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	<title>journalists Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>जब यूएनआई के एक संवाददाता की शिकायत पर बिहार पुलिस उप-महानिदेशक को जीवन पर्यन्त कभी फिल्ड में पदस्थापन नहीं हो पाया (भाग-2)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/on-a-single-complaint-a-dig-was-denied-a-field-posting-for-his-entire-career</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Mar 2026 11:53:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[eviction]]></category>
		<category><![CDATA[Highcourt order]]></category>
		<category><![CDATA[jounalism]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली: शायद यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया में कार्य करने वाले आज के लोगों को ज्ञात नहीं होगा, हो सकता है स्वीकार भी नहीं करें, एक समय यूएनआई के एक संवाददाता की शिकायत पर बिहार के पुलिस उप-महानिदेशक का अपने सम्पूर्ण कार्यकाल में कभी &#8216;फिल्ड पोस्टिंग&#8217; नहीं हो पाया, जबकि बिहार में &#8216;जाति [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली: शायद यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया में कार्य करने वाले आज के लोगों को ज्ञात नहीं होगा, हो सकता है स्वीकार भी नहीं करें, एक समय यूएनआई के एक संवाददाता की शिकायत पर बिहार के पुलिस उप-महानिदेशक का अपने सम्पूर्ण कार्यकाल में कभी &#8216;फिल्ड पोस्टिंग&#8217; नहीं हो पाया, जबकि बिहार में &#8216;जाति की राजनीति&#8217;  थी, आज तो है ही। आज भी प्रदेश के मुख्यालय के दस्तावेज में कहीं-न-कहीं उद्धृत होगा। उक्त पुलिस उप-महानिदेशक का &#8216;फिल्ड-पोस्टिंग&#8217; नहीं करने का आदेश पुलिस मुख्यालय अथवा प्रदेश के गृह मंत्रालय से नहीं, अपितु प्रदेश के मुख्यमंत्री स्वयं फ़ाइल पर लिखे थे। </strong></p>
<blockquote><p>एक समय आज है जब दिल्ली की मुख्यमंत्री कार्यालय से तीन किलोमीटर और प्रधानमंत्री कार्यालय से पचास कदम दूरी पर स्थित यूएनआई मुख्यालय से सभी पत्रकारों और ग़ैर-पत्रकारों को देर रात दिल्ली पुलिस और सरकारी अधिकारी बाहर निकाल दिए, धक्का-मुक्की देकर; न दिल्ली की मुख्यमंत्री कुछ कहीं, ना ही प्रधानमंत्री कुछ बोले ना पत्रकार और संपादक से राजनीतिक गलियारे में बने राजनेता और मंत्री ही कुछ कहे। सन्नाटा चतुर्दिक बहाल रहा। गिरावट, चाहे सोच में हो या आंतरिक प्रशासन में या फिर प्रबंधन-कर्मचारी की राजनीति में, आई तो जरूर है, आप माने या नहीं, तभी यह सन्नाटा है । </p></blockquote>
<p>दिल्ली ही नहीं, देश में स्थित यूएनआई के पत्रकारों और ग़ैर-पत्रकारों को शायद ज्ञात नहीं होगा कि आपातकाल के दौरान जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी उस समय देश के सभी चार संवाद एजेंसियों &#8211; प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (पीटीआई), यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया (यूएनआई), हिंदुस्तान समाचार और समाचार भारती &#8211; को मिलाकर &#8216;समाचार&#8217; नामक एजेंसी बनाई थी, उस समय यूएनआई &#8216;स्थापना विरोधी तथ्य से भरपूर कहानियों&#8217; और लेखों के लिए विख्यात था। इतना ही नहीं, संस्थान के प्रति प्रतिबद्धता से सम्बंधित एक दृष्टान्त ऐसा भी है जब यूएनआई के सैकड़ों कर्मियों में से एक कर्मी संस्था के वजूद के रक्षार्थ सपरिवार, अपने छोटे छोटे बच्चों के साथ हज़ारों सीढ़ियों को लांघकर ईश्वर से युद्ध किया था, संस्था के अस्तित्व के रक्षार्थ और मिन्नतें भी पूरी हुयी थी। खैर। </p>
<p><strong>स्थापना के बाद पटना में यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया की शुरुआत आर्यावर्त-इंडियन नेशन समाचार पत्र समूह के प्रांगण से ही हुआ था। कई एकड़ में फैले परिसर में बने &#8216;दी न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशंस लिमिटेड&#8217; के भवन के दो कमरों से यूएनआई समाचार सेवा का श्रीगणेश हुआ था। उन दिनों संस्थान के प्रबंधक थे श्री उपेंद्र आचार्या और अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक इन दोनों अख़बारों के संस्थापक दरभंगा के महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह स्वयं थे। यूएनआई की स्थापना प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया के समानांतर सेवा देना था। लेकिन यूएनआई बहुत मामलों में अपने स्थापना के प्रारंभिक दिनों से ही &#8216;कुछ अलग&#8217; था, जहाँ तक कहानियों, समाचारों की गुणवत्ता का सवाल है। </strong></p>
<p>आपातकाल के दिनों में, पटना ही नहीं देश के अन्य अख़बारों, पत्रिकाओं के पत्रकारों, सम्पादकों को इस बात की तकलीफ अवश्य थी की वे अपने पाठकों के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं क्योंकि एक पाठक अख़बार खरीदकर पढ़ता है। यूएनआई भी अपनी गुणवत्ता को लेकर भयभीत था। यूएनआई के तत्कालीन पत्रकारों के साथ-साथ संस्थान के प्रबंधकीय पदों पर बैठे अधिकारियों के मन में भय होने लगा था कि अगर यूएनआई आने वाले दिनों में इसी तरह कार्य करने के लिए बाध्य होते रहा तो पाठकों/सब्सक्राइबरों की नज़रों में &#8216;सम्पादकीय अस्तित्व खतरे में आ जायेगा।&#8217;</p>
<figure id="attachment_7521" aria-describedby="caption-attachment-7521" style="width: 976px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-BN-Jha.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-BN-Jha.jpg" alt="" width="976" height="1184" class="size-full wp-image-7521" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-BN-Jha.jpg 976w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-BN-Jha-247x300.jpg 247w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-BN-Jha-844x1024.jpg 844w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-BN-Jha-768x932.jpg 768w" sizes="(max-width: 976px) 100vw, 976px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7521" class="wp-caption-text">यूएनआई के तत्कालीन अधिकारी श्री बीएन झा (श्री झा का देहांत 1992 में हो गया)</figcaption></figure>
<p><strong>इसी उद्देश्य से यूएनआई के एक प्रबंधकीय पद के शीर्षस्थ अधिकारी, जो यूएनआई के जन्म काल से साथ थे, मध्यप्रदेश के सतना जिले के मैहर नामक गाँव में पहाड़ी पर स्थित माँ शारदा के मंदिर में सपरिवार पैदल चलकर देवी से याचना करने को ठान लिए। उनका कहना था कि अगर संस्थान नहीं बचेगा तो हम और हमारे जैसे लोगों, उनके परिवारों का अस्तित्व कहाँ बच पायेगा। उस दिन भी, और आज भी मान्यता यह भी है कि इस मंदिर में पैदल चलकर आने वाला कभी भी खाली हाथ वापस नहीं जाता है। उन दिनों यूएनआई के अधिकारी श्री बी.एन. झा, सपरिवार मैहर मंदिर जाने निकल पड़े। देवी शारदा के सामने याचना करने और उनसे मिन्नत करने कि &#8216;हे देवी!! हमें (यूएनआई) अस्तित्वहीन हो रहा है, इसे बचाएं।&#8221; </strong></p>
<blockquote><p>मैं नहीं समझता हूँ कि यूएनआई के स्थापना काल से अब तक संस्थान का कोई भी कर्मचारी, अधिकारी, कर्मचारी संघ के लोग अपने संस्थान के अस्तित्व को बचाने के लिए कभी ऐसी याचना अथवा प्रयत्न किये होंगे। अगर किये होते तो शायद आज संस्थान का यह हश्र भी नहीं हुआ होता। संस्था के पुराने लोगों का कहना है कि विगत तीन दशक से यह संस्था अपने &#8216;आंतरिक राजनीति का शिकार होता आ रहा है। बदलते वक्त में भी लोगों ने अपनी सोच को नहीं बदला जिसका परिणाम सबों के सामने हैं।&#8221; </p></blockquote>
<p>त्रिकूटा पहाड़ी की सबसे ऊँची चोटी पर स्थित माँ शारदा देवी मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। पहाड़ी की चोटी तक पहुँचने के लिए 1063 सीढ़ियाँ हैं। श्री बी.एन. झा सपरिवार, अपनी पत्नी, अपने छोटे-छोटे बच्चों का हाथ पकड़े इन सीढ़ियों को पार करते देवी दर्शन के लिए पहुंचे थे। याचना करने पहुंचे थे। संस्था को तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था से मुक्त कराने के लिए पहुंचे थे। श्री झा की याचना देवी ने सुन ली और 14 अप्रैल 1978 को यूएनआई के साथ-साथ अन्य अन्य तीन समाचार एजेंसियां फिर से अपने पुराने जीवन में वापस आया। मैहर भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए भी प्रसिद्ध है। मैहर-सेनिया घराना के संस्थापक उस्ताद अलाउद्दीन खान मैहर के ही निवासी थे। उन्हें 1971 में भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। उनके प्रसिद्ध शिष्यों में सितार वादक पंडित रवि शंकर और उस्ताद अली अकबर खान शामिल हैं। </p>
