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	<title>journalist Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>​फोटोग्राफी की दुनिया में &#8216;रघु राय&#8217; होना इत्तेफाक नहीं, &#8216;सात-दशक की साधना का परिणाम&#8217; था, अन्यथा &#8216;कैमरा पकड़ने वाले सभी रघु राय हो जाते&#8217; ​</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 26 Apr 2026 07:07:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[journalist]]></category>
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		<category><![CDATA[photojoournalist]]></category>
		<category><![CDATA[raghu rai]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सन 1974 के जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के समय जब श्री रघु राय उस क्रांति की तस्वीरों को क्लिक-क्लिक कर आने वाले दिनों के लिए छायाकारिता की दुनिया में इतिहास का पन्ना जोड़ रहे थे, मैं पटना और दिल्ली से प्रकाशित अख़बारों को पटना की सड़कों पर बेच रहा था । पद्मश्री रघु राय भी हम-आप जैसे एक सामान्य व्यक्ति [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सन 1974 के जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के समय जब श्री रघु राय उस क्रांति की तस्वीरों को क्लिक-क्लिक कर आने वाले दिनों के लिए छायाकारिता की दुनिया में इतिहास का पन्ना जोड़ रहे थे, मैं पटना और दिल्ली से प्रकाशित अख़बारों को पटना की सड़कों पर बेच रहा था । पद्मश्री रघु राय भी हम-आप जैसे एक सामान्य व्यक्ति थे । लेकिन उनकी दृष्टि और उनकी ऊँगली का कैमरे के साथ तारतम्य सामान्य नहीं थी । एक साधना का परिणाम था जो ईश्वर प्रदत्त था अन्यथा कैमरा पकड़ने वाले सभी रघु राय हो जाते। आज 83-वर्ष की आयु में रघु राय अंतिम सांस लिए।</strong></p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=67W2EyjDjAY&#038;t=1205s">@अखबारवाला001(209✍ #पद्मश्रीरघुराय: #फोटोग्राफी एक #दृष्टि है 👁 एक #साधना है जो स्वयं करना होता है</a></p>
<p>पिछले कुछ माह पहले @अखबारवाला001 यूट्यूब के लिए एक कहानी करने के निमित्त राय साहब से मिला था। सन 1974 में जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के दौरान जिस दिन पटना के कदमकुआं से जिस जीप पर जयप्रकाश नारायण बैठे थे, उसी जीप पर चालक के बगल में लटक कर कैमरे से इतिहास को किलिक-क्लिक कर रहे थे, मैं दसवीं कक्षा का छात्र था। परीक्षा दे चुका था और परीक्षाफल का इंतज़ार कर रहा था। अखबार बेचने का समय का अवसान होने वाला था और अखबार में लिखने-पढ़ने का समय आने वाला था।उस दिन श्री रघु राय दि स्टेट्समैन, दिल्ली संस्करण के मुख्य छायाकार थे। मैं नहीं जानता था कि जिस अखबार के वे मुख्य छायाकार थे रघु राय उस दिन, उसी अखबार में 25-साल बाद दिल्ली संस्करण में, मैं विशेष संवाददाता बनूँगा। जिस संडे पत्रिका की शुरूआती संस्करणों में रघु राय की तस्वीरें प्रकाशित होंगी, उसी संडे पत्रिका में उनके कार्य करने के कोई 12 साल बाद मैं भी संवाददाता बनूँगा। विगत माह मुद्दत बाद उनसे मिला था । बातचीत किया। वे कहे &#8216;आप प्रश्न करें&#8217;, मैंने कहा &#8216;मैं सिर्फ सुनने आया हूँ, आप कहें और कैमरा अपना काम करेगा।&#8217; </p>
<figure id="attachment_7657" aria-describedby="caption-attachment-7657" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/raghu-rai-1.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/raghu-rai-1.jpg" alt="" width="1200" height="675" class="size-full wp-image-7657" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/raghu-rai-1.jpg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/raghu-rai-1-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/raghu-rai-1-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/raghu-rai-1-768x432.jpg 768w" sizes="(max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7657" class="wp-caption-text">देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे</figcaption></figure>
<p><strong>ऐतिहासिक फोटो-पत्रकार/संपादक’ रघु राय जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के चश्मदीद गवाह थे। जिस दिन जय प्रकाश नारायण पर पटना की सड़कों पर लाठी प्रहार हुआ था, रघु राय उनके बगल में, उसी जीप पर सवार थे चालक के पास लटके हुए। जेपी पर लाठी प्रहार की वह तस्वीर दो दिन बाद दिल्ली से प्रकाशित स्टेट्समैन अखबार के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित हुई थी। उधर संसद अपने सत्र में था। उस तस्वीर को देखकर एक और जहाँ सत्ता पक्ष के लोग लाठी प्रहार को गलत कह रहे थे, सत्ता से पदच्युत करने वाले सत्ताधारियों की तीव्र आलोचना कर रहे थे। रघु राय की वह तस्वीर भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में भूचाल ला दी थी उन दिनों। पटना से लेकर भारत के प्रत्येक राज्यों में, दिल्ली में रघु राय ‘राय साहब’ हो गए।  </strong></p>
<figure id="attachment_7658" aria-describedby="caption-attachment-7658" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-4.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7658" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7658" class="wp-caption-text">इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे</figcaption></figure>
<p>रघु राय कहते हैं: “उस दिन 4 नवम्बर था। मैं दिल्ली से पटना पहुँच गया था। सुबह-सवेरे तैयार होकर, कैमरे उठाकर मैं जयप्रकाश नारायण के कदमकुआं स्थित घर पर पहुँचने निकल गया था। घर पर बहुत उथल-पुथल नहीं था। शांति थी। एक जीप सामने लगी थी। कुछ तीन-चार छात्र वाहिनी के युवक-युवतियां उपस्थित थी। लोगों की उपस्थिति नहीं देखकर किसी ने जेपी साहब को सलाह दिया कि या तो यात्रा रोक देते हैं अथवा कुछ समय और प्रतीक्षा करते हैं। इन शब्दों को सुनकर जेपी साहब कहते हैं ‘ना’ ‘ना’, हम जो भी हैं निकलेंगे और निकल लिए। </p>
<figure id="attachment_7659" aria-describedby="caption-attachment-7659" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-5.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7659" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7659" class="wp-caption-text">इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे</figcaption></figure>
<blockquote><p>“जब चलने की बात आई तब मैं जेपी साहब से कहा कि क्या मैं चालक के तरफ रह सकता हूँ? मैं किसी तरह कुछ स्थान बनाकर चालक की ओर खड़ा हो गया। तस्वीर लेने के लिए हमें कुछ स्थान भी चाहिए था और सामने जेपी साहब भी। हम लोग जब निकले अधिकाँश लोगों के घरों के द्वार बंद थे। कुछ चलने पर एक-दो- मंजिले मकान की खिड़कियों पर खड़े दो-चार लोग दिखे जो जेपी साहब को नमन कर रहे थे, हौसला बढ़ा रहे थे। जिंदाबाद – जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। यह देखकर हम सबों का मनोबल बढ़ा। मैं और मेरा कैमरा अपना काम कर रहा था – क्लिक-क्लिक।” </p></blockquote>
<p>राय साहब कहते हैं: “जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए दो, चार, दस, बीस लोग साथ होते गए। सड़क पर स्थानीय प्रशासन के तरफ से बहुत अधिक मात्रा में सुरक्षा की व्यवस्था थी। स्थानीय पुलिस (पटना पुलिस, बिहार पुलिस) के अलावे केंद्रीय रिजर्व पुलिस के बल तैनात थे। लेकिन टुकड़ियों में लोगों का हम लोगों के साथ मिलने के कारण जन सैलाब क्रमशः बढ़ रहा था। जैसे-जैसे घडी की सुई आगे बढ़ रही थी, जेपी साहब के प्रति लोगों का विस्वास भी बढ़ रहा था। उनके घर से आगे निकलने पर धीरे-धीरे उनके जीप के पीछे, आगे, दाहिने-बाएं सैकड़ों, हज़ारों की संख्या में लोग चलने लगे थे। रास्ते में विशाल जन सैलाब हो गया था।” <br />
 <br />
<figure id="attachment_7660" aria-describedby="caption-attachment-7660" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7660" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7660" class="wp-caption-text">इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे</figcaption></figure></p>
<p>“कई घंटे बाद हम सभी आयकर चौराहे के पास पहुंचे थे। वहां की सुरक्षा व्यवस्था बहुत ही मजबूत थी। एक तरफ जनसैलाब था तो दूसरे तरफ वर्दी-टोपी धारी पुलिस बल। अब तक यह स्पष्ट हो गया था कि कुछ होने वाला है। मैं तो जेपी के साथ था, इसलिए यह देख नहीं पाया कि और कितने छायाकार है। तभी अचानक पहले अश्रु गैस के गोले चले और फिर लाठी प्रहार। उस भगदड़ में कैमरा और स्वयं को सँभालते, सुरक्षित रखते क्लिक-क्लिक करता रहा। </p>
<p>रघु राय का जन्म 1942 में झांग नाम के एक छोटे से गाँव में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। उन्होंने 1965 में फ़ोटोग्राफ़ी शुरू की, और अगले ही साल &#8216;द स्टेट्समैन&#8217; अख़बार में मुख्य फ़ोटोग्राफ़र के तौर पर काम करना शुरू कर दिया। 1971 में पेरिस में उनके काम की एक प्रदर्शनी से प्रभावित होकर, हेनरी कार्टियर-ब्रेसन ने 1977 में राय को &#8216;मैग्नम फ़ोटोज़&#8217; में शामिल होने के लिए नॉमिनेट किया। </p>
<figure id="attachment_7661" aria-describedby="caption-attachment-7661" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7661" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7661" class="wp-caption-text">इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे</figcaption></figure>
<p><strong>राय ने 1976 में &#8216;द स्टेट्समैन&#8217; छोड़ दिया और कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली एक साप्ताहिक समाचार पत्रिका &#8216;संडे&#8217; के लिए पिक्चर एडिटर के तौर पर काम करने लगे। उन्होंने 1980 में यह काम छोड़ दिया और भारत की अग्रणी समाचार पत्रिका &#8216;इंडिया टुडे&#8217; के शुरुआती सालों में पिक्चर एडिटर/विज़ुअलाइज़र/फ़ोटोग्राफ़र के तौर पर काम किया। 1982 से 1991 तक, उन्होंने विशेष अंकों और डिज़ाइनों पर काम किया, और सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विषयों पर ज़बरदस्त पिक्चर निबंधों का योगदान दिया; इनमें से कई निबंध पत्रिका की चर्चा का मुख्य विषय बन गए। पिछले 18 सालों में, राय ने भारत की व्यापक कवरेज में विशेषज्ञता हासिल की है। उन्होंने 18 से ज़्यादा किताबें लिखी हैं, जिनमें &#8216;रघु रायज़ दिल्ली&#8217;, &#8216;द सिख्स&#8217;, &#8216;कलकत्ता&#8217;, &#8216;खजुराहो&#8217;, &#8216;ताजमहल&#8217;, &#8216;तिब्बत इन एग्ज़ाइल&#8217;, &#8216;इंडिया&#8217; और &#8216;मदर टेरेसा&#8217; शामिल हैं।</strong></p>
<figure id="attachment_7662" aria-describedby="caption-attachment-7662" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-10.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7662" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-10.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-10-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-10-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-10-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-10-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7662" class="wp-caption-text">इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे</figcaption></figure>
<p>ग्रीनपीस के लिए, उन्होंने 1984 में भोपाल में हुई रासायनिक आपदा और गैस पीड़ितों के जीवन पर इसके लगातार पड़ रहे प्रभावों पर एक गहन डॉक्यूमेंट्री प्रोजेक्ट पूरा किया है। इस काम के परिणामस्वरूप एक किताब और तीन प्रदर्शनियाँ तैयार हुईं, जो 2004 से &#8211; जो इस आपदा की 20वीं वर्षगांठ थी &#8211; यूरोप, अमेरिका, भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया का दौरा कर रही हैं। राय को उम्मीद है कि यह प्रदर्शनी ज़्यादा जागरूकता पैदा करके कई जीवित बचे लोगों की मदद कर सकेगी &#8211; यह जागरूकता आपदा के बारे में भी होगी और पीड़ितों के बारे में भी &#8211; जिनमें से कई को अभी तक कोई मुआवज़ा नहीं मिला है और जो भोपाल के आस-पास के दूषित वातावरण में ही रहने को मजबूर हैं।</p>
<p><strong>रघु राय का फ़ोटोग्राफ़ी की दुनिया में आना काफ़ी हद तक एक इत्तेफ़ाक था। एक सिविल इंजीनियर, जो उस समय अपने काम से ब्रेक पर थे, 1960 के दशक में दिल्ली में अपने भाई, फ़ोटोग्राफ़र एस. पॉल से मिलने गए थे। वहीं उन्हें इस कला की बारीकियों से पहली बार परिचय मिला। हरियाणा के एक गाँव में एक दोस्त के साथ जाते हुए, उन्होंने अपनी पहली तस्वीरों में से एक खींची: एक गधा सीधे कैमरे की तरफ़ देख रहा था। इस तस्वीर से प्रभावित होकर, पॉल ने इसे लंदन के &#8216;द टाइम्स&#8217; अख़बार को भेजा, जहाँ यह छपी। इससे राय को न सिर्फ़ इनाम की रक़म मिली, बल्कि उससे भी कहीं ज़्यादा अहम, फ़ोटोग्राफ़ी में एक ऐसा करियर मिला जो 26 अप्रैल को दिल्ली में अपनी मृत्यु तक उनके साथ रहा। वे 83 वर्ष के थे।</strong></p>
<figure id="attachment_7663" aria-describedby="caption-attachment-7663" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-11.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-11.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7663" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-11.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-11-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-11-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-11-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-11-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7663" class="wp-caption-text">इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे</figcaption></figure>
<p>दृढ़ निश्चयी, गहरी नज़र रखने वाले और बेहद जिज्ञासु राय ने अपनी हर तस्वीर में जान डाल दी और देश की नब्ज़ को पकड़ा। 2024 में &#8216;द इंडियन एक्सप्रेस&#8217; को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, &#8220;एक पेशेवर फ़ोटोग्राफ़र से कहीं ज़्यादा, मैं ज़िंदगी का एक खोजकर्ता बन गया।&#8221; हालाँकि अब वह ज़िंदगी ख़त्म हो चुकी है, लेकिन जो पल उन्होंने कैमरे में क़ैद किए, वे हमेशा उनकी समृद्ध तस्वीरों के संग्रह (आर्काइव) के रूप में हमारे बीच रहेंगे। इस संग्रह में फ़ोटो-पत्रकारिता से लेकर दस्तावेज़ीकरण और अलग-अलग क्षेत्रों—राजनीति से लेकर संस्कृति तक—की कुछ सबसे जानी-मानी हस्तियों के पोर्ट्रेट शामिल हैं।</p>
<p>भारत के सबसे जाने-माने फ़ोटोग्राफ़रों में से एक, राय पाँच दशकों से भी ज़्यादा समय तक एक फ़ोटो-पत्रकार भी रहे। उन्होंने अपनी सहज और अंतर्ज्ञानी भावना को उन सभी न्यूज़रूम में पहुँचाया, जिनका वे हिस्सा रहे। 2024 के उसी इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, &#8220;अगर ज़िम्मेदार पत्रकारिता इतिहास का पहला मसौदा है, तो फ़ोटो-पत्रकारिता उस इतिहास के जिए जाने का पहला सबूत है। मेरे पेशे की पवित्रता की यह माँग है कि तस्वीरें लोगों के रोज़मर्रा के जीवन की गहराइयों में उतरें—उनकी भावनाओं और अलग-अलग स्थितियों पर उनकी प्रतिक्रियाओं को किसी भी दिए गए समय या स्थान पर कैमरे में क़ैद करें। मैं यहाँ सिर्फ़ सुंदर तस्वीरें बनाने या ऐसी दस्तावेज़ी तस्वीरें खींचने के लिए नहीं हूँ, जो महज़ जानकारी देती हों।&#8221;</p>
<figure id="attachment_7664" aria-describedby="caption-attachment-7664" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-13.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-13.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7664" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-13.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-13-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-13-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-13-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-13-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7664" class="wp-caption-text">इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे</figcaption></figure>
<p><strong>तो सात दशकों के दौरान, 1972 के पद्म श्री विजेता ने देश के इतिहास के कई पहलुओं को अपने काम में समेटा, जिसमें 1984 में &#8216;ऑपरेशन ब्लू स्टार&#8217; से ठीक पहले अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में जरनैल सिंह भिंडरावाले की तस्वीरें भी शामिल हैं। उनकी कुछ सबसे यादगार तस्वीरें भोपाल गैस त्रासदी की जगह और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान शरणार्थियों की थीं। आपातकाल के दौरान एक फोटो जर्नलिस्ट के तौर पर काम करते हुए, उन्होंने सेंसरशिप से बचकर काम करने के तरीके ढूंढ निकाले। उन सालों को याद करते हुए, 2025 में &#8216;द इंडियन एक्सप्रेस&#8217; को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, &#8220;कई ऐसी तस्वीरें थीं जिन्हें छापा नहीं जा सका, जिनमें गिरफ्तार किए गए राजनीतिक नेताओं और प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें शामिल थीं। हमने प्रतीकात्मक तरीकों से सच्चाई को दिखाने के रास्ते निकाले।&#8221;</strong></p>
<p>तो सात दशकों के दौरान, 1972 में पद्म श्री से सम्मानित इस कलाकार ने देश के इतिहास के कई पहलुओं को अपने कैमरे में कैद किया; इनमें 1984 में &#8216;ऑपरेशन ब्लू स्टार&#8217; से ठीक पहले अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में जरनैल सिंह भिंडरावाले की तस्वीरें भी शामिल हैं। उनकी कुछ सबसे यादगार तस्वीरें भोपाल गैस त्रासदी की जगह और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान शरणार्थियों की थीं। आपातकाल के समय एक फोटो जर्नलिस्ट के तौर पर काम करते हुए, उन्होंने सेंसरशिप से बचने और काम जारी रखने के कई तरीके खोज निकाले। उन दिनों को याद करते हुए, 2025 में &#8216;द इंडियन एक्सप्रेस&#8217; को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, &#8220;कई ऐसी तस्वीरें थीं जिन्हें छापा नहीं जा सकता था; इनमें गिरफ्तार किए गए राजनीतिक नेताओं और प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें शामिल थीं। हमने वास्तविकता को दिखाने के लिए नए तरीके अपनाए, जिसमें प्रतीकात्मक तस्वीरों का सहारा लिया गया।&#8221;</p>
<figure id="attachment_7665" aria-describedby="caption-attachment-7665" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-15.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-15.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7665" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-15.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-15-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-15-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-15-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-15-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7665" class="wp-caption-text">इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे</figcaption></figure>
<p>1977 में, वह देश के पहले ऐसे फोटोग्राफर बने जिन्हें &#8216;मैग्नम फोटोज&#8217; में शामिल होने का न्योता मिला। यह न्योता उन्हें महान फ्रांसीसी फोटोग्राफर हेनरी कार्टियर-ब्रेसन की सिफारिश पर मिला था, जिन्होंने 1971 में पेरिस में आयोजित एक प्रदर्शनी में उनकी तस्वीरें देखी थीं। कार्टियर-ब्रेसन का मानवीय दृष्टिकोण राय के अपने काम में भी साफ झलकता है—चाहे वह पुरानी दिल्ली की हलचल भरी सड़कों की तस्वीरें हों, गंगा के घाटों की, अलग-अलग इलाकों के नज़ारे हों या फिर महाकुंभ की तस्वीरें।</p>
<figure id="attachment_7666" aria-describedby="caption-attachment-7666" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7666" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Raghu-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7666" class="wp-caption-text">इस तस्वीर को खींचने वाले देश में महान फोटोग्राफर रघु राय, 83, नहीं रहे</figcaption></figure>
<p>आत्म-मंथन और चीजों को सहेजकर रखने के प्रति उनके झुकाव का प्रमाण उनकी कई किताबें भी हैं; इनमें &#8216;दिल्ली&#8217;, &#8216;रघु रायज़ इंडिया&#8217;, &#8216;पिक्चरिंग टाइम&#8217; और &#8216;तिब्बत इन एग्ज़ाइल&#8217; शामिल हैं। दूसरी ओर, &#8216;रघु राय: पीपल&#8217; (2016) नामक किताब में उनके बेहतरीन पोर्ट्रेट्स (चित्र) का संग्रह है—जिनमें आम लोगों से लेकर जानी-मानी हस्तियां तक शामिल हैं। इनमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, शहनाई के उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, दलाई लामा, रोमन कैथोलिक नन मदर टेरेसा और फिल्म जगत की हस्तियां सत्यजीत रे और अपर्णा सेन प्रमुख हैं।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/indias-photographer-raghu-rai-is-no-more">​फोटोग्राफी की दुनिया में &#8216;रघु राय&#8217; होना इत्तेफाक नहीं, &#8216;सात-दशक की साधना का परिणाम&#8217; था, अन्यथा &#8216;कैमरा पकड़ने वाले सभी रघु राय हो जाते&#8217; ​</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>बिहार विधानसभा चुनाव : 35-वर्ष पहले जब आनंद मोहन &#8216;मेरा गाँव मेरा देश&#8217; सिनेमा का कॉपी-पेस्ट किये थे, आज महिला पत्रकार कर रहीं हैं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 26 Oct 2025 13:03:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[anand mohan]]></category>
