिंह तीन महारानियों के होते हुए भी &#8220;संतानहीन&#8221; थे।</strong></p>
<p>वसुधा झा कहती हैं: जिस संपत्ति का कोई कानूनी मालिक नहीं होता, वह सीधे सरकार की हो जाती है। इस परिवार की एक बेटी होने के नाते, मैं केवल एक कड़वी सच्चाई के साथ यह कह सकती हूं कि कई पीढ़ियों—और वर्तमान पीढ़ी— ने चापलूसों को इस घर को भीतर से खोखला करने दिया। आज जो हम देख रहे हैं, वह अचानक नहीं है—यह वर्षों की धीमी सड़न का परिणाम है। बंटे हुए, अशिक्षित और सीमित सोच वाले उत्तराधिकारियों की लालच और कम समझ ने बिहार सरकार को यह अवसर दे दिया है कि वह इस खालीपन का लाभ उठाए। जिसे वंश परंपरा नहीं बचा सकी, उसे राज्य पूरी तत्परता से अपने अधिकार में लेने को तैयार है।&#8221;</p>
<p>वसुधा झा का कहना है कि &#8216;हम सभी जानते हैं कि चापलूस कभी खतरे के रूप में सामने नहीं आते। वे खुद को वफादार के रूप में प्रस्तुत करते हैं—जोहर बात पर सहमति जताते हैं, प्रशंसा करते हैं, और खुश रखते हैं। राज दरभंगा जैसे शाही ढांचे में, जहां सत्ता के करीबहोना ही प्रभाव तय करता था, ऐसे लोग व्यवस्था का हिस्सा बन गए। उनकी असली ताकत सत्य नहीं थी—बल्कि चापलूसी थी।&#8221;</p>
<p><strong>वे कहती हैं कि &#8220;बचपन से “महाराजी एक्टिविटीज़” जैसे शब्द सुनने को मिलते थे—एक तरह का मज़ाक, लेकिन असल में इस गहरी जड़ें जमा चुकी चापलूसी का स्वीकार। धीरे-धीरे, चमचागिरी एक व्यवहार नहीं, बल्कि एक संस्कृति बन गई: • सत्ता में बैठे लोगों को खुश रखना, सही सलाह देने से अधिक महत्वपूर्ण हो गया • परिपक्व सलाह की जगह सहमति ने ले ली • योग्यता की जगह नज़दीकी ने ले ली। इसका परिणाम स्पष्ट था: • प्रशासनिक क्षमता कमजोर हुई • दूरदर्शिता खत्म हुई • योग्य लोगों को किनारे कर दिया गया और • निर्णय अल्पकालिक संतुष्टि पर आधारित हो गए। यह भी सच है कि ज़मींदारी उन्मूलन, स्वतंत्रता के बाद की नीतियाँ और बदलते शासन ढांचे ने बड़ी भूमिका निभाई।लेकिनचमचागिरी ने यह सुनिश्चित किया कि यह संस्था इन परिवर्तनों के लिए अंदर से तैयार ही न हो। उनके अनुसार, सत्य और योग्यता पर आधारित व्यवस्था खुद को ढाल सकती थी, चापलूसी में डूबी व्यवस्था नहीं।&#8221;</strong></p>
<p>वसुधा झा आगे कहती हैं: आज स्थिति साफ है: चापलूसों ने घर को भीतर से खोखला किया; अब अवसरवाद बाहर से उसे अपना बना रहा है। राज दरभंगा की जो विरासत भीतर से संभाली नहीं जा सकी, उसे राज्य अब कानूनी ढांचे के सहारे अपने अधिकार में लेने को तैयार है। यह कहानी केवल एक परिवार की नहीं है—यह हर व्यवस्था के लिए चेतावनी है: चापलूसी रातों-रात नष्ट नहीं करती। यह एक दीमक की तरह होती है—जो धीरे-धीरे भीतर से सब कुछ खोखला कर देतीहै, और तब दिखाई देती है जब ढांचा गिरने के कगार पर होता है। आज राज दरभंगा की यही तस्वीर है। फिर भी, एक प्रश्न अब भी बाकी है—तत्काल और निर्णायक: क्या राज दरभंगा की वर्तमान पीढ़ी लालच और विभाजन से ऊपर उठकर एकजुट होगी… और जो बचाया जा सकता है, उसे बचाएगी? या फिर इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराएगा—“इस बार, एक निर्णायक, अपरिवर्तनीय क्षति के रूप में?”</p>
<p>राजकुमार शुभेश्वर सिंह और राजकुमार यजनेश्वर सिंह वसीयत लिखे जाने के समय नाबालिक थे और उनकी शादी नहीं हुई थी सबसे बड़े राजकुमार जीवेश्वर सिंह की दूसरी शादी नहीं हुई थी। शायद महाराजा को अपनी मृत्यु की अंदेशा था । मृत्यु से पूर्व ५ जुलाई १९६१ को कोलकाता में उन्होंने अपनी अंतिम वसीयत की थी, जिसके एक गवाह पं. द्वारकानाथ झा थे, जो महाराज के ममेरा भाई थे और दरभंगा एविएशन, कोलकाता में मैनेजर थे । कहा जाता है कि महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद बहुत ही तीब्रगति से दरभंगा राज का पतन हुआ। इसके अनेकानेक कारण हैं परन्तु मूल रूप से महाराजा की असामयिक और अचानक मृत्यु, महाराजा के सभी विश्वस्त और अच्छे लोग यथा महाप्रबंधक डैन्बी, निवेश प्रबंधक बैद्यनाथ झा, शिक्षा सलाहकार अमरनाथ झा, छोटे भाई विश्वेश्वर सिंह इत्यादि का भी देहांत होना, दोनों महारानियां का राज के क्रियाकलापों से अनभिज्ञता, विल के प्रोबेट कर्ता लक्ष्मीकान्त झा के हाथों राज का कार्य आते ही वे बहुत अधिक महत्वाकांक्षी होना, भतीजे या तो कोई समझदार नहीं होना या उनका छोटा होना, सरकार की नकारात्मक रुचि का होना, राज के प्रबंधक और सगे सम्बंधी स्वयं को धनाढ्य बनाने में लग जाना और उत्तराधिकारी के अभाव में दरभंगा राज का बृहत् लूट खसोट का केंद्र बन जाना प्रमुख रहा। खैर।</p>
<figure id="attachment_7705" aria-describedby="caption-attachment-7705" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7705" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7705" class="wp-caption-text">महारानी कामसुंदरी देवी की मृत्यु के बाद बिहार के तत्कालीन राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान अपनी संवेदना व्यक्त करने कल्याणी निवास आए थे। उनकी अगुवाई राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह</figcaption></figure>
<p>वैसे महाराजाधिराज अपनी वसीयत को एस्क्यूट करने, प्रोवेट करने का एकमात्र अधिकार &#8220;न्यायमूर्ति&#8221; पंडित लक्ष्मी कान्त झा को क्यों दिया? यह तो उतना ही बहुमूल्य प्रश्न है जितना दरभंगा राज का कुल मोल। वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि महाराजा की मृत्यु के समय भी दरभंगा राज के ऐसी कोई भी कुशल महिला अथवा पुरुष नहीं थे, जो दरभंगा राज का सम्पूर्णता के साथ भार स्वीकार करते। जो कोई शिक्षित थे भी, उनके मन में महाराजा के प्रति उतना &#8220;झुकाव&#8221; उनके मरणोपरांत विगत साठ-वर्षों में भी नहीं दिखा, जितना उनकी मृत्यु के बाद दरभंगा राज की संपत्ति के प्रति। अगर ऐसा नहीं होता तो आज भी भारत में विभिन्न न्यायालयों में दरभंगा राज के लोगों के बीच मुकदमे लंबित नहीं होते। मृत्यु का समाचार मिलने पर वे कोलकाता से दरभंगा पहुंचे और वसीयत को प्रोबेट कराने की प्रक्रिया शुरू करवा दी । कोलकाता उच्च न्यायालय द्वारा वसीयत सितम्बर 1963 को प्रोबेट हुई और पं. लक्ष्मी कान्त झा वसीयत के एकमात्र एस्क्यूटर बने।</p>
<blockquote><p>वसियत के अनुसार दोनों महारानी के जिन्दा रहने तक संपत्ति का देखभाल ट्रस्ट के अधीन रहेगा और दोनों महारानी के स्वर्गवाशी होने के बाद संपत्ति को तीन हिस्सा में बाँटने जिसमे एक हिस्सा दरभंगा के जनता के कल्याणार्थ देने और शेष हिस्सा महाराज के छोटे भाई राजबहादुर विशेश्वर सिंह जो स्वर्गवाशी हो चुके थे के पुत्र राजकुमार जीवेश्वर सिंह ,राजकुमार यजनेश्वर सिंह और राजकुमार शुभेश्वर सिंह के अपने ब्राह्मण पत्नी से उत्पन्न संतानों के बीच वितरित किया जाने का प्रावधान था ।  इससे बड़ा दुर्भाग्य दरभंगा राज के लिए क्या हो सकता है कि महाराजा की मृत्यु के बाद उनकी महारानियों का देखभाल ट्रस्ट करे। </p></blockquote>
<p>बड़ी महारानी के 1976 में देहांत होने और 1978 में पंडित लक्ष्मी कान्त झा के देहांत के बाद दरभंगा राज का कार्य ट्रस्ट के अधीन हो गया। श्री मदनमोहन मिश्र ( गिरीन्द्र मोहन मिश्र के बड़े पुत्र), श्री द्वारिका नाथ झा और श्री दुर्गानंद झा तीनो ट्रस्टी के अधीन। फिर श्री दुर्गानंद झा के देहांत के बाद 1983  के आसपास श्री गोविन्द मोहन मिश्र ट्रस्टी बने और फिर उनके स्थान पर श्री कामनाथ झा ट्रस्टी बने । दोनों महारानी को रहने के लिए एक – एक महल, जेवर, कार और कुछ संपत्ति मात्र उपभोग के लिए और दरभंगा राज से प्रतिमाह कुछ हजार रूपये प्रति माह खर्च देने का प्रावधान था। </p>
