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	<title>police Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>​बिहार का सत्यानाश(10)😢 राजनीति का अपराधीकरण बनाम अधिकारियों का राजनीतिकरण, कहते हैं बिहार का विकास करेंगे👁मतदाता कपार पीट रहा है😢वे समझते हैं ताली बजा रहा है😢</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/criminalization-of-politics-versus-politicization-of-officials-in-bihar</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 13 Apr 2025 12:32:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>डाक बंगला चौराहा (पटना): सत्तर के दशक से जिस तरह बिहार में अपराधियों का राजनीतिकरण शुरू हुआ था, बाद के वर्षों में अधिकारियों ने स्वयं अपना राजनीतिकरण प्रारम्भ कर दिया है। यानी कल राजनीति का अपराधीकरण हुआ था, आज राजनीति का अधिकारीकरण हो रहा है। वैसे सभी यही ताल ठोकते हैं कि &#8216;वे प्रदेश की भलाई के [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>डाक बंगला चौराहा (पटना): सत्तर के दशक से जिस तरह बिहार में अपराधियों का राजनीतिकरण शुरू हुआ था, बाद के वर्षों में अधिकारियों ने स्वयं अपना राजनीतिकरण प्रारम्भ कर दिया है। यानी कल राजनीति का अपराधीकरण हुआ था, आज राजनीति का अधिकारीकरण हो रहा है। वैसे सभी यही ताल ठोकते हैं कि &#8216;वे प्रदेश की भलाई के लिए कर रहे हैं, लेकिन इससे प्रदेश की कितनी भलाई हुई अथवा होगी, इस बात से वे भी भिज्ञ हैं और मतदाता तो अनभिज्ञ हैं ही नहीं, लाचार है। </strong>  </p>
<blockquote><p>अपराधियों ने जब सत्तर के कालखंड में इस बात को महसूस किया कि उनके बिना तत्कालीन राजनेताओं का अस्तित्व खतरे में आ सकता है, अपने अस्तित्व को मजबूत करने के लिए या फिर नेताओं का परस्पर लाभार्थी होने के उद्देश्य से स्वयं राजनीति में आने लगे। समय बदला और इस बदलते समय में राजनेताओं के पिछलग्गू अधिकारी जब इस बात को महसूस किए कि वे भी राजनीति में गोता लगा सकते हैं; अपने राजनीतिक मास्टर के बगल में बराबर की ऊँचाई में खड़े हो सकते है, अधिकारियों ने अपराधियों के राजनीतिक लाभ के तर्ज पर स्वयं का राजनीतिकरण शुरू कर दिया। वैसे भी प्रदेश का शैक्षिक दर इतना कम है कि मतदाता बात खुलकर बोल सकता है और न सोच सकता। उधर, चाहे अधिकारी हों या नेता, वे कभी चाहते ही नहीं कि मतदाता विचारवान हो। शब्द कटु है, लेकिन सत्य है और दुखद भी</p></blockquote>
<p>यह बोलने अथवा लिखने की आवश्यकता नहीं है, जहाँ तक भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का प्रश्न है। इसका दृष्टान्त नब्बे के दशक में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयोग टी.एन. शेषन से बेहतर और कोई नहीं हो सकता। स्वतंत्र भारत में चुनावी गंदगी को साफ़ करने में अगर किसी का नाम लिया जाता है, या आने वाले दिनों में भी लिया जायेगा तो टी.एन. शेषन का नाम सर्वोपरि होगा। साल 1990-96 के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में शेषन ने चुनावी प्रणाली को साफ करने की प्रक्रिया शुरू की थी। मतदाताओं के लिए फोटो पहचान पत्र की शुरुआत इसी दिशा में एक कदम था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि आदर्श आचार संहिता, जिसे तब तक अकादमिक हित का दस्तावेज माना जाता था, को पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा गंभीरता से लिया जाए। अपने पद से बाहर जाने के लिए आलोचनाओं का सामना करने के बावजूद, श्री शेषन ने बाहरी दुनिया को दिखाया कि उनका पद कोई आसान काम नहीं है।</p>
<figure id="attachment_6307" aria-describedby="caption-attachment-6307" style="width: 1984px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1.jpg" alt="" width="1984" height="2264" class="size-full wp-image-6307" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1.jpg 1984w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1-263x300.jpg 263w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1-897x1024.jpg 897w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1-768x876.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1-1346x1536.jpg 1346w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1-1795x2048.jpg 1795w" sizes="(max-width: 1984px) 100vw, 1984px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6307" class="wp-caption-text">पूर्व चुनाव आयुक्त (दिवंगत) टी एन शेषन और पूरब भारतीय पुलिस के अधिकारी डॉ. अजय कुमार, अब राजनीति में (Pic: from Kumar&#8217;s Twitter page)</figcaption></figure>
<p>शेषन अवकाश के बाद भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी के विरुद्ध गांधीनगर से चुनाव लड़े, हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद 1997 में आर.के.नारायणन के विरुद्ध राष्ट्रपति के लिए चुनाव लड़े, हार का सामना करना पड़ा। अंततोगत्वा मन में अधूरे कार्यों को पूरे करने की इक्षा लिए 10 नवम्बर, 2019 को अनंत यात्रा पर निकल गए। शेषन महज एक दृष्टान्त थे एक अधिकारी के रूप में जो अपने कार्यकाल में वैसा बहुत कुछ किये, जो एक अधिकारी को करना चाहिए। उन्हें भी अंत में राजनीति में आने की लालसा हुई, लेकिन अधूरी रह गयी। हम पूरे देश की बात नहीं करेंगे, लेकिन जब बिहार की बात आएगी तो यह कहते, लिखते पीछे भी नहीं रहेंगे कि बिहार लोकसेवा आयोग के साथ-साथ संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षाओं में अव्वल आने के बाद, एक भारतीय प्रशासनिक अधिकारी के रूप में अपना स्थान बनाने के बाद, सेवाकाल के दौरान अथवा सेवानिवृति के बाद, यहाँ तक कि नौकरी से त्यागपत्र देकर राजनीति में गोता लगाने के लिए आज अधिकारियों की संख्या क्यों बढ़ रही है?  </p>
<p><strong>विगत पचास वर्षों का इतिहास अगर देखा जाए उन अधिकारियों का जो प्रशासनिक अथवा पुलिस सेवा के बाद/बीच में त्यागपत्र देकर अगर राजनीति में आये तो उससे प्रदेश को क्या मिला? जिन मतदाताओं ने उनके लिए अपनी बाएं हाथ की तर्जनी पर चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित स्याही लगाए ताकि उनका भविष्य उज्जवल हो, वे अधिकारी से राजनेता बने लोग उन मतदाताओं के चेहरों पर कालिख पोतने के अलावे क्या दिए? उनके विधानसभा अथवा संसदीय क्षेत्र के मतदाता एक घूंट पानी के लिए, एक टुकड़ा दवाई के लिए, एक रोटी के लिए, एक नियोजन के लिए, अपने बाल-बच्चों की पढ़ाई के लिए उम्मीद की आस लिए सांस लेते लेते अंतिम सांस ले लिए, लेकिन न प्रदेश का हित हुआ और ना ही मतदाता का। आप माने अथवा नहीं, लेकिन यह एक गहन शोध का विषय है। </strong></p>
<p>इतना ही नहीं, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी जी. कृष्णाया की हत्या भी एक दृष्टान्त है। मधेपुरा के तत्कालीन राज नेता आनंद मोहन ने 5 दिसंबर 1994 को मुजफ्फरपुर में गोपालगंज के जिलाधिकारी जी कृष्णैया की हत्या कर दी थी। आनंद मोहन उक्त अधिकारी को उनकी आधिकारिक कार से बाहर खींच लिया गया और पीट-पीट कर मार डाला था। सन 1985 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी जी कृष्णैया वर्तमान तेलंगाना के महबूबनगर के रहने वाले थे। आनंद मोहन की रिहाई के तत्काल बाद जी कृष्णैया की विधवा ‘आश्चर्य’ व्यक्त की। आश्चर्य व्यक्त करना स्वाभाविक भी है। जी कृष्णैया की मृत्यु के बाद आनंद मोहन भले कारावास में हों, उनकी पत्नी श्रीमती लवली आनंद भारत के संसद में थी और बाद में पुत्र बिहार विधानसभा में विधायक। लेकिन जी कृष्णैया के बारे में, उनके परिवार के बारे में न तो व्यवस्था सोची और न ही राजनीतिक पार्टियों के नेता चाहे पटना के हों या दिल्ली में बैठे हों। वैसे चेतन आनंद यह कहते हैं कि ‘उस घटना के बाद दोनों परिवार काफी कुछ सहा है।’ </p>
<p>समय का तकाजा देखिए। जिस राष्ट्रीय जनता दल के शीर्षस्थ नेता, जो बाद में ऐतिहासिक चारा घोटाला कांड में पहले आरोपी बने और फिर सजाभोक्ता के साथ-साथ मुख्यमंत्री कार्यालय से बाहर भी हुए, आनंद मोहन को कभी हाथ नहीं पकड़े, मदद नहीं किये। आज आनंद मोहन के पुत्र चेतन आनंद बिहार के शिवहर से राष्ट्रीय जनता दल के विधायक हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की देखरेख में प्रदेश सरकार द्वारा जेल मैनुअल के नियमों में संशोधन किया गया और एक आधिकारिक अधिसूचना के आधार पर आनंद मोहन सहित 27 आपराधिक-कैदियों को जो 14 साल या 20 साल कारावास की सजा काट चुके, रिहा करने का आदेश दिया गया। रिहाई से पहले 15 दिनों तक वे ‘पे-रोल’ पर थे। </p>
<p><strong>अगर ख़बरों पर विश्वास करें तो आज 200 से अधिक भारतीय प्रशासनिक, पुलिस सेवा के अधिकारी, चिकित्सक, अधिवक्ता, और विभिन्न व्यवसायों के लोग विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के झंडों को अपने गले में बांध रहे हैं, उसके हो रहे हैं। वे कहते हैं बिहार का उद्धार होगा। सेवानिवृत्त पुलिस सेवा के अधिकारियों में आर. के.  मिश्रा, एस. के. पासवान, के. के. वर्मा और के. बी. सिंह शामिल हैं। मिश्रा पूर्व डीजी (होमगार्ड) थे जबकि एसके पासवान छत्तीसगढ़ के डीजी (जेल) के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। इसके अलावे अजय कुमार द्विवेदी (पश्चिम चंपारण, सेवानिवृत्त विशेष सचिव, कैबिनेट, बिहार सरकार); अरविंद कुमार सिंह (भोजपुर, सेवानिवृत्त सचिव, पूर्व जिला मजिस्ट्रेट, कैमूर और पूर्णिया); ललन यादव (मुंगेर, सेवानिवृत्त आयुक्त, पूर्णिया, डीएम, नवादा, कटिहार); तुलसी हजार (पूर्वी चंपारण; सेवानिवृत्त प्रशासक बेतिया राज, बिहार सरकार); सुरेश शर्मा (गोपालगंज, सेवानिवृत्त संयुक्त सचिव, स्वास्थ्य विभाग, बिहार सरकार) और गोपाल नारायण सिंह (औरंगाबाद, सेवानिवृत्त संयुक्त (सचिव, ग्रामीण कार्य विभाग, बिहार सरकार) का भी नाम आता है।</strong> </p>
<figure id="attachment_6306" aria-describedby="caption-attachment-6306" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6306" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2-24x24.jpg 24w" sizes="(max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6306" class="wp-caption-text">डॉ. अजय कुमार, अब राजनीति में (Pic: from Kumar&#8217;s Twitter page)</figcaption></figure>
<p>इससे पहले के वर्षों में डॉ. अजय कुमार, जो 1986-1996 तक भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी थे, जमशेदपुर के पुलिस अधीक्षक भी थे, राजनीति में प्रवेश किये। रामचन्द्र प्रसाद सिंह, भाप्रसे के अधिकारी थे, नीतीश कुमार के मुख्य सचिव भी थे, राजनीति में चादर ढंक लिए, कहे प्रदेश का भलाई करेंगे। कभी जनता दल यूनाइटेड में रहे, कभी भाजपा में कटवत बदल लिए फिर अपनी पार्टी बनाये। उससे भी पहले दिल्ली के पुलिस आयुक्त निखिल कुमार, जिनका परिवार प्रदेश की राजनीति में ही सांस लिया, सेवा के पश्चात सांसद बने, फिर राजनीति में गोता लगाते गए। </p>
<p>भाप्रसे के एक और अधिकारी यशवंत सिन्हा 24 वर्ष सरकारी सेवक रहने के बाद पहले जनता दल के हुए, फिर बाद में भाजपा के हो गए। केंद्र में मंत्री भी बने। बाबू जगजीवन राम की पुत्री श्रीमती मीरा कुमार, 1973 में भारतीय विदेश सेवा की अधिकारी बनी, राजनीति में डुबकी लगा दीं। लोक सभा की अध्यक्षा भी बनी। 1975 बैच के भाप्रसे राजकुमार सिंह जिन्होंने लालू यादव के कहने पर लाल कृष्ण आडवाणी को उनके प्रथम रथयात्रा के दौरान गिरफ्तार किया था, भाजपा के हो गए, केंद्र में मंत्री भी बने। गुप्तेश्वर पाण्डे अवकाश के पूर्व नौकरी छोड़ दिए और राजनीति में कम्बल ढँक लिए। सुनील कुमार आज नितीश के मंत्रिमंडल में बैठे हैं। लेकिन बिहार को छोड़िये, उनके संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं को क्या मिला ? </p>
<blockquote><p>उसी भाप्रसे-भापुसे यात्रा की अगली कड़ी में विगत दिनों भारतीय पुलिस सेवा के एक और अधिकारी बिहार में बहती राजनीतिक धारा में गोंता लगा दिए। महाराष्ट्र के मूलवासी शिवदीप लांडे, अब महाराष्ट्र के लोगों के लिए नहीं, बल्कि बिहार के लोगों की भलाई के लिए लड़ाई लड़ेंगे। महाराष्ट्र के &#8216;शिवसेना&#8217; के तर्ज पर लांडे ने &#8216;हिंद सेना&#8217; नाम से नई राजनीतिक पार्टी की शुरुआत की। पटना में प्रेस सम्मेलन में उन्होंने इसकी घोषणा करते कहा कि उनकी पार्टी बिहार के लोगों के हक के लिए लड़ेगी और सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। उनके अनुसार, आजादी के 78 साल के बाद भी प्रदेश में जो बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए थी, वह नहीं पहुंची। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आवास को अपनी पार्टी का प्रमुख कार्य सूची बताया। </p></blockquote>
<p>लांडे के अनुसार, वे पुलिसिंग किये हैं, इसलिए जानते हैं कि बिहार में हर साल करीब 2700 से 3000 हत्याएं होती हैं। इनमें से करीब 57% हत्या जमीन विवाद को लेकर होती हैं। यानी हर साल 1500 से ज्यादा लोग सिर्फ जमीन के झगड़े में मारे जाते हैं। हर दिन 4 से 5 लोग मारे जाते हैं। वैसी स्थिति में एक आम आदमी को न्याय कैसे मिलेगा?  उनका कहना है कि &#8216;बहुत से लोग सोचते हैं कि न्याय उनकी जेब में है लेकिन उनकी पार्टी का &#8216;न्याय&#8217; का अवधारणा सिर्फ उनके लिए है जो सच्चे गरीब, वंचित और पीड़ित हैं। लांडे ने कहा कि उनकी पार्टी का प्रतीक &#8216;त्रिपुण्ड और खाकी&#8217; होगा, जो उनके अब तक के जीवन दर्शन को दर्शाता है। यह प्रतीक मानवता, न्याय और सेवा को दर्शाएगा। </p>
<figure id="attachment_6308" aria-describedby="caption-attachment-6308" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6308" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6308" class="wp-caption-text">महाराष्ट्र के मूलवासी और पूर्व भापुसे अधिकारी शिवदीप लांडे, ​अब महाराष्ट्र के लोगों के लिए नहीं, बल्कि बिहार के लोगों की भलाई के लिए लड़ाई लड़ेंगे।</figcaption></figure>
<p>2006 बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे लांडे ने पिछले साल सितंबर में सेवा से इस्तीफा दे दिया था। लांडे ने कहा, &#8220;18 साल तक वर्दी में बिहार की सेवा करने के बाद अब मैं जनता के बीच एक नई भूमिका में आना चाहता हूं। हिन्दू सेना पार्टी बिहार को बदलने और विकास के रास्ते पर ले जाने के लिए काम करेगी।&#8221; महाराष्ट्र के अकोला जिले में जन्मे लांडे ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद सिविल सेवा में कदम रखा था। बिहार में उनकी पहली पोस्टिंग नक्सल प्रभावित मुंगेर जिले में हुई थी। स्वयं को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित करते शिवदीप लांडे ने कहा कि अब हमारा उद्देश्य युवाओं को जोड़ना, संगठन खड़ा करना और चुनाव के लिए वैचारिक ताकत तैयार करना है। शायद लांडे साहब इस बात से भिज्ञ नहीं हैं कि 1974 में जयप्रकाश नारायण ने भी &#8216;छात्रों को, युवाओं को संगठित कर सत्ता की लड़ाई लड़े थे। आज वही लड़ाकू सत्ता की गलियारे में बैठे हैं और प्रदेश का क्या हश्र है, यह न तो पुलिस फाइल से छिपा है और ना ही अदालत से।&#8221; खैर। </p>
<p>बिहार के राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि &#8220;बिहार में कुल मतदाताओं की संख्या 7.80 करोड़ है। इनमें 18-19 साल के सर्वाधिक कम उम्र के मतदाताओं की संख्या आठ लाख है। युवा में शुमार 30-39 आयु वर्ग के मतदाताओं की संख्या 2.04 करोड़ है। आमतौर पर यह माना जाता है कि ज्यादातर प्रौढ़ या बुजुर्ग मतदाता किसी न किसी दल के कोर वोटर होते हैं, जबकि युवा मतदाताओं का दिमाग कोरे स्लेट की तरह होता है। यानी ये फ्लोटिंग वोटर हैं। इन्हें जिस भी किसी दल या नेता पर विश्वास जम गया, वे उसी की ओर मुखातिब हो जाते हैं। बिहार में चूंकि ऐसे वोटरों की तादाद एक चौथाई है, इसलिए हर नया दल युवा को ही टारगेट करता है। जन सुराज के प्रशांत किशोर भी युवाओं की बात शिद्दत से रखते हैं। अब हिन्द सेना के शिवदीप लांडे भी युवाओं को लेकर ही राजनीति करने की बात कह रहे हैं।&#8221;</p>
<p>चलिए आगे बढ़ते हैं। मोहम्मद यूनुस (1 अप्रैल, 1937 से 19 जुलाई, 1937) और श्रीकृष्ण सिन्हा (20 जुलाई, 1937 से 31 अक्टूबर, 1939 तथा 23 मार्च, 1946 से 14 अगस्त, 1947 तथा 15 अगस्त, 1947 से 31 जनवरी, 1961) तक के मुख्यमंत्री कार्यालय का कालखंड कुछ क्षण के लिए अलग रखते हैं। साल 1961 के बाद साल 2025 तक बिहार को कुल 22 चेहरे मुख्यमंत्री के रूप में मिला। प्रदेश का आवाम साठ के दशक के कालखंड में क्या सोचता था, उसे भी अगर विश्रामावस्था में रखते हैं तो आज के मतदाताओं की नजर में इन 22 मुख्यमंत्रियों में कौन कैसा है? यह सभी &#8216;मन-आत्मा और शरीर से जीवित&#8217; पूर्व मुख्यमंत्रियों के साथ-साथ राजनेता जानते हैं।</p>
<blockquote><p>बिहार के लोगों का मानना है कि &#8220;इन 22 मुख्यमंत्रियों में सिवाय श्री भोला पासवान शास्त्री के अलावे कोई भी मुख्यमंत्री अग्निकुंड में प्रवेश कर अपनी छवि, अपनी ईमानदारी, मतदाता के प्रति अपनी वफ़ादारी की परीक्षा देने का कूबत नहीं रखता है। भ्रष्टाचार से लेकर अपराधों की दुनिया से प्रत्यक्ष ना सही, अप्रत्यक्ष रूप से सम्बन्ध रखता ही है। अगर भारत के निर्वाचन आयोग अपने कार्यालय में इन सम्मानित महानुभावों और राजनीतिक पार्टियों के झंडे तले राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले नेताओं द्वारा प्रस्तुत हलफनामे की तहकीकात करे, तो शायद दूघ और पानी की धाराएं अलग-अलग प्रवाहित दिखाई देगी। लेकिन निर्वाचन आयोग ऐसा नहीं कर सकती हैं और वह भी संविधान की धाराओं से बंधी है।&#8221; </p></blockquote>
<p> <br />
भारत को आज़ादी मिलने के बाद 15 अगस्त, 1947 से आज तक अविभाजित और विभाजित बिहार को दो दर्जन मुख्यमंत्री मिला। श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर नीतीश कुमार के बीच ब्राह्मण, क्षत्रिय, राजपूत, दलित, कायस्थ, मुसलमान, ग्वाला और कुर्मी जाति के नेता प्रदेश का राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व किये। इन विगत वर्षों में बिहार मे आधे कालखंड में लालू प्रसाद यादव-राबड़ी देवी और नीतीश कुमार कुछ 35 वर्षों तक (कुछ समय अन्य) मुख्यमंत्री के कार्यालय में विराजमान रहे, शेष 35 वर्षों में कांग्रेस पार्टी के नेताओं के साथ-साथ अन्य राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने मुख्यमंत्री पद संभाले। लेकिन श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर डॉ. जगन्नाथ मिश्र (1990) तक 35 वर्षों में विभिन्न मुख्यमंत्री के कालखंड में बिहार का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक क्षेत्रों की सेवाओं में जितना पतन हुआ, 1990 में लालू यादव का बिहार के राजनीतिक पटल पर अभ्युदय के बाद, उनकी पत्नी और अंततः नीतीश कुमार के कालखंड में बिहार रसातल की ओर चला गया, जा रहा है। </p>
