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	<title>music Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>&#8220;​नैना से नैना जो मिला के देखे &#8211; मौसम के साथ मुस्कुरा के देखे &#8211; दुनिया उसी का है जो आगे देखे&#8221; &#8211; नमन आपको आशा ताई</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 12 Apr 2026 12:54:43 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>15 जुलाई, 2006 को शनिवार था। मुद्दत बाद दिल्ली के इंडिया गेट परिसर से &#8216;कार्यक्रम करने/कराने पर प्रतिबंध&#8217; भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा एक दिन के लिए हटाया गया था। वजह थी &#8211; शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की अंतिम अभिलाषा को पूरा करना।  उसी वर्ष मार्च के महीने में, जिस महीने में उस्ताद का जन्म [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>15 जुलाई, 2006 को शनिवार था। मुद्दत बाद दिल्ली के इंडिया गेट परिसर से &#8216;कार्यक्रम करने/कराने पर प्रतिबंध&#8217; भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा एक दिन के लिए हटाया गया था। वजह थी &#8211; शहनाई सम्राट उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की अंतिम अभिलाषा को पूरा करना। </strong></p>
<p>उसी वर्ष मार्च के महीने में, जिस महीने में उस्ताद का जन्म बिहार के डुमरांव में हुआ था (21 मार्च, 1916) के 7 तारीख (7 मार्च, 2006) को बनारस में संकट मोचन सहित कई स्थानों पर बम विस्फोट हुआ था। कई लोग मृत्यु को प्राप्त किये थे। स्वाभाविक है बनारस का लाल, जिसे बनारस ही नहीं, पूरे विश्व के लोग पसंद करते थे, उन मृतकों के सम्मान में अपने 91-वां जन्म दिन उस तारीख को मनाने से मना कर दिए। शहर के कई सम्मानित लोगों के अनुरोध पर चार दिन बाद अपने घर सराय हरहा के दूसरे मंजिल पर अपना जन्म दिन मनाये बिस्मिल्लाह खान । </p>
<p>इस निमित्त 91-किलो का केक बनवाया था, वह घर की सीढ़ियों की संकीर्णता के कारण दूसरी मंजिल पर नहीं जा सकता था और उस्ताद अपनी बीमारी के कारण नीचे के आँगन में नहीं आ सकते थे। फिर शहनाई और उनके सम्मान में बनी पुस्तक &#8216;मोनोग्राफ ऑन उस्ताद बिस्मिल्लाह खान&#8217; को लोकार्पित करते, सैकड़ों लोगों की उपस्थिति में मेरी पत्नी श्रीमती नीना झा का हाथ पकड़कर कहते हैं: </p>
<blockquote><p>&#8220;आप तो दरभंगा की बहु हैं, मिथिला की बेटी हैं, आप मेरी एक अंतिम अभिलाषा पूरी कर दें। मैं अपनी अंतिम सांस लेने से पहले दिल्ली के इंडिया गेट पर शहीदों के सम्मानार्थ अपने शहनाई में अपनी सांस फूंकना चाहता हूँ। शहनाई के धुन से शहीदों को आमंत्रित करना चाहता हूँ और फिर शहनाई के धुन से ही उन्हें विसर्जित कर इस दुनिया से कूच करना चाहता हूँ। और वे रोने लगे।&#8221; सम्पूर्ण वातावरण अश्रुपूरित हो गया था।</p></blockquote>
<p>फिर मैं अपनी सांसों को सँभालते उस्ताद से कहा: &#8220;मैं बहुत छोटा सा पत्रकार हूँ दिल्ली सल्तनत में। मेरी औकात कीड़े-मकोड़ों से भी कम है। लेकिन आप जैसे बड़े-बुजुर्गों से ही सुना हूँ कि &#8216;कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।&#8217; अतः मैं कोशिश करने से पहले हार नहीं मानूंगा। आपकी अंतिम अभिलाषा पूरा करने में अपना सम्पूर्ण योगदान दे दूंगा। मेरे और मेरी पत्नी के अनुरोध पर भारत सरकार का गृह मंत्रालय &#8216;प्रतिबंध&#8217; को हटाकर, एक छोटा सा कार्यक्रम कर उनकी अंतिम इच्छा पूरा करने का इजाजत दिया। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-4.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-4.jpg" alt="" width="2037" height="1340" class="aligncenter size-full wp-image-7598" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-4.jpg 2037w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-4-300x197.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-4-1024x674.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-4-768x505.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-4-1536x1010.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2037px) 100vw, 2037px" /></a></p>
<p><strong>15 जुलाई, 2006 को तारीख मुक़र्रर हुआ। इस तारीख को एपीजे अब्दुल कलाम (तत्कालीन राष्ट्रपति) के अलावे, भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, भारत रत्न पंडित रवि शंकर, भारत रत्न अमर्त्य सेन, भारत रत्न लता मंगेशकर और भारत रत्न एमएस शुभलक्ष्मी को कुछ समय के लिए ही सही, इंडिया गेट पर अंकित हुतात्माओं के साथ-साथ भारत की जंगे आज़ादी में अपने प्राणों को अर्पित करने वाले शहीदों को शहनाई सम्राट के समर्पण घुन के समय उनकी उपस्थिति के लिए प्रर्थना कर रहा था। बात बिस्मिल्लाह खान की अंतिम अभिलाषा की थी।</strong> </p>
<p>अप्रैल, 2006 में लता मंगेशकर तक पहुँचने के लिए एक दिन फोन किया ताकि मुंबई पहुंचकर उनसे प्रार्थना कर सकूँ। फोन की घंटी चार बार बजी थी &#8211; ट्रिंग-ट्रिंग-ट्रिंग-ट्रिंग &#8211; पांचवी बार बजने से पूर्व दूसरे छोड़ से आवाज आयी &#8220;हेलो!!!!&#8221; मैं समझ गया था की यह आशा भोसले की आवाज है। इससे पहले कि मैं कुछ कहूं, वे कहती हैं: &#8220;मैं आशा बोल रहीं हूँ, बताएं &#8230;&#8221; मैं फोन पर ही चरण स्पर्श करते अपनी बात उनसे कहा। वे फिर कहती हैं कि &#8216;आपकी चिठ्ठी भी आयी है। दीदी उसे देखी भी हैं। तब तक लता जी फोन पर आयी और कहीं कि &#8220;उस महीने में दिल्ली में बहुत गर्मी होती है, इसलिए मेरे लिए यह संभव नहीं है कि मैं आ सकूँ । मेरी शुभकामनाएं हैं कि खान साहब के निमित्त आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम सफल हो, ऐतिहासिक हो।&#8221; फिर मई महीना के मध्य में 11 मई 2006 को लिखा एक पत्र प्राप्त हुआ &#8211; Your Sincerely, Lata Mangeshkar, </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-5-1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-5-1.jpg" alt="" width="1701" height="2297" class="aligncenter size-full wp-image-7600" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-5-1.jpg 1701w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-5-1-222x300.jpg 222w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-5-1-758x1024.jpg 758w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-5-1-768x1037.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-5-1-1137x1536.jpg 1137w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-5-1-1517x2048.jpg 1517w" sizes="(max-width: 1701px) 100vw, 1701px" /></a></p>
<p>आज जब आशा भोसले अंतिम सांस ली तो दो दशक पूर्व का वह टेलीफोनिक वार्ता याद आ गया। किस्ती सहृदय थी आप आशा जी। </p>
<p>बहरहाल, साल 1955 में ख़्वाजा अहमद अब्बास &#8211; वी.पी. साठे के कहानी पर राज कपूर-नरगिस-ललिता पवार-नादिरा अभिनीत और राज कपूर के निर्देशन में फिल्म आयी थी &#8216;श्री 420&#8217; और उस फिल्म में  एक मधुर गीत था। उस गीत के गीतकार थे शैलेन्द्र, संगीतकार थे शंकर-जयकिशन और गया था  आशा भोसले तथा मन्ना डे। गीत के बोल थे:</p>
<p><em>मुड-मुड के ना देख, मुड-मुड के <br />
मुड-मुड के ना देख, मुड-मुड के<br />
मुड-मुड के ना देख, मुड-मुड के<br />
मुड-मुड के ना देख, मुड-मुड के<br />
नैना से नैना जो मिला के देखे<br />
मौसम के साथ मुस्कुरा के देखे<br />
दुनिया उसी की है जो आगे देखे<br />
नैना से नैना जो मिला के देखे<br />
मौसम के साथ मुस्कुरा के देखे<br />
दुनिया उसी की है जो आगे देखे, होए!</em></p>
<p>आज आशा भोसले की आवाज भी शांत हो गयी &#8211; संगीत से नैना मिलाते, मौसम के साथ मुस्कुराते आशा ताई दुनिया से आगे निकल गयी। आशा भोसले, जो न केवल अपनी बहन की महानता की छाया में रहीं, बल्कि अपनी अनोखी आवाज़ के दम पर उस छाया से बाहर निकलकर हिंदी पार्श्व गायन की दुनिया में अपना एक अलग मुकाम बनाया, का आज निधन हो गया। वह 92 वर्ष की थीं। मंगेशकर बहनों में से एक, आशा &#8211; जिनकी बहुमुखी प्रतिभा की तुलना उनकी अपनी बहन से भी नहीं की जा सकती थी &#8211; को शनिवार शाम सीने में संक्रमण और अत्यधिक थकान के कारण ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। यह जानकारी उनकी पोती ज़नाई भोसले ने दी। </p>
<p>जिस दिन श्री 420 फिल्म के लिए आशा भोंसले और मन्ना डे इस गीत को गायी थी, वे महज 22-वर्ष की थी। इस गीत को गाने से छः वर्ष पूर्व 1949 में 16 वर्ष की आयु में गणपतराव भोसले से उनका विवाह हुआ था। बाद में अपने सहयोगी व संगीतकार आर.डी. बर्मन से शादी की। आशा भोसले अपने पीछे अपने बेटे आनंद और अपने पोते-पोतियों को छोड़ गई हैं।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-2.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7601" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>भोसले ने विभिन्न भारतीय भाषाओं में 12,000 से अधिक गाने रिकॉर्ड किए और पद्मिनी एवं वैजयंती माला जैसी दक्षिण भारतीय अभिनेत्रियों से लेकर मीना कुमारी, मधुबाला, जीनत अमान, काजोल और उर्मिला मातोंडकर सहित कई प्रमुख अभिनेत्रियों को अपनी आवाज दी। उन्होंने 2023 में अपने जन्मदिन के उपलक्ष्य में दुबई में आयोजित एक विशेष संगीत कार्यक्रम &#8216;आशा 90: लाइव इन कॉन्सर्ट&#8217; में प्रस्तुति दी थी।</p>
<p>आशा भोसले, जिन्होंने अपनी गायकी से श्रोताओं को &#8220;आजा, आजा&#8221; गाने पर थिरकने पर मजबूर कर दिया, ठीक उतने ही कुशलता से उन्होंने &#8220;चैन से हमको कभी&#8221; गाने के ज़रिए श्रोताओं को बिछड़े प्यार का मातम मनाने पर भी विवश किया। आशा और उनकी बहन लता ने सात दशकों तक हिंदी पार्श्व गायन की दुनिया पर राज किया; इस दौरान बॉलीवुड में नायिकाओं के लिए रिकॉर्ड किए गए लगभग हर गाने में इन्हीं दोनों की आवाज़ का इस्तेमाल किया गया। </p>
<p><strong>आशा भोसले का पहला गाना 1943 में, जब वह केवल 10 वर्ष की थीं, मराठी फ़िल्म &#8220;माझा बाल&#8221; के लिए रिकॉर्ड किया गया था। उन्होंने 2010 के दशक के अंत तक और उसके बाद भी गायन जारी रखा, जिससे वह वैश्विक संगीत इतिहास में सबसे लंबे समय तक सक्रिय रहने वाली गायिकाओं में से एक बन गईं। आठ दशकों से अधिक लंबे करियर में आशा भोसले अपनी बहुमुखी प्रतिभा के लिए जानी जाती थीं। उन्होंने रोमांटिक गीतों से लेकर गजलों तक कई यादगार नगमे गाए। साथ ही कई ऐसे गीत भी गाए, जिन्होंने लोगों को थिरकने के लिए मजबूर कर दिया। आशा के सबसे मशहूर गानों में &#8220;अभी न जाओ छोड़ कर&#8221;, &#8220;इन आँखों की मस्ती&#8221;, &#8220;दिल चीज़ क्या है&#8221;, &#8220;पिया तू अब तो आजा&#8221;, &#8220;दुनिया में लोगों को&#8221; और &#8220;ज़रा सा झूम लूँ मैं&#8221; जैसे गाने शामिल हैं। </strong></p>
<p>लता का निधन छः फरवरी 2022 को 92 वर्ष की आयु में निधन हुआ था। और आशा भोसले भी 12 अप्रैल, 2026 को 92 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। जहाँ एक ओर, सुरों और ग़ज़लों के उस्ताद संगीत निर्देशक मदन मोहन की पहली पसंद लता थीं, वहीं आशा भी इस विधा में उतनी ही पारंगत थीं। आज भी उन्हें फ़िल्म &#8220;उमराव जान&#8221; में गाई गई अपनी ग़ज़लों के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है। इस फ़िल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। </p>
<p>लेकिन उन्होंने अपनी एक अलग पहचान भी बनाई; पहले उन्होंने ओ.पी. नैयर के साथ मिलकर उनके लयबद्ध और जोशीले गानों में काम किया, और बाद में आर.डी. बर्मन के साथ ऐसे गाने गाए जो कैबरे, रोमांस, दर्द और हर तरह के जज़्बाती अंदाज़ से प्रेरित थे।फिर भी, उन दोनों बहनों के बीच कभी कोई आपसी होड़ या जलन नहीं दिखी, जिन्होंने भारत के गायन जगत में लगभग एक बराबर ऊँचा मुकाम हासिल किया था। </p>
<p><strong>पद्म विभूषण और दादा साहब फाल्के से सम्मानित से सम्मानित आशा भोसले को कार्डियक अरेस्ट के साथ-साथ फेफड़ों से जुड़ी कुछ समस्याएं भी थीं, जिसके कारण उनकी मृत्यु हो गई। अस्पताल की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, आशा ताई को कार्डियक अरेस्ट और सीने में इन्फेक्शन की शिकायत के बाद कल अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिवार के अनुसार, कल सुबह 11 बजे लोअर परेल स्थित उनके निवास ‘कासा ग्रैंड’ में अंतिम दर्शन के लिए पार्थिव शरीर रखा जाएगा, जहां लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे सकेंगे। इसके बाद शाम 4 बजे मुंबई के शिवाजी पार्क में उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा।</strong></p>
<p>मशहूर गायिका आशा भोसले के बेटे आनंद भोसले ने कहा, &#8216;मेरी मां का आज निधन हो गया। लोग कल सुबह 11 बजे लोअर परेल स्थित कासा ग्रैंड में उन्हें अपनी अंतिम श्रद्धांजलि दे सकते हैं, जहां वे रहती थीं। उनका अंतिम संस्कार कल शाम 4 बजे शिवाजी पार्क में किया जाएगा।&#8217; शुरुआती सूचनाओं में दावा किया गया कि आशा भोसले को हार्ट अटैक हुआ था, पर बाद में पोती ने इसका खंडन किया और छाती में इंफेक्शन की बात बताई थी। बाद में आशा भोसले को डॉक्टरों ने मल्टिपल ऑर्गन फेलियर के कारण मृत घोषित कर दिया। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7602" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aasha-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>8 सितंबर, 1935 को सांगली (महाराष्ट्र) में जन्मी आशा को संगीत की शुरुआती तालीम उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर से मिली थी, ठीक वैसे ही जैसे उनकी बहन को मिली थी। शायद संगीत ही उनकी किस्मत में लिखा था। चार बहनों में से लता, उषा और आशा तो पार्श्व गायिकाएँ बनी, जबकि मीना एक संगीतकार हैं। उनके भाई हृदयनाथ मंगेशकर भी एक संगीतकार हैं। कई पुरस्कारों से सम्मानित आशा एक सफल उद्यमी भी थीं; उन्होंने दुबई और ब्रिटेन में &#8216;आशा&#8217; नाम से एक लोकप्रिय रेस्टोरेंट भी चलाया। उन्हें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार, पद्म विभूषण, राष्ट्रीय पुरस्कार और संगीत जगत के कई अन्य प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया।</p>
<p>आशा भोसले ने एक साल पहले अमृता राव और आरजे अनमोल के पॉडकास्ट में अपनी आखिरी इच्छा के बारे में बताया था। आशा भोसले ने कहा था कि वह अपने आखिरी पल गाते हुए बिताना चाहती हैं क्योंकि उन्हें गाना बहुत पसंद है।आशा भोसले पब्लिकली बेहद कम नजर आती थीं, पर लगातार म्यूजिक प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही थीं। वह आखिरी बार 5 मार्च 2026 को मुंबई में सचिन तेंदुलकर के बेटे क्रिकेटर अर्जुन तेंदुलकर और सानिया चंडोक की शादी में नजर आई थीं।</p>