<p>एक सूत्र के अनुसार दरभंगा राज के जनरल मेनेजर मि. डेनवी के समय रहे असिस्टेंट मेनेजर पं. दुर्गानन्द झा के जिम्मे दरभंगा राज का प्रबंध था । वे राजमाता साहेब के फूलतोड़ा के पुत्र थे और महाराज के बचपन के मित्र थे वे उस ज़माने के स्नातक थे और पंडित द्वारिका नाथ झा, महाराज के ममेरे भाई एक्सेक्यूटर के सचिव मनोनीत हो गये और कोलकाता से आकर गिरीन्द्र मोहन रोड के बंगला नंबर 5 में अपने मामा पं.यदु दत्त झा, जो दरभंगा राज के अनुभवी और दझ पदाधिकारी थे, जिन्हें मिस्टर देनबी ने अपने बाद जनरल मेनेजर के लिए अनुशंसा की थी जिनका उल्लेख 1934 के भूकंप में राहत कार्यक्रम में कुमार गंगानंद सिंह ने की है, के बगल के बंगला में रहने लगे। </p>
<p><strong>बड़ी महारानी राजलक्ष्मी जी ने सबसे छोटे राजकुमार शुभेश्वर सिंह को अपने रामबाग में रखा। वसियत के अनुसार बड़ी महारानी राजलक्ष्मी जी के मृत्यु के बाद उनके महल पर राजकुमार शुभेश्वर सिंह का स्वामित्व होगा। बड़े कुमार जीवेश्वर सिंह राजनगर रहने लगे और उनकी बड़ी पत्नी राजकिशोरी जी अपनी दोनों बेटी के साथ और मझले राजकुमार यजनेश्वर सिंह अपने परिवार के साथ यूरोपियन गेस्ट हाउस ऊपरी मंजिल पर उत्तर और दझिण भाग में आ गए। सबसे बड़े राजकुमार जीवेश्वर सिंह राजनगर ट्रस्ट के एकमात्र ट्रस्टी रहे दरभंगा राज के मामले में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं था। राजनगर से वे गिरीन्द्र मोहन मिश्र के बाद बंगला नंबर १, गिरीन्द्र मोहन रोड में अपने दूसरी पत्नी और 5  पुत्री के साथ रहने लगे।</strong></p>
<figure id="attachment_7706" aria-describedby="caption-attachment-7706" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7706" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7706" class="wp-caption-text">राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह​, दरभंगा राज की सम्पत्तियाँ और पगड़ी</figcaption></figure>
<p>राजकुमार शुभेश्वर सिंह 1965 के आसपास दरभंगा राज के मामले में सक्रिय हो गये थे उन्हें रामेश्वर जूट मिल, फिर सुगर कंपनी और न्यूज़ पेपर &#038; पब्लिकेशन लिमिटेड का जिम्मेवारी मिली। कहा जाता है कि सं 1980में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि महारानी-अधिरानी कामसुन्दरी “रेसिडुअरी इस्टेट” का एक-तिहाई हिस्से का हक़दार होंगी।  कलकत्ता उच्च न्यायालय के इस फैसले के विरुद्ध कुमार शुभेश्वर सिंह सर्वोच्च न्यायालय गए और न्यायालय को बताया की वे अपने दो अवयस्क बच्चों के हितों के रक्षार्थ कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ लड़ रहे हैं। </p>
<p>शुभेश्वर सिंह को अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए महाराजा की जीवित पत्नी महारानी अधिरानी कामसुन्दरी के साथ अनेकानेक मुक़दमे लड़ने पड़े। सम्भवतः आज भी कई मुक़दमे माननीय न्यायालय में लंबित होंगे। शुभेश्वर सिंह महाराजा के छोटे भतीजे थे। इसका वजह यह था कि महाराजाके वसीयत के क्लॉज 4 में इस बात को स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि शुभेश्वर सिंह के बच्चे उसी हालात में महाराजा की सम्पत्तियों के लिए दावा कर पाएंगे अगर उनकी माँ ब्राह्मण परिवार की होंगी। शुभेश्वर सिंह सन 1965 में महाराजा की इक्षा और उनके वसीयत में लिखे शब्दों के सम्मानार्थ “ब्राह्मण महिला” से ही विवाह किये और उनके दो पुत्र – श्री राजेश्वर सिंह और श्री कपिलेश्वर सिंह – हुए ।</p>
<p>कहा जाता है कि दरभंगा राज लगभग 2410 वर्ग मील में फैला था, जिसमें कोई 4495 गाँव थे, बिहार और बंगाल के कोई 18 सर्किल सम्मिलित थे। दरभंगा राज में लगभग 7500 कर्मचारी कार्य करते थे। आज़ादी के बाद जब भारत में जमींदारी प्रथा समाप्त हुआ, उस समय यह देश का सबसे बड़ा जमींदार थे। इसे सांस्कृतिक शहर भी कहा जाता है। लोक-चित्रकला, संगीत, अनेकानेक विद्याएं या क्षेत्र की पूंजी थी। लोगों का कहना है कि वर्त्तमान स्थिति के मद्दी नजर, दरभंगा राज के सभी लोगों की निगाह दरभंगा राज फोर्ट यानी करीब 85 एकड़ भूमि के बीचोबीच स्थित रामबाग का विशाल भवन है। आज भवन की कीमत जो भी आँका जाय, इस सम्पूर्ण क्षेत्र यानी दरभंगा के ह्रदय में स्थित 85 एकड़ भूमि की व्यावसायिक कीमत क्या होगी, यह आम आदमी नहीं सोच सकता है। वजह भी है : सरकारी आंकड़े के अनुसार &#8220;दरभंगा के लोगों का प्रतिव्यक्ति आय 15, 870/- रूपया आँका गया है और इतनी आय वाले लोग लाख, करोड़, अरब, खरब रुपयों के बारे में सोच भी नहीं सकते। वह जीवन पर्यन्त उस राशि पर कितने &#8220;शून्य&#8221; होंगे, सोचते जीवन समाप्त कर लेगा। परन्तु सोच नहीं पायेगा।</p>
<p>नब्बे के दशक के उत्तरार्ध रेसिडुअरी इस्टेट ऑफ़ महाराजा दरभंगा और महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टियों ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय सहित, कलकत्ता उच्च न्यायालय को &#8221;लिखित याचना&#8221; देकर न्यायालय से गुहार किए कि उन्हें रेसिडुअरी इस्टेट ऑफ़ महाराजा दरभंगा और चेरिटेबल ट्रस्ट से &#8220;कार्यमुक्त&#8221; कर दिया जाय । जीवन के अंतिम वसंत में वे &#8220;बेइज्जत&#8221; नहीं होना चाहते हैं। चूंकि इस सम्पूर्ण कार्यभार में अनेकानेक लोगों का &#8220;निहित स्वार्थ&#8221; निहित है, अतः बढ़ती उम्र और ढ़लती स्वास्थ्य के मद्दे नजर वे अपने कार्यों को कर पाने में असहाय हैं, नहीं कर सकते हैं। वे न्यायालय से निवेदन भी किये कि &#8220;उन्हें मुक्ति दिया जाय&#8221; और सम्पूर्ण कार्य को संपादित करने के लिए न्यायालय एक प्रशासक की नियुक्ति कर दे &#8211; याचना है।</p>
<p>मिथिलाञ्चल अथवा राज दरभंगा के इतिहास में शायद यह पहली घटना होगी जब 84-वर्षीय, 72-वर्षीय और 69-वर्षीय वृद्ध न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर उससे विनती किया हो कि उन्हें कार्य मुक्त होने का मार्ग प्रशस्त किया जाय, कार्यमुक्त किया जाय । याचिका में लिखा है: &#8220;It is submitted that the applicants are being harassed unnecessarily by the various quarters having vested interest. They are also being confronted with various problems. The applicants further submitted that due to their old age, falling health and other difficulties they are not in a position to continue to function as Trustees. It is the sincere desire of the applicants that they may be relieved of the responsibilities of the office of the Trustees of the Residuary Estate of Maharaja of Darbhanga and also of the Charitable Trust.&#8221; </p>
