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	<title>maithili Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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		<title>कक्का यौ!! जुलुम भ गेल!!!✍मिथिला का शैक्षिक-दर 55% से ऊपर उठने में कुथ रहा है😢, मिथिला पाग के आकार को बढ़ाने का निवेदन हो रहा है😢</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Dec 2024 11:47:53 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मधुबनी / दरभंगा / पटना / नई दिल्ली: मैथिली और मिथिला के &#8216;विकास&#8217; से सम्बंधित कई वर्ष पहले गठित एक संगठन ने मिथिला के लोगों से निवेदन किया गया है कि पाग के निर्माणकर्ता पाग बनाते समय उसका आकार बढ़ाकर बनायें ताकि पहनने और पहनाने में असुविधा नहीं हो। यह बात विगत दिनों संगठन द्वारा [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/mithilas-educational-rate-is-struggling-to-rise-above-55">कक्का यौ!! जुलुम भ गेल!!!✍मिथिला का शैक्षिक-दर 55% से ऊपर उठने में कुथ रहा है😢, मिथिला पाग के आकार को बढ़ाने का निवेदन हो रहा है😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मधुबनी / दरभंगा / पटना / नई दिल्ली: मैथिली और मिथिला के &#8216;विकास&#8217; से सम्बंधित कई वर्ष पहले गठित एक संगठन ने मिथिला के लोगों से निवेदन किया गया है कि पाग के निर्माणकर्ता पाग बनाते समय उसका आकार बढ़ाकर बनायें ताकि पहनने और पहनाने में असुविधा नहीं हो। यह बात विगत दिनों संगठन द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया। जबकि आज़ादी के 78 वर्ष बाद आज भी मिथिला का शैक्षिक दर 55 फीसदी से आगे बढ़ने पर कुथ रहा है। </strong></p>
<p>कल भारत के संसद के बाहर, विजय चौक के रास्ते रायसीना हिल और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय के आस-पास मिथिला क्षेत्र के कर्मचारियों का कहना था कि &#8220;उक्त संगठन द्वारा पाग के मामले में जारी प्रेस विज्ञप्ति का प्रत्येक शब्द एक गहन शोध का विषय है। उनका कहना है कि &#8220;पाग का आकार बढ़ाने पर बल देने का सीधा अर्थ यही माना जायेगा कि &#8220;मिथिला में पाग पहनने वालों का माथा (शरीर का सबसे ऊपरी हिस्सा)  का आकार या तो बढ़ गया है या फिर पाग के निर्माण कर्ता पाग के महत्व को इतना महत्वहीन बना दिए हैं कि उन्हें औसतन मानव माथे का आकर का ज्ञान नहीं रहा और पाग का आकार छोटा होता गया।&#8221; </p>
<p><strong>गृहमंत्रालय के सामने चबुतरे पर खड़े एक अधिकारी कहते हैं: &#8220;यौ झाजी !!! एहि बात से इंकार नै कयल जा सकैत अछि कि मिथिला के बाल-बच्चा शैक्षिक दुनिया में अव्वल अछि आ आवि रहल अछि। लेकिन इ सब बच्चा, चाहे बेटी होय अथवा बेटा, वैह अव्वल आवि रहल अछि जेकर माता-पिता अपन-अपन जीवनक निर्माण हेतु, बच्चाक जीवनक निर्माण हेतु गामक सीमा पार केलैथ।&#8221; </strong></p>
<p>वे आगे कहते हैं: &#8220;अगर चेन्नई, बंगलुरु, मुंबई, अहमदाबाद, कानपुर, नागपुर, दिल्ली, भोपाल आदि शहरों में मुद्दत से रहने वाले, पढ़ाने-लिखाने वाले किसी महानुभाव की बेटी विश्व के पटल पर अपना हस्ताक्षर करती है तो दरभंगा और लहेरियासराय के जिलाधिकारी उसकी शैक्षिक योग्यता को या उसकी उपलब्धि को अपनी सांख्यिकी में नहीं जोड़ सकता है न? पाग के साथ भी वही हश्र है, जो दुखद है। मिथिला में रहने वाले, पाग पहनने वाले, पाग पहनाने वाले औसतन 90 से अधिक फीसदी लोग (अपवाद छोड़कर) पाग के रंग का महत्व, कौन किसे पहनायेगा, किस अवसर पर किस रंग का पाग पहनाया जायेगा नहीं जानते।&#8221;</p>
<blockquote><p>हकीकत यह है, वे आगे कहते हैं: &#8220;राजनीतिक गलियारे से लेकर, आर्थिक मंडी तक सभी अपना-अपना उल्लू सीधा करने के लिए पाग को एक हथकंडा बना लिए हैं। वजह यह है कि मिथिला में पाग का सांस्कृतिक महत्व में सोच से अधिक गिरावट आया है। पाग में रंग नहीं, राजनीतिक कसीदा कारी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इतना ही नहीं, पाग किसके सर पर कौन रखेगा, यह अब महत्वहीन बन गया है। आज स्थिति वैसी ही है जब भारत के लोग विदेशों में अपना ठिकाना, आसियाना बना लेते हैं तो भारत के प्रति उनकी राष्ट्रभक्ति अधिक हो जाती है। जबकि वे ग्रीन-कार्ड होल्डर होते हैं। भारत की राष्ट्रीयता को दर किनार का विदेशी राष्ट्रीयता ग्रहण करते हैं। आज मिथिला, मैथिली, पाग, लोक चित्रकला सबों की हालत ऐसी ही है।  सभी आज व्यापार का एक हिस्सा बन गया है। यही कारण है कि बाहर वाले लोगों के माथे के नाप के हिसाब से पाग का आकार निर्धारित करने को कहा जा रहा है। यह व्यवसाय है न कि संस्कृति और गरिमा की बात है।&#8221;</p></blockquote>
<figure id="attachment_5943" aria-describedby="caption-attachment-5943" style="width: 1424px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/lalu.jpeg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/lalu.jpeg" alt="" width="1424" height="721" class="size-full wp-image-5943" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/lalu.jpeg 1424w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/lalu-300x152.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/lalu-1024x518.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/lalu-768x389.jpeg 768w" sizes="(max-width: 1424px) 100vw, 1424px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5943" class="wp-caption-text">इन महानुभावों और मोहतरमा को तो आप सभी जानते ही हैं</figcaption></figure>
<p>इसका ज्वलंत दृष्टान्त राष्ट्रीय जनता दल के नेता और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और ऐतिहासिक चारा घोटाला कांड के अभियुक्त लालू प्रसाद यादव के नवमीं कक्षा पास पुत्र और उनकी अर्धांगिनी के सर पर पाग है। अगर मिथिला के लोग इन व्यक्तियों को पाग पहनाते हैं, तो इसका अर्थ सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक दुकानदारी ही माना जायेगा। क्या ये पाग पहनने के लायक है? तेजस्वी यादव और उनकी पत्नी को वैवाहिक जीवन पर बधाई देने का अनेकानेक तरीका हो सकता था परन्तु पाग पहनाकर पाग का अपमान भी किये। </p>
<p><strong>अगर उक्त संगठन के उक्त &#8216;प्रेस विज्ञप्ति&#8217; के मद्दे नजर मिथिला की शैक्षिक दर को देखें &#8211; जो माथे के विस्तार का सूचक हो सकता है और बड़े आकार के पाग की जरुरत हो सकती है &#8211; तो बिहार का औसत शैक्षिक दर 63.82 फीसदी है जिसमें मिथिला क्षेत्र में शैक्षिक दर 55.18 से अधिक नहीं हैं। प्रदेश में सबसे अधिक शैक्षिक दर भोजपुरी क्षेत्र में है जहाँ औसतन शैक्षिक दर 66.19 फीसदी है। भोजपुरी क्षेत्र में रोहतास क्षेत्र में शैक्षिक दर 73.37 फीसदी है। इतना ही नहीं, मगध क्षेत्र में शैक्षिक दर मिथिला की तुलना में 9 फीसदी अधिक है, यानी 64.92 फीसदी है। </strong></p>
<p>यही कारण है कि दिल्ली के राजनीतिक गलियारे में अपना हस्ताक्षर रखने वाले एक नौकरशाह कहते हैं: &#8220;पाग मिथिला का एक सम्मान है। मिथिला के प्रत्येक लोगों की इज्जत है। मिथिला का एक-एक बच्चा पाग के सांस्कृतिक गरिमा को पहले समझता था। पाग के रंगों की महत्ता को समझता था। वह यह भी समझता था कि किस रंग का पाग किस अवसर पर कौन पहनता है। पाग किसे पहनाया जाए । पाग पहनाने का शाब्दिक अर्थ और वास्तविक अर्थ क्या है। परन्तु, तकलीफ इस बात कि है कि मिथिला में अब राजनीति होती है और उस राजनीति में मिथिला का पाग धरल्ले से इस्तेमाल होता है। अन्यथा आज मिथिला पाग की यह स्थिति नहीं होती। मिथिला की संस्कृति की यह स्थिति नहीं होती।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_6337-scaled.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_6337-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="aligncenter size-full wp-image-5944" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_6337-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_6337-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_6337-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_6337-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_6337-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_6337-2048x1367.jpg 2048w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p><strong>अधिकारी आगे कहते हैं: &#8220;मिथिला में तो करवा चौथ नहीं होता है। वहां की महिलाएं अपने पति के लिए मधुश्रावणी पूजा करती हैं। लेकिन अब देखादेखी में मिथिला में ही नहीं प्रस्तावित मिथिला राज्य निर्माण के लिए सभी 24 जिलों, मसलन अररिया, बेगूसराय, दरभंगा, कटिहार, खगड़िया, किशनगंज, मधेपुरा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, सहरसा, समस्तीपुर, शिवहर, सीतामढ़ी, सुपौल, पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, वैशाली, लखीसराय, मुंगेर, शेखपुरा, जमुई, भागलपुर और बांका के अलावे पटना के कंकरबाग, शिवपुरी, लोहानीपुर, कदमकुआं और अन्य इलाकों सहित राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के अनेकानेक क्षत्रों में, मुंबई, कलकत्ता, चेन्नई और अन्य प्रांतों में मिथिला की महिलाएं अब करवा चौथ करती हैं। और मैथिली भाषा के स्थान पर स्थानीय भाषाओँ का प्रयोग कर &#8216;मैथिली भाषा&#8221; की दुकानदारी करने में तनिक भी लज्जा नहीं करते। विश्वास नहीं हो तो दिल्ली के करोलबाग स्थित दिल्ली सरकार की दारू की खरीद-बिक्री वाले कार्यालय (भवन) के निचले तल्ले में मैथिली &#8211; भोजपुरी अकादमी को ठिठुरते देख लीजिये।</strong> </p>
<p>अब अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मिथिला क्षेत्र के करीब 120 विधानसभा और 12 से अधिक लोकसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी का कब्ज़ा करने के लिए मैथिली और संस्कृत में भारत का संविधान छाप दिए तो क्या गलत किये? क्या समझे &#8211; सब राजनीति है। मिथिला के कितने लोग मैथिली और संस्कृत में संविधान को पढ़कर अपने अधिकार-कर्तव्य का बोध करेंगे? यह भी आने वाले दिनों में शोध का विषय होगा। वैसे मिथिला के लोग लालू प्रसाद यादव के छोटका ननकिरबा और उसकी कनिया का वैवाहिक जीवन लड्डू जैसा मीठा हो, जीवन पर्यन्त, लालू प्रसाद यादव जैसा ही उनके छोटका ननकिरबा का परिवार पढ़े, दर्जनों बच्चों का माता-पिता बने, पाग की लाज बचाये रखें &#8211; और क्या चाहिए। लोग तो यह भी कहते हैं कि अब मिथिला में पोखर कहाँ है कि प्रधानमंत्री कमल खिलाएंगे। </p>
<p>बहरहाल, अगर बिहार के किसी भी विद्वान-विदुषी के पास, दरभंगा राज परिवार से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सम्बन्ध रखने वाले महानुभावों के पास ऐसी कोई तस्वीर हो जहाँ महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह, महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह, राजा बहादुर विशेश्वर सिंह अथवा तत्कालीन राज परिवार के गणमान्य व्यक्ति अपने प्रदेश, राज्य में आये किसी भी गणमान्य महानुभावों को “मिथिला का पाग”, “सम्मानार्थ ही सही” पहनाए हों। अगर वे “मिथिला का पाग  उन आंगतुकों को नहीं पहनाए तो क्या हम समझेंगे कि उन दिनों “आगंतुकों का सम्मान नहीं होता था राज दरभंगा में, मिथिलाञ्चल में? या यह समझा जा सकता है कि दरभंगा राज अथवा उनकी नजर में “मिथिला-पाग” पहनने के लायक आगंतुक नहीं होते थे ? </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2020-11-05-15.09.37.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2020-11-05-15.09.37.jpg" alt="" width="1522" height="1469" class="aligncenter size-full wp-image-5945" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2020-11-05-15.09.37.jpg 1522w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2020-11-05-15.09.37-300x290.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2020-11-05-15.09.37-1024x988.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2020-11-05-15.09.37-768x741.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/2020-11-05-15.09.37-24x24.jpg 24w" sizes="(max-width: 1522px) 100vw, 1522px" /></a></p>
<p>आज़ादी के बाद, या यूँ कहें कि महाराजा कामेश्वर सिंह की मृत्यु तक मिथिला की संस्कृति जितनी मजबूत और सुरक्षित थी, आज नहीं है। यानि. अक्टूबर 1962 के बाद मिथिलांचल में मिथिला की संस्कृति को संरक्षित रखने वाला नहीं रहा। आज भले हम मिथिला लोक-चित्रकला को विश्व में प्रचार-प्रसार के माध्यम से फैलाएं, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि मिथिला लोक चित्रकला के कलाकार आज मृत प्राय हो गया है । समाज, सरकार अथवा मिथिलांचल के जिला प्रमुखों से इस ऐतिहासिक लोक चित्रकला को उतना संरक्षण नहीं मिलता है जितने का वह हकदार हैं। आज स्थिति ऐसी हो गयी है की मिथिलाञ्चल के लोग, विशेषकर पुरुष समुदाय, न केवल “पाग के वास्तविक महत्व” से अपरिचित हैं, बल्कि उसका सम्मान भी नहीं कर पाते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो इस पाग को “सब धन बाईस पसेरी” जैसा सबों के माथे पर सजाकर फोटो-सेशन नहीं करते, सोसल मीडिया पर या भारत की सड़कों पर “पाग का राजनीतिकरण नहीं होने देते, नहीं करते।” </p>
<p><strong>अगर मिथिलांचल के लोग, विशेषकर जो “पाग की अहमियत” समझते हैं, अपने ही घरों में, अपने ही समाज में, टोले-मुहल्लों में एक सर्वे करें की किनके – किनके घरों में “वास्तविक पाग (सफ़ेद रंग का अथवा भटमैला रंग का) है ? हाल, पीला, हरा, ब्लू, रंग बिरंगा, सतरंगी, लोक चित्रकला वाला नहीं; तो औसतन सैकड़े घरों की बात नहीं करें, हज़ार घरों में शायद दस अथवा बीस घरों में पाग की उपस्थिति दर्ज होगी। विश्वास नहीं तो हो आजमा कर देखिए। अब स्थिति यह है कि हम अपने घरों में, मिथिला के समाजों में पाग के महत्व को नहीं बता सके, वर्तमान पीढ़ी को नहीं बता सके, लेकिन देश के मुंबई, दिल्ली, कलकत्ता, चेन्नई, बंगलुरु, मंगलुरु, कानपूर, नागपुर, बराकर के अतिरिक्त देश के 718 जिलों में “पाग से अर्थ कमाने के लिए पाग का विपरण करने में जुटे हैं।” </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/aa-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/aa-1.jpg" alt="" width="501" height="540" class="alignleft size-full wp-image-5946" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/aa-1.jpg 501w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/aa-1-278x300.jpg 278w" sizes="auto, (max-width: 501px) 100vw, 501px" /></a></p>
<p>देवशंकर नवीन का कहना है : इसके अतिरिक्त, क्या सर्वजन मैथिलों ने आम सहमति से अपने पारंपरिक प्रतीक ‘पाग’ के स्वरूप में यह फेरबदल स्वीकार कर लिया? अब तक पाग पर किसी तरह की चित्रकारी की मान्यता नहीं थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि बाजार की चमक-दमक ने मैथिलों के सांस्कृतिक संकेत पर अपना कब्जा बना लिया!  दूसरा सवाल पाग की पारंपरिक मान्यता को लेकर है। बचपन से देखता आ रहा हूं कि अनेक शहरों में मैथिल जनता अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए महाकवि विद्यापति की बरसी मनाती है। उन आयोजनों में आमंत्रित विशिष्ट जनों का पाग-डोपटा से सम्मान करते और अपने सांस्कृतिक उत्कर्ष का दावा करते हुए मैथिल आत्ममुग्ध होते हैं। गीत, कविता, चुटकुला, नाच-नौटंकी सब आयोजित करते हैं। आयोजन का नाम रहता है ‘विद्यापति स्मृति पर्व’, पर विद्यापति वहां सिरे से गायब रहते हैं। आयोजन का लक्ष्य शायद ही कहीं साहित्य और संस्कृति का उत्थान या अनुरक्षण रहता हो!  </p>
