<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>leaders Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
	<atom:link href="http://www.aryavartaindiannation.com/tag/leaders/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://www.aryavartaindiannation.com/tag/leaders</link>
	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
	<lastBuildDate>Tue, 24 Jun 2025 06:32:37 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=6.9.4</generator>
	<item>
		<title>जब &#8216;खाने की वस्तु&#8217; को &#8216;पहनाने लगे&#8217; लोग, तो समझ लीजिये &#8216;राजनीति&#8217; हो रही है, मिथिला का &#8216;मखान&#8217; भी अछूता नहीं है, &#8216;पाग&#8217; के बारे में तो पूछिए नहीं (बिहार स्टार्टअप-5)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/business/politics-of-makahana-and-paag-in-mithila</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/business/politics-of-makahana-and-paag-in-mithila#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Jun 2025 06:32:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[व्यापार]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[business]]></category>
		<category><![CDATA[leaders]]></category>
		<category><![CDATA[maala]]></category>
		<category><![CDATA[makahna]]></category>
		<category><![CDATA[paag]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=6802</guid>

					<description><![CDATA[<p>मधुबनी / दरभंगा / पटना / नई दिल्ली: ​आप माने या नहीं, आपकी मर्जी। लेकिन जब किसी भोज्य पदार्थ का इस्तेमाल पहनाने में होने लगे, स्वयं से अशिक्षित लोगों के सर पर &#8216;पाग&#8217; पहनाया जाने लगे, तो समझ लें उस बहुमूल्य वस्तु का राजनीतिक लाभार्थ इस्तेमाल होने लगा है &#8211; मिथिला का मखान या मिथिला [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/business/politics-of-makahana-and-paag-in-mithila">जब &#8216;खाने की वस्तु&#8217; को &#8216;पहनाने लगे&#8217; लोग, तो समझ लीजिये &#8216;राजनीति&#8217; हो रही है, मिथिला का &#8216;मखान&#8217; भी अछूता नहीं है, &#8216;पाग&#8217; के बारे में तो पूछिए नहीं (बिहार स्टार्टअप-5)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मधुबनी / दरभंगा / पटना / नई दिल्ली: ​आप माने या नहीं, आपकी मर्जी। लेकिन जब किसी भोज्य पदार्थ का इस्तेमाल पहनाने में होने लगे, स्वयं से अशिक्षित लोगों के सर पर &#8216;पाग&#8217; पहनाया जाने लगे, तो समझ लें उस बहुमूल्य वस्तु का राजनीतिक लाभार्थ इस्तेमाल होने लगा है &#8211; मिथिला का मखान या मिथिला का पाग भी ग्रसित हो गया है। वजह भी है मिथिला का शैक्षिक दर। मिथिला में ही नहीं, देश, दुनिया में मिथिला के लोग जहाँ-जहाँ हैं, आजकल &#8216;खुलेआम&#8217;, &#8216;यत्र-तत्र-सवर्त्र&#8217; लोगों को, जहाँ &#8216;लाभ की आशा दिखती है,&#8217; मिथिला का &#8216;पाग&#8217; और मिथिला के &#8216;मखान&#8217; का माला पहनाने में तनिक भी देरी नहीं करते नहीं करते हैं। पता नहीं, पसीने से लत पत वस्त्र में भींगा उस मखान भी लोग खाते भी हों। </strong></p>
<p>मैथिली और मिथिला के ‘विकास’ से सम्बंधित कई वर्ष पहले गठित एक संगठन ने मिथिला के लोगों से निवेदन किया गया है कि पाग के निर्माणकर्ता पाग बनाते समय उसका आकार बढ़ाकर बनायें ताकि पहनने और पहनाने में असुविधा नहीं हो। यह बात दिनों संगठन द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में ​भी कहा गया। जबकि आज़ादी के 78 वर्ष बाद आज भी मिथिला का शैक्षिक दर 55 फीसदी से आगे बढ़ने पर कुथ रहा है।​ हालांकि, मिथिला क्षेत्र में दर्जनों शैक्षणिक संस्थाएं प्रदेश के राजनेताओं के नाम से गोदना गुदवाए हुए हैं, हज़ारों स्थानीय शैक्षिक माफियाओं द्वारा संचालित है। देशी, विदेशी नाम पर अंकित विद्यालयों और महाविद्यालयों की तो किल्लत है ही नहीं। </p>
<blockquote><p>कल भारत के संसद के बाहर, विजय चौक के रास्ते रायसीना हिल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय के आस-पास मिथिला क्षेत्र के कर्मचारियों का कहना था कि “उक्त संगठन द्वारा पाग के मामले में जारी प्रेस विज्ञप्ति का प्रत्येक शब्द एक गहन शोध का विषय है। उनका कहना है कि “पाग का आकार बढ़ाने पर बल देने का सीधा अर्थ यही माना जायेगा कि “मिथिला में पाग पहनने वालों का माथा (शरीर का सबसे ऊपरी हिस्सा) का आकार या तो बढ़ गया है या फिर पाग के निर्माण कर्ता पाग के महत्व को इतना महत्वहीन बना दिए हैं कि उन्हें औसतन मानव माथे का आकर का ज्ञान नहीं रहा और पाग का आकार छोटा होता गया।”​ </p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-3.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-3.jpg" alt="" width="2045" height="1210" class="aligncenter size-full wp-image-6805" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-3.jpg 2045w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-3-300x178.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-3-1024x606.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-3-768x454.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-3-1536x909.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2045px) 100vw, 2045px" /></a></p>
<p>गृहमंत्रालय के सामने ​चबूतरे पर खड़े एक अधिकारी कहते हैं: “यौ झाजी !!! एहि बात से इंकार नै कयल जा सकैत अछि कि मिथिला के बाल-बच्चा शैक्षिक दुनिया में अव्वल अछि आ आवि रहल अछि। लेकिन इ सब बच्चा, चाहे बेटी होय अथवा बेटा, वैह अव्वल आवि रहल अछि जेकर माता-पिता अपन-अपन जीवनक निर्माण हेतु, बच्चाक जीवनक निर्माण हेतु गामक सीमा पार केलैथ।​&#8221; वे आगे कहते हैं कि &#8220;अगर चेन्नई, बंगलुरु, मुंबई, अहमदाबाद, कानपुर, नागपुर, दिल्ली, भोपाल आदि शहरों में मुद्दत से रहने वाले, पढ़ाने-लिखाने वाले किसी महानुभाव की बेटी विश्व के पटल पर अपना हस्ताक्षर करती है तो दरभंगा और लहेरियासराय के जिलाधिकारी उसकी शैक्षिक योग्यता को या उसकी उपलब्धि को अपनी सांख्यिकी में नहीं जोड़ सकता है न? पाग के साथ भी वही हश्र है, जो दुखद है। मिथिला में रहने वाले, पाग पहनने वाले, पाग पहनाने वाले औसतन 90 से अधिक फीसदी लोग (अपवाद छोड़कर) पाग के रंग का महत्व, कौन किसे पहनायेगा, किस अवसर पर किस रंग का पाग पहनाया जायेगा नहीं जानते।”​ </p>
<figure id="attachment_6815" aria-describedby="caption-attachment-6815" style="width: 2045px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/12345.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/12345.jpg" alt="" width="2045" height="1210" class="size-full wp-image-6815" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/12345.jpg 2045w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/12345-300x178.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/12345-1024x606.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/12345-768x454.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/12345-1536x909.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2045px) 100vw, 2045px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6815" class="wp-caption-text">आप​ स्वयं निर्णय करें</figcaption></figure>
<p><strong>इसका ज्वलंत दृष्टान्त राष्ट्रीय जनता दल के नेता और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और ऐतिहासिक चारा घोटाला कांड के अभियुक्त लालू प्रसाद यादव के नवमीं कक्षा पास पुत्र और उनकी ​पत्नी जी के सर पर पाग है। अगर मिथिला के लोग इन व्यक्तियों को पाग पहनाते हैं, तो इसका अर्थ सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक दुकानदारी ही माना जायेगा। क्या ये पाग पहनने के लायक है? तेजस्वी यादव और उनकी पत्नी को वैवाहिक जीवन पर बधाई देने का अनेकानेक तरीका हो सकता था परन्तु पाग पहनाकर पाग का अपमान भी किये।​</strong> </p>
<p>अगर उक्त संगठन के उक्त ‘प्रेस विज्ञप्ति’ के मद्दे नजर मिथिला की शैक्षिक दर को देखें – जो माथे के विस्तार का सूचक हो सकता है और बड़े आकार के पाग की जरुरत हो सकती है – तो बिहार का औसत शैक्षिक दर 63.82 फीसदी है जिसमें मिथिला क्षेत्र में शैक्षिक दर 55.18 से अधिक नहीं हैं। प्रदेश में सबसे अधिक शैक्षिक दर भोजपुरी क्षेत्र में है जहाँ औसतन शैक्षिक दर 66.19 फीसदी है। भोजपुरी क्षेत्र में रोहतास क्षेत्र में शैक्षिक दर 73.37 फीसदी है। इतना ही नहीं, मगध क्षेत्र में शैक्षिक दर मिथिला की तुलना में 9 फीसदी अधिक है, यानी 64.92 फीसदी है।​ </p>
<figure id="attachment_6806" aria-describedby="caption-attachment-6806" style="width: 2045px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-4.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-4.jpg" alt="" width="2045" height="1210" class="size-full wp-image-6806" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-4.jpg 2045w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-4-300x178.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-4-1024x606.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-4-768x454.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-4-1536x909.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2045px) 100vw, 2045px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6806" class="wp-caption-text">दरभंगा के सांसद महोदय खुद बिना पाग पहने दूसरों को पाग पहनाते हैं &#8211; यह शोध का विषय है</figcaption></figure>
<p>यही कारण है कि दिल्ली के राजनीतिक गलियारे में अपना हस्ताक्षर रखने वाले एक नौकरशाह कहते हैं: “पाग मिथिला का एक सम्मान है। मिथिला के प्रत्येक लोगों की इज्जत है। मिथिला का एक-एक बच्चा पाग के सांस्कृतिक गरिमा को पहले समझता था। पाग के रंगों की महत्ता को समझता था। वह यह भी समझता था कि किस रंग का पाग किस अवसर पर कौन पहनता है। पाग किसे पहनाया जाए । पाग पहनाने का शाब्दिक अर्थ और वास्तविक अर्थ क्या है। परन्तु, तकलीफ इस बात कि है कि मिथिला में अब राजनीति होती है और उस राजनीति में मिथिला का पाग धरल्ले से इस्तेमाल होता है। अन्यथा आज मिथिला पाग की यह स्थिति नहीं होती। मिथिला की संस्कृति की यह स्थिति नहीं होती।”​ </p>
<p><strong>अगर मिथिलांचल के लोग, विशेषकर जो “पाग की अहमियत” समझते हैं, अपने ही घरों में, अपने ही समाज में, टोले-मुहल्लों में एक सर्वे करें की किनके – किनके घरों में “वास्तविक पाग (सफ़ेद रंग का अथवा भटमैला रंग का) है ? हाल, पीला, हरा, ब्लू, रंग बिरंगा, सतरंगी, लोक चित्रकला वाला नहीं; तो औसतन सैकड़े घरों की बात नहीं करें, हज़ार घरों में शायद दस अथवा बीस घरों में पाग की उपस्थिति दर्ज होगी। विश्वास नहीं तो हो आजमा कर देखिए। अब स्थिति यह है कि हम अपने घरों में, मिथिला के समाजों में पाग के महत्व को नहीं बता सके, वर्तमान पीढ़ी को नहीं बता सके, लेकिन देश के मुंबई, दिल्ली, कलकत्ता, चेन्नई, बंगलुरु, मंगलुरु, कानपूर, नागपुर, बराकर के अतिरिक्त देश के 718 जिलों में “पाग से अर्थ कमाने के लिए पाग का विपरण करने में जुटे हैं।”</strong></p>
<p>​इतना ही नहीं, अधिकारी आगे कहते हैं: “मिथिला में तो करवा चौथ नहीं होता है। वहां की महिलाएं अपने पति के लिए मधुश्रावणी पूजा करती हैं। लेकिन अब देखादेखी में मिथिला में ही नहीं प्रस्तावित मिथिला राज्य निर्माण के लिए सभी 24 जिलों, मसलन अररिया, बेगूसराय, दरभंगा, कटिहार, खगड़िया, किशनगंज, मधेपुरा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, सहरसा, समस्तीपुर, शिवहर, सीतामढ़ी, सुपौल, पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, वैशाली, लखीसराय, मुंगेर, शेखपुरा, जमुई, भागलपुर और बांका के अलावे पटना के कंकरबाग, शिवपुरी, लोहानीपुर, कदमकुआं और अन्य इलाकों सहित राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के अनेकानेक क्षत्रों में, मुंबई, कलकत्ता, चेन्नई और अन्य प्रांतों में मिथिला की महिलाएं अब करवा चौथ करती हैं। और मैथिली भाषा के स्थान पर स्थानीय भाषाओँ का प्रयोग कर ‘मैथिली भाषा” की दुकानदारी करने में तनिक भी लज्जा नहीं करते। विश्वास नहीं हो तो दिल्ली के करोलबाग स्थित दिल्ली सरकार की दारू की खरीद-बिक्री वाले कार्यालय (भवन) के निचले तल्ले में मैथिली – भोजपुरी अकादमी को ठिठुरते देख लीजिये।</p>
<figure id="attachment_6807" aria-describedby="caption-attachment-6807" style="width: 2045px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-5.jpg" alt="" width="2045" height="1210" class="size-full wp-image-6807" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-5.jpg 2045w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-5-300x178.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-5-1024x606.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-5-768x454.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-5-1536x909.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2045px) 100vw, 2045px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6807" class="wp-caption-text">यह मिथिला की मछली नहीं नहीं, बल्कि कलकत्ता और दक्षिण भारत की है, मिथिला माँछ के नाम से बिकती है, गहन शोध का विषय है</figcaption></figure>
<p>आज़ादी के बाद, या यूँ कहें कि महाराजा कामेश्वर सिंह की मृत्यु तक मिथिला की संस्कृति जितनी मजबूत और सुरक्षित थी, आज नहीं है। यानि​, अक्टूबर 1962 के बाद मिथिलांचल में मिथिला की संस्कृति को संरक्षित रखने वाला नहीं रहा। आज भले हम मिथिला लोक-चित्रकला को विश्व में प्रचार-प्रसार के माध्यम से फैलाएं, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि मिथिला लोक चित्रकला के कलाकार आज मृत प्राय हो गया है। समाज, सरकार अथवा मिथिलांचल के जिला प्रमुखों से इस ऐतिहासिक लोक चित्रकला को उतना संरक्षण नहीं मिलता है जितने का वह हकदार हैं। आज स्थिति ऐसी हो गयी है की मिथिलाञ्चल के लोग, विशेषकर पुरुष समुदाय, न केवल “पाग के वास्तविक महत्व” से अपरिचित हैं, बल्कि उसका सम्मान भी नहीं कर पाते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो इस पाग को “सब धन बाईस पसेरी” जैसा सबों के माथे पर सजाकर फोटो-सेशन नहीं करते, सोसल मीडिया पर या भारत की सड़कों पर “पाग का राजनीतिकरण नहीं होने देते, नहीं करते।”</p>
<p><strong>देवशंकर नवीन का कहना है​ कि &#8220;क्या सर्वजन मैथिलों ने आम सहमति से अपने पारंपरिक प्रतीक ‘पाग’ के स्वरूप में यह फेरबदल स्वीकार कर लिया? अब तक पाग पर किसी तरह की चित्रकारी की मान्यता नहीं थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि बाजार की चमक-दमक ने मैथिलों के सांस्कृतिक संकेत पर अपना कब्जा बना लिया! दूसरा सवाल पाग की पारंपरिक मान्यता को लेकर है। बचपन से देखता आ रहा हूं कि अनेक शहरों में मैथिल जनता अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए महाकवि विद्यापति की बरसी मनाती है। उन आयोजनों में आमंत्रित विशिष्ट जनों का पाग-डोपटा से सम्मान करते और अपने सांस्कृतिक उत्कर्ष का दावा करते हुए मैथिल आत्ममुग्ध होते हैं। गीत, कविता, चुटकुला, नाच-नौटंकी सब आयोजित करते हैं। आयोजन का नाम रहता है ‘विद्यापति स्मृति पर्व’, पर विद्यापति वहां सिरे से गायब रहते हैं। आयोजन का लक्ष्य शायद ही कहीं साहित्य और संस्कृति का उत्थान या अनुरक्षण रहता हो!​&#8221; </strong></p>
<p>आजकल दरभंगा के टावर चौक से दिल्ली के जंतर मंतर तक, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यालय से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के कार्यालय तक बिहार को काट-छांट कर अलग मिथिला ​राज्य बनाने की चर्चाएं आम हैं। मिथिला क्षेत्र के राजनीति में सक्रिय रहने वाले लोग न केवल प्रस्तावित अलग राज्य के निर्माण में किन-किन जिलों को बिहार से अलग कर मिथिला राज्य में​ अंकित कर देना चाहिए की सूची बनाकर मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को पेश कर रहे हैं, बल्कि राज्य बनने के बाद कौन-​कौन महापुरुष और महिला नए राज्य के मंत्रिमंडल में शामिल होंगे, ​कौन मुख्यमंत्री बनेंगे, कौन वित्त मंत्रीं बनेंगे, कौन शिक्षा मंत्री बनेंगे की ​मन-ही-मन सूची बनाने में भी कोताही नहीं कर रहे हैं। ​</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-6.jpg" alt="" width="2045" height="1210" class="aligncenter size-full wp-image-6808" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-6.jpg 2045w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-6-300x178.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-6-1024x606.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-6-768x454.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-6-1536x909.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2045px) 100vw, 2045px" /></a></p>
<p>यह अलग बात है कि उत्तर बिहार इस गंगा तराई क्षेत्र के इन जिलों में राज्य के 11 नदियों की पानी के अलावे कुछ नहीं है और शैक्षिक दर का फीसदी भी महिला-पुरुष मिलकर 60 फीसदी से अधिक नहीं पहुंच पाया है।मिथिला के महात्मनों का कहना है कि अब तक 24 जिलों को प्रस्तावित राज्य में शामिल करने का प्रस्ताव है। इन जिलों में अररिया, बेगूसराय, दरभंगा, कटिहार, खगड़िया, किशनगंज, मधेपुरा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, सहरसा, समस्तीपुर, शिवहर, सीतामढ़ी, सुपौल, पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, वैशाली, लखीसराय, मुंगेर, शेखपुरा, जमुई, भागलपुर और बांका शामिल हैं। ​जबकि ‘प्रस्तावित मंत्रिमंडल की सूची’ को ‘सार्वजनिक’ नहीं कर रहे हैं। यह अलग बात है कि दिल्ली सल्तनत में ‘मैथिली’ भाषा के ‘तथाकथित विकास और विस्तार के लिए’ राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति हेतु बना “मैथिली – भोजपुरी अकादमी” दिल्ली सरकार के “दारू का बोतल गिनने वाले भवन में स्थित है। हालात यह है कि यहाँ मैथिली अथवा भोजपुरी के अलावे सभी भाषाओं में वार्तालाप होती है और दिल्ली में रहने वाले मैथिली भाषा भाषी मुद्दत से मूक-बधिर बने हैं। यह राजनीति हैं।</p>
<p>बिहार सं 22 मार्च, 1912 को बंगाल से काटकर अपने अस्तित्व में आया था। लगभग 24 वर्ष बाद, 1 अप्रैल, 1936 को बिहार का पहला खंडन हुआ और उस खंडन से ओड़िसा राज्य का अस्तित्व बना। ओड़िसा राज्य बनने के कोई 64 वर्ष बाद बिहार का फिर दो फांक हुआ झारखण्ड राज्य ​बनाने के लिए। सन 2000 से पहले, तत्कालीन दक्षिण बिहार के स्थानीय लोगों की दशकों से चल रही क्रांति, जिसमें कई सौ लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दिए, 15 नवम्बर, 2000 को झारखण्ड राज्य अपने अस्तित्व में आया। अब उत्तर बिहार के गंगा तराई क्षेत्र में स्थित जिलों को काटकर मिथिला राज्य बनाने की राजनीति चल रही है। ​खैर।</p>
<p><strong>विष्णुपुराण के मिथिला-माहात्म्य </strong></p>
<p>इंटरनेट पर जब लिखा देखा कि विष्णुपुराण के मिथिला-माहात्म्य में मिथिला एवं तीर भुक्ति दोनों नाम कहे गये हैं, मन खुश हो गया। शायद मिथिला क्षेत्र से आने वाले किसी भी राजनीतिक पार्टी के नेतागण, चाहे जिला परिषद् में बैठते हों या प्रदेश के विधानसभा और विधान परिषद् में या फिर भारत के ऊपरी और निचली संसद में कुर्सियां तोड़ते हों ‘नहीं जानते होंगे, नहीं पढ़े होंगे।’ वजह भी है। मिथिला क्षेत्र में शैक्षिक दर 55 फीसदी से अधिक नहीं होने दिए ‘महात्मनों’ ने। क्योंकि अगर मतदाता पढ़ेगा तो सोचने की शक्ति बढ़ेगी, वाद-विवाद करने में सामर्थ्यवान होगा और मतदान करने से पहले नेता को परखेगा – जो महात्मन नहीं चाहते रहे हैं, नहीं चाहेंगे।</p>
<p>‘मिथि’ के नाम से मिथिला तथा अनेक नदियों के ”तीर’ पर स्थित होने से तीरों से पोषित होने से तीरभुक्ति नाम माने गये हैं।इस ग्रंथ में गंगा से लेकर हिमालय के बीच स्थित मिथिला में मुख्य 15 नदियों की स्थिति मानी गयी है तथा उनके नाम भी गिनाये गये हैं। यह तीरभुक्ति मिथिला सीता का निमिकानन कहा गया है। आज स्थिति ऐसी है कि मिथिला के माता-पिता अपनी बेटियों का नाम “सीता” नहीं रख रहे हैं। उस पुराण में मिथिला को ‘ज्ञान का क्षेत्र’ है और ‘कृपा का पीठ’ कहा गया है। आज मिथिला में पुरुष-महिला का शैक्षिक दर 55 फीसदी है। आज मिथिला मैथिली भाषा भाषी भी अपनी भाषा में बात नहीं करते। खैर। जानकी कि यह जन्मभूमि मिथिला निष्पापा और निरपेक्षा है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-7.jpg" alt="" width="2045" height="1210" class="aligncenter size-full wp-image-6809" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-7.jpg 2045w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-7-300x178.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-7-1024x606.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-7-768x454.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-7-1536x909.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2045px) 100vw, 2045px" /></a></p>
<p>सैद्धांतिक रूप से जैसे साकेत नगरी संसार के कारण स्वरूप है वैसे ही यह मिथिला समस्त आनंद का कारण स्वरूप है। इसलिए महर्षिगण समस्त परिग्रहों को छोड़कर राम की आराधना के लिए प्रयत्न पूर्वक यहीं निवास करते हैं। श्रीसावित्री तथा श्रीगौरी जैसी देव-शक्तियों ने यही जन्म ग्रहण किया। स्वयं सर्वेश्वरेश्वरी श्रीसीता जी की जन्मभूमि यह मिथिला यत्नपूर्वक वास करने से समस्त सिद्धियों को देने वाली है। मिथिला की सीमा (चौहद्दी) का स्पष्ट उल्लेख करते हुए कहा गया है कि​ </p>
<p><em>शिकीन्तु समारभ्य गण्डकीमधिगम्यवै।योजनानि चतुर्विंश व्यायामः परिकीर्त्तितः॥<br />
गङ्गा प्रवाहमारभ्य यावद्धैमवतम्वनम् ।विस्तारः षोडशप्रोक्तो देशस्य कुलनन्दन॥</em></p>
<p>अर्थात् पूर्व में कोसी से आरंभ होकर पश्चिम में गंडकी तक 24 योजन तथा दक्षिण में गंगा नदी से आरंभ होकर उत्तर में हिमालय वन (तराई प्रदेश) तक 16 योजन मिथिला का विस्तार है। महाकवि चन्दा झा ने उपर्युक्त श्लोक का ही मैथिली रूपांतरण करते हुए मिथिला की सीमा बताते हुए लिखा है कि</p>
<p><em>गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि पूब कौशिकी धारा।पश्चिम बहथि गंडकी उत्तर हिमवत वन विस्तारा॥</em></p>
<p>इस प्रकार उल्लिखित सीमा के अंतर्गत वर्तमान में नेपाल के तराई प्रदेश के साथ बिहार राज्य के पश्चिम और पूर्वी चम्पारण, शिवहर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय, दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, खगड़िया जिले का प्रायः पूरा भूभाग तथा भागलपुर और पूर्णिया जिले का आंशिक भूभाग आता है।</p>
<p><strong>‘पग-पग पोखर, माँछ, मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-8.jpg" alt="" width="2045" height="1210" class="aligncenter size-full wp-image-6810" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-8.jpg 2045w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-8-300x178.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-8-1024x606.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-8-768x454.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-8-1536x909.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2045px) 100vw, 2045px" /></a></p>
<p>जिस महामहोपाध्याय ने मिथिला का चित्रण ‘पग-पग पोखर, माँछ, मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या, वैभव, शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक’ इन शब्दों में किये थे, वे बहुत दूरदर्शी थे। लगता है वे सरस्वती के वरद पुत्र थे और उन्हें ज्ञात था कि आने वाले समय में मिथिला के लोग उनकी कविता को मिथिला के चौराहों पर ‘पाठ’ करके, मिथिला का गुणगान करके अपने-अपने हिस्से की मिथिला अपने नाम लिखाएँगे। प्रदेश के लेखाकार में ‘एक खास किस्म के लोग’ दरभंगा राज का ‘मुहर’ लेकर तैयार भी रहेंगे जो आतंरिक-बाहरी माफिआओं के साथ मिलकर मिथिला (दरभंगा राज और उसकी गरिमा) को बेचकर, उसे मिट्टी पलीद करेंगे और स्वयं ‘संभ्रांत’ और ‘धनाढ्यों’ की श्रेणी में सूचीबद्ध हो जायेंगे, नेता, अभिनेता भी हो सकते हैं।</p>
<p>मिथिला के किसी भी स्थान पर खड़े होकर मिथिला के बाबू, बबुआइन और बौआसिन लोग अगर “पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या वैभव शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक” कविता पाठ करते मिल जायँ, तो समझ लीजिये वे ‘सरेआम झूठ’ बोल रहे हैं। अपने-अपने हितों के रक्षार्थ वे स्थानीय लोगों को बरगला रहे हैं। इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते हैं कि वे राजनीति में प्रवेश करने के लिए मिथिला की कविता पाठ करना प्रारम्भ कर दिए हों जो उनके अनेकानेक प्रयासों में, एक यह भी प्रयास हो। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि जिस समय इस कविता की रचना हुई होगी, उस कवि के नजर में मिथिला और उसकी गरिमा अपने उत्कर्ष पर रहा होगा। मिथिला के सभी क्षेत्रों में, प्रत्येक कदम पर, प्रत्येक घरों के सामने-पीछे छोटा-बड़ा पोखर रहा होगा। तत्कालीन राजा-महाराजा-महाराजाधिराज स्थानीय लोगों के सम्मानार्थ, तत्कालीन पानी की समस्याओं के निदानार्थ अपने खर्च पर पोखर, तालाब बनबाये होंगे। यह सच भी है।</p>
<p><strong>अब जब मिथिला में असंख्य पोखर / तालाब रहा होगा तो उसके महार (इम्बैंकमेंट) पर पान की खेती, मखान की खेती होती होगी, जिसका उपयोग अपने-अपने घरों में, आगंतुकों के लिए, सगे-सम्बन्धियों के लिए किया जाता होगा। कोई सौ वर्ष पहले तक मिथिला में ‘शिक्षा’ चाहे ‘प्राथमिक’ हो, ‘माध्यमिक’ हो या ‘उच्च शिक्षा हो – पढ़ने वालों के साथ-साथ पढ़ाने वालों की किल्लत नहीं थी। अपने-अपने क्षेत्र के अनेकानेक आचार्य, प्राचार्य, महामहोपाध्याय समाज में उपलब्ध थे। शिक्षा के मामले में बनारस और इलाहाबाद की दूरियां मिथिला से अधिक नहीं थी। पाटलिपुत्र में भी मिथिला के लोग आकर शिक्षित होते थे। लेकिन, दुर्भाग्य यह रहा कि शिक्षा प्राप्ति के बाद उन्हें समाज को जो वापस करना था, वह नहीं कर सके। मिथिला के ग्रामीण इलाकों से खेतिहर-परिवारों से लेकर विद्वानों के परिवारों तक, जो भी शिक्षा के लिए शहर की ओर उन्मुख हुए, कभी वापस नहीं आये। और वापस भी आये तो वृद्धावस्था में। परिणाम यह हुआ कि मिथिला की जो अपनी पारम्परिक शिक्षा और शिक्षा पद्धति थी, उसका सर्वनाश हो गया।</strong></p>
