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	<title>manmohan singh Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>यमुना के किनारे निगम बोध घाट पर लाखों आत्माओं का जमघट, चट-चट-फट-फट-चटाक-पटाक-फुस्स ध्वनियों के बीच &#8216;शव&#8217; और &#8216;शिव&#8217; का मिलाप</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/lakhs-of-souls-gathered-at-nigam-bodh-ghat-on-the-banks-of-yamuna</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 30 Dec 2024 11:01:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[death]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>निगमबोध घाट (यमुना नदी के किनारे दिल्ली छोड़ पर) : शिव को श्मशान का मालिक माना गया है। &#8216;शव&#8217;, यानी पार्थिव शरीर का अंतिम स्थान &#8216;श्मशान&#8217; है। &#8216;शव&#8217; में जब छोटी इ की मात्रा लग जाती है, यानी जहाँ मनुष्य अथवा किसी भी जीव का अहंकारी रूपी शरीर का अस्त होता है, वहीँ शिव का अभ्युदय होता है। श्मशानों [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/lakhs-of-souls-gathered-at-nigam-bodh-ghat-on-the-banks-of-yamuna">यमुना के किनारे निगम बोध घाट पर लाखों आत्माओं का जमघट, चट-चट-फट-फट-चटाक-पटाक-फुस्स ध्वनियों के बीच &#8216;शव&#8217; और &#8216;शिव&#8217; का मिलाप</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>निगमबोध घाट (यमुना नदी के किनारे दिल्ली छोड़ पर) : शिव को श्मशान का मालिक माना गया है। &#8216;शव&#8217;, यानी पार्थिव शरीर का अंतिम स्थान &#8216;श्मशान&#8217; है। &#8216;शव&#8217; में जब छोटी इ की मात्रा लग जाती है, यानी जहाँ मनुष्य अथवा किसी भी जीव का अहंकारी रूपी शरीर का अस्त होता है, वहीँ शिव का अभ्युदय होता है। श्मशानों की अपनी एक ख़ास विशेषता होती है। बिना किस द्वेष के वह सबकी होती है। सभी शमशानों का राग, ताल, बोल, सुर, संगीत एक ही होता है। प्रत्येक श्मशानों की अपनी कहानियां होती हैं। प्रत्येक श्मशानों के लिए आगंतुक भी पूर्व से निर्धारित होते हैं। श्मशानों में धधकती चिताओं से निकलने वाली चट &#8211; चट &#8211; फट &#8211; फट -चटाक -फटाक -फुस्स जैसी ध्वनि को सभी लोग नहीं ग्राह्य कर सकते हैं।<br />
 <br />
<em>इस पृथ्वी पर श्मशान को एक बेहतरीन पाठशाला माना गया है जहाँ हर मनुष्य कुछ सीख सकता हैं। गौतम बुद्ध भी &#8216;भिक्षुक&#8217; होने के लिए, अपने शिष्यों को दीक्षा देने से पहले उन्हें न्यूनतम एक माह की अवधि के लिए अपने समीप के सबसे व्यस्त श्मशान में बैठकर देखने को कहते थे कि शरीर के साथ क्या हो रहा है। यह बात मेरे बाबूजी भी कहते थे कि श्मशानों की ध्वनि को, वातावरण में उपस्थित तेज को, पार्थिव शरीर से  ज्वालाओं को जैसे-जैसे वरन करते जाओगे, तुम्हारे इर्द-गिर्द एक ऐसी शक्ति का सृजन होगा जो तुम्हें अन्य मनुष्य से अलग कर देगा। कहते भी हैं कि समय, परिवर्तन, शक्ति, सृजन, संरक्षण और विनाश का प्रतिनिधित्व करता है श्मशान जहाँ एक तरफ काली का विभिन्न स्वरूप होता है, वहीँ शिव की उपस्थिति होती है। शास्त्रों के अनुसार, मातंगी, सिद्ध काली, धूमावती, आर्द्रपटी चामुण्डा, नीला, नील सरस्वती, घर्मटी, भर्कटी, उन्मुखी तथा हंसी ये सभी श्मशान-कालिका के भेद रुप हैं।</em> </p>
<p>बनारस पर कार्य करने के क्रम में विगत दस वर्षों में कितनी बार बनारस यात्रा किया, यह नहीं कह सकता हूँ। जितने बार बनारस पहुंचा दो श्मशानों की यात्रा करना अनिवार्य था। हरिश्चंद्र घाट और मणिकर्णिका घाट। इन घाटों में धधकती चिताओं से चट &#8211; चट &#8211; फट &#8211; फट -चटाक -फटाक -फुस्स जैसी ध्वनि को समझना अनिवार्य था। बनारस का दो श्मशान &#8211; हरिश्चंद्र घाट और मणिकर्णिका घाट &#8211; पर भले पार्थिव शरीरों का अंतिम संस्कार किया जाता है, लेकिन दोनों श्मशानों के लिए भी पार्थिव शरीरों का आगमन पूर्व सुनिश्चित होता है, अन्यथा हरिश्चंद्र घाट और मणिकर्णिका घाट की दूरी कितनी है? दोनों एक ही शहर में, एक ही गंगा प्रवाह के बीच एक किलोमीटर दूरी के अंदर ही अवस्थित हैं। लेकिन यहाँ भी मनुष्य के पार्थिव शरीरों का प्रारब्ध कार्य करता है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2-1-scaled.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2-1-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1555" class="aligncenter size-full wp-image-5989" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2-1-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2-1-300x182.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2-1-1024x622.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2-1-768x466.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2-1-1536x933.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2-1-2048x1244.jpg 2048w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<blockquote><p>इस पृथ्वी के प्रत्येक श्मशानों पर प्रत्येक व्यक्ति का नाम अंकित है। किसे अपने देश की मिट्टी में मिलना है, अपने गाँव, शहर, नदी के किनारे स्थित श्मशानों में अपने शरीर को त्यागकर आगे बढ़ना है &#8211; यह सभी बातें पूर्व नियोजित हैं। बाबूजी तो यह भी कहते थे जीवन में कोई कितना भी अर्जित कर ले, सैकड़ों, हज़ारों एकड़ भूमि का मालिक हो ले, सैकड़ों बैंकों का मालिक हो ले, अंतिम विश्राम के लिए महज तीन फुट चौड़ा और छह फुट लम्बा जगह के साथ-साथ साढ़े सात मन लकड़ी ही पर्याप्त है एक शरीर को मिट्टी में मिलने के लिए। पुष्प-माला-सुगंध आधी तो मानव निर्मित योजनाएं हैं।</p></blockquote>
<p>कोई आठ दशक पहले बाबूजी मणिकर्णिका पर साधना करने के बाद कामाख्या में अपनी साधना पूर्ण किये थे। वे कहते थे जब भी किसी श्मशान में खड़े होगे तो पहले आत्मा से स्वयं को श्मशानों की देवी को सौंप दो, फिर चतुर्दिक देखो, तुम्हें यथार्थ दिखेगा, सच दिखेगा। धधकती चिताओं पर ही तुम्हे वस्त्र दिखेंगे। वे सभी साज-श्रृंगार से परिपूर्ण दिखेंगे। अनेकानेक आत्माएं उनके चतुर्दिक खड़े, वार्तालाप करते, हँसते, मुस्कुराते, प्रसन्न दिखेंगे। ऐसा लगेगा जैसे उनकी दुनिया अलग है &#8211; निश्छल, पवित्र, समर्पित। शेष जो दिखेंगे, वे नग्न दिखेंगे। बाबूजी की बातों में बहुत ताकत होती थी। </p>
<p><strong>आज शाहजहानाबाद जिसका निर्माण कोई पौने चार शताब्दी पहले 1649 में हुआ था, के सामने स्थित निगमबोध घाट के प्रवेश द्वार पर खड़ा होकर बाबूजी की बातें याद आ रही है। प्रवेश द्वार पर लिखा भी देख रहा हूँ : &#8220;मुझे यहाँ तक पहुँचाने वालों तुम्हारा धन्यवाद &#8211; आगे हम अकेले ही चले जायेंगे।&#8221; सामने मानव-दानव-पशु-पक्षियों के जीवित शरीर को पार्थिव बनाकर निकलने वाली आत्माएं यमुना के किनारे विचरण करते देख रहा हूँ। उस दृश्य का अवलोकन कर रहा हूँ जब मुग़ल साम्राज्य के आने के कई सौ साल पहले से यमुना की धारा भी दिल्ली सल्तनत की मिट्टी को स्पर्श करते आगे बढ़ती थी। वजह भी था। यह तो इंद्रप्रस्थ था। कहते हैं इसी यमुना के किनारे ब्रह्मा को भी ज्ञान प्राप्त हुआ था जब वे इस स्थान पर यमुना में स्नान किये थे । </strong></p>