		<category><![CDATA[assembly]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>डाक बंगला चौराहा (पटना) : बिहार विधानसभा चुनाव के लिए सज्ज हो रहा है। आगामी 6 और 11 नवम्बर को चुनाव होना है। विगत दिनों सोशल मिडिया के प्लेटफॉर्म पर एक महिला टीवी संवाददाता को विधानसभा के सामने घोड़ा पर बैठकर रिपोर्टिंग करते देखा। शायद पहली घटना होगी। मोहतरमा को देखकर सन 1971 में अख्तर रोमानी लिखित, राज खोसला द्वारा निर्देशित, लक्ष्मीकांत [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/bihar-assembly-elections-and-horseback-reportimg">बिहार विधानसभा चुनाव : 35-वर्ष पहले जब आनंद मोहन &#8216;मेरा गाँव मेरा देश&#8217; सिनेमा का कॉपी-पेस्ट किये थे, आज महिला पत्रकार कर रहीं हैं</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>डाक बंगला चौराहा (पटना) : बिहार विधानसभा चुनाव के लिए सज्ज हो रहा है। आगामी 6 और 11 नवम्बर को चुनाव होना है। विगत दिनों सोशल मिडिया के प्लेटफॉर्म पर एक महिला टीवी संवाददाता को विधानसभा के सामने घोड़ा पर बैठकर रिपोर्टिंग करते देखा। शायद पहली घटना होगी। मोहतरमा को देखकर सन 1971 में अख्तर रोमानी लिखित, राज खोसला द्वारा निर्देशित, लक्ष्मीकांत – प्यारेलाल द्वारा संगीतबद्ध और धर्मेंद्र &#8211; विनोद खन्ना द्वारा अभिनीत फिल्म “मेरा गाँव मेरा देश” के साथ-साथ बाहुबली से राजनेता बने &#8216;आनंद मोहन&#8217; एक साथ याद आ गया । घटना आज से 35-वर्ष पूर्व की है। </strong></p>
<p>शायद आज के पत्रकारों को मालूम नहीं होगा कि &#8216;मेरा गाँव मेरा देश&#8217; &#8216;अपराधी से राजनेता बने&#8217; उन दिनों के उभरते आनंद मोहन को बहुत अच्छा लगता था। आनंद मोहन उस सिनेमा में अभिनेताओं के साज-सज्जा को देखकर बहुत प्रभावित थे। जिसका प्रभाव आज तक जारी है। वे बॉलीवुड के कलाकार &#8216;जितेंद्र के सफ़ेद वस्त्र&#8217; से भी बहुत प्रभावित थे। </p>
<p>बिहार के लोग जो आज न्यूनतम 35 वर्ष के भी होंगे, उनके जन्म से पहले की यह तस्वीर है आनंद मोहन का। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर खुलेआम कहते थे कि धनबाद का कोयला माफिया सूर्यदेव सिंह और कोसी क्षेत्र का आनंद मोहन उनके ‘मित्रवत’ हैं और वे ‘मित्रता का सम्मान’ करते हैं। सूर्यदेव सिंह का कोयला माफिया होना, उनकी पेशा है कोयला के क्षेत्र में, हीरा ढूंढने के लिए अगर वे कुछ भी करते हैं तो यह उनका व्यावसायिक क्रियाकलाप है । </p>
<blockquote><p>उसी तरह कोशी के आनंद मोहन प्रदेश की राजनीति में ही नहीं, दिल्ली के राजपथ पर भी अपना अधिपत्य ज़माने की कोशिश कर रहे हैं, यह उनकी चाहत है, होनी भी चाहिए क्योंकि राजनीति में बहुत पापड़ बेलना होता है, और वे बेलन की लम्बाई, चौड़ाई और मोटाई माप रहे हैं, मापना भी चाहिए। चंद्रशेखर हमेशा चाहते थे कि आनंद मोहन “मजबूत” बने।  समाज में हरेक बड़े-बुजुर्ग युवकों को उनकी योग्यता के अनुसार “मजबूत” बनने की सलाह देते थे।</p></blockquote>
<p>इसलिए जिस क्षेत्र में “तेज और तर्रार” है, उसी में आगे बढ़े, आषीश देते हैं। फिर क्या था, आनंद मोहन “बाहुबली” बन गए। दोनों को चंद्रशेखर बहुत ही सम्मान करते थे। इधर सूर्यदेव सिंह और आनंद मोहन भी उनका उतना ही सम्मान करते थे। आज की नेताओं जैसा नहीं की जैसे ही अपना स्वार्थ सिद्ध हुआ, सामने वालों को पहचानने से भी मुकर जाते हैं। खैर।</p>
<p>यह उन दिनों की बात है जब चंद्रशेखर अपने राजनीतिक जीवन के उत्कर्ष पर थे और बिहार के लालू प्रसाद यादव चंद्रशेखर से आनंद मोहन के लिए ‘शिकायत’ किये थे। यह अलग बात थी कि उसी काल में पूर्णिया के पप्पू यादव भी कनक को बन्दुक की नोक पर रखे थे, अधिकारियों को पैर के नीचे रखते थे; लेकिन लालू प्रसाद के लिए पपू यादव का वह क्रिया-कलाप बचपना था, क्योंकि वे लालू के अपने थे। लालू प्रसाद अपने गुरुदेव चंद्रशेखर से यह भी निवेदन किये कि आनंद मोहन को रोकिये। क्योंकि आनंद मोहन को रोकने का कार्य उन दिनों भारत की चौहद्दी में सिर्फ और सिर्फ चंद्रशेखर ही कर सकते थे। लेकिन चंद्रशेखर लालू प्रसाद को खुश नहीं किये और कहे: “उसे रोको नहीं …छोड़ दो उसे। समय आने पर वह खुद समर्पित कर देगा।”</p>
<p>उस ज़माने में आनंद मोहन और पप्पू यादव में आज़ादी की दूसरी लड़ाई जैसी ताकत की आजमाइश हो रही थी। नित्य खेत-खलिहान, गली-कूची, सड़क, कारखाने में, या यूँ कहें कि उत्तर बिहार में सहरसा-मधेपुरा-सुपौल-पूर्णिया-कटिहार आदि क्षेत्रों में शायद ही कोई इलाका बचा होगा जहाँ खून की होली नहीं खेली गयी थी। चतुर्दिक दोनों गुटों के लोगों का जीता-जागता शरीर “पार्थिव” हो रहा था। सम्पूर्ण क्षेत्र में ख़ौफ़ का माहौल था। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-1.jpg" alt="" width="1341" height="1883" class="aligncenter size-full wp-image-7161" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-1.jpg 1341w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-1-214x300.jpg 214w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-1-729x1024.jpg 729w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-1-768x1078.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-1-1094x1536.jpg 1094w" sizes="auto, (max-width: 1341px) 100vw, 1341px" /></a></p>
<p><strong>उन्ही दिनों पटना के बी एन कालेज का एक बंगाली छात्र, जो स्वयं को फोटोग्राफी की दुनिया में सुपुर्द कर देना चाहता था, हाथ में एक छोटा सा मैनुअल निकोन कैमरा लेकर अपनी किस्मत को आजमाने  पटना की सड़कों पर उतरा था। खाकी रंग का वाटर-प्रूफ कैमरा बैग अपने दाहिने कंधे पर लटकाकर एक स्ट्रिंगर के रूप में फोटो खींचना प्रारम्भ किया था अपनी रोजी-रोटी के लिए। इसी बीच, लालू-चद्रशेखर संवाद स्थानीय अख़बारों में प्रकाशित होती है। आनंद मोहन और पप्पू यादव को तत्कालीन स्थानीय अख़बारों में जगह तो मिलता था, लेकिन घटना के कई दिनों बाद। </strong></p>
<p>उस ज़माने में संचार के ऐसे कोई साधन नहीं थे जो क्षण-क्षण की सूचना को इस पार से उस पार कर दे। स्थानीय पत्रकार हाथ से लिखते थे, या फिर टाइप करते थे कहानियों को फिर डाक से भजते थे। टेलीप्रिंटर का जमाना था, लेकिन ‘समाचारों के लिए’, बड़ी-बड़ी कहानियां डाक से ही प्रेषित की जाती थी। अगर उन कहानियों के साथ कुछ तस्वीर मिली तो वाह-वाह , नहीं मिली तो भी वाह-वाह। समाचार जब तक प्रकाशित होता था तब तक दूसरी घटना हो जाती थी। टेलीप्रिंटर तो था, लेकिन  जिला संवाददाताओं के पास नहीं होता था। खैर। </p>
<p>उस ज़माने में इलाहाबाद से एक हिन्दी पत्रिका का प्रकाशन होता था। नाम “माया” था। “माया” के तत्कालीन बिहार के संवाददाता विकास कुमार झा आनंद मोहन पर एक कहानी करना चाहते थे। शायद विकास कुमार झा &#8216;पहला और अंतिम पत्रकार&#8217; हैं जो अपना पूरा नाम लिखते थे। आज तो &#8216;कुमार&#8217; शब्द में भी &#8216;छटनी&#8217; हो गया है और अधिकांश लोग कुमार को &#8216;के&#8217; में बदल दिए हैं। विकास कुमार झा का जन्म 1961 में बिहार के सीतामढ़ी जिले में हुआ। उन्होंने 18 वर्ष की आयु में बतौर पत्रकार जीवन प्रारम्भ किये थे। आनंद मोहन-पप्पू यादव पर कहानी के लिए  जरुरत थी तस्वीरों की, क्योंकि तस्वीरों के बिना कहानी विधवा जैसी होती है । </p>
<p><strong>यहीं उस बंगाली छायाकार की किस्मत आनंद मोहन के साथ जुड़ गयी। एक तस्वीर, एक ओर जहाँ आनंद मोहन को बिहार में ही नहीं, सम्पूर्ण देश में, विदेशों में बाहुबली बना दिया, नाम-शोहरत को दिल्ली के क़ुतुब मीनार पर चढ़ा दिया, उस छायाकार की भी उस ऐतिहासिक तस्वीर के लिए चर्चाएं होने लगी। उन दिनों उस तस्वीर को प्राप्त करने के लिए पटना के उस ज़माने के छायाकारों ने न जाने कितने लोभ-प्रलोभ दिए, लेकिन बंगाली छायाकार हिला नहीं। नाम संजीव बनर्जी है।  </strong></p>
<p>पटना ही नहीं बिहार के पत्रकार अथवा छायाकार आज शायद नहीं जानते होंगे की आनंद मोहन की उस  ऐतिहासिक तस्वीर का “फ्रेम” बनाने के लिए उन दिनों संजीव बनर्जी और सुनील झा किन-किन परिस्थितियों से गुजरे थे, आज के छायाकार कल्पना नहीं कर सकते हैं। संजीव बनर्जी और सुनील झा दोनों बस से पटना से सहरसा के लिए निकले। दोनों आनंद मोहन के एक हितैषी थे और कांग्रेस के नेता थे सुधीर मिश्रा जी से पहले संपर्क स्थापित कर लिए थे। </p>
<p><strong>सहरसा पहुँचने पर वे दोनों रात में वहीं रुके। मिश्रा जी के सहयोग से आनंद मोहन बाबा-आदम का एक पुराना, खटारा एम्बेसडर कार दोनों को लाने के लिए भेजे थे। सहरसा से दोनों आनंद मोहन के गांव पंचगछिया के लिए निकले। रात्रि विश्राम पंचगछिया में था। अगली सुबह दोनों एक गंतब्य स्थान के लिए उसी गाडी से निकले। साथ में आनंद मोहन के भी “आदमी” थे। कुछ  दूर निकलने के बाद संजीब बनर्जी और सुनील झा दोनों की आखों पर कपड़ा बाँध दिया गया ताकि रास्ते का अंदाजा नहीं मिल सके। सुधीर मिश्रा जी का ससुराल नेपाल की तराई में था, जहाँ आनंद मोहन अड्डा जमाये हुए थे। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-2.jpg" alt="" width="1336" height="1662" class="aligncenter size-full wp-image-7162" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-2.jpg 1336w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-2-241x300.jpg 241w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-2-823x1024.jpg 823w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-2-768x955.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/10/Aanand-Mohan-2-1235x1536.jpg 1235w" sizes="auto, (max-width: 1336px) 100vw, 1336px" /></a></p>
<p>जिस स्थान पर आनंद मोहन अपना ठिकाना बनाये थे वहां पहुँचने पर ही आँखों से पट्टी हटाया गया। उद्देश्य तस्वीर तरोताजा तस्वीर खिंचा था जिससे विकास कुमार झा कहानी लिखें और तस्वीरों के साथ कहानी का प्रकाशन हो। दोनों पत्रकारों को आवभगत करने में आनंद मोहन और उनके लोग कोई कसार नहीं छोड़े थे, लेकिन दोनों पत्रकारों का रक्तचाप संतुलन से बहुत अधिक था। इस बात की कल्पना आज विधानसभा के सामने घोड़े पर बैठकर टीवी के लिए एंकरिंग करने वाली पत्रकार महोदय नहीं समझेंगी। </p>
<p>दर्जनों राइफल, दो नाली बन्दुक, पिस्टल और अन्य अस्त्र-शस्त्र के साथ सैकड़ों तस्वीरें क्लिक-क्लिक हुए। तभी आनंद मोहन को मेरा गाँव मेरा देश का विनोद खन्ना और धर्मेंद्र याद आ गए। वस्त्र बदला गया। सफ़ेद घोड़ा लाया गया। घोड़ा को साफ़-सुथरा किया गया। गद्दी लगाया गया। आंनद मोहन उस घोड़े पर विराजमान हुए। आनद मोहन बाएं हाथ से विनोद खन्ना जैसा घोड़ा का लगाम पकडे थे और दाहिने हाथ में पिस्तौल लिए दर्जनों फोटो क्लिक क्लिक हुआ । </p>
<p><strong>अब बात आयी एक ऐसी तस्वीर जो पत्रिका का कवर हो। बस क्या था सफ़ेद फुलपैंट, कमीज में तनिक तिरछा होकर बैठे।  पिस्तौल का नोक आसमान की ओर किये। आजु-बाजू आनंद मोहन के हितैषीगण, अंगरक्षक सभी बन्दुक, राइफल लेकर खड़े हो गए –  क्लिक-क्लिक हुआ। उस ज़माने में रंगीन तस्वीर बहुत कम खींची जाती थी।  रंगीन फोटो वाले निगेटिव को “टी पी” कहते थे। डिजिटल कैमरा भी नहीं था। अगर किन्ही के पास होता भी था तो वे समाज से अलग संभ्रांत छायाकार होते थे। अब इस बनर्जी के पास तो फिल्म खरीदने के लिए भी पैसे नहीं होते थे तो अधिक क्लिक-क्लिक भी नहीं कर सकता था। </strong></p>
<p>कहते हैं “जान बचे तो लाख उपाय”, दोनों हनुमान चालीसा पढ़ते पुनःमुसको भवः हुए – उसी तरह, आखों पर पट्टी बाँध दिया गया। वापसी में पहुंचे मधेरपुरा के जिलाधिकारी के पास। उस ज़माने में जयन्तो दासगुप्ता माडपुरा के जिलाधिकारी थे जो लालू के “खास” थे। मधेपुरा उन दिनों आनंद मोहन – पप्पू यादव का कुरुक्षेत्र था। दोनों में से कोई भी हथियार रखना नहीं कहते थे। खैर जयन्तो दासगुप्ता भी कदम कुआं पटना के थे।  उनके दादाजी थे प्रमाथो दासगुप्ता, जहाँ संजीव बनर्जी बचपन में खेलने-कूदने जाया करते थे।  बस क्या था – दो बंगाली इकठ्ठा हुए, बचपन की बातें दुहराई गयी और आनंद मोहन-पप्पू यादव कुरुक्षेत्र का विस्तार से विन्यास हुआ। सुनील झा सभी बातें अपनी डायरी पर लिख रहे थे। </p>
<p><strong>पटना आते ही, संजीव हम लोगों के ज़माने के माणिकदा @ सत्यजीत मुखर्जी के स्टूडियो “फोटो-मेकर” पहुंचे। निगेटिव साफ़-सुथरा हुआ, तस्वीर निकली और फिर ‘माया’ के दफ्तर में हाजिर हुए झाजी और बनर्जी। विकास कुमार झा कहानी लिख रहे थे। तस्वीर देखने के बाद विकास कुमार झा ने संजीव को तत्काल इलाहाबाद रावण किये तस्वीरों के साथ। इधर पटना में जब छायाकारों को मालूम हुआ की संजीब बनर्जी तस्वीर बनाकर लाये हैं, सभी “मुझे दो-मुझे दो” करने लगे। जब संजीब इलाहाबाद पहुंचे तब ‘माया’ पत्रिका में एक ‘लेखक-ब्रह्मास्त्र’ हुआ करते थे बाबूलाल शर्मा जी। बबूलाल जी तस्वीर देखे। विकास झा की कहानी को पढ़े और जो कहानी बनी वह ऐतिहासिक थी – ये है बिहार (माया, अंक 31 दिसंबर, 1991) </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/bihar-assembly-elections-and-horseback-reportimg">बिहार विधानसभा चुनाव : 35-वर्ष पहले जब आनंद मोहन &#8216;मेरा गाँव मेरा देश&#8217; सिनेमा का कॉपी-पेस्ट किये थे, आज महिला पत्रकार कर रहीं हैं</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>शिक्षक दिवस पर विशेष ✍ कल अख़बार में नाम छपवाने के लिए &#8216;प्रेस रिलीज&#8217; लेकर दफ्तर में &#8216;दंड बैठकी&#8217; करते थे, आज बिहार के लोगों को प्राणायाम सीखा रहे हैं😢</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Sep 2023 11:38:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[abdul ghafur]]></category>
		<category><![CDATA[bill]]></category>
		<category><![CDATA[correspondent]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना : जय प्रकाश नारायण का सम्पूर्ण क्रांति बिहार ही नहीं, देश के लोगों के मगज पर चढ़ रहा था। देश के मतदाता देश की राजनितिक व्यवस्था में बदलाव चाहते थे। स्वाभाविक है। सत्तारूढ़ के अलावे विपक्ष के नेताओं को भी सत्ता का रसास्वादन करने का संवैधानिक अधिकार है। देश का क्या होगा, यह न [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/special-on-teachers-daya-tribute-to-teacher">शिक्षक दिवस पर विशेष ✍ कल अख़बार में नाम छपवाने के लिए &#8216;प्रेस रिलीज&#8217; लेकर दफ्तर में &#8216;दंड बैठकी&#8217; करते थे, आज बिहार के लोगों को प्राणायाम सीखा रहे हैं😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना : जय प्रकाश नारायण का सम्पूर्ण क्रांति बिहार ही नहीं, देश के लोगों के मगज पर चढ़ रहा था। देश के मतदाता देश की राजनितिक व्यवस्था में बदलाव चाहते थे। स्वाभाविक है। सत्तारूढ़ के अलावे विपक्ष के नेताओं को भी सत्ता का रसास्वादन करने का संवैधानिक अधिकार है। देश का क्या होगा, यह न तो उन दिनों लोगों को, राजनेताओं को चिंता थी, न आज है। पंचायत से संसद तक चाहे क्रिया-कलाप ठीक-ठाक संचालित होता भी रहे, कुर्सियों को देखकर कुकुरमुत्तों की तरह पनपते नेताओं को खुजली होने लगती है, वे चक्रव्यूह रचने लगते हैं, ताकि सतारूढ़ दल धराम से नीचे गिरे और वे मुस्कुराते शपथ लेकर कुर्सी से चिपक जायँ। यह मानव का लक्षण है। जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के समय बिहार में यह बात तनिक अधिक देखने को मिला।</strong> </p>
<p>वैसे तो चौथी विधान सभा से ही, लेकिन पांचवी विधान सभा काल आते-आते सरकारी महकमे में “आया-राम-गया-राम” वाली बात पटना के सर्कुलर रोड, सरपेंटाइन रोड, बेली रोड, फ़्रेज़र रोड पर अधिक प्रचलित हो गया था। मंत्री से लेकर संत्री तक, अधिकारी से लेकर चपरासी तक, जिलाधिकारी से लेकर मुंशी तक सभी हनुमान चालीसा पढ़ते सोते थे और सुवह विष्णुसहस्रनाम पढ़ते जागते थे, ताकि विपत्ति का पहाड़ न टूट पड़े उनपर ।  </p>
<p>राजनेताओं की तो बात ही नहीं करें। उनकी गर्दन हमेशा बक्सर के पुल पर लटका होता था। कब नीचे गंगा में प्रवाहित हो जायेंगे, कब पदच्युत हो जायेंगे, कब कौन लंगड़ी मार देगा, कब कौन छिटकिनी लगाकर मुंह के बल गिरा देगा, कोई नहीं जानता था। विहार विधान सभा और विधान परिषद् में आज भी दर्जनों “सम्मानित विधायकगण” हैं, जिनकी स्थिति फ़्रेज़र रोड के कोने पर स्थित (उस समय) उडप्पी से आर्यावर्त-इण्डियन नेशन के कार्यालय से दस कदम आड़े पिंटू होटल तक आते-आते भय से रक्तचाप बढ़ जाता था। वे गवाह होंगे,  सांस ले रहे हैं । कई बार ऐसी स्थिति का सामना वे सभी किये थे जब ‘प्रेस रिलीज’ निर्गत करते समय जिस पदभार का मुहर प्रेस रिलीज पर लगाए थे, समाचार बनने के समय तक पदभार से मुक्त हो जाया करते थे। बिहार विधान परिषद् में आज भी ऐसे अनेकानेक माननीय सदस्य हैं जो उन दिनों उस समय के उभरते नेताओं के पीछे-पीछे चलते थे। वे हँसते थे तो इस ठहाका लगा देते थे। </p>
<p>लेकिन आज वे राजनीति में मठाधीश बने बैठे हैं। उन दिनों पटना से प्रकाशित आर्यावर्त-इंडियन नेशन समाचार पत्रों में अपना नाम प्रकाशित करने के लिए, अपना विज्ञप्ति छपाने के लिए, जो सुबह से शाम तक “दण्ड बैठकी” करते थे, आज उसी संस्थान के सैकड़ों-हज़ारों कर्मचारियों, उनके परिवारों को “प्राणायाम” कराते नहीं थकते। कई तो प्राणायाम करते ईश्वर को प्राप्त हो गए, कुछ कतारबद्ध हैं। लेकिन उन्हें क्या? राजनीतिक गलियारे में, मंत्री-संत्री की कुर्सियों पर चिपकने के बाद जनता के बारे में कौन सोचता है? या उन लोगों के बारे में कौन सोचता है, जो शुरूआती दिनों में ‘ऊँगली’ पकड़कर नाम, प्रतिष्ठा, शोहरत दिलाया था। खैर। </p>
<p>उन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री थे अब्दुल गफ्फूर। कहने के लिए तो छठा विधान सभा कालखंड था, लेकिन गफ्फूर साहेब 13 वें मुख्यमंत्री के रूप में कुर्सी पर बैठे थे। एक मुख्यमंत्री का कार्यकाल, जो पांच साल का (विधान सभा अवधि के बराबर) होनी चाहिए थी, औसतन ढाई-साल और उससे कम की अवधि में कुर्सी को नमस्कार कर “भूतपूर्व” हो जाया करते थे। गफूर साहब 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975 तक बिहार राज्य के तेरहवें मुख्यमंत्री के रूप में सेवा किये । वे राजीव गांधी के समय में कैबिनेट मंत्री के रूप में भी शोभायमान हुए थे। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दें गफ्फूर साहेब। </p>
<p>वैसे, 1967 और 1971 के बीच, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तूती बोलती थी, चाहे पार्टी हो या सरकार। सबों को अपने नियंत्रण में ले ली थी श्रीमती गाँधी । आज की तरह ही, उन दिनों भी केंद्रीय सरकार का अर्थ केंद्रीय मंत्रिमंडल कोई नहीं था, बल्कि प्रधानमंत्री के सचिवालय ही हो गया था। सम्पूर्ण सरकार वहीँ केंद्रित थी। जो उनके भरोसे मंद थे, उनका तेवर कुछ और था, जो विश्वासभाजन नहीं थे, उनकी तो तो बात ही नहीं करें। सत्तर के दशक के प्रारंभिक महीनों, वर्षों में जो हुआ वह देश जानता है, जहां तक राजनीति का सवाल है। परन्तु जो नहीं जानता है वह यह की उन दिनों आर्यावर्त-इण्डियन नेशन-मिथिला मिहिर पत्र समूह का सम्पादकगण न केवल अपनी कलम में ताकत रखते थे, बल्कि उस समय के मंत्रियों, चाहे मुख्यमंत्री ही क्यों न हो, पुलिसकर्मियों चाहे पुलिस महानिदेशक ही क्यों न हो, उन्हें उनकी औकात दिखने की क्षमता रखते थे। कुछ ऐसी ही ऐतिहासिक घटना हुई थी उस दिन। </p>
<p>1975 की तपती गर्मी के दौरान अचानक भारतीय राजनीति में भी बेचैनी दिखी। यह सब हुआ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले से जिसमें इंदिरा गांधी को चुनाव में धांधली करने का दोषी पाया गया और उन पर छह वर्षों तक कोई भी पद संभालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। लेकिन इंदिरा गांधी ने इस फैसले को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की और 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी । उस दिन आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा, “जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील क़दम उठाए हैं, तभी से मेरे ख़िलाफ़ गहरी साजिश रची जा रही थी।” 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में देश में आपातकाल घोषित था।</p>
<p>जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के तहत पटना के दो प्रमुख अख़बारों के दफ्तरों को सुपुर्दे ख़ाक करने की तैयारी हो चुकी थी। नेता से लेकर, व्यापारी तक, पुलिस से लेकर अपराधी तक, आंदोलन में कतारबद्ध लोगबाग यह निर्णय ले लिए थे कि अमुक दिन पहले सर्चलाइट-प्रदीप और फिर आर्यावर्त-इण्डियन नेशन – मिथिला मिहिर का दफ्तर फूंका जायेगा। सर्चलाइट-प्रदीप जलकर स्वाहा हो गया परन्तु, जब आर्यावर्त-इण्डियन नेशन की बात आई तो इण्डियन नेशन के तत्कालीन संपादक दीनानाथ झा सामने खड़े हो गए। उस दिन वैसे तो संस्थान के लगभग सभी कर्मचारी गोलबंद हो गए थे, लेकिन संध्याकाळ होते-होते संस्थान के मुख्य द्वार के बजाय पिछले दीवारों को, जो जमाल रोड से मिलती थी, लांघ कर अपने-अपने घरों की ओर बच-बचाकर कूच कर रहे थे। धीरे-धीरे सम्पूर्ण परिसर वीरान हो गया। मुख्य द्वार पर 50-60 किलो शारीरिक वजन वाले दरवान ही रह गए थे। यह स्थान प्रवेश द्वार के ठीक सामने पोर्टिको का था। दिनाबाबू वहीं बैठ गए। अब तक ‘जॉब-विभाग’ में कार्य करने वाले बागेश्वरी प्रसाद ही बच गए थे, जो दीना बाबू के बगल में खड़े थे। बागेश्वरी प्रसाद का शारीरिक वजन भले 65 किलो के आसपास रहा होगा उस शाम, लेकिन उन्होंने हज़ारों-हज़ार किलो के मानसिक वजन वाले लोग जैसा कार्य किया था। दीना बाबू उन्हें भी जाने को कहे। वे दीना बाबू का बाहर सम्मान करते थे। </p>
<p>इसी बीच लाइनों विभाग में कार्य करने वाला जयप्रकाश, जो शरीर से कोई छः फिट लम्बा था, कुछ पल दीना बाबू और बागेश्वरी प्रसाद के पास खड़े रहे, लेकिन तक्षण संस्थान के पिछले दीवार की ओर भागे, जिधर से सभी कर्मचारी अपने-अपने घरों की ओर उन्मुख थे। </p>
<p>जयप्रकाश जोर से आवाज लगाया : <strong>“रुक जाओ…रुक जाओ कहीं दीना बाबू अपना दाह नहीं कर लें। वे कह रहे हैं अगर संस्थान बचेगा तभी हम सभी कर्मचारियों का जीवन है, अन्यथा कोई अस्तित्व नहीं है।</strong> </p>
