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	<title>order Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>बिहार के मुख्यमंत्री सम्मानित नीतीश कुमार जी से प्रदेश से पलायित एक पत्रकार का निवेदन 🙏</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 14 Mar 2023 10:57:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
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		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
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		<category><![CDATA[politics]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आदरणीय श्री नीतीश बाबू, मुख्यमंत्री, बिहार। प्रणाम, आप स्वस्थ होंगे। माँ कामाख्या और महादेव से प्रार्थना करता हूँ अपने प्रदेश की किसी भी महिला की यह कतई इक्षा नहीं होती है कि पंजाब में फसल काटते समय या मुंबई में दूकान पर बैठते समय या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भवनों के निर्माण में बालू-सीमेंट-ईंट ढ़ोते [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आदरणीय श्री नीतीश बाबू,<br />
मुख्यमंत्री,<br />
बिहार। </strong></p>
<p>प्रणाम,</p>
<p>आप स्वस्थ होंगे। माँ कामाख्या और महादेव से प्रार्थना करता हूँ </p>
<p><strong>अपने प्रदेश की किसी भी महिला की यह कतई इक्षा नहीं होती है कि पंजाब में फसल काटते समय या मुंबई में दूकान पर बैठते समय या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भवनों के निर्माण में बालू-सीमेंट-ईंट ढ़ोते समय, या किसी घर में झाड़ू-पोछा करते समय ”उसका स्तन ठेकेदार या मालिक” देखे।</strong></p>
<p>शहरों में उसके ही उम्र के बच्चे स्कूल जाय और उसे उसी घर में झाड़ू लगाना पड़े – बहुत सारी बातें हैं, बहुत सारे अवसर हैं – जिसे आप बिहारी होने के नाते ठीक कर सकते हैं नितीश बाबू। ठीक करिये हुकुम – बहुत दुआएं देंगे बिहार के लोग, जो आपके ही लोग हैं – नहीं तो प्रदेश से बाहर पलायित बच्चे जब दूसरे शहरों में, प्रदेशों में, देशों में “अब्बल” आएंगे तब “छक्कों की तरह हम सभी बिहारी ताली ही बजायेंगे – बिहारी है बिहारी है – और वह मन ही मन मुस्कुराता गलियाता रहेगा – कभी बिहार में अवसर नहीं मिला। न साधन था न अवसर और न ही प्रतियोगिता। </p>
<p>मैं अपने गाँव से कभी नहीं निकलना चाहता था, नीतीश बाबू। परन्तु कुकुरमुत्तों जैसा पनप रहे प्रदेश के नेताओं ने, अधिकारियों ने, बिचौलियों ने – हमारे गाँव के पंचायत से लेकर पटना सचिवालय के मुख्य मंत्री कार्यालय तक प्रदेश को इतना नोचा, इतना नोचा – अर्थ से, सामर्थ से – मुझे गाँव से बाहर कदम निकालने को मजबुर किया था नीतीश बाबू।</p>
<p>मुझे अपने गाँव के मिडिल स्कूल के शिक्षकगण ईश्वर जैसे दीखते थे, नीतीश बाबू। उन्हें छोड़कर रास्ते को लांघना बहुत कष्दायक था नितीश बाबू – लेकिन आप नहीं समझेंगे। पढ़ाई-लिखाई का अर्थ और महत्व आप नहीं समझेंगे। आप तो “अभियंता” थे। प्रदेश की सेवा करने के बात होती तो अभियंता के रूप में भी कर सकते थे। यही वजह है की अब कुछ “पढ़े-लिखे लोग बाग, अधिकारी भी राजनीति रसमलाई खाना चाहते हैं।</p>
