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	<title>pana college Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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		<title>पटना कालेज @ 160 : जब बादशाह खान पटना कॉलेज मैदान में कहे थे &#8220;बुद्ध को मत भूलो&#8230;.गाँधी को मत भूलो&#8221;, साल 1969 था (11)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Apr 2022 05:35:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विदेश में बिहारी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>शायद बहुत कम लोगों को याद होगा आज जब पटना कॉलेज के प्रशासनिक भवन के ठीक सामने से जाती हुई सड़क, जब वाणिज्य महाविद्यालय के रास्ते गंगा की ओर मुड़ती है, कॉलेज के मुख्य मैदान के दाहिने कोने पर स्थित मिट्टी और बालू की उस विशाल ढ़ेर के बगल में बने मंच से खान अब्दुल [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/when-badshah-khan-said-in-patna-college-ground-dont-forget-buddha-dont-forget-gandhi">पटना कालेज @ 160 : जब बादशाह खान पटना कॉलेज मैदान में कहे थे &#8220;बुद्ध को मत भूलो&#8230;.गाँधी को मत भूलो&#8221;, साल 1969 था (11)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शायद बहुत कम लोगों को याद होगा आज जब पटना कॉलेज के प्रशासनिक भवन के ठीक सामने से जाती हुई सड़क, जब वाणिज्य महाविद्यालय के रास्ते गंगा की ओर मुड़ती है, कॉलेज के मुख्य मैदान के दाहिने कोने पर स्थित मिट्टी और बालू की उस विशाल ढ़ेर के बगल में बने मंच से खान अब्दुल गफ्फार खान यानी सीमांत गाँधी यानी फ्रोंटियर गांधी यानी बादशाह खान तत्कालीन युवाओं को, छात्रों को, छात्राओं को, शिक्षकों को, शिक्षार्थियों को, गरीबों को, धनाढ्यों को यानी पटना कॉलेज के प्रशासनिक भवन वाले छोड़ पर गंगा पार सिद्धार्थ और महावीर के जन्मस्थली से आने वाली हवाओं के बीच खड़े होकर मंच से सम्बोधित कर रहे थे : बुद्ध को मत भूलो&#8230;.गाँधी को मत भूलो। साल था सन 1969 । </strong></p>
<p>पटना कालेज के आज के शिक्षक, छात्र-छात्राएं, शिक्षकेत्तर कर्मचारी भले इस बात से अनभिज्ञ हों, लेकिन पटना कालेज का प्रशासनिक भवन वाला यह मैदान और इस मैदान का दाहिना किनारा, वहां की मिट्टी, वहां के ईंट-पथ्थर, वहां की हवाएं आज भी इस बात का गवाही देते हैं कि इसी स्थान पर कोई पौने-सात फीट लम्बा एक सामाजिक प्रवर्तक आया था । अपने प्रवास के दौरान सीमांत गांधी रो-रो कर, बिलख-बिलखकर, अवरुद्ध कंठ से  बार-बार यह बात दोहराते रहे, कहते रहे: आज़ाद भारत के लोग &#8220;गौतम बुद्ध&#8221; को भी भूल गए और &#8220;महात्मा गाँधी&#8221; को भी याद नहीं रख पाए। जबकि बिहार में ही मोहन दास करमचंद गांधी &#8216;महात्मा गांधी&#8217; बने और नेपाल की तराई में स्थित लुम्बिनी में जन्म लिए &#8216;सिद्धार्थ&#8217; को बिहार में ही &#8216;बोधित्व&#8217; प्राप्त हुआ और वे &#8220;गौतम बुद्ध&#8221; बने।<br />
हमारी पीढ़ी के लोग महात्मा गाँधी को नहीं देखा होगा, यह पक्का है। लेकिन &#8216;सीमांत गांधी&#8217; को भी शायद बहुत कम लोग &#8216;साक्षात्&#8217; देखे होंगे। उन्हें स्पर्श किये होंगे। उनकी बातों को सुने होंगे और आज तक याद भी रहे होंगे, भले समय अपनी गति से 53 वर्ष निकल गया हो। मैं बहुत भाग्यशाली हूँ। </p>
<p>हमारे लिए दस वर्ष की आयु में, पटना के एक ऐतिहासिक विद्यालय &#8211; टी के घोष अकादमी &#8211; के छात्र के रूप में सीमांत गांधी के लिए बनाए जाने वाले मंच के लिए &#8216;बांस&#8217; के टुकड़ों को दो-तीन मित्रों के साथ खींच-खींच कर लाना, रस्सी कम हो जाने पर एनी बेसेंट रोड स्थित श्री बद्री साहू की दूकान से दौड़कर लाना, पीने का पानी दौड़कर या तो इक़बाल हॉस्टल के फुलबारी में लगे नल से या फिर प्रशासनिक भवन के सामने वाले फुलबारी में लगे नल से लाना, मनोविज्ञान के प्राध्यापक प्रोफ़ेसर शमशाद हुसैन के आदेश पर गरमा-गरम सिंघारा, पूड़ी-कचौड़ी और जलेबी लाना, पटना कॉलेज के तत्कालीन चतुर्थ-वर्गीय कर्मचारी श्री रामाशीष जी और श्री भोलाजी (माली) का प्रिय-पात्र होना  &#8211; एक इतिहास के पन्ने पर हस्ताक्षर करने से कम नहीं था।</p>
<p>क्योंकि अगर वैसा नहीं होता तो आज पांच दशक के बाद भी वो सभी बातें इस कदर याद नहीं आते और पटना कॉलेज के 160 वे वर्ष पर अपने महाविद्यालय के सम्मानार्थ, वहां की मिट्टी के सम्मानार्थ, तत्कालीन शिक्षकों के सम्मानार्थ या फिर व सभी जिन्होंने हमारे जीवन-निर्माण में गिलहरी की तरह ही सही, अपनी-अपनी भूमिका निभाए थे, उनके सम्मानार्थ आज ये शब्द नहीं दोहराता, नहीं लिखता। यह भाग्य और प्रारब्ध की ही तो बात है। </p>
<p>संभव है आज भी पटना कॉलेज के अनन्य छात्र-छात्राएं-शिक्षक भारत देश के विभिन्न स्थानों पर अपना-अपना जीविकोपार्जन कर जीवित होंगे, लेकिन सन 1969 में सीमांत गांधी का पटना कॉलेज में पदार्पण शायद भूल गए होंगे। या फिर उसे याद रखना उनके लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं रहा होगा। </p>