<p>समय बदल रहा था। समाज बदल रहा था। सोच बदल रहे थे। स्वाभाविक है शिक्षा का स्वरूप भी में बदलेगा ही। लेकिन तकलीफ इस बात की है कि आज भी हम उसी कविता पाठ को दोहरा रहे हैं और कहते थक भी नहीं रहे है कि “पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या वैभव शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक” – खासकर तब जब बिहार के ग्रामीण इलाकों में शैक्षिक दर पुरुषों में 57 फीसदी और महिलाओं में 29 फीसदी है। मिथिला भी इसी आकंड़े के अधीन है। पूरे प्रदेश में औसतन शैक्षिक दर 69 फीसदी है। इसमें पुरुषों के हिस्से 70 फीसदी और महिलाओं के हिस्से 53 फीसदी है। यानी दोनों के बीच आज भी 17 फीसदी का फासला है और यही 17 फीसदी का फासला, चाहे मिथिला में पंचायत का चुनाव हो, दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, भागलपुर, मुंगेर, आदि शहरों में जिला परिषद् का चुनाव हो या बिहार के विधान सभा और विधान परिषद का चुनाव हो – निर्णायक होता है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-9.jpg" alt="" width="2045" height="1210" class="aligncenter size-full wp-image-6811" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-9.jpg 2045w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-9-300x178.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-9-1024x606.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-9-768x454.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-9-1536x909.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2045px) 100vw, 2045px" /></a></p>
<p>सबसे महत्वपूर्ब बात तो माँछ (मछली) से सम्बंधित है। माँछ की कथा-व्यथा बनारसी पान जैसी है। बनारस में पान की खेती नहीं होती, लेकिन हज़ारों-हज़ार पान की दुकानें हैं। प्रत्येक चार दुकान या चार मकान के बाद पान की दुकानें मिलेंगी। लगभग सभी किस्मों के पान यहाँ, जगन्नाथ जी, गया और कलकत्ता आदि स्थानों से आते हैं। पान का जितना बड़ा व्यावसायिक केन्द्र बनारस है, शायद उतना बड़ा केन्द्र विश्व का कोई नगर नहीं है। काशी में इसी व्यवसाय के नाम पर दो मुहल्ले बसे हुए हैं। केवल शहर के पान विक्रेता ही नहीं, बल्कि दूसरे शहरों के विक्रेता भी इस समय इस जगह पान खरीदने आते हैं।</p>
<p>बस इतना ही समझ लें कि आज मिथिला में माँछ का उपलब्धता जितना है वह मिथिला के दो फीसदी लोगों की आवश्यकता पूरी नहीं कर सकता। मिथिला के बाज़ारों में जो माँछ आप देख रहे हैं वह सन 1911 से पहले देश की राजधानी जिस प्रदेश में थी, वहां से और आंध्र प्रदेश से आती है। मिथिला में महज ‘ठप्पा’ लगता है। अब सोचिये खाते हैं बंगाल की – आंध्र की मछली और आज भी कविता पाठ किये हैं “पग-पग पोखर माँछ ,,,,” जब इस कविता की रचना की गयी थी माछ, पान और मखान मिथिला की शान, पहचान अवश्य थी। लेकिन समय के साथ मिथिला अपनी इस पहचान को न सिर्फ खो दिया है, बल्कि इन सभी चीजों पर अब दूसरे प्रदेशों द्वारा कब्जा भी हो गया है। इस दृष्टि से मिथिला की पहचान खतरे में है और लोग बाग़ है कि इस खतरे में भी खतरा उठाना चाहते हैं ‘मिथिला को अलग राज्य का दर्जा दो” – गजब है।</p>
<p><strong>पूरे मिथिला में स्थित पोखरों की संख्या को अगर तनिक बाद में अध्ययन करें तो सिर्फ दरभंगा के महाराजा के साम्राज्य में तक़रीबन 9113 पोखर और तालाब थे। इसमें दरभंगा शहर में ही 350 के आस-पास थे। आज अगर अवकाश है (वैसे मिथिला के लोग वेवजह व्यस्त होते हैं। मोबाईल पर घंटी आज बजायेंगे तो तीसरे दिन हेल्लो ट्यून सुनाई देदा) तो शहर में धूम लें और पोखरों, तालाबों की संख्या, उसकी स्थिति, उसमें दौड़ती मछलियों से, खिलते माखन से, महारों पर लगे पानों की खेती की स्थिति से अवगत हो लें। यकीन मानिए ‘भोकार’ नहीं, ‘चीत्कार’ मारकर रोने लगेंगे, अगर आखों में पानी होगा तो।</strong></p>
<p>इन कविता वाचकों को शायद यह मालूम भी नहीं होगा कि पान की खेती करने के लिए दो-रस मिट्टी की जरूरत होती है। न ज्यादा पानी और न ज्यादा धूप की जरूरत होती। पानी इतना हमेशा चाहिए, ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे। यहां तो लोगों की आखों में नमी नहीं है, बेचारी मिट्टी क्या करे। यही कारण है कि कलकत्तिया पान दरभंगिया बनाकर मिथिला के बाज़ार पर अधिपत्य जमा लिया है, कब्ज़ा कर लिया है यानी ‘सुतल छी आ वियाह होईत अछि’ वाली कहावत सिद्ध हो रही है और कविता वाचक पाठ करते नहीं थक रहे हैं “पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या वैभव शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक” – पूरी मिथिला की सांख्यिकी आप निकालें, यहाँ दरभंगा जिले में रोज तकरीबन 8 टन मछली की खपत है, लेकिन दरभंगा ज़िले से मात्र 500 किलो तक भी मछली बाजार में नहीं पहुंच पाती है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-10.jpg" alt="" width="2045" height="1210" class="aligncenter size-full wp-image-6812" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-10.jpg 2045w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-10-300x178.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-10-1024x606.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-10-768x454.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-10-1536x909.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2045px) 100vw, 2045px" /></a></p>
<p>एक बात गर्दन से नीचे नहीं उतरता वह यह कि जब पोखर और तालाबों की संख्या उत्तरोत्तर शून्य की ओर अग्रसर है, फिर पानी में पैदा होने वाला मखान कहाँ से आ रहा है? मखान को सुपर फूड का दर्जा मिला है। ‘जी-टैग’ भी मिला है। कई तरह के कंपनियां अपने अपने नाम की ब्रांडिंग भी कर लिए हैं। </p>
<p>कहा जाता है कि मल्लाह जाति के लोग ही मखाना की खेती करते थे/हैं। आंकड़ों के अनुसार, बिहार में निषाद समाज की करीब 21 उपजातियां हैं। करीब चार दर्जन ‘सरनेम’ लगाए बैठे हैं। प्रदेश की सम्पूर्ण आबादी में करीब एक करोड़ 70 लाख लोग निषाद जाति के हैं। लेकिन सवाल यह है कि जो समाज के लोग, उनका परिवार, बाल-बच्चा बिहार के, तालाबों-पोखरों में पहले गर्दन भर पानी में डूब कर मखान की खेती करने में अपना सौभाग्य समझते थे, आज ठेंघुने और घुटने पर पानी नहीं है उन तालाबों और पोखरों में। इन कहावतों को व्यापारीकरण कर रहे हैं। इतना ही नहीं, अब तो मिथिला के पाग पर भी धावा बोल दिया गया है। ‘पाग’ तो अब रंगबिरंगा हो गया। सफ़ेद पाग कहीं दीखता नहीं। लाल-पाग और हल्दी-रंग नुमा पाग महज अवसर पर ही लोग माथे पर रखते हैं। अब तो ‘पान’, मखान, माँछ, मुस्की, आम, लताम (अमरुद), लीची सभी मिथिला के पाग पर दिखेंगे और राष्ट्रीय ही नहीं, अंतराष्ट्रीय बाजार में मिथिला पेंटिंग के नाम पर बेचे जा रहे हैं, जाएंगे और फिर कहते भी नहीं थकेंगे “पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान…..” ।​ </p>
<p><strong>बिहार में मखाना बोर्ड की स्थापना</strong></p>
<p>केन्‍द्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी, 2025 को संसद में केन्‍द्रीय बजट 2025-26 पेश करते हुए भारत की विकास यात्रा के लिए ‘कृषि को प्रथम इंजन’ की संज्ञा देते हुए अन्नदाताओं के लाभ के लिए कृषि क्षेत्र के विकास और उत्पादकता में वृद्धि के लिए कई उपायों की घोषणा की।​ बिहार में मखाना बोर्ड की स्थापना के सरकार के निर्णय की घोषणा करते हुए श्रीमती निर्मला सीतारमण ने कहा कि मखानों का उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और विपणन में सुधार लाने के लिए बिहार में मखाना बोर्ड स्थापित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इन कार्यकलापों में लगे लोगों को एफपीओ में संगठित किया जाएगा। यह बोर्ड मखाना किसानों को पथ-प्रदर्शन और प्रशिक्षण सहायता उपलब्ध कराएगा और यह सुनिश्चित करने के लिए भी कार्य करेगा कि उन्हें सभी संगत सरकारी योजनाओं के लाभ मिले।<br />
​</p>
<blockquote><p>​बिहार में मखाना बोर्ड स्थापित करने के सरकार के फैसले की घोषणा करते हुए श्रीमती सीतारमण ने कहा कि इससे मखाना के उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और विपणन में सुधार होगा और साथ ही इन गतिविधियों में लगे लोगों को किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) में संगठित करने में सहायता मिलेगी। उन्होंने कहा कि बोर्ड मखाना किसानों को सहायता और प्रशिक्षण सहायता प्रदान करेगा और यह सुनिश्चित करने के लिए भी काम करेगा कि उन्हें सभी प्रासंगिक सरकारी योजनाओं का लाभ मिले।​</p></blockquote>
<p>केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने बजट-2025 को विकसित और हर क्षेत्र में श्रेष्ठ भारत के निर्माण की दिशा में मोदी सरकार की दूरदर्शिता का ब्लूप्रिंट बताया। केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने सर्वसमावेशी और दूरदर्शी बजट के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी और वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण जी को बधाई दी।</p>
<p>​लेकिन <strong>बीबीसी के संवाददाता सीटू तिवारी</strong>​ बजट प्रस्तुत होने, मखाना बोर्ड बनने की घोषणा होने के दो माड़ बाद लिखती हैं कि बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के भागलपुर में एक कार्यक्रम में 300 दिन मखाना खाने की बात कही ​थी।जानकारी के मुताबिक़, &#8220;बोर्ड का गठन मखाने के उत्पादन, प्रोसेसिंग, वैल्यू एडिशन और मार्केटिंग को बेहतर बनाने के लिए किया जाएगा. ये बोर्ड मखाना किसानों को प्रशिक्षण सहायता देगा और मखाना उत्पादन से जुड़े लोगों को एफ़पीओ में संगठित ​करेगा।&#8221;​ </p>
<p>वे लिखती हैं कि मखाना किसानों के लिए पहले भी मोटे तौर पर इन्हीं उद्देश्यों के साथ बिहार में राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र खोला गया था, लेकिन ये मखाना केंद्र खुद ही बदहाल​ है। ​&#8221;स्थिति ये है कि इस केंद्र में एक अदद फुल टाइम निदेशक नहीं है और सिर्फ़ 10 स्टाफ़ के सहारे पूरा संस्थान चल रहा है.​ अपने 23 साल के सफ़र में मखाना केंद्र के पास 18 साल तक &#8216;राष्ट्रीय&#8217; का दर्जा भी नहीं ​रहा।&#8221; साल 2002 में राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र के तौर पर खुले मखाना केंद्र से &#8216;राष्ट्रीय&#8217; होने का दर्जा साल 2005 में छिन गया था, जो साल 2023 में जाकर वापस ​मिला। दरभंगा में मखाने के एक राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र खोलने की योजना नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002) में बनी थी. जिसके बाद साल 2002 में मखाना अनुसंधान केंद्र का कैम्प ऑफिस पटना स्थित आलू अनुसंधान केंद्र में ​खुला। बाद में ये केंद्र दरभंगा शिफ्ट हो ​गया। इस केंद्र का उद्देश्य मखाना उत्पादन से जुड़े मुश्किल काम को आसान करने के लिए तकनीक विकसित करना, उत्पादकता, रोज़गार, वैल्यु एडिशन, मार्केटिंग आदि करना ​था। लेकिन मखाना केंद्र की ये उपलब्धियां उसके 23 साल के सफ़र और मखाना उत्पादन से जुड़े लोगों की मुश्किलों के सामने बहुत &#8216;बौनी&#8217; नज़र आती ​है। दरअसल, मखाना केंद्र खुद ही अपनी समस्याओं से जूझता ​रहा। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-11.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-11.jpg" alt="" width="2045" height="1210" class="aligncenter size-full wp-image-6813" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-11.jpg 2045w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-11-300x178.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-11-1024x606.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-11-768x454.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-11-1536x909.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2045px) 100vw, 2045px" /></a></p>
<p>लोकसभा में फरवरी 2025 में कृषि और किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी के दिए गए जवाब के मुताबिक़, मखाना अनुसंधान केंद्र ने वित्तीय वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच महज 3.4 करोड़ रुपये खर्च किए ​हैं। साल 2024-25 में मखाना केंद्र ने जनवरी माह तक महज 1.27 करोड़ रुपये खर्च ​किये गए। दरअसल, इतनी कम राशि खर्च करने की वजह मखाना अनुसंधान केंद्र का दर्जा ​है। साल 2005 में इस केंद्र से &#8216;राष्ट्रीय&#8217; का दर्जा वापस लेकर इसे आईसीएआर (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) पूर्वी क्षेत्र के प्रशासनिक नियंत्रण में लाया ​गया। बाद में साल 2023 में फिर से मखाना अनुसंधान केंद्र को राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र का दर्जा वापस ​मिला। </p>
<p><strong>​बहरहाल, बिहार में फिलहाल लगभग 35 हजार हेक्टेयर में मखाने की खेती होती ​है। कारण 25000 किसान इससे जुड़े हुए ​हैं। देश में सबसे अधिक मखाना उत्पादन करने वाला राज्य बिहार ​है। अब तो प्रचार-प्रसार के लिए समझें या मिथिला क्षेत्र की मखाना की राजनीति, मखाना महोत्सव भी मनाया जाने लगा है। प्रदेश के मुख्यमंत्री सहित अन्य नेतागण भी ताल थोक रहे हैं कि मखाना का उत्पादन बढ़ाने को लेकर प्रयास किए जा रहे ​हैं। लक्ष्य है कि अगले दो-तीन साल में 50-60 हजार हेक्टेयर में इसकी खेती हो और 50 हजार किसान मखाने की खेती से ​जुड़े। </strong></p>
<p>मखाने की खेती उत्तरी और पूर्वी बिहार में मखाना की खेती की जाती ​है। इसमें मधुबनी, दरभंगा, पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, मधेपुरा, सुपौल, अररिया, सीतामढ़ी और किशनगंज जिले में मखाना की खेती होती ​है। मखाना अपने गुणों के कारण सुपर फूड माना जाता है। इसमें प्रोटीन, फाइबर, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन और मिनरल्स भरपूर मात्रा में होते हैं। यह पानी में उपजने वाला पौधा है और  जलवायु लचीलापन फसल ​है। ​चुकि मखाना की जड़ें पानी के अंदर होती हैं, इसलिए जमीन की सतह पर होने वाली फसलों की तुलना में इस पर तेज गर्मी का असर कम होता है। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन का असर मखाना की खेती पर भी पड़ने लगा है।​ लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि मखाने की खेती के लिए जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती है। 40 डिग्री से अधिक तापमान इसके लिए बिल्कुल अच्छा नहीं है। हर तीन-चार साल में एक बार मखाना की फसल पर ड्राई स्पेल (सूखे का दौर) आ जाता है, जिससे किसानों को नुकसान होता है। </p>
<p><strong>मखाना का उत्पादव और बिहार </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-12.jpg" alt="" width="2045" height="1210" class="aligncenter size-full wp-image-6814" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-12.jpg 2045w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-12-300x178.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-12-1024x606.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-12-768x454.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-12-1536x909.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2045px) 100vw, 2045px" /></a></p>
<p>भारत दुनिया का लगभग 90 प्रतिशत मखाना उत्पादित करता है और इस उत्पादन ​ में बिहार का योगदान करीब 85 फीसदी से भी अधिक है। बिहार के 38 जिलों में से छह जिले &#8220;एक जिला, एक उत्पाद&#8221; (ओडीओपी) योजना के तहत मखाना की खेती के लिए चिह्नित किए गए हैं। ये जिले हैं &#8211; दरभंगा, मधुबनी, सहरसा, सुपौल, अररिया और कटिहार। ओडीओपी योजना के तहत इन जिलों के किसानों को इनपुट खरीद, सामान्य सेवाओं का लाभ लेने और उत्पादों के विपणन के लिए ज्यादा सुविधाएं मिलती हैं। हालांकि, मिथिलांचल और कोसी-सीमांचल के 10 जिलों में मखाना की खेती होती है और उन जिलों के किसान बिहार सरकार द्वारा संचालित मखाना विकास योजना का लाभ लेने के पात्र हैं। ये 10 जिले हैं &#8211; कटिहार, पूर्णिया, मधुबनी, किशनगंज, सुपौल, अररिया, मधेपुरा, सहरसा, दरभंगा और खगड़िया। वर्ष 2022 में मिथिला मखाना को​ जीआई टैग भी मिला है। </p>
<p>बिहार में मखाना की खेती तेजी से बढ़ रही है। वित्त वर्ष 2012-13 में मखाना का रकबा 13,000 हेक्टेयर था, जो वर्ष 2021-22 में बढ़कर 35,224 हेक्टेयर हो गया। यह 171 प्रतिशत की वृद्धि है। इस दौरान मखाना के उत्पादन में भी 152 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 2012-13 में 9,360 टन मखाना का उत्पादन हुआ था, जो 2021-22 में बढ़कर 23,656 टन हो गया। इसी दौरान मखाना के बीज का उत्पादन भी 56,389 टन हो गया।​ इसके उत्पादन में 70 फीसदी हिस्सा सिर्फ मिथिलांचल का है। ​आज बिहार के अलावा बंगाल, असम, उड़ीसा, जम्मू कश्मीर, मणिपुर और मध्य प्रदेश में भी इसकी खेती की ​जा रही है। मखाना की खपत देश के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भी है। भारत के अलावा चीन, जापान, कोरिया और रूस में मखाना की खेती की जाती है। मखाना के निर्यात से देश को हर साल 25 से 30 करोड़ की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। </p>
<p><strong>​मनीष आनंद और मिथिला नेचुरल्स </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-13.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-13.jpg" alt="" width="2045" height="1210" class="aligncenter size-full wp-image-6803" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-13.jpg 2045w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-13-300x178.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-13-1024x606.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-13-768x454.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Makhana-13-1536x909.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2045px) 100vw, 2045px" /></a></p>
<p>​बहरहाल, <strong>मनीष आनंद ​(मिथिला नेचुरल्स​)</strong> मधुबनी जिले के अरेर गांव में 70,000+ वर्ग फुट का दुनिया का सबसे बड़ा एकीकृत माखन प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित किया।​ मनीष आनंद एक अनुभवी पेशेवर हैं, जिन्होंने अपने अनुभव और व्यावसायिकता का उपयोग अपने गांव जराइल-अरेर, क्षेत्र मिथिला और राज्य बिहार में गांव के पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर बनाने के लिए करने के लिए शानदार एमएनसी जीवन को छोड़ दिया।​ उन्होंने 24 से अधिक देशों के बाज़ार में काम किया और कंट्री मैनेजर के रूप में दक्षिण एशिया को संभाला। उन्हें अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार का गहन ज्ञान और अनुभव है।​ उन्होंने आकर्षक लेकिन नीरस नियमित कॉर्पोरेट जीवन को छोड़ दिया और बिहार के मधुबनी जिले के बेनीपट्टी ब्लॉक में अपने गांव जराइल में &#8216;वापस जड़&#8217; पर जाने का फैसला किया।</p>
<p>वे एक दूरदर्शी और बिहार के सबसे तेजी से बढ़ते ब्रांड, मिथिला नेचुरल्स के संस्थापक हैं। उन्होंने 2012 में मिथिला के साथ अपनी यात्रा शुरू की। मिथिला/बिहार और इसकी ताकत और कमजोरियों का अध्ययन करने के बाद, उन्होंने कृषि आधारित कृषि उपज में अपनी अगली पेशेवर यात्रा शुरू करने का फैसला किया, जो मिथिला/बिहार की ताकत है। उन्होंने अपने गाँव के तालाब में मखाना की खेती देखी और मखाना में उतरने का फैसला किया। अगले 3 वर्षों में, उन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया, बाजार का अध्ययन किया, संभावित विकास का अनुमान लगाया, मूल्य वर्धित मखाना के दायरे पर शोध किया, किसानों, फोरिस, मनी लेंडर्स, व्यापारियों, स्टॉकिस्ट, जमाखोरों जैसे हितधारकों से मुलाकात की और 2015 में दिल्ली हाट, आईएनए में पहला प्रोटोटाइप उत्पाद लॉन्च किया। तब 4 उत्पाद लॉन्च किए गए थे; फूल मखाना, भुना हुआ फ्लेवर्ड मखाना, मखाना पाउडर और मखाना पाक। </p>
<p>2018 में उन्होंने मिथिला से पहला एकीकृत खाद्य ब्रांड &#8216;मिथिला नेचुरल्स&#8217; और पहला प्रीमियम फूल मखाना ब्रांड &#8216;मिथिला मखान&#8217; लॉन्च करने का फैसला किया। यह सफल रहा और अब उनके उत्पाद बास्केट में 100 से अधिक SKU हैं जो दुनिया भर में अब तक 10 मिलियन से अधिक पैकेट बेचे जाने के साथ बढ़ रहे हैं। हाल ही में उन्होंने अमेरिकी उपभोक्ता बाजार का पता लगाने के लिए अपनी कंपनी मिथिला नेचुरल्स यूएसए कॉर्प को पंजीकृत किया, जो दुनिया में सबसे बड़ा है। और अंदाज़ा लगाइए, उनके सभी एंड टू एंड उत्पाद मूल्य श्रृंखला उत्पादन उनके दूरदराज के गाँव से आते हैं जहाँ समाज के कमज़ोर वर्ग की ज़्यादातर अकुशल महिला कर्मचारी काम करती हैं। यू.के. एम.एन.सी. के लिए काम करते समय अपनी शुरुआती प्रवृत्ति में, उन्होंने 6 व्यावसायिक लाइनें (ऑप्थैल्मिक ग्लास, ऑप्टिकल ग्लास, एक्सरे ग्लास, ग्लास मास्टर, न्यूक्लियर ग्लास, बिल्डिंग ग्लास) स्थापित कीं और भारत और पड़ोसी देशों में एंटीस्लिप उत्पादों का व्यवसाय बनाया। </p>
<p>उन्होंने अपने व्यवसाय को तकनीकी उत्पादों से बिल्डिंग उत्पादों में बदल दिया और अंततः &#8216;आटा-डेटा&#8217; सिद्धांत में विश्वास करते हुए कृषि और खाद्य क्षेत्र में बदल दिया। हमारा लक्ष्य 10 साल में 10 हजार करोड़ का ब्रांड बनना है। हमारा लक्ष्य पूर्वी भारत का अग्रणी घरेलू खाद्य ब्रांड बनना है। हमने मखाना से शुरुआत की है, लेकिन हम स्टेपल में भी प्रवेश कर रहे हैं और घरों में रोजाना खाए जाने वाले सभी खाद्य उत्पाद जैसे चावल, दाल, बेसन, सत्तू, आटा, सूखे मेवे, खाद्य तेल, मसाले, बेकरी, डेयरी, पानी आदि बनाएंगे। हम कैसे बेचेंगे? हम B2B आपूर्ति के साथ-साथ पारंपरिक, आधुनिक, ईकॉम और डार्क स्टोर मॉडल पर काम कर रहे हैं। हम D2C से आगे बढ़कर D2V मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं।</p>
<p><strong>मखान-पोखर वाली सभी तस्वीरें अजय कुमार कोशी बिहार के सौजन्य से</strong> </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/business/politics-of-makahana-and-paag-in-mithila">जब &#8216;खाने की वस्तु&#8217; को &#8216;पहनाने लगे&#8217; लोग, तो समझ लीजिये &#8216;राजनीति&#8217; हो रही है, मिथिला का &#8216;मखान&#8217; भी अछूता नहीं है, &#8216;पाग&#8217; के बारे में तो पूछिए नहीं (बिहार स्टार्टअप-5)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/business/politics-of-makahana-and-paag-in-mithila/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>1</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>​बिहार का सत्यानाश(10)😢 राजनीति का अपराधीकरण बनाम अधिकारियों का राजनीतिकरण, कहते हैं बिहार का विकास करेंगे👁मतदाता कपार पीट रहा है😢वे समझते हैं ताली बजा रहा है😢</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/criminalization-of-politics-versus-politicization-of-officials-in-bihar</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/criminalization-of-politics-versus-politicization-of-officials-in-bihar#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 13 Apr 2025 12:32:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[criminals]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[elections]]></category>
		<category><![CDATA[leaders]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
		<category><![CDATA[police]]></category>
		<category><![CDATA[Policing]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[voters]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=6303</guid>

					<description><![CDATA[<p>डाक बंगला चौराहा (पटना): सत्तर के दशक से जिस तरह बिहार में अपराधियों का राजनीतिकरण शुरू हुआ था, बाद के वर्षों में अधिकारियों ने स्वयं अपना राजनीतिकरण प्रारम्भ कर दिया है। यानी कल राजनीति का अपराधीकरण हुआ था, आज राजनीति का अधिकारीकरण हो रहा है। वैसे सभी यही ताल ठोकते हैं कि &#8216;वे प्रदेश की भलाई के [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/criminalization-of-politics-versus-politicization-of-officials-in-bihar">​बिहार का सत्यानाश(10)😢 राजनीति का अपराधीकरण बनाम अधिकारियों का राजनीतिकरण, कहते हैं बिहार का विकास करेंगे👁मतदाता कपार पीट रहा है😢वे समझते हैं ताली बजा रहा है😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>डाक बंगला चौराहा (पटना): सत्तर के दशक से जिस तरह बिहार में अपराधियों का राजनीतिकरण शुरू हुआ था, बाद के वर्षों में अधिकारियों ने स्वयं अपना राजनीतिकरण प्रारम्भ कर दिया है। यानी कल राजनीति का अपराधीकरण हुआ था, आज राजनीति का अधिकारीकरण हो रहा है। वैसे सभी यही ताल ठोकते हैं कि &#8216;वे प्रदेश की भलाई के लिए कर रहे हैं, लेकिन इससे प्रदेश की कितनी भलाई हुई अथवा होगी, इस बात से वे भी भिज्ञ हैं और मतदाता तो अनभिज्ञ हैं ही नहीं, लाचार है। </strong>  </p>
<blockquote><p>अपराधियों ने जब सत्तर के कालखंड में इस बात को महसूस किया कि उनके बिना तत्कालीन राजनेताओं का अस्तित्व खतरे में आ सकता है, अपने अस्तित्व को मजबूत करने के लिए या फिर नेताओं का परस्पर लाभार्थी होने के उद्देश्य से स्वयं राजनीति में आने लगे। समय बदला और इस बदलते समय में राजनेताओं के पिछलग्गू अधिकारी जब इस बात को महसूस किए कि वे भी राजनीति में गोता लगा सकते हैं; अपने राजनीतिक मास्टर के बगल में बराबर की ऊँचाई में खड़े हो सकते है, अधिकारियों ने अपराधियों के राजनीतिक लाभ के तर्ज पर स्वयं का राजनीतिकरण शुरू कर दिया। वैसे भी प्रदेश का शैक्षिक दर इतना कम है कि मतदाता बात खुलकर बोल सकता है और न सोच सकता। उधर, चाहे अधिकारी हों या नेता, वे कभी चाहते ही नहीं कि मतदाता विचारवान हो। शब्द कटु है, लेकिन सत्य है और दुखद भी</p></blockquote>
<p>यह बोलने अथवा लिखने की आवश्यकता नहीं है, जहाँ तक भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का प्रश्न है। इसका दृष्टान्त नब्बे के दशक में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयोग टी.एन. शेषन से बेहतर और कोई नहीं हो सकता। स्वतंत्र भारत में चुनावी गंदगी को साफ़ करने में अगर किसी का नाम लिया जाता है, या आने वाले दिनों में भी लिया जायेगा तो टी.एन. शेषन का नाम सर्वोपरि होगा। साल 1990-96 के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में शेषन ने चुनावी प्रणाली को साफ करने की प्रक्रिया शुरू की थी। मतदाताओं के लिए फोटो पहचान पत्र की शुरुआत इसी दिशा में एक कदम था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि आदर्श आचार संहिता, जिसे तब तक अकादमिक हित का दस्तावेज माना जाता था, को पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा गंभीरता से लिया जाए। अपने पद से बाहर जाने के लिए आलोचनाओं का सामना करने के बावजूद, श्री शेषन ने बाहरी दुनिया को दिखाया कि उनका पद कोई आसान काम नहीं है।</p>
<figure id="attachment_6307" aria-describedby="caption-attachment-6307" style="width: 1984px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1.jpg" alt="" width="1984" height="2264" class="size-full wp-image-6307" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1.jpg 1984w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1-263x300.jpg 263w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1-897x1024.jpg 897w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1-768x876.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1-1346x1536.jpg 1346w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Dr-Ajay-KumarTN-Shheshan-1-1795x2048.jpg 1795w" sizes="auto, (max-width: 1984px) 100vw, 1984px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6307" class="wp-caption-text">पूर्व चुनाव आयुक्त (दिवंगत) टी एन शेषन और पूरब भारतीय पुलिस के अधिकारी डॉ. अजय कुमार, अब राजनीति में (Pic: from Kumar&#8217;s Twitter page)</figcaption></figure>