<p>सतही मनोरंजन के अलावा वहां ऐसा कुछ भी नहीं दिखता, जिसमें ‘मैथिल’ का कोई वैशिष्ट्य सिर उठाए। ‘पाग’ जैसे सांस्कृतिक प्रतीक की अधोगति भी ऐसे अवसरों पर भली-भांति हो जाती है। दरअसल, मिथिला में ‘पाग’ का विशष्ट महत्त्व है। पर उल्लेखनीय है कि यह पूरी मिथिला का सांस्कृतिक प्रतीक नहीं है। ‘पाग’ की प्रथा मिथिला में सिर्फ ब्राह्मण और कायस्थ में है। इन जातियों के भी ‘पाग’ की संरचना में एक खास किस्म की भिन्नता होती है, जिसे बहुत आसानी से लोग नहीं देख पाते। पाग के अगले भाग में एक मोटी-सी पट्टी होती है, वहीं इसकी पहचान-भिन्नता छिपी रहती है। इससे आगे की व्याख्या यह है कि इन दो जातियों में भी सारे लोग पाग नहीं पहनते। परिवार या समाज के सम्मानित व्यक्ति इसे अपने सिर पर धारण करते हैं। यह उनके ज्ञान और सामाजिक सम्मान का सूचक है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Modi-with-Paag.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Modi-with-Paag.jpg" alt="" width="891" height="420" class="alignright size-full wp-image-5947" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Modi-with-Paag.jpg 891w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Modi-with-Paag-300x141.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Modi-with-Paag-768x362.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 891px) 100vw, 891px" /></a></p>
<p>समय के ढ़लते बहाव में धीरे-धीरे यह प्रतीक उन सम्मानित जनों के लिए भी विशिष्ट आयोजनों-अवसरों का आडंबरधर्मी प्रतीक बन गया। संरचना के कारण इसे धारण करना बहुत कठिन है। विनीत भाव से भी इसके धारक कहीं थोड़ा झुक जाएं, तो यह सिर से गिर जाता है। मैथिली में ‘पाग गिरना’ एक मुहावरा है, जिसका अर्थ है ‘पगड़ी गिरना’, ‘इज्जत गंवाना’। लिहाजा, संशोधित परंपरा में आस्था रखने वाले आधुनिक सोच के लोगों के सामने इसने बड़ी दुविधा खड़ी कर दी है। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/mithilas-educational-rate-is-struggling-to-rise-above-55">कक्का यौ!! जुलुम भ गेल!!!✍मिथिला का शैक्षिक-दर 55% से ऊपर उठने में कुथ रहा है😢, मिथिला पाग के आकार को बढ़ाने का निवेदन हो रहा है😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>​55 फीसदी शैक्षिक दर वाले &#8216;मिथिला क्षेत्र&#8217; में &#8216;मैथिली भाषा का संविधान&#8217; क्या करेगा जहाँ न रोटी है और ना ही नून😢हाँ, यह राजनीतिक उपचारात्मक उपाय अवश्य है, इसके लिए प्रधानमंत्री को धन्यवाद🙏</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/others/what-will-the-constitution-of-maithili-language-do-in-mithila-region-which-has-55-percent-education-rate</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Nov 2024 13:29:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>नई ​दिल्ली: ग्यारहवीं, बारहवीं और तेरहवीं लोक सभा के काल खंड (1996-2004) में तीन प्रधानमंत्री बने। अटल बिहार बाजपेयी, एच डी देवेगौड़ा और आइ.के. गुजराल प्रधानमंत्री कार्यालय में शोभायमान हुए। इन तीनों में वाजपेयी का कार्यकाल संतोषजनक रहा। परन्तु मिथिला के लोग संतुष्ट नहीं थे। राजनीतिक विशेषज्ञ इस बात को स्वीकार करेंगे कि मिथिला के [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/others/what-will-the-constitution-of-maithili-language-do-in-mithila-region-which-has-55-percent-education-rate">​55 फीसदी शैक्षिक दर वाले &#8216;मिथिला क्षेत्र&#8217; में &#8216;मैथिली भाषा का संविधान&#8217; क्या करेगा जहाँ न रोटी है और ना ही नून😢हाँ, यह राजनीतिक उपचारात्मक उपाय अवश्य है, इसके लिए प्रधानमंत्री को धन्यवाद🙏</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई ​दिल्ली:  ग्यारहवीं, बारहवीं और तेरहवीं लोक सभा के काल खंड (1996-2004) में तीन प्रधानमंत्री बने। अटल बिहार बाजपेयी, एच डी देवेगौड़ा और आइ.के. गुजराल प्रधानमंत्री कार्यालय में शोभायमान हुए। इन तीनों में वाजपेयी का कार्यकाल संतोषजनक रहा। परन्तु मिथिला के लोग संतुष्ट नहीं थे। राजनीतिक विशेषज्ञ इस बात को स्वीकार करेंगे कि मिथिला के लोग, यानी मतदाता मिथिलांचल की उपेक्षा के कारण भी वाजपेयी से एक-हाथ की दुरी रखे। यह वाजपेयी जानते थे। परिणाम यह हुआ कि जब तेरहवीं लोकसभा का गठन हुआ और वाजपेयी के हाथ देश का कमान आया, वे सर्वप्रथम मिथिला के लोगों की लंबित मांग को स्वीकार करते मैथिली भाषा को संविधान के आठवें सूची में स्थान दिए। वर्ष 2003 था।</strong></p>
<p>मैथिली भाषा को आधिकारिक भाषा बनने के बाद भी भले मिथिला का कल्याण नहीं हुआ हो उन लोगों के हाथों जो मैथिली भाषा को लेकर संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर ऊँची-ऊँची कुर्सियों पर विराजमान हुए, लेकिन &#8216;मैथिली भाषा&#8217; को एक सम्मानित स्थान मिलने के कारण मिथिलांचल के लोग लाल-पीला-हरा रंग का वस्त्र के स्थान पर गेरुआ वस्त्र धारण करने लगे। गली-कूची के नुक्कड़ों पर, चौराहों पर, बसों में, ट्रेनों में, खेत-खलिहानों में, पोखरों में &#8216;कमल&#8217; खिलाने लगे। इन विगत वर्षों में मैथिली भाषा का विकास भले नहीं हुआ हो, मैथिली भाषा में पूर्वी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, असम, पंजाब की भाषाओँ का आधिपत्य जमने लगा,  लेकिन मैथिली भाषा के प्रति &#8216;वेदना और संवेदना&#8217; होने के कारण संघ लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित परीक्षाओं में बैठने वाले अभ्यर्थियों को काल अवश्य हुआ, निजी तौर पर।</p>
<figure id="attachment_5912" aria-describedby="caption-attachment-5912" style="width: 956px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/shashinath-jha.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/shashinath-jha.jpg" alt="" width="956" height="960" class="size-full wp-image-5912" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/shashinath-jha.jpg 956w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/shashinath-jha-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/shashinath-jha-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/shashinath-jha-768x771.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/shashinath-jha-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/shashinath-jha-48x48.jpg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/shashinath-jha-96x96.jpg 96w" sizes="auto, (max-width: 956px) 100vw, 956px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5912" class="wp-caption-text">श्री शशिनाथ झा, पूर्व कुलपति, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय</figcaption></figure>
<p>समय बीतता गया और राजनीतिक गलियारे में, चाहे बिहार का  विधानसभा हो, विधान परिषद् हो, लोक सभा हो या राज्यसभा &#8211; मिथिलांचल की राजनीति अपना स्थान बनाने लगा। आज वाजपेयी के आदेश के 21 वर्षों के बाद भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में मिथिलांचल के लिए एक और राजनीतिक प्यादा चला &#8211; भारत के संविधान का मैथिली में अनुवादित कर संविधान के 75 वें वर्षगाँठ पर राष्ट्र के साथ मिथिला के लोगों को समर्पित किया गया। इससे पूर्व मिथिला के दो मर्मज्ञ विद्वान एन.एल. दास और वैराव लाल दास संविधान को मैथिली में अनुवादित कर प्रकाशित कर चुके हैं। दुर्भाग्य यह रहा की मिथिला के लोग शायद जाने भी नहीं होंगे। ​कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति कहते हैं: &#8220;मैथिली भाषा में संविधान प्रकाशित होना गौरव की बात है, लेकिन इसका व्यावहारिक उपयोग सिर्फ राजनीतिक अखाड़े में ही होगा।&#8221;</p>
<p>तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में मैथिली भाषा को संविधान के अष्ठम सूची में स्थान मिला। साल 2003 था। इस भाषा को आधिकारिक भाषा का दर्जा मिलने के बाद अखिल भारतीय स्तर की परीक्षाओं, खाकर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षाओं बैठने वाले अभ्यर्थियों ने भरपूर लाभ उठाया। अनेकानेक छात्र-छात्राएं [परीक्षाओं में मैथिली विषय लेकर उत्तीर्ण हुए।  महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थापित हुए। अष्ठम सूची में दर्ज होने के कोई 21 वर्ष बाद, भारत को गणराज्य घोषित होने के 75वें वर्ष के अवसर पर आज संविधान दिवस ​के दिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मैथिली और संस्कृत में संविधान का विमोचन किया। प्रधानमंत्री​ नरेंद्र मोदी, ​लोक सभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और अन्य नेता उपस्थित थे। इस अवसर पर एक विशेष डाक टिकट और सिक्का भी जारी किया गया। यह मैथिली भाषा के लिए एक बड़ा कदम ​है। इसमें कोई दो मत नहीं है। </p>
<figure id="attachment_5913" aria-describedby="caption-attachment-5913" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/H20241126171622.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/H20241126171622.jpg" alt="" width="2048" height="1308" class="size-full wp-image-5913" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/H20241126171622.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/H20241126171622-300x192.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/H20241126171622-1024x654.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/H20241126171622-768x491.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/H20241126171622-1536x981.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5913" class="wp-caption-text">भारत के उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ संविधान दिवस 2024 समारोह को संबोधित कर रहे हैं।</figcaption></figure>
<p>राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में संविधान अंगीकार किए जाने के 75 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में भाग ​लेते अपने अपने संबोधन में कहा कि 75 वर्ष पहले, आज ही के दिन, संविधान सदन के इसी केंद्रीय कक्ष में, संविधान सभा ने स्वतंत्र राष्ट्र के संविधान निर्माण का महती कार्य संपन्न किया था। उसी दिन, संविधान सभा द्वारा हम भारत के लोगों ने संविधान को अंगीकार, अधिनियमित और स्वयं को समर्पित किया था।​ हमारा संविधान हमारे लोकतांत्रिक गणराज्य की सुदृढ़ आधारशिला है। हमारा संविधान हमारी सामूहिक और व्यक्तिगत गरिमा सुनिश्चित करता है।​ प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज संविधान दिवस और संविधान की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर राष्ट्र को शुभकामनाएं दीं।​ एक्स पर अपनी एक पोस्ट में प्रधानमंत्री ने लिखा:​ “सभी देशवासियों को भारतीय संविधान की 75वीं वर्षगांठ के पावन अवसर पर संविधान दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।</p>
<p>उधर, अंतर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद ने संविधान दिवस पर भारतीय संविधान को विविध भारतीय भाषाओं में प्रस्तुत करने के लिए भारत सरकार का और अनुवादकों एवं प्रकाशको का धन्यवाद ज्ञापित किया है। डॉक्टर धनाकर ठाकुर संस्थापक अंतरराष्ट्रीय मैथिली परिषद एवं नेशनल मेडिकल ऑर्गेनाइजेशन ने आज संविधान दिवस पर देश की जनता को बधाई देते हुए कहा कि &#8220;मैथिली या  बिहार के अधिकांश भाग और झारखंड और पश्चिमी बंगाल के कुछ क्षेत्र के लोगों की मातृभाषा है। मैथिली करीब सात करोड़ लोगों द्वारा बोली जाती है और मैथिली में संविधान को पहले ही स्वर्गीय प्रोफेसर नित्यानंद लाल दास एवं भैरव लाल दास जी ने प्रस्तुत कर दिया था। अब सरकारी सहयोग से यह अधिकृत रूपसे  प्रकाशित हुआ है । संविधान की मूल भावनाओं का आदर करते हुए सभी भाषाओं में इसे प्रस्तुत करने  के इस कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय मैथिली परिषद में सराहा है और आशा की है कि इसकी ऑडियो बनाकर भारत सरकार का सूचना प्रसारण विभाग विविध भाषाओं में इसे प्रसारित करेगा तो वे लोग भी जो कि पढ़ लिख नहीं सकते हैं किंतु ऐसे  लाखों मजदूर भी सफर करते हुए या गांवों में रहते हुए भी जब संविधान को अपनी भाषाओं में सुनेंगे तो अपने अधिकारों के प्रति सचेत होंगे और अपने नागरिकोचित कर्तव्यों को  संपादित करेंगे तभी एक श्रेष्ठ भारत का निर्माण होगा जो कि विश्व का जगतगुरु होगा।&#8221;</p>
<figure id="attachment_5914" aria-describedby="caption-attachment-5914" style="width: 954px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/dr-dhankar-thakur.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/dr-dhankar-thakur.jpg" alt="" width="954" height="1065" class="size-full wp-image-5914" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/dr-dhankar-thakur.jpg 954w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/dr-dhankar-thakur-269x300.jpg 269w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/dr-dhankar-thakur-917x1024.jpg 917w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/dr-dhankar-thakur-768x857.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 954px) 100vw, 954px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5914" class="wp-caption-text">डॉक्टर धनाकर ठाकुर संस्थापक अंतरराष्ट्रीय मैथिली परिषद एवं नेशनल मेडिकल ऑर्गेनाइजेशन</figcaption></figure>
<p>राष्ट्रपति ने कहा कि देश की स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूर्ण होने पर सभी देशवासियों ने &#8216;आजादी का अमृत महोत्सव&#8217; मनाया। अगले वर्ष 26 जनवरी को हम अपने गणतंत्र होने की 75वीं वर्षगांठ मनाएंगे। ऐसे समारोह हमें राष्ट्र की अब तक की यात्रा को समझने और भविष्य की बेहतर योजना बनाने का अवसर प्रदान करते हैं। ऐसे समारोह हमारी एकता भी मजबूत करते हैं और दर्शाते हैं कि राष्ट्रीय लक्ष्यों को पाने के हमारे प्रयासों में हम सभी एकजुट हैं।​ राष्ट्रपति ने कहा कि हमारे संवैधानिक आदर्शों को कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के साथ ही सभी नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से शक्ति मिलती है। हमारे संविधान में प्रत्येक नागरिक के मौलिक कर्तव्यों का भी स्पष्ट उल्लेख है। भारत की एकता और अखंडता की रक्षा, समाज में सद्भाव को बढ़ावा देना, महिलाओं की गरिमा सुनिश्चित करना, पर्यावरण की रक्षा करना, वैज्ञानिक समझ विकसित करना, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा और राष्ट्र को नई ऊंचाईयों पर पहुंचाना नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों में शामिल है।</p>