<p>यह भी कहा जाता है कि इसी स्थान पर युधिष्ठिर ने नारायण को साक्षी मानकर नीली छतरी वाले महादेव की स्थापना किये थे। और यह भी सत्य है कि भारतीय पौराणिक कथाओं को, इतिहास को न तो मुगलों ने मिटाया और ना ही अंग्रेजों ने। बहुत ही सम्मान के साथ मुग़ल बादशाह अपने शाहजहानाबाद के चौदह द्वारों में एक द्वार निगमबोध घाट को समर्पित किया। विद्वान और विदुषी कहते हैं कि महाभारत काल में भी यमुना नदी के किनारे इसी स्थान पर निगमबोध घाट अपने अस्तित्व में था। ख़ैर। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/4-scaled.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/4-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1550" class="aligncenter size-full wp-image-5990" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/4-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/4-300x182.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/4-1024x620.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/4-768x465.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/4-1536x930.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/4-2048x1240.jpg 2048w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p>दिल्ली सल्तनत को बाहर से बाँधने वाली सड़क रिंग रोड से यमुना की ओर जो रास्ता निगम बोध घाट की ओर बढ़ती है, मैं भी आगे बढ़ रहा हूँ। प्रवेश के साथ यमुना का पानी काफी दूर दिख रहा है। कौए, कुत्ते, चील, अन्य पक्षी यमुना के पानी में गिरे, परे, मरे, सड़े पदार्धों को भोज्य तलाश कर रहे हैं। आगे दाहिने हाथ कुछ &#8216;जीवित प्राणियों&#8217; के लिए कुर्सियां लगी दिख रही हैं और सामने उनके सम्बन्धियों, परिजनों का आत्मा रहित शरीर, यानी उनका पार्थिव शरीर रखा है। कई शरीरों के लिए चिताओं का साज-श्रृंगार हो रहा है। बीच में भैरव भी &#8216;काल&#8217; बनकर निरीक्षण कर रहे हैं। उन पार्थिव शरीरों के पास उनके पूर्वजों की आत्माएं भी दिख रही हैं। सभी के चेहरों पर प्रसन्नता दिख रही हैं। यह अलग बात है कि सामने मेज पर बैठे लोग दुखी दिख रहे हैं, लेकिन बाबूजी की बातों को याद कर श्मशान की भव्यता दिखाई दे रही हैं। </p>
<blockquote><p>वैसे तो श्मशान पर महादेव और अग्नि का साम्राज्य होता है, लेकिन कुछ कदम पर बाएं हाथ श्मशान का देख-रेख करने वाले अधिकारी की कुर्सी देख रहा हूँ जो शीशे के दरवाजे के अंदर है। यहीं से बाएं हाथ एक रास्ता जाती है जिसका अंत एक ऊँचे स्थान पर सजे सज्जा पर होता हैं। उस सय्या से निकलती अग्नि की ज्वाला चतुर्दिक प्रज्वलित कर रहा है। यहाँ आस पास महादेव की तस्वीरें लगी है और फिर आगे दाहिने तथा बाएं यमुना तक पर दर्जनों धधकती चिताएं दिख रही हैं। इन चिताओं के बीच जहाँ मैं खड़ा हूँ चतुर्दिक लाखों की तायदात में प्रसन्नचित आत्माएं पंक्तिबद्ध हैं। यमुना के किनारे, यमुना के उस पार, पानी में,  नौका पर सभी आत्माएं,  कुछ आम लोगों की,  कुछ शिक्षाविदों की,  कुछ व्यवसायियों की,  कुछ चिकित्सकों की,  कुछ अधिवक्ताओं की, कुछ न्यायमूर्तियों की, कुछ आर्थिक रूप से विपन्नता का जीवन जीने वालों की, यानी समाज के सभी वर्गों के लोगों की, आम आदमियों की आत्माएं हाथ में पुष्प लिए पंक्तिबद्ध दिख रही थी। यहाँ न पूंजीवाद है और ना ही साम्यवाद। समाजवाद की वास्तविक परिभाषा ये आत्माएं ही लिख रही हैं।</p></blockquote>
<p>महात्मा का पार्थिव शरीर इस निगमबोध घाट से कोई दो तीन किलोमीटर दूर दिल्ली गेट और यमुना नदी के बीच अग्नि को सुपुर्द किया गया था कोई 76 वर्ष पहले। उनके आस पास ही पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, जगजीवन राम, राजीव गांधी, संजय गांधी, चरण सिंह, ललिता शास्त्री, जैल सिंह, शंकर दयाल शर्मा, देवी लाल, के आर नारायणन, चंद्रशेखर, पीवी नरसिम्हा राव, स्वामी वेंकटरमन, इंद्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोगों का पार्थिव शरीर अग्नि को सुपुर्द किया गया था। आज उन सभी लोगों की आत्माएं भी यहाँ पंक्तिबद्ध दिख रहे हैं। हो भी क्यों नहीं। दिल्ली सल्तनत का ही एक पति, एक पिता, एक शिक्षक, एक अधिकारी, एक अर्थशास्त्री, एक राजनेता, एक प्रधानमंत्री का पार्थिव शरीर रखा है जिसके सामने उसकी आत्मा हजारों आत्माओं के साथ खड़ी है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/3-scaled.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/3-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1619" class="aligncenter size-full wp-image-5991" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/3-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/3-300x190.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/3-1024x648.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/3-768x486.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/3-1536x972.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/3-2048x1296.jpg 2048w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p>यमुना किनारे दिल्ली सल्तनत में जंगे आज़ादी के कालखंड से अब तक मिट्टी में मिले पार्थिव शरीरों से निकली आत्माएं, चाहे यमुना के इस पार की हों या यमुना के उस पार की &#8211; सभी एक दूसरों का हाथ पकडे, बिना किसी &#8216;इज्म&#8217; के, यानि सोसिअलिज्म, कम्युनलिज्म आदि भेद-भाव के, मुस्कुराते विचरण करते देख रहा हूँ। बीच-बीच में नेहरू की निगाह, गांधी की निगाह, वाजपेयी जी की निगाह निगम बोध घाट पर शरीर के साथ बैठे महानुभावों की ओर मुड़ते देख रहा हूँ। आज इस शमशान की भूमि पर, यहाँ की लकड़ियों पर, यही की अग्नि पर, यहाँ के परिवेश पर भारतवर्ष के एक शिक्षक, अर्थशास्त्री, विशेषज्ञ, बेहतरीन इंसान और अंततः पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का &#8216;आत्मा रहित शरीर&#8217; का नाम लिखा है। यही उनका प्रारब्ध था। ऐसा लग रहा था कि  बनारस के मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर अग्नि के रास्ते महादेव के पास पहुंचे मानव शरीरों की आत्माओं का जीवित स्वरुप टकटकी निगाहों से डॉ. सिंह के पार्थिव शरीर की प्रतीक्षा कर रहा हो। मणिकर्णिका और हरिशचंद्र घाटों की आत्माओं के साथ-साथ निगम बोध गहत पर नश्वर शरीर को छोड़कर जाने वाली सभी आत्माएं डॉ. सिंह के सम्मान में प्रसन्न मुद्रा में स्वागतार्थ खड़े हों। सभी आत्माओं के चेहरों पर तेज था। </p>
<blockquote><p>आत्माएं आपस में वार्तालाप कर रही थीं।  कह रही थी &#8220;देखो जीवित लोग कैसे आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं और सिंह साहब आराम से सो रहे हैं। सिंह साहब एक शिक्षाविद थे। उन्हें क्या ? तभी नरसिम्हा राव की आत्मा सामने आयी और कही भी मैं भी राष्ट्र के लिए बहुत कुछ किया था, लेकिन मुझे भी लोग अनेक चीजों के लिए आरोपित किये। मेरे लिए में मेमोरियल की बात राजनीतिक उद्देश्य से की गई। अब इन जीवित लोगों को कौन समझाए कि हम सभी को वे नहीं देख सकते, लेकिन हम सभी उनके कारनामों को देख रहे हैं। वे सभी सोच रहे हैं वे ऐसे ही कुर्सियों से चिपके रहेंगे। उन्हें कौन समझाए कि उनके बदल में लालकिला के निर्माता शाहजहां और मुगलों के कई पीढ़ियों की आत्माएं बैठी हैं। निगमबोध घाट पर आत्माएं बात कर रही थी और कह रही थी भारत के चौदहवें प्रधानमंत्री डॉ. सिंह विचारक और विद्वान के रूप में प्रसिद्ध है। वह अपनी नम्रता, कर्मठता और कार्य के प्रति प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं। यमुना के किनारे निगमबोध घाट पर आत्माओं का जमघट, कह रही थी &#8216;शिक्षक की समाधि नहीं होती&#8217;, उनकी बातों को अमल करो, वही श्रद्धांजलि होगा। </p></blockquote>
<p>बहरहाल, सिंह साहब का पार्थिव शरीर को निगमबोध घाट तक साथ देने हेतु राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, सोनिया गांधी और अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे। डॉ. सिंह की विधवा गुरशरण कौर, बड़ी बेटी उपिंदर सिंह, दमन सिंह और अमृत सिंह भी अपने पिता के अंतिम दर्शन हेतु उपस्थित थी।  डॉ. सिंह का जन्म 26 सितम्बर 1932 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रान्त के एक गाँव में हुआ था। डॉ. सिंह ने वर्ष 1948 में पंजाब विश्वविद्यालय से मेट्रिक की शिक्षा पूरी की। उसके बाद उन्होंने अपनी आगे की शिक्षा ब्रिटेन के कैंब्रिज विश्वविद्यालय से प्राप्त की। सन 1957 में उन्होंने अर्थशास्त्र में प्रथम श्रेणी से ऑनर्स की डिग्री अर्जित की। इसके बाद 1962 में उन्होंने ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के नूफिल्ड कॉलेज से अर्थशास्त्र में डी.फिल किया। उन्होंने अपनी पुस्तक “भारत में निर्यात और आत्मनिर्भरता और विकास की संभावनाएं” में भारत में निर्यात आधारित व्यापार नीति की आलोचना की थी। </p>