<p>बहरहाल, पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. बिधान चंद्र राय की अगुवाई में गठित देश का प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी &#8216;चापलूसी रहित&#8217; अपनी &#8216;सम्पादकीय गुणवत्ता&#8217; के कारण आपातकाल के दिनों में सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टी और नौकरशाहों के लिए गले की हड्डी बन गया था। कहते हैं कि यूएनआई जब अपना कार्य शुरू किया था उस समय इसके पास दो अंकों में भी कर्मचारियों की संख्या नहीं थी।  लेकिन समयांतराल कर्मचारियों, खासकर पत्रकारों &#8211; स्ट्रिंगर से लेकर संपादक तक &#8211; हज़ारों में पहुँच गयी थी। </p>
<figure id="attachment_7520" aria-describedby="caption-attachment-7520" style="width: 976px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Surendra.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Surendra.jpg" alt="" width="976" height="1184" class="size-full wp-image-7520" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Surendra.jpg 976w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Surendra-247x300.jpg 247w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Surendra-844x1024.jpg 844w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Surendra-768x932.jpg 768w" sizes="(max-width: 976px) 100vw, 976px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7520" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री सुरेंद्र किशोर</figcaption></figure>
<p><strong>जनसत्ता के पूर्व वरिष्ठ संवाददाता पद्मश्री सुरेंद्र किशोर कहते</strong> हैं: यूएनआई के साथ मेरा सम्बन्ध छह दशक से है। पटना में पदस्थापित श्री बी.एन. झा और श्री डी.एन. झा के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों और दिल्ली के पत्रकारों के साथ मेरा मधुर सम्बन्ध रहा है। मेरा मानना है कि अपने स्थापना काल से ही यूएनआई जीवंत समाचार एजेंसी रहा है। प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया की तुलना में यूएनआई अधिक विश्वसनीय और अशुद्धता रहित रहा है। यूएनआई समाचार निर्गत करने से पूर्व कई मर्तबा शब्दों का चयन, वाक्यों का विन्यास और शुद्धता का परख करता है। यह उसकी खास विशेषता रही है। यहाँ कार्य करने वाले पत्रकारों, विशेषकर जो संवाददाता के रूप में कार्य किये हैं, इस बात से सहमत होंगे कि यहाँ रिपोर्ट में सभी प्रकार की स्वतंत्रता शुरू से रही है। आज यूएनआई के बारे में खबर सुनकर मन दुःखी हो गया।&#8221;</p>
<figure id="attachment_7523" aria-describedby="caption-attachment-7523" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-e.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-e.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7523" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-e.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-e-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-e-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-e-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-e-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7523" class="wp-caption-text">विगत दिनों दिल्ली पुलिस के कर्मी न्यायालय के आदेश के बाद यूएनआई के कर्मचारियों, पत्रकारों को कार्यालय परिसर से बाहर निकलते हुए। तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>एक घटना की चर्चा करते सुरेंद्र किशोर कहते हैं: &#8220;1989 लोकसभा चुनाव में पटना से जनरल एस.के. सिन्हा चुनाव लड़ रहे थे। उनके खिलाफ डॉ. सी.पी. ठाकुर थे। दिल्ली से प्रकाशित &#8216;जनसत्ता&#8217; अख़बार में एक कहानी प्रकाशित हुई कि इस चुनाव में जनरल सिन्हा का पलड़ा भारी है। कहानी मैंने लिखी थी। यूएनआई के वरिष्ठ पत्रकार श्री धैर्या बाबू (श्री डीएन झा) &#8216;जनसत्ता&#8217; के रिपोर्ट को पढ़कर मुझे कहे कि आपने जो लिखा है, वह सही नहीं है। आपको जो दिख रहा है, वह सच नहीं है क्योंकि इस चुनाव में सीपी ठाकुर ही विजय होंगे। इसलिए कहानी लिखने और प्रेषित करने से पहले सभी दृष्टि थे ठोक-ठाक कर जांच लें, तभी भेजा करें, अन्यथा अपनी साख ख़राब हो जाएगी।&#8221; </p>
<p><strong>भारत में पत्रकार, पत्रकारिता के संस्थान और पत्रकारिता </strong></p>
<p>एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के अनुसार भारत में पहले समाचार पत्र का श्रेय जेम्स ऑगस्टस हिक्की को दिया जाता है, जिन्होंने 1780 में द बंगाल गजट (जिसे कलकत्ता जनरल एडवरटाइज़र के नाम से भी जाना जाता है) की शुरुआत की थी। यह समाचार पत्र राज की मुखर आलोचना के कारण 1782 में ब्रिटिश प्रशासन द्वारा जब्त किए जाने से पहले केवल दो वर्षों तक ही चल सका। इसके बाद कई अन्य समाचार पत्र भी प्रकाशित हुए, जैसे कि द बंगाल जर्नल, कलकत्ता क्रॉनिकल, मद्रास कूरियर और बॉम्बे हेराल्ड। हालांकि, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा लागू किए गए सेंसरशिप उपायों के कारण इन सभी पर अंकुश लगा दिया गया। </p>
<p>सन् 1799, 1818 और 1823 के दौरान, औपनिवेशिक प्रशासन ने देश में प्रेस को विनियमित करने के लिए कई अधिनियम पारित किए। इस अवधि के दौरान अपवाद स्वरूप 1835 का प्रेस अधिनियम था, जिसे मेटकाफ अधिनियम के नाम से जाना जाता है, जिसने अधिक उदार प्रेस नीति की शुरुआत की। यह सिलसिला 1857 के विद्रोह तक चला, जिसके बाद, विद्रोह से विचलित विदेशी प्रशासन ने 1857 में लाइसेंसिंग अधिनियम लागू किया। इसने औपनिवेशिक प्रशासन को किसी भी मुद्रित सामग्री के प्रकाशन और प्रसार को रोकने की शक्तियां प्रदान कीं। 1867 में, प्रशासन ने पंजीकरण अधिनियम लागू किया, जिसके अनुसार प्रत्येक पुस्तक या समाचार पत्र पर मुद्रण कर्ता, प्रकाशक और प्रकाशन स्थान का नाम अंकित होना अनिवार्य था। इसके अतिरिक्त, सभी पुस्तकों को प्रकाशन के एक महीने के भीतर स्थानीय सरकार को प्रस्तुत करना आवश्यक था। </p>
<p>भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर लगाए गए सबसे कड़े नियमों में से एक 1878 का वर्नाकुलर प्रेस अधिनियम था। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिटन द्वारा लागू किए गए इस अधिनियम ने सरकार को स्थानीय भाषा के प्रेस में प्रकाशित रिपोर्टों और संपादकीय लेखों पर सेंसरशिप लगाने के व्यापक अधिकार प्रदान किए। इसका उद्देश्य स्थानीय भाषा के प्रेस को ब्रिटिश नीतियों की आलोचना करने से रोकना था। यह उपाय &#8216;गैगिंग एक्ट&#8217; की खामियों का समाधान था, जिसका प्रेस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। 1908 और 1912 के बीच चार नए उपाय लागू किए गए &#8211; समाचार पत्र (अपराधों के लिए उकसाने) अधिनियम और आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम 1908, प्रेस अधिनियम 1910 और राजद्रोह पूर्ण बैठकों की रोकथाम अधिनियम 1911 इत्यादि। </p>
<figure id="attachment_7524" aria-describedby="caption-attachment-7524" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-c-copy.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-c-copy.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7524" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-c-copy.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-c-copy-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-c-copy-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-c-copy-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-c-copy-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7524" class="wp-caption-text">यूएनआई कार्यालय को न्यायालय के आदेश के बाद सील करने के बाद । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>1910 के प्रेस अधिनियम ने विशेष रूप से भारतीय समाचार पत्रों को भारी नुकसान पहुंचाया। इसने स्थानीय सरकार को सरकार के विरुद्ध किसी भी &#8216;आपत्तिजनक सामग्री&#8217; के लिए सुरक्षा शुल्क वसूलने का अधिकार दिया। इस अधिनियम के तहत लगभग 1,000 समाचार पत्रों पर मुकदमा चलाया गया। महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह ने अंग्रेजों के खिलाफ जनता को एकजुट करने के लिए प्रेस का व्यापक रूप से उपयोग किया। इससे प्रेस और सरकार के बीच तनाव और बढ़ गया। 1930 में गांधी की गिरफ्तारी के बाद, सरकार ने 1931 का प्रेस (आपातकालीन शक्तियां) अधिनियम लागू किया। इसने प्रांतीय सरकारों को सेंसरशिप की शक्तियां प्रदान कीं। इसके बाद,  सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के शुरू होने से और भी प्रतिबंध लग गए। 1931 के प्रेस आपातकालीन अधिनियम के बावजूद, सरकार ने कड़ी सेंसरशिप की मांग की। इसने आने वाली अंतरराष्ट्रीय खबरों को नियंत्रित और फ़िल्टर किया। </strong></p>