<p><strong>राष्ट्रपति ने कहा कि संविधान की भावना के अनुरूप, आम लोगों का जीवन बेहतर बनाने के लिए कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका को मिलकर काम करने का दायित्व मिला है। उन्होंने कहा कि संसद द्वारा पारित अनेक अधिनियमों में लोगों की आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति मिली है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने समाज के सभी वर्गों,  विशेषकर कमजोर वर्गों के विकास के लिए अनेक कदम उठाए हैं। ऐसे निर्णय से लोगों के जीवन में सुधार हुआ है और उन्हें विकास के नए अवसर प्राप्त हो रहे हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें यह जानकर प्रसन्नता हुई कि सर्वोच्च न्यायालय के प्रयासों से देश की न्यायपालिका न्यायिक प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास कर रही है।​ राष्ट्रपति ने कहा कि हमारा संविधान एक जीवंत और प्रगतिशील दस्तावेज है। हमारे दूरदर्शी संविधान निर्माताओं ने बदलते समय की आवश्यकता अनुरूप नए विचारों को अपनाने की व्यवस्था बनाई थी। हमने संविधान द्वारा सामाजिक न्याय और समावेशी विकास से जुड़े कई महत्वाकांक्षी लक्ष्य हासिल किए हैं। एक नई सोच के साथ हम वैश्विक समुदाय के बीच भारत की नई पहचान स्थापित कर रहे हैं। हमारे संविधान निर्माताओं ने अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का निर्देश दिया था। आज हमारा देश अग्रणी अर्थव्यवस्था होने के साथ ही विश्व बंधु के रूप में भी अपनी उल्लेखनीय भूमिका निभा रहा है।</strong></p>
<p>​ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर (अवकाशप्राप्त) अरविन्द सुन्दर झाका कहना है कि &#8220;विगत दिनों जब प्राचीन भाषाओँ के मामले में सरकार का निर्णय हुआ था, मैथिली भाषा उपेक्षित रहा। भारत के संविधान को मैथिली भाषा में अनुवादित कर प्रकाशन करना और राष्ट्रूपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री जैसे गणमान्य लोगों के हाथों लोकार्पित करना प्रतिष्ठा की बात अवश्य है। लेकिन इसे राजनीति से भी अलग कर नहीं देखा जा सकता है। दो दशक पहले जब मिथिला के लोगों ने यह निर्णय ले लिए था कि वे भाजपा के लिए मतदान नहीं करेंगे, तो वाजपेयी जी मैथिली को संविधान के आठवें सूची में स्थान दिए। कुछ वर्ष पहले यह निर्णय लिया गया बिहार सरकार के किसी भी मंत्री/राजनेता को सम्मानित नहीं किया जायेगा, संविधान का मैथिली में अनुवाद हो गया। इससे आम नागरिक को क्या लाभ होगा, यह तो नहीं कह सकते, लेकिन भाषा को सम्मान मिला है, यह स्वागत योग्य है। इसे &#8216;रिमेडियल मेजर&#8217; कह सकते हैं।  वैसे मैथिली भाषा में संविधान का अनुवाद मिथिला के मूर्धन्य दास जी कर चुके हैं।&#8221;</p>
<p>राष्ट्रपति ने कहा कि लगभग तीन-चौथाई सदी की संवैधानिक यात्रा में राष्ट्र ने उन क्षमताओं को प्रदर्शित करने और परंपराएं विकसित करने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हमने जो पाठ सीखे हैं, उन्हें अगली पीढ़ियों तक पहुंचाना आवश्यक है। राष्ट्रपति ने कहा कि 2015 से प्रत्येक वर्ष &#8216;संविधान दिवस&#8217;  आयोजन युवाओं में हमारे राष्ट्र के संस्थापक दस्तावेज, संविधान के बारे में जागरूकता बढ़ाने में सहायक रहा है। उन्होंने देश के सभी नागरिकों से अपने आचरण में संवैधानिक आदर्शों को शामिल करने, मौलिक कर्तव्यों का पालन करने और वर्ष 2047 तक &#8216;विकसित भारत&#8217; के निर्माण के राष्ट्रीय लक्ष्य के प्रति समर्पण के साथ आगे बढ़ने का आग्रह किया।</p>
<figure id="attachment_5915" aria-describedby="caption-attachment-5915" style="width: 960px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/arvind-sundar-jha.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/arvind-sundar-jha.jpg" alt="" width="960" height="966" class="size-full wp-image-5915" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/arvind-sundar-jha.jpg 960w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/arvind-sundar-jha-298x300.jpg 298w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/arvind-sundar-jha-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/arvind-sundar-jha-768x773.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/arvind-sundar-jha-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/arvind-sundar-jha-48x48.jpg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/arvind-sundar-jha-96x96.jpg 96w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5915" class="wp-caption-text">ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर (अवकाशप्राप्त) अरविन्द सुन्दर झा</figcaption></figure>
<p>उप-राष्ट्रपति अपने भाषण में कहा कि आज का यह महत्वपूर्ण दिन इतिहास में मील का पत्थर है, क्योंकि हम भारत में अपने संविधान को अपनाने के 75 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहे हैं, जो विश्व के सबसे बड़े और सबसे ऊर्जस्वी लोकतंत्र के लिए उल्लेखनीय उपलब्धि है।​ उन्होंने कहा कि &#8216;यह हमारे संविधान के मूलभूत मूल्यों पर गंभीरता से विचार करने तथा इसके मार्गदर्शक सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि करने का अवसर है।​ यह उत्कृष्ट कृति हमारे संविधान निर्माताओं की गहन दूरदर्शिता और अटूट समर्पण का उपहार है, जिन्होंने लगभग तीन वर्षों में हमारे देश की नियति को आकार दिया, मर्यादा और समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत किया, और असंगत तथा मतभेदों वाले मुद्दों को सर्वसम्मति और समझदारी से सुलझाया।​&#8221;</p>
<p>​उप-राष्ट्रपति ने कहा कि आधुनिक काल में, जब संसदीय विमर्श में शिष्टाचार और अनुशासन की कमी हो गई है, आज हमें अपनी संविधान सभा की सुन्दर कार्यप्रणाली के प्राचीन गौरव को दोहराते हुए सभी समस्याओं को हल करने की आवश्यकता है। संविधान की प्रस्तावना के प्रारंभिक शब्द, &#8220;हम भारत के लोग&#8221; बहुत गहरे अर्थ रखते हैं। वे लोकतंत्र में नागरिकों के अंतिम अधिकार को स्थापित करते हैं,  और संसद उनकी आवाज के रूप में कार्य करती है। संविधान की प्रस्तावना प्रत्येक नागरिक को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का आश्वासन देती है। जब लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने की बात आती है तो यह हमारा &#8220;ध्रुवतारा&#8221; है और कठिन परिस्थितियों में हमारा &#8220;प्रकाश स्तंभ&#8221; है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि भारत का संविधान दुनिया में सबसे अनूठा है क्योंकि यह सबसे लंबा और एकमात्र सचित्र संविधान है, जिसमें हमारी सभ्यता की 5,000 वर्षों की यात्रा को कलाकृतियों में दर्शाया गया है।​ हमारा संविधान लोकतंत्र के तीन स्तंभों &#8211; विधायिका, ​ कार्यपालिका और न्यायपालिका &#8211; को बड़े शानदार तरीके से स्थापित करता है। इनमें से प्रत्येक की भूमिका निर्धारित है। लोकतंत्र का सबसे अच्छा पोषण तब होता है जब इसकी संवैधानिक संस्थाएँ अपने अधिकार क्षेत्र का पालन करते हुए आपसी सामंजस्य और एकजुटता के साथ काम करती हैं। सरकार के इन अंगों के कामकाज में, अपने-अपने क्षेत्र की विशिष्टता ही वह तत्व है जो भारत को समृद्धि और समानता की अभूतपूर्व ऊंचाइयों की ओर ले जाने में अभूतपूर्व योगदान देता है।</p>
<p>​बिहार राज्यपाल भी अपने सन्देश में कहा है की &#8217;75वें संविधान दिवस के अवसर पर भारतीय संविधान की देवभाषा संस्कृत के साथ-साथ बिहार के मिथिलांचल की भाषा मैथिली में अनूदित प्रतियों के विमोचन के लिए माननीय राष्ट्रपति जी के प्रति हार्दिक आभार। इससे मैथिली भाषा का गौरव बढ़ा है।​&#8217; यानी, विद्वान और विदुषी कहते हैं कि भारत का संविधान अब मैथिली भाषा में भी ​पढ़ा जा सकता हैं। मंगलवार को भारत की दो प्राचीन भाषा मैथिली और संस्कृत में अनुदित संविधान की प्रतियों का विमोचन किया ​गया। </p>
<p>अब व्यवहारिकता की नजर से भारत के संविधान को देखा जाय। बड़े-बड़े राजनितिक विद्वान और विश्लेषक तो यहाँ तक चीड़-फाड़ कर सिलाई कर रहे है कि मिथिलांचल में लोकसभा की एक दर्जन सीटें हैं और लगभग 100 से अधिक विधानसभा सीट है। ​और  इंकार नहीं किया जा सकता है कि मैथिली भाषा में प्रकाशित यह मिथिलांचल की राजनीतिक व्यवस्था का धुवीकरण में एक हथियार हो सकता है। बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्दे नजर भी इस मैथिली भाषा में अनुवादित संविधान को देखा जा सकता हैं। </p>
<p><strong>बहरहाल, आज़ादी के बाद बिहार में लगभग 32 वर्ष तक, यानि 1972 तक अर्थात पांचवीं विधानसभा तक जब तक श्रीकृष्ण सिंह, दीपनारायण सिंह, विनोदानंद झा, के बी सहाय, भोला पासवान शास्त्री, हरिहर सिंह मुख्यमंत्री रहे, ठीक ठाक था। पार्टी की पकड़ मतदाताओं के साथ-साथ विकास पर भी था। लेकिन पार्टी और नेताओं की पकड़ दारोगा प्रसाद राय, केदार पांडेय और अब्दुल ग़फ़ूर के मुख्यमंत्री बनने के बाद खिसकने लगी थी। प्रदेश में अनेकानेक कारणों से सकता के प्रति आवाज उठने लगी थी। सं 1975 में जगन्नाथ मिश्र के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही कांग्रेस समाप्ति के रास्ते पर अग्रसर हो गयी थी।जगन्नाथ मिश्र प्रदेश में मुख्यमंत्री तीन बार बने और अपने समय काल में उनसे प्रदेश को और कांग्रेस पार्टी को जितना आघात पहुंचा, शायद किसी भी कांग्रेसी नेता से नहीं हुआ होगा, मजबूती के साथ सत्ता में रही कांग्रेस संपूर्ण क्रांति, क्षेत्रीय दलों का उभार, वामपंथ का प्रभाव और कथित खेमाबंदी के कारण धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई। कांग्रेस की समाप्ति का फायदा प्रदेश के दूसरी राजनीतिक पार्टियों को खास कर, जनता दल यूनाइटेड और राष्ट्रीय जनता दल को हुई। </strong></p>
<p>आजादी के बाद बिहार में वर्ष 1952 में 276 सीटों के लिए हुए पहले विधानसभा चुनाव में 239 यानी 86.55 प्रतिशत सीटें हासिल करने वाली कांग्रेस महज 38 साल बाद 1990 में 324 सीटों के लिए हुए विधानसभा चुनाव में 71 यानी लगभग 22 प्रतिशत सीटों के आंकड़े पर ही सिमट कर रह गई। इतना ही नहीं, आने वाले वर्षों में इसके कमजोर पड़ते जनाधार को पूरे देश ने देखा। 1995 के चुनाव में तो इसकी सीट का गणित 29 सीट यानी लगभग नौ प्रतिशत सीट पर रुक गया। 2010 में 243 सीटों पर हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को महज चार सीटें यानी 1.65 प्रतिशत सीट ही मिल पाई। दरअसल, कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के विरोध में वर्ष 1975 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार की धरती से शुरू हुई “संपूर्ण क्रांति” को दबाने के लिए वर्ष 1977 में लागू राष्ट्रपति शासन में बिहार में सातवीं विधानसभा का चुनाव कराया गया। 318 सीटों पर हुए इस चुनाव में 214 सीटें जीतने वाली जनता पार्टी ने पहली बार कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती दी। जनता पार्टी ने कांग्रेस के विजय रथ को महज 57 सीटों पर ही रोक दिया। इस चुनाव में निर्दलीय को 25 और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) को 21 सीटें मिली थीं। </p>
<p>ऐसा नहीं है कि इतने खराब प्रदर्शन के बाद कांग्रेस हमेशा के लिए धराशायी हो गई। और आज जनता दल (यूनाइटेड) यानी नीतीश कुमार ‘स्वहित’ के लिए शनैः शनैः अपनी पार्टी के लोगों को भाजपा को सौंप रहे हैं। कहते हैं पार्टी में विभाजन के बावजूद कांग्रेस के एक गुट कांग्रेस (आई) के बैनर तले डॉ. जगन्नाथ मिश्रा के नेतृत्व में वह वर्ष 1980 के विधानसभा चुनाव में पूरी ताकत से फिर से उठ खड़ी हुई। 324 सीटों के लिए हुए इस चुनाव में कांग्रेस (आई) को 169 सीटें मिलीं जबकि जनता दल (एस) चरण ग्रुप को 42 और भाकपा को 23 सीटें मिलीं। कांग्रेस का कारवां यहीं नहीं रुका 1985 के चुनाव में उसने और बेहतर प्रदर्शन किया और 196 सीटों पर जीत दर्ज की वहीं लोक दल को 46 और आईएनडी को 29 सीटें मिलीं। लेकिन, इसके बाद के चुनावों में जो हुआ उसने कांग्रेस को पूरी तरह से कमजोर कर दिया और वह फिर उठ नहीं पाई। यही हश्र बाबू नीतीश कुमार का है और आने वाले दिनों में और ख़राब होने वाला है। राजनीतिक विशेषज्ञों के अलावे प्रदेश का मतदाता अधिक जानता हैं। और यह बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो जानते ही हैं। </p>
<p>बिहार में लोक सभा के 40 स्थान हैं जिसमें दर्जन से भी आधी स्थान मिथिलांचल में है। प्रदेश में 243 विधानसभा स्थान हैं। जब 2003 में मैथिली भाषा को आधिकारिक दर्जा मिला,  तब 243 सदस्यों वाली विधान सभा में 2005 में जनता दल (यु) विधायकों की संख्या 88 थी जो 2010 विधान सभा में बढ़कर 115 हुई। 2005 में सुशील मोदी (अब दिवंगत) की अगुआई में भाजपा की संख्या 55 थी जो 2010 में 91 हो गई। राष्ट्रीय जनता दल के विधायकों की संख्या 2005 में 54 थी, जो 2010 में घटकर 22 हो गई। पांच साल बाद 2015 विधानसभा में भाजपा 53 पर आ गयी, जनता दल (यु) 71 पर, कांग्रेस 27 पर और राष्ट्रीय जनता दल 80 पर पहुँच गयी। इसके अगले विधानसभा में आरजेडी 80 से 75 पर आयी, जबकि भाजपा 53 से 74 पर और जनता दल (यु) 71 से 43 पर। कांग्रेस 27 से लुढकर 19 पर पहुंची।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/others/what-will-the-constitution-of-maithili-language-do-in-mithila-region-which-has-55-percent-education-rate">​55 फीसदी शैक्षिक दर वाले &#8216;मिथिला क्षेत्र&#8217; में &#8216;मैथिली भाषा का संविधान&#8217; क्या करेगा जहाँ न रोटी है और ना ही नून😢हाँ, यह राजनीतिक उपचारात्मक उपाय अवश्य है, इसके लिए प्रधानमंत्री को धन्यवाद🙏</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>चापलूस, चाटुकारों से घिरे &#8216;स्वयंभू युवराज&#8217; मिथिला के लिए कुछ किये नहीं, अख़बारों में विज्ञापन देकर मिथिला नरेश की कीर्तियों को दोहराये &#8216;स्वहित&#8217; में, फिर &#8216;मैथिली भाषा&#8217; को &#8216;शास्त्रीय भाषाओँ की श्रेणी में&#8217; कैसे देखेंगे मिथिला के लोग ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 31 Oct 2024 05:10:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>दरभंगा / पटना / नई दिल्ली : दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह, जिन्होंने मिथिला क्षेत्र और मैथिली भाषा के विकास के लिए, अनेकानेक कार्य किये, की मृत्यु दिवस के 48 घंटे के अंदर देश के 14 वें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विगत 3 अक्टूबर 2024 को &#8216;मैथिली भाषा [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/how-do-you-expect-inclusion-of-maithili-in-the-list-of-classical-languages">चापलूस, चाटुकारों से घिरे &#8216;स्वयंभू युवराज&#8217; मिथिला के लिए कुछ किये नहीं, अख़बारों में विज्ञापन देकर मिथिला नरेश की कीर्तियों को दोहराये &#8216;स्वहित&#8217; में, फिर &#8216;मैथिली भाषा&#8217; को &#8216;शास्त्रीय भाषाओँ की श्रेणी में&#8217; कैसे देखेंगे मिथिला के लोग ?</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा / पटना / नई दिल्ली : दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह, जिन्होंने मिथिला क्षेत्र और मैथिली भाषा के विकास के लिए, अनेकानेक कार्य किये, की मृत्यु दिवस के 48 घंटे के अंदर देश के 14 वें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विगत 3 अक्टूबर 2024 को &#8216;मैथिली भाषा को छोड़कर&#8217;, मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने को मंजूरी दे दी। वहीँ दरभंगा राज के तथाकथित &#8216;गणमान्यों&#8217; के साथ-साथ मैथिली साहित्य और मैथिली भाषा के विकास का दावा करने वाले हज़ारों विद्वान और विदुषी मूक-बधिर बने रहे। केंद्रीय मंत्रिमंडल के इस फैसले के साथ ही शास्त्रीय भाषाओँ की श्रेणी में भाषाओँ की संख्या 11 हो गई। इससे पहले, भारत की छह शास्त्रीय भाषाओँ &#8211; तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, संस्कृत और उड़िया &#8211; को यह सम्मान मिला था। </strong></p>