<figure id="attachment_5992" aria-describedby="caption-attachment-5992" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/1-fotor-2024123016727.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/1-fotor-2024123016727.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-5992" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/1-fotor-2024123016727.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/1-fotor-2024123016727-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/1-fotor-2024123016727-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/1-fotor-2024123016727-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/1-fotor-2024123016727-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5992" class="wp-caption-text">डॉ. मनमोहन सिंह का पार्थिव शरीर निगमबोध घाट पर अग्नि की प्रतीक्षा में</figcaption></figure>
<p>पंजाब विश्वविद्यालय और दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में डॉ. सिंह ने शिक्षक के रूप में कार्य किया। इसी बीच में कुछ वर्षों के लिए उन्होंने यूएनसीटीएडी सचिवालय के लिए भी कार्य किया। इसी के आधार पर उन्हें 1987 और 1990 में जिनेवा में दक्षिण आयोग के महासचिव के रूप में नियुक्ति किया गया। 1971 में डॉ. सिंह वाणिज्य मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के रूप में शामिल हुए। 1972 में उनकी नियुक्ति वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार के रूप में हुई। डॉ. सिंह ने वित्त मंत्रालय के सचिव; योजना आयोग के उपाध्यक्ष; भारतीय रिजर्व बैंक के अध्यक्ष; प्रधानमंत्री के सलाहकार; विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। डॉ सिंह ने 1991 से 1996 तक भारत के वित्त मंत्री के रूप में कार्य किया जो स्वतंत्र भारत के आर्थिक इतिहास में एक निर्णायक समय था। आर्थिक सुधारों के लिए व्यापक नीति के निर्धारण में उनकी भूमिका को सभी ने सराहा है। भारत में इन वर्षों को डॉ. सिंह के व्यक्तित्व के अभिन्न अंग के रूप में जाना जाता है।</p>
<p>डॉ. सिंह को मिले कई पुरस्कारों और सम्मानों में से सबसे प्रमुख सम्मान है – भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण(1987); भारतीय विज्ञान कांग्रेस का जवाहरलाल नेहरू जन्म शताब्दी पुरस्कार (1995); वर्ष के वित्त मंत्री के लिए एशिया मनी अवार्ड (1993 और 1994); वर्ष के वित्त मंत्री के लिए यूरो मनी अवार्ड (1993), कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (1956) का एडम स्मिथ पुरस्कार; कैम्ब्रिज के सेंट जॉन्स कॉलेज में विशिष्ट प्रदर्शन के लिए राइट पुरस्कार (1955)। डॉ. सिंह को जापानी निहोन किजई शिम्बुन एवं अन्य संघो द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। डॉ. सिंह को कैंब्रिज एवं ऑक्सफ़ोर्ड तथा अन्य कई विश्वविद्यालयों द्वारा मानद उपाधियाँ प्रदान की गई हैं। डॉ. सिंह ने कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों और सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। उन्होंने 1993 में साइप्रस में राष्ट्रमंडल प्रमुखों की बैठक में और वियना में मानवाधिकार पर हुए विश्व सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया है।</p>
<figure id="attachment_5993" aria-describedby="caption-attachment-5993" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2-fotor-2024123016659.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2-fotor-2024123016659.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-5993" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2-fotor-2024123016659.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2-fotor-2024123016659-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2-fotor-2024123016659-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2-fotor-2024123016659-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2-fotor-2024123016659-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5993" class="wp-caption-text">राजकीय सम्मान</figcaption></figure>
<p>अपने राजनीतिक जीवन में डॉ. सिंह 1991 से भारतीय संसद के उच्च सदन (राज्य सभा) के सदस्य रहे जहाँ वे 1998 से 2004 तक विपक्ष के नेता थे। डॉ. सिंह ने 2004 के आम चुनाव के बाद 22 मई 2004 को प्रधानमंत्री के रूप के शपथ ली और 22 मई 2009 को दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। सिंह ने एक दशक से अधिक समय तक अभूतपूर्व वृद्धि और विकास का नेतृत्व किया। डॉ. सिंह के नेतृत्व में, भारत ने अपने इतिहास में सबसे अधिक वृद्धि दर देखी, जो औसतन 7.7% रही और लगभग दो ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन गई। डॉ. सिंह के सत्ता में आने के बाद भारत दसवें स्थान से उछलकर 2014 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया, जिससे लाखों लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठा। डॉ. सिंह के भारत के विचार के मूल में सिर्फ़ उच्च विकास ही नहीं बल्कि समावेशी विकास और ऐसी लहरों का विश्वास था जो सभी नावों को ऊपर उठा सकें। यह विश्वास उन विधेयकों के पारित होने में निहित था, जिन्होंने नागरिकों को भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, काम का अधिकार और सूचना का अधिकार सुनिश्चित किया। डॉ. सिंह की अधिकार-आधारित क्रांति ने भारतीय राजनीति में एक नए युग की शुरुआत की।</p>
<p>जुलाई 1991 में, डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने बजट भाषण का समापन इन शब्दों के साथ किया, &#8220;दुनिया की कोई भी ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका समय आ गया है। मैं इस सम्मानित सदन को सुझाव देता हूं कि दुनिया में एक प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में भारत का उदय एक ऐसा ही विचार है।&#8221; यहीं से उनके भारत के विचार की शुरुआत हुई। यह वह दौर था जिसने भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर किया और डॉ. सिंह की एक नवोन्मेषी विचारक और प्रशासक के रूप में साख को भी चमकाया। हालांकि, डॉ. सिंह के विश्वासों और सार्वजनिक सेवा के प्रति उनके समर्पण की नींव उनके बीसवें दशक की शुरुआत और उनके करियर की शुरुआत में ही देखी जा सकती है। विकास के प्रति डॉ. सिंह की प्रतिबद्धता और उनकी अनेक उपलब्धियों को उन अनेक सम्मानों के माध्यम से मान्यता मिली है जो उन्हें प्रदान किए गए हैं। इनमें 1987 में पद्म विभूषण, 1993 में वित्त मंत्री के लिए यूरो मनी पुरस्कार, 1993 और 1994 में वित्त मंत्री के लिए एशिया मनी पुरस्कार और 1995 में भारतीय विज्ञान कांग्रेस का जवाहरलाल नेहरू जन्म शताब्दी पुरस्कार शामिल हैं।</p>
<figure id="attachment_5994" aria-describedby="caption-attachment-5994" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/3-fotor-2024123016755.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/3-fotor-2024123016755.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-5994" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/3-fotor-2024123016755.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/3-fotor-2024123016755-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/3-fotor-2024123016755-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/3-fotor-2024123016755-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/3-fotor-2024123016755-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5994" class="wp-caption-text">राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री का अंतिम श्रद्धांजलि </figcaption></figure>