<p>आप तो जानते ही हैं नीतीश बाबू की नेता, अधिकारीगण तो अन्तःमन से चाहते ही हैं की सम्पूर्ण प्रदेश “ज़ाहिल” रहे। उन जाहिलों के सामने पांच साल में पांच रोटी फेंक कर पुनःचः कुर्सी पर बैठ जाएँ। मैं गलत तो नहीं कह रहा हूँ नीतीश बाबू, विश्वास नहीं हो तो अपने कनिष्ठ यानी उप-मुख्य मंत्री के आँख में आँख डालकर पूछ लीजिये। खैर, आप तो जानते ही हैं हम लोग जैसा मुर्ख थोड़े ही हैं आप । </p>
<p>मेरा जन्म सन् 1959 में हुआ नीतीश बाबू, दरभंगा जिला के एक संस्कृत आचार्य के घर में। बहुत विद्वान थे मेरे बाबूजी नितीश बाबू। आप तो जानते ही हैं कि बिहार ही नहीं, सम्पूर्ण देश में विद्वान लोग, शिक्षित लोग, विचारवान नेताओं से “पन्गा” नहीं लेते। हमारे बचपन में नेतागण अपने-अपने क्षेत्र के लुच्चों, लफंगों, गुंडों को पालते थे अपने राजनीतिक लाभ के लिए नीतीश बाबू; परन्तु समयान्तराल जब समाज के उन महानुभावों को यह ज्ञान हुआ की उनकी सहायता के बिना नेतागण कुर्सी पर विराजमान नहीं हो सकते; वे स्वयं राजनीति में कूद पड़े और बिहार के करोड़ों “असहाय, निरीह, अशिक्षित मतदाता गण, मेरे बाबूजी के तरह, कूबत नहीं रखते उन्हें रोकने के लिए” और आप नेतागण तो रोकेंगे ही नहीं यह तो सर्वविदित है यहाँ तक की निर्वाचन आयोग भी दिल्ली के सरदार पटेल चौक पर अपने जन्म से ही रो रहा है , आप जानते ही हैं । अब निर्वाचन आयुक्त भी इतने ताकतवर तो हैं नहीं (क्योंकि आप टी एन शेषन की दशा अवकाश के बाद देख चुके हैं) की शासन और व्यवस्था से टक्कर ले।</p>
<p>गाँव में शिक्षा का बंदोबस्त नहीं था नीतीश बाबू, उन दिनों में भी और आज भी। सरकारी अधिकारी शिक्षकों को मिलने वाले पारिश्रमिक में से “कटौती” लेने लगे सरकार । चूँकि प्रशासन और सरकार स्वयं प्रदेश को, जिलों को, गांवों को शिक्षित नहीं करना चाहते थे (आज भी नहीं चाहते हैं हुकुम), जिला-पंचायत-प्रखंडों- गांव की स्कूलों की पढ़ाई जमीन के अंदर दफ़न होती चली गयी हुज़ूर। अधिकारीगण कागज़ पर स्कूल बनाते गए, शिक्षकों की नियुक्ति करते गए, तनखाह बांटते गए और प्रदेश शिक्षा के क्षेत्र में अव्वल आता गया हुकुम – यह आप भी जानते हैं और मैं तो जानता ही हूँ तभी लिख रहा हूँ।</p>
<p>प्रदेश से बाहर पलायित बच्चे जब भी कोई बालक-बालिका दूसरे शहरों में, प्रदेशों में, देशों में “अब्बल” आने लगे, “छक्कों की तरह हम सभी लोग ताली बजाने लगे, लगते हैं हुकुम” यह आप जानते हैं नीतीश जी।</p>
<p>मैं तो साढ़े-चार-वर्ष की उम्र में ही पिता की ऊँगली पकड़कर छोटी लाइन की ट्रेन से दरभंगा से हाजीपुर-सोनपुर-पहलेजा घाट के रास्ते गंगा मैया की तेज धार को काटते पटना के महेंद्रु घाट पहुँच गए सरकार। उस समय कपार पर गोलघर जैसा लाल-तिलकधारी बिनोदानंद झा मुख्यमंत्री कार्यालय से निकल रहे थे हुज़ूर; प्रदेश के नेताओं को, अधिकारीयों को, ठेकेदारों को, बिचौलियों के मुख में प्रदेश को लूटने की विधि-विधान की ओर उन्मुख करके हुज़ूर। क्योंकि दीप नारायण सिंह 18 दिन के शासन में क्या किये, आप तो अनेकानेक बार पढ़े हैं और श्रीकृष्ण सिंह की तो बात ही छोड़िये।</p>
<p>अगर गांव छोड़कर पटना नहीं आया होता, पटना छोड़कर कलकत्ता नहीं गया होता, कलकत्ता छोड़कर दिल्ली नहीं आया होता तो गर्दनीबाग रेलवे क्रासिंग पर या फिर सर्पेंटाइन रोड के चौराहे पर, या फिर डाक बंगला रोड के कोने पर “भुट्टा ही बेचते” रहता न नीतीश बाबू। </p>