<p>उधर, दरभंगा के महाराजाधिराज का हँसता-खेलता-मुस्कुराता शरीर &#8216;अचानक&#8217; पहली अक्टूबर, 1962 को &#8216;पार्थिव&#8217; हो गया था। मिथिला के कई करोड़ लोग, यहाँ तक कि &#8216;संतानहीन महाराजाधिराज&#8217; के छोटे भाई राजाबहादुर (जो कभी महाराजा नहीं हो सके) के तीसरी पीढ़ी के &#8216;स्वयंभू युवराज&#8217; भारत में पदार्पित ईस्ट इंडिया कंपनी के तर्ज पर बिहार की भूमि से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं में सत्तारूढ़ राजनेताओं के साथ &#8216;विज्ञापन के रूप में अपनी तस्वीरों का विपरण कर रहे हैं। दरभंगा में इस बात की चर्चाएं आम हैं कि भारतीय संसद के ऊपरी सदन के साथ-साथ बिहार विधान परिषद् में प्रवेश के लिए (मनोनीत) अथक प्रयास कर रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से नजदीक रहने वाले प्रायः सभी नेताओं के साथ &#8216;हर हाल&#8217; में संपर्क साधने की कोशिश कर रहे हैं ताकि &#8216;सदन का प्रवेश द्वार खुले।&#8217;</p>
<blockquote><p>लोग तो यह भी कहते हैं कि ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अपने पिता कुमार शुभेश्वर सिंह अथवा दादा राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह का नाम लिए बिना, महाराजाधिराज डॉ. कामेश्वर सिंह की मृत्यु के 60-वर्ष बाद भी तत्कालीन महाराजाओं की कीर्तियों को दोहरा रहे हैं। लोगों का कहना है कि इसका वजह यह है कि उनकी कीर्तियों को दोहराने के अलावे इनके पास कोई अन्य विकल्प भी नहीं है। महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद विगत छः वर्षों में इन महानुभावों के नेतृत्व वाले दरभंगा राज के एक-एक ईंट अलग होते मिथिला के लोग, मैथिली भाषा भाषी सभी देख रहे हैं। यहाँ तक कि महाराजाधिराज द्वारा स्थापित बिहार की आवाज आर्यावर्त, इंडियन नेशन और मिथिला मिहिर अख़बार तथा पत्रिका का नामोनिशान इन्हीं नेतृत्व के कालखंड में नेश्तोनाबूद हुआ है । चतुर्दिक चापलूसों, चाटुकारों, जी-हुज़ूरी करने वालों से घिरे स्वयंभू युवराज कहते नहीं थक रहे हैं कि मिथिला में विकास हो रहा है और वे महाराजा की, मिथिला की, दरभंगा राज की गरिमा को स्थापित करने जा रहे हैं। खैर। </p></blockquote>
<p>उधर, मिथिला क्षेत्र से चयनित विधायक से लेकर सांसद तक &#8216;मिथिला के लोगों को, मैथिली भाषा भाषियों को यह कहते भी नहीं थक रहे हैं कि &#8216;वे प्रधानमंत्री को मना लेंगे ताकि मैथिली भाषा को भी शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिल सके। लेकिन सवाल यह है कि &#8216;इतनी समृद्ध भाषा होने के बावजूद मैथिली भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा नहीं मिलने का क्या कारण हो सकता है? दरभंगा के राजा-महाराजाओं का भारत के शिक्षा जगत में योगदान अविस्मरणीय है, यह सत्य है; लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि दरभंगा के राजा-महाराजाओं के अलावे भी देश के अन्य राजा, जमींदार का भारत की शिक्षा व्यवस्था मजबूत हो, मिथिला का उत्थान हो, मैथिली भाषा का वजूद हो, पर्याप्त कार्य किये थे – लेकिन आज मिथिला के लोग इतिहास के पन्नों में उसका नाम नजरअंदाज कर दिए हैं। </p>
<p><strong>आज़ाद भारत में जन्म लिए मिथिला के लोग इस बात का चश्मदीद गवाह हैं कि मिथिला के लिए अलग राज्य की मांग 1950 के दशक में भारत की आजादी के तुरंत बाद शुरू हो गई थी । आंदोलन का दूसरा चरण साहित्य अकादमी में मैथिली को आधुनिक भारतीय भाषा के रूप में मान्यता देने और जनगणना में मैथिली बोलने वालों की सही गणना के मुद्दों को उठाया गया था। इसमें मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा में रेडियो स्टेशन खोलने जैसी अन्य मांगें भी शामिल हैं। तीसरा चरण मैथिली को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर था। इस चरण में बिहार लोक सेवा आयोग से मैथिली को हटाने और इसे फिर से शामिल करने के कारण कई विरोध और प्रदर्शन हुए था। इसी तरह माध्यमिक विद्यालय परीक्षाओं में मैथिली को शामिल करने के लिए, प्राथमिक स्तर पर शिक्षा के माध्यम के रूप में मैथिली के उपयोग के संबंध में निर्णय के कार्यान्वयन के लिए, मैथिली में पाठ्यपुस्तकों के प्रकाशन और मैथिली शिक्षकों की भर्ती के लिए, बिहार राज्य में मैथिली को एक प्रशासनिक भाषा के रूप में मान्यता देने के लिए अनेकानेक आंदोलन हुए थे, विशेषकर तब जब मैथिली भाषी मुख्यमंत्री, जगन्नाथ मिश्र द्वारा उर्दू को राज्य में दूसरी आधिकारिक भाषा बनाया गया था।लेकिन आज मिथिला में मैथिली भाषा के प्रति जो त्रासदी है, वह दयनीय हैं।</strong></p>
<p>कौन बनेगा करोड़पति के हॉट सीट पर बैठे मिथिला के किसी भी सम्मानित मैथिली भाषा-भाषी महानुभाव से अगर अमिताभ बच्चन एक प्रश्न पूछें कि “भारत के किस विश्वविद्यालय में किस मिथिला के किस राजा के कारण मैथिली भाषा एक विषय के रूप में उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था, साथ ही ‘मैथिली लैक्चर’ स्थापित किया गया था,?&#8221; हमें विश्वास है कि ‘हॉट सीट पर बैठे सम्मानित महानुभाव की कुर्सी हॉट हो जाएगी और वे उत्तर नहीं दे पाएंगे। शब्द बहुत कटु हैं, मिथिला के लोगों को हज़म नहीं होगा, परन्तु सत्य यही है।</p>
<p>इतना ही नहीं, लोग माने अथवा नहीं, सं 1977 में कर्पूरी ठाकुर जब बिहार के मुख्य मंत्री थे, और 1980 में डॉ जगन्नाथ मिश्र प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए, “मैथिली” भाषा को मिथिला के नौजवानों के हितार्थ संविधान के आठवें सूची में स्थान प्रदान करने के लिए प्रयास प्रारम्भ किया गया था। उस प्रयास के लगभग 25-वर्ष बाद संविधान के 92 वें संसोधन में ‘बोडो’, ‘डोगरी’, ‘संथाली’ और ‘मैथिली’ भाषाओँ को संविधान के आठवें सूची में स्थान प्राप्त हुआ। साथ ही, संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित भारतीय प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षाओं में ‘वैकल्पिक विषय’ के रूप में दाखिला मिला। लेकिन 2004 से आज तक, यानी विगत दो दशकों में, इन परीक्षाओं में “मैथिली” विषय के साथ कितने अभ्यर्थी उत्तीर्ण हुए हैं और वे मिथिला का कितना कल्याण किये हैं, मैथिली भाषा के विकास के लिए क्या किए, यह एक अलग शोध का विषय है। लेकिन कर्पूरी ठाकुर को या फिर डॉ जगन्नाथ मिश्र को इस पहल के लिए कितना “सम्मान” मिला, यह तो मिथिला के लोग अधिक जानते होंगे। </p>
<p>कहते हैं कि 1917 के कालखंड में भारत में, खासकर बंगाल में ‘भाषा’ के प्रति ‘सम्मान’ और राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए आंदोलन की नींव मजबूत होना प्रारम्भ हो गया था। उधर देश की राजनीतिक गतिविधियों में अप्रैल के महीने में मोहनदास करमचंद गाँधी बिहार के चम्पारण जिले में नील की खेती और किसानों के सम्मानार्थ सत्याग्रह प्रारम्भ कर दिए थे। अगस्त के महीने में एड्विन मॉन्टेगुए, जो ब्रितानिया सरकार का भारत के लिए सचिव थे, भारत के लिए अंग्रेजी नीतियों की घोषणा कर चुके थे। सन 1918 के अप्रैल महीने में रॉलेट कमिटी अपना रिपोर्ट प्रस्तुत कर दिया था। एड्विन मॉन्टेगुए और वाइसरॉय चेम्सफोर्ड अपना संयुक्त संवैधानिक प्रतिवदेन भी प्रस्तुत कर चुके थे। देश में राजनीतिक उथल-पुथल की शुरुआत हो गयी थी। </p>
<p>तभी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भाषा की महत्ता को स्वीकार करते कलकत्ता विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति आशुतोष मुखर्जी ने बनैली के राजा कीर्त्यानन्द सिंह का मैथिली भाषा के प्रति ‘निष्ठा’, ‘प्रतिबद्धता’, ‘सम्मान’, भाषा की विकास के लिए उनकी सोच का सम्मान करते उनसे कहे कि अगर ‘तीन दिन के अंदर’ वे 2500 रुपये विश्वविद्यालय में जमा कर दें तो ‘मैथिली भाषा कलकत्ता विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल हो जायेगा। ब्रितानिया हुकूमत के इस काल खंड में ‘मैथिली’ भाषा को भारत के किसी भी विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम के रूप में ‘सम्मान’ मिलना, एक बेहतरीन पहल था। राजा कीर्त्यानन्द सिंह ने मैथिली की सेवा करने मे अपना सौभाग्य समझ कर तुरंत 2500 विश्वविद्यालय में जमा करवाए और फिर अपनी तरफ से 7500 रुपये अतिरिक्त प्रेषित किये। इसका परिणाम यह हुआ कि कलकत्ता विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर कक्षा तक “मैथिली भाषा” एक विषय के रूप में अपना स्थान प्राप्त किया। इतना ही नहीं, एक वर्ष बाद, सन 1919 में कुमार कालिकानंद सिंह और राजा कीर्त्यानन्द सिंह ने मिलकर 1200 रूपये वार्षिक शुल्क देकर छह वर्षों के लिए ‘मैथिली लैक्चर” स्थापित किये। </p>
<p>लेकिन दुर्भाग्य यह है कि विगतदस दशकों से अधिक वर्षों में मिथिला के एक भी व्यक्ति, मिथिला के एक भी विद्वान, एक भी विदुषी, मिथिला साहित्य के एक भी तथाकथित धनुर्धर, एक भी हस्ताक्षर कभी ‘मैथिली भाषा’ के प्रति राजा कीर्त्यानंद सिंह अथवा कुमार कालिका नन्द सिंह की भूमिका की चर्चा तक नहीं किये और उन सबों की आवाज दरभंगा राज और दरभंगा के लाल किले से बाहर नहीं निकला। चापलूसी, चाटुकारिता पर यह भी एक शोध का विषय है। पटना विश्वविद्यालय में मैथिली की पढ़ाई 1938 में प्रारम्भ हुई। राजा बहादुर कीर्त्यानंद सिंह राजा लीलानंद सिंह के तीसरे पुत्र थे। उनका जन्म 23 सितम्बर, 1883 को हुआ था। सं 1919 में इन्हे राजा बहादुर की पदवी से अलंकृत किया गया। कलानंद और कीर्त्यानंद में बड़ी मैत्री थी। रानी पद्मावती देवी की मदद से इन दोनों ने पद्मानंद के हिस्से के 7 आने को ठीका प्रबंध पर ले लिया और यह व्यवस्था 1939 ई0 तक चलती रही। कलानंद और कीर्त्यानंद 1919 तक एक साथ ड्योढ़ी बनैली चम्पानगर में रहे। स्थानीय लोगों का कहना है कि राज बनैली का स्वर्णिम काल था। </p>
<p>यह अलग बात है कि बदलते समय में मिथिला के लोगों ने शिक्षा के क्षेत्र में बनैली राज की भूमिका को नजर अंदाज किया, लेकिन इतिहास गवाह है कलानंद और कीर्त्यानंद भाइयों ने शिक्षा के क्षेत्र में, उसके विकास के लिए कई महत्वपूर्ण योगदान दिए। उनका योगदान आज भी पूर्णिया के इतिहास में अंकित है। सन 1903 में उन्होंने चम्पानगर में एम्. ई स्कूल खुलवाया जो निजी व्यवस्था द्वारा संचालित जिला का पहला विद्यालय था। इसी तरह 1909 में भागलपुर के तेज नारायण जुबली कालेज की बिगड़ती हुई हालत देखकर कलानंद सिंह और कीर्त्यानंद सिंह ने लाखों रुपये देकर उसे नया जीवन दिया।टी. एन. जे. काॅलेज बाद में तेज नारायण बनैली काॅलेज के नाम से प्रसिद्द हुआ। इतना ही नहीं, दोनों भाईयों ने भाइयों ने कई और अनुदान देकर पूर्णियाँ का नाम रोैशन किया। मसलन: पटना विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के रीडरशिप के लिए 25000/-, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में एक लाख रुपये दान किये। </p>
<p><strong>बहरहाल, आइये केंद्रीय मंत्रिमडल के निर्णय पर आएं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा से कुछ दिन पहले की गई इस घोषणा से राजनीतिक वाकयुद्ध शुरू हो गया है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने राज्य की लंबे समय से लंबित मांग को पूरा करने का कुछ श्रेय लेने का दावा किया है। हालांकि, राजनीति से परे, विद्वानों और शिक्षाविदों को उम्मीद है कि नई स्थिति ऐतिहासिक अनुसंधान, साहित्यिक अनुवाद और इन भाषाओं के आधुनिक भाग्य की रक्षा और वृद्धि करेगी। विश्व स्तर पर, शास्त्रीय भाषाओं को वह माना जाता है जिनकी एक प्राचीन और स्वतंत्र साहित्यिक परंपरा होती है और लिखित साहित्य का एक समूह शास्त्रीय माना जाता है। वे अक्सर बोली जाने वाली भाषाओं जैसे लैटिन या संस्कृत के रूप में उपयोग में नहीं होती हैं &#8211; या उनके आधुनिक संस्करणों से अलग होती हैं। क्या मैथिली भाषा कमजोर है इस दृष्टि से? </strong></p>
<p>शास्त्रीय भाषाओं को भारत की प्राचीन और गहन सांस्कृतिक विरासत का संरक्षक माना जाता है, जो अपने संबंधित समुदायों के समृद्ध इतिहास, साहित्य और परंपराओं को संरक्षित करती हैं। इस स्थिति को प्रदान करके, सरकार भारत के विविध सांस्कृतिक परिदृश्य के भाषाई मील के पत्थर का सम्मान और सुरक्षा करना चाहती है, यह सुनिश्चित करते हुए कि आने वाली पीढ़ियाँ इन भाषाओं की गहरी ऐतिहासिक जड़ों तक पहुँच सकें और उनकी सराहना कर सकें। यह कदम न केवल भाषाई विविधता के महत्व को पुष्ट करता है बल्कि देश की सांस्कृतिक पहचान को आकार देने में इन भाषाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को भी स्वीकार करता है।</p>
<p>किसी भाषा को शास्त्रीय के रूप में नामित करने का उद्देश्य उसके ऐतिहासिक महत्व और भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत के संरक्षक के रूप में उसकी भूमिका को पहचानना है। ये भाषाएँ हजारों वर्षों से भारत की प्राचीन ज्ञान प्रणालियों, दर्शन और मूल्यों को पीढ़ियों तक संरक्षित और प्रसारित करने में आवश्यक रही हैं। इन भाषाओं को शास्त्रीय के रूप में मान्यता देकर, सरकार उनकी गहरी जड़ें जमा चुकी प्राचीनता, विशाल साहित्यिक परंपराओं और राष्ट्र के सांस्कृतिक ताने-बाने में उनके अमूल्य योगदान को स्वीकार करती है। यह मान्यता इन भाषाओं द्वारा भारत की विरासत में किए गए महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और भाषाई योगदान को उजागर करती है। यह न केवल उनके कद को ऊंचा करेगा बल्कि इन भाषाओं के प्रचार, संरक्षण और आगे के शोध के प्रयासों को भी सुविधाजनक बनाएगा, जिससे आधुनिक दुनिया में उनकी निरंतर प्रासंगिकता सुनिश्चित होगी।</p>
<p>किसी भाषा को शास्त्रीय घोषित करने के मानदंड के मामले में 2004 में, भारत सरकार ने पहली बार भाषाओं की एक नई श्रेणी बनाई, जिसे शास्त्रीय भाषाएँ कहा जाता है। इसने शास्त्रीय भाषा की स्थिति के लिए कुछ मानदंड निर्धारित किए।  मसलन &#8211; इसके प्रारंभिक ग्रंथों की उच्च प्राचीनता/एक हजार वर्षों से अधिक का दर्ज इतिहास, प्राचीन साहित्य / ग्रंथों का एक संग्रह, जिसे वक्ताओं की पीढ़ी द्वारा एक मूल्यवान विरासत माना जाता है। इसके अतिरिक्त, साहित्यिक परंपरा मौलिक होनी चाहिए और किसी अन्य भाषण समुदाय से उधार नहीं ली जानी चाहिए। शास्त्रीय भाषा की स्थिति के लिए प्रस्तावित भाषाओं की जांच करने के लिए साहित्य अकादमी के तहत भाषाई विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशों के आधार पर इस मानदंड को 2005 और 2024 में संशोधित किया गया था।</p>
<p>2024 संशोधन के अनुसार, 1500-2000 वर्षों की अवधि में इसके प्रारंभिक ग्रंथों / अभिलिखित इतिहास की उच्च प्राचीनता। प्राचीन साहित्य/ग्रंथों का एक संग्रह, जिसे वक्ताओं की पीढ़ियों द्वारा विरासत माना जाता है। साहित्यिक परंपरा मौलिक होनी चाहिए और किसी अन्य भाषण समुदाय से उधार नहीं ली जानी चाहिए। ज्ञान ग्रंथ, विशेषकर गद्य ग्रंथ, पद्य के अतिरिक्त अभिलेखीय एवं अभिलेखीय साक्ष्य। स्त्रीय भाषाएँ और साहित्य अपने वर्तमान स्वरूप से भिन्न हो सकते हैं या अपनी शाखाओं के बाद के रूपों से अलग हो सकते हैं। ज्ञातव्य हो कि छह भारतीय भाषाओं अर्थात् संस्कृत, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और उड़िया को पहले शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया गया था। सूत्रों के आधार पर तामिल 12 अक्टूबर 2004, संस्कृत 25 नवम्बर 2005, तेलुगू 31 अक्टूबर 2008, कन्नड 31 अक्टूबर 2008, मलयालम 8 अगस्त 2013, उड़िया 1 मार्च 2014 को गृह मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय ने मान्यता प्रदान की। </p>