<p>लेकिन आज 53-वर्ष बाद भी बिहार के एक शिक्षक को, एक सामाजिक प्रवर्तक को, हिंदी-उर्दू साहित्य के दर्जनों किताबों के लेखक, विधानसभा पत्रिका &#8216;साक्ष्य&#8217; के संपादक, &#8216;दोआबा&#8217; पत्रिका के संपादक, उर्दू कथा डायरी &#8216;रेत पर खेमा&#8217; के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से अलंकृत, &#8216;छोटा सा एक पुल&#8217;, &#8216;पहाड़ मेरे सखा है&#8217;, &#8216;रेत से आगे&#8217;, &#8216;चाक पर रेत&#8217;, &#8216;जिन्दा होने का सबूत&#8217;, अतीत का चेहरा&#8217; जैसे दर्जनों रचनाओं के हस्ताक्षर, महान राजनीतिज्ञ, विधान सभा के पूर्व अध्यक्ष श्री जाबिर हुसैन साहेब को जब कल फोन किया और पूछा कि &#8220;सर&#8230;. शिवनाथ झा बोल रहा हूँ&#8230; पटना कॉलेज में श्रद्धेय सीमांत गांधी किस वर्ष आये थे? सभी बातें याद है लेकिन साल याद नहीं आ रहा है&#8230;&#8221; सम्मानित जाबिर हुसैन साहब, इससे पहले कि मैं अगली सांस लूँ, कहते हैं &#8220;1969&#8221; &#8211; मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। </p>
<p>और फिर याद आ गया &#8220;वह दो चवन्नी&#8221; जो मंच के पास दूसरे दिन मिला था जब हम सभी छोटे-छोटे बच्चे फिर बांस के टुकड़ों को खींच-खींचकर एक जगह एकत्रित कर रहे थे। दरियों को खींच-खिंच कर मोड़ रहे थे ताकि उसे फिर सामने व्यायामशाला-सह-परीक्षा कक्ष में रखा जा सके। जिस समय &#8216;दो चवन्नी&#8217; मिला था, पटना कॉलेज के एक मित्र &#8216;गिरीश&#8217; जो हमारे साथ स्कूल में पढता भी था और जिसके पिता पटना कॉलेज के चतुर्थ-वर्गीय कर्मचारी भी थे, बहुत खुश हुआ था। उन दिनों पटना कॉलेज के सामने ननकू जी के होटल में पांच पैसे में सिघाड़ा (समोसा) और बारह पैसे में काला-काला बड़ा-बड़ा गुलाब जामुन मिलता था। </p>
<p>पूर्णिया (गढ़बनैली) के रास्ते गाँव (दरभंगा) से मगध की राजधानी पटना कुछ वर्ष पहले ही आया था। बाबूजी पटना के एक मशहूर प्रकाशक और पुस्तक विक्रेता नोवेल्टी एंड कंपनी में एक मामूली कर्मी के रूप में काम करते थे। आखिर खुद सांस लेने के लिए और बाल-बच्चों के परवरिश के लिए काम तो करना ही पड़ेगा &#8211; चाहे आपकी योग्यता के अनुसार हो अथवा नहीं। नोवेल्टी के मालिक बाबूजी का बहुत सम्मान करते थे उनके व्यवहार और योग्यता को मद्दे नजर रखकर। बाबूजी संस्कृत के विद्वान थे, लेकिन जो कार्य करते थे, उसका संस्कृत से कोई लेना-देना नहीं था। खैर। </p>
<p>लोग आज भले ही &#8216;हिंदी&#8217; और &#8216;संस्कृत&#8217; की उन्नत्ति के लिए विभिन्न प्रकार के नारे लगाएं, चाहे सरकारी-स्तर पर हो या गैर-सरकारी-स्तर पर; लेकिन सच तो यही है कि आज जब सम्पूर्ण देश हिंदुस्तान की आज़ादी के 75 वर्ष पर आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, हमारी अपनी भाषा, हिंदी भाषा, अभी तक &#8216;राष्ट्रभाषा&#8217; नहीं बन पाई। राष्ट्र उसे सम्मान नहीं दे सका, जिसका वह &#8216;हकदार&#8217; है। देश हिंदी को अपना नहीं बना सका। साल के 365 दिनों में 15 दिन &#8216;पखबाड़े&#8217; के रूप में हिंदी को समर्पित करता है। अब जब देश के लोग 365 दिनों में 350 दिन &#8216;इंग्लिश&#8217;, &#8216;हिंगलिश&#8217; और लठमार भाषाओँ का प्रयोग कर अपनी बातों का आदान-प्रदान करते हैं, तो बेचारी हिंदी पंद्रह दिनों में क्या कर लेगी ?</p>
<p>पढ़े-लिखे विद्वान-विदुषियों की बात करने की क्षमता मुझमें नहीं है, लेकिन आज भी अंग्रेजी हुकूमत के दौरान बनाये गए नियम, कानून चल रहे हैं। हिंदी को आज भी वह स्थान नहीं मिला पाया, जो मिलना चाहिए था। बड़े-बड़े विद्वानों-विदुषियों, समाज के संभ्रांतों के बीच जैसे ही हम हिंदी में बोलना शुरू करते हैं, सामने वाले अपनी कान और नाक की खुदाई करने लगते हैं। कहते हैं समाज के उन संभ्रांतों के सामने जब तक &#8216;कमर नहीं हिले&#8217;, &#8216;कंधे पर बेवजह लकवा नहीं मारे &#8211; हिलता-डुलता नहीं रहे&#8217;, &#8216;बेवजह हाथ दंड-बैठकी नहीं करे&#8217;, बात-बात में &#8216;सीट-सीट&#8217; नहीं बोले  &#8211; समझ लें हम संभ्रांतों के समूह में रहने लायक नहीं हैं, चाहे संभ्रांतों में महिलाएं हों या पुरुष। &#8216;तीसरे तबके&#8217; के लोगों को तो समाज अभी तक हृदय से लगाया ही नहीं है। खैर। </p>
<p>कारण यह भी है कि जिला में जिलाधिकारी राज करते हैं, पुलिस अधीक्षक शासन करते हैं। प्रदेश से लेकर सम्पूर्ण देश में, यानी पटना के अशोक राज पथ से दिल्ली के राजपथ तक नौकरशाहों का साम्राज्य है जो भारतीय आवाम द्वारा &#8216;चयनित&#8217; 4121 विधान सभा और 426 विधान परिषदों के विधायकों, 245 राज्यसभा और 545 लोकसभा के सांसदों और विभिन्न मंत्रालयों के मंत्रियों और राष्ट्राध्यक्षों के द्वारा &#8216;निष्पादित&#8221; किये जाने  वाले कार्यों में &#8216;अंग्रेजी शब्दों के विन्यास के सामने बेचारी हिंदी जो वैशाख और जेठ महीने में भी पूस और माघ महीने जैसी ठिठुरती ही नजर आती है। खैर। </p>