<p>स्वाधीनता के बाद प्रेस जांच समिति की स्थापना 1947 में संविधान सभा द्वारा प्रतिपादित मौलिक अधिकारों के आलोक में प्रेस कानूनों की जांच करने के उद्देश्य से की गई थी। चार साल बाद, 1951 में प्रेस (आपत्तिजनक सामग्री) अधिनियम पारित किया गया, साथ ही अनुच्छेद 19 (2) में संशोधन किया गया, जिसने सरकार को &#8220;आपत्तिजनक सामग्री&#8221; के प्रकाशन के लिए सुरक्षा राशि मांगने और जब्त करने का अधिकार दिया। यह अधिनियम 1956 तक लागू रहा। 1954 में न्यायमूर्ति राज्याध्यक्ष की अध्यक्षता में एक प्रेस आयोग का गठन किया गया था। समिति की एक प्रमुख सिफारिश अखिल भारतीय प्रेस परिषद की स्थापना थी। इसकी औपचारिक स्थापना 4 जुलाई, 1966 को एक स्वायत्त, वैधानिक, अर्ध-न्यायिक निकाय के रूप में हुई, जिसके अध्यक्ष तत्कालीन सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे.आर. मुधोलकर थे।</p>
<p>कहते हैं कि भारत में पत्रकारिता संस्थान 20वीं सदी की शुरुआत में यूनिवर्सिटी ट्रेनिंग से विकसित होकर खास, सरकारी मदद वाले और निजी संस्थानों में बदल गए। डॉ. एनी बेसेंट ने 1920 में मद्रास के अड्यार में नेशनल यूनिवर्सिटी में पहला पत्रकारिता का पाठ्यक्रम शुरू किया। 1941 में, प्रो. पी.पी. सिंह ने लाहौर की पंजाब यूनिवर्सिटी (जो बाद में भारत आ गई) में पत्रकारिता का पहला औपचारिक यूनिवर्सिटी विभाग स्थापित किया। मद्रास यूनिवर्सिटी ने 1947 में एक डिप्लोमा कोर्स शुरू किया। 1952-53 में, हिस्लोप क्रिश्चियन कॉलेज (नागपुर यूनिवर्सिटी) ने अमेरिकी शैक्षणिक मदद से पत्रकारिता का एक प्रमुख विभाग स्थापित किया। बाद में सरकारी क्षेत्र में, खासकर संचार से जुड़े लोगों/अधिकारियों को उचित प्रशिक्षण देने के लिए 1965 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन की स्थापना की गई। जो बाद में एक पत्रकारिता संस्थान के रूप में विकसित हुयी। दिल्ली से बाहर, 1970–1990 का दशक में ओडिशा की बेरहामपुर यूनिवर्सिटी ने 1974 में अपना पत्रकारिता कार्यक्रम शुरू किया। बाद में, IIMC का विस्तार कई जगहों पर हुआ, जिनमें आइजोल, अमरावती, जम्मू और कोट्टायम शामिल हैं। </p>
<p><strong>यूएनआई और पत्रकारिता </strong></p>
<p>यहाँ इसका जिक्र इसलिए कर रहा हूँ कि उन दिनों देश में आज की तरह पत्रकारों का सृजन करने वाला संस्थान कुकुरमुत्तों की तरह नहीं पनपा था। स्वाभाविक भी हैं क्योंकि अख़बार, पत्रिका, आकाशवाणी और दूरदर्शन के अतिरिक्त कुछ नहीं था। जैसे-जैसे मीडिया के क्षेत्र में टीवी और इंटरनेट का आगमन हुआ, पत्रकारों का सृजन करने वाली संस्थाएं भी बढ़ती गयी। आज तो गली-कूचियों में पत्रकार बनने, बनाने के बोर्ड टंगे दीखते हैं। लेकिन यूएनआई के साथ सबसे बड़ी बात यह है कि यह संवाद एजेंसी अपने स्थापना काल से आज तक (पटना कार्यालय के मद्दे नजर) देश को बेहतरीन पत्रकारों को दिया है। आज भी दिल्ली के मीडिया घरानों में सैकड़ों ऐसे पत्रकार हैं जो यूएनआई से सीखकर आये हैं। </p>
<figure id="attachment_7518" aria-describedby="caption-attachment-7518" style="width: 976px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-YUvraj.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-YUvraj.jpg" alt="" width="976" height="1184" class="size-full wp-image-7518" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-YUvraj.jpg 976w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-YUvraj-247x300.jpg 247w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-YUvraj-844x1024.jpg 844w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-YUvraj-768x932.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 976px) 100vw, 976px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7518" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमिरे</figcaption></figure>
<p><strong>आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम से बात करते वरिष्ठ पत्रकार श्री युवराज घिमरे </strong>कहते हैं: &#8220;यूएनआई एक ऐसी संस्था थी उन दिनों जो अगर आप एक बार यूएनआई के हो गए, तो जीवन पर्यन्त यूएनआई से नाता नहीं तोड़ सकते हैं। मैं सत्तर के दशक के अंत में पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विषय के स्नातकोत्तर विभाग में प्रवेश लिया था। लिखने-पढ़ने की असीम इच्छा तो थी ही, पत्रकारिता के प्रति भी अभिरुचि भी जग गयी थी। इसी क्रम में एक दिन घूमते यूएनआई के दफ्तर में पहुंचा फ़्रेज़र रोड। उन दिनों यूएनआई पटना में मीडिया के क्षेत्र में एक बहुत बड़ा &#8216;हब&#8217; था। कार्यालय में न्यूनतम स्थान होने के बावजूद  वहां शहर के शायद ही कोई विद्वान, विदुषी, लेखक, पत्रकार रहे होंगे जो उस दफ्तर के चौखट पर नहीं आये होंगे, कार्यालय के नीचे सड़क पर (आकाशवाणी, पटना के प्रवेश द्वार के सामने) खड़े होकर गाँव-मोहल्ला से लेकर प्रदेश, देश और अंतराष्ट्रीय मसलों पर चर्चा नहीं करते थे। लिखते थे।&#8221;</p>
<p>घिमरे कहते हैं: &#8220;यूएनआई के दोनों झा जी में एक अलग आकर्षण था। जब मैं पत्रकारिता के प्रति अपनी अभिरुचि बताया, तो श्री धैर्या बाबू कहे कि वे पैसे नहीं देंगे अभी, लेकिन लिखने की पूरी स्वतंत्रता होगी। एक युवक को और क्या चाहिए। स्नातकोत्तर करने के क्रम में पत्रकारिता सीखते रहा, लिखना सीखते रहा, लिखते रहा और जैसे ही परीक्षा उत्तीर्ण किया यूएनआई में सेवा शुरू कर दिया। मैं यूएनआई में करीब ढाई साल काम किया और फिर वहां से कलकत्ता से प्रकाशित और एमजे अकबर के संपादन वाले दी टेलीग्राफ ज्वाइन कर लिया। उन दिनों यूएनआई का रेपुटेशन इतना मजबूत था की सभी, चाहे राजनेता हों या अधिकारी, उसके शब्दों का, लिखने वालों का कद्र करते थे। उसी समय हेमेन्द्र नारायण और अमरेंद्र सिन्हा भी थे। बाद में हेमेंद्र इंडियन एक्सप्रेस और दी स्टेट्समैन आ गए।  टेलीग्राफ के बाद मैं दिल्ली आ गया, फिर इंडियन एक्सप्रेस। यूएनआई के साथ सबसे बड़ी खासियत यह थी की अगर आप एक बात यूएनआई के हो गए तो जीवन पर्यन्त आप यूएनआई के बने रहेंगे और इसका ज्वलंत दृष्टान्त यह है कि आज हम पचास साल पहले की बात को दोहरा रहे हैं।&#8221;  </p>
<p><strong>उन दिनों देश के किसी भी कोने से कोई भी पत्रकार या संपादक कहानी के क्रम में बिहार आते थे तो यूएनआई आये बिना उनकी यात्रा और लेखनी पूरी नहीं होती थी। सन 1973 में आनंद बाजार पत्रिका समूह का &#8216;संडे&#8217; और &#8216;रविवार&#8217; पत्रिका का प्रकाशन हुआ। इसके दो साल बाद लिविंग मिडिया समय द्वारा &#8216;इंडिया टुडे&#8217; पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। टाइम्स ऑफ़ इंडिया का &#8216;इलूस्ट्रेटेड वीकली&#8217;, &#8216;करेंट&#8217;, &#8216;ब्लिट्ज&#8217;, &#8216;धर्मयुग&#8217;, &#8216;दिनमान&#8217; आदि पत्रिकाओं में लिखने वाले लोगों के लिए यूएनआई का कार्यालय एक &#8216;शैक्षिक अड्डा&#8217; था। बिना यहाँ आये, विषय पर बात किये उनकी कहानियां पूरी हो ही नहीं सकती थी। यह बात पीटीआई के साथ लागू नहीं था। देश के जाने-माने पत्रकार फ़रज़न्द अहमद (इण्डिया टुडे के वरिष्ठ संपादक, अब दिवंगत) जब तक पटना में रहे, यूएनआई के दफ्तर में एक टाइपराइटर लेकर बैठे होते थे और सभी नए-नए संवाददाताओं की लिखनी को दुरुस्त करते रहते थे। यूएनआई और फ़रज़न्द साहब एक दूसरे के पूरक थे।</strong> </p>
<figure id="attachment_7519" aria-describedby="caption-attachment-7519" style="width: 976px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Sudhakar.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Sudhakar.jpg" alt="" width="976" height="1184" class="size-full wp-image-7519" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Sudhakar.jpg 976w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Sudhakar-247x300.jpg 247w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Sudhakar-844x1024.jpg 844w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Sudhakar-768x932.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 976px) 100vw, 976px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7519" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार सुधाकर झा</figcaption></figure>