<p>सभी कर्मचारियों के कदम वापस हो गए। परिसर में अखबार बेचने वालों की साईकिल लगी थी, संख्या सैकड़ों में थी। सभी साईकिल सामने के भवन के छत पर क्षणभर में चले गए। ईंट, पत्थर आदि भी एकत्रित हो गए। चतुर्दिक आंदोलनकारी भी भर गए थे फ़्रेज़र रोड पर। लेकिन ऊपर से साइकिलों, पत्थरों और ईंटों के प्रहार से वे संस्थान के अंदर प्रवेश नहीं ले सके। इस बीच, दिनाबाबू तत्कालीन पुलिस महानिदेशक वाई.एन. झा से संस्थान की सम्पूर्ण सुरक्षा के लिए सुरक्षा बल मुहैया करने को कहा। पुलिस महानिदेशक, बिहार में प्रचलित उस कहावत को चरितार्थ कर दिए जब एक व्यक्ति के पेशाब की जरूरत हुई और वह व्यक्ति कहने लगा की वह पिछले छः माह से पेशाब किया ही नहीं और अगले एक वर्ष तक लघुशंका करेगा भी नहीं। अब तक पोर्टिको में कर्मचारियों का बैठक बन गया था। टेलीफोन भी लग गए थे। </p>
<p>दूसरे दिन प्रदेश के मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर अपने चेला-चपाटियों के साथ आर्यावर्त-इण्डियन नेशन कार्यालय में धमके। प्रांगण के अंदर प्रवेश के साथ ही कार्यालय परिसर के समस्त कर्मचारी गोलबंद हो गए। मुख्यमंत्री अपने काफिले के साथ पोर्टिको तक पहुंचे। दीनाबाबू वहीँ थे । अब्दुल गफूर को देखते ही दीनानाथ झा का रक्तचाप बढ़ गया। वे जब गुस्स में होते थे तो उनका सम्पूर्ण शरीर कांपने लगता था। दृश्य बहुत संवेदनशील था। दीनानाथ जी बाहर गेट के तरफ अपनी ऊँगली से इशारा करते अब्दुल गफूर को बाहर निकलने को कहा। स्थिति बद से बत्तर हो रही थी। एक पत्रकार और मुख्यमंत्री आमने सामने था। तभी फोन की घंटी टनटनायी – “हेल्लो !!! रेस्पेक्टेड दीना बाबू, मैडम विश तो टॉक तो यु…. प्लीज सर।” </p>
<p>फोन के दूसरे छोड़ पर दिल्ली से श्रीमती इंदिरा गाँधी थीं। अब्दुल गफूर उलटे पैर वापस अपने कार्यालय में आ गए। फ़्रेज़र रोड पर बड़े-बड़े बसों में लदे तक़रीबन 50 बन्दुक, राइफलों से लैश केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के लोग कार्यालय परिसर में प्रवेश लिए और बिहार के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक तत्काल प्रभाव से हस्तानांतरित हो गए। इसके बाद विद्याचरण शुक्ल – अब्दुल गफूर के साथ फिर एक बार रूबरू बकझक हुआ। और दोनों नेता पुनः मुंह के बल गिरे। पत्रकारिता में सम्मान था। पत्रकार भी सम्मानित थे। </p>
<p>सत्तर के दशक या उससे पूर्व की पत्रकारिता की तुलना नब्बे के दशक के बाद से लगातार, आज तक, हम नहीं कर सकते हैं। उन दिनों की पत्रकारिता, या पत्रकारों के प्रति, पत्रकारिता के प्रति तत्कालीन राजनेताओं का जो सम्मान था, पत्रकारों की कलम में जो ताकत थी, उनकी जो सोच थी, समाज के प्रति उनकी जो प्रतिबद्धता थी; आज की तुलना नहीं कर सकते हैं। आज सब कुछ बदल गया है। मालिकों की सोच बदल गयी है। कर्मचारियों की सोच बदल गयी है। लेकिन बाबूजी कहते थे: “अंतिम दम तक लड़ना सीखो, क्या पता अंतिम चाल में ही कामयाबी मिल जाय।” </p>
<p>आज आर्यावर्त – इंडियन नेशन – मिथिला मिहिर अखबार बंद हो गया, नामोनिशान मिटा दिया पटना के फ़्रेज़र रोड पर। कुछ कर्मचारी भी दोषी थे, कुछ प्रबंधन भी, मालिक तो थे ही। प्रबंधन के लोगबाग ‘बूढ़ी संस्थान’ से छुटकारा पा कर, अपना हाथ धोकर गंगा नहाना चाह रहे थे, इसलिए जिधर लाभ का दीपक दिखा, गर्दन धुसा लिए। हताश कर्मचारियों के पास कोई विकल्प नहीं था। वह “भागते भूत को लंगोट ही सही’, में विस्वास करने लगे और मालिक तो “निरीह”, “कमजोर” “दूर दृष्टिहीन” हो ही गया था। वह चाह भी रहा था की किसी तरह इस जंजाल से, इस पीड़ा से मुक्ति मिले। वजह भी था: जिंन्हें पटना के इस स्थान पर एक-गज जमीन खरीदने की ताकत थी नहीं थी, मुफ्त में मिली सम्पत्तियों का कद्र करना नहीं जानते थे, चापलूसों, चाटुकारों, लोभियों, चमचों, अवसरवादियों के चक्रव्यूह में रहना पसंद करते थे, सभी गिद्ध की तरह मौका की तलाश में थे – अवसर मिलता गया, नोचते गए। </p>
<p><strong>सन 1975 में जब आर्यावर्त-दी इण्डियन नेशन पत्र समूह में मैट्रिक उत्तीर्ण कर नौकरी शुरू किया था, दी इण्डियन नेशन के तत्कालीन संपादक श्री दीनानाथ झा पहले सर पर हाथ रखकर &#8216;आशीष&#8217; दिए, फिर कहे: &#8216;गरीब के बच्चों को पत्रकारिता में नहीं आना चाहिए। लेकिन तुम अपवाद हो। तुम अपने जीवन में इतना ज्ञान एकत्रित करना, इतनी मेहनत करना, अपनी सोच को इतना मजबूत बनाना कि आने वाले समय में पत्रकारिता जगत के ही लोग तुम पर कहानी करने लगें। कल तुम अख़बार बेचे थे, हम गवाह हैं। आज उसी अखबार में नौकरी शुरू किये हो, हम गवाह हैं। कल इसी अखबार में तुम लिखोगे भी और मैं संपादक भी रहूँगा । मेरा आशीष है कि तुम पटना ही नहीं, बिहार ही नहीं, भारत ही नहीं, विश्व के बेहतरीन अख़बारों में लिखो। लोग तुम्हें तुम्हारे नाम से, काम से जाने। तुम्हारी पहचान कुछ अलग हो। जिस दिन ऐसा होगा मैं समझ लूंगा कि मुझे दक्षिणा मिला गया। उस दिन मैं रहूं या नहीं रहीं, तुम्हारे माता-पिता रहें अथवा नहीं, लेकिन तुम्हारे माता-पिता को गर्व होगा और सबसे महत्वपूर्ण तुम अपनी नज़रों में अव्वल दिखोगे।&#8221;</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/special-on-teachers-daya-tribute-to-teacher">शिक्षक दिवस पर विशेष ✍ कल अख़बार में नाम छपवाने के लिए &#8216;प्रेस रिलीज&#8217; लेकर दफ्तर में &#8216;दंड बैठकी&#8217; करते थे, आज बिहार के लोगों को प्राणायाम सीखा रहे हैं😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>जैसे-जैसे ✍ पत्रकारिता में अक्षरों का रंग बदलता गया, काला अक्षर &#8216;रंगीन&#8217; होता गया; &#8216;काले अक्षरों पर धब्बे लगते गए,&#8217; फ़र्जी पत्रकारों की बाढ़ आती गई😪दुःखद</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-existence-of-journalism-is-in-danger</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 18 Apr 2023 10:55:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[code of conduct]]></category>
		<category><![CDATA[journalism]]></category>
		<category><![CDATA[journalist]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>रायसीना हिल (नई दिल्ली) : आप माने अथवा नहीं। राजनेताओं के साथ-साथ, सत्ता की गलियारे में बैठे आला अधिकारियों और समाज के तथाकथित &#8216;ठेकेदारों&#8217; की यही इक्षा होती है कि उनके सगे-सम्बन्धी अगर भारतीय प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा, राजस्व सेवा, चिकित्सक, अभियंता, कॉर्पोरेट घराने के मालिक नहीं बन पाए (ऐसा हो नहीं सकता), राजनीतिक &#8216;उत्तराधिकारी&#8217; [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-existence-of-journalism-is-in-danger">जैसे-जैसे ✍ पत्रकारिता में अक्षरों का रंग बदलता गया, काला अक्षर &#8216;रंगीन&#8217; होता गया; &#8216;काले अक्षरों पर धब्बे लगते गए,&#8217; फ़र्जी पत्रकारों की बाढ़ आती गई😪दुःखद</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रायसीना हिल (नई दिल्ली) : आप माने अथवा नहीं। राजनेताओं के साथ-साथ, सत्ता की गलियारे में बैठे आला अधिकारियों और समाज के तथाकथित &#8216;ठेकेदारों&#8217; की यही इक्षा होती है कि उनके सगे-सम्बन्धी अगर भारतीय प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा, राजस्व सेवा, चिकित्सक, अभियंता, कॉर्पोरेट घराने के मालिक नहीं बन पाए (ऐसा हो नहीं सकता), राजनीतिक &#8216;उत्तराधिकारी&#8217; नहीं बन पाए; तो अंततः देश में सबसे अधिक बिकने वाला &#8216;अंग्रेजी&#8217; दैनिक, सबसे अधिक दिखने वाला &#8216;टीवी&#8217; या फिर सबसे अधिक घरों में, खेत-खलिहानों में सुने जाने वाले रेडियो में वरिष्ठतम संवाददाता/संपादक बन जाए। भले उनकी पात्रता को देखते उनकी नियुक्ति &#8216;मध्य-पद&#8217; पर हो, लेकिन तीसरी तन्खाह मिलते-मिलते उनके नामों से दर्जनों &#8216;विशेष खबर&#8217; प्रकाशित हो जाए, &#8216;एयर&#8217; हो जाए और वे वरिष्ठ पत्रकारों की सूची में अंकित हो जायँ। संस्थानों के मालिक और मालकिन उन्हें अपने साथ चाय पिलाने में अपना गर्व समझें।</strong></p>
<p>जबकि उसी संस्था की सबसे निचली सीढ़ी पर मुद्दत से अपना-अपना &#8216;पिछवाड़ा&#8217; रगड़ने वाले गरीब पत्रकार (अर्थ और सामर्थ दोनों से), जो दिन-रात मेहनत और मसक्कत कर कहानियां निकलता हों, &#8216;पकने&#8217;, &#8216;छौंका&#8217; लगने के बाद जब पडोसने का समय हो, उसके हाथों से खींचकर &#8216;सम्मानित आकाओं द्वारा अनुशंसित पत्रकारों के नाम लिख दिया जाए । तभी तो कहानियां &#8216;लिक&#8217; होगी, &#8216;फाइलें&#8217; निकलेंगी, &#8216;विज्ञापन&#8217; वाला फाइलों पर हस्ताक्षर होगा, एक-फोन पर अधिकारियों का, नेताओं का &#8216;बाइट&#8217; मिलेगा। यह सब वर्तमान पत्रकारिता की चारित्रिक विशेषता है। आज जैसे-जैसे कहानियों में लिखे जाने वाले अक्षरों का रंग &#8216;रंग-बिरंगा&#8217; होते जा रहा है, पत्रकारिता का काला अक्षर अपना वजूद खो रहा है। काले अक्षरों पर भी &#8216;काला धब्बा&#8217; दिखने लगा है। परिणाम यह हो रहा है कि देश की पत्रकारिता की स्थिति आज &#8216;सफ़ेद&#8217; नहीं, बल्कि &#8216;लाल&#8217; हो गया है। </p>
<p>सत्तर के दशक में पटना से प्रकाशित &#8216;दी इण्डियन नेशन&#8217; अख़बार के संपादक थे श्री (दिवंगत) दीनानाथ झा, जिनके छत्र-छाया में मैं पत्रकारिता सीखा था। पचास वर्ष पूर्व भारतीय पत्रकारिता का भविष्य उन्होंने आंककर कहा था। क्योंकि ऐसा ज्ञान सिर्फ वही दे सकता है जो &#8216;वास्तव में पत्रकार&#8217; रहा हो, जिसका वजूद पत्रकारिता की बुनियाद को मजबूत बनाता हो।  आज अक्षरशः सत्य दिख रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो आज पत्रकार के भेष में अपराधी नहीं आते। हाथों में कलम के बजाए बंदूक, पिस्तौल नहीं दीखते। लिखने के नाम पर ठांय-ठांय नहीं करता । कुछ तो है जिसे देखने, तहकीकात करने और जड़ से उखाड़ फेंकने की जरुरत है आज। क्योंकि अगर आज चूक गए तो आने वाले दिनों में भारत की पत्रकारिता और पत्रकार दोनों प्रदूषित नदी की धाराओं में अपना अस्तित्व समाप्त कर देगा। पत्रकार और पत्रकारिता के नाम पर &#8220;कलंक&#8221; लिखा जाएगा। </p>
<p><strong>देश में पहले अख़बारों के पाठक हुआ करते थे। अब पाठकों से अधिक लेखक, आलोचक और समीक्षक हैं। पहले अख़बारों में जो तस्वीरें प्रकाशित होती थीं, उन तस्वीरों को खींचने वालों की पहचान छायाकार के रूप में होती थी। देश में &#8216;स्मार्ट फोन&#8217; के आगमन से प्रत्येक &#8216;स्मार्ट फोन धारक&#8217;, चाहे वह अपनी सोच और मानसिकता से &#8216;स्मार्ट&#8217; हो अथवा नहीं, &#8216;छायाकार&#8217; अवश्य हो गया है। समाजिक क्षेत्र के मीडिया घरानों के आगमन से इन छायाकारों के पंख लग गए। </strong></p>
<p>टीवी के प्रादुर्भाव के बाद टीवी के दर्शक होते थे। टीवी पर जो समाचार वाचक होते थे, उन्हें टीवी के दर्शक कभी हँसते, बोलते नहीं देखते थे; चिचियाने की बात स्वप्न में भी नहीं सोचें । रेडियो में समाचार वाचक अथवा विभिन्न कार्यक्रमों में मंच सँभालने वालों को जब लोगबाग देखते थे तो उनकी आवाज से उन्हें पहचानने की कोशिश करते थे, पहचानते थे कि &#8220;फलाने उद्घोषक&#8221; या &#8220;उद्घोषिका&#8221; हैं। बहुत सम्मान मिलता था उन्हें। आज भी उन दिनों के समाचार वाचक या उद्घोषक जो शरीर से जीवित हैं, उनकी आत्मा की गहराई आज के वाचक अथवा उद्घोषक नहीं माप सकते हैं। यह पक्का है । </p>
<p>विगत चार-पांच दशकों में, जैसे-जैसे सरकारी क्षेत्रों के रेडियो, टीवी आदि के कन्धों पर पैर रखकर, कुचलकर, लहलहूआन  कर निजी क्षेत्र के लोगबाग &#8216;पत्रकार&#8217; बनते गए, बाज़ारों में पत्रकार बनने के उद्योग, संस्थाएं खुलती गई, पत्रकारिता के लिए दूकानदारी बढ़ती गई, समाज के लोग बाग़, संभ्रांतों के परिवार और परिजन, संतान पत्रकारिता पढ़ते गए, चिकन-चुनमुम, गोरे-चिट्टे चेहरों के साथ कमर और गर्दन हिलाते पत्रकारिता में ढुकते गए &#8211; पत्रकारिता का वजूद, अस्तित्व समाप्त होता गया। </p>
<p>वजह भी है। नेताओं की नजर में जब देश का कोई मोल नहीं रहा, देश के विकास का कोई वजूद नहीं रहा, जिन मतदाताओं की मतों से देश के 28 राज्यों के विधान सभाओं में, आठ केंद्र शासित प्रदेशों में देश की जनता के कल्याणार्थ, देश के विकास के लिए रामायण से लेकर गीता पर हाथ रखकर कसमें खाते हैं &#8211; सभी झूठे हैं। अगर सच होता तो शायद विगत 75 वर्षों में देश की न्यायालयों में लंबित मुकदमों में सफ़ेद पोश नेताओं का, सफेदपोश अधिकारियों का, दलालों का, समाज-सेवियों का, वर्दी पहने अधिकारियों का नाम अंकित नहीं होता। वे जेल की चहारदीवारी के अंदर बंद नहीं होते। </p>
<p><strong>वैसी स्थिति में अगर समाज के सभी तबके के लोगों में, संस्थाओं में चारित्रिक गिरावट आई है तो पत्रकार भी तो उसी समाज के हिस्सा हैं। अगर न्यायालयों की न्यायिक व्यवस्था में गिरावट होने के बाद भी भारत के लोगों का न्यायिक व्यवस्था पर विश्वास है, न्याय पर विश्वास है, चाहे जीते-जी मिले अथवा नहीं, न्यायमूर्तियों पर विश्वास है, चाहे सेवा अवधि के बाद उनकी निगाहें देश के संसद की ओर ही क्यों न टिकी हो। उसी तरह लाख ही नहीं, करोड़ों दुर्गुणों के बाद आज भी भारत के अख़बारों के पाठकों का, रेडियो के श्रोताओं का, टीवी के दर्शकों का देश के पत्रकारों पर विश्वास है, भरोसा है। </strong></p>
<p>लेकिन विधानपालिका-कार्यपालिका-राजनेताओं-राजनीतिक पार्टियों-तथाकथित समाज सेवियों &#8211; वर्दी धारियों के साथ मिली-भगत, साठ-गाँठ के कारण आज &#8216;पत्रकारिता&#8217; शब्द का मूल्य और सिद्धांतों से अनभिज्ञ लोगों का विशाल समुदाय इस क्षेत्र में घर बना लिया है। आज जो अख़बार प्रकाशित कर रहे हैं, टीवी चला रहे हैं, रेडियो बजा रहे हैं &#8211; उनमें सैकड़े 99 फ़ीसदी लोगों को पत्रकारिता के मूल्यों और सिद्धांतों से दूर-दूर तक कोई रिस्ता नहीं है। </p>
<p><strong>एक दृष्टान्त:</strong> कई वर्ष पहले दिल्ली शहर में सबसे अधिक बिकने वाला एक दैनिक समाचार पत्र के मालिक ने आधिकारिक रूप से यह कहा था कि उन्हें &#8216;समाचार के मूल्यों&#8217; से कोई मतलब नहीं है। अगर प्रथम पृष्ठ की प्रथम कहानी कितना भी महत्वपूर्ण क्यों न हो, वह मौद्रिक मूल्यों की बाद होगी। अगर उस थान पर कोई पैसे देकर समाचार प्रकाशित करना चाहता है जिससे संस्था को आर्थिक लाभ की बात होगी, वे उस समाचार को वहां से हटाने का एकाधिकार सर्वाधिकार सुरक्षित रखते हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर पत्रकरों को, लेखकों को, सम्पादकों को संस्थान मोटी-मोटी रकमों पर रखता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वे आर्थिक मामलों पर दखलंदाजी करें। मोटी रकमों का भुगतान उन्हें तभी होता है जब संस्था की कमाई होती है। </p>
<p>बहरहाल, अगले महीने जून में भारत में रेडियो प्रसारण का 100 वर्ष हो जायेगा। सन 1923 में तत्कालीन अंग्रेजी शासन के दौरान बम्बई प्रेसिडेंसी रेडियो क्लब द्वारा एक कार्यक्रम का प्रसारण किया गया था। इसके चार साल बाद जुलाई महीने में इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी लिमिटेड के एक करारनामे के अनुसार देश में दो निजी रेडियो स्टेशन की स्थापना हुई। पहला बम्बई में और दूसरा कलकत्ता में। बम्बई से प्रसारण 23 जुलाई, 1927 से प्रारम्भ हुआ जबकि कलकत्ता से 26 अगस्त, 1927 से प्रसारण प्रारम्भ हुआ। तीन वर्ष के अंदर ही ये दोनों स्टेशन्स &#8216;लिक्विडेशन&#8217; में चला गया । लेकिन तत्कालीन सरकार प्रसारण सुविधा को प्रयोग के आधार पर अपने हाथ में ले ली और दो सालों तक चलाने की शुरुआत की और अंततः 1936 के जून महीने में अखंड भारत को &#8216;ऑल इण्डिया रेडियो&#8221; के रूप में प्रसारण हेतु एक सरकारी संस्था मिला।</p>
<p>स्वाधीनता के बाद भारत में दिल्ली, बम्बई, कलकत्ता, मद्रास, तिरुचिरापल्ली, और लखनऊ रेडियो स्टेशन के रूप में प्रसारण संस्थाएं मिली। जुलाई 1977 में पहली बार एफएम प्रसारण मद्रास रेडियो से प्रारम्भ हुआ। आज पूरे देश में तक़रीबन 400 शहरों में एफएम रेडियो बज रहा है। आकाशवाणी तो है ही । कहते हैं कि आज भारत की अर्थव्यवस्था में रेडियो उद्योग का विकास बहुत अधिक हुआ, खासकर मीडिया और इंटरटेनमेंट के क्षेत्र में। आशा है कि आने वाले समय में रेडियो की आमदनी 4000 करोड़ प्रतिवर्ष का व्ववसाय हो जायेगा। </p>
<p><strong>इसी तरह आज देश में कोई 900 निजी सेटेलाइट टीवी चैनेल्स हैं। शायद ही कोई भाषा है, जिसमें टीवी नहीं है। इतना ही नहीं, कोई 105443 निबंधित समाचार पत्र/पत्रिकाएं हैं जो देश की गली-कूचियों से लेकर राज्यों की जिला मुख्यालयों के रास्ते, राजधानियों को पार करते देश की राजधानी से प्रकाशित होती हैं। अब सवाल यह है कि अगर निजी क्षेत्रों में इतने सारे संवादों के प्रसारण हेतु संस्थाएं हैं लोगबाग भी तो होंगे ही। </strong></p>
<p>भारत के वरिष्ठ पत्रकार <strong>के विक्रम राव </strong>उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्य नाथ योगी को लिखते हैं कि &#8220;योगी जी, मीडिया को गटर में न जाने दें ! सरकारी मान्यता नियम लागू हों !!&#8221; </p>
<p>उनका लिखना जायज है। क्योंकि टीवी रिपोर्टर के छझ वेश में तीन शोहदों द्वारा माफिया अहमद &#8211; ब्रदर्स (अतीक और अशरफ) को भून देना, हम श्रमजीवी पत्रकारों के लिए वीभत्स हादसा है। क्योंकि पत्रकारिता हमारे लिए व्रत हैं, बाद में वृत्ति। अतः प्रयागराज का जघन्य कांड एक गंभीर चेतावनी है। हालांकि भारत सरकार का गृह मंत्रालय कल ही सुरक्षा की दृष्टि से जोखिम भरी घटनाओं की रिपोर्टिंग पर नियमावली तत्काल जारी कर रहा है। लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास पर पहरा तो बढ़ा दिया गया है। मगर मूल मसला है कि पत्रकार का कार्ड शासन ने थोक में अंधाधुंध जारी किया है। राजधानी में ही हजार हो गए हैं। कैसे ? क्यों ? सूचना निदेशालय हुलिया देखकर मान्यता देना बंद करे। ये तीन कथित संवाददाता फर्जी पहचानपत्र, वीडियो कैमरा, माईक आदि लिए थे। इनमें लवलेश तिवारी तो अपने आप को “महाराज” कहता है। उसकी आयु महज 22 साल है, जब कि मान्यता कार्ड पाने के लिए कम से कम पांच वर्ष का पत्रकारी कार्य होना अनिवार्य है। अर्थात फर्जी था। दूसरा हत्यारा अरुण मौर्य तो केवल 18 का है।</p>
<p>राव साहब का कहना है कि एक घृणित तथ्य का उल्लेख यहां लाजिमी है। राजीव गांधी की हत्या का रचयिता शिवरासन तमिलनाडु सरकार का मान्यता प्राप्त संवाददाता था। हाथ में बालपेन और नोटबुक थामें रहता था। गांधीजी का हत्यारा नाथूराम गोडसे भी पुणे के लुगदी साप्ताहिक का संपादक था। तालिबानियों के शत्रु अहमदशाह मसूद, शेरे पंजशीर, को 2007 में अलकायदा के बमबाजों ने संवाददाता बनकर उड़ा दिया था। आजकल तो मोबाइल फोन से ही कैमरा का काम भी हो जाता है। अतः जांच का कारण अधिक गंभीर और अपरिहार्य हो जाता हैं।</p>
<p>वे लिखते हैं: &#8220;योगी आदित्यनाथजी से मैं स्वयं सारे मान्यता कार्डों की पड़ताल का अनुरोध कर चुका हूं। फर्जी पत्रकारों की सूक्ष्म जांच हो। इसीलिए कि रवि और कवि की भांति रिपोर्टर भी बेरोकटोक, बेखौफ हर जगह पहुँच जाते हैं। मुनि नारद के वंशज जो ठहरे ! आश्वासन देने के बावजूद अभी तक ऐसी शासकीय जांच हुई ही नहीं है। आज लखनऊ के हजार मान्यताप्राप्त संवाददाताओं में वास्तव में कितने कार्यरत हैं ? मसलन, एक शर्त मान्यता की है कि प्रार्थी आधार कार्ड को नत्थी करे। सरकारी नियम है कि हर संवाददाता की L.I.U. जांच हो। ईमानदारी से ऐसी जांच हो, तो जालसाजी कटेगी। कई ऐसे मान्यताप्राप्त हैं जो राजधानी लखनऊ में रहते ही नहीं। जिलों के निवासी हैं। जाली पता दे दिया है, क्योंकि केवल लखनऊवासी ही राज्य का मान्यताप्राप्त संवाददाता हो सकता है।&#8221;</p>
<p>उनका कहना है कि &#8220;मुझे स्मरण आता है 1981 का प्रसंग। तब यूपी राज्य मान्यता समिति का मैं सदस्य था। मेरे साथ NUJ के अच्युतानन्द मिश्र (फोन : 9560880055/9560110055, अमर उजाला) भी थे। तब तक इंदिरा गांधी वापस सत्ता पर आ गई थीं। महाबली आरके धवन भी। धवन ने किसी पत्रकार की मान्यता हेतु मुख्यमंत्री के मार्फत सूचना सचिव/निदेशक को कहा था। पर हम लोगों ने नहीं होने दिया क्योंकि वह व्यक्ति कांग्रेस पार्टी कार्यकर्ता था,  संवाददाता नहीं। आज अधिकांश मान्यताप्राप्त संवाददाता क्या नियमानुसार हैं ? मैंने योगीजी से आग्रह भी किया था कि इस प्रकार की जांच सर्वप्रथम मेरे ही मान्यतापत्र की पड़ताल से शुरू की जाए। मेरे विषय में सारे उल्लिखित नियमों, शर्तों, आवश्यकताओं, अर्हताओं के आलोक में समुचित परीक्षा हो। यदि त्रुटि पाई जाए तो मेरी मान्यता निरस्त कर दी जाए। यहां उल्लेख कर दूं की कि मायावती सरकार ने द्वेषवश मेरी मान्यता (रोहित नंदन निदेशक थे) रद्द कर दी थी। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने मेरी मान्यता बहाल की। तब न्यायमूर्ति यूके धवन की खंडपीठ ने कठोर शब्दों में पूछा था : “मायावती शासन दुनिया की मीडिया को क्या संदेश देना चाहता है ? वरिष्ठतम संवाददाता की मान्यता अकारण काट दी ?” बहाली का हुक्म दिया।&#8221;</p>
<p>योगीजी के शासन से मैं फिर सविनय अनुरोध करता हूं कि सर्वप्रथम मेरी ही जांच हो। मैं भारत के छः राज्यों में मान्यता प्राप्त संवाददाता रहा हूं। भारत के शीर्षतम अंग्रेजी दैनिक “दि टाइम्स ऑफ इंडिया” में चार दशकों तक कार्यरत रहा। भारतीय प्रेस परिषद का छः वर्षों तक सदस्य रहने के अलावा भारत सरकार की प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो की केंद्रीय मान्यता समिति का दो बार सदस्य रहा। भाचावत तथा मणिसाणासिंह वेतन बोर्डों का नौ वर्षों तक सदस्य रहा। बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र, उत्तर प्रदेश विधान मण्डलों की तथा राज्यसभा की रिपोर्टिंग कर चुका हूं। पत्रकारी अनुभव के हिसाब से मैं नेहरू से नरेंद्र मोदी तक की रिपोर्टिंग मैं कर चुका हूँ। एक बुद्धिकर्मी हूं। मेहनत द्वारा हक मांगा और हासिल किया है। कोई कृपादान अथवा फर्जीवाड़ा से नहीं ! इसीलिए चाहता हूं कि मान्यताप्राप्त संवाददाता की गरिमा संजोयी जाये। अवनति खत्म हो। योगीजी से एक और आग्रह। जो भी समाचार संकलन करते हैं, लिखते पढ़ते ही उन्हें ही सुविधायें उपलब्ध हो।</p>