<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहाँ कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी के निधन ने हम सभी के हृदय को गहरी पीड़ा पहुंचाई है। उनका जाना, एक राष्ट्र के रूप में भी हमारे लिए बहुत बड़ी क्षति है। विभाजन के उस दौर में बहुत कुछ खोकर भारत आना और यहां जीवन के हर क्षेत्र में उपलब्धियां हासिल करना, ये सामान्य बात नहीं है। अभावों और संघर्षों से ऊपर उठकर कैसे ऊंचाइयों को हासिल किया जा सकता है, उनका जीवन ये सीख भावी पीढ़ी को देता रहेगा। एक नेक इंसान के रूप में, एक विद्वान अर्थशास्त्री के रूप में और रिफॉर्म्स के प्रति समर्पित लीडर के रूप में उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। एक अर्थशास्त्री के रूप में उन्होंने अलग-अलग स्तर पर भारत सरकार में अनेक सेवाएं दीं। एक चुनौतीपूर्ण समय में उन्होंने रिजर्व बैंक के गवर्नर की भूमिका निभाई।&#8221;<br />
व्हाइट हाउस से जारी बयान में कहा गया है कि &#8216;आज संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच सहयोग का अभूतपूर्व स्तर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की रणनीतिक दृष्टि और राजनीतिक साहस के बिना संभव नहीं होता।&#8217; अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के निधन पर दुख जताते हुए उन्हें सच्चा राजनेता बताया। व्हाइट हाउस की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि भारत और अमेरिका के बीच आज जिस तरह का सहयोग है, वह मनमोहन सिंह के विजन के बिना संभव नहीं था। मनमोहन सिंह साल 2004 से 2014 तक 10 साल तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। गुरुवार रात को 92 साल की उम्र में मनमोहन सिंह का निधन हो गया। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/lakhs-of-souls-gathered-at-nigam-bodh-ghat-on-the-banks-of-yamuna">यमुना के किनारे निगम बोध घाट पर लाखों आत्माओं का जमघट, चट-चट-फट-फट-चटाक-पटाक-फुस्स ध्वनियों के बीच &#8216;शव&#8217; और &#8216;शिव&#8217; का मिलाप</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>लालू यादव, राहुल गांधी, तेजस्वी यादव जैसे नेताओं को पार्श्ववर्ती प्रवेश (लेटरल इंट्री) की आलोचना करना शोभा नहीं देता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Aug 2024 06:28:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bjp]]></category>
		<category><![CDATA[congress]]></category>
		<category><![CDATA[criticism]]></category>
		<category><![CDATA[examination]]></category>
		<category><![CDATA[lateral entri]]></category>
		<category><![CDATA[manmohan singh]]></category>
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		<category><![CDATA[upsc]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>रायसीना की ऊँची पहाड़ी से (नई दिल्ली) : मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह अहलूवालिया, अशोक देसाई, नंदन नीलेकणी, जगदीश भगवती,  राकेश मोहन, अरविंद विरमानी,  टी.एन. श्रीनिवासन, डॉ. वर्गीज़ कुरियन, प्रकाश टंडन जैसे सैकड़ों लोग &#8216;पिछली गली&#8217; से &#8216;नौकरशाह&#8217; बने। आज 940 करोड़+ रुपए चारा घोटाला कांड के अभियुक्त लालू प्रसाद यादव, नवमीं कक्षा पास उनके कनिष्ठ पुत्र तेजस्वी यादव या फिर कांग्रेस [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रायसीना की ऊँची पहाड़ी से (नई दिल्ली) : मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह अहलूवालिया, अशोक देसाई, नंदन नीलेकणी, जगदीश भगवती,  राकेश मोहन, अरविंद विरमानी,  टी.एन. श्रीनिवासन, डॉ. वर्गीज़ कुरियन, प्रकाश टंडन जैसे सैकड़ों लोग &#8216;पिछली गली&#8217; से &#8216;नौकरशाह&#8217; बने। आज 940 करोड़+ रुपए चारा घोटाला कांड के अभियुक्त लालू प्रसाद यादव, नवमीं कक्षा पास उनके कनिष्ठ पुत्र तेजस्वी यादव या फिर कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी के मुख से &#8220;पार्श्ववर्ती प्रवेश (लेटरल इंट्री)&#8221; की आलोचना करना शोभा नहीं देता। सभी अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा के हक़ के नाम पर राजनीति कर रहे हैं, जो दुःखद है। जिसे आलोचना करनी चाहिए, या जिसे सरकार के इस फैसले के विरूद्ध सड़क पर उतरना चाहिए, यानी &#8220;आईएएस ऑफिसर्स एसोसिएशन&#8217; आज उसके पास न तो हिम्मत है और ना ही दक्षता। दिल्ली के विजय चौक पर चर्चाएं आम हैं कि &#8216;यह एसोसिएशन अब मृतप्राय है।&#8217; सभी अधिकारी अब नौकरी करते हैं और सबों को अपनी-पानी नौकरी प्यारी है, स्वयं के लिए, परिवार के भरण-पोषण के लिए। </strong></p>
<p>आज जितने भी राजनेता या राजनीतिक पार्टियां इस विषय की आलोचना कर राजनीतिक अखाड़े में कबड्डी खेल रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल में पार्श्ववर्ती प्रवेश के द्वारा नियुक्ति की आलोचना कर रहे हैं, चाहे राहुल गाँधी भी क्यों न हों, भारतीय प्रसाशनिक सेवा का इतिहास इस बात का साक्षी है कि यह पद्दति देश में मुद्दत से चली आ रही है। नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल में इस पद्धति में एक पारदर्शी परिवर्तन यह किया गया है कि नियुक्ति की इस प्रक्रिया के तहत इसका दारोमदार संघ लोक सेवा आयोग को दिया गया है जो भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के लिए प्रतिवर्ष परीक्षा भी संचालित करता हैं। </p>
<p><strong>पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, रघुराम राजन, मोंटेक सिंह अहलूवालिया, शकणार आचार्य, अशोक देसाई, अरविन्द वीरमणि, जगदीश भगवती, नंदन नीलेकण जैसे सैकड़ों महानुभाव पूर्व में रहे हैं जो संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में बिना कलम घिसे भारत सरकार की ऊँची-ऊँची सिंहासन पर विराजमान हुए।</strong> </p>
<p>विगत दिनों संघ लोक सेवा आयोग ने पार्श्ववर्ती प्रवेश के जरिए सीधे 𝟒𝟓 संयुक्त सचिव, उप-सचिव और निदेशक स्तर की नौकरियां निकाली है जिनमें 10 संयुक्त सचिव और 35 निदेशक/उप सचिव के पद शामिल है। शुरुआत में सरकार 10 मंत्रालयों, मसलन, राजस्व विभाग, वित्तीय सेवा विभाग, आर्थिक कार्य विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, जहाजरानी मंत्रालय, नागर विमानन मंत्रालय, पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में विशेषज्ञ संयुक्त सचिवों को नियुक्त करेगी। </p>
<figure id="attachment_5713" aria-describedby="caption-attachment-5713" style="width: 1417px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/PM.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/PM.jpg" alt="" width="1417" height="1029" class="size-full wp-image-5713" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/PM.jpg 1417w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/PM-300x218.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/PM-1024x744.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/PM-768x558.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/PM-324x235.jpg 324w" sizes="auto, (max-width: 1417px) 100vw, 1417px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5713" class="wp-caption-text">क्या पता कलयह महिला खिलाड़ी भी भारत के खेलकूद की दुनिया का कर्ताधर्ता बन जाय</figcaption></figure>