<p><strong>पटना के सुधाकर झा</strong>, जिनके पिता यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया के दो बार अध्यक्ष थे, कहते हैं: &#8220;मैं उन दिनों पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर कर रहा था। मेरे पास खाली समय था और लिखने, पढ़ने की अभिरुचि तो थी ही। एक दिन मैं फ़्रेज़र रोड स्थित आकाशवाणी के प्रवेश द्वार पर यूएनआई के दफ्तर पहुंचा। शाम का समय था। वहां शहर से प्रकाशित अख़बारों के बड़े-बड़े पत्रकार, जिनका नाम अख़बार के पन्नों पर लिखा पढता था, भी उपस्थित थे। श्री धैर्या बाबू और श्री बी.एन. झा मुझे जानते थे। एक शिक्षक जैसा उन्होंने लिखना सिखाया। लिखने के साथ सबसे अधिक महत्व जो उनसे सीखा वह था &#8216;समय का महत्व&#8217;, &#8216;शब्दों का चयन&#8217;, &#8216;छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग, जो आज भी मेरे लिए उपयोगी है। दी इंडियन नेशन, दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया, नेशनल हेराल्ड अख़बारों में दशकों तक कार्य किया, देश-विदेश के पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न विषयों पर लिखा, यह उसी शिक्षण-प्रशिक्षण का परिणाम हैं। </p>
<p>सत्तर के दशक के उत्तरार्ध की बात है। उन दिनों आनंद मार्ग के संस्थापक श्री आनंदमूर्ति पटना के बांकीपुर कारावास में बंद थे। उन पर अपने शिष्यों की हत्या करने का आरोप लगाया गया था। पटना का केंद्रीय कारावास उन दिनों महरुल हक़ पथ पर था। कारा का प्रवेश द्वार आर्यावर्त और इंडियन नेशन अख़बारों के दफ्तर के ठीक सामने था, जबकि इस दीवार का अंतिम सिरा पटना रेलवे स्टेशन के सामने वाले गोलंबर के पास समाप्त होता था। इस दशक में न केवल पटना, बल्कि राष्ट्र की राजधानी दिल्ली में भी राजनीतिक तापमान सर्दी के मौसम में भी 40 डिग्री से अधिक चल रहा था। देश में आपातकाल की घोषणा हो गयी थी। उन दिनों रात में कार्य समाप्त कर यूएनआई के तत्कालीन प्रमुख घर जा रहे थे। जब कारावास के पास आये, वे लघुशंका से निवृत होने के लिए वहां खड़े हुए। वहां उपस्थित सुरक्षाकर्मी उनके साथ दुर्व्यवहार किया। इस बात की खबर न केवल अख़बारों के दफ्तर में बिजली की तरह फैली, बल्कि मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुँच गयी। अखबार के पन्ने रंगे गए। बल्कि मुख्यमंत्री कार्यालय से भी &#8216;क्षमा&#8217; याचना की बात हुयी। </p>
<figure id="attachment_7525" aria-describedby="caption-attachment-7525" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-a-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-a-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7525" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-a-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-a-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-a-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-a-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-a-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7525" class="wp-caption-text">जब अच्छे दिन थे। यूएनआई के कर्मचारी अपने कार्यालय में (फाइल फोटो)</figcaption></figure>
<p>उसी कालखंड की एक और घटना है जब <strong>मिथिलेश स्टेडियम</strong> में ऑल इंडिया पुलिस खेलकूद प्रतियोगिता हो रहा था। इस प्रतियोगिता में <strong>सीमा सुरक्षा बल (बॉर्डर सेक्युरिटी फ़ोर्स) और बिहार मिलिट्री पुलिस</strong> का भिड़ंत फ़ाइनल में हो रहा था। इस कार्यक्रम में बीएमपी के जनसम्पर्क अधिकारी ने पटना के प्रेस प्रतिनिधि को भी आमंत्रित किया था। श्री धैर्यानन्द झा (यूएनआई) सबसे श्रेष्ठ थे। इस बीच बीएमपी के डीआईजी टीपी सिंह ने पत्रकारों को खड़ा कर परिचय पूछने लगे। इस घटना से क्षुब्ध होकर श्री धैर्या बाबू बीएमपी के जनसम्पर्क अधिकारी को कहे कि क्या टीपी पैरेड करा रहे हैं, आप लाये हैं तो परिचर आप दें। इस बात से टीपी सिंह की भाषा तनिक टेढ़ी हो गयी और उनकी भृकुटि भी तन गयी। </p>
<blockquote><p>परिणाम यह हुआ कि पत्रकार दीर्घा में बैठे सभी लोग श्री धैर्या बाबू की अगुआई में कार्यक्रम को &#8216;बॉयकॉट&#8217; कर अपने-अपने दफ्तर की और निकल गए। इस बात की खबर फिर मुख्यमंत्री कार्यालय में पहुंची। तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र सभी पत्रकारों, खासकर श्री धैर्या बाबू से कहे कि आज अंतिम दिन है और बिहार का सवाल है, कृपया। इस पर श्री धैर्या बाबू का एक ही जबाब था &#8211; टीपी सिंह माफ़ी मांगे। यह पत्रकारों की &#8216;बेइज्जती&#8217; है। टीपी सिंह &#8216;तत्काल प्रभाव से पदमुक्त किये गए और उनके फाइल पर लिखा गया कि इन्हे भविष्य में कभी फिल्ड में पदस्थापित नहीं किया जाय।&#8217; खैर। </p></blockquote>
<p>विगत दिनों जब दिल्ली उच्च न्यायालाय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सचिन दत्ता यूएनआई की याचिका को ख़ारिज करते L&#038;DO/शहरी विकास मंत्रालय को यह निर्देश दिया वे यह सुनिश्चित करें कि सार्वजनिक भूमि का सशर्त आवंटन पूरी सावधानी, तत्परता और संस्थागत सख्ती के साथ लागू किया जाए, ताकि लाइसेंस की शर्तों का कोई भी उल्लंघन या पालन न होना, बहुत लंबे समय तक बिना किसी कार्रवाई के न रह जाए। मूल्यवान सार्वजनिक संपत्तियों के प्रबंधन का दायित्व संभालने वाले सार्वजनिक प्राधिकारियों को इस बात को सुनिश्चित करने के लिए सदैव सतर्क रहना चाहिए कि ऐसी भूमि का उपयोग पूरी तरह से उसी उद्देश्य के अनुसार किया जाए जिसके लिए उसे आवंटित किया गया है, और किसी भी विचलन (नियमों से हटने) की स्थिति में समय पर उचित कार्रवाई की जाए &#8211; यूएनआई के तत्कालीन अधिकारी और संवाददाता बहुत याद आ रहे थे ।</p>
<p><strong>न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि वे तत्काल प्रश्नगत भूमि/संपत्ति का कब्ज़ा प्राप्त करें और यह सुनिश्चित करें कि उसका उपयोग विधि के अनुसार ही किया जाए। यह भी स्पष्ट किया कि इस न्यायालय ने प्रश्नगत संपत्ति/भूमि में PCI के अधिकारों के संबंध में कोई टिप्पणी नहीं की है और न ही कोई निर्णय दिया है। यह संबंधित सरकारी प्रतिवादियों का दायित्व होगा कि वे आगे उचित कदम उठाएं, और ऐसा करते समय इस अनिवार्य आवश्यकता को ध्यान में रखें कि प्रश्नगत भूमि/संपत्ति का उचित और कुशल उपयोग सुनिश्चित किया जाए। न्यायालय ने कहा कि &#8220;यह न्यायालय यह टिप्पणी करने के लिए भी बाध्य है कि L&#038;DO को तत्परता से कार्रवाई करनी चाहिए थी, जब निर्माण के लिए निर्धारित दो वर्ष की अवधि (जैसा कि 14.12.1979 के आवंटन पत्र में परिकल्पित था) बिना किसी भी प्रकार के निर्माण कार्य के ही समाप्त हो गई थी। इसके बजाय, समय-समय पर संशोधित आवंटन पत्र जारी किए जाते रहे, जिससे याचिकाकर्ता को लगातार अपने दायित्वों का पालन न करने के बावजूद, मूल्यवान सार्वजनिक भूमि पर अपना कब्ज़ा जारी रखने का अवसर मिलता रहा।&#8221;</strong></p>
<figure id="attachment_7526" aria-describedby="caption-attachment-7526" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-b-copy.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-b-copy.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7526" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-b-copy.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-b-copy-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-b-copy-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-b-copy-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-b-copy-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7526" class="wp-caption-text">जब अच्छे दिन थे दशकों पहले। (फाइल फोटो)</figcaption></figure>
<p>न्यायालय ने माना कि &#8220;यूएनआई द्वारा अपनी रिट याचिका में संशोधन की मांग करने वाले आवेदन में (जो मामले में अंतिम बहस शुरू होने के काफी बाद विलंब से दायर किया गया था) उठाए गए तर्क, प्रथम दृष्टया ही भ्रामक और आधारहीन हैं। याचिकाकर्ता के लिए &#8216;भारतीय सुखाधिकार अधिनियम, 1882&#8217; की धारा 60(a) और 60(b) पर निर्भर रहना (जैसा कि संशोधित रिट याचिका में करने का प्रयास किया गया है) पूरी तरह से अस्वीकार्य है; और यह तर्क देना कि एक चारदीवारी का निर्माण या किसी मूल्यह्रासित संरचना के लिए किया गया भुगतान, किसी तरह एक &#8216;शर्त-आधारित लाइसेंस&#8217; को प्रमुख सार्वजनिक भूमि पर एक &#8216;अपरिवर्तनीय अधिकार&#8217; में बदल देता है, सरासर गलत है। </p>
<p>न्यायालय ने कहा कि इस बात पर भी ज़ोर दिया जाना चाहिए कि सरकारी संपत्ति पर लाइसेंस कोई इनाम या खैरात नहीं है, जिसका लाइसेंसी अपनी मर्ज़ी से आनंद ले सके। ऐसी इजाज़त किसी खास सरकारी मकसद के लिए दी जाती है और यह स्वाभाविक रूप से लाइसेंसी द्वारा ली गई ज़िम्मेदारियों को पूरा करने की शर्त पर आधारित होती है। एक बार जब लाइसेंसी उन ज़िम्मेदारियों को पूरा करने में नाकाम हो जाता है, तो वह कब्ज़े में बने रहने के लिए किसी भी तरह के न्यायसंगत या कानूनी अधिकार का दावा नहीं कर सकता। सरकारी ज़मीन को किसी ऐसे डिफ़ॉल्ट करने वाले लाइसेंसी द्वारा बंधक नहीं बनने दिया जा सकता, जो उस मकसद को ही पूरा करने में नाकाम रहा है जिसके लिए उसे लाइसेंस दिया गया था।</p>
