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	<title>maharaja of darbhanga Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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		<title>​​अगर &#8216;कागज सही है&#8217; तो &#8216;महारानियों की मृत्यु के बाद संपत्ति महाराजा के भतीजे शुभेश्वर सिंह (अब दिवंगत) के संतानों को मिलेगा&#8217;, लेकिन &#8216;नेपथ्य में कुछ और हो रहा है&#8217; </title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 30 Apr 2026 11:52:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / दरभंगा : &#8220;एंड व्हेरेऐज आई हैव नो इस्सू&#8221; इस छः शब्दों को अपने वसीयत के दूसरे पन्ने पर लिखते, लिखाते समय दरभंगा के अंतिम महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की आत्मा &#8220;दो-फांक&#8221; में अवश्य हो गयी होगी। परन्तु, महाराजाधिराज अपनी उस वसीयत में जिस प्रकार बहुत ही प्रमुखता, सम्मान, अपनापन के साथ यह [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/when-maharaja-darbhanga-soad-painfully-and-whereas-i-have-no-issue">​​अगर &#8216;कागज सही है&#8217; तो &#8216;महारानियों की मृत्यु के बाद संपत्ति महाराजा के भतीजे शुभेश्वर सिंह (अब दिवंगत) के संतानों को मिलेगा&#8217;, लेकिन &#8216;नेपथ्य में कुछ और हो रहा है&#8217; </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / दरभंगा : &#8220;एंड व्हेरेऐज आई हैव नो इस्सू&#8221; इस छः शब्दों को अपने वसीयत के दूसरे पन्ने पर लिखते, लिखाते समय दरभंगा के अंतिम महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की आत्मा &#8220;दो-फांक&#8221; में अवश्य हो गयी होगी। परन्तु, महाराजाधिराज अपनी उस वसीयत में जिस प्रकार बहुत ही प्रमुखता, सम्मान, अपनापन के साथ यह उद्धृत किये कि &#8220;मेरे सबसे करीबी, मेरी अपनी दो पत्नियां हैं &#8211; महारानी राज्यलक्ष्मी और महारानी कामसुंदरी और मेरे दिवंगत भाई राजा बहादुर बिशेश्वर सिंह के तीन पुत्र &#8211; राज कुमार जीवेश्वर सिंह, राज कुमार येणेश्वर सिंह और राजकुमार शुभेश्वर सिंह, जिसमें पहला सबसे बड़ा है और शेष दो अभी नाबालिग है&#8221;; आज की स्थिति में शायद ही कोई लिखता होगा, अपने भतीजों को &#8216;अपना&#8217; कहता होगा, अपने सगे-सम्बन्धियों को &#8216;अपना स्वीकारता&#8217; होगा। </strong></p>
<p>लेकिन महाराजाधिराज की मृत्यु के 64-साल और उनकी तीसरी महारानी कामसुंदरी देवी की 12 जनवरी, 2026 को अंतिम सांस लेने के 89-वें दिन (10 अप्रैल 2026) को बिहार सरकार के राजस्व और भूमि सुधार विभाग में महारानी की सम्पत्तियों पर आधिपत्य ज़माने के लिए शतरंज का गोटी बिछना शुरू हो गया था। अगर ऐसा नहीं होता तो पीआर-001312 (राजस्व)/2026-27 संख्या से अरविन्द कुमार, सरकार के अवर सचिव के नाम से सार्वजनिक सूचना जारी नहीं होता। इस अधिसूचना के निर्गत होने के तारीख के नौवें दिन, अर्थात 18 अप्रैल 2026 को बिहार के प्रादेशिक अख़बारों में प्रकाशित नहीं होता। कोई तो है, कुछ तो कारण है जो नेपथ्य से कार्य कर रहा है। </p>
<blockquote><p>पटना सचिवालय के साथ-साथ दरभंगा जिला के राजस्व और भूमि सुधार विभाग के &#8216;होठ सिले कर्मचारियों&#8217; का कहना है कि &#8216;वे सभी बहुत ही छोटे-छोटे कर्मचारी हैं। यह बड़े-बड़े (शिक्षा से नहीं, अपितु धन से) लोगों, अधिकारियों, नेताओं का खेला है। यह कहना बहुत मुश्किल है कि कौन-कौन लोग इस खेला में खिलाड़ी हैं। लेकिन एक बात तो तय है कि महाराजा की सम्पत्तियों पर सबकी निगाहें गिद्ध जैसी लगी है। हो भी क्यों नहीं। मुफ्त की संपत्ति है। सभी अपनी-अपनी पारी खेल रहे हैं।&#8221;</p></blockquote>
<p>जिस दिन पटना के राजस्व विभाग में इस अधिसूचना को अख़बारों में प्रकाशित करने संबधी आदेश पर हस्ताक्षर हुआ था, बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुख्यमंत्री कार्यालय से निकलने के लिए सज्ज हो रहे थे। तारीख 10 अप्रैल 2026 था। उस समय बिहार का राजस्व और भूमि सुधार विभाग उनके मंत्रिमंडल में भारतीय जनता पार्टी के उप-मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा के पास था। नितीश कुमार 14 अप्रैल को त्यागपत्र दिए। अगले दिन, यानी 15 अप्रैल 2026 को भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री पद का शपथ लिए और राजस्व तथा भूमि सुधार विभाग के साथ-साथ 29 अन्य विभागों को अपने पास रखे। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने के तीसरे दिन, यानी 18 अप्रैल 2026 को प्रादेशिक अख़बारों में यह विज्ञापन प्रकाशित हुआ।</p>
<p><strong>ज्ञातव्य हो कि तत्कालीन जिलाधिकारी, दरभंगा के प्रतिवेदन के अनुसार स्थिति इस प्रकार थी: अंतिम दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह की मृत्यु दिनांक 1-10-1962 को हुई। मृत्यु के पूर्व 05-07-1961 को उन्होंने एक वसीयत बनाया था ,जिसके अनुसार तीन अनुसूचियों के अनुरूप अपनी संपत्तियों को बांटे। वसीयत के अनुसार ⅓ हिस्सा पब्लिक चैरिटेबल के उद्देश्य से दिया गया था। बाद में महाराज के कई पारिवारिक सदस्यों ने कई मुकदमे महाराज के पैतृक कोर्ट ( कलकत्ता उच्च न्यायालय ) में किये। अंततः यह मामला माननीय उच्चतम न्यायालय में गया और 05-10-1987 को फॅमिली सेटलमेंट हुआ। इस सेटलमेंट के अनुसार रेसिडुअरी एस्टेट के पब्लिक चैरिटेबल कार्य हेतु जो संपत्ति रखी गयी, उसमे प्रश्नगत भूमि भी शामिल है। रेसिडुअरी एस्टेट में वर्णित सम्पत्ति की देख – भाल ट्रस्ट के द्वारा किए जाने की व्यवस्था थी। रेसिडुअरी एस्टेट में जो सम्पति चैरिटेबल प्रॉपर्टी के लिए रखी गयी थी, उसकी व्यवस्था महाराजा कामेश्वर सिंह चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा की जानी चाहिए थी। बाद में, 25-03-1992 को ट्रस्टी ने महाराजा कामेश्वर सिंह चैरिटेबल ट्रस्ट और दरभंगा निबंधन कार्यालय में एक डीड कार्यान्वित किया, जिसमें ट्रस्ट का एम्स एवं ऑब्जेक्ट निर्धारित किया गया।</strong></p>