<p><strong>बहरहाल, दिग्गज गायिका और संगीत जगत की महान हस्ती आशा भोसले के निधन से पूरे फिल्म जगत में शोक की लहर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आशा भोसले के निधन पर शोक जताया। उन्होंने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आशा भोसले के निधन पर गहरा शोक जताया है। उन्होंने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा-&#8216;भारत की सबसे मशहूर और बहुमुखी आवाज़ों में से एक, आशा भोसले जी के निधन से मैं बहुत दुखी हूं। दशकों तक चली उनकी असाधारण संगीत यात्रा ने हमारी सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध किया और दुनिया भर में अनगिनत दिलों को छुआ। चाहे उनकी दिल को छू लेने वाली धुनें हों या उनकी जोशीली रचनाएं, उनकी आवाज़ में हमेशा एक बेमिसाल चमक रही। उनके साथ हुई मेरी मुलाक़ातों की यादें मैं हमेशा संजोकर रखूंगा।</strong></p>
<p><strong>उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ</strong> ने आशा भोसले के निधन को कला और संगीत जगत की अपूरणीय क्षति बताया है। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा-&#8216;भारतीय संगीत जगत की सुर साम्राज्ञी, सुरों की महान उस्ताद, &#8216;पद्म विभूषण&#8217; आशा भोसले जी का निधन बहुत दुखद है और कला की दुनिया के लिए एक ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती। उनकी बेमिसाल गायकी ने भारतीय संगीत को नई ऊंचाइयां दीं। उनकी मीठी धुनें हमेशा देश के लोगों के दिलों में गूंजती रहेंगी। मैं भगवान श्री राम से प्रार्थना करता हूं कि दिवंगत आत्मा को शांति मिले, और शोकाकुल परिवार और चाहने वालों को यह बहुत बड़ा दुख सहने की शक्ति मिले। ॐ शांति!</p>
<p>अक्षय कुमार से लेकर करण जौहर तक कई बड़ी हस्तियों ने उनके निधन पर शोकर जाहिर किया है। रविवार को 92 वर्ष की उम्र में आशा भोसले का निधन हो गया। उनका इलाज करने वाले चिकित्सकों की टीम में शामिल डॉ. प्रतीत समदानी ने बताया कि उनके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। भोसले को शनिवार शाम सीने में संक्रमण और कमजोरी के चलते मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनकी पोती जनाई भोसले ने एक मीडिया पोस्ट में यह जानकारी साझा की थी। अक्षय कुमार ने एक्स पर लिखा, &#8220;आशा भोसले जी के जाने से मुझे जो नुकसान हुआ है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। उनकी सुरीली आवाज हमेशा हमेशा के लिए अमर रहेगी। ओम शांति&#8221;</p>
<p>फिल्म निर्माता मधुर भंडारकर ने कहा, &#8220;मुझे बहुत दुख है कि आशा ताई, एक सिंगर जो दुनिया भर में इतनी मशहूर थीं और जिन्होंने इतने गाने गाए, अब हमारे बीच नहीं रहीं। उन्होंने इतने सालों में कई पीढ़ियों को इंस्पायर किया। एक फिल्ममेकर के तौर पर, मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला। उन्होंने फिल्मों में कई गाने गाए&#8230;उनकी कमी खलेगी।&#8221;</p>
<p>लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने कहा, &#8220;हमारे दिलों पर राज करने वाली आशा ताई अब नहीं रहीं। यह सोचना भी बहुत दुख देता है कि अब हम उनके बिना रह जाएंगे। आशा ताई ने बहुत बड़ी विरासत बनाई। एक बड़े बरगद के पेड़ के नीचे नई पहचान बनाना आसान नहीं होता। लेकिन आशा ताई ने लता जी से पहले गाया। और उन्होंने क्या गायकी की! उन्होंने अपनी काबिलियत साबित की&#8230;मुझे लगता है, अपने गानों से उन्होंने एक एम्पायर बनाया और वह दुनिया भर के कला प्रेमियों के दिलों पर राज करती रहेंगी।&#8221;</p>
<p>ममता बनर्जी ने आशा भोसले के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया और उन्हें &#8220;संगीत जगत की महान हस्ती&#8221; करार देते हुए पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बताया। बनर्जी ने &#8216;एक्स&#8217; पर अपने संदेश में कहा, &#8220;संगीत जगत की महान हस्ती आशा भोसले के निधन से गहरा दुख हुआ है। वह एक ऐसी प्रेरणादायी और मंत्रमुग्ध कर देने वाली गायिका थीं, जिन्होंने पीढ़ियों तक हमारे दिलों पर राज किया।&#8221; </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/legendary-singer-asha-bhosle-died-at-92">&#8220;​नैना से नैना जो मिला के देखे &#8211; मौसम के साथ मुस्कुरा के देखे &#8211; दुनिया उसी का है जो आगे देखे&#8221; &#8211; नमन आपको आशा ताई</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>कहते हैं श्रीमती शारदा सिन्हा अपने गीतकारों, शब्दकारों को वह सम्मान नहीं दीं, मदद का हाथ नहीं बढ़ायीं जिसका वे सभी हकदार थे 😢 आपको नमन शारदाजी 🙏</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 07 Nov 2024 10:21:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[folksongs]]></category>
		<category><![CDATA[lyrists]]></category>
		<category><![CDATA[music]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / दरभंगा / समस्तीपुर / इण्डिया गेट (नई दिल्ली): सत्तर के दशक के उत्तरार्ध से जिन शब्दों को, जिनके शब्दों को गा-गा कर श्रीमती शारदा सिन्हा संगीत की दुनिया में उत्कर्ष पर पहुंचीं, पद्मश्री, पद्मभूषण नागरिक सम्मान से अलंकृत हुई, देशज से विदेशज समागम में श्रोताओं के बीच अपना हस्ताक्षर की, उन गीतों के [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / दरभंगा / समस्तीपुर / इण्डिया गेट (नई दिल्ली):  सत्तर के दशक के उत्तरार्ध से जिन शब्दों को, जिनके शब्दों को गा-गा कर श्रीमती शारदा सिन्हा संगीत की दुनिया में उत्कर्ष पर पहुंचीं, पद्मश्री, पद्मभूषण नागरिक सम्मान से अलंकृत हुई, देशज से विदेशज समागम में श्रोताओं के बीच अपना हस्ताक्षर की,  उन गीतों के शब्दकारों को, गीतकारों को, लेखकों को कभी वे आर्थिक मदद के लिए न हाथ पकड़ीं और ना ही, उस उनके शब्दों के सम्मान को सार्वजनिक की, होने दीं, जिसका वे सभी शब्दकार हकदार थे &#8211; चाहे श्री कपिल देव ठाकुर &#8216;स्नेहलता&#8217; हों, चाहे डॉ. नरेश कुमार &#8216;विकल&#8217; हों चाहे ह्रदय नारायण झा हों &#8211;  सच तो यही है।</strong></p>
<p>शारदा सिन्हा 2018 से मल्टिपल मायलोमा से जूझ रही थीं। यह एक तरह का ब्लड कैंसर है। इसमें बोन मैरो में प्लाज्मा सेल अनियंत्रित तरीक़े से बढ़ने लगता है और इससे हड्डियों में ट्यूमर्स बनने लगता है। श्रीमती सिन्हा का जीवन कल छठ पर्व के प्रारंभिक दिवस को सूर्योदय के साथ सूर्यास्त हो गया । आपको नमन और श्रद्धांजलि श्रीमती शारदा सिन्हा जी। </p>
<p>बहरहाल, कहानी को आगे बढ़ाते हैं। आज से साढ़े अट्ठारह वर्ष पहले (11-05-2006) को लता मंगेशकर की एक चिठ्ठी आयी। वह चिट्ठी मेरी चिट्ठी का और दूरभाष पर की गई बातों का जबाब था। उस वर्ष मार्च के महीने में भारत रत्न शहनाई उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अपने जीवन के अंतिम वसंत में मृत्यु से पहले दिल्ली के इण्डिया गेट परिसर में शहनाई वादन करना चाहते थे, कुछ पल के लिए ही सही।</p>
<p>उनकी इच्छा थी कि शहनाई वादन से, शहनाई के घुन से देश की आज़ादी में अपने प्राणों को उत्सर्ग करने वाले सभी हुतात्माओं को, शहीदों को आमंत्रित करें। वे यह नहीं जानते थे कि इण्डिया गेट पर भारतीय स्वाधीनता संग्राम के शहीदों का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं है, लेकिन जिनके भी नाम अंकित हैं, उनकी आत्मा को कुछ पल स्वतंत्र भारत की राजधानी दिल्ली की ह्रदय में, इण्डिया गेट परिसर में बैठाकर शहनाई सुनाकर पुनः स्वस्थानम गच्छ: करें। मैं बिस्मिल्लाह खान, उनकी शहनाई, डुमरांव, बनारस, गंगा आदि पर कार्य कर एक किताब बनाया था उन्हें उनके जन्मदिन पर प्रस्तुत करने के लिए। किताब का नाम था &#8216;मोनोग्राफ ऑन उस्ताद बिस्मिल्लाह खान।&#8217; सन 2006 के मार्च महीने के 21 तारीख को उनका 91 वां जन्मदिन था। </p>
<p>उनके जन्मदिन के दो सप्ताह पहले बनारस पर आतंकवादियों का प्रहार हुआ हो गया। संकटमोचन सहित कई स्थानों पर बम्ब फेंके गए थे। कई लोग हताहत हुए। कई अपने प्राणों को उत्सर्ग किये थे। बिस्मिल्लाह खान अपना जन्मदिन नहीं मनाये उस दिन। उनका कहना था कि &#8216;मेरा बनारस रो रहा है, फिर मैं जन्मदिन कैसे मनाऊं ?&#8217; वे ह्रदय से बोल रहे थे। उनकी आखों से आंसू निकल रहे थे। उनकी बात बनारस के बिश्वनाथ की बात थी। </p>
<p>जन्मदिन का कार्यक्रम 21 मार्च को रद्द हुआ और चार दिन बाद 25 मार्च को उनके घर के दूसरे तल्ले के छोटे से कमरे के बाहर बरामदा पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। उस दिन 91 किलो का केक बना था। दिल्ली के दरियागंज स्थित निहालसंस आभूषणालय से तीन किलो का चांदी की शहनाई लेकर गया था। साथ में सैकड़ों किताब जो लोगों को बांटना था। उस किताब का प्रकाशन एयरटेल के मालिक श्री सुनील मित्तल के सहयोग से हुआ था। बिस्मिल्लाह खान आये। उनका स्वागत सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक किये। अब तक कई सौ लोग उपस्थित हो गए थे। उस्ताद को तीन किलो चांदी की शहनाई, डेढ़ लाख रुपये हाथ में रखकर उन्हें जन्मदिन का मुबारकबाद दिया गया। वे केक भी खाये और आदेश भी दिए कि &#8216;देखना कोई छूट न जाए।&#8217;</p>
<p>वहां उपस्थित लोगों के बीचभारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान मेरी पत्नी श्रीमती नीना झा का हाथ पकड़कर कहे: &#8220;आप दरभंगा की बेटी और बहु दोनों हैं। आप मेरी एक इच्छा पूरी कर दें। मैं इण्डिया गेट पर शहनाई बजाना चाहता हूँ।&#8221; और फिर शुरू हो गया प्रयत्न। गृह मंत्रालय दशकों से कवर करने के कारण मंत्रालय में दिक्कत नहीं हुई। तत्कालीन गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल तत्काल आदेश दिए दिल्ली पुलिस को और 15 जुलाई को कार्यक्रम निर्धारित हुआ। इण्डिया गेट पर किसी भी कार्यक्रम के लिए लगा प्रतिबन्ध हटाया गया उस दिन। 15 जुलाई को भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के अलावे भारत रत्न अमर्त्य सेन (उनके बेटी के साथ आनंद बाजार पत्रिका समूह में कार्य किया था), भारत रत्न एपीजे अब्दुल कलाम (राष्ट्रपति), भारत रत्न सितार सम्राट पंडित रविशंकर, भारत रत्न लता मंगेशकर आदि की उपस्थित &#8216;प्रार्थित&#8217; थी।</p>
<blockquote><p>तभी 11-05-2006 को लता मंगेशकर की एक चिठ्ठी आयी जिसमें लिखा था : &#8220;As I already explained to you over phone I regret to state that due to extreme and unbearable heat in the north especially in New Delhi, it will not be possible for men to reach New Delhi for the above function in July 2006.&#8221; दिल्ली पुलिस और गृहमंत्रालय द्वारा आदेशित तिथि 15 जुलाई, 2006 था। परन्तु कार्यक्रम नहीं हो सका उस्ताद की बिमारी के कारण और वे 21 अगस्त, 2006 को शहनाई को अपने सराय हरहा घर पर रखकर हेरिटेज अस्पताल में अंतिम सांस लिए। उस्ताद चुकि शहीदों के बारे में बात किये थे, यहीं से भारतीय स्वाधीनता संग्राम के गुमनाम क्रांतिकारियों, शहीदों के आज के वंशजों की खोज प्रारम्भ हुई। अब तक 75 वंशजों को ढूँढना और छह किताबों से छह का जीवन बदलना, तीन का विवाह कराना राष्ट्रीयता का एक जीवन दृष्टं है &#8211; यह मैं समझता हूँ।</p></blockquote>
<p>लता मंगेशकर की चर्चा यहाँ इसलिए कर रहा हूँ कि बहुत बड़ा कलाकार होना और कलाकार का दूसरों के साथ आत्मीय होना, उसकी भावना का कद्र करने में फर्क होता है। ऐसी बहुत सारी बातें शारदा सिन्हा जी के साथ भी थी । आज न लता मंगेशकर हैं और शारदा सिन्हा भी अंतिम सांस ले ली हैं, लेकिन अपने जीवन में उन्मुख होने, बढ़ने के क्रम में शारदा सिन्हा उन सभी लोगों का हाथ नहीं पकड़ीं जिनके शब्दों को स्वर देकर संगीत की दुनिया में नाम कमायीं। यह शब्द पढ़ने, सुनने में बहुत कष्टकारक है, बिहार ही नहीं संगीत की दुनिया के लोगों कर्णप्रिय और पठनीय नहीं लगेगा, लेकिन यह सत्य है। आज पटना में जो सत्तर-अस्सी के ज़माने के लोग जीवित होंगे, जिन्होंने शारदा सिन्हा को मंच दिए, उनके लिए शब्दों का विन्यास किये, गीत के बोल लिखे &#8211; हमसे बेहतर जानते हैं। </p>
<p>आइये पटना जंक्शन से ऐतिहासिक गाँधी मैदान की ओर जाने वाली सड़क मजहरुल हक़ पथ (फ़्रेज़र रोड) के रास्ते भारतीय नृत्य कला मंदिर महुँचते हैं। उन दिनों नृत्य कला मंदिर में प्रवेश के लिए आकाशवाणी, पटना के मुख्य प्रवेश द्वार से जाना होता था। वैसे सन 1975 में भारतीय नृत्य कला मंदिर ही नहीं, पटना का यह पूरा हिस्सा जलमग्न हो गया था, लेकिन अभी हम उसे हादसे से तीन साल पहले चलते हैं। सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्ष (1971-72) में भारतीय नृत्य कला मंदिर में एक कार्यक्रम था। </p>
<figure id="attachment_5837" aria-describedby="caption-attachment-5837" style="width: 1197px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/sharda-sinha2-fotor.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/sharda-sinha2-fotor.jpg" alt="" width="1197" height="684" class="size-full wp-image-5837" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/sharda-sinha2-fotor.jpg 1197w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/sharda-sinha2-fotor-300x171.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/sharda-sinha2-fotor-1024x585.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/sharda-sinha2-fotor-768x439.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1197px) 100vw, 1197px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5837" class="wp-caption-text">शारदा सिन्हा उन दिनों</figcaption></figure>
<p>उस दिन से पूर्व तक <strong>शारदा सिन्हा</strong> को &#8216;संभवतः&#8217; बिहार के लोग या पटना के लोग नहीं जानते थे। उस कार्यक्रम के कर्ताधर्ता थे श्री जयनाथ मिश्र। श्री मिश्र पटना के मछुआ टोली (आर्य कुमार रोड) में रहते थे। राजेंद्र नगर की दिशा से जब आर्य कुमार रोड में प्रवेश करते है, दाहिने हाथ दिनकर भवन (राष्ट्रकवि रामधारी सिंह &#8216;दिनकर&#8217;) और श्री छवि नाथ पाण्डे के घरों के बीच से जाती गली के अंतिम सिरे पर श्री जयनाथ मिश्र का घर (था) आज भी हैं। इस घर के पहले श्री तारा नंद झा का घर है। इसी घर में मैं अपना बचपन जिया हूँ। श्री मिश्र बिहार के मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र के ससुर थे।</p>