<p>उस दिन पटना कॉलेज के इस ऐतिहासिक मैदान में सीमांत गांधी और उनके साथ जितने भी लोग थे, अंग्रेजी शब्दों को अपने जिह्वा पर नहीं आने दिया। आखिर अंग्रेजों को भारत से भगाए तो महज 22 साल ही हुए थे और इन 22 सालों में जो 15 अगस्त, 1947 की रात को जन्म लिए थे, उनकी मूंछों की रखाएँ स्वतः खींचनी शुरू हो गई थी और अनवरत बढ़ रही थी। उस युग में &#8216;फ़ास्ट-फ़ूड&#8217; का भारतीय चौहद्दी में नामोनिशान नहीं था, इसलिए युवाओं और युवतियों में &#8216;यावनारम्भ&#8217; भी देर से दस्तक देता था।</p>
<p>सीमांत गांधी को मुंगेर के आर डी एंड डी जे कॉलेज में भाषण देना था। वे एक पोटली हाथ में लिए दिल्ली हवाई अड्डा पर उतरे थे फिर वहां से पटना के लिए रवाना हुए। दिल्ली हवाई अड्डे पर अन्य गणमान्यों के अलावे श्रीमती इंदिरा गांधी स्वयं उनकी आगुआई में कड़ी थी। आखिर श्रीमती गांधी अपना बचपन भी तो उनके सानिग्ध में बिताई थी। सीमांत गांधी दिल्ली से पटना आये।</p>
<p>पटना कॉलेज में तत्कालीन छात्र-छात्राओं को, समाज के लोगों को संबोधित किये। फिर यहाँ से मुंगेर। उन दिनों बिहार के कई जिलों में छोटी-मोटी साम्प्रदायिक दंगे हो रहे थे। अपने संबोधन में बार-बार अवरुद्ध कंठ से सीमांत गांधी कहते रहे: &#8220;हम बुद्ध को भी भूल गए और गांधी को भी याद नहीं रख सके।&#8221; उनका सीधा निशाना था &#8220;देश में अमन शांति हो, चैन हो। सबों में भाईचारा हो।&#8221; सम्मानित जाबिर हुसैन साहब सीमांत गांधी के लिए गठित स्वागत समिति का नेतृत्व कर रहे थे। कहते हैं जिस दिन सीमांत गांधी मुंगेर के  आर डी एंड डी जे कॉलेज में अपनी उपस्थिति दर्ज किये थे, वह कालेज अपने छः दशक पुराना अस्तित्व से प्रसन्नचित था। आज वह कॉलेज कोई 120 वर्ष पुराना हो गया है। </p>
<p>हम अपने माता-पिता के साथ उन दिनों पटना कॉलेज के सामने ननकू जी के होटल वाली गली के नुक्कड़ वाले मकान में रहते थे। वह मकान आज तो नहीं है, अब वहां चार-मंजिला भवन बन गया है, लेकिन गली की नुक्कड़ आज भी अपने स्थानसे पटना कालेज के मैदान का वह कोना देखता है और इतिहास के पन्नों में सिमटे, परत-दर-परत धूल जमी बातों को याद कर कभी प्रसन्न होता है तो कभी अश्रुपूरित। </p>
<p>गली के नुक्कड़ का वह ईंट आज भी सीमांत गांधी की उस बात को सुनकर अश्रुपूरित हो जाता है जब पटना कॉलेज के दर्जनों पीपल, बरगद, अशोक, आम के पेड़ों पर बंधे &#8216;लाउडस्पीकर से आवाज गूंज रही थी : &#8220;आज़ाद भारत के लोग &#8220;गौतम बुद्ध&#8221; को भी भूल गए और &#8220;महात्मा गाँधी&#8221; को भी याद नहीं रख पाए। जबकि बिहार में ही मोहन दास करमचंद गांधी &#8216;महात्मा गांधी&#8217; बने और नेपाल की तराई में स्थित लुम्बिनी में जन्म लिए &#8216;सिद्धार्थ&#8217; को बिहार में ही &#8216;बोधित्व&#8217; प्राप्त हुआ और वे &#8220;गौतम बुद्ध&#8221; बने।&#8221; उपस्थित हज़ारों हज़ार लोगों में किसी न ताली नहीं ठोका। सबों की नजर जमीन में गरी थी। कहते हैं जब शर्म उत्कर्ष पर होती है तो नजर जमीन के अंदर धंस जाती है। </p>
<p>लेकिन सन 1969 के ठीक दस वर्ष बाद 1979 में पटना कॉलेज के स्थान पर पटना के बांस घाट का दृश्य बहुत ही अमानवीय था। गंगा के किनारे बांस घाट (राजेंद्र प्रसाद घाट) पर लाखों लोगों का सैलाब था। पटना के छुटभैये नेताओं से लेकर दिल्ली और विदेशों के नेताओं और के सामने जब लोक नायक जयप्रकाश नारायण के पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दिया जा रहा था, कोई सम्मानित महानुभाव अपने तलहत्थी पर तम्बाकू ठोक दिए। आखिर पटना के लोग थे। ज्ञानी-महात्मा-विद्वता तो पराकाष्ठा पर थी ही। बगल में खड़े सम्मानित महानुभाव भी तलहथ्थी ठोके। </p>
<p>लोग बाग़ समझे &#8220;ताली बजी&#8221; और फिर गंगा के इस पार से गंगा के उस पार तक तालियों की गरगराहट &#8211; श्रीमती इंदिरा गाँधी अपने दोनों हाथों को अपने कपार पर रखकर शर्म से जमीन के अंदर समां रही थी। चिल्ला-चिल्लाकर कह रही थी &#8211; शर्म करो, यह समय ताली बजाने का नहीं है। लेकिन कौन सुनता है। देश की राजनितिक आज़ादी मिले 32 साल हो गए थे। कहीं मूछें घनघोर हो रही थी, तो कहीं मूंछें कट रही थी &#8211; कहते सुनते थे फैशन बदल रहा है। खैर। </p>
<p>साठ के दशक से लेकर जय प्रकाश नारायण की &#8216;सम्पूर्ण क्रांति&#8217; तक पटना कॉलेज परिसर में सामने की गलियों में रहने वाले हम बच्चों की उपस्थिति, सहयोग के बिना संभव ही नहीं था। उन दिनों के छात्र, चाहे हॉस्टल में रहते हों यह अपने-अपने घरों से कॉलेज आते थे, मोहल्ले के बच्चों की टोली से गर्दन भर परिचित होते थे। आज समय और परिवेश के साथ-साथ कालेज की हवाएं भी बदल गई है, बदलना भी स्वाभाविक है। बादशाह खान 20 जनवरी 1988 को अंतिम सांस लिए। पटना कॉलेज की मिट्टी और उस दस वर्षीय बच्चा का नमन स्वीकार करें बादशाह खान साहब</p>
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		<title>पटना कालेज @ 160 : पटना विश्वविद्यालय के दो समाजशास्त्री जिन्होंने समाज शास्त्र को पुनः परिभाषित किये (10)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Apr 2022 05:26:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विदेश में बिहारी]]></category>
		<category><![CDATA[bindeshwar]]></category>
		<category><![CDATA[hetukar]]></category>