<p>इन पदों पर आवेदन के लिये न्यूनतम आयु सीमा 40 वर्ष रखी गई है, जबकि अधिकतम आयु सीमा तय नहीं की गई है।इनका वेतन केंद्र सरकार के अंतर्गत काम करने वाले संयुक्त सचिव के समान होगा तथा अन्य सुविधाएं भी उसी अनुरूप मिलेंगी और इन्हें सर्विस रूल के तहत काम करना होगा। इस प्रकार संघ लोक सेवा आयोग से नियुक्त होने वाले संयुक्त सचिवों का कार्यकाल उनकी कार्य-निष्पादन क्षमता के अनुसार 3 से 5 साल का होगा। केवल अन्तर्वीक्षा के आधार पर इनका चयन होगा तथा मंत्रिमंडल सचिव की अध्यक्षता में बनने वाली कमेटी उनका इंटरव्यू लेगी। योग्यता के अनुसार सामान्य ग्रेजुएट और किसी सरकारी, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई, विश्वविद्यालय के अलावा किसी निजी कंपनी में 15 साल का अनुभव रखने वालों को चुना जाएगा। </p>
<blockquote><p>जुलाई 2017 में सरकार ने नौकरशाही में देश की सबसे प्रतिष्ठित मानी जाने वाली सिविल सेवाओं में परीक्षा के माध्यम से नियुक्ति के अलावा अन्य क्षेत्रों अर्थात पार्श्ववर्ती प्रवेश से प्रवेश का प्रावधान पर विचार करने की बात कही थी। सरकार चाहती है कि निजी क्षेत्र के अनुभवी उच्चाधिकारियों को विभिन्न विभागों में उपसचिव, निदेशक और संयुक्त सचिव स्तर के पदों पर नियुक्त किया जाए। इसके लगभग एक वर्ष बाद केंद्र सरकार ने पार्श्ववर्ती प्रवेश की अधिसूचना जारी करते हुए पदों के लिये आवेदन आमंत्रित किये थे। इसके अलावा, नीति आयोग ने एक रिपोर्ट में कहा था कि यह जरूरी है कि पार्श्ववर्ती प्रवेश के तहत विशेषज्ञों को मुख्यधारा में शामिल किया जाए। इसका उद्देश्य नौकरशाही को गति देने के लिये निजी क्षेत्र से विशेषज्ञों की तलाश करना था। जिसके तहत सबसे पहले विभिन्न विभागों में संयुक्त सचिव के 9 पदों के लिये निजी क्षेत्र के आवेदकों को चुना गया है जिसमें अंबर दुबे (नागरिक उड्डयन), अरुण गोयल (वाणिज्य), राजीव सक्सेना (आर्थिक मामले), सुजीत कुमार बाजपेयी (पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन), सौरभ मिश्रा (वित्तीय सेवाएँ), दिनेश दयानंद जगदाले (नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा), सुमन प्रसाद सिंह (सड़क परिवहन और राजमार्ग), भूषण कुमार (शिपिंग) और काकोली घोष (कृषि, सहयोग और किसान कल्याण) शामिल हैं। कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय को इन पदों के लिये 6077 आवेदन मिले थे।</p></blockquote>
<p>सरकार का तर्क है कि पार्श्ववर्ती प्रवेश के तहत उच्च पदों पर नियुक्ति कोई पहली बार नहीं की जा रही हैं, बल्कि इस प्रकार की नियुक्ति पूर्व में भी की जाती रही है। अंतर केवल इतना है कि इस बार इन नियुक्तियों के लिये आवेदन आमंत्रित किये गए हैं। दूसरी ओर इस प्रकार की नियुक्तियों का विरोध करने वालों का कहना है कि इससे संघ लोक सेवा आयोग एक असहाय संस्था बनकर रह जाएगी और आरक्षण व्यवस्था को भी नुकसान पहुँचेगा। सरकार का कहना है कि ऐसा करने से विकास की नई अवधारणा से नौकरशाही खुद को सीधे तौर पर जोड़ सकेगी। इसी प्रकार कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार नौकरशाही में सुधार करके काम करने की प्रक्रिया को सरल बनाना चाहती है, तो उसका विरोध नहीं होना चाहिये। </p>
<p><strong>निजी क्षेत्र से संयुक्त सचिवों की सीधी भर्ती ऐसा ही एक कदम है, क्योंकि निजी क्षेत्र में दक्षता और पारदर्शिता की मदद से ही कोई कामयाब हो सकता है, जबकि सरकारी तंत्र के लिये ऐसा होना आवश्यक नहीं। इसमें कोई दो राय नहीं कि नौकरशाही में सुधार की आवश्यकता है, लेकिन ऐसा करने से पहले इसे राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने की भी आवश्यकता है। देश में संयुक्त सचिव के कुल 341 पद हैं, जिनमें से 249 पदों पर IAS अधिकारी ही नियुक्त होते हैं तथा शेष 92 पदों पर विशेषज्ञों की नियुक्ति की जाती है, जो गैर-IAS भी होते हैं। लेकिन इसके लिए अब तक किसी तरह का विज्ञापन जारी नहीं किया जाता था और सरकार इन पदों पर नियुक्तियां कर देती थी। </strong></p>
<figure id="attachment_5714" aria-describedby="caption-attachment-5714" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Manmohan-singh-Statesman.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Manmohan-singh-Statesman.jpg" alt="" width="1200" height="800" class="size-full wp-image-5714" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Manmohan-singh-Statesman.jpg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Manmohan-singh-Statesman-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Manmohan-singh-Statesman-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Manmohan-singh-Statesman-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5714" class="wp-caption-text">डॉ मनमोहन सिंह भी तो ऐसे ही नौकरशाह बने थे</figcaption></figure>
<p>आज़ादी के चार साल बाद सं 1951 में प्रशासन की कार्यशैली पर एन.डी. गोरेवाला की रिपोर्ट &#8216;लोक प्रशासन पर प्रतिवेदन&#8217; नाम से आई। रिपोर्ट के अनुसार कोई भी लोकतंत्र स्पष्ट, कुशल और निष्पक्ष प्रशासन के अभाव में सफल नियोजन नहीं कर सकता। इस रिपोर्ट में अनेक उपयोगी सुझाव थे, लेकिन क्रियान्वयन नहीं हुआ। 1952 में केंद्र ने प्रशासनिक सुधारों पर विचार करने के लिए अमेरिकी विशेषज्ञ पॉल एपिलबी की नियुक्ति की। उन्होंने &#8216;भारत में लोक प्रशासन सर्वेक्षण का प्रतिवेदन&#8217; प्रस्तुत किया। इस रिपोर्ट में भी अनेक महत्त्वपूर्ण सुझाव थे, लेकिन जड़ता जस-की-तस बनी रही। स्वाधीनता के 19 वर्ष बाद 1966 में पहला प्रशासनिक सुधार आयोग बना, जिसने 1970 अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश की।इसके लगभग 30 वर्ष बाद 2005 में दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया गया था। नौकरशाही में पार्श्ववर्ती प्रवेश का पहला प्रस्ताव 2005 में आया था; लेकिन तब इसे सिरे से खारिज कर दिया गया। </p>
<p>इसके बाद 2010 में दूसरी प्रशासनिक सुधार रिपोर्ट में भी इसकी अनुशंसा की गई थी, लेकिन इसे आगे बढ़ाने में समस्याएँ आने पर सरकार ने इससे हाथ खींच लिये। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 में इसकी संभावना तलाशने के लिये एक कमेटी बनाई, जिसने अपनी रिपोर्ट में इस प्रस्ताव पर आगे बढ़ने की अनुशंसा की। नौकरशाही के बीच इस प्रस्ताव पर विरोध और आशंका दोनों रही थी, जिस कारण इसे लागू करने में विलंब हुआ। अंतत: पहले प्रस्ताव में आंशिक बदलाव कर इसे लागू कर दिया गया। पहले के प्रस्ताव के अनुसार सचिव स्तर के पद पर भी पार्श्ववर्ती प्रवेश की अनुशंसा की गई थी, लेकिन वरिष्ठ नौकरशाही के विरोध के कारण अभी संयुक्त सचिव के पद पर ही इसकी पहल की गई है। </p>
<p><strong>देश का नौकरशाही इतिहास इस बात का गवाह है कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक अर्थशास्त्री थे और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे। उन्हें 1971 में वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के तौर पर नियुक्त किया गया था और उन्होंने सिविल सेवा की परीक्षा नहीं दी थी। उन्हें 1972 में वित्त मंत्रालय का मुख्य आर्थिक सलाहकार भी बनाया गया था और यह पद भी संयुक्त सचिव स्तर का ही होता है। इसी प्रकार मनमोहन सिंह ने बतौर प्रधानमंत्री रघुराम राजन को अपना मुख्य आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया था और वे भी संघ लोक सेवा आयोग से चुनकर नहीं आए थे, लेकिन संयुक्त सचिव के स्तर तक पहुँच गए थे और बाद में रिज़र्व बैंक के गवर्नर बनाए गए थे। </strong></p>