<p>क्या कहते हैं मिथिलांचल के संभ्रांत लोग? क्या कहते हैं दरभंगा राज के लोग जो महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद उनकी सम्पत्तियों के लाभार्थी हुए ? क्योंकि दरभंगा के बेनीपुर, अलीनगर,ग्रामीण दरभंगा, हायाघाट, बहादुरपुर, केओटी, जाले, झंझारपुर, सकरी, मनीगांची, अंधराठाढ़ी, बंगालगढ़, बंगलीटोला, शुभंकरपुर, लक्ष्मी सागर, बेला, लहेरियासराय, तमौरिया आदि जगहों का गरीब-गुरबा की तो क्षमता नहीं होगी कि वे रेसिडुअरी इस्टेट ऑफ़ महाराजा दरभंगा और महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टियों को &#8220;उत्पीड़ित&#8221; करे।</p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;&#8230;..</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/when-maharaja-darbhanga-soad-painfully-and-whereas-i-have-no-issue">​​अगर &#8216;कागज सही है&#8217; तो &#8216;महारानियों की मृत्यु के बाद संपत्ति महाराजा के भतीजे शुभेश्वर सिंह (अब दिवंगत) के संतानों को मिलेगा&#8217;, लेकिन &#8216;नेपथ्य में कुछ और हो रहा है&#8217; </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>​दरभंगा के लोग कहते हैं: ​&#8217;दादी एक गिलास पानी के लिए जीवन पर्यन्त प्रतीक्षा करते परलोक सिधारी, पौत्र &#8216;राजसी ठाठ से मृत्योपरांत कर्म करेंगे&#8217; (मृत्योपरांत कहानी श्रृंखला-1)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 17 Jan 2026 13:35:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga raaj]]></category>
		<category><![CDATA[death]]></category>
		<category><![CDATA[maharani]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दरभंगा : कल का दरभंगा राज का बेला पैलेस और आज का पोस्ट ऑफिस ट्रेनिंग सेंटर का कार्यालय के सामने खड़े लोग आपस में बात कर रहे हैं। ​कहते हैं इस महल में महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और अन्य गणमान्य व्यक्तियों सहित कई प्रमुख हस्तियों ने दौरा किया है महाराजाओं के [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/great-grandmother-passed-away-after-waiting-her-entire-life-for-a-glass-of-water">​दरभंगा के लोग कहते हैं: ​&#8217;दादी एक गिलास पानी के लिए जीवन पर्यन्त प्रतीक्षा करते परलोक सिधारी, पौत्र &#8216;राजसी ठाठ से मृत्योपरांत कर्म करेंगे&#8217; (मृत्योपरांत कहानी श्रृंखला-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा :  कल का दरभंगा राज का बेला पैलेस और आज का पोस्ट ऑफिस ट्रेनिंग सेंटर का कार्यालय के सामने खड़े लोग आपस में बात कर रहे हैं। ​कहते हैं इस महल में महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और अन्य गणमान्य व्यक्तियों सहित कई प्रमुख हस्तियों ने दौरा किया है महाराजाओं के कालखंडों में । महल की वास्तुकला में मुगल, राजपूत और यूरोपीय शैलियों का मिश्रण है। आज यह भवन भारत के छह पोस्टल ट्रेनिंग सेंटरों में से एक है।​ यह केंद्र बिहार, झारखंड, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल सर्कल की ट्रेनिंग ज़रूरतों को पूरा करता है। ​यह भी कहते हैं कि यहाँ​ डाक विभाग से जुड़े कई श्रेणियों के अधिकारियों और कर्मचारियों को प्रशिक्षण दी जाती हैं। खैर। </strong></p>
<blockquote><p>शहर का तापमान अठारह डिग्री के आस पास है। जो भी लोग उपस्थित हैं उनमें बीड़ी और सिगरेट पीने वाले नहीं हैं, अन्यथा इस तापमान पर तो कितने डिब्बे सिगरेट और कितने बंडल बीड़ी फूंके गए होते। बातचीत का सिलसिला जारी है। दरभंगा के महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह द्वारा स्थापित &#8216;दी इंडियन नेशन&#8217; अख़बार के अस्सी के ज़माने के तत्कालीन संपादक श्री दीनानाथ झा कहे थे &#8216;एक संवाददाता के लिए सबसे आवश्यक है कि वह अच्छा श्रोता हो। आँख खुला रखता हो और बिना कलम का इस्तेमाल किये अपने मानस पटल पर लिखने की क्षमता रखता हो।&#8217; बेला पैलेस के सामने उनकी याद बहुत आ रही है। </p></blockquote>
<p><strong>दरभंगा मैथिली भाषा का केंद्र है, परन्तु यहाँ उपस्थित  निनानबे फ़ीसदी लोग हिंदी में बात कर रहे हैं। शब्दों का उच्चारण कभी कभी मुख में दाँत के अभाव के कारण अथवा तंबाकू और गुटका भरे होने के कारण, जिस तरह क्रिकेट खेल में बॉल स्लीप और गली से निकल जाता, शब्द भी फिसल रहे हैं। मिथिला के बुजुर्ग इसलिए कहते हैं कि &#8216;न दंतहीन सर्प अच्छा होता और न ही दंतहीन व्यक्ति शब्दों का सही उच्चारण कर पाता। यहाँ दृष्टान्त देख रहा हूँ। </strong></p>
<p>महारानी को अंतिम सांस लेकर अनंत यात्रा पर निकले आज पांच दिन हो गया। शहर में अब महारानी के प्रति वेदना-संवेदना की बात, चर्चाएं थम सी गयी है। जैसे-जैसे समय एकादशा, द्वादशा और मांस-माँछ तिथि की ओर बढ़ रहा है, जहाँ भोज में अनेकानेक व्यंजन, दही, रसगुल्ला परोसे जायेंगे, दरभंगा के लोग, खासकर जिनका प्रवेश दरभंगा के लालकोठी (रामबाग परिसर) या कल्याणी निवास में &#8216;आम&#8217; या &#8216;खास&#8217; है, महारानी की मृत्युभोज के बारे में, मरणोंपरांत कर्म के दौरान दान स्वरुप मिलने वाली वस्तुओं, आभूषणों के बारे में चर्चाएं कर रहे हैं। </p>
<p><strong>कई लोगों के मुख से यह भी कहते सुना हूँ कि अगर भारत-चीन के दौरान सन बासठ में दरभंगा राज की ओर से तत्कालीन महारानी (बड़ी महारानी) और तत्कालीन ट्रस्टी (श्री लक्ष्मीकांत झा) के प्रयास से (राजनीति ही सही) 15 मन सोना दान किया जा सकता है, तो महादेव की नगरी में महारानी की आत्मा को जगह मिले, वे अपने पति देव महाराजा कामेश्वर सिंह से, अपनी दोनों बड़ी बहनों (महाराजा की दो पत्नियां) से मिलें, तदर्थ अन्य दानों के अलावे स्वर्णदान अवश्य करेंगे। पंद्रह मन ना सही, पंद्रह किलो का ही दान होना चाहिए। विदित हो कि महारानी काम सुंदरी की मृत्यु के बाद दरभंगा ही नहीं, पटना ही नहीं, देश-विदेश से प्रकाशित अख़बारों में, इंटरनेटों पर, वेबसाइटों पर 15 मन सोना दान करने का श्रेय महारानी कामसुन्दरी को दिया गया। खैर।</strong> </p>
<figure id="attachment_7235" aria-describedby="caption-attachment-7235" style="width: 1080px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/52.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/52.jpeg" alt="" width="1080" height="720" class="size-full wp-image-7235" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/52.jpeg 1080w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/52-300x200.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/52-1024x683.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/52-768x512.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1080px) 100vw, 1080px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7235" class="wp-caption-text">दिवंगत महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह और उनकी तीसरी पत्नी (दिवंगत) महारानी काम सुंदरी देवी</figcaption></figure>
<p>महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह, महाराजा रमेश्वर सिंह, राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह, महाराजा कामेश्वर सिंह की अथवा दरभंगा राज में अब तक मृत्यु को प्राप्त किये महिलाओं के मृत्यु भोज में इस डाक ट्रेनिंग कार्यालय के सामने खड़े लोग (कुछ को छोड़कर) सरिक नहीं हुए थे। इनमें से किसी भी व्यक्ति का उस काल खंड में जन्म भी नहीं हुआ था। जो दरभंगा में सत्तर-अस्सी वसंत देखे हैं (उनकी संख्या बहुत कम है) वे महाराजा के साथ-साथ राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह, उनके पुत्र जीवेश्वर सिंह, बड़ी महारानी, जीवेश्वर सिंह की पत्नी आदि की मृत्यु और मृत्युभोज में सरिक अवश्य हुए थे, लेकिन किन्ही भी दो व्यक्तियों के मृत्यु भोज अथवा मृत्यु कर्म में समानता नहीं थी। लोगों को तो यहाँ तक कहते सुना कि जीवेश्वर सिंह, जो दरभंगा राज के उस काल खंड से लेकर आज के काल खंड तक, सभी पुरुषों से सबसे मेधावी और यशस्वी थे, उनकी पत्नी के देहावसान के समय दरभंगा राज के लोगों का ह्रदय नहीं पसीजा था। सब समय है। </p>