<p>शेषन अवकाश के बाद भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी के विरुद्ध गांधीनगर से चुनाव लड़े, हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद 1997 में आर.के.नारायणन के विरुद्ध राष्ट्रपति के लिए चुनाव लड़े, हार का सामना करना पड़ा। अंततोगत्वा मन में अधूरे कार्यों को पूरे करने की इक्षा लिए 10 नवम्बर, 2019 को अनंत यात्रा पर निकल गए। शेषन महज एक दृष्टान्त थे एक अधिकारी के रूप में जो अपने कार्यकाल में वैसा बहुत कुछ किये, जो एक अधिकारी को करना चाहिए। उन्हें भी अंत में राजनीति में आने की लालसा हुई, लेकिन अधूरी रह गयी। हम पूरे देश की बात नहीं करेंगे, लेकिन जब बिहार की बात आएगी तो यह कहते, लिखते पीछे भी नहीं रहेंगे कि बिहार लोकसेवा आयोग के साथ-साथ संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षाओं में अव्वल आने के बाद, एक भारतीय प्रशासनिक अधिकारी के रूप में अपना स्थान बनाने के बाद, सेवाकाल के दौरान अथवा सेवानिवृति के बाद, यहाँ तक कि नौकरी से त्यागपत्र देकर राजनीति में गोता लगाने के लिए आज अधिकारियों की संख्या क्यों बढ़ रही है?  </p>
<p><strong>विगत पचास वर्षों का इतिहास अगर देखा जाए उन अधिकारियों का जो प्रशासनिक अथवा पुलिस सेवा के बाद/बीच में त्यागपत्र देकर अगर राजनीति में आये तो उससे प्रदेश को क्या मिला? जिन मतदाताओं ने उनके लिए अपनी बाएं हाथ की तर्जनी पर चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित स्याही लगाए ताकि उनका भविष्य उज्जवल हो, वे अधिकारी से राजनेता बने लोग उन मतदाताओं के चेहरों पर कालिख पोतने के अलावे क्या दिए? उनके विधानसभा अथवा संसदीय क्षेत्र के मतदाता एक घूंट पानी के लिए, एक टुकड़ा दवाई के लिए, एक रोटी के लिए, एक नियोजन के लिए, अपने बाल-बच्चों की पढ़ाई के लिए उम्मीद की आस लिए सांस लेते लेते अंतिम सांस ले लिए, लेकिन न प्रदेश का हित हुआ और ना ही मतदाता का। आप माने अथवा नहीं, लेकिन यह एक गहन शोध का विषय है। </strong></p>
<p>इतना ही नहीं, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी जी. कृष्णाया की हत्या भी एक दृष्टान्त है। मधेपुरा के तत्कालीन राज नेता आनंद मोहन ने 5 दिसंबर 1994 को मुजफ्फरपुर में गोपालगंज के जिलाधिकारी जी कृष्णैया की हत्या कर दी थी। आनंद मोहन उक्त अधिकारी को उनकी आधिकारिक कार से बाहर खींच लिया गया और पीट-पीट कर मार डाला था। सन 1985 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी जी कृष्णैया वर्तमान तेलंगाना के महबूबनगर के रहने वाले थे। आनंद मोहन की रिहाई के तत्काल बाद जी कृष्णैया की विधवा ‘आश्चर्य’ व्यक्त की। आश्चर्य व्यक्त करना स्वाभाविक भी है। जी कृष्णैया की मृत्यु के बाद आनंद मोहन भले कारावास में हों, उनकी पत्नी श्रीमती लवली आनंद भारत के संसद में थी और बाद में पुत्र बिहार विधानसभा में विधायक। लेकिन जी कृष्णैया के बारे में, उनके परिवार के बारे में न तो व्यवस्था सोची और न ही राजनीतिक पार्टियों के नेता चाहे पटना के हों या दिल्ली में बैठे हों। वैसे चेतन आनंद यह कहते हैं कि ‘उस घटना के बाद दोनों परिवार काफी कुछ सहा है।’ </p>
<p>समय का तकाजा देखिए। जिस राष्ट्रीय जनता दल के शीर्षस्थ नेता, जो बाद में ऐतिहासिक चारा घोटाला कांड में पहले आरोपी बने और फिर सजाभोक्ता के साथ-साथ मुख्यमंत्री कार्यालय से बाहर भी हुए, आनंद मोहन को कभी हाथ नहीं पकड़े, मदद नहीं किये। आज आनंद मोहन के पुत्र चेतन आनंद बिहार के शिवहर से राष्ट्रीय जनता दल के विधायक हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की देखरेख में प्रदेश सरकार द्वारा जेल मैनुअल के नियमों में संशोधन किया गया और एक आधिकारिक अधिसूचना के आधार पर आनंद मोहन सहित 27 आपराधिक-कैदियों को जो 14 साल या 20 साल कारावास की सजा काट चुके, रिहा करने का आदेश दिया गया। रिहाई से पहले 15 दिनों तक वे ‘पे-रोल’ पर थे। </p>
<p><strong>अगर ख़बरों पर विश्वास करें तो आज 200 से अधिक भारतीय प्रशासनिक, पुलिस सेवा के अधिकारी, चिकित्सक, अधिवक्ता, और विभिन्न व्यवसायों के लोग विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के झंडों को अपने गले में बांध रहे हैं, उसके हो रहे हैं। वे कहते हैं बिहार का उद्धार होगा। सेवानिवृत्त पुलिस सेवा के अधिकारियों में आर. के.  मिश्रा, एस. के. पासवान, के. के. वर्मा और के. बी. सिंह शामिल हैं। मिश्रा पूर्व डीजी (होमगार्ड) थे जबकि एसके पासवान छत्तीसगढ़ के डीजी (जेल) के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। इसके अलावे अजय कुमार द्विवेदी (पश्चिम चंपारण, सेवानिवृत्त विशेष सचिव, कैबिनेट, बिहार सरकार); अरविंद कुमार सिंह (भोजपुर, सेवानिवृत्त सचिव, पूर्व जिला मजिस्ट्रेट, कैमूर और पूर्णिया); ललन यादव (मुंगेर, सेवानिवृत्त आयुक्त, पूर्णिया, डीएम, नवादा, कटिहार); तुलसी हजार (पूर्वी चंपारण; सेवानिवृत्त प्रशासक बेतिया राज, बिहार सरकार); सुरेश शर्मा (गोपालगंज, सेवानिवृत्त संयुक्त सचिव, स्वास्थ्य विभाग, बिहार सरकार) और गोपाल नारायण सिंह (औरंगाबाद, सेवानिवृत्त संयुक्त (सचिव, ग्रामीण कार्य विभाग, बिहार सरकार) का भी नाम आता है।</strong> </p>
<figure id="attachment_6306" aria-describedby="caption-attachment-6306" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6306" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-2-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6306" class="wp-caption-text">डॉ. अजय कुमार, अब राजनीति में (Pic: from Kumar&#8217;s Twitter page)</figcaption></figure>
<p>इससे पहले के वर्षों में डॉ. अजय कुमार, जो 1986-1996 तक भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी थे, जमशेदपुर के पुलिस अधीक्षक भी थे, राजनीति में प्रवेश किये। रामचन्द्र प्रसाद सिंह, भाप्रसे के अधिकारी थे, नीतीश कुमार के मुख्य सचिव भी थे, राजनीति में चादर ढंक लिए, कहे प्रदेश का भलाई करेंगे। कभी जनता दल यूनाइटेड में रहे, कभी भाजपा में कटवत बदल लिए फिर अपनी पार्टी बनाये। उससे भी पहले दिल्ली के पुलिस आयुक्त निखिल कुमार, जिनका परिवार प्रदेश की राजनीति में ही सांस लिया, सेवा के पश्चात सांसद बने, फिर राजनीति में गोता लगाते गए। </p>
<p>भाप्रसे के एक और अधिकारी यशवंत सिन्हा 24 वर्ष सरकारी सेवक रहने के बाद पहले जनता दल के हुए, फिर बाद में भाजपा के हो गए। केंद्र में मंत्री भी बने। बाबू जगजीवन राम की पुत्री श्रीमती मीरा कुमार, 1973 में भारतीय विदेश सेवा की अधिकारी बनी, राजनीति में डुबकी लगा दीं। लोक सभा की अध्यक्षा भी बनी। 1975 बैच के भाप्रसे राजकुमार सिंह जिन्होंने लालू यादव के कहने पर लाल कृष्ण आडवाणी को उनके प्रथम रथयात्रा के दौरान गिरफ्तार किया था, भाजपा के हो गए, केंद्र में मंत्री भी बने। गुप्तेश्वर पाण्डे अवकाश के पूर्व नौकरी छोड़ दिए और राजनीति में कम्बल ढँक लिए। सुनील कुमार आज नितीश के मंत्रिमंडल में बैठे हैं। लेकिन बिहार को छोड़िये, उनके संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं को क्या मिला ? </p>
<blockquote><p>उसी भाप्रसे-भापुसे यात्रा की अगली कड़ी में विगत दिनों भारतीय पुलिस सेवा के एक और अधिकारी बिहार में बहती राजनीतिक धारा में गोंता लगा दिए। महाराष्ट्र के मूलवासी शिवदीप लांडे, अब महाराष्ट्र के लोगों के लिए नहीं, बल्कि बिहार के लोगों की भलाई के लिए लड़ाई लड़ेंगे। महाराष्ट्र के &#8216;शिवसेना&#8217; के तर्ज पर लांडे ने &#8216;हिंद सेना&#8217; नाम से नई राजनीतिक पार्टी की शुरुआत की। पटना में प्रेस सम्मेलन में उन्होंने इसकी घोषणा करते कहा कि उनकी पार्टी बिहार के लोगों के हक के लिए लड़ेगी और सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। उनके अनुसार, आजादी के 78 साल के बाद भी प्रदेश में जो बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए थी, वह नहीं पहुंची। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आवास को अपनी पार्टी का प्रमुख कार्य सूची बताया। </p></blockquote>
<p>लांडे के अनुसार, वे पुलिसिंग किये हैं, इसलिए जानते हैं कि बिहार में हर साल करीब 2700 से 3000 हत्याएं होती हैं। इनमें से करीब 57% हत्या जमीन विवाद को लेकर होती हैं। यानी हर साल 1500 से ज्यादा लोग सिर्फ जमीन के झगड़े में मारे जाते हैं। हर दिन 4 से 5 लोग मारे जाते हैं। वैसी स्थिति में एक आम आदमी को न्याय कैसे मिलेगा?  उनका कहना है कि &#8216;बहुत से लोग सोचते हैं कि न्याय उनकी जेब में है लेकिन उनकी पार्टी का &#8216;न्याय&#8217; का अवधारणा सिर्फ उनके लिए है जो सच्चे गरीब, वंचित और पीड़ित हैं। लांडे ने कहा कि उनकी पार्टी का प्रतीक &#8216;त्रिपुण्ड और खाकी&#8217; होगा, जो उनके अब तक के जीवन दर्शन को दर्शाता है। यह प्रतीक मानवता, न्याय और सेवा को दर्शाएगा। </p>
<figure id="attachment_6308" aria-describedby="caption-attachment-6308" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6308" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6308" class="wp-caption-text">महाराष्ट्र के मूलवासी और पूर्व भापुसे अधिकारी शिवदीप लांडे, ​अब महाराष्ट्र के लोगों के लिए नहीं, बल्कि बिहार के लोगों की भलाई के लिए लड़ाई लड़ेंगे।</figcaption></figure>
<p>2006 बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे लांडे ने पिछले साल सितंबर में सेवा से इस्तीफा दे दिया था। लांडे ने कहा, &#8220;18 साल तक वर्दी में बिहार की सेवा करने के बाद अब मैं जनता के बीच एक नई भूमिका में आना चाहता हूं। हिन्दू सेना पार्टी बिहार को बदलने और विकास के रास्ते पर ले जाने के लिए काम करेगी।&#8221; महाराष्ट्र के अकोला जिले में जन्मे लांडे ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद सिविल सेवा में कदम रखा था। बिहार में उनकी पहली पोस्टिंग नक्सल प्रभावित मुंगेर जिले में हुई थी। स्वयं को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित करते शिवदीप लांडे ने कहा कि अब हमारा उद्देश्य युवाओं को जोड़ना, संगठन खड़ा करना और चुनाव के लिए वैचारिक ताकत तैयार करना है। शायद लांडे साहब इस बात से भिज्ञ नहीं हैं कि 1974 में जयप्रकाश नारायण ने भी &#8216;छात्रों को, युवाओं को संगठित कर सत्ता की लड़ाई लड़े थे। आज वही लड़ाकू सत्ता की गलियारे में बैठे हैं और प्रदेश का क्या हश्र है, यह न तो पुलिस फाइल से छिपा है और ना ही अदालत से।&#8221; खैर। </p>
<p>बिहार के राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि &#8220;बिहार में कुल मतदाताओं की संख्या 7.80 करोड़ है। इनमें 18-19 साल के सर्वाधिक कम उम्र के मतदाताओं की संख्या आठ लाख है। युवा में शुमार 30-39 आयु वर्ग के मतदाताओं की संख्या 2.04 करोड़ है। आमतौर पर यह माना जाता है कि ज्यादातर प्रौढ़ या बुजुर्ग मतदाता किसी न किसी दल के कोर वोटर होते हैं, जबकि युवा मतदाताओं का दिमाग कोरे स्लेट की तरह होता है। यानी ये फ्लोटिंग वोटर हैं। इन्हें जिस भी किसी दल या नेता पर विश्वास जम गया, वे उसी की ओर मुखातिब हो जाते हैं। बिहार में चूंकि ऐसे वोटरों की तादाद एक चौथाई है, इसलिए हर नया दल युवा को ही टारगेट करता है। जन सुराज के प्रशांत किशोर भी युवाओं की बात शिद्दत से रखते हैं। अब हिन्द सेना के शिवदीप लांडे भी युवाओं को लेकर ही राजनीति करने की बात कह रहे हैं।&#8221;</p>
<p>चलिए आगे बढ़ते हैं। मोहम्मद यूनुस (1 अप्रैल, 1937 से 19 जुलाई, 1937) और श्रीकृष्ण सिन्हा (20 जुलाई, 1937 से 31 अक्टूबर, 1939 तथा 23 मार्च, 1946 से 14 अगस्त, 1947 तथा 15 अगस्त, 1947 से 31 जनवरी, 1961) तक के मुख्यमंत्री कार्यालय का कालखंड कुछ क्षण के लिए अलग रखते हैं। साल 1961 के बाद साल 2025 तक बिहार को कुल 22 चेहरे मुख्यमंत्री के रूप में मिला। प्रदेश का आवाम साठ के दशक के कालखंड में क्या सोचता था, उसे भी अगर विश्रामावस्था में रखते हैं तो आज के मतदाताओं की नजर में इन 22 मुख्यमंत्रियों में कौन कैसा है? यह सभी &#8216;मन-आत्मा और शरीर से जीवित&#8217; पूर्व मुख्यमंत्रियों के साथ-साथ राजनेता जानते हैं।</p>
<blockquote><p>बिहार के लोगों का मानना है कि &#8220;इन 22 मुख्यमंत्रियों में सिवाय श्री भोला पासवान शास्त्री के अलावे कोई भी मुख्यमंत्री अग्निकुंड में प्रवेश कर अपनी छवि, अपनी ईमानदारी, मतदाता के प्रति अपनी वफ़ादारी की परीक्षा देने का कूबत नहीं रखता है। भ्रष्टाचार से लेकर अपराधों की दुनिया से प्रत्यक्ष ना सही, अप्रत्यक्ष रूप से सम्बन्ध रखता ही है। अगर भारत के निर्वाचन आयोग अपने कार्यालय में इन सम्मानित महानुभावों और राजनीतिक पार्टियों के झंडे तले राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले नेताओं द्वारा प्रस्तुत हलफनामे की तहकीकात करे, तो शायद दूघ और पानी की धाराएं अलग-अलग प्रवाहित दिखाई देगी। लेकिन निर्वाचन आयोग ऐसा नहीं कर सकती हैं और वह भी संविधान की धाराओं से बंधी है।&#8221; </p></blockquote>
<p> <br />
भारत को आज़ादी मिलने के बाद 15 अगस्त, 1947 से आज तक अविभाजित और विभाजित बिहार को दो दर्जन मुख्यमंत्री मिला। श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर नीतीश कुमार के बीच ब्राह्मण, क्षत्रिय, राजपूत, दलित, कायस्थ, मुसलमान, ग्वाला और कुर्मी जाति के नेता प्रदेश का राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व किये। इन विगत वर्षों में बिहार मे आधे कालखंड में लालू प्रसाद यादव-राबड़ी देवी और नीतीश कुमार कुछ 35 वर्षों तक (कुछ समय अन्य) मुख्यमंत्री के कार्यालय में विराजमान रहे, शेष 35 वर्षों में कांग्रेस पार्टी के नेताओं के साथ-साथ अन्य राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने मुख्यमंत्री पद संभाले। लेकिन श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर डॉ. जगन्नाथ मिश्र (1990) तक 35 वर्षों में विभिन्न मुख्यमंत्री के कालखंड में बिहार का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक क्षेत्रों की सेवाओं में जितना पतन हुआ, 1990 में लालू यादव का बिहार के राजनीतिक पटल पर अभ्युदय के बाद, उनकी पत्नी और अंततः नीतीश कुमार के कालखंड में बिहार रसातल की ओर चला गया, जा रहा है। </p>
<figure id="attachment_6309" aria-describedby="caption-attachment-6309" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6309" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-5-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6309" class="wp-caption-text">यशवंत सिन्हा</figcaption></figure>
<p>इन विगत वर्षों में मतदाता जितने ही गरीबी की रेखाओं से कई मील नीचे धंस रहे हैं, उनके नेता जमीन के ऊपर उतने ही उठ रहे हैं। वैसी स्थिति में इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है कि सत्ता और सिंहासन के लोभ के कारण प्रदेश के अधिकारी सरकारी नौकरियों को छोड़कर सरकार ही बनने के लिए आकर्षित होते हों।खैर। </p>
<p><strong>बिहार का पहला मुख्यमंत्री बने श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) तक।  इसके बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) तक। बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970, कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979, केदार पांडे 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973, अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975, जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 और सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक।</strong> </p>
<p>डा. जगन्नाथ मिश्र के बाद नब्बे के दशक में जब जनता दल के तत्कालीन नेता लालू यादव प्रदेश का राजनीतिक कमान हाथ में लिए, तत्कालीन मतदाताओं के साथ-साथ युवा पीढ़ियों के मन में एक विश्वास जगा। लोगों का मानना था कि जयप्रकाश नारायण का सपना, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता – सिंहासन खाली करो कि जनता आ रही है – का भावार्थ साकार होगा। प्रदेश का छात्र नेता, जो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के दौरान प्रशासनिक अत्याचार को अपने सर पर, पीठ पर, कमर पर लाठियों के माध्यम से सहा था, अपने प्रदेश में एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करेगा जो उस कालखंड के ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक दृष्टान्त के रूप में उद्धत किया जायेगा। </p>
<figure id="attachment_6310" aria-describedby="caption-attachment-6310" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6310" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-6-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6310" class="wp-caption-text">​मीरा कुमार</figcaption></figure>
<p>लेकिन, प्रदेश की तत्कालीन आवादी 870,452,165 में 28,227,746 पुरुष और 24,366,539 महिला मतदाताओं का मनोबल और विश्वास चकनाचूर हो गया। जिन लोगों ने लालू यादव को चुनकर सड़क से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाये थे, गलत सिद्ध हुए, जब लालू यादव अपने दूसरे कालखंड के प्रारंभिक वर्षों में बिहार ही नहीं, भारत ही नहीं, पूरे विश्व में ”चाराचोर” के नाम से कुख्यात हुए। उस समय लालू यादव जो मुख्यमंत्री कार्यालय से निकले, कभी वापस नहीं आ सके। वैसे मुख़्यमंत्री कार्यालय से बाहर निकलने के बाद भी उन्होंने नेपथ्य से अपनी पत्नी श्रीमती राबड़ी देवी के माध्यम से सिंहासन पर विराजमान रहे। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री की पत्नी या मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान होने के वावजूद राबड़ी देवी प्रदेश की मतदाताओं के विश्वास और अपेक्षाओं पर खड़ी नहीं उतरीं। इसका मुख्य कारण था ‘अशिक्षा’, जिसे पति-पत्नी द्वय अपने जीवन में कभी महत्व नहीं दिए। अगर देते तो शायद अपनी अगली पीढ़ी के दोनों पुत्रों को शिक्षा की दुनिया में अव्वल बनाते। यही कारण है कि बिहार में शिक्षा का जो पतन कर्पूरी ठाकुर (आज भारत रत्न की उपाधि से अलंकृत हैं) के कालखंड से प्रारम्भ हुआ, लालू यादव – राबड़ी देवी – नीतीश कुमार के कालखंड आते आते नेश्तोनाबूद हो गया, ध्वस्त हो गया। दृष्टान्त प्रदेश की साक्षरता दर है। </p>
<p>वैसे भारतीय राजनीति में ‘रामायण’ का चाहे जितना भी दृष्टान्त दिया जाय, वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में ‘विभीषणों’ का भरमार है और ‘भरत’ का घोर किल्लत है। यह किल्लत देश में तो है ही, बिहार में तो यत्र-तत्र-सर्वत्र है। अवसर की तलाश में गिद्ध जैसे लोग बैठे हैं। सत्ता में बने रहने और सत्ता से बाहर रहने पर शक्ति में जो कमी होती है, लालू यादव इस बात को मन ही मन स्वीकार लिए थे। लेकिन भारत का न्यायालय, देश की जाँच एजेंसियों की निगाह चौबीसों घंटा लालू यादव पर टिकी थी। जैसे ही चारा घोटाला काण्ड अख़बारों के पन्नों पर, न्यायालयों के फाइलों में आया, नितीश कुमार अवसर का लाभ उठाने हेतु सज्ज होने लगे। राजनीतिक शतरंज की गोटियां बिछने लगी। कल तक लालू यादव को बड़े भाई कहने वाले नीतीश कुमार सत्ता की गलियारे में लालू यादव की मुख्यमंत्री पत्नी को परास्त करने के लिए आगे आ गए। </p>
<p>नीतीश कुमार के बारे में उनके राजनीतिक गुरु जॉर्ज फर्नांडिस की सोच को जया जेटली ने भी उद्धृत किया है एक किताब में : “वे (जॉर्ज फर्नांडिस) हमेशा कहते थे कि नीतीश कुमार एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनके दिमाग को वे कभी नहीं समझ सकते। सबसे बढ़कर एक लोकतांत्रिक व्यक्ति होने के नाते, जब नीतीश कुमार राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक आयोजित करने की तारीख पर सहमत होने से इनकार कर देते थे या ऐसी बैठकों के दौरान बनी आम सहमति को पलट देते थे, तो वे रात में अकेले उनसे मिलने आते थे और अपने विचार रखते थे, जिस पर वे अमल करने पर ज़ोर देते थे। अक्सर, इस वजह से पार्टी ने अच्छे लोगों को भाजपा में खो दिया; ये वे लोग थे जो अक्सर मेरे साथ चाय पीते थे और नीतीश कुमार के बारे में अपनी पीड़ाएँ साझा करते थे। मैंने जॉर्ज फर्नांडिस को ऐसी बातें बताना अपना कर्तव्य समझा, लेकिन मैं यह भी जानता था कि इससे अनजाने में उनकी चिंताएँ बढ़ जाएँगी। वे हमेशा बड़े लक्ष्य की खातिर तर्कहीन बातों को तर्कसंगत बनाने के लिए उनके आगे झुक जाते थे।”</p>
<figure id="attachment_6311" aria-describedby="caption-attachment-6311" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6311" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-4-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6311" class="wp-caption-text">​निखिल कुमार</figcaption></figure>
<p>खैर। राजनीतिक दृष्टि से यदि देखा जाए तो विगत 35 वर्षों से बिहार के सत्ता के सिंहासन पर दो व्यक्तियों का आधिपत्य रहा है – लालू यादव और कंपनी तथा नीतीश कुमार। 35 वर्षों का आधिपत्य होना और प्रदेश का उत्तरोत्तर पिछड़ा होते जाना – इस बात का प्रमाण है कि दोनों को प्रदेश के विकास से दूर-दूर तक कोई मतलब नहीं है। अलबत्ता, 1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू यादव और उनके परिवार जिस तरह सत्ता के ऊपर कब्ज़ा किये, वह आने वाले समय में इतिहास के पन्नों में काले अक्षर से लिखा जायेगा। आज भी उनके परिवार में दोनों पुत्र विधान सभा और दो संसद में (पत्नी-राज्य सभा और पुत्री लोक सभा) में बैठी है। अगर समुदाय की ही बात करें तो जिस गरीब-गुरबा, पिछड़ा, यादव आदि जातियों के नाम पर वे राजनीति में बरकरार रहे, उनके परिवार से बाहर कोई उस योग्य नहीं है? </p>
<p><strong>लालू के कालखंड में हत्या, अपहरण, फिरौती के लिए अपहरण आम था। उस काल खंड के जो भुक्तभोगी हैं, आज भी कलाप रहे हैं। लेकिन नीतीश कुमार के राज में, जिन्हें सभी ‘सुशासन बाबू’ के नाम से अलंकृत किये हैं, रिश्वतखोरी की प्रथा अनियंत्रित है, अपने उत्कर्ष पर है और यह कतई नहीं माना जायेगा कि इसमें सत्ता के गलियारे में बैठे लोग, सत्ता से संरक्षित अधिकारियों, नेताओं का हाथ नहीं है।”  और सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि जिला स्तर से लेकर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक, बिहार के बारे में, बिहार की राजनीति के बारे में, आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्थिति, सांस्कृतिक स्थिति, शैक्षिक स्थिति, स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में लिखने वाले कभी इन बातों को उजागर नहीं किये, कर रहे हैं। नीतीश के राज में जो बुनियादी ज़रूरत है – शिक्षा, स्वास्थ्य सभी चरमरायी हुई है।</strong> </p>
<p>2025 में होने वाली विधानसभा का चुनाव अपनी शुरूआती तारीख से 18 वीं संख्या की होगी। सं 1951 में बिहार में बिहार में विधानसभा चुनाव की शुरुआत हुई थी। अन्य चुनावों की बात और परिणाम अगर छोड़ भी दें तो आज़ादी के बाद बिहार में पहली बार 1977 में कांग्रेस पार्टी बड़ी तरह परास्त हुई। उस कालखंड में विधानसभा के 324 सीटों में कांग्रेस पार्टी महज 57 सीटों पर सिमट गई। लेकिन जो भी पार्टी सरकार में आयी, वह पांच वर्ष पूरा नहीं कर पायी। परिणाम स्वरुप तीन वर्ष बाद 1980 में मध्यवर्ती चुनाव में कांग्रेस पार्टी 169 सीटों पर कब्ज़ा कर पूर्ण बहुमत के साथ सर्कार भी बनायीं। वैसे 1980 से पहले प्रदेश में दो बार मध्यवर्ती चुनाव हुआ था। पहला चुनाव संपन्न हुआ था 1969 में और दूसरा 1972 में। सन 1969 में कांगेस को 118 स्थान मिले थे जबकि  सं 1972 के मध्यवर्ती चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 318 सीटों में से 167 स्थान मिले थे। </p>
<figure id="attachment_6312" aria-describedby="caption-attachment-6312" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6312" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-7-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6312" class="wp-caption-text">​राज कुमार सिंह</figcaption></figure>
<p>प्रदेश का चुनावी इतिहास इस बात का गवाही है कि कांग्रेस पार्टी को उखाड़ फेंकने के लिए बनी जनता पार्टी 1977 के चुनाव में जहाँ 214 स्थान प्राप्त की थी, वहीँ 1980 के चुनाव में 42 सीटों के साथ चौधरी चरण सिंह वाली सेकुलर जनता पार्टी सबसे बड़ी दूसरी पार्टी थे। उस चुनाव में सीपीआई को 23, भारतीय जनता पार्टी को 21, इंडियन कांग्रेस (यु) को 14, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को 11, जनता पार्टी (जेपी) को 13, जनता पार्टी (राजनारायण) को एक तथा 23 निर्दलीय विधायक जीतकर विधान सभा पहुंचे थे। 1985 के चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर आयी थी जहाँ उसने 323 संख्या वाली विधान सभा में 196 सीटें प्रतप्त की थी जो बहुमत से अधिक थी। नौवां विधान सभा का कालखंड में डॉ. जगन्नाथ मिश्र 94 दिनों (6 दिसंबर, 1989 से 10 मार्च, 1990) के मुख्यमंत्री थे। प्रदेश के लोग इस बात से इंकार नहीं करेंगे 10 मार्च 1990 से प्रदेश रसातल की ओर उन्मुख हो गया। </p>
<p>10 मार्च 1990 से 28 मार्च 1995 तक लालू प्रसाद यादव दसवें विधान सभा में जनता दल का प्रतिनिधित्व करते पूरा किया। लालू यादव के दूसरे कालखंड में ऐतिहासिक चारा घोटाला गबन का पर्दाफास हुआ। यह अलग बात है की लालू यादव उसके बाद भी नेपथ्य से अपनी पत्नी को सत्ता प्रदानकर मुख्यमंत्री कार्यालय का छवि थामे थे, लेकिन मतदाताओं की नज़रों में लालू यादव का सक्रीय राजनीति से बाहर थे। 11 वीं विधानसभा काल को पूरा करने में राबड़ी देवी 25 जुलाई 1997 से 11 फरवरी 1999 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रही। लालू यादव का चारा घोटाला कांड में मुख्य अभिययुक्त होते ही वे जनता दल को छोड़कर  राष्ट्रीय जनता दल बना लिया था। यानी राबड़ी देवी अपने नवनिर्मित पार्टी की पहली मुख्यमंत्री थी। </p>
<p>11 फरवरी – 9 मार्च 1999 तक प्रदेश में राष्ट्रपति शासन रहा। 9 मार्च 1999 से 2 मार्च 2000 तक 11 वीं विधानसभा में वे फिर मुख्यमंत्री बनी। अब तक देश में राजनीतिक भूचाल आ गया था। उधर दिल्ली में भी सभी की नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी ऊपर टिकी थी। अब तक जॉर्ज फर्नाडिस के सहयोग से समता पार्टी का भी गठन हो गया था और नितीश कुमार दिल्ली से पटना के सिंहासन की ओर उन्मुख हुए थे – सात दिनों के लिए 3 मार्च 2000 से 10 मार्च 2000 तक। लेकिन 11 मार्च 2000 से 6 मार्च 2005 तक फिर राबड़ी देवी का समय था। यह उनका अंतिम यात्रा था मुख्यमंत्री कार्यालय में। 24 नवम्बर 2005 (14 वें विधानसभा का कालखंड से) वर्तमान तक कई बार, कई पार्टियों के साथ तालमेल बैठने, हटाने के बाद भी नीतीश कुमार वर्तमान हैं। </p>