<figure id="attachment_5715" aria-describedby="caption-attachment-5715" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Momntek-The-Print.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Momntek-The-Print.jpeg" alt="" width="1200" height="675" class="size-full wp-image-5715" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Momntek-The-Print.jpeg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Momntek-The-Print-300x169.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Momntek-The-Print-1024x576.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Momntek-The-Print-768x432.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5715" class="wp-caption-text">मोंटेक सिंह अहलूवालिया। तस्वीर: दी प्रिंट के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p>वित्त मंत्रालय में संयुक्त सचिव तथा योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया के अलावा शंकर आचार्य, राकेश मोहन, अरविंद विरमानी और अशोक देसाई ने भी पार्श्ववर्ती प्रवेश के माध्यम से सरकार में जगह पाए थे । जगदीश भगवती, विजय जोशी और टी.एन. श्रीनिवासन ने भी इसी प्रकार सरकार को अपनी सेवाएँ दी। इनके अलावा योगिंदर अलग, विजय केलकर, नीतिन देसाई, सुखमॉय चक्रवर्ती जैसे न जाने कितने नाम हैं, जिन्हें लैटरल एंट्री के ज़रिये सरकार में उच्च पदों पर काम करने का मौका मिला। राज्य स्तर पर देखें तो शशांक शेखर सिंह इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहे हैं, जो 2007 से 2012 के बीच उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के समय राज्य के कैबिनेट सचिव थे और IAS अधिकारी होने के बजाय एक पायलट थे। </p>
<p><strong>इन्फोसिस के प्रमुख कर्त्ता-धर्त्ताओं में एक नंदन निलेकणी भी इसी प्रकार आधार कार्ड जारी करने वाली संवैधानिक संस्था UIDAI के चेयरमैन नियुक्त किये गए थे। इसी प्रकार बिमल जालान ICICI के बोर्ड मेंबर थे जिन्हें सरकार में पार्श्ववर्ती प्रवेश मिली और वह रिज़र्व बैंक के गवर्नर बने। रिज़र्व बैंक के वर्तमान गवर्नर उर्जित पटेल भी पार्श्ववर्ती प्रवेश से इस पद पर आए हैं। पूर्व में इंदिरा गांधी ने मंतोश सोंधी की भारी उद्योग में उच्च पद पर बहाली की थी। इससे पहले वह अशोक लेलैंड और बोकारो स्टील प्लांट में सेवा दे चुके थे तथा उन्होंने ही चेन्नई में हैवी व्हीकल फैक्ट्री की स्थापना की थी। NTPC के संस्थापक चेयरमैन डी.वी. कपूर ऊर्जा मंत्रालय में सचिव बने थे। BSES के CMD आर.वी. शाही भी 2002-07 तक ऊर्जा सचिव रहे। </strong></p>
<p>लाल बहादुर शास्त्री ने डॉ. वर्गीज़ कुरियन को NDBB का चेयरमैन नियुक्त किया था, जो तब खेड़ा डिस्ट्रिक्ट कोआपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर यूनियन के संस्थापक थे। हिंदुस्तान लीवर के चेयरमैन प्रकाश टंडन को स्टेट ट्रेडिंग कॉरपोरेशन का प्रमुख बनाया गया था। केरल स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के चेयरमैन के.पी.पी. नांबियार को राजीव गांधी ने इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग की ज़िम्मेवारी सौंपी थी। इसी प्रकार उन्होंने सैम पित्रौदा को भी कई अहम ज़िम्मेदारियाँ सौंपी थी।जगदीश भगवती, विजय जोशी ने भी इसी प्रकार सरकार को अपनी सेवाएँ दीं। </p>
<figure id="attachment_5716" aria-describedby="caption-attachment-5716" style="width: 1536px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/nandan-nilekani-ET.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/nandan-nilekani-ET.jpg" alt="" width="1536" height="1536" class="size-full wp-image-5716" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/nandan-nilekani-ET.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/nandan-nilekani-ET-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/nandan-nilekani-ET-1024x1024.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/nandan-nilekani-ET-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/nandan-nilekani-ET-768x768.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/nandan-nilekani-ET-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/nandan-nilekani-ET-48x48.jpg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/nandan-nilekani-ET-96x96.jpg 96w" sizes="auto, (max-width: 1536px) 100vw, 1536px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5716" class="wp-caption-text">नंदन नीलेकणी।  तस्वीर: इकोनॉमिक टाइम्स के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p>देश में प्रशासनिक सुधारों की अनुशंसा करने के लिये अब तक दो प्रशासनिक सुधार आयोगों का गठन किया जा चुका है।सर्वप्रथम इस आयोग की स्थापना 5 जनवरी, 1966 को की गई थी और तब मोरारजी देसाई को इसका अध्यक्ष बनाया गया था। मार्च 1967 में मोरारजी देसाई देश के उपप्रधानमंत्री बन गए, तो के. हनुमंतैया को इसका अध्यक्ष बनाया गया।इस आयोग का काम यह देखना था कि देश में नौकरशाही को किस तरह से और बेहतर बनाया जा सकता है। तब इस आयोग ने अलग-अलग विभागों के लिये 20 रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें 537 बड़े सुझाव थे। सुझावों पर अमल करने की रिपोर्ट नवंबर 1977 में संसद के पटल पर रखी गई थी। तब से लेकर 2005 तक देश की नौकरशाही इसी आयोग की सिफारिशों के आधार पर चलती रही। </p>
<p>सिविल सेवा रिव्यू कमेटी के अध्यक्ष योगेन्द्र अलघ ने 2002 में अपनी रिपोर्ट में पार्श्ववर्ती प्रवेश का सुझाव देते हुए कहा था कि जब अधिकारियों को लगता है कि उनका प्रतियोगी आने वाला है तो उनके अंदर भी ऊर्जा आती है उनमें भी नया जोश आता है। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि अमेरिका में स्थायी सिविल सर्वेंट और मिड करियर प्रोफेशनल्स का चलन है। वहाँ पर इनकी सेवा ली जाती है। हमारे देश में भी अंतरिक्ष, विज्ञान तथा तकनीक, बायोटेक्नोलोजी, इलेक्ट्रॉनिक्स ऐसे विभाग हैं, जहाँ पर इनकी सेवा ली जाती है; लेकिन इसका विस्तार करने की ज़रूरत है तथा अन्य विभागों में भी इनकी सेवा ली जा सकती है। इसके अलावा समिति ने सिफारिश की थी कि जितने भी प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति होती है, उन्हें कम-से-कम तीन साल के लिये किसी निजी कंपनी में काम करने के लिये भेजा जाना चाहिए, ताकि वे निजी कंपनी में काम करने के तौर-तरीके सीखे और फिर उसे ब्यूरोक्रेसी में भी लागू करें, लेकिन सरकार ने इस सिफारिश को नकार दिया। </p>
<figure id="attachment_5717" aria-describedby="caption-attachment-5717" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Rakesh-Mohan-CSEP.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Rakesh-Mohan-CSEP.jpg" alt="" width="1600" height="1067" class="size-full wp-image-5717" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Rakesh-Mohan-CSEP.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Rakesh-Mohan-CSEP-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Rakesh-Mohan-CSEP-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Rakesh-Mohan-CSEP-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Rakesh-Mohan-CSEP-1536x1024.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5717" class="wp-caption-text">राकेश मोहन।  तस्वीर: सीएसईपी के सौजन्य से </figcaption></figure>