<p>अनेकों गणमान्यों के कहने पर जयनाथ मिश्र शारदा सिन्हा को कुछ काल के लिए मंच देने को तैयार हुए। यह भी कह सकते हैं कि इस मंच के माध्यम से शारदा सिन्हा की एक संगीत परीक्षा का आयोजन किया गया था। उन दिनों शारदा सिन्हा की आयु 22 वर्ष रही होगी। उस कार्यक्रम में शारदा सिन्हा की प्रस्तुति सभी ने सराहा। जयनाथ मिश्र चेतना समिति के अध्यक्ष थे। अलावे वैदेही कला केंद्र के कर्ता-धर्ता कमलनाथ सिंह ठाकुर सभी कर्त्ता धर्ता को उनकी प्रस्तुति अच्छा लगा । वजह भी था &#8211; उन दिनों बिहार में कोई भी महिला कलाकार नहीं थी या कोई भी महिला &#8216;गीत-नाद&#8217; को अपने जीवन का प्रमुख अंग नहीं बना पायी थी। ​यह कार्यक्रम महाकवि विद्यापति पर ग्रामोफोन कंपनी एचएमवी द्वारा बनाये गए कैसेट का उद्घाटन के लिए आयोजित किया गया था। </p>
<p>इस कार्यक्रम के बाद पटना आकाशवाणी के <strong>श्री छत्रानन्द सिंह झा यानी बटुक भाई (अब दिवंगत), श्री गौरी कांत चौधरी &#8216;कान्त&#8217; यानी &#8216;मुखिया जी&#8217;</strong> शारदा जी को कवि कोकिल विद्यापति के सम्मान में आयोजित होने वाला वार्षिक चेतना समिति कार्यक्रम के मंच के तरफ आने को कहा। चेतना समिति बिहार का एक मात्र मंच था जहाँ कलाकारों को आगे बढ़ने का मौका मिलता था। चेतना समिति के प्रथम अध्यक्ष थे बाबा नागार्जुन। इससे पूर्व चेतना समिति वैदेही कला केंद्र के नाम से जाना जाता था।  </p>
<p>उन दिनों पटना से प्रकाशित अख़बारों में लिखने वालों में प्रमुख थे श्री भाग्य नारायण झा, श्री काली कांत झा (आर्यावर्त), श्री जीवन मोय दत्त, श्री कृष्णा नंद सिंह (इण्डियन नेशन) जिन्होंने इनके बारे में बहुत लिखे। लेकिन दुर्भाग्य की बात उन दिनों से ही रही की शारदा सिन्हा के गीतों के लेखकों को कभी वह सम्मान नहीं मिला, उन लोगों को कभी भी सार्वजनिक रूप से आगे नहीं आने दिया गया, अख़बारों में उनके बारे में नहीं लिखा गया जो शब्दों को चुनते, बुनते, विन्यास कर शारदा सिन्हा के मुख तक पहुंचते थे।</p>
<p>उन दिनों के गीतकारों में<strong> श्री कपिल देव ठाकुर &#8216;स्नेहलता&#8217;, डॉ. नरेश कुमार &#8216;विकल&#8217;,श्री हृदयनारायण झा</strong> प्रमुख रहे। लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि तत्कालीन पत्रकारों ने भी इन गीतकारों को शारदा सिन्हा की सफलता के पीछे खड़ा स्तम्भ नहीं समझें। &#8216;विकल&#8217; जी स्वयं मैथिली साहित्य के धनुर्धर थे, साथ ही पत्रकार भी थे। आर्यावर्त. मिथिला मिहिर में प्रदेश के नामी-गरामी लोगों, यहाँ तक कि पत्रकारों, सम्पादकों का अन्तर्वीक्षा लेकर उन्हीं के अख़बारों में, पत्रिकाओं में प्रकाशित करते थे। आर्यावर्त में श्री हीरानंद झा &#8216;शास्त्री&#8217; और मिथिला मिहिर के श्री सुधांशु शेखर चौधरी का अन्तर्वीक्षा उन दिनों काफी प्रमुखता से प्रकाशित हुआ था। खैर। </p>
<figure id="attachment_5838" aria-describedby="caption-attachment-5838" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Vikal-ji.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Vikal-ji.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-5838" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Vikal-ji.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Vikal-ji-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Vikal-ji-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Vikal-ji-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Vikal-ji-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5838" class="wp-caption-text">डॉ विकल जी</figcaption></figure>
<p><strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> से बात करते हुए <strong>डॉ. नरेश कुमार &#8216;विकल&#8217;</strong> कहते हैं &#8220;साल सन 1979 था शारदा जी वहां आयी और मैं महिला कालेज, समस्तीपुर में एक साल बाद सं 1980 । शारदा जी इस कालेज से पहले भी विभिन्न कार्यक्रमों के दौरान मुलाकात हुई थी, एक दूसरे को जानते थे, लेकिन कालेज आने के बाद सम्बन्ध में प्रगाढ़ता बड़ी। संगीत और कला से सम्बंधित महाविद्यालय अथवा बाहर जहाँ भी कोई कार्यक्रम का आयोजन होता था, प्राचार्य महोदय मुझे ही संयोजन बना देते थे। संगीत से सम्बंधित जो भी अभ्यास / रियाज की बात होती थी, मेरी उपस्थिति अवश्य होती थी। </p>
<p>सन 1980 में आकाशवाणी के श्री बटुक भाई शारदा जी को चेतना समिति में मंच दिए। उन दिनों श्री बटुक भाई आकाशवाणी के &#8220;चौपाल&#8221; कार्यक्रम में तो कार्य करते ही थे, चेतना समिति में भी उद्घोषक होते थे। उनकी भाषा, शब्दों में मधुरता श्रोताओं को बाँध कर रखता था। चेतना समिति का मंच, वैसे तो मैथिली भाषा-भाषियों का था, लेकिन उस कालखंड में  एक ऐसा मंच था  जो सैकड़ों कलाकारों को अवसर देकर आगे बढ़ाया था। शारदा जी भी उन कलाकारों में एक थीं। </p>
<blockquote><p>विकल जी आगे कहते हैं: &#8220;अस्सी के दशक में पटना ही नहीं, बिहार के अनेकानेक मंचों से दर्जनों छठ का गीत गया गया। वैसे शारदा जी के द्वारा बनाये गए कैसेट्स में मेरे गीतों की संख्या बहुत अधिक नहीं है, लेकिन अपने जीवन काल में वे मंच से जितना भी गीत गायी, मेरे शब्द थे। नब्बे के दशक में दिल्ली में एक संगीत समारोह हो रहा था। शारदा जी दिल्ली में थी। समारोह में शारदा जी को फगुआ (होली) गीत गाना था। लेकिन तत्काल होली का गीत नहीं था। शारदा जी फोन कर कहीं कि जल्दी एक गीत लिख दें। हम गीत लिखें। धुन बनाये। फोन पर ही उन्हें धुन सुनाया, फिर रियाज़ कराया, फिर उसे फैक्स किया। लेकिन हम तो कहीं रहे ही नहीं। सामा-चकेवा का दो गीत हमने लिखा। &#8220;खेलs चलली भौजी संग सहेली भैय्या जीवsहो&#8221;, &#8220;चुगला-चुगली&#8221;  हमने लिखा। लेकिन कभी भी, किसी भी कार्यक्रम में, मंच से वे सार्वजनिक रूप से गीतकारों का नाम नहीं ली। स्वाभाविक है कि श्रोता गायक को ही गीतकार भी समझेंगे। उनके संगीत जीवन में जितने भी गीतकार हुए, सबों का यही हश्र हुआ।&#8221; </p></blockquote>
<p>यह सच है कि 1 अक्टूबर 1952 को जन्मी शारदा की मातृभूमि के देहाती खेतों से लेकर पहचान के भव्य मंच तक की यात्रा उनके अटूट समर्पण और असाधारण प्रतिभा का प्रमाण है। बेगूसराय जिले के सिहमा गांव में रहने वाले उनके ससुराल वालों के कारण, उन्हें छोटी उम्र से ही इस क्षेत्र की समृद्ध संगीत परंपराओं से परिचित कराया गया था। संगीत के साथ उनका लगाव तब शुरू हुआ जब उन्होंने अपने घर के हरे-भरे परिदृश्यों में गूंजने वाले दिल को छू लेने वाले मैथिली लोकगीतों को अपनी आवाज़ दी। यह एक संगीत यात्रा की शुरुआत थी।  लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उनके जीवन काल में उनकी सांस्कृतिक यात्रा के दौरान जिन-जिन शब्दकारों ने, गीतकारों ने उनका साथ दिए, उनके लिए शब्दों को सजाये, गीत लिखे, गीत-राग बनाये, शारदा सिंह उन्हें उनका यथोचित सम्मान (आर्थिक मदद की बाद नहीं करेंगे) नहीं दे पायी। </p>
<p>यह भी सच है कि <strong>&#8220;द्वार के छेकाई देके पहिले चुकइयौ हे दुलरुआ भैया &#8211; तब जहियौ कोहबर अपन, हे दुलरुआ भैया&#8221;</strong> गीत से शारदा सिन्हा मैथिली-भोजपुरी संगीत की दुनिया में उत्कर्ष पर पहुंची, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यह गीत समस्तीपुर जिले के दरोड़ी गाँव के <strong>श्री कपिलदेव ठाकुर &#8216;स्नेहलता&#8217; जी</strong> की कीर्त्ति है। श्री स्नेहलता का जन्म 1909 में हुआ और वे अपने जीवन का अंतिम सांस 1993 में लिए।</p>
<p>उन्होंने अपने जीवन काल में विवाह, संकीर्तन, विनय पदावली, शिववाणी, चेतावनी, झूला-संकीर्तन, सीतावतरण प्रबन्धकाव्य आ स्नेहशतक- दोहावली-कवित्त आदि मिथिला की महिला वर्ग और संकीर्तनकार के कंठ मे परिव्याप्त है। आज भी लोकमंगलक अनुष्ठानों में व्यापक रूप से उनकी कीर्तियाँ व्यवहृत है। सम्मानित स्नेहलता जी का  &#8220;वैदेही विवाह&#8221; मिथिला की  कीर्तनिया नाट्य परम्परा के लोकरुचि के अनुसार है। यह भी कहा जाता है कि स्नेहलता मिथिला के भक्त कवियों में सर्वोपरी रहे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/yoganand-jha.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/yoganand-jha.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-5839" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/yoganand-jha.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/yoganand-jha-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/yoganand-jha-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/yoganand-jha-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/yoganand-jha-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>विगत दिनों साहित्य अकादमी द्वारा &#8216;स्नेहलता&#8217; पर एक &#8216;मोनोग्राफ&#8217; भी निकला गया है जिसके रचयिता हैं डॉ. योगानंद झा।  श्री झा मैथिली भाषा साहित्य हेतु प्रतिबद्ध लेखन एवं क्षेत्रानुसन्धान में निपुणता प्राप्त हैं। लोकजीवन और साहित्य, आलेख संचयन, मैथिली शक्त साहित्य, मोहन सेनापति, बिहार का लोक कथा, आदि लेखन के हस्ताक्षर हैं। सं 1998 से 2002 तक साहित्य अकादमी में मैथिली परामर्शदात्री समिति का सदस्य भी रहे। इसके अतिरिक्त पी सी राय चौधरी लिखित &#8216;दी फाँक टेल्स ऑफ़ बिहार ​का मैथिली में अनुवाद किये।</p>
<p>मैथिली साहित्य के हस्ताक्षर <strong>डॉ योगानंद झा</strong> से जब पूछा कि &#8216;स्नेहलता का योगदान मिथिला में साहित्य, संस्कृति, गीत, संगीत में अद्वितीय हैं। आप स्नेहलता पर मोनोग्राफ लिखे हैं। क्या शारदा सिन्हा जब स्नेहलता की रचनाओं का इस्तेमाल की थी, अपने संगीत के जीवन काल में कभी स्नेहलता को वह सम्मान या आर्थिक सहायता कि जिसके वे हकदार थे? डॉ. झा कुछ क्षण रुके, फिर कहें &#8216;मेरी जानकारी में शारदा जी दस गीतों को ली थी गाने के लिए। उन्हें कहा गया था की आप गा सकती हैं लेकिन उससे कोई आर्थिक लाभ नहीं हुआ या फिर कभी स्नेहलता का नाम भी नहीं लिया गया। कई मर्तबा उन्हें शब्दों को बदल दिया गया।&#8221;</p>
<p>शारदाजी  के कलात्मक योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता तब मिली जब उन्हें संगीत जगत में उनके असाधारण योगदान के लिए 1991 में प्रतिष्ठित पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके बाद 2018 में उन्हें पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो भारत का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक पुरस्कार है, जिसने संस्कृति और कला में उनके महत्व को और भी रेखांकित किया।  </p>
<p>कल जब शारदा जी अंतिम सांस लीं, उससे पूर्व प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे बात की थी और हर तरह की मदद का आश्वासन दिया था। संयोग है कि जिस छठ महापर्व के गीतों के लिए शारदा सिन्हा ज़्यादा जानी जाती हैं, उसी पर्व के दौरान उनका देहांत हुआ।  निधन पर शोक जताते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पोस्ट में लिखा है, &#8221;सुप्रसिद्ध लोक गायिका शारदा सिन्हा जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। उनके गाए मैथिली और भोजपुरी के लोकगीत पिछले कई दशकों से बेहद लोकप्रिय रहे हैं। आस्था के महापर्व छठ से जुड़े उनके सुमधुर गीतों की गूंज भी सदैव बनी रहेगी।  उनका जाना संगीत जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है।  शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं. ओम शांति!&#8221; </p>
<p>शारदा सिन्हा की गायकी करियर की शुरुआत 1970 के दशक में हुई थी। सिन्हा ने भोजपुरी, मैथिली और हिन्दी में कई लोकगीत गायी। उनकी गायकी में बिहार से पलायन और महिलाओं के संघर्ष को काफ़ी जगह मिली है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शोक जताते हुए कहा है, &#8221;शारदा सिन्हा के छठ महापर्व पर सुरीली आवाज़ में गाए मधुर गाने बिहार और उत्तर प्रदेश समेत देश के सभी भागों में गूंजा करते है। उनके निधन से संगीत के क्षेत्र में अपूरणीय क्षति हुई है।&#8221; लालू प्रसाद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती राबड़ी देवी और तेजस्वी प्रसाद यादव ने निधन पर गहरी शोक जताया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा है, &#8221;अपनी मधुर आवाज़ के लिए प्रसिद्ध लोक गायिका शारदा सिन्हा जी के निधन की ख़बर बेहद दुखद है। उनके शोकाकुल परिजनों एवं प्रशंसकों के ‌प्रति अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त करता हूं।&#8221;  </p>
<p>शारदा सिन्हा का जन्म साल 1953 में बिहार के सुपौल के हुलास गाँव में हुआ था। उनके पिता बिहार सरकार के शिक्षा विभाग में अधिकारी थे और उन्होंने उनमें गायकी के गुण देखने के बाद उसे सींचने का फैसला किया था। पिता सुखदेव ठाकुर ने 55 साल पहले दूरदर्शिता दिखाते हुए उन्हें नृत्य और संगीत की शिक्षा दिलवानी शुरू कर दी थी और घर पर ही एक शिक्षक आकर शारदा सिन्हा को शास्त्रीय संगीत की शिक्षा देने लगे थे. शारदा सिन्हा के 9 भाई-बहनों में सबसे बड़े वाले भाई का निधन हो चुका है। शारदा सिन्हा भाई-बहनों में सातवें नंबर पर थीं। उनके बाद दो और उनके छोटे भाई हैं। लोक गायिका शारदा सिन्हा की कहानी संघर्ष, संगीत और परिवार के रिश्तों की मिसाल है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Hriday-Narayan-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Hriday-Narayan-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-5840" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Hriday-Narayan-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Hriday-Narayan-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Hriday-Narayan-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Hriday-Narayan-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Hriday-Narayan-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>पिछले दो दशक से शारदा सिन्हा के साथ, उनकी  गायकी के साथ जुड़े बिहार सरकार  के संस्कृत अकादमी में सहायक पद से सहायक निदेशक के पद की दूरी तय कर अवकाश प्राप्त करने वाले <strong>श्री ह्रदय नारायण झा</strong> कहते हैं: &#8220;शारदा जी से मेरी मुलाक़ात पटना दूरदर्शन के एक कार्यक्रम में हुआ। उस समय टी -सीरीज का आगमन हो चूका था उनके जीवन में, जहाँ तक गीतों के रिकार्डिंग का सवाल है। मेरे कार्यों से से वे प्रभावित थी। उस समय एक गीत लिखा गया <strong>&#8220;सकल जगतारिणी हे छठि मैय्या &#8211; सभक शुभकारिणी हे छठि मैया&#8221;</strong>, जो काफी प्रसिद्धि प्राप्त किया। मधुबनी के रहने वाले गीतकार हृदय नारायण झा शारदा सिन्हा के लिए कुल 9 छठ गीत लिखे हैं, चार भोजपुरी गीत लिखे, पांच मैथिली गीत लिखे, तीन भोलेनाथ का गीत और तीन हिंदी गीत लिखे। </p>