<figure id="attachment_6313" aria-describedby="caption-attachment-6313" style="width: 1319px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3.jpg" alt="" width="1319" height="1367" class="size-full wp-image-6313" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3.jpg 1319w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3-289x300.jpg 289w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3-988x1024.jpg 988w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3-768x796.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-3-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1319px) 100vw, 1319px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6313" class="wp-caption-text">आर सी पी सिंह</figcaption></figure>
<p><strong>एक दशक पहले 2015 के एक अध्ययन के मुताबिक, उस समय बिहार के नवनिर्वाचित 243 विधायकों में से 142 यानी 58 फीसदी पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। बिहार इलेक्शन वाच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) के अध्ययन के मुताबिक, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले कुल विधायकों में से 90 (40 फीसदी) पर हत्या, हत्या के प्रयास, सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे संगीन मामले दर्ज हैं। 70 विधायकों पर आरोप तय किए जा चुके हैं। अध्ययन के मुताबिक, ‘अपने खिलाफ आपराधिक मामले बताने वाले 142 विधायकों में से 70 (49 फीसदी) ने बताया है कि अदालत उनके खिलाफ पहले ही आरोप तय कर चुकी है।’ 11 विधायकों पर हत्या या हत्या के प्रयास का मामला दर्ज है। इनमें से चार राष्ट्रीय जनता दल के हैं। </strong></p>
<p>एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच (एनईडब्ल्यू) की ओर से किए गए विश्लेषण में देश भर में राज्य विधानसभाओं और केंद्रशासित प्रदेशों में वर्तमान विधायकों की ओर से चुनाव लड़ने से पहले दायर किए गए शपथ पत्रों की पड़ताल की गई और संबंधित विवरण प्राप्त किया गया। विश्लेषण में 28 राज्य विधानसभाओं और दो केंद्र शासित प्रदेशों में 4,033 में से कुल 4,001 विधायकों का विवरण शामिल है। एडीआर ने कहा कि विश्लेषण में शामिल विधायकों में से 1,136 या लगभग 28 प्रतिशत ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं, जिनमें हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित आरोप शामिल हैं। </p>
<p>इस रिसर्च में खुलासा हुआ है कि बिहार के 67 फीसदी विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। बिहार के 242 विधायकों में से 161 विधायक दागी हैं। यानी इन पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। विधायकों के आंकड़ों को देखें तो केरल में 135 में से 95 विधायकों यानी 70 प्रतिशत ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। इसी तरह दिल्ली में 70 में से 44 विधायक (63 प्रतिशत), महाराष्ट्र में 284 में से 175 विधायक (62 प्रतिशत), तेलंगाना में 118 विधायकों में से 72 विधायक (61 प्रतिशत) और तमिलनाडु में 224 विधायकों में से 134 (60 प्रतिशत) ने अपने हलफनामे में स्वयं के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले घोषित किए हैं।</p>
<figure id="attachment_6314" aria-describedby="caption-attachment-6314" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6314" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Bihar-Vidhan-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6314" class="wp-caption-text">​बिहार विधान सभा</figcaption></figure>
<p>कैलाशपति मिश्र (1980-81/1984-87), इन्दर सिंह नामधारी (1988-90), ताराकांत झा (1990-93), अश्वनी कुमार (1994-96), यशवंत सिन्हा (1997-98), नन्द किशोर यादव (1998-2003), गोपाल नारायण सिंह (2003-05), सुशील कुमार मोदी (2005-06), राधा मोहन सिंह (2006-10), सी.पी. ठाकुर (2010-13), मंगल पांडे (2013-16), नित्यानंद राय (2016-19), संजय जायसवाल (2019-23), सम्राट चौधरी (2023-24) और दिलीप कुमार जायसवाल (2024 से अब तक) ये सभी पिछले 44 वर्षों में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने। सवाल यह है कि इन लोगों के कार्यकाल में भाजपा मजबूत हुआ, पार्टी मजबूत हुयी, भाजपा में बिहार के मतदाताओं का रुझान क्या रहा, यह इस बात का ,प्रमाण है कि आज भी 43 विधायकों के साथ नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं और भाजपा के नेता उप-मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं। 2015 में विधानसभा में भाजपा के विधायकों की संख्या भले 53 से बढ़कर 17वीं विधानसभा में 74 हो गया हो; लेकिन यह संख्या भाजपा की अपनी नहीं है। यह संख्या नीतीश कुमार द्वारा दान स्वरुप हैं। 2015 में जनता दल यूनाइटेड की विधानसभा में संख्या 71 थी, जो 17वीं विधानसभा में 43 हो गयी। राष्ट्रीय जनता दल की संख्या भले 80 से घटकर 75 हो गया हो, लेकिन आज भी मतदाताओं के बीच उसकी पकड़ है। </p>
<p><strong>​क्रमशः &#8230;..</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/criminalization-of-politics-versus-politicization-of-officials-in-bihar">​बिहार का सत्यानाश(10)😢 राजनीति का अपराधीकरण बनाम अधिकारियों का राजनीतिकरण, कहते हैं बिहार का विकास करेंगे👁मतदाता कपार पीट रहा है😢वे समझते हैं ताली बजा रहा है😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/criminalization-of-politics-versus-politicization-of-officials-in-bihar/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>1</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>​बिहार का सत्यानाश (भाग-1) विशेष कहानी : चारा चोर-चारा चोर चिल्लाते, नारा लगाते सभी विधानसभा, लोकसभा, राज्य सभा में बैठते गए, मतदाता बाएं के स्थान पर दाहिनी तर्जनी पर अमिट स्याही लगाते गए​</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/shouting-fodder-thief-fodder-thief-they-kept-sitting-in-the-houseajya-sabha</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/shouting-fodder-thief-fodder-thief-they-kept-sitting-in-the-houseajya-sabha#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 10 Jan 2025 13:22:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[assembly]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[cbi]]></category>
		<category><![CDATA[election]]></category>
		<category><![CDATA[fodder]]></category>
		<category><![CDATA[lalu yadav]]></category>
		<category><![CDATA[leaders]]></category>
		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
		<category><![CDATA[scam]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=6012</guid>

					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : विगत पाँच, दस, पंद्रह वर्षों में बिहार के मतदाता अपने अपने प्रदेश में यदि भ्रष्टाचार का कोई मामला देखे हों, क़ानून-व्यवस्था में गिरावट की बात सुने हों, रोज़ी-रोज़गार का कोई मामला सामने आया हो, शिक्षा के पतन के बारे में घरना-जुलूस निकला हो, महिलाओं का बलात्कार हुआ हो, गरीब-गुरबा को [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/shouting-fodder-thief-fodder-thief-they-kept-sitting-in-the-houseajya-sabha">​बिहार का सत्यानाश (भाग-1) विशेष कहानी : चारा चोर-चारा चोर चिल्लाते, नारा लगाते सभी विधानसभा, लोकसभा, राज्य सभा में बैठते गए, मतदाता बाएं के स्थान पर दाहिनी तर्जनी पर अमिट स्याही लगाते गए​</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : विगत पाँच, दस, पंद्रह वर्षों में बिहार के मतदाता अपने अपने प्रदेश में यदि भ्रष्टाचार का कोई मामला देखे हों, क़ानून-व्यवस्था में गिरावट की बात सुने हों, रोज़ी-रोज़गार का कोई मामला सामने आया हो, शिक्षा के पतन के बारे में घरना-जुलूस निकला हो, महिलाओं का बलात्कार हुआ हो, गरीब-गुरबा को गोली से छल्ली किया गया हो, रिश्वत या फिरौती नहीं देने पर अपहरण हुआ हो, तो सभी  मुद्दों को ज़मीन में दफ़ना दीजिए, संदूक में बंद कर दीजिए। भारत का चुनाव आयोग बिहार में विधान सभा चुनाव के लिए तारीख़ की घोषणा करने जा रहा है। अगर उन मामलों को दफ़नाने में आप चूक गये, संदूक में बन कर चाभी गंगा मैया को देना भूल गये तो यक़ीन कीजिए आप मतदाता फिर से चुनावी जाल में, नेताओं की चाल में फँसने जा रहे हैं।</strong> </p>
<p>यकीन नहीं होता तो उदहारण पर नजर दीजिये। सबसे बड़ा दृष्टांत यह है कि पिछले दो दशक में चारा चोर &#8211; चारा चोर का चिचियाकर नारा देने वाला अनपढ़, अशिक्षित, बदमाश, दबंग सभी विधायक बन गए। मंत्री बन गए। संत्री बन गए। लोक सभा और राज्य सभा का सांसद बन गए। इतना ही नहीं, जिसे भारत का कार्यपालिका, विधानपालिका और न्यायपालिका भ्रष्टाचार का नेता घोषित कर लाखों-करोड़ों रुपये का दंड ठोका, उनके घर में दो विधायक और दो सांसद बन गए और आप मतदाता फिर से अपने दाहिने और बायें हाथ की तर्जनी उँगली में नहीं छूटने वाला रोशनाई लगाने के लिए सज्ज हो रहे हैं। </p>
<blockquote><p>कभी सोचे कि चारा घोटाला का मामला नब्बे के दशक के उत्तरार्ध पुलिस के पास और न्यायालय में आया और उसी कालखंड में जन्म लिए कभी मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं छोड़ने वाले अभियंता नीतीश कुमार। उसी कालखंड में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के पूर्व निदेशक (अब दिवंगत) जोगिन्दर सिंह का किताब INSIDE CBI का प्रकाशन हुआ जिसमें चारा घोटाला का वर्णन सिंह साहब चौपाई में किये। इनसाइड सीबीआई के रचयिता और कुमार साहेब का यह जन्म-जन्मांतर वाला सम्बन्ध आने वाले दिनों में एक वृहत शोध का विषय होगा। </p></blockquote>
<figure id="attachment_6014" aria-describedby="caption-attachment-6014" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/F-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/F-3.jpg" alt="" width="2048" height="1290" class="size-full wp-image-6014" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/F-3.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/F-3-300x189.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/F-3-1024x645.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/F-3-768x484.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/F-3-1536x968.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6014" class="wp-caption-text">दो मित्र-दो नेता-दो मुख्यमंत्री-एक बहुत &#8211; एक वर्तमान</figcaption></figure>
<p>चारा घोटाला में भले हज़ारों करोड़ रुपये का चपत लगा हो सरकारी कोषों को, उस मुकदमें पर सरकारी कोष से भले कई सौ करोड़ रूपये खर्च किये गए हों; अंततः चारा घोटाला में लिप्त वे सभी व्यक्ति लाभान्वित हुए तो इस कांड में लिप्त थे, जो चारा-चोर, चारा-चोर का नारा लगाए, जो विभिन्न भारतीय भाषाओँ में किताबों का प्रकाशन किये। कभी सोचे कि नीतीश कुमार के अलावे प्रदेश में मुख्यमंत्री पद पर कोई अन्य व्यक्ति क्यों नहीं आसीन हो पाए? नहीं न। आप आगामी चुनाव में फिर नया नारा सुनने की प्रतीक्षा करें, ठगने-ठगाने का इंतज़ार करें, तर्जनी वाली ऊँगली पर कभी नहीं छूटने वाला रोशनाई लेपने की प्रतीक्षा करें और फिर सामाजिक क्षेत्र के संचार साधनों पर तस्वीर चिपकाएं। वैसे भारत में तथाकथित रूप से बड़े-बड़े लोग, मतदाता, चाहे पुरुष हों तय महिला, नहीं जानते की किस हाथ की किस ऊँगली में रोशनाई लगनी चाहिए मतदान के समय। </p>
<p>राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के सरदार पटेल चौक के बाएं भारत का निर्वाचन आयोग के प्रवेश द्वार पर संतरियों का मानना है कि बिहार में राजनीतिक गतिविधियां शीघ्र ही कछुए की चाल से चीता की चाल में तब्दील होने वाली है। आगामी चुनाव में अपनी-अपनी टोपी उछालने वाले दिन-रात मेहनत कर, निजी क्षेत्र लोगों को नियोजन देकर &#8216;झूठ-सच&#8217; बातों का पुलिंदा चुनाव प्रचार-प्रसार में लाउडस्पीकर पर चिल्लाने के लिए तैयार हो रहे हैं। &#8216;फलनमा&#8217; डकैत है, फलनमा &#8216;जनता का अहित किया है&#8217;, फलनमा प्रदेश को लूट लिया है &#8211; जैसे नारों से पटना का गाँधी मैदान जल्द ही गूंजने वाला है। दिल्ली के कई शैक्षणिक संस्थानों में राजनीतिक शास्त्र, सांख्यिकी के छात्र-छात्राओं का विशाल समूह आंकड़ों के साथ सज्ज हो रहा है, आखिर कैसे मतदाताओं को ठगा जाए । जाति के आधार पर गणित का गुणनफल निकाला जाए। अल्पसंख्यकों को उनके झोले से निकालकर अपने झोले में डाला जाए।  </p>
<p>2020 के चुनाव के बाद एक विश्लेषण में कहा गया कि बिहार विधानसभा के 243 नवनिर्वाचित सदस्यों में से 162 करोड़पति हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और बिहार इलेक्शन वॉच द्वारा किए गए विश्लेषण में कहा गया था कि &#8220;इस साल बिहार विधानसभा में कुल 67 प्रतिशत निर्वाचित प्रतिनिधि करोड़पति हैं, जबकि 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान विश्लेषण किए गए 228 विधायकों में से 45 विधायक, यानी 20 प्रतिशत, करोड़पति थे।&#8221; 243 नवनिर्वाचित विधायकों के हलफनामों के अध्ययन के अनुसार, 162 में से 14 विधायकों के पास 10 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति है। राजद के 80 में से 51 विधायक, जदयू के 71 में से 53 विधायक, भाजपा के 53 में से 32 विधायक, कांग्रेस के 27 में से 19 विधायक, रालोसपा के दो में से एक विधायक और लोजपा के दोनों विधायक करोड़पति हैं। </p>
<p>बिहार की सबसे अमीर विधायक खगड़िया से पूनम देवी यादव के पास 41 करोड़ रुपए से ज़्यादा की संपत्ति है, जो मौजूदा विधायकों की औसत संपत्ति से लगभग 14 गुना ज़्यादा है। सूची में दूसरे नंबर पर भागलपुर के अजीत शर्मा हैं, जिनके पास 40 करोड़ रुपए की संपत्ति है। उनकी चल संपत्ति 3.7 करोड़ रुपये है, जबकि उनकी अचल संपत्ति जैसे भूमि, संपत्ति और संपदा 36.7 करोड़ रुपये की है। मोकामा विधायक अनंत कुमार सिंह ने कुल 28 करोड़ रुपये की संपत्ति दर्ज की, जिसमें भूमि और संपत्ति लगभग 25 करोड़ रुपये है। शेष 2.8 करोड़ रुपये चल संपत्ति हैं। अनंत कुमार सिंह 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में चुनाव लड़ रहे सबसे अमीर उम्मीदवार भी हैं, जिनकी कुल संपत्ति तीन गुना बढ़कर 68 करोड़ रुपये हो गई है। कुमार के खिलाफ सबसे ज्यादा आपराधिक मामले भी दर्ज हैं। इसके विपरीत, रानीगंज के विधायक अचमित ऋषिदेव ने सबसे कम 9.8 लाख रुपये की संपत्ति दर्ज की।</p>
<figure id="attachment_6015" aria-describedby="caption-attachment-6015" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/F-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/F-4.jpg" alt="" width="2048" height="1363" class="size-full wp-image-6015" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/F-4.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/F-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/F-4-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/F-4-768x511.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/F-4-1536x1022.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6015" class="wp-caption-text">पिता-पुत्र यानी एक पूर्व मुख्यमंत्री, एक पूर्व-उप-मुख्यमंत्री एयर एक पूर्व स्वास्थ्य मंत्री</figcaption></figure>
<p><strong>अगर प्रदेश के राजनेता अपने-अपने कलेजे पर हाथ रखकर स्वयं से पूछें तो इस बात से इंकार नहीं कर सकेंगे की सन 1975 जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के बाद अभी तक जितने भी नेता, मंत्री, संत्री, विधायक, सांसद बने, प्रदेश के विकास की तुलना में स्वयं का विकास अधिक महत्व दिए। भारत के चुनाव आयोग को दिए गए शपथ पत्र और संपत्ति विवरण इस बात का गवाह है कि राजनीति इनके लिए सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ-साथ शायद व्यवसाय भी है, अन्यथा इतनी संपत्ति की प्रचुरता के बाद प्रदेश का, विधानसभा क्षेत्र के उनके मतदाताओं की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक स्थिति इतनी दरिद्र क्यों है ? क्या वे सच में चाहते हैं कि उनके विधानसभा अथवा संसदीय क्षेत्र के मतदाता सच में समृद्ध हों, विकसित हों, शिक्षित हों, विचारवान हों।  शायद नहीं।</strong> </p>
<blockquote><p>जिन लोगों ने &#8216;भ्रष्टाचार&#8217; का नारा बुलंद कर, गिरती, लुढ़कती विधि-व्यवस्था को अपने नारों में प्रमुखता देकर मतदाता को बरगलाये, चुनाव जीते, वे तो समाज और राजनीतिक व्यवस्था में &#8216;संभ्रांत&#8217; हो गए, मतदाता वहीँ का वहीँ कहीं पांच तो कहीं तीन डिग्री के तापमान में, पेट-पीठ एक किये, कल भी कलपती थी, कराहती थी, आज भी कलाप रही है, कराह रही है। यही उसका प्रारब्ध है क्योंकि शहरों में 60-65 % और ग्रामीण क्षेत्रों में 35-45 % साक्षरता दर पर, 90 % बेरोजगारी पर &#8211; इससे अधिक सोच भी नहीं सकते हैं।</p></blockquote>
<p>चलिए जब भ्रष्टाचार की बात उठी तो नई दिल्ली के सीजीओ परिसर चलते हैं जहाँ केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) का दफ्तर है। नब्बे के दशक में ब्यूरो में जो अधिकारी थे, वे सभी अवकाश प्राप्त कर लिए क्योंकि वे सभी साठा हो गए। यह बात ब्यूरो में ही नहीं, देश और प्रदेश के किसी भी संस्था में काम करने वाले कर्मी से लेकर अधिकारी के लिए लागु होता है। जैसे ही साठा होते हैं, वे काम करने लायक नहीं रहते। उन्हें अवकाश ग्रहण करना पड़ता हैं। अपवाद छोड़कर (जो नेताओं चाहे मुख्यमंत्री हों या प्रधानमंत्री, के नीली आँख वाले अगर हैं तो साठ ही नहीं,  जीवन के अंतिम सांस तक काम करने लायक रहते हैं, चाहे हाथ-पैर थरथराये या बोली लड़खड़ाए। विश्वास नहीं है तो चश्मा लगाकर, आँख फाड़कर देख लीजिये। </p>
<p>ब्यूरो के एक अधिकारी कहते हैं कि &#8216;स्वतंत्र भारत में दर्जनों भ्रष्टाचार कांड हुए लेकिन नब्बे के दशक में पशुओं के चारा के नाम पर जो गबन हुआ, शायद इतिहास में काले अक्षर में ही दर्ज रहेगा। बहु-अरब डॉलर का पशुपालन विभाग घोटाला, जिसे आम तौर पर चारा घोटाला के रूप में जाना जाता है, 1990 के दशक के मध्य में उजागर हुआ था, जिसमें कथित तौर पर स्कूटर और मोटरसाइकिल पंजीकरण संख्या वाले ट्रकों और लॉरियों पर पशु चारा की आपूर्ति की गई थी। इस मामले में कई राजनेताओं को दोषी पाया गया और उन्हें विधानसभा और संसद में अपने पदों से इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा। इतना संवेदनशील होने के बावजूद कि यह घोटाला 1996 में सामने आया था। </p>
<p>लालू प्रसाद यादव मंत्रिमंडल में तत्कालीन पशुपालन मंत्री रामजीवन सिंह ने विधानसभा में इस मुद्दे को उठाया और सीबीआई जांच का प्रस्ताव रखा। हालांकि, लालू प्रसाद के नेतृत्व वाले प्रशासन, जिनके पास वित्त मंत्रालय भी था, ने कुछ नहीं किया। बाद में, जनवरी 1996 में, तत्कालीन वित्त आयुक्त वी.एस. दुबे ने अमित खरे को चाईबासा में जिला कोषागार से अत्यधिक और धोखाधड़ी से निकासी की जांच करने का काम सौंपा। </p>
<p>कहा जाता है कि यह घोटाला सरकारी अधिकारियों द्वारा गलत व्यय रिपोर्ट दाखिल करने के छोटे पैमाने पर गबन से शुरू हुआ था, लेकिन समय के साथ यह बढ़ता गया और राजनेताओं और व्यापारियों सहित और भी प्रतिभागियों को इसमें शामिल किया गया, जब तक कि यह एक पूर्ण माफिया नहीं बन गया। घोटाले के बारे में जानने का आरोप लगने वाले पहले मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा थे, जो 1970 के दशक के मध्य में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। सीबीआई ने चाईबासा कोषागार मामले में पहली एफआईआर 27 मार्च 1996 को दर्ज की थी। केंद्रीय जांच ब्यूरो की विशेष अदालत द्वारा अनेक लोगों के विरुद्ध कार्रवाई हुए लेकिन इस काण्ड में लालू प्रसाद यादव को दोषी ठहराया गया। </p>
<p><strong>अधिकारी कहते हैं कि तब आइए, नतीजा पर। जब से इस काण्ड में लालू यादव का नाम आया, ब्यूरो, अदालत उन्हें दोषी पाने लगा, उनकी कुर्सी गयी। वे सत्ता के शरीर से बाहर हो गए। लेकिन पिछले दो दशकों में अगर प्रदेश की राजनीतिक व्यवस्था पर नजर डालें तो प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (जिनका नाम भी आया था प्रारम्भ में) हों, या दिवंगत सुशील कुमार मोदी हों, या वर्तमान में जनतादल यूनाइटेड के राज्यसभा सदस्य संजय झा हों, चारा घोटाला से भले मौद्रिक लाभ नहीं हुआ हो, लेकिन सत्ता की गलियारे में कुर्सी पर विराजमान होना &#8211; इत्तिफाक नहीं, बल्कि उसी का परिणाम है।</strong></p>
<p>इतना ही नहीं, आज के बिहार की अनुमानित जनसख्यां 132,790,000 में सिर्फ लालू प्रसाद यादव और उनका ही परिवार इतना दक्ष है कि विधान सभा से लेकर संसद तक उनकी पत्नी, उनके बाल-बच्चे, सगे सम्बन्धी बैठें &#8211; यह मूलतः तमाचा है सम्पूर्ण व्यवस्था पर, चाहे राजनीतिक हो विधि-विधान हो, न्यायिक हो। लालू यादव तो 29 वर्ष की आयु में संसद पहुंचे थे, लेकिन उनका छोटका पुत्र तेजस्वी यादव 26 साल की आयु में प्रदेश का उप-मुख़्यमंत्री बन गया। यह कार्य न तो प्रदेश का या केंद्र का मंत्रिमंडल कार्यालय अधिसूचना निकालकर उन्हें रखा, बल्कि प्रदेश के लोग ही चुने &#8211; पूरे परिवार को। फिर दोषी कौन है?</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/INSIDE-CBI-fotor.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/INSIDE-CBI-fotor.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="aligncenter size-full wp-image-6016" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/INSIDE-CBI-fotor.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/INSIDE-CBI-fotor-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/INSIDE-CBI-fotor-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/INSIDE-CBI-fotor-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/INSIDE-CBI-fotor-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p>चारा घोटाला के मामले में कई जनहित याचिकाएं दायर की गयी, जिसमें तीन व्यक्ति &#8211; सुशील मोदी, सरयू राय और शिवानंद तिवारी &#8211; प्रमुख थे । याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने 11 मार्च, 1996 को अपने आदेश में कहा, “राज्य के अनुसार, विभाग में अतिरिक्त निकासी 1977-78 से हो रही है। मेरा मानना है कि प्रस्तावित जांच और जांच 1977-78 से 1995-96 तक की पूरी अवधि को कवर करनी चाहिए। मैं सीबीआई को उसके निदेशक के माध्यम से निर्देश देता हूं कि वह 1977-78 से 1995-96 की अवधि के दौरान बिहार राज्य में पशुपालन विभाग में अतिरिक्त निकासी और व्यय के सभी मामलों की जांच और छानबीन करे तथा जहां निकासी धोखाधड़ी की प्रकृति की पाई जाए, वहां मामला दर्ज करे और उन मामलों में जांच को यथाशीघ्र, बेहतर होगा कि चार महीने के भीतर, तार्किक निष्कर्ष तक ले जाए।&#8221; एजेंसी ने राज्य पुलिस द्वारा पहले से दर्ज 41 मामलों की जांच शुरू की, और पटना उच्च न्यायालय के आदेश के बाद खुफिया रिपोर्टों और शिकायतों के आधार पर 23 मामले दर्ज किए गए। कुल मिलाकर, सीबीआई ने चारा घोटाले के चौसठ मामलों की जांच की। 27 मार्च, 1996 को, सीबीआई ने चाईबासा कोषागार मामले में पहली प्राथमिकी दर्ज की।</p>
<p><strong>क्रमशः</strong> </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/shouting-fodder-thief-fodder-thief-they-kept-sitting-in-the-houseajya-sabha">​बिहार का सत्यानाश (भाग-1) विशेष कहानी : चारा चोर-चारा चोर चिल्लाते, नारा लगाते सभी विधानसभा, लोकसभा, राज्य सभा में बैठते गए, मतदाता बाएं के स्थान पर दाहिनी तर्जनी पर अमिट स्याही लगाते गए​</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/shouting-fodder-thief-fodder-thief-they-kept-sitting-in-the-houseajya-sabha/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>अटल बिहारी वाजपेई के महाप्रस्थान के साथ ही भाजपा में शुष्कता, कर्कषता उग आई है। कटाक्ष, फबती, छींटाकशी, दिल्लगी, ठिठोली, चुटकियां सब खत्म हो गए</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/head-prowess/with-the-great-departure-of-atal-bihari-vajpayee-dryness-harshness-has-increased-in-bjp</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/head-prowess/with-the-great-departure-of-atal-bihari-vajpayee-dryness-harshness-has-increased-in-bjp#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 28 Apr 2023 14:01:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मुखियाजी उवाच]]></category>
		<category><![CDATA[bjp]]></category>
		<category><![CDATA[congress]]></category>
		<category><![CDATA[leaders]]></category>
		<category><![CDATA[modi]]></category>
		<category><![CDATA[vajpayee]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=4889</guid>

					<description><![CDATA[<p>भाजपाइयों में व्यंगबोध ओझल हो रहा है। कल (27 अप्रैल 2023) जब कर्नाटक चुनाव अभियान में कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खड़गे ने नरेंद्र मोदी को नाग कह दिया तो बिफर कर निर्मला सीतारमन ने बवाल मचाया। अरे ! उसी लहजे में वे कह देतीं कि “सोनिया गांधी नागिन है।” शाब्दिक हिसाब बराबर हो जाता। जोड़ीदारी भी। [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/head-prowess/with-the-great-departure-of-atal-bihari-vajpayee-dryness-harshness-has-increased-in-bjp">अटल बिहारी वाजपेई के महाप्रस्थान के साथ ही भाजपा में शुष्कता, कर्कषता उग आई है। कटाक्ष, फबती, छींटाकशी, दिल्लगी, ठिठोली, चुटकियां सब खत्म हो गए</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>भाजपाइयों में व्यंगबोध ओझल हो रहा है। कल (27 अप्रैल 2023) जब कर्नाटक चुनाव अभियान में कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खड़गे ने नरेंद्र मोदी को नाग कह दिया तो बिफर कर निर्मला सीतारमन ने बवाल मचाया। अरे ! उसी लहजे में वे कह देतीं कि “सोनिया गांधी नागिन है।” शाब्दिक हिसाब बराबर हो जाता। जोड़ीदारी भी। मगर मोदी का खड़गे को जवाब उम्दा व्यंग है। खड़गे बोले कि वे कांग्रेस सरकार की गारंटी लेते हैं, मतलब पक्का वादा। व्यापारी प्रदेश गुजरात के मोदी बोले : “आपकी तो वारंटी ही खत्म हो गई। गारंटी का सवाल कहां रहा है ?” लेकिन प्रतीत होता है कि अटल बिहारी वाजपेई के महाप्रस्थान के साथ ही भाजपा में शुष्कता, कर्कषता उग आई है। कटाक्ष, फबती, छींटाकशी, दिल्लगी, ठिठोली, चुटकियां सब खत्म हो गए।</strong></p>
<p>अटलजी का ही एक उदाहरण है। तब (मई 1975) में गुजरात विधानसभा का मध्यावर्ती निर्वाचन हो रहा था। कांग्रेस बनाम अन्य के बीच संग्राम था। अटल बिहारी वाजपेई ने तब बरगद के वृक्ष (सोशलिस्ट पार्टी) के लिए वोट मांगे, तो जॉर्ज फर्नांडिस दीपक (जनसंघ) के लिए। दोनों मिलकर सूत-कातती महिला (संस्था कांग्रेस) के लिए। उस समय अहमदाबाद के रूपाली सिनेमा के सामने ही एक जनसभा हुई। जनता मोर्चा वाली, 1977 की जनता पार्टी का प्रथम अवतार थी। अटल जी के भाषण के अंत में मैंने पूछा : “कुछ संजय गांधी की मारुति छोटी कार्य योजना पर बोलिए।” तब मैं “टाइम्स ऑफ इंडिया” का रिपोर्टर था। </p>