<p><strong>निरस्तीकरण आदेश में इस बात को सही ढंग से ध्यान में रखा गया है कि याचिकाकर्ता बिल्डिंग बनाने में पूरी तरह से नाकाम रहा है और उनके तरफ से लंबे समय तक और बिना किसी स्पष्टीकरण के कोई कार्रवाई नहीं की गई है। 1999 के बाद भी, जब कंस्ट्रक्शन प्रोसेस में CPWD/NBCC की भूमिका तय की गई थी, तब भी याचिकाकार्य ने प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए कोई भी सक्रिय कदम नहीं उठाया। इसके बजाय, जैसा कि कैंसलेशन लेटर में सही ढंग से बताया गया है, पिटीशनर मौजूदा बनी हुई बिल्डिंग के कमर्शियल इस्तेमाल और उसे सब-लेट करने की इजाज़त लेने में कहीं ज़्यादा सक्रिय दिखाई दिया, भले ही अलॉटमेंट की शर्तों के मुताबिक पूरी बिल्डिंग का कोई कंस्ट्रक्शन शुरू नहीं किया गया था।</strong></p>
<p>ज्ञातव्य हो कि यूएनआई के मौजूदा मालिक &#8216;द स्टेट्समैन&#8217; ने पुलिस की इस कार्रवाई को &#8220;भारत में मीडिया की आज़ादी पर एक अभूतपूर्व ज़्यादती और हमला&#8221; बताया। न्यूज़ एजेंसी के दफ़्तर पर चिपकाए गए एक नोटिस में लिखा था, &#8220;दिल्ली हाई कोर्ट के 20.03.2026 के फ़ैसले के अनुसार, भारत सरकार ने 20.03.2026 को 9, रफ़ी मार्ग, नई दिल्ली स्थित परिसर को अपने कब्ज़े में ले लिया है। L&#038;DO की अनुमति के बिना किसी भी व्यक्ति द्वारा उक्त परिसर में प्रवेश करना, उस पर कब्ज़ा करना या उसका उपयोग करना पूरी तरह से प्रतिबंधित है और ऐसा करने पर कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी।&#8221; चेयरमैन RP गुप्ता कोलकाता में &#8216;द स्टेट्समैन हाउस&#8217; को लेकर भी एक कानूनी मामले का सामना कर रहे हैं।</p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;&#8230; यूएनआई को इस स्तर तक आने में आखिर कौन है ज़िम्मेदार ? </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/on-a-single-complaint-a-dig-was-denied-a-field-posting-for-his-entire-career">जब यूएनआई के एक संवाददाता की शिकायत पर बिहार पुलिस उप-महानिदेशक को जीवन पर्यन्त कभी फिल्ड में पदस्थापन नहीं हो पाया (भाग-2)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8216;संपादक स्टोरी मांगे &#8211; चवन्नी उछाल के&#8217;, यानी पटना के पाटलिपुत्र टाइम्स अखबार के पत्रकारों को, कर्मचारियों को &#8216;रेजकी&#8217; (सिक्के) में वेतन </title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 06 Mar 2022 12:38:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राज्य]]></category>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना: कल ही की तो बात है। कल ही तो कोई सैंतीस साल बाद पटना के एक पत्रकार के बारे में लिखा था &#8211; नाम था अंजनी विशाल (अब दिवंगत) जो हिंदी भाषा के पत्रकार थे और पटना से प्रकाशित &#8216;पाटलिपुत्र टाईम्स&#8217; में कार्यरत थे उन दिनों। हिंदी भाषा में प्रकाशित अखबार और अपनी कहानी से वे प्रदेश के सिंहासन को ही नहीं, देश की राजधानी और राजधानी के रायसीना हिल पर अंग्रेजों के ज़माने में बना भवन का नींव तक हिल गया था। प्रदेश के पत्रकारों में उस कहानी को लेकर भारत-पाकिस्तान जैसा युद्ध छिड़ा, विभाजन हुआ। कुछ &#8216;सम्मानित&#8217; पत्रकार अंजनी विशाल के खेमे में आये तो कुछ मुंह मोड़ लिए। खैर अब तक तो खबर का प्रकाशन हो गया था। लोग-बाग़ &#8220;भला उसकी कमीज मेरी कमीज से सफ़ेद क्यों&#8221; को मैदान के बीचोबीच रखकर कोई &#8220;डिफेंसिव&#8221; हो रहे थे, तो कोई &#8220;ओफ्फेंसिव।&#8221; खैर। </strong></p>
<p>कल की कहानी को मगध की राजधानी की सड़कों पर लुढ़कने के बाद शहर के ज्ञानी-महात्मा कोई फोन पर बधाई दे रहे थे, तो कोई व्हाट्सट्सएप पर लिख रहे थे &#8211; तुस्सी ग्रेट हो आर्यावर्तइण्डियननेशन, शब्दों से लेखक को श्रद्धांजलि दिए सैंतीस साल बाद। आज भी एक-एक शब्द ह्रदय को हिला दिया।&#8221; सबसे अच्छा तब लगा जब दिवंगत अंजनी विशाल की विधवा श्रीमती कुसुम विशाल जी लिखी: &#8220;बहुत-बहुत धन्यवाद इस आलेख के लिए।&#8221; </p>
<p>लेकिन जब <strong>पटना के महान पत्रकार सम्मानित विमलेन्दु सिंह</strong> से बात किये तो पाटलिपुत्र टाईम्स की एक और कहानी जीवित हो गयी। शायद भारतीय पत्रकारिता के जन्म के बाद ऐसी घटना कभी नहीं हुई होगी, यहाँ तक कि वर्तमान प्रधानमंत्री सम्मानित नरेंद्र मोदी जी द्वारा भारतीय मुद्रा का &#8216;विमुद्रीकरण&#8217; किये और 500 तथा 1000 रुपये के नोटों को &#8216;चलन से उठाकर बाहर फेंक&#8217; दिए। अगर आप पत्रकार हैं, यह किसी मीडिया घराने से जुड़े हैं, तो शायद आप के लिए भी यह कहानी अजूबा होगी और आप पढ़कर लोटपोट हो जायेंगे। </p>
<p>विमलेन्दु बाबू की आवाज कान में गुंजी। दो शब्दों का एक नाम गूंजा। ऐसे जैसे यज्ञोपवीत संस्कार में &#8216;गुरुवार&#8217; अपने शिष्य के कानों में &#8216;बीजमंत्र&#8217; पढ़ते हैं। विमलेन्दु बाबू जीना नाम लिए वे साहब भी पत्रकार ही हैं, लेकिन आजकल पत्रकारिता, लेखन के अलावे हिंदी साहित्य के हस्ताक्षर हो गए हैं। कविताएँ लिखते हैं, कहानियां लिखते हैं, उपन्यास लिखते हैं। &#8216;भारत भूषण अग्रवाल&#8217; पुरस्कार, &#8216;हेमंत स्मृति&#8217; कविता सम्मान, &#8216;विद्यापति पुरस्कार&#8217; और अनेकानेक पुरस्कारों से अलंकृत हैं मान्यवर। </p>
<p>मैं बिना देर किये उनके मोबाईल की घंटी टनटना दिए। साहब दूसरे छोड़ से बहुत ही शालीनता से मेरा परिचय पूछे। आम तौर पर दिल्ली ही नहीं, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ही नहीं, पटना के पत्रकारों को भी अगर फोन करते हैं तो पहले मेरा पूरा जन्मकुंडली पूछते हैं। अब फोन पर उम्र तो मालूम नहीं होता (वैसे जो क्राईम के क्षेत्र में रिपोर्टिंग किये होंगे और देश की दो पुलिस &#8211; दिल्ली पुलिस और मुंबई पुलिस &#8211; के अन्वेषण और फोरेंसिक साइंस विभाग से जुड़े होंगे, उनके वैज्ञानिक तकनीकों के प्रयोग चाहे ब्लड के मामले में हो, फिंगरप्रिंट के मामले में हो, आवाज के मामले में हो, से अवगत होंगे तो &#8216;आवाज से औसतन 90 फीसदी से अधिक उस व्यक्तिविशेष के शारीरिक बनाबट को आंक सकते हैं।&#8221; अब गूगल के युग में, ट्विटर के युग में इतनी मेहनती कौन करता हैं। इण्डियन एक्सप्रेस में नब्बे के ज़माने में कार्य करते समय हम लोगों ने तो सीखा था। खैर। </p>
<p><strong>दूसरे छोड़ से जो महाशय फोन पर थे वे सम्मानित महान पत्रकार, लेखक, कवि, उपन्यासकार संजय कुंदन साहब थे।</strong> मेरी उनसे पहली बातचीत थी। मैं तक्षण सम्मानित विमलेन्दु जी का नाम का पत्ता फेक दिया और कहा की मैं इसी नाम के व्यक्ति को ढूंढ रहा हूँ जिनका सम्बन्ध भारतीय रेजगारी (सिक्के) से है, जो उन्हें किसी समाचार पत्र में नौकरी करने के दौरान मासिक तनखाह में दिया गया था। वे जोर से ठहाका मारे और कहे : &#8216;आप सही स्थान पर है। वह मैं ही हूँ और किताब में उद्धृत भी किया हूँ।&#8221; आपको जानकर आश्चर्य होगा की पटना से प्रकाशित &#8216;पाटलिपुत्र टाइम्स&#8217; में एक समय पत्रकारों को, कर्मचारियों को भारतीय रेजगारी (सिक्के) में मासिक तनख्वाह दी गयी थी। </p>
<p>बहरहाल, <strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> से बात करते संजय कुन्दन कहते हैं: &#8220;यूं तो मैंने ग्रेजुएशन के बाद ही अखबारों में फ्रीलांसिंग शुरू कर दी थी पर अखबारों में नौकरी की बाक़ायदा शुरुआत 1994 में धनबाद के ‘आवाज़’ से हुई जहां मैं प्रशिक्षु उप संपादक बनकर गया। लेकिन वहां मन नहीं लगा इसलिए एक ही महीना में पटना लौट आया। कुछ दिनों  के बाद पाटलिपुत्र टाइम्स के निकलने की जानकारी मिली। इस बार इसे कांग्रेस के नेता भरत राय ने निकाला था। अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले थे और उनका मकसद चुनावी लाभ लेना रहा होगा। हालांकि कहा यह गया कि अख़बार का चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है। वैसे भरत राय चुनाव हार गए और कुछ ही दिनों के बाद अख़बार बंद कर दिया गया।&#8221;</p>
<p>कुंदन बाबू आगे कहते हैं: &#8220;बहरहाल एक रोचक इंटरव्यू के बाद उसमें मेरी नियुक्ति हुई। मेरे ज़्यादातर सहकर्मी मेरे मित्र ही थे। उसके संपादक पहले मणिकांत ठाकुर बने, जिन्होंने एक दिन हम लोगों के साथ बैठक भी की लेकिन बाद में पता नहीं क्यों उन्होंने छोड़ दिया। फिर कुछ दिन हम सब संपादक विहीन रहे। फिर विजय भास्कर आए। हम सब नए थे, युवा थे, बहुत कुछ करना चाहते थे। अखबार भी नया था। हम सबको मनमुताबिक काम मिला। मुझे संपादकीय लिखने से लेकर एक साझा कॉलम में लिखने का अवसर भी मिला। हम लोगों को जो सूझा, उस हिसाब से हमने खूब प्रयोग किए। वह एक तरह से स्व प्रशिक्षण था। उन दिनों काम का ऐसा उत्साह था कि छुट्टी के दिन भी आकर काम करते थे। वह करीब सात-आठ महीने का समय बड़ा मज़ेदार रहा। इस दौरान कई नाटकीय घटनाएं हुईं। कर्मचारियों के बीच मारपीट हुई, एक महिला पत्रकार अपने प्रेमी के साथ गुम हो गई।&#8221;</p>