<p>शिक्षा मंत्रालय ने शास्त्रीय भाषाओं को आगे बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं। 2020 में, संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए संसद के एक अधिनियम के माध्यम से तीन केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई। सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ क्लासिकल तमिल की स्थापना प्राचीन तमिल ग्रंथों के अनुवाद, अनुसंधान को बढ़ावा देने और विश्वविद्यालय के छात्रों और भाषा विद्वानों के लिए पाठ्यक्रम पेश करने की सुविधा के लिए की गई थी। शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन और संरक्षण को और बढ़ाने के लिए, मैसूर में केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान के तत्वावधान में शास्त्रीय कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और उड़िया में अध्ययन के लिए उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए गए थे। इसके अतिरिक्त, शास्त्रीय भाषाओं के क्षेत्र में उपलब्धियों को पहचानने और प्रोत्साहित करने के लिए कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार शुरू किए गए हैं। शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रदान किए गए अन्य लाभों में शास्त्रीय भाषाओं के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार, विश्वविद्यालय अध्यक्ष और शास्त्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए समर्पित केंद्र शामिल हैं।</p>
<p>सवाल यह है कि किसी भाषा को शास्त्रीय घोषित किये जाने का क्या प्रभाव पड़ता है? विशेषज्ञों का मानना है कि भाषाओं को शास्त्रीय भाषाओं के रूप में शामिल करने से विशेष रूप से शैक्षणिक और अनुसंधान क्षेत्रों में रोजगार के महत्वपूर्ण अवसर पैदा होंगे। इसके अतिरिक्त, इन भाषाओं में प्राचीन ग्रंथों के संरक्षण, दस्तावेज़ीकरण और डिजिटलीकरण से संग्रह, अनुवाद, प्रकाशन और डिजिटल मीडिया जैसे क्षेत्रों में रोजगार पैदा होंगे। यह भी कहा जाता है कि भाषाओं को शास्त्रीय के रूप में मान्यता देने से विद्वानों के अनुसंधान, संरक्षण और प्राचीन ग्रंथों और ज्ञान प्रणालियों के पुनरोद्धार को प्रोत्साहन मिलता है, जो भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए आवश्यक हैं। इसके अलावा, यह इन भाषाओं को बोलने वालों के बीच गर्व और स्वामित्व की भावना पैदा करता है, राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देता है और आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से निहित भारत की व्यापक दृष्टि के साथ जुड़ता है।</p>
<p>बहरहाल, मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने का केंद्रीय मंत्रिमंडल का निर्णय भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को आकार देने में इन भाषाओं की अमूल्य भूमिका की गहरी मान्यता को दर्शाता है। यह कदम न केवल उनके ऐतिहासिक और साहित्यिक महत्व को स्वीकार करता है बल्कि भारत की भाषाई विविधता के संरक्षण और प्रचार के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करता है। इस पहल से शैक्षणिक और अनुसंधान के अवसरों को बढ़ावा मिलने, वैश्विक सहयोग बढ़ने और देश की सांस्कृतिक और आर्थिक वृद्धि में योगदान मिलने की उम्मीद है। भावी पीढ़ियों के लिए इन भाषाओं को सुरक्षित करके, सरकार आत्मनिर्भर भारत और सांस्कृतिक रूप से निहित भारत के उद्देश्यों के अनुरूप, सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय एकता के व्यापक दृष्टिकोण को मजबूत कर रही है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/how-do-you-expect-inclusion-of-maithili-in-the-list-of-classical-languages">चापलूस, चाटुकारों से घिरे &#8216;स्वयंभू युवराज&#8217; मिथिला के लिए कुछ किये नहीं, अख़बारों में विज्ञापन देकर मिथिला नरेश की कीर्तियों को दोहराये &#8216;स्वहित&#8217; में, फिर &#8216;मैथिली भाषा&#8217; को &#8216;शास्त्रीय भाषाओँ की श्रेणी में&#8217; कैसे देखेंगे मिथिला के लोग ?</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल तो मैथिल-भोजपुरी चाटुकारों/चापलूसों के चक्कर में फंसे हैं &#8216;वोट बैंक&#8217; के लिए</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 19 Sep 2023 05:25:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[arvind kejrival]]></category>
		<category><![CDATA[bojpuri]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>यह तो अच्छा हुआ कि ‘विद्यापति’ और ‘भिखारी ठाकुर’ पहले मृत्यु को प्राप्त किये। आज अगर जीवित होते तो सर पटक-पटक कर रोते दारुखाना में अपनी-अपनी भाषाओं को देखकर। #विगत दिनों #अखबारवाला001 यूट्यूब और #आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम के लिए कहानी के क्रम में दिल्ली की सड़कों पर पैदल था। बाबूजी कहते थे कि &#8216;जहाँ तक संभव हो [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/delhi-cm-trapped-inmaithil-bhojpuri-sycophants-for-vote-bank">दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल तो मैथिल-भोजपुरी चाटुकारों/चापलूसों के चक्कर में फंसे हैं &#8216;वोट बैंक&#8217; के लिए</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>यह तो अच्छा हुआ कि ‘विद्यापति’ और ‘भिखारी ठाकुर’ पहले मृत्यु को प्राप्त किये। आज अगर जीवित होते तो सर पटक-पटक कर रोते दारुखाना में अपनी-अपनी भाषाओं को देखकर।</strong></p>
<p>#विगत दिनों #अखबारवाला001 यूट्यूब और #आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम के लिए कहानी के क्रम में दिल्ली की सड़कों पर पैदल था। बाबूजी कहते थे कि &#8216;जहाँ तक संभव हो सके पैदल चलो आँख खोलकर। तुम्हें इतने तरह के विषय दिखेंगे कि लिखते-लिखते जीवन निकल जायेगा और लिखने की भूख समाप्त नहीं होगी।&#8217; कितनी सच्चाई थी बाबूजी की बातों में। आज भी यह बात तरो-ताजा हैं उन सभी के लिए जो लिखने के लिए, सीखने के लिए पैदल चलते हैं। </p>
<p>चलते-चलते सोच रहा था कि हमारे प्रदेश (बिहार) के करीब 45000+ गावों में शिक्षा को विकसित करने के लिए प्रदेश के नेता-मंत्री लोग भले &#8216;खिचड़ी&#8217; खिलाकर बच्चों को विद्यालय की ओर आकर्षित करें, वास्तविक तौर पर शिक्षा का विकास गाँव-गाँव तक उतना नहीं पहुँच पाया जितना आज़ादी के बाद पहुंचना चाहिए था। जब देश गुलाम था तब देश-प्रदेश-गाँव-मोहल्ला के लोग अंग्रेजी हुकुमतानों को दोषी ठहराते थे। जब देश आज़ाद हुआ तो देश को नोचने में सभी लोग लग गए। अगर ऐसा नहीं होता तो बिहार वेटनरी कालेज के चपरासी क्वार्टर में रहने वाले लालू प्रसाद यादव, जगन्नाथ मिश्र, केदार पाण्डे और अन्य नेता तथा उनके छोटे-छोटे बच्चे इतने धनाढ्य कैसे हो जाते ? दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की इमारतों की ईंट-से-ईंट कैसे बजती? आखिर धनवान होने के लिए गलत तो करना ही पड़ता है अन्यथा देश का प्रत्येक नागरिक करोड़पति होता। आज भी शिक्षा के मामले में पुरुष:महिला का शिक्षा दर अनुपात में 20 फीसदी की खाई है बोट क्लब के इसी तालाबों की तरह। </p>
<p>मन में फिर विचार आने लगा कि 2014 में देश के लोगों को लुभाकर कैसे सम्मानित श्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए। दस साल बीत गए। श्री रामनाथ कोविंद साहब भी बिहार के राज्यपाल से देश के राष्ट्रपति बनकर अवकाश का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। अवकाश प्राप्त करने के बाद सम्मानित कोविंद साहब को जीवन पर्यन्त लुट्येन्स दिल्ली में (12 जनपथ) सुरक्षित है। यह आवास पहले बिहारी नेता राम विलास पासवान (अब दिवंगत) जिनका नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज है अधिकतम मत प्राप्त करने के लिए, रहते थे। सम्मानित कोविंद साहब को प्रतिमाह 250000 रूपये पेंशन मिलता है। इसके अलावे, एक प्राइवेट सचिव, एक निजी सचिव, एक अतिरिक्त प्राइवेट सचिव, दो चपरासी और कार्यालय खर्च के लिए एक लाख रुपये प्रति माह सुनिश्चित है। मकान के लिए कोई किराया नहीं देय होगा। दो टेलीफोन, मुफ्त इंटरनेट, एक चार-पहिया वाहन की सुविधा अतिरिक्त मुफ्त चिकित्सा सुविधा, मुफ्त यात्रा सुविधा इत्यादि-इत्यादि। लेकिन आज तक देश का मतदाता अपने-अपने बैंकों से एसएमएस आने का इंतज़ार कर रहा है &#8211; आपके लेखा में पंद्रह लाख रुपये जमा हो गए जिसका वादा किया गया था। बाबूजी सच में कहते थे &#8220;लोभी गाँव में ठग भूखा नहीं मरता।&#8221;</p>
<p>मन में यह भी सोच रहा था कि आज से कोई आठ वर्ष पहले, उस दिन शायद शिक्षक दिवस (5 सितम्बर) था और साल 2015 था,  जब टटका-टटका बने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी हमारे बिहार के बोध गया गए थे। सम्मानित श्री कोविंद साहब उन दिनों हमारे प्रदेश के राज्यपाल थे। उस दिन यह कहा गया कि बोध गया को सांस्कृतिक शहर के रूप में बसाया जायेगा, विकसित किया जायेगा ताकि विश्व के लोग अधिकाधिक यहाँ आएं। मैं कहानी भी लिखा था ख़ुशी-ख़ुशी &#8211; कुछ अच्छा होने वाला है । शहर का विकास होने से और कुछ हो न हो, युवकों को, युवतियों को, राजनीतिक पार्टियों के मतदाताओं को रोजगार मिलेगा।  समय का चक्र देखिये &#8211; सम्मानित श्री कोविंद साहब राज्यपाल से राष्ट्रपति बनकर अवकाश का जीवन व्यतीत कर रहे हैं । सम्मानित मोदी जी प्रधानमंत्री कार्यालय में दूसरी पारी खेल रहे हैं और तीसरी पारी के लिए अभ्यास कर रहे हैं। लेकिन बेचारा बोध गया और महाबोधि वृक्ष, जिसके तले कोई 2,550 साल पहले भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था, वह ज्ञान आधुनिक नहीं हो सका। हमारा शहर सांस्कृतिक शहर का दर्जा नहीं पा सका, विकसित नहीं हो सका। इसे कहते हैं प्रारब्ध और इसे कहते हैं राजनीति। खैर !! सभी समय के नजर में हैं। </p>
<p>हम भी अपना गाँव नहीं छोड़ना चाहते थे। बपौती संपत्ति तो नहीं थी, लेकिन मन में इस इक्षा जरूर थी कि गाँव का विकास होने से यहीं शिक्षा प्राप्त करूँगा, यहीं कार्य करूँगा। लेकिन वैसा हो नहीं सका। हम तो खेत खरीद नहीं सके, लेकिन सन 1959 के बाद प्रदेश में जितने भी नेता जन्म लिए सभी दरिद्र से धनाढ्य हो गए (अपवाद छोड़कर) और हमारे प्रदेश का उतना विकास नहीं हो सका जितना आज़ादी की लड़ाई में प्रदेश की भूमिका रही। कैसे कहूं कि यही प्रदेश मोहनदास करमचंद गांधी को &#8216;महात्मा गांधी&#8217; बनाया। खैर। </p>
<p>महादेव मेरा प्रारब्ध और कर्म-भाग्य रेखा खुद खींच रहे थे, स्वाभाविक था मेरा गाँव से निकलना। फिर गाँव से निकला और मगध की राजधानी पटना पहुंचा। आज भी मानस पटल पर दरभंगा से मुजफ्फरपुर-हाजीपुर-सोनपुर के रास्ते पहलेजा घाट वाली ट्रेन याद है। कैसे पहलेजाघाट से उफनती गंगा में पानी वाला जहाज से महेन्द्रू घात आये थे। उस दिन तो गंगा का पानी महेन्द्रू घाट के बहुत ऊपर तक पहुँच गया था। घाट तक पहुँचने में कई मर्तबा जहाज पानी के बहाव के साथ बह गया था। सभी यात्री भगवान्-भगवान कर रहे थे। फिर जीवन की शुरुआत हुई। पटना की सड़कों पर अखबार बेचने के साथ-साथ पटना से प्रकाशित &#8216;आर्यावर्त&#8217; और &#8216;दी इण्डियन नेशन&#8217; पत्र समूह कार्य करते धनबाद के हीरापुर के रास्ते, कलकत्ता के प्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट होते दिल्ली के तत्कालीन राजपथ पर पहुंचा। इन यात्रा के दौरान पत्रकारिता को इतना रगड़ा, इतना रगड़ा, अभ्यास किया कि कल के अखबार बेचने वाले, कल अख़बारों में कहानी लिखने वाला आज खुद एक कहानी बन गया। लोग उस पर कहानी लिखने लगे। सब समय है। </p>
<p>फिर भारत के संसद के सामने, विजय चौक के इस नव-निर्मित बैठकी पर बैठकर सोचने लगा कि मिथिला के लोग अगर वास्तविक रूप में मिथिला के विकास के लिए प्रखर होते तो आज मिथिला वहां तो अवश्य नहीं होता, जहाँ आज है। मिथिला के राजा और उनके पूर्वज भी स्वर्ग से अपने मिथिला को देखकर अश्रुपूरित होते होंगे। कल के मिथिला में विद्वानों-विदुषियों का भरमार था, आज चापलूसों, चाटुकारों की बाढ़ है। हज़ारों-हज़ार संस्थाएं मिथिला के विकास करने में लगे हैं।  लेकिन खुद मेहनत से अधिक विकसित हो रहे हैं और मिथिला अपने भाग्य पर रो रही है। </p>
<p>अब दृष्टान्त देता हूँ। दिल्ली सल्तनत में तो मिथिला के लोग, मैथिली भाषा भाषी का उफान है, लेकिन मैथिली बोलने वालों की किल्लत ही नहीं, अकाल है। जिस स्थान पर दिल्ली सरकार का दारू-शराब का रखरखाव किया जाता है, पैसा-कौड़ी का लेखा-जोखा रखा जाता है, उसी भवन में &#8216;अछूत&#8217; जैसा एक कमरा में &#8216;मैथिली-भोजपुरी अकादमी&#8217; बना दिया गया। भवन का नाम है – 7-9 आपूर्ति भवन, आराम बाग़, पहाड़गंज, नई दिल्ली। विगत वर्ष दिल्ली सरकार 2022-2023 वित्तीय वर्ष में 762 करोड़ और अधिक शराब से भरी बोतलों को बेचकर 6,821 करोड़ रुपये सरकारी कोष में जमा की। यह दृष्टान्त काफी है यह कहने के लिए की दिल्ली सल्तनत में मिथिला के लोगों की मानसिक क्षमता। </p>
<p>इतना ही नहीं, दिल्ली सल्तनत में कुल 573+12 = 585 शराब के ठेके हैं। कुछ ठेके/दुकानें दिल्ली के मॉलों में भी स्थित है। दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय द्वारा संचालित कुल 2400 विद्यालय हैं और नगर निगम द्वारा संचालित विद्यालयों की संख्या 1735 है। यानी कुछ 4135 विद्यालय हैं। अगर नगर निगमों के विद्यालयों को तत्काल छोड़ भी दिया जाए तो दिल्ली सल्तनत में शिक्षा निदेशालय के क्षेत्राधिकार वाले प्रत्येक चार विद्यालयों पर दिल्ली सरकार द्वारा संचालित दारू का एक ठेका है।</p>
<p>वैसी स्थिति में दिल्ली सरकार के लिए ‘मैथिली’ और ‘भोजपुरी’ भाषा की क्या अहमियत है आप स्वयं निर्णय करें। यह तो अच्छा हुआ कि ‘विद्यापति’ और ‘भिखारी ठाकुर’ पहले मृत्यु को प्राप्त किये। आज अगर जीवित होते तो सर पटक-पटक कर रोते। कांग्रेस के ज़माने से, यानि श्रीमती शीला दीक्षित के ज़माने से आज तक, इन दो समुदाय के लोगों का उपयोग महज राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए होती आई है। मैथिली और भोजपुरी भाषा के विकास से इन अकादमी का कुछ भी लेना देना नहीं है। महज यह एक राजनीतिक लाभ हेतु मंच बनाया गया है। </p>
<p>पिछले दिनों भारत सरकार के साहित्य अकादमी में मैथिली भाषा की हस्ताक्षर <strong>डा. वीणा ठाकुर</strong> कहती हैं: “कोनो भाषासँ सम्बद्ध संस्था-संगठनक स्थापनाक मूलमे निहित होइत अछि ओहि भाषा-साहित्यक संरक्षण आ संवर्द्धन। ई तखने सम्भव होइत अछि जखन मौलिक दृष्टि सम्पन्न तटस्थ आ कुशल नेतृत्व होय। ओहि भाषा-साहित्य लेल मौलिक काज कयल जाय-करबायल जाय। ई तखने सम्भव होयत जखन एहन व्यक्तित्वक कुशल मार्गदर्शन भेटय जे मूलतः साहित्यकार होथि आ जिनकामे भाषा सेहो पचल होनि। किछु कविता, गीत, कथा आदि रचिकऽ कोनो गोटे साहित्यकारक शृंखलामे भने परिगणित होइत होथु, हुनक रचनो उत्कृष्ट होइत होइनि, मुदा तकर अर्थ ई कदापि नहि जे ओ भाषिक दृष्टिसँ सेहो क्षमतावान होथि।ओना तँ भाषाक ज्ञाता ओ सभ सर्वसाधारण होइत छथि जिनकर ओ मातृभाषा होइत छनि, मुदा ठोस विकास लेल साहित्यिक आ भाषिक दृष्टिकोणसँ एतबे टा होयब उपयुक्त नहि होइत अछि। भाषाक स्थायी ओ सर्वांगीण विकास लेल चाही विशेष-दृष्टि सम्पन्नता जकर अभाव दिल्लीक मैथिली-भोजपुरी अकादमीमे मैथिली लेल नजरि अबैत अछि।  एकरा तँ मैथिलीक सिरमौर होयबाक चाही। एहि लेल सभक प्रति समभाव आ पारदर्शिता तँ चाहबे करी, जकर घोर अभाव बुझना जाइत अछि। लगैत अछि जेना ईहो गुटबाजीक शिकार भऽ गेल अछि। जेना सोशल मीडियापर अपन खायब-पियब, टहलब-बुलब आ अन्य अनावश्यक गतिविधिकेँ पल-पल पोस्ट कयनिहारकेँ भेटैत ‘लाइक्स’केँ लोकप्रियताक नपना मानि लेल जाइत अछि तहिना कविता-गीतक नामपर परसल जायवला अलर-बलरकेँ सेहो साहित्य मानबाक भ्रम पोसल जाय लागल अछि&#8230;.</p>
<p>मैथिली-भोजपुरी अकादमीकेँ सेहो एहिसँ फराक रहबाक चाही। अकादमीमे मैथिली लेल नेतृत्वकर्त्ताक दायित्व छनि जे ओ बुझथु जे साहित्य-लेखन आ ओकर आकलन दुनू फराक-फराक विषय थिक। ई सभक लेल कदापि सम्भव नहि जे ओ दुनूमे क्षम होथि। अकादमीमे मुख्य भूमिका निमाहनिहारकेँ ई अनिवार्य रूपसँ ध्यान राखऽ पड़तनि तखने मैथिलीक यथार्थ विकासमे संस्था अपन असल भूमिकाक निर्वाह कऽ सकत। विचारणीय ईहो थिक जे आइ धरि मैथिली अकादमी अपन स्वतंत्र स्वरूप किए ने पाबि सकल। स्थापनाक डेढ़ दशक बादो मैथिली लेल कोनो सार्थक प्रयास नहि कऽ सकल सेहो चिन्ता आ चिन्तनक कारण बनैत अछि।&#8221;</p>