<figure id="attachment_6309" aria-describedby="caption-attachment-6309" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6309" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6309" class="wp-caption-text">यशवंत सिन्हा</figcaption></figure>
<p>इन विगत वर्षों में मतदाता जितने ही गरीबी की रेखाओं से कई मील नीचे धंस रहे हैं, उनके नेता जमीन के ऊपर उतने ही उठ रहे हैं। वैसी स्थिति में इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है कि सत्ता और सिंहासन के लोभ के कारण प्रदेश के अधिकारी सरकारी नौकरियों को छोड़कर सरकार ही बनने के लिए आकर्षित होते हों।खैर। </p>
<p><strong>बिहार का पहला मुख्यमंत्री बने श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) तक।  इसके बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) तक। बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970, कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979, केदार पांडे 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973, अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975, जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 और सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक।</strong> </p>
<p>डा. जगन्नाथ मिश्र के बाद नब्बे के दशक में जब जनता दल के तत्कालीन नेता लालू यादव प्रदेश का राजनीतिक कमान हाथ में लिए, तत्कालीन मतदाताओं के साथ-साथ युवा पीढ़ियों के मन में एक विश्वास जगा। लोगों का मानना था कि जयप्रकाश नारायण का सपना, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता – सिंहासन खाली करो कि जनता आ रही है – का भावार्थ साकार होगा। प्रदेश का छात्र नेता, जो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के दौरान प्रशासनिक अत्याचार को अपने सर पर, पीठ पर, कमर पर लाठियों के माध्यम से सहा था, अपने प्रदेश में एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करेगा जो उस कालखंड के ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक दृष्टान्त के रूप में उद्धत किया जायेगा। </p>
<figure id="attachment_6310" aria-describedby="caption-attachment-6310" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6310" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6310" class="wp-caption-text">​मीरा कुमार</figcaption></figure>
<p>लेकिन, प्रदेश की तत्कालीन आवादी 870,452,165 में 28,227,746 पुरुष और 24,366,539 महिला मतदाताओं का मनोबल और विश्वास चकनाचूर हो गया। जिन लोगों ने लालू यादव को चुनकर सड़क से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाये थे, गलत सिद्ध हुए, जब लालू यादव अपने दूसरे कालखंड के प्रारंभिक वर्षों में बिहार ही नहीं, भारत ही नहीं, पूरे विश्व में ”चाराचोर” के नाम से कुख्यात हुए। उस समय लालू यादव जो मुख्यमंत्री कार्यालय से निकले, कभी वापस नहीं आ सके। वैसे मुख़्यमंत्री कार्यालय से बाहर निकलने के बाद भी उन्होंने नेपथ्य से अपनी पत्नी श्रीमती राबड़ी देवी के माध्यम से सिंहासन पर विराजमान रहे। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री की पत्नी या मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान होने के वावजूद राबड़ी देवी प्रदेश की मतदाताओं के विश्वास और अपेक्षाओं पर खड़ी नहीं उतरीं। इसका मुख्य कारण था ‘अशिक्षा’, जिसे पति-पत्नी द्वय अपने जीवन में कभी महत्व नहीं दिए। अगर देते तो शायद अपनी अगली पीढ़ी के दोनों पुत्रों को शिक्षा की दुनिया में अव्वल बनाते। यही कारण है कि बिहार में शिक्षा का जो पतन कर्पूरी ठाकुर (आज भारत रत्न की उपाधि से अलंकृत हैं) के कालखंड से प्रारम्भ हुआ, लालू यादव – राबड़ी देवी – नीतीश कुमार के कालखंड आते आते नेश्तोनाबूद हो गया, ध्वस्त हो गया। दृष्टान्त प्रदेश की साक्षरता दर है। </p>
<p>वैसे भारतीय राजनीति में ‘रामायण’ का चाहे जितना भी दृष्टान्त दिया जाय, वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में ‘विभीषणों’ का भरमार है और ‘भरत’ का घोर किल्लत है। यह किल्लत देश में तो है ही, बिहार में तो यत्र-तत्र-सर्वत्र है। अवसर की तलाश में गिद्ध जैसे लोग बैठे हैं। सत्ता में बने रहने और सत्ता से बाहर रहने पर शक्ति में जो कमी होती है, लालू यादव इस बात को मन ही मन स्वीकार लिए थे। लेकिन भारत का न्यायालय, देश की जाँच एजेंसियों की निगाह चौबीसों घंटा लालू यादव पर टिकी थी। जैसे ही चारा घोटाला काण्ड अख़बारों के पन्नों पर, न्यायालयों के फाइलों में आया, नितीश कुमार अवसर का लाभ उठाने हेतु सज्ज होने लगे। राजनीतिक शतरंज की गोटियां बिछने लगी। कल तक लालू यादव को बड़े भाई कहने वाले नीतीश कुमार सत्ता की गलियारे में लालू यादव की मुख्यमंत्री पत्नी को परास्त करने के लिए आगे आ गए। </p>
<p>नीतीश कुमार के बारे में उनके राजनीतिक गुरु जॉर्ज फर्नांडिस की सोच को जया जेटली ने भी उद्धृत किया है एक किताब में : “वे (जॉर्ज फर्नांडिस) हमेशा कहते थे कि नीतीश कुमार एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनके दिमाग को वे कभी नहीं समझ सकते। सबसे बढ़कर एक लोकतांत्रिक व्यक्ति होने के नाते, जब नीतीश कुमार राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक आयोजित करने की तारीख पर सहमत होने से इनकार कर देते थे या ऐसी बैठकों के दौरान बनी आम सहमति को पलट देते थे, तो वे रात में अकेले उनसे मिलने आते थे और अपने विचार रखते थे, जिस पर वे अमल करने पर ज़ोर देते थे। अक्सर, इस वजह से पार्टी ने अच्छे लोगों को भाजपा में खो दिया; ये वे लोग थे जो अक्सर मेरे साथ चाय पीते थे और नीतीश कुमार के बारे में अपनी पीड़ाएँ साझा करते थे। मैंने जॉर्ज फर्नांडिस को ऐसी बातें बताना अपना कर्तव्य समझा, लेकिन मैं यह भी जानता था कि इससे अनजाने में उनकी चिंताएँ बढ़ जाएँगी। वे हमेशा बड़े लक्ष्य की खातिर तर्कहीन बातों को तर्कसंगत बनाने के लिए उनके आगे झुक जाते थे।”</p>
<figure id="attachment_6311" aria-describedby="caption-attachment-6311" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6311" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6311" class="wp-caption-text">​निखिल कुमार</figcaption></figure>
<p>खैर। राजनीतिक दृष्टि से यदि देखा जाए तो विगत 35 वर्षों से बिहार के सत्ता के सिंहासन पर दो व्यक्तियों का आधिपत्य रहा है – लालू यादव और कंपनी तथा नीतीश कुमार। 35 वर्षों का आधिपत्य होना और प्रदेश का उत्तरोत्तर पिछड़ा होते जाना – इस बात का प्रमाण है कि दोनों को प्रदेश के विकास से दूर-दूर तक कोई मतलब नहीं है। अलबत्ता, 1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू यादव और उनके परिवार जिस तरह सत्ता के ऊपर कब्ज़ा किये, वह आने वाले समय में इतिहास के पन्नों में काले अक्षर से लिखा जायेगा। आज भी उनके परिवार में दोनों पुत्र विधान सभा और दो संसद में (पत्नी-राज्य सभा और पुत्री लोक सभा) में बैठी है। अगर समुदाय की ही बात करें तो जिस गरीब-गुरबा, पिछड़ा, यादव आदि जातियों के नाम पर वे राजनीति में बरकरार रहे, उनके परिवार से बाहर कोई उस योग्य नहीं है? </p>
<p><strong>लालू के कालखंड में हत्या, अपहरण, फिरौती के लिए अपहरण आम था। उस काल खंड के जो भुक्तभोगी हैं, आज भी कलाप रहे हैं। लेकिन नीतीश कुमार के राज में, जिन्हें सभी ‘सुशासन बाबू’ के नाम से अलंकृत किये हैं, रिश्वतखोरी की प्रथा अनियंत्रित है, अपने उत्कर्ष पर है और यह कतई नहीं माना जायेगा कि इसमें सत्ता के गलियारे में बैठे लोग, सत्ता से संरक्षित अधिकारियों, नेताओं का हाथ नहीं है।”  और सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि जिला स्तर से लेकर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक, बिहार के बारे में, बिहार की राजनीति के बारे में, आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्थिति, सांस्कृतिक स्थिति, शैक्षिक स्थिति, स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में लिखने वाले कभी इन बातों को उजागर नहीं किये, कर रहे हैं। नीतीश के राज में जो बुनियादी ज़रूरत है – शिक्षा, स्वास्थ्य सभी चरमरायी हुई है।</strong> </p>
<p>2025 में होने वाली विधानसभा का चुनाव अपनी शुरूआती तारीख से 18 वीं संख्या की होगी। सं 1951 में बिहार में बिहार में विधानसभा चुनाव की शुरुआत हुई थी। अन्य चुनावों की बात और परिणाम अगर छोड़ भी दें तो आज़ादी के बाद बिहार में पहली बार 1977 में कांग्रेस पार्टी बड़ी तरह परास्त हुई। उस कालखंड में विधानसभा के 324 सीटों में कांग्रेस पार्टी महज 57 सीटों पर सिमट गई। लेकिन जो भी पार्टी सरकार में आयी, वह पांच वर्ष पूरा नहीं कर पायी। परिणाम स्वरुप तीन वर्ष बाद 1980 में मध्यवर्ती चुनाव में कांग्रेस पार्टी 169 सीटों पर कब्ज़ा कर पूर्ण बहुमत के साथ सर्कार भी बनायीं। वैसे 1980 से पहले प्रदेश में दो बार मध्यवर्ती चुनाव हुआ था। पहला चुनाव संपन्न हुआ था 1969 में और दूसरा 1972 में। सन 1969 में कांगेस को 118 स्थान मिले थे जबकि  सं 1972 के मध्यवर्ती चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 318 सीटों में से 167 स्थान मिले थे। </p>
<figure id="attachment_6312" aria-describedby="caption-attachment-6312" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6312" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6312" class="wp-caption-text">​राज कुमार सिंह</figcaption></figure>
<p>प्रदेश का चुनावी इतिहास इस बात का गवाही है कि कांग्रेस पार्टी को उखाड़ फेंकने के लिए बनी जनता पार्टी 1977 के चुनाव में जहाँ 214 स्थान प्राप्त की थी, वहीँ 1980 के चुनाव में 42 सीटों के साथ चौधरी चरण सिंह वाली सेकुलर जनता पार्टी सबसे बड़ी दूसरी पार्टी थे। उस चुनाव में सीपीआई को 23, भारतीय जनता पार्टी को 21, इंडियन कांग्रेस (यु) को 14, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को 11, जनता पार्टी (जेपी) को 13, जनता पार्टी (राजनारायण) को एक तथा 23 निर्दलीय विधायक जीतकर विधान सभा पहुंचे थे। 1985 के चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर आयी थी जहाँ उसने 323 संख्या वाली विधान सभा में 196 सीटें प्रतप्त की थी जो बहुमत से अधिक थी। नौवां विधान सभा का कालखंड में डॉ. जगन्नाथ मिश्र 94 दिनों (6 दिसंबर, 1989 से 10 मार्च, 1990) के मुख्यमंत्री थे। प्रदेश के लोग इस बात से इंकार नहीं करेंगे 10 मार्च 1990 से प्रदेश रसातल की ओर उन्मुख हो गया। </p>
<p>10 मार्च 1990 से 28 मार्च 1995 तक लालू प्रसाद यादव दसवें विधान सभा में जनता दल का प्रतिनिधित्व करते पूरा किया। लालू यादव के दूसरे कालखंड में ऐतिहासिक चारा घोटाला गबन का पर्दाफास हुआ। यह अलग बात है की लालू यादव उसके बाद भी नेपथ्य से अपनी पत्नी को सत्ता प्रदानकर मुख्यमंत्री कार्यालय का छवि थामे थे, लेकिन मतदाताओं की नज़रों में लालू यादव का सक्रीय राजनीति से बाहर थे। 11 वीं विधानसभा काल को पूरा करने में राबड़ी देवी 25 जुलाई 1997 से 11 फरवरी 1999 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रही। लालू यादव का चारा घोटाला कांड में मुख्य अभिययुक्त होते ही वे जनता दल को छोड़कर  राष्ट्रीय जनता दल बना लिया था। यानी राबड़ी देवी अपने नवनिर्मित पार्टी की पहली मुख्यमंत्री थी। </p>
<p>11 फरवरी – 9 मार्च 1999 तक प्रदेश में राष्ट्रपति शासन रहा। 9 मार्च 1999 से 2 मार्च 2000 तक 11 वीं विधानसभा में वे फिर मुख्यमंत्री बनी। अब तक देश में राजनीतिक भूचाल आ गया था। उधर दिल्ली में भी सभी की नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी ऊपर टिकी थी। अब तक जॉर्ज फर्नाडिस के सहयोग से समता पार्टी का भी गठन हो गया था और नितीश कुमार दिल्ली से पटना के सिंहासन की ओर उन्मुख हुए थे – सात दिनों के लिए 3 मार्च 2000 से 10 मार्च 2000 तक। लेकिन 11 मार्च 2000 से 6 मार्च 2005 तक फिर राबड़ी देवी का समय था। यह उनका अंतिम यात्रा था मुख्यमंत्री कार्यालय में। 24 नवम्बर 2005 (14 वें विधानसभा का कालखंड से) वर्तमान तक कई बार, कई पार्टियों के साथ तालमेल बैठने, हटाने के बाद भी नीतीश कुमार वर्तमान हैं। </p>
<figure id="attachment_6313" aria-describedby="caption-attachment-6313" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6313" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6313" class="wp-caption-text">आर सी पी सिंह</figcaption></figure>
<p><strong>एक दशक पहले 2015 के एक अध्ययन के मुताबिक, उस समय बिहार के नवनिर्वाचित 243 विधायकों में से 142 यानी 58 फीसदी पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। बिहार इलेक्शन वाच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) के अध्ययन के मुताबिक, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले कुल विधायकों में से 90 (40 फीसदी) पर हत्या, हत्या के प्रयास, सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे संगीन मामले दर्ज हैं। 70 विधायकों पर आरोप तय किए जा चुके हैं। अध्ययन के मुताबिक, ‘अपने खिलाफ आपराधिक मामले बताने वाले 142 विधायकों में से 70 (49 फीसदी) ने बताया है कि अदालत उनके खिलाफ पहले ही आरोप तय कर चुकी है।’ 11 विधायकों पर हत्या या हत्या के प्रयास का मामला दर्ज है। इनमें से चार राष्ट्रीय जनता दल के हैं। </strong></p>
<p>एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच (एनईडब्ल्यू) की ओर से किए गए विश्लेषण में देश भर में राज्य विधानसभाओं और केंद्रशासित प्रदेशों में वर्तमान विधायकों की ओर से चुनाव लड़ने से पहले दायर किए गए शपथ पत्रों की पड़ताल की गई और संबंधित विवरण प्राप्त किया गया। विश्लेषण में 28 राज्य विधानसभाओं और दो केंद्र शासित प्रदेशों में 4,033 में से कुल 4,001 विधायकों का विवरण शामिल है। एडीआर ने कहा कि विश्लेषण में शामिल विधायकों में से 1,136 या लगभग 28 प्रतिशत ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जिनमें हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित आरोप शामिल हैं। </p>
<p>इस रिसर्च में खुलासा हुआ है कि बिहार के 67 फीसदी विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। बिहार के 242 विधायकों में से 161 विधायक दागी हैं। यानी इन पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। विधायकों के आंकड़ों को देखें तो केरल में 135 में से 95 विधायकों यानी 70 प्रतिशत ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। इसी तरह दिल्ली में 70 में से 44 विधायक (63 प्रतिशत), महाराष्ट्र में 284 में से 175 विधायक (62 प्रतिशत), तेलंगाना में 118 विधायकों में से 72 विधायक (61 प्रतिशत) और तमिलनाडु में 224 विधायकों में से 134 (60 प्रतिशत) ने अपने हलफनामे में स्वयं के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले घोषित किए हैं।</p>
<figure id="attachment_6314" aria-describedby="caption-attachment-6314" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6314" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6314" class="wp-caption-text">​बिहार विधान सभा</figcaption></figure>
<p>कैलाशपति मिश्र (1980-81/1984-87), इन्दर सिंह नामधारी (1988-90), ताराकांत झा (1990-93), अश्वनी कुमार (1994-96), यशवंत सिन्हा (1997-98), नन्द किशोर यादव (1998-2003), गोपाल नारायण सिंह (2003-05), सुशील कुमार मोदी (2005-06), राधा मोहन सिंह (2006-10), सी.पी. ठाकुर (2010-13), मंगल पांडे (2013-16), नित्यानंद राय (2016-19), संजय जायसवाल (2019-23), सम्राट चौधरी (2023-24) और दिलीप कुमार जायसवाल (2024 से अब तक) ये सभी पिछले 44 वर्षों में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने। सवाल यह है कि इन लोगों के कार्यकाल में भाजपा मजबूत हुआ, पार्टी मजबूत हुयी, भाजपा में बिहार के मतदाताओं का रुझान क्या रहा, यह इस बात का ,प्रमाण है कि आज भी 43 विधायकों के साथ नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं और भाजपा के नेता उप-मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं। 2015 में विधानसभा में भाजपा के विधायकों की संख्या भले 53 से बढ़कर 17वीं विधानसभा में 74 हो गया हो; लेकिन यह संख्या भाजपा की अपनी नहीं है। यह संख्या नीतीश कुमार द्वारा दान स्वरुप हैं। 2015 में जनता दल यूनाइटेड की विधानसभा में संख्या 71 थी, जो 17वीं विधानसभा में 43 हो गयी। राष्ट्रीय जनता दल की संख्या भले 80 से घटकर 75 हो गया हो, लेकिन आज भी मतदाताओं के बीच उसकी पकड़ है। </p>
<p><strong>​क्रमशः &#8230;..</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/criminalization-of-politics-versus-politicization-of-officials-in-bihar">​बिहार का सत्यानाश(10)😢 राजनीति का अपराधीकरण बनाम अधिकारियों का राजनीतिकरण, कहते हैं बिहार का विकास करेंगे👁मतदाता कपार पीट रहा है😢वे समझते हैं ताली बजा रहा है😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>ओह !!! मिरांडा हाउस प्रवेश द्वार से राजौरी गार्डन लाल बत्ती तक का सफर, फिर &#8216;ठांय&#8217; &#8216;ठांय&#8217;, उस वर्ष विद्यार्थी परिषद् की हार और अगले वर्ष सुश्री रेखा गुप्ता की जीत  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 20 Feb 2025 11:55:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[chief minister]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[election]]></category>
		<category><![CDATA[encountr]]></category>
		<category><![CDATA[police]]></category>