		<category><![CDATA[jha]]></category>
		<category><![CDATA[pana college]]></category>
		<category><![CDATA[patha]]></category>
		<category><![CDATA[Sanitation]]></category>
		<category><![CDATA[socology]]></category>
		<category><![CDATA[Sulabh]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना विश्वविद्यालय के दो महान समाजशास्त्री जिन्होंने समाज शास्त्र को पुनः परिभाषित किये सामाजिक सरोकार के मद्दे नजर &#8211; डॉ हेतुकर झा अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी कृतियां आज भी अमर है &#8211; सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक और पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के मेधावी समाजशास्त्री डॉ बिंदेश्वर पाठक को [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>पटना विश्वविद्यालय के दो महान समाजशास्त्री जिन्होंने समाज शास्त्र को पुनः परिभाषित किये सामाजिक सरोकार के मद्दे नजर &#8211; डॉ हेतुकर झा अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी कृतियां आज भी अमर है &#8211; सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक और पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के मेधावी समाजशास्त्री डॉ बिंदेश्वर पाठक को 80वें जन्मदिन पर भारतीय समाज की ओर से शुभकामनाएं ।</p>
<p>माँ कहती थी &#8216;जब मनुष्य के शरीर की हड्डी से मांस लटकने लगे, त्वचाओं में झुर्रियां और शिराएं दिखने लगे, तो यह मत समझना कि वह मनुष्य वृद्ध हो गया है । यह सोचकर समझने के कोशिश करना कि वह अपने जीवन के कितने वसंतों की पीड़ाओं को सहकर, स्वयं को उस मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक, शैक्षिक और मानवीय उत्कर्ष पर पहुंचा पाया है, जहाँ समाज के बिरले लोग पहुंच पाते हैं। उसके शरीर के एक-एक नश, एक-एक शिराएं, त्वचा की झुर्रियां जीवन-पर्यन्त उसका चश्मदीद गवाह होता है।</p>
<p>माँ यह भी कहती थी तुम्हें तुम्हारे जीवन काल में समाज में वैसे जीतने भी जीवित प्राणी दिखें, उन्हें अन्तः मन से सम्मान करना क्योंकि वैसे मनुष्यों की माताएं &#8216;अशिक्षित&#8217;, &#8216;अनपढ़&#8217;, &#8216;निरक्षर&#8217; ही मिलेंगी, मेरी तरह। वे सभी माताएं अपने बच्चों को शिक्षा के उत्कर्ष पर देखने के लिए खुद अशिक्षित रहना श्रेयस्कर समझीं। वे अपनी भाषाओँ को छोड़कर, किसी भी अन्य भाषाओँ को नहीं जानती हैं; नहीं पहचानती, नहीं पढ़ पाती। लेकिन अपने बच्चों के होठों की गतियों को, शारीरिक हलचलों को पढ़ना जानती हैं और समझ जाती हैं की आखिर उनका संतान क्या चाहता है। आने वाले समय में ऐसे मनुष्यों की किल्लत होगी। समाज में दृष्टान्त देना तो मुश्किल होगा ही।</p>
<p>बहरहाल, यह तस्वीर माँ की समस्त बातों को समेटे हुए है। ये दो महामानव पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के हस्ताक्षर हैं। उच्चतर शिक्षा के प्रारंभिक वर्षों में दोनों सहपाठी थे, मित्र थे। एक ही कक्षा में पढ़ते थे स्नातक तक । लेकिन समय के आगे किसका चला है। समाज को बेहतर बनाने हेतु समय दोनों को दो धाराओं की ओर उन्मुख किया और समयांतराल जो सम्मान कर रहे हैं (सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संथापक डॉ बिंदेश्वर पाठक), वे छात्र हो गए और जो सम्मानित हो रहे हैं (डॉ हेतुकर झा) वे शिक्षक ।</p>
<p>पाटलिपुत्र के गंगा तट पर स्थित वाणिज्य महाविद्यालय के द्वितीय तल्ले में पटना विश्वविद्यालय का समाजशास्त्र विभाग, उसके दीवारें, ईंट-पत्थर, ब्लेक-बोर्ड, कक्षाओं की कुर्सी-टेबल सभी इनकी अद्वितीय मित्रता, एक दूसरे के प्रति सम्मान, आदर, विश्वास का चश्मदीद गवाह है। जीवन में उस अद्भुत मित्रता की डोर न कभी कमजोर हुई और न ही टूटी। जब तक शिक्षक महोदय अपनी जीवन की अंतिम सांस लेकर इस लोक से अपनी अनंत यात्रा पर निकले, मित्र हताश अवश्य हुए, आज भी हैं, लेकिन प्रकृति और प्रारब्ध के नियमों के किसका चला है यह तस्वीर महज एक तस्वीर नहीं है, बल्कि माँ की बातों का शायद &#8216;अंतिम दृष्टान्त&#8217; भी है हमारे समाज में। डॉ पाठक विगत 2 अप्रैल को अपना 80 जन्मोत्सव मनाए हैं। हम सभी कामना करते हैं कि वे स्वस्थ रहें, मुस्कुराते रहे, सुलभ के आगंतुकों को कहते हैं &#8220;मुस्कुराइए &#8230; आप सुलभ में हैं।&#8221;</p>
<p>विगत सप्ताह कबीर खान द्वारा निर्देशित और रणवीर सिंह, दीपिका पादुकोण, पंकज त्रिपाठी, बोमन ईरानी, ताहिर राज भसीन, जीवा, साकिब सलीम, जतिन सरना जैसे कलाकारों द्वारा अभिनीत &#8220;फिल्म 83&#8221; देखा। इस फिल्म को देखकर मैं अश्रुपूरित था। कपिल देव की गेंद मुझे अपने जीवन के चालीस वर्ष पीछे लेकर चला गया। वह दिन एक तरह से मेरे जीवन का मार्मिक दिन अवश्य था, लेकिन &#8216;सकारात्मक&#8217; समय की शुरुआत के लिए &#8211; कपिल देव की तरह।</p>