<p>जिस छठ के गीत से शारदा सिन्हा को विश्वख्याति मिला, करीब 55 मिलियन श्रोता सुने &#8211; <strong>&#8220;पहिले पहिल हम कईनी, छठी मईया व्रत तोहार &#8211; करिहा क्षमा छठी मईया, भूल-चूक गलती हमार&#8221;</strong> के गीतकार भी हृदय नारायण झ। <strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> जब पूछा कि आप उनके जीवन काल में तक़रीबन दो दर्जन से अधिक गीतों का सृजन किये, शब्दों को सजाये, भाग-भंगिमा दिए, राज दिए; आपको उन गीतों को लिखने के लिए शारदा जी क्या दिए? आपके गीतों से शारदा जी पिछले दो दशक में कहाँ से कहाँ पहुंची? आप का हाथ आर्थिक रूप से, मानसिक रूप से पकड़ीं अथवा नहीं। आपको और आपके शब्दों को जो सार्वजनिक सम्मान मिलना चाहिए था, मिला या नहीं? वे मुस्कुराने लगे। लेकिन <strong>यह कहते भी नहीं रुके कि उन दिनों हम सभी नियमों  को नहीं जानते थे कि गीतकार भी कागज पर करारनामा बनता है।&#8221; </strong></p>
<p><strong>&#8220;दुखवा मिटाईं छठी मईया&#8221; </strong><जो शारदा सिन्हा के जीवन का आखिरी गीत है, इस गीत का गीतकार भी <strong>हृदय नारायण झा</strong> ही हैं। सोहर, समदाउन और न जाने कितने महत्वपूर्ण गीतों का सृजन किये ह्रदय से ह्रदय नारायण जी। उन्हीं गीतों में <strong>&#8220;कातिक मास इजोरिया सप्तमी तिथि आयल रे &#8211; ललना देव माता आदित्यक पुत्र आदित्य अवतरण ले लेलन हे&#8221;</strong>, लाखों-लाख, करोड़ों लोगों ने इन शब्दों को सुना। विश्व भर में शारदा जी की गायकी को सराहा गया। लेकिन शारदा जी कभी गीतकारों को सामने नहीं लायीं, उनके शब्दों के बारे में श्रोताओं को नहीं बतायीं &#8211; यह दुखद है। टी-सीरीज से एल्बम भी बना। स्वाभाविक है टी-सीरीज रॉयल्टी भी देता ही होगा। लेकिन (अपवाद छोड़कर) किसी भी गीतों के लिए, शब्दों के लिए, कभी भी गीतकार को वह सम्मान और सराहना नहीं मिला, जिसका वह कहदार था। आर्थिक लाभ की बात नहीं करें।</p>
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		<title>अपनी ही गलियों में गुमनाम हो गयी बीबी गौहर जान, &#8216;तवायफ़&#8217; से &#8216;वेश्या&#8217; कहने लगे लोग</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 13 May 2024 03:02:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[ajmeri gate]]></category>
		<category><![CDATA[bibi gauhar jaan]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[music]]></category>
		<category><![CDATA[old delhi]]></category>
		<category><![CDATA[tawayef]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पुरानी दिल्ली: अचानक पुरानी दिल्ली की एक ऐतिहासिक गली में मंदिर की घंटी के साथ भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में महात्मा गांधी का हाथ थामने वाली तवायफ़ बीबी गौहर जान के प्रति श्रद्धासुमन हेतु आँख डबडबा गयी। वहीँ  आज़ाद भारत के 76 वर्ष में ही उसी गली में, जो तवायफ बीबी गौहर जान के नाम से अंकित [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पुरानी दिल्ली: अचानक पुरानी दिल्ली की एक ऐतिहासिक गली में मंदिर की घंटी के साथ भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में महात्मा गांधी का हाथ थामने वाली तवायफ़ बीबी गौहर जान के प्रति श्रद्धासुमन हेतु आँख डबडबा गयी। वहीँ  आज़ाद भारत के 76 वर्ष में ही उसी गली में, जो तवायफ बीबी गौहर जान के नाम से अंकित है, वर्तमान समाज के लोगों की मानसिकता को देखकर, पढ़कर &#8216;आत्मा से अश्रुपूरित&#8217; हो गया । लाल किले से कोई दो किलोमीटर और ऐतिहासिक जामा मस्जिद से लगभग एक किलोमीटर अंदर गली में आज भी ऐतिहासिक हवेली गौहर जान की गाथाओं को अपने सीने पर, ईंट-पत्थरों पर गुदाये बैठी है। लेकिन उस गली में रहने वाले, उस रास्ते आवक-जावक करने वाले हज़ारों-लाखों लोग तवायफ गौहर जान को &#8216;वेश्या&#8217; कहते नहीं थकते। हकीकत यह है कि वे उसी हवेली की साया में संभवतः जन्म लिए, बचपन , जवानी जीते आज वृद्धवस्था में भी पहुँच गए। कई तो उन्ही गलियों से चार कन्धों पर आश्रित होकर अग्नि के माध्यम से अनंत यात्रा पर निकले तो कई जमीन में दफ़न हो गए । </strong></p>
<p>उसी गली के नुक्कड़ पर एक मंदिर में घंटी बज रही थी। मंदिर परिसर में कोने में रखे आधुनिक वाद्ययंत्रों पर भजन-कीर्तन बज रहा था। बाहर प्लास्टिक के पाइप से पानी की धाराओं से महादेव के साथ-साथ ने देवी-देवताओं को नहलाया जा रहा था। बगल में दीप भी प्रज्वलित था। लेकिन सबों की नजर में गौहर जान &#8216;वेश्या&#8217; थी। आज की पीढ़ियां शायद इस बात से अनभिज्ञ है कि जंगे आज़ादी के दौरान &#8216;यही महिला&#8217; जिसे आज का समाज &#8216;वेश्या&#8217; शब्द से &#8216;अलंकृत&#8217; कर रहा है, आर्थिक तंगी के दौरान मोहनदास करमचंद गाँधी को 12000 रूपये की मदद की थी अपनी गीत-गानाओं और घुंघरू की कमाई से। वैसे यह घटना आज से कोई 124+ वर्ष पहले की है, लेकिन आज भी भारत ही नहीं, विश्व की संगीत की दुनिया में बीबी गौहर जान अपनी आवाज से जीवित है। </p>
<p>कल की ही तो बात है। कल पुरानी दिल्ली की हौजकाज़ी चौक पर खड़ा था। मेट्रो स्टेशन के अलावे विगत चौंतीस-पैंतीस वर्षों में यहाँ कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। यहाँ तक कि सड़कों के किनारे वाले मकानों में भी न तो प्लास्टर नए लगे हैं ताकि टूटी दीवारों, छतों को रोक सके और ना ही दीवारों पर सफेदी ही हुआ है, जिससे दीवारें मोहल्ले की रौनक बढ़ा सके। उस ज़माने में या उस ज़माने से पहले दिल्ली दूरभाष केंद्रों द्वारा लोगों के घरों तक पहुँचने, पहुँचाने वाली तार भी मोहब्बत में एक-दूसरे से जिस कदर लिपटे थे, आज भी लिपटे ही हैं। बीच-बीच में दिल्ली बिजली बोर्ड् की तारें, कुछ मोटे, कुछ पतले भी, दूरभाष के तारों से अपने संबंधों और मित्रता वाली प्रेमरूपी रिश्ते को बरकरार रखे दिखे। नीचे गलियों में, सड़कों पर, घरों में रखने वालों में भी कोई परिवर्तन नहीं दिखा। नुक्कड़ पर क्या बच्चे-क्या जवान और क्या वृद्ध खड़े दिखे, आपस में बात करते दिखे। </p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=HkqWCXO7U84&#038;t=3s">@अखबारवाला001(196)✍ #अजमेरीगेट की गली: आज भी #सायराबानो का इंतज़ार कर रहा है वह घर, वहां की मिट्टी🌹</a></p>
<p>इस चौराहे की सबसे बड़ी विशेषता जो उन दिनों भी थी, आज भी बरकरार है वह यह कि यहाँ सूरज के आने से बहुत पहले ही सड़क के किनारे, दुकानों के सामने, फुटपाथों पर सुबह-सवेरे खाने पीने के लिए, चाय के लिए, पूड़ी-कचौड़ी के लिए दुकानें खुल जाती हैं। आम तौर पर ऐसी दुकानों का खुलने का समय प्रातः काल तीन बजे से (कई मामले में रात भर) होता है और जब घड़ी की छोटी सुई नौ पर और बड़ी सुई तीन कदम आगे होती है, ऐसी सभी दुकानदार अपनी-अपनी दुकानों को बढ़ाने लगते हैं। सामने मेट्रो के अंदर का हवा निकालने के लिए जहाँ निकास रूप टीला दीखता है, वहां सैकड़ों रोज-कमाने-रोज खाने वाले मजदूरों की कतार भी उसी तरह लगी थी, जो पहले होती थी। मजदूर अपने-अपने सामानों, मसलन हथौड़ा, कुदाल, छेनी, दौड़ा, बाल्टी आदि (पंक्ति में) रखकर बैठे थे मालिकों के इंतज़ार में। उनकी दशा और दिशा यहाँ से कोई एक किलोमीटर दूर कल के जीबी रोड और आज के श्रद्धानन्द मार्ग पर स्थित वेश्याओं की 72+ कोठों के नीचे अपना पेट और परिवार पालने के लिए जिस तरह वेश्याएं ग्राहकों का इंतज़ार करती है आज़ादी के 76 साल बाद भी, इस चौराहे पर श्रमिक और मजदूर भी &#8216;काम&#8217; की तलाश में मालिकों और ठेकेदारों का इंतज़ार करते दिखा।  </p>
<figure id="attachment_5472" aria-describedby="caption-attachment-5472" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0109-1-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0109-1-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="size-full wp-image-5472" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0109-1-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0109-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0109-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0109-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0109-1-1536x1026.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0109-1-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5472" class="wp-caption-text">हौजकाजी-चावड़ी बाज़ार चौराहा</figcaption></figure>
<p><strong>इस चौराहे की एक और विशेषता यह है कि यहाँ चार तरफ से सड़कें आती हैं और चार दिशाओं में निकलकर मुगलकालीन इस पुरानी बस्ती को ल्यूटन्स दिल्ली से, आधुनिक दिल्ली के नेताओं के दफ्तरों से, आवासों से जोड़ती है। यह अलग बात है कि आधुनिक भारत या आधुनिक दिल्ली के तथाकथित निर्मातागण, यानी नेता, अधिकारी, पदाधिकारी, मंत्री, संत्री कभी इस इलाके में नहीं आते। इस दिल्ली में भ्रमण-सम्मेलन करना &#8216;अछूत समाज&#8217; में भ्रमण-सम्मलेन करने जैसा होता है। तक़रीबन 1825 दिनों में (यदि सरकार चाहे दिल्ली की हो या केंद्र की) गिरी नहीं तो कोई भी नेता, चाहे विधायक हों या सांसद इस इलाके में आधे-घंटे से अधिक समय नहीं देते हैं &#8211; चुनाव प्रचार-प्रसार के समय। शेष दिवसों में यहाँ के मतदाताओं को उनके पास जाना होता है, जो कभी &#8216;सशरीर&#8217; मिलते नहीं हैं। खैर। </strong></p>
<p>इस चौराहे पर एक सड़क ऐतिहासिक अजमेरी गेट से आती है। दूसरी लाल कुआं की ओर से। तीसरी चावड़ी बाजार से और चौथी सीताराम बाजार से। अगर ल्यूटन्स की दिल्ली से इस स्थान की तुलना करें तो ल्यूटन्स की दिल्ली में जो स्थान कनॉट प्लेस या इण्डिया गेट की है, वही स्थान ऐतिहासिक और उम्र से भी पुराना पुरानी दिल्ली का यह हौजकाजी चौक है। वैसे इस स्थान से कुछ ही दुरी पर ग़ालिब की हवेली भी है और गालिब कहते भी थे: &#8220;दिल बहलाने के लिए ख़याल अच्छा है। नब्बे के दशक के पूर्वार्ध, जब दिल्ली आया था, खासकर जब यहाँ से कोई तीन किलोमीटर दूर दिल्ली के अंतिम बादशाह बहादुर शाह ज़फर के नाम से अंकित दिल्ली गेट से आईटीओ चौराहे तक जाने वाली सड़क पर स्थित इंडियन एक्सप्रेस अखबार का रिपोर्टर बना, इस इलाके में सैकड़ों बार आया था &#8211; कहानी करने, कहानी गढ़ने के लिए। आज भी वही करने आया हूँ। </p>
<p>आज चावड़ी बाजार की ओर जाने वाली सड़क के नुक्कड़ पर खड़ा था। मेरे दाहिने हाथ एक वृद्ध चाय वाला अपने केतली से अंतिम प्याली चाय छानकर अपनी दूकान को बढ़ा रहा था । बाएं हाथ एक और वृद्ध अपने आगे एक टोकरी में पान की एक छोटी दूकान लिए बैठा था । उनके सामने दर्जनों लोग (ग्राहक) अपनी पारी का इन्तजार कर रहे थे। उनकी कमर का झुकाव और उनके चेहरे का झुर्री हौजकाजी-सीतारामबाजार के साथ-साथ उनके उम्र का इतिहास बता रहा था। चेहरे पर झुर्री होने के बाद भी उनके होठ और उनकी उंगलियां दोनों ख़ुशी से लाल थे। उन्हें देखकर मैं मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था कि हे महादेव!!! इस वृद्ध की ख़ुशी को बरकरार रखना। जिस समय मैं यहाँ खड़ा था यहाँ से आने-जाने वाले लोग सभी एक-दूसरे को पहचानते थे, यह दोनों के चेहरों की भाषा बताता था।</p>
<p>मैं भी एक सादा पान अपने गलफर के अंदर डाला और दो पान राह खर्च के लिए झोले में रखकर दूर जामा मस्जिद का पिछले हिस्सा देख चौड़ी बाज़ार का राह पकड़ लिया। यह रास्ता आगे बाएं हाथ गली लाहौरी वाली, दाहिने चूड़ी बलान, फिर बाएं नई सड़क, दाहिना मटिया महल और सैकड़ों उम्र से भी अधिक पुरानी गलियों के रास्ते लाल किले, दिल्ली गेट, तुर्कमान गेट की ओर निकलती है। चौड़ी बाजार-चूड़ी बलान का यह इलाका अपने जीवन के प्रारंभिक दिनों में, यानी मुग़ल काल के साथ-साथ ब्रितानिया हुकूमत के समय नाचने-गाने वाली तवायफों की बस्ती थी। आज भी सैकड़ों दीवारें, मकान, मकानों के झरोखें इतिहास के पन्नों को उलट रही थी और मैं अपने बाएं कंधे पर झोला और दाहिने कंधे पर कैमरा लिए इस ऐतिहासिक वस्तियों, गलियों में शरीर से तो पैदल चल रहा था, लेकिन मानसिक रूप से पैदल नहीं था।खैर। </p>
<figure id="attachment_5473" aria-describedby="caption-attachment-5473" style="width: 1709px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0217-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0217-scaled.jpg" alt="" width="1709" height="2560" class="size-full wp-image-5473" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0217-scaled.jpg 1709w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0217-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0217-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0217-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0217-1025x1536.jpg 1025w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0217-1367x2048.jpg 1367w" sizes="auto, (max-width: 1709px) 100vw, 1709px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5473" class="wp-caption-text">पुरानी दिल्ली की गलियां और गुमनाम लोग</figcaption></figure>
<p><strong>पुरानी दिल्ली के इस इलाके में ही नहीं, दिल्ली सल्तनत में वुजूर्गों की संख्या आजादी के बढ़ते वर्षों के साथ-साथ घटती जा रही है। दिल्ली की आवादी आधिकारिक रूप से विगत वर्ष (2023) में कुल 32941000 बताया गया। नई दिल्ली को अगर छोड़ भी दें, तो पुरानी दिल्ली के साथ-साथ दिल्ली के अन्य क्षेत्रों में रहने वाले वुजूर्गों की संख्या कम हो रही है। आज इन गलियों में चलते समय गलियों में बिछी पट्ठों की चिकनाई इस बात का गवाह था कि मुद्दत से इन गलियों में दोपाया और चारपाया जीवों का आना-जाना रहा है। चार पाया तो &#8216;सजीव&#8217; होते हुए भी &#8216;निर्जीव&#8217; ही रहे, क्योंकि अपने वंश के अलावे वे अगली पीढ़ी को कुछ नहीं दे सकते। लेकिन दो-पायों के बारे में सोचकर मन खिन्न हो रहा था। वुजूर्गों की संख्याओं का कम होना, अथवा उनके द्वारा अपनी अगली पीढ़ियों को, फिर अगली पीढ़ियों को इतिहास नहीं बताने का भुगतान आज हम हौजकाजी-चावड़ी बाजार-लालकुआं-सीताराम बाजार-चूडीबालान -अजमेरी गेट- गली लाहौरी वाली- मटिया महल &#8211; जामा मस्जिद की गलियों में भुगतान कर रहे थे। </strong></p>