		<category><![CDATA[rekha gupta]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली : रेखा गुप्ता महज एक नाम नहीं है बल्कि दिल्ली की सामाजिक गलियों से राजनीतिक गलियारों तक एक गहरी रेखा को दर्शाती है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी आज भले सुश्री रेखा गुप्ता को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाने का सेहरा अपने माथे बांधें, या फिर &#8216;महिला सशक्तिकरण&#8217; का दृष्टान्त देते सशक्त भारत के निर्माण का [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/30-years-journey-of-a-lady-leader">ओह !!! मिरांडा हाउस प्रवेश द्वार से राजौरी गार्डन लाल बत्ती तक का सफर, फिर &#8216;ठांय&#8217; &#8216;ठांय&#8217;, उस वर्ष विद्यार्थी परिषद् की हार और अगले वर्ष सुश्री रेखा गुप्ता की जीत  </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली : रेखा गुप्ता महज एक नाम नहीं है बल्कि दिल्ली की सामाजिक गलियों से राजनीतिक गलियारों तक एक गहरी रेखा को दर्शाती है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी आज भले सुश्री रेखा गुप्ता को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाने का सेहरा अपने माथे बांधें, या फिर &#8216;महिला सशक्तिकरण&#8217; का दृष्टान्त देते सशक्त भारत के निर्माण का डंका बजाएं &#8211; लेकिन सुश्री रेखा गुप्ता आज से तीन दशक पहले दिल्ली विश्वविद्यालय प्रांगण में जो इतिहास रची थी, शायद आज के लोग नहीं जानते हैं। अगर जानते, तो इस बात की चर्चा खुलेआम होती, खास होती। इतना ही नहीं, तीन दशक पहले उनके साथ दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष के रूप में शपथ लेने वाली सुश्री अलका लम्बा भी अपने कद को छोटी समझीं। जिस शपथ लेती तस्वीर को सामाजिक क्षेत्र के मीडिया पर चिपकाया गया वह इस बात का गवाह है।</strong> </p>
<blockquote><p>अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जिस कालखंड में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ में अपने अस्तित्व पर आंच लगा लिया था, उस कालखंड में सुश्री रेखा गुप्ता अकेली छात्रा थी, जो विद्यार्थी परिषद् के झंडे को नीचे नहीं झुकने दी। उस वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के सभी अभ्यर्थियों को हार का सामना करना पड़ा था। </p></blockquote>
<p>तारीख था 16 सितम्बर और 1994 साल। सुवह सवेरे दिल्ली से प्रकाशित एक-एक समाचार पत्रों में यह खबर प्रमुखता के साथ प्रकाशित हुई थी कि दिल्ली पुलिस और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खूंखार अपराधियों के बीच मुठभेड़ में दो अपराधी मारे गए। अपराधी की गाड़ी से प्राप्त सामानों से स्पष्ट था कि वे दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के अभ्यर्थियों को मदद करने आया था। </p>
<figure id="attachment_6178" aria-describedby="caption-attachment-6178" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/Delhi-CM.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/Delhi-CM.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6178" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/Delhi-CM.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/Delhi-CM-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/Delhi-CM-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/Delhi-CM-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/Delhi-CM-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6178" class="wp-caption-text">साल 1995: दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ में चयनित सुश्री अलका लम्बा और सुश्री रेखा गुप्ता</figcaption></figure>
<p>उस घटना के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर में एक भय का माहौल था। एक ग्लानि का माहौल था। छात्र समुदाय अपने हितों की रक्षा के लिए अपराधियों का सहारा नहीं लेना चाहते थे। यह अलग बात थी कि देश के राजनीतिक गलियारे में अपराधियों का राजनीतिकरण और राजनीति का अपराधीकरण का दौर उत्कर्ष पर था। लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय की बात कुछ और थी, आज भी कुछ है, जहाँ तक शिक्षा और अनुशासन का प्रश्न है । </p>
<blockquote><p>सन 1994 छात्रसंघ के चुनाव के बाद अगले वर्ष 1995 में जब विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव हुआ तो सचिव पद अपनी विश्वसनीयता का ठप्पा लगाते हुए, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वयं का नाम पुनः स्थापित किया। आज वही अभ्यर्थी दिल्ली की मुख्यमंत्री की शपथ ली हैं। नाम तो आप सभी जानते ही हैं &#8211; सुश्री रेखा गुप्ता। </p></blockquote>
<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह मंत्री समेत तमाम मंत्री, भाजपा और एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्री के अलावा साधु-संत और कारोबारियों के साथ ही हजारों लोग रेखा के शपथ ग्रहण में शामिल हुए। शपथ ग्रहण के लिए रामलीला मैदान में सुरक्षा के लिए एनएसजी कमांडो, दिल्ली पुलिस के जवान और आरएएफ के जवान तैनात कर दिए गए थे। चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। बिना सुरक्षा जांच के किसी को भी अंदर नहीं जाने दिया जा रहा। </p>
<figure id="attachment_6179" aria-describedby="caption-attachment-6179" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178698.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178698.jpg" alt="" width="2200" height="1694" class="size-full wp-image-6179" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178698.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178698-300x231.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178698-1024x788.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178698-768x591.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178698-1536x1183.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178698-2048x1577.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6179" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री 20 फरवरी, 2025 को नई दिल्ली में दिल्ली के मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में</figcaption></figure>
<p>शालीमार बाग विधानसभा सीट से पहली बार विधायक बनीं सुश्री रेखा गुप्ता के साथ प्रवेश वर्मा, मनजिंदर सिंह सिरसा, कपिल मिश्रा, आशीष सूद, पंकज सिंह और रविंदर सिंह इंद्राज को भी मंत्री पद की शपथ दिलाई गई है। रेखा गुप्ता सुषमा स्वराज, शीला दीक्षित और आतिशी के बाद दिल्ली की चौथी महिला मुख्यमंत्री हैं। अरविंद केजरीवाल वाली आम आदमी पार्टी के 10 साल के शासन पर विराम लगाते हुए सुश्री गुप्ता के रूप में भाजपा दिल्ली में 27 साल बाद सत्ता में वापस आयी है। </p>
<p>चलिए नब्बे के दशक में चलते हैं।  उस कालखंड में दिल्ली में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपराधियों की तूती बोलती थी। भय का वातावरण चतुर्दिक था। उसी अपराधियों में मेरठ के खूंखार अपराधी बृज मोहन त्यागी को पकड़ने का प्रयास प्रारम्भ हुआ था । उस ज़माने में एम बी कौशल दिल्ली पुलिस के आयुक्त थे और पश्चिमी जिला के उपायुक्त थे दीपक मिश्रा।  त्यागी का काम कथित तौर पर जबरन वसूली करने, दिल्ली के व्यापारियों को सुरक्षा राशि के लिए धमकाने और कॉन्ट्रैक्ट किलिंग आदि में शामिल था। साथ ही, उस पर 1994 के दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनावों में नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया के उम्मीदवारों को धमकाने का भी संदेह था। </p>
<figure id="attachment_6180" aria-describedby="caption-attachment-6180" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178697.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178697.jpg" alt="" width="2200" height="1585" class="size-full wp-image-6180" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178697.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178697-300x216.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178697-1024x738.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178697-768x553.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178697-1536x1107.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178697-2048x1475.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6180" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री 20 फरवरी, 2025 को नई दिल्ली में दिल्ली के मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में</figcaption></figure>
<p><strong>उस दिन दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव हो रहा था। साल 1994 था। विश्वविद्यालय परिसर में मतदाता अपने-अपने अभ्यर्थियों के लिए प्रचार प्रसार कर रहे थे। पूरा परिसर, विशेषकर उत्तरी परिसर (नॉर्थ कैम्पस) खचाखच भरा था। अनुशासन और शांतिपूर्ण मतदान संपन्न हो, इसके लिए दिल्ली पुलिस की ओर से पर्याप्त व्यवस्था की गयी थी। आज के विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन से परिसर की ओर आने वाली सड़क जब मिरांडा हॉउस-विधि संकाय से आगे निकलती है, पुलिस की तैनाती अधिक थी। चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा व्यवस्था थी। छात्र-छात्राओं को इतनी पुलिस की मौजूदगी खल भी रही थी। </strong></p>
<p>अचानक पुलिस पुलिस की गाडी हड़कत में आ गयी। शस्त्रों पर उंगलियां सजने लगी। दिल्ली पुलिस दिल्ली विश्वविद्यालय के आस-पास के इलाकों में उसकी गतिविधियों के बारे में खुफिया नेटवर्क की मदद से, 15 सितंबर 1994 को बृज मोहन त्यागी को उसकी कार में देखा गया था । मिरांडा हॉउस के नुक्कड़ पर स्थित पुलिस की गाड़ी निकल पड़ी थी। पुलिस की गाड़ियों का काफिला दिल्ली विश्वविद्यालय के इलाके से राजौरी गार्डन तक उसका पीछा किया। उस इलाके में उसे एक व्यापारी को मारने के लिए जाना था। कहते हैं इस कार्य के लिए उसे 50 लाख रुपये की सुपारी मिली थी। </p>
<p>करीब दोपहर का 2.15 बजा होगा जब दिल्ली पुलिस का मुठभेड़ वाला ब्रांच राजौरी गार्डन चौक के यातायात के लाल बत्ती पर बृज मोहन त्यागी की कार को घेर लिया। इस बीच जैसे ही दिल्ली पुलिसकर्मी त्यागी के कार तक पहुँचने वाली थी, त्यागी के तरफ से गोलीबारी शुरू हो गई। परिणाम यह हुआ कि दोनों तरफ से गोलियों की बारिश होने लगी और अंततः उस मुठभेड़ में बृजमोहन त्यागी अपने एक साथी अनिल मल्होत्रा के साथ मारे गए। उस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिसकर्मी &#8211; सुनील शर्मा और बिजेंद्र सिंह &#8211; को भी गोली लगने से घायल हो गए। अपराधियों की गोलीबारी में तीन आम राहगीर भी घायल हुए थे। कहते हैं दीपक मिश्रा का यह पहला मुठभेड़ था। <br />
 <br />
उस समय का जो दृश्य था वह किसी सिनेमा से कम नहीं था। सड़कों के बीचोबीच बिजली के खम्भे पर भी दर्जनों गोलियों के निशान बने थे। त्यागी के सर पर दिल्ली पुलिस और उत्तर प्रदेश पुलिस की तरफ से तीन लाख रुपये का इनाम था। इस मुठभेड़ को दिल्ली से प्रकाशित सभी समाचार पत्रों ने बहुत ही प्रमुखता से प्रकाशित किया था। यहाँ तक की इसे सिनेमाई मुठभेड़ नहीं कहकर, &#8216;असली मुठभेड़&#8217; करार दिया। जख्मी पुलिसकर्मी को पेट में गोली लगी थी जो दिन दयाल उपाध्याय अस्पताल में लगभग दो सप्ताह तक भर्ती रहे। </p>
<figure id="attachment_6181" aria-describedby="caption-attachment-6181" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178703.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178703.jpg" alt="" width="2200" height="1135" class="size-full wp-image-6181" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178703.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178703-300x155.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178703-1024x528.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178703-768x396.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178703-1536x792.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178703-2048x1057.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6181" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री 20 फरवरी, 2025 को नई दिल्ली में दिल्ली के मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में</figcaption></figure>
<p><strong>दिलचस्प बात यह हुई कि दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के उम्मीदवारों के समर्थन में बैनर/पोस्टर, हमलावर अपराधी बृजमोहन त्यागी की कार से बरामद किए गए थे।  इस बात को तस्वीरों के साथ, अगले दिन यानी 16 सितंबर 1994 को छात्रसंघ के चुनाव के दिन समाचार पत्रों में प्रकाशित किया था। इस प्रकाशन का परिणाम यह हुआ कि दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र-छात्रा मतदाता इस बात से आश्वस्त हो गए कि संभवतः बृजमोहन त्यागी छात्रसंघ के चुनाव में परिषद् के उम्मीदवारों का समर्थन करने आयी थी। इस समाचार से परिषद् के उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा था। </strong></p>
<p>अगले वर्ष 1995 के चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अभ्यर्थी के रूप में सुश्री रेखा गुप्ता सचिव चुनी गई और अध्यक्ष के पद पर सुश्री अलका लम्बा विजयी हुयी। फिर अगले वर्ष, यानी 1996-1997 के चुनाव में सुश्री रेखा गुप्ता अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अभ्यर्थी के रूप में अध्यक्ष भी बनी। खैर। रेखा गुप्ता ने पहली बार विधानसभा का चुनाव जीती हैं। उन्होंने विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार वंदना कुमारी को 29,595 वोटों के बड़े अंतर से मात दी है। रेखा गुप्ता बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सक्रिय सदस्य हैं। 1994-95 में वह दौलत राम कॉलेज में सचिव चुनी गईं। </p>
<p>बहरहाल, 1951 में दिल्ली विधानसभा के गठन के साथ दिल्ली का राजनीतिक इतिहास काफी उतार-चढ़ाव से भरा रहा। 1952 में पहले चुनाव होने के बाद ब्रह्म प्रकाश दुबे दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री बने। लेकिन कुछ समय के बाद दिल्ली में विधानसभा को भंग हो गया केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया और उपराज्यपाल के रूप में दिल्ली की सत्ता केंद्र के हाथों आ गई। कुछ समय तक केंद्र शासित प्रदेश बने रहने के बाद, दिल्ली की जनता की मांग के आधार पर पुनः 1991 में दिल्ली में विधानसभा की स्थापना की गयी। परिसीमन के बाद 1993 में एक बार फिर चुनावों का आयोजन किया गया। जिसमें भाजपा 49 सीटें जीती थी, वहीं कांग्रेस को 14 सीटें मिली थी और 4 सीटों के साथ जनता दल, जो तीसरी पार्टी के रूप में आयी थी। भाजपा के मदन लाल खुराना नए मुख्यमंत्री बने। </p>
<p>मदन लाल खुराना के इस्तीफा देने के बाद भाजपा के ही साहिब सिंह वर्मा को नया मुख्यमंत्री बने। जैन हवाला डायरी कांड में सर्वोच्च न्यायालय से क्लीन चिट मिल जाने के बाद भाजपा के कई बड़े नेता और कार्यकर्ताओं खुराना को दोबारा से मुख्यमंत्री बनाने के पक्षधर थे, लेकिन वे सत्ता में वापस नहीं हो पाए। प्रदेश की राजनीति बदल रही थी। नेपथ्य में पृष्ठभूमि भी बदल रहा था। अगले विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा साहिब सिंह वर्मा को भी मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाकर सुषमा स्वराज कुछ दिनों के लिए मुख्यमंत्री बनी। </p>
<figure id="attachment_6182" aria-describedby="caption-attachment-6182" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178701.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178701.jpg" alt="" width="2200" height="937" class="size-full wp-image-6182" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178701.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178701-300x128.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178701-1024x436.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178701-768x327.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178701-1536x654.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178701-2048x872.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6182" class="wp-caption-text">प्रधानमंत्री 20 फरवरी, 2025 को नई दिल्ली में दिल्ली के मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में</figcaption></figure>
<p>उधर, कांग्रेस की दिल्ली की सत्ता में शुरुआत 1998 के विधानसभा चुनाव से हुई जब कांग्रेस ने शीला दीक्षित के नेतृत्व में लड़े चुनाव में जीत हासिल करके भाजपा को सत्ता से बेदखल कर दिया था और शीला दीक्षित खुद दिल्ली की नई मुख्यमंत्री बनी थी। 1998 से 2013 तक लगातार तीन कार्यकाल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने कार्य किया। उनकी सरकार पर कई आरोप भी लगे जैसे 2010 में उनके नेतृत्व में दिल्ली में आयोजित हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार संबंधित कई आरोप लगे। जिसकी वजह से उन्हें 2013 के विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा और फिर विराजमान हुए आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल। जब उन पर भी दाग लगा तो आ गयी श्रीमती आतिशी। 1993 से 2025 तक देश की राजधानी दिल्ली ने नौ विधानसभा चुनाव देखे हैं। </p>