<p>सन 1983 के जून महीने में 9 जून से 25 जून तक इंग्लैंड और वेल्स में वर्ल्ड कप के लिए मैच हो रहा था। सेमी फ़ाइनल में इंग्लैंड, पाकिस्तान, वेस्ट इंडीज और भारत आया था और 25 जून को लॉर्ड्स में भारत और वेस्ट इंडीज के बीच फ़ाइनल मैच खेले जाने वाला था। उन दिनों मैं पटना से प्रकाशित आर्यावर्त-इण्डियन नेशन अखबार में कार्य करता था। इण्डियन नेशन के सम्पादकीय विभाग में उप-संपादक के रूप में कार्यरत था। दफ्तर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी थी। कर्मचारियों को वेतन हेतु कैशियर के काउंटर पर पहुंचे महीनों बीत गए थे। कई लोगों के घरों में चूल्हे की आंच धीमी हो गयी थी। कई कर्मचारियों की बेटियों का विवाह तय होने के बाद भी, टूट गया था। बच्चों के विद्यालयों में शुल्क शैक्षिक-शुल्क की राशि भी उत्तरोत्तर बढ़ रही थी। पटना की सड़कों पर तापमान एक ओर जहाँ आसमान छू रहा था, हमारे दफ्तर में सामान्य कर्मचारियों का जीवन जमीन के अंदर दबा जा रहा था।</p>
<p>उन दिनों हमारे दफ्तर में थे सुधाकर भाई (सुधाकर झा) जो संवाददाता तो थे ही, खेल-कूद, विशेषकर क्रिकेट में उन्हें बहुत अभिरुचि थी। उन दिनों अख़बारों में इलस्ट्रेशन दिल्ली से &#8216;केबीके&#8217; का छपता था जो डाक से आने के कारण औसतन तीन दिन बाद आता था। उस दिन बृहस्पतिवार था और तारीख 23 जून। मैं 9 जून से उस तारीख तक वर्ल्ड कप में खेले गए सभी देशों की अंक-तालिका बना लिया था। मेरी इक्षा थी की जब फ़ाइनल मैच हो, उस दिन उस तालिका को प्रकाशित करेंगे &#8216;केबीके&#8217; के आने से पहले। फ़ाइनल मैच में विजय देश का स्थान छोड़कर, एक बेहतरीन अंक तालिका बनाया। यह सोच लिया था जैसे ही खेल ख़त्म होगा, विजय देश का नाम लिखकर अंक तालिका का ब्लॉक बनाकर प्रकाशित करेंगे।</p>
<p>इस पूरे कार्य में सुधाकर भाई का पूरा सहयोग था। उन दिनों पटना के दो-पहिये वाहन जैसे स्कूटर, मोटर साईकिल आदि के अगले और पिछले हिस्से पर नंबर लिखा होना &#8216;बाध्यकारी&#8217; हो गया था। ट्रैफिक डीएसपी थे बनबारी बाबू। एक बेहतरीन इंसान, लेकिन अनुशाषित। मैं 10 रुपये में अनंत लोगों की गाड़ियों पर नंबर लिखा। पैसे आने से घर में चूल्हे जलने में मदद मिलता था। सुधाकर भाई हमेशा हमारे कार्य में पीछे खड़े होते थे। जब तालिका बना लिया तब सोचा कि अगर कोई इसे &#8216;स्पॉन्सर&#8217; कर दे तो &#8216;दो पैसे की आमदनी&#8217; मुझे भी हो जाएगी और संस्थान को तो होगी ही। मैं तत्कालीन विज्ञापन व्यवस्थापक और मुद्रक तथा प्रकाशक गिरीन्द्र मोहन भट्ट (अब दिवंगत) के पास पहुंचा। तालिका दिखाया और मार्गदर्शन के लिए याचना किया। भट्ट जी मेरी आंखों में मेरी भावना को पढ़ लिए। आखिर वे भी तो एक पिता थे और भूख से होने वाली पेट-पीड़ा से वे भी अवगत थे। उन्होंने एक रास्ता बताया &#8211; &#8216;आप सुलभ शौचालय के बिंदेश्वर पाठक जी के पास चले जाएँ, उन्हें दिखाएँ और कहें की भट्ट जी भेजे हैं।&#8217; उन दिनों सुलभ &#8216;शौचालय&#8217; ही था।</p>
<p>23 जून। वर्ल्ड कप फ़ाइनल से 48 घंटा पूर्व। पटना की सड़कों पर तापमान कोई 48+ डिग्री। और मैं उन्मुख था पाटलिपुत्र कॉलोनी स्थित बिंदेश्वर पाठक के आवास की ओर। सड़कों पर मुझ जैसे &#8216;अभागा&#8217; ही चलते-फिरते दिख रहा था। कहीं कोई रिक्शावाला, तो कहीं ठेला पर सामन लिए मजदूर। बीच-बीच में अपने चेहरे को छुपाए स्कूटर, मोटर साईकिल पर लोग दिख रहे थे। सूर्यदेव सर के कुछ डिग्री पश्चिम गाल को सेक रहे थे। माँ-बाबूजी कहते थे: &#8220;समय परीक्षा की घोषणा नहीं करता। वह जीवन में कभी भी समय परीक्षा ले सकता है। इसलिए हमेशा सज्ज रहना।&#8221; माँ-बाबूजी की बातें हमारे लिए &#8216;ब्रह्मवाक्य&#8217; था और हम भी सज्ज थे। मन में कई तरह की बातें आ रही थी लेकिन साईकिल अपनी दिशा की ओर उन्मुख थी।</p>
<p>पाटलिपुत्र कालोनी में प्रवेश के बाद सड़क की बायीं ओर एक छोटे-मैदान के पास बिंदेश्वर पाठक का घर था। बाहर एक पेड़ में साईकिल को सिक्कड़ से बांधकर, चेहरे को पोछते, हनुमान चालीसा पढ़ते मैं दरवाजे पर दस्तक दिया। प्रवेश द्वार के दाहिने कोने पर स्थित &#8216;कॉल-बेल&#8217; को दबाया &#8211; ट्रिंग &#8211; ट्रिंग। कुछ ही क्षण में दरवाजा खुला। दरवाजा खुलते ही अंदर से आलू-परवल की सब्जी, बासमती चावल, अरहर दाल और अन्य भोज्य पदार्थों का सुगंध एक ही बार नाक के रास्ते मस्तिष्क तक पहुंचा। माँ कहती थी &#8216;चाहे तुम कितना भी भूखा रहो, चेहरे पर शिकन नहीं आने देना।&#8217;</p>
<p>सामने एक सज्जन आये और उनके पीछे घर के अंदर डाइनिंग टेबल के पास हाथ पोछते बिंदेश्वर पाठक साहब दिखे। मैं सज्जन को कहा कि &#8216;मैं शिवनाथ हूँ और भट्ट जी भेजे हैं।&#8217; पाठक जी तक्षण बाहर निकले और अंदर आने को कहा। मैं कोने पर ही खड़े-खड़े उन्हें पूरी बातें बताया, तालिका दिखाया और कहा कि &#8216;परसो विश्व कप का फ़ाइनल मैच है। यह तालिका उसी से सम्बंधित है। जो जीतेगा उसका नाम लिखकर, ब्लॉक बनाकर इसे दोनों अखबार में प्रकाशित करेंगे।&#8217;</p>