<blockquote><p>महारानी काम सुंदरी देवी भले 64-वर्ष विधवा का जीवन व्यतीत कीं, उनकी मृत्यु के बाद उनके शव के समक्ष कल्याणी निवास में &#8216;राजनीति&#8217; भले हुआ हो, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि वे &#8216;भाग्यशाली&#8217; भी थी। उनकी शव यात्रा में उनका सबसे बड़ा पौत्र कन्धा दिया था। उनके शव के पीछे दरभंगा शहर के लोग, इष्ट अपेक्षित, संबंधी, तथाकथित संबंधी सभी साथ थे। सभी का अश्रुपूरित था। </p></blockquote>
<p>भले उनका देहावसान 96 वर्ष में हुआ हो, सभी इस बात को स्वीकार कर रहे थे कि दरभंगा की महारानी (भले देख रेख के भाव में उन्हें बेड सोर हो गया हो, कमजोरी के कारण पिछले कुछ दिनों से बोलने, आँखें खोलने में असमर्थ रही हो, लोगबाग स्वयं को &#8216;महारानीहीन समझ रहे थे। मिथिला की यही तो गरिमा है। यही तो संस्कृति है। समाज में कुछ होने पर समाज के लोगों में हर्ष और विषाद होता है, भले परिवार के लोग संवेदनहीन हो जाएँ। </p>
<p>तभी एक महाशय कहते हैं: &#8220;महाराजा की मृत्यु के बाद वसीयत में महारानी को महाराजा की संपत्ति पर जो भी अधिकार या उपयोग करने का अधिकार दिया गया हो, वे भले संतानहीन रही हों, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उन्होंने अपने जीवन काल में गाँव, समाज के सैकड़ों परिवारों को पाली पोसी। कई लोगों को अपने पास रखकर शिक्षित करने की कोशिश की।&#8221; </p>
<p><strong>अपने धोती के खूंट से अपनी अश्रुपूरित आंखों को पोछते एक महाशय कहते हैं: &#8220;करीब 64 वर्ष विधवा जीवन व्यतीत की महारानी। अपने जीवन के अंतिम सांस तक वाट जोहते रही अपने पोतों की। रत्नेश्वर बाबू को छोड़कर कभी किसी ने दरवाजे पर दस्तक नहीं दिया। काश !! दरभंगा राज के &#8216;तथाकथित&#8217; या &#8216;स्वयंभू&#8217; युवराज कभी अपने हाथों से एक गिलास पानी पिलाए होते !! काश !!! थर-थर काँपते हाथों से दवाई लेकर, रुग्ण अवस्था में बेडसोर से पीड़ित अपनी दादी को उठाकर दो शब्द बात किए होते। दुखद हैं। खैर !!! कहते हैं भगवान सब देखता है, यह भी देखा होगा।&#8221;</strong></p>
<p>तभी वहां खड़े कोई चालीस वर्षीय युवक कहता है : &#8220;जीवन में दोनों के बीच संपत्ति को लेकर कई मुकदमें हुए। शायद दो बार मिले उनके जीवन काल में &#8216;स्वयंभू युवराज&#8217; और दोनों बार सबसे पहले दूसरे अख़बारों में ही फोटो छपा। महाराजा द्वारा स्थापित अख़बारों को तो बेच-बाचकर सभी डकार लिए। अब महारानी के मरने के बाद देश, विदेश के राजा आएं, मंत्री आएं संत्री आएं, भोज करें, अख़बार में नाम छपायें, इससे लोगों को क्या? दरभंगा राज के आज के सबसे बड़े पुरुष, जिन्होंने मुखाग्नि दिए, उनसे भी सम्बन्ध एकादशा और द्वादशा तक ही रहेगा। माँछ -मौस आते-आते संधि युक्त नहीं संधि विच्छेद हो जायेगा। पत्रकार लोग भी गजब का प्रश्न करते हैं &#8220;श्राद्ध का इंतज़ाम कैसा होगा?&#8221;  </p>
<figure id="attachment_7237" aria-describedby="caption-attachment-7237" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7237" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7237" class="wp-caption-text">महारानी का पार्थिव शरीर</figcaption></figure>
<p>उनकी बातों को काटते एक अन्य व्यक्ति एक स्थानीय पत्रकार के प्रश्न पर चुटकी लेते कहते हैं: &#8220;पिछले पाँच और अधिक वर्षों में, जबसे महारानी का शरीर शिथिल हुआ, एक भी पत्रकार दो शब्द उस दर्दनाक काल का नहीं लिखा (अपवाद छोड़कर), आज प्रश्न पूछ रहा है कौन-कौन राजा आ रहे हैं? श्राद्ध का कैसा इन्तज़ाम होगा, कहाँ चूल्हा लगेगा, कहाँ पत्तल, क्या क्या उपहार मिलेगा? ओह !!&#8221;</p>
<p><strong>इस बीच धोती कुर्ता कोट पहने, ऊनी चादर से सर और कान ढँके, लाठी का सहारा लिए एक बुजुर्ग का प्रवेश होता है। डाक विभाग के कार्यालय के पास उपस्थित लोगों की ओर देखते कहते है “यह भी पूछना चाहिए कि भोज का आयोजन करने वाले केश कटायेंगे अथवा नहीं? अमेरिका और दिल्ली में रहने वाले की संस्कृति कुछ अलग होती है।&#8221; चलते चलते बुजुर्ग कहते हैं, “जो भी हो, इस अवस्था में महारानी का जाना उनके शरीर के लिए अच्छा हुआ। बेडसोर होने के कारण बहुत कष्ट में थी। वैसे भी दरभंगा के कितने लोग, जिनकी आयु आज पचास वर्ष भी है, महारानी को देखे हैं? हम सभी तो महारानी शब्द के प्रति ही संवेदना व्यक्त कर रहे हैं। एक युग का अंत हो गया। अब दरभंगा के शब्दकोष से &#8216;महारानी&#8217; शब्द निरस्त हो गया।  दरभंगा राज में महिलायें पहले विधवा होती हैं, और वर्षों बाद विधवा जीवन जी कर  मृत्यु को प्राप्त करती है, यही होता आया है। आगे महादेव की मर्जी।&#8221;</strong></p>
<p>कुछ देर पहले लाल बाग की ओर से आती सड़क जो आगे विश्वविद्यालय और राम बाग परिसर से होते निकलती है, खड़ा था यहाँ से दाहिने हाथ संस्कृत विश्वविद्यालय प्रवेश द्वार होते कल्याणी निवास की ओर बढ़ा था। इसी आवास में महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाऊंडेशन का कार्यालय भी है। विशालकाय सफ़ेद रंग का घर। बीच के हिस्से में आसमानी रंग को पोताई जिसे एक फूल का पौधा आधी दीवार को ढंका है, दिखा। दाहिने हाथ दो तीन गाड़ियां लगी दिखी । कुछ कुर्सियां भी लगी थीं आगंतुकों के लिए। महारानी की मृत्यु की जिज्ञासा करने आये कई लोग कुर्सियों पर बैठे दिखे तो कई खड़े होकर बात करते दिखे। शहर का तापमान वैसे 20 डिग्री के आस-पास थी, लेकिन लोगों के शरीर पर स्वेटर, कोट और अन्य ऊनी वस्त्रों का जमाव है। अपवाद छोड़कर सभी लोग कान गुलेबन्द से ढंके हैं। </p>
<p>इसी बीच पैर के नीचे एक मोटा गद्दा रखे, सफ़ेद वस्त्र में, शरीर पर मात्र ठंढ़ से परहेज करने के कारण कुछ वस्त्र पहने दरभंगा राज के सबसे बड़े पुरुष रत्नेश्वर सिंह बैठे थे। वस्त्र के ऊपर &#8216;उतरी&#8217; लटका दिख रहा था। चेहरे पर शालीनता दिख रही थी। यह भी दिख रहा था कि परिवार में अब कोई वृद्ध नहीं रहा। रत्नेश्वर के पिता का हाल ही में देहांत हुआ है। माँ जीवित हैं। </p>
<p><strong>वैसे महारानी की मृत्यु के बाद पार्थिव शरीर को मुखाग्नि देने से पूर्व इस कल्याणी निवास में बहुत बड़ी राजनीति का बीजारोपण हुआ था, लेकिन बड़ा प्रपौत्र होने के नाते रत्नेश्वर ही महारानी काम सुंदरी जी को अग्नि के रास्ते महादेव और उनके पति तक भेजने का दायित्व लिया। उनके मुखाग्नि के साथ ही महारानी को अपने पति महाराजा कामेश्वर सिंह, अपने ससुर महाराजा रमेश्वर सिंह और महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह, देवर (महाराजा के छोटे भाई) राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह, उनके पुत्र यज्ञेश्वर सिंह से मुलाकात होगी। रत्नेश्वर सिंह राजबहादुर विश्वेश्वर सिंह के तीन पुत्रों में एक पुत्र यज्ञेश्वर सिंह के पुत्र रत्नेश्वर सिंह हैं। </strong></p>
<p>रत्नेश्वर सिंह के बाएं हाथ कोई पांच फूट की दूरी पर राजा बहादुर के सबसे छोटे पुत्र कुमार शुभेश्वर सिंह के कनिष्ठ पुत्र कपिलेश्वर सिंह बैठे दिखे। कपिलेश्वर सिंह पैंट, कमीज, गोल गले वाला (हाईनेक) स्वेटर, जूता पहने थे। कभी कभार काले रंग का चश्मा भी आँखों के सामने आ जाता था। उनके पीछे कई लोग खड़े थे। सामने कुछ पत्रकारों का जमाव दिखा। सामने उपस्थित सभी लोगों के हाथों में वीडियो बनाने के लिए &#8216;स्मार्ट फोन&#8217; भी तैयार दिखा। </p>