<p>आज इन गलियों में, सड़कों पर, मुहल्लों में देश को आज़ादी मिलने से पहले, या उस रात भी, जब तत्कालीन राष्ट्र नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू &#8220;A tryst with destiny&#8221; राष्ट्र को सम्बोधित किये थे, जो जन्म लिए हों, लोग नहीं दिख रहे थे। जो दिख रहे थे उनके मानस पटल को पढ़कर ऐसा लगता था कि जिस जानकारी की खोज में मैं निकला हूँ, उसकी जानकारी इन्हे तो नहीं होगी और मैं गलत नहीं होता था। शेष जो आवक-जावक दिख रहे थे उनमें पढ़ने-लिखने की अभिरुचि नहीं दिख रही थी। सैकड़ों-हज़ारों लोग गलियों में, सड़क के किनारे बैठे मिले, लेकिन उनमें भारत के दूर दराज जिलों से रोजी-रोटी की तलाश वाले अधिक दिख रहे थे &#8211; जिन्हें अपने गाँव, अंचल, प्रखंड, जिला के इतिहास की जानकारी तो होती नहीं, हज़ारों किलोमीटर दूर दिल्ली सल्तनत की इतिहास की जानकारी, वह भी तवायफों के बारे में, वे क्यों रखेंगे? खैर। मैं तो ठहरा रिपोर्टर और खबर निकालना, लिखना तो मेरा धर्म भी है और कर्म भी। </p>
<p>पुरानी दिल्ली का यह इलाका अधिकाधिक साढ़े छह किलोमीटर से अधिक नहीं है। पुरानी दिल्ली का निर्माण मुग़ल बादशाह शाहज़हां द्वारा &#8216;शाहजहानाबाद&#8217; के रूप में सन 1639 में किया गया। यह भारत के अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुरशाह जफ़र की राजधानी भी थी। जफ़र को सन 1857 जंगे आज़ादी के बाद 1858 में तत्कालीन ब्रितानिया हुकूमत के अधिकारियों ने गिरफ्तार कर रंगून भेज दिया था। जंगे आज़ादी के दौरान वैसे अजमेरी गेट-कश्मीरी गेट इलाके में करीब 9644 लोगों ने मृत्यु को वरन किया, लेकिन 1857-1858 में भारतीय विद्रोह या प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान और उसके बाद, चारदीवारी वाले शहर के कुछ हिस्सों को भारी क्षति हुई थी। आज भी यह इलाका गवाही देता है। वैसे आज के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक बाजार उस गवाही का कोई मोल नहीं है। </p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=gWuSkp3gmTE&#038;t=11s">@​अखबारवाला001(197) ✍ ​10 मई, 1857 🙏 दिल्ली की गलियां, तवायफ़ और जंगे आज़ादी: एक श्रद्धांजलि 🌺</a></p>
<p><strong>आज़ादी के 76 वर्ष बाद आज भारत के शहरों से, प्रदेशों की राजधानियों से जो अखबार और पत्रिकाएं प्रकाशित होती है, उसके सम्पादकों को &#8216;इन इतिहासों&#8217; से कोई मतलब नहीं रहा। संवाददाता भले चीत्कार मारकर रोयें, चिल्लाएं दो सौ पंक्ति की खबर के लिए। खैर सन सत्तावन के युद्ध के बाद अंग्रेजों ने लाल किला और जामा मस्जिद पर कब्जा कर लिया। उस दौरान यह इलाका भी अछूता नहीं रहा। पैदल चलते चलते सैकड़ों लोगों को पूछा इन इलाकों में तवायफ कहाँ रहती थी? सैकड़ें निनानब्बे फीसदी लोग मुझे श्रद्धानन्द मार्ग की ओर (पहले का जीबी रोड) उंगलिया उठाकर बताये। जैसे ही वे उंगलियां उठाते थे, मुझे लखनऊ की वह मौसी याद आ जाती थी जिसके पास आज़ादी के 42 वे वर्ष कालखंड में घुंघरू और उनके जीवन पर कहानी करने गए थे। वे मौसी कही थी: &#8220;आज़ाद भारत में कौन सी शिक्षा का प्रचार प्रसार हो रहा है जो तवायफ और जिश्म बेचकर पेट पालने वाली (रंडी/वेश्या) में फर्क नहीं समझती। पुरानी दिल्ली की इन तंग गलियों में मैं शरीर से पैदल होते हुए भी वर्त्तमान और आने वाली समय को देख रहा था।&#8221; </strong></p>
<p>कहते हैं 1857 के विद्रोह का प्रमुख राजनैतिक कारण अंग्रेज़ों की विस्तारवादी नीति और व्यपगत का सिद्धांत था। बड़ी संख्या में भारतीय शासकों और प्रमुखों को हटा दिया गया, जिससे अन्य सत्तारुढ़ परिवारों के मन में भय पैदा हो गया। रानी लक्ष्मी बाई के दत्तक पुत्र को झाँसी के सिंहासन पर बैठने की अनुमति नहीं थी। डलहौज़ी ने अपने व्यपगत के सिद्धांत का पालन करते हुए सतारा, नागपुर और झाँसी जैसी कई रियासतों को अपने अधिकार में ले लिया। जैतपुर, संबलपुर और उदयपुर भी हड़प लिये गए। लॉर्ड डलहौज़ी द्वारा अवध को भी ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन कर लिया गया जिससे अभिजात वर्ग के हज़ारों लोग, अधिकारी, अनुचर और सैनिक बेरोज़गार हो गए। इस कार्यवाही ने एक वफादार राज्य ‘अवध’ को असंतोष और षड्यंत्र के अड्डे के रूप में परिवर्तित कर दिया। वर्ष 1840 के दशक के अंत में लॉर्ड डलहौजी द्वारा पहली बार व्यपगत का सिद्धांत नामक उल्लेखनीय ब्रिटिश तकनीक का सामना किया गया था। इसमें अंग्रेज़ों द्वारा किसी भी शासक के नि:संतान होने पर उसे अपने उत्तराधिकारी को गोद लेने का अधिकार नहीं था, अतः शासक की मृत्यु होने के बाद या सत्ता का त्याग करने पर उसके शासन पर कब्ज़ा कर लिया जाता था। </p>
<p>देश में असंतोष बढ़ रहा था। कई लोग राजस्व प्राप्ति के अधिकार से दूर हो गए थे या अपने लाभप्रद पदों को खो चुके थे। सन 1857 का विद्रोह एक सिपाही विद्रोह के रूप में शुरू हुआ। भारत में ब्रिटिश सैनिकों के बीच भारतीय सिपाहियों का प्रतिशत 87 था, लेकिन उन्हें ब्रिटिश सैनिकों से निम्न श्रेणी का माना जाता था। एक भारतीय सिपाही को उसी रैंक के एक यूरोपीय सिपाही से कम वेतन का भुगतान किया जाता था। उसने अपने घरों से दूर क्षेत्रों में काम करने की अपेक्षा की जाती थी। वर्ष 1856 में लॉर्ड कैनिंग ने एक नया कानून जारी किया जिसमें कहा गया कि कोई भी व्यक्ति जो कंपनी की सेना में नौकरी करेगा तो ज़रूरत पड़ने पर उसे समुद्र पार भी जाना पड़ सकता है। यह विद्रोह भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए एक निर्णायक मोड़ था। देश में आज़ादी की भूख लगभग सभी के पेटों में नहीं, बल्कि मष्तिष्क में तीव्र हो गई थी। </p>
<figure id="attachment_5474" aria-describedby="caption-attachment-5474" style="width: 1709px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0224-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0224-scaled.jpg" alt="" width="1709" height="2560" class="size-full wp-image-5474" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0224-scaled.jpg 1709w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0224-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0224-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0224-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0224-1025x1536.jpg 1025w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0224-1367x2048.jpg 1367w" sizes="auto, (max-width: 1709px) 100vw, 1709px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5474" class="wp-caption-text">बीबी गौहर जान की गलियां का एक दरवाजा</figcaption></figure>
<p>और इस विद्रोह का सीधा असर पड़ा था दिल्ली सल्तनत की इन गलियों के अलावे देश की विभिन्न प्रांतो की तवायफों पर, उनकी संस्कृति पर, नाच-गानों पर, कलाओं पर, नृत्यों पर, वाद्ययंत्रों पर, सारंगी और संतूर की तारों पर। घुंघरुओं की आवाज धीमी होने लगी थी। गले का स्वर कमजोर होने लगा था। अन्य वाद्य यंत्रों से भी आवाज निकालना समय के साथ-साथ कमजोर होने लगा था। यानी तवायफों की कलाओं के लिए मौत की घंटी थी बज चुकी थी । प्रशासन सीधे ब्रिटिश ताज के अधीन आ गया। जिन कोठों पर तत्कालीन समाज के राजा-महाराजों, धनाढ्यों, जमींदारों का संगीत से मनोरंजन किया जाता था, बदलते वक्त में उन कोठों की तवायफों को कलाकारों के रूप नहीं, अलबत्ता वेश्याओं के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा था। यह भी कहा जाता है कि उन दिनों अंग्रेजी सरकार अपने सेनाओं में संक्रमण संबधी बीमारियों की रोकथाम के लिए जंगे आज़ादी यानी सन सत्तावन की क्रांति के कोई आठ साल बाद 1864 संक्रामक रोग अधिनियम जैसे कानून लायी जिसका उद्देश्य मूल रूप से ब्रिटिश सैनिकों के बीच यौन रोगों के प्रसार को रोकना था। </p>
<p>उधर, ऐसा कहा जाता है भारतीय सुधारकों ने 19वीं सदी के अंत में नाच-गाना विरोधी आंदोलन शुरू किया। अपनी आजीविका बर्बाद होने के बाद दिल्ली ही नहीं, बल्कि देश के अन्य भागों में भी एक और जहाँ &#8216;तवायफों&#8217; की संख्या कम होने लगी, &#8216;वेश्याओं&#8217; की संख्या बढ़ने लगी। पेट और परिवार को बचने के लिए किसी भी उम्र की लड़कियां, महिलाएं वेश्यावृत्ति की ओर राह पकड़ने  लगी। लेकिन आत्मा से सभी भारतीय थीं। सभी देश को देश बेचकर भी आज़ाद देखना चाहती थी। उसी दौरान सन 1900 के दशक में जब स्वदेशी और असहयोग आंदोलनों के माध्यम से ब्रिटिश शासन के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रतिरोध शुरू हुआ, तब तक अधिकांश तवायफें अपनी-अपनी सामाजिक स्थिति और आर्थिक स्थितिक्रांतिकारियों को यथासाध्य मदद करने लगी। </p>
<p>इतिहास इस बात का साक्षी है कि पिछले 5000 वर्षों में हर काल में, चाहे वह हड़प्पा सभ्यता हो, वैदिक संस्कृति हो, महाजनपद हो, दिल्ली सल्तनत हो, मुगल काल हो और प्रारंभिक ब्रिटिश काल हो, सार्वजनिक महिलाएं थीं जो पेशेवर मनोरंजनकर्ता के रूप में नृत्य और संगीत का भंडार थीं। चावड़ी बाज़ार पुरानी दिल्ली की एक सैरगाह वाली सड़क थी जहाँ तवायफ़ों की विशाल हवेलियाँ थीं। इन तवायफों का आकर्षण राजाओं, नवाबों, कवियों और साहबों को उनके दरवाजे तक खींच लाता था। आज भी इन गलियों में जब &#8220;बीबी गौहर जान&#8221; के नाम से अंकित मोहल्ला दिखता है, उनके नाम से गलियों में लटके दुकानों के साइन बोर्डों पर &#8220;गली बीबी गौहर जान&#8221; लिखा दिखा तो अनायास रूपमती, अनारकली, राणा दिल, लाल कुँवर नूर बाई, चमानी राम जानी, उत्तम बाई, फिरदौस जान, अद बेगम, अल्फिना, पुन्ना बाई जैसी नामी तवायफों का नाम मानस पटल पर आने लगता है। </p>
<p><strong>आज मुद्दत बाद पुरानी दिल्ली की ऐतिहासिक जामा मस्जिद के पीछे हौजकाजी की ओर आने वाली सड़क से जैसे ही कोई नौ-दशक पुरानी &#8216;देहाती पुट्स्क भण्डार&#8217; के पास आया कदम स्वतः नई सड़क की ओर निकल पड़ा। आज जिस तरह कदम उठा था, दो दशक पूर्व गोदौलिया चौक से मणिकर्णिका के लिए भी कदम उठा था। कुछ दूर आगे बढ़ने पर स्वतः रोशनपुरा की गलियों की ओर निकल पड़ा। आगे यह गली किसी और के नाम से अंकित नहीं है, बल्कि जंगे आज़ादी के उस गुमनाम ट्वाय के नाम से अंकित है जो भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में, स्वदेश आंदोलन में, महात्मा गाँधी को, तत्कालीन राजनेताओं को न जाने किन-किन हालाओं में, कितने अर्थ की मदद की थी। उस तवायफ का धन अर्जन का श्रोत सिर्फ और सिर्फ &#8216;गाना-बजाना&#8217; ही था। नाम था बीबी गौहर जान। इस स्थान से कोई डेढ़ किलोमीटर दूर अजमेरी गेट पर तवायफ चमिया बाई की भी हवेली थी। आज चमिया बाई की तीसरी पीढ़ी भी जीवित है &#8211; भारत के सम्मानित समाज में सायरा बानो के नाम से, लेकिन गौहर जान की इस गली वाली हवेली में गौहर जान का नाम सिर्फ दीवारों पर दिखा। लेकिन इस गली की ऐतिहासिक इमारतें, झरोखें, नक्कासियां आज भी उस दिन को तरोताजा कर दिया। </strong></p>
<p>कहते हैं कि बीबी गौहर जान 1900 के दशक में एक रिकॉर्डिंग कलाकार के रूप में अपार सफलता पाई थी। गौहर जान का सामाजिक और आर्थिक स्थिति उतनी ही बेहतर थी कि महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करने के लिए स्वराज कोष में योगदान देने के लिए संपर्क किया था। वह इस शर्त पर एक धन-संचय संगीत कार्यक्रम आयोजित करने के लिए सहमत हुईं कि गांधी उनके प्रदर्शन में शामिल होंगे। लेकिन गांधी नहीं आ पाये। परिणाम यह हुआ कि आने पर जहाँ उन्हें 24000 मदद मिलता, तत्काल केवल 12,000 रुपये मिले। 1920 से 1922 तक गांधी जी के नेतृत्व वाले असहयोग आंदोलन के दौरान, वाराणसी में तवायफों ने आज़ादी के क्रांतिकारियों के समर्थन में एक तवायफ सभा का भी गठन की। यह कहा जाता है कि उस सभा की अध्यक्षता की थी तवायफ़ हुस्ना बाई ने। सभा में हुस्नाबाई ने सभी तवायफों से गुजारिश की कि वह क्रांति के समर्थन में और अपना विरोध प्रकट करने के लिए अपने आभूषणों के स्थान पर लोहे की जंजीरें, गले में लोहे का कड़ा पहने, साथी ही, तत्कालीन बाजार में मिलने वाली सभी विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करे। </p>
<p>महान विचारक और लेखक अमृतलाल नागर की ये कोठेवालियाँ (1958), जो तवायफों के जीवन का विवरण है, में एक वैश्या विद्याधर बाई का वाराणसी में गांधीजी से मुलाकात पर लिखा एक पत्र भी शामिल है। उन्होंने लिखा, उनके सुझाव पर, कुछ वेश्याओं ने अपने संगीत प्रदर्शन को राष्ट्रवादी गीतों की प्रस्तुति के साथ शुरू करने का फैसला किया था। पत्र में उनका लिखा हुआ एक गीत &#8216; चुन चुन के फूल ले लो&#8217; भी शामिल था। ज्ञातव्य है कि वे सभी गीत-गाने आज भी जीवित हैं।</p>
<p>नेवले ने अपनी पुस्तक &#8220;नॉच गर्ल्स ऑफ़ इण्डिया: डांसर्स, सिंगर्स प्लेमेंट्स&#8221; म,में लिखा भी है कि कैसे उत्तर भारत की तवायफों को धन, शक्ति, प्रतिष्ठा, राजनीतिक पहुंच प्राप्त थी और उन्हें संस्कृति पर अधिकार माना जाता था। कुलीन परिवार अपने बेटों को तहज़ीब, या शिष्टाचार और &#8220;बातचीत की कला&#8221; सीखने के लिए उनके पास भेजते थे। मुगल शासन के तहत तवायफें अपने चरम पर पहुंच गईं। नेविले ने लिखा, &#8220;सर्वश्रेष्ठ तवायफें, जिन्हें डेरेदार तवायफ कहा जाता है, शाही मुग़ल दरबारों से आने का दावा करती थीं।&#8221; “वे राजाओं और नवाबों के अनुचर का हिस्सा थे&#8230; इनमें से कई उत्कृष्ट नर्तक और गायक थे, जो आराम और विलासिता में रहते थे&#8230; तवायफ के साथ जुड़ना स्थिति, धन, परिष्कार का प्रतीक माना जाता था और संस्कृति&#8230;किसी ने भी उसे बुरी महिला या दया की पात्र नहीं समझा।&#8221;</p>
<p><strong>बहरहाल, सचिन श्रीवास्तव जी लिखते हैं कि 18वीं सदी में दिल्ली का चावड़ी बाजार तवायफों का मोहल्ला हुआ करता था। उस दौरान तमाम अंग्रेज और अन्य विदेशी सैनिक भी यहां के कोठों पर अपनी शाम बिताने आया करते थे। इन्हीं में से एक थे वॉल्टर रेनहार्ड सोम्ब्रे । वॉल्टर रेनहार्ड फ्रांस के रहने वाले थे और मुगलों के लिए भाड़े पर सैनिक अफसर का काम करते थे। बात सन 1767 की है, वॉल्टर रेनहार्ड चावड़ी बाजार में एक कोठे पर पहुंचे। उस समय उनकी नजर तबले की थाप पर थिरकती एक खूबसूरत लड़की पर पड़ी. वॉल्टर रेनहार्ड का उस लड़की को देखते ही उस पर दिल आ गया। ये लड़की कोई और नहीं बल्कि फ़रज़ाना थीं, जो बाद में बेगम समरू बनीं। फ़रज़ाना की मां चावड़ी बाजार की जानी मानी तवायफ थीं। उन्होंने अपनी मौत से पहले अपनी बेटी को एक अन्य तवायफ खानम जान के सुपुर्द कर दिया था। </strong></p>