<p>पाठक जी आर्यावर्त-इण्डियन नेशन संस्थान की स्थिति से अवगत थे। वे वहां के कर्मचारियों की स्थिति को भली-भांति जानते थे। मेरी भावना और उस गर्मी में सड़क नापने का उद्देश्य वे जानते थे। आखिर वे भी वे पिता थे। पाठक जी फिर पूछते हैं: &#8220;कौन जीतेगा?&#8221; मैं सहज शब्दों में कहा: कपिल देव। मेरे तालिका के पीछे उन्होंने हस्ताक्षर कर दिए और कहे कि भट्ट जी को कहियेगा कि बिल दफ्तर में भेज देंगे।&#8217; फिर अपने कुर्ता के जेब में हाथ दिए और जो भी द्रव्य था (1600/- रुपये) वे मेरे हाथ में रखते कहते हैं: &#8216;यह आपकी मेहनत और सोचने की अलग दृष्टि का पुरस्कार है।&#8221; मैं भी उसे अपनी जेब में रखा लिया और उन्हें धन्यवाद देते, प्रणाम करते विदा लिया। बाहर आते ही जब सूर्यदेव पर नजर गयी तो ऐसा लगा कि सूर्यदेव मुस्कुरा रहे हैं। शायद उनकी नजर में मैं उत्तीर्ण था। मैं साईकिल का पैडल मारते सीधा अपने घर की ओर उन्मुख हो गया।</p>
<p>उन दिनों मैं पटना के भीखना पहाड़ी मोहल्ला के सैदपुर छात्रावास के सामने रहता था। सामने एक स्कूल और स्कुल परिसर में एक विशाल पीपल का बृक्ष और उस बृक्ष के नीचे हनुमान की प्रतिमा। सूर्यदेव अस्ताचल की ओर उन्मुख थे। तेज और तप दोनों कम हो गया था। माँ बीच वाले कमरे के दरवाजे का ओट लिए बैठी थी। दरवाजा खुला था। सूर्य की किरणें उसके चेहरे के साथ क्रीड़ा कर रही थी। पीपल के पेड़ के पत्तों के बीच से सूर्य की किरणें कभी-कभी छनकर आती थी। माँ मेरी साईकिल की घंटी से अवगत थी। उसे चिंता थी कि मुझे दफ्तर जाने का समय हो रहा है और मैं अब तक वापस नहीं आया हूँ। तभी साईकिल की ट्रिंग-ट्रिंग घंटी बजी। गली के नुक्कड़ से दरवाजे की दूरी महज 20 कदम था। माँ मेरे चेहरे को पढ़ ली। &#8216;नाउम्मीद&#8217; मन आकाशमात उम्मीदों से भर गया। माँ समझ गई &#8211; कुछ अच्छा हुआ है। मैं साइकिल लगाकर माँ के हाथों में 1600/- रुपये रखा। अपनी आँचल की खूंट से अपनी आंखों को पोछते वे कहती हैं: &#8220;जुग-जुग जीबैथ बिंदेश्वर बाबू।&#8221; उस द्रव्य से कोई तीन महीने हम सभी &#8216;भर-पेट खाना खाये।</p>
<p>उस घटना के कोई तीन दशक बाद जब भारत के पूर्व कप्तान और विश्व कप &#8211; 1983 के विजेता कपिल देव से नोयडा स्थित उनके नवनिर्मित गगनचुम्बी अट्टालिका में भारतीय स्वाधीनता संग्राम के गुमनाम क्रांतिकारियों का वीर-गति प्राप्त सेनानियों के आज के वंशजों की खोज से संबंधित प्रयास को लेकर मिला और उन्हें पटना की उस घटना को बताया, बिंदेश्वर पाठक जी के बारे में बताया। मेरी बातों को वे बहुत धैर्य के साथ सुने। वे निःशब्द थे। लगता था वे मेरी भावना को पढ़ रहे हैं। उन दिनों मैं ऑस्ट्रेलिआ से उदघोषित स्पेशल ब्रॉडकास्टिंग सर्विस (एसबीएस रेडियो, हिंदी सेवा) के लिए कार्य करता था। मेरी बातों को सुनने के बाद भारत के कप्तान कहते हैं: &#8220;हमें उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिए। न मैं खेल के मैदान में उस दिन उम्मीद छोड़ा था और ना ही आज। आपकी बातें एक पाठ है आज को युवाओं के लिए। आप बहुत बेहतरीन कार्य कर रहे हैं। इस कार्य को सभी नहीं समझेंगे। मैं पाठक जी को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ। पाठक जी बहुत बेहतरीन इंसान हैं। आज़ाद भारत में वे एकमात्र व्यक्ति हैं जिन्होंने सफाई के समाजशात्र को पुनः परिभाषित किया। उन्होंने जो किया, आज तक किसी ने नहीं किया। आप भी उम्मीद नहीं छोड़ें। कोई नहीं जानता आपका अंतिम प्रयास ही आपको विश्वव्यापी बना दे।&#8221; खैर।</p>
<p>आज ही नहीं, कल भी “मेरी आवाज ही पहचान है” – ये पांच शब्द सुनते ही दिवंगत लता मंगेशकर जी याद आएँगी। “मिसाईल” सुनते ही महान वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत ए पी जे अब्दुल कलाम साहब याद आएंगे। क्रिकेट के मैदान में जब भी वर्ल्ड कप की चर्चा होगी पहले कपिल देव ही नाम लिया जायेगा। उसी तरह आज ही नहीं, कल भी और आने वाले समय में भी, जब भारत में स्वच्छता और भंगी-मुक्ति आंदोलन, यानी “सामाजिक बदलाव” और “मानवीय विकास” के अग्रणी का नाम लिया जायेगा, तो सबों के जुबान पर एक ही नाम आएगा &#8216;सुलभ&#8217; और उनके संस्थापक डॉ बिन्देश्वर पाठक &#8211; और जब डॉ बिंदेश्वर पाठक अपने आप से पूछेंगे तो शायद अपने परम मित्र, सहपाठी, शिक्षक और प्राथमिक सलाहकार डॉ हेतुकर झा को कभी नहीं भूलेंगे।</p>
<p>जब भी &#8216;सोशियोलॉजी ऑफ़ सेनिटेशन&#8217; पर चर्चा की जाएगी डॉ पाठक के साथ-साथ उनके मित्र-सह-शिक्षक-सह-सलाहकार डॉ हेतुकर झा का नाम स्वतः मुख पर आ जायेगा। यही कारण है कि डॉ पाठक की तुलना इब्राहिम लिंकन से भी लोगों ने किया। जिस तरह लिंकन अमेरिका में काले-गोरों में भेदभाव को मिटाने के लिए याद किये जाते हैं, डॉ पाठक भारत में समाज के दबे-कुचले, समाज से उपेक्षित सर पर मैला ढोने वाले महिला-पुरुषों को समाज की मुख्यधाराओं में जोड़ने के लिए याद किये जायेंगे। और उन्ही यादों में &#8216;सोसिओलोजी ऑफ़ सेनिटेशन&#8217; के रचयिता डॉ हेतुकर झा का नाम भी आएगा। यदि सही कहा जाय तो पटना में डॉ पाठक और उनके मित्र डॉ हेतुकर झा पटना के रास्ते, अपने प्रदेश, देश और विश्व में सोसिओलोजी ऑफ़ सेनिटेशन&#8217; की बुनियाद को मजबूत किये।</p>