<p>अब एक जिक्र विभिन्न मुख्यमंत्रियों और मीडिया के सम्बन्धों में। मायावती की प्रेस कॉन्फ्रेंस में तो मैं जाता नहीं था। वे इमला लिखाकर चली जाती थीं। एक मुख्यमंत्री आए थे सुल्तानपुर वाले पं. श्रीपति मिश्र। उन्हें समझ ही नहीं चला समाचारपत्र है क्या ? यूं वे विधानसभा अध्यक्ष भी रहे थे। एक बार श्रमजीवी पत्रकारों की समस्याओं पर चर्चा करने से एक प्रतिनिधिमंडल लेकर इस कांग्रेसी मुख्यमंत्री के पास गया था। साथियों का परिचय मैंने कराया कि फलां लखनऊ श्रमजीवी पत्रकार यूनियन, यूपी पत्रकार यूनियन तथा इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ) के पदाधिकारी हैं। पंडित श्रीपति मिश्र बोले : “अच्छा तीन संगठनों के हैं ?” मेरा जवाब था : “नहीं। जैसे आपकी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, प्रदेश कमेटी, जिला कमेटी, शहर कमेटी हैं”। तब उन्हें कौंधा। राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह को मैंने पाया कि सुबह वे दैनिकों में राज्य संबंधी समाचार पढ़कर जिलाधिकारियों से फोन पर ही जवाब तलब कर लेते थे।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-existence-of-journalism-is-in-danger">जैसे-जैसे ✍ पत्रकारिता में अक्षरों का रंग बदलता गया, काला अक्षर &#8216;रंगीन&#8217; होता गया; &#8216;काले अक्षरों पर धब्बे लगते गए,&#8217; फ़र्जी पत्रकारों की बाढ़ आती गई😪दुःखद</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>भारतीय मीडिया पर सरकारी हमला: दास्तां  &#8220;बिहार प्रेस बिल&#8221; के जन्म तथा निधन की !!</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/editorial/bihar-press-bill-life-and-death</link>
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		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Aug 2022 06:14:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[emergency]]></category>
		<category><![CDATA[journalist]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>ठीक चार दशक हुए, भारतीय मीडिया पर एक और सरकारी हमला हुआ था। तारीख था 4 अगस्त। प्रेस को क्लीव बनाने की सुनियोजित साजिश थी। बिहार विधान मंडल (परिषद भी) ने प्रेस बिल पारित कर दिया था। कांग्रेसी मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र द्वारा उनके आलोचक-पत्रकारों को यह नायाब तोहफा था। इसके ठीक सात वर्षों पूर्व [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>ठीक चार दशक हुए, भारतीय मीडिया पर एक और सरकारी हमला हुआ था। तारीख था 4 अगस्त। प्रेस को क्लीव बनाने की सुनियोजित साजिश थी। बिहार विधान मंडल (परिषद भी) ने प्रेस बिल पारित कर दिया था। कांग्रेसी मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र द्वारा उनके आलोचक-पत्रकारों को यह नायाब तोहफा था। इसके ठीक सात वर्षों पूर्व  (25 जून 1975) इंदिरा गांधी ने भी सेंशरशिप थोप कर आपातकाल की घोषणा कर दी थी। उनके आत्मीय, जनवादी, वामपंथी प्रगतिशील सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंदर गुजराल ने पत्रकारों को ‘‘बड़ा बाबू‘‘ बना डाला था। मगर तुलना में बिहार प्रेस बिल अत्यंत चतुरायी से रचा गया था। इसके प्रावधानों के तहत यदि कोई खोंचावाला भी अखबार के टुकड़े में चना लपेट रहा हो और उसमें सरकार विरोधी खबर छपी हो तो वह फेरीवाला भी जेल भेजा जा सकता था। इतना जटिल तथा निकृष्ट! दोबारा सत्ता पर लौटने पर इंदिरा गांधी ने फिर वैसा ही प्रयोग करना चाहा। वह तब तक प्रेस से उद्विग्न और व्याकुल हो गई थीं। कारण ? उनकी निजता चाहने वाली, 28-वर्षीया बहू मेनका-संजय गांधी और सांस इंदिरा गांधी के बीच ठन गयी थी। तब वरुण दुधमुहा शिशु था।  समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में खूब प्रचार हो रहा था।</strong></p>
<p>आक्रोशित प्रधानमंत्री ने विचार किया। तब तक बिहार सरकार का व्यापक कदाचार मीडिया फोकस में था। एक ही बाण से दोनों साधने में इंदिरा गांधी के आज्ञाकारी विधायकों ने निष्ठा दर्शायी। मगर गंगातट की घटना सेे चिंगारी देषभर में प्रदीप्त हो गयी। विवश होकर जगन्नाथ मिश्र को अपना कानून निरस्त करना पड़ा। जगन्नाथ मिश्र ने वफादारी पूरी निभायी।</p>
<figure id="attachment_4272" aria-describedby="caption-attachment-4272" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1.jpeg" alt="" width="2048" height="1351" class="size-full wp-image-4272" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1-300x198.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1-1024x676.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1-768x507.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1-1536x1013.jpeg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4272" class="wp-caption-text">आर्काइव से अखबार का कतरन</figcaption></figure>
<p>मगर पटना की घटना यह केवल सीमित या वामनाकार नहीं रही। इसका रूप विकराल था। तब इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट (आईएफडब्ल्यूजे) का राष्ट्रीय अगवा होने के नाते मैं इस पूरे कशकमशम का क्रियाशील साक्षी रहा, खास भूमिका में भी था। हमारे संगठन (आईएफडब्ल्यूजे) के लिये बिहार मीडिया संघर्ष एक परीक्षा की बेला थी। इसके आधार में था हमारा राष्ट्रीय नेतृत्व का तबका जो वामपंथी बल्कि कम्युनिस्ट पार्टी का था। अध्यक्ष थे केरल के (मलयालमभाषी) ए. राघवन । वे आरके करंजिया के सात्ताहिक ‘‘ब्लिट्ज‘‘ के दिल्ली ब्यूरो के प्रमुख थे। कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ सदस्य रहे। </p>
<figure id="attachment_4273" aria-describedby="caption-attachment-4273" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2.jpeg" alt="" width="2048" height="1368" class="size-full wp-image-4273" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2-300x200.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2-1024x684.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2-768x513.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2-1536x1026.jpeg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4273" class="wp-caption-text">आर्काइव से अखबार का कतरन</figcaption></figure>
<p>बिहार बिल आने तक तो हमारे संगठन में छोटे मोटे मनभेद होते थे, मतभेद के बाद। तीव्रता बढ़ी जब वियतनाम पर अमेरिकी की  बमबारी की आईएफडब्ल्यूजे ने भर्त्सना की। हमारे मुम्बई कार्यालय (टाइम्स आफ इंडिया) से हुतात्मा चौक (फ्लोरा फाउंटेन) तक हम सबने विरोध जुलूस निकाला। नारा था ‘‘हमारा नाम वियतनाम। तुम्हारा नाम वियमनाम।‘‘  और निक्सन की निंदा थी। मगर जब सोवियत रूस की लाल सेना द्वारा चेकोस्लेवाकिया, हंगरी, पोलैण्ड आदि गणराज्यों को कुचला तो आईएफडब्ल्यूजे के नेतृत्व ने साजिशभरा मौन रखा, और नजरअंदाज कर दिया। तब हमारे साथियों ने मार्क्सवादी शब्दावलि में प्रण किया कि श्रमजीवी पत्रकार संगठन में वैचारिक पवित्रीकरण करना होगा। इस प्रयास में बिहार पत्रकार संघ बड़ा मददगार रहा।</p>
<figure id="attachment_4274" aria-describedby="caption-attachment-4274" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3.jpeg" alt="" width="2048" height="1368" class="size-full wp-image-4274" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3-300x200.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3-1024x684.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3-768x513.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3-1536x1026.jpeg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4274" class="wp-caption-text">आर्काइव से अखबार का कतरन</figcaption></figure>
<p>तब शुक्रवार, 20 अगस्त 1982, के दिन पटना से मुझे एक तार मिला: ‘‘बिहार पत्रकार संघर्ष समिति‘‘ के पंडित दीनानाथ झा की तरफ से। दूसरे दिन के जुलूस में शामिल होने का निमंत्रण था। तब मैं आईएफडब्ल्यूजे का पराजित अध्यक्ष था। ब्लिट्ज के श्री ए. राघव ने मुझे मात्र दो प्रतिशत वोट से हराया था। खुद राघवन ने लखनऊ फोन कर मुझे पटना जाने की बात कही। मुझे दुविधा थी। डा. जगन्नाथ मिश्र के मौसेरे भाई चन्द्रमोहन मिश्र वामपंथी दैनिक ‘‘दि पेट्रियट‘‘ के संवाददाता थे। वे हमारी बिहारी इकाई के अध्यक्ष थे। बताया जाता है कि चन्द्रमोहन ने ही विवादास्पद बिल का मसौदा तैयार कराया था। अर्थात दो मित्र लोग मौसेरे भाई भी थे, मुहावरे के तौर पर भी!!</p>
<figure id="attachment_4275" aria-describedby="caption-attachment-4275" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/4.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/4.jpeg" alt="" width="2048" height="1368" class="size-full wp-image-4275" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/4.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/4-300x200.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/4-1024x684.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/4-768x513.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/4-1536x1026.jpeg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4275" class="wp-caption-text">आर्काइव से अखबार का कतरन</figcaption></figure>
<p>राघवन के निर्देश तथा दीनानाथ झा के आदेश पर मैं पटना गया। एयरपोर्ट पर ‘‘इंडियन नेशन‘‘ (बाद में ‘‘टाइम्स आफ इंडिया‘‘)  के श्री के.के. सिंह मुझे लेने आये थे। हम वहां से सीधे गार्डिनर (अब वीरचन्द पटेल) रोड-स्थित रवीन्द्र भवन पहुंचे, जहां से संघर्ष समिति का जुलूस राजभवन जा रहा था। राज्यपाल अकीलुर रहमान किदवई (यूपी के बाराबंकी वाले) को बिहार प्रेस बिल को निरस्त करने का ज्ञापन देना था। हम सब मौन प्रदर्शनकारी थे। नारे लगाना मना था। उस दौर में जगन्नाथ मिश्र ने अपने दल बल की चतुराई से हमारा राष्ट्रव्यापी आंदोलन क्रमशः मन्द कर दिया था। प्रतिरोध की स्फूर्ति भी अन्य राज्यों में घटती गयी थी। </p>
<figure id="attachment_4276" aria-describedby="caption-attachment-4276" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/5.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/5.jpeg" alt="" width="2048" height="1417" class="size-full wp-image-4276" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/5.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/5-300x208.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/5-1024x709.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/5-768x531.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/5-1536x1063.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/5-100x70.jpeg 100w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/5-218x150.jpeg 218w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4276" class="wp-caption-text">आर्काइव से अखबार का कतरन</figcaption></figure>
<p>अब पत्रकार हो और घी निकालने में उंगली तिरछी न करे? हमारा जुलूस ज्यो ही बेली रोड पहुंचा, चन्द युवा पत्रकारों ने मार्ग मरम्मत हेतु रखे पत्थरों के ढेर को देखा। तनिक पत्थरबाजी हुयी। पुलिस ने लाठी चलायी। हरावल दस्ते में संपादक थे। बात बढ़ गयी। वहीं आईपीएस के रामचन्द्र खान का हुक्म हुआ। फिर हम सब गिरफ्तार होकर बाकीपुर थाने में हिरासत में रहे। उसी वक्त हजारीबाग जेल ले जाने का प्रोग्राम बन रहा था। फिर ऊपर से कुछ मशविरा हुआ। हम सब रिहा हो गये। अफसर डरा रहे थे।ष्वे शीघ्र जान गये कि भारत की पांच जेलों में (बड़ौदा की सौ साल पुरानी तनहा कोठरी मिलाकर) मैं तेरह माह गुजार चुका था। कैद अभ्यस्त था।</p>
<figure id="attachment_4277" aria-describedby="caption-attachment-4277" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/6.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/6.jpeg" alt="" width="2048" height="1417" class="size-full wp-image-4277" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/6.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/6-300x208.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/6-1024x709.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/6-768x531.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/6-1536x1063.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/6-100x70.jpeg 100w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/6-218x150.jpeg 218w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4277" class="wp-caption-text">आर्काइव से अखबार का कतरन</figcaption></figure>
<p>उन्हीं दिनों आईएफडब्ल्यूजे की राष्ट्रीय वर्किंग कमेटी की बैठक हमारे रणभूमि (पटना) में आहूत की। स्थान था गांधी मैदान के निकटवर्ती लाला लाजपत राय भवन। अध्यक्ष चंद्रमोहन मिश्र ने बताया कि मुख्यमंत्री ने चाय पर हम सबको बुलाया है। राघवन समन्वयवादी बन गये, वर्ग संघर्ष के सिद्धांत को तज कर। चलने को तैयार थे। मैंने एक शर्त रखी कि जगन्नाथ मिश्र विधेयक वापसी की घोषणा कर दे, हम सब चाय के बाद लंच के लिए भीे तैयार हैं। दोनों मिश्र जी नहीं माने। आन्दोलन राष्ट्रव्यापी बनकर व्यापा। इंदिरा गांधी 1977 की लोकसभा में रायबरेली की हार को भूली नहीं थीं। विधेयक सालभर के अंदर ही काल कवलित हो गया। बिहार के पत्रकारों की तब 15 अगस्त और 26 जनवरी एक साथ मन गयी।</p>
<figure id="attachment_4278" aria-describedby="caption-attachment-4278" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/7.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/7.jpeg" alt="" width="2048" height="1417" class="size-full wp-image-4278" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/7.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/7-300x208.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/7-1024x709.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/7-768x531.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/7-1536x1063.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/7-100x70.jpeg 100w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/7-218x150.jpeg 218w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4278" class="wp-caption-text">आर्काइव से अखबार का कतरन</figcaption></figure>
<p>मगर एक निजी तौर पर बड़ी दुखद बात हुयी। मैं बांकीपुर पुलिस हिरासत में था। तभी चन्द्रमोहन मिश्र वहां आये। सीधे पुलिसिया अन्दाज में मुझसे पूछा: ‘‘आप किसकी इजाजत से पटना आये हैं? ‘‘ साधारणतय उबलकर मैं भी गुनहगार मुख्यमंत्री के इस शातिर नातेदार को व्यंजनात्मक शैली में जवाब देता। पर शालीनता से बंधा था। </p>
<p>मैंने कहा: ‘‘आपकी पार्टी के आका और आईएफडब्ल्यूजे के अध्यक्ष राघवन के आग्रह से संगठन की मान मर्यादा को बिकने से बचाने आया हूं।‘‘ वे समझ गये। चुपचाप लौट गये। मगर हमारा मकसद भी पूरा हो गया। संघर्ष की लौ उसी दिन (1 अगस्त 1982) राष्ट्रव्यापी ज्वाला बन गयी। इंदिरा गांधी के भक्त सरदार खुशवंत सिंह तक इंडिया गेट पर हमारे पैदल प्रदर्शन में शरीक हो गये। दीवाल पर चमक रही चेतावनी को प्रधानमंत्री ने पढ़ लिया। जगन्नाथ मिश्र बहादुरी से पीछे हटे। हम जीते ही नहीं,  कामयाब हो गये।<br />
                                                  <br />
<strong>इस रपट को तैयार करने में साथी सुरेन्द किशोर, भाई संतोष सुमन, श्रीकांतजी, प्रवीण बागी, कृष्ण कुमार सिंह, मणिकान्त ठाकुर, लव कुमार मिश्र, डा. धु्रव कुमार आदि द्वारा उपलब्ध करायी गयी सूचना के लिये उनका मैं अत्यधिक आभारी हूं।</strong></p>
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		<title>मैंने अपने सीनियर पत्रकारों से किस्सा सुना कि &#8221;टाइम्स आफ इंडिया&#8221; में ब्रिटिश राज हर पत्रकार के लिये  &#8216;टाई&#8217; अनिवार्य ​थी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 01 Aug 2022 13:37:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[britisg raaj]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[journalist]]></category>
		<category><![CDATA[newspapers]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली: &#8221;नैक—टाई&#8221; (मसखरी में कण्ठलगोट) का विरोध आज यूरोप में तेज होता जा रहा है। भारत में तो यह प्रतिरोध अत्यंत जोरदार रहा। आज ही के दिन (1 अगस्त 1920) महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार से असहयोग आन्दोलन चलाया था। तब टाई खासकर गोरी सत्ता का प्रतीक हो गयी थी। उस दौर में टाई मिलाकर [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली: &#8221;नैक—टाई&#8221; (मसखरी में कण्ठलगोट) का विरोध आज यूरोप में तेज होता जा रहा है। भारत में तो यह प्रतिरोध अत्यंत जोरदार रहा। आज ही के दिन (1 अगस्त 1920) महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार से असहयोग आन्दोलन चलाया था। तब टाई खासकर गोरी सत्ता का प्रतीक हो गयी थी। उस दौर में टाई मिलाकर कुल ब्रिटिश पोशाक की होली जलती थी। खादी वाला विकल्प खूब व्यापा था। </strong></p>
<p>टाई आजकल खबरों में है। पेरिस में फ्रांसीसी सांसद टाई पर बड़ी गहरायी से विभाजित हो गये हैं। राष्ट्रपति एमानुऐल माइक्रोनी ने टाई के बचाव में अब अभियान छेड़ा है। वे सदन में औपचारिक परिधान की मर्यादा संजोये रखने में प्राणपण से जुटे हैं। मगर वामपंथी, जनवादी सांसद जो बड़ी संख्या में फ्रांसीसी संसद में पहुंचे हैं, का यह मानना है कि वर्ग विषमता को टाई गहराती है। गत दो सदियों से भारत में गोरी सत्ता का प्रतीक टाई रही है। अश्वेतों पर शासन का माध्यम। बल्कि जो लंदन से पढ़कर आया, आईसीएस में उत्तीर्ण होकर, मलका बर्तानिया का अफसर बन कर भारत लौटा था, उसका रुतबा कहीं ज्यादा रहता था। मानों देवपुरुष हो। </p>
<p><strong>पारम्परिक भारत में टाई यूं भी गुलामी का परिचायक रही। टोडी कहते थे उसे धारण करने वालों को। अर्थात मेंढक का बच्चा। हालांकि इन दिनों (शीतकाल में खासकर) टाई का प्रचलन फिर बढ़ गया है। आरक्षित पिछड़ी जातियों में खासकर। यह सजावटी तथा व्यवहारिक दोनों दृष्टि से अब प्रयुक्त हो रहा है।</strong></p>
<p>टाई की उत्पत्ति कई सदियों पुरानी है। प्राचीन मिस्र में दफनायी गयी &#8221;ममीज&#8221; के गले में यह बंधी रहती थी। ओशिनिया (Oceania)  इलाके में अमेज़न के आदिवासी बहुत कम कपड़े पहनते थे लेकिन उनके जीवन में भी गले के वस्त्रों का विशेष स्थान था। कहा जाता है कि नेकटाई की शुरूआत यूरोप में तीस साल के युद्ध की उथल-पुथल के दौरान हुई थी। उस समय इसका उपयोग स्कार्फ (Scarves) के रूप में किया गया। इन स्कार्फ का उपयोग सम्मान के प्रतीक के रूप में केवल सैनिक ही किया करते थे। उस समय आम जनता को इसे पहनने की अनुमति नहीं थी।</p>
<p>बादशाह लुईस अट्ठारहवें ने क्रोएशियाई व्यापारियों को नियुक्त किया, जिन्होंने अपनी वर्दी के हिस्से के रूप में अपनी गर्दन के चारों ओर कपड़े का एक टुकड़ा पहना। बादशाह लुईस को यह काफी पसंद आया और उन्होंने सभी शाही सभाओं के लिए इसे अनिवार्य बना दिया। क्रोएशियाई सैनिकों को सम्मानित करने के लिए उन्होंने इस कपड़े के टुकड़े को &#8220;ला क्रैवेट&#8221; (La Cravate) का नाम दिया जिसे फ्रेंच में नेकटाई कहा गया। यह शैली पूरे यूरोप में 200 वर्षों तक लोकप्रिय रही।</p>
<p><strong>जब रोमन सम्राट ने ट्रोजन के युद्ध में डाकियन्स (Dacians) को हराया, तो अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए संगमरमर का एक स्तंभ बनवाया जिसमें हज़ारों सैनिकों को साहसी चरित्र के प्रतीक के रूप दर्शाने के लिये नेकटाई पहनायी गयी थी।</strong></p>
<p>हर महत्वपूर्ण राजनेता अपनी स्टाइल बनाकर टाई धारण करता था। माईक्रोनी को एक अनोखा नजारा दिखा जब वे संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएन) गये थे। वे पतली टाई पहने थे। तभी टाई पहने अमेरिकी राष्ट्रपति (डोनाल्ड ट्रम्प) से सामना हुआ। ट्रम्प को लंबी टाई, बहुधा लाल और पतली पसंद थी। उनका सामना हुआ एमानुऐल से। तब तक वह यूरोप का फैशन बन गया था। बहुधा टाई की गाठों से भी फैशन का नया या पुराना होने का अहसास हो जाता था। मसलन राष्ट्रपति फ्रांकुवा होलैंन्द की टाई में कई गांठें पड़ी होती थीं। तब एक शीर्ष सम्मेलन में उनसे भेंट पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चुटकी ली : &#8221;इस गर्मी में आप बेझिझक टाई उतार सकते हैं।&#8221; इस पर फ्रेंच राष्ट्रपति का जवाब था : &#8221;यह टाई मेरे फ्रेंच प्रेस के लिये है।&#8221; इतना महत्व रहा है टाई का।</p>
<p>आज फ्रांसीसी संसद में टाई पर कलह के मूल में वर्ग—विग्रह की अवधारणा हैं। सम्पन्न और जनवादी लोगों के दरम्यान यह तीव्र संघर्ष है। गत वर्ष के आम चुनाव में माइक्रोनी ने बहुमत गवां दिया था क्योंकि सोशलिस्टों ने उन्हें घनाढ्यो का पोशाक वाला करार देकर विरोध में अभियान चलाया था।</p>