<p>वॉल्टर रेनहार्ड ने अपने से 30 साल छोटी फ़रज़ाना के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। फ़रज़ाना ने कहा कि आपको मेरे साथ तलवारबाजी का मुकाबला करना होगा। अगर आप जीत गए तो धार्मिक रीति रिवाज से शादी कर लूंगी। असलियत में फ़रज़ाना भी वॉल्टर रेनहार्ड को चाहने लगी थीं। उनको वॉल्टर रेनहार्ड का साथ इतना पसंद आया कि वो उनके साथ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में हिस्सा लेने लगीं। दोनों लखनऊ, रूहेलखंड, आगरा, भरतपुर और डींग की जंग में साथ रहे। आखिर में वे सरधना पहुंचे। ये जगह मेरठ से करीब 40 किमी दूर है। दोनों के बीच इश्क तो परवान चढ़ने ही लगा था। बाद में उन्होंने ईसाई रीति रिवाज से शादी कर ली। फ़रज़ाना ने सोम्ब्रे उपनाम अपना लिया और वह बेगम समरू बन गईं।  </p>
<p>मुगल शासक शाह आलम के आदेश पर वॉल्टर रेनहार्ड ने सहारनपुर के रोहिल्ला लड़ाके जाबिता खान को पराजित किया।  दरअसल रोहिल्ला लड़ाकों ने मुगल शासक को परेशान कर रखा था। शाह आलम ने खुश होकर दोआब में एक बड़ी जागीर वॉल्टर रेनहार्ड के नाम पर कर दी।  वॉल्टर रेनहार्ड इसके बाद अपनी पत्नी बेगम समरू के साथ वहीं सरधना में ही बस गए।  शादी के पांच साल बाद वॉल्टर रेनहार्ड की अचानक मौत हो गई। इतिहासकार दूर्बा घोष ने अपनी किताब ‘सेक्स एंड द फैमिली इन कोलोनियल इंडिया’ में लिखती हैं कि 1778 में वॉल्टर रेनहार्ड की मौत के बाद शाह आलम द्वितीय ने बेगम समरू को सरधना का जागीरदार घोषित किया। 18 यूरोपीय अफसरों और 4000 सैनिकों वाली सरधना की फौज की कमान बेगम समरू ने संभाल ली और राजपाट अपने हाथ में ले लिया। बेगम समरू हथियार चलाने में भी निपुण थीं, इसलिए वह 48 साल तक सरधना पर शासन करने में सफल रहीं। एक दौर ऐसा भी था जब बेगम समरू का शासन अलीगढ़ से लेकर सहारनपुर तक चलता था। </p>
<p>सरधना में बने ऐतिहासिक रोमन कैथालिक चर्च का निर्माण बेगम समरू ने करवाया था। कहा जाता है कि ये चर्च उन्होंने अपने पति की याद ने बनवाया। बेगम समरू ने इसको बनवाने की जिम्मेदारी मेजर एंथोली रेगीलीनी को सौंपी थी। माना जाता है कि मेजर एंथोली को वास्तुकला के बारे में अच्छी जानकारी थी। चर्च 1809 में बनना शुरू हुआ था और इसे पूरा होने में 11 साल लगे. चर्च के निर्माण में कई हजार लोग लगे थे। यह 1822 में बनकर तैयार हुआ। कहा जाता है कि बेगम समरू ने चर्च में लगी तमाम मूर्तियों के लिए विदेशी कारीगरों को बुलाया था. इटली के कारीगरों ने इसके लिए 2700 सोने की मोहरें मेहनताने के तौर पर ली थीं । मुगल शासक शाह आलम अपने जागीरदार वॉल्टर रेनहार्ड के काम से इतना खुश थे कि उनके लिए दिल्ली में एक महल बनवाया था। बाद में बेगम समरू ने भी चांदनी चौक और उसके आस पास के क्षेत्र में कई हवेलियों का निर्माण करवाया था। एक दौर ऐसा भी था जब बेगम समरू की गिनती देश की सबसे दौलतमंद और ताकतवर महिलाओं में की जाती थी। उन्हें देश की एकमात्र ऐसी शासिका के रूप में भी जाना जाता है जो रोमन कैथालिक थीं। </p>
<figure id="attachment_5475" aria-describedby="caption-attachment-5475" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0122.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0122.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-5475" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0122.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0122-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0122-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0122-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/DSC_0122-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5475" class="wp-caption-text">इतिहास के पन्नों से : तवायफें जिन्होंने देश की आज़ादी के आंदोलन में अपना योगदान दिया।</figcaption></figure>
<p>गांधी जी के आंदोलन में हुस्ना बाई, विद्याधरी बाई ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। हालांकि स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी किताबों में इनका संघर्ष कहीं नहीं दिखता। वर्ष 1920 से लेकर 1922 तक के असहयोग आंदोलन के दौरान वाराणसी के समूह ने स्वतंत्रता संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए एक तवायफ सभा भी बनाई। अपने शोध पत्र में लता सिंह लिखती हैं कि इस सभा की कमान हुस्ना बाई ने संभाली और सदस्यों को एकता के साथ विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने और गहनों की जगह लोहे की हथकड़ी पहनने के लिए प्रोत्साहित किया। वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य के अनुसार दालमंडी में कोठों पर क्रांति की कहानियां लिखने वाली तवायफों की सूची में दुलारी बाई का नाम सबसे ऊपर है। इतिहासकार वीना तलवार ओल्डनबर्ग ने करीब 35 तवायफों के साक्षात्कार के जरिए उनकी जिंदगी में झांकने की कोशिश की। वह अपनी पुस्तक द मेकिंग आफ कोलोनियल लखनऊ में लिखती हैं कि भारत की स्वतंत्रता की पहली लड़ाई में तवायफों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बागियों का दमन करने के बाद अंग्रेजों ने जो संपत्ति जब्त की, उस सूची में इनके नाम प्रमुख थे। इस समय तक, मुग़ल साम्राज्य का दशकों पहले ही पतन हो चुका था। दिल्ली को छोड़कर कई तवायफें अवध राज्य के लखनऊ में चली गईं, जहां नवाबों ने अभी भी उनकी कला का समर्थन किया। लेकिन लखनऊ में भी उनकी किस्मत बदलते देर नहीं लगी. 1856 में अंग्रेजों ने अवध राज्य पर कब्ज़ा कर लिया, और जब विद्रोह शुरू हुआ तो अचानक तवायफों ने खुद को आदर्श स्थिति में पाया। </p>
<p><strong>फुलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में चोट&#8230; जैसे गीत से मशहूर हुईं रसूलन बाई ने महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन से प्रेरित होकर गहने पहनना छोड़ दिया था। उन्होंने गहने तभी पहने, जब देश आजाद हो गया। अपने प्रण के मुताबिक रसूलन बाई ने देश के आजाद होने के बाद ही शादी भी की। बाद में रसूलन बाई को संगीत नाट्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। बनारस की प्रसिद्ध गली दालमंडी में भी कभी कोठे हुआ करते थे। यहां से गूंजने वाली घुंघरुओं की झंकार ने अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया था। उस दौर में राजेश्वरी बाई, जद्दन बाई से लेकर रसूलन बाई तक के कोठों पर सजने वाली महफिलें महज मनोरंजन का केंद्र ही नहीं होती थीं, बल्कि अंग्रेजों को देश से निकालने की रणनीति भी यहीं से तय होती थी। ठुमरी गायिका राजेश्वरी बाई तो हर महफिल में अंतिम बंदिश भारत कभी न बन सकेला गुलाम&#8230; गाना नहीं भूलती थीं। मशहूर अभिनेत्री नर्गिस दत्त की मां जद्दन बाई के दालमंडी कोठे पर भी आजादी के दीवानों का आना-जाना रहता था। अंग्रेजों ने कई बार उनके कोठे पर छापा मारा। प्रताडऩा से तंग आकर जद्दन बाई को दाल मंडी की गली तक छोडऩी पड़ी थी। इन सबके बावजूद महफिल से मिलने वाले पैसों को तवायफें चुपके से क्रांतिकारियों को दे दिया करती थीं। अमृतलाल नागर की किताब ये कोठेवालियां में तवायफों की जिंदगी के बारे में बहुत अच्छी तरह प्रकाश डाला गया है।</strong></p>
<p>इसी तरह, एक महिला पुरुष वेश में, सीने पर मेडल से आभूषित, घोड़े की पीठ पर सवार, पिस्तौल लिए मैदान-ए-जंग में उतर गई और ब्रिटिश सैनिकों से खूब बहादुरी से लड़ी। अजीजन बाई वह नाम है जो 1857 की क्रांति में उभरकर सामने आया। वह एक ऐसी तवायफ थीं जो देश की आजादी के लिए बहादुरी से लड़ीं, कभी पर्दे में रहकर तो कभी बिना किसी पर्दे के। कहते हैं कि अजीजन बाई एक जासूस, खबरी और योद्धा थीं। उनका जन्म लखनऊ में हुआ था। उनकी मां भी एक तवायफ थीं, लेकिन देश के प्रति प्रेम अजीजन को लखनऊ से कानपुर ले आया। अजीजन बाई के घर में हिंदुस्तानी सिपाहियों की बैठकें हुआ करती थीं। बताया जाता है कि अजीजन बाई ब्रिटिश इंडियन आर्मी के सैनिकों के काफी नजदीक थीं। उनके कोठे में स्वतंत्रता संघर्ष की रणनीति बनाई जाती थी। एक जून, 1857 को क्रांतिकारियों ने कानपुर में एक बैठक की। इसमें नाना साहब, तात्या टोपे के साथ सूबेदार टीका सिंह, शमसुद्दीन खां और अजीमुल्ला खान के अलावा अजीजन बाई ने भी शिरकत की थी। इसी बैठक में हाथ में गंगाजल लेकर इन सबने अंग्रेजों की हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया था। </p>
<p>जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के सेंटर फार वुमंस स्टडीज की प्रोफेसर लता सिंह ने भारत की आजादी के संघर्ष में तवायफों के योगदान पर एक शोध पत्र लिखा है, जिसमें अजीजन बाई का उल्लेख है। लता सिंह के अनुसार 1857 की क्रांति में कानपुर से अजीजन बाई के संघर्ष का उल्लेख मिलता है। उन्होंने महिलाओं का एक ऐसा समूह बनाया था जो स्वतंत्रता सेनानियों का साथ देने, हथियारों से लैस सिपाहियों का मनोबल बढ़ाने, उनके घावों की मरहम पट्टी करने और हथियारों को वितरित करने को तैयार रहता था। लता सिंह कहती हैं, यहां तक कि स्वाधीनता सेनानी वीर सावरकर ने भी अपने राष्ट्रवादी लेखों में अजीजन बाई के बारे में लिखा है कि इस नाचने वाली को सिपाही बहुत प्यार करते हैं। वह बाजार में पैसों के लिए अपना प्यार नहीं बेचती है। उसका प्यार देश से प्यार करने वालों के लिए है।-<strong> अखबारवाला001 </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/bibi-gauhar-jaan-became-anonymous-in-her-own-streets">अपनी ही गलियों में गुमनाम हो गयी बीबी गौहर जान, &#8216;तवायफ़&#8217; से &#8216;वेश्या&#8217; कहने लगे लोग</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>जब उस्ताद विलायत हुसैन खान ने &#8216;संगीतज्ञों के संस्कार&#8217; में लिखा ✍ &#8216;बिहार में कुमार श्यामानन्द सिंह से बेहतर संगीत का पारखी कोई और नहीं है&#8230;.&#8217;🙏 (भाग-7)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 13 Oct 2022 07:31:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[banaily]]></category>
		<category><![CDATA[champanagar]]></category>
		<category><![CDATA[classical]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[indian]]></category>
		<category><![CDATA[music]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पूर्णियां / चम्पानगर : बनैली राज के राजाओं का अपने प्रजाओं के उत्थान के लिए, चाहे आर्थिक क्षेत्र हो, सामाजिक हो, सांस्कृतिक हो या शिक्षण &#8211; सभी क्षेत्रों में योगदान रहा है और यही कारण है कि आज भी बनैली राज की पीढ़ियां अपने पूर्वजों द्वारा संपन्न कार्यों को धरोहर के रूप में सुरक्षित और [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पूर्णियां / चम्पानगर : बनैली राज के राजाओं का अपने प्रजाओं के उत्थान के लिए, चाहे आर्थिक क्षेत्र हो, सामाजिक हो, सांस्कृतिक हो या शिक्षण &#8211; सभी क्षेत्रों में योगदान रहा है और यही कारण है कि आज भी बनैली राज की पीढ़ियां अपने पूर्वजों द्वारा संपन्न कार्यों को धरोहर के रूप में सुरक्षित और संरक्षित रखने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं। &#8216;अपवाद&#8217; समाज के सभी तबकों में होता है, बनैली राज भी &#8216;अछूता&#8217; नहीं है। फिर भी, उन दिनों दरभंगा के राजाओं द्वारा उपेक्षित मिथिला का यह पूर्वी हिस्सा, आज मिथिला के अन्य क्षेत्रों से अधिक संपन्न है, विशेषकर &#8216;मानसिकता&#8217; में। खैर।</strong></p>
<p>यह बात इसलिए यहाँ लिख रहा हूँ क्योंकि भारतीय संगीत के मर्मज्ञ और पूजनीय उस्ताद विलायत हुसैन खान ने अपनी पुस्तक &#8216;संगीतज्ञों के संस्कार&#8217; में लिखा है: &#8220;बिहार में कुमार श्यामानन्द सिंह से बेहतर संगीत का पारखी कोई और नहीं है।&#8221; कोई चौदह शब्दों का यह वाक्य किसी मनुष्य को मानव से &#8216;महामानव&#8217; बना देता है, दिया था। </p>
<p><strong>कुमार श्यामानंद सिंह चंपानगर में अपने निवास पर अपने समय के हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के कई उस्तादों को संरक्षण और सम्पोषण किया। कभी उन्होंने न चेहरे को मलिन होने दिया, ना ही कभी हाथ पीछे किया। अलबत्ता, अपनी महान संपत्ति का इस्तेमाल किया शास्त्रीय संगीत जो जीवित रखने के लिए किया ताकि संगीत, संगीतज्ञ, संस्कार जीवित रहे और हमारा देश भारत भी जीवित रहे । इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय शास्त्रीय संगीत को सीखने और उसके विकास का एक नहीं सैकड़ों द्वार खोल दिए। आज ही नहीं कल भी चंपानगर के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा है, रहेगा कि चंपानगर स्टेट उस्ताद सलामत अली खान, खुर्जा के उस्ताद अल्ताफ हुसैन खान और उस्ताद बच्चू खान साहब, और कई अन्य लोगों को निवास और संरक्षण प्रदान किया गया था। </strong></p>
<figure id="attachment_4583" aria-describedby="caption-attachment-4583" style="width: 2042px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-6.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-6.png" alt="" width="2042" height="1245" class="size-full wp-image-4583" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-6.png 2042w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-6-300x183.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-6-1024x624.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-6-768x468.png 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-6-1536x936.png 1536w" sizes="auto, (max-width: 2042px) 100vw, 2042px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4583" class="wp-caption-text">साल 1942: बाएं से &#8211; एक अपरिचित, कुमार दुर्गानंद सिंह, कुमार जयानंद सिंह, कुमार विमलानंद सिंह, प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, कुमार तारानंद सिंह और कुमार श्यामानंद सिंह</figcaption></figure>
<p>कहते हैं कुमार श्यामनन्द सिंह शास्त्रीय संगीत का सम्पूर्ण विकास के लिए, लोगों तक पहुँचाने के लिए, प्रदर्शन के लिए कई महान उस्तादों को भी आमंत्रित किया करते थे । मसलन: &#8220;आफताब-ए-मौशिकी&#8221; उस्ताद फैयाज खान, उस्ताद बड़े गुलाम अली खान, उस्ताद मुबारक अली खान, उस्ताद निसार हुसैन खान, पंडित डी.वी. पलुस्कर, सूरश्री केसरबाई केरकर, सवाई गंधर्व, उस्ताद विलायत हुसैन खान, उस्ताद हाफिज अली खान, उस्ताद अल्ताफ हुसैन खान, पंडित जसराज, दिलीप चंद वेदी, उस्ताद मुश्ताक हुसैन खान, पंडित नारायणराव व्यास, पंडित बसवराज राजगुरु और उस्ताद सलामत अली खान और नजाकत अली खान, मलंग खान (पखावज), अलाउद्दीन खान (सरोद), मुश्ताक अली (सितार), पंडित भोलानाथ भट्ट, पंडित चिन्मय लाहिरी, महावीर मलिक, जदुवीर मलिक और रामचतुर मलिक आदि। </p>