<p>साठ के दशक के मध्य की बात है। हेतुकर बाबू पटना के राजेंद्र नगर इलाके में रोड नंबर 16 में रहते थे। पटना के ऐतिहासिक मोइनुल हक़ स्टेडियम के ठीक सामने। इनका आवास दूसरे तल्ले पर था। उसी मकान में नीचे बेचन बाबू रहते थे। आम तौर पर उन दिनों हेतुकर बाबू अपने आवास से विश्वविद्यालय रिक्शा से जाते थे। यदि रास्ता ठीक-ठाक रहा तो रिक्शा सैदपुर स्थित राष्ट्रभाषा परिषद् कार्यालय से होते हुए भिखना पहाड़ी स्थित डॉ कमला आचारी के घर के सामने से या तो रमना रोड होते विश्वविद्यालय परिसर आती थी अथवा साइंस कालेज के सामने निकल कर अशोकराज पथ से विभाग पहुँचते थे। वे अपने छात्र-जीवन में वे पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव भी लड़े थे । पद था उपाध्यक्ष।</p>
<p>26 जनवरी, 1968 को पटना विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति के.के.दत्ता का लिखा और हस्ताक्षरित यह पत्र हेतुकर बाबू के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का दृष्टान्त देता है। के.के.दत्ता लिखता हैं: &#8221; Shri Hetukar Jha has been intimately known to me as a student of the Patna University. I have been favourably impressed with all that I have seen of him. With good academic record he has developed a liberal and cultural outlook. He is intelligent, industrious and conscientious. What I liked most in him is his genuine interest of creative activities and as Vice-President of the Patna University Students Union he has rendered valuable services to me in fostering a feeling of fellowship in the University campus. Hias manners and conducts are excellent. I wish him all success in his life.&#8221;</p>
<p>हेतुकर बाबू से हमारा रिश्ता पारिवारिक था। साथ ही, नोवेल्टी एंड कंपनी के कारण पटना विश्वविद्यालय के लगभग सभी प्राध्यापकों को जानते थे। उन दिनों पाठक जी साइकिल से हेतुकर बाबू के घर राजेंद्र नगर आते थे। एक मित्र के रूप में दोनों ढ़ेर सारी बातें करते थे। बातों का ध्रुवीकरण सामाजिक क्षेत्र के कार्यों से जुड़ा होता था। पाठक जी के मन में प्रारम्भ से ही समाज में एक बदलाव लाने की तम्मन्ना थी और उस कार्य में हेतुकर बाबू की भूमिका को आज तक पाठक साहब भी नहीं भुला पाए। जैसे-जैसे समय में बदलाव आ रहा था, पाठक जी पहले एक पुरानी मोटरसाइकिल (राजदूत) की सवारी करने लगे फिर एक पुराना एम्बेसेडर कर। उन दिनों भी हेतुकर बाबू के पास एक आसमानी रंग फिएट (DHA 6200) हुआ करता था । दोनों की मित्रता एक शिक्षक-छात्र से अधिक एक अद्वितीय मित्र के रूप में था। पटना कालेज ही नहीं, पटना विश्वविद्यालय के ही नहीं, बल्कि बिहार से दिल्ली तक, जहाँ भी सामाजिक सरोकार पर, स्वच्छता पर, अछूतों के उत्थान पर, उन्हें समाज के मुख्य धाराओं में जोड़ने की बात पर चर्चा होती थी; पाठक जी और हेतुकर बाबू का नाम अवश्य आता था। यदि कहा जाय तो दोनों की मित्रता, सम्मान, सम्बन्ध बहुत ही उत्कर्ष का था। उसे शब्दों में नहीं लिखा जा सकता है।</p>
<p>जब डॉ. पाठक ने 1970 में बिहार में सुलभ शौचालय संस्थान के नाम से एक स्वयंसेवी और लाभ निरपेक्ष संस्था की आधारशिला रखी, पटना विश्वविद्यालय के समाज शास्त्र विभाग के अध्यापक हेतुकर बाबू उनके पीछे खड़े थे। हेतुकर बाबू को अपने मित्र पर अटूट विश्वास था और उन्हें यह भी विश्वास था कि आने वाले समय में पाठक जी न केवल पटना, बिहार या भारत, अपितु विश्व के अन्य देशों में, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर &#8216;समाजशात्र&#8217; की परिभाषा को पुनः लिखेंगे। वे गाँधी की विचारधाराओं, जिससे वे अधिक प्रभावित थे, को अक्षरसः व्यवहार में अनुवाद करेंगे । आज भी याद है इन महान समाजशास्त्रियों के सुयोग्य नेतृत्व में कमाऊ शौचालयों को कम लागत वाले फ्लश शौचालयों अर्थात् ‘सुलभ शौचालयों’ में बदलने का एक क्रान्तिकारी अभियान शुरू किया। उन दिनों परम्परागत कमाऊ शौचालय पर्यावरण को प्रदूषित करते थे और दुर्गन्ध फैलाते थे। साथ ही, उन्हें साफ करने के लिए सफाई कर्मियों की आवश्यकता पड़ती थी। कम लागत वाले सुलभ शौचालय उपयोग की दृष्टि से व्यावहारिक थे, आज भी हैं और उन्हें साफ करने के लिए सफाई कर्मियों की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस प्रकार यह एक व्यवहार्य विकल्प है जो इसका उपयोग करने वालों के साथ ही सफाई कर्मियों के लिए भी वरदान सिद्ध हुआ है।</p>
<p>उन दिनों पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रोफ़ेसर मुसी राजा साहब, प्रोफ़ेसर सरदार देवनंदन सिंह साहब, प्रोफ़ेसर सतीश कुमार साहब, प्रोफ़ेसर आनंद कुमार साहब, प्रोफ़ेसर (श्रीमती) फुलोरा सिंह, प्रोफ़ेसर ज़ियाउद्दीन अहमद जैस समाजशात्र के महान हस्ताक्षर थे। प्रोफ़ेसर हेतुकर बाबू की हमेशा इक्षा होती थी की समाज में उनके द्वारा, उनके सहयोग से कुछ ऐसी संस्थागत व्यवस्था हो जो आने वाली पीढ़ियों के लिए, खासकर उनकी शिक्षा-शोध में लाभकारी हो। परिणाम यह हुआ कि हेतुकर बाबू-पाठक जी के सहयोग से मिथिला में पंजीकरण व्यवस्था पर शोध कर कार्य करने की बात हुई। इस सिलसिले में देश के कई विश्वविद्यालयों से भी वार्तालाप हुई। इतना ही नहीं, पटना में समाजशास्त्र और सामाजिक व्यवस्था पर उच्चस्तरीय शोध के लिए दोनों ने सुलभ इंस्टीटूट ऑफ़ सोसल स्टडीज की स्थापना की गई जिसका कोई ढ़ाई साल तक हेतुकर बाबू ऑर्जेनाइजिंग डाइरेक्टर भी थे। दोनों यह चाहते थे कि पटना में एक ऐसे संस्थान की स्थापना की जाय जो भविष्य में सामाजिक क्षेत्र के कार्यों पर शोध करने वाले शोधार्थी को मदद मिल सके &#8211; एक केंद्रीय संस्था के रूप में। लेकिन तत्कालीन व्यवस्था और हुकुमनानों के साथ &#8216;तालमेल नहीं बैठने के कारण पटना में स्थापित होने वाला वह संस्था दिल्ली आ गया।</p>