<p>भारत के परिवेश में टाई एक दासता—परिचायक निशान रहा। देश की जलवायु की विवशता और आम दृष्टि में टाई किसी भी दृष्टि से देसी नहीं हैं। बल्कि दो भारतीयों में आपसी विषमता सर्जाता है। याद कीजिये दक्षिण अफ्रीका में बापू जब वकील थे तो उन्होंने जेल जाने पर सादा लिबास पहना। फिर धोती भी। घुटनों तक गरीब किसानों से तादात्म्य बनाने के लिये। मगर उनके अनन्य चेले जवाहरलाल नेहरु तो आजादी के बाद तक टाई लटकाते रहे। जब भी वे राष्ट्रमंडल की सभा में लंदन जाते थे (1948 से 1962 तक) वे सदैव सूट—बूट और टाई में रहते थे। उनका चूड़ीदार पैजामा इंग्लैण्ड में अमूमन पैंट के नीचे पहनने वाला वस्त्र होता है। एक बार की घटना है कि केंब्रिज में नेहरु अपने पुराने छात्रों की सभा में गये तो भारतीय पोशाक (अचकन—चूड़ीदार) में गये थे। वहां एक बुजुर्ग महिला बेहोश हो गयी। वह समझी नेहरु पैंट पहनना भूल कर, नंगे आ गये हैं।</p>
<p>मैंने अपने सीनियर पत्रकारों से किस्सा सुना कि &#8221;टाइम्स आफ इंडिया&#8221; में ब्रिटिश राज हर पत्रकार के लिये  में टाई अनिवार्य थी। गेट पर ही रोक दिया जाता था जांच हेतु। हालांकि मेरे गांधीवादी पिता (स्व.के रामा राव) जब &#8221;टाइम्स&#8221; में चीफ सबएडिटर (1923—27) थे तो प्रवेश फाटक पर दर्बान के जांचने के बाद, डेस्क पर बैठते ही टाई मोड़कर जेब में रख लेते थे। बाद में भारतीय अखबारों में वे आये तो ऐसी साम्राज्यवादी पाबंदी नहीं रही। जेल और खादी तो उनकी जीवन—संगी बन गयी थी। इसी कारण से (टाइम्स आफ इंडिया के पूर्व संवाददाता रहे) मुझे भाषायी पत्रकारों द्वारा टाई लगाता देखकर चिढ़ होती है। </p>
<p>यहां मेरी समस्त अभिव्यक्ति पूरी ईमानदारीभरी ही है। इसका प्रमाण ? लखनऊ विश्वविद्यालय में मेरे पांच वर्ष के छात्र जीवन में केवल खादी पहनने और फिर छह महाद्वीपों के 51 राष्ट्रों की यात्रा बिना टाई लगाये, बिना शराब पिये कर चुका हूं। नाज होता है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/yiw-was-mandatory-in-timeofindia-during-british-raj">मैंने अपने सीनियर पत्रकारों से किस्सा सुना कि &#8221;टाइम्स आफ इंडिया&#8221; में ब्रिटिश राज हर पत्रकार के लिये  &#8216;टाई&#8217; अनिवार्य ​थी</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया चुनाव के बहाने: अपने ह्रदय को टटोलिये, जिसने पहचान दिया कहीं उस पत्रकारिता को लतिया कर राजनीतिक पार्टी का पिछलग्गू तो नहीं बन रहे हैं &#8216;स्वहित&#8217; में</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/dont-ditch-journalism</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 May 2022 05:19:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[journalism]]></category>
		<category><![CDATA[journalist]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया में क्लब के पदाधिकारियों के चयन हेतु &#8216;प्रत्यक्ष मतदान&#8217; का दिन था। ऐतिहासिक भीड़ थी। &#8216;अपरिचितों&#8217; की भीड़ में &#8216;जाना-पहचाना&#8217; चेहरा ढूंढ रहा था। पत्रकारों की पीढ़ियां बदल गई थी। कितनों के माथे के &#8216;बाल&#8217; अपने अस्तित्व से अलग हो गया था। कितनों के चेहरे जो मुद्दत पहले मूंछों&#8217; [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/dont-ditch-journalism">प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया चुनाव के बहाने: अपने ह्रदय को टटोलिये, जिसने पहचान दिया कहीं उस पत्रकारिता को लतिया कर राजनीतिक पार्टी का पिछलग्गू तो नहीं बन रहे हैं &#8216;स्वहित&#8217; में</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया में क्लब के पदाधिकारियों के चयन हेतु &#8216;प्रत्यक्ष मतदान&#8217; का दिन था। ऐतिहासिक भीड़ थी। &#8216;अपरिचितों&#8217; की भीड़ में &#8216;जाना-पहचाना&#8217; चेहरा ढूंढ रहा था। पत्रकारों की पीढ़ियां बदल गई थी। कितनों के माथे के &#8216;बाल&#8217; अपने अस्तित्व से अलग हो गया था। कितनों के चेहरे जो मुद्दत पहले मूंछों&#8217; के कारण पहचाने जाते थे, निमोछिया हो गए थे। कल तक जो 120-किलो शरीर का वजन दिल्ली की सड़कों पर रखे थे, सुटुक का सूखे &#8216;अल्हुए&#8217; जैसा हो गए थे। कई के वक्ष जो सम्मानित नरेंद्र मोदी के दिल्ली सल्तनत पर कब्ज़ा करने से बहुत पहले भी 56 इंच से भी अधिक नापे जाते थे, कल &#8216;उदर की चौड़ाई&#8217; 65 इंच से पार दिख रहा था। महिला पत्रकारों की घोर किल्लत थी, जैसे अकाल पड़ा हो। सुनने में यह भी आ रहा था कि भारत के महिला पत्रकार पुनः मुसको भवः होना चाहती हैं इस प्रेस क्लब में, लेकिन &#8216;प्रवेश शुल्क&#8217; अधिक होने के कारण कदम आगे नहीं बढ़ा पा रही हैं। हो भी कैसे ? आखिर वे &#8216;पत्रकार&#8217; भले हैं, &#8216;महिला&#8217; भी हैं और &#8216;माँ&#8217; भी &#8211; अतः परिवार की जिम्मेदारी &#8216;भारतीय पुरुष पत्रकारों&#8217; की तुलना में उन पर तो अधिक है। </strong></p>
<p>मैं उस भीड़ में अपनी मोटी-घनी मूंछ लिए चतुर्दिक जाना-पहचाना चेहरा ढूंढ रहा था, काम से कम 35-साल पुराना । गनीमत थी की विगत साढ़े तीन दशक से भी अधिक समय से दिल्ली में रहते हुए मूंछ पर कभी आंच नहीं आने दिए। जो पहचान उन दिनों थी, वही मूंछ आज भी &#8216;आधार कार्ड&#8217; कहिये या &#8216;पहचान पत्र&#8217; लोगों की निगाहों को आकर्षित कर रहा था। महिला मित्रों की कमी ह्रदय के कोने-कोने तक महसूस हो रही थी। जो मिलते थे, शारीरिक दूरियां बरकरार रखते एक-दूसरे से &#8216;बतिया&#8217; रहे थे &#8211; कह रहे थे कि महादेव को धन्यवाद देते हैं कि हम सभी जीवित हैं, साँसे ले रहे हैं और आज मतदान करने भी उपस्थित हुए हैं। अन्यथा दस हज़ार से भी अधिक सदस्यों वाली प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया में कौन किसे जानता हैं, नाम से, चेहरे से &#8211; अगर आप &#8216;उनके मंच के सदस्य&#8217; नहीं हैं। उन दिनों भी क्लब में प्रवेश तक &#8216;औपचारिकता&#8217; निभाने के लिए &#8216;हाय-हेलो&#8217; होता था, जैसे ही &#8216;दो-घूंट&#8217; अंदर उतरता था, अच्छे-अच्छे पहचान वाले अन्जान जैसा व्यवहार करने लगते थे। खैर। </p>
<p>कल प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया में पत्रकारिता के क्षेत्र में सम्मानित पत्रकारों का उदय &#8216;ध्यान आकर्षण&#8217; योग्य दिखा। नए-नए चेहरे दिखे।  उनके चेहरों पर रुतबा दिखा, &#8216;एटीच्यूड&#8217; दिखा । कहीं उम्मीदवार अपना पर्चा सुन्दर-सुन्दर महिलाओं के हाथों बंटवा रहे थे तो कहीं इवेंट-मैनेजमेंट के लोग पीला-पीला कपड़ा पहने &#8216;मतदाताओं&#8217; को आकर्षित कर रहे थे। लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, सुश्री मायावती, दिवंगत राजीव गांधी, भी कभी मतदाताओं को &#8216;इस कदर आकर्षित नहीं किये होंगे&#8217;, चुनाब के समय। सभी मोहतरम &#8216;सज-धज&#8217; कर मतदान हेतु आये थे। कोई किसी का पीठ ठोकने, तो कोई किसी का पैर खींचने । बड़ी-बड़ी लाखों-करोड़ों कीमत की गाड़ियां रायसीना रोड के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पंक्तिवद्ध थी। पत्रकारों की ऐसी-ऐसी गाड़ियों को देखकर भारत की पत्रकारिता खुद पर हंस रही थी। दिल्ली की यह पत्रकारिता देश की पत्रकारिता को दर्शा रहा था। दिल्ली पुलिस के सम्मानित अधिकारी भी इधर-उधर अपनी निगाहें कोने में बैठकर घुमा रहे थे। </p>
<p>हमारे ज़माने में पत्रकार या तो पटना की सड़कों पर साईकिल से चलते थे या पैदल। उनकी कलमों में इतनी ताकत थी की दिल्ली से 980 किलोमीटर दूर बैठकर भी प्रधान मंत्री कार्यालय में अपनी पत्रकारिता की छाप छोड़ते थे। आज तो आलम यह है कि दिल्ली में बिहार से प्रवासित लोगों को, चाहे वे भारतीय पत्रकारिता का अहम् हिस्सा ही क्यों न हो, सत्ता की गलियारे में खुद हिलते-डोलते नजर आते हैं। बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के बारे में तो पूछिए ही नहीं। कई पत्रकार तो सफेदपोश नेताओं के &#8216;अनुयायी&#8217; नहीं, बल्कि &#8216;पिछलग्गु&#8217; बनकर जीवन यापन का रास्ता ढूंढ रहे हैं। &#8216;कहीं कोई कुर्सी मिल जाय&#8217; की याचना के साथ सुबह-शाम अपने-अपने इष्ट नेताओं का जाप करते दीखते हैं।  जो सफल हो गए वे प्रदेश में अपने बुढ़ापे के लिए &#8216;विधायक पेंशन&#8217; निश्चित कर लिए, कई अभी लम्बी कतार में खड़े हैं।  </p>
<p>यह बात सिर्फ बिहार के पत्रकारों के साथ ही नहीं, देश के सभी 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों के पत्रकारों के साथ है &#8211; जो अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा &#8216;संरक्षित&#8217;, &#8216;सम्पोषित&#8217; हैं। आखिर समय बदल रहा है। एक अमरीकी डालर के लिए जब 73+ भारतीय रुपये देने हों, तो कलम की कीमत भी तो वैसी ही होगी। दिल्ली की सड़कों पर, लाल-बत्तियों पर, चौराहों पर, भीड़-भाड़ वाले इलाकों में &#8216;पेट-पीठ&#8217; एक किये बच्चे, महिला, वृद्ध कहीं &#8216;कलम&#8217; बेच रही हैं तो कहीं &#8216;तिरंगा&#8217; &#8211; आखिर पेट तो सबों के है । अब तो पत्रकार बंधु-बांधव भी &#8216;कलम&#8217; रखना त्याग दिए हैं, &#8216;वायु त्याग&#8217; जैसा।  कमीजों के ऊपरी जेब में अब कलम नहीं दीखते, उसका स्थान स्मार्ट फोन ले लिया है। लिखने का काम, कथन-वक्तव्यों को रिकार्ड करने के लिए &#8216;स्मार्ट फोन&#8217; का इस्तेमाल करने लगे हैं। खैर।  </p>
<figure id="attachment_4046" aria-describedby="caption-attachment-4046" style="width: 2000px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244.jpg" alt="" width="2000" height="1325" class="size-full wp-image-4046" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244.jpg 2000w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244-300x199.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244-1024x678.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244-768x509.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244-1536x1018.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2000px) 100vw, 2000px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4046" class="wp-caption-text">स्थिर पानी और पानी में परछाई &#8211; आप भी देख सकते हैं</figcaption></figure>
<p>&#8216;लन्दन&#8217; के छाप पर उस ज़माने के &#8216;वेटेरन&#8217; पत्रकार श्री दुर्गा दास जी अविभाजित भारत की राजधानी दिल्ली में भी प्रेस प्रतिनिधियों के लिए एक &#8216;क्लब&#8217; बनाने को ठाने और बनाये भी। श्री दास जी उस समय एसोसिएटेड प्रेस ऑफ़ इण्डिया, जो बाद में प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया के रूप में विख्यात हुआ, के संपादक थे। अच्छा था कि वे सन 1930 के दशक में संपादक थे और सम्मानित भी थे। अन्यथा अगर आज की दौड़ के होते तो अपनी आखों के भारतीय पत्रकारिता की दशा ही नहीं, &#8216;दुर्दशा&#8217; को देखकर मन-ही-मन इतना रोते की उन्हें हृदयाघात हो जाता, या फिर जीने के लिए &#8216;ह्रदय में स्टंट&#8217; लगाना होता। खैर। न अब सम्मानित दुर्गा दास जी हैं और न तत्कालीन समय वाली पत्रकारिता। </p>
<p>कहते हैं कि 20 दिसंबर, 1957 को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की स्थापना हुई और उसका एक कंपनी के रूप में 10 मार्च 1958 को पंजीकरण हुआ। उनके प्रयासों की ही बदौलत भारत में ब्रिटिश हुकमरानी के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने इसके लिए 1 रायसीना रोड का बंगला आवंटित किया। यह भी कहा जाता है कि तत्कालीन आवंटन रद्द कर दिया गया तहत। जो भी, आज़ाद भारत के गृह मंत्री गोविन्द वल्लभ पंत 2 फरवरी, 1959 को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का उद्घाटन किया। आज भी पंत जी आदमकद तस्वीर प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया में टंगा है। इस क्लब में प्रारम्भ में महज ३० सदस्य थे और तत्कालीन हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक दुर्गा दास इसके पहले अध्यक्ष और दिग्गज पत्रकार डीआर मानकेकर पहले सेक्रेटरी जनरल थे। आज &#8216;आर्डिनरी&#8217; से लेकर &#8216;एसोसिएट&#8217; और &#8216;कॉर्पोरेट&#8217; सदस्यों की संख्या 9000 से अधिक है। </p>
<p>यही कारण है कि इस बार भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय द्वारा 300 से अधिक पत्रकारों को &#8211; जो साठ वर्ष से अधिक उम्र के हो गए हैं,  संस्थानों से अवकाश प्राप्त कर लिए हैं, लेकिन &#8216;फ्रीलांसर&#8217; के रूप में अपने शब्दों के सहारे दो वक्त की रोटी जुटाकर अपना और परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं &#8211; उन्हें &#8216;पत्र सूचना कार्यालय कार्ड (पीआईबी कार्ड) से मुक्त कर दिया गया है। उन वृद्ध पत्रकारों को उस कार्ड से जीवन के अंतिम वसंत में अपने बाल-बच्चों पर दवा-दारु-अस्पतालों के खर्च से बहुत आराम मिलता था। पिछली सरकार गैर-भाजपा सरकार में सूचना प्रसारण मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय के सहयोग से उन्हें केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना के तहत यह सुविधा प्रदान की गई थी, जिसका अस्तित्व पीआईबी कार्ड से ही था। सरकारी मुलाजिम मूक-बधिर हैं। सूचना प्रसारण मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय को क्या कहें, कोई भी मंत्री अथवा मंत्रालय इस विषय पर चूं नहीं कर सकता। सभी कहते हैं &#8220;ऊपर का, आला कमान का आदेश&#8221; है। &#8216;आला-कमान&#8217; शब्द कांग्रेस में तो थी ही (परिणाम सामने है), अब भारतीय जनता पार्टी की नेतृत्व वाली सरकार में भी आ गयी है। </p>
<p>इस मामले में पत्रकार संघों, इकाईयों, यूनियनों से &#8220;हल्ला-बोल&#8221; की अपेक्षा करना बेकार है क्योंकि सभी अपने-अपने फ़िराक में हैं। सभी तो &#8216;फ़िराक गोरखपुरी&#8217; हैं नहीं और न सभी सूर्यकान्त त्रिपाठी &#8216;निराला&#8217; हैं। पत्रकारों, उनके संगठनों के बारे में कुछ सोचना मई-जून के महीने में &#8216;मूली&#8217; रोपने के बराबर है। अगर भारत के पत्रकार बंधु-बांधव कभी अपने समाज के लोगों के लिए, उनके कल्याणार्थ सोचे होते तो शायद आज भारत के चौराहों पर जिस कदर भारत के लोग पत्रकारों का फ़जीहत करते हैं, आलोचना करते हैं, गलियाते हैं &#8211; ऐसा नहीं होता। </p>
<p>एक दृष्टान्त: सत्तर के दशक में पटना रेलवे स्टेशन और डाक बंगला चौराहा को जोड़ने वाली सड़क फ़्रेज़र रोड के बाएं तरफ केंद्रीय कारा हुआ करता था। उस केंद्रीय कारा में आनंद मार्ग के बहुत से कार्यकर्त्ता बंद थे। आनंद मार्ग को &#8216;बैन&#8217; कर दिया दिया गया था। श्रीमती इंदिरा गांधी देश का कमान संभाली थी। जेल के चारो तरफ केंद्रीय रिजर्व पुलिस वल का पहरा रहता था। पटना के यूनाइटेड न्यूज़ एजेंसी (यूएनआई) के शिक्षक-तुल्य पत्रकार थे डी. एन. झा। झा साहेब अपने जीवन काल में कितने पत्रकार पैदा किये, यह अमूल्य शोध का विषय है। दुर्भाग्य यह है कि आज पटना के पत्रकार भी बाबू डी.एन. झा &#8211; बाबू बी.एन. झा को नहीं जानते होंगे। खैर , यह डिजिटल युग की पत्रकारिता हैं। </p>
<p>सम्मानित झा साहेब देर रात सड़क मार्ग से पैदल अपने घर जा रहे थे। इस बीच उन्हें &#8216;लघु शंका&#8217; की आवश्यकता हुई और वे आम नागरिक-नेताओं की तरह सड़क के बायीं ओर निवृत होने लगे। उन दिनों पटना की सड़कों पर &#8216;सुलभ शौचालय&#8217; महज एक &#8216;नवजात शिशु&#8217; के रूप में &#8216;रेंगना&#8217; शुरू किया था और &#8216;स्वच्छ भारत अभियान&#8217; तो भारत के अधिकारियों के &#8216;मानसिक गर्भ&#8217; में जन्म भी नहीं लिया था। सम्मानित अमिताभ बच्चन साहेब का &#8220;खुले में शौच नहीं करें&#8221; कथन दूरदर्शन पर भी नहीं आता था। हाँ, बच्चन साहेब पटना &#8216;वीणा सिनेमा&#8217;, एलिफिंस्टन सिनेमा&#8217; गृहों में &#8216;शोले&#8217; फिल्म में तस्वीर में दीखते थे। </p>
<p>सीआरपीएफ के जवान झा साहेब को दबोच लिए और कुछ डंडे भी रसीद दिए। अपना परिचय देते देते थक गए &#8216;झा साहेब&#8217;, लेकिन जवान एक भी नहीं सुने। अब तक उसकी बारी थी। यह बात कुछ सेकेण्ड में यूएनआई के दफ्तर में, तत्कालीन आर्यावर्त-इण्डियन नेशन-सर्चलाइट-प्रदीप-कौमी आवाज अख़बारों के दफ्तर में बिजली जैसी कौंध गई। समय पलट गया था, क्योंकि भारत के पत्रकार को इस कदर खुलेआम पीटना, जबकि वह &#8216;शंका&#8217; से मुक्त हो रहा था, अमानवीय माना गया। प्रदेश के मुख्य मंत्री कार्यालय और आवास की बात छोड़े, दिल्ली का प्रधान मंत्री कार्यालय में भी बत्तियां जल गयी थी। सीआरपीएफ के जवान और उसके आला अधिकारी को अपनी गलतियों का एहसास हो गया था। वजह भी था &#8211; उन दिनों सड़कों पर क्या राज नेता, क्या मंत्री, क्या अधिकारी सभी खुलेआम लघुशंका से मुक्त होते थे। गाँव-देहातों में तो &#8216;दीर्घ&#8217; भी खेतों में खुलेआम करते थे। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो शायद आज प्रदेश का यह हाल भी नहीं होता। </p>
<p>बहरहाल, श्री दुर्गा दास का क्लब मेरे जन्म के दस-माह पूर्व यानी 10 मार्च, 1958 को एक कंपनी के रूप में भारतीय कंपनियों की श्रृंखला में पंक्तिबद्ध हो गया। मेरा जन्म तो 10 जनवरी, 1959 को हुआ। मशहूर &#8216;बॉक्सर&#8217; जॉर्ज फोरमैन, मशहूर गायक जिम क्रॉस, बॉलीवुड के नायक ऋतिक रौशन, नायिका ऐश्वर्या राजेश, मशहूर बास्केट बॉल खिलाडी ग्लेंन रॉबिंसन, मशहूर पार्श्व गायक यसुदास का जन्म 10 जनवरी को ही हुआ था। आश्चर्य तो तब होता है जब भारतीय राजनीतिक मानचित्र पर 10 जनवरी को किसी भी राजनेता का जन्म तारीख नहीं देखता हूँ। कहते हैं 10 जनवरी को जन्म लेने वाले को जीवन में बहुत संघर्ष, मसक्कत करना पड़ता है और भारतीय राजनेता शायद उस श्रेणीं में नहीं हैं। बहरहाल, देश आज़ाद हो गया था। सन 1930 के दशक वाले पत्रकार वृद्ध होने लगे थे। पत्रकारिता में नई पीढ़ियों का अभ्युदय होने लगा था। देश का दो फांक में विभाजन भी हो गया था। रायसीना रोड-राजेंद्र प्रसाद रोड के मिलन-स्थल के कोने पर स्थित प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया उस ऐतिहासिक त्रादसी का चश्मदीद गवाह भी था। </p>
<p>जो भी हो, सन 1894 भूमि अधिग्रहण कानून के अधीन लगभग 300 से अधिक तत्कालीन लोगों की जमीन को अधिग्रहित किया गया था वायसराय के घर के निर्माण के लिए रायसीना पहाड़ पर । हुकूमत अंग्रेजी थी, स्वाभाविक है भारतीय गरीब लोगों को जमीन का हक़ देना ही पड़ा। अधिक बातें तो शहर के ज्ञानी-महात्मा बताएँगे, लेकिन ऐसा माना जाता है कि अंग्रेजी हुकूमत के दिनों की बातों को अगर नजर अंदाज कर भी दें, तो स्वतंत्र भारत में इस स्थान पर रहने वाले, दफ्तरों में बैठने वाले, संसद पर आधिपत्य जमाने वाले सम्मानित भारतीय स्वयं को सन 1947 के बाद से भारत के आवाम से न्यूनतम 18+ मीटर यानी 59+ फीट &#8220;ऊँचा&#8221; समझते हैं।उनकी अन्तःमन की इक्षा होती है कि &#8216;अगर एक बार ऊपर आ गए तो फिर अंतिम सांस बंद होने के बाद ही नीचे उतरें।&#8217; </p>
<p>अब स्वाधीनता के 75 वर्ष पर चाहे &#8216;आजादी का अमृत महोत्सव&#8217; मनाएं&#8217;, सच तो यही है कि देश में आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक दृष्टि से गरीब-गुरबा से लेकर दलित, महादलित भारतीयों की औसतन शारीरिक ऊंचाई पांच फुट आठ इंच से अधिक तो हैं नहीं। विज्ञान में चाहे कितना चमत्कार हो जाय, आम भारतीयों की ऊंचाई तो &#8220;जिराफ़&#8221; जैसी हो नहीं सकती। जो &#8216;मन से उंचा है भी&#8217;, मन पर इतना अधिक बोझ लिए बैठे हैं कि न उठ पाते हैं और ना ही आने वाली पीढ़ियों को उठने देते हैं। वैसी स्थिति में 59 फुट ऊँचे स्थान पर बैठे &#8216;महामानवों&#8217; को देखने के लिए तो उसे जमीन पर &#8216;चित्त&#8217; ही लेटना होगा, दूसरा कोई &#8216;विकल्प&#8217; नहीं है।  यही कारण है कि विगत 75-वर्षों से सन 1947 वाला 23 करोड़ आवाम से लेकर आज की 130+ करोड़ जनता तक सभी &#8220;चित&#8221; ही हैं। </p>
<p>&#8220;पट्ट&#8221; तो भारतीय संसद में &#8216;प्रत्यक्ष&#8217; और &#8216;परोक्ष&#8217; रूप से चयनित 545 लोक सभा के सम्मानित सांसद, 245 राज्य सभा के सम्मानित सांसद, राज्यों के विधान परिषदों के करीब 426 सम्मानित सदस्य, और 28 राज्यों तथा आठ केंद्र शासित प्रदेशों के कुल 4121 विधान सभाओं के सम्मानित सदस्य हैं। उन्हीं चयनित सदस्यों में सम्मानित प्रधान मंत्री महोदय हैं, भारतीय कैबिनेट के मंत्रीगण हैं, मुख्यमंत्रीगण हैं, लाट साहेब महोदय हैं । </p>
<p>खैर, अब अगर भारतीय संसद से दो सौ कदम पर प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया स्थित है। आज़ादी के बाद पूरे देश में कोई दो सौ के आस-पास समाचार पत्र प्रकशित होते थे, जब देश की आवादी 23 करोड़ थी; आज 130+ करोड़ लोगों के लिए एक लाख से अधिक समाचार पत्रों का निबंन्धन है। इसमें करीब 18,000 समाचार पत्र हैं और एक लाख से अधिक पत्रिकाएं हैं। इसके अलावे करीब 900 से अधिक टीवी चैनेल्स, जो 130+ करोड़ भारतीयों को क्षण-प्रतिक्षण की सूचना उपलब्ध कराते हैं। </p>
<figure id="attachment_4046" aria-describedby="caption-attachment-4046" style="width: 2000px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244.jpg" alt="" width="2000" height="1325" class="size-full wp-image-4046" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244.jpg 2000w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244-300x199.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244-1024x678.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244-768x509.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244-1536x1018.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2000px) 100vw, 2000px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4046" class="wp-caption-text">स्थिर पानी और पानी में परछाई &#8211; आप भी देख सकते हैं</figcaption></figure>
<p>प्रारंभिक काल में तो एक सरकारी टीवी था, भारत के लोग &#8216;दूरदर्शन&#8217; के नाम से जानते थे। एक रेडियो था। लोग बाग़ &#8216;ये आकाशवाणी&#8217; है के नाम से परिचित थे। सामाजिक क्षेत्र के डिजिटल मीडिया के जन्म लेने के साथ ही, पारम्परिक संवाद में &#8216;ग्रहण&#8217; लगने का आभास होने लगा। आखिर समय बदल रहा था। देश को आज़ाद हुए भी सात दशक से अधिक हो गया था। जो उस समय वृद्ध थे, अपनी &#8216;राष्ट्रीयता&#8217; की मानसिकता को लेकर &#8216;मृत्यु&#8217; को प्राप्त करते गए। </p>