<figure id="attachment_7238" aria-describedby="caption-attachment-7238" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7238" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/Maharani-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7238" class="wp-caption-text">राम नाम सत्य है &#8211; महारानी अनंत यात्रा पर</figcaption></figure>
<p><strong>इस बीच एक व्यक्ति कहते हैं: &#8220;आजकल नेता बनने के चक्कर में हैं। इसलिए स्थानीय अख़बारों में तस्वीर की पूर्ति बनी रहे, सोशल मीडिया पर कहानियां, वीडियो और तस्वीरें चिपकती रहे, कई लोगों को इस कार्य पर लगा रखे हैं। उनकी बातें ख़त्म हुई भी नहीं थी कि एक अन्य व्यक्ति जो न्यूनतम सत्तर वसंत देखे होंगे, कहते हैं: &#8220;सब पैसा का खेल है। सुनते हैं नेताओं के संसर्ग में हैं। यह शायद नहीं जानते कि नेताओं के कारण भी दरभंगा राज का यह हश्र हुआ है। आज अगर अपना अख़बार जिन्दा होता तो महारानी के ऊपर क्या-क्या नहीं लिखा जाता। &#8216;आर्यावर्त&#8217; और &#8216;इंडियन नेशन&#8217; अख़बार में नामी रिपोर्टर थे। विश्वास नहीं होता है तो जिस दिन महाराजाधिराज की मृत्यु हुयी थी, अगले दिन का अखबार देख लो। नेताओं ने ही दरभंगा राज को, अख़बारों को नेश्तोनाबूद कर दिया। खैर भगवान् अच्छजा करें, यही प्राथना करता हूँ। </strong></p>
<p>वैसे महारानी की मृत्यु के बाद अथवा उनकी पार्थिव शरीर जब तक अग्नि में सुपुर्द नहीं हुआ था, वे राष्ट्र की राजधानी, जहाँ वे रहते हैं, से दरभंगा के कल्याणी निवास अथवा माधवेश्वर, जहाँ महारानी का अंतिम संस्कार हुआ, नहीं आये थे। प्रवेश द्वार के बाएं हाथ खड़े कुछ लोग आपस में बात करते सुना कि &#8216;रत्नेश्वर जी सीधा-साधा आदमी है। जब तक महारानी जिन्दा थी, कभी कोई नहीं पूछा था सिवाय रत्नेश्वर के। मेरी आयु आज 65 साल हो गयी है, लेकिन दरभंगा के अख़बारों में कभी नहीं पढ़ा, फोटो नहीं देखा की छोटा कुमार का बेटा महारानी से मिलने, हाल-चाल पूछने आया हो। तभी एक अन्य बुजुर्ग कहते हैं: &#8216;सुनते हैं महाराजा का सभी संपत्ति अब उसी के नाम हो गयी है। जब तक महारानी जीवित थी, तब तक कागजात में जो भी उनके हिस्से ही संपत्ति थी, उनकी थी, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद दरभंगा राज की सभी संपत्ति अब छोटे वाले को मिल गयी है।&#8221; मैं उनकी बातों को सुन रहा था। </p>
<p>इस बीच उन लोगों की बात को काटते धोती-कुर्ता और स्वेटर, कोट पहने एक शिक्षित व्यक्ति कहते हैं: &#8220;छोटका कुमार के बेटा सब संपत्ति के लेल महारानी पर केस केने छलै। दरभंगा के अख़बार में पढ़ने रहिये। खजाना से आभूषण के चोरी के समाचार सेहो छपल रहै।&#8221; विगत 12 जनवरी को दरभंगा राज की अंतिम महारानी काम सुंदरी देवी का इसी भवन के अंदर लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया था। महारानी अपनी अंतिम सांस, ऐसा कहा जाता है, सुबह-सवेरे 3 बजे के आस-पास ली, लेकिन उनकी मृत्यु को कई घंटों तक सार्वजानिक नहीं होने दिया गया था। ऐसा क्यों हुआ यह तो दरभंगा राज से जुड़े लोग, या फिर जो महारानी की देखरेख करते आ रहे थे, बेहतर बताएँगे। </p>
<blockquote><p>लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि कल्याणी निवास से जब यह खबर कल्याणी फॉउंडेशन के बनाने वाले प्रोफ़ेसर हेतुकर झा (अब दिवंगत) के घर पहुंचा, उनके पुत्रद्वय यहाँ पहुंचे। उनका कहना था कि यह महज एक महिला की मृत्यु नहीं हुयी है, बल्कि दरभंगा राज की अंतिम महारानी, जो महाराजा डॉ कामेश्वर सिंह की मृत्यु के करीब 64 वर्ष तक विधवा रही, जिसके कारण ही दरभंगा राज की अब तक की गरिमा बची रही, के अंतिम संस्कार के समय तक उनके परिवार के सभी लोगों का उपस्थित होना आवश्यक है। </p></blockquote>
<p>इस बीच शुभेश्वर सिंह के छोटे पुत्र कपिलेश्वर सिंह दिल्ली से दरभंगा की ओर निकल गए थे, लेकिन हवाई जहाज में विलम्ब हो रहा था। उनके बड़े भाई राजेश्वर सिंह अमेरिका में सूचित कर दिया गया था और वे भी दरभंगा की ओर निकल गए थे। कुछ लोगों का कहना था कि सभी को कपिलेश्वर सिंह की प्रतीक्षा करनी चाहिए, आखिर खून हैं। </p>
<p>इसके अन्य जो भी कारण हो, सैद्धांतिक रूप में  महारानी की मृत्यु के बाद दरभंगा राज से सम्बंधित, ट्रस्ट्स से सम्बंधित जितनी भी आधिकारिक जवाबदेही है, सम्पत्तियों का स्वामित्व है, &#8216;संपत्ति की वसीयत&#8217; के अनुसार&#8217; स्वतः कपिलेश्वर सिंह को प्राप्त होना है। कपिलेश्वर सिंह भले अपने जीवन काल में अब तक महारानी (उनकी दादी) से अधिकतम तीन बार मिले हों, सम्पत्तियों के लिए उनपर मुकदमें किये हों, उन्हें न्यायालय लाये हों; लेकिन क़ानूनी तौर पर महारानी की मृत्यु के बाद सभी सम्पत्तियों पर उन्हीं का हक़ है। लेकिन हवाई जहाज में बिलम्ब के कारण वे समय निकलता चला जा रहा था। </p>
<p><strong>इसी बीच उस दिन किसी कोने से &#8216;अपशब्द&#8217; हवा में उछला और फिर चाटों की आवाज जो सम्पूर्ण वातावरण को घूमिल कर दिया। कुछ लोग उनका भी इंतज़ार नहीं करना चाहते थे और आनन् फानन में महारानी को मुखाग्नि देकर उन्हें विदा करना चाहते थे, जो व्यावहारिक रूप से गलत था। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि विगत कई वर्षों से महारानी की देखरेख करने के लिए महारानी के नैहर के एक सम्बन्धी और उनका परिवार करते आया है। स्वाभाविक है, अंतिम संस्कार करने के लिए उनका आगे आना। लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से यह गलत हो जाता है जब महारानी के परिवार के लोग, प्रपौत्र जीवित हैं और वे सबसे बड़े भी हैं। </strong></p>
<figure id="attachment_7239" aria-describedby="caption-attachment-7239" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/1.jpg" alt="" width="2048" height="1153" class="size-full wp-image-7239" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/1.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/1-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/1-1024x577.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/1-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/01/1-1536x865.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7239" class="wp-caption-text">राम नाम सत्य है &#8211; महारानी अनंत यात्रा पर</figcaption></figure>
<p>स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में, इंटरनेट पर इस खबर को &#8216;कुछ और तरीके से&#8217; प्रस्तुत किया गया, जो दरभंगा राज के लिए शुभ संकेत नहीं देता है। इतना ही नहीं, महारानी को उन अख़बारों में, ख़बरों में जिस तरह प्रस्तुत किया गया &#8211; भारत चीन युद्ध के दौरान उनकी भूमिका, स्वर्ण दान &#8211; यह भी तथ्य से परे था। भारत चीन युद्ध के दौरान महारानी काम सुंदरी की कोई भूमिका नहीं थी, अलबत्ता, बड़ी महारानी राजलक्ष्मी देवी तत्कालीन ट्रस्टी लक्ष्मीकांत झा के द्वारा भारत सरकार के मंत्री मोरार जी देसाई को दी थी। महारानी काम सुंदरी बड़ी महारानी को &#8216;माँ&#8217; स्वरुप मानती थी। मड़ई महारानी की मृत्यु सत्तर के दशक के मध्य हुई। </p>
<p>दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की तीन पत्नियां थी, परन्तु कोई संतान नहीं था उन तीनों पत्नियों से। दो महारानियां की मृत्यु पहले हो गई थी। महाराजाधिराज के अंतिम सांस के समय दो महारानियां (बड़ी और सबसे छोटी) और तीन भतीजे थे। ये तीनों भतीजे महाराजाधिराज के भाई राजा बहादुर विशेश्वर सिंह के पुत्र थे। इन तीनों भाइयों में सबसे बड़े थे राजकुमार जीवेश्वर सिंह, फिर थे राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह और सबसे छोटे थे राजकुमार शुभेश्वर सिंह। महाराजाधिराज की मृत्यु के समय सिर्फ राजकुमार जीवेश्वर सिंह का ही विवाह हुआ था और उनकी पत्नी थी श्रीमती राजकिशोरी जी। शेष दो भाई – राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह और राजकुमार शुभेश्वर सिंह नाबालिग थे। </p>