<p>27 साल बाद घर वापसी के पहले और बाद में मुख़्यमंत्री सुश्री रेखा गुप्ता ने आश्वासन दिया कि भाजपा सरकार महिलाओं को 2,500 रुपये मासिक वित्तीय सहायता प्रदान करने के अपने चुनावी वादे को पूरा करेगी। मासिक सहायता की पहली किस्त 8 मार्च तक उनके खातों में जमा कर दी जाएगी। चुनावों से पहले, भाजपा के घोषणापत्र का उद्देश्य आम आदमी पार्टी की सत्ता में आने पर 2,100 रुपये मासिक सहायता की घोषणा से आगे निकलना है और अपने वादों को पूरा करना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि &#8220;प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सपने को पूरा करना राजधानी के सभी 48 भाजपा विधायकों की जिम्मेदारी है। हम महिलाओं के लिए वित्तीय सहायता सहित अपने सभी वादों को अवश्य पूरा करेंगे। 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178710.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178710.jpg" alt="" width="2200" height="1653" class="aligncenter size-full wp-image-6183" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178710.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178710-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178710-1024x769.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178710-768x577.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178710-1536x1154.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/02/H20250220178710-2048x1539.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p><strong>दिल्ली की कुल जनसंख्या और उसमें महिलाओं की भागीदारी के साथ-साथ भाजपा द्वारा निर्गत की जाने वाली राशि की गणना गणितज्ञ करेंगे।  लेकिन शहर में कुल मतदाताओं की संख्या 1,55,24,858 है, जिसमें 83,49,645 पुरुष मतदाता, 71,73,952 महिला मतदाता।  साथ ही 1,261 तृतीय लिंग मतदाता शामिल हैं।  मुख्यमंत्री सुश्री रेखा गुप्ता की बात मान भी ली जाय की आगामी 8 मार्च तक उनकी सरकार महिलाओं के बैंक खाते में 2500 रुपये जमा कर देगी, तो इसका राज्य के वित्तीय व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा &#8211; एक शोध का विषय होगा। अगर दिल्ली के कुल महिला मतदाता को ही लें तो कुल मतदाता 71,73,952 x 2500/- रुपये = 17934880000/- रुपये प्रतिमाह। अब अगर इसे एक साल (12 महीने) से गुना किया जाय तो अंक 215218560000 आता है और मुख्यमंत्री सुश्री रेखा गुप्ता अगर पांच साल मुख्यमंत्री कार्यालय में रहती हैं तो दिल्ली की महिलाओं पर &#8216;अनुत्पादक&#8217; कितनी राशियों का व्यय होता है &#8211; यह तो उनका वित्त मंत्रालय और आला अधिकारी ही बता पाएंगे। </strong></p>
<p>खैर, आज का दिन उनके लिए शुभ है। 20 फरवरी दिल्ली के लिए तो महत्वपूर्ण है,  देश-दुनिया के इतिहास में 20 फरवरी का दिन काफी महत्वपूर्ण है। आज ही के दिन देश में पहली बार कंप्यूटर से रेलवे टिकट आरक्षण की शुरुआत हुई थी। आज ही के दिन ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने भारत को 30 जून, 1948 तक ब्रिटेन की गुलामी से आजाद करने की घोषणा की थी। हालांकि, बाद में यह तारीख बदलकर 15 अगस्त हो गई थी।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/30-years-journey-of-a-lady-leader">ओह !!! मिरांडा हाउस प्रवेश द्वार से राजौरी गार्डन लाल बत्ती तक का सफर, फिर &#8216;ठांय&#8217; &#8216;ठांय&#8217;, उस वर्ष विद्यार्थी परिषद् की हार और अगले वर्ष सुश्री रेखा गुप्ता की जीत  </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>योगी आदित्यनाथ ने कहा था: “माफिया को मिट्टी में मिला देंगे”</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Apr 2023 13:34:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अपराध]]></category>
		<category><![CDATA[adityanath]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>झाँसी /लखनऊ / नई दिल्ली : विगत दिनों जब &#8216;पुलिस इन्काउन्टर&#8217; पर एक कहानी कर रहा था, जिसमें आम तौर पर मुजरिमों पर गोली चलाने वाले खाकी वर्दीधारी को &#8220;हीरो&#8221;, &#8220;स्पेशलिस्ट&#8221;, &#8220;सुपर कॉप&#8221; आदि तगमों से &#8216;अलंकृत&#8217; कर पुलिस महकमे से उसे भीड़ से अलग कर दिया जाता है। काश प्रदेश के &#8216;नेतृत्व&#8217; को भी देखते जिनके [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>झाँसी /लखनऊ / नई दिल्ली : विगत दिनों जब &#8216;पुलिस इन्काउन्टर&#8217; पर एक कहानी कर रहा था, जिसमें आम तौर पर मुजरिमों पर गोली चलाने वाले खाकी वर्दीधारी को &#8220;हीरो&#8221;, &#8220;स्पेशलिस्ट&#8221;, &#8220;सुपर कॉप&#8221; आदि तगमों से &#8216;अलंकृत&#8217; कर पुलिस महकमे से उसे भीड़ से अलग कर दिया जाता है। काश प्रदेश के &#8216;नेतृत्व&#8217; को भी देखते जिनके अधीन पुलिस अथवा प्रशासन कार्य करती है। तभी तो &#8216;पुलिस को एक राज्य का विषय कहा गया है,&#8217; और &#8216;वेवजह कभी भी केंद्र सरकार राज्य के प्रशासन के मामले में दखलंदाजी नहीं करती।&#8217; उत्तर प्रदेश में विभिन्न प्रकार के अपराधों और अपराधियों को जमीन के अंदर दफ़न करने का नेतृत्व कौन संभाले हैं, यह सर्वविदित है। </p>
<p>उमेश पाल हत्याकांड में फरार चल रहे पांच लाख के इनामी अतीक के बेटे असद अहमद और शूटर गुलाम को गुरुवार को एसटीएफ ने एनकाउंटर में मार गिराया। उधर समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव कहती हैं कि देश में कानून का राज है और यूपी में फर्जी मुठभेड़ हो रहे हैं। यूपी में कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।जबकि उनके पति और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव का कहना है कि &#8216;पहले दिन से BJP चुनाव को देखते हुए एनकाउंटर कर रही है। मैं BJP से पूछना चाहता हूं कि जिन अधिकारियों ने एक ब्राह्मण मां-बेटी पर बुलडोजर चलाया उन्हें क्यों नहीं मिट्टी में मिलाया?&#8230;क्या आज का भारत यह है कि कमजोर की जान ले लें? क्या संविधान में जो अधिकार है वो नहीं मिलेंगे?&#8217;</strong></p>
<p>वरिष्ठ पत्रकार <strong>के. विक्रम राव</strong> अपने &#8216;माफिया कि मौत ! अंत भला तो सब भला !!&#8217; कालम में लिखते हैं कि  माफिया अतीक अहमद के हत्यारे-पुत्र असद अहमद को मारकर योगी आदित्यनाथ की पुलिस ने 48 दिनों बाद पीड़िता को नैसर्गिक न्याय दिलाया। वर्ना मृतकों की पिस्तौलों (ब्रिटिश बुल्डाग और बाल्थर पी–88 से) कई खाकीधारी रक्षक ही आज शहीद हो जाते। पुलिस की सूचना के अनुसार ये अस्त्र अतीक को पाकिस्तान से ड्रोन द्वारा पंजाब सीमा पर सप्लाई किया जाता था। </p>
<p>अब स्व. उमेश पाल (अतीक के गुर्गों द्वारा मारे गए बसपा विधायक राजू पाल का मित्र) की मां शांति देवी का कलेजा ठंडा हो गया होगा। उन्होंने (5 मार्च 2023) कहा भी था : “मात्र घर ढहाने से नहीं, माफिया अतीक और अशरफ के मारे जाने से ही मेरे कलेजे को ठंडक मिलेगी।” मगर अब दिलचस्पी इसमें होगी कि कौन सी सियासी पार्टी माफिया असद अहमद के लिए नमाजे जनाजा अता करेगी ? </p>
<p>योगीजी ने विधानसभा में (25 फरवरी 2003) वादा किया था कि : “माफिया को मिट्टी में मिला देंगे।” फिल वक्त मियां अतीक अहमद के हसीन ख्वाबों को तो खाक में मिला ही दिया गया। प्रयागराज की उस अदालत में जहां कैदी अतीक को जब-जब लाया जाता था तो आतंक से इतनी शांति छा जाती थी कि सुई गिरने की आवाज भी सुनी जा सकती थी। स्वयं इलाहाबाद हाईकोर्ट ने (5 मार्च 2023) को एक तल्ख टिप्पणी की कहा : “देखने से लगता है कि धूमनगंज थाना क्षेत्र में पुलिस का नहीं, अतीक अहमद का इकबाल चलता है।” </p>
<figure id="attachment_4858" aria-describedby="caption-attachment-4858" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/04/asad-ahmad.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/04/asad-ahmad.jpg" alt="" width="1200" height="900" class="size-full wp-image-4858" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/04/asad-ahmad.jpg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/04/asad-ahmad-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/04/asad-ahmad-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/04/asad-ahmad-768x576.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4858" class="wp-caption-text">तस्वीर न्यूज 18 हिंदी के सौजन्य से </figcaption></figure>
<p>एक रिपोर्ट के अनुसार यूपी एसटीएफ ने एनकाउंटर की एफआईआर दर्ज कराई है और बताया है कि उन्हें मुखबिरों से असद के होने की सूचना मिली थी। सूचना मिलने पर जब एसटीएफ की टीम ने असद और गुलाम को घेरा तो वह दोनों नहीं रुके और उनकी बाइक झाड़ियों में फंस गई। वहां से दोनों ने कई राउंड फायरिंग की तो पुलिस को भी जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी। इसी दौरान असद और गुलाम को गोली लग गई और दोनों मारे गए।</p>
<p>विक्रम राव आगे लिखते हैं कि &#8220;अब मंजर बदला है उसी कोर्ट परिसर का। वहां आज अपने बेटे की गोलियों से भुनी लाश पर अतीक रोया। बाहर नाराज जनता जूतों का हार लिए अतीक की प्रतीक्षा में थी, इस खूंखार  माफिया के गले में डालने के लिए। इसी बीच अतीक अहमद की पार्टी प्रमुख बहन कुमारी सुश्री मायावती ने ऐलान कर दिया कि अतीक अहमद कि बेगम शाइस्ता परवीन प्रयागराज के महापौर पद की प्रत्याशी नामित नहीं की जाएंगी। वरना यह तय लग रहा था कि धर्मनगरी की प्रथम नागरिक इस मुस्लिम माफिया की शरीके हयात ही होंगी। यूं समाजवादी नेता अखिलेश यादव ने असद अहमद के मुठभेड़ को फर्जी करार दिया है। प्रतिक्रिया स्वाभाविक तथा अपेक्षित रही क्योंकि अतीक को समाजवादी समाज का स्वप्नदृष्टा माना जाता रहा। मायावती ने भी जांच की मांग की है।&#8221;</p>
<p>अतीक के पुत्र को जिस रीति से अंतिम दंड दिया गया वह याद दिलाता है 1980-82 का दौर जब इंदिरा गांधी-राज में मांडा राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा प्रतिपादित प्राकृतिक इंसाफ दिया जाता था। उसी का यह परिष्कृत रूप है। एनकाउंटर में मारे गए असद का शव उसके दादा की कब्र के पास दफनाया जाएगा।एनकाउंटर की सूचना के बाद पुश्तैनी आवास पर लोगों की भीड़ जुट गई। सगे संबंधियों के आने का क्रम देर रात तक चलता रहा।</p>
<p><strong>अमर उजाला में आशीष तिवारी</strong> लिखते हैं कि &#8220;पंजाब में बीते कुछ समय से हथियारों की धरपकड़ और हरियाणा के एक शहर में पकड़े गए बड़े हथियारों के जखीरे और चार आतंकियों के पकड़े जाने को भी अतीक अहमद से जोड़कर देखा जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि बीते कुछ समय में जिस तरह से हरियाणा, दिल्ली, पंजाब में लगातार आरडीएक्स और अवैध हथियारों के जखीरे बरामद हो रहे हैं, वह पाकिस्तान से पंजाब के रास्ते देश के अलग अलग हिस्सों में पहुंचाए जा रहे हैं। </p>
<p>उन्होंने आगे लिखा है की: &#8220;क्या अतीक अहमद बीते कई सालों से पाकिस्तान के इशारे पर उत्तर प्रदेश में बहुत बड़ा नेटवर्क तैयार कर रहा था? क्या पाकिस्तान से हथियारों की खेप को मंगवा कर वह सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि समूचे देश में माहौल खराब करने की कोशिश की जा रही थी? क्या उत्तर प्रदेश के माफिया सरगना रहे और पूर्व सांसद अतीक अहमद के पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और रिंदा से भी मजबूत रिश्ते हैं? देश की प्रमुख सुरक्षा एजेंसियों समेत अतीक अहमद मामले की जांच कर रही एजेंसी के लिए यह सब जानना बेहद जरूरी हो गया है। आंतरिक सुरक्षा मामलों से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में अतीक अहमद से की जाने वाली मजबूत पूछताछ के साथ कई ऐसे राज खुल सकते हैं, जो न सिर्फ अतीक के काले साम्राज्य को उजागर करेंगे, बल्कि कई अन्य माफियाओं की आतंकी सांठगांठ को भी बेनकाब करेंगे।&#8221;</p>
<p>आशीष के रिपोर्ट के अनुसार &#8220;पूर्व सांसद रहे माफिया अतीक अहमद का नेटवर्क उतना सीमित नहीं है, जितना कि अब तक माना जा रहा था। अतीक मामले की जांच कर रही सुरक्षा एजेंसियों से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अतीक अहमद पाकिस्तान के इशारे पर न सिर्फ दहशत फैला रहा था, बल्कि हथियारों की बड़ी खरीद-फरोख्त और उनको देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचाने के बड़े नेटवर्क के तौर पर काम कर रहा था। पुलिस ने जिस आधार पर अतीक की रिमांड ली है, उससे कहीं ज्यादा उन्हें अतीक के काले साम्राज्य के खुलासे की उम्मीद है। सूत्रों का कहना है कि अतीक अहमद सिर्फ पूर्वांचल में ही दहशत फैलाने का काम नहीं करना चाहता था, बल्कि वह पाकिस्तान की शह काम भी कर रहा था। इसमें वह न सिर्फ हथियारों की खरीद-फरोख्त करता था, बल्कि उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में हथियारों की सप्लाई भी कराता था।&#8221; </p>
<p>बहरहाल, अमर उजाला के रिपोर्ट के अनुसार झांसी के पारीछा डैम के पास एनकाउंटर में मारे गए माफिया अतीक अहमद के बेटे असद और शूटर गुलाम मोहम्मद का शुक्रवार रात 2:30 बजे तक पोस्टमार्टम चला। 3 डॉक्टरों का पैनल शामिल रहा। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक सामने आया कि माफिया अतीक के बेटे असद को दो गोलियां लगी हैं। एक गोली पीछे से पीठ में लगकर दिल और सीने को चीरते हुए बाहर निकल गई। जबकि दूसरी गोली सीने में लगी और गले में जाकर फंस गई। डॉक्टरों की टीम ने शरीर के भीतर से गोली को बरामद किया है। वहीं, शूटर गुलाम को सिर्फ एक गोली लगी, जो पीठ में लगकर दिल व सीने को चीरते हुए बाहर निकल गई। गोली से ही दोनों की मौत हुई है।डॉ. शैलेश गुप्ता, डॉ. नीरज सिंह और डॉ. राहुल पाराशर के पैनल ने रात करीब 9 बजे पोस्टमार्टम शुरू किया। दाेनों शवों के पोस्टमार्टम करने में करीब 5 घंटे का वक्त लगा। इस दौरान पूरे पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी भी कराई गई है। </p>
<p>राव का मानना है कि &#8216;मियां अतीक अहमद की विशिष्टता पर चर्चा तो होनी चाहिए। वे फूलपुर से लोकसभा सदस्य रहे जहां से जवाहरलाल नेहरू (1952-62) जीता करते थे। संगम के पूर्वी छोर पर बसा फूलपुर लोकसभाई चुनाव क्षेत्र तब गंदला हो गया था। फिर हत्या, लूट, डकैती, अपहरण, राहजनी के पैंतीस जघन्य मुकदमों में अभियुक्त माफिया डान अतीक अहमद यहां के जनप्रतिनिधि निर्वाचित हुए। तब वे समाजवादी पार्टी में थे। वर्षों तक अतीक अहमद का अस्थायी आवास नैनी सेंट्रल जेल रहा। कभी-कभी तो वे संसद भवन से सीधे इस कारागार में पधारते थे। यूं तो नेहरू भी दस वर्षों तक जेल में रहे, मगर बर्तानवी सत्ता से टकराने के कारण, अहिंसक संघर्ष के सिपाही के रूप में। फूलपुर ने प्रधानमंत्री रह चुके विश्वनाथ प्रताप सिंह को 1971 में चुना था। नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित और लोहियावादी जनेश्वर मिश्र को भी वोटरों ने यहीं से विजयी बनाया था।</p>
<p>क्या नियति है। बंदूक-पिस्तौल के दम पर करोड़ों रुपयों की जायदाद बनाने वाले अतीक अहमद आज कैदी नंबर 17052 बनकर रोज पच्चीस रुपए कमाता है। अहमदाबाद जेल से साबरमती जेल में अतीक संडास साफ करता है, धोबी का काम करता है। उसका वजन भी कम हो रहा है। इतिहास बताता है कि असद ने अपराध की दुनिया में छह महीने पहले ही कदम रखा था। भाई अली और उमर के सरेंडर कर जेल जाने के बाद अतीक गैंग की कमान उसने संभाल ली थी। उसे “छोटे” कहकर पुकारते थे। वह गिरोह का संचालन लखनऊ के एक फ्लैट से करता था।</p>
<p>असद अहमद की मौत पर असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि कानून की धज्जियां उड़ाई गई हैं। अब ओवैसी बताएं कि आज तक जो लोग (अतीक-असद) बाप-बेटे द्वारा हत्या के शिकार हुए उनके लिए कई संवेदना ? जब हाल ही में प्रयागराज में उमेश पाल को असद ने छलनी कर दिया था तब ओवैसी का पूरा मौन था ! अर्थात अपराध की परिभाषा और गंभीरता भी मजहब के आधार पर तय की जाएगी ? मियां अतीक अहमद की कथा को पढ़िये वरिष्ठ संवाददाता अंकित तिवारी (नवभारत टाइम के 3 मार्च 2023) की कलम से : “अतीक का नाम सबसे पहले 1979 में एक हत्या में आया था। तब वह केवल 17 साल का था। उसके पिता फिरोज इलाहाबाद स्टेशन पर तांगा चलाते थे। गली-मोहल्ले की गुंडई करते-करते अतीक इलाहाबाद के कुख्यात चांद बाबा के मुकाबिल हो गया। लोगों की मदद से अतीक का ग्राफ बढ़ने लगा। 1986 में जब पुलिस ने पकड़ा तो दिल्ली के एक रसूखदार परिवार ने छोड़ने की सिफारिश की। फिर 1989 में वह इलाहाबाद पश्चिमी सीट से चांद बाबा के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरा और विधायक बन गया। उसके माननीय बनने के कुछ महीने के भीतर ही चांद बाबा की दिनदहाड़े सरे बाजार हत्या कर दी। उसके गैंग के बाकी लोगों को भी एक-एक करके मार डाला गया।”</p>
<p>अब चंद अल्फाज काषाय परिधानधारी योगी आदित्यनाथ महाराज से की जा रही जन अपेक्षाओं की बाबत। क्योंकि सिर्फ सपोले की मौत हुई है, विष का श्रोत नहीं सूखा है। फिलहाल योगीजी इस पूरे हादसे पर बड़ी सहनशीलता से कह सकते हैं जो गोस्वामी तुलसी दास जी ने उत्तरकांड (रामचरित मानस) में कहा था : “कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा । व्यास समास स्वमति अनुरूपा ॥”  (हे नाथ ! मैंने श्रीहरिका अनुपम चरित्र अपनी बुद्धि के अनुसार कहीं विस्तार से और कहीं संक्षेप से कहा।) मगर आगे योगी जी को ही बाकी माफियाओं को भी ठीक करना होगा। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/crime/yogi-adityanath-had-said-will-eliminate-mafioso">योगी आदित्यनाथ ने कहा था: “माफिया को मिट्टी में मिला देंगे”</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में &#8216;नियत का साफ़ होना&#8217; एक मज़ाक है, अगर इसे &#8216;पुलिस सुधार&#8217; मामले में प्रकाश सिंह समिति की अनुशंसा की नजर से देखें</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-cleansing-of-destiny-in-the-indian-political-system-is-a-joke-if-seen-from-the-point-of-view-of-the-prakash-singh-committees-recommendation-on-police-reforms</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Jan 2023 11:47:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[BSF]]></category>
		<category><![CDATA[CISF]]></category>
		<category><![CDATA[CRPF]]></category>
		<category><![CDATA[home ministry]]></category>
		<category><![CDATA[narendra modi]]></category>
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		<category><![CDATA[police]]></category>
		<category><![CDATA[Policing]]></category>
		<category><![CDATA[Prakash Singh Committe]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली: नवनियुक्त उप-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पंकज कुमार सिंह महज एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ही नहीं, बल्कि एक ऐसे पुलिस अधिकारी के पुत्र भी हैं, जिन्होंने भारतीय पुलिस व्यवस्था को &#8216;स्वस्थ&#8217; और &#8216;दुरुस्त&#8217; बनाने के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया। यह अलग बात है कि भारतीय कार्यपालिका, विधानपालिका की &#8216;शतरंजी चाल&#8217; और उस पर [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-cleansing-of-destiny-in-the-indian-political-system-is-a-joke-if-seen-from-the-point-of-view-of-the-prakash-singh-committees-recommendation-on-police-reforms">भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में &#8216;नियत का साफ़ होना&#8217; एक मज़ाक है, अगर इसे &#8216;पुलिस सुधार&#8217; मामले में प्रकाश सिंह समिति की अनुशंसा की नजर से देखें</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली: नवनियुक्त उप-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पंकज कुमार सिंह महज एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ही नहीं, बल्कि एक ऐसे पुलिस अधिकारी के पुत्र भी हैं, जिन्होंने भारतीय पुलिस व्यवस्था को &#8216;स्वस्थ&#8217; और &#8216;दुरुस्त&#8217; बनाने के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया। यह अलग बात है कि भारतीय कार्यपालिका, विधानपालिका की &#8216;शतरंजी चाल&#8217; और उस पर &#8216;देश के शीर्षस्थ राजनेताओं&#8217; के &#8216;अवांछनीय कमान&#8217; के कारण आज तक उनका वह ऐतिहासिक सिफारिशें सरकारी दफ्तरों में लाल कपड़े में बंद पड़ा है। आम तौर पर किसी भी व्यवस्था को स्वस्थ बनाने के लिए, दुरुस्त बनाने के लिए &#8216;आत्म-विश्वास&#8217; के साथ-साथ &#8216;साफ़-सुथरी नियत&#8217; की आवश्यकता होती है। परन्तु तकलीफ इस बात की है कि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में &#8216;नियत का साफ़ होना&#8217; एक मज़ाक ही समझा जाता है। </strong></p>