<p>महाराजाधिराज की मृत्यु के 26 वर्ष बाद, 27 मार्च, 1987 को सम्बद्ध लोगों के बीच हुए फेमिली सेटेलमेंट को लेकर दायर अपील को सर्वोच्च न्यायालय दिनांक 15 अक्टूबर, 1987 को &#8220;डिक्री&#8221; देते हुए ख़ारिज कर दिया। तदनुसार, फेमिली सेटेलेमनट के क्लॉज 1 के अनुसार, सिड्यूल II में वर्णित शर्तों को मद्दे नजर रखते, महारानी अधिरानी कामसुन्दरी सिड्यूल II में उल्लिखित सभी सम्पत्तियों की स्वामी बन गयी। स्वाभाविक है, उन सम्पत्तियों पर उनका एकल अधिकार हो गया। </p>
<p><strong>इसी तरह, फॅमिली सेटलमेंट के क्लॉज 2 के अनुसार, कुमार शुभेश्वर सिंह के दोनों पुत्र, यानी राजेश्वर सिंह, जो उस समय बालिग हो गए थे, और उनके छोटे भाई, कपिलेश्वर सिंह, जो उस समय नाबालिग थे, शेड्यूल III में वर्णित शर्तों को मद्दे नजर रखते शेड्यूल III में उल्लिखित संपत्तियों के मालिक हो गए। आगे इसी तरह, फैमिली सेटेलमेंट के क्लॉज 3 के अंतर्गत शेड्यूल IV में वर्णित सभी नियमों के अनुरूप में सभी शेड्यूल IV में उल्लिखित सम्पत्तियों का मालिक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टी हो गए। फेमिली  सेटेलमेंट के क्लॉज 5 के अधीन, श्रीमती कात्यायनी देवी, श्रीमती दिव्यायानी देवी, श्रीमती नेत्रयानी देवी (कुमार जीवेश्वर सिंह के सभी बालिग पुत्रियां) और सुश्री चेतना दाई, सुश्री दौपदी दाई, सुश्री अनीता दाई (कुमार जीवेश्वर सिंह के सभी नाबालिग पुत्रियां), श्री रत्नेश्वर सिंह, श्री रश्मेश्वर सिंह (उस समय मृत), श्री राजनेश्वर सिंह (कुमार याजनेश्वर सिंह) सिड्यूल V में उनके नामों के सामने उल्लिखित, साथ ही, उसी शेड्यूल में उल्लिखित शर्तों के अनुरूप, सम्पत्तियों के मालिक होंगे।</strong></p>
<p>फेमिली सेटेलमेंट के क्लॉज 5 के तहत, पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टीज को यह अधिकार दिया गया कि वे सिड्यूल I में वर्णित &#8216;लायबिलिटीज&#8217; को समाप्त करने के लिए, सिड्यूल VI में उल्लिखित सम्पत्तियों को बेचकर धन एकत्रित कर सकते हैं, साथ ही, परिवार के लोगों में फेमिली सेटेलमेंट के अनुरूप शेयर रखने का अधिकार दिया गया। साथ ही, फेमिली सेटेलमेंट के क्लॉज 6 के अनुसार, महारानी अधिरानी कामसुंदरी और राज कुमार शुभेश्वर सिंह या उनके नॉमिनी (दूसरे क्षेत्र के लाभान्वित लोगों के प्रतिनिधि) द्वारा बनी एक कमेटी लिखित रूप से संपत्तियों की बिक्री, शेयरों का वितरण आदि से संबंधित निर्णयों को लिखित रूप में ट्रस्टीज को देंगे जहाँ तक व्यावहारिक हो, परन्तु किसी भी हालत में पांच वर्ष से अधिक नहीं या फिर न्यायालय द्वारा जो भी समय सीमा निर्धारित हो।<br />
इसी फैमिली सेटलमेंट के शेड्यूल iv के अनुसार न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशन्स लिमिटेड के 100 रुपये का 5000 शेयर दरभंगा राज के रेसिडुअरी इस्टेट चेरिटेबल कार्यों के लिए अपने पास रखा। कोई 20,000 शेयर अन्य लाभान्वित होने वाले लोगों द्वारा रखा गया &#8211; मसलन: 100 रुपये मूल्य का 7000 शेयर (रुपये 7,00,000 मूल्य का) महरानीअधिरानी कामसुन्दरी साहेबा को मिला।  राजेश्वर सिंह और कपिलेशर सिंह (पुत्र: कुमार शुभेश्वर सिंह) को 7000 शेयर, यानी रुपये 7,00,000 मूल्य का इन्हे मिला। </p>
<p>महाराजा कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट को 5000 शेयर, यानी रुपये 5,00,000 का मिला। श्रीमती कात्यायनी देवी को 100 रुपये मूल्य का 600 शेयर, यानि 60000 मूल्य का मिला। इसी तरह श्रीमती दिब्यायानी देवी को भी 100 रुपये मूल्य का 600 शेयर, यानि 60000 मूल्य का मिला। रत्नेश्वर सिंह, रामेश्वर सिंह और राजनेश्वर सिंह को 100 रुपये मूल्य का 1800 शेयर, यानि 180000 मूल्य का मिला। जबकि नतरयाणी देबि, चेतानी देवी, अनीता देवी और सुनीता देवी को 100 रुपये मूल्य का 3000 शेयर, यानि 3,00,000 मूल्य का मिला। यह सभी शेयर उन्हें इस शर्त पर दिया गया कि वे किसी भी परिस्थिति में अपने-अपने शेयर को किसी और के हाथ नहीं हस्तानांतरित करेंगे, सिवाय फेमिली सेटेलमेंट के लोगों के।</p>
<figure id="attachment_7700" aria-describedby="caption-attachment-7700" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-9.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-9.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7700" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-9.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-9-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-9-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-9-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-9-1026x1536.jpg 1026w" sizes="(max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7700" class="wp-caption-text">महाराजा की तीसरी और अंतिम पत्नी (दिवंगत) महारानी काम सुंदरी देवी</figcaption></figure>
<p><strong>अब आइये बिहार सरकार के विज्ञापन पर </strong></p>
<p>विज्ञापन के अनुसार: सार्वजनिक सूचना यह है कि जहाँ यह प्रतिवेदन एवं अभिलेखों से परिलक्षित है कि दरभंगा राज के तत्कालीन महाराजा सर कामेश्वर सिंह द्वारा  द्वारा  विधि सम्मत वसीयत (विल) के अधीन उनकी चल एवं अचल संपत्तियां उनकी दो महारानियों,, कुछ निकट सम्बन्धियों एवं पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट हेतु प्राप्त हुयी थी। </p>
<p>* और जहाँ महाराजा की अंतिम जीवित पत्नी महारानी कामसुन्दरी देवी का निधन 12-01-2026 को निःसंतान अवस्था में हो गया है। <br />
* और जहाँ विभागीय अभिलेखों, उपलब्ध साख्यों एवं अब तक की जांच के आधार पर यह तथ्य स्थापित होता है कि उक्त अंतिम महारानी द्वारा निष्पादित किसी वैद्य वसीयत का कोई अभिलेख या प्रमाण उपलब्ध नहीं है। <br />
* और जहाँ उपलब्ध साख्यों एवं अब तक की जांच के आधार पर यह तथ्य स्थापित होता है कि राज दरभंगा के तत्कालीन महाराजा के वसीयत नामा के प्रोबेट के पश्चात् कई दशकों से कई न्यायालयीय वाद विभिन्न बेनिफिसियरीज एवं ट्रस्टीज के बीच चल रहा है। <br />
* यह की विवादों के निपटारे हेतु माननीय सर्वोच्च न्यायालय में वर्ष 1987 में विभिन्न पक्षकारों के बीच हुए पारिवारिक समझौतों के आधार पर डिक्री हुयी, तथापि अद्यतन परिवारिक समझौताभी पूर्णतः लागू नहीं हो सका। <br />