<p><strong>राजकुमार जीवेश्वर सिंह अपनी प्रथम पत्नी श्रीमती राजकिशोरी जी के रहते हुए भी, दूसरी शादी भी किए। कुमार जीवेश्वर सिंह के प्रथम पत्नी से दो बेटियां – कात्यायनी देवी और दिब्यायानी देवी हुई और दूसरी पत्नी से पांच बेटियां – नेत्रायणी देवी, चेतना, द्रौपदी, अनीता, सुनीता  – हुई । कहा जाता है की जीवेश्वर सिंह दूसरी शादी अपने ही घर के एक ब्राह्मण, जो उनके पूजा-पाठ इत्यादि का बंदोबस्त करते थे, फूल तोड़ते थे, की बेटी से किये। जीवेश्वर सिंह को दोनों पत्नियों से पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। यह भी कहा जाता है कि किसी भी अन्य सदस्यों की तुलना में जीवेश्वर सिंह अधिक शिक्षित थे और महाराजाधिराज के समय-काल में दुनिया भी देखे थे। दरभंगा राज के लोग उन्हें “युवराज” भी कहते थे।</strong> </p>
<p>कहा जाता है कि महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद कुमार जीवेश्वर सिंह को महाराजा की संपत्ति से “बेदखल” कर दिया गया। ऐसा क्यों हुआ यह तो शोध का विषय तो है, लेकिन शोध से परे नहीं है। विवाह के बाद जब तक महाराजाधिराज जीवित थे, राज किशोरी दरभंगा के नरगौना पैलेस में ही रहती थीं। बाद में, अपने पति के साथ वे बेला पैलेस आ गई ।तत्कालीन सरकार ने दरभंगा राज के ही किसी ‘महत्वकांक्षी’ व्यक्ति के ताल-मेल से जब बेला पैलेस पर अपनी निगाहें जमा ली, तो राज किशोरी यूरोपियन गेस्ट हाउस में रहने लगीं। लेकिन सरकार की नजर उनके साथ-साथ चल रही थी। यूरोपियन गेस्ट हॉउस भी दरभंगा राज के स्वामित्व से फिसल गया। इसके बाद वे बलभद्रपुर स्थित आवास में ही उनका शेष समय बीता। अपने पति की मृत्यु के बाद राज किशोरी बेहद एकांत में रहने लगी थी। पिछले वर्ष श्रीमती राज किशोरी का देहांत हो गया। वे दरभंगा के लहेरियासराय के बलभद्रपुर मोहल्ले स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। </p>
<p>राजकुमार यज्ञेश्वर सिंह, जो राजा बहादुर विशेश्वर सिंह के मझले बेटे थे, को तीन बेटे हुए  – कुमार रत्नेश्वर सिंह, कुमार रश्मेश्वर सिंह और कुमार राजनेश्वर सिंह। इसमें कुमार रश्मेश्वर सिंह की अकाल मृत्यु हो गई थी। अपने मझले बेटे की अकाल-मृत्यु के बाद वे अपने अन्तःमन से टूट गए। जबकि राजबहादुर के सबसे छोटे पुत्र राजकुमार शुभेश्वर सिंह के दो पुत्र हुए – राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह। कुमार शुभेश्वर सिंह और उनकी पत्नी दोनों वर्षों पहले मृत्यु को प्राप्त किये। </p>
<p><strong>आगे पढ़ें : माधवेश्वर में दरभंगा राज की महिलाओं को वह सम्मान, स्थान  नहीं मिला जिसका वे भी हकदार थीं </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/great-grandmother-passed-away-after-waiting-her-entire-life-for-a-glass-of-water">​दरभंगा के लोग कहते हैं: ​&#8217;दादी एक गिलास पानी के लिए जीवन पर्यन्त प्रतीक्षा करते परलोक सिधारी, पौत्र &#8216;राजसी ठाठ से मृत्योपरांत कर्म करेंगे&#8217; (मृत्योपरांत कहानी श्रृंखला-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8216;अपवाद छोड़कर&#8217; बिहार के राजाओं की &#8216;गरिमा&#8217; अगली पीढ़ियां &#8216;बरकरार&#8217; नहीं रख सकीं ✍ वैसे समाज में शिक्षा का प्रचुर विकास हुआ, दुःखद 😢 (भाग-3)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 09 Oct 2022 06:21:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[banaily]]></category>
		<category><![CDATA[cases]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पूर्णिया / कटिहार : क्या दरभंगा, क्या मधुबनी, क्या डुमरांव, क्या गिद्धौर, क्या रामगढ़, क्या कुर्सेला, क्या बेतिया, क्या टेकारी, क्या जोगनी, क्या शिवहर &#8230;  बिहार ही नहीं, देश के सभी राज्यों में जिस जद्दोजेहद, मसक्कत, सेवा, त्याग, समर्पण के साथ तत्कालीन जमींदारों ने, राजाओं ने अपने-अपने घरानों को मजबूत बनाए, प्रजाओं के हितार्थ सामाजिक [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/barring-exceptions-the-nest-generations-could-not-maintain">&#8216;अपवाद छोड़कर&#8217; बिहार के राजाओं की &#8216;गरिमा&#8217; अगली पीढ़ियां &#8216;बरकरार&#8217; नहीं रख सकीं ✍ वैसे समाज में शिक्षा का प्रचुर विकास हुआ, दुःखद 😢 (भाग-3)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पूर्णिया / कटिहार : क्या दरभंगा, क्या मधुबनी, क्या डुमरांव, क्या गिद्धौर, क्या रामगढ़, क्या कुर्सेला, क्या बेतिया, क्या टेकारी, क्या जोगनी, क्या शिवहर &#8230;  बिहार ही नहीं, देश के सभी राज्यों में जिस जद्दोजेहद, मसक्कत, सेवा, त्याग, समर्पण के साथ तत्कालीन जमींदारों ने, राजाओं ने अपने-अपने घरानों को मजबूत बनाए, प्रजाओं के हितार्थ सामाजिक कल्याण का कार्य कर अपना नाम, शोहरत, धन, सम्पदा एकत्रित किये; उनके देहावसान के बाद (अपवाद छोड़कर) शायद ही कोई घराने के वंशज या घराना ऐसा बचा है, जो संपत्ति के बंटवारे को लेकर प्रदेश के उच्च न्यायालयों के रास्ते जिला न्यायालयों से देश के सर्वोच्च न्यायालय तक अपनी-अपनी अर्जियां नहीं जमा किये होंगे, परन्तु उनकी गरिमाओं को नहीं बरक़रार रख सके । इतिहास इस बात का साक्षी है कि &#8216;राजघराने में संपत्ति के लिए न्यायालयों में मुकदमा दर्ज करना &#8216;खास&#8217; नहीं, &#8216;आम&#8217; बात हो गयी है। </strong></p>
<p>शायद बहुत काम लोग इस बात से भिज्ञ होंगे कि देश में संविधान लागू होने के पूर्व ही &#8216;जमींदारी एबॉलिशन बिल्स&#8217; अपना कार्य करना प्रारम्भ कर दिया था। वैसे इसे स्वतंत्र भारत में महत्वपूर्ण &#8216;कृषि सुधार&#8217; शब्दों से अलंकृत किया गया, और तत्कालीन संघीय प्रोविंसों मसलन: सेन्ट्रल प्रोविंस, युनाइटेड प्रोविंस, बिहार, असम, मद्रास और बम्बई में जमींदारी एबॉलिशन कमिटी के आदेशानुसार लागू कर दिया गया था। यह अलग बात है कि स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई में उन जमींदारों ने तत्कालीन राजनेताओं को, क्रांतिकारियों को सभी तरह से मदद का हाथ बढ़ाये थे। </p>
<p>इस नियम और कानून के बारे में विश्लेषण तो ज्ञानी-महात्मा करेंगे, लेकिन आज़ादी के चार साल बाद यानी सन 1951 में भारत का संविधान लागु होने के 15 दिनों के अंदर पहला संशोधन और फिर 1955 में दूसरा संशोधन कानून पारित किया गया। फिर सन 1956 में &#8216;जमींदारी एबॉलिशन एक्ट&#8217; पारित हुआ। लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकत है कि इस कानून के लागु होने के बाद तत्कालीन जमींदारों, राजाओं को जो &#8216;नुकसान की भरपाई&#8217; की गई वह &#8216;कम&#8217; ही नहीं &#8216;बहुत कम&#8217; था। खैर। </p>
<p><strong>आज़ाद भारत में जमींदारी प्रथा समाप्त होने के बाद, खासकर जमींदारों / राजाओं की प्रथम पीढ़ी अथवा आधिकारिक रूप से उनके उत्तराधिकारियों की मृत्यु के बाद उनकी सम्पत्तियों का (अपवाद छोड़कर) जो हश्र हुआ अथवा हो रहा है, वह सम्बद्ध क्षेत्र के लोग चश्मदीद गवाह रहे हैं, हैं। बिहार ही नहीं, देश के सभी राज्यों में, जमींदारी कानून के तहत जमींदारों / राजाओं / महाराजाओं की सम्पतियों पर आधिपत्य समाप्त हुआ (कानून के तहत छोड़े गए हिस्सों को छोड़कर); लेकिन समयांतराल उनके उत्तराधिकारियों, सम्बन्धियों, दूर-दराज के लोगों, राजनेताओं, दवंगों के द्वारा जिस कदर उनकी सम्पत्तियों को नेश्तोनाबूद किया गया, उनकी गरिमाओं को मिट्टी-पलीद किया, भारत का न्यायालय गवाह है।</strong> </p>