<p>इसके बाद 5 अगस्त, 2005 को वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया गया। इस आयोग को केंद्र सरकार को प्रत्येक स्तर पर देश के लिये एक सक्रिय, प्रतिक्रियाशिल, जवाबदेह और अच्छा प्रशासन चलाने के दौरान आ रही कठिनाइयों की समीक्षा करने और उसका समाधान खोजने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसके अलावा इस आयोग को भारत सरकार के केंद्रीय ढाँचे, शासन में नैतिकता, अधिकारियों को भर्ती करने की प्रक्रिया को चलाया जाने वाला प्रशासन, ई-प्रशासन, संकट प्रबंधन और आपदा प्रबंधन के बारे में भी रिपोर्ट तैयार करने का काम सौंपा गया था। इस प्रशासनिक आयोग ने अपनी रिपोर्ट में भारतीय नौकरशाही में भारी फेरबदल की संभावना की बात कही थी। इसने सुझाव दिया था कि संयुक्त सचिव के स्तर पर विशेषज्ञों की नियुक्ति की जाएँ तथा इन्हें बिना परीक्षा पास किये केवल इंटरव्यू के माध्यम से इस पद पर लाया जा सकता है। प्रशासनिक आयोग ने तय किया था कि अधिकारी की उम्र कम-से-कम 40 साल होनी चाहिये और उसे काम करते हुए कम से कम 15 साल का अनुभव होना चाहिये। </p>
<p>सरकार यह मानती है कि विगत 30-40 वर्षों में कई बार उच्चाधिकारियों की नियुक्ति इस प्रकार पार्श्ववर्ती प्रवेश से की गई है और अनुभव कोई बुरा नहीं रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकारियों के चयन का अधिकार संघ लोक सेवा आयोग को ही होना चाहिये।पार्श्ववर्ती प्रवेश की प्रक्रिया से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल सकता है। केंद्र सरकार की तुलना में भारत के राज्यों में भ्रष्टाचार अधिक है और यदि किसी को उत्तरदायी ठहराए बिना किसी पद पर नियुक्त कर दिया जाता है तो उस पर अनुशासनात्मक नियंत्रण रखना कठिन हो जाएगा। अधिकांश विशेषज्ञ उच्चाधिकारियों की इस प्रकार सीधी नियुक्ति के पक्ष में हैं, यदि उनकी नियुक्ति लंबे समय अर्थात् 20-30 वर्ष के लिये की जाए। </p>
<p>ऐसा करने से उनकी ज़िम्मेदारी निर्धारित की जा सकती है और उनके कार्य की समीक्षा भी हो सकती है। इस प्रकार की नियुक्तियाँ उन्हीं हालातों में की जानी चाहिये, जब किसी उच्च सेवा के तहत किसी कार्य विशेष को करने के लिये विशेषज्ञ उपलब्ध न हों। इस प्रकार की सीधी नियुक्तियों की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिये तथा उसमें किसी प्रकार के भाई-भतीजावाद का स्थान का पर कार्यकाल निश्चित होना चाहिये, क्योंकि इन्हें नीतियाँ बनाने से लेकर उन्हें लागू करने की प्रक्रिया में लंबे समय तक काम करना होता है। </p>
<figure id="attachment_5718" aria-describedby="caption-attachment-5718" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Dr-Rediff.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Dr-Rediff.jpg" alt="" width="1200" height="1204" class="size-full wp-image-5718" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Dr-Rediff.jpg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Dr-Rediff-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Dr-Rediff-1021x1024.jpg 1021w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Dr-Rediff-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Dr-Rediff-768x771.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Dr-Rediff-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Dr-Rediff-48x48.jpg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/Dr-Rediff-96x96.jpg 96w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5718" class="wp-caption-text">डॉ. वर्गीज़ कुरियन।  तस्वीर: रीडिफ़ के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p><strong>यह सरकारी नौकरी तीन सालों के लिए &#8216;ठेका-पट्टा&#8217; के आधार पर होगी। संयुक्त सचिव पद पर 15 साल, निदेशक के लिए 10 साल और उप-सचिव के लिए 7 साल का कार्य अनुभव माँगा गया है। वहीं, पदों के हिसाब से शैक्षणिक योग्यता भी निर्धारित की गई है। इसके लिए राज्य सरकार या केंद्र शासित प्रदेश में इसके समकक्ष पदों पर सरकारी नौकरी करने वाले अफसर आवेदन कर सकते हैं। इसके अलावा लोक उद्यमों, स्वायत्त निकायों, वैधानिक संगठनों, विश्वविद्यालय,  मान्यता प्राप्त शोष संस्थान, निजी संस्थान, बहुराष्ट्रीय संस्थान में कार्यरत लोग भी इन पदों के लिए आवेदन कर सकते हैं।</strong> </p>
<p>कहते हैं कि यह अलग बात है कि वैश्वीकरण ने शासन के काम को अत्यंत जटिल बना दिया है और यही वज़ह है कि इस क्षेत्र में विशेषज्ञता और कौशल की मांग पहले से बहुत अधिक बढ़ गई है। सिविल सेवाओं के लिये चयन का अधिकार संविधान के तहत केवल UPSC को दिया गया है, इसलिये इससे बाहर जाकर नियुक्तियाँ करना लोकतांत्रिक मूल्यों पर तो आघात होगा ही, साथ ही इस परीक्षा से जुड़ी मेरिट आधारित, राजनीतिक रूप से तटस्थ सिविल सेवा के उद्देश्य को भी क्षति पहुँचेगी। ऐसे में लैटरल एंट्री को लेकर उठ रहीं तमाम आशंकाओं को दूर करने का प्रयास सरकार को करना चाहिये।</p>
<figure id="attachment_5720" aria-describedby="caption-attachment-5720" style="width: 1301px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/rsz_dsc_8910-fotor-20240819115252.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/rsz_dsc_8910-fotor-20240819115252.jpg" alt="" width="1301" height="831" class="size-full wp-image-5720" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/rsz_dsc_8910-fotor-20240819115252.jpg 1301w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/rsz_dsc_8910-fotor-20240819115252-300x192.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/rsz_dsc_8910-fotor-20240819115252-1024x654.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/rsz_dsc_8910-fotor-20240819115252-768x491.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1301px) 100vw, 1301px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5720" class="wp-caption-text">संघ लोक सेवा आयोग और बाहर एक अभ्यर्थी</figcaption></figure>
<p><strong>ज्ञातव्य हो कि प्रशासन के प्रयोजनों के लिए भारत में सिविल सेवा की सबसे प्रारंभिक उत्पत्ति 1757 के बाद की अवधि में हुई थी जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत के कुछ हिस्सों में वास्तविक शासक थी। कंपनी ने अनुबंधित सिविल सेवा की शुरुआत की जिसमें सदस्यों को कंपनी के बोर्ड के साथ अनुबंध पर हस्ताक्षर करना पड़ा। कहते हैं कि 1854 में, मैकाले समिति ने सिफारिश की कि कंपनी के संरक्षण के आधार पर सेवा में नियुक्ति बंद कर दी जाए और योग्यता-आधारित प्रणाली स्थापित की जाए। 1855 के बाद, आईसीएस में भर्ती केवल प्रतिस्पर्धी परीक्षा के माध्यम से योग्यता पर आधारित थी। यह भारतीयों तक ही सीमित था। (मैकाले समिति का गठन भारतीय चार्टर अधिनियम 1853 के प्रावधानों के तहत किया गया था।) 1857 के विद्रोह के बाद, जब कंपनी का शासन समाप्त हो गया और सत्ता ब्रिटिश क्राउन को हस्तांतरित कर दी गई, यानी 1886 के बाद इस सेवा को इंपीरियल सिविल सर्विस (आईसीएस) कहा जाने लगा। इसे बाद में भारतीय सिविल सेवा कहा जाने लगा।</strong></p>
<p>सन 1886 में, सर चार्ल्स अम्फ़रस्टन एचिसन की अध्यक्षता में एचिसन आयोग ने सिफारिश की कि भारतीयों को भी सार्वजनिक सेवा में नियोजित किया जाए। सेवा में भारतीयों को शामिल करने का एक और प्रयास 1912 में हुआ जब इस्लिंगटन आयोग ने सुझाव दिया कि 25% उच्च पद भारतीयों द्वारा भरे जाने चाहिए। इसने यह भी सिफारिश की कि उच्च पदों पर भर्ती आंशिक रूप से भारत में और आंशिक रूप से इंग्लैंड में की जानी चाहिए। सन 1922 से आईसीएस परीक्षा भारत में आयोजित की जाने लगी। भारतीय लोक सेवा आयोग (आज का संघ लोक सेवा आयोग) की स्थापना 1 अक्टूबर 1926 को सर रॉस बार्कर की अध्यक्षता में की गई थी। 1924 में अखिल भारतीय सेवाओं को सेंट्रल सुपीरियर सर्विसेज के रूप में नामित किया गया था। 1939 के बाद, यूरोपीय लोगों की अनुपलब्धता के कारण सेवा में भारतीयों की संख्या बढ़ गई। स्वतंत्रता के बाद, ICS भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) बन गई।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/it-does-not-suit-leaders-like-lalu-yadav-rahul-gandhi-tejashwi-yadav-to-criticize-lateral-entry">लालू यादव, राहुल गांधी, तेजस्वी यादव जैसे नेताओं को पार्श्ववर्ती प्रवेश (लेटरल इंट्री) की आलोचना करना शोभा नहीं देता</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8220;जहां हमारा (हिन्दुस्तानियों का) लहू गिरा है, वह कश्मीर हमारा है&#8230;&#8221;</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/editorial/where-hindustans-blood-has-fallen-that-kashmir-is-ours</link>