<p>आकंड़ों के अनुसार भारत में अभी 75+ वर्ष वाले कोई दो करोड़ 83 लाख लोग हैं जबकि 80+ उम्र के एक करोड़ 32 लाख और 90+ उम्र के बारह लाख के आस पास। अब सवाल यह है कि देश की कुल आवादी में 75 से अधिक उम्र के लोगों की संख्या, 75 से नीचे लोगों की संख्या के सामने &#8216;नगण्य&#8217; है और जो 75 से कम उम्र के हैं उनका फक्र के साथ यह कहना कि वे आज़ाद देश में जन्म लिए &#8211; गर्व की बात है। उनका देश की राजनीतिक व्यवस्था के प्रति, राजनेताओं के प्रति, राजनीतिक पार्टियों के प्रति &#8216;वचनबद्धता&#8217;, &#8216;प्रतिवद्धता&#8217; &#8216;झुकाव&#8217; स्वाभाविक है।  इसे आप उनका &#8216;जन्म सिद्ध अधिकार&#8217; भी कह सकते हैं । और इन एक लाख से अधिक पत्र-पत्रिकाओं में, टीवी चैनलों में, सामाजिक क्षेत्र के मीडिया में काम करने वाले सम्मानित पत्रकार बंधु-बांधव&#8217; भी तो इसी समाज के हैं। उनका नाम भी तो भारतीय जनगणना में अंकित है। </p>
<p>अब अगर प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया से मात्र दो सौ कदम पर भारत के कुल 3287263 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रों से &#8216;प्रत्यक्ष&#8217; और &#8216;परोक्ष&#8217; रूप से निर्वाचित लोग बाग़ आधुनिक ऐसो-आराम से सज्ज जीवन व्यतीत कर रहे हैं। भारतीय संसद के प्रवेश द्वार पर लिखा भी है &#8216;आम रास्ता नहीं है&#8217;, साथ ही प्रवेश द्वार के ठीक सामने सड़कों पर &#8216;अलकतरा&#8217; का पोचरा करने वाले आम भारतीयों की &#8216;सुक्खा-सुक्खी&#8217; न्यूनतम मजदूरी 178/- रूपया प्रतिदिन हो और उसकी तुलना में अन्य सभी सुख-सुविधाओं को छोड़कर सम्मानित सांसदों को, मंत्रियों को, मुख्य मंत्रियों को, राष्ट्रपति को, राज्यपालों को, अधिकारियों को, नेताओं को लाखों-लाख रुपयों में वेतन मिलता हो &#8211; चाहे अमेरिकन डॉलर की तुलना में भारतीय मुद्रा कितना भी लुढ़के &#8211; फिर तो &#8216;सजग पत्रकार&#8217;, &#8216;पहुँच वाले पत्रकार,&#8217; &#8216;राजनीतिक गलियारों के नामी पत्रकार&#8217; भी तो इसी समाज के हिस्सा हैं और उन्हें भी सर्वाधिकार है कि वे &#8216;बल्ले-बल्ले टाईप&#8217; जीवन व्यतीत करें। वैसे भी दिल्ली की हवा बहुत प्रदूषित है और &#8216;सुगंध&#8217; की तुलना में &#8216;दुर्गन्ध&#8217; का फैलाव समाज में अधिक होता है।</p>
<p>इतना ही नहीं, &#8216;बिना एक शब्द गलती के&#8217; हज़ारों-हज़ार शब्दों की कहानी लिखने वाले पत्रकार, जिसके नाम पर समाचार पत्रों के संपादक &#8216;सम्पादकीय&#8217; लिखते हैं, टीवी चैनलों के &#8216;प्राइम टाईम&#8217; में &#8216;कबड्डी का आयोजन करते हैं, उस &#8216;निरीह&#8217; पत्रकार की कहानी को राजनीतिक बाजार में बेचकर दिल्ली की लक्ष्मी नगर की तंग गलियों से निकलकर स्वम्भू-पत्रकार-संपादक-समाज के अधिष्ठाता दक्षिण दिल्ली के फार्म-हॉउसों में दंड-बैठकी करते नजर आएंगे और &#8216;सच्चा पत्रकार&#8217; बाहर गेट पर &#8216;चुपचाप&#8217; खड़ा रहेगा, कोने में। कोई पूछता भी नहीं है। कहते हैं &#8216;सेल्फ-रेस्पेक्ट&#8217; होनी चाहिए। </p>
<p>खैर। हम तो बस इतना ही कहेंगे की संस्था को बचाएं चाहे प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया हो या भारत का संसद या 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों का विधान सभा। अन्यथा आने वाले दिनों में वास्तविक राजनेताओं, राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ पत्रकार बंधु-बांधव जब अंतिम सांस लेंगे तो संसद में, विधान सभा परिसरों में, प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया के आँगन में उनकी आत्मा की शांति के लिए किसी &#8216;तुलसी के पौधे&#8217; का रोपण नहीं किया जायेगा; अलबत्ता छोटका-प्रवेश द्वार के कोने पर रखे एक फ्रेम में उनकी तस्वीर बदलती जाएगी। फिर दो मिनट का मौन रखा जायेगा। देश के 130+ करोड़ लोगों के 5337 सांसदों-विधायक प्रतिनिधियों के साथ-साथ दस हज़ार सदस्यों से अधिक संख्या वाले इस क्लब में &#8216;श्रद्धांजलि&#8217; देने वाले दस लोग भी एकत्रित नहीं होंगे। नेता लोग तो &#8216;ट्वीट&#8217; भी कर देंगे और उनके &#8216;पिछलग्गू&#8217; (फॉलोवर्स) उसे &#8216;रीट्वीट&#8217; भी करेंगे, टिपण्णी भी कर देंगे,  अपनी उपस्थिति दर्ज भी करेंगे वे। पत्रकारों के मामले में क्लब के मुख्य बैठकी से लोग बाहर भी नहीं आएंगे। जो आ भी गए वे जहाँ एक मिनट में औसतन लोग 12 से 16 बार साँस लेते हैं; वे 24 से 32 बार सांस लेकर निकलने की ताक में रहेंगे। कहीं अंदर &#8216;बार&#8217; में घंटी न बज जाए। </p>
<p><strong>शोक-संवेदना व्यक्त करने के अवसर पर, शमशानों में, शवदाह गृहों में &#8216;बार-बार घड़ी की ओर देखना&#8217; एक &#8216;शरीर से जीवित&#8217;, परन्तु &#8216;आत्मा से मृत&#8217; लोगों में ही देखा जाता है। अगर विश्वास नहीं हो तो किसी की अंतिम यात्रा में चलकर आजमा लीजिए। और सबसे ताजा उदाहरण देखना हो तो &#8216;दूरदर्शन का फुटेज&#8217; देखिये जब भारत राष्ट्र के महामानव, देश के पत्रकार और पूर्व प्रधानमंत्री सम्मानित श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द किया जा रहा था। अन्य उपस्थित लोगों के अलावे, देश के एक ऐसे व्यक्ति अपनी कलाई पर बंधी घड़ी बार-बार देख रहे थे, जैसे कोई चोरी तो नहीं कर ली। और जैसे ही अग्नि की ज्वाला सम्मानित श्री वाजपेयी जी की शरीर को अपने में समाया, ज्वाला प्रज्वलित हुई, संस्कार स्थल वीरान हो गया। </strong></p>
<p>अंततः प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया का इस वर्ष का चुनाव संपन्न हो गया। परिणाम भी आ गया। संख्या अपना खेल खेल गया। जिसे अधिक मिला वे &#8216;विजयश्री&#8217; का झंडा लहराए, जिन्हें काम मिला वे सफल नहीं हो पाए। सब संख्या का खेल है। भारत के संसद से लेकर प्रदेशों के विधान सभाओं में, जिला परिषदों में &#8216;विजय&#8217; और &#8216;पराजय&#8217; का निर्णय &#8216;संख्या&#8217; ही करता है। कभी कोई संख्या का &#8216;इंतजाम&#8217; कर लेते हैं प्रधान मंत्री बने रहने के लिए, कोई नहीं कर पाता। लेकिन इस संस्था की गरिमा को बचाना हमारा प्रथम उद्देश्य होना चाहिए। साथ ही, यह भी नितांत आवश्यक है कि &#8216;पत्रकारिता&#8217; के बहाने हमें अपने-अपने ह्रदय को टटोलना होगा, स्वयं से भी पूछना होगा कि जिस पत्रकारिता ने, जिस संस्था ने हमें पहचान दिया कहीं हम उस पत्रकारिता और संस्था का इस्तेमाल कर, फिर उसे लतिया कर राजनीतिक पार्टी का पिछलग्गू तो नहीं बन रहे हैं &#8216;स्वहित&#8217; में। <br />
 </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/dont-ditch-journalism">प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया चुनाव के बहाने: अपने ह्रदय को टटोलिये, जिसने पहचान दिया कहीं उस पत्रकारिता को लतिया कर राजनीतिक पार्टी का पिछलग्गू तो नहीं बन रहे हैं &#8216;स्वहित&#8217; में</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8216;पूस की वह रात&#8217;, प्रसव-पीड़ा में &#8216;अर्ध मृत&#8217; वह महिला, उसकी नाभि से जुड़ा &#8216;निष्प्राण&#8217; वह नवजात शिशु और श्रीमती श्यामा देवी का ईश्वरीय अवतरण &#8211; एक समर्पण</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 18 May 2022 04:34:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[किताब]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[gopal]]></category>
		<category><![CDATA[history]]></category>
		<category><![CDATA[humanity]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>ग्राम &#8211; उजान (दरभंगा) : धनपत राय श्रीवास्तव का &#8216;हल्कू&#8217; गरीब किसान &#8216;पूस की उस रात&#8217; में बेहद खुश था। वजह भी था। &#8216;हल्कू&#8217; कर्ज से गर्दन भर डूबा था। उधर मालिक &#8216;सहना&#8217; का कर्जा अलग। हड्डी-पसली कपाने वाली &#8216;पूस की उस रात&#8217; में भी &#8216;हल्कू&#8217; को अपने मालिक का कर्ज चुकाने के लिए खेत [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/book/half-dead-woman-lifeless-newborn-and-the-devine-incarnation-of-smt-shyama-devi">&#8216;पूस की वह रात&#8217;, प्रसव-पीड़ा में &#8216;अर्ध मृत&#8217; वह महिला, उसकी नाभि से जुड़ा &#8216;निष्प्राण&#8217; वह नवजात शिशु और श्रीमती श्यामा देवी का ईश्वरीय अवतरण &#8211; एक समर्पण</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>ग्राम &#8211; उजान (दरभंगा) : धनपत राय श्रीवास्तव का &#8216;हल्कू&#8217; गरीब किसान &#8216;पूस की उस रात&#8217; में बेहद खुश था। वजह भी था। &#8216;हल्कू&#8217; कर्ज से गर्दन भर डूबा था। उधर मालिक &#8216;सहना&#8217; का कर्जा अलग। हड्डी-पसली कपाने वाली &#8216;पूस की उस रात&#8217; में भी &#8216;हल्कू&#8217; को अपने मालिक का कर्ज चुकाने के लिए खेत की रखवाली करना पड़ता था। &#8216;हल्कू&#8217; और उसकी पत्नी &#8216;मुन्नी&#8217; जो भी काम करते है, उसका अधिकांश हिस्सा उसके मालिक के पास जाता है। क्योंकि उधार के पैसे पर ब्याज दर इतनी अधिक थी कि &#8216;हल्कू&#8217; को लगता था कि वह पूरा कर्ज कभी नहीं चुका पाएगा। </strong></p>
<p>काफी मेहनत-मसक्कत करने के बाद &#8216;हल्कू&#8217; तीन रुपये बचा पाया था उस समय। उसे उस पैसे की बहुत जरूरत भी थी &#8211; एक कम्बल खरीदने के लिए। रात में बहुत ठंड लगती थी। &#8216;हल्कू&#8217; की पत्नी इस तीन रुपये को &#8216;सहना&#8217; को तत्काल नहीं देना चाहती थी। घर में अनाज का एक दाना भी नहीं था। एक तो ठंढ और उस पर पेट-पीठ एक। शरीर में उस ठंढ को बर्दाश्त करने की ताकत भी नहीं थी। लेकिन &#8216;हल्कू&#8217; उस पैसे को &#8216;सहना&#8217; को दे देना चाहता था। वह अपनी पत्नी से बारम्बार कह रहा था कि &#8216;रातों में ठंड को बर्दाश्त कर लेंगे, ठंड रातें मालिक की प्रताड़ना से बेहतर हैं,&#8217; और फिर वह तीन रुपये सहना को दे दिया। </p>
<p>अँधेरी और बेहद सर्द रात में &#8216;हल्कू&#8217; धूम्रपान करते हुए खेत पर अपने भाग्य को कोस रहा था। कभी अपने शरीर के बीच अपना चेहरा छुपा लेता था, तो कभी हाथ रगड़ता था, ताकि कहीं से कोई गर्मी प्राप्त हो जाय। उस रात वह मनुष्य और पशु के बीच के सारे भेदों को भुलाकर कुत्ते को अपने बिस्तर पर बुला लिया, उसे गले से लगाया। कुत्ते की शरीर से &#8216;हल्कू&#8217; को थोड़ी गर्मी मिली। लेकिन कुत्ते को खेत में किसी की आहट सुनाई दी और वह खेत की ओर भौंकते दौड़ गया। </p>
<p>&#8216;हल्कू&#8217; अपने भाग्य को कोसते सुबह का इन्तजार कर रहा था। इस बीच बगल के आम के बगीचे से वह आम के सूखे पत्ते लाता है और उसमें आग लगाता है। कुत्ता को भी अपने पास लाता है। कुछ पल ही सही, गर्मी दोनों महसूस करते हैं। ठंड की उस रात में शरीर गर्म होते ही उसकी आखें लग जाती है और इस बीच नील गाय &#8216;सहना&#8217; की खेत पर हमला बोल देती है। कुत्ता अपनी वफ़ादारी निभाता रहता है, भौंकता रहता है; लेकिन &#8216;हल्कू&#8217; का शरीर पूस की उस रात में गर्म होने के कारण जमीन पर ही सही, गहरी नींद में सोया रहता है। </p>
<p>जब सुबह होती है, &#8216;हल्कू&#8217; की पत्नी सम्पूर्ण दृश्य को देखकर उदास हो जाती है। लेकिन &#8216;हल्कू&#8217; मन-ही-मन बहुत खुश था  &#8211; अब उसे पूस की ऐसी पसली में छेद करने वाली रात में &#8216;सहना&#8217; की खेत का रखवाली नहीं करना होगा। अलबत्ता, मेहनत, मजदूरी, मसक्कत करके वह कर्ज चुका देगा। आज से कोई सौ-वर्ष पहले सन 1921 के आस-पास धनपत राय श्रीवास्तव यानी मुंशी प्रेमचंद ने &#8216;पूस की रात&#8217; की इस मार्मिक कहानी को शब्द बद्ध किये थे। एक लाचार मनुष्य की कहानी को समाज के सामने रखे थे। कहानी कृषि और किसानों की थी। आज सौ साल बाद भी किसानों की स्थिति में कोई बेहतर सुधार नहीं हो पाया है। खैर। </p>
<p><strong>मुंशी प्रेमचंद की इस &#8216;पूस की रात&#8217; कहानी के कोई 38-वर्ष बाद दरभंगा जिला के उजान गाँव के कनक पुर टोल में दिवंगत पीताम्बर झा के पुत्र गोपाल दत्त झा के घर में एक बालक का जन्म होता है। जब वह बालक अपनी माँ के गर्भ से महादेव रचित इस संसार में अपना पहला कदम रखता है, वह &#8216;रात भी पूस&#8217; की ही थी। उस रात भी हार-मांस गला देने वाली ठंड नेपाल की तराई वाले हिस्से को दबोचे हुए थी। इधर माँ के गर्भ से उस बच्चे का जन्म होता है और उधर कर्ज में डूबे &#8216;हल्कू&#8217; जैसे उस बालक के पिता की पत्नी प्रसव में मरणासन्न हो जाती है। कई दिनों से प्रसव-काल में उपयुक्त भोजन उसके गले से नीचे नहीं उतरा था। अन्न के अभाव में &#8216;हल्कू&#8217; की पत्नी &#8216;मुन्नी&#8217; से भी बत्तर उस महिला की आर्थिक, सामाजिक स्थिति थी। रात काफी गहरी थी। सन्नाटा चतुर्दिक था। गाँव में, आस-पास के फूस के घरों के दरवाजे बंद थे। सबों के घरों के बाहर दालानों पर घरों की रखवाली करने वाले कुत्तों का परिवार भी &#8216;गर्म-कोना&#8217; ढूंढकर सोया था अपने-अपने बच्चों के साथ।</strong> </p>
<figure id="attachment_4032" aria-describedby="caption-attachment-4032" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji.jpeg" alt="" width="2048" height="1397" class="size-full wp-image-4032" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji-300x205.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji-1024x699.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji-768x524.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji-1536x1048.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji-218x150.jpeg 218w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4032" class="wp-caption-text">विश्व कि सबसे सुन्दर महिला और प्रखर, ओजस्वी पुरुष, मेरे सर्वश्रेठ गुरु &#8211; दिवंगत माता-पिता</figcaption></figure>
<p>लेकिन उस रात प्रसव-पीड़ा से बेहोश हुई उस महिला की एक शुभेक्षु, जो उम्र में तो छोटी थी ही उससे, उसके बहुत बाद बहु बनकर आई थी उस गाँव में, उस परिवार में; परन्तु उस प्रसव वाली महिला से &#8216;अन्तःमन&#8217; से एक ऐसी तार से जुड़ी थी, जो उसे तत्काल सचेत कर रहा था, सजग रख रहा था &#8211; कहीं कोई &#8216;अपसकुन&#8217; न हो जाय। कहीं किसी की साँसे न रुक जाय। डाक्टर डी.स्कॉट नामक मनोवैज्ञानिक ऐसी अवस्था को &#8216;टेलीपैथी&#8217; कहते हैं जब दो मनुष्य &#8216;भावनात्मक&#8217; रूप से एक दूसरे से जुड़े होते हैं, उनके मष्तिष्क में एक &#8216;आतंरिक तरंग&#8217; उत्पन्न होते रहते हैं जो समय विशेष पर प्रकट कर देता है। </p>
<p><strong>सन 1959 में &#8216;पूस की उस रात&#8217; को भी कुछ वैसी ही घटना हुई थी श्रीमती श्यामा देवी @ श्रीमती चन्द्रिका देवी के साथ &#8211; इनके मस्तिष्क में उस प्रसव पीड़ा से ग्रसित महिला के प्रति। अगर उस क्षण यह उपस्थित नहीं होती तो शायद न नवजात शिशु अगला सांस ले पाता और ना ही प्रसव-पीड़ा में अर्ध-मृत हुई वह महिला। माँ की नाभी से जुड़ा (शहरों में लोग एमिकल कॉड कहते हैं) वह बच्चा भी शेष बची सांसों को एमिकल कॉड से जुड़े अपनी माँ के साथ लेते महादेव के शरण में उपस्थित हो जाता &#8211; जीवन की शुरुआत करने से पूर्व ही जीवन का अंत हो जाता। लेकिन जच्चा-बच्चा दोनों महादेव की नजर में था और महादेव श्रीमती श्यामा देवी जी के मष्तिष्क में उस महिला के दर्द के प्रति एक तरंग उत्पन्न कर रहे थे। </strong></p>
<p>फिर अचानक श्रीमती श्यामा देवी उस अर्धमृत जच्चा-बच्चा के सामने प्रकट होती हैं। चिल्लाती हैं, अगल-बगल की महिलाएं कुछ काल बाद उपस्थित होती हैं। अब तक पुरुष समुदाय के लोग भी बाहर एकत्रित हो जाते हैं। श्रीमती श्यामा देवी सर्वप्रथम &#8216;उस बच्चे की नाभी&#8217; काटती हैं, पोछती हैं और फिर अपने स्तन से चिपका लेती है। अब तक कोई आवाज नहीं उस बच्चे के मुख से । अन्य महिलाएं उस महिला को सजग कर, सेवा-शुश्रूषा करती हैं ताकि वह मन और शरीर से जीवित&#8217; हो सके। अचानक श्रीमती श्यामा देवी की स्तन से चिपका वह बच्चा पूस की उस रात की सन्नाटे को चिरता चिल्लाता है। उसकी माँ की सांसे जीवित होती है। खून के सम्बन्ध में श्रीमती श्यामा देवी उस बच्चे की &#8216;भाभी&#8217; है और उसकी माँ &#8216;सास&#8217; &#8211; लेकिन अन्तःमन से सम्बन्ध हृदय का रहा और दोनों जीवन भर श्रीमती श्यामा देवी का ऋणी। आज भी है और जीवन की अंतिम सांस तक रहेगा।&#8221; श्रीमती श्यामा देवी महामहोपाध्याय श्री दिगंबर झा (हमारे पितामह श्री पीताम्बर झा के अपने भाई) के पुत्र श्री महाशय बाबू के पुत्र श्री श्रीमंत बाबू की पत्नी थी। </p>
<p><strong>और वह बच्चा&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8221;मैं ही हूँ।&#8221; </strong></p>
<p>माँ अपनी मृत्यु काल तक कहती रही: &#8216;तुम पहला दूध मनोर की माँ का पिये थे। मैं तो बेहोश थी, मरणासन्न। अगर उस क्षण वह नहीं होती तो न तुम होते और ना ही मैं। वह थी कि हम-तुम जीवित रहे। तुम्हारे जन्म के समय गरीबी अपने उत्कर्ष पर थी। घर में अन्न का दाना नहीं होता था। यही कारण है कि गर्भावस्था में तुम्हें भी भर पेट भोजन नहीं मिल सका, और मैं भी खा नहीं सकी। लेकिन जैसे जैसे समय नजदीक आ रहा था, मन में एक विश्वास का जन्म हो रहा था। जिस रात तुम जन्म लिए वह कहीं भी &#8216;अब घर में जश (यश) होगा और तुम &#8216;जशु (यशु) हो गए। कभी भी वे तुम्हें अपनी संतान से अलग नहीं समझी। तुम उनका हमेशा ऋणी रहोगे।&#8221; हमारी पीढ़ी से पहले की पीढ़ियों में श्रीमती श्यामा देवी अंतिम कड़ी हैं। मैं ह्रदय की गहराई से, अन्तःमन से आपको प्रणाम करता हूँ और महादेव से याचना करता हूँ कि आप स्वस्थ रहे।&#8221;</p>
<figure id="attachment_4033" aria-describedby="caption-attachment-4033" style="width: 720px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3d2a2a16-8db9-4cc1-8e2a-03791d517a81-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3d2a2a16-8db9-4cc1-8e2a-03791d517a81-1.jpg" alt="" width="720" height="1280" class="size-full wp-image-4033" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3d2a2a16-8db9-4cc1-8e2a-03791d517a81-1.jpg 720w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3d2a2a16-8db9-4cc1-8e2a-03791d517a81-1-169x300.jpg 169w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3d2a2a16-8db9-4cc1-8e2a-03791d517a81-1-576x1024.jpg 576w" sizes="auto, (max-width: 720px) 100vw, 720px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4033" class="wp-caption-text">श्रद्धेय, आदरणीय श्रीमती श्यामा देवी जिनके कारण आज मैं जीवित हूँ।</figcaption></figure>
<p><strong>आज मुद्दत बाद भाभी श्रीमती श्यामा देवी जी से बात हुई। उन दिनों हम लोगों के छः घरों का आँगन-बाहर लगभग एक था। बाहर दलान का कुछ हिस्सा भले बांस के जाफ़री से बंटा था, लेकिन आँगन की ओर छोटी-मोटी फूस-बांस की भित्ति जैसी थी, जो खुला ही होता था। गाँव से पूर्णिया के रास्ते पटना की ओर अग्रमुख होने से पहले अपने आँगन से दाहिने कोने पर स्थित अमरुद-हरश्रृंगार के पेड़ के नीचे से सबसे पहले श्री छत्रनाथ झा (श्री महाशय बाबू के सबसे छोटे पुत्र और महामहोपाध्याय श्री दिगंबर झा के पौत्र) के आंगन से श्री श्रीमंत भाई (महाशय बाबू के तीसरे पुत्र और महामहोपाध्याय श्री दिगंबर झा के पौत्र) के आंगन में आते थे।</strong> </p>
<p>इस आँगन के बाएं तरफ एक भित्ति वाला फूस का घर होता था, जिसे हम सभी &#8216;भंसाघर&#8217; अथवा &#8216;पूजाघर&#8217; कहते थे। इसी घर में रहती थी &#8216;मैंयाँ&#8217;, जो महाशय बाबू की पत्नी और मेधानाथ झा @ श्री जयंत बाबू, श्री दीवानाथ झा @ श्रीमंत बाबू, श्री चन्द्रनाथ झा @ श्री नांगर बाबू और श्री छत्रनाथ झा @ श्री छतर बाबू की माँ रहती थी। कद-काठी में दुबली-पतली, कम ऊंचाई की गोरी-चिट्टी महिला हमेशा तत्कालीन बच्चों को आशीष देते नहीं थकती थी। इस आँगन से जुड़ा था श्री जयंत बाबू का आँगन। उस ज़माने में श्री जयंत बाबू के आँगन के बाएं कोने पर (विश्राम घर के बगल में) जो रास्ता उनके गौशाला से बाहर दालान पर और फिर अंदर से श्री चन्द्रनाथ बाबू के घर की ओर जाती थी, एक चापाकल हुआ करता था। वैसे श्री चन्द्रनाथ बाबू (मेरे यज्ञोपवित संस्कार में आचार्य भी थे) के आँगन में भी चापाकल था, लेकिन हम बच्चों के लिए श्री जयंत बाबू के आँगन का चापाकल अधिक पहुँच में था। उसे बार-बार चलाने में बहुत ख़ुशी मिलती थी। </p>
<p>उन दिनों श्री रूप नाथ झा @ श्री मुनाई बाबू, श्री जयंत बाबू और श्री चन्द्रनाथ बाबू के घरों को छोड़कर हम तीन घरों में पानी का इस्तेमाल सामने स्थित उसी ऐतिहासिक इनार (कुआं) से होता था &#8211; चाहे पीने के लिए हो, स्नान के लिए हो, रसोई के लिए हो &#8211; इसी इनार का पानी जीवन-रेखा था। मुद्दत बाद आज श्रीमती श्यामा भाभी कहती हैं: &#8220;हम सभी के घरों में इसी इनार का पानी इस्तेमाल होता था। पानी बहुत मीठा था, आज भी है। आज समय बदल गया है। घरों का रूप-स्वरुप भी बदल गया है। स्वाभाविक है घरों के चहारदीवारी के अंदर चापाकल आ गया है और यह इनार धीरे-धीरे अकेले हो गया है। </p>
<p>उन दिनों इनके घर में जो महिला कार्य करती थी, उसका नाम उसके गाँव के गाम से जुड़ा था। वे &#8216;मझोरा वाली&#8217; के नाम से जानी जाती थी। इसी तरह छत्रनाथ बाबू के घर में कार्य करने वाली का नाम था &#8216;कुरसो वाली&#8217; और श्री जयंत बाबू के घर कार्य करने वाली एक वृद्ध महिला थी &#8216;डोमा माय&#8217; &#8211; सबसे बड़ी बात यह थी कि उन सभी महिलाओं को इतना अधिकार था कि वे हम बच्चों को कान पकड़कर दो थप्पड़ रसीद दे और कोई भी, किसी के माता-पिता भी नहीं, चूं शब्द भी नहीं करते थे । लेकिन कभी ऐसा मौका नहीं मिला &#8211; न उसे और न हम लोगों को।  </p>