* और जहां उपर्युक्त परिस्थितियों में यह प्रथम दृष्टया (प्रेम फेसी ) प्रतीत होता है कि स्वर्गीय महारानी कामसुन्दरी देवी को प्राप्त चल-अचल संपत्ति बिना वैद्य उत्तराधिकारी के अवस्थित है तथा महाराजा की वसीयत एवं तदोपरांत परिपरिक समझौतों के उपरांत माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित डिक्री का क्रियान्वयन पूर्ण नहीं हुआ है, तथा राज दरभंगा की परिसंपत्तियों के निर्विवाद वारिस नहीं है, तथा महाराजा कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट एवं अन्य ट्रस्ट का प्रबंधन, सम्बंधित ट्रस्ट डीड, भारतीय ट्रस्ट अधिनियम  एवं अन्य लागू विधियों के अधीन होना परीक्षण का विषय है। <br />
* और जहाँ, सरकार का यह समाधान हो गया है की उक्त स्थिति में स्वर्गीय महारानी कामसुंदरी देवी को महाराजा के वसीयत नामा / पारिवारिक समझौते से प्राप्त होने वाली चल-अचल संपत्ति, राज दरभंगा के विभिन्न ट्रस्टों से सम्बंधित संपत्ति तथा कोषागार एवं बैंकों में रखी गयी संपत्ति, जो बिहार राज्य में एवं राज्य की अधिसीमा से बाहर भी स्थित है, principle of escheat / bona vacantia के अंतर्गत राज्य निहित हो सकती है। <br />
* यह कि इस लोक सूचना के माध्यम से सर्व साधारण को सरकार के इस विषय पर लोकहित में इरादा।/ नियत स्पष्ट की जा रही है। <br />
* यह कि इस लोक सूचना द्वारा सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि कोई भी व्यक्ति, संस्था, ट्रस्ट जो उपर्युक्त सम्पत्तियों पर उत्तराधिकार, स्वामित्व अथवा अन्य विधिक अधिकार का दावा करता / करती हों, वह साख्यों  / दस्तावेजों की अभिप्रमाणित प्रति के साथ सूचना के प्रकाशन के 30 दिनों के भीतर  निम्न पते पर अपना दावा उपस्थित होकर / निबंधित डाक के माध्यम से प्रस्तुत करें। </p>
<p><strong>कार्यालय प्रधान सचिव <br />
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग <br />
बिहार पटना <br />
पुराना सचिवालय <br />
पटना &#8211; 15 </strong> </p>
<p>निर्धारित अवधि में यदि दावा नहीं प्राप्त होता है अथवा प्राप्त दावा विधि सम्मत एवं संतोषजनक नहीं पाया जाता है तो संबंधित सम्पत्तियाँ विधि के अनुसार राज्य सरकार में  escheat / bona vacantia के रूप में वेस्ट होने हेतु आवश्यक अग्रेतर कार्रवाई की जाएगी। </p>
<p><strong>अरविन्द कुमार <br />
सरकार के अवर सचिव </strong></p>
<figure id="attachment_7701" aria-describedby="caption-attachment-7701" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-5.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7701" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7701" class="wp-caption-text">रत्नेश्वर सिंह अपनी परदादी महारानी काम सुंदरी देवी (जब जीवित थी) के साथ<br />​</figcaption></figure>
<p><strong>आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम</strong> महाराजा के अनुज राजबहादुर विश्वेश्वर सिंह के सबसे छोटे पुत्र कुमार शुभेश्वर सिंह के पुत्र <strong>कुमार कपिलेश्वर सिंह</strong>, जो  दरभंगा राज की संपत्तियों के मालिक हैं, संपर्क करने की कोशिश किया। लेकिन विफल रहा। उन्हें ईमेल के माध्यम से भी इस विषय पर अपना मंतव्य कहने को  कहा, विफल रहा। इनके बड़े भाई <strong>राजेश्वर सिंह</strong> का संपर्क प्राप्त नहीं होने के कारण उन तक नहीं पहुँच सका। इस बीच दरभंगा राज के तीसरी पीढ़ी के वंशजों में सबसे बड़े पुत्र <strong>रत्नेश्वर सिंह</strong> से संपर्क करने पर उन्होंने कहा कि <strong>&#8220;कोई मिस्चिफ करना चाह रहा है। बिहार सरकार के राजस्व और भूमि सुधार द्वारा जारी यह अधिसूचना &#8216;इरेलीवेंट&#8217; है। हम सभी इसका जवाब दे दिए हैं। बिहार सरकार जवाब पर विचार जरूर करेगी, अगर ऐसा नहीं हुआ, तो हम सभी सरकार के इस अधिसूचना के खिलाफ न्यायालय जायेंगे।&#8221;</strong></p>
<p>कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत झा को महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह के इस वसीयतनामा को लागू करने का एकमात्र अधिकार दिया गया । मिथिलांचल के लोगों का मानना है कि अगर महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह का अपना कोई संतान होता, अथवा किसी को भी अपना उत्तराधिकारी घोषित कर देते, तो शायद दरभंगा राज की सम्पत्तियों का उनकी मृत्यु के पश्चात जो हश्र हुआ, वह नहीं होता। मिथिलांचल की स्थिति गर्त में पहुंची, वह नहीं अग्रसर होती। वसीयतनामा के लागु होने के बाद, अनेकानेक ट्रस्टों के निर्माण के बाद, जो-जो महानुभाव उसके कर्ता-धर्ता बने, सदस्य बने, संरक्षक बने, कोई भी महाराजाधिराज की आर्थिक, मानसिक, सामाजिक, राजनीतिक, मानवीय, सांस्कृतिक गरिमा को एक कदम भी आगे ले जाने में सफल नहीं हुए। वजह था &#8211; सोच की किल्लत और सम्पत्तियों पर एकाधिकार ज़माने का होड़ ।</p>
<p>महाराजाधिराज की मृत्यु पहली अक्टूबर, 1962 को हुई। कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा 27 जून, 1963 को न्यायमूर्ति श्री लक्ष्मीकांत झा को एकमात्र एस्क्यूटर घोषित किया गया। मिथिलांचल के बड़े-बुजुर्ग, जिन्होंने महाराजाधिराज के समय-काल का प्रथम दृष्टा रहे हैं, उनके क्रिया-कलापों को देखे हैं, भले स्वीकार करें अथवा नहीं; लेकिन आज की पीढ़ी इस बात को कतई मानने को तैयार नहीं होगी कि महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद राज परिवार के लोगों ने महाराजा द्वारा स्थापित विरासतों को आगे बढ़ाने की कोशिश किये।</p>
<p><strong>महाराजा की नजर में कुमार शुभेश्वर सिंह </strong></p>
<p><strong>दस्तावेज भी गवाह है की महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की नजर में राजकुमार शुभेश्वर सिंह का क्या महत्व था। दस्तावेजों को उद्धृत करते सूत्र का कहना है कि &#8220;जब महाराजाधिराज के सबसे बड़े भतीजे दूसरी शादी कर लिए, महाराजाधिराज तनिक सचेत हो गए। इसलिए महाराजाधिराज अपने मृत्यु से पूर्व जब वसीयतनामा बनाये या बनबाये, उस वसीयतनामे में सम्पत्तियों के प्रारंभिक बंटबारे के साथ साथ, इस बात का विशेष ध्यान रखे की उनकी पत्नियों को जीते-जी किसी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं हो, यहाँ तक सम्पत्तियों का प्रश्न है। </strong></p>