<p>1988 बैच के राजस्थान कैडर के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी पंकज कुमार सिंह, जो अब भारत का उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के नाम से भी जाने जायेंगे, 1959 बैच के सेवानिवृत्त भारतीय पुलिस अधिकारी प्रकाश सिंह के पुत्र हैं। भारतीय पुलिस प्रशासन में प्रकाश सिंह का नाम और उनकी ऊंचाई, आज ही नहीं, आने वाले कई दशकों तक न भारत के लोग माप पाएंगे, ना ही देश के कार्यपालिका, विधानपालिका में बैठे लोग ही। इतना ही नहीं, आने वाले कई दशकों तक भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में घुटने कद से आदमकद की लम्बाई तक खुद को खींचकर बनाने वाले राजनेता ही समझ पाएंगे। अगर समझ पाते तो शायद भारत में पुलिस सुधारों की दिशा में सुझाए गए ऐतिहासिक प्रकाश सिंह समिति की सिफारिशों को सम्पूर्णता के साथ लागू किया गया होगा।</p>
<p>पिता-पुत्र की समानता यह भी देखिये &#8211; प्रकाश सिंह सन 1993-1994 में सीमा सुरक्षा बल का नेतृत्व किये थे। दशकों बाद उनका पुत्र पंकज कुमार सिंह भी सीमा सुरक्षा बल के पूर्व महानिदेशक थे। बहरहाल, पंकज कुमार सिंह की नियुक्ति दो साल की अवधि के लिए किया गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के आदेश के अनुसार 15 जनवरी 2023 को जारी किया गया था। दिनांक 14 जनवरी,2023 को भारत सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग सूत्रों के अनुसार पदभार ग्रहण करने की तिथि से दो साल की अवधि के लिए या अगले आदेश तक, जो भी पहले हो, अनुबंध के आधार पर पुनर्नियुक्ति। भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीतियों के निर्माण, कार्यान्वयन और सुधार में अजीत डोभाल,जिसमें आतंकवाद, डेटा उल्लंघनों और चोरी, साइबर खतरों,संबंधित एजेंसियों की तत्परता और सुरक्षा से निपटने वाले प्रमुख संगठनों के बीच सहयोग से उत्पन्न खतरों का आकलन करना शामिल है।</p>
<p>नवनियुक्त उप-सुरक्षा सलाहकार इससे पहले दिल्ली में केंद्रीय  रिजर्व पुलिस फ़ोर्स मुख्यालय में सीआरपीएफ महानिरीक्षक (छत्तीसगढ़) और आईजी (ऑपरेशंस) के रूप में केंद्र सरकार के साथ भी काम किया है।महानिदेशक, बीएसएफ के रूप में वे बीएसएफ क्षेत्राधिकार में विवादस्पद संसोधन पर भी कार्य किया था । इनकी अगुआई में ही कई राज्यों के विरोध पर सीमा से 50 किलोमीटर तक बढ़ा दिया गया था।बीएसएफ की महिला सैनिकों को आगे बढ़ाने में भी बड़ी भूमिका अद्वितीय है।इसके बाद बीएसएफ की महिला मोटरसाइकिल सवारों द्वारा देशव्यापी दौरा भी किया गया। </p>
<p>जैसलमेर में बीएसएफ का 2021 स्थापना दिवस मनाने का उनका विचार इतना पसंद किया गया कि अब भारतीय सेना सहितसभी अर्धसैनिक बलों को निर्देश दिया गया है कि वे अपनी स्थापना और स्थापना दिवस दिल्ली से बाहर मनाएं। सूत्रों का कहना है कि पूर्वी सीमांत के प्रमुख के रूप में उन्होंने पश्चिम बंगाल और असं की सीमाओं के माध्यम से मवेशियों की तस्करी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2015 और 2021 के बीच, भारत-बांग्लादेश सीमा पर मवेशियों की तस्करी में अस्सी से अधिक फीसदी की कमी आई है। खैर, यह तो वर्तमान उप-सुरक्षा सलाहकार की बात हुई। </p>
<figure id="attachment_4748" aria-describedby="caption-attachment-4748" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/01/DGP-Prakash-Singh.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/01/DGP-Prakash-Singh.jpg" alt="" width="1200" height="675" class="size-full wp-image-4748" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/01/DGP-Prakash-Singh.jpg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/01/DGP-Prakash-Singh-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/01/DGP-Prakash-Singh-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/01/DGP-Prakash-Singh-768x432.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4748" class="wp-caption-text">पूर्व भारतीय पुलिस सेवा के अधिकार प्रकाश सिंह। तस्वीर: दी प्रिंट के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p><strong>लेकिन आज ही नहीं, आने वाले समय में भी जब भी पुलिस सुधार की बात होगी, राजनेताओं के होठों पर नाम आये अथवा नहीं, क्योंकि देश में शायद ही कोई पुलिस वाले होंगे जो राजनेताओं के विरुद्ध जा सकते हैं। भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में पुलिस मूलतः नेताओं की उंगलियों पर नाचती है। यह कारण है कि प्रकाश सिंह ने दशकों पहले से भारतीय पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए अनेकानेक यत्न किए। कोई दस वर्ष पहले उन्होंने लिखा था कि &#8220;पुलिस सुधारों के प्रति राज्यों की अरुचि के कारण आम जनता से इसके लिए आंदोलन करनी चाहिए।&#8221;</strong></p>
<p>प्रकाश सिंह के अनुसार, शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता है जब पुलिस से संबंधित कोई आलोचनात्मक खबर अखबारों में न छपती हो। उत्पीड़न, उगाही, जनता के साथ दुर्व्यवहार, घटना स्थल पर समय से न पहुंचने, विवेचना में लापरवाही, कुछ न कुछ आए दिन होता ही रहता है। इधर हाल में दो बड़ी घटनाएं ऐसी हुई जिसका उल्लेख करना आवश्यक है। पुलिस महानिदेशकों के अखिल भारतीय सम्मेलन में परिचर्चा के दौरान बिहार के डीजीपी ने कहा कि शांति व्यवस्था की स्थिति खड़ी होने पर बल प्रयोग के बजाय घटना की वीडियोग्राफी भी एक अच्छा विकल्प है। दंगाइयों को फोटो से चिन्हित करने के पश्चात उनके विरुद्घ अभियोग दर्ज कर मुकदमा चलाया जा सकता है। </p>
<p>दूसरे शब्दों में, बलवा करने वालों पर दमनात्मक कार्रवाई कोई जरूरी नहीं है। बिहार में रणवीर सेना के प्रमुख की हत्या के बाद उनके जातीय समर्थकों ने पटना में जमकर उपद्रव किया था और पुलिस मूक दर्शक बनी रही। इसी लय पर मुंबई में भी असम और म्यांमार की घटनाओं को लेकर जब 11 अगस्त को आजाद मैदान में मुसलमानों ने उपद्रव किया तो वहां भी पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। बलवाइयों ने जमकर तोड़फोड़ की और महिला सिपाहियों के साथ दु‌र्व्यहार भी किया। एक डिप्टी कमिश्नर ने अराजक तत्वों के विरुद्ध कार्रवाई करने की कोशिश की तो उन्हें पुलिस कमिश्नर ने मौके पर ही झाड़ दिया। कमिश्नर का कहना है कि अगर कार्रवाई करते तो उसकी गंभीर प्रतिक्रिया होती। </p>
<p>अगर गहराई में उपरोक्त दोनों घटनाओं का विश्लेषण किया जाए तो सच्चाई यह है कि बिहार में जातीय समीकरण के कारण और उच्चतम स्तर से कार्रवाई न होने के संकेत के कारण पुलिस निष्क्रिय हो रही है। इसी तरह मुंबई में गृह मंत्रालय के मौखिक आदेशों के कारण पुलिस ने बलवाइयों को खुली छूट दी। कुल मिलाकर नतीजा यह निकलता है कि राजनीतिक निर्देश और संरक्षण के कारण वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने दोनों प्रकरणों में अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं किया। इसका परिणाम आम जनता को भुगतना पड़ा और इस निष्क्रियता के जो भयंकर दूरगामी परिणाम होंगे वे अपनी जगह हैं। प्रश्न यह उठता है कि देश की पुलिस किसके लिए है-क्या यह शासक वर्ग के लिए है और उसके राजनीतिक लक्ष्य की पूर्ति करना उसका कर्तव्य है या यह देश की जनता के लिए है और कानून पर चलते हुए कानून की रक्षा करना उसका सर्वोपरि कर्तव्य है। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि स्वतंत्रता के छह दशक बीत जाने के बाद आज भी पुलिस का सामंतवादी ढांचा बरकरार है। </p>
<p>अंग्रेजों ने अपने साम्राज्य की रक्षा और शासक वर्ग के हितों को ध्यान में रखते हुए इस पुलिस की संरचना की थी। स्वतंत्रता या उसके शीघ्र बाद में पुलिस व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता थी, परंतु ऐसा नहीं किया गया। आज केवल इतना ही फर्क है कि गोरे शासकों के बजाय अन्ना के शब्दों में अब काले अंग्रेजों की हुकूमत चल रही है। 22 सितंबर 2006 को सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार संबंधी कुछ आदेश दिए थे। इन आदेशों का लक्ष्य था कि पुलिस पर किसी तरह का बाहरी दबाव न रहे और उसे अपने कार्यो में स्वायत्तता हो ताकि वह अराजक तत्वों के विरुद्घ निर्भीकता से कार्रवाई कर सके। इसके अलावा पोस्टिंग व ट्रांसफर के मामलों में एक बोर्ड जिसके सदस्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी होंगे, के बनाए जाने का निर्देश था और यह अपेक्षा की गई थी कि उप पुलिस अधीक्षक और राजपत्रित अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग यह बोर्ड ही करेगा। </p>
<figure id="attachment_4749" aria-describedby="caption-attachment-4749" style="width: 1064px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/01/Home-Ministry-India.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/01/Home-Ministry-India.jpeg" alt="" width="1064" height="700" class="size-full wp-image-4749" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/01/Home-Ministry-India.jpeg 1064w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/01/Home-Ministry-India-300x197.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/01/Home-Ministry-India-1024x674.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/01/Home-Ministry-India-768x505.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1064px) 100vw, 1064px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4749" class="wp-caption-text">नॉर्थ ब्लॉक, नई दिल्ली</figcaption></figure>
<p>पुलिस के विरुद्ध गंभीर शिकायतों के निस्तारण हेतु भी राज्य और जनपद स्तर पर शिकायत बोर्ड बनाए जाने के निर्देश थे। पुलिस अधिकारियों के लिए नियुक्ति पर दो साल का कार्यकाल निर्धारित किया गया था। दुर्भाग्य से इन आदेशों को कार्यान्वित नहीं किया गया। कुछ राज्यों ने स्वीकृति का हलफनामा तो दिया है, परंतु जमीनी हालात अभी भी पहले जैसे ही हैं। अधिकांश राज्य हीला-हवाली कर रहे हैं। कुछ राज्यों ने चालाकी में कानून बना लिए हैं, जो वास्तव में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करते हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो सुधार के बजाय पुलिस में गिरावट ही होती जा रही है। सवाल अब सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता का है। </p>
<p>न्यायपालिका की जिम्मेदारी क्या निर्देश देने के बाद समाप्त हो जाती है? अगर राज्य सरकार जानबूझकर उन आदेशों की अवहेलना करती है तो क्या सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी नहीं है कि उन पर चाबुक चलाए और उन्हें अवमानना की नोटिस दे? एक तरफ पुलिस के कुछ अधिकारी शांति व्यवस्था की चुनौतियों के सामने मूक दर्शक बन गए हैं, दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट अपने आदेशों की अवहेलना को देखकर भी कोई सख्त कदम नहीं उठा रहा है। अगर यही हालात बने रहे तो हमें शायद भूल जाना होगा कि इस देश में पुलिस नाम की कोई चीज है। हां उसे शासक वर्ग का एक मिलिशिया या बल कहा जा सकेगा। </p>
<p>पुलिस अधिकारियों का एक वर्ग, जो सुधार के प्रति समर्पित है, अपनी मांगों को लेकर जनता के पास जाने का प्रयास कर रहा है। इन अधिकारियों का यह सोचना है कि जब तक सुधारों को जनता का समर्थन नहीं मिलेगा तब तक प्रगति नहीं होगी। उन्होंने एक दस सूत्रीय कार्यक्रम बनाया है जिसका मुख्य संदेश यह है कि वर्तमान शासक पुलिस को जनता की पुलिस के रूप से परिवर्तित किया जाए और पुलिस के जनता के प्रति व्यवहार में आमूल परिवर्तन हो। अभियोगों के पंजीकरण में विशेष सुधार होना चाहिए। साथ ही साथ, पुलिस की जनशक्ति में वृद्धि और उसके संसाधनों के आधुनिकीकरण की आवश्यकता है। </p>
<p>अधीनस्थ कर्मचारियों को अपने कार्यकाल में कम से कम तीन प्रोन्नतियां अवश्य मिलनी चाहिए। पुलिसकर्मियों से बारह घंटे से ज्यादा डयूटी न ली जाए और कालांतर में इसे कम करके आठ घंटे लाया जाए। सिपाहियों की आवासीय सुविधा में भी विशेष सुधार की आवश्यकता है, इत्यादि। पीपुल्स पुलिस यानी जनता की पुलिस बनाने का यह प्रयास सही दिशा में एक सकारात्मक कदम है। देश का बहुत नुकसान हो चुका है, जनता भी बहुत त्रस्त हो चुकी है। अब भी अगर सरकार पुलिस सुधारों के प्रति सजग हो जाए और सुप्रीम कोर्ट इस विषय में सख्त रुख अपना ले तो स्थिति संभाली जा सकती है। जनता की भी इस क्षेत्र में बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। </p>
<p>तभी प्रकाश सिंह ने कहा था कि आवश्यकता है एक जन आंदोलन की, जिसमें पुलिस सुधारों की मांग की जाए, उसे शासकीय चंगुल से मुक्त कर जनता के प्रति जिम्मेदार बनाया जाए और ऐसी व्यवस्था की जाए कि पुलिस कानून और संविधान की रक्षा करना ही अपना सर्वोपरि कर्तव्य समझे।  प्रकाश सिंह के अनुसार यह वर्तमान भारत की विडंबनाओं में से एक है कि जब हम चंद्रमा पर एक मिशन भेजने, अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों को लॉन्च करने, बुलेट ट्रेन विकसित करने और एक दुर्जेय आईटी शक्ति होने की स्थिति का आनंद लेने में सक्षम हैं। आजादी के दशकों बाद- वही पुरानी औपनिवेशिक संरचना और सामंती मानसिकता वाले पुलिस बल के साथ फंस गया। ऐसा नहीं है कि पुलिस को आधुनिक बनाने के लिए अतीत में प्रयास नहीं किए गए। राज्य और केंद्रीय स्तर पर कई आयोगों ने पुलिस बल के पुनर्गठन की सिफारिशें की हैं। हालांकि, &#8216;पुलिस&#8217; और &#8216;कानून और व्यवस्था&#8217; पर अधिकार क्षेत्र रखने वाली राज्य सरकारों ने केवल दिखावटी बदलाव किए और उन सुधारों के खिलाफ थीं जो पुलिस को राजनीतिक दबाव से अलग करते और इसे लोगों के प्रति जवाबदेह बनाते।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-cleansing-of-destiny-in-the-indian-political-system-is-a-joke-if-seen-from-the-point-of-view-of-the-prakash-singh-committees-recommendation-on-police-reforms">भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में &#8216;नियत का साफ़ होना&#8217; एक मज़ाक है, अगर इसे &#8216;पुलिस सुधार&#8217; मामले में प्रकाश सिंह समिति की अनुशंसा की नजर से देखें</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>राज्यों के राज्यपालों, गृह मंत्रियों, आला पुलिस अधिकारियों की चिंतन-मंथन बैठक कल से, प्रधानमंत्री संबोधित करेंगे</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/nation/two-day-chintan-baithak-of-state-home-ministers-rom-tomorrow</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 Oct 2022 04:25:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[governors]]></category>
		<category><![CDATA[haryana]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सूरजकुंड (हरियाणा) : आज़ादी के 100वें वर्ष तक देश का विजन क्या होगा और विकसित भारत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए देश की महिलाओं की क्या भूमिका होगी, आगामी 27 और 28 नवम्बर को हरियाणा के सूरजकुंड में गृह मंत्रियों, राज्य के राज्यपालों, आला पुलिस अधिकारियों की चिंतन बैठक में चिंतन-मंथन किया जायेगा। प्रधानमंत्री [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/two-day-chintan-baithak-of-state-home-ministers-rom-tomorrow">राज्यों के राज्यपालों, गृह मंत्रियों, आला पुलिस अधिकारियों की चिंतन-मंथन बैठक कल से, प्रधानमंत्री संबोधित करेंगे</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सूरजकुंड (हरियाणा) : आज़ादी के 100वें वर्ष तक देश का विजन क्या होगा और विकसित भारत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए देश की महिलाओं की क्या भूमिका होगी, आगामी 27 और 28 नवम्बर को हरियाणा के सूरजकुंड में गृह मंत्रियों, राज्य के राज्यपालों, आला पुलिस अधिकारियों की चिंतन बैठक में चिंतन-मंथन किया जायेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल, यानी 28 अक्टूबर 2022 को सुबह करीब साढ़े दस बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से चिंतन शिविर को संबोधित करेंगे। इस दो-दिवसीय चिंतन बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह करने जा रहे हैं।  </strong></p>
<p>आधिकारिक सूत्रों के अनुसार गृह मंत्रियों का यह चिंतन शिविर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री के भाषण में घोषित पंच प्रण के अनुरूप आंतरिक सुरक्षा से संबंधित मामलों पर नीति निर्माण को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य प्रदान करने का एक प्रयास है। सहकारी संघवाद की भावना के अनुरूप यह शिविर,  केन्द्र और राज्य स्तर पर विभिन्न हितधारकों के बीच योजना एवं समन्वय के मामले में अधिक तालमेल सुनिश्चित करेगा।</p>
<p>दो दिवसीय चिंतन शिविर में भाग लेने के लिए सभी राज्यों के गृह मंत्रियों और संघ शासित प्रदेशों के उपराज्यपाल और प्रशासकों को आमंत्रित किया गया है। राज्यों के गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और केंद्रीय पुलिस संगठनों  के महानिदेशक भी चिंतन शिविर में भाग लेंगे। सूत्रों के अनुसार चिंतन शिविर का उद्देश्य &#8220;विजन 2047&#8221; और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में घोषित पंच प्राण के कार्यान्वयन के लिए कार्य योजना तैयार करना है। साथ ही, वर्ष ‘2047 तक विकसित भारत&#8217; के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नारी शक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण है, चिंतन शिविर में देश में महिलाओं की सुरक्षा और उनके लिए सुरक्षित वातावरण बनाने पर विशेष बल दिया जाएगा। </p>