<p>हुज़ूर!! बिनोदानंद झा, लोगबाग उन्हें “बिनोदबाबू” कहते हैं (मुंह भी नहीं दुखता) से लेकर आजतक 22 मुख्यमंत्री बने हुज़ूर, एक-एक आदमी दो बार, तीन बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुए; आप भी जानते हैं लेकिन हम लोग जैसा निरीह-गरीब-गुरबा इन साठ-वर्षों में आज भी ठेंघुने पर ही हैं हुकुम क्योंकि अपने प्रदेश में कभी “अवसर का अवसर नहीं ढूंढा गया” नीतीश जी। लेकिन देखिये न बिहार के बाहर दिल्ली में, नोएडा में, गाजियाबाद में, लखनऊ में, कानपुर में, कोलकाता में,चेन्नई में, मुंबई में, राजस्थान में, मध्यप्रदेश में, उत्तराखंड में मंत्रियों का, अधिकारीयों का, ठेकेदारों का, दबंगों का और शासन-व्यवस्था के नजदीकियों का कितना बड़ा संपत्ति-साम्राज्य है ? आपको तो मालूम ही है नीतीश बाबू।</p>
<p>के बी सहाय, महामाया प्रसाद सिंह, सतीश प्रसाद सिंह, बी पी मंडल, भोला पासवान शास्त्री, हरिहर सिंह, दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर, केदार पांडेय, अब्दुल गफूर, जगन्नाथ मिश्रा, राम सुन्दर दास, चंद्रशेखर सिंह, सत्येन्द्र नारायण सिंह, लालू प्रसाद, राबड़ी देवी और नीतीश जी आप जैसे सभी मुख्यमंत्रियों ने, मंत्रियों ने, अधिकारियों ने, दबंगों ने अपने-अपने राजनीतिक लाभ के लिए – सबों ने मिलकर बिहार का चतुर्दिक लुटे हुकुम, लूट रहे हैं सरकार और बिहार को बांझ बना दिए “आर्थिक, शैक्षणिक, स्वास्थ्य, कला-विज्ञान इत्यादि इत्यादि क्षेत्रों में सरकार । </p>
<p>नीतीश बाबू !! अपने प्रदेश में अपने लोगों को सुरक्षित रहने, भर-पेट डकार लेकर खाने, अनंत-स्तर तक शिक्षा ग्रहण करने, स्वस्थ और तंदुरुस्त रहने, व्यापार करने, खेतों में भरपूर उत्पादन करने, उसे उचित मूल्यों बाजार में बेचने, बिना धूस दिए कार्यालयों में अधिकारियों, कर्मचारियों को काम करने का माहौल बनाइए बाबू।</p>
<p>अपने प्रदेश की किसी भी महिला की यह कतई इक्षा नहीं होती की: पंजाब में फसल काटते समय उसका स्तन वहां का ठेकेदार गलत निगाह से देखे; कम उम्र के लड़कों को जो अपने बूढ़े माता-पिता को भरपेट खाना खिलाने के लिए अरब देश भागे जहाँ उसे वहां “शारीरिक शोषण करें” शहरों में उसके ही उम्र के बच्चे स्कूल जाए और उसे उसी घर में झाड़ू लगाना पड़े – बहुत सारी बातें हैं, बहुत सारे अवसर हैं – जिसे आप बिहारी होने के नाते ठीक कर सकते हैं नीतीश बाबू। </p>
<p>ठीक करिये हुकुम – बहुत दुआएं देंगे बिहार के लोग, जो आपके ही लोग हैं नहीं तो आप उत्तरोत्तर कमजोर होते चले जायेंगे। आखिर समय भी कोई चीज है। अगर ऐसा नहीं होता तो मगध में गुप्त वंश का पतन नहीं होता। शेष तो आप पढ़े-लिखे हैं ही, विचारक भी हैं। </p>
<p><strong>आपका शुभचिंतक,</strong></p>
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		<title>138 साल ​पुराना &#8216;मनीऑर्डर&#8217; ​प्रथा संभवतः अब इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक (आईपीपीबी) के नाम से जाना जायेगा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 31 Aug 2018 11:48:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली : एक लाख 55 हज़ार डाकघरों, कोई 16 करोड़ से अधिक खाता धारकों, जहाँ दो करोड़ 60 लाख करोड़ से भी अधिक राशि जमा है और जिस भारतीय डाक का सालाना राजस्व 1500 करोड़ से भी अधिक है &#8211; सरकार की