<p><strong>कुंदन जी कहते हैं: &#8220;उससे जुड़ा एक प्रसंग बड़ा ही दिलचस्प है। एक बार हम लोगों को तनख्वाह सिक्के में दी गई। असल में पाटलिपुत्र टाइम्स के प्रेस में दूसरे छोटे अख़बार भी छपते थे जैसे सांध्य टाइम्स, जिसे जेवीजी निकालती थी। जेवीजी एक पैरा बैंकिंग कंपनी थी, जिसके छोटे-छोटे बचतकर्ता थे। वे रोज़ अपनी बचत का कुछ पैसा जमा करते थे। आम तौर पर वे सिक्के जमा करते थे। इस तरह जेवीजी के पास सिक्कों का भंडार हो जाया करता था। एक बार जेवीजी ने सांध्य टाइम्स के प्रकाशन के शुल्क का भुगतान सिक्कों में किया। पाटलिपुत्र टाइम्स  के व्यवस्थापक इतने सिक्के लेकर क्या करते। उन्होंने हमारा वेतन इन्हीं सिक्कों में देने का फ़ैसला किया।&#8221;</strong></p>
<p>मैं अपनी हंसी को रोक नहीं रहा था। उन दिनों मेरे कई जानकार उस अखबार में कार्य करते थे। उन्हें भी फोन घुमाया, घंटी टनटनाया, लेकिन जैसा मैं पहले लिखा हूँ, &#8220;हम स्वयं को बहुत भाग्यशाली समझते हैं जब पटना के कोई पत्रकार अनजान नंबर देखकर भी उठा लेते हैं। औसतन लोग नहीं उठाते। इतना ही नहीं, वे भी नहीं उठाते जो उस अखबार में कार्य भी किये थे। हाँ, रेजगारी में तनखाह लिए थे या नहीं, इसी को जानने के किये उन्हें भी फोन किया। वे नहीं उठाये। खैर। </p>
<p><strong>संजय कुन्दन साहब आगे कहते हैं: &#8220;उन दिनों मेरी तनख्वाह पंद्रह सौ रुपये थी। इस तरह पंद्रह सौ सिक्के मिले। हालांकि इससे भी ज़्यादा रहे होंगे क्योंकि कुछ अठन्नी भी थी। वे पैसे एक छोटी सी बोरी में मिले। लेकिन हमारे कई वरिष्ठों की तनख्वाह तीन से चार हज़ार के बीच थी। उन्हें कई बोरियां मिलीं। मैंने एक वरिष्ठ पत्रकार को देखा कि वे रिक्शे पर बोरियां लादकर ले जा रहे हैं। कोई स्कूटर पर ले गया।  मैं भी साइकिल के पीछे रखकर अपना वेतन लाया।&#8221;</strong></p>
<p>उनकी बातों का अंतिम पैरा चल रहा था। दोनों हंस रहे थे। भारतीय हिंदी साहित्य के गद्य-पद्य लेखक को, उपन्यासकार को इस कदर हँसते मुद्दत बाद महसूस का रहा था, क्योंको दोनों फोन पर ही थे। वे हँसते आगे कहते हैं: &#8220;मुझे कैशियर के कमरे का दृश्य भूलता नहीं। कैशियर बेचारा बीच में खड़ा था और चारों तरफ़ उसके घुटने भर सिक्के ही सिक्के पड़े थे। एक-दो कर्मचारी किनारे बैठकर सिक्के गिन रहे थे। हमलोग जब भी चाय पीने या कुछ खाने जाते तो बिल का भुगतान सिक्कों में करते और एक-दूसरे को देखकर हंसते। कई दिनों तक हमारे बीच यही चर्चा रही कि हमारे सिक्के ख़त्म हुए या नहीं और हुए तो कैसे। किसी ने दूधवाले को दे दिया तो किसी ने पास के किराने वाले के पास खपाया। पाटलिपुत्र टाइम्स की जब भी याद आती हैं, आंखों के सामने सिक्के चमक उठते हैं।&#8221;</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/state/newspaper-journalists-employees-pay-in-coins">&#8216;संपादक स्टोरी मांगे &#8211; चवन्नी उछाल के&#8217;, यानी पटना के पाटलिपुत्र टाइम्स अखबार के पत्रकारों को, कर्मचारियों को &#8216;रेजकी&#8217; (सिक्के) में वेतन </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>हिंदी पत्रकारों को &#8216;चमचा&#8217; नहीं, &#8216;काँटा&#8217; बनना होगा, अन्यथा &#8216;अंग्रेजी&#8217; पत्रकार &#8216;ब्रितानिया&#8217; सरकार जैसा कब्ज़ा कर लेंगे।</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Jan 2022 12:02:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[crying]]></category>
		<category><![CDATA[hindi]]></category>
		<category><![CDATA[journalists]]></category>
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<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/tale-of-hindi-journalists-in-indian-media">हिंदी पत्रकारों को &#8216;चमचा&#8217; नहीं, &#8216;काँटा&#8217; बनना होगा, अन्यथा &#8216;अंग्रेजी&#8217; पत्रकार &#8216;ब्रितानिया&#8217; सरकार जैसा कब्ज़ा कर लेंगे।</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>विगत दिनों &#8216;जनसत्ता&#8217; अखबार के मूर्धन्य पत्रकार और वर्तमान में अनुवाद कम्युनिकेशंस के अधिष्ठाता संजय कुमार सिंह लिखित कुछ शब्द फेसबुक पर पढ़ा। उस लेख में मूलतः दो पत्रकारों द्वारा एक छोड़ से दूसरे छोड़ पर फोन पर बातचीत हो रही थी। वाचक की छोड़ से आने वाले प्रत्येक शब्द में वेदन, रुदन, त्रादसी तो थी। अगर मोबाईल के रास्ते नाक और आँख से निकलने वाले जल का आवागमन होता, तो शायद श्रोता के छोड़ पर बाल्टी में पानी एकत्रित हो जाता। वेदना का मूल सार था &#8211; अवकाश प्राप्त हिंदी पत्रकार अपने जीवन के अंतिम बसंत कैसे जिएं ?</strong> </p>
<p>संजय सिंह लिखते हैं: &#8220;छह आठ महीने पहले एक अनजान नंबर से फोन आया था। फोन करने वाले ने पूछा कि संजय जी आपका नंबर मेरे पास काफी समय से सेव है मैं पहचान नहीं पा रहा हूं कि आप कौन हैं। सभ्य और बुजुर्ग सी आवाज थी तो मैंने अपना परिचय बता दिया। उन्होंने भी अपना नाम और हाल-चाल सब बताया। मैंने उनका नंबर सेव कर लिया। लंबी बात हुई। मैं भी रिटायर, बेरोजगार की ही श्रेणी में हूं सो अच्छा ही लगा। उसके बाद शायद दो बार या एक ही बार फोन आया था। हालचाल और पत्रकारिता राजनीति पर बात हुई। रिटायरमेंट के बाद बुढ़ापे में परेशानी झेल रहे हैं वह भी मुद्दा था। बच्चों के बारे में मैंने पूछा नहीं, उन्होंने बताया नहीं या बताया भी हो तो मुझे याद नहीं है। पर वे साथ नही रहते हैं। शायद खबर भी नहीं लेते हैं या हों ही नहीं। </p>
<p>आज फिर उनका फोन आया था। रुआंसे लग रहे थे। मैंने उत्साहपूर्वक बात कर स्थिति समझने और संभालने की कोशिश थी। अंदाजा तो था पर मैं भी किसी की कितनी मदद कर सकता हूं। बातचीत में उन्होंने कहा कि कई दिनों बाद आज ठीक से खाना खाया हूं। चूंकि नियमित खाना नहीं खाता इसलिए खाना था भी तो खा नहीं पाया और ऐसी ही बातें। काम नहीं है। तुम्हारा काम कैसा चल रहा है आदि। अंत में उन्होंने कहा कि किसी से कुछ पैसे दिलवा सको तो दिला दो। मैंने उनसे उनका शहर पूछा। बातचीत में जिन नामों की चर्चा आई थी उनसे बात करने के लिए कहा। पर वे यही कहते रहे कि कितना मांगू। सब से मांग चुका हूं। शर्म आती है। और फलां तो फोन भी नहीं उठाता। उसके पास काम हैं, पैसे होंगे तो व्यस्त रहता है। उससे बात नहीं हो पाती। आदि आदि। मतलब संकट सिर्फ अभी का नहीं है। </p>
<p>कुछ पैसे मैं उन्हें अभी दे दूं तो फिर अगली बार वो मुझसे मांगने में हिचकेंगे या दो-चार बार मैं दे दूं तो मुझे ही फोन उठाना बंद करना पड़ेगा। क्या गोबर पट्टी में जहां हिन्दी वालों की और भिन्न पार्टियों की सरकार है। पत्रकारों को खिलाने-पिलाने को बुरा नहीं माना जाता रहा है वहां किसी बूढ़े-बुजुर्ग पत्रकार के लिए कोई व्यवस्था नहीं हो सकती है? अगर सरकार नहीं कर रही हैं तो कौन करेगा? क्या यह हमारा काम और हमारी जिम्मेदारी नहीं है? हो सकता मुझे जरूरत ना पड़े पर क्या मुझे अपने बुढ़ापे में किसी साथी की मदद न कर पाने का अफसोस नहीं रहे इसके लिए अभी कुछ नहीं करना चाहिए। किसी एक साथी की मदद करने से कब तक काम चल पाएगा। मुझे लगता है कि रिटायर, बुजुर्ग या अक्षम पत्रकारों के लिए कुछ किया जाना चाहिए। फिलहाल तो उक्त पत्रकार को भी सहायता की जरूरत है। </p>
<p>क्या हम कुछ करेंगे या ताली-थाली ही बजाते रहेंगे। जो पत्रकारिता नहीं कर रहे हैं वही कुछ दान सुख प्राप्त कर लें। चारण पत्रकारिता की स्थायी -कमाऊ व्यवस्था कर दें जिससे साथियों का जीवन आराम से निकल सके। जिनका समय निकल गया वो तो अब अफसोस ही कर सकते हैं। हमारी अपनी स्थिति वैसी ही नहीं हो यह कैसे तय होगा? पहले लोकोपकार करने वाले बहुत सारे लोग और संस्थाएं होती थीं। अब सब पीएम केयर्स में समाहित है। विदेशी दान उड़ाने की संभावनाओं पर सरकार की नजर है। ऐसे में यह काम करना तो सरकार को ही चाहिए पर सरकार के समर्थक करवा सकते हैं या इसे गैर जरूरी बता सकते हैं?&#8221; खैर। </p>
<p><strong>मेरी जिंदगी अख़बारों के पन्नों के बीती हैं। उन दिनों पटना में प्रकाशित अख़बारों की कीमत छः पैसे से 15 पैसे के बीच ही कुस्ती-कबड्डी करती थी। वजह भी था &#8211; मालिक को समाज का सरोकार था और वह बनिया जाति से नहीं आते थे । जीवन के प्रारंभिक दिनों में पटना की सड़कों पर कभी अपने कन्धों पर, तो कभी साईकिल के हैंडिल और कैरियर पर, अख़बारों को बांधकर, रखकर अख़बारों के थोक विक्रेता के रास्ते प्रकाशक से पाठक तक पहुँचाया हूँ। स्वतंत्र भारत में हिंदी के मूर्धन्य ज्ञानी-महात्मा उसे &#8216;अखबार विक्रेता&#8217; कहते हैं; जबकि अंग्रेजी साहित्य के विशारद &#8216;हॉकर&#8217;। </strong></p>