<p>अपने चिरपरिचित शैली में अटलजी बस तीन शब्द बोले : “मां रोती है।” सारे श्रोता हंस दिये। यह पैना, अर्थभरा कटाक्ष था। मिलता जुलता एक और वाकया हुआ जब 2014 के संसदीय चुनाव में कांग्रेस की संख्या घट कर 44 रह गई थी। तो एक भाजपायी नेता ने कहा : “सिर्फ एक वोल्वो लायक रह गये।” इस बस में 45 ही बैठ सकते हैं। उसी चुनावी दौर में कांग्रेस अध्यक्षा तथा प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी अभियान पर गुजरात आईं। एक सभा में बोलीं : “मैं गुजरात की बहू हूं।” आधार था कि उनके पति स्व. फिरोज जहांगीर गांधी दक्षिण गुजरात के नवसारी शहर से इलाहाबाद बसने आए थे। इस पर सोशलिस्ट नेता मधु लिमए ने पूछा : “तो आप रोम जाएंगी चुनाव प्रचार में, तो दावा करेंगी कि आप इटली की सास हैं ?” जसपाल भट्टी इसीलिए कहा करते थे : “व्यंग बड़ा गंभीर विषय है। दिमाग की कारीगरी।”</p>
<p>हास्य, विडंबना, अतिशयोक्ति या लोगों की मूर्खता और कुरीतियों को उजागर करने और उनकी आलोचना करने के लिए उपहास का ही उपयोग व्यंग में होता है। “राजनीतिक परिदृश्य में तो व्यंग्य में विडंबना उग्रवादी होती है”, साहित्यिक आलोचक नॉर्थरोप फ्राइ ने कहा था। उदाहाणार्थ (मनमोहन सिंह के दौर में) कांग्रेसी मंत्रियों से घरेलू नाई अक्सर पूछते थे स्विस बैंक और काले धन के बारे में। एक बार किसी मंत्री ने डांटा, तो नाई बोला : “सर आपके रोयें खड़े हो जाते हैं तो उस्तुरा चलाने में सुभीता होता है।” </p>
<p>किसी गुजराती ने बंगाली से पूछा कि प्रधानमंत्री और बंगाल की मुख्यमंत्री में क्या फर्क है ? जवाब में बंगाली बोला : “बस सूती साड़ी और रेशमी कुर्ता पैजामा का।” भोपाल के एक पत्रकार ने दिग्विजय सिंह की तुलना गांधार नरेश शकुनी से की थी क्योंकि दोनों खानदानी सत्ता के हिमायती रहे और युवराज को राज दिलाने के पक्षधर रहे। यूपी के एक वोटर से एक मलयाली पत्रकार ने पूछा कि राहुल गांधी वायनाड में जीते, अमेठी से हारे क्यों ? तो जवाब मिला : “यही तो अंतर है साक्षरता में और समझ में।” किसी ने पूछा कि मुख्यमंत्री बनने पर भगवंत सिंह मान में क्या परिवर्तन दिखा ? जवाब था : “पहले वे जोकर के रोल में मजाक करते थे। अब मुख्यमंत्री के रूप में।” </p>
<p>ऑस्कर फिल्म एवार्ड के लिए एक भारतीय राजनेता का नामांकन मांगा गया। सरदार मनमोहन सिंह का नाम प्रस्तावित हुआ। कारण ? वे दस वर्ष तक प्रधानमंत्री का अभिनय करते रहे। तो किसी ने पूछा कि राजनेता और डाइपर (शिशुओं वाला) में क्या समानता है ? बताया गया कि दोनों को बदलते रहना चाहिए। किसी सुनसान स्थान पर एक रहजन ने किसी व्यक्ति को छूरा दिखाकर कहा : “सारे रूपये दे दो।” वह व्यक्ति बोला : “मैं सांसद हूं।” तो उस लुटेरे ने कहा : “तो अब तक हमसे लूटे गए रूपये वापस करो।”</p>
<p>श्रेष्ठतम राजनीतिक कटाक्ष था अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पर। वे बड़े रूपवान और पौरुषग्रंथि वाले रहे। दुबारा नामांकन कर रहे थे। एक सर्वेक्षण में महिलाओं से पूछा गया कि “क्लिंटन के साथ कौन-कौन यौनाचार करना चाहेंगी।” नब्बे प्रतिशत महिलाओं का (इस मोनिका लेविंस्की के प्रेमी के बारे में) जवाब था : “अब दुबारा नहीं।” </p>
<p>कर्नाटक के ताजा आरोप-प्रत्यारोप के संदर्भ में एक खासियत है। कांग्रेस और भाजपा के विचार में विलक्षण समानता है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ही बने रहें। पार्टी में वंशावली बनी रहेगी। भाजपा के लिए भी माकूल रहेगा। दूसरा  कूटनीतिक वृतांत। रोमानिया के निर्दयी कम्युनिस्ट तानाशाह निकोलाई चेचेस्कू फ्रेंच अभिनेत्री ब्रिगेटा वार्दोत के गहरे इश्क में पड़ गए। एक आत्मीय क्षण में अभिनेत्री ने अर्चना की : “राष्ट्रपति जी आप अपनी जनता को विदेश जाने की अनुमति दे दीजिए।” इस पर चेचेस्कू बोले : “प्रिये तुम कितनी रोमांटिक हो ! तुम्हारी इच्छा है कि रोमानिया में केवल तुम और मैं ही एकाकी रहें ?”</p>
<p>अब कर्नाटक चुनाव के संदर्भ में एक और वाकया। तब जोसेफ स्टालिन का युग था। एक रूसी मतदाता ने किसी अमेरिकी वोटर से कहा : “तुम्हारे देश में तो तुम लोगों को महीनों लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती है चुनाव परिणाम के लिए। सोवियत रूस में हम मतदान के पूर्व ही जान जाते हैं कि परिणाम क्या है।” अर्थात भारत में अभी लोकतंत्र हैं, परमात्मा उसे सलामत रखे !	</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/head-prowess/with-the-great-departure-of-atal-bihari-vajpayee-dryness-harshness-has-increased-in-bjp">अटल बिहारी वाजपेई के महाप्रस्थान के साथ ही भाजपा में शुष्कता, कर्कषता उग आई है। कटाक्ष, फबती, छींटाकशी, दिल्लगी, ठिठोली, चुटकियां सब खत्म हो गए</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/head-prowess/with-the-great-departure-of-atal-bihari-vajpayee-dryness-harshness-has-increased-in-bjp/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>शिक्षा प्रसार में बिहार के लोग &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; को और जमींदारों-राजाओं को नकेल कसने में &#8216;लौह पुरुष&#8217; को अगर भूल गए &#8230; तो समझिये इतिश्री देवाखंडे </title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/krishn-vallabh-sahay-the-iron-man-of-bihar</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/krishn-vallabh-sahay-the-iron-man-of-bihar#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 May 2022 08:07:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[chiefminister]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[kb sahar]]></category>
		<category><![CDATA[leaders]]></category>
		<category><![CDATA[paliganj]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[ramlakhan singh]]></category>
		<category><![CDATA[statistics]]></category>
		<category><![CDATA[yadav]]></category>
		<category><![CDATA[zamindar]]></category>
		<category><![CDATA[zamindari]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=4052</guid>

					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : आप माने अथवा नहीं। बिहार में जब भी &#8216;यादव&#8217; उपनाम पर चर्चा होगी, दो यादवों का नाम अवश्य आएगा और उनका भी नाम आएगा जो पिछड़ी जातियों के नाम पर &#8216;लच्छेदार राजनीतिक पराठे सकते&#8217; आये हैं। अब इसे उनका &#8216;सौभाग्य&#8217; कहिये या मतदाताओं का &#8216;दुर्भाग्य&#8217; &#8211; बिहार के लोग प्रारम्भ [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/krishn-vallabh-sahay-the-iron-man-of-bihar">शिक्षा प्रसार में बिहार के लोग &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; को और जमींदारों-राजाओं को नकेल कसने में &#8216;लौह पुरुष&#8217; को अगर भूल गए &#8230; तो समझिये इतिश्री देवाखंडे </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : आप माने अथवा नहीं। बिहार में जब भी &#8216;यादव&#8217; उपनाम पर चर्चा होगी, दो यादवों का नाम अवश्य आएगा और उनका भी नाम आएगा जो पिछड़ी जातियों के नाम पर &#8216;लच्छेदार राजनीतिक पराठे सकते&#8217; आये हैं। अब इसे उनका &#8216;सौभाग्य&#8217; कहिये या मतदाताओं का &#8216;दुर्भाग्य&#8217; &#8211; बिहार के लोग प्रारम्भ से &#8216;लपेटे&#8217; में आते रहे हैं। आज़ाद भारत में सन 1947 के बाद अगर बिहार की गलियों में चौथी पीढ़ी के मतदाता हो गए हैं, तो प्रदेश के विधानसभा और विधान परिषद् में भी &#8216;उस ज़माने के लोग&#8217; कहाँ बचे हैं। आज नीतीश कुमार, लालू यादव, सुशील मोदी, रवि शंकर प्रसाद, राधा मोहन सिंह, शत्रुघ्न सिन्हा, उपेंद्र कुशवाहा, मीरा कुमार, नन्द किशोर यादव, चिराग पासवान जैसे &#8216;जनता से कटे &#8211; कुर्सी से जुड़े&#8217; नेताओं को तो सभी जानते हैं; कोई &#8216;अनुयायी&#8217; हैं तो कोई &#8216;पिछलग्गू&#8217; &#8211; लेकिन आज बिहार के चौथी पीढ़ी के मतदाता शायद &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; और बिहार के &#8216;लौह पुरुष&#8217; को जानता होगा। </strong></p>
<p>#आर्यावर्त #इण्डियन नेशन अखबार उन दोनों &#8216;महामानवों&#8217; को देखा है और आज के परिपेक्ष में ही नहीं, आने वाले समय में भी, जब भी लिखने की बात होगी &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; और बिहार का &#8216;लौह पुरुष&#8217; को एक दूसरे से अलग रखकर शब्दबद्ध नहीं किया जा सकता है। अन्य राजनीतिक गतिविधियों पर चर्चाएं होंगी, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उस ज़माने में &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; शिक्षा के प्रचार-प्रसार के प्रति बहुत अधिक प्रतिबध्द थे। सामाजिक क्षेत्र के मीडिया के अभ्युदय और शब्दकोषों में बदलते शाब्दिक अर्थों के मद्दे नजर अगर आज की मीडिया &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; को शिक्षा जगत से जोड़कर देखेगी तो तत्काल उन्हें &#8216;शिक्षा माफिया&#8217; शब्द से अलंकृत करने में तनिक भी बिलम्ब नहीं करेगी। </p>
<p>लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकत है कि अविभाजित बिहार में &#8216;आरएलएसवाई&#8217; नामक शैक्षिक संस्थाओं का प्रदेश में &#8216;शैक्षिक-दर&#8217; बढ़ाने में योगदान अवश्य है, चाहे &#8216;पांच फ़ीसदी&#8217; ही क्यों न हो। अगर पांच फीसदी को ही आधार माने तो वर्तमान मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार के साथ-साथ प्रदेश के आला अधिकारी अगर प्रदेश का शैक्षिक दर 69.83 का आंकड़ा मानते हैं तो स्वाभाविक है कि &#8216;आरएलएसवाई&#8217; का पांच फ़ीसदी योगदान है। इससे भी बड़ी बात यह है कि कुछ देर के लिए अगर &#8216; शेर-ए-बिहार&#8217; को उस ज़माने के &#8216;शिक्षा माफिया&#8217; मान भी लें, तो बिहार के मतदाता से लेकर जो मतदान के दिन घर से नहीं निकलते हैं, इस बात को स्वीकार अवश्य करेंगे की &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; के बेटे के पास &#8216;स्नातक&#8217; का प्रमाण पत्र अवश्य है। जबकि सन नब्बे से 2005 तक प्रदेश का बागडोर सँभालने वाले &#8216;यादवों की अगली पीढ़ी के नेता&#8217; के बेटों ने दसवीं-बारहवीं का प्रमाण पत्र भी नहीं प्राप्त कर सके। यानी  मानसिकता में &#8216;अंतर&#8217; तो है, जहाँ तक शिक्षा का सवाल है। खैर। </p>
<figure id="attachment_4054" aria-describedby="caption-attachment-4054" style="width: 640px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3.jpeg" alt="" width="640" height="629" class="size-full wp-image-4054" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3.jpeg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3-300x295.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3-24x24.jpeg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3-48x48.jpeg 48w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4054" class="wp-caption-text"><br />श्री कृष्ण बल्लभ सहाय और उनका परिवार।  साल 1963</figcaption></figure>
<p><strong>बहरहाल, आप माने या नहीं, जब &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; वृद्ध हो गए, तब बिहार की राजनीतिक मानचित्र पर लालू यादव अवतरित हुए थे &#8211; &#8216;स्वयंभू यादव नेता&#8217; बनकर। वैसे लालू यादव स्वयं को यादवों का, दलितों का, प्रदेश के गरीब-गुरबों का &#8216;स्वयंभू&#8217; नेता कह लें, हकीकत तो यह है कि असली नेता तो रामलखन सिंह यादव थे जो सं 1952 से 1991 तक बिहार विधान सभा में मुस्तैद रहे। जिसका हुए, उसका कभी हाथ नहीं छोड़े और जिसका नहीं हुए, उसका कभी ऊँगली भी नहीं पकड़े। सं 1991 में बिहार विधान सभा से निकलकर दिल्ली लोक सभा में विराजमान हुए। रसायन और उर्वरक के कैबिनेट मंत्री बने, बिहार की राजनीतिक इतिहास में, खासकर शिक्षा के विस्तार और विकास के अध्याय में जो पन्ने लिखे, जोड़े; आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी उस पन्ने से अधिक पन्ना कोई नहीं लिख सका।</strong> </p>
<p>&#8216;दहशत&#8217; था &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; का &#8216;सम्मान&#8217; के साथ। &#8216;लोग&#8217; दूर से डरते अवश्य थे, लेकिन पास आते ही पिघल जाते थे। लोग घबराते जरूर थे, लेकिन &#8216;थरथराते&#8217; नहीं थे। आज के नेता इस सम्मान के बारे में सोच नहीं सकते, चाहे &#8216;ब्राह्मण&#8217; हों, &#8216;क्षत्रिय&#8217; हो, &#8216;वैश्य&#8217; हो, &#8216;शूद्र&#8217; हो, &#8216;यादव&#8217; हों, &#8216;कुर्मी&#8217; हो, &#8216;कायस्थ&#8217; हो, &#8216;पासवान&#8217; हो, &#8216;कुशवाहा&#8217; हो; क्योंकि &#8216;सम्मान&#8217; &#8216;अर्जित&#8217; किया जाता है बहुत मसक्कत से, और वर्तमान राजनीतिक गलियारे में, चाहे पटना का सरपेंटाइन रोड हो या दिल्ली का संसद मार्ग औसतन 90 फीसदी से अधिक नेतागण उस सम्मान से कोसों दूर हैं । वह तो &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217;  ही थे कि तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री पी वी नरसिम्हा राव की सरकार &#8216;नो कॉन्फिडेंस मोशन&#8217; में बची थी। खैर। </p>
<p>आज &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; का जिक्र इसलिए कर रहा हूँ कि आज से कोई नौ दिन बाद बिहार के लोग अपने प्रदेश के &#8216;लौह पुरुष&#8217; को श्रद्धांजलि देंगे। सन 1974 के 3 जून को बिहार के लौह पुरुष बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय यानी के.बी. सहाय &#8216;आकस्मिक मृत्यु&#8217; को प्राप्त किये। लगभग इन पांच दशकों में यह सार्वजानिक नहीं हो पाया की बाबू के बी सहाय को किसने मारा, क्यों मारा जब वे अपने हिंदुस्तान एम्बेसेडर (BRM 101) की अगली सीट पर बैठे थे और एक ट्रक उनके हँसते-मुस्कुराते शरीर को &#8220;पार्थिव&#8221; बना दिया। पटना-हज़ारीबाग की वह सड़क आज तक उस घटना को नहीं भूल पायी है। </p>
<figure id="attachment_4055" aria-describedby="caption-attachment-4055" style="width: 640px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3.jpeg" alt="" width="640" height="640" class="size-full wp-image-4055" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3.jpeg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3-300x300.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3-150x150.jpeg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3-24x24.jpeg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3-48x48.jpeg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3-96x96.jpeg 96w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4055" class="wp-caption-text">श्री कृष्ण बल्लभ सहाय तत्कालीन बिहार के हज़ारीबाग में। साल: 1963</figcaption></figure>
<p>पालीगंज, अनिशाबाद, औरंगाबाद, बख्तियारपुर, रांची, नालंदा, कोडरमा, बेतिया, गया, नवादा और न जाने कितने शहर हैं बिहार के, जो उन दिनों भले &#8216;स्मार्ट शहरों&#8217; की गिनती में नहीं थे, लेकिन उन शहरों में स्थित रामलखन सिंह यादव के नाम की शैक्षणिक संस्थाओं से शिक्षा प्राप्त कर छात्र-छात्राएं अपने परिवार, समाज और प्रदेश का नाम रोशन किये थे। कल की ही तो बात हैं बिहार के बाइसवें मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार पटना विश्वविद्यालय के मगध महिला कॉलेज में भले यह स्वीकार कर लिए हों कि &#8220;जब वे इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ते थे, महिलाएं नहीं होती थी, जब कोई महिला कालेज परिसर में आती थी सभी उसे देखने लगते थे।&#8221; परन्तु, हकीकत यह है कि रामलखन सिंह यादव अपनी शैक्षणिक संस्थाओं में महिलाओं को विशेष स्थान दिए थे। वे महिला शिक्षा के पक्षधर ही नहीं, अग्रणी भी थे। यह बात अलग है कि नीतीश कुमार अपनी बात 2022 में कह रहे हैं, जबकि सत्तर के दशक और उसके पूर्व से ही रामलखन सिंह यादव के महाविद्यालयों में महिलाएं शिक्षा प्राप्त करती थी। </p>
<p>बहरहाल, बिहार में तीसरी विधान सभा काल में दो व्यक्ति मुख़्यमंत्री कार्यालय में बैठे। सन 1962 के चुनाव के बाद श्री बिनोदानंद झा के नेतृत्व में सरकार बनी। बिनोद बाबू &#8216;राजमहल&#8217; विधान सभा क्षेत्र से चुनाव जीत कर आये थे। लेकिन पांच साल नहीं चले  और उन्हें महात्मा गांधी के जन्मदिन के अवसर पर सं 1963 में मुख्यमंत्री की कुर्सी के बी सहाय के हाथ सौंपना पड़ा। सहाय बाबू 2 अक्टूबर, 1963 से 5 मार्च, 1967 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रहे। तीसरी विधान सभा के बाद से लगातार बिहार में &#8216;आया राम &#8211; गया राम&#8217; सिद्धांत पर सरकार बन रही थी, चल रही थी, जा रही थी। चौथे विधान सभा, जिसका चुनाव 1967 में हुआ था, चार मुख्यमंत्री महोदय, मसलन जनक्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा, शोषित दल के सतीश प्रसाद सिंह, बी पी मंडल और कांग्रेस के भोला पासवान शास्त्री का मुख्यमंत्री कार्यालय में &#8216;उदय&#8217; और &#8216;अस्त&#8217; हुआ। इसी तरह पांचवी विधान सभा (1969) में हरिहर प्रसाद, भोला पासवान शास्त्री, दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर का उदय-अस्त हुआ। लेकिन आज अगर पिछले 22 मुख्यमंत्रियों को एक नजर में देखें, तो बाबू श्रीकृष्ण सिन्हा को छोड़कर, कुछ ही मुख्यमंत्री हैं जिन्हें आज भी बिहार के लोग, बिहार के मतदाता, प्रदेश के विद्वान-विदुषी से लेकर अशिक्षित और अज्ञानी तक &#8211; नहीं भुला है और शायद भूल भी नहीं पायेगा। उन्हीं &#8216;ना भूलने वाले मुख्यमंत्रियों&#8221; की सूची में एक हैं बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय। </p>
<p>31 दिसंबर, 1998 को, यानि अपनी मृत्यु से कोई आठ साल पहले &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; राम लखन सिंह यादव ने &#8216;बिहार के लौह पुरुष&#8217;  के बी सहाय के बारे में, उनके साथ अपनी सानिग्धता के बारे में, अपने प्रेम-सम्मान और विश्वास के बारे में, जनता के प्रति उनकी सोच के बारे में कुछ शब्द लिखे थे। यह लेख पटना से प्रकाशित &#8216;आज&#8217; समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ था। इस लेख को सहाय साहब के पौत्र राजेश सहाय अपने ब्लॉग पर बहुत सम्मान के साथ सुरक्षित रखे हैं। विगत दिनों जब &#8216;सोडा फ़ाउंटेंन&#8217; की कहानी &#8216;खादी ग्रामोद्योग&#8217; आगजनी की कहानी, पुलिस गोली काण्ड की कहानी लिखा, तो ऐसा लगा कि आज की पीढ़ी को बाबू राम लखन सिंह यादव का बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय के प्रति कितना सम्मान था, उन दिनों की राजनीतिक हालात कैसी थी, क्यों वह सब हुआ &#8211; इस बात को अगर आज की पीढ़ी के लोग देखेंगे, पढ़ेंगे तो जानकारी स्वरुप ही सही, बेहतर अवश्य होगा। &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; राम लखन सिंह यादव के शब्दों को हम राजेश सहाय को धन्यवाद अर्पित करते हूबहू यहाँ रख रहे हैं। </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/RLS.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/RLS.jpg" alt="" width="899" height="769" class="alignleft size-full wp-image-4056" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/RLS.jpg 899w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/RLS-300x257.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/RLS-768x657.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 899px) 100vw, 899px" /></a></p>
<p>&#8220;स्वर्गीय कृष्ण बल्लभ सहाय जो आम तौर पर के.बी.सहाय के नाम से जाने जाते थे, जन्मकाल से ही एक विलक्षण प्रतिभा संपन्न, स्मरण शक्ति में बेजोड़, अंग्रेजी (साहित्य) भाषा के अच्छे ज्ञाता, छात्र जीवन में अपने समय में मेट्रिक परीक्षा में प्रदेश में सर्वोत्तम, अंग्रेजी आनर्स में विश्वविद्यालय भर में सर्वोत्तम और गेट गोल्ड मेडलिस्ट विचार एवं व्यवहार तथा आचार में पक्के समाजवादी, गरीबों विशेष कर पिछड़े वर्गों हरिजन, आदिवासियों तथा अल्प संख्यकों के पक्के हिमायती, किसानों के प्रणेता, ज़मींदारी प्रथा उन्मूलन के भारत भर में सर्वप्रथम जनक तथा बिहार के लौह पुरुष के रूप में बराबर याद किये जायेंगें। </p>
<p>कृष्ण बल्लभ बाबू का जन्म इकतीस दिसम्बर 1898 को पटना ज़िले में फतुआ थाना अन्तर्गत शेखपुरा ग्राम में एक साधारण कायस्थ परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री गंगा प्रसाद पुलिस विभाग में दरोगा के पद पर पदस्थापित थे। इनकी माँ एक अनुशासन प्रिय एवं दृढ इच्छा शक्ति की धनी महिला थी। जो बात उनके मन में बैठ जाती उस पर वे दृढ रहती थी। ऐसी ही एक घटना कृष्ण बल्लभ बाबू के जन्म के बाद सात वर्ष बीतते-बीतते घटी। कृष्ण बल्लभ बाबू तीन भाई थे। एक की मृत्यु तो हमलोगों से संपर्क से पहले हो चुकी थी, जिनके पुत्र आज भी तारा बाबू के रूप में जीवित हैं। दूसरे भाई डॉक्टर दामोदर प्रसाद एक कुशल डॉक्टर के रूप में लोगों की सेवा में आजीवन लगे रहे। दरियापुर पटना स्थित इनके मकान में कृष्ण बल्लभ बाबू के साथ अन्य राजनीतिज्ञों का जमावड़ा रहता था, जिसमें श्री के. पी. सहाय श्री गंगा शरण सिंह एवं श्री उमाकांत की चर्चित त्रिगुट मंडली प्रतिदिन यहाँ बैठा करती थी।  </p>
<p>सन 1906 में कृष्ण बल्लभ बाबू के बहन की शादी तय हुई। इनके दादा ने शादी तय की थी। लेकिन पता नहीं कैसे इनकी माँ को सूचना हो गयी कि होने वाले वर के पेट में पिलही रोग है। उन्होने इनके पिता दरोगाजी को मजबूर किया कि वे स्वयं जा कर लड़के को देखें कि हकीकत क्या है। वे जाने को तैयार भी हुए लेकिन गांवों और विशेषकर गांवों की महिलाओं की चर्चा के दवाब में आकर जाने के समय अपनी यात्रा स्थगित कर दी क्योंकि पिता के प्रति यह अविश्वास होता। बदकिस्मती से ठीक शादी होने के बाद मंडप में इनकी माँ ने परिक्षण के समय देख लिया कि लड़के के पेट में पथरी है और वह वहीं पर मूर्छित हो कर गिर गया। बरात विदाई के ठीक चौथाडी के दिन उस लड़के का देहांत हो गया। इसके बाद इनकी माँ ने तय किया कि अब वह किसी भी हालात में शेखपुरा में नहीं रहेंगीं और बाध्य होकर उनके दादा को भी उनकी ज़िद के सामने झुकना पड़ा। </p>
<p>कृष्ण बल्लभ बाबू सात वर्ष की उम्र में ही अपने भाई बहन के साथ माँ के आदेशानुसार माँ के साथ पुनपुन स्टेशन आकर ट्रैन से हजारीबाग के लिए रवाना हो गए जहाँ वे अपने परिवार समेत आजीवन रहे। </p>
<p>प्राइमरी शिक्षा उन्होनें हजारीबाग धर्मशाला प्राइमरी विद्यालय से तथा मेट्रिक तक की शिक्षा ज़िला स्कूल हजारीबाग से प्राप्त की। मेट्रिक की परीक्षा में उन्होनें बिहार भर में प्रथम स्थान प्राप्त किया। 1916 में मेट्रिक परीक्षा पास करने के बाद 1919 में संत कोलंबस कॉलेज से अंग्रेजी स्नातक परीक्षा में गोल्ड मैडल के साथ पास किया। तत्कालीन गवर्नर श्रीमान  गेट  के  हाथों  उन्हें  यह गोल्ड  मैडल  मिला। इसके बाद उन्होनें एम.ए. (अंग्रेजी) में तथा लॉ प्रथम वर्ष में एडमिशन लिया। एक वर्ष तक दोनों विषयों को पढने के बाद 1921 में महात्मा गाँधी के आह्वान पर अपने उज्जवल भविष्य को तिलांजलि देकर अपना जीवन पूर्ण रूप से राष्ट्र को समर्पित करते हुए 1921, 1928, 1929, 1932, 1934, 1940, 1942 में तमाम आज़ादी की लड़ाईयों में साक्रिय रूप से हिस्सा लेने कारण उन्हें वर्षों जेल में जीवन बिताना पड़ा। </p>
<p>जैसा कि मैंने प्रारम्भ में ही इनके कई गुणों के बारे में लिखा है, कुछ व्यक्तिगत जीवन की घटनाओं से पता चल जाएगा कि वे गुण इनमें किस प्रकार कूट कूट कर भरे थे। कृष्ण बल्लभ बाबू की पत्नी की मृत्यु के बाद तीन शादियां हुई थी। पहली शादी उनके छात्र जीवन में ही नवादा ज़िले के दरियापुर ग्राम में तत्कालीन पुलिस दरोगा श्री विशेश्वर नाथ की पुत्री से हुई। ससुराल में प्रथम बार एक शादी में सम्मलित होने गए। तेज़ छात्र होने के नाते उन्हें देखने के लिए उनके संबंधी और ग्राम के लोग भीड़ लगाए थे। बरात आने के दिन करीब दस हलवाई और अन्य नौकर बहुत सुबह से ही मिठाई और पूरी लोगों के खाने के लिए तैयार करते रहे। दोपहर में उन्हें खाने के लिए सूखा चूड़ा एवं गुड़ दिया गया तभी उनके ससुर दरोगाजी आकर उन नौकरों को पीटने लगे कि काम छोड़ कर नाश्ता क्यों कर रहा है? इस घटना ने कृष्ण बल्लभ बाबू के दिमाग पर गहरा असर किया और उन्होंने तय किया कि इन गरीबों के मार खाने के बाद इनके द्वारा तैयार किया गया भोजन करना भारी गुनाह है। उन्होंने बहाना किया कि उनके पेट में दर्द हो गया है और उन्हें शीघ्र पटना पहुंचा दिया जाए। उनकी सास ने अपने पति की बातों की अवहेलना करते हुए कृष्ण बल्लभ बाबू की इच्छानुसार बिना समय गंवाए उन्हें शीघ्र पटना भेज दिया। यह घटना साबित करती है कि गरीबों के प्रति उनके दिल में कितना दर्द था। </p>
<p>दूसरी घटना हजारीबाग ज़िले के गिद्धौर थाने में घटी जहां उनके पिता पदस्थापित थे। गर्मियों की छुट्टी में पिताजी के आदेशानुसार वे वहीं थाना में छुट्टी बिताने गए। संयोगवश कुछ दिनों के लिए उनके पिता एक पठान जमादार को उनके गार्डियन के रूप में सौंप कर कहीं बाहर गए। कृष्ण बल्लभ बाबू खाते, गाय का दूध पीते और बचा हुआ दूध नौकर को पिला देते थे। एक दिन सुबह जमादार उनके पास आये और जब उन्हें मालूम हुआ कि गाय का दूध नौकर पिता है तब उसने उस नौकर को लाठी से इतना मारा कि वह बेहोश हो गया। उसने उन्हें भी डांटा तुम नौकर को आगे दूध पिलाओगे तो तुम्हारी गति भी यही होगी। वह नौकर खैनी खाता था इसलिए चुक्का में चूना रखता था। कृष्ण बल्लभ बाबू ने अपने हाथ से हल्दी पीस कर चूना के साथ गर्म कर के उसके बदन में पूरा लेप दिया। रात्रि में जब उसकी तबियत ठीक हुई तब उससे उन्होंने कहा कि पिताजी के आने पर कह देना कि आवश्यक कार्यवश मैं आज ही पटना जा रहा हूँ। इस घटना के बाद कृष्ण बल्लभ बाबू पिता के लाख कहने के बाद भी किसी थाने में नहीं गए। इससे गरीबों के प्रति उनके मन में अपार श्रद्धा एवं भाव प्रकट होता है। </p>
<figure id="attachment_4057" aria-describedby="caption-attachment-4057" style="width: 640px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay-2.jpg" alt="" width="640" height="460" class="size-full wp-image-4057" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay-2.jpg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay-2-300x216.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4057" class="wp-caption-text">श्री कृष्ण बल्लभ सहाय और अन्य गणमान्य लोग &#8211; साल: 1963</figcaption></figure>