<blockquote><p>हाँ, उनकी महारानियों की मृत्यु के पश्चात महारानियों की सम्पत्तियों (वसीयतनामे का सिड्यूल ए और सिड्यूल बी) पर उनके सबसे छोटे भतीजे, यानी कुमार शुभेश्वर सिंह का आधिपत्य होगा। साथ ही, उनकी महारानियों की मृत्यु के बाद सम्पूर्ण सम्पत्तियों का एक-तिहाई हिस्सा राजकुमार शुभेश्वर सिंह के बच्चों का होगा, बशर्ते राज कुमार शुभेश्वर सिंह अपनी शादी अपने ब्राह्मण समुदाय में करें और बच्चे उसी ब्राह्मण समुदाय की पत्नी से जन्म ले। और एक-तिहाई हिस्सा अन्य भतीजों के संतानों को मिलेगा।&#8221; ध्यान रहे कि अन्य भतीजों के संतानों के बारे में महाराजाधिराज ने कोई भी ऐसी शर्त नहीं रखे की बच्चे की माँ ब्राह्मण समुदाय की ही हो।  राजकुमार शुभेश्वर सिंह की मृत्यु सन 2004 में हुई जबकि उनकी पत्नी उनसे पहले महादेव के शरण में अपनी उपस्थिति लगा दी थी।</p></blockquote>
<p>फैमली सेटेलमेंट के तहत,  महाराजाधिराज के उस सम्पूर्ण संपत्ति स्वरुप सिक्के को जिन चार भागों में विभक्त किया गया उसमें एक &#8211; चौथाई भाग महाराजाधिराज पत्नी महारानी कामसुन्दरी को मिला। एक &#8211; चौथाई हिस्सा राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह को मिला।  एक &#8211; चौथाई हिस्सा राजकुमार जीवेश्वर सिंह और यज्ञेश्वरा सिंह को मिला और अंतिम एक &#8211; चौथाई टुकड़ा चेरिटेबल ट्रस्ट के हिस्से आया। सेटेलमेंट के क्लॉज 11 के तहत, यह बात स्पष्ट किया गया कि &#8216;समय आने पर ट्रस्ट का निर्माण&#8217; किया जायेगा जिसका नाम &#8216;कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट&#8217; होगा और इस ट्रस्ट के सभी सदस्यों का चयन, रखरखाव आदि-आदि नियमानुसार होगा। आगे, फेमिली सेटेलमेंट के क्लॉज 14 के अधीन न्यायालय के आदेश केदिनांक 15 अक्टूबर, 1987 से  पांच साल के अंदर इस सेटेलमेंट को लागू करना था। बाद में, दिनांक 7 मई, 1993 को न्यायलय ने सेटेलमेंट को दिनांक 15 अक्टूबर, 1995 तक बढ़ा दिया।</p>
<p>बहरहाल,  दरभंगा राज की सम्पत्तियों को नेस्तोनाबूद करने में महाराजाधिराज के विल को क्रियान्वित करने वाले तत्कालीन अधिकारीयों और ट्रस्टियों का हाथ उत्कर्ष पर रहा ही; लेकिन सत्तर के दसक में स्थानीय प्रशासन के सहयोग से दरभंगा राज के मुख्यालय को जिस तरह मिथिला विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने कब्ज़ा किया, राज दरभंगा के लोगों की कमजोरी/मिलीभगत को दृष्टिगोचित करता है। </p>
<figure id="attachment_7702" aria-describedby="caption-attachment-7702" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Madh-Copvr.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Madh-Copvr.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7702" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Madh-Copvr.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Madh-Copvr-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Madh-Copvr-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Madh-Copvr-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Madh-Copvr-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7702" class="wp-caption-text">दरभंगा राज की तीन महारानियाँ और एक पुत्रबधु (सभी दिवंगत)</figcaption></figure>
<p>एक अधिकारिक दस्तावेज के अनुसार जिलाधिकारी, दरभंगा के आदेश संख्या 1835 /एल  दिनांक 16.08. 1975 के द्वारा एक्सेकूटर लक्ष्मी कान्त झा को डिफेन्स ऑफ़ इंडिया रूल 1971 के सुसंगत प्रावधान के आलोक में दरभंगा राज के भवन एवं भूमि अधिगृहित करने की सूचना दी गयी जिसके खिलाफ पंडित लक्ष्मीकांत झा ने माननीय पटना उच्च न्यायालय में सी . डब्लू .जे . सी . नंबर 1786 /75 दाखिल की।वाद के निपटारा से पूर्व हीं बिहार सरकार और दरभंगा राज के बीच समझौता हुई और जिलाधिकारी के आदेश और उक्त वाद को वापस ले लिया गया और 12 -09-1975  को हुई इस समझौता के आलोक में 133 एकड़ भूमि और भवन विस्वविद्यालय हेतु दी गयी।</p>
<p><strong>कहा जाता है कि सं 1980 में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि महारानी-अधिरानी कामसुन्दरी “रेसिडुअरी इस्टेट” का एक-तिहाई हिस्से का हक़दार होंगी। कलकत्ता उच्च न्यायालय के इस फैसले के विरुद्ध कुमार शुभेश्वर सिंह सर्वोच्च न्यायालय गए और न्यायालय को बताया की वे अपने दो अवयस्क बच्चों के हितों के रक्षार्थ कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ लड़ रहे हैं। शुभेश्वर सिंह को अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए महाराजा की जीवित पत्नी महारानी अधिरानी कामसुन्दरी के साथ अनेकानेक मुक़दमे लड़ने पड़े। सम्भवतः आज भी कई मुक़दमे माननीय न्यायालय में लंबित होंगे। शुभेश्वर सिंह महाराजा के छोटे भतीजे थे।</strong></p>
<p>इसका वजह यह था कि महाराजा के वसीयत के क्लॉज 4 में इस बात को स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि शुभेश्वर सिंह के बच्चे उसी हालात में महाराजा की सम्पत्तियों के लिए दावा कर पाएंगे अगर उनकी माँ ब्राह्मण परिवार की होंगी। शुभेश्वर सिंह सन 1965 में महाराजा की इक्षा और उनके वसीयत में लिखे शब्दों के सम्मानार्थ “ब्राह्मण महिला” से ही विवाह किये और उनके दो पुत्र – श्री राजेश्वर सिंह और श्री कपिलेश्वर सिंह – हुए । लेकिन उन्होंने इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी किया था की “वे बहुत ही तेज जीवन जीये हैं। उनकी जितनी भी बुराईयां थीं, अवगुण थे; सभी के सभी विवाह के साथ समाप्त हो गए, छोड़ दिए। लेकिन एक कमजोरी है जिसे वे नहीं त्याग नहीं सके, और वह है – शराब पीना।</p>