<p>आज आज़ादी के 75-वर्ष बाद (अपवाद छोड़कर) प्रदेश के जमींदारों के आज की पीढ़ियों को देखकर, उनकी सम्पत्तियों को देखकर, उनकी कीर्तियों को नेश्तोनाबूद होते देखकर मन और आत्मा अश्रुपूरित हो जाता है। कल जिन चौखटों पर समाज के लोगों के कल्याणार्थ राजा, महाराजाओं, जमींदारों की मानवता और मानवीयता चौबीसो-घंटे तत्पर रहता था, आज वह चौखट कराह (अपवाद छोड़कर) रहा है। संपत्ति के बंटबारे को लेकर देश के न्यायालयों में लाल वस्त्र में बंधे लाखों-लाख दस्तावेज बिलख रहे हैं। </p>
<p>इस बात से सभी अवगत है कि राजघराने में संपत्ति के लिए जिला न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय तक मुकदमा दायर करना &#8216;खास&#8217; नहीं, &#8216;आम&#8217; बात है। वजह यह है कि संपत्ति एक निर्जीव वस्तु होने के बावजूद, स्वयं इतना सामर्थ्यवान होता है कि पृथ्वी के सभी &#8216;सजीवों&#8217; को, विशेषकर मनुष्य जाति की प्रजाति को अपनी ओर बिना किसी रंग, जाति, धर्म का भेद-भाव के अपनी ओर आकर्षित करने की बेशुमार कूबत रखता है। यह बात भारत के संभ्रांत और धनाढ्य अधिक समझेंगे। </p>
<p>भारत में, खासकर मिथिला क्षेत्र में, शायद ही कोई महामानव होंगे, महिला होंगी जो अपने पूर्वजों के देहावसान के बाद उनकी संपत्ति में अपने हिस्से की बात नहीं किये हों। आम तौर पर मिथिला के समाज में परिवार के मुखिया के देहावसान के बाद संपत्ति का बंटवारा जिस द्रुत गति से होता है, शायद संपत्ति बनाने में परिवार के मुखिया को अपना जीवन निकाल देना होता है और इस वेदना तथा संवेदना को &#8216;मुफ्त में मिलने वाली संपत्ति के मालिक भी नहीं समझते हैं । शब्द बहुत कटु है, लेकिन सत्य यही है।  </p>
<p><strong>इतना ही नहीं, संपत्ति के लिए पुत्र को पिता के खिलाफ, भाई को भाई के खिलाफ, बहन को भाई के खिलाफ, माँ-दादी को बेटे-पोते के खिलाफ, बेटे-पोते को माँ-दादी के खिलाफ, भतीजे हो चाचा के खिलाफ जाने में मिनट की देरी नहीं होती। अगर ऐसा नहीं होता तो आज देश के न्यायालयों में तक़रीबन 10848584 दीवानी मुकदमें, जिसमें अधिकांश भूमि/संपत्ति विवाद से सम्बंधित है, लंबित नहीं होता। वैसे मिथिला राज्य के प्रस्तावित जिलाओं के न्यायालयों को देखें, तो भूमि और संपत्ति से सम्बंधित विवाद लाखों में मिलेंगे। इसका जीवंत दृष्टान्त है दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद दरभंगा राज का, राज की संपत्ति का &#8216;विनाशकारी हश्र&#8217; है । वैसे संपत्ति के बंटवारे के मामले में &#8216;न्यायालयों का शरण लेना&#8217; &#8216;अपने-अपने सम्बन्धियों पर मुकदमा करना&#8217; मिथिला के मिथिलेश के परिवारों के सदस्यों का जवाब नहीं। खैर।</strong>  </p>
<figure id="attachment_4546" aria-describedby="caption-attachment-4546" style="width: 1194px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Lilanand-singh.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Lilanand-singh.jpeg" alt="" width="1194" height="1600" class="size-full wp-image-4546" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Lilanand-singh.jpeg 1194w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Lilanand-singh-224x300.jpeg 224w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Lilanand-singh-764x1024.jpeg 764w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Lilanand-singh-768x1029.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Lilanand-singh-1146x1536.jpeg 1146w" sizes="auto, (max-width: 1194px) 100vw, 1194px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4546" class="wp-caption-text">राजाबहादुर लीलानंद सिंह (1816-1883)</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, बनैली राज के गिरिजानंद सिंह, जो अपने पूर्वजों के धरोहर, उनकी कीर्तियों को, जनहित में उनके द्वारा सम्पादित कार्यों को सुरक्षित और संरक्षित रखने के साथ-साथ भरसक आगे बढ़ाने का अनवरत कोशिश कर रहे है, <strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> से कहते है कि &#8220;बनैली राज में राजा लीलानंद सिंह की मृत्यु के कुछ वर्ष बाद ही उनकी पत्नी रानी सीतावती देवी ने 1888 ई में अपने नाबालिग बेटों की तरफ से पद्मानन्द सिंह के विरुद्ध बंटबारे का मामला दायर किया। पद्मावती ने रानी सीतावती को इस्टेट में हिस्सा देने से साफ़ इंकार कर दिया था, परन्तु बाद में अपनी पत्नी पद्मावती के दवाब में आकर संधि के लिए राजी हो गए। कुँवर कलानंद और कुँवर कीर्त्यानंद को राज बनैली में 9 आना का हिस्सा मिला और पद्मानंद 7 आना लेकर अलग हो गए।&#8221; </p>
<p>गिरिजानंद सिंह के अनुसार, &#8220;राजा पद्मानंद सिंह पिता की भांति दान शील तो थे ही, भगवान शिव के अनन्य भक्त भी थे। देवघर के बैद्यनाथ मंदिर के सिंह द्वार का निर्माण राजा पद्मानंद सिंह ने कराया था। सन 1902 ई. में पांच बीघा जमीन और प्रचुर धन देकर उन्होंने पूर्णिया में &#8216;विक्टोरिया मेमोरियल टाउन हॉल&#8217; का निर्माण भी करवाया। उनके बड़े बेटे कुँवर चन्द्रानन्द सिंह मानसिक रूप से अविकसित थे और यही कारण था कि एक योग्य वारिस के आभाव में पद्मानंद भौतिक मूल्यों के प्रति अति असावधान हो गए और अत्यधिक खर्च करते हुए गले तक कर्ज में धंस गए।&#8221;  </p>
<p>सन 1908 ई में कुँवर चन्द्रानन्द सिंह की मृत्यु के बाद उनकी विधवा रानी चन्द्रावती देवी, 7 आना इस्टेट की मालकिन बनी। बाद में, रानी चन्द्रावती ने 3 आना हिस्सा अपने दायाद कीर्त्यानंद, रमानन्द और कृष्णानंद के हाथों बेचकर अपने ससुर द्वारा लिए गए कर्जों की चुकती कीं । रानी चन्द्रावती की मृत्यु के बाद 4 आना इस्टेट में से डेढ़ आना राजा कीर्त्यानंद को, और ढ़ाई आना उनकी ननद राजकुमारी मोती दाईजी के बेटों को मिला।&#8221; </p>
<p>गिरिजानन्द सिन्हा आगे कहते हैं कि &#8220;राजा पद्मानन्द सिंह के दूसरे पुत्र कुमार सूर्यानंद सिंह बड़े होनहार और ओजस्वी थे। परन्तु दुर्भाग्यवश वे किशोरावस्था में ही चल बसे और राजकुमारी मोती दाई के वंशज बनैली राज की रामनगर शाखा के रूप में जाने गए।&#8221; सिन्हा साहब के अनुसार, &#8220;राजा पद्मानंद की पत्नी पद्मावती देवी द्वारा 1912 ई. में और उनकी पुत्रवधू रानी चंद्रावती देवी द्वारा 1924 ई. में बनारस में तारा मंदिर ट्रस्ट और श्यामा मंदिर ट्रस्ट की स्थापना की गई। श्यामा मंदिर ट्रस्ट के अंतर्गत 1927 में &#8216;आदर्श रानी चंद्रावती श्यामा महाविद्यालय&#8217; खोला गया जिसे आज भी बनारस के संस्कृत शिक्षा संस्थानों में अग्रणी माना जाता है।&#8221;</p>