<p>सूत्रों के अनुसार, इस शिविर में पुलिस बलों के आधुनिकीकरण, साइबर अपराध प्रबंधन, आपराधिक न्याय प्रणाली में आईटी के बढ़ते उपयोग, भूमि सीमा प्रबंधन, तटीय सुरक्षा, महिला सुरक्षा, मादक पदार्थों की तस्करी जैसे मुद्दों पर विचार-विमर्श किया जाएगा।  साथ ही, शिविर में साइबर अपराध प्रबंधन के लिए ईको-सिस्टम विकसित करने, पुलिस बलों के आधुनिकीकरण, आपराधिक न्याय प्रणाली में आई.टी. के बढ़ते उपयोग, भूमि सीमा प्रबंधन और तटीय सुरक्षा एवं आंतरिक सुरक्षा से संबंधित अन्य मुद्दों पर चिंतन होगा।</p>
<p>दो दिन के चिंतन शिविर का उद्देश्य &#8220;विजन 2047&#8221; और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में घोषित पंच प्राण के कार्यान्वयन के लिए कार्य योजना तैयार करना है। गृह मंत्रियों के चिंतन शिविर में साइबर अपराध प्रबंधन के लिए ईको-सिस्टम विकसित करने, पुलिस बलों के आधुनिकीकरण, आपराधिक न्याय प्रणाली में आई.टी. के बढ़ते उपयोग, भूमि सीमा प्रबंधन और तटीय सुरक्षा एवं अन्य आंतरिक सुरक्षा से संबंधित मुद्दों पर चिंतन किया जायेगा। वर्ष ‘2047 तक विकसित भारत&#8217; के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नारी शक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण है और चिंतन शिविर में देश में महिलाओं की सुरक्षा और उनके लिए सुरक्षित वातावरण बनाने पर विशेष बल दिया जाएगा। शिविर का उद्देश्य उपर्युक्त क्षेत्रों में राष्ट्रीय नीति निर्माण और बेहतर योजना व समन्वय को सुगम बनाना भी है।</p>
<p>चिंतिन शिविर में छह सत्रों में विभिन्न विषयों पर चर्चा की जायेगी। शिविर के पहले दिन होमगार्ड, नागरिक सुरक्षा, आग से सुरक्षा और शत्रु संपत्ति आदि कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श होगा। दूसरे दिन, साइबर सुरक्षा, मादक पदार्थों की तस्करी, महिला सुरक्षा और सीमा प्रबंधन जैसे अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होगी। </p>
<p>मादक पदार्थों की तस्करी विषय पर एन.डी.पी.एस. अधिनियम, एन्कॉर्ड, निदान और नशामुक्त भारत अभियान पर भी चिंतन शिविर में विचार विमर्श किया जायेगा। भूमि सीमा प्रबंधन और तटीय सुरक्षा विषयों के अंतर्गत सीमाओं की सुरक्षा और सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास पर चिंतन किया जायेगा। ICJS और CCTNS सिस्टम और आई.टी. मॉड्यूल – नफीस, आई.टी.एस.एस.ओ., एन.डी.एस.ओ. और क्रि-मैक का उपयोग करके प्रौद्योगिकी-आधारित जांच द्वारा दोषसिद्धि दर बढ़ाने के उपायों पर भी विचार-विमर्श किया जाएगा। सेफ सिटी प्रोजेक्ट, 112-सिंगल इमरजेंसी रिस्पांस सिस्टम, जिलों में मानव तस्करी-रोधी इकाई, पुलिस थानों में महिला हेल्प डेस्क और मछुआरों के लिए बायोमेट्रिक पहचान पत्र जैसी पहलों पर भी चर्चा की जाएगी। विभिन्न विषयों पर सत्रों का उद्देश्य इन मुद्दों पर राज्य सरकारों की सहभागिता को प्रोत्साहित और सुनिश्चित करना है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/two-day-chintan-baithak-of-state-home-ministers-rom-tomorrow">राज्यों के राज्यपालों, गृह मंत्रियों, आला पुलिस अधिकारियों की चिंतन-मंथन बैठक कल से, प्रधानमंत्री संबोधित करेंगे</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>#भारतकीसड़कों से #भारतकीकहानी (19) ✍  #दिल्लीपुलिस:   #संवेदना Vs #वेदना 😪 कैसे मुस्कुराएं जनाब ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 31 Aug 2022 07:12:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[administration]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi Police]]></category>
		<category><![CDATA[home ministry]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[police]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दिल्ली के पालम क्षेत्र में स्थित सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन के परिसर में यत्र-तत्र-सर्वत्र लिखा है &#8220;मुस्कुराइए &#8230;.. आप सुलभ में हैं&#8221; &#8211; भावार्थ यह है कि आप &#8216;लघु&#8217; अथवा &#8216;दीर्घ शंकाओं&#8217; से अगर पीड़ित हैं तो आप &#8216;घबराने&#8217; के बजाय &#8216;मुस्कुराएं&#8217;; क्योंकि आप एक ऐसे परिसर में हैं जो भारत के 130 करोड़ [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दिल्ली के पालम क्षेत्र में स्थित सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन के परिसर में यत्र-तत्र-सर्वत्र लिखा है &#8220;मुस्कुराइए &#8230;.. आप सुलभ में हैं&#8221; &#8211; भावार्थ यह है कि आप &#8216;लघु&#8217; अथवा &#8216;दीर्घ शंकाओं&#8217; से अगर पीड़ित हैं तो आप &#8216;घबराने&#8217; के बजाय &#8216;मुस्कुराएं&#8217;; क्योंकि आप एक ऐसे परिसर में हैं जो भारत के 130 करोड़ आवाम को इस पीड़ा से मुक्ति दिलाने हेतु विगत पांच दशकों से कार्यरत हैं। लोगों ने सराहा है। </strong></p>
<p>यह अलग बात है कि जब सुलभ के संस्थापक डॉ बिंदेश्वर पाठक, जो बाद में &#8216;पद्मविभूषण&#8217; से भी अलंकृत हुए, अपने हाथों से भारत की गलियों में, गाँव में, शहरों में, मेट्रोपोलिटन और कॉस्मोपोलिटन में लोगों का &#8216;मल-मूत्र&#8217; उठाकर, साफ कर  &#8216;सेवा&#8217; कार्य किया; आज लघु और दीर्घ शंकाओं का भी कोर्पोरेटजेशन हो गया। लोग बाग़ &#8216;मल-मूत्र से भी मालामाल हो रहे हैं। &#8216;मुस्कुराने&#8217; का वजह कब अपने उत्कर्ष पर होता है, इसका प्रयोग बादशाह अकबर के ऊपर भी किया गया था जब उन्होंने &#8216;बीरबल&#8217; से पूछा था कि जीवन में सबसे अधिक &#8216;प्रसन्नता&#8217;, &#8216;मुस्कुराने का वजह&#8217; कब होता है। बीरबल ने कहा था कि जब हम दैनिक प्राकृतिक आवश्यकताओं से निवृत होते हैं। </p>
<p>लेकिन अगर भारत सरकार के गृह मंत्रालय यह अपेक्षा करें कि उनके अधीनस्थ की सभी संस्थाएं, साथ ही, दिल्ली पुलिस के कर्मी गण जनता के साथ मधुर संबंध बनाए रखे, हमेशा मुस्कुराते रहें, पुलिस भी और जनता भी &#8211; यह संभव तो है ही नहीं, नामुमकिन ही है, बशर्ते &#8216;शीर्षस्थ अधिकारी से लेकर नीचे तक सबों की इक्षाशक्ति बहुत मजबूत हो। मजबूत होने के लिए, मुस्कुराने के लिए &#8216;मानवीय&#8217; होना नितांत आवश्यक है । क्योंकि जो व्यक्ति वर्दी पहनकर समाज की, राष्ट्र की सेवा करते हैं, खासकर निचले तबके के लोग, उसे समाज से ही नहीं, संस्थान से भी वह नहीं मिल पाता, जिसका वह हकदार है। </p>
<p><iframe loading="lazy" title="#भारतकीसड़कों से #भारतकीकहानी (19) ✍ दिल्ली पुलिस ✍ &#039;संवेदना&#039; Vs &#039;वेदना&#039; : कैसे मुस्कुराएं जनाब ? 🙏" width="696" height="392" src="https://www.youtube.com/embed/uP0zEBqxQJg?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture" allowfullscreen></iframe></p>
<p>वर्दी वाले नीचे तबके के कर्मियों को वह सम्मान नहीं मिल पाता जिसकी मनोवैज्ञानिक रूप से उम्मीद होती है। सम्बद्ध विभाग के उत्कर्ष अधिकारियों की बात छोड़ें, उनके विभागाध्यक्ष भी (अपवाद छोड़कर) अपने अधीन कार्य करने वाले कर्मियों को नाम से नहीं पहचानते हैं। संस्थान में उच्च पदों पर आसीन अधिकारीगण उसी संस्थान में कार्यरत छोटे-छोटे, अदना सा कर्मचारियों को कभी देखे भी नहीं होते हैं, देखते भी नहीं हैं। </p>
<p><strong>विश्वास नहीं हो तो दिल्ली पुलिस सहित गृह मंत्रालय के अधीन कार्यरत सभी संस्थानों में लगे सीसीटीवी का फुटेज देखें, जब वरिष्ठ अधिकारी दफ्तर में आते-जाते हैं और कनिष्ठ उन्हें सल्यूट करते हैं। औसतन 90 फीसदी से अधिक वरिष्ठ अधिकारी उसे देखते भी नहीं, मुस्कुराने की बात तो अलग है। &#8216;मुस्कुराना&#8217; या अपने कनिष्ठ का अभिवादन स्वीकारना शायद पुलिस मैन्युअल में नहीं लिखा है कि गलत है।</strong> </p>
<p>मनोवैज्ञानिक, आर्थिक, सामाजिक, मानसिक, मानवीय दूरियां इतनी अधिक होती है जिसके कारण सेवा क्या, अवकाश के बाद बिरले (अपवाद छोड़कर) कोई पदाधिकारी होते हैं जिन्हें उस संस्थान के कर्मी उन्हें याद करते हैं। यह बात गृह मंत्रालय ही नहीं, शासन, व्यवस्था, सरकार, न्यायालय से जुड़े सभी लोगों के साथ है। लेकिन गृह मंत्रालय की बात यहाँ इसलिए करना उचित है कि गृह मंत्रालय अपने अधीन (दिल्ली पुलिस सहित) कार्यरत सभी कर्मियों को, खासकर जो वर्दी में हैं आवाम के साथ बेहतर सम्बन्ध बनाने की बात कर रहा है। कह रहा है &#8220;आप मुस्कुराएं&#8221;</p>
<p>विगत दिन दिल्ली पुलिस मुख्यालय गया था। आईटीओ पर स्थित मुख्यालय और पार्लियामेंट थाना के पीछे, वाईएमसीए के सामने नवनिर्मित पुलिस मुख्यालय में बहुत अंतर है &#8211; संवेदनात्मक । संभव है समय अंतराल में  यह अंतर ना दिखे, महसूस नहीं हो; लेकिन आईटीओ पुलिस मुख्यालय में प्रवेश के साथ जो एक &#8216;आकर्षण&#8217; होता था, इस नए गगनचुंबी इमारत में नहीं महसूस किया। खैर। </p>
<p>पिछले 75 वर्षों में भारत सरकार में 31 गृह मंत्री आये। कुछ दोबारा भी बने थे। विगत 14 वर्षों में शायद यह तीसरा मौका और दूसरे गृह मंत्री थे जो दिल्ली पुलिस मुख्यालय आये थे। दो वर्षों में यह उनका दूसरा भ्रमण-सम्मलेन हैं। उनसे पहले सन 2009 में तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम आये थे। गृहमंत्री द्वारा &#8216;मुस्कुराने&#8217; की बात, अथवा &#8216;जनता-पुलिस मधुर सम्बन्ध&#8217; की बात की शुरुआत वे स्वयं किये, ऐसा प्रतीत होता है। </p>
<p>वे अधिकारियों के साथ लम्बी बैठक की। दोषसिद्धि दर को बढ़ाने और आपराधिक न्याय प्रणाली को फोरेंसिक विज्ञान जांच के साथ एकीकृत करने के लिए दिल्ली में 6 वर्ष से अधिक सजा वाले सभी अपराधों में फोरेंसिक जांच अनिवार्य करने के निर्देश दिये। वे गंभीर प्रकृति के चिन्हित अपराधों में पुलिस द्वारा चार्जशीट को लीगल वैटिंग के पश्चात ही दायर किया जाए, यह भी कहा ।उनका मानना है कि निगरानी अपराध को रोकने व इसकी जांच में पुलिसिंग का प्रमुख अंग है, इसलिए दिल्ली में सिविल प्रशासन, पुलिस द्वारा लगाए गए कैमरों के साथ ही सार्वजनिक स्थानों, मसलन हवाई अड्डा, रेलवे स्टेशन, बस अड्डा, बाजार, RWAs द्वारा लगाए गए सीसीटीवी कैमरों को पुलिस कंट्रोल रम में जोड़ने की बात भी कही &#8211; बहुत बेहतर पहल है।</p>
<p>सरकार ड्रग्स के अभिशाप से देश को मुक्त करने के लिए संकल्परत है इसलिए दिल्ली में नार्कोटिक्‍स के ऊपर नकेल कसने के लिए विस्‍तृत कार्य-योजना तैयार की गई है। दिल्ली/एन.सी.आर व समीप के राज्यों में सक्रिय मल्‍टी स्‍टेट क्रिमिनल गैंग्स पर नकेल कसने की रणनीति बनाई गई है। महिलाओं, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा को वे अपनी प्राथमिक बताये। पुलिस फिटनेस पर भी चर्चा किये। वे यह भी कहे कि पुलिस द्वारा किये जा रहे मानवीय कार्यों को जनसामान्य तक पहुँचाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल हो और इस कड़ी में पुलिस के प्रति आम लोगों की धारणा बदलने के लिए पुलिस कांस्टेबलों को स्कूली बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए। सभी बेहतर बातें हैं। </p>
<p><strong>लेकिन, सबसे बड़ी बात है कि संस्थान के अंदर, छतों के नीचे रहने वाले निचले कर्मियों और वरिष्ठों के बीच मानवीय, संवेदनात्मक, भावनात्मक संबंधों का होना। निचले कर्मियों को ही नहीं, ऊपर बैठे अधिकारियों के लिए भी वही पाठ होनी चाहिए। आखिर वर्दी में दोनों हैं और जनता वर्दी को पहचानती है। अच्छा काम निचले तबके के कर्मी करें और पीठ ऊपर बैठे का थपथपाया जाए &#8211; यह चेहरों पर मुस्कुराहट कैसे ला सकती है।</strong></p>
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		<title>#भारतकीसड़कों से #भारतकीकहानी (13) ✍️ वीरगति प्राप्त &#8216;मैन-इन-यूनिफॉर्म&#8217; को &#8216;शहीद&#8217; कहकर मजाक नहीं करें 😢</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 28 Aug 2022 11:45:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[defence ministry]]></category>
		<category><![CDATA[freedom movement]]></category>
		<category><![CDATA[home ministry]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[martyrs]]></category>
		<category><![CDATA[police]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>वीरगति प्राप्त सैन्यकर्मियों, पुलिसों के पार्थिव शरीर के साथ, परिवारों के साथ साथ क्रूर मजाक नहीं करें &#8216;शहीद&#8217; कहकर, क्योंकि &#8216;शहीद&#8217; शब्द भारत सरकार के किसी भी दस्तावेज में नहीं है और यह बात सरकार भी मानती है 😢 इस श्रृंखला में हम उन परिवारों के बारे में, उन विधवाओं के बारे में, उन पुत्रहीन, [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/bharat-ki-sadkon-se-bharat-ki-kahani13">#भारतकीसड़कों से #भारतकीकहानी (13) ✍️ वीरगति प्राप्त &#8216;मैन-इन-यूनिफॉर्म&#8217; को &#8216;शहीद&#8217; कहकर मजाक नहीं करें 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>वीरगति प्राप्त सैन्यकर्मियों, पुलिसों के पार्थिव शरीर के साथ, परिवारों के साथ साथ क्रूर मजाक नहीं करें &#8216;शहीद&#8217; कहकर, क्योंकि &#8216;शहीद&#8217; शब्द भारत सरकार के किसी भी दस्तावेज में नहीं है और यह बात सरकार भी मानती है 😢 इस श्रृंखला में हम उन परिवारों के बारे में, उन विधवाओं के बारे में, उन पुत्रहीन, पतिहीन, पिताहीन परिवारों के बारे में बात कर रहे हैं जो मातृभूभि की रक्षा करते-करते, लहू-लहुआन होते, खून से लथपथ अपने शरीर के एक-बून्द रक्त को भारत माँ की मिट्टी में मिला देना श्रेयस्कर समझे, समझते हैं; परन्तु तिरंगा को नहीं झुकने देते हैं। </strong></p>
<p>दुखद आश्चर्य इस बात की है कि उन वीर योद्धाओं को, चाहे देश की सीमा पर लड़ते-लड़ते मृत्यु को प्राप्त किये हों, अथवा देश की आतंरिक सुरक्षा व्यवस्था को बनाये रखने में अपने प्राणों को उत्सर्ग किये हों/करते हों &#8211; राजनीतिक मंच पर, समाज के गलियों में, नुक्कड़ों पर, मैदानों में भाषण देते, प्रवचन देते लोग बाग़, नेतागण उन्हें &#8220;शहीद&#8221; शब्द से अलंकृत कर उस मृतक के परिवार के साथ, उसकी विधवा के साथ, उसके वृद्ध माता-पिता, सास-ससुर, बाल-बच्चों के साथ क्रूर मजाक करते नहीं थकते। </p>
<p>क्योंकि भारत सरकार ऐसे योद्धाओं को &#8220;शहीद अथवा मार्टियर्स&#8221; मानती ही नहीं है। भारत सरकार के किसी भी दस्तावेजों में, चाहे रक्षा मंत्रालय का हो या गृह मंत्रालय का, &#8216;शहीद/मार्टियर्स&#8217; शब्द प्रयोग में है ही नहीं। </p>
<p>इस श्रृंखला के माध्यम से मैं (क्षमा याचना के साथ) भारत के राष्ट्रपति महामहीम श्रीमती द्रौपदी मुर्मुजी से, देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी से, रक्षा मंत्री श्री राज नाथ सिंह जी से और गृहमंत्री श्री अमित शाह जी से प्रार्थना करता हूँ कि सन 1857 से 1947 तक जंगे आज़ादी में अपने प्राणों को उत्सर्ग करने वाले सभी योद्धाओं, क्रांतिकारियों को, जो फांसी पर लटके, गोली से छल्ली हुए, जेल की यातनाओं को सहते मृत्यु को प्राप्त किये, &#8220;शहीद/मार्टियर्स&#8217; शब्द से अलंकृत तो करें ही; साथ ही, स्वतंत्र भारत में अपनी मातृभूमि के रक्षार्थ रक्षा मंत्रालय/गृह मंत्रालय के &#8216;मैन-इन-यूनिफॉर्म&#8217; हैं, और वीरगति प्राप्त किये है/करते हैं, उन्हें भी शहीद/मार्टियर्स शब्द से अलंकृत करें या फिर बोलचाल की भाषा में उन हुतात्माओं के परिवार/परिजनों के साथ उस मृतक को शहीद&#8217; न कहें जिस शब्द का भारत सरकार के दस्तावेजों में कोई जगह ही नहीं है। </p>
<p><iframe loading="lazy" title="#भारतकीसड़कों से #भारतकीकहानी (13) ✍️ वीरगति प्राप्त &#039;मैन-इन-यूनिफॉर्म&#039; को &#039;शहीद&#039; कहकर मजाक नहीं करें" width="696" height="392" src="https://www.youtube.com/embed/1_Ij5Ns6DWI?start=20&#038;feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture" allowfullscreen></iframe></p>
<p>22 दिसंबर, 2015 को भारत सरकार का गृह मंत्रालय भारत के संसद में (लोकसभा) &#8220;मार्टियर्स स्टेटस&#8221; पर लिखित जबाब दिया था। प्रश्न करने वाली थी श्रीमती नीलम सोनकर और उत्तर देने वाले थे तत्कालीन गृह राज्य मंत्री श्री कीरेन रिजिजू। </p>
<p>जवाब में लिखा गया था: &#8220;The Ministry of Defence has informed that the word &#8220;Martyrs&#8221; is not used in reference to any of the casualties in Indian Armed Forces. Similarly no such term is used in reference to the Central Armed Police Forces (CAPFs) and Assam Rifles (AR) personnel killed in action or on any operation. However, their families/Next of Kin are given full family pension under the Liberalized Pensionary Awards (LPA) rules and lump sum ex-gratia compensation of Rupees fifteen lakh as per rules in addition to other benefits admissible.&#8220;</p>
<p>उससे पहले 18 दिसंबर, 2013 को राज्यसभा में श्री किरणमय नंदा ने गृह मंत्रालय से पूछा था (अनस्टार्ड प्रश्न संख्या 1474): (a) whether it is a fact that by now 31,895 security personnel belonging to paramilitary forces have lost their lives in discharging their duties in internal securities of nation, but government has not considered their sacrifice as &#8216;shaheed/martyrs&#8217;; and(b) if so, whether government has any plan to go for constitutional amendment in present Act so that sacrifice of our security personnel can be honoured as &#8216;shaheed/martyrs&#8217;.© if not, the reasons therefor?</p>
<p>उस समय केंद्र में गृह राज्य मंत्री थे आर पी एन सिंह। उन्होंने (a) से © तक के प्रश्न का जो उत्तर दिया वह आँख खोलने वाला है। क्योंकि विगत 75 वर्षों में हम मातृभूमि के लिए अपने-अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले वीर योद्धाओं की वीरगति प्राप्त करने के बाद नेता से अभिनेता तक, समाज सुधारक से राज्यों के विधान सभाओं में, विधान परिषदों में, राज्य सभा में, लोक सभा में बैठे सम्मानित नेतागण बोलचाल की भाषा में, राजनीतिक लाभ प्राप्त करने हेतु उन्हें &#8220;शहीद&#8221; कहते थकते नहीं, उस परिवार की वेदना के साथ खेलते थकते नहीं; हकीकत तो यही है कि उसे सरकार शहीद मानती ही नहीं।  </p>