<p><strong>इसी फेमिली सेटेलमेंट के सिड्यूल iv के अनुसार न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशन्स लिमिटेड के 100 रुपये का 5000 शेयर दरभंगा राज के रेसिडुअरी इस्टेट चेरिटेबल कार्यों के लिए अपने पास रखा। कोई 20,000 शेयर अन्य लाभान्वित होने वाले लोगों द्वारा रखा गया &#8211; मसलन: 100 रुपये मूल्य का 7000 शेयर (रुपये 7,00,000 मूल्य का) महरानीअधिरानी कामसुन्दरी साहेबा को मिला।  राजेश्वर सिंह और कपिलेशर सिंह (पुत्र: कुमार शुभेश्वर सिंह) को 7000 शेयर, यानी रुपये 7,00,000 मूल्य का इन्हे मिला। महाराजा कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट को 5000 शेयर, यानी रुपये 5,00,000 का मिला। श्रीमती कात्यायनी देवी को 100 रुपये मूल्य का 600 शेयर, यानि 60000 मूल्य का मिला। इसी तरह श्रीमती दिब्यायानी देवी को भी 100 रुपये मूल्य का 600 शेयर, यानि 60000 मूल्य का मिला। रत्नेश्वर सिंह, रामेश्वर सिंह और राजनेश्वर सिंह को 100 रुपये मूल्य का 1800 शेयर, यानि 180000 मूल्य का मिला। जबकि नेत्रयानी देवी, चैत्रायणि देवी, अनीता देवी और सुनीता देवी को 100 रुपये मूल्य का 3000 शेयर, यानि 3,00,000 मूल्य का मिला। यह सभी शेयर उन्हें इस शर्त पर दिया गया कि वे किसी भी परिस्थिति में अपने-अपने शेयर को किसी और के हाथ नहीं हस्तांतरित करेंगे, सिवाय फेमिली सेटेलमेंट के लोगों के।</strong></p>
<figure id="attachment_7703" aria-describedby="caption-attachment-7703" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7703" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7703" class="wp-caption-text">​महाराजधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह के अनुज राजबहादुर विश्वेश्वर सिंह। इनके ही वंशज (पुरुषों में) आज दरभंगा राज में हैं</figcaption></figure>
<p>दस्तावेज के अनुसार, नब्बे के दशक के उत्तरार्ध कलकत्ता उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति  विशेश्वर नाथ खरे और उनके सहयोगी न्यायमूर्तियों के समक्ष एक याचिका प्रस्तुत होता है। यह याचिका सिविल प्रोसेड्यूर कोड के सेक्शन 90 और आदेश 36 के तहत, सन 1963 के प्रोबेट प्रोसीडिंग्स संख्या 18 के तहत, दरभंगा के महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह बहादुर के वसीयत नामा के अधीन नियुक्त ट्रस्टियों के द्वारा इण्डियन ट्रस्ट एक्ट के सेक्शन 34, 37, 39, 60 और 74 के अधीन प्रस्तुत किया जाता है। प्रस्तुतकर्ता होते हैं द्वारका नाथ झा, मदन मोहन मिश्र और कामनाथ झा। ये सभी ट्रस्टी न्यायालय से निवेदन करते हैं कि महाराजाधिराज की मृत्यु 1 अक्टूबर, 1962 को होती है। अपनी मृत्यु से पूर्व वे दिनांक 5 जुलाई, 1961 को एक वसीयत बनाते हैं जिसमें लक्ष्मी कांत झा को &#8220;सोल एस्क्यूटर&#8221; बनाते हैं। इसके बाद दिनांक 26 सितम्बर, 1963 उक्त वसीयतनामा को &#8220;प्रोबेट&#8221; करने का अधिकार लक्ष्मी कांत झा को दिया जाता है। लक्ष्मी कांत झा उक्त कार्य को सम्पन्न करते हुए 3 मार्च, 1978 को मृत्यु को प्राप्त करते हैं।</p>
<p><strong>महाराजा की बड़ी बहन श्रीमती लक्ष्मी दाईजी के वंशज </strong></p>
<p>दरभंगा के महाराजा रमेश्वर सिंह के तीन बच्चे थे – श्रीमती लक्ष्मी दाईजी, श्री कामेश्वर सिंह और श्री विश्वेश्वर सिंह। श्रीमती लक्ष्मी दाईजी महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की बड़ी बहन थीं। श्रीमती लक्ष्मी दाई जी का विवाह श्री मुकुंद झा से हुआ था। श्री मुकुंद झा को एक पुत्र था श्री कन्हैया झा। कन्हैया झा का विवाह श्रीमती कृष्णलता बुआसिन से हुआ था। इन दोनों के दो बच्चे थे – एक पुत्र श्री शंकर झा और एक पुत्री श्रीमती द्वितीया झा। श्री शंकर झा का विवाह श्रीमती कमला झा (श्रीमती शंकरलता बुआसिन) से हुआ था और श्रीमती द्वितीया झा का विवाह श्री कृष्णानंद झा साथ हुआ था। </p>
<p><strong>बहरहाल, शंकर झा की पुत्री यानी श्रीमती लक्ष्मी डाईजी परपोती वसुधा झा कहती हैं: &#8220;इतिहास अतीत में खत्म नहीं होता—वह वर्तमान में गूंजता रहता है। राज दरभंगा का पतन केवल बाहरी राजनीतिक बदलावों या ज़मींदारी उन्मूलन का परिणाम नहीं था। यह एक ऐसी आंतरिक संस्कृति का भी परिणाम था, जिसने धीरे-धीरे सत्य से अपना रिश्ता खो दिया। इस क्षरण के केंद्र में थी चापलूसी—लगातार की जाने वाली चमचागिरी।&#8221; वसुधा झा आगे कहती है कि &#8221; इस कहानी को और अधिक मार्मिक बनाता है यह तथ्य कि वर्तमान पीढ़ी इस इतिहास से ऊपर उठ नहीं पाई है। बल्कि, वही विरासत में मिली बीमारी आज भी उनके व्यवहार में दिखती है—और अब वही उनके अपने सामने लौटकर खड़ी है। </strong></p>
<figure id="attachment_7698" aria-describedby="caption-attachment-7698" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Darbhanga-Cover2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Darbhanga-Cover2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7698" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Darbhanga-Cover2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Darbhanga-Cover2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Darbhanga-Cover2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Darbhanga-Cover2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Darbhanga-Cover2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7698" class="wp-caption-text">सुश्री वसुधा झा।  ये महाराजा दसर. सर कामेश्वर सिंह की बहन श्रीमती लक्ष्मी दाईजी की परपोती हैं </figcaption></figure>
<p>उनका कहना है कि 18 अप्रैल 2026 को बिहार सरकार ने एक नोटिस जारी किया कि यदि महारानी कामसुंदरी के उत्तराधिकारी 30 दिनों के भीतर सामने नहीं आते, तो उनकी सारी संपत्ति ‘Escheat’ और ‘Bona Vacantia’ के कानूनी प्रावधानों के तहत सरकार में निहित हो जाएगी।  यह केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है—यह एक अवसरवाद है। बिहार सरकार भली-भांति देख रही है कि राज दरभंगा के उत्तराधिकारी एकजुट होने विरासत को संभालने में पूरी तरह असमर्थ हैं। व्यक्तिगत लालच, परिवार के सदस्यों की प्रगति से ईर्ष्या, और चाटुकारों के प्रति गहरा लगाव—इनसबने उन्हें इतना संकीर्ण बना दिया है कि वे बड़ी तस्वीर देखने में असफल हैं।&#8221;</p>