<p>बात साठ के दशक के उत्तरार्ध और सत्तर के दशक के मध्य की है। उन दिनों पटना ही नहीं देश के किसी भी शहर की सड़कों पर न तो कुकुरमुत्तों की तरह पत्रकार जन्म लिए थे, और ना ही पत्रकारों मालिकों के द्वारा, शासन-प्रशासन के द्वारा, सत्ताधारियों के द्वारा उनका मानसिक-आर्थिक-बौद्धिक बलात्कार ही होता था। विदेशी मुद्राओं द्वारा भारतीय मुद्राओं का भी बलात्कार प्रारम्भ नहीं हुआ था। भारतीय मुद्रा भी पटना के सड़कों पर, कालिदास रंगालय में बेखौफ &#8216;कत्थक नृत्य&#8217; करते थे। परिणाम यह था की गरीब भी अमीरों के सामने अपने 56 इंच सीने को 66, 76 इंच बनाकर दिखाने में तनिक भी हिचकी नहीं लेते थे। गरीब और धनि समाज में थे तो जरूर उन दिनों भी, लेकिन 36 का आंकड़ा शब्दकोष में दीखता नहीं था। </p>
<p>जब कदमकुंआ वाले लालाजी, आप उन्हें जयप्रकाश नारायण भी कहें (पटना के नेता तो उन्हें लोकनायक&#8217; कहते नहीं थकते) पटना की सड़कों पर आंदलन का नेतृत्व किये, हमारी तो निकल पड़ी। टीवी का जमाना नहीं था। सोशल मीडिया भारतीय मीडिया घरानों के गर्भ में पनपा भी नहीं था । न तो समाज &#8216;स्मार्ट&#8217; हुआ था और ना ही &#8216;शहर&#8217; &#8211; क्योंकि नेताओं की सोच कोइलवर से आगे दिल्ली की ओर नहीं निकली थी। वह तो सम्मानित प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी को धन्यवाद दीजिए कि &#8216;दिव्यांग&#8217; शहरों को भी &#8216;स्मार्ट&#8217; शहर बनाकर धन्य-धान्य कर दिए। नारा भी बुलंद कर दिए &#8211; सोच बदलो , देश बदलेगा। </p>
<p><strong>अब उन्हें कौन समझाए कि भूखा पेट तो भगवान् का भी भजन नहीं होता, भूखा पेट पत्रकार क्या लिखेगा, समाज का सोच क्या बदलेगा ? लेकिन सम्मानित प्रधानमंत्री जानते थे कि उन्हें अब पत्रकारों की कोई जरुरत नहीं हैं, भारत सरकार में भी पत्र और सूचना कार्यालय की जरूरत नहीं है &#8211; क्योंकि वे खुद एक पत्रकार हैं। खुद प्रेस रिलीज बनाते हैं, अपनी बातें लिखते हैं, अपनी तस्वीरों के साथ &#8216;ट्वीट&#8217; कर देते हैं। भारत स्थित मीडिया घरानों के मालिकों, उसमें कार्य करने वाले पत्रकारों को लपकना है तो लपक लो, छापना है तो छाप लो &#8211; क्योंकि उनके करोड़ों अनुयायी हैं।</strong> </p>
<p>स्थिति बद से बत्तर तब हो गयी, जब अंग्रेजी माध्यम के पत्रकारों ने अंग्रेजी मीडिया घरानों को &#8216;नमस्कार&#8217; कर &#8216;हिंदी&#8217; बोलने लगे, &#8216;बतियाने&#8217; लगे और हिंदी मीडिया में ढुकने लगे। अंग्रेजी पत्रकारों की एक आदत हिंदी अख़बारों के मालिकों पर बहुत भारी पड़ा &#8211; उन्हें प्रभावित करने में। अंग्रेजी अखबार वाले &#8216;कमर&#8217;, &#8216;कन्धा&#8217; अधिक हिलाते हैं। बीड़ी नहीं पीते चाहे क्रेडिट कार्ड पर लोन लेकर ही सिगरेट पीना पड़े, फ़िल्टर वाला। सड़क के किनारे चाय की दूकान पर बैठकर चाय नहीं पीते। मोदी जी अपने बचपन में जिस चाय की दूकान पर काम करते थे, उसके बारे में बेहतरीन शब्दों का विन्यास कर, लिखकर उसे भी बेच देते हैं, क्योंकि अंग्रेजी मीडिया घरानों के पत्रकारों पर बनिया मालिकों का विशेष प्रभाव होता है। विश्वास नहीं हो तो पटना के अशोक राज पथ से लेकर डिक्की के राजपथ तक भ्रमण-सम्मलेन कर आंक लीजिये। </p>
<p><strong>हिंदी मीडिया घरानों के मालिकों को कन्धा-कमर हिलाकर, उन्हें पत्रकारिता के साथ घर के लिए आलू, पियाज, मटर, साग-सब्जी लाने के साथ-साथ &#8216;स्मार्ट शहरों के आलीशान होटलों में बैठकर शराब पीने का भी मार्ग बना लेते हैं। यानी हिंदी मीडिया घरानों पर अंग्रेजी हुकूमतों का कब्ज़ा हो जाता है। इसका मूल कारण यह है कि हिंदी मीडिया घराने के मालिक चाहे खरबपति क्यों न हों, वे &#8220;इंट्रोवर्ट&#8221; होते हैं। </strong></p>
<p>ये सब कार्य &#8216;शिष्टता&#8217; से भी हिंदी मीडिया घरानों में कार्य करने वाले हिंदी में बोलने-बतियाने वाले पत्रकार &#8216;स्टाईल&#8217; से नहीं कर पाते। अगर कमर और कन्धा हिलाने की कोशिश किये भी तो शरीर के 206 हड्डियां में कोई न कोई खिसक जाती है। अब सब तो &#8216;समूह&#8217; में विश्वास करते हैं कि जब तक अंतिम सांस नहीं ले लेंगे तब तक न तो मीडिया को छोड़ेंगे और ना ही &#8216;डिमॉनेटाइजेशन&#8217; के बाद भी भारतीय मुद्रा के आगमन श्रोत का मार्ग अवरुद्ध करेंगे। कभी मौका मिले तो ऐसे महान पत्रकारों से वार्तालाप अवश्य कर लें &#8211; ज्ञान का पिटारा है इनके पास। लेकिन व्यवहार में दूसरे की थाली को भी छीन कर बिना डकार लिए गटकने में कोई कसर नहीं छोड़ते। खैर।</p>
<p>पिछले दिनों हिन्दी के एक लेखक एक जलेबी की दूकान पर गए। लेखक ने दुकानदार से कहा: “पाँच जलेवी देना भैय्या।” दुकानदार बोला: पन्द्रह रुपये देना। लेखक बहुत ही मायूसी के साथ दूकानदार को कहते हैं: मैं तो सिर्फ चार शब्द में याचना किया, और इन चार शब्दों को जब मैं लिखकर किसी पत्र-पत्रिका या कारपोरेट घरानों में हिंदी नहीं जानने वाले पैजामा का नारा पकडे अधिकारी को दूंगा, तो वे मुझे ३० पैसे प्रतिशब्द के हिसाब से (वह भी बहुत याचना के बाद) भुगतान करेंगे, यानी मुझे १ रुपये २० पैसे मिलेंगे। मैं इन पांच जलेबी के लिए पन्द्रह रुपये कहाँ से लाऊंगा ? दुकानदार लेखक की स्थिति को समझते हुए लेखक के हाथ में “एक पाव जलेवी” रखते कहता है: “तभी तो हिन्दी साहित्य की माँ – बहन हो रही है। </p>
<p><strong>वह तो धन्यवाद दीजिये  जिस समय रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र, मधुशाला, अलंकार, आनन्द मठ, एक गधे की वापसी, गबन, गोदान, गोरा, निर्मला, कबुलीबाला, जीना तो पड़ेगा, अंधायुग, मुद्रा राक्षस उखड़े खम्बे आदि कहानियों, कविताओं की रचना की गई, उन दिनों भारतीय भाषाओँ में लेखक, लेखनी और शब्दों की कीमत थी । लेकिन आज आज़ादी के 75 वर्ष बाद, जबकि देश में अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है, भारतीय मुद्राओं का मोल अंतर्राष्ट्रीय बाजार में लुढ़का, बल्कि हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओँ के शब्दों की कीमत तो लुढ़की ही नहीं; लोगों ने तो उसे “चरित्रहीन” बना दिया नहीं तो आज अपने ही देश में, अपनी ही भाषा २० पैसे से ३० पैसे प्रतिशब्द कैसे बिकती। बाजार में क्रेताओं की संख्या तो भरमार है ही, लेखकों की तो बाढ़ से है – बारहो महीना, छतीसो दिवस। वैसी स्थिति में “मेरे प्यारे देश! देह या मन को नमन करूँ मैं ? किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं? </strong></p>
<p>हिंदी के पत्रकार इस बात को मानते हैं कि हिन्दी में लिखने की संभावना बहुत कम है और लिखने के पैसे तो नहीं के बराबर हैं। इसलिए कई लोग जो &#8216;बाममार्गी&#8217; थे, वे दक्षिणपंथी&#8217; हो गए, कई &#8216;मध्यमार्ग&#8217; अपना लिए। लिखने में एक बड़ा झंझट यह है कि आपके नाम से छपेगा। पाठक वही होंगे। इसलिए कोई भी बहुत ज्यादा नहीं छापेगा। जब अच्छे पैसे मिलते थे तो एडिट पेज के एक लेख के 1000 रुपए मिलते थे। महीने के चार-छह हजार में क्या होता है। और जो इतने पैसे देता था वो इतना बिकता था कि आप कहीं और नहीं लिख सकते थे। उन दिनों बैंक में खाता खोलना आसान था। किसी भी नाम से खाता खुल सकता था। हम लोग दो-चार नाम से लिखते थे। रेडियो से भी पैसे मिलते थे और अनुवाद भी करता था। सब मिलाकर चल जाता था। अब काम लगातार कम हुआ है। दूसरे नाम से खाता ही नहीं खुलेगी। आयकर और जीएसटी के नियमों का उल्लंघन है। इसलिए संभावना लगातार कम हुई है जबकि काम करने वाले बढ़े हैं। नौकरियां भी कम हुई हैं। जहां पहले 50 लोग होते थे वहां 10 हैं वो भी सस्ते वाले। पुराने अनुभवी लोग बेरोजगार हैं। सस्ते या मुफ्त में काम करने के लिए तैयार। इसलिए यह हाल हुई है। </p>
<p><strong>यदि देखा जाय तो हिंदी का गला घोटने का प्रयास आज़ादी के बाद से लगातार किया जाता रहा है। जिम्मेदार लोगों द्वारा, अंग्रेजी अनिवार्यता कई परीक्षाओं से लेकर योग्यता का एक अनुचित मापदंड आज भी बनी हुई है। भारतीय समाज में, ऐसे में हिंदी भाषा का जो भी उत्कर्ष हो सका हैं वो इसके अपने विशाल पाठक वर्ग व बड़ी आबादी की बोलचाल की भाषा होने से हो सका हैं जिसके मूल में कहीं न कहीं बाज़ारवादी मजबूरी भी हैं जिसमें ग्राहक की रुचि,भाषा आदि सर्वोपरी हैं! लेकिन बड़ा प्रश्न ये हैं कि हिन्दी लेखन को प्रोत्साहन देना आवश्यक हैं आर्थिक व जनजागरण दोनों स्तर पर क्योंकि हिंदी पत्र पत्रिकाओं में लेखन पर जो पारिश्रमिक दिया जा रहा हैं वो बेहद कम हैं।  इससे न तो हिंदी बचेगी और ना ही लेखक। इतना ही नहीं, हिंदी भाषा प्रेमियों और मर्मज्ञों की उदासीनता के चलते भाषा की मूल आत्मा अपने स्वरूप को खो देगी, वैसे भी देवनागरी लिपि को आज हिंगलिश लिपि सोशल मीडिया के दौर में अतिक्रमण कर रही है।</strong> </p>