<p>माँ कहती थी उन दिनों हमारे पुवारिया घर का आँगन के तरफ का बरामदा की ऊंचाई आँगन की सतह से बहुत कम थी। एक सुबह उसी बरामदे पर लेटकर, जिसमें माँ का पैर का हिस्सा आँगन में था, माँ मुझे दूध पीला रही थी। तभी एक विशाल काय &#8216;धामन सांप&#8217; माँ के पैर पर चढ़ते, मुझे लांघते, माँ के स्तन को स्पर्श करते आगे की ओर निकल गया। कहते हैं धामन सांप औसतन महिलाओं की दूध पीते उसे मृत्यु को भी प्राप्त करा देता है। उस क्षण माँ की स्थिति क्या हुई थी यह अपनी अंतिम सांस तक नहीं बता पायी। उस घटना के कई दशक तक, याद करते उसके रोंगटे खड़े हो जाते थे। मृत्यु से कुछ माह पहले माँ उस घटना को फिर दोहराई थी और रोने लगी। कहती थी उस दिन मुझे कुछ हो जाता, कोई बात नहीं, लेकिन अगर सांप तुम्हे कुछ कर देता तो मैं कैसे जी पाती। मैं हँसते हुए कहता था: : मेरा ना शिव है, फिर सर्प मुझे क्यों काटेगा?&#8221; और माँ हंस दी थी। </p>
<p>कोई बारह वर्ष पहले, 2010 में, जिस वर्ष माँ अपनी अनंत यात्रा पर निकली थी, गाजियाबाद स्थित घर में दरवाजे पर खड़ी होकर गाँव जाने की ज़िद कर रही थी। बड़े भाई गाँव में एक बहुत बेहतरीन घर बनाये हैं। मैं उन्हें बार-बार मना कर रहा था।  वह बार-बार कह रही थी &#8216;अगर मृत्यु को भी प्राप्त की तो उसी स्थान पर मरना चाहूंगी जहाँ मैं आयी थी। इस शब्द को सुनकर मुझे हंसी आ गयी। वह हँसते मेरी हंसी का कारण पूछी। </p>
<p><strong>उसे देखते मैंने कहा: मैं अपने पिता का संतान हूँ, उनके भाईयों &#8211; भतीजों का चहेता हूँ जो तंत्र विद्या में महारथ थे। तुम्हारी अंतिम यात्रा उसी स्थान से होगी जहाँ तुम अभी खड़ी हो। समय यही कहता है। तुम विश्व के किसी भी कोने में रहोगी, बाबूजी के पास जाने के लिए, अपने शुभेक्षुओं के पास पहुँचने के लिए, अपने माता-पिता के पास पहुँचने के लिए तुम्हे अपनी यात्रा की शुरुआत इस स्थान से करनी होगी, जहाँ तो अभी खड़ी हो। इस प्रारब्ध को कोई नहीं टाल सकता है। तुम लिख लो।&#8221; माँ मुस्कुरा दी। </strong></p>
<p>जून के महीने में माँ गाँव की ओर कूच की थी। अगस्त में गाँव में उसकी तबियत ख़राब हुई। हृदयाघात का शिकार हुई। मोहन बाबू, बेचन बाबू सभी उसे उसी क्षण मधुबनी लाये। सरकारी अस्पताल की स्थिति नारकीय थी। डाक्टर के स्थान पर &#8216;सुवर&#8217; मरीजों के वार्ड में चार-पांच बार हाल-चाल पूछने सपरिवार आते थे। लाखों मच्छर-कीड़े-मकोड़े भी अस्पताल में अपना साम्राज्य बना लिए थे। देश आज़ाद था। </p>
<p>माँ की सबसे प्रिय भाई और शिक्षक श्री जीवनाथ मिश्र (श्री जीबू बाबू, लालगंज) माँ को देखने आये। माँ की चौथी बेटी ममता मधुबनी में सपरिवार उसकी सेवा में समर्पित थी। अगली दिन मां दिल्ली की ओर रवाना हुई। उसके छोटे पुत्र और मैं साथ थे। सबों को सूचना दे दिया गया था अगर रास्ते में कुछ होता है तो हम बनारस की ओर प्रस्थान कर जाएंगे। लेकिन विधि का विधान तो निश्चित था। गाजियाबाद स्टेशन पर उसके बड़े पुत्र और गाँव के उसके बच्चे-बुतरू उसकी प्रतीक्षा में थे। यहाँ अस्पताल में भर्ती हुई। पांच दिन के बाद डाक्टर के अंतिम शब्द &#8220;घर ले जाएँ और सेवा करें&#8221; &#8211; अंतिम सूचना पर परिचायक था। यह सूचना &#8216;शिक्षक दिवस&#8217; के दिन की थी। कुछ सप्ताह बाद जितिया का पारण था। इस जिस दिन भारत की कोई माँ व्रत तोड़ती है, जिसे वह अपने बच्चों की हिफाजत के लिए रखती है &#8211; पारण के दिन। माँ को गढ़मुक्तेश्वर में गंगा को साक्षी मानकर मुखाग्नि दिया गया। उसका व्रत टूटा और वह अग्नि के रास्ते अपने पति के पास पहुँचने के लिए यात्रा की शुरुआत की। जाते समय उसके चेहरे पर तेज था। अपने संतान से हर माता-पिता हारना चाहता है &#8211; माँ हारकर भी जीत गयी। </p>
<p><strong>समय बीत रहा था। हम सभी तत्कालीन बच्चे भी बड़े हो रहे थे। शिक्षा हेतु स्थानीय उजान मिडिल स्कूल में नामांकन लिया। श्रीमंत बाबू के पुत्रों में चौथा और पांचवा पुत्र &#8211; श्री सेतु नाथ झा (भूंनी) और श्री होत्रीनाथ झा (गुन्नी) &#8211; उम्र में कुछ छोटा होने के बाद भी अन्तःमन से एक-दूसरे के प्रति बहुत समर्पित थे। उन सबों के घरों में चावल की खेती, अरहर की खेती बहुत अधिक होती थी, स्वाभाविक है घर में चावल का खपत भी बहुत अधिक था। हमारे घर की आर्थिक स्थिति धनपत राय के &#8216;हल्कू&#8217; और &#8216;मुन्नी&#8217; से भी बत्तर थी। चावल (भात) या अरहर दाल  मुद्दत हो जाया करता था। </strong></p>
<figure id="attachment_4035" aria-describedby="caption-attachment-4035" style="width: 2000px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1.jpg" alt="" width="2000" height="1500" class="size-full wp-image-4035" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1.jpg 2000w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2000px) 100vw, 2000px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4035" class="wp-caption-text">विगत दिनों गाजियाबाद स्थित घर पर मिट्टी की कियारी में मिट्टी खनते समय खुर्पी बारम्बार एक ठोस पदार्थ से टकरा रही थी। धीरे से निकला तो शिवलिंग नुमा दिखा। मैं उसे माँ के द्वारा स्थापित कोई 22-वर्ष पुराना बरगद के वृक्ष के नीचे स्थान सुरक्षित कर दिया &#8211;  हे महादेव !!!</figcaption></figure>
<p>अक्सरहां स्कूल में हम सभी अपना-अपना टिफ़िन बदल लेते थे। बदलने की शुरुआत भुन्नी करता था। उसके टिफ़िन में चावल की रोटी और अन्य स्वादिष्ट पकवान होता था, जबकि मुझे मेरी माँ मकई, गेहूं की रोटी देती थी साथ में कुछ सब्जियां। आज जब श्रीमती श्यामा भाभी से इस बात का जिक्र किया तो &#8216;कुछ पल वे रुक गई। आवाज नहीं आने के बहाने से शायद फोन को होल्ड पर रख दीं। मेरा गला भी अवरुद्ध था। उन दिनों का दृश्य आँखों के सामने था। फिर कहती है: तुमको सभी बातें याद है यह फक्र की बात है। फिर माँ की तरह कहती है की सब समय है। समय प्रत्येक पल परीक्षा लेती है। उस दिन भी लेती थी। लेकिन तुम सभी तैयार रहते थे। आज का जीवन उसी परीक्षा का परिणाम है।&#8221;</p>
<p>उन दिनों जब हम अपने घर से सीधा श्री चन्द्रनाथ बाबू के घर के सामने से होते दाहिने हाथ मुख्य मार्ग पर पहुँचते थे &#8211; जहाँ से दाहिने हाथ शंकरी पोखर की ओर और बाएं गऊटोली होते एक रास्ता (कलमबाग-खेत होते) लोहना रोड स्टेशन की ओर और बाएं अपने मिडिल स्कूल की ओर जाती थी, इसी नुक्कड़ पर दाहिने हाथ एक विशालकाय परिसर में घर था। यहाँ &#8216;दाई मैंय्या&#8221; रहती थी। &#8216;दाई मैंय्या&#8217; श्रीमंत बाबू चारो भाइयों के पिता श्री महाशय बाबू की दूसरी माँ थी। गाँव में &#8216;सतमाय&#8217; कहते हैं। &#8216;दाईं मैंयाँ&#8217; के घर के ठीक सामने सड़क के बाए हाथ एक और वृद्ध विधवा का घर था। हम सभी इन्हे &#8216;काकी-मौसी&#8217; कहते थे। काकी-मौसी हमारे पितामह श्री पीताम्बर झा के भाई नीलाम्बर झा के प्रथम पुत्र की विधवा थी। नीलाम्बर झा के दूसरे पुत्र प्रोफेसर रूप नाथ झा जो न्यायशास्त्र, धर्मशास्त्र, दर्शनशास्त्र और ज्योतिषी के प्रखंड विद्वान थे। वे मिथिला रिसर्च इन्स्टीट्यूट दरभंगा में कुछ समय तक शास्त्रचूडामणि के प्राध्यापक भी थे। लगभग 46-वर्ष पहले, यानी जून 25, 1976 को इनका शरीर पार्थिव हो गया। </p>
<p>आज मुद्दत बाद बाबूजी याद आ गए जब श्री रुपनाथ झा (श्री मुनाई बाबू), जो उनके तंत्र-मन्त्र विद्या के गुरु और आचार्य  भी थे, एक दिन उन्हें दण्डित भी किये थे। मुद्दत पहले जब बाबूजी इस विद्या में महारथ हासिल किये था। एक दिन सत्यनारायण भगवान की पूजा हेतु धोती रंगकर बाहर सूखने दिए थे। घर में कार्य करने वाली एक महिला उस धोती को लेकर चली गयी। पूजा के समय धोती नहीं मिलने पर वे सीधा उस महिला के घर पहुंचे और धोती के बारे में पूछताछ किये। वह महिला नकार गयी। क्रोधित बाबूजी उसे बार-बार कह रहे थे कि धोती दे दो अन्यथा वह तुम्हारे साथ ही जाएगी। ऐसा ही हुआ। </p>
<p>बाबूजी क्रोधित अवस्था में अपने विद्या का प्रयोग किये। उसकी मृत्यु के बाद धोती उसी के घर से निकला। यह बात जब उनके भाई, जो गुरु भी थे, सुने, उन्हें दंड-स्वरुप अपना ही थूक चाटने का आदेश दिया। बाबूजी &#8216;ना&#8217; नहीं कह सकते थे। फिर एक चेतावनी भी दिए &#8211; जीवन में अपनी विद्या को सकारात्मक कार्यों में लगाना और याद रखना अगर तुम ऐसा करोगे तो जिस दिन मैं &#8211; यानी तुम्हारा बड़ा भाई और गुरु &#8211; जाऊंगा उसी दिन कामाख्या देवी का पट खुलेगा, सालाना पर्व के बाद। मेरी मृत्यु के 16-वर्ष बाद, उस तारीख से दो दिन पूर्व तुम अपनी यात्रा शुरू करोगे और उस दिन कामाख्या देवी का पट बंद रहेगा और बंदी का मध्य-दिवस रहेगा। ऐसा ही हुआ।  बाबूजी 23 जून, 1992 को उनके पास पहुंचे। माँ कामाख्या का पट्ट प्रत्येक वर्ष 22-23 और 24 जून का बंद रहता है स्वाजला पर्व के लिए। </p>
<p>बहरहाल, विगत दिनों अपने घर के सामने स्थित को दो-सौ साल पुराना इनार की कहानी लिखने के बाद, दरभंगा के अतिरिक्त नागपुर के एक विद्वद्जन का फोन आया कि वे उजान गाँव के कनकपुर टोल के उस इनार को पुनः जीवित करना चाहते हैं। नागपुर वाले महानुभाव का कहना है कि वे महादेव के अनन्य भक्त है और उनका विश्वास है कि उस क्षेत्र में महादेव के सर्प, गण अवश्य रहे होंगे, होंगे आज भी। उनका कि आज के समय में सरकारी-गैर सरकारी स्त्रोतों से एक और जहाँ पानी का स्त्रोत सामाजिक न रहकर &#8216;व्यक्तिगत&#8217; हो रहा है, जीव-जंतुओं को पीने के लिए पानी की उपलब्धिता नगण्य होती जा रही है। वैसी स्थिति में उस शताब्दी पुराने कुएं को अगर जीवित किया जाता है तो एक ओर जहाँ प्राकृतिक पुरात्तव जीवंत होगा, वहीँ हम मूक-बधिर जीव-जंतुओं के साथ भी न्याय कर  पाएंगे। </p>
<p><strong>आज श्रीमती श्यामा देवी, यानी हमारी पीढ़ी के बच्चों की भाभी, उस पीढ़ी की इकलौती माँ है, महिला है। पंडित लोक नाथ झा यानी लान्हि झा के चार पुत्रों &#8211; महामहोपाध्याय श्री दिगम्बर झा, वैयाकरण श्री पीताम्बर झा, महामहोपाध्याय श्री नीलाम्बर झा, पंडित श्री सीताम्बर झा और एक कन्या महामहोपाध्याय बालकृष्ण मिश्र तथा मही मिश्र की माँ श्रीमती कर्पूरी मिश्राइन &#8211; परिवार की इकलौती चिराग है जो सबों के सर पर आशीष और स्नेह का हाथ रखने का सामर्थ रखती हैं। महामहोपाध्याय श्री दिगम्बर झा की अगली पीढ़ियों में काशी के विद्वान महामहोपाध्याय श्री महाशय झा की मृत्यु आषाढ़ शुक्ल अष्टमी 1952 को हुआ। </strong></p>
<p>महाशय बाबू के अपने बेमातर भाई श्री दया नाथ झा यानि बंसन्त बाबू और उनकी पत्नी मुद्दत पहले मृत्यु को प्राप्त किये। उन्हें पुत्र नहीं था। महाशय बाबू को चार पुत्र था &#8211; श्री मेधा नाथ झा (श्री जयंत बाबू), श्री दीवा नाथ झा (श्री श्रीमंत बाबू), श्री चन्द्र नाथ झा (श्री नांगर बाबू) और श्री छत्र नाथ झा (श्री छतर बाबू) &#8211; ये सभी आज परमात्मा के पास उपस्थित हैं अपनी-अपनी अर्धांगिनियों के साथ। श्री जयंत बाबू के पुत्र श्री योगेश्वर झा (श्री बेचन झा) हैं। श्री श्रीमंत बाबू के पांच पुत्र हुए &#8211; श्री भीम नाथ झा (श्री मोहन बाबू), श्री सोम नाथ झा (श्री लाल बाबू), श्री जगन्नाथ झा (श्री जोहन बाबू), श्री सेतु नाथ झा (श्री भुन्नी बाबू) और श्री होत्री नाथ झा (श्री गुन्नी बाबू) &#8211; इसमें पांचों की अगली पीढ़ी और उसके आगे की पीढ़ियां श्रीमती श्यामा देवी की आशीष से बढ़ रही हैं। इन पांच भाईयों में श्री भीमनाथ झा विगत वर्ष अपने इष्टदेव के पास पहुँचने के लिए यात्रा की शुरुआत कर लिए। </p>
<p>श्री चन्द्रनाथ झा के तीन पुत्र हुए &#8211; श्री महेंद्र नाथ झा (श्री भोगन बाबू), श्री देवेंद्र नाथ झा (श्री चुनचुन बाबू) और श्री कला नाथ झा (श्री मिहिर बाबू) &#8211; आज सभी स्वस्थ हैं और उनकी अगली और आगे की पीढ़ियां श्रीमती श्यामा देवी के आशीष से बढ़ रही है। श्री चन्द्रनाथ बाबू और उनकी पत्नी अब इस संसार में नहीं हैं। महाशय बाबू के सबसे छोटे पुत्र श्री छत्र नाथ झा भी अब इस संसार में नहीं हैं। श्री छत्र नाथ झा के चार पुत्र हुए &#8211; श्री सुशील कुमार झा, श्री सुधीर कुमार झा, श्री सुनील कुमार झा और श्री अनिल कुमार झा। ईश्वर श्री सुनील को अपने पास बुला लिए। मैं दिल्ली में उस क्षण उपस्थित था अपने छोटे भाई के साथ। शेष सभी श्रीमती श्यामा देवी की आशीष से फल-फूल रहे हैं।  </p>
<p>श्री पीताम्बर झा के एक पुत्र श्री गोपाल दत्त झा और श्री गोपाल दत्त झा के तीन पुत्र &#8211; श्री काशीनाथ झा, श्री शिवनाथ झा, श्री गंगा नाथ झा और पांच बेटी। आज श्री गोपाल दत्त झा, उनकी पत्नी श्रीमती राधा देवी और उनकी चार बेटियां इस पृथ्वी पर नहीं हैं। गोपाल दत्त झा के तीनों पुत्रों की अगली पीढ़ी अपने-अपने शैक्षिक क्षेत्रों में अग्रसर हैं। महामहोपाध्याय न्यायिक पंडित नीलाम्बर झा के दूसरे पक्ष में दो बालक थे &#8211; न्याय प्रवर श्री रसिक नाथ झा और न्याय प्रवर प्रोफ़ेसर रूप नाथ झा। श्री रसिक नाथ झा की मृत्यु बहुत पहले हो गयी थी और श्रीमती काकी मौसी उन्हीं की विधवा थीं। पंडित रूप नाथ झा के एक पुत्र श्री श्यामनन्द झा (श्री शास्त्री) हुए। श्री शास्त्री जी ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में पुस्तकालय में थे। आज श्री रूप नाथ झा और श्री शास्त्री जी नहीं हैं। परन्तु इनकी अगली पीढ़ी के वंशज अपने-अपने क्षेत्रों में अग्रसर हैं।</p>
<p>अंततः, आज महामहोपाध्याय श्री दिगम्बर झा, वैयाकरण श्री पीताम्बर झा, महामहोपाध्याय श्री नीलाम्बर झा, पंडित श्री सीताम्बर झा के चौथी-पांचवी-छठी पीढ़ियों के वंशज  पूर्वजों के आशीष से खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं। हमें  विश्वास है कि त्रिनेत्रधारी महादेव सभी महात्मनों को, उनकी अर्धांगिनियों को अपने शरण में स्थान दे दिए होंगे। मुझे यह भी आशा है की महादेव उन महात्मनों के समय का बनाया हुआ इनार भी आने वाले  समय में जीवित हो जायेगा। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/book/half-dead-woman-lifeless-newborn-and-the-devine-incarnation-of-smt-shyama-devi">&#8216;पूस की वह रात&#8217;, प्रसव-पीड़ा में &#8216;अर्ध मृत&#8217; वह महिला, उसकी नाभि से जुड़ा &#8216;निष्प्राण&#8217; वह नवजात शिशु और श्रीमती श्यामा देवी का ईश्वरीय अवतरण &#8211; एक समर्पण</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>पटना का &#8216;डाक बंगला चौराहा&#8217; और &#8216;जेपी का आंदोलन&#8217; कईयों को &#8216;फोटोग्राफर&#8217; से &#8216;फोटो जर्नलिस्ट&#8217; बना दिया (#फोटोवाला श्रृंखला-12)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/interview/patna-dakbungalow-makes-photographers-to-photojournalists</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 02 Sep 2021 11:35:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इंटरव्यू]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना : सत्तर के दशक में पटना में डाक बंगला चौराहे के दाहिने कोने पर स्थित सत्कार होटल के नीचे खड़ा होना, उस विशाल भवन के सतही-तल्ले पर बाएं तरफ रीडर्स कॉर्नर से किताब, दिल्ली वाला अखबार, पत्रिका खरीदना; इस भवन से कोई दस कदम आगे चलकर भारत कॉफी हॉउस में मसाला डोसा खाना या [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/interview/patna-dakbungalow-makes-photographers-to-photojournalists">पटना का &#8216;डाक बंगला चौराहा&#8217; और &#8216;जेपी का आंदोलन&#8217; कईयों को &#8216;फोटोग्राफर&#8217; से &#8216;फोटो जर्नलिस्ट&#8217; बना दिया (#फोटोवाला श्रृंखला-12)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना : सत्तर के दशक में पटना में डाक बंगला चौराहे के दाहिने कोने पर स्थित सत्कार होटल के नीचे खड़ा होना, उस विशाल भवन के सतही-तल्ले पर बाएं तरफ रीडर्स कॉर्नर से किताब, दिल्ली वाला अखबार, पत्रिका खरीदना; इस भवन से कोई दस कदम आगे चलकर भारत कॉफी हॉउस में मसाला डोसा खाना या कॉफी पीना पटना के तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में &#8220;गर्व&#8221; और &#8220;गौरव&#8221; की बात होती थी। उसी सड़क पर स्टेशन की ओर कोई 500 कदम आगे पिंटू होटल की &#8216;ब्रुक-बॉन्ड पत्ती&#8221; की चाय और &#8220;सफ़ेद सगुल्ला&#8221; मगध की राजधानी की गरिमा में गिनी जाती थी। अगर पतलून के पिछवाड़े वाले जेब में, अथवा देशी-विदेश बटुआ में, भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर लक्ष्मीकांत झा द्वारा हस्ताक्षरित कागज के टुकड़ों की मोटाई होती थी; तो डाक बंगला रोड चौराहे से दाहिने हाथ एग्जिविशन रोड की ओर जाने वाली सड़क के ठीक बाएं कोने पर स्थित लखनऊ स्वीट हॉउस या इस दूकान के प्रवेश द्वार से 135 डिग्री कोण पर स्थित पाल स्वीट्स की दूकान से सफ़ेद रसगुल्ला या छेना वाला कोई भी मिठाई खाने, या फिर उसे बंधवाकर घर, परिवार, परिजनों, मित्रों के लिए ले जाना &#8211; सामाजिक संभ्रांतों की सूची में सबसे ऊपर नाम दर्ज होता था। लोग बाग़ डब्बे पर लिखा नाम देखकर ही कुर्सी आगे कर देते थे। </strong></p>
<figure id="attachment_3381" aria-describedby="caption-attachment-3381" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5.jpg" alt="" width="1280" height="853" class="size-full wp-image-3381" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/5-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3381" class="wp-caption-text">चंद्रशेखर का नमन स्वीकार करें जय प्रकाश जी</figcaption></figure>
<p>यह अलग बात थी कि उन दिनों भी बेली रोड स्थित डॉ जगन्नाथ मिश्र वाले इण्डियन इंस्टीच्यूट ऑफ़ बिजनेस एंड पर्सनल मैनेजमेंट शैक्षणिक ससंस्थान के दाहिने हाथ बोरिंग रोड चौराहे की ओर जाने वाली सड़क और चौराहे के दाहिने तरफ कोने पर भी पॉल स्वीट्स की दूकान हुआ करती थी; परन्तु डाक बंगला की बात ही कुछ और थी। उन दिनों घर के छोटे-छोटे बच्चे तो इस दूकान से मिठाई खा लेते थे, लेकिन जब &#8220;मिष्ठान&#8221; खाने की बात होती थी, तब क्या बोरिंग रोड, क्या बोरिंग केनाल रोड, क्या पाटलिपुत्र कालोनी, क्या राजवंशी नगर, क्या गर्दनीबाग &#8211; सभी डाक बंगला की ओर ही उन्मुख होते थे। डाक बंगला चौराहे की बात ही कुछ और थी। चाहे लखनऊ स्वीट हॉउस हो या पाल स्वीट्स, शीशे के अंदर रखी बेहतरीन मिष्ठानों की अधिकतम कीमत अठन्नी भी नहीं होती थी। छेना वाला सफ़ेद रसगुल्ला की कीमत महज 20 पैसे हुआ करता था। यह बात भी अलग थी कि पटना की आवादी सत्तर के दशक के प्रारम्भिक वर्षों से मध्य तक सात लाख भी नहीं थी, लेकिन तत्कालीन समाज के आम लोगों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी की लखनऊ स्वीट हॉउस या पाल स्वीट्स से मिष्ठान खरीद पाते। औसतन एक हज़ार में पांच से दस लोग ही मिष्ठान खरीद पाते थे। शेष हम लोग जैसा व्यक्ति दो वक्त की रोटी, गुड़ और मसूर दाल के लिए उस दिन भी जेद्दोजेहद करते थे, आज भी करते हैं। अब सभी तो रामानंद तिवारी, डॉ जगन्नाथ मिश्र, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, नीतीश कुमार तो हो नहीं सकते। यह चौराहा कितने &#8220;कुकुरमुत्तों&#8221; की तरह &#8220;सफ़ेद-सफ़ेद&#8221; वस्त्र पहनने वालों को नेता बना दिया, तो वहीँ क्लिक-क्लिक करने वाले राष्ट्रीय स्तर के फोटोग्राफर बन गए। </p>
<figure id="attachment_3382" aria-describedby="caption-attachment-3382" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17.jpg" alt="" width="1280" height="852" class="size-full wp-image-3382" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/17-768x511.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3382" class="wp-caption-text">सहरसा-मधेपुरा के लिए रवाना होने राजीव</figcaption></figure>
<p>संध्याकाल इधर घड़ी की सूई साढ़े पांच बजे घड़ी की बड़ी सूई छोटी सूई पर चढ़ाई करती थी, उधर पटना के संभ्रांत लोग, उनका परिवार सच-धज कर, इत्र-परफ्यूम छिड़ककर डाक बंगला चौराहे के इर्द-गिर्द दिखाई देने लगते थे। लखनऊ स्वीट हॉउस के तरफ ही एग्जिविशन रोड की ओर उन्मुख होने पर कुछ दुकानों के बाद एक दर्जी की दूकान थी। सिलाई दूकान में वस्त्र नापने वाले से लेकर सिलाई करने वाले तक, सभी पटना के अन्य सिलाई-दुकानों के कारीगरों से बिलकुल अलग होते थे। उनकी प्रतिष्ठा, शानो-शौकत वैसे ही हुआ करता था जैसे अनपढ़-गवाँर-जाहिल क़स्बा में एक सांस में दो से 19 तक पहाड़ा गिनने वाला। यहाँ पुरुषों के वस्त्रों की सिलाई नहीं होती थी। पुरुष कारीगर &#8220;महिलाओं के वस्त्रों&#8221; को सिलने में माहिर थे। </p>
<p>डाक बंगला चौराहे के दाहिने कोने पर &#8220;शंकर पानवाला&#8221; सुबह आठ बजे से देर रात 12 बजे तक सपरिवार सुबह पाली से लेकर दोपहर पाली के रास्ते रात्रि पाली तक अपनी &#8211; अपनी ड्यूटी बजाते थे। हंसमुख चेहरा बाप-बेटा सबों का। जो दूकान में काम भी करता था, उसकी मुस्कान भी मगही पान जैसा सुगन्धित होता था। उन दिनों पटना की पान खाने वाली संभ्रांत महिलाएं भी पान की दूकान पर कहीं-कहीं दिखती थी। अन्यथा वे भी सड़क और समाज का सम्मान करती थी, और सड़क तथा समाज भी उनका अन्तःमन से, ह्रदय से सम्मान करता था। जो रास्ता बेली रोड की ओर जाती थी, आगे कुछ कदम दाहिने हाथ एक पेट्रोल पम्प हुआ करता था और बाएं हाथ तत्कालीन डाक बंगला का बाउंड्री वाल होता था। इस बाउंड्री वाल पर पटना के लोग, नेतागण, रिक्शावाला, पैदल यात्री, छोटे-छोटे व्यापारी, जो सड़क पर अपने जूते रगड़ कर आगे बढ़ रहे थे, किसी भी समय &#8216;लघु शंका&#8217; से मुक्त होने में देरी नहीं करते थे। इस बाउंड्री वॉल के अंदर पीले रंग के खपड़ैल वाला ब्रितानिया सरकार के ज़माने में बना डाक बंगला में बिहार के अन्य क्षेत्रों से, जिलों से आये नेतालोग, अधिकारीगण शरणागत होते थे। गजब का मौहौल था उन दिनों। </p>