<p>महाराजाधिराज दिनांक 1 अक्टूबर, 1962 को मृत्यु को प्राप्त हुए। वे दुर्गा पूजा के अवसर पर कलकत्ता से अपने राज दरभंगा आये थे। वे अपने निवास दरभंगा हाउस, मिड्लटन स्ट्रीट, कलकत्ता से अपने रेलवे सैलून से नरगोना स्थित अपने रेलवे टर्मिनल पर कुछ दिन पूर्व उतरे थे। सभी बातें सामान्य थी उस सुबह, लेकिन क्या हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ जैसे अनेकानेक कारणों के बीच  पहली अक्टूबर, 1962 को नरगौना पैलेस के अपने सूट के बाथरूम के नहाने के टब में उनका जीवित शरीर &#8220;पार्थिव&#8221; पाए गया । सर कामेश्वर सिंह की तीन पत्नियां थीं &#8211; महारानी राज लक्ष्मी, महारानी कामेश्वरी प्रिया और महारानी कामसुंदरी। </p>
<p>महारानी कामेश्वरी प्रिय की मृत्यु आज़ाद भारत से पूर्व और अंग्रेज भारत छोड़ो आंदोलन के समय सं 1942 में हुई। महाराजाधिराज बहुत दुःखी थे उनकी मृत्यु के बाद, जैसा लोग कहते हैं। जिस सुबह महाराजाधिराज अंतिम सांस लिए, उसके बाद उनकी दोनों पत्नियां &#8211; महारानी राजलक्षी और महारानी कामसुन्दरी दाह संस्कार में उपस्थित थी, यह भी लोग कहते हैं। महारानी राजलक्ष्मी की मृत्यु सन 1976 में, यानि महाराजा की मृत्यु के 14 वर्ष बाद हुई और महारानी कामसुंदरी 1961 से विधवा जीवन जीते अंततः 12 जनवरी 2026 को मृत्यु को प्राप्त की। </p>
<p>साख्य और दस्तावेज इस बात का गवाह है की महाराजाधिराज को चाहने वाले, उनके हितैषी, उनके मित्र, उनके प्रशंसक भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के प्रत्येक कोने में थे, आज भी हैं। लेकिन उनके पार्थिव शरीर को, जैसा कहा जाता है, देश के किसी भी गणमान्य व्यक्तियों के आने का इंतज़ार किये बिना, आनन फानन में माधवेश्वर में इनका दाह संस्कार दोनों महारानी की उपस्थिति में कर दिया गया।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-7.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="aligncenter size-full wp-image-7704" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-7.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-7-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-7-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-7-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dra-7-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p><strong>अब यहाँ एक सवाल महाराजा की मृत्यु के 64-वर्ष बाद भी उठना स्वाभाविक है &#8211; है &#8211; क्या उस समय जीवित महाराजा की दोनों पत्नियां स्थानीय प्रशासन, प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री विनोदानंद झा से, देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, जो चौथे कार्यकाल (2 अप्रैल, 1962-27 मई, 1964), तत्कालीन गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री (25 फरवरी, 1961 &#8211; 1 सितम्बर, 1963) से राज दरभंगा का कोई भी व्यक्ति, यहाँ तक की महाराजाधिराज की विधवाएं अगर आवाज लगाती तो शायद दिल्ली से पटना और दरभंगा तक अन्वेषणकर्ताओं की लम्बी कतार लग जाती।  लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्यों नहीं हुआ इसके लिए तत्कालीन &#8220;नाबालिग&#8221; लोगों को तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन जो &#8220;बालिग&#8221; थे, उनका व्यवहार प्रश्नवाचक चिन्ह के अधीन हो गया। महाराजा कामेश्वर सिंह तीन महारानियों के होते हुए भी &#8220;संतानहीन&#8221; थे।</strong></p>
<p>वसुधा झा कहती हैं: जिस संपत्ति का कोई कानूनी मालिक नहीं होता, वह सीधे सरकार की हो जाती है। इस परिवार की एक बेटी होने के नाते, मैं केवल एक कड़वी सच्चाई के साथ यह कह सकती हूं कि कई पीढ़ियों—और वर्तमान पीढ़ी— ने चापलूसों को इस घर को भीतर से खोखला करने दिया। आज जो हम देख रहे हैं, वह अचानक नहीं है—यह वर्षों की धीमी सड़न का परिणाम है। बंटे हुए, अशिक्षित और सीमित सोच वाले उत्तराधिकारियों की लालच और कम समझ ने बिहार सरकार को यह अवसर दे दिया है कि वह इस खालीपन का लाभ उठाए। जिसे वंश परंपरा नहीं बचा सकी, उसे राज्य पूरी तत्परता से अपने अधिकार में लेने को तैयार है।&#8221;</p>
<p>वसुधा झा का कहना है कि &#8216;हम सभी जानते हैं कि चापलूस कभी खतरे के रूप में सामने नहीं आते। वे खुद को वफादार के रूप में प्रस्तुत करते हैं—जोहर बात पर सहमति जताते हैं, प्रशंसा करते हैं, और खुश रखते हैं। राज दरभंगा जैसे शाही ढांचे में, जहां सत्ता के करीबहोना ही प्रभाव तय करता था, ऐसे लोग व्यवस्था का हिस्सा बन गए। उनकी असली ताकत सत्य नहीं थी—बल्कि चापलूसी थी।&#8221;</p>
<p><strong>वे कहती हैं कि &#8220;बचपन से “महाराजी एक्टिविटीज़” जैसे शब्द सुनने को मिलते थे—एक तरह का मज़ाक, लेकिन असल में इस गहरी जड़ें जमा चुकी चापलूसी का स्वीकार। धीरे-धीरे, चमचागिरी एक व्यवहार नहीं, बल्कि एक संस्कृति बन गई: • सत्ता में बैठे लोगों को खुश रखना, सही सलाह देने से अधिक महत्वपूर्ण हो गया • परिपक्व सलाह की जगह सहमति ने ले ली • योग्यता की जगह नज़दीकी ने ले ली। इसका परिणाम स्पष्ट था: • प्रशासनिक क्षमता कमजोर हुई • दूरदर्शिता खत्म हुई • योग्य लोगों को किनारे कर दिया गया और • निर्णय अल्पकालिक संतुष्टि पर आधारित हो गए। यह भी सच है कि ज़मींदारी उन्मूलन, स्वतंत्रता के बाद की नीतियाँ और बदलते शासन ढांचे ने बड़ी भूमिका निभाई।लेकिनचमचागिरी ने यह सुनिश्चित किया कि यह संस्था इन परिवर्तनों के लिए अंदर से तैयार ही न हो। उनके अनुसार, सत्य और योग्यता पर आधारित व्यवस्था खुद को ढाल सकती थी, चापलूसी में डूबी व्यवस्था नहीं।&#8221;</strong></p>
<p>वसुधा झा आगे कहती हैं: आज स्थिति साफ है: चापलूसों ने घर को भीतर से खोखला किया; अब अवसरवाद बाहर से उसे अपना बना रहा है। राज दरभंगा की जो विरासत भीतर से संभाली नहीं जा सकी, उसे राज्य अब कानूनी ढांचे के सहारे अपने अधिकार में लेने को तैयार है। यह कहानी केवल एक परिवार की नहीं है—यह हर व्यवस्था के लिए चेतावनी है: चापलूसी रातों-रात नष्ट नहीं करती। यह एक दीमक की तरह होती है—जो धीरे-धीरे भीतर से सब कुछ खोखला कर देतीहै, और तब दिखाई देती है जब ढांचा गिरने के कगार पर होता है। आज राज दरभंगा की यही तस्वीर है। फिर भी, एक प्रश्न अब भी बाकी है—तत्काल और निर्णायक: क्या राज दरभंगा की वर्तमान पीढ़ी लालच और विभाजन से ऊपर उठकर एकजुट होगी… और जो बचाया जा सकता है, उसे बचाएगी? या फिर इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराएगा—“इस बार, एक निर्णायक, अपरिवर्तनीय क्षति के रूप में?”</p>