<figure id="attachment_4547" aria-describedby="caption-attachment-4547" style="width: 953px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Padmanand-singh.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Padmanand-singh.jpeg" alt="" width="953" height="1600" class="size-full wp-image-4547" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Padmanand-singh.jpeg 953w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Padmanand-singh-179x300.jpeg 179w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Padmanand-singh-610x1024.jpeg 610w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Padmanand-singh-768x1289.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Padmanand-singh-915x1536.jpeg 915w" sizes="auto, (max-width: 953px) 100vw, 953px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4547" class="wp-caption-text">राजाबहादुर पद्मानन्द सिंह (मृत्यु: 1912)</figcaption></figure>
<p>गिरिजानन्द सिन्हा के अनुसार, &#8220;राजा लीलानंद सिंह के दूसरे पुत्र राजा कलानंद सिंह बहादुर का जन्म 1880 ई. में हुआ। जन्म के 30 वें वर्ष के जनवरी माह में, यानी 1910 में ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें &#8216;राजा&#8217; की उपाधि मिली। राजा लीलानंद सिंह के तीसरे पुत्र, राजा बहादुर कीर्त्यानंद सिंह का जन्म 1883 (23 सितम्बर) को हुआ और ब्रिटिश सरकार ने इन्हे 1914 में &#8216;राजा&#8217; और पुनः 1919 में &#8216;राजा बहादुर&#8217; की पदवी से सम्मानित किया। कलानंद और कीर्त्यानंद में बड़ी मैत्री थी। रानी पद्मावती देवी की मदद से इन दोनों ने राजा पद्मानन्द के हिस्से के 7 आने को ठीका प्रबंध पर ले लिया और यह व्यवस्था 1936 तक चलती रही। सन 1919 तक दोनों भाई साथ-साथ ड्योढ़ी बनैली चंपानगर में रहे और वह काल राज बनैली का स्वर्णिम काल रहा।&#8221;</p>
<p>राजा कलानंद सिंह के पुत्र कुमार रामानंद सिंह अपने पिता के सम्मान और स्मृति में गढ़बनैली में एक अंग्रेजी माध्यम उच्च विद्यालय की स्थापना किये और उसका नाम &#8220;कलानंद उच्च विद्यालय&#8217; रखा। इसी तरह, पूर्णियां बालिका उच्च विद्यालय को उन्होंने तीन बिधा जमीन और प्रचुर धन देकर जिले में स्त्री शिक्षा के प्रति अपना कर्तब्य निभाया। इतना ही नहीं, गढ़बनैली में अपना निजी अतिथि भवन देकर &#8216;रामानंद मध्य विद्यालय&#8217; खुलवाया। जलालाबाद (मुंगेर) में स्थित &#8216;रामानंद हाई स्कूल&#8217; भी उन्हीं की देन है। पूर्णिया में चिकित्सा सुविधा में विकास लाने की दिशा में कुमार रामानंद सिंह द्वारा की गई सेवा को भुलाया नहीं जा सकता। एक लाख रुपयों का दान देकर अस्पताल परिसर में उन्होंने एक भवन बनवाया जिसे आज भी &#8216;रामानंद ब्लॉक&#8217; के नाम से जाना जाता है। साथ ही, अस्पताल के विकास के लोइये आर्थिक सहायता की गई। उन्होंने गढ़बनैली में &#8216;कलावती दातव्य औधालय&#8217; की स्थापना की जो उनकी माता की स्मृति में है। </p>
<p>कुमार रमानन्द सिंह के छोटे भाई कुमार कृष्णानंद सिंह बड़े सुदर्शन व्यक्तित्व के मालिक थे और प्रजाजनों के बीच उनका बड़ा ही सम्मान था।बाद  में  वे सुलतानगंज जा बसे। गढ़बनैली के महल और उद्यान अपने सौंदर्य, भव्यता और स्थापत्य कला के लिए मशहूर थे। &#8216;नबका पक्का&#8217; नामक महल रामानंद सिंह की कलात्मक रुचियों का प्रमाण है। सन 1936 ई इस महल का निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ परन्तु उनकी असामयिक मृत्यु के कारण वह आज भी अधूरा ही रहा । वैसे तो समुच गढ़बनैली ही एक सुन्दर, सुनियोजित नक़्शे के अनुसार बना था, परन्तु &#8216;सिंह दरवाजे&#8217; के सामने एक सौ बीघे में फैला हुआ उद्यान और सफ़ेद सीमेंट से बनाया गया नक्काशीदार नाट्यशाला अपनी सुंदरता के लिए प्रख्यात था। कला भवन नाम से प्रसिद्द वहां के राजप्रासाद को जिले का  सर्वाधिक विशाल भवन होने का गौरव प्राप्त था। परन्तु दुर्भाग्यवश रामानंद के वंशज उसे संभल नहीं सके। फिर भी ड्योढ़ी के कुछ बचे हुए अंश आज भी दर्शनीय हैं। </p>
<figure id="attachment_4548" aria-describedby="caption-attachment-4548" style="width: 1226px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/G1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/G1.jpg" alt="" width="1226" height="1192" class="size-full wp-image-4548" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/G1.jpg 1226w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/G1-300x292.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/G1-1024x996.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/G1-768x747.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/G1-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/G1-48x48.jpg 48w" sizes="auto, (max-width: 1226px) 100vw, 1226px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4548" class="wp-caption-text">गिरिजानंद सिन्हा</figcaption></figure>
<p>गिरिजानंद सिन्हा आगे कहते हैं कि &#8220;राजा कृत्यानंद सिंह के बड़े पुत्र कुमार श्यामनन्द सिंह के समय में बनैली का नाम शास्त्रीय संगीत के संरक्षक और प्रचारक के रूप में उभरा और 1938 से 1965 तक चम्पानगर ड्योढ़ी में भारतीय शास्त्रीय संगीत का भव्य आयोजन होता रहा। इस कालखंड में भारत के लगभग सभी महान कलाकारों ने यहाँ अपनी प्रस्तुति की। इन संगीत सम्मेलनों के फलस्वरूप ही पूर्णियां की जनता शास्त्रीय संगीत के प्रति अधिक जागरूक होती गई और पूर्णियां की संस्कृति के साथ संगीत का नाम सदा के लिए जुड़ गया। कुमार श्यामानन्द सिंह स्वयं भी एक उच्च कोटि के संगीतज्ञ थे और ख्याल तथा बंदिश गाने में उन्हें महारत हासिल थी। कलकत्ता के पंडित भीष्मदेव चटर्जी, आगरा के उस्ताद बाचू खाँ, दिल्ली के उस्ताद मुज़फ़्फ़र खाँ, इलाहाबाद के पंडित भोलानाथ भट्ट सरीखे संगीत के दिगज्जों से कुमार श्यामानंद सिंह ने प्रशिक्षण लिया था। </p>
<p>चंपानगर-पूर्णिया में लोग आज भी इस बात को भूले नहीं हैं की कुमार श्यामानंद सिंह एक उच्च कोटि के खिलाड़ी भी थे। फुलबॉल के क्षेत्र में जिला स्तर पर और बिलियर्ड्स के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें ख्याति प्राप्त थी। बनैली की चंपानगर शाखा की तरफ से उन्होंने जिला खेलकूद संघ को अपना निजी मैदान देकर पूर्णिया खेलकूद जगत को एक अमूल्य उपहार दिया। अखिल भारतीय संगीत नाटक अकादमी में उन्होंने बिहार का प्रतिनिधित्व भी किया और 1948 ई. में प्रयाग संगीत समिति द्वारा आयोजित अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन में दीक्षांत भाषण भी दिया था। सन 1966 के बाद वे पूर्णिया के निकटवर्ती क्षेत्र में भक्ति संगीत के प्रचार-प्रसार के प्रति समर्पित रहे। सन 1994 ई. में वे महादेव के पास कूच कर गए। </p>
<p>यह कहने में तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं है कि बनैली चंपानगर की ड्योढ़ी और महल आदि पुराने भवन स्थापत्य कला की दृष्टि से दर्शनीय तो है ही, तत्कालीन जमींदार-राजाओं के आवासीय संरचना के मॉडल के रूप में भी विद्यमान है। सन 1869-70 ई. में रानी चण्डेश्वरी देवी द्वारा स्थापित देवघरा और 1897 ई. में रानी सीतावती देवी द्वारा निर्मित सीतेश्वर महादेव और राधा-कृष्ण मंदिर यहाँ के मुख्य आकर्षण हैं। </p>
<p><strong>क्रमशः </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/barring-exceptions-the-nest-generations-could-not-maintain">&#8216;अपवाद छोड़कर&#8217; बिहार के राजाओं की &#8216;गरिमा&#8217; अगली पीढ़ियां &#8216;बरकरार&#8217; नहीं रख सकीं ✍ वैसे समाज में शिक्षा का प्रचुर विकास हुआ, दुःखद 😢 (भाग-3)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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