<p>कृष्ण बल्लभ बाबू ने समाजवाद को अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में मूर्त रूप दिया। रहन-सहन, खान-पान, पारिवारिक जीवन, लोगों के प्रति उनका व्यवहार, उनके द्वारा किये गए काम, जिस पर भी आप नज़र डालें उसकी झलक साफ़ दृष्टिगोचर होती है। वे भीतर और बाहर पारदर्शी थे वे स्पष्टवादी, ईमानदार एवं निसंकोच, सच्चाई के साथ अपने बातों को स्पष्ट रूप से रखने के आदि थे। उनकी स्मरण शक्ति अद्वितीय थी। सात वर्ष की उम्र से जबसे वे अपने गांव शेखपुरा छोड़ कर हजारीबाग गए आजीवन छोटी या बड़ी घटनाएं समय और तिथि समेत अच्छी तरह याद रहती थी। आवश्यकतानुसार बिना किसी कागज़ को देखे सारी घटनाएं वे बतला देते थे। जब बिहार की राजनीति में तात्कालिक मुख्यमंत्री से कुछ विभेद पैदा हुआ और उनके ऊपर कई तरह के गंभीर आरोप और आक्षेप समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाया गया था तब उन्होंने सब का जवाब एक लंबे वक्तव्य में दिया। </p>
<p>उन दिनों वे हजारीबाग में थे। 1957 में चुनाव हारने के बाद उन्होनें आवास एवं गाडी से झंडा उतरवाया। सभी कर्मचारियों को एक साथ खड़ा कर उन्हें धन्यवाद् दिया। सबको एक एक सर्टिफिकेट दिया और वहीं से गाडी में बैठ कर रवाना होने से पूर्व सभी कर्मचारियों को सरकार में जहां भी रहे अनुशासन, ईमानदारी एवं निष्ठा से कार्य करने की सलाह दी। सरकारी आवास में पुनः उन्होंने पैर नहीं रखा। मुझसे इतना ही पुछा कि मैं हजारीबाग में उन्हें खबर कर दूं कि एक दिन के बाद वे कहाँ आवेंगें। मैंने उनके साथ रहने का प्रबंध पहले ही कर लिया था इसलिए कहा कि निसंकोच सीधे मेरे घर पहले आ जाएँ। वे ठीक तीसरे दिन आये और मेरे ही निवास के निकट नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आई. एन. ए. की सरकार के मंत्री स्वर्गीय परमानन्द जी का बड़ा मकान जो गुलाब गार्डन के नाम से मशहूर था उसी में उनका निवास रखा गया। लेकिन कुछ ही दिनों के बाद उन्होनें बड़े मकान को छोड़ कर उसी प्रांगण में उनके नौकरों के रहने का तीन रूम का मकान था उसमे बिना किसी से राय लिए रहने लगे। </p>
<p>उन दिनों समाचार पत्रों में छपी अनर्गल बातों का जवाब देना हुआ तब उन्होनें हजारीबाग से संध्या समय फ़ोन किया कि दो अंग्रेजी स्टेनोग्राफर को सुबह से ही तैयार रखें। आदेशानुसार सब कुछ तैयार रखा गया और वे हजारीबाग से चल कर सीधे सात बजे सुबह गुलाब गार्डन पहुँच गए। गार्डन में ही एक पेड़ के नीचे बैठ कर बिना हाथ में कागज़ या चिट लिए दोनों स्टेनोग्राफरों को एक एक कर डिक्टेशन अंग्रेजी में देते रहे और पूरा टाइप होने पर यथोचित संशोधन किया। वक्तव्य लंबा था। उसकी कई प्रतियां तैयार की गयी और यह कह कर कि मैं इसे प्रेस में प्रकाशनार्थ भेज दूंगा, वे उसी संध्या को हजारीबाग के लिए रवाना हो गए। मैं चाहता था कि वह अभी प्रकाशित न हो क्योंकि इससे बहुत झगडे पैदा होंगें। लेकिन हजारीबाग पहुंचने के बाद भी उन्होनें कहा कि इसे प्रकाशित करा ही देना चाहिए। तब मैंने उसे प्रकाशनार्थ भेज दिया। उसके सम्बन्ध में बहुत प्रचार किया गया कि यह वक्तव्य कदम कुआँ के ब्रेन ट्रस्ट लोगों ने सप्ताहों बैठ कर सब कागज़ात निकाल कर ड्राफ्ट किया है। मैं और श्री एल. एन. झा को ही यह पता था यह कैसे और कहाँ ड्राफ्ट हुआ था। कृष्ण बल्लभ बाबू की स्मरण शक्ति क्या थी यह तो इसका सिर्फ एक छोटा सा उदाहरण था। </p>
<p>बिहार में सर्वप्रथम ज़मींदारी उन्मूलन का कानून बनाया गया वे इसके जनक थे। उसके चलते बिहार के ज़मींदारों से, बड़े-बड़े लोगों से और ख़ास कर रामगढ के राजा कामाख्या नारायण सिंह ने जन्म भर उनकी राजनैतिक शत्रुता और मुकदमे लगे रहे, चूँकि कृष्ण बल्लभ बाबू ही राजस्व और जंगल विभाग के मंत्री बराबर रहे। मुझे याद है लैंड सीलिंग बिल को पेश करते हुए उन्होने कहा था कि ज़मींदारों और बड़े-बड़े भूपतियों का जो रवैया है पता नहीं यह कानून कब लागू होगा। लेकिन मैं तो कम से कम रास्ता प्रशस्त कर रहा हूँ कि आगे शीघ्रताशीघ्र ही इसे लागू करने के लिए कानून बनाने में समय खर्च न हो। इस कानून का भी बड़ा विरोध हुआ और मुकदमे में कई दिनों तक लटका रहा। विनोबा भावे के भूदान आंदोलन को बढ़ने सहयोग करने ज़मीन माँगने में भी कृष्ण बल्लभ बाबू आगे रहे। सबसे बड़ी बात यह हुई कि 1954 में देश में सबसे पहले कृष्ण बल्लभ बाबू के द्वारा ही बिहार भूदान एक्ट बनाया गया। कहा जा सकता है कि ज़मीन संबंधी सारे प्रगतिशील कदम बिहार में उन्हीं के द्वारा उठाये गए।  </p>
<p>1967 का चुनाव सारे उत्तर भारत विशेष कर बिहार के लिए बहुत ही मील का पत्थर साबित हुआ। इस साल आम चुनाव के पूर्व से ही आम मतभेद, अराजपत्रित कर्मचारियों एवं छात्रों के बीच विरोधी दलों द्वारा उन्हें तरह-तरह की मांगों को सरकार द्वारा स्वीकृत करवाने के मुद्दों पर आक्रामक और हिंसक रास्ते पर ले जाकर भयंकर आंदोलन करवाने के चलते कांग्रेस की बड़ी क्षति हुई। कृष्ण बल्लभ बाबू पटना शहर से ही उम्मीदवार बने और उनका विरोध महामाया प्रसाद सिन्हा ने किया। पटना में हिंसक आंदोलन पर बहुत लाचार होकर पुलिस और मजिस्ट्रेट को आगज़नी से शहर को बचाने तथा आत्मरक्षार्थ गोली चलानी पड़ी। खादी भवन जैसी संस्था में भी लोगों ने आग लगायी। </p>
<p>मैं स्वयं भी दक्षिण पटना से उम्मीदवार था। उक्त घटनाओं के चलते हमलोगों के चुनाव पर बुरा असर पड़ा। कृष्ण बल्लभ बाबू को हम लोगों ने बहुत समझाया बुझाया लेकिन वे अपने हर चुनाव भाषण में पटना में मतदाताओं को कहते रहे कि मेरे रहते जिस तरह की हिंसक घटनाएं घाटी हैं उसे बर्दाश्त नहीं कर सकता हूँ और किसी प्रकार की जांच करवाने को तैयार नहीं हूँ। हाँ आप चाहें तो मुझे वोट न दें और जिसे चाहे गद्दी पर बिठा दें। </p>
<figure id="attachment_4058" aria-describedby="caption-attachment-4058" style="width: 640px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-5-Oct-Editors-Meet.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-5-Oct-Editors-Meet.jpeg" alt="" width="640" height="529" class="size-full wp-image-4058" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-5-Oct-Editors-Meet.jpeg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-5-Oct-Editors-Meet-300x248.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4058" class="wp-caption-text">सम्पादकों के साथ बैठक। चित्र में आर्यावर्त अखबार के तत्कालीन संपादक श्रीकांत ठाकुर &#8216;विद्यालंकार&#8217; भी है</figcaption></figure>
<p>उन दिनों राष्ट्रिय कांग्रेस के अध्यक्ष कामराज नादर थे उन्होनें पटना आगमन पर उन्हें समझाया कि यहां जो गोलीकांड हुआ है उसी कि न्यायिक जांच करवा दी जाए। श्री नादर ने जब यह प्रस्ताव कृष्ण बल्लभ बाबू के समक्ष रखा तब बिना किसी प्रकार की बात किये उन्होंने अपना त्याग पत्र बिहार कांग्रेस पार्टी नेतृत्व एवं मुख्यमंत्री पद से उनके हाथ में दे दिया क्योंकि जांच का आदेश देकर वे प्रशासन को नाजायज़ ढंग से हतोत्साहित नहीं करना चाहते थे। हारने के बावजूद उनके ऊपर जरा सी भी उदासी नहीं आई। इससे स्पष्ट है कि वे कितने सख्त प्रशासक थे और प्रजातंत्र में उनका कितना विश्वास था। जिस कारगर ढंग से मजबूती से स्वयं जाकर जमशेदपुर, रांची आदि जगहों पर उन्होंने मुसलमानों पर हुए दंगों को दबाया वह अद्वितीय था। </p>
<p>इसी प्रकार की एक और घटना घटी। भारत के गृह मंत्री और उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल ने बेतिया राज के साठी की जमीन को लेकर श्री कृष्ण सिंह को देहरादून में सफाई देने के लिए बुला भेजा। श्री बाबू बहुत ही मर्माहत हुए। कृष्ण बल्लभ बाबू ने उन्हें जाने से रोक स्वयं सरदार पटेल से मिले सुश्री मणि देवी पटेल और सरदार पटेल के सचिव श्री शंकर के समक्ष ही सरदार पटेल ने कृष्ण बल्लभ बाबू को और कुछ कहने से पहले ही कहा कि कृष्ण बल्लभ साठी की ज़मीन वापस करनी होगी। कृष्ण बलभ बाबू ने जवाब दिया &#8220;साठी कि ज़मीन कभी वापस नहीं होगी।“ सरदार गुस्से से गुर्राते हुए बोले &#8220;क्यों?&#8221; कृष्ण बल्लभ बाबू का जवाब था आप केवल केंद्र सरकार के उपप्रधान मंत्री ही नहीं अपितु सारे देश के और कांग्रेसजनों की इज़्ज़त के संरक्षक भी हैं। बिना सुने आपके द्वारा फाँसी की सजा नहीं होनी चाहिए। सरदार ने शांतिपूर्वक जब सारे कागज़ात देखे और कृष्ण बल्लभ बाबू ने बिहार सरकार के निर्णय पर जो सफाई दी उससे सरदार पटेल पूर्णरूपेण संतुष्ट हुए। उलटे जिन लोगों ने चार्ज लगाया था उन्हीं के ऊपर सरदार पटेल ने अपनी नाराज़गी जाहिर किया। सरदार पटेल के आग्रह पर उनकी राय के अनुसार साठी ज़मीन के बारे में कानून बना। लेकिन जैसा कृष्ण बल्लभ बाबू ने कहा था वह कानून कोर्ट द्वारा रद कर दिया गया। उक्त घटना से उनके सख्त प्रशासक और नीडर राजनेता होने का प्रमाण साबित होता है। </p>
<p>जब-जब बिहार को विपत्ति का सामना करना पड़ा कृष्ण बल्लभ बाबू ने आगे बढ़ कर कुशल नेतृत्व प्रदान किया। बाढ़ से उत्पन्न परिस्थिति, भयंकर भूकंप या फिर 1966-67 के भयंकर अकाल की परिस्थिति में कृष्ण बल्लभ बाबू ने श्री जय प्रकाश नारायण की अध्यक्षता में सक्षम लोगों के साथ एक केंद्रीय सहायता समिति बना कर चारो ओर से स्वयंसेवी संस्थाओं और सरकारों से सहायता लेकर बिहार की जनता को भीषण दुर्भिक्ष से बचाया। जब वे मंत्री नहीं थे तब बिहार निर्माता कोष समिति बनाकर राशि संग्रह कर राजेंद्र बाबू, श्री बाबू और अनुग्रह बाबू की याद में जनता की सेवा हेतु संस्थाओं को जन्म दिया। </p>
<p>कृष्ण बल्लभ बाबू ने यो तो सारे बिहार की सेवा आजीवन की, जिसके लिए वे बराबर याद किये ही जायेंगें- छोटानागपुर जहां आदिवासी, हरिजन एवं पिछड़े जातियों का ही बाहुल्य है वहां के मूल निवासी सबसे गरीब लेकिन जहां ज़मीन के नीचे अतः खनिज पदार्थ भरा पड़ा है और उससे सारा देश लाभान्वित हो रहा है, कृष्ण बल्लभ बाबू आजीवन इन गरीबों की सेवा करते रहे। भिन्न-भिन्न संस्थाओं के माध्यम से सेवा तो करते ही थे, उनके मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार सरकार छोटानागपुर में कुछ महीने बैठा करती थे। लेकिन उनके मुख्यमंत्री पद से हट जाने के बाद से आज तक छोटानागपुर की हालात बाद से बदतर होती जा रही है। आज छोटानागपुर को बाध्य होकर अलग राज्य बनाने पर विचार हो रहा है। </p>
<p>कृष्ण बल्लभ बाबू समाज सेवा और कांग्रेस के लिए सरदार पटेल, किदवई, इन्द्रभानु गुप्त जैसे लोगों की श्रेणी में आते हैं जो करोड़ों रुपये पार्टी फण्ड के लिए इकठ्ठा करते रहे लेकिन इसका उपयोग कभी भी अपने या अपने परिवार के लिए नहीं किया। जब कभी सौ दो सौ रुपये उनकी पत्नी घर खर्च के लिए उनसे मांगती थी -लाखों रुपये पारी फण्ड के होने के बावजूद उन्होनें नहीं दिया। कभी-कभी तो हमलोग भी उनके घर के निजी खर्च के लिए पैसे देते थे और पैसे आने पर वे उसे अवश्य लौट दिया करते थे। अपने राजनैतिक और सामाजिक जीवन के नज़दीकी लोगों से वे सख्त हिसाब लिया करते थे। श्री दीनानाथ पांडेय के गोलीकांड में मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री श्री बाबू के कहने पर मुझे छात्रों के बीच कार्य करने के लिए कुछ पैसे दिए गए। सभी खर्चे की विधिवत रसीद मैंने दी लेकिन मात्र इक्कीस रुपये का मैंने अन्यान्य खर्च हुए उस पर कृष्ण बल्लभ बाबू ने बड़ी कड़ाई से मुझसे हिसाब लिया। उनकी प्रतिदिन की आदत थी कि वे रात्रि में दिन भर का हिसाब रजिस्टर में दर्ज करने के बाद जांच कर अपना दस्तखत कर दिया करते थे।</p>
<figure id="attachment_4059" aria-describedby="caption-attachment-4059" style="width: 640px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay.jpg" alt="" width="640" height="473" class="size-full wp-image-4059" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay.jpg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay-300x222.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4059" class="wp-caption-text">श्री कृष्ण बल्लभ सहाय और अन्य गणमान्य लोग &#8211; साल: 1963</figcaption></figure>
<p>जब ज़मींदारी प्रथा उन्मूलन और जंगल कटाई को लेकर राजा रामगढ और कृष्ण बल्लभ बाबू में भयंकर मुक़दमेबाज़ी हुई तब बिहार मंत्रिमंडल ने बार-बार स्वीकृति प्रस्ताव लाने के बजाय खर्च करने के लिए उन्हें इजाज़त दे दी। उनके निजी सचिव श्री राणा जो उनके जेल के समय के सहयोगी थे मुकदमा के खर्चे का हिसाब रखते थे। कुछ महीने का हिसाब उन्होंने नहीं दिया। मुक़दमे के ही सिलसिले में श्री लाल नारायण सिंह, श्री बजरंग सहाय श्री कृष्ण बल्लभ बाबू के साथ ट्रैन से दिल्ली जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने अपने निजी सचिव श्री राणा से पूछा कि हिसाब आप क्यों नहीं दे देते हैं? श्री लाल नारायण सिंह और श्री बजरंग सहाय के कहने पर उन्होंने श्री राणा से लौटकर रांची में हिसाब देने की बात मान ली। संयोगवश एक विशेष घटना घटी। उस दिन रांची में मैं शत्रुघ्न बाबू एवं कामता बाबू (प्रसिद्ध कवि एवं साहित्यकार कामता प्रसाद सिंह काम जो डॉ. शंकर दयाल शर्मा, भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री एवं राज्यपाल के पिता थे) मौजूद थे। हिसाब माँगने पर श्री राणा ने कृष्ण बल्लभ बाबू को कहा &#8220;मैंने आपको धोखा दिया है और ट्रेज़री से रुपये निकाल कर निजी मद में खर्च कर दिया है।“ जब हमलोगों को मालूम पड़ा तब श्री राणा को सबसे पहले पकड़ा गया। श्रीबाबू ने मुख्य सचिव श्री एल.पी.सिंह को बुला कर इस सम्बन्ध में राय ली। श्री एल.पी.सिंह ने सही राय दी कि जितनी राशि राणा ने ट्रेज़री से नाजायज़ ढंग से निकाली है उतनी राशि पहले जमा कर दी जाए अन्यथा विरोधी लोग बवाल पैदा करेंगें। कृष्ण बल्लभ बाबू के कुछ समर्थकों ने रुपये लेकर जमा किया एवं राणा से उतना क़र्ज़ के रूप में हैण्ड नोट लिखवा लिया ताकि पीछे धोखा न दे। बात यहीं दब गयी। पटना ट्रेज़री कोषागार का लगातार चार दिनों तक तात्कालिक ज़िलाधिकारी ने रात दिन परिश्रम कर एक-एक कागज़ का मुआयना किया। लेकिन श्री राणा द्वारा निकाली गयी राशि का कोई सुराग नहीं मिला। </p>
<p>1967 में महामाया सरकार पांच व्यक्तियों पर मेरे समेत पांच जांच कमीशन बैठाई। सी.बी.आई. के डी.आई.जी. इंचार्ज थे। कमीशन के फैसले के बाद डी.आई.जी. ने मुझसे कहा लगभग सारे देश में विशेष कर राजनीतिज्ञों पर मैं जांच करता रहा हूँ लेकिन कृष्णा बल्लभ सहाय जैसा ईमानदार व्यक्ति बिरले मिला क्योंकि इस व्यक्ति के पास करोड़ों रुपये का लिखित हिसाब 1946 से अब तक मिला। इसके अतिरिक्त भी पार्टी फंड का पैसा उन्होंने अपने और अपने परिवार के किसी कार्य में नहीं लगाया। बाकी लोगों के हिसाब का तो पता नहीं चलता है कि राजनीतिज्ञ कैसे खर्च करते हैं।  कृष्ण बल्लभ बाबू अपने जीवन में राजनीती में रहने वाले गरीब कार्यकर्ताओं, जो लोग मर जाते उनकी विधवा या उनके आश्रितों के लिए एक अभिभावक के रूप में हमेशा मदद किया करते थे। </p>
<p>श्री बाबू की मृत्यु के बाद हम सब लोगों ने पंडित विनोदानंद झा को मुख्यमंत्री बनाने में बहुत ही मेहनत की। लेकिन पंडित झा ने बिलकुल सौ प्रतिशत झूठा षड्यंत्र रच कर पूरे कागज़ का पोथी बनाकर प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के हाथ में दे दिया कि मैं उन्हें मछली में विष दे कर मारने का षड्यंत्र रचा हूँ। मुझ समेत 36 लोगों को मुजरिम बना दिया गया। पंडित नेहरू ने आई.बी. इंटेलिजेंस के तात्कालिक निदेशक श्री मल्लिक द्वारा जांच करवाई। डी.आई.जी. श्री शुक्ल जांच अधिकारी बनाये गए। चार दिनों तक मुझसे पूछताछ की गयी। प्रधानमंत्री जी को भी मैंने सारी बातें बताई। श्री मल्लिक की ही रिपोर्ट पर पंडित विनोदानंद झा को पंडित नेहरू ने मुख्यमंत्री पद से हटाया और बाद में श्री कृष्ण बल्लभ बाबू मुख्यमंत्री बने। जब मुझ पर पंडित विनोदानंद झा ने षड्यंत्र का मुकदमा किया, तब मैंने एक बार कृष्ण बल्लभ बाबू की आँखों में आंसू गिरते हुए देखा था। मैंने उनसे कहा कि यदि वे मेरी वजह से विनोदानंद झा के सामने झुके, तब मैं अपना प्राण त्याग दूंगा। मैंने कहा कि ईश्वर पर मुझे पूरा भरोसा है और विनोदानंद झा स्वयं मुख्यमंत्री पद से हटाये जायेगे और हुआ भी वही। श्री मल्लिक ने जांच कर एक पत्र पंडित नेहरू को दिया कि पंडित विनोदानंद झा जैसे व्यक्ति को एक दिन भी मुख्यमंत्री पद पर रखना खतरनाक है। तात्कालिक गृह मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री और श्री सत्येंद्र बाबू स्वयं इन बातों से वाकिफ थे।&#8221;</p>
<p><strong>अख़बार का कतरन बिहार के लौह पुरुष श्री कृष्ण बल्लभ सहाय के पौत्र राजेश सहाय के ब्लॉग के सौजन्य से &#8211; राजेश सहाय संभवतः बिहार के किसी भी राजनेता के वंशज होंगे जिन्होंने अपने पूर्वज का दस्तावेजों को इस कदर सहेज कर रखें हैं। आपको मौका मिले तो अवश्य भ्रमण करें </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/krishn-vallabh-sahay-the-iron-man-of-bihar">शिक्षा प्रसार में बिहार के लोग &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; को और जमींदारों-राजाओं को नकेल कसने में &#8216;लौह पुरुष&#8217; को अगर भूल गए &#8230; तो समझिये इतिश्री देवाखंडे </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/krishn-vallabh-sahay-the-iron-man-of-bihar/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>&#8220;हमारी बेटियां आपकी &#8216;पुरुषार्थ&#8217; को अपने दोनों पैरों के बीच रख लेती है, आपको सुकून मिलता है; लेकिन उसे &#8216;वेश्या&#8217; और &#8216;रंडी&#8217; भी आप ही कहते हैं&#8230;.&#8221;</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/prostitution-india-needs-changes-in-law</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/prostitution-india-needs-changes-in-law#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 May 2022 12:30:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[kolkata]]></category>
		<category><![CDATA[law]]></category>
		<category><![CDATA[leaders]]></category>
		<category><![CDATA[lucknow]]></category>
		<category><![CDATA[newdelhi]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[prostitution]]></category>
		<category><![CDATA[society]]></category>
		<category><![CDATA[vote]]></category>
		<category><![CDATA[votebank]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=3996</guid>

					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली/कोलकाता/लखनऊ : नाम का हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। कई लोग अपने नाम का &#8216;अर्थ&#8217; भी नहीं समझते। फिर उसे &#8216;सार्थक&#8217; या &#8216;निरर्थक&#8217; सिद्ध करने में उनकी भूमिका का &#8216;गौण&#8217; होना भी स्वाभाविक है। समाज का औसतन पचास से अधिक फीसदी महिला-पुरुष अपने नाम की सार्थकता जीवन पर्यन्त सिद्ध और सार्थक नहीं कर [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/prostitution-india-needs-changes-in-law">&#8220;हमारी बेटियां आपकी &#8216;पुरुषार्थ&#8217; को अपने दोनों पैरों के बीच रख लेती है, आपको सुकून मिलता है; लेकिन उसे &#8216;वेश्या&#8217; और &#8216;रंडी&#8217; भी आप ही कहते हैं&#8230;.&#8221;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली/कोलकाता/लखनऊ : नाम का हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। कई लोग अपने नाम का &#8216;अर्थ&#8217; भी नहीं समझते। फिर उसे &#8216;सार्थक&#8217; या &#8216;निरर्थक&#8217; सिद्ध करने में उनकी भूमिका का &#8216;गौण&#8217; होना भी स्वाभाविक है। समाज का औसतन पचास से अधिक फीसदी महिला-पुरुष अपने नाम की सार्थकता जीवन पर्यन्त सिद्ध और सार्थक नहीं कर पाते। अगर ऐसा होता तो शायद भारतवर्ष की स्थिति आज ऐसी नहीं होती। लेकिन जब समाज के लोग अपने हित में किसी और का नाम खुले बाजार में बेच देते हैं, फिर उसे अपना नाम अपभ्रंश कर समाज में जीना होता है। दुर्भाग्य यह है कि उस अपभ्रंशित नाम, शाब्दिक से व्यावहारिक अर्थ तक, अपनी सार्थकता सिद्ध करता है फिर उसे समझने के लिए हमारे समाज में शायद शून्य दशमलव एक फ़ीसदी लोग भी नहीं होते हैं।</strong> </p>
<p>यह बात मैं नहीं कह रहा हूँ। यह बात आज से कोई पैंतीस वर्ष पहले लखनऊ के हज़रतगंज और चारबाग, पटनासिटी के मालसलामी, मुजफ्फरपुर के चतुर्भुज स्थान, दिल्ली के जी बी रोड (अब श्रद्धानन्द मार्ग), कलकत्ता के सोनागाछी क्षेत्रों में उन दिनों उम्र से बूढी तंग गलियों में जीवन की सांस गिनने वाली समाज से उपेक्षित बेटियों की मौसी, बाज़ारों में बेचीं गई बेटियों की मौसी, कूड़े-कचरों के ढ़ेरों से उठाई-पोसी गई बेटियों की मौसी, पैसे के लालच में अपनी बेटियों-पत्नियों को बेचने वाले भारतीय मर्दों की पत्नियों की मौसी कही थी &#8211; वह भी फ़क्र के साथ, सर उठाकर। </p>
<p><strong>वह तो यह भी कही थी कि &#8220;अगर हमारी बेटियां अपना जिस्म बेचना बंद कर दे तो आपके समाज की बहु-बेटियां चौराहों पर नग्न हो जाएँगी। समाज के संभ्रांतों की इज्जत बड़े-बड़े शहरों की सड़कों पर बेपर्द हो जाएगी। तमीज और तहजीव तो हमारी बेटियों में है जो &#8216;आदाब&#8217; और &#8216;खुदहाफिज़&#8217; कहकर आपका सम्मान भी करती है और आपकी पुरुषार्थ को, आपकी इज्जत को अपने दोनों पैरों के बीच कुछ देर रख लेती है। आप उसमें ही खुश हो जाते हैं। आपको जीवन के उत्कर्ष वाली शांति प्राप्त होती है। उस &#8216;शांति&#8217; की बात आप अपने-अपने घरों की &#8216;शांति&#8217; से नहीं करते। लेकिन उसे, मुझे &#8216;वेश्या&#8217;, &#8216;रंडी&#8217;, &#8216;बदचलन&#8217; भी आप ही कहते हैं।&#8221;</strong></p>
<p>मौसी फिर कहती है: &#8220;मेरी बेटियों को देखकर समाज की औरतें अपने-अपने बच्चों को खींचकर दरवाजे के अंदर इस कदर खींचती हैं जैसे हमारी बेटियां &#8221;एयर-बोर्न डिजीज&#8217; लेकर चल रही हों। हमारी बेटियां कभी &#8216;चूं&#8217; भी नहीं करती। लेकिन आपके घरों की &#8216;शांति&#8217; को देखकर &#8216;मुस्कुराती&#8217; जरूर है।&#8221;</p>
<p>मैं तो महज उस श्रद्धेय मौसी की बातों को आज दोहरा रहा हूँ। पैंतीस वर्ष पहले कलकत्ता से प्रकाशित &#8216;आनंद बाजार पत्रिका&#8217; का &#8216;संडे&#8217; पत्रिका एक कवर स्टोरी कर रही थी। हम सभी छोटे से बड़े संवाददाता भारत के विभिन्न &#8216;लालरंगी क्षेत्रों&#8217; में स्थित संकीर्ण गलियों की कहानी, उन गलियों में रहने वाली मौसियों, उनकी बेटियों की रुदन को शब्दबध्द कर कलकत्ता भेज रहे थे। उद्देश्य था &#8216;समाज के संभ्रांतों की सोच बदले &#8211; क्योंकि अपने-अपने नजरों में नंगे सभी हैं और उसी नंग आखों से दूसरों की नंग्नता को आंकते हैं। <br />
जो &#8216;समाज के अंदर&#8217; है, उन्हें &#8216;संभ्रांतों&#8217; के रूप में अलंकृत करते हैं; जो समाज की तंग-गलियों में सांस ले रही हैं, जो समाज के संभ्रांतों की पुरुषार्थ को शांत कर रही हैं, उसे &#8216;वेश्या&#8217;, &#8216;रंडी&#8217; &#8216;बदचलन&#8217; शब्दों से अलंकृत किया जाता है। हाँ, सामाजिक, बौद्धिक और चारित्रिक बाजार में वे भले &#8216;चरित्रहीन&#8217; हों; लेकिन भारत के राजनीतिक बाजार में उनका और समाज के संभ्रातों का मोल &#8216;बराबर&#8217; होता है &#8211; एक वोट &#8211; जो स्थानीय राजनेताओं के राजनीतिक चरित्र का निर्माण करता है। इससे बड़ा &#8216;बिडम्बना&#8217; और क्या हो सकता है। लेकिन भारत में &#8216;वेश्यावृति&#8217; आज भी क़ानूनी तौर पर अपराध है। </p>
<figure id="attachment_3998" aria-describedby="caption-attachment-3998" style="width: 940px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/gbrd.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/gbrd.jpeg" alt="" width="940" height="1410" class="size-full wp-image-3998" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/gbrd.jpeg 940w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/gbrd-200x300.jpeg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/gbrd-683x1024.jpeg 683w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/gbrd-768x1152.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 940px) 100vw, 940px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3998" class="wp-caption-text">दिल्ली का जी बी रोड यानी श्रद्धानन्द मार्ग : तस्वीर: मीडियम के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p>कल मुद्दत बाद गंगूबाई फिल्म देखा। जब तक वह &#8216;गंगा&#8217; थी, समाज के लोग उसकी &#8216;पवित्रता&#8217; को ठग कर शरीर खरीद-बिक्री के बाजार में बेच दिया। गंगा अपभ्रंशित होकर &#8216;गंगू&#8217; हो गई। लेकिन &#8216;गूंगी&#8217; नहीं हुई। कोई कहता है यह फिल्म मशहूर लेखक हुसैन जैदी की किताब ‘माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई’ पर आधारित है। कोई कहता है गंगूबाई 60 के दशक में मुंबई माफिया का बड़ा नाम थीं। उसके पति ने महज पांच सौ रुपए के लिए बेच दिया था और इसके बाद से ही वे वेश्यावृत्ति में लिप्त हो गई थी। <br />
लेकिन संजय लीला भंसाली ने भारतीय वेश्यावृति समाज की पीढ़ी-दर-पीढ़ी से लेकर वर्त्तमान काल तक की स्थिति को गंगूबाई के माध्यम से जिस कदर पेश किया है, काबिले तारीफ है। यह इस बात को भी उजागर करता है कि आज भी समाज में वेश्याओं को अपनी आवाज खुद बननी होगी क्योंकि समाज में मानसिकता का महज दो फांक नहीं, सहस्र फांक है और सभी अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। इस फिल्म में गंगूबाई का किरदार आलिया भट्ट ने जिस कदर निभाई हैं, वह उनके समाज के बाहर के समाज को &#8220;गूंगा&#8221; बना दी हैं। </p>
<p>एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के इतिहास में कई ऐसी महिलाएं रहीं जिनका रुतबा और शान विश्व प्रख्यात रहा। ये महिलाएं केवल सिनेमा, राजनीति और खेल जगत तक ही सीमित नहीं रहीं बल्कि समाज सेवा जैसे कई ऐसे क्षेत्रों से जुड़कर उन्होंने विश्व भर में अपना नाम बनाया। लेकिन उन महिलाओं के जीवन के विषय में लोग कम ही जानते हैं। कहा जाता है कि गंगा हरजीवनदास यानी गंगूबाई गुजरात की एक पढ़ी-लिखी और संपन्न परिवार से ताल्लुक रखती थीं। उनका जन्म गुजरात के काठियावाड़ में 1939 में हुआ था। जब गंगूबाई छोटी थीं तब वो बॉलीवुड की अभिनेत्री बनने का ख्वाब रखती थीं और अपना सपना पूरा करने मुंबई आना चाहती थीं।</p>
<p>16 साल की आयु में जब गंगू पढ़ाई करने कॉलेज पहुंची तो उनके जीवन में एक बड़ी घटना ने दस्तक दी। गंगू को 16 वर्ष की आयु में ही प्यार हो गया था और उस शख्स का नाम था रमणीक लाल। रमणीक गंगू के पिता के लिए बतौर एक अकाउंटेंट का कार्य करते थे। जब गंगू का प्यार परवान चढ़ा तो उन्होंने रमणीक से शादी करने का मन बनाया और उसके साथ भागकर मुंबई आ गईं। लेकिन ये प्यार उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हुआ क्योंकि रमणीक ने गंगू को केवल 500 रूपयों के लिए कोठे पर बेच दिया।</p>