<p>राजकुमार शुभेश्वर सिंह और राजकुमार यजनेश्वर सिंह वसीयत लिखे जाने के समय नाबालिक थे और उनकी शादी नहीं हुई थी सबसे बड़े राजकुमार जीवेश्वर सिंह की दूसरी शादी नहीं हुई थी। शायद महाराजा को अपनी मृत्यु की अंदेशा था । मृत्यु से पूर्व ५ जुलाई १९६१ को कोलकाता में उन्होंने अपनी अंतिम वसीयत की थी, जिसके एक गवाह पं. द्वारकानाथ झा थे, जो महाराज के ममेरा भाई थे और दरभंगा एविएशन, कोलकाता में मैनेजर थे । कहा जाता है कि महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद बहुत ही तीब्रगति से दरभंगा राज का पतन हुआ। इसके अनेकानेक कारण हैं परन्तु मूल रूप से महाराजा की असामयिक और अचानक मृत्यु, महाराजा के सभी विश्वस्त और अच्छे लोग यथा महाप्रबंधक डैन्बी, निवेश प्रबंधक बैद्यनाथ झा, शिक्षा सलाहकार अमरनाथ झा, छोटे भाई विश्वेश्वर सिंह इत्यादि का भी देहांत होना, दोनों महारानियां का राज के क्रियाकलापों से अनभिज्ञता, विल के प्रोबेट कर्ता लक्ष्मीकान्त झा के हाथों राज का कार्य आते ही वे बहुत अधिक महत्वाकांक्षी होना, भतीजे या तो कोई समझदार नहीं होना या उनका छोटा होना, सरकार की नकारात्मक रुचि का होना, राज के प्रबंधक और सगे सम्बंधी स्वयं को धनाढ्य बनाने में लग जाना और उत्तराधिकारी के अभाव में दरभंगा राज का बृहत् लूट खसोट का केंद्र बन जाना प्रमुख रहा। खैर।</p>
<figure id="attachment_7705" aria-describedby="caption-attachment-7705" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7705" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7705" class="wp-caption-text">महारानी कामसुंदरी देवी की मृत्यु के बाद बिहार के तत्कालीन राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान अपनी संवेदना व्यक्त करने कल्याणी निवास आए थे। उनकी अगुवाई राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह</figcaption></figure>
<p>वैसे महाराजाधिराज अपनी वसीयत को एस्क्यूट करने, प्रोवेट करने का एकमात्र अधिकार &#8220;न्यायमूर्ति&#8221; पंडित लक्ष्मी कान्त झा को क्यों दिया? यह तो उतना ही बहुमूल्य प्रश्न है जितना दरभंगा राज का कुल मोल। वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि महाराजा की मृत्यु के समय भी दरभंगा राज के ऐसी कोई भी कुशल महिला अथवा पुरुष नहीं थे, जो दरभंगा राज का सम्पूर्णता के साथ भार स्वीकार करते। जो कोई शिक्षित थे भी, उनके मन में महाराजा के प्रति उतना &#8220;झुकाव&#8221; उनके मरणोपरांत विगत साठ-वर्षों में भी नहीं दिखा, जितना उनकी मृत्यु के बाद दरभंगा राज की संपत्ति के प्रति। अगर ऐसा नहीं होता तो आज भी भारत में विभिन्न न्यायालयों में दरभंगा राज के लोगों के बीच मुकदमे लंबित नहीं होते। मृत्यु का समाचार मिलने पर वे कोलकाता से दरभंगा पहुंचे और वसीयत को प्रोबेट कराने की प्रक्रिया शुरू करवा दी । कोलकाता उच्च न्यायालय द्वारा वसीयत सितम्बर 1963 को प्रोबेट हुई और पं. लक्ष्मी कान्त झा वसीयत के एकमात्र एस्क्यूटर बने।</p>
<blockquote><p>वसियत के अनुसार दोनों महारानी के जिन्दा रहने तक संपत्ति का देखभाल ट्रस्ट के अधीन रहेगा और दोनों महारानी के स्वर्गवाशी होने के बाद संपत्ति को तीन हिस्सा में बाँटने जिसमे एक हिस्सा दरभंगा के जनता के कल्याणार्थ देने और शेष हिस्सा महाराज के छोटे भाई राजबहादुर विशेश्वर सिंह जो स्वर्गवाशी हो चुके थे के पुत्र राजकुमार जीवेश्वर सिंह ,राजकुमार यजनेश्वर सिंह और राजकुमार शुभेश्वर सिंह के अपने ब्राह्मण पत्नी से उत्पन्न संतानों के बीच वितरित किया जाने का प्रावधान था ।  इससे बड़ा दुर्भाग्य दरभंगा राज के लिए क्या हो सकता है कि महाराजा की मृत्यु के बाद उनकी महारानियों का देखभाल ट्रस्ट करे। </p></blockquote>
<p>बड़ी महारानी के 1976 में देहांत होने और 1978 में पंडित लक्ष्मी कान्त झा के देहांत के बाद दरभंगा राज का कार्य ट्रस्ट के अधीन हो गया। श्री मदनमोहन मिश्र ( गिरीन्द्र मोहन मिश्र के बड़े पुत्र), श्री द्वारिका नाथ झा और श्री दुर्गानंद झा तीनो ट्रस्टी के अधीन। फिर श्री दुर्गानंद झा के देहांत के बाद 1983  के आसपास श्री गोविन्द मोहन मिश्र ट्रस्टी बने और फिर उनके स्थान पर श्री कामनाथ झा ट्रस्टी बने । दोनों महारानी को रहने के लिए एक – एक महल, जेवर, कार और कुछ संपत्ति मात्र उपभोग के लिए और दरभंगा राज से प्रतिमाह कुछ हजार रूपये प्रति माह खर्च देने का प्रावधान था। </p>
<p>एक सूत्र के अनुसार दरभंगा राज के जनरल मेनेजर मि. डेनवी के समय रहे असिस्टेंट मेनेजर पं. दुर्गानन्द झा के जिम्मे दरभंगा राज का प्रबंध था । वे राजमाता साहेब के फूलतोड़ा के पुत्र थे और महाराज के बचपन के मित्र थे वे उस ज़माने के स्नातक थे और पंडित द्वारिका नाथ झा, महाराज के ममेरे भाई एक्सेक्यूटर के सचिव मनोनीत हो गये और कोलकाता से आकर गिरीन्द्र मोहन रोड के बंगला नंबर 5 में अपने मामा पं.यदु दत्त झा, जो दरभंगा राज के अनुभवी और दझ पदाधिकारी थे, जिन्हें मिस्टर देनबी ने अपने बाद जनरल मेनेजर के लिए अनुशंसा की थी जिनका उल्लेख 1934 के भूकंप में राहत कार्यक्रम में कुमार गंगानंद सिंह ने की है, के बगल के बंगला में रहने लगे। </p>
<p><strong>बड़ी महारानी राजलक्ष्मी जी ने सबसे छोटे राजकुमार शुभेश्वर सिंह को अपने रामबाग में रखा। वसियत के अनुसार बड़ी महारानी राजलक्ष्मी जी के मृत्यु के बाद उनके महल पर राजकुमार शुभेश्वर सिंह का स्वामित्व होगा। बड़े कुमार जीवेश्वर सिंह राजनगर रहने लगे और उनकी बड़ी पत्नी राजकिशोरी जी अपनी दोनों बेटी के साथ और मझले राजकुमार यजनेश्वर सिंह अपने परिवार के साथ यूरोपियन गेस्ट हाउस ऊपरी मंजिल पर उत्तर और दझिण भाग में आ गए। सबसे बड़े राजकुमार जीवेश्वर सिंह राजनगर ट्रस्ट के एकमात्र ट्रस्टी रहे दरभंगा राज के मामले में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं था। राजनगर से वे गिरीन्द्र मोहन मिश्र के बाद बंगला नंबर १, गिरीन्द्र मोहन रोड में अपने दूसरी पत्नी और 5  पुत्री के साथ रहने लगे।</strong></p>