<p>समयांतराल हेतुकर बाबू &#8220;सोसिऑलोजी ऑफ़ सेनिटेशन&#8221; नामक मुलभुत किताब की रचना किये जिसे पाठक जी ने प्रकाशित भी किया। यह किताब वस्तुतः &#8216;सेनिटेशन&#8217; के मामले में एक इन्साइक्लोपीडिया है जो किसी भी शोधार्थी के लिए महत्वपूर्ण है। इन तमाम कार्यों में डॉ पाठक की भूमिका अद्वितीय है। यही कारण है कि जब सत्तर के दशक का सुलभ शौचालय समयांतराल सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन बना, सामाजिक क्षेत्र में हेतुकर बाबू की भूमिका के सम्मानार्थ डॉ पाठक नजरअंदाज नहीं किये।</p>
<p>कहते हैं डॉ पाठक का जन्म 1943 में बिहार के वैशाली जिले के एक गांव में एक रूढि़वादी ब्राह्णण परिवार में हुआ था। विगत चार दशकों और अधिक समय में पाठक जी से अनेकों बार सुना: “जब मैं 6 वर्ष का था तो मैंने एक कथित अस्पृश्य महिला को छू दिया और रूढि़वादी अस्पृश्यता को मानने वाली मेरी दादी ने शुद्ध करने की बात कहकर जबरन मुझे गाय का गोबर और गौ मूत्र पिलाया , जिसका कड़वा स्वाद आज भी मेरे मुंह में है।” डॉ पाठक के अनुसार वे जिस घर में पीला-बढे उसमे वैसे नौ कमरे तो थे, परन्तु एक भी शौचालय नहीं था। जब वे सोते थे तो सुबह-सवेरे अर्धनिद्रा में कुछ आवाजें सुनते थे, कोई बाल्टी उठा रहा होता था, कोई पानी भर रहा होता था और महिलाएं सूर्योदय से पहले शौच के लिए बाहर जा रही होती थीं। कोई महिला बीमार पड़ जाती तो उसे एक मिट्टी के बर्तन में ही शौच करना पड़ता था। कई महिलाओं के सिर में दर्द रहता क्योंकि उन्हें दिनभर अपने शौच को रोककर रखना पड़ता था। यह कहानी महज उनके घर या गाँव की नहीं बल्कि यही कहानी भारत के 7,00,000 गांवों और सैकड़ों शहरों की थी। उनकी शिक्षा चार स्कूलों में हुई और दुर्भाग्यवश किसी में भी शौचालय नहीं था।</p>
<p>पटना विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातक करने के बाद उन्हें 1968-69 में बिहार गांधी जन्म शताब्दी समारोह समिति के भंगी मुक्ति विभाग में काम करने का मौका मिला। समिति ने उन्हें सुरक्षित और सस्ती शौचालय तकनीक विकसित करने और दलितों के सम्मान के लिए काम करने को कहा ताकि उन्हें मुख्यधारा में शामिल किया जाय। ब्राह्मण परिवार के जन्म लिए एक व्यक्ति के लिए यह सबसे “नीच कार्य” समझा जाता था, परन्तु डॉ पाठक इसे सहर्ष स्वीकार किया – यह स्वीकार्यता न केवल उनके व्यक्तित्व में बदलाव लाया परन्तु उनके जीवन को एक नयी दिशा भी दिया। डॉ पाठक के जीवन में नया मोड़ तब आया, जब वे बेतिया की दलित बस्ती में तीन महीने के लिए उनके बीच रहने गए।</p>
<p>उस समय देश में जाति-प्रथा उत्कर्ष पर थी। उनके साथ रहते हुए डॉ पाठक ने जो देखा-सीखा-पीड़ा का अनुभव किया, वह सभी बातें इन्हे अपने जीवन को स्कैवेंजरों के लिए समर्पित करने की ओर उन्मुख कर दिया – पश्चिमी देशों में इस्तेमाल हो रही महंगी कलश और सीवर व्यवस्था के विकल्प के रूप में प्रभावी और सस्ती शौचालय व्यवस्था का विकास कैसे किया जाए, ताकि स्कैवेंजिंग प्रथा रोकी जा सके और उन्हें किसी दूसरे कार्य में पुनर्वासित किया जा सके। आज उन्होंने मानवीय सिद्धांतों के साथ तकनीकी नवाचार को मिलाकर संगठन शिक्षा के माध्यम से मानव अधिकारों, पर्यावरण स्वच्छता, ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों, अपशिष्ट प्रबंधन और सामाजिक सुधारों को बढ़ावा देने के लिए काम करता है। संगठन 50,000 स्वयंसेवकों की गिनती करता है।</p>
<p>पटना विश्वविद्यालय का यह समाजशात्री आज भारत सरकार के पद्मभूषण से अलंकृत है। उनका नाम ग्लोबल 500 रोल ऑफ़ ऑनर, स्टॉकहोम जल पुरस्कार, लीजेंड ऑफ़ प्लेनेट पुरस्कार, इंडियन अफेयर्स सोशल रिफॉर्मर ऑफ द ईयर 2017 का पुरस्कार, ऑर्डर पटेल अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार, न्यूयॉर्क शहर के मेयर बिल डी ब्लासियो ने 14 अप्रैल को बिंदेश्वर पाठक दिवस के रूप में घोषित किये। आज प्रोफेसर हेतुकर बाबू नहीं हैं, लेकिन दोनों समाजशास्त्रियों की स्वच्छता सम्बन्धी सोच ने भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में एक मिसाल कायम कर दी। करीब पांच दशक जिस अभियान को शुरू किया गया था, वह एक विशाल आंदोलन के रूप में, सामाजिक क्रांति के रूप में, सामाजिक चेतना के रूप में विश्व में अवतरित हुआ।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/two-sociologists-of-patna-university-who-redefined-sociology">पटना कालेज @ 160 : पटना विश्वविद्यालय के दो समाजशास्त्री जिन्होंने समाज शास्त्र को पुनः परिभाषित किये (10)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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