<p>बहरहाल, <strong>&#8216;मायइण्डिया</strong>&#8216; के एक लेख के अनुसार सन 1956 में, अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम द्वारा यौनकर्मियों की स्थिति के बारे में एक अत्यधिक महत्वपूर्ण कानून पारित किया गया था। जिसे एसआईटीए के नाम से भी जाना जाता है। यह कानून बताता है कि वेश्याओं को उनके निजी व्यापार को चलाने की पूरी अनुमति है, लेकिन वे इस व्यवसाय को सार्वजनिक रुप से या खुलेआम बिल्कुल भी नहीं चला सकती हैं। बीबीसी में एक लेख प्रकाशित किया गया था, जिसमें कहा गया है कि भारत में वेश्यावृत्ति अवैध है। हालांकि भारतीय कानून, वेश्यावृत्ति के रूप में पैसों के बदले वेश्याओं के साथ सेक्स सम्बन्ध बनाने की अनुमति नहीं देता है। कानून के अनुसार, यदि वे सार्वजनिक रूप से किसी भी यौन गतिविधियों में शामिल होती हैं, तो उनके ग्राहकों को गिरफ्तार भी किया जा सकता है। यदि एक व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत क्षमता के आधार पर पैसे देकर अगर किसी वेश्या से उसके बदले में सेक्स की अनुमति मांगता है, तो कोई भी वेश्या सार्वजनिक स्थान से लगभग 200 गज की दूरी के अंदर यह काम नहीं कर सकती है। देखा जाए, तो ये यौनकर्मी सामान्य श्रम कानूनों के दायरों में नहीं आती है। हालांकि, उनके पास वे सभी अधिकार हैं जो एक आम नागरिक के पास होते हैं, लेकिन आम लोग उनसे केवल आनंद ही लेना चाहते हैं, अगर वे इस दलदल से बचना चाहती हैं, तो उनका पुनर्वास भी करवाया जा सकता हैं। </p>
<p>हालांकि, एसआईटीए के रूप में उसका प्रयोग इस तरह नहीं किया जाता है। कभी-कभी आईपीसी के विभिन्न वर्गों को यौनकर्मियों के खिलाफ उनकी सार्वजनिक अश्लीलता, आपराधिक कृत्यों और आरोपों के विरुद्ध नियोजित किया जाता है। उनके ऊपर सार्वजनिक रुप से बाधाएं उत्पन्न करने के भी आरोप लगाए जा सकते हैं। अब समस्या यह है कि क्या इन अपराधों की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है क्योंकि कुछ सनकी अधिकारियों द्वारा यौनकर्मियों का शोषण करने के बाद उन्हें छोड़ दिया जाता है, वही यौनकर्मी बाद में उनके खिलाफ आरोप लगाती हैं। ‘एसआईटीए’ को हाल ही में ‘पीआईटीए’ या अनैतिक व्यापार (रोकथाम) के अधिनियम द्वारा बदल दिया गया है। इस कानून को बदलने के कई अथक प्रयास किये जा रहे हैं जिससे कि समाज में विस्तृत समूह में फैले हुए वेश्यावृत्ति और वेश्याओं के ग्राहकों पर लगे दोषों पर रोक लगाई जा सके। हालांकि, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने वेश्यावृत्ति में निरन्तर हो रहे विकास का विरोध किया है। लेकिन इन दिनों, कई बीमा कंपनियां यौनकर्मियों का बीमा करने के लिए आगे आ रही हैं। </p>
<figure id="attachment_3999" aria-describedby="caption-attachment-3999" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/aajtak-sonagachi-scaled.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/aajtak-sonagachi-scaled.jpeg" alt="" width="2560" height="1686" class="size-full wp-image-3999" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/aajtak-sonagachi-scaled.jpeg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/aajtak-sonagachi-300x198.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/aajtak-sonagachi-1024x674.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/aajtak-sonagachi-768x506.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/aajtak-sonagachi-1536x1012.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/aajtak-sonagachi-2048x1349.jpeg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3999" class="wp-caption-text">कलकत्ता का सोनागाछी : तस्वीर &#8216;आजतक&#8217; के सौजन्य से</figcaption></figure>
<p>आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 30 लाख यौनकर्मी रहते हैं। भारत में जिन महिलाओं को पैसे की अत्यधिक आवश्कता है और उनके पास धन कमाने का कोई रास्ता नही है तो वे विवश होकर इस पेशे को अपना लेती हैं। हालांकि, बहुत से ऐसे लोग भी होते हैं जो इन महिलाओं को वेश्यावृत्ति के पेशे को अपनाने के लिए मजबूर करते हैं। ऑल इंडिया नेटवर्क ऑफ यौनकर्मी के अध्यक्ष, भारती डे का कहना है कि महिलाएं खुद के हालातों से समझौता करके, अन्त में वेश्या बन जाती हैं, मगर हमें उन वेश्याओं को दूसरों के समान अधिकार देने की आवश्यकता है। पिछले कुछ सालों में, वेश्यावृत्ति के उद्योग में भारी बढोत्तरी हुई है और नए यौनकर्मी में से अधिकांश महिलाएं ग्रामीण क्षेत्रों की हैं, जिनमें बहुत ही कम महिलाएं ऐसी हैं जो कम या बिल्कुल भी शिक्षित नहीं है। उनमें से कुछ महिलाएं ऐसी हैं जो कम रुपयों में ही कोई छोटा और अच्छा काम करने का रास्ता चुनती हैं, जबकि कुछ महिलाएं अधिक रुपयों के लालच में यौनकर्मी का काम चुनती हैं। </p>
<p>वास्तव में, डे की अध्यक्षता वाला समूह, वेश्यावृत्ति में लिप्त महिलाओं को बाहर निकालना चाहता है। अप्रैल 2015 के दौरान, महिलाओं के खिलाफ अपराधिक मामलों पर एक बैठक बुलाई गई थी और जिसमें ऐसा कहा गया था कि अगर भारत यौनकर्मियों की संख्या को कम करने में सफल रहा, तो देश में महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर हो जाएगी। 2009 में, सुप्रीम कोर्ट ने यह सुझाव दिया था कि वेश्यावृत्ति के लिए कानून बनाया जाए। महिलाओं के लिए राष्ट्रीय आयोग, एक राष्ट्रीय-सरकारी संगठन ने इस मुद्दे को नजरअदांज कर दिया। इसकी प्रमुख ललिता कुमारमंगलम ने कहा था कि अगर वेश्यावृत्ति को पूर्ण रूप से नियन्त्रित करना है, तो हमारे देश के उच्च अधिकारियों को विशेष रूप से बच्चों की तस्करी पर रोक लगाने के लिए जल्द से जल्द कोई बेहतर कदम उठाने होगें। </p>
<p>यह उन बुरे हालातों में सुधार करने में मदद करेगा, जिसमें ग्राहक और यौनकर्मी के शरीर में एचआईवी-एड्स के प्रसार के साथ किसी अन्य बीमारी भी एक-दूसरे में पहुँचती हैं। 8 नवंबर को उन्होंने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में विशेष पैनल के रूप में प्रस्तुत किया, जो कानून बदलना चाह रहे थे। ‘मयंक ऑस्टेन सूफी’ जीबी रोड पर स्थिति वेश्यालय के बारे में लिखते रहे हैं और उनके अनुसार, सभी यौनकर्मी से बातचीत करने पर पता चला है कि वे सभी कानूनी दर्जा प्राप्त करने की इच्छा रखती है। वे लोग डॉक्टरों के पास बार-बार जाकर थक गई है और हमेशा पुलिस द्वारा परेशान किये जाने का डर भी उन्हें लगा रहता है। वे अपने मालिकों के घर भी एक डर की संभावना के साथ रहती हैं कि पता नहीं कब उनका मालिक उनको उस घर से निकाल दें, वे सब जीवित रहने के लिए वेश्यावृत्ति करने को मजबूर हैं। </p>
<p>जबकि इसके विपक्ष में विचार देने वालों का मानना है कि यह निश्चित रूप से सच है, हम केवल मजबूरी में की जाने वाली वेश्यावृत्ति को तुरंत बंद कर सकते है न कि ऐसी किसी भी गतिविधियों को जो स्वेच्छा से हो रही है। ‘अपने आप’ नाम का एक गैर-तस्करी समूह का कहना है कि तस्कारों के दलालों द्वारा गांवों में युवा लड़कियों और बच्चियों के माता-पिता को कम कीमत देकर खरीदते हैं, वह उन लड़कियों को दुगनी कीमत पर बेचते है, इसलिए इन मासूम लड़कियों को मजबूरी में अपने साथ हो रहे बलात्कार को सहना पड़ता है। अक्सर, पुलिस और एनजीओ के संगठनों ने इन पर छापा भी मारा है और लड़कियों को बचाने में मदद भी की है, लेकिन इससे कोई खास फायदा नहीं हुआ क्योंकि जैसे ही लड़कियां उनके चंगुल से छूट कर आती है, उनके परिवार वाले फिर से उन्हीं दलालों के हाथ बेच देते है। ‘अपने आप’ के अनुसार, भारत में लगभग 30% से अधिक यौनकर्मी 18 साल की आयु से कम की हैं।</p>
<p>स्पष्ट रूप से यह समूह वेश्यावृत्ति को कानूनी दर्जा देने के खिलाफ है। इनका कहना है कि सेक्स के लिए अधिक मांग के साथ, केवल तस्करी की मात्रा में वृद्धि होगी। इनकी ऐसी मांगों को कम करने के लिए “कूल मैन डू नॉट बाय सेक्स” नामक अभियान भी चलाया जा रहा था। इस अभियान को देखते हुए, वास्तव में इस कार्यक्रम को सफलता नहीं मिली, क्योंकि वह अब तक वेश्यावृत्ति के कम होने या वैध होने की संभावना की उम्मीद कर रहे थे।बीजेपी (भाजपा) एक रूढ़िवादी पार्टी के रूप में जानी जाती है और यह अप्रत्याशित है कि यह पार्टी यौन व्यापार के अनुमोदन के लिए अपना टिकट प्रदान करेगी, जिससे कि वेश्यावृत्ति में शामिल महिलाओं को राहत मिल सकें।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/prostitution-india-needs-changes-in-law">&#8220;हमारी बेटियां आपकी &#8216;पुरुषार्थ&#8217; को अपने दोनों पैरों के बीच रख लेती है, आपको सुकून मिलता है; लेकिन उसे &#8216;वेश्या&#8217; और &#8216;रंडी&#8217; भी आप ही कहते हैं&#8230;.&#8221;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/prostitution-india-needs-changes-in-law/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>पटना कॉलेज@160: यह गली सन 1974 की सम्पूर्ण क्रांति का साक्षी है, लालू, सुशिल मोदी, अश्विनी चौबे इत्यादि उभरते नेता यहाँ &#8216;लघुशंका&#8217; किया करते थे (6)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/this-street-is-a-witness-to-the-1974-total-revolution</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/this-street-is-a-witness-to-the-1974-total-revolution#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Apr 2022 04:46:53 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विदेश में बिहारी]]></category>
		<category><![CDATA[1974]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[laluyadav]]></category>
		<category><![CDATA[leaders]]></category>
		<category><![CDATA[ministers]]></category>
		<category><![CDATA[patnacollege]]></category>
		<category><![CDATA[susilmodi]]></category>
		<category><![CDATA[total revolution]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=3939</guid>

					<description><![CDATA[<p>सन 1974 के 12मार्च, मंगलवार को पटना कॉलेज मुख्य द्वार के अंदर कक्षाओं और प्रशासनिक भवन की ओर जाती हुई उम्र से लम्बी सड़क पर जब सीआरपीएफ के जवानों को शैक्षिक परिसर में आंदोलनकारी छात्रों की भीड़ को समाप्त करने के लिए आंसू गैस के गोले फेंकने पड़े, जबाब में आंदोलनकारी छात्र अपने अपने घरों [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/this-street-is-a-witness-to-the-1974-total-revolution">पटना कॉलेज@160: यह गली सन 1974 की सम्पूर्ण क्रांति का साक्षी है, लालू, सुशिल मोदी, अश्विनी चौबे इत्यादि उभरते नेता यहाँ &#8216;लघुशंका&#8217; किया करते थे (6)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सन 1974 के 12मार्च, मंगलवार को पटना कॉलेज मुख्य द्वार के अंदर कक्षाओं और प्रशासनिक भवन की ओर जाती हुई उम्र से लम्बी सड़क पर जब सीआरपीएफ के जवानों को शैक्षिक परिसर में आंदोलनकारी छात्रों की भीड़ को समाप्त करने के लिए आंसू गैस के गोले फेंकने पड़े, जबाब में आंदोलनकारी छात्र अपने अपने घरों और कमरों में जाने के वजाय, उस आंसू गैस के गोले पर पेशाब कर, पानी डालकर उसकी तीब्रता को कम करने की अथक परिश्रम कर, उसे उठाकर पुनः सीआरपीएफ पर फेंखने लगे &#8211; उस क्षण देश के ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित सुरक्षा एजेंसी के जवानों को, जिसमें कई अभिभावक भी थे, कई पिता भी थे, कई बड़े भाई भी थे और जिनके ऊपर अपने-अपने संतानों को पढ़ाने का जबाबदेही भी था &#8211; आंदोलन की शुरुआत को देखकर एक अभिभावक के रूप में प्रदेश ही नहीं, बल्कि आने वाले समय में सम्पूर्ण देश में शिक्षा और शैक्षिक संस्थाओं की धज्जी उड़ते देख रहे थे। शिक्षा और शैक्षिक संस्थाओं का राजनीतिकरण हो गया था। छात्र भटक गए थे। आज तक उस मार को देश का 99.5+ फीसदी भोक्ता उठ नहीं पाया, जबकि उस दिन के आंदोलनकारी देश &#8211; प्रदेश के सत्ता पर कब्ज़ा भी किये और सत्यानाश भी </strong></p>
<p><strong>यह गली और यह नुक्कड़ सन 1974 की सम्पूर्ण क्रांति का प्रथम द्रष्टा है, साक्षी है। आज जहाँ यह पानी गिरा देख रहे हैं, सत्तर के दशक में इस गली के प्रवेश के साथ (इसी स्थान पर) बाएं हाथ एक लकड़ी का बना &#8216;गुमटी&#8217; (दूकान) रखा होता था। उस गुमटी के पीछे लालू प्रसाद यादव, सुशिल कुमार मोदी, नरेंद्र सिंह, बशिष्ठ नारायण सिंह, अश्विनी चौबे, चंद्रदेव प्रसाद वर्मा और पटना कालेज के सैकड़ों छात्र, सैकड़ों मूंछ की रेखाओं जैसी उभरते नेताओं के &#8216;अगलग्गू&#8217; से &#8216;पिछलग्गू&#8217; तक &#8216;लघुशंका&#8217; किया करते थे। उन दिनों जो नेता &#8216;बेलबाटम&#8217; अथवा पैंट पहनते थे, उनके लिए तो सहज था; लेकिन लालू प्रसाद यादव, अश्विनी चौबे, सुशील कुमार मोदी जैसे महानुभावों के लिए लघु-शंका से &#8216;निवृत&#8217; होना बहुत कठिन कार्य होता था। वे सभी पैजामा-कुर्ता घारी होते थे। और पैजामा-कुर्ता में &#8216;शंका&#8217; से निवृत होना प्रत्येक पल सशंकित ही रहना पड़ता था। बिना अर्ध-नग्न हुए &#8216;लघुशंका&#8217; से भी निवृत नहीं हो सकते थे।</strong></p>
<p>कई मर्तबा तो पटना विश्वविद्यालय के ये सभी महानुभाव शंकाओं से निवृत होते समय ऊपर-दाएं-बाएं यह भी देखते रहते थे कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा है। सबसे अधिक डर उस गली में रहने वाले बुजुर्गों से होता था। क्योंकि उन दिनों पटना नगर निगम के कर्मचारी औसतन 365-दिनों में 52 रविवारों को छोड़कर शेष 313 दिन हड़ताल पर ही रहते थे। नालियां खुली होती थी। इस गली में भी बाएं हाथ लम्बी और गहरी खुली नाली थी, जिससे मुद्दत से जमा पानी धीरे-धीरे आगे की ओर उन्मुख होता रहता था। गली के बच्चे सुबह-सवेरे इस ऐतिहासिक गली की नाली का परंपरागत रूप से इस्तेमाल करते थे &#8211; लघु और दीर्घ शंकाओं से निवृत होने के लिए। बच्चे तो बच्चे होते थे और घर में &#8216;कमाऊ शौचालय&#8217; था, जिसका निकास भी इसी गली के तरफ था। आम तौर पर शौचालय जाने के बाद मन सशंकित रहता था, कहीं अधिक तेज से &#8216;आवाज&#8217; नहीं निकल जाय। ऐसी स्थिति में गली में आवक-जावक लोग बाग़ कभी-कभार आवाज भी लगा देते थे &#8211; अरे झाजी संभल के।</p>
<p>गली के नुक्कड़ के दाहिने हाथ वाले तीन-तल्ला मकान पर सम्मानित श्री जगदीश प्रसाद जी रहते थे। यह उनका पुस्तैनी घर था। आज भी है लेकिन जगदीश बाबू अब नहीं हैं। उनकी पत्नी भी अब नहीं हैं। उनके माता-पिता भी अब नहीं हैं। जगदीश बाबू की पत्नी श्रीमती शांति जी हिंदी साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री जी की मुंहबोली साली थीं। शास्त्रीजी जब भी पटना प्रवास करते थे, यहीं रुकते थे। हम सभी बच्चे, उनके घर के लोग &#8216;मौसाजी&#8217; की सेवा करने में हरदम तत्पर रहते थे।</p>
<p>जगदीश जी की एक दूकान थी &#8216;शांति कैफे&#8217; जो उनके मकान के सबसे नीचले तल्ले में थी। उसका रास्ता तो गली से भी था, लेकिन दूकान के मद्दे नजर मुख्य प्रवेश अशोक राजपथ से था। इसलिए प्रातःकाल दूकान खुलने के साथ-साथ इस गली के दो महत्वपूर्ण व्यक्ति &#8211; श्री जगदीश बाबू और श्री ननकू जी (यादव) &#8211; साफ़ सफाई पर विशेष ध्यान रखते थे। ननकूजी का होटल गली के दाहिने तरफ नुक्कड़ पर थी &#8211; चाय, नास्ता, जलेबी, सिंघाड़ा, गुलाब जामुन इत्यादि। इसलिए इस गली के नुक्कड़ वाले कोने को कोई शौचालय नहीं बना दे, दोनों बहुत तत्पर रहते थे।</p>
<p>उन दिनों महामहीम गूगल झा धरती पर अवतरित नहीं हुए थे, यानी, सामाजिक क्षेत्र का &#8216;कैमरे वाला मिडिया (मोबाईल फोन) का ब्रह्मास्त्र भी जन्म नहीं लिया था। पटना की सड़कों पर कंधे पर कैमरा लटकाये साईकिल से, मोपेड से, स्कूटर से दाहिने लटके/झुके जो भी कैमरामैन अवलोकित होते थे उनमें सत्यनारायण दूसरे, कृष्ण मुरारी किशन और राजीव कांत सर्वाधिक चर्चित थे। इनके अलावे कभी-कभार श्री बीरजी अपने ब्लू रंग के स्कूटर से मोटा शरीर लिए दिखाई देते थे। बीर जी की दूकान अशोक राजपथ पर स्थित पटना विश्वविद्यालय पुस्तकालय के दाहिने प्रवेश द्वार (आप निकासी कह सकते हैं) के ठीक सामने इलाहाबाद बैंक के सामने &#8216;सन्नी स्टूडियो&#8221; के नाम से विख्यात था।</p>
<p>वह तो सिर्फ बीर जी ही हैं जो पटना के वर्तमान में &#8220;नेता&#8221;, जो फिल्म जगत में &#8220;खामोश&#8221; के नाम से कुख्यात हैं, नाम हैं शत्रुघ्न सिन्हा की पहली तस्वीर खींचे थे। बीर जी की वह तस्वीर मुंबई के फिल्म जगत में अमित छाप छोड़ा था। बाबू शत्रुघ्न सिन्हा उन दिनों पटना साइंस कॉलेज के छात्र थे और फिल्म उद्योग में चेहरे पर दाग लिए किस्मत आजमा रहे थे। आगे क्या हुआ यह तो मुंबई ही नहीं, पूरा विश्व जानता है। इसलिए चेहरे के दाग को छिपाएं नहीं, हर दाग बुरे नहीं होते &#8211; बाबू शत्रुघ्न सिन्हा साहेब साबित कर दिए हैं।</p>
<p>ननकू जी की दूकान के ऊपर वाले तल्ले में राजेंद्र बाबू अपनी विधवा माँ, पत्नी, तीन पुत्र और एक नई नवेली बहु के साथ रहते थे। उनका निवास सड़क की ओर वाले कमरों में था। इस घर से कोई दस कदम आगे एनीबेसेन्ट रोड की ओर आने पर कमाल बाइंडिंग स्टोर्स &#8211; स्टेशनरी विक्रेता &#8211; के पास राजेंद्र बाबू की पान की दूकान थी। कभी खुद बैठते थे, कभी माँ, तो कभी तीनों पुत्र समयानुसार। उनका छोटा बेटा बहुत शरारती था। जैसे ही किसी को नीचे नुक्कड़ पर ओट लिए लघुशंका से निवृत होते देख लेता था, झटपट ऊपर से एक मग, एक गिलास पानी निशाना साध कर फेकता था। इस मकान के पीछे वाले हिस्से में एक कमरा ऊपर और एक कमरा नीचे किराये पर मेरे बाबूजी लिए थे। बाबूजी उस समय नोवेल्टी में काम करते थे। घर और कार्यस्थल की दूरी अधिक नहीं थी। हम दसवीं कक्षा में पढ़ते थे ऐतिहासिक टी के घोष अकादमी में।</p>
<p>ननकु जी के होटल के आगे फुटपाथ पर पटना नगर निगम का एक नल होता था। जो अपने निश्चित समय पर सुबह-दोपहर-शाम में &#8216;सीटी&#8217; बजता था। सीटी बजाना इस बात का संकेत होता था कि सरकारी पानी का आगमन होने वाला है। आज भी वह ऐतिहासिक नल अपने स्थान पर है। इस नल के 105 डिग्री कोण पर ननकू जी का होटल था और 75 डिग्री कोण पर गौरी शंकर जी का ऐतिहासिक पान की दूकान। आज की तारीख में भी वह दूकान अपने अस्तित्व में बरकरार है।</p>
<p>सम्मानित गौरी शंकर जी का देहावसान 1969 में हो गया। वे अपनी दूकान से कोई पांच मिनट के रास्ते पर पुरन्दरपुर मोहल्ला में संयुक्त परिवार प्रथा को जीवित रखते रहते थे। गौरीशंकर जी पटना कॉलेज के स्थापना के पचासवें वर्ष के आस-पास किराये पर दूकान खोले थे &#8211; बनारसी पान वाला । आज उनकी दूकान उनका सबसे छोटा बेटा श्री टुनटुन जी चलाते हैं। टुनटुन जी की आयु भी कोई 70+ में है। टुनटुन जी तीन भाई &#8211; जगदीश जी, लालजी बाबू और वे &#8211; थे। उनकी दूकान से सटी एक दर्जी की दूकान होती थी, जो उस ज़माने में पटना कालेज के छात्रों का एक बैठक भी होता था।</p>
<p>टुनटुन जी बात करते कहते हैं: &#8220;बाबूजी के समय में मैं उनकी हाथ पकड़कर आता था। जैसे जैसे बड़ा हुआ पढाई भी करता रहा। कालेज में आने पर पटना कालेज परिसर में गंगा किनारे स्थित वाणिज्य महाविद्यालय में प्रवेश लिया। बाबूजी के समय से लेकर आज के ज़माने तक पटना कॉलेज के ही नहीं, पटना विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले, पढ़ाने वाले शायद ही कोई छात्र (यहाँ तक कि छात्राएं भी) और प्राध्यापक होंगे, जो हमारी दूकान से पान खाकर अपना होठ लाल नहीं किये होंगे।&#8221;</p>
<p>टुनटुन जी आगे कहते हैं: &#8220;उन दिनों के बने गंहकी (ग्राहक) की पीढ़ियां जैसे जैसे आगे बढ़ती गई, इस दूकान के गद्दी (जो पान लगाते थे, पैसे लेते थे) पर बैठने वाले भी बदलते गए &#8211; लेकिन भगवान का कृपा है कि आज भी सम्बन्ध बने हुए हैं। पान का सम्बन्ध ही कुछ ऐसा होता हैं। कई गंहकी तो ऐसे थे कि महेन्द्रू से, सुल्तानगंज से, पटना सिटी से रिक्शा से, गाड़ी से, टमटम से पान खाने आते थे। उन दिनों रात के कम से कम बारह बजे तक दुकानें खुली होती थी, खासकर जब पटना विश्वविद्यालय में परीक्षा का समय होता था। देर रात झुण्ड में लड़के चाय पीने, पान खाने, सिगरेट पीने आते थे &#8211; मन तो तड़ोताजा करने के लिए। सन 1974 के आंदोलन या उससे पहले भी, पटना कॉलेज या पटना विश्वविद्यालय के शायद ही कोई नेता होंगे (नहीं ही माने) जो इस दूकान पर बाबूजी के हाथों, हमारे बड़े भाइयों &#8211; जगदीश जी और लालजी भैया &#8211; पान नहीं खाये होंगे।&#8221;</p>
<p>टुनटुन जी कहते हैं: &#8220;लालू यादव हों या सुशील मोदी हों, राम विलास पासवान हों, अश्विनी चौबे हों, या फिर आज के भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा हो &#8211; सभी ननकू होटल, बनारसी पान वाला और शांति कैफे दुकानों को आज भी जानते हैं। मुद्दत तक यहाँ जमघट लगाते थे। पान खाते थे।&#8221;</p>
<p>बहरहाल, उस दिन शायद मंगलवार था और सन 1974 साल का 12 मार्च। देश में राजनीतिक सत्ता के बदलाव के लिए बिहार के छात्र &#8211; युवा वर्ग सड़क पर आ गए थे। वैसे आंदोलन में नेतृत्व की किल्लत थी क्योंकि जयप्रकाश नारायण का अभ्युदय नहीं हुआ था। स्थानीय शासन, व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन प्रारम्भ हो गया था। उस दिन सुबह-सवेरे पटना कॉलेज के मुख्य द्वार पर आंदोलनकारी छात्र सड़क पर आ गए थे। यत्र-तत्र तोड़-फोड़ की घटना प्रारम्भ हो गयी थी। सभी सरकारी वाहन (वैसे उन दिनों कितने वहां चलते ही थे सिवाय पटना वीमेंस कॉलेज/मगध महिला कॉलेज की ऑनर्स की छात्राओं को उनके कॉलेज से पटना कालेज लाना) ऑफ दी रोड थी। लेकिन सरकारी कार्यालय, चाहे विश्वविद्यालय का उनका अपना ही दफ्तर/भवन क्यों न हो, में तोड़फोड़ के कारण भय का वातावरण था। ईंट वाजी, पत्थर वाजी प्रारम्भ हो गया था स्थानीय पुलिस पर। पटना के गांधी मैदान से महेन्द्रू मोहल्ला तक, आगे भी सभी दुकानों का दरवाजा नीचे गिरा दिया गया था। कुछ दुकानदार, खासकर राशन दूकान वाले, अपने दरवाजे को बंद कर भी अंदर से जरूरतमंदों को आटा, चावल, दाल, तेल आदि की आपूर्ति कर रहे थे। किसी को कुछ पता नहीं था कि आगे पल, अथवा आने वाले दिनों में क्या होने वाला है।</p>
<p>बिहार का राजनीतिक कमान अब्दुल गफूर साहब के हाथों था। सत्तर के दशक में गफूर साहब बहुत ही भाग्यशाली राजनेता थे जो एक साल 283 दिनों तक मुख्यमंत्री के सिंहासन पर बैठे रहे। अन्यथा दरोगा प्रसाद राय (310 दिन), भोला पासवान शास्त्री (222 दिन) केदार पांडेय (एक साल 105 दिन), रामसुंदर दास (302 दिन) ही रहे। हाँ, कर्पूरी ठाकुर और डॉ जगन्नाथ मिश्र अधिक दिनों तक कुर्सी पर विराजमान रहे। पांचवा, छठा और सातवां विधान सभा का समय था। प्रशासन का कमान एफ अहमद के हाथों था। अहमद साहब बेहद खूबसूरत दीखते थे। कोई छह फुट लंबे थे। स्मार्ट तो थे ही। पटना कालेज की छात्राओं की नजरों में बहुत सम्मानित भी थे। छात्राएं उन्हें &#8216;तिरछी नजर&#8221; से बहुत ही सम्मान के साथ देखती थी। अब तक पटना कालेज के आस-पास का वातावरण गर्म हो गया था। बीच बीच में कृष्ण मुरारी किशन, सत्यनारायण दूसरे और राजीव जी (सभी फोटोग्राफर्स) दीखते थे। उन्हें देखते वातावरण और भी गर्म हो जाता था &#8211; आखिर अख़बारों में छपने का सवाल था।</p>
<p>अब तक स्थानीय पुलिस (पटना पुलिस) के स्थान पर इधर केंद्रीय रिजर्व पुलिस फ़ोर्स (सीआरपीएफ) कमान संभाल लिया था। उन दिनों सीआरपीएफ के सज्ज जवानों की उपस्थिति इस बात का द्योतक होता था कि स्थिति सामान्य नहीं है और स्थानीय प्रशासन कुछ भी नहीं कर सकती है। सीआरपीएफ की अहमियत प्रदेश अथवा केंद्र के गृह मंत्री से भी अधिक होता था &#8211; जहाँ तक सम्मान का सवाल है।</p>
<p>सीआरपीएफ की उपस्थिति देखते ही पटना कालेज के आंदोलन कारी छात्रों ने मुख्य द्वार पर लोहे के सिक्कड़ के साथ ताला लटका दिया, ताकि वह अंदर नहीं प्रवेश ले सके। हम सभी जगदीश बाबू के छत से दृश्य देख रहे थे। गोली चलने की नौबत नहीं थी, फिर भी सीआरपीएफ के जवान हम सबों को वहां से हटने को कहते थे। इसी बीच एक महिला प्रशासनिक अधिकारी के आदेश पर आंसू के गोले पटना कालेज परिसर में फेंकना प्रारम्भ हो गया। इधर मुख्य द्वार के दरवाजे को गोली से तोड़ा गया। दुर्भाग्यवश, उस दिन हवा का रुख आंदोलनकारी छात्रों के पक्ष में था। गंगा छोड़ से आने वाली हवा आंसू गैस को उड़ाते मुख्य सड़क की ओर आने लगी। सीआरपीएफ के जवान अपनी आखों के सामने शीशे वाली पट्टी लगाने के बाद भी अपनी आखों को जेब में रखे रुमाल से पोछने से रोक नहीं सके।</p>
<p>उस आंदोलन में पहली बार सीआरपीएफ के जवानों को हताश देखे थे। उन जवानों में कई के संतान पटना विश्वविद्यालय या बिहार के अन्य विश्वविद्यालयों के छात्र &#8211; छात्राएं थे। शायद पटना कालेज के सामने अशोक राज पथ पर सं 1974 की आंदोलन की शुरुआत को देखकर एक अभिभावक के रूप में सीआरपीएफ के जवान प्रदेश ही नहीं, बल्कि आने वाले समय में सम्पूर्ण देश में शिक्षा और शैक्षिक संस्थाओं की धज्जी उड़ते देख रहे थे। शिक्षा और शैक्षिक संस्थाओं का राजनीतिकरण हो गया था। छात्र भटक गए थे। आज तक उस मार को देश का 99.5+ फीसदी भोक्ता उठ नहीं पाया, जबकि उस दिन के आंदोलनकारी देश &#8211; प्रदेश के सत्ता पर कब्ज़ा भी किये और सत्यानाश भी&#8230;..</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/this-street-is-a-witness-to-the-1974-total-revolution">पटना कॉलेज@160: यह गली सन 1974 की सम्पूर्ण क्रांति का साक्षी है, लालू, सुशिल मोदी, अश्विनी चौबे इत्यादि उभरते नेता यहाँ &#8216;लघुशंका&#8217; किया करते थे (6)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/this-street-is-a-witness-to-the-1974-total-revolution/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>&#8216;जिगर के टुकड़े&#8217; काल से बिहार-झारखण्ड का शिक्षा तंत्र और विध्वंसकारी त्रासदी, &#8216;सड़क&#8217; वाले &#8216;ब्लैकबोर्ड&#8217; पर दिखने लगे</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/interview/bihar-jharkhands-education-system-and-devastating-tragedies</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/interview/bihar-jharkhands-education-system-and-devastating-tragedies#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 09 Mar 2022 11:51:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इंटरव्यू]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[college]]></category>
		<category><![CDATA[devastation]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[leaders]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[road]]></category>
		<category><![CDATA[school]]></category>
		<category><![CDATA[students]]></category>
		<category><![CDATA[teachers]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=3889</guid>

					<description><![CDATA[<p>पटना:  &#8216;जिगर के टुकड़े&#8217; &#8211; काल से आज तक राज्य के शिक्षा तंत्र में जो कुछ भी किया गया है, उसे विध्वंसकारी त्रासदी के सिवा और कुछ कहा भी नहीं जा सकता। सातवें दशक में &#8216;जिगर के टुकड़ों&#8217; ने परीक्षा (पर-इच्छा) को स्वेच्छा (स्व-इच्छा) में बदल डाला। आठवें दशक में विश्वविद्यालयों के अधिनियम/परिनियम के खुलकर [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/interview/bihar-jharkhands-education-system-and-devastating-tragedies">&#8216;जिगर के टुकड़े&#8217; काल से बिहार-झारखण्ड का शिक्षा तंत्र और विध्वंसकारी त्रासदी, &#8216;सड़क&#8217; वाले &#8216;ब्लैकबोर्ड&#8217; पर दिखने लगे</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>पटना:  &#8216;जिगर के टुकड़े&#8217; &#8211; काल से आज तक राज्य के शिक्षा तंत्र में जो कुछ भी किया गया है, उसे विध्वंसकारी त्रासदी के सिवा और कुछ कहा भी नहीं जा सकता। सातवें दशक में &#8216;जिगर के टुकड़ों&#8217; ने परीक्षा (पर-इच्छा) को स्वेच्छा (स्व-इच्छा) में बदल डाला। आठवें दशक में विश्वविद्यालयों के अधिनियम/परिनियम के खुलकर राजनीतिकरण हुए। शिक्षकों की नियुक्ति-प्रोन्नति के दृढ़ बंधेजों को अपनी सुविधानुसार इतना लचीला कर दिया गया कि जिन्हें रोड पर होना चाहिए था, वे ब्लैकबोर्ड पर दिखाई पड़ने लगे। नवें दशक के मध्य से आज तक की अवधि में नियुक्तियां (कुलपति की हो या प्रतिकुलपति की, प्रधानाचार्य की हो या कुल-सचिव की, शिक्षक की हो या शिक्षकेत्तर कर्मचारी की) खुले बाजार की वस्तु बनकर रह गई। </p>