नजर पर गयी है। जिस मनीऑर्डर सेवा का प्रारम्भ सं 1880 में [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>नई दिल्ली : एक लाख 55 हज़ार डाकघरों, कोई 16 करोड़ से अधिक खाता धारकों, जहाँ दो करोड़ 60 लाख करोड़ से भी अधिक राशि जमा है और जिस भारतीय डाक का सालाना राजस्व 1500 करोड़ से भी अधिक है &#8211; सरकार की नजर पर गयी है। जिस मनीऑर्डर सेवा का प्रारम्भ सं 1880 में तत्कालीन वाइसराय और गवर्नर जेनेरल रॉबर्ट बुलबेर लिटन एडवर्ड के समय हुआ था, इस व्यवस्था का &#8216;आधुनिकीकरण&#8217; कर अब इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक (आईपीपीबी) खुलने जा रहा है, जिसका उद्घाटन कल प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी करेंगे। </p>
<p>वैसे इस बात की सम्पूर्णता के साथ पुष्टि की गयी है कि इस भुगतान बैंक में भारत सरकार की 100% हिस्सेदारी है। इस डाक विभाग के व्यापक नेटवर्क और तीन लाख से अधिक डाकियों और ग्रामीण डाक सेवकों का लाभ मिलेगा। इसका मकसद देश में डाकघरों की व्यापक पहुंच के माध्यम से लोगों तक वित्तीय समावेशन के लाभ पहुंचाना है। उद्घाटन के साथ ही आईआईपीबी की 650 शाखाएं और 3,250 सुविधा केंद्र काम करना शुरू कर देंगे। उद्घाटन दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में होगा। </p>
<p>यह भी कहा गया है कि आईपीपीबी की स्थापना केंद्र सरकार के वित्तीय समावेशन के लक्ष्य को तेजी से पाने के लिए की गई है। इसकी कल्पना आम आदमी के लिए एक सस्ते, भरोसेमंद और आसान पहुंच वाले बैंक के तौर पर की गई है। देश के 1.55 लाख डाकघरों को 31 दिसंबर 2018 तक आईपीपीबी प्रणाली से जोड़ लिया जाएगा। आईआईपीबी अपने खाताधारकों को भुगतान बैंक के साथ-साथ चालू खाता, धन हस्तांतरण, प्रत्यक्ष धन अंतरण, बिलों के भुगतान इत्यादि की सेवाएं भी उपलब्ध कराएगा।</p>
<p>​देश भर में इसके एटीएम और माइक्रो एटीएम भी काम करेंगे। साथ ही मोबाइल बैंकिंग एप, एसएमएस और आईवीआर जैसी सुविधाओं के माध्यम से भी बैंकिंग सेवाएं लोगों तक पहुंचाएगा।  </p>
<p>लगभग 500 साल पुरानी &#8216;भारतीय डाक प्रणाली&#8217; आज दुनिया की सबसे विश्वसनीय और बेहतर डाक प्रणाली में अव्वल स्थान पर है। आज भी हमारे यहाँ हर साल क़रीब 900 करोड़ चिठियों को भारतीय डाक<br />
द्वारा दरवाज़े &#8211; दरवाज़े तक पहुंचाया जाता है। ​अंग्रेजों ने ​सैन्य और खुफ़िया सेवाओं की मदद के मक़सद लिए भारत में पहली बार 1688 ​में मुंबई में ​पहला डाकघर खोला। फिर उन्होंने अपने सुविधा के लिए देश के अन्य इलाकों में डाकघरों की स्थापना करवाई। 1766 में लॉर्ड क्लाईव द्वारा डाक-व्‍यवस्‍था के विकास के लिए कई कदम उठाते हुए, भारत में एक आधुनिक डाक-व्यवस्था की नींव रखी गई। इस सम्बंध में आगे का काम वारेन हेस्‍टिंग्‍स द्वारा किया गया, उन्होंने 1774 ​में कलकत्ता में पहले जनरल पोस्‍ट ऑफिस की स्‍थापना की। यह जी.पी.ओ. (जनरल पोस्‍ट ऑफिस) एक पोस्‍टमास्‍टर जनरल के अधीन कार्य करता था। फिर आगे 1786 ​में मद्रास और 1793 में बंबई प्रेसीडेंसी में &#8216;जनरल पोस्‍ट ऑफिस&#8217; की स्थापना की ​गई। </p>