<p>(a) से © तक के प्रश्न का उत्तर था: &#8220;No Sir. As reported by the CAPFs, the number of force personnel, who have sacrificed their lives in action, is 4942. The Government does not differentiate between the sacrifice made by the personnel belonging to the various armed forces of the union. The Ministry of Defence have indicated that shaheed/martyr is not defined anywhere and presently they are not issuing any such order/notification to this effect in respect of the defence personnel. Similarly, no such order/notification to this effect is issued by the Ministry of Home Affairs in respect of the CAPF personnel who are killed in action while discharging their duties. However, their families/Next of Kin (NOKs) are given full family pension under the Liberalised Pensionary Awards (LPA) rules, i.e. the last pay drawn, and ex-gratia compensation as per rules in addition to the other ex-gratia/benefits admissible.&#8221; </p>
<p>विचार आप करें 🙏</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/bharat-ki-sadkon-se-bharat-ki-kahani13">#भारतकीसड़कों से #भारतकीकहानी (13) ✍️ वीरगति प्राप्त &#8216;मैन-इन-यूनिफॉर्म&#8217; को &#8216;शहीद&#8217; कहकर मजाक नहीं करें 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>Child trafficking: Vulnerable in 7 North Bihar districts, 68 others in the country, 25-day combat operation to be launched from August 1</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/crime/child-trafficking-vulnerable-in-7-north-bihar-districts-68-others-in-the-country-25-day-combat-operation-to-be-launched-from-august-1</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 29 Jul 2022 13:59:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अपराध]]></category>
		<category><![CDATA[child]]></category>
		<category><![CDATA[crime]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>NEW DELHI: The National Commission for Protection of Child Rights (NCPCR) is commemorating &#8216;World Day against Human Trafficking&#8217; tomorrow, i.e. July 30. The NCPRC, with support of State Commission for Protection of Child Rights (SCPCRs) and District Administration, is launching a 25 days campaign i.e. बाल तस्करी से आज़ादी from 1st August, 2022 to 25th [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>NEW DELHI: The National Commission for Protection of Child Rights (NCPCR) is commemorating &#8216;World Day against Human Trafficking&#8217; tomorrow, i.e. July 30. The NCPRC, with support of State Commission for Protection of Child Rights (SCPCRs) and District Administration, is launching a 25 days campaign i.e.  बाल तस्करी से आज़ादी from 1st August, 2022 to 25th August, 2022 in 75 bordering Districts of India, including seven districts of north Bihar, as a part of Azadi ka Amrit Mahotsav, to celebrate and commemorate 75 years of progressive India.</strong></p>
<p>According to official sources of Ministry of Women and Child Development, child trafficking is a serious crime and worst form of human rights violations prevalent in many parts of our country; thereby causing a deterrence in achieving the goal of a New India, a Progressive India. Combating Child Trafficking requires interventions and attention of a cross section of stakeholders. </p>
<p>The porous international borders shared by several districts of our country amplify the conditions that enable and attract traffickers. Children become soft targets who fall prey to the clutches of these predators constantly in search of their prey. The victim children encounter severe forms of exploitation, such as physical, sexual and emotional violence, abuse, torture, and trauma, forced and bonded labour, forced marriages and practices like slavery etc. The cruelty and injustice faced by the victims of child trafficking often go beyond comprehension; their lives scarred and beyond repair; deprived of rights.</p>
<p>Sources said that &#8216;to combat the menace of child trafficking, the National Commission for Protection of Child Rights (NCPCR), an apex statutory body constituted under the Commission for Protection of Child Rights Act, 2005, an Act of Parliament of India has been taking ongoing steps under its mandate and jurisdiction. In this connection, NCPCR is commemorating “World day against Human Trafficking” observed on 30th July, 2022.&#8217;</p>
<p>Sources further said that &#8216;in this regard, District level Sensitization programme in selected 75 Districts shall be participated by representatives from Special Juvenile Police Units (SJPUs), Anti Human Trafficking Units (AHTUs), Child Welfare Police Officers (CWPOs) of Thanas, Child Welfare Committee (CWCs), Juvenile Justice Boards (JJBs), Special Forces active in the district on Human Trafficking issues, in the identified 75 Bordering Districts of our country, including Kishanganj, Supaul, Madhubani, West Champaran-Bettiah, Sitamarhi, Araria and East Champaran of Bihar. During this campaign, NCPCR officials will be visit bordering villages and celebrate its 75th independence day with the children of bordering districts.&#8217;</p>
<p>The main objective of this campaign is to sensitize the key stakeholders on basic indicators to identify children at risk, vulnerable children, and prevention for combating child trafficking in bordering districts of India. Expert Resource Persons from the Commission, Chairperson/Member of the State Commissions and subject experts shall be making a presentation on the subject matter and after interactive session shall plan a road map for combating child trafficking in bordering districts.</p>
<p>Under the campaign 75 bordering districts of our country will be witnessing the awareness &#038; sensitization programme for multi stakeholders on combating this menace of child trafficking and preventing children from this serious crime.</p>
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		<title>&#8216;सबरंग&#8217; अब &#8220;बदरंग&#8221; हो गया,  तीस्ता अपराधी पाई गयी !!</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/editorial/sabrang-has-now-become-badrang-teesta-found-guilty</link>
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		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 29 Jun 2022 12:07:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[court]]></category>
		<category><![CDATA[enforcement]]></category>
		<category><![CDATA[guilty]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>जनकल्याण हेतु स्थापित बंबइया न्यास &#8221;सबरंग&#8221; अब बदरंग हो गया है। दंगा पीड़ितों और युवाओं की साक्षरता तथा सेवा के लिये गठित इस एनजीओ (स्वयंसेवी संस्था) का उद्देश्य कभी उच्च तथा उत्कृष्ट था। पर सब रंगीनियों में ही गुम हो गया। न्यायिक तथा शासकीय पड़ताल ने पाया कि वित्तीय अनुदान और सहयोग राशि विलासिता तथा [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जनकल्याण हेतु स्थापित बंबइया न्यास &#8221;सबरंग&#8221; अब बदरंग हो गया है। दंगा पीड़ितों और युवाओं की साक्षरता तथा सेवा के लिये गठित इस एनजीओ (स्वयंसेवी संस्था) का उद्देश्य कभी उच्च तथा उत्कृष्ट था। पर सब रंगीनियों में ही गुम हो गया। न्यायिक तथा शासकीय पड़ताल ने पाया कि वित्तीय अनुदान और सहयोग राशि विलासिता तथा प्रशासनिक खर्चों पर ही खप गयी। यह सरासर अवांछित और नाजायज हुआ। सबरंग न्यास की मालकिन है तीस्ता जावेदमियां सीतलवाड। उन्हें गत सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय ने फर्जीवाड़ा और गलत बयानी का दोषी पाया। अहमदाबाद पुलिस ने सत्र न्यायालय के आदेशानुसार तीस्ता को हिरासत में रखा है। मानव संवेदना का ऐसा निजी और वाणिज्यीय प्रयोग बड़ा दुर्लभ ही है। </strong>       </p>
<p>फिर यह संबरंग न्यास तथा उसकी ही अनुषांगिक संस्था &#8221;सिटिजन्स फार जस्टिस एण्ड पीस&#8221; के कार्यकलापों की विस्तृत जांच हुयी। आयव्यय का आडिट भी हुआ। बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां, अनियमितता, जालसाजी, दुरुपयोग तथा गबन पाया गया।</p>
<p><strong>अहमदाबाद पुलिस की रपट के अनुसार सबरंग न्यास द्वारा लगभग एक करोड़ चालीस लाख रुपये की राशि वर्ष 2008 से 2013 के दरम्यान भारत सरकार से फर्जी तरीके से प्राप्त की गयी। बेजा खर्च हुयी। गुजरात तथा महाराष्ट्र में निर्धन बच्चों तथा गोधरा (2002) दंगे के पीड़ितों पर व्यय करना था। अन्यंत्र चला गया।</strong></p>
<p>तीस्ता जावेदमियां सीतलवाड के इन दोनों न्यासों पर गबन का आरोप लगाया था उन्हीं के पूर्व साथी गुजरात के मियां रईस खान पठान ने। पठान ने खुलासा किया कि तीस्ता ने एकत्रित राशि को बजाये शिक्षा के, सांप्रदायिक जहर फैलाने पर तथा परिपत्र और किताबें मुदित करने पर लगाया। भारतीय दंड संहिता (धारा 403) बेईमानी से संपत्ति कब्जियाना और धारा 406 (अपराधिक विश्वासघात) तथा भ्रष्टाचार उन्मूलन अधिनियम के तहत तीस्ता पर अभियोग लगाया गया।?</p>
<p>पूर्व सहयोगी रईस खान पठान का इल्जाम था कि तीस्ता ने मजहब का सियासत में घालमेल किया। मनमोहन सिंह वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा प्रदत्त 1.4 करोड़ रुपये के अनुदान का गैरवाजिब खर्च किया। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय की छानबीन समिति ने तीस्ता पर सामाजिक तनाव तथा घृणा सर्जाने का आरोप लगाया था। दान हेतु वित्तीय राशि को वसूलने का आरोप लगा। तीस्ता के सबरंग न्यास ने &#8221;खोज&#8221; योजना के तहत महाराष्ट्र और गुजरात में शांति स्थापना और विवाद—निवारण हेतु कार्यक्रम रखा था। मगर सारी राशि कर्मियों के वेतन—भत्ते, यात्रा व्यय, वकीलों की फीस तथा राज्य शासन के विरुद्ध अभियान पर ही खपा दिया। नतीजन जांच के बाद केन्द्रीय सरकार ने सबरंग न्यास के आयव्यय में गोलमाल के कारण उसका पंजीकरण निरस्त कर दिया। इसके विरुद्ध सांसद वकील कपिल सिब्बल ने न्यायालय में वाद दायर कर दिया। इसके बाद केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने फोर्ड फाउण्डेशन द्वारा प्रस्तावित 12.5 अरब डॉलर (करीब 84 अरब रुपये) पर रोक लगा दी। मगर इसके पूर्व ही लगभग 1.8 करोड़ रुपये का अनुदान सबरंग फाउंडेशन से ले चुका था।</p>
<p>जांच समिति ने पाया कि दान की अधिकांश राशि शराब, होटल बिल, विदेश (लाहौर) यात्रा आदि पर खर्च हुआ। अर्थात सर्वहारा के कल्याणार्थ यह अनुदान राशि ऐशो—आराम, साड़ियों की खरीददारी, सौंदर्य उपकरणों, सैलानी जैसे खर्चों पर इस्तेमाल हुये। टाइम्स आफ इंडिया (14 फरवरी 2015) में प्रकाशित रपट के अनुसार भारत सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता श्री तुषार मेहता ने उच्चतम न्यायालय की दो सदस्यीय खण्डपीठ (पटना में शिक्षित न्यायमूर्ति सुधांशु ज्योति मुखोपाध्याय तथा नूतलपाटि वेंकट रमण, अधुना प्रधान न्यायधीश) को बताया था कि सबरंग न्यास और जावेदमियां का &#8221;सिटिजंस फार जस्टिस एण्ड पीस&#8221; एनजीओ ने प्राप्त करोड़ों रुपयों की अनुदान राशि को मुम्बई हवाई अड्डे की करमुक्त दुकानों से शराब, खरीदने पर, सिनेमा देखने पर, सौंदर्य प्रसाधन पर बहुमूल्य साड़ियों पर, कीमती जूतों पर आदि पर खर्च किया। पाकिस्तान, इटली, कुवैत, अमेरिका, कनाड़ा, यूरोप आदि की यात्रा पर व्यय किया। जब तीस्ता ने सर्वोच्च न्यायालय में तत्कालीन गुजरात मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को 2002 के गुजरात दंगों पर &#8221;मुस्लिमों का हत्यारा&#8221; और सोनिया गांधी के शब्दों में मौत का सौदागर होने के लिये दंडार्थ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की, तो तीन जजों की खण्डपीठ ने अपने निर्णय में लिखा : &#8221;तीस्ता गुजरात को बदनाम करना चाहती थी। याचिकार्थी श्रीमती जाकिया जाफरी को भी तीस्ता ने बयान रटवाया था।&#8221; सुप्रीम कोर्ट के सात दशकों के इतिहास में इतना कड़ा और मर्मस्पर्शी निर्णय आजतक नहीं दिखा। तीस्ता को केवल खुन्नस थी और इसीलिये वह गुजरात से प्रतिशोध चाहती थी।</p>
<p><strong>बैंच ने लिखा कि तीस्ता ने फर्जीवाड़ा किया। दस्तावेजों को जाली बनाया। गवाहों से असत्य बयान दिलवाये, उन्हें मिथ्या पाठ सिखाया। पहले से ही टाइप किये बयानों पर गवाहों के दस्तखत कराये। यही बात पर 11 जुलाई 2011 को गुजरात हाई कोर्ट ने भी लिखी थी (याचिका 1692/2011)। अन्य आरोप है कि उसने तथा अपने साथी फिरोजखान सैयदखान पठान ने सबरंग न्यास के नाम पर गबन और अनुदान राशि का दुरुपयोग किया। अनुदान की राशि को निजी सुख और सुविधा पर व्यय किया। जजों ने कहा कि सरकारी वकील ने दर्शाया है कि किस भांति तीस्ता और उसके पति ने 420, फर्जीवाड़ा धोखा आदि के काम किये। निर्धन और असहायों के लिये जमा धनराशि को डकार गयी। खुद गुजरात हाईकोर्ट ने इन अपराधियों की याचिका खारिज कर दी और फैसला दिया कि अभियुक्तों को हिरासत में सवाल—जवाब हेतु कैद रखा जाये।</strong></p>
<p>यूं तो सत्र न्यायालय, गुजरात हाईकोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय ने तीस्ता को दोषी माना है। अत: उसे  प्रारब्ध भोगने को सुनिश्चित कराने का उत्तरदायित्व है, कर्तव्य है, शासन पर। भारत के अन्य फर्जी एनजीओ को सबक दिलाने और चेतावनी हेतु यह कदम अनिवार्य है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/editorial/sabrang-has-now-become-badrang-teesta-found-guilty">&#8216;सबरंग&#8217; अब &#8220;बदरंग&#8221; हो गया,  तीस्ता अपराधी पाई गयी !!</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>नेताओं ने तो हमेशा &#8216;छात्रों&#8217; का इस्तेमाल किया है &#8216;सत्ता के लिए&#8217;, फिर केबी सहाय का गोली कांड हो या जेपी का आंदोलन</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/interview/politicians-always-used-students-for-power</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 May 2022 14:08:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इंटरव्यू]]></category>
		<category><![CDATA[aaryavart]]></category>
		<category><![CDATA[firing]]></category>
		<category><![CDATA[indiannation]]></category>
		<category><![CDATA[intervyu]]></category>
		<category><![CDATA[kb sahaya]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना : विगत दिनों पटना के एक मित्र किसी बात के सिलसिले में &#8220;सोडा फाउंटेन&#8221; की चर्चा किये। सुनते ही 26 वां स्वाधीनता दिवस का महीना याद आ गया। साल सन 1973 था और अगली सुबह पटना से प्रकाशित &#8216;आर्यावर्त&#8217;, &#8216;इण्डियन नेशन&#8217;, &#8216;सर्चलाइट&#8217;, &#8216;प्रदीप&#8217; अखबार खूब बेचे थे। सुबह-सवेरे पटना के गाँधी मैदान में पटना [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/interview/politicians-always-used-students-for-power">नेताओं ने तो हमेशा &#8216;छात्रों&#8217; का इस्तेमाल किया है &#8216;सत्ता के लिए&#8217;, फिर केबी सहाय का गोली कांड हो या जेपी का आंदोलन</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना : विगत दिनों पटना के एक मित्र किसी बात के सिलसिले में &#8220;सोडा फाउंटेन&#8221; की चर्चा किये। सुनते ही 26 वां स्वाधीनता दिवस का महीना याद आ गया। साल सन 1973 था और अगली सुबह पटना से प्रकाशित &#8216;आर्यावर्त&#8217;, &#8216;इण्डियन नेशन&#8217;, &#8216;सर्चलाइट&#8217;, &#8216;प्रदीप&#8217; अखबार खूब बेचे थे। सुबह-सवेरे पटना के गाँधी मैदान में पटना से बाहर जाने वाले बस यात्रियों के हाथों तो बेचे ही थे, गाँधी मैदान से पटना विश्वविद्यालय के रानी घाट प्राध्यापक आवासीय क्षेत्र तक इतने अखबार बेचे थे कि जेब में &#8216;रेजकी&#8217; (खुदरा पैसा) दोनों तरफ इस कदर लटक गया था, जैसे बारह वर्ष की आयु में &#8216;हाइड्रोसील&#8217; बिमारी हो गया हो। बुशर्ट से &#8216;सेप्टिपिन&#8217; निकालकर जेब में लगा लिया था ताकि मेहनत की कमाई सड़क पर न गिरे। साईकिल की गति भी धीमी गति की समाचार जैसी हो गयी थी। कहने के लिए तो &#8220;छात्रों का कमाल&#8221; था, लेकिन भीड़ में &#8220;छात्र को पहचानना&#8217; मुश्किल ही नहीं &#8216;नामुमकिन&#8217; उस दिन भी होता था, आज तो सार्वभौमिक सत्य है क्योंकि बिहार ही नहीं, देश के कोने-कोने के राजनेता किस करवट बैठकर कुर्सी के लिए &#8216;वायुत्याग&#8217; करेंगे कोई नहीं समझता।</strong> <br />
 <br />
भारत के लाल किले पर 15 अगस्त को झंडोत्तोलन होने से कोई तीन माह पूर्वं, यानी 12 मई, 1947 को पटना के गांधी मैदान के पास तत्कालीन &#8216;एलिफिंस्टन और रीजेंट सिनेमा हॉल&#8217; के बीच दाहिने कोने पर सत्यनारायण झुनझुनवाला एक खुला रेस्तरां खोले। इस रेस्तरां के दाहिने तरफ तो छोटा-मोटा भवन आकार का रेस्तरां था, लेकिन खुले गार्डननुमा मैदान में टेबुल-कुर्सी लगी होती थी। शाम के समय पटना के लोग बाग़, संभ्रांत महामानव सहित, यहाँ सपरिवार आकर जलपान, चाय, काफी, या अन्य भोज्य पदार्थों का आनंद लेते थे। पटना शहर में एक विशेष जगह बन गया था यह स्थान।</p>