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		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 May 2022 11:39:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[case]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>स्वतंत्र कश्मीर के लिये मुजाहिद यासिन मलिक को कल (25 मई 2022) उम्रकैद हो गयी। अभियोजन के (सरकारी) वकील नील कमल ने फांसी की सजा मांगी थी। यासिन के वकील अखण्ड प्रताप सिंह ने कहा कि &#8220;गौर किया जाये कि यासिन ने 1994 से हिंसा तज दी थी।&#8221; आरोपी ने कहा उसकी आस्था गांधीवादी हो [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/editorial/where-hindustans-blood-has-fallen-that-kashmir-is-ours">&#8220;जहां हमारा (हिन्दुस्तानियों का) लहू गिरा है, वह कश्मीर हमारा है&#8230;&#8221;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>स्वतंत्र कश्मीर के लिये मुजाहिद यासिन मलिक को कल (25 मई 2022) उम्रकैद हो गयी। अभियोजन के (सरकारी) वकील नील कमल ने फांसी की सजा मांगी थी। यासिन के वकील अखण्ड प्रताप सिंह ने कहा कि &#8220;गौर किया जाये कि यासिन ने 1994 से हिंसा तज दी थी।&#8221; आरोपी ने कहा उसकी आस्था गांधीवादी हो गयी है। मगर जज प्रवीण सिंह ने टोका कि &#8220;चौराचौरी की हिंसा के बाद बापू ने आंदोलन वापस ले लिया था। हिंसा की भर्त्सना की थी। यासिन ने ऐसा नहीं किया। लिहाजा आजीवन कारावास।&#8221;</strong></p>
<p>मगर यह सजा आंशिक है, केवल एक पक्ष में ही दी गयी है। यासिन के सह-अभियुक्तों में डा. फारुख अब्दुल्ला, तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त आरवीएस पेरिशास्त्री, राजीव गांधी भी नामित होने चाहिये। </p>
<p>कारण ? भारत सरकार की एक साजिशभरी हरकत ने इस भ्रमित भारतद्रोही (मगर कट्टर पाकिस्तान—विरोधी), प्रताप कालेज के स्नातक को आतंकवादी बना दिया। जम्मू—कश्मीर आजादी फ्रन्ट का सिरमौर बना दिया। हत्यारा बना दिया। कश्मीर घाटी में 1987 में राज्य विधानसभा का चुनाव था। एक पोलिंग बूथ पर यासिन तब मुस्लिम यूनाइटेड फ्रन्ट के प्रत्याशी मोहम्मद यूसुफ शाह का चुनाव एजेंट था। अमीर कदल विधानसभा क्षेत्र के निर्वाचन अधिकारी ने आधी रात के बाद यासिन को बताया कि &#8220;उसकी पार्टी का प्रत्याशी काफी बढ़त बनाये है। सुबह तक वह विजयी घोषित हो जायेगा। अत: अब घर जायें। आराम करें।&#8221; सरकारी तंत्र पर यकीन कर इक्कीस—वर्षीय यासिन घर चला गया। सुबह उसने अखबार में पढ़ा कि फारुख अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस का प्रतिद्वंदी विजयी घोषित हो गया। अंतिम चक्र की मतगणना में उसके वोट उसकी जमानत बचाने लायक भी पर्याप्त नहीं थे। जीत का तो सवाल ही नहीं था। विधानसभा में फारुख अब्दुल्ल तथा राजीव—कांग्रेस को बहुमत मिल गया।</p>
<p>मुझसे एक इन्टर्व्यू में (श्रीनगर 3 जनवरी 1991) को यासिन ने इस नाइंसाफी और फर्जीवाड़ा को सिलसिलेवार वर्णित कर बताया था। तब वह श्रीनगर में भारतीय वायुसेना के अधिकारियों की हत्या का अभियुक्त था। विशेष अनुमति पर सरकार ने फौजी हिरासत में यासिन से मुझे मिलाया था। मगर तब तक भारत के लोकतांत्रिक मतदान में उसकी आस्था नष्ट हो चुकी थी। प्रेस कांउसिल का सदस्य होने के कारण मैं ने अपने अध्यक्ष तथा सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज ने राजेन्द्र सिंह सरकारिया को यह घटना बतायी थी। इसके अलावा प्रेस कांउसिल की जांच समिति में मेरे सहसदस्य तथा सम्पादक पत्रकार बीजी वर्गीस को भी इस इन्टर्व्यू के बारे में बता दिया था। वर्गीस इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स तथा टाइम्स आफ इंडिया के संपादक रह चुके थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को भी इस बारे में पता था।</p>
<p>उसी दौर में वीपी सिंह सरकार के गृहमंत्री रहे मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया (महबूबा की अनुजा) का अपहरण हुआ था। पांच क्रूर आंतकवादियों की रिहाई के एवज में रुबिया मुक्त हुयी थी। नूरा कुश्ती के शक की सुई केन्द्रीय गृहमंत्री पर टिकी थी। अर्थात यासिन की बात वजनदार ही थी। भारत का सत्ता केन्द्र कश्मीरी आवाम को अब्दुल्ला—सल्तनत का गुलाम ही बनाये रखना चाहती थी। और इसीलिये यासिन ने हथियार उठा लिये, जो माओत्से तुंग ने पीड़ितों को सिखाया था। </p>
<p>हिरासत में पूछा भी था मुझसे यासिन ने: &#8220;क्या विकल्प है हम पीड़ितों के लिये?&#8221; मेरा सवाल था &#8220;कब तक लड़ोगे?&#8221; वह बोला &#8220;आप अंग्रेजों से कब तक लड़ते रहे?&#8221; समझाने की कोशिश में मैंने कहा : &#8220;गोरे लोग सात समुंदर दूर थे। हम तो पहाड़ के नीचे है।&#8221; वह नहीं माना। यासिन बोला पीढ़ी दर पीढ़ी हमारी जंग चलेगी। फिर मैंने जानना चाहा कि &#8220;कश्मीर यदि इस्लाम के नाम पर भारत से अलग हुआ था, तो आपके तीस करोड़ सहधर्मी भारत में किस आधार पर रह पायेंगे ?&#8221; यासिन का उत्तर बड़ा स्पष्ट और साफ था : &#8220;कश्मीरियों का कोई भी वास्ता इन हिन्दुस्तानी मुसलमानों से नहीं है। हमारी लड़ाई जुदा है।&#8221; आकर मैंने दिल्ली और लखनऊ में सबको बताया। मगर कोई भी मिल्लत का आदमी अथवा जमात ने यासिन को मजहब का वास्ता देकर समझाने की तनिक भी कोशिश नहीं की।</p>
<p><strong>यासिन मलिक त्रासद का शिकार रहा। अटल बिहारी वाजपेयी ने उसका पासपोर्ट जारी किया था। केन्द्रीय काबीना मंत्री जार्ज फर्नांडिस उससे मिले थे ताकि संवाद द्वारा समाधान निकले। सरदार मनमोहन सिंह ने यासिन को अपना राज्य अतिथि बनाया था। फिर बात क्यों नहीं बनी ? बेईमान मतदान प्रणाली जो जनमत से प्रवंचना करती है, वही एकमात्र कारण रही। </strong></p>
<p>यह बात 1977 की है। केंद्रीय चुनाव आयोग के अधिकारी मोरारजी देसाई के पास पूछने गये थे : &#8220;कश्मीर और बंगाल के विधानसभाई मतदान पर क्या आदेश है?&#8221; प्रधानमंत्री को पहले अचरज हुआ फिर आक्रोशित हुये । उनका सुझाव था :&#8221;निर्बाध, निष्पक्ष चुनाव हो।&#8221; नतीजन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट बंगाल में और शेख अब्दुल्ला श्रीनगर में पूरे बहुमत से जीते। तभी शेख ने कहा भी : &#8220;आजादी के बाद कश्मीर का यह पहला ईमानदार निर्वाचन हुआ।&#8221; शेख और मोरारजी परस्पर विरोध खेमों में थे। उन्हें भली भांति स्मरण रहा कि 1948 से तब तक (नेहरु युग से राजीव काल तक) चुनावी धांधली बड़ी आम बात थी। यासिन मलिक इसका जीवंत सबूत है। उसे पाकिस्तान धन देता रहा क्योंकि फारुख, मुफ्ती, उमर और महबूबा की भांति वह राजकोष से दूर—दूर ही था। कोर्ट में उसने अपनी हिंसक अपराधों को बेहिचक स्वीकारा है। राजीव गांधी के हत्यारों की भांति यासिन पर भी सरकार को कृपापात्र होना चाहिये। </p>
<p>यह पूछे जाने पर कि उसने शांति मार्ग क्यों नहीं अपनाया ? यासिन द्वारा दिये गये उत्तर पर अदालत को गौर करना चाहिये। यासिन ने कहा : &#8220;घाटी में बंदूक संस्कृति की इब्तिदा मुझसे हुयी है। हम चाहते है कि हमें सुना जाये।&#8221; सभी कश्मीरी भलीभांति समझते है कि भारतीयों का उत्सर्ग याद रखना चाहिए कि : &#8220;जहां हमारा (हिन्दुस्तानियों का) लहू गिरा है, वह कश्मीर हमारा है।&#8221; समझौते का आधार भी यही होगा।</p>
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