<figure id="attachment_721" aria-describedby="caption-attachment-721" style="width: 976px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/08/General-Post-Office-GPO-Calcutta-Kolkata-1875.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/08/General-Post-Office-GPO-Calcutta-Kolkata-1875.jpg" alt="1774 ​में कलकत्ता में पहले जनरल पोस्‍ट ऑफिस की स्‍थापना" width="976" height="668" class="size-full wp-image-721" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/08/General-Post-Office-GPO-Calcutta-Kolkata-1875.jpg 976w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/08/General-Post-Office-GPO-Calcutta-Kolkata-1875-300x205.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/08/General-Post-Office-GPO-Calcutta-Kolkata-1875-768x526.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/08/General-Post-Office-GPO-Calcutta-Kolkata-1875-218x150.jpg 218w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/08/General-Post-Office-GPO-Calcutta-Kolkata-1875-910x623.jpg 910w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/08/General-Post-Office-GPO-Calcutta-Kolkata-1875-696x476.jpg 696w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/08/General-Post-Office-GPO-Calcutta-Kolkata-1875-614x420.jpg 614w" sizes="(max-width: 976px) 100vw, 976px" /></a><figcaption id="caption-attachment-721" class="wp-caption-text">1774 ​में कलकत्ता में पहले जनरल पोस्‍ट ऑफिस की स्‍थापना</figcaption></figure>
<p>1837 में एक अधिनियम द्वारा भारतीय डाकघरों के लिए एक अखिल भारतीय सेवा को प्रारम्भ किया गया और फिर 1854 के &#8216;पोस्‍ट ऑफिस अधिनियम&#8217; से पूरी डाक प्रणाली के स्‍वरूप में एक नया बदलाव आया  और पहली अक्तूबर 1854 को एक महानिदेशक के नियंत्रण में भारतीय डाक-प्रणाली ने आधुनिक रूप में काम करना प्रारम्भ कर दिया। उस समय भारत में कुल 701 डाकघर थे। इसी साल &#8216;रेल डाक सेवा&#8217; की भी स्थापना हुई और भारत ​से ब्रिटेन और चीन के बीच &#8216;समुद्री डाक सेवा&#8217; भी प्रारम्भ की गई। इसी वर्ष देश भर में पहला वैध डाक टिकट भी जारी किया ​गया। </p>
<p>1854 में डाक और तार दोनों ही विभाग अस्तित्व में आए। शुरू से ही दोनों विभाग जन कल्याण को ध्यान में रख कर चलाए गए। लाभ कमाना उद्देश्य नहीं था। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में सरकार ने फैसला किया कि विभाग को अपने खर्चे निकाल लेने चाहिए। उतना ही काफ़ी होगा। 20वीं सदी में भी यही क्रम बना रहा। डाकघर और तार विभाग के क्रियाकलापों में एक साथ विकास होता रहा। 1914 के प्रथम विश्व युद्ध की शुरूआत में दोनों विभागों को मिला दिया ​गया। </p>
<p>कोई भी संस्थान डाकघर जितना आदमी की ज़िंदगी के इतने क़रीब नहीं पहुंच सका है। डाकघर की पहुंच देश के कोने कोने तक है। एक वजह यह भी है कि जिसके कारण सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं को लोगों तक पहुंचने में होने वाली कठिनाई की स्थिति में ये डाकघर जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल करते हैं। </p>