<figure id="attachment_7706" aria-describedby="caption-attachment-7706" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7706" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Dar-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7706" class="wp-caption-text">राजेश्वर सिंह और कपिलेश्वर सिंह​, दरभंगा राज की सम्पत्तियाँ और पगड़ी</figcaption></figure>
<p>राजकुमार शुभेश्वर सिंह 1965 के आसपास दरभंगा राज के मामले में सक्रिय हो गये थे उन्हें रामेश्वर जूट मिल, फिर सुगर कंपनी और न्यूज़ पेपर &#038; पब्लिकेशन लिमिटेड का जिम्मेवारी मिली। कहा जाता है कि सं 1980में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि महारानी-अधिरानी कामसुन्दरी “रेसिडुअरी इस्टेट” का एक-तिहाई हिस्से का हक़दार होंगी।  कलकत्ता उच्च न्यायालय के इस फैसले के विरुद्ध कुमार शुभेश्वर सिंह सर्वोच्च न्यायालय गए और न्यायालय को बताया की वे अपने दो अवयस्क बच्चों के हितों के रक्षार्थ कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ लड़ रहे हैं। </p>
<p>शुभेश्वर सिंह को अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए महाराजा की जीवित पत्नी महारानी अधिरानी कामसुन्दरी के साथ अनेकानेक मुक़दमे लड़ने पड़े। सम्भवतः आज भी कई मुक़दमे माननीय न्यायालय में लंबित होंगे। शुभेश्वर सिंह महाराजा के छोटे भतीजे थे। इसका वजह यह था कि महाराजाके वसीयत के क्लॉज 4 में इस बात को स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि शुभेश्वर सिंह के बच्चे उसी हालात में महाराजा की सम्पत्तियों के लिए दावा कर पाएंगे अगर उनकी माँ ब्राह्मण परिवार की होंगी। शुभेश्वर सिंह सन 1965 में महाराजा की इक्षा और उनके वसीयत में लिखे शब्दों के सम्मानार्थ “ब्राह्मण महिला” से ही विवाह किये और उनके दो पुत्र – श्री राजेश्वर सिंह और श्री कपिलेश्वर सिंह – हुए ।</p>
<p>कहा जाता है कि दरभंगा राज लगभग 2410 वर्ग मील में फैला था, जिसमें कोई 4495 गाँव थे, बिहार और बंगाल के कोई 18 सर्किल सम्मिलित थे। दरभंगा राज में लगभग 7500 कर्मचारी कार्य करते थे। आज़ादी के बाद जब भारत में जमींदारी प्रथा समाप्त हुआ, उस समय यह देश का सबसे बड़ा जमींदार थे। इसे सांस्कृतिक शहर भी कहा जाता है। लोक-चित्रकला, संगीत, अनेकानेक विद्याएं या क्षेत्र की पूंजी थी। लोगों का कहना है कि वर्त्तमान स्थिति के मद्दी नजर, दरभंगा राज के सभी लोगों की निगाह दरभंगा राज फोर्ट यानी करीब 85 एकड़ भूमि के बीचोबीच स्थित रामबाग का विशाल भवन है। आज भवन की कीमत जो भी आँका जाय, इस सम्पूर्ण क्षेत्र यानी दरभंगा के ह्रदय में स्थित 85 एकड़ भूमि की व्यावसायिक कीमत क्या होगी, यह आम आदमी नहीं सोच सकता है। वजह भी है : सरकारी आंकड़े के अनुसार &#8220;दरभंगा के लोगों का प्रतिव्यक्ति आय 15, 870/- रूपया आँका गया है और इतनी आय वाले लोग लाख, करोड़, अरब, खरब रुपयों के बारे में सोच भी नहीं सकते। वह जीवन पर्यन्त उस राशि पर कितने &#8220;शून्य&#8221; होंगे, सोचते जीवन समाप्त कर लेगा। परन्तु सोच नहीं पायेगा।</p>
<p>नब्बे के दशक के उत्तरार्ध रेसिडुअरी इस्टेट ऑफ़ महाराजा दरभंगा और महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टियों ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय सहित, कलकत्ता उच्च न्यायालय को &#8221;लिखित याचना&#8221; देकर न्यायालय से गुहार किए कि उन्हें रेसिडुअरी इस्टेट ऑफ़ महाराजा दरभंगा और चेरिटेबल ट्रस्ट से &#8220;कार्यमुक्त&#8221; कर दिया जाय । जीवन के अंतिम वसंत में वे &#8220;बेइज्जत&#8221; नहीं होना चाहते हैं। चूंकि इस सम्पूर्ण कार्यभार में अनेकानेक लोगों का &#8220;निहित स्वार्थ&#8221; निहित है, अतः बढ़ती उम्र और ढ़लती स्वास्थ्य के मद्दे नजर वे अपने कार्यों को कर पाने में असहाय हैं, नहीं कर सकते हैं। वे न्यायालय से निवेदन भी किये कि &#8220;उन्हें मुक्ति दिया जाय&#8221; और सम्पूर्ण कार्य को संपादित करने के लिए न्यायालय एक प्रशासक की नियुक्ति कर दे &#8211; याचना है।</p>
<p>मिथिलाञ्चल अथवा राज दरभंगा के इतिहास में शायद यह पहली घटना होगी जब 84-वर्षीय, 72-वर्षीय और 69-वर्षीय वृद्ध न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर उससे विनती किया हो कि उन्हें कार्य मुक्त होने का मार्ग प्रशस्त किया जाय, कार्यमुक्त किया जाय । याचिका में लिखा है: &#8220;It is submitted that the applicants are being harassed unnecessarily by the various quarters having vested interest. They are also being confronted with various problems. The applicants further submitted that due to their old age, falling health and other difficulties they are not in a position to continue to function as Trustees. It is the sincere desire of the applicants that they may be relieved of the responsibilities of the office of the Trustees of the Residuary Estate of Maharaja of Darbhanga and also of the Charitable Trust.&#8221; </p>
<p>क्या कहते हैं मिथिलांचल के संभ्रांत लोग? क्या कहते हैं दरभंगा राज के लोग जो महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद उनकी सम्पत्तियों के लाभार्थी हुए ? क्योंकि दरभंगा के बेनीपुर, अलीनगर,ग्रामीण दरभंगा, हायाघाट, बहादुरपुर, केओटी, जाले, झंझारपुर, सकरी, मनीगांची, अंधराठाढ़ी, बंगालगढ़, बंगलीटोला, शुभंकरपुर, लक्ष्मी सागर, बेला, लहेरियासराय, तमौरिया आदि जगहों का गरीब-गुरबा की तो क्षमता नहीं होगी कि वे रेसिडुअरी इस्टेट ऑफ़ महाराजा दरभंगा और महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टियों को &#8220;उत्पीड़ित&#8221; करे।</p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;&#8230;..</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/when-maharaja-darbhanga-soad-painfully-and-whereas-i-have-no-issue">​​अगर &#8216;कागज सही है&#8217; तो &#8216;महारानियों की मृत्यु के बाद संपत्ति महाराजा के भतीजे शुभेश्वर सिंह (अब दिवंगत) के संतानों को मिलेगा&#8217;, लेकिन &#8216;नेपथ्य में कुछ और हो रहा है&#8217; </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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