<p>&#8220;Buy now, pay later&#8221; के तर्ज पर &#8220;teach now, learn later&#8221;के ब्रिगेड रंगरूटों को प्राथमिक शिक्षकों की वर्दी में तैनात कर दिया गया, तो मुन्ना भाई- एमबीबीएस डिग्रीधारियों ने कॉलेजों में टंगे ब्लैकबोर्डों का भार सम्भाल लिया। कुर्ता-बंडी धारियों की खुदगर्जी और लघुदर्शिता के कारण से भी गाॅड-फादर, आईएएस आफिसरान अपनी अप्रौढ़ सोच, बदनीयतियों एवं कुवृत्तियों से मदहोश होकर जैसी नीति निर्धारण करते रहे हैं; उसी का अंजाम है, राज्य के शिक्षा तंत्र में की वर्तमान स्थिति।</p>
<p><strong>कारण चाहे जो कुछ भी हो, दायित्व चाहे जिसका भी हो पर इस यथार्थ को नकारा नहीं जा सकता कि विगत चार-पांच दशकों के दौरान राज्य का शिक्षा तंत्र, दिशाहीनता का शिकार रहा है। आज शिक्षातंत्र पर पूर्ण रूप से असामाजिक तत्वों का कब्जा हो चुका है। नतीजा यह है कि हमारे पास न तो पुराने आदर्श रह गए हैं और न कोई ठोस नवीन की रूप-रेखा। आज नई पीढ़ी के पास न कोई मानदण्ड है, न ज्ञान है और न अनुभव, जिससे वह अपने चिंतन और अपनी गतिविधियों को नियंत्रित कर सके। यह खतरे की स्थिति है। अगर इसका अवरोध और सुधार नहीं हुआ, तो इससे भयानक परिणाम निकल सकते हैं। </strong></p>
<p>ज्ञान विहीन डिग्रीधारी नई पीढ़ी अपने भविष्य के प्रति किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में है। कारण, उसकी सोच अप्रौढ़, अपरिपक्व व्यक्तित्व और आत्मविश्वास भीरुता  है। हम आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में संक्रान्ति की अवस्था से गुजर रहे हैं। इसे भी नकारा नहीं जा सकता कि आर्थिक सम्पन्नता जीवन और प्रगति का बुनियादी आधार है। </p>
<p>लेकिन काश! नई पीढ़ी इस तथ्य को स्वीकारने का सामर्थ्य रखती कि जिन्दगी का मकसद वहीं तक खत्म नहीं होता। कठोर परिश्रम के बल पर अर्जित ज्ञान, डिग्री और अनुभव के प्रति पनपी अरूचि, नई पीढ़ी का दुर्बल पक्ष है। आज, राज्य के नवयुवक वर्ग के समक्ष जो प्रश्न है, वह केवल सैद्धान्तिक ही नहीं है, उसका सम्बन्ध उनकी जीवन की सारी प्रक्रिया से जुड़ा है और उसके समुचित निदान और समाधान पर ही उनका भविष्य निर्भर करता है। यह डिग्रीधारी नवयुवक वर्ग समाज में स्वयं को असहज/विकल महसूस कर रहा है जो उसके नैतिक पतन का संकेत है। सम्भ्रान्त तरुणों के जीवन से जुड़ी समस्याओं का एकमात्र समाधान उसकी सोच और व्यक्तित्व की परिपक्वता है जिसके आवश्यक है &#8211; गहन अध्ययन और विद्वान अध्यापक का स्नेह एवं मार्ग दर्शन। गुरू के नाम पर शिक्षा-शास्त्री तो अतीत का विषय बनकर रह गया है।</p>
<figure id="attachment_3892" aria-describedby="caption-attachment-3892" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/Picture-1356-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/Picture-1356-1.jpg" alt="" width="2200" height="1457" class="size-full wp-image-3892" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/Picture-1356-1.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/Picture-1356-1-300x199.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/Picture-1356-1-1024x678.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/Picture-1356-1-768x509.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/Picture-1356-1-1536x1017.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/03/Picture-1356-1-2048x1356.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3892" class="wp-caption-text">जिगर के टुकड़े और सम्पूर्ण क्रांति :  शैक्षणिक पाठशाला</figcaption></figure>
<p><strong>&#8216;जिगर के टुकड़े&#8217; और &#8216;सम्पूर्ण क्रांति&#8217; की देन है &#8211; बुद्धिजीवी-युग, जिसका अर्थ होता है &#8211; बुद्धि या तिकड़म से जीविका करनेवाला। आज विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों में शिक्षक पदों पर शिक्षा-शास्त्री नहीं, बल्कि कोरे बुद्धिजीवियों ने अपनी पैठ बना रखी है। प्राथमिक विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक छात्र-छात्राओं का पाठ्य-पुस्तक एवं ज्ञान-अर्जन से जुड़ी पुस्तकों का अध्ययन के प्रति विमुख होने का मुख्य कारण है,‌ बुद्धिजीवी शिक्षकों की विषय में अज्ञानता और खुली-किताब सिस्टम परीक्षातंत्र,‌ जिसे समाज और प्रशासन की स्वीकार्यता प्राप्त हो चुकी है। आचरण,‌ व्यवहार और सहिष्णुता में अप्रत्याशित गिरावट वर्तमान पीढ़ी का स्वयं अर्जन है या पूर्ववर्तियों का उपहार, अपने आप में एक सवाल बना हुआ है। यह त्रासदी नहीं तो क्या है कि जिन उपलब्धियों पर इन्हें नाज है,‌ वे उनकी प्राकृत नासमझी के सिवा कुछ और नहीं।</strong></p>
<p>कुलाधिपतियों ने 12 यूनिवर्सिटी स्पेक्ट्रम के आबंटन में &#8216;हम भी&#8217; की उद्घोषणा की। &#8216;हथौडा़ गिराने&#8217; की संस्कृति से राज्य के विश्वविद्यालयों में भूचाल आया और बहुत कुछ हुआ जो नहीं होना चाहिए था। कुलाधिपति महोदय के सुर से सुर मिलाते कुलपतियों द्वारा नियुक्त प्रिंसिपलों ने भी स्वेच्छा से शंखनाद किया &#8216;हम भी&#8217;। राज्य के शिक्षा मंदिरों में घंटी का बजना बन्द हो गया और चहल-पहल परिसर उजाड़ हो गए। यह है बिहार की मेधावी पीढ़ी (?)। शिक्षा-परीक्षा के मानसिक, तनाव से मुक्त रखने का अधिकार इनके स्वयं का अर्जन है। इस वर्तमान पीढ़ी (?) को बिहार पर गर्व है, और बिहार के वर्तमान पीढ़ी पर। गजब का है, यह पारस्परिक नाज का रिश्ता। प्रश्न उठता है, क्या कल के बिहार के अनुरूप है इसकी वर्तमान पीढ़ी की बौद्धिक उपलब्धियां ? क्या यह कहना उचित होगा कि बौद्धिक दृष्टिकोण से आज की पीढ़ी बिहार को परिभाषित करती है?&#8230;&#8230;&#8221;</p>
<p>बहरहाल, <strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम </strong>से बात करते मेसर्स नोवेल्टी एण्ड कम्पनी के प्रबन्ध निदेशक नरेन्द्र कुमार झा कहते हैं कि &#8220;पटना कॉलेज व पटना विश्वविद्यालय की पत्रिकाओं/रिसर्च जर्नलों/पटना यूनिवर्सिटी स्पोर्ट्स बोर्ड/विश्वविद्यालय दर्पण आदि का प्रकाशन लगभग 53 वर्ष पहले से ही पूर्णतः बन्द था। हमने अभी से 10 वर्ष पूर्व इन पत्रिकाओं को पुनर्स्थापित किया। एक ओर हमने पटना विश्वविद्यालय की &#8216;मानविकी एवं समाज विज्ञान की शोध-पत्रिका&#8217; (Annual Research Journal &#038; Social Science) के प्रकाशन को 2011 में प्रारम्भ किया तो दूसरी ओर पटना कॉलेज की शोध-पत्रिका  &#8220;Current Studies (A Research of Patna College)&#8211; का पुनः आरम्भ आठ वर्ष पूर्व हुआ। शोधकर्ताओं की हेतु हमें केन्द्रीय स्तर पर ISS भी प्राप्त हो चुका है। पटना विश्वविद्यालय की शोध पत्रिका Research Journal of Humanities &#038; Social का ISSN 2277-2022 (UGC Approved List of Journal No. 64257) है जबकि पटना कॉलेज की शोध-पत्रिका Current Studies का ISSN 2347-9833 है।&#8221; </p>
<p>नरेन्द्र कुमार झा आगे कहते हैं कि &#8220;पटना विश्वविद्यालय की शोध पत्रिका का प्रति वर्ष का एक भोल्युम लगभग 600-700 पृष्ठों का होता है जबकि पटना कॉलेज की शोध-पत्रिका लगभग 225 पृष्ठों की होती है। हम लोग पटना विश्वविद्यालय की पत्रिका का अबतक 9 भोल्युम प्रकाशित कर चुके हैं। हमारे द्वारा प्रकाशित दोनों रिसर्च जर्नल/शोध पत्रिका यूजीसी से मान्यता प्राप्त करने वाला बिहार का अकेला जर्नल है। इन दोनों पत्रिकाओं के अतिरिक्त हम 10 साल से प्रति वर्ष पटना महाविद्यालय स्थापना दिवस (9  जनवरी) की तिथि को &#8216;पटना काॅलेज पत्रिका&#8217; का भी प्रकाशन करते हैं। इसी तरह 2022 में हम पटना विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस (1  अक्टूबर) की तिथि को &#8216;विश्वविद्यालय दर्पण&#8217; का प्रकाशन करके उसका लोकार्पण 1  अक्तूबर 2022  को &#8216;ह्वीलर सिनेट हाॅल&#8217; में करने का प्रयास करेंगे।&#8221;</p>
<p>उनका कहना है कि  &#8220;आज भी (लॉक-डाउन की अवधि में भी) हम स्नातकोत्तर के उपरान्त शिक्षकों को अपने विषय की पुस्तक लिखने हेतु प्रेरित करते हैं। हमारे द्वारा उनकी पुस्तकों का प्रकाशन आज भी जारी है। कतिपय लेखक 3-5 वर्ष के अन्दर अपनी पुस्तकों के प्रकाशन के फलस्वरूप &#8216;पीएचडी&#8217; भी प्राप्त करते हैं, मतलब, लेक्चरर को प्रोफेसर की उपाधि प्रदान होती है।&#8221; </p>
<p>बिहार के शिक्षाविदों, विद्वानों, विदुषियों से अपील करते नरेन्द्र कुमार झा कहते है कि &#8220;यदि शिक्षा से सम्बद्ध अपना आलेख हमें डाक पता अथवा व्हाट्सएप के माध्यम से प्रेषित करते हैं तो हम उसे उपयुक्त पत्रिका में प्रकाशित करने का यथासंभव प्रयास भी करेंगे। आपकी अभिरुचि पर हम मेसर्स नोवेल्टी एण्ड कम्पनी द्वारा प्रकाशित की गई महाविद्यालय/विश्वविद्यालय की पत्रिकाओं की कुछ तस्वीरें भी व्हाट्सएप कर सकते हैं।&#8221; </p>
<p><strong>डाक पता:<br />
प्रबन्ध निदेशक,<br />
मेसर्स नोवेल्टी एण्ड कम्पनी,<br />
तारा भवन, अशोक राजपथ, पटना &#8211; 800 004<br />
दूरभाष: 0612-2678389 / मोबाईल: 89874-92351/89867-62237/व्हाट्सएप: 94717-84609<br />
इ-मेल: nkjha48@gmail.com/ noveltyandco@gmail.com</strong></p>
<p>ज्ञातव्य हो कि मेसर्स नोवेल्टी एण्ड कम्पनी मूलतः आजादी से पूर्व 1937-38 में ही संस्थापित हुआ था। उस समय हम देश की सबसे अच्छी लेखन सामग्रियों (कलम, पेंसिल, रोशनाई, कोरस कार्बन, कागज, रजिस्टर, फाइल इत्यादि) का क्रय-विक्रय करते थे। इन सामग्रियों को आठ वर्ष उपरान्त पूर्णतः विराम लगाकर सन 1945-46 में पुस्तकों के प्रकाशन का शुभारम्भ किया जो आज भी कायम है। इस संस्थान के माध्यम से बिहार में लेखकों का निर्माण किया गया, महाविद्यालयों के सेवाकर्मी बना । सन 1949-50 में एक अन्य शैक्षिक संस्थान मेसर्स अजन्ता प्रेस प्रा० लिमिटेड के माध्यम से विद्यालयों के भी सेवाकर्मी बने।</p>
<p>नरेंद्र कुमार झा कहते हैं: &#8220;आम नागरिक हेतु हमारा लक्ष्य एक ही था, है और आगे भी रहेगा &#8211; बिना किसी प्रचार-प्रसार के अपने शैक्षिक संस्थान के माध्यम से शैक्षणिक क्षेत्रों में सदैव सेवा कर्मी बने रहना। हम किस वर्ग/श्रेणी में कब-कब सफल या असफल हुए हैं वह हमारे नहीं रहने के बाद ही देश की जनता (विशेषकर मिथिलांचल भारतीय आम नागरिक) पूर्णतः जान सकेगी। मेरा मानना है कि कतिपय &#8216;विषयों&#8217; का इतिहास उन्हीं लेखिकाओं/लेखकों से समयावधि में साझा किया जा सकता है जिसमें उन्हें अभिरुचि हो। आज के युग में साझा-परिचर्चा के अन्तर्गत सरकारी व गैर-सरकारी प्रबुद्ध शैक्षणिक संस्थानों के क्रियाकलापों का विषय प्रमुख है। खासकर इसलिए भी क्योंकि आजकल शैक्षणिक क्षेत्रों की वर्तमान युग की जायका से हमें  समाचार पत्र बखूबी अवगत कराते हैं। यदि हम अपने प्रदेश में निश्चित रूप से शैक्षणिक संस्थानों का &#8216;घोटाला&#8217; सार्वजनिक कर समाजसेवी बनना चाहते हैं तो इसका पहला पथ है हमारी एकजुटता में एकता। हमें ईमानदारी से खबरों का अवलोकन करके देश के आम नागरिक के बीच हमारी शैक्षिक एकजुटता का संदेश पहुंचना भी अति आवश्यक है। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/interview/bihar-jharkhands-education-system-and-devastating-tragedies">&#8216;जिगर के टुकड़े&#8217; काल से बिहार-झारखण्ड का शिक्षा तंत्र और विध्वंसकारी त्रासदी, &#8216;सड़क&#8217; वाले &#8216;ब्लैकबोर्ड&#8217; पर दिखने लगे</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/interview/bihar-jharkhands-education-system-and-devastating-tragedies/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>#भारतभाग्यविधाता : भारत के 28 राज्यों, 8 केंद्र शासित प्रदेशों के लोगों और &#8216;राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर&#8217; के नेता का अनुपात 243824:1 का अनुपात है</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/india-population-and-leader-ratio-2438241</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/india-population-and-leader-ratio-2438241#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 13 Feb 2022 12:15:47 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[leaders]]></category>
		<category><![CDATA[loksabha]]></category>
		<category><![CDATA[vidhanparishad]]></category>
		<category><![CDATA[vuidhansbha]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=3786</guid>

					<description><![CDATA[<p>गया / पटना : आप माने अथवा नहीं, लेकिन सांख्यिकी तो यही कहता है कि भारत के लोगों और देश के 28 राज्यों, 8 केंद्र शासित प्रदेशों के विधानसभा, विधानपरिषद, राज्यसभा और लोकसभा में प्रत्यक्ष और परोक्ष चुनावों में चयनित भारत के भाग्य विधाताओं (सदस्यों) का अनुपात 243824:1 का अनुपात है। यानी दो लाख तैतालीस हज़ार आठ [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/india-population-and-leader-ratio-2438241">#भारतभाग्यविधाता : भारत के 28 राज्यों, 8 केंद्र शासित प्रदेशों के लोगों और &#8216;राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर&#8217; के नेता का अनुपात 243824:1 का अनुपात है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>गया / पटना : आप माने अथवा नहीं, लेकिन सांख्यिकी तो यही कहता है कि भारत के लोगों और देश के 28 राज्यों, 8 केंद्र शासित प्रदेशों के विधानसभा, विधानपरिषद, राज्यसभा और लोकसभा में प्रत्यक्ष और परोक्ष चुनावों में चयनित भारत के भाग्य विधाताओं (सदस्यों) का अनुपात 243824:1 का अनुपात है। यानी दो लाख तैतालीस हज़ार आठ सौ चौबीस लोगों को हांकने के लिए एक नेता हैं। इसे दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि देश के 2,43,824 लोग अपने ही देश के एक नेता को अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों के लिए सपर्पित रखने में &#8216;काबिल&#8217; नहीं है। इतने लोग एक राजनेता को दुरुस्त करने के लायक हैं। क्योंकि देश के मतदाता &#8216;उम्मीदवार&#8217; को नहीं, बल्कि &#8216;राजनीतिक पार्टी&#8217; को &#8216;वोट&#8217; देते हैं। वैसी स्थिति में अगर उम्मीदवारों को &#8216;बिना आंके&#8217; चयनित करेंगे, फिर &#8216;राइट टू रिकॉल&#8217; का प्रयोग कैसे करेंगे ?</strong></p>
<p>&#8220;राइट टू रिकॉल&#8221; आजकल बिहार में सक्रिय हो रहे हैं। राजनीतिक संस्थाओं की तरह, अगर &#8216;राइट टू रिकॉल&#8217; प्रदेश के राजनेताओं जैसा प्रदेश की समस्याओं का राजनीतिकरण कर कुर्सी के आकर्षण-क्षेत्र में ढुकने, कुर्सी से चिपकने और चिपके रहने की इक्षा से ग्रसित नहीं है; तो अपने ज्ञापन में जिन मूलभूत समस्याओं को उजागर करने की कोशिश किया है, प्रशंसा योग्य है। बिहार ही नहीं, देश के अन्य सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सत्ता के आकर्षण क्षेत्र में भ्रमण-सम्मेलन करने वाले लोग आम आदमी की मज़बूरी की बातों को विपरण कर सत्ता में ढुकने का अनवरत प्रयास करते आये हैं और यह परंपरा चलती रहेगी जब तक मतदाता राजनीतिक पार्टी को नहीं, बल्कि अपने-अपंने क्षेत्रों के उम्मीदवारों को तराजू पर तौलकर, नाप-जोखकर वोट देंगे।  </p>
<p>चाहे खेत-खलिहान की बात हो, किसानों की बात हो, शिक्षा की बात हो, दवा-दारू की बात हो, पत्रकारिता की बात हो &#8211; सभी क्षेत्रों में सत्ता के चापलूस और चाटुकार चतुर्दिक कसरत करते नजर आएंगे। लेकिन सरकारी क्षेत्रों से प्राप्त होने वाली सुख-सुविधाएँ &#8216;रोग-मुक्त&#8217; हो, &#8216;स्वस्थ&#8217; रहे; इसके लिए उनके मन में शायद ही कोई सकारात्मक विचार पनपता है। अगर ऐसा होता तो 28 राज्यों, 8 केंद्र शासित प्रदेशों के कोई 4121 विधानसभा के सम्मानित सदस्यगण, 426 विधानपरिषद् के सदस्यगण, 545 माननीय लोकसभा और 245 माननीय राज्यसभा के सदस्यगण, जो प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से देश के 130 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं &#8211; अपने-अपने क्षत्रों के मतदाताओं को पांच वर्षों पर मुखातिब नहीं होते। सांख्यिकी दृष्टि से भारत के कुल 130 करोड़ की आवादी पर विधानसभा-विधानपरिषद-राज्यसभा-लोकसभा के कुल 5335 सदस्यों का अनुपात 243824:1 का अनुपात है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत के 243824 लोग एक राजनेता को दुरुस्त करने के लायक हैं? </p>
<p>व्यावहारिक तौर पर यदि देखा जाए तो &#8220;नहीं&#8221; &#8211; सैद्धांतिक रूप की तो बात ही नहीं करें। क्योंकि विधानसभा और लोकसभा में भारत के मतदाता &#8220;अपने पसंदिता उम्मीदवारों&#8221; को चुनकर भेजते हैं। यह भी सैद्धांतिक और व्यावहारिक दृष्टि में अंतर है। कोई भी मतदाता (सैकड़े 90 फीसदी) उम्मीदवारों के नाम, उनके कार्य को मद्दे नजर मतदान नहीं करता है। &#8220;राजनीतिक पार्टियों&#8221; का &#8220;ठप्पा&#8221; प्रमुख भूमिका निभाती है। फिर अगर नेताजी अपने-अपने विधानसभा, विधानपरिषद, राज्यसभा अथवा लोकसभा क्षेत्रों में जनता की, मतदाता की इक्षाओं के अनुरूप कार्य नहीं किये, वैसी स्थिति में उनकी क्या गलती है? इस बात को भारत के मतदाता अथवा बिहार के मतदाता कभी सोचे हैं? शायद नहीं। खैर।    </p>
<p>गया जिले के राइट टू रिकॉल के महासचिव डी पी सिन्हा, बिहार कामगार श्रमिक संघ के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ विनय कुमार विष्णुपुरी 21-मुख्य बिंदुओं पर भारत के राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद, राज्यपाल फागु चौहान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को एक ज्ञापन प्रेषित किये हैं।  साथ ही, यह उम्मीद भी किये हैं कि उन बिंदुओं पर सरकार और व्यवस्था सकारात्मक रुख अपनाएगी। </p>
<p>ज्ञापन में सर्वप्रथम सभी शिक्षण- प्रशिक्षण, सरकारी- गैर सरकारी संस्थान में शिक्षण- प्रशिक्षण की गुणवत्ता में गुणात्मक सुधार लाने की बात की गई है। ज्ञापन में कहा गया है कि बिहार भारत का एक ऐसा राज्य है जो शिक्षा के स्तर में भारत के 38 राज्यों में सबसे नीचे है। पहले कभी बिहार नालंदा और विक्रमशिला जैसी शिक्षण संस्थाएँ विश्व भर में विख्यात थे । बिहार में आज अधिकांश कॉलेज डिग्री बेचने का अड्डा बन चुका है, डिग्री प्राप्त हेतु मुंह मांगी रकम चुकाई जाती है और डिग्री खरीद की जाती है। प्रदेश के गैर-सरकारी कॉलेज, नर्सिंग कॉलेज, आईटीआई एवं इंजीनियरिंग कॉलेज आदि के कारनामें आजकल प्रदेश से प्रकाशित समाचार पत्रों के प्रथम पृष्ठ पर लबालब दिखते हैं। </p>
<p>ज्ञापन के अनुसार, उच्च शिक्षा पाने के लिए प्रति वर्ष 1,00,000 से अधिक छात्र बिहार से बाहरी राज्यों में पलायन कर रहे हैं। जहां प्रवेश के नाम पर शिक्षा के दलाल धन उगाही कर लेते हैं। इसके अलावा बिहार में कोचिंग, गैर सरकारी संस्थानों और पब्लिक स्कूलों का गढ़ है जहां सरकारी विद्यालयों/महाविद्यालयों में नामांकन करा लेते हैं, परंतु कोचिंग करने का रास्ता चुन लेते हैं क्योंकि विद्यालयों/महाविद्यालयों में पढ़ाई नहीं होती है या फिर गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई नहीं होती है।</p>
<p>इतना ही नहीं, सरकारी संस्थान भगवान भरोसे हैं। कुछ में व्यवस्थाओं की कमी है तो कुछ में शिक्षकों की कमी है। बिहार में अधिकतर प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की संरचना बदहाल है। विद्यालय में शिक्षक पढ़ाते हैं उनके खुद के बच्चे प्राइवेट विद्यालय में पढ़ते हैं बिहार में आंगनबाड़ी केंद्र से लेकर यूनिवर्सिटी तक की शिक्षा व्यवस्था बदहाल है। जबकि प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए शिक्षा के नाम पर खर्च किए जाते हैं। </p>
<p>बिहार राज में आंगनबाड़ी की संख्या 80211 है जहां 3 साल से 6 साल के बच्चे समय बिताते हैं और उन्हें पौष्टिक भोजन तथा प्रारंभिक अक्षरों का ज्ञान दिया जाता है। आंगनबाड़ी केंद्रों पर छह प्रकार की सेवाएं दी जाती है, मसलन: आहार, टीकाकरण और विटामिन ए की आपूर्ति, स्कूल पूर्व शिक्षा, स्वास्थ्य शिक्षा, माताओं के लिए पोषण सम्बन्धी शिक्षा और स्वास्थ्य जांच। आंगनबाड़ी केंद्रों का संचालन आंगनबाड़ी सेविका के जिम्मे होता है। एक केंद्र पर 40 बच्चों को नामांकन करने का प्रावधन है आंगनबाड़ी केंद्र के माध्यम से भोजन, सूखा राशन अथवा पैसे दिए जाते हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों की सेहत कागज पर बेहतर दिखाई देती है परंतु धरातल पर बेहद खराब है। बिहार में आंगनबाड़ी केंद्रों के नाम पर घोटाला नियमित रूप से जारी है। </p>
<figure id="attachment_3791" aria-describedby="caption-attachment-3791" style="width: 1318px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/rsz_1vidhansbha.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/rsz_1vidhansbha.jpeg" alt="" width="1318" height="809" class="size-full wp-image-3791" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/rsz_1vidhansbha.jpeg 1318w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/rsz_1vidhansbha-300x184.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/rsz_1vidhansbha-1024x629.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/rsz_1vidhansbha-768x471.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/rsz_1vidhansbha-356x220.jpeg 356w" sizes="auto, (max-width: 1318px) 100vw, 1318px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3791" class="wp-caption-text">बिहार विधान सभा</figcaption></figure>
<p><strong>ज्ञापन में इस बात पर विशेष उल्लेख किया गया है कि पोषाहार के नाम पर बच्चों को खिचड़ी खिलाई जाती है वह भी बिना दाल के। केंद्र पर बच्चों की उपस्थिति 10 से 12 होती है परंतु हाजरी राशन खर्च 40 बच्चों का दिलाया जाता है इसी प्रकार हर मद में सिपर्फ घोटाला होता है इसकी चिंता किसी को नहीं है यदि आंगनबाड़ी केंद्रों की जांच किसी स्वच्छ एजेंसी से कराई जाए तो करोड़ों, अरबों रुपए घोटाला का पर्दापफाश हो सकता है।</strong></p>
<p>जहाँ तक, प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा का सवाल है, बिहार के ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में शिक्षा का साम्राज्य फैला हुआ है। बिहार में प्राथमिक/माध्यमिक विद्यालयों पर नजर रखने के लिए प्रखंड संसाधन केंद्र खोले गए थे, परंतु इसके रक्षक ही भक्षक बन बैठे हैं। इन सरकारी विद्यालयों में बुनियादी जरूरतों वाले ढांचे का भी अभाव हैं। यहां योग्य शिक्षकों का अभाव है तथा इन विद्यालयों एवं व्यवस्था पर निगरानी रखने वाले निरीक्षक निष्क्रिय हैं। इसके साथ ही शिक्षक और छात्र का अनुपात में अंतर है। किसी-किसी विद्यालय में तो एक ही शिक्षक हैं। इन सब के साथ इन विद्यालयों में भी कई तरह के मिलने वाली राशि का बड़ा घोटाला होते आ रहा हैं। सरकार को इसकी कोई परवाह नहीं है। </p>
<p><strong>शिक्षा को बेहतर बनाने की योजना सिर्फ कागज पर ही सीमित है। कई गांव में स्कूल का अपना भवन नहीं है। किसी स्कूल में शौचालय नहीं है तो कहीं पानी की व्यवस्था नहीं है। शिक्षा के स्तर में भारत के 38 राज्यों में सबसे नीचे है। कहीं-कहीं विद्यालयों में शिक्षकों की उपस्थिति रहते हुए भी पढ़ाई नहीं होती है। यही कारण है कि किसी भी सरकारी शिक्षक का कोई भी बच्चा सरकारी विद्यालय में नहीं पढ़ता है। सभी शिक्षक अपने अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं । विद्यालय के प्रधनाध्यापक हमेशा कागज पन्नों को दुरुस्त करने में लगे रहते हैं। एक विद्यालय की निगरानी के लिए विद्यालय स्तर से लेकर मंत्रालय तक कई समितियां एवं निगरानी समितियां तथा पदाधिकारियों की नियुत्तिफ व गठन किया गया है, परंतु सभी कागजों पर है। सरकारी विद्यालयों में जो भी बच्चों कुछ देख रहे हैं वह सभी आम आदमी के बच्चे हैं उन्हें ना तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है, ना तो बेहतर संस्कार ही मिल रही है।</strong></p>
<p>ज्ञापन के अनुसार, कॉलेज अपने छात्रों को आगे की पढ़ाई के लिए डिग्री और डिप्लोमा प्रदान करता है और विश्वविद्यालय एक उच्च शिक्षा और अनुसंधन का केंद्र है जो अपने छात्रों को डिग्री और पुरस्कार प्रदान करता है। अिऽल भारतीय उच्च शिक्षा की शिक्षा सर्वेक्षण रिपोर्ट 2019-20 के मुताबिक बिहार में विभिन्न प्रकार के 35 विश्वविद्यालय हैं जिनमें निजी विश्वविद्यालय और केंद्रीय विश्वविद्यालय भी शामिल है। इन विश्वविद्यालयों के अधीन कई सरकारी और गैर-सरकारी कॉलेज हैं जो जनसंख्या के हिसाब से काफी कम है। इन कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में क्लासरूम शिक्षकों तथा अन्य सुविधाओं विश्वविद्यालयों के विभिन्न विभागों में इक्विपमेंट्स की स्थिति बिहार में दयनीय है।</p>
<p>कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। गलत शिक्षा नीतियों के कारण लगातार उच्च शिक्षा पतन की ओर जा रहा है। सैकड़ों कॉलेज डिग्री बांट रहे हैं हजारों विद्यार्थी की भी भीड़ लगी है। यहां के शिक्षक निष्क्रिय है, छात्रों में भी सक्रियता नहीं है। शिक्षा व्यवस्था राजनीति की भेंट चढ़ गई है। कॉलेजों में नामांकन करा कर छात्रा छात्राएं ट्यूशन व कोचिंग में पढ़ाई करने पर मजबूर हैं। सरकारी कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों में मोटी रकम का घोटाला किया जा रहा है जो ताजा उदाहरण मगध् विश्वविद्यालय के कुलपति के यहां करोड़ों रुपए कैश का पकड़ा जाना तथा अन्य संपत्ति को भ्रष्टाचार से जमा/ख़रीदा जाना है मगध् विश्वविद्यालय तो सिपर्फ वानगी है। हर कॉलेज एवं विश्वविद्यालयों में रुपयों का घोटाला का चल चल रहा है।</p>
<p>वहीं प्राइवेट कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भी प्रतिवर्ष अरबों रुपए की वसूली आम छात्रा/छात्राओं से की जाती है, परंतु पढ़ाई में यह सिस्टम भी बिहार में फेल है। प्राइवेट कॉलेज और विश्वविद्यालयों का शिक्षण प्रशिक्षण में स्थिति और खराब है। यह सिर्फ डिग्री बांटने का काम करती है। बिहार में शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए आंगनबाड़ी केंद्र से लेकर विश्वविद्यालयों तक गुणवत्तापूर्ण युत्तफ शिक्षकों की बहाली, भवन, अन्य सुविधएं सुनिश्चित करनी होगी।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/india-population-and-leader-ratio-2438241">#भारतभाग्यविधाता : भारत के 28 राज्यों, 8 केंद्र शासित प्रदेशों के लोगों और &#8216;राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर&#8217; के नेता का अनुपात 243824:1 का अनुपात है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/india-population-and-leader-ratio-2438241/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