<p>अब सवाल यह है कि दिल्ली सरकार को, मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल को &#8216;ज्ञान&#8217; नहीं है, यह मान नहीं सकते। मुख्यमंत्री श्री केजरीवाल देश के किसी भी मुख्यमंत्री से, यहाँ तक कि बिहार के श्री नितीश कुमार बाबू से, अधिक शिक्षित हैं। नीतीश जी तो एक अभियंता है। लेकिन श्री केजरीवाल अखिल भारतीय स्तर की परीक्षा में उत्तीर्ण हैं। वे &#8216;भाषा&#8217; के महत्व को नहीं समझते होंगे, यह अखबारवाला001 नहीं मान सकता है। हाँ, जिस तरह चापलूसों, चाटुकारों, खुशामदियों, धूर्तों के चक्कर में पड़कर मिथिला राज समाप्त हो गया, दरभंगा राज का नामोनिशान मिट गया, समय दूर नहीं है कहीं केजरीवाल की कुर्सी भी खिसक न जाए  &#8211; क्योंकि मैथिल किसी का नहीं हुआ है। अगर होता तो दरभंगा राज समाप्त नहीं होता, आर्यावर्त-दी इण्डियन नेशन अख़बार, मिथिला मिहिर पत्रिका का नामोनिशान समाप्त नहीं होता। </p>
<p>हम तो एक श्रृंखला लिखने जा रहे हैं दिल्ली के मैथिलों पर, दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल के मानसिक स्थिति पर &#8211; आखिर दारुखाना में भाषा कैसे जीवित रहेगी। मुझे न तो विधायक बनना है और ना ही केजरीवाल जी की मदद से किसी संस्था का अध्यक्ष और ना ही कोई सरकारी लाभ लेना है। न मैं  चापलूस हूँ, न चाटुकार हूँ। पत्रकार हूँ तो हुमचकर लिखूंगा, लिखता रहूँगा जबतक मैथिली-भोजपुरी अकादमी दारुखाना से निकलकर आईटीओ स्थित विशालकाय किसी भवन में नहीं आ जाता &#8211; सम्मान के साथ </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/delhi-cm-trapped-inmaithil-bhojpuri-sycophants-for-vote-bank">दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल तो मैथिल-भोजपुरी चाटुकारों/चापलूसों के चक्कर में फंसे हैं &#8216;वोट बैंक&#8217; के लिए</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>दिल्ली में शिक्षा निदेशालय और उत्पाद विभाग के क्षेत्राधिकार वाले विद्यालय तथा शराब के ठेके का अनुपात 4:1 है यानी चार विद्यालय और एक ठेका 😢</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/ratio-of-schools-and-liquor-shops-in-delhi-is-41</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Jun 2023 07:20:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[arvind kejriwal]]></category>
		<category><![CDATA[bhojpuri]]></category>
		<category><![CDATA[delhi government]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली: वैसे अलग बात है कि विगत दिनों दारू की दुकानों को लेकर दिल्ली सरकार और उसके मंत्री, संत्री, आला अधिकारी सभी चर्चा में रहे, जांच के अधीन हैं । अख़बारों में और टीवी पर सुर्खियों में रह रहे हैं । लेकिन बावजूद इसके दिल्ली सल्तनत में दिल्ली सरकार 2022-2023 वित्तीय वर्ष में 762 [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/ratio-of-schools-and-liquor-shops-in-delhi-is-41">दिल्ली में शिक्षा निदेशालय और उत्पाद विभाग के क्षेत्राधिकार वाले विद्यालय तथा शराब के ठेके का अनुपात 4:1 है यानी चार विद्यालय और एक ठेका 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली: वैसे अलग बात है कि विगत दिनों दारू की दुकानों को लेकर दिल्ली सरकार और उसके मंत्री, संत्री, आला अधिकारी सभी चर्चा में रहे, जांच के अधीन हैं । अख़बारों में और टीवी पर सुर्खियों में रह रहे हैं । लेकिन बावजूद इसके दिल्ली सल्तनत में दिल्ली सरकार 2022-2023 वित्तीय वर्ष में 762 करोड़ और अधिक शराब से भरी बोतलों को बेचकर 6,821 करोड़ रुपये सरकारी कोष में जमा की। मज़ाक बात नहीं है इतनी राशि का एकत्रीकरण । </strong></p>
<p>यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि दिल्ली की वर्तमान आबादी (32,941,000) में पियक्कड़ों की संख्या उम्मीद से अधिक है। यह बात भी अलग है कि सरकार शराब की बोतलों पर अंग्रेजी में, हिंदी में, पंजाबी में, उर्दू में, चाहे जिस भाषा में लिखकर चिपकते रहे &#8211; शराब पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इतना ही नहीं, अगर इन शराब के बोतलों को गिनने वाले स्थान पर किसी &#8216;उम्दा भारतीय भाषाओँ का अकादमी&#8217; भी खोल दें तो उस भाषा को बोलने वालों को, लेखकों को, सम्बद्ध लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर ऐसा नहीं होता तो शराब नियंत्रण कक्ष में &#8216;मैथिली-भोजपुरी अकादमी&#8217; कराहता नहीं। आखिर भाषा की उन्नति पर विचार तो शराब पर चर्चा के बाद ही होगा। इसी को कहते हैं भाषा के नाम पर राजनीति। लेकिन आपको क्या?</p>
<p><strong>यह बात यहाँ इसलिए लिख रहा हूँ कि दिल्ली सल्तनत में कुल 573+12 = 585 शराब के ठेके हैं। कुछ ठेके/दुकानें दिल्ली के मॉलों में भी स्थित है। दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय द्वारा संचालित कुल 2400 विद्यालय हैं और नगर निगम द्वारा संचालित विद्यालयों की संख्या 1735 है। यानी कुछ 4135 विद्यालय हैं। अगर नगर निगमों के विद्यालयों को तत्काल छोड़ भी दिया जाए तो दिल्ली सल्तनत में शिक्षा निदेशालय के क्षेत्राधिकार वाले प्रत्येक चार विद्यालयों पर दिल्ली सरकार द्वारा संचालित दारू का एक ठेका है। </strong></p>
<p>विगत दिनों नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) ने दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव को एक पत्र लिखा था। नगर निगमों की विद्यालयों को छोड़ दें तो दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय द्वारा संचालित 1024 विद्यालयों के एक अध्ययन के अनुसार में सिर्फ 203 विद्यालयों में प्राचार्य अथवा विद्यालय के सर्वोच्च अधिकारी हैं। यानी 2400 विद्यालयों में से 1024 विद्यालयों में से 824 विद्यालयों में सर्वोच्च अधिकारी नहीं हैं। वैसे दिल्ली सरकार और सरकार के आला अधिकारी भी कम चालाक नहीं हैं। तक्षण उन्होंने इस जबाबदेही को दिल्ली सल्तनत के उपराज्यपाल के मथ्थे मढ़ दिया। कहने में तनिक भी देर नहीं किये कि प्राचार्यों/सर्वोच्च पदाधिकारियों को नियुक्त करने का अधिकार उपराज्यपाल के पास है। इसी को राजनीति कहते हैं। </p>
<figure id="attachment_4943" aria-describedby="caption-attachment-4943" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/liquorshop1674487297610.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/liquorshop1674487297610.jpeg" alt="" width="1200" height="675" class="size-full wp-image-4943" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/liquorshop1674487297610.jpeg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/liquorshop1674487297610-300x169.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/liquorshop1674487297610-1024x576.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/liquorshop1674487297610-768x432.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4943" class="wp-caption-text">दिल्ली और दारू की दुकान</figcaption></figure>
<p>अब अगर दिल्ली सरकार की शराब की दुकानों (585) और शिक्षा निदेशालय के विद्यालयों की सांख्यिकी (2400) की तुलना करें तो औसतन चार सरकारी विद्यालयों पर एक एक सरकारी शराब का ठेका है। परन्तु कोई भी सरकारी ठेका विक्रेता से लेकर शराब-मादक-मदिरा से जुड़े विभाग और मंत्रालय की कोई भी कुर्सी खाली नहीं है। अलबत्ता, अधिकारी से लेकर पदाधिकारी तक, अगर कहीं कोई स्थान &#8216;रिक्त&#8217; दीखता है तो एक अधिकारी के मथ्थे दो-चार विभाग लगा दिया गया है। </p>
<p>इतना ही नहीं, दिल्ली सरकार का प्रत्येक शराब का ठेका &#8216;आधुनिक साज-सज्जा&#8217; से लैश है, जबकि सरकारी क्षेत्र के विद्यालयों में &#8216;प्राचार्य&#8217;, &#8216;हेड-मास्टर&#8217; &#8216;वरीय शिक्षकों&#8217; की बात तत्काल नहीं करें तो &#8216;डस्टर&#8217;, &#8216;पेन्सिल&#8217;, &#8216;मानचित्र&#8217;, &#8216;झाडू&#8217;, &#8216;कुर्सी&#8217;, &#8216;किताब&#8217;, &#8216;पेन्सिल&#8217; की घोर किल्लत है। अब सवाल यह है कि अगर दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल की सानिग्धता &#8216;नवमी कक्षा&#8217; के समकक्ष वाले &#8216;बिहार के उप-मुख्यमंत्री&#8217; श्रीमान तेजस्वी यादव जैसे &#8216;विचारवान&#8217; राजनेताओं से रहेगा तो दिल्ली में विद्यालयीय शिक्षा का क्या हश्र होगा &#8211; आप समझ सकते हैं। हालांकि अंदर के लोग यह कहते हैं कि &#8216;स्थान तो कागज पर रिक्त है लेकिन निजी क्षेत्र से ठेका प्रथा के अधीन लोगों को भर दिया गया है।&#8217;</p>
<figure id="attachment_4945" aria-describedby="caption-attachment-4945" style="width: 1258px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/Screenshot-2023-06-19-at-12.05.59-PM.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/Screenshot-2023-06-19-at-12.05.59-PM.png" alt="" width="1258" height="702" class="size-full wp-image-4945" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/Screenshot-2023-06-19-at-12.05.59-PM.png 1258w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/Screenshot-2023-06-19-at-12.05.59-PM-300x167.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/Screenshot-2023-06-19-at-12.05.59-PM-1024x571.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/Screenshot-2023-06-19-at-12.05.59-PM-768x429.png 768w" sizes="auto, (max-width: 1258px) 100vw, 1258px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4945" class="wp-caption-text">मैथिली-भोजपुरी अकादमी जिस भवन में है, उस भवन में शराब के ठेकों का नियंत्रण होता है</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, एनसीपीसीआर ने तो पत्र में यह भी लिखा था कि &#8216;इंफ्रास्ट्रक्चर&#8217; की बात यदि छोड़ भी दें, तो अधिकांशतः विद्यालयों में विद्यालय प्रमुख (Head of School-HoS) की कुर्सी खली होने के कारण परिसर के किसी कोने में राखी दिखी। अब अगर दिल्ली सल्तनत में शिक्षा विभाग का यह हाल है तो दिल्ली सल्तनत में स्थापित &#8216;मैथिली-भोजपुरी अकादमी&#8217; का क्या हश्र होगा यह बात झंडेवालान के एक ऑटोवाला के कथन से स्पष्ट है। </p>
<p>विगत दिनों झंडेवालान् मेट्रो स्टेशन से नीचे सड़क पर उतरते ऑटो वाला से पूछा कि &#8216;मैथिली-भोजपुरी अकादमी&#8217; चलोगे? ऑटो वाला मुस्कुराते कहता है &#8216;वहीं न सर जिस ऑफिस में केजरीवाल का दारू खाना है, जहाँ बोतलों की गिनती होती है और मुख्यमंत्री कार्यालय में बताया जाता है कि आज, इस सप्ताह, इस माह, इस वर्ष इतनी शराब की भरी बोतलें बिकी और इतने पैसे की आमदनी हुई।&#8217; </p>
<p>मैं ऑटो वाले का मुख टकटकी निगाह से देखता रहा। उसकी भाषा सुनकर मैं उससे मैथिली में पूछा: &#8216;कतए घर भेल?&#8217; </p>
<p><strong>वह कहता है: &#8216;सर !!! हमर घर भुसारी छै, समस्तीपुर जिला।&#8217; मुझे देखकर वह मुस्कुराया और आगे कहता है: &#8216;मिथिला में लोक सभ मैथिली के नै बचाबैक कोशिश करै छथिन, आ एतय दारू वाला ऑफिस में &#8216;मैथिली-भोजपुरी अकादमी&#8217; छै &#8211; लिखलहा !!!</strong></p>
<p>यह बात इसलिए लिख रहा हूँ कि जिस भवन में शराब की बोतलों की गिनती होती हैं, बोतलों की बिक्री से एकत्रित पैसों की गिनती होती है &#8211; उसी भवन के नीचले तल्ले के कोने में &#8220;मैथिली-भोजपुरी अकादमी&#8221; स्थित है। भवन का नाम है &#8211; 7-9 आपूर्ति भवन, आराम बाग़, पहाड़गंज, नई दिल्ली। वैसी स्थिति में दिल्ली सरकार के लिए &#8216;मैथिली&#8217; और &#8216;भोजपुरी&#8217; भाषा की क्या अहमियत है आप स्वयं निर्णय करें। &#8216;मैथिली-भोजपुरी अकादमी&#8217; में बैठने वाले कर्मचारी &#8216;मैथिली&#8217; और &#8216;भोजपुरी&#8217; भाषा को शायद अपने जीवन में कभी नहीं सुने होंगे। वैसी स्थिति &#8216;विद्यापति&#8217; और &#8216;भिखारी ठाकुर&#8217;  बारे में पूछना कुल्हाड़ी पर अपना पैर पटकना है। कांग्रेस के ज़माने से, यानि श्रीमती शीला दीक्षित के ज़माने से आज तक, इन दो समुदाय के लोगों का उपयोग महज राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए होती आई है। मैथिली और भोजपुरी भाषा के विकास से इन अकादमी का कुछ भी लेना देना नहीं है। </p>
<p>विगत दिनों @अखबारवाला001 मैथिली-भोजपुरी अकादमी पर एक श्रृंखला प्रारम्भ किया। यूट्यूब की कहानी संख्या 119 &#8220;पऊआ, अद्धा, बोतल और दिल्ली में मैथिली-भोजपुरी अकादमी&#8217; &#8211; उस कहानी को करने से पहले भारत सरकार के &#8216;साहित्य अकादमी&#8217; के मैथिली साहित्य के दस हस्ताक्षरों को ईमेल के माध्यम से निवेदन किया कि वे दिल्ली सरकार द्वारा स्थापित/संचालित &#8216;मैथिली-भोजपुरी अकादमी&#8217; के बारे में ज्ञानवर्धन करें। क्या यह अकादमी &#8216;मैथिली&#8217; और &#8216;भोजपुरी&#8217; भाषा को मजबूत बनाने में सफल रही है या महज यह एक राजनीतिक लाभ हेतु मंच बनाया गया है ? </p>
<figure id="attachment_4946" aria-describedby="caption-attachment-4946" style="width: 1259px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/Screenshot-2023-06-19-at-12.05.01-PM.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/Screenshot-2023-06-19-at-12.05.01-PM.png" alt="" width="1259" height="707" class="size-full wp-image-4946" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/Screenshot-2023-06-19-at-12.05.01-PM.png 1259w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/Screenshot-2023-06-19-at-12.05.01-PM-300x168.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/Screenshot-2023-06-19-at-12.05.01-PM-1024x575.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/06/Screenshot-2023-06-19-at-12.05.01-PM-768x431.png 768w" sizes="auto, (max-width: 1259px) 100vw, 1259px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4946" class="wp-caption-text">दिल्ली सरकार का मैथिली-भोजपुरी अकादमी कार्यालय। यह जिस भवन में है, उस भवन में शराब के ठेकों का नियंत्रण होता है ​</figcaption></figure>
<p>इस कहानी पर पहली प्रतिक्रिया भारत सरकार के साहित्य अकादमी में मैथिली भाषा की हस्ताक्षर <strong>डा. वीणा ठाकुर</strong> कल लिखकर प्रेषित की। डॉ. वीणा ठाकुर अपनी बात <strong>&#8216;मैथिली&#8217;</strong> में लिखी हैं, यह ख़ुशी की बात है। </p>
<p><em>&#8220;कोनो भाषासँ सम्बद्ध संस्था-संगठनक स्थापनाक मूलमे निहित होइत अछि ओहि भाषा-साहित्यक संरक्षण आ संवर्द्धन। ई तखने सम्भव होइत अछि जखन मौलिक दृष्टि सम्पन्न तटस्थ आ कुशल नेतृत्व होय। ओहि भाषा-साहित्य लेल मौलिक काज कयल जाय-करबायल जाय। ई तखने सम्भव होयत जखन  एहन व्यक्तित्वक कुशल मार्गदर्शन भेटय जे मूलतः साहित्यकार होथि आ जिनकामे भाषा सेहो पचल होनि। किछु कविता, गीत, कथा आदि रचिकऽ कोनो गोटे साहित्यकारक शृंखलामे भने परिगणित होइत होथु, हुनक रचनो उत्कृष्ट होइत होइनि, मुदा तकर अर्थ ई कदापि नहि जे ओ भाषिक दृष्टिसँ सेहो क्षमतावान होथि।ओना तँ भाषाक ज्ञाता ओ सभ सर्वसाधारण होइत छथि जिनकर ओ मातृभाषा होइत छनि, मुदा ठोस विकास लेल साहित्यिक आ भाषिक दृष्टिकोणसँ एतबे टा होयब उपयुक्त नहि होइत अछि। भाषाक स्थायी ओ सर्वांगीण विकास लेल चाही विशेष-दृष्टि सम्पन्नता जकर अभाव दिल्लीक मैथिली-भोजपुरी अकादमीमे मैथिली लेल नजरि अबैत अछि।</p>