<p>बहरहाल, बीते दिनों के इतिहास का पन्ना पोछते बनैली राज के गिरिजानंद सिंह कहते हैं कि &#8220;चम्पानगर का वह पुश्तैनी पुश्तैनी महल आजभी विद्यमान है, जिसमें कुमार श्यामानंद सिंह पले बढ़े, जीवन को भरपूर जिया और सतहत्तरवें वर्ष में पंचतत्व में विलीन हो गए लेकिन सप्त सुरों की लहरी में लिपटी लहराती हवाओं के बीच प्रतिष्ठित वाग्देवी का वह अनूठा मंदिर अब नहीं रहा। प्रातः काल की वह संगीत साधना, दोपहर का वह स्वर-विलास और देर रात तक चलने वाला रागिनियों का वह अनुपम श्रृंगार नहीं रहा। बस वहां के संगीतमय माहौल की यादें शेष हैं।&#8221;</p>
<figure id="attachment_4581" aria-describedby="caption-attachment-4581" style="width: 1250px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Girija.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Girija.png" alt="" width="1250" height="1235" class="size-full wp-image-4581" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Girija.png 1250w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Girija-300x296.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Girija-1024x1012.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Girija-768x759.png 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Girija-24x24.png 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Girija-48x48.png 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Girija-96x96.png 96w" sizes="auto, (max-width: 1250px) 100vw, 1250px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4581" class="wp-caption-text">गिरिजानन्द सिंह</figcaption></figure>
<p>गिरिजानंद सिंह कहते हैं : &#8220;यादें अनगिनत हैं, और बातें तो इतनी हैं कि सैकड़ों पन्नों में भी ना समायें।परिवार में वो सबसे बड़े, और मैं सबसे छोटा, व्यक्तित्व में, पद में, गुण में। फिर भी जैसा मैंने उन्हें जाना, पाया और अनुभूत किया, वह अपने आप में एक रुचिकर है, इसमें कोई संदेह नहीं।बात सन 1963-64 ई0 की। मैं सात-आठ वर्ष का था। उन दिनों दुर्गापूजा के महापर्व पर चंपानगर में गवैयों-बजवैयों का जमघट होता था। नवरतन पैलेस के दरबार हॉल में, लगभग एक पखवाड़े तक सुबह-शाम संगीत की महफिल सजती थी।</p>
<p>समूचे हॉल में दुधिया चाँदनी बिछाई जाती थी, और हॉल के बीचोंबीच एक मखमली कालीन के ऊपर उपर एक विशाल मसनद लगाया जाता था। महफिल के समय मेरे बड़े काका, राजकुमार श्यामनन्द सिंह, सहज शालीनता के साथ मसनद से उठंग कर बैठते थे और उनके अगल-बगल मेरे पिताजी समेत अन्य राजकुमारों के बैठने की जगह होती थी। पीछे की ओर सभी रिश्तेदार, हम लोग, अन्य सभासद और श्रोतागण बैठते थे। हॉल के पूर्वी तरफ, एक दूसरे गलीचे पर अपने साजो-समान और साजिंदो के साथ मुख्य कलाकार बैठकर अपना फन प्रस्तुत करते थे। उत्तरी ओर कलाकारों की जमात थी, और दक्षिणी ओर के दरवाजों पर लटके हुए चिक और पर्दो के पीछे राजघराने की स्त्रियाँ बैठकर संगीत का आनंद लेती थी। झाड़ फानूसों से छनकर आती हुई बिजली की रोशनी से संपूर्ण कक्ष एक दूधिया आलोक में नहाया हुआ लगता था। चार बड़े-बड़े सीलिंग पंखे वातावरण को शीतलता प्रदान करते थे। ऐसे शांत स्निग्ध वातावरण का निर्माण होता था कि मानो महाश्वेता भगवती सरस्वती का साक्षात आविर्भाव हुआ हो।&#8221;</p>
<p>तत्कालीन दृश्यों के समेटते गिरिजानंद सिंह आगे कहते हैं कि &#8220;नियत समय पर काकाजी अपना आसन ग्रहण करते और पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार किसी कलाकार के गायन अथवा वादन से संगीत-सभा आरंभ होती थी। जब कभी किसी कलाकार द्वारा बेहतरीन प्रस्तुति की जाती तो संपूर्ण सभागार संगीत से झूम उठता था, और एक अजीब समा बंध जाती थी। लोग इस तरह मंत्रमुग्ध होकर संगीत का आनंद लेते थे, कि प्रस्तुति के समापन पर प्रतीत होता था जैसे समय एकाएक रुक गया हो। सभा स्तब्ध हो गई हो। चारों ओर निशब्द-नीरव शांति के बीच केवल पंखों का घर्र-घर्र ही सुनाई देता था। काकाजी धीरे से शाबाशी देते, कोई बात छेड़ते अथवा केवल मुस्कराकर रह जाते थे। फिर अगली प्रस्तुति होती थी, फिर वही संगीत के सागर में डूबना-उतराना, और फिर वही चुप्पी और पंखों का घर्र-घर्र।&#8221;</p>
<p>संगीत महफिलों के अपने कायदे कानून तो थे ही, राज दरबारों के तौर तरीकों के साथ मिलकर एक अत्यंत अनुशासित माहौल बन जाता था। जब तक कोई प्रस्तुति चलती रहती तब तक किसी की क्या मजाल कि चूँ शब्द भी निकाल सके। बैठने की मुद्रा का परिवर्तन करना भी अपेक्षित ना था। अगर कोई ऐसा करता तो राजकुमारों की एक नजर ही उन्हें सहमा कर रख देती। किसी गायन अथवा वादन के बीच सभा से उठकर जाना किसी जघन्य अपराध से कम ना था। ऐसा करने से प्रस्तुतिकर्ता  और दरबार दोनों का अनादर समझा जाता था।</p>
<figure id="attachment_4584" aria-describedby="caption-attachment-4584" style="width: 2042px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Chamopa-4.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Chamopa-4.png" alt="" width="2042" height="1245" class="size-full wp-image-4584" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Chamopa-4.png 2042w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Chamopa-4-300x183.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Chamopa-4-1024x624.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Chamopa-4-768x468.png 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Chamopa-4-1536x936.png 1536w" sizes="auto, (max-width: 2042px) 100vw, 2042px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4584" class="wp-caption-text">परिवार</figcaption></figure>
<p>गिरिजानंद सिंह कहते हैं: &#8220;विजयादशमी और लक्ष्मीपूजा की संध्या बैठकों में स्वयं काकाजी प्रस्तुतिकर्ता की कालीन पर विराजते और उनके मसनद को हम लोग हथिया लेते थे। इस अवसर पर विशेष भीड़भाड़ होती थी, और चिक के पीछे बैठने वाला स्थान भी ठसाठस भर जाता था। जो लोग शास्त्रीय संगीत से अधिक रुचि न भी रखते थे वे भी काकाजी के मनोहारी संगीत का रसास्वादन करने के लिए खिंचे चले आते थे। काकाजी हारमोनियम बजाकर गाया करते थे और उनके पीछे उनके दो शागिर्द विशालकाय तानपुरों से सुर छेड़ा करते थे। काकाजी के प्रिय तबला वादक ऋषिकांत सिंह तबले पर संगत करते थे। गाने की प्रस्तुति के बीच जब किसी तान की अभिव्यक्ति के क्रम में काकाजी अपने दायें हाथ को हवा में लहराते थे तो उनकी कानी अंगुली पर धारण की हुई हीरे की अंगुठी से ऐसी धनुषाकार रेखा खिंच जाती थी जैसे विद्युत लता हो। वह दृश्य आज भी मेरे दृष्टिपटल पर इस तरह अंकित है कि याद आते ही मुझे रोमांचित कर देता है।&#8221;</p>
<p>&#8220;सभा के अंत में, राजमाता द्वारा एक विशेष भजन सुनाने के आग्रह पर नतमस्तक होकर काकाजी द्वारा &#8216;बन ठन कर आयो रे गोपी&#8217; गाना, और सभी श्रोताओं का अभिभूत होकर का झूमना मैं कभी भूल नहीं सकता। उन दिनों &#8216;बेणी माधव&#8217; नाम के एक विशेष कलाकार थे जिनकी प्रस्तुति सुनने के लिए लगभग उतनी ही भीड़ होती थी जितनी काकाजी के लिए। ऐसे अवसरों पर पूरा का पूरा रनिवास उमड़कर पर्दो के पीछे बैठ जाता था। पायल और नुपुरों की ध्वनि से दरबार का ध्यान आकृष्ट ना हो इसके लिए राजघरानें की औरतें दरबार की तरफ कदम बढ़ाने से पहले अपनी पायलें और कड़े खोलकर आँचल में बाँध लिया करती थी। फिर भी औरतें तो आखिर औरतें ठहरीं। बहुत देर तक अपने को संयत न रख पाती थीं, और उनकी फुसफुसाहत कभी-कभी चिक-परदों से छनकर काकाजी के कानों तक पहुँच ही जाती थी। वे एक बार कड़ी नजर से परदों की तरफ देखते और बस, उनकी एक नजर ही काम कर जाती थी। पुनः नियंत्रित होकर औरतें बैठ जातीं और बेणी माधव के गाने का आनंद लेने लगती थीं।&#8221;</p>
<figure id="attachment_4585" aria-describedby="caption-attachment-4585" style="width: 1416px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-7.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-7.png" alt="" width="1416" height="2042" class="size-full wp-image-4585" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-7.png 1416w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-7-208x300.png 208w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-7-710x1024.png 710w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-7-768x1108.png 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-7-1065x1536.png 1065w" sizes="auto, (max-width: 1416px) 100vw, 1416px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4585" class="wp-caption-text">ड्योढ़ी का बरामदा जहाँ सैकड़ों संगीतज्ञों के चरण पड़े</figcaption></figure>
<p>गिरिजानंद सिंह आगे कहते हैं कि &#8220;काकाजी के दरबार में दो तीन गवैये स्थाई तौर पर रहते थे। उनमें उस्ताद अल्ताफ हुसैन खाँ, उस्ताद बाचू खाँ साहेब और पं0 सूर्यनारायण सिंह प्रमुख थे। अल्ताफ हुसैन खां की यादें काफी धूमिल सी रह गई हैं, परंतु बाचू खाँ जिन्हें हम &#8216;बच्चू खाँ&#8217; या &#8216;ओस्ताद&#8217; कहा करते थे, मुझे अच्छी तरह याद हैं। वे काकाजी को तो संगीत का तालीम देते ही थे, मेरी बड़ी बहनों को भी गाना सिखाया करते थे। वे अक्सर शाम के चार बजे मेरी बहनों को गाना सिखाने के लिए गाना-कमरे के एक कोने में हारमोनियम लेकर बैठ जाते। वाणी दीदी,  वंदना दीदी, उर्मिला दीदी, और सरोज दीदी उन्हें घेरकर बैठ जाती थीं और नए नए बंदिश सीखा करती थीं। वाणी दीदी और वंदना दीदी खूब मन लगाकर सीखती थीं। उर्मिला दीदी थोड़ी चंचला थीं, अक्सर ओस्ताद उनसे कहते &#8216;ध्यान से सुनो फिर गाओ, तुम मुझसे आगे-आगे ही गाने लगती हो।&#8217;</p>
<p>फिर, &#8220;सरोज दीदी इतनी धीमी आवाज में गातीं कि ओस्ताद सुन ही नहीं पाते थे। वे सबको चुप करवा देते और सरोज दीदी से कहते थे &#8216;हाँ बेटा&#8217; अब गाओ, सुनू तो अब, क्या गा रही हो।&#8217; ओस्ताद खुद एक पतले, दुबले और कमजोर से दिखने वाले इंसान थे। मैंने सुना है कि छोटी सी आवाज थी उनकी, लेकिन क्या गाते थे, दिल पर चोट करते थे। सरोज दीदी के पीछे-पीछे उनकी संध्या तालीम में मैं भी जा बैठता था। &#8216;मोरी बैयाँ ना पकड़ो गिरिधारी श्याम, मैं तो विनती करत गई हारी श्याम&#8217;  जब वे दीदी लोगों को सीखा रहे थे, तब मैंने भी वह बंदिश चुपके से उठा ली थी। इस तरह से ओस्ताद मेरे भी संगीत गुरु थे।&#8221;</p>
<p>वे आगे कहते हैं: &#8220;बचपन में मेरे संगी साथी अधिक न थे। दो ही मित्र थे मेरे, चचेरे भाई बिहारी और दिलीप जो रिश्ते में मेरा भतीजा था। बिहारी भाई का एकमात्र शौक था मोटर गाड़ियों के खिलौने खरीदना और उन्हीं से खेलना। उनके पास रंग-बिरंगी सैकड़ों मोटर गाड़ियाँ थी, जिन्हें वे एक अलग कमरे में करीने से सजाकर रखते और बारी-बारी से उन्हें निकालकर कपोल-कल्पित सड़कों पर दौड़ाते थे। मैं भी नियमित रूप से उनके इस खेल में शरीक होता। मोटर गाड़ियों वाले कमरे से लेकर बाहरी बरामदों, सीढ़ियों और सहन में हमने कई सड़कें चौराहें, यहाँ तक की पुर्णियाँ, कटिहार और कुर्सेला जैसे स्थानों की भी कल्पना कर ली थी। बीच-बीच में कई पेट्रोल पंप भी थे। हम तीनों अपनी पसंद की मोटर गाड़ी लेकर हूँ-हूँ करते हुए उन सड़कों पर कभी कम तो कभी अधिक स्पीड में मोटर दौड़ाते थे।&#8221;</p>
<p>इन मोटर गाड़ियों के खेल से मुझे एक दूरगामी लाभ हुआ, जब हम अपनी-अपनी मोटर लेकर खेला करते तब निकट के बैठक कमरे में मेरे बड़े काका अपने शागिर्दों को शास्त्रीय संगीत की तालीम दे रहे होते थे। पूरा वातावरण संगीतमय हो जाया करता था। कभी ललित, कभी जौनपुरी, तो कभी मियाँ की टोड़ी जैसी रागिनियों की अवतारणा होती रहती, और हम अपने नन्हे-नन्हे श्रवणेन्द्रियों से उसका रसपान करते हुए अपनी मोटर गाड़ियों को दौड़ाते रहते। उस सुमधुर संगीत ने शनैः शनैः मुझे उस छोटी उम्र में ही गान रसिया बना दिया था। जैसे ही काकाजी किसी लंबी तान या बहलावा करके मुखड़े पर आकर ठहरते वैसे ही मेरी मोटरकार भी रुक जाती और मैं तल्लीन होकर गुनगुनाने लगता। इस प्रकार सात-आठ साल की छोटी उम्र में ही, मैं काकाजी का अप्रत्यक्ष शागिर्द हो गया था। बाद में उनके शागिर्दों में से एक होने का गौरव मुझे भी प्राप्त हुआ। लेकिन मैं उस गौरव को संभाल न सका। मैंने उनसे विद्या ग्रहण करने में कभी वह निष्ठा और एकाग्रता नहीं रखी जो मुझसे अपेक्षित थी। इस बात का पछतावा मुझे जीवन भर रहेगा।</p>
<figure id="attachment_4586" aria-describedby="caption-attachment-4586" style="width: 2042px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-2.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-2.png" alt="" width="2042" height="1245" class="size-full wp-image-4586" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-2.png 2042w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-2-300x183.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-2-1024x624.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-2-768x468.png 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-2-1536x936.png 1536w" sizes="auto, (max-width: 2042px) 100vw, 2042px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4586" class="wp-caption-text">ड्योढ़ी &#8211; संगीत का महल</figcaption></figure>
<p>गुरु-शिष्य शिक्षा पर गिरिजा बाबू कहते हैं: &#8220;काकाजी और उनके शागिर्दों के बीच गुरु-कुल परंपरा के अनुरूप ही शिक्षा-दीक्षा का प्रावधान था। शागिर्दी के आरंभिक दिनों में विशेष जिज्ञासु होना अपेक्षित न था। गुरुदेव के साथ बस गाते रहना और शनैः शनैः संगीत की बारीकियों से अवगत होते जाना, यही हमारे गुरुकुल की रीत थी। एक बार जब मैं कालेज की छुट्टियों में घर आया तो काकाजी ने शुक्ल-विलावल के एक खयाल से हमारी तालीम के क्रम को आगे बढ़ाया जो बचपन से ही मुझे बेहद पसंद था।&#8221;</p>
<p>&#8216;कल ना पड़त मोहे, निस दिन अरी दई, बिरहा अगन मोरे तन में जरी दई&#8217;।</p>
<p>मेरे खुशी की सीमा न रही और मैं मन लगा कर सीखने लगा। लेकिन कुछ ही दिनों में छुट्टियाँ खत्म हुईं और मेरी तालीम अधूरी रह गई। अगली छुट्टियों में जब मैं घर आया तो गुरुदेव मेरे गुरुभाई &#8216;जित्तन&#8217; को जौनपुरी सिखा रहे थे और मैं भी वही सीखने लगा। एक दिन मैंने हिम्मत कर के गुरुदेव को याद दिला ही दिया</p>
<p>&#8216;काकाजी, वो गाना बताइये ना!&#8217;<br />
&#8216;कौन सा?&#8217; उन्हों ने पूछा<br />
&#8216;शुक्ल विलावल&#8217; मैंने तपाक से कहा<br />
काकाजी मुस्करा उठे और और उन्हों ने मुझसे पूछा<br />
&#8216;अच्छा, कल ना पड़त? तुम्हें कैसे मालूम कि ये शुक्ल बिलावल है?&#8217;<br />