<p>झुनझुनवाला साहेब लन्दन से एक मशीन मंगाए थे &#8211; नाम था सोडा फाउंटेन &#8211; और उसी मशीन के नाम पर इस रेस्तरां का नामकरण हो गया। क्या रिक्शावाला, क्या बस वाला, क्या नेता, क्या मंत्री, क्या छात्र, क्या अध्यापक, क्या डाक्टर, क्या व्यापारी, क्या हज़ामत बनाने वाला &#8211; सभी इस रेस्तरां के ग्राहक थे। गाँधी मैदान के इस छोड़पर &#8216;सोडा फाउंटेन&#8217; और &#8216;खादी ग्रामोद्योग&#8217; दोनों &#8216;आइकॉन&#8217; बन गया था। सत्ताईस अगस्त, 1973 की रात में झुनझुनवाला साहेब पूरे दिन की बिक्री का हिसाब-किताब कर &#8216;गद्दी&#8217; से उतड़े अगली सुबह दूकान खोलने की तैयारी करने के लिए। अगली सुवह भी सब ठीक-ठाक था। लेकिन इधर सूर्यदेव जैसे-जैसे ब्रह्माण्ड में ऊपर चढ़ रहे थे, &#8216;सोडा फाउंटेन&#8217; का अस्तित्व खतरे की ओर उन्मुख हो रहा था &#8211; शांति पूर्वक। कहीं कोई आभास नहीं था अगले पल क्या होने वाला है। </p>
<p>&#8216;सोडा फाउंटेन&#8217; में खचाखच ग्राहक थे। खुले गार्डेन में गरमा-गरम समोसे, पकौड़ियाँ हरी-हरी चटनियों के साथ लोग बाग़ आनंद ले रहे थे। आसमान में बादल बन रहा था। तापमान भी शारीरिक सहज के अधीन था। तभी &#8216;गद्दी&#8217; (कैश काउंटर) पर बैठे सज्जन की आवाज धीरे-धीरे ऊँची होने लगी थी और सामने खड़े चार-पांच छात्रों की आवाज उस आवाज को दबाते, ऊपर उठ रहा था। मामला महज &#8216;साढ़े-सात&#8217; रुपये की पिछले बकाये राशि की थी जिसे गद्दी पर बैठे महानुभाव सामने खड़े ग्राहक से मांग रहे थे। इसलिए कहते हैं &#8220;उधार प्रेम की कैंची है।&#8221;</p>
<p>ग्राहक पटना विश्वविद्यालय के छात्र थे और गद्दी पर बैठे सज्जन से गलती यह हो गई कि वे &#8220;पटना के छात्र&#8221; से &#8220;बकाये पैसे मांग लिए&#8221; &#8211; देखते ही देखते वह &#8216;साढ़े सात रुपये की राशि सोडा फाउंटेन के लिए साढ़ेसाती बन गया। पहले मुंह चल रहा था, फिर हाथ चला, फिर हॉस्टल के कमरों में लगी मच्छरदानी का डंडा, फिर असली डंडा, फिर हौक्की का डंडा, फिर तोड़-फोड़, फिर माचिस की एक छोटी तिल्ली ने सोडा फाउंटेन का नामोनिशान मिटा दिया। हज़ारों छात्रों के गुस्सा को सोडा फाउंटेन के झुनझुनवाला साहेब नहीं झेल सके। देखते ही देखते &#8216;सोडा फाउंटेन&#8217; अगले दिन प्रकाशित अख़बारों के पन्नों पर तस्वीरों के साथ प्रकाशित हुई। </p>
<p>वैसे कई वर्ष पहले फिर सोडा फाउंटेन अपने स्वरूप में आ गया लेकिन कल सोडा फाउंटेन के संस्थापक सम्मानित श्री सत्यनारायण झुनझुनवाला साहेब के पोते श्री समीर झुनझुनवाला से बात करने की कोशिश किये ताकि उन्हें कहानी में समेट सकूँ, वे बहुत व्यस्त थे। कहते हैं: &#8220;सन्डे से पहले तो बात हो ही नहीं सकती, बहुत अधिक व्यस्तता है।&#8221; मैं उनकी बातों का सम्मान करते फोन रख दिया। अब उन्हें कैसे कहते कि &#8216;हम भी बेरोजगार नहीं हैं। देश में शब्दों की कीमत भले नहीं हो, विद्यार्थियों की कीमत आज भी है।&#8221; खैर। </p>
<p><strong>&#8216;सोडा फाउंटेन&#8217; के पास एक घटना सं 1973 की घटना से भी अधिक कष्टदायक थी जब साथ चल रहे एक छात्र के सिर पर बिहार की पुलिस गोली अचानक टकराती है। गोली अपना काम कर जाती है। कुछ सेकेण्ड पहले हँसते छात्र का शरीर &#8216;पार्थिव&#8217; हो जाता है। तक़रीबन 59 राउंड गोलियां चलाई गई थी तत्कालीन बिहार पुलिस के द्वारा और बुद्ध &#8211; महावीर &#8211; गुरु गोविन्द सिंह &#8211; चाणक्य &#8211; चन्द्रगुप्त &#8211; कुंवर सिंह के बिहार का नेतृत्व कर रहे थे बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय और साल सन 1967 था और जनवरी महीना का 5 तारीख । कहते हैं इस गोली कांड के बाद बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय यानी केबी सहाय कभी राजनीतिक गलियारे में नहीं दिखे, सत्ता और शासन की बात तो मीलों दूर। </strong></p>
<p>उस गोलीकांड का चश्मदीद गवाह थे तत्कालीन &#8216;दी इण्डियन नेशन&#8217; अखबार के संवाददाता श्री जनार्दन ठाकुर, असित सेन और किशोर जी। असित सेन और किशोर जी &#8216;छायाकारी&#8217; का भी कलाकारी जानते थे। कितने लोग मरे उस गोली कांड में, यह तो &#8216;माँ गंगा&#8217; भी नहीं बता सकी जिनके आँगन में तत्कालीन प्रशासन के प्रशासक पार्थिव शरीरों को उठाकर गंगा को समर्पित कर रहे थे। लेकिन असित सेन और किशोर जी&#8217; का कैमरा सब कुछ देख रहा था। </p>
<p>जिस छात्र के सिर पर गोली लगी थी, उसके &#8216;सहपाठी&#8217; से आज <strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> बात किया। दोनों पटना के अशोक राजपथ पर स्थित टी के घोष अकादमी का छात्र थे। उस दिन दोनों घर के कुछ कार्य करने के लिए गांधी मैदान की ओर आये थे और कार्य समाप्त करने के बाद &#8216;हँसते-खेलते&#8221; घर जा रहे थे। सत्तर+ वर्षीय अशोक कुमार झा उस घटना को याद करके आज भी हरकम्पित हो गए। अशोक जी &#8216;दी इण्डियन नेशन&#8217; अखबार के तत्कालीन &#8216;एसोसिएट एडिटर&#8217;, जो बाद में संपादक भी बने और बिहार की पत्रकारिता में अपना हस्ताक्षर भी किये, दिवंगत श्री दीनानाथ झा के पुत्र हैं। पेशे से पटना उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। </p>
<p>अशोक जी कहते हैं: &#8220;के बी सहाय के गोलीकांड के सामने सोडा फाउंटेन की सं 1973 की घटना तो नगण्य है। सन 1973 में तो एक जिद ने सोडा फाउंटेन को नेस्तनाबूद कर दिया। उस घटना में कोई मरा नहीं। लेकिन उस गोली कांड में कितने लोग मरे, आज तक कोई नहीं जान पाया है। मैं अपने मित्र के साथ बात करते चला जा रहा था। नवमी कक्षा में पढता था। आस-पास कुछ भीड़-भाड़ अवश्य थी, काफी संख्या में लोग एकत्रित भी थे, खासकर खादी ग्रामोद्योग के पास, लेकिन उस क्षण तक यह अंदाजा नहीं था कि कुछ क्षण बाद क्या होने वाला है। अचानक भगदड़ हुई। खादी ग्रामोद्योग को अग्नि को सुपुर्द कर दिया गया। तभी मेरे साथ चलते मित्र का शरीर खून से लथपथ जमीन पर गिर गया। उसके माथे में गोली लगी थी। सभी भाग रहे थे। हम भी अपने बाए हाथ भागे जो आगे एक बड़ा नाला की ओर जाता था।&#8221;</p>
<p>अशोक जी आगे कहते हैं: &#8220;उस समय किसी को भी यह होश नहीं था कि नाले की गहराई कितनी है &#8211; एक तरह से जलियाँवाला बाग़ के उस कुएं जैसा था। यही नाला आगे अशोक राज पथ को लांघते, बी एन कालेज छात्रावास के बगल से तत्कालीन अंटाघाट होते गंगा में मिलती थी, आज भी मिलती हैं। सैकड़ों लोग कूदे थे उस नाले में। पैर में चप्पल कहीं रास्ते में ही निकल गया था। पूरा शरीर नाले की गंदगी से तर-बतर था। उन दिनों न तो सुलभ शौचालय जन्म लिया था और ना ही सफाई-स्वच्छता शब्द का राजनीतिकरण, व्यवसायीकरण हुआ था। उसी नाले में पैखाना भी फेका था। कई घंटों के बाद बाकरगंज की पतली गली के रास्ते, उस समय के इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भवन के पीछे से, गलियों से रोते-बिलखते एग्जिविशन रोड के नुक्कड़ पर पहुंचे थे। फिर बाएं हाथ लालजी टोला के लिए बढे।&#8221;</p>
<p>झा साहब कहते हैं: &#8220;लालजी टोला में नुक्कड़ पर भारतीय वायु सेना का दफ्तर था और गली आगे जहाँ बाएं मुड़ती थी, &#8216;पैरागाओं ड्रिंक्स&#8217; का दफ्तर था। उस गोली कांड का प्रभाव पूरे पटना शहर पर अब तक हो गया था। पूरा शहर पुलिस की गिरफ्त में थी तो जरूर, लेकिन उपद्रवकारियों का क्रिया कलाप भी कम नहीं था। अब तक &#8216;पैरागाओं ड्रिंक्स&#8217; का हज़ारों बोतल सड़क पर, दफ्तरों के शीशों पर टूट चुके थे। यहाँ से मेरा घर अधिक दूर नहीं था, फिर भी पैर में चप्पल नहीं होने के कारण और गली-सड़क पर शीशे का कार्पेट बिछा होने के कारण चलना मुश्किल था। उधर, घर पर कोहराम मचा हुआ था। मरने वालों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ रही थी। माँ गली में खड़ी थी। पिताजी दफ्तर में थे। मोहल्ले के लोग चिंतित थे। उस गली का मैं एकमात्र बच्चा था जो अब तक बाहर था। जैसे ही माँ मुझे देखी, मेरी ओर दौड़कर मुझे पकड़ी और बिना मेरी दशा को देखे मारना शुरू कर दी। बहुत मार लगी थी उस शाम। आज भी जब उस घटना को याद करता हूँ, मन भर जाता है।&#8221;</p>
<p>अशोक जी कहते हैं: &#8220;उस ज़माने के ही नहीं, उसके बाद आज तक शायद जो पत्रकारिता &#8216;जनार्दन ठाकुर जी किये थे, उस गोली कांड और उसके बाद का, शायद अब तक किसी भी पत्रकार ने नहीं किया होगा। उस समय का &#8216;बेस्ट इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म&#8217; था। ठाकुर जी, असित सेन और किशोर जी उस समय के बहुत ही बेहतरीन पत्रकार-छायाकार थे। जनार्दन ठाकुर तो मुख्यमंत्री कार्यालय से कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों को निकालकर अपने अखबार में प्रकाशित किये थे। जनार्दन ठाकुर &#8211; असित सेन का रिपोर्टिंग इतना भयावह था कि के.बी. सहाय की कुर्सी तो गई ही, वे कभी प्रदेश की राजनीतिक गलियारे में दिखे भी नहीं। इस घटना के बाद ही जनार्दन ठाकुर दिल्ली की ओर कूच किये और असित सेन भी बिहार की सीमा रेखा से बाहर निकल गए। जनार्दन ठाकुर पटना से प्रकाशित &#8216;सर्चलाइट&#8217; अखबार में पत्रकारिता प्रारम्भ किये थे। साल 1959 था। बाद में &#8216;इण्डियन नेशन&#8217; आये और फिर आगे आनंद बाजार पत्रिका समूह के रास्ते भारतीय पत्रकारिता का एक स्तम्भ बन गए। सत्तर के दशक में राजनेताओं और अधिकारियों द्वारा किस कदर सत्ता का दुरुपयोग किया गया, उनके द्वारा लिखित &#8220;ऑल द प्राइम मिनिस्टर मैन&#8221; गवाह है। जनार्दन ठाकुर का देहांत 12 जुलाई, 1999 को हुआ।&#8221;</p>
<p>कहा जाता है कि कामराज प्लान के अधीन सं 1963 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विनोदानंद झा मुख्यमंत्री कार्यालय से बाहर निकाले गए। उनके इस्तीफे से पटना की राजनीति गर्म हो गयी।  तत्कालीन नेताओं ने अपना-अपना पासा फेंकना शुरू कर दिया। झा जी को सत्ता के गलियारे में चक्कर लगाना चाहते थे। पूरे प्रकरण को अपने हाथ में रखना चाहते थे। वे मुख्यमंत्री पद के लिए वीरचंद पटेल का पासा फेंके तो सही, लेकिन दूसरे ही क्षण उन्हें ऐसा लगा कि पटेल साहब &#8216;गुजरात&#8217; से नहीं बल्कि बिहार के कुर्मी समुदाय से आते हैं। उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि वीरचंद के नाम पर सभी पिछड़ा वर्ग के लोग एकजुट हो जाएंगे। साथ ही, ब्राह्मण समुदाय भी उनके साथ खड़ा रहेगा। लेकिन खेल तो आकर्षण-विकर्षण का था। तत्कालीन राजपूत समुदाय के नेता सत्येंद्र नारायण सिंह पटेल साहब के नाम पर सहमत नहीं थे। भूमिहार समुदाय के महेश प्रसाद सिन्हा भी मौका के फ़िराक में थे। </p>
<p>समय बदल रहा था। ब्राह्मण, राजपुत, भूमिहार, पिछड़ा, अगला सभी सुतुर्मुर्ग की तरह एक पैर पर खड़े थे। कई लोग के बी सहाय के पक्ष में खड़े दिखने लगे। इस बीच, रामलखन यादव पिछड़े वर्ग के विधायकों को एकजुट करने लगे और अंततः  के.बी. सहाय बिहार के चौथे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले लिए। सहाय साहब कोई साढ़े तीन साल मुख्यमंत्री रहे। इस बीच बिहार में &#8216;कनखजूरा&#8217; का उत्पादन भी बढ़ गया था राजनीतिक गलियारे में और दिल्ली में आ गई थी श्रीमती इंदिरा गाँधी। सहाय साहब के विरुद्ध पटना से क़्वींटल के भाव में शिकायतें दिल्ली पहुँचने लगी। उनके मंत्रियों मसलन, रामलखन सिंह यादव, महेश प्रसाद सिन्हा, राघवेन्द्र नारायण सिंह, सत्येन्द्र नारायण सिंह और खुद के बी सहाय पर भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी को बढ़ावा देने का आरोप लग रहा था। </p>
<p>बहरहाल, अन्य वर्षों की तरह उस वर्ष भी तत्कालीन राजनीतिक गलियारे के खिलाड़ियों ने &#8216;बिहार के, खासकर पटना विश्वविद्यालय के छात्रों का प्रयोग किया &#8211; ब्रह्मास्त्र के रूप में। प्रदेश में प्रशासन से जुड़ी सैकड़ों मुद्दे थे, लेकिन छात्रों का उपयोग &#8216;कालेज शुल्क&#8217;, &#8216;वर्ग&#8217;, &#8216;शिक्षकों की उपस्थिति&#8217; आदि बातों पर निशाना साध कर सड़क पर उतार दिया। इस्तेमाल करने वाले राजनेता अपने-अपने घरों में प्राकृतिक आनंद ले रहे थे। किसान, मजदूर, गरीब-गरमा, अर्थहीन, दीन माता-पिता एक उम्मीद से अपने-अपने बेटा-बेटियों को पढ़ने के लिए कालेज भेजे थे। सोचे थे अगर पढ़ लेगा तो जीवन सुधर जायेगा। उन्हें क्या पता कि उनके बाल-बच्चे किताबों से दूर और राजनेताओं के करीब आ गए हैं। खैर। </p>
<p><strong>उस दिन 5 जनवरी था और साल सन 1967- प्रदर्शन शांतिपूर्वक चल रही थी। के बी सहाय का नाम मुख्यमंत्री कार्यालय के बाहर गोदना जैसा लिखा था जो तत्कालीन नेताओं को हजम नहीं हो रहा था। दो दिन बाद, यानी नया साल का मुबारकबाद देने-लेने के बाद (यह कहा जाता है) प्रदर्शन का रुख बदला और पटना के गांधी मैदान के कोने पर खादी भंडार को निशाना बनाया गया। यह भी कहा जाता है कि कुछ लोग (जो तत्कालीन राजनीतिक गलियारे में चहलकदमी करते थे) खादी भंडार के छत से प्रदर्शनकारियों पर, पुलिस पर पत्थर बरसाने लगे और अंदर से ही किसी व्यक्ति ने खादी भंडार में माचिस की एक तिल्ली राजनीति के नाम पर फेंक दी।</strong> </p>
<p>बस क्या था। गोलियां चलने लगी, लोग जख्मी होते गए, कई दर्जन लोगों की सांसे भी बंद हुई। राजनेताओं का क्या &#8211; आज &#8216;विपक्ष&#8217; में हैं, कल &#8216;पक्ष&#8217; में हो गए &#8211; प्रदर्शनकारियों को भरपूर मदद किये &#8216;स्वहित&#8217; में। पटना से दूर केबी सहाय के पैतृक घर हजारीबाग और नवादा में भी हल्ला बोला गया, हमला किया। सहाय &#8216;निःसहाय&#8217; हुए, सरकार गिरी और फिर पटना पश्चिम विधान सभा क्षेत्र से विजय उम्मीदवार महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री कार्यालय में रखी कुर्सी पर विराजमान हुए। केबी सहाय सरकार के भ्रष्टाचार की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस टी एल वेंकटराम अय्यर की अध्यक्षता में एक आयोग बैठाया गया और पटना की सड़कों पर, गली-कूचियों में कुल 330 दिनों तक &#8220;मैय्या-बाबू (महामाया बाबू) जिंदाबाद&#8221; का नारा छोटे-छोटे बच्चे लगते रहे।</p>
<p>इसी क्रम में <strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> पटना के बहुत पुराने छायाकार इश्तियाक अहमद साहब से बात किया। अहमद साहेब पटना में मौर्या के सामने &#8216;डेफोडिल्स स्टूडियो&#8217; का मालिक हैं। अहमद साहेब बनारस के रहने वाले हैं। नेशनल हाई स्कूल, बनारस से मैट्रिक पास किये थे। साल सन 1954 था। अहमद साहेब कहते हैं: &#8220;एक तो मैं पढ़ने में बहुत तेज-तर्राक नहीं था और दूसरे उन दिनों बनारस में पढ़ने के साधन भी नहीं थे हम जैसे गरीब-गुरबा परिवारों के लिए। किसी तरह मैट्रिक पास कर लिए और काम की तलास में जुट गए। जिनसे मिलने जाते थे काम नहीं देते थे और दौड़ाते भी थे। सभी पूछते थे क्या करोगे? जब कहता था कि &#8216;कुछ&#8217; भी काम करूँगा, कुछ बोलते नहीं थे। मन खिन्न हो गया था। परिवार से काम करने का दबाव अलग।&#8221;</p>
<p>इश्तियाक जी कहते हैं कि उन दिनों बनारस में धर्मवीर जी नामक एक व्यक्ति थे। धर्मवीर जी का एक स्टूडियो था। उन दिनों वे पूरे बनारस में सबसे अव्वल थे अपने क्षेत्र में। जब उनके पास पहुंचा तो वे आंखों में आंखें डालकर पूछे &#8211; क्या काम करोगे? फोटोग्राफी सीखोगे? डार्करूम का काम सीखोगे? यह सभी शब्द मेरे लिए बिलकुल नया था। मैं &#8216;हां&#8217; कह दिया और धर्मवीर जी का हो गया, उनके स्टूडियो और डार्क रूम का हो गया। दो साल तक उनसे बहुत कुछ सीखा। इतना सीखा की हम अपने पैर पर खड़े हो सकते थे। आज जो भी हूँ उनके सिख के कारण ही हूँ।&#8221;</p>
<p>अहमद साहेब आगे कहते हैं: सं 1964 में मैं बनारस से पटना आ गया। पूरा इलाका खाली दिखता था। बिहार की राजधानी होने के बाद भी शहर बिलकुल शांत दिखती थी। उन दिनों पटना की सड़कों पर फोटोग्राफर नामक जीव नहीं दीखते थे। अखबार तो छपता ही था &#8211; आर्यावर्त, इण्डियन नेशन, सर्चलाइट, प्रदीप &#8211; और अख़बारों में तस्वीरें भी छपती थी, लेकिन तस्वीर कौन देता था, कौन फोटोग्राफर था, यह नहीं जान पाता था। </p>
<p>&#8220;इसी बीच किसी एक कार्यक्रम में इण्डियन नेशन अखबार के रिपोर्टर केशव कुमार जी से मुलाकात हो गई। केशव जी पटना सिटी के रहने वाले थे। छोटे-नाटे कद के, लेकिन दुरुस्त। व्यायाम वाला शरीर था। एक क्षण में ही वे घुलमिल गए और कहा कि  इण्डियन नेशन में फोटो दोगे ? मेरी वही स्थिति थी कि एक भूखा आदमी को एक रोटी और एक गिलास ठंडा पानी मिल जाय। मेरी आंखें भर आई थी जब वे पूछे थे। उस दिन के बाद से जीवन पर्यन्त वे मेरे &#8216;अभिभावक&#8217; रहे। मैं अन्तःमन से उन्हें प्रणाम करता रहा। उनका सम्मान करता रहा और वे अपने एक छोटे भाई की तरह मुझे संरक्षित करते गए। वे जहाँ भी जाते थे, मुझे मिलाते थे, ताकि आने वाले समय में अगर उन्हें तस्वीर से सम्बंधित कोई कार्य पड़े, मुझे याद करें। डॉ एस एन उपाध्याय, डॉ ए एन पाण्डे, डॉ बी मुखोपाध्याय, डॉ लाला सूर्यनन्दन सभी लोगों से उन्होंने ही मिलवाया और मैं भी जीवन पर्यन्त उनका सेवक बना रहा। किसी को भी किसी भी काम की जरुरत होती थी &#8211; बनारसी को बुलाओ &#8211; कहते थे। &#8221;</p>
<p>इश्तियाक साहब कहते हैं: &#8220;उस दिन यानी 5 जनवरी को जब गांधी मैदान के पास गोलियां चल रही थी, पटना सचिवालय के सामने भी छात्रों का प्रदर्शन, नारे वाजी और अन्य बातें चल रही थी। उन दिनों पुलिस की संख्या भी उतनी अधिक नहीं थी, जितनी आज है। प्रदर्शनकारियों को इस बात की खबर हो गयी थी की गांधी मैदान के पास गोलियां चली है। वे भी उग्र हो रहे थे। लेकिन उग्रता को दबाने के,लिए पुलिस आंसू गैस के गोले छोड़ रही थी। मैं सचिवालय के मुख्य द्वार के पास ही खड़ा था। उन दिनों &#8216;प्रेस&#8217; नाम का कोई हौआ तो था नहीं, सड़क कर्मभूमि होने के कारण लोग नाम से, चेहरे से जानते थे; इसलिए खतरा का कोई प्रश्न नहीं रहता था।&#8221;</p>
<p>कुछ क्षण रुकने के बाद, एक लम्बी सांस लेते इश्तियाक जी कहते हैं: &#8220;लेकिन उस दिन गाँधी मैदान के पास जो भी हुआ वह ह्रदय विदारक था। अगले दिन के अख़बारों में जिस तरह लिखा गया था, एक-एक शब्द ह्रदय को चीर रहा था। मैं उस दिन अपने भगवान् से, अल्लाह से दुआ किये की आने वाले समय में कभी कोई ऐसी घटना नहीं हो। दर्जनों से अधिक माताओं की कोख़ सुनी हो गयी। पिता का पुत्र मृत्यु को प्राप्त किया। केबी सहाय उस गोली कांड के बाद जो गए, फिर नहीं दिखे।&#8221;</p>
<p><strong>बहरहाल, इश्तियाक साहब के पास बिहार के राजनेताओं की तस्वीरों का विशाल भण्डार है। सं 1979 में वे अजय भवन के कोने पर &#8216;बनारस फोटो गैलरी&#8217; नामक एक दूकान खोले। आज उनके दो बेटे हैं फ़ैज़ अहमद और फ़िरोज अहमद। फ़ैज़ साहब को एक बेटा एक बेटी हैं जबकि फिरोज साहव को दो बेटे हैं। बनारस से रिस्ता आज भी है क्योंकि बनारस के बिना तो इस पृथ्वी पर जी ही नहीं सकता लोग, लेकिन इश्तियाक साहब के बाद &#8216;कैमरे&#8217; और फोटो से रिस्ता अगली पीढ़ी को नहीं है। </strong></p>
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