<p>जहिया एकर स्थापना लेल प्रयास कयल गेल छल आ तत्कालीन मुख्यमन्त्री श्रीमती शीला दीक्षित एकर स्थापना कयने छलीह तहिया की एतबे अपेक्षा छल जे एकटा एहन संस्था होय जे अवसर विशेषपर कवि-गोष्ठी आ अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम कऽ अपन कर्त्तव्यक इतिश्री करैत रहत? </p>
<p>साहित्यक दृष्टिसँ एकर जे कोनो गतिविधि रहबो कयल अछि तकरा सन्तोषप्रद कहल-मानल जा सकैछ? कथमपि नहि। </p>
<p>हमरा तँ लगसँ एकरा देखबा-गुनबाक अवसर नहि लागल अछि, मुदा फटकीएसँ जे नजरि अबैत रहल अछि से निराश करैत अछि।  ई देशक राजधानीक संस्था थिक। एकरा तँ मैथिलीक सिरमौर होयबाक चाही। एहि लेल सभक प्रति समभाव आ पारदर्शिता तँ चाहबे करी, जकर घोर अभाव बुझना जाइत अछि। लगैत अछि जेना ईहो गुटबाजीक शिकार भऽ गेल अछि। जेना सोशल मीडियापर अपन खायब-पियब, टहलब-बुलब आ अन्य अनावश्यक गतिविधिकेँ पल-पल पोस्ट कयनिहारकेँ भेटैत &#8216;लाइक्स&#8217;केँ  लोकप्रियताक नपना मानि लेल जाइत अछि तहिना कविता-गीतक नामपर परसल जायवला अलर-बलरकेँ सेहो साहित्य मानबाक भ्रम पोसल जाय लागल अछि। </p>
<p>मैथिली-भोजपुरी अकादमीकेँ सेहो एहिसँ फराक रहबाक चाही। अकादमीमे मैथिली लेल नेतृत्वकर्त्ताक दायित्व छनि जे ओ बुझथु जे साहित्य-लेखन आ ओकर आकलन दुनू फराक-फराक विषय थिक। ई सभक लेल कदापि सम्भव नहि जे ओ दुनूमे क्षम होथि। अकादमीमे मुख्य भूमिका निमाहनिहारकेँ ई अनिवार्य रूपसँ ध्यान राखऽ पड़तनि  तखने मैथिलीक यथार्थ विकासमे संस्था अपन असल भूमिकाक निर्वाह कऽ सकत।</p>
<p>विचारणीय ईहो थिक जे आइ धरि मैथिली अकादमी अपन स्वतंत्र स्वरूप किए ने पाबि सकल। स्थापनाक डेढ़ दशक बादो मैथिली लेल कोनो सार्थक प्रयास नहि कऽ सकल सेहो चिन्ता आ चिन्तनक कारण बनैत अछि।</em></p>
<p><strong>क्रमशः </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/ratio-of-schools-and-liquor-shops-in-delhi-is-41">दिल्ली में शिक्षा निदेशालय और उत्पाद विभाग के क्षेत्राधिकार वाले विद्यालय तथा शराब के ठेके का अनुपात 4:1 है यानी चार विद्यालय और एक ठेका 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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			</item>
		<item>
		<title>विश्वविद्यालय-स्तर पर &#8216;मैथिली भाषा&#8217; एक विषय के रूप में राजबहादुर कीर्त्यानंद सिंह ने प्रारम्भ कराये, लेकिन मिथिला के लोग उनके योगदान पर कभी &#8216;पुष्पांजलि&#8217; नहीं किये 😢 (भाग-1)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 07 Oct 2022 04:09:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[banaili]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[calcutta]]></category>
		<category><![CDATA[krityanand singh]]></category>
		<category><![CDATA[language]]></category>
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		<category><![CDATA[university]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पूर्णिया: कौन बनेगा साढ़े-सात करोड़पति के हॉट सीट पर बैठे मिथिला के किसी भी सम्मानित मैथिली भाषा-भाषी महानुभाव से अगर अमिताभ बच्चन साढ़े-सात करोड़ मूल्य का एक प्रश्न पूछें कि &#8220;भारत के किस विश्वविद्यालय में किस मिथिला के किस राजा के कारण मैथिली भाषा एक विषय के रूप में उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/raja-krityanand-singh-protector-of-maithili-language">विश्वविद्यालय-स्तर पर &#8216;मैथिली भाषा&#8217; एक विषय के रूप में राजबहादुर कीर्त्यानंद सिंह ने प्रारम्भ कराये, लेकिन मिथिला के लोग उनके योगदान पर कभी &#8216;पुष्पांजलि&#8217; नहीं किये 😢 (भाग-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पूर्णिया: कौन बनेगा साढ़े-सात करोड़पति के हॉट सीट पर बैठे मिथिला के किसी भी सम्मानित मैथिली भाषा-भाषी महानुभाव से अगर अमिताभ बच्चन साढ़े-सात करोड़ मूल्य का एक प्रश्न पूछें कि &#8220;भारत के किस विश्वविद्यालय में किस मिथिला के किस राजा के कारण मैथिली भाषा एक विषय के रूप में उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था, साथ ही &#8216;मैथिली लैक्चर&#8217; स्थापित किया गया था ?&#8221;  हमें विश्वास है कि &#8216;हॉट सीट पर बैठे सम्मानित महानुभाव की कुर्सी हॉट हो जाएगी और वे उत्तर नहीं दे पाएंगे। शब्द बहुत कटु हैं, मिथिला के लोगों को हज़म नहीं होगा, परन्तु सत्य यही है। वजह यह है कि मिथिला के लोग दरभंगा के महाराजाओं के अलावे शिक्षा के विकास के क्षेत्र में किसी और राजा-महाराजाओं-जमींदारों के योगदानों को आगे आने नहीं दिए। वजह &#8216;सर्वविदित&#8217; है। </strong></p>
<p>मिथिला में माँछ-माखन-पाग की राजनीति के कारण आज लोग शायद यह जानते भी नहीं होंगे कि जिस &#8216;मैथिली&#8217; भाषा को लेकर मिथिला के करीब साढ़े चार करोड़ मैथिली भाषा-भाषी दरभंगा के टावर चौक से दिल्ली के जंतर मंतर तक कुश्ती लड़ रहे हैं; अपने-अपने नामों का सिक्का चलाने का अनवरत प्रयास कर रहे हैं; मैथिली के नाम पर राजनीतिक अखाड़े खोल रखे हैं; आखिर &#8216;मैथिली भाषा भारत की उच्च शिक्षा में पाठ्यक्रम में कहाँ और कैसे प्रवेश लिया? किस महानुभाव के अथक प्रयास से यह संभव हो पाया था &#8211; इस तथ्य को शायद नहीं जानते होंगे। </p>
<p><strong>दरभंगा के राजा-महाराजाओं का भारत के शिक्षा जगत में योगदान अविस्मरणीय है, यह सत्य है; लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि दरभंगा के राजा-महाराजाओं के अलावे भी देश के अन्य राजा, जमींदार का भारत की शिक्षा व्यवस्था मजबूत हो, मिथिला का उत्थान हो, मैथिली भाषा का वजूद हो, पर्याप्त कार्य किये थे &#8211; लेकिन आज मिथिला के लोग इतिहास के पन्नों में उसका नाम नजर अंदाज कर दिए हैं। </strong></p>
<p>इतना ही नहीं, लोग माने अथवा नहीं, सं 1977 में कर्पूरी ठाकुर जब बिहार के मुख्य मंत्री थे, और 1980 में डॉ जगन्नाथ मिश्र प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए, &#8220;मैथिली&#8221; भाषा को मिथिला के नौजवानों के हितार्थ संविधान के आठवें सूची में स्थान प्रदान करने के लिए प्रयास प्रारम्भ किया गया था। उस प्रयास के लगभग 25-वर्ष बाद संविधान के 92 वें संसोधन में &#8216;बोडो&#8217;, &#8216;डोगरी&#8217;, &#8216;संथाली&#8217; और &#8216;मैथिली&#8217; भाषाओँ को संविधान के आठवें सूची में स्थान प्राप्त हुआ। साथ ही, संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित भारतीय प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षाओं में &#8216;वैकल्पिक विषय&#8217; के रूप में दाखिला मिला। </p>
<p><strong>खैर, 2004 से आज तक, यानी विगत दो दशकों में, इन परीक्षाओं में &#8220;मैथिली&#8221; विषय के साथ कितने अभ्यर्थी उत्तीर्ण हुए हैं और वे मिथिला का कितना कल्याण किये हैं, मैथिली भाषा के विकास के लिए क्या किए, यह एक अलग शोध का विषय है। लेकिन कर्पूरी ठाकुर को या फिर डॉ जगन्नाथ मिश्र को इस पहल के लिए कितना &#8220;सम्मान&#8221; मिला, यह तो मिथिला के लोग अधिक जानते होंगे।</strong> </p>
<p>बहरहाल, 1917 के कालखंड में भारत में, खासकर बंगाल में &#8216;भाषा&#8217; के प्रति &#8216;सम्मान&#8217; और राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए आंदोलन की नींव मजबूत होना प्रारम्भ हो गया था। उधर देश की राजनीतिक गतिविधियों में अप्रैल के महीने में मोहनदास करमचंद गाँधी बिहार के चम्पारण जिले में नील की खेती और किसानों के सम्मानार्थ सत्याग्रह प्रारम्भ कर दिए थे। अगस्त के महीने में एड्विन मॉन्टेगुए, जो ब्रितानिया सरकार का भारत के लिए सचिव थे, भारत के लिए अंग्रेजी नीतियों की घोषणा कर चुके थे। सन 1918 के अप्रैल महीने में रॉलेट कमिटी अपना रिपोर्ट प्रस्तुत कर दिया था। एड्विन मॉन्टेगुए और वाइसरॉय चेम्सफोर्ड अपना संयुक्त संवैधानिक प्रतिवदेन भी प्रस्तुत कर चुके थे। देश में राजनीतिक उथल-पुथल की शुरुआत हो गयी थी। </p>
<p><strong>तभी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भाषा की महत्ता को स्वीकार करते कलकत्ता विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति आशुतोष मुखर्जी ने बनैली के राजा कीर्त्यानन्द सिंह का मैथिली भाषा के प्रति &#8216;निष्ठा&#8217;, &#8216;प्रतिबद्धता&#8217;, &#8216;सम्मान&#8217;,  भाषा की विकास के लिए उनकी सोच का सम्मान करते उनसे कहे कि अगर &#8216;तीन दिन के अंदर&#8217; वे 2500 रुपये विश्वविद्यालय में जमा कर दें तो &#8216;मैथिली भाषा कलकत्ता विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल हो जायेगा। ब्रितानिया हुकूमत के इस काल खंड में &#8216;मैथिली&#8217; भाषा को भारत के किसी भी विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम के रूप में &#8216;सम्मान&#8217; मिलना, एक बेहतरीन पहल था। </p>
<figure id="attachment_4534" aria-describedby="caption-attachment-4534" style="width: 1134px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/6-Kirtyanand1200.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/6-Kirtyanand1200.jpeg" alt="" width="1134" height="1600" class="size-full wp-image-4534" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/6-Kirtyanand1200.jpeg 1134w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/6-Kirtyanand1200-213x300.jpeg 213w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/6-Kirtyanand1200-726x1024.jpeg 726w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/6-Kirtyanand1200-768x1084.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/6-Kirtyanand1200-1089x1536.jpeg 1089w" sizes="auto, (max-width: 1134px) 100vw, 1134px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4534" class="wp-caption-text">राजा कीर्त्यानंद सिंह</figcaption></figure>
<p>राजा कीर्त्यानन्द सिंह ने मैथिली की सेवा करने मे अपना सौभाग्य समझ कर तुरंत 2500 विश्वविद्यालय में जमा करवाए  और फिर अपनी तरफ से 7500 रुपये अतिरिक्त प्रेषित किये। इसका परिणाम यह हुआ कि कलकत्ता विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर कक्षा तक &#8220;मैथिली भाषा&#8221; एक विषय के रूप में अपना स्थान प्राप्त किया। इतना ही नहीं, एक वर्ष बाद, सन 1919 में कुमार कालिकानंद सिंह और  राजा कीर्त्यानन्द सिंह ने मिलकर 1200 रूपये वार्षिक शुल्क देकर छह वर्षों के लिए &#8216;मैथिली लैक्चर&#8221; स्थापित किये।</strong> </p>
<p>लेकिन दुर्भाग्य यह है कि विगत 105 वर्षों में मिथिला के एक भी व्यक्ति, मिथिला के एक भी विद्वान, एक भी विदुषी, मिथिला साहित्य के एक भी तथाकथित धनुर्धर, एक भी हस्ताक्षर कभी &#8216;मैथिली भाषा&#8217; के प्रति राजा कीर्त्यानंद सिंह अथवा कुमार कालिका नन्द सिंह की भूमिका की चर्चा तक नहीं किये और उन सबों की आवाज दरभंगा राज और दरभंगा के लाल किले से बाहर नहीं निकला। चापलूसी, चाटुकारिता पर यह भी एक शोध का विषय है। पटना विश्वविद्यालय में मैथिली की पढ़ाई 1938 में प्रारम्भ हुई। </p>
<p>राजा बहादुर कीर्त्यानंद सिंह राजा लीलानंद सिंह के तीसरे पुत्र थे। उनका जन्म 23 सितम्बर, 1883 को हुआ था। सं 1919 में इन्हे राजा बहादुर की पदवी से अलंकृत किया गया। कलानंद और कीर्त्यानंद में बड़ी मैत्री थी। रानी पद्मावती देवी की मदद से इन दोनों ने पद्मानंद के हिस्से के 7 आने को ठीका प्रबंध पर ले लिया और यह व्यवस्था 1939 ई0 तक चलती रही। कलानंद और कीर्त्यानंद 1919 तक एक साथ ड्योढ़ी बनैली चम्पानगर में रहे।  स्थानीय लोगों का कहना है कि राज बनैली का स्वर्णिम काल था।</p>
<p>यह अलग बात है कि बदलते समय में मिथिला के लोगों ने शिक्षा के क्षेत्र में बनैली राज की भूमिका को नजर अंदाज किया, लेकिन इतिहास गवाह है कलानंद और कीर्त्यानंद भाइयों ने शिक्षा के क्षेत्र में, उसके विकास के लिए कई महत्वपूर्ण योगदान दिए। उनका योगदान आज भी पूर्णिया के इतिहास में अंकित है। </p>
<p>सन 1903 में उन्होंने चम्पानगर में एम्. ई स्कूल खुलवाया जो निजी व्यवस्था द्वारा संचालित जिला का पहला विद्यालय था। इसी तरह 1909 में भागलपुर के तेज नारायण जुबली कालेज की बिगड़ती हुई हालत देखकर कलानंद सिंह और कीर्त्यानंद सिंह  ने लाखों रुपये देकर उसे नया जीवन दिया।टी. एन. जे. काॅलेज बाद में तेज नारायण बनैली काॅलेज के नाम से प्रसिद्द हुआ। इतना ही नहीं, दोनों भाईयों ने भाइयों ने कई और अनुदान देकर पूर्णियाँ का नाम रोैशन किया। मसलन: पटना विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के रीडरशिप के लिए 25000/-, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में एक लाख रुपये दान किये। </p>
<figure id="attachment_4535" aria-describedby="caption-attachment-4535" style="width: 957px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/ec785825-9cb0-4d4b-8489-5026a62c97f6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/ec785825-9cb0-4d4b-8489-5026a62c97f6.jpg" alt="" width="957" height="1280" class="size-full wp-image-4535" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/ec785825-9cb0-4d4b-8489-5026a62c97f6.jpg 957w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/ec785825-9cb0-4d4b-8489-5026a62c97f6-224x300.jpg 224w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/ec785825-9cb0-4d4b-8489-5026a62c97f6-766x1024.jpg 766w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/ec785825-9cb0-4d4b-8489-5026a62c97f6-768x1027.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 957px) 100vw, 957px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4535" class="wp-caption-text">गिरिजानंद सिन्हा</figcaption></figure>
<p><strong>बनैली राज के गिरिजानंद सिन्हा अपनी पुस्तक &#8220;बनैली: रूट्स टू राज&#8221; में लिखे हैं कि : &#8220;कलानंद सिंह सदैव ऐसा महसूस करते थे कि उपरोक्त सभी अनुदानों में सिर्फ कीर्त्यानंद ही यश के भागी हुए।&#8221; यह बात सच भी थी क्योंकि जनता से अधिक आदान-प्रदान बनाये रखने के कारण कीर्त्यानंद सिंह काफी प्रसिद्द थे। उन्होंने यह भी लिखा कि &#8220;कलानंद के बड़े लड़के कुमार रामानंद सिंह ने अपने पिता पर दबाब डालकर उन्हें चाचा से अलग होने के लिए मना लिया और दोनों भाई अलग हो गए।&#8221; राजा बहादुर कीर्त्यानंद  सिंह जमींदारों और राजाओं के बीच पहले ग्रेजुएट थे।उन्होंने 1903 में इलाहाबाद महाविद्यालय से बी ए पास किया था। वे इतिहास के स्नातक तो थे ही, अंग्रेजी और हिन्दी के विद्वान भी थे। उन्होंने अपने &#8216;शिकार&#8217; के अनुभवों पर आधारित दो पुस्तकें अंग्रेज़ी में लिखी थीं &#8211; &#8220;पूर्णिया ए शिकार लैंड&#8221; और दूसरा: शिकार इन हिल्स एंड जंगलस।&#8221;</strong></p>