<figure id="attachment_3383" aria-describedby="caption-attachment-3383" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23.jpg" alt="" width="1280" height="853" class="size-full wp-image-3383" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/23-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3383" class="wp-caption-text">वो सरकार निकम्मी है</figcaption></figure>
<p>आज लोग सोच नहीं सकते हैं। आज जैसे ही युवकों को, युवतियों को कहते हैं कि यहां एक डाक बंगला हुआ करता था। उस डाक बंगला के पीछे खाली मैदान नुमा स्थान था। एक रास्ता बन्दर बगीचा के रास्ते एक महिला कालेज की ओर उन्मुख होता था। आज जहाँ विशालकाय गगनचुम्बी ईमारतें खड़ी हैं, कल पटना के लोग भाग, संभ्रांतों के साथ, कुछ खड़े, कुछ बैठकर &#8220;लघुशंका&#8221; से मुक्त हुआ करते थे। रात्रि के अँधेरे में दीर्घशंका से भी मुक्ति पाते थे। उन दिनों तक दिल्ली के पालम वाले बिंदेश्वर पाठक वाला सुलभ शौचालय का अभ्युदय नहीं हुआ था। पटना के लोगों की न तो सोच बदला था और न शौचालय। आज उसी स्थान पर पटना के संभ्रांत खड़े-खड़े &#8220;गोलगप्पा&#8221; खाते हैं, &#8220;चीन-निर्मित&#8221; खाने के अनेकानेक व्यंजनों का आनंद लेते हैं।  </p>
<p>आज के लोग बाग़ शायद नहीं जानते होंगे अथवा जानते भी होंगे तो अगली पीढ़ी को बताने में संकोच करते हैं कि बैद्यनाथ मिश्र यानी नागार्जुन, रामधारी सिंह &#8216;दिनकर&#8217; और फणीश्वर नाथ &#8216;रेणु&#8217; फोटोग्राफी के बहुत शौक़ीन थे। और पटना का यह डाक बंगला चौराहा उन लोगों के लिए एक पसंदीदा स्थान हुआ करता था। तत्कालीन समाज में, खासकर पटना के फोटोग्राफर उन्हें बहुत पसंद करते थे और ये त्रिमूर्ति भी छायाकारों को बहुत चाहते थे। रेणु जी ने तो साठ और सत्तर के ज़माने और उससे पहले के एक छायाकार मित्र सत्यनारायण दूसरे जी के क्रियाकलापों का अनेकों बार अपनी रचनाओं में उद्धृत किये थे। नागार्जुन और रेणु जी जब भी उन दिनों डाक बंगला कोने पर, तत्कालीन आर्यावर्त-इण्डियन नेशन के छायाकारों को देखते थे, राजीव सहित, मन में एक इक्षा दोनों को अवश्य होतो थी की एक तस्वीर हो जाए। आज भी पटना के उन दिनों के छायाकारों के पास दिनकर, नागार्जुन और रेणु की असंख्य तस्वीरें होंगी। दिनकर जी का देहावसान 24 अप्रैल, 1974 को हुआ जबकि रेणु जी 11 अप्रैल, 1977 को और नागार्जुन 5 नबम्बर, 1998 को ईश्वर के शरणागत हुए।  उन दिनों आर्यावर्त-इण्डियन नेशन सम्पादकीय विभाग में संपादक से लेकर सम्पादकीय विभागों तक, सभी लोग विद्वान तो होते ही थे, आत्मीयता और आत्मसम्मान भी उत्कर्ष पर था। और इन तीन विद्वानों को और क्या चाहिए। समय समय पर वे इस दफ्तर में अवश्य आते थे। खासकर नागार्जुन।  </p>
<figure id="attachment_3384" aria-describedby="caption-attachment-3384" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26.jpg" alt="" width="1280" height="853" class="size-full wp-image-3384" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/26-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3384" class="wp-caption-text">बिहार  की जनता और लालकृष्ण आडवाणी</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, समय बदल रहा था। आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, कृषि, विज्ञान आदि के क्षेत्रों में आधारभूत प्रतिवर्तन हो, प्रदेश के लोग बाग़, गरीब-गुरबा का जीवन भी हंसमुख हो, रिक्शावाले को, जूता सिलने वाले को, कपड़ा सिलने वाले को भी भर पेट भोजन मिले, उसके बच्चे भी विद्यालय जायँ; इसके बारे में पटना के लोग, बिहार के लोग, विद्वान-विदुषी, नेता भले नहीं सोचें; लेकिन सबों के मानस-पटल पर पटना के बेली रोड से दिल्ली के राजपथ तक यह अवश्य था की देश में राजनितिक सत्ता के गलियारे में जो बैठे हैं, उन्हें उठाकर बाहर फेक दिया जाय। जो कल तक उस गलियारे का हिस्सा थे, उस दिन झंडा लेकर विरुद्ध में खड़े हो गए थे। स्वाभाविक है प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों की गद्दीदार कुर्सियां किसे नहीं अच्छी लगेगी। बिहार के तत्कालीन नेता अपने-अपने कपाल को तो साफ़ कर ही रहे थे, अपने-अपने पिछवाड़े के वस्त्र को भी उन कुर्सियों के उपयुक्त बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। बिहार के लोगों में यह आम बात होती है। </p>
<p>सन चौहत्तर की क्रांति की शुरुआत हो गयी थी। विद्यालय से महाविद्यालय तक, बिहार विद्यालय परीक्षा समिति से पटना, मगध, बिहार विश्वविद्यालय तक आंदोलन के बिगुल का आवाज पहुँच गया था। एक ओर छात्राएं अपने-अपने घरों में सीमित हो गयी थी, वहीँ दूसरी ओर &#8216;राजनीति में अपना-अपना जीवन संवारने वाले, प्रदेश तत्कालीन नेतागण अपने घरों को भरने के लिए सड़क पर उतर गए थे। कोई मूंछ-दाढ़ी कटा रहे थे तो कोई मूंछ &#8211; दाढ़ी को अपनी पहचान का मन्त्र मान रहे थे। अगर भारत के निर्वाचन आयोग के दफ्तर में तत्कालीन नेताओं द्वारा पेश किये गए आर्थिक दस्तावेजों की तुलना विगत लोक सभा और विधान सभा के दस्तावेजों से कर लें, खुद को संतुष्ट कर लें की उनकी सम्पत्तियों में कितना इजाफ़ा हुआ है, मतदाता तो वहीँ का वहीँ है । जो उस समय बिहार के वेटेनरी कालेज के चपरासी क्वाटर्स में रहते थे, आज कितने भवनों के मालिक हैं। जो उस समय गांधी मैदान स्थित भारतीय स्टेट बैंक में पैसे की निकासी के लिए पंक्तिबद्ध होते थे, आग बैंकों के अध्यक्ष घर पर पेटियां पहुंचते हैं। ऐतिहासिक गांधी मैदान की घास को पटना के ही लोग अपने अपने पैरों तले उसे दफना रहे थे। </p>
<figure id="attachment_3385" aria-describedby="caption-attachment-3385" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2.jpg" alt="" width="1280" height="852" class="size-full wp-image-3385" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/6-2-768x511.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3385" class="wp-caption-text">आडवाणी, जाबिर हुसैन और आर के सिन्हा<br /></figcaption></figure>
<p>अब तक जून का महीना आ गया था और साल था सन चौहत्तर। पांच जून, 1974 को गांधी मैदान में एक सभा हुई। मंच पर जय प्रकाश नारायण थे और कर्पूरी ठाकुर भी थे। विगत तीन दशकों से बिहार की सत्ता के गलियारे में जो राज किये, कर रहे हैं, सभी वहां &#8220;चवन्नी छाप&#8221; नेता के रूप में, मैले-कुचैले कपड़े पहने खड़े थे। देख रहे थे कि जय प्रकाश जी की नजर में उनकी उपस्थिति दर्ज हो रही है अथवा नहीं। सुई रखने का जगह नहीं थी गांधी मैदान में। अपने जीवन में जय प्रकाश नारायण भी ऐसा जनसैलाब नहीं देखे थे। इसी मंच पर उपस्थित थे फणीश्वरनाथ रेणु, जिन्होंने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता पाठ कर रहे थे :</p>
<p>&#8220;सदियों की ठण्डी-बुझी राख सुगबुगा उठी,<br />
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;<br />
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,<br />
सिंहासन खाली करो कि &#8220;जनता&#8221; आती है । </p>
<figure id="attachment_3386" aria-describedby="caption-attachment-3386" style="width: 196px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/7-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/7-2.jpg" alt="" width="196" height="274" class="size-full wp-image-3386" /></a><figcaption id="caption-attachment-3386" class="wp-caption-text">जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी &#8211; जेपी के निवास पर</figcaption></figure>
<p>दिनकर जी अरविन्द के भक्त थे। जय प्रकाश नारायण की इस क्रांति-तिथि से कोई दो माह पूर्व दिनकर जी दक्षिण भारत की यात्रा पर निकले थे। कहा जाता है कि वे आश्रम पहुंचे और अपने आराध्य के कहें: &#8220;मैं आ गया&#8221; आपके शरण में। दिनकर की मृत्यु ह्रदय गति रुकने के कारण वे अंतिम सांस लिए । बाद में उनका पार्थिव शरीर पटना लाया गया।  उस पार्थिव शरीर को कदमकुआं के हिंदी साहित्य सम्मेलन परिसर में श्रद्धांजलि स्वरुप रखा गया। अनेकानेक प्रगतिशील विचारधरा वाले लेखक श्रद्धांजलि देने भी नहीं पहुंचे। लेकिन आगंतुकों की संख्या कम नहीं थी। फिर लेखकों और उनके कलमों को साक्षी मानकर, जहाँ रेणु जी भी उपस्थित थे, गंगा तट पर गायघाट में अग्नि को सुपुर्द किया गया। </p>
<p>सन चौहत्तर की क्रांति और जय प्रकाश नारायण का नेतृत्व ऐसा फैल गया कि देखते ही देखते राजनीति का चेहरा ही पूरी तरह बदल गया। वह आंदोलन करीब एक साल चला। फिर आपातकाल का समय आया।  जयप्रकाश नारायण इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए वचनबद्ध थे। भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुई इस क्रांति में बाद में बहुत सी चीजें जुड़ गई। गांधी मैदान में सभा को संबोधित करने से पहले जेपी ने दोपहर सर्वोदय संगठन के कई कार्यकर्ताओं व अन्य के साथ जुलूस में शामिल हो राजभवन की ओर प्रस्थान किया। राजभवन में तत्कालीन राज्यपाल को पत्र सौंप सभा के लिए वापस गांधी मैदान लौटने लगे तो रास्ते में जुलूस पर फायरिंग की गई। संपूर्ण क्रांति की तपिश इतनी भयानक थी कि केंद्र में कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ गया था। बिहार से उठी संपूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने कोने में फैलकर आग बनकर भड़क रही थी। </p>
<figure id="attachment_3387" aria-describedby="caption-attachment-3387" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2.jpg" alt="" width="1280" height="852" class="size-full wp-image-3387" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/11-2-768x511.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3387" class="wp-caption-text">खामोश</figcaption></figure>
<p>उस ज़माने में बेगूसराय जिला के मझौल गाँव के महान क्रांतिकारी परिवार का एक परिवार बिमला कांत प्रसाद और अहिल्या देवी पटना के गर्दनीबाग रोड नंबर &#8211; 4 में रहते थे। बिमला कांत बाबू बिहार सरकार के एक विभाग में कार्यरत थे। बाद में वे पटना के आयुक्त आर आर एस पी सिन्हा के ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी भी बने। बिमला कांत जी और अहिल्या देवी के एक पुत्र राजीव थे, आज भी स्वस्थ हैं। राजीव साहब के परिवार का, उनके पुरखों का देश की आज़ादी के आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान था। मुंगेर, बेगुसराय आदि इलाकों में इनके दादाजी और उनके भाइयों की राजनीतिक गलियारे में तूती बोलती थी आज़ादी से पहले। सभी क्रांतिकारी विचारधारा के थे और महात्मा गांधी की चम्पारण यात्रा और उसके बाद के सभी आंदोलनों में राजीव जी के पूर्वजों का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। कहा जाता है कि तत्कालीन क्रांतिकारी युगल किशोर प्रसाद सिन्हा, अखिलेश्वर प्रसाद सिन्हा, इन्दु बाबू सबों ने महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस सबों के साथ आज़ादी की लड़ाई में सक्रीय भूमिका निभाए। </p>
<p><strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम </strong>से बातचीत करते राजीव जी कहते हैं: &#8220;सन 1942 के आंदोलन में जब पटना सचिवालय के सामने राष्ट्रध्वज फहराने के लिए क्रांतिकारी एकत्रित हुए थे, उनमें मेरे फूफा जी जगत नंदन सहाय भी थे। आंदोलन धीरे-धीरे हिंसक रूप ले लिया । पुलिस क्रांतिकारियों को आगे बढ़ने से रोक रही थी और क्रांतिकारी आगे बढ़कर राष्ट्रध्वज को लहराना चाह रहे थे। दोनों तरफ भारतीय ही थे। एक लड़ रहे थे, दूसरा रोक रहा था। इस बीच ब्रितानिया सरकार की हुकूमत की ओर से गोलियों का बौछार हो गया। भीड़ तीतर-बितर हो गयी। लेकिन सात छात्र मृत्यु को प्राप्त किये। मेरे फूफा जी उस गोली कांड में घायल एक क्रांतिकारी को अपने कंधे पर लादकर, साईकिल से एक और मित्र के सहारे पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले गए। गर्दनीबाग इलाके से काफी संख्या में क्रांतिकारी एकत्रित हुए थे, जो घायल हुआ था उसका नाम &#8216;जगत नारायण लाल&#8217; था। इस बीच कुछ लोग घर में आकर यह कह दिए कि &#8220;जगत नारायण मर गया,&#8221; इस बात को बुआ बर्दाश्त नहीं कर सकी और तत्काल ह्रदय गति रुकने के कारण उसकी मृत्यु हो गयी। शाम में जब फूफा जी घर आये तब सभी कहने लगे &#8211; भूत आया &#8211; भूत आया &#8211; यह घटना हमारे परिवार को हिलाकर रख दिया था।&#8221;</p>
<figure id="attachment_3388" aria-describedby="caption-attachment-3388" style="width: 717px" class="wp-caption alignright"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/12-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/12-2.jpg" alt="" width="717" height="976" class="size-full wp-image-3388" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/12-2.jpg 717w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/12-2-220x300.jpg 220w" sizes="auto, (max-width: 717px) 100vw, 717px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3388" class="wp-caption-text">जेपी और देसाई &#8211; कदमकुआं में</figcaption></figure>
<p>राजीव आगे कहते हैं: &#8220;यही कारण था कि जब जय प्रकाश नारायण की क्रांति सन 1942 की क्रांति के कोई 32 साल बाद एक बार फिर पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान से लेकर पटना की सड़कों पर दिखने लगा था; जब भी बाहर निकलता था, घर के सभी लोग कहते थे &#8220;किसी भी हालत में गिरफ्तार नहीं होना है&#8221;, सभी यह सोचते थे कि गिरफ्तार होने पर पुलिस कहीं मार न दे। घर के बड़े-बुजुर्ग, खासकर महिलाओं में यह बात घर कर गयी थी कि सं 1942 में भी भारत के लोग, बिहार के लोग, पटना के लोग पुलिस में थे; आज भी वही लोग हैं। कहीं आवाज बुलंग करने पर गिरफ्तार कर मार नहीं दे।&#8221;</p>
<p>राजीव का कैमरा पकड़ना और फिर कैमरे के क्लिक-क्लिक से इतिहास बनाना भी एक इत्तिफाक ही था। राजीव जी कहते हैं: &#8221; सन सत्तर की बात है। मेरे घर में चोरी हुई। चोर घर से एक-एक सामान को उठाकर ले गया। तत्कालीन बक्से में कपडा-लत्ता, पैसा-कौड़ी, गहने सभी ले गया। उन्ही बक्सा में बाबूजी का एक कैमरा था। चूँकि बाबूजी बिहार सरकार की नौकरी में थे और उस समय बिहार का पर्यटन विभाग को बढ़ावा देने के लिए भरपूर प्रयास किता जा रहा था; इसलिए बाबूजी जहाँ कहीं भी जाते थे, उस कैमरे से तस्वीर खींचकर सरकारी कार्यों में उपयोग करते थे। चोर ने सभी सामान छांट &#8211; छाँट कर ले लिया। जो उसके जरुरत के नहीं थे, उसे सामने एक सूखे कुएं में फेक सिया। बाबूजी का बी-2 आकार का कैमरा भी वहीँ फेका मिला। बाद में यह कैमरा ही मेरे जीवन का निर्माता बना। उस कैमरे में आठ फिल्म (निगेटिव) लगता था और परिणाम बहुत बेहतर होता था।&#8221;</p>
<p>राजीव कहते हैं: &#8220;जयप्रकाश नारायण की क्रांति के दौरान शिक्षा में सुधार, बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार आदि मुद्दों पर क्रांति किया गया था। लेकिन यदि सच पूछें तो जो स्थिति उन दिनों थी, आज भी बहुत बेहतर नहीं है, जहाँ तक बिहार का सवाल है। इंदिरा गांधी चाहती थी कि जेपी का आंदोलन बिहार से बाहर न जाय। इंदिरा गाँधी के विरुद्ध कचहरी का आदेश जेपी आंदोलन को एक नया आयाम दिया। इस आंदोलन के दौरान जेपी सहित कई हज़ार क्रांतिकारी और नेतागण गिरफ्तार किये गए थे। गुजरात की चमनभाई पटेल सरकार के खिलाफ छात्रों का आंदोलन जेपी आंदोलन का बुनियाद था। जेपी आंदोलन से नेताओं की ऐसी फौज निकली जो बाद में राज्यों एवं केंद्र की राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनाई। अरुण जेटली, रवि शंकर प्रसाद, नीतीश कुमार, राम विलास पासवान, लालू प्रसाद यादव और शरद यादव जैसे अनेक नेता हैं जो जेपी आंदोलन से निकले। इस क्रांति में वामपंथी व कांग्रेस को छोड़कर समाज के सभी तबके के लोग, मसलन साहित्यकार, डॉक्टर, किसान नेता, वकील, कर्मचारी, महिलाएं, रिक्शावाला, मजदूर भी शामिल थे।&#8221;</p>
<figure id="attachment_3389" aria-describedby="caption-attachment-3389" style="width: 853px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25.jpg" alt="" width="853" height="1280" class="size-full wp-image-3389" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25.jpg 853w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25-682x1024.jpg 682w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/25-768x1152.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 853px) 100vw, 853px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3389" class="wp-caption-text">नागार्जुन</figcaption></figure>
<p>राजीव आगे कहते हैं: &#8220;जिस दिन कई लाख चिट्ठियों को एक ट्रक पर लादकर लाखों की संख्या में लोग जय प्रकाश नारायण की अगुआई में बिहार के तत्कालीन राज्यपाल आर डी भंडारे को देने जा रहे थे, जुलूस वैसे निकला तो कदमकुआं से था, लेकिन कुछ समय के बाद यह निश्चित कर पाना कठिन हो गया था की जुलुस का  प्रारंभिक छोड़ कहा पहुंचा । कई लोग यह कह रहे थे कि अगली छोड़ जब राज्यपाल के निवास पर पहुँच गया था, कदमकुआं में उस प्रराम्भित स्थान पर हज़ारों लोग एकत्रित थे। उस समय पटना की सड़कों पर मैं अपने 120/बी-2 कैमरा से क्लिक-क्लिक तो कर ही रहा था, आर्यावर्त &#8211; इण्डियन नेशन के लिए फोटो का काम करने वाला कृष्ण मुरारी किशन भी दिखाई देता था। मुरारीजी उम्र में हमसे छोटे थे, लेकिन कैमरे पर उनकी पकड़ बहुत बेहतर थी। हम पुलिस से बहुत डरते थे। इसलिए जैसे ही किसी पुलिस की गाड़ी देखते थे, मैं कहीं छिप जाता था। इस दौरान गर्दनीबाग से कदमकुआं की दूरी कम होती गई और हम जेपी के नजदीक आते गए। उस ज़माने में जेपी की तस्वीर के लिए मुरारी और इण्डियन नेशन के विक्रम जी को छोड़कर शायद ही कोई दिखाई देता था। बाद में आपातकाल के बाद, सन 1978 के पूर्वार्ध अशोक कर्ण और प्रभाकर दिखने लगे। उन दिनों &#8216;यासिका डी-120&#8217; कैमरा होता था।  फिर बाद में &#8216;लोवीटल&#8217; कैमरा हुआ। उन कैमरों को लेकर पटना की सड़कों पर क्लिक-क्लिक करते रहे, इतिहास का हिस्सा बनते गए।&#8221;</p>
<p>उस ज़माने में पटना में इंदिरा गांधी की यात्रा का वर्णन करते राजीव कहते हैं: गाँधी मैदान में आल इण्डिया कॉंग्रेस सेवा दल का सम्मलेन था। इंदिरा गाँधी राजीव गाँधी को लेकर आयी थी। उस ज़माने में गांधी मैदान में सुरक्षा की दृष्टि से छोटे-छोटे पॉकेट बनाये गए थे। फोटोग्राफर्स की संख्या भी दस से अधिक नहीं रही होगी। इंदिरा जी को सबों से मिलना संभव नहीं था। अतः वे एक खुले जीप पर आगे खड़ी हो गयी और सभी पॉकेट में घूम रही थीं, ताकि मिल भी लें और छायाकारों को तस्वीर भी बन जाय। हम सभी भी एक जीप पर थे। अचानक हम सबों की जीप पलट गयी। इसे देखते ही इंदिराजी आगे बढ़ी और जोर-जोर से कहने लगी, उठाओ सबको, देखों किसी को चोट तो नहीं लगी। मैं सबसे नीचे था। चूँकि मैं कुछ पहलवान जैसा था लम्बा-चौड़ा, इसलिए सबों की निगाहें मुझ पर जल्दी रूकती थी। इसी तरह, जान जेपी बीमार हुए, तब इंदिराजी उनसे मिलने आयी थी। उन दिनों राजनीतिक रिश्ते राजनेताओं की चाहे जैसे रहती हो, कटु या मधुर, लेकिन आत्मीयता में कमी नहीं होती थी। इंदिरा जी में भी वह बात थी।&#8221;  </p>
<figure id="attachment_3390" aria-describedby="caption-attachment-3390" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8.jpg" alt="" width="1280" height="852" class="size-full wp-image-3390" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/8-768x511.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3390" class="wp-caption-text">लालू, नितीश और अन्य सभी अंडा-कढ़ी दबोच रहे हैं &#8211; समाजवाद</figcaption></figure>
<p>आज जब कंकड़बाग देखता हूँ और सन 1984 से तुलना करता हूँ तो आसमान जमीन सा फर्क दीखता है। उस  ज़माने में चिरैयांटांड पुल पार करने के बाद जब बाईपास पर आते थे, तो कुछ दूर दाहिने &#8211; बाएं दुकाने थी, पेट्रोल पम्प था, फिर अचानक दुकानों, मकानों की संख्या कम होने लगती थी। बाईपास ओर रेलवे लाइन बराबर दीखता था। उस ज़माने में कंकड़बाग में एच आई जी और एम आई जी नहीं बना था। एक बहुत बड़ा खाली मैदान हुआ करता था। राष्ट्रीय जनता पार्टी का सम्मलेन हुआ था। उस सम्मलेन में देश के शायद ही  कोई ऐसे बड़े नेता रहे होंगे जो अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराये थे।चंद्रशेखर, चौधरी देवी लाल, राजनारायण, सुरेंद्र मोहन, राम कृष्ण हेडगे, शहाबुद्दीन, राम बिलास पासवान, कपिल देव सिंह, सत्येंद्र नारायण सिंह, जॉर्ज फर्नांडिस, मोहन धारिया, मधु दंडवते, प्रमिला दंडवते, सुब्रम्हण्यम स्वामी, जाबिर हुसैन, सुबोध कांत सहाय, सुषमा स्वराज इत्यादि सभी आये थे। सत्तारूढ़ को छोड़कर। चंद्रशेखर के नेतृत्व में 8 मार्च से 11 मार्च, 1984 तक ऐतिहासिक सम्मलेन हुआ था। सम्मलेन सुवह से शाम तक तीन सत्र में हुआ करता था । खाना, नास्ता चाहे बड़े हो या छोटे, सभी कार्यकर्त्ता पंडाल में ही किया करते थे। </p>
<p>आज राजीव जी के परिवार में उनका एक बेटा रोहित है जो वस्त्र निर्माण की दुनिया में है। उसकी पत्नी सौम्या एक फैशन डिजाइनर है।​ बेटी सरस्वती है।​राजीव कहते हैं : समय बहुत बदल गया लेकिन आज भी डाक बंगला का चौराहा का नाम आते ही मन कुछ क्लिक-क्लिक करने लगता है। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/interview/patna-dakbungalow-makes-photographers-to-photojournalists">पटना का &#8216;डाक बंगला चौराहा&#8217; और &#8216;जेपी का आंदोलन&#8217; कईयों को &#8216;फोटोग्राफर&#8217; से &#8216;फोटो जर्नलिस्ट&#8217; बना दिया (#फोटोवाला श्रृंखला-12)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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