<p>हिंदी के प्रबुद्धों का कहना है कि हिंदी वालों का सबसे ज्यादा शोषण किया हैं। हिंदी गुटबाजी से निकले तो कुछ हो, नए लोगों को कोई प्रोत्साहित करे तो कुछ हो। आजकल तो एक गुट नयी हिंदी का भी नारा लगाने लगी है, यहाँ भी बंटवारा! सबको मुफ्त में लिखने वाले चाहिए। हिंदी वाले केवल उसी को पैसा देते हैं जो पहले से ही समर्थ और समृद्ध या लोकप्रिय है। बेडा गर्क करके रखा है! लेकिन, उम्मीद है कि ये हालत बदलेंगे! हम तो प्रार्थना ही कर सकते हैं। </p>
<p>इनके अलावा जो सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है वह यह कि इनके द्वारा लेखकों को कितना भुगतान किया जा रहा है । आजकल जैसा कि देखने में आ रहा है, पाठकों की तुलना में लेखकों की संख्या में अपार वृद्धि हुई है । और यही कारण है कि पत्र पत्रिकायें ज्यादा शब्द समृद्ध लोगों से लिखवाने से बच रहे हैं और जिनसे लिखवाया जा रहा है, उनको बीस से तीस पैसे प्रति शब्द दिये जा रहे हैं, और यही वो कड़ी है जिसके कारण हिन्दी की दुर्दशा हुई है, क्योंकि ज्यादा शब्द संपन्न लेखक इस काम से हाथ खींच रहे हैं। इससे हाथ खींचना इसलिये उनकी मजबूरी बन चुकी है क्योंकि यह किसी भी तरह उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में सक्षम नहीं है, और बेहतर लोगों के लेखन के क्षेत्र में ना रहने से हिन्दी को जो नुकसान हुआ है वह दयनीय है। </p>
<p><strong>बहरहाल, सुधीश पचौरी साहब, हिंदी साहित्यकार हैं, लिखते हैं: साहित्य क्या राजनीति से कम है? वहां जाति है, तो यहाँ भी जाती है। वहाँ धर्म है, तो यहाँ भी है। वहां विचारहीनता है, तो यहाॅ॑ भी है। वहां परिवारवाद है, तो यहाँ भी है। वहाॅ॑ ललित और दलित विमर्श है, तो यहाँ भी है। वहां स्त्री विमर्श है, तो यहाँ भी है। वहां सबका साथ, सबका विकास है, तो यहाँ भी है।‌ वहां झूठ-सच है, तो यहां सचमुच का &#8220;झूठा-सच&#8221; है। </strong></p>
<p>इतना ही नहीं, अब तो अखिल भारतीय साहित्यकार मोर्चा भी बन गया है और नारा भी है &#8216;हर पुस्तक एक मशाल&#8217; है। लेकिन उन्होंने यह भी लिखा कि &#8220;जब एक काव्यात्मक पंक्ति राजनीति को बदलने का दावा कर सकती है, तब साहित्य राजनीति को बदलने का दावा क्यों नहीं कर सकता?&#8221; इसलिए उन्होंने हरेक छोटे-बडे़, अच्छे-बुरे साहित्यकारों से अपील कर दिए, &#8216;आवहु मिलकर सब रोवहु भारत आई। हा हा! साहित्य की दुर्दशा न देखी जाई।&#8217; आओ, सब मिलकर चुनाव लड़ो, जीतो और अपनी साहित्यिक सरकार बनाकर दिखा दो कि अब साहित्य ही है, जो समाज, जनतंत्र और आप सबकी रक्षा कर सकता है। यही सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा व स्वास्थ्य दे सकता है। राजनीति की बनाई सड़क टूट सकती है, घर फूट सकता है, लेकिन साहित्य में बनी सड़क न कभी टूटती है, न ही घर फूटता है।&#8221;</p>
<p>वे आगे लिखित हैं: &#8220;बहुत हो लिया इस-उसके दस्तखत के नीचे अपने दस्तखत करना। माँ सरस्वती के वरद पुत्र-पुत्रियों, किस-किस के पिछलग्गू बने रहोगे और कब तक? ये एक्शन के दिन हैं। हे मेरे लेखक, अपने को देख। सब नेता भ्रष्ट और कलंकी। अकेला तू अभ्रष्ट और निष्कलंकी। तू होता भी कैसे? तुझे मौका ही नहीं मिला। एक मौका तो लेकर देख। तेरी सात पुश्तें तर जाएंगी। इसलिए अपनी पार्टी बना। चुनावों में कूद। टिकट दे। टिकट ले। सोच तो। न जाने कितने बजर बट्टू तेरी कविताओं की एक एक दो-दो लाइनें गलत-सलत सुना-सुनाकर गद्दीनशी हो गए। जब कबीर, सूर, तुलसी, रहीम, निराला, दिनकर, गालिब, फैज, दुष्यंत, राहत इंदौरी और नजीर बनारसी की दो-चार लाइनें जपकर मामूली नेता सत्ता तक पहुॅ॑च सकते हैं, तो तू क्यों नहीं पहुॅ॑च सकता?</p>
<p>बहुत रो चुका कि कविता नहीं छपती। कहानी नहीं छपती। राॅयल्टी नहीं मिलती। एक बार कमान हाथ में ले, फिर देख बड़े से बड़ा प्रकाशक तेरी ग्रंथावली छापने के लिए एक लाइन लगाएगा। नोबेल वाले हाथ जोड़े खड़े होंगे। साहित्य का नया युग आएगा। तभी वह राजनीति का चमचा बनने की जगह उसके आगे जलने व चलने वाली मशाल बन सकेगा। इसीलिए मैं &#8216;जाली नोट&#8217; के गाने की तर्ज पर चेतातू हूॅ॑ कि हे कलम के धनी प्रतिभा पुंज, तू लुंज-पुंज मत बन। &#8216;छुरी बन कांटा बन ओ माई सन, सब कुछ बन किसी का चमचा नहीं बन!&#8217; </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/tale-of-hindi-journalists-in-indian-media">हिंदी पत्रकारों को &#8216;चमचा&#8217; नहीं, &#8216;काँटा&#8217; बनना होगा, अन्यथा &#8216;अंग्रेजी&#8217; पत्रकार &#8216;ब्रितानिया&#8217; सरकार जैसा कब्ज़ा कर लेंगे।</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>पत्रकार &#8216;निर्धन&#8217; होते हैं, जेब में &#8216;पैसे&#8217; नहीं होते हैं डॉ हर्षवर्धन जी &#8211; आप तो अधिक जानते हैं; इसलिए सीजीएचएस योजना को &#8216;कैश-लेस&#8217; कर दें </title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/health/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%9c</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 26 Jun 2020 14:09:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[स्वास्थ]]></category>
		<category><![CDATA[cghs]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[delhijournalistassociation]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दिल्ली पत्रकार संघ ने केन्द्रीय स्वास्थ मन्त्री डॉ हर्षवर्धन से भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) के मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए &#8220;कैश-लेस&#8221; स्वास्थ-सुविधा हेतु मांग किया है। पत्रकारों की आर्थिक-स्थिति को मद्दे नजर रखते संघ ने सरकार से गुजारिश किया है कि वर्तमान में पत्रकारों की स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि वे अस्पतालों की [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/health/%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%9c">पत्रकार &#8216;निर्धन&#8217; होते हैं, जेब में &#8216;पैसे&#8217; नहीं होते हैं डॉ हर्षवर्धन जी &#8211; आप तो अधिक जानते हैं; इसलिए सीजीएचएस योजना को &#8216;कैश-लेस&#8217; कर दें </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p>दिल्ली पत्रकार संघ ने केन्द्रीय स्वास्थ मन्त्री डॉ हर्षवर्धन से भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) के मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए &#8220;कैश-लेस&#8221; स्वास्थ-सुविधा हेतु मांग किया है। </p>



<p>पत्रकारों की आर्थिक-स्थिति को मद्दे नजर रखते संघ ने सरकार से गुजारिश किया है कि वर्तमान में पत्रकारों की स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि वे अस्पतालों की आर्थिक-भार को वहन कर सकें। </p>



<p>डॉ हर्षवर्धन को लिखे पत्र में संघ के अध्यक्ष मनोहर सिंह ने कहा है कि &#8220;विदित हो की दिल्ली सहित भारत के विभिन्न राज्यों में पत्र  सूचना कार्यालय (पीआईबी) के मान्यता प्राप्त पत्रकार अपने-अपने क्षेत्र में सेवा कर रहे हैं। केंद्र सरकार के सहयोग से विगत वर्षों से ये सभी मान्यता प्राप्त पत्रकार केन्द्रीय स्वास्थ और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा केंद्रीय सरकार स्वस्थ योजना (सीजीएचएस) सुविधा का लाभ उठा रहे हैं, जिसमे सरकार की ओर से लाभार्थ सुविधाएँ दी गयी हैं. ताकि उनपर अधिकाधिक मौद्रिक भार नहीं पड़े।&#8221;</p>



<p>संघ ने आगे लिखा है कि  &#8220;कोविड &#8211; 19 महामारी से उत्पन्न संकट की स्थिति में बहुत से पत्रकारों के परिवारों की आर्थिक स्थिति टूट रही है। किसी विपदा के क्षण में इस समय कई बार पत्रकारों की जेब में उतने भी पैसे नहीं रहते, जिससे वे अपनी और अपने परिवार के किसी सदस्य की समय पर चिकित्सा करवा सकें।  संकट के इस काल में उन्हें कहीं से मदद मिलना भी मुस्किल हो गया है। &#8220;</p>



<p>मनोहर सिंह के साथ संघ के महासचिव अमलेश राजू भी पत्र पर हस्ताक्षर किये हैं और मंत्री से मांग किये हैं कि:</p>



<p><strong>एक &#8211; </strong>सीजीएचएस योजना के तहत आने वाले मान्यता प्राप्त पत्रकारों/उनके परिवार के सदस्यों के लिए, अस्पताल में दाखिले की नौबत आने पर इसकी सुविधा को &#8220;पे लेस&#8221; किया जाय अथवा इसमें यथासंभव न्यूनतम से न्यूनतम आर्थिक भार डाला जाय। </p>



<p><strong>दो &#8211;</strong> इस योजना में कोविड -19 , गुर्दा, यकृत और कैंसर जैसी बिमारियों के इलाज में जरुरी सब प्रकार की जांच को भी पैनल में रखा जाय। </p>



<p><strong>तीन &#8211;</strong> सीजीएचएस सुविध प्राप्त पत्रकार की मृत्यु की स्थिति में उसके जीवन साथी को इस योजना का संरक्षण जारी रखा जाय। <br></p>
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