<p>पहली बार भारतीय डाकघर को राष्ट्रीय महत्व के एक अलग संगठन के रूप में स्वीकार किया गया और उसे 1 अक्टूबर 1854 को डाकघर महानिदेशक के सीधे नियंत्रण में सौंप दिया गया। इस तरह डाक विभाग ने सन् 2004 में 1 अक्टूबर को अपने 150 वर्ष पूरे किये। भारतीय डाक व्यवस्था कई व्यवस्थाओं को जोड़कर बनी है। 650 से ज्यादा रजवाड़ों की डाक प्रणालियों, ज़िला डाक प्रणाली और जमींदारी डाक व्यवस्था को प्रमुख ब्रिटिश डाक व्यवस्था में शामिल किया गया था। इन टुकड़ों को इतनी खूबसूरती से जोड़ा गया है कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक संपूर्ण अखंडित संगठन है। </p>
<p>भारतीय राज्यों के वित्तीय और राजनीतिक एकीकरण के चलते यह आवश्यक और अपरिहार्य हो गया कि भारत सरकार भारतीय राज्यों की डाक व्यवस्था को एक विस्तृत डाक व्यवस्था के अधीन लाए। ऐसे कई राज्य थे जिनके अपने ज़िला और स्वतंत्र डाक संगठन थे और उनके अपने डाक टिकट ​चलते थे। इन राज्यों के लैटर बाक्स हरे रंग में रंगे जाते थे ताकि वे भारतीय डाकघरों के लाल लैटर बाक्सों से अलग नज़र आएं। सन 1908 में भारत के 652 देशी राज्यों में से 635 राज्यों ने भारतीय डाक घर में शामिल होना स्वीकार किया। केवल 15 राज्य बाहर रहे, ​जिसमे हैदराबाद, ग्वालियर, जयपुर और ट्रावनकोर प्रमुख हैं।</p>
<p>​सन 1925 में डाक और तार विभाग का बड़े पैमाने पर पुनर्गठन किया गया। विभाग की वित्तीय स्थिति का जायजा लेने के लिए उसके खातों को दोबारा व्यवस्थित किया गया। उद्देश्य यह पता लगाना था कि विभाग करदाताओं पर कितना बोझ डाल रहा है या सरकार का राजस्व कितना बढा रहा है और इस दिशा में विभाग की चारों शाखाएं ​यानि डाक, तार, टेलीफोन और बेतार कितनी भूमिका निभा ​रहे हैं। </p>
<p>​सन 1857 के आंदोलन के दौरान डाक विभाग भी अछूता नहीं रहा। आगजनी और लूटमार​, ​हत्या​ आदि घटनाएं हुईं। ​हिंसा खत्म हो जाने के बाद भी साल भर तक कई डाकघरों को दोबारा नहीं खोला जा सका। लगभग पांच माह तक चलने वाली​ 1920 की डाक हड़तालों ने देश की डाक सेवा को पूरी तरह ठप्प कर दिया था। </p>
<p>​बहरहाल, इस हफ्ते की शुरूआत में मंत्रिमंडल ने आईआईपीबी के व्यय को बढ़ाकर 1,435 करोड़ रुपये करने की मंजूरी दे दी थी। ताकि आईआईपीबी इस क्षेत्र में पहले से मौजूद पेटीएम पेमेंट्स बैंक, एयरटेल पेमेंट्स बैंक इत्यादि से प्रतिस्पर्धा कर सके।  </p>
<p>आज़ादी के समय देश भर में 23,344 डाकघर थे। इनमें से 19,184 डाकघर ग्रामीण क्षेत्रों में और 4,160 शहरी क्षेत्रों में थे। आजादी के बाद डाक नेटवर्क का सात गुना से ज्यादा विस्तार हुआ है। आज एक लाख 55 हज़ार डाकघरों के साथ भारतीय डाक प्रणाली विश्व में पहले स्थान पर है। लगभग एक लाख 55 हज़ार से भी ज़्यादा डाकघरों वाला भारतीय डाक तंत्र विश्व की सबसे बड़ी डाक प्रणाली होने के साथ-साथ देश में सबसे बड़ा रिटेल नेटवर्क भी है। यह देश का पहला बचत बैंक भी था और आज इसके 16 करोड़ से भी ज़्यादा खातेदार हैं और डाकघरों के खाते में दो करोड़ 60 लाख करोड़ से भी अधिक राशि जमा है। इस विभाग का सालाना राजस्व 1500 करोड़ से भी अधिक है। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/india-post-payments-bank">138 साल ​पुराना &#8216;मनीऑर्डर&#8217; ​प्रथा संभवतः अब इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक (आईपीपीबी) के नाम से जाना जायेगा</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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