<p>आज पूरा विश्व वन्य प्राणियों की सुरक्षा में भिड़ा है। कितनी ही प्रजातियां &#8216;बिलुप्त&#8217; होने के कगार पर कड़ी है और ऐसे में उनका संरक्षण अत्यावश्यक है। कीर्त्यानंद सिंह के ज़माने में परिस्थितियां सर्वथा भिन्न थी। पूर्णिया ए शिकार लैंड में वे लिखते हैं: “The country all around is calm, but is not, certainly, devoid of population. A number of scattered thorps dot the plains here and there; but the life of the inhabitants is at times one of danger and dread; for, which their numberless cattle grazing freely in the jungles, attract the cattle lifter from his grassy ambush, the people themselves have at times cleverly to deceive the vigilance of the dangerous man-eater. The welfare of these poor agriculturists and cow herds who are our tenants made me take to the rifle and generated in me and all about me a passion for jungle sport which is the subject of this book.”</p>
<p>कहते हैं कीर्त्यानंद सिंह होमियोपैथिक चिकित्सा के भी अच्छे जानकार थे और उन्होंने इस विषय पर ‘होमियोपैथिक प्रेक्टिस नामक किताब लिखी भी लिखे थे।  कीर्त्यानंद सिंह ने काफी कम उम्र में राजनीतिक जीवन में प्रवेश लिया था । मॉर्ले मिन्टो रिफॉर्म्स&#8217; के अंतर्गत वे पुराने बंगाल के विधान परिषद के माननीय सदस्य थे। बिहार और उड़ीसा प्रान्त के गठन होने पर वे पुनः विधान परिषद में भागलपुर के जमींदारों के प्रतिनिधि सदस्य के रूप  में चुने गये। सन 1909 ईश्वी में वे भागलपुर के बिहार औद्योगिक सम्मेलन के अध्यक्ष बनें। भागलपुर में आयोजित अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के स्वागत समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने हिन्दी भाषा की बड़ी सेवा की। सं 1914 के जून माह में वे &#8220;राजा&#8221; की ुआपाधी से अलंकृत हुए। वे काफी लम्बे समय तक ‘बिहारोत्कल संस्कृत समिति’ के अध्यक्ष भी रहे। जुलाई 1917 को कीर्त्यानंद सिंह ‘चंपारण अग्रेरियन कमिटी’ में जमींदारों के प्रतिनिधि चुने गये और उन्होंने जिस प्रकार जमींदार और रैयत के बीच सामंजस्य सामंजस्य कायम किया, वह न केवल तत्कालीन सरकार बल्कि महात्मा गांधी के द्वारा भी सराहा गया। बाद में, 1919 ई0 में ‘राजाबहादुर’ की उपाधि से अलंकृत किया गया। </p>
<p>बैंक ऑफ़ बिहार की स्थापना 1911 ई0 में हुई थी। बाबू कीर्त्यानंद सिंह इस बैंक के कार्यशील निदेशक के रूप सन 1929 से 1937 ई0 तक प्रांत के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। बाद में बैंक ऑफ़ बिहार का स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया में विलय हो गया। इतना ही नहीं, बंगाल के सीतारामपुर में उन्होंने ‘कीर्त्यानंद आयरन एंड स्टील वर्क्स&#8217; खोलकर औद्योगीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास किया था। इस कंपनी ने 1921-22 ई में उत्पादन कार्य प्रारम्भ किया था और गुणवत्ता में यह टाटा कंपनी और बंगाल आयरन कंपनी के समकक्ष माना गया। दुर्भाग्यवश यह &#8216;कामयाब&#8217; नहीं हो पाया। </p>
<p><strong>उन्होंने 1906 ई0 में प्रांत के पहले अंग्रेजी दैनिक अख़बार &#8216;द बिहारी&#8217; को सुदृढ़ और सुव्यवस्थित करने में बड़ी मदद की।यही ‘द बिहारी’ बाद में ‘सर्चलाइट’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।&#8221;राजा&#8221; की उपाधि से अलंकृत होने पर तत्कालीन दैनिक अख़बार ”द एक्सप्रेस“ ने लिखा- “The title of Raja conferred on Kumar Kirtyanand Sinha of Banaili, will undoubtedly be received with very great satisfaction. Raja Kirtyanand Sinha has freely opened his purse for all good works, calculated to promote the advancement of the province, and it is an honour which he richly deserves.”</strong></p>
<p>1933 ई0 में ‘हाउस्टन माउण्ट एवरेस्ट एक्सपीडिशन के अंतर्गत पूर्णियां में ही बेस कैम्प बनाकर एवरेस्ट की चोटी के ऊपर से प्रथम उड़ान भरी गई।उल्लेखनीय है कि इस उड़ान-दल ने राजा कीर्त्यानंद सिंह और दरभंगा के महाराजा के संरक्षण और आतिथ्य में रहकर अपना कार्य पूरा किया था। पी.एफ.एम. फेलोज़ लिखते हैं: &#8220;The Raja of Banaili, a cheery personality, who had shot over hundred tigers, offered us his fleet of motor-cars, remarking that, if possible, he would like to retain one or two of his own. He had seventeen. He seemed astonished, as if at an unusual display of moderation, when only three cars and a lorry were required.&#8221;</p>
<p>यह भी सत्य है कि राजा कीर्त्यानंद सिंह ने 1928 ई0 में पूर्णियाँ-सहरसा रेलवे लाइन पर भोकराहा के निकट निजी कोष से एक रेलवे स्टेशन बनवाया जो आज कीर्त्यानंद नगर के नाम से जाना जाता है। इतना ही नहीं, उन्होंने 1935 ई. में पूर्णियां जिला स्कूल का नया भवन बनवाने के लिए 17.5 एकड़ ज़मीन और प्रचुर धन देकर महत्वपूर्ण सहयोग दिया। इस सम्बन्ध में कलकत्ता से प्रकाशित द स्टेट्समैन ने ने लिखा: “The Rajah Bahadur of Banaili has presented 17½ acres of land at Purnea for the purpose of building the new Purnea Zila School to replace the old school ruined by the Bihar Earthquake.” बाद में वे उच्च और अनियमित रक्तचाप से अस्वस्थ रहने लगे। 1936 ई0 में वे बीमार पड़े और उनकी हालत बिगड़ती चली गयी। अंतिम समय में उन्हें एक विशेष रेलगाड़ी से बनारस ले जाया गया। &#8216;काशी&#8217; स्टेशन पर पहुँचते ही उनका हँसता-मुस्कुराता शरीर &#8216;पार्थिव&#8217; हो गया। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/raja-krityanand-singh-protector-of-maithili-language">विश्वविद्यालय-स्तर पर &#8216;मैथिली भाषा&#8217; एक विषय के रूप में राजबहादुर कीर्त्यानंद सिंह ने प्रारम्भ कराये, लेकिन मिथिला के लोग उनके योगदान पर कभी &#8216;पुष्पांजलि&#8217; नहीं किये 😢 (भाग-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>मिथिला की महिलाओं से अपील: पारिवारिक कार्यों के बाद आप अपना अतिरिक्त समय &#8216;मातृभाषा&#8217; को मजबूत करने में दें</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Feb 2022 10:36:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>रांची / दरभंगा / पटना :  प्रतिभा और संवेदना &#8212; &#8220;मिथिला&#8221; की यह दो खास देन है। मिथिलांचल से आने वाली प्रतिभाओं की कमी नहीं है। मिथिला की प्रतिभाएं आज विभिन्न क्षेत्रों में अपनी खास पहचान बना चुकी है। लेकिन मिथिलांचल से आने वाली अधिकांश महिलाओं की प्रतिभाओं सहित अन्य क्षेत्रों (राज्यों) की महिलाओं से [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रांची / दरभंगा / पटना :  प्रतिभा और संवेदना &#8212; &#8220;मिथिला&#8221; की यह दो खास देन है। मिथिलांचल से आने वाली प्रतिभाओं की कमी नहीं है। मिथिला की प्रतिभाएं आज विभिन्न क्षेत्रों में अपनी खास पहचान बना चुकी है। लेकिन मिथिलांचल से आने वाली अधिकांश महिलाओं की प्रतिभाओं सहित अन्य क्षेत्रों (राज्यों) की महिलाओं से (पुरुष की तुलना में) हम आम तौर पर अपरिचित हैं। मिथिला की महिलाओं से अनुरोध है कि पारिवारिक (घरेलू) कार्यों के बाद यदि आप या आपके परिवार की अन्य महिला सदस्य अतिरिक्त समय में खाली बैठती हैं तो इस खाली समय में &#8220;मातृभाषा संघर्ष समिति&#8221; को अपनी अवैतनिक सेवा देकर स्वयं को व्यस्त रखें तथा अपनी प्रतिभा व क्षमता के प्रदर्शन से मैथिली को राज्य/राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने में भरपूर सहयोग करें।</strong></p>
<p>अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद, केन्द्रीय समिति, बिहार के संरक्षक, राष्ट्रीय शैक्षिक महोत्सव सह पटना-राॅ॑ची पुस्तक मेला के संस्थापक और नोवेल्टी एण्ड कम्पनी के प्रबंध निदेशक नरेन्द्र कुमार झा ने लिखा है कि सोमवार दिनांक 7 फरवरी, 2022  को प्रोफेसर शांति श्री धूलिपुडी़‌ पंडित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली की कुलपति नियुक्त की गई है। उन्हें जेएनयू पहली महिला कुलपति बनने का भी गौरव मिला है। उनका कार्यकाल 5 वर्ष होगा। वह अभी महाराष्ट्र के सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय, पुणे के राजनीति व लोक प्रशासन विभाग में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर थीं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्रा रहीं शांति श्री ने 1986 में यहीं से एमफिल और 1990 में पीएचडी की थी। तमिलनाडु से सम्बन्ध रखने वाली‌‌ जेएनयू की पूर्व छात्रा को यह जिम्मेदारी सौंपने के लिए प्रधानमंत्री का आभार है। उन्होंने कार्यभार संभाल लिया है।</p>
<p>झा ने लिखा है कि हमेशा नहीं लेकिन कभी-कभार ही हमें महिलाओं की प्रतिभा व क्षमता का उदाहरण मिल पाता है हालांकि मिथिला के धरती की अधिकांश महिलाएं  प्रतिभासम्पन्न होती हैं। इसका मूल कारण यह है कि मिथिला की परम्परागत संस्कृति के कारण अधिकांश महिलाओं की प्रतिभा व क्षमता का प्रदर्शन विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न विषयों पर नहीं हो पाता है। ले-देकर उनके लिए मात्र शिक्षण का ही क्षेत्र बचता है जिसमें वे अपनी प्रतिभा व क्षमता का प्रदर्शन अपनी परम्परागत संस्कृति का निर्वाह करते हुए कर सकें। लेकिन महाविद्यालयों में उनकी लगभग 6 घंटे तक उपस्थिति की अनिवार्यता के फलस्वरूप अधिकांश महिलाएं शिक्षण कार्य के साथ-साथ अपने पारिवारिक (घरेलू) कार्य में समुचित समय नहीं दे पातीं हैं जिसके कारण कतिपय अन्य विषयों के संघर्षों हेतु प्रतिभा सम्पन्न होते हुए भी महिलाओं का कम प्रतिशत ही इस क्षेत्र में भी अपनी क्षमता का प्रदर्शन करता है।</p>
<figure id="attachment_3782" aria-describedby="caption-attachment-3782" style="width: 638px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp.jpg" alt="" width="638" height="638" class="size-full wp-image-3782" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp.jpg 638w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-48x48.jpg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-96x96.jpg 96w" sizes="auto, (max-width: 638px) 100vw, 638px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3782" class="wp-caption-text">अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद, केन्द्रीय समिति, बिहार के संरक्षक, राष्ट्रीय शैक्षिक महोत्सव सह पटना-राॅ॑ची पुस्तक मेला के संस्थापक और नोवेल्टी एण्ड कम्पनी के प्रबंध निदेशक नरेन्द्र कुमार झा</figcaption></figure>
<p>हमारे विचार से &#8216;मैथिली भाषा संघर्ष समिति&#8217; के स्थान पर &#8220;मातृभाषा संघर्ष समिति&#8221; नामकरण माध्यम से हम महिलाओं व विभिन्न क्षेत्रों के आम नागरिक से भी अभूतपूर्व सहयोग प्राप्त कर सकते हैं। जहाँ तक झारखंड में अपनी मातृभाषा की सफलता का प्रश्न है इसमें बिहार-झारखंड की अधिक से अधिक महिलाओं की एकजुटता को शामिल करना तो अति आवश्यक है ही। हमें पूरा विश्वास है कि बिहार व झारखण्ड में प्रतिभाओं की उर्वरक धरती मिथिला से आई महिलाओं के सहयोग से असम्भव को सम्भव किया जा सकता है। एक ओर जहाँ शिक्षण-प्रशिक्षण विषय पर इन प्रतिभासम्पन्न महिलाओं की क्षमता का प्रदर्शन किसी भी महाविद्यालय को श्रेष्ठता प्रदान कराता है वहीं दूसरी ओर झारखण्ड में मातृभाषा की अनिवार्यता विषय पर भी सहयोगी महिलाओं की क्षमता का प्रदर्शन हमें सफलता प्रदान करेगा।<br />
 <br />
<strong>हम विशेषकर बिहार-झारखंड के मिथिलांचल क्षेत्र के उन आम नागरिकों की एकजुटता से ही अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त कर सकते हैं जो मूलतः बिहार के ही हैं हालांकि वे अब नए प्रदेश झारखंड के आजीवन वासी  हैं। कार्य कठिन है लेकिन असंभव नहीं। मिथिला की प्रतिभा ही इस कार्य को सम्भव कर सकती है।</strong></p>
<p>उपरोक्त तथ्यों के आलोक में हम अनुरोध करते हैं कि पारिवारिक (घरेलू) कार्यों के बाद यदि आप या आपके परिवार की अन्य महिला सदस्य अतिरिक्त समय में खाली बैठती हैं तो इस खाली समय में &#8220;मातृभाषा संघर्ष समिति&#8221; को अपनी अवैतनिक सेवा देकर स्वयं को व्यस्त रखें तथा अपनी प्रतिभा व क्षमता के प्रदर्शन से मैथिली को राज्य/राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने में भरपूर सहयोग करें। हम आपसे आग्रह करते हैं कि बिहार-झारखण्ड की उन महिलाओं का भी नाम, मोबाइल नंबर व डाक पता आदि ह्वाट्सएप करने का कष्ट करें ताकि उन्हें  अविलम्ब &#8220;मातृभाषा संघर्ष समिति&#8221; समूह में शामिल किया जा सके। महिलाओं के इस समूह हेतु एक &#8220;संचालन समिति&#8221; का निर्माण भी अति आवश्यक है।<br />
 <br />
अन्ततः हम समझते हैं कि मिथिला की पहचान बनाने की संवेदना आप में अवश्य होगी। अतः हम जिस सहयोग की अपेक्षा रखते हैं वह नि:संदेह आप अपनी मातृभाषा को देंगी। हमें आपकी सहभागिता आपके खाली समय में ही चाहिए।‌ समय आप अपनी सुविधानुसार जो भी देना चाहें, हमें स्वीकार्य होगा।  आपके समूह की प्रतिभा हमें मातृभाषा के स्तर को बरकरार रखने में जहाँ एक ओर मदद करेगी, वहीं दूसरी ओर किसी भी अन्य सामूहिक संघर्ष में भी आप सहयोगी बनने में आकर्षित होंगी। </p>
<figure id="attachment_3783" aria-describedby="caption-attachment-3783" style="width: 640px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-1.jpg" alt="" width="640" height="640" class="size-full wp-image-3783" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-1.jpg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-1-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-1-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-1-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-1-48x48.jpg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/pp-1-96x96.jpg 96w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3783" class="wp-caption-text">डॉ धनाकर ठाकुर</figcaption></figure>
<p><strong>उधर, </strong>विगत 8 फरवरी को गूगल मीटिंग आयोजन के द्वारा  तिरहुत मित्र मंडल का  स्थापना  दिवस मनाया गया जो उसी दिन 2011 में रांची में स्थापित हुआ था। मीटिंग की अध्यक्षता डॉ धनाकर ठाकुर ने की । उन्होंने कहा की अब इसे दिल्ली समेत सभी महानगर में संगठित किया जायेगा ताकि मिथिला राज्य और मैथिली भाषा का प्रचार संगठित रूप से इस क्षेत्र में हो जिसके बिना मिथिला राज्य एवं मैथिली भाषा की कल्पना नहीं की जा सकती है। मिथिलाक्षर का पहिला शिलालेख यहीं नरकटियागंज निकट सहोदरा गाँव में मिला है जो दशवीं सदी का है।</p>
<p>उन्होंने कहा क़ि तिरहुत क्षेत्र वह है जहाँ ब्राह्मण त्रिकाल संध्या करते थे जो गुरु गोलवलकर का मत है वैसे बिहार में गंगा का उत्तरी भाग तिरहुत क्षेत्र कहा जाता है जो नदी के किनारे सामान्य अर्थ में है। तुर्क-अफगान काल में तिरहुत स्वतंत्र प्रशासनिक ईकाई बना जो बंगाल राज्य के  अंतर्गत था। गंगा, गंडक तथा कोशी नदी  से घिरा सघन आबादी वाला मैदानी हिस्सा सन 1856 तक बंगाल प्रांत में भागलपुर प्रमंडल का अंग था। संथाल विद्रोह के पश्चात तिरहुत को पटना प्रमंडल में मिला दिया गया।</p>
<p>सन् 1875 में बंगाल से अलग होकर मुजफ्फरपुर एवं दरभंगा नामक दो जिला में बँट गया । 1875 में दरभंगा को तिरहुत से अलग कर स्वतंत्र जिला बना दिया गया। 19 वीं सदी के उत्तरार्द्धमें इस क्षेत्र मे अकाल पड़ने के बाद बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एंड्रू फ्रेजर ने तिरहुत को अलग प्रशासनिक इकाई बनाने की आवश्यकता का अनुभव किया। जनवरी 1908 में भारत के गवर्नर जनरल की मंजूरी पश्चात तिरहुत प्रमंडल बनाया गया जिसमें सारण, चंपारण, मुजफ्फरपुर तथा दरभंगा जिला रख मुजफ्फरपुर मुख्यालय बनाया गया। ब्रिटिश भारत में सन 1908 में जारी एक आदेश के तहत तिरहुत पटना से अलग प्रमंडल बना ।</p>
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