अब मैं बड़ी मुश्किल में पड़ा। क्या जवाब देता। हकलाने लगा<br />
&#8216;अ अ अ ऐसे ही&#8217;<br />
&#8216;ऐसे ही क्या?&#8217; काकाजी ने कहा और हँस पड़े।</p>
<figure id="attachment_4587" aria-describedby="caption-attachment-4587" style="width: 2042px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-3.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-3.png" alt="" width="2042" height="1245" class="size-full wp-image-4587" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-3.png 2042w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-3-300x183.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-3-1024x624.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-3-768x468.png 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Champa-3-1536x936.png 1536w" sizes="auto, (max-width: 2042px) 100vw, 2042px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4587" class="wp-caption-text">कुमार श्यामानन्द सिंह का विलियर्ड्स टेबुल</figcaption></figure>
<p>उसी दिन से एक बार फिर वे मुझे शुक्ल बिलावल सिखाने लगे। लेकिन उस दिन के बाद कई महीनों तक उन्होंने मेरा नाम ही रख दिया &#8216;शुक्ल बिलावल&#8217;। जब भी मुझ पर उनकी नजर पड़ती &#8216;शुक्ल बिलावल&#8217; कह कर मुझे छेड़ते थे। कभी डाँटा नहीं, फटकारा नहीं। लेकिन एक अनूठे ढंग से अपनी बात बता गए। मुझे सबक मिल गया। असल में गुरुदेव के साथ, बार-बार, बस गाते दोहराते हुए, स्थायी-अंतरे को आत्मसात करना था मुझे। आहिस्ते आहिस्ते राग की जटिल बारीकियों से अवगत होना था, एक एक कर सीढ़ियों को चढ़ना था। एकबारगी नहीं।</p>
<p>रोजाना नियमित तालीम के बाद नियमित रेयाज़ भी अपेक्षित था शागिर्दों से। गाने वाला कमरा, हम लोग जब भी खाली पाते थे, शुरु हो जाते थे। दिन, दोपहर, शाम, कभी भी। जब हम लोग तल्लीन हो कर गा रहे होते थे तो कई बार गुरुदेव दरवाजे की ओट में खड़े होकर हमारा रेयाज़ सुन जाया करते थे। बाद में तालीम के समय कहते थे। &#8216;ठीक ही गा रहे थे&#8217; बस इस जगह पर थोड़ी कसर रह गई&#8217; यहाँ इस तरह से सुर लगाना है&#8217; और उसी जगह से खुद शुरु हो जाते थे।</p>
<p>फिर कुछ क्षण रुक जाते हैं जैसे अपनी आखों के सामने अपने समस्त पूर्वजों को श्रद्धा-सुमन अर्पित करते कहते कहते हैं: &#8220;आज काकाजी हमारे बीच नहीं हैं। माँ-बाप, गुरु-गुरुपत्नी, कोई भी नहीं। लगभग सभी ज्येष्ठ-श्रेष्ठ गुरुभाई भी चल बसे। कुमार जयानंद सिंह, कुमार शंकरानंद सिंह, सीताराम झा, शक्तिनाथ झा, सभी चले गये। बस उनकी यादें रह गयी हैं, जो बार-बार अतीत के पन्नों से निकल कर हमारे सामने जीवंत हो उठती हैं। मन में एक टीस सी उठती है : &#8216; दैय्या कहाँ गए वो लोग, ब्रज के बसैय्या&#8221;</p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;..✍</strong> </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/there-is-no-better-music-connoisseur-in-bihar-than-kumar-shyamanand-singh">जब उस्ताद विलायत हुसैन खान ने &#8216;संगीतज्ञों के संस्कार&#8217; में लिखा ✍ &#8216;बिहार में कुमार श्यामानन्द सिंह से बेहतर संगीत का पारखी कोई और नहीं है&#8230;.&#8217;🙏 (भाग-7)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>लता मंगेशकर को &#8216;खाना पकाना&#8217; बेहद पसंद था, इसलिए जब अंतिम सांस ली, देश में &#8216;लोगों के घरों में चूल्हे नहीं जले&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 06 Feb 2022 12:46:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[death]]></category>
		<category><![CDATA[lata]]></category>
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		<category><![CDATA[mumbai]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मुंबई / दिल्ली : कहते हैं स्वर कोकिला लता मंगेशकर जी को संगीत के अलावा खाना पकाने और फ़ोटो खींचने का बहुत शौक़ था । समय का तकाजा देखिये, आज भारत के घरों में जब चूल्हे जले भी नहीं थे, भारत रत्न से, पद्मविभूषण से , पद्मभूषण से, दादा साहब फाल्के जैसे सैकड़ों-हजारों उपाधियों से अलंकृत [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/lata-mangeshkar-loves-cooking-when-she-breathed-her-last-no-one">लता मंगेशकर को &#8216;खाना पकाना&#8217; बेहद पसंद था, इसलिए जब अंतिम सांस ली, देश में &#8216;लोगों के घरों में चूल्हे नहीं जले&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मुंबई / दिल्ली : कहते हैं स्वर कोकिला लता मंगेशकर जी को संगीत के अलावा खाना पकाने और फ़ोटो खींचने का बहुत शौक़ था । समय का तकाजा देखिये, आज भारत के घरों में जब चूल्हे जले भी नहीं थे, भारत रत्न से, पद्मविभूषण से , पद्मभूषण से, दादा साहब फाल्के जैसे सैकड़ों-हजारों उपाधियों से अलंकृत भारत की कोकिला का शरीर &#8220;पार्थिव&#8221; हो गया। </p>
<p>जिसे जीवन भर फोटो खींचने का शौक़ रहा, आज भारत के घरों में, लोगों के दिलों में ख़ुद &#8216;टंग&#8217; गई &#8216;फोटो&#8217; बनकर । अश्रुपूरित राष्ट्र और राष्ट्र के लोग, क्या रिक्शावाला, क्या मजदूर, क्या अधिकारी, क्या मंत्री, क्या संत्री, क्या जवान, क्या रक्षक, क्या व्यापारी, क्या राष्ट्रपति, क्या प्रधानमंत्री, क्या अखबार वाले, क्या गाना गुनगुनाने वाले, क्या राग अलापने वाले, क्या सुर साधने वाले &#8211; सभी अपने-अपने अश्रुपूरित आखों से, अवरुद्ध कंठ से लता मंगेशकर की आत्मा को शांति हेतु अदृश्य शक्ति से याचना कर रहे हैं</strong>।  </p>
<p>92-वर्षीय लता मंगेशकर के पार्थिव शरीर को पूरे राजकीय सम्मान के साथ मुंबई के शिवाजी पार्क में अग्नि को सुपुर्द कर दिया जायेगा। </p>
<p>भारत रत्न लता मंगेशकर भारत की सबसे लोकप्रिय और आदरणीय गायिका हैं जिनका छ: दशकों का कार्यकाल उपलब्धियों से भरा पड़ा है। जिनकी आवाज़ ने छह दशकों से भी ज़्यादा संगीत की दुनिया को सुरों से नवाज़ा है। भारत की &#8216;स्‍वर कोकिला&#8217; लता मंगेशकर ने 20 भाषाओं में 30,000 गाने गाये है। उनकी आवाज़ सुनकर कभी किसी की आँखों में आँसू आए, तो कभी सीमा पर खड़े जवानों को सहारा मिला। लता जी आज भी अकेली हैं, उन्होंने स्वयं को पूर्णत: संगीत को समर्पित कर रखा है।लेकिन उनकी पहचान भारतीय सिनेमा में एक पार्श्वगायक के रूप में रही है। अपनी बहन आशा भोंसले के साथ लता जी का फ़िल्मी गायन में सबसे बड़ा योगदान रहा है। </p>
<p>कुमारी लता दीनानाथ मंगेशकर का जन्म 28 सितम्बर, 1929 इंदौर, मध्यप्रदेश में हुआ था।उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर एक कुशल रंगमंचीय गायक थे। दीनानाथ जी ने लता को तब से संगीत सिखाना शुरू किया, जब वे पाँच साल की थी। उनके साथ उनकी बहनें आशा, ऊषा और मीना भी सीखा करतीं थीं। लता &#8216;अमान अली ख़ान साहिब&#8217; और बाद में &#8216;अमानत ख़ान&#8217; के साथ भी पढ़ीं। लता मंगेशकर हमेशा से ही ईश्वर के द्वारा दी गई सुरीली आवाज़, जानदार अभिव्यक्ति व बात को बहुत जल्द समझ लेने वाली अविश्वसनीय क्षमता का उदाहरण रहीं हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण उनकी इस प्रतिभा को बहुत जल्द ही पहचान मिल गई थी। लेकिन पाँच वर्ष की छोटी आयु में ही आपको पहली बार एक नाटक में अभिनय करने का अवसर मिला। शुरुआत अवश्य अभिनय से हुई किंतु आपकी दिलचस्पी तो संगीत में ही थी। </p>
<p>वर्ष 1942 में इनके पिता की मौत हो गई। इस दौरान ये केवल 13 वर्ष की थीं। नवयुग चित्रपट फिल्‍म कंपनी के मालिक और इनके पिता के दोस्‍त मास्‍टर विनायक (विनायक दामोदर कर्नाटकी) ने इनके परिवार को संभाला और लता मंगेशकर को एक सिंगर और अभिनेत्री बनाने में मदद की।</p>
<p>सफलता की राह कभी भी आसान नहीं होती है। लता जी को भी अपना स्थान बनाने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पडा़। कई संगीतकारों ने तो आपको शुरू-शुरू में पतली आवाज़ के कारण काम देने से साफ़ मना कर दिया था। उस समय की प्रसिद्ध पार्श्व गायिका नूरजहाँ के साथ लता जी की तुलना की जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे अपनी लगन और प्रतिभा के बल पर आपको काम मिलने लगा। लता जी की अद्भुत कामयाबी ने लता जी को फ़िल्मी जगत की सबसे मज़बूत महिला बना दिया था। </p>
<p><strong>लता जी को सर्वाधिक गीत रिकार्ड करने का भी गौरव प्राप्त है। फ़िल्मी गीतों के अतिरिक्त आपने ग़ैरफ़िल्मी गीत भी बहुत खूबी के साथ गाए हैं। लता जी की प्रतिभा को पहचान मिली सन् 1947 में, जब फ़िल्म “आपकी सेवा में” उन्हें एक गीत गाने का मौक़ा मिला। इस गीत के बाद तो आपको फ़िल्म जगत में एक पहचान मिल गयी और एक के बाद एक कई गीत गाने का मौक़ा मिला। इन में से कुछ प्रसिद्ध गीतों का उल्लेख करना यहाँ अप्रासंगिक न होगा। जिसे आपका पहला शाहकार गीत कहा जाता है वह 1949 में गाया गया “आएगा आने वाला”, जिस के बाद आपके प्रशंसकों की संख्या दिनोदिन बढ़ने लगी। इस बीच आपने उस समय के सभी प्रसिद्ध संगीतकारों के साथ काम किया। अनिल बिस्वास, सलिल चौधरी, शंकर जयकिशन, एस. डी. बर्मन, आर. डी. बर्मन, नौशाद, मदनमोहन, सी. रामचंद्र इत्यादि सभी संगीतकारों ने आपकी प्रतिभा का लोहा माना। लता जी ने दो आँखें बारह हाथ, दो बीघा ज़मीन, मदर इंडिया, मुग़ल ए आज़म, आदि महान फ़िल्मों में गाने गाये है। आपने “महल”, “बरसात”, “एक थी लड़की”, “बडी़ बहन” आदि फ़िल्मों में अपनी आवाज़ के जादू से इन फ़िल्मों की लोकप्रियता में चार चाँद लगाए। इस दौरान आपके कुछ प्रसिद्ध गीत थे: “ओ सजना बरखा बहार आई” (परख-1960), “आजा रे परदेसी” (मधुमती-1958), “इतना ना मुझसे तू प्यार बढा़” (छाया- 1961), “अल्ला तेरो नाम”, (हम दोनो-1961), “एहसान तेरा होगा मुझ पर”, (जंगली-1961), “ये समां” (जब जब फूल खिले-1965) इत्यादि।</strong></p>
<p>लता मंगेशकर का जन्‍म 28 सितंबर 1929 को इंदौर के मराठी परिवार में पंडित दीनदयाल मंगेशकर के घर हुआ। इनके पिता रंगमंच के कलाकार और गायक भी थे इसलिए संगीत इन्‍हें विरासत में मिली। लता मंगेशकर का पहला नाम &#8216;हेमा&#8217; था, मगर जन्‍म के 5 साल बाद माता-पिता ने इनका नाम &#8216;लता&#8217; रख दिया था।</p>
<p>सन 1974 में दुनिया में सबसे अधिक गीत गाने का &#8216;गिनीज़ बुक रिकॉर्ड&#8217; उनके नाम पर दर्ज है।अभी भी गाने की रिकॉर्डिंग के लिये जाने से पहले लता मंगेशकर कमरे के बाहर अपनी चप्पलें उतारती हैं। वे हमेशा नंगे पाँव गाना गाती हैं। कहा जाता है लता जी महज एक दिन के लिए स्कूल गई थी। इसकी वजह यह रही कि जब वह पहले दिन अपनी छोटी बहन आशा भोसले को स्कूल लेकर गई तो अध्यापक ने आशा भोसले को यह कहकर स्कूल से निकाल दिया कि उन्हें भी स्कूल की फीस देनी होगी। बाद में लता ने निश्चय किया कि वह कभी स्कूल नहीं जाएंगी। हालांकि बाद में उन्हें न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी सहित छह विश्वविद्यालयों में मानक उपाधि से नवाजा गया।</p>
<p>लता को अपने सिने करियर में मान-सम्मान बहुत मिले हैं। वे फिल्म इंडस्ट्री की पहली महिला हैं जिन्हें भारत रत्न और दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्राप्त हुआ। उनके अलावा सत्यजीत रे को ही यह गौरव प्राप्त है। वर्ष 1974 में लंदन के सुप्रसिद्ध रॉयल अल्बर्ट हॉल में उन्हें पहली भारतीय गायिका के रूप में गाने का अवसर प्राप्त है। लता की सबसे पसंदीदा फिल्म द किंग एंड आई है। हिंदी फिल्मों में उन्हें त्रिशूल, शोले, सीता और गीता, दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे और मधुमती पसंद हैं। वर्ष 1943 में प्रदर्शित ही फिल्म किस्मत उन्हें इतनी पसंद आई कि उन्होंने यह फिल्म तकरीबन पचास बार तक देखी थी।</p>
<p>लता ने मोहम्मद रफी के साथ सैकड़ो गीत गाए थे, लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया था जब उन्होंने रफी से बातचीत करना बंद कर दी थी। लता गानों पर रॉयल्टी की पक्षधर थीं, जबकि मोहममद रफी ने कभी भी रॉयल्टी की मांग नहीं की। दोनों का विवाद इतना बढ़ा कि मोहम्मद रफी और लता के बीच बातचीत भी बंद हो गई और दोनों ने एक साथ गीत गाने से इंकार कर दिया था। हालांकि चार वर्ष के बाद अभिनेत्री नरगिस के प्रयास से दोनों ने एक साथ एक कार्यक्रम में ‘दिल पुकारे’ गीत गाया।</p>
<p>कहा जाता है कि 1962 में लता 32 साल की थी तब उन्हें स्लो प्वॉइजन दिया गया था। लता की बेहद करीबी पदमा सचदेव ने इसका जिक्र अपनी किताब ‘Aisa Kahan Se Lauen’में किया है।हालांकि उन्हें मारने की कोशिश किसने की, इसका खुलासा आज तक नहीं हो पाया। लता मंगेशकर 6 फरवरी 2022 को मुंबई स्थित ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में सुरों की कोकिला लता मंगेशकर ने अपनी आखिरी सांस ली। </p>
<p><strong>लता मंगेशकर को फ़िल्म फेयर पुरस्कार (1958, 1962, 1965, 1969, 1993 और 1994) से अलंकृत किया गया। फिर राष्ट्रीय पुरस्कार (1972, 1975 और 1990) मिला। महाराष्ट्र सरकार पुरस्कार (1966 और 1967) उन्हें पुरस्कृत की। सन 1969 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। सन 1989 में उन्हें फ़िल्म जगत का सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहेब फाल्के पुरस्कार’ दिया गया। सन 1993 में फ़िल्म फेयर के &#8216;लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार&#8217; से सम्मानित किया गया।सन 1996 में स्क्रीन के &#8216;लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार&#8217; से सम्मानित किया गया। सन 1997 में &#8216;राजीव गांधी पुरस्कार&#8217; से सम्मानित किया गया। सन 1999 में पद्मविभूषण, एन.टी.आर. और ज़ी सिने के &#8216;लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार&#8217; से सम्मानित किया गया। सन 2000 में आई. आई. ए. एफ.(आइफ़ा) के &#8216;लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार&#8217; से सम्मानित किया गया। सन 2001 में स्टारडस्ट के &#8216;लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार&#8217;, नूरजहाँ पुरस्कार, महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सन 2001 में भारत सरकार ने आपकी उपलब्धियों को सम्मान देते हुए देश के सर्वोच्च पुरस्कार “भारत रत्न” से विभूषित किया गया ।</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/lata-mangeshkar-loves-cooking-when-she-breathed-her-last-no-one">लता मंगेशकर को &#8216;खाना पकाना&#8217; बेहद पसंद था, इसलिए जब अंतिम सांस ली, देश में &#8216;लोगों के घरों में चूल्हे नहीं जले&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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