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	<title>journalism Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>पटना का UNI: 1959 में एक कमरा में था, आज बेसमेंट के एक कमरे में आ गया, जबकि प्रदेश के नेता, मंत्री अरबपति, खरबपति (भाग-4)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 04 Apr 2026 12:28:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : श्रीकृष्ण सिंह से लेकर नीतीश कुमार तक, बिहार में अब तक 23 मुख्यमंत्री बने। चौबीसवें अभी राजनीतिक गर्भ में अदृश्य हैं। सौभाग्य की बात यह है कि इन 23 मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल को प्रदेश के दो महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित समाचार एजेंसियां &#8211; प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (पीटीआई) तथा यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/in-1959-uni-was-housed-in-a-single-room-today-it-has-moved-to-a-room-in-the-basement">पटना का UNI: 1959 में एक कमरा में था, आज बेसमेंट के एक कमरे में आ गया, जबकि प्रदेश के नेता, मंत्री अरबपति, खरबपति (भाग-4)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : श्रीकृष्ण सिंह से लेकर नीतीश कुमार तक, बिहार में अब तक 23 मुख्यमंत्री बने। चौबीसवें अभी राजनीतिक गर्भ में अदृश्य हैं। सौभाग्य की बात यह है कि इन 23 मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल को प्रदेश के दो महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित समाचार एजेंसियां &#8211; प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (पीटीआई) तथा यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया (यूएनआई) ने शब्दों से इतिहास लिखता आया। मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान होने से लेकर, उनके मंत्रिमंडल के निर्माण और फिर कार्यालय से विदाई के साथ-साथ उनके अंतिम साँस तक, उनके बारे में लिख-लिखकर देश-प्रदेश के लोगों को उनकी कीर्तियों, यश-अपयशों के बारे में जानकारी देते आया है। </strong></p>
<p>लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इन एजेंसियों के बारे में अब तक कोई भी चाहे &#8216;तथाकथित विकास पुरुष नीतीश कुमार हों या भारत रत्न से अलंकृत कर्पूरी ठाकुर हों, न उनके मंत्रिमंडल के लोग, नहीं सोचे। अगर सोचे होते तो शायद आज 65-70 साल बाद आज भी ये दो एजेंसियां किराये के मकान में भटकती नहीं होती। जबकि, तत्कालीन मुख्यमंत्रियों, राजनेताओं के &#8216;आशीष&#8217; से पत्रकारों के नाम से &#8216;पत्रकार नगर&#8217; बन गया, लेकिन इन एजेंसियों को अपने टेलीप्रिंटर का सर छुपाने के लिए जगह नहीं मिला। विचार जरूर करें। <br />
अगर अब तक बने 22-मुख्यमंत्री एक निश्चित स्थान आवंटित किये होते तो शायद खानाबदोश की तरह इन एजेंसियों को साल-दो साल-पांच साल पर घर नहीं बदलना होता। वैसे &#8216;घर बदलने में क्या मानसिक तकलीफ होती है, यह नेताओं को नहीं मालूम होगा।</p>
<blockquote><p>पटना में पीटीआई और यूएनआई कार्यालय खुलने के बाद आज भी दोनों एजेंसियां &#8216;किराये के मकान में कार्यालय चला रहे हैं। पीटीआई अब तक पांच से अधिक मकानों में अपना पनाह ढूंढा है, जबकि यूएनआई आर्यावर्त-इंडियन नेशन परिसर (1959) से निकलने के बाद फ़्रेज़र रोड स्थित &#8216;प्रकाश होटल&#8217; के दो कमरों के रास्ते आज अपने दसवें किराये के मकान में, वह भी एक कमरे में (बेसमेंट) में पहुँच गया है। टेलीप्रिंटर की आवाज थम गयी है। टेलीप्रिंटर में लगे कागज फटने लगे हैं, रिबन के नीचे प्रकाशित होने वाले अक्षर धूमिल होते गए हैं। कहते हैं बिहार में उद्योगों का विकास हो रहा है।</p></blockquote>
<p>इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि यूएनआई संस्था को इस कगार तक लाने में प्रबंधन और शेयरधारकों सहित, प्रदेश के कई संभ्रांत लोगों का प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हाथ है। अगर ऐसा नहीं होता तो दिल्ली स्थित 9-रफ़ी मार्ग को खाली कराने का आदेश न्यायालय से नहीं लाया गया होता। कहते हैं जिस कारण से 9-रफ़ी मार्ग को खाली कराया गया (सरकार द्वारा आवंटित भूमि में 45-वर्ष में मकान नहीं बना पाने के कारण), उस कारण का निदान तो शायद तत्कालीन महाप्रबंधक जी.जी. मीरचंदानी के कार्यकाल में ही हो गया होता। लेकिन &#8216;आंतरिक कलह&#8217;, &#8216;शेयर धारकों की लापरवाही&#8217; के कारण ऐसा नहीं हो सका। मीरचंदानी के बाद जैसे ही नरेश मोहन (अब दिवंगत) का आगमन यूएनआई परिसर में हुआ, यूएनआई का अधोमुख यात्रा का सूचक बन गया। वजह आज भी शोध का विषय है। </p>
<figure id="attachment_7567" aria-describedby="caption-attachment-7567" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-1.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7567" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7567" class="wp-caption-text">पटना का डाक बंगला चौराहा</figcaption></figure>
<p><strong>आइये, पहले आज की तारीख को देखते हैं। </strong></p>
<p>आज 2026 साल का 4 अप्रैल है। भारतीय राजनीति के अलावे भारतीय पत्रकारिता और भारतीय साहित्य में 4 अप्रैल का अपना अलग महत्व है, जिसे न तो बीते हुए कल, न आज और ना ही आने वाला कल अपना स्थान ले सकता है। आज से 137-वर्ष पहले मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में बाबई ग्राम में श्री नन्दलाल चतुर्वेदी जी के घर में एक बालक का जन्म हुआ था। माता-पिता नाम रखे था <strong>&#8216;माखनलाल&#8217;</strong> और वंश का उपनाम <strong>&#8216;चतुर्वेदी&#8217; </strong>आगे जुड़ गया । श्री नन्दलाल चतुर्वेदी गाँव के एक प्राथमिक विद्यालय में एक शिक्षक थे। स्वाभाविक है अपने पुत्र को एक बेहतर नागरिक बनाने के लिए एक पिता और एक शिक्षक की भूमिका निभाने में कोई कोताही नहीं किये। हिंदी, संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी, गुजराती और कई अन्य भाषाओं पर अपना आधिपत्य जमाने वाला माखनलाल चतुर्वेदी 16 वर्ष की आयु में एक शिक्षक हो गए। साल 1905 आ गया था। </p>
<p>उसी वर्ष <strong>1905 में ही, 4 अप्रैल को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा</strong> जिले और घाटी में करीब 7.8 + की तीव्रता पर भूकंप आया। उस भूकंप ने कांगड़ा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज के अलावे हिमाचल की घाटियों के रास्ते जम्मू-कश्मीर की घाटियों को भी तवाह कर दिया। अनुमानतः 20,000 से भी अधिक लोग अंतिम सांस लिए। इस भूकंप के कोई 20 साल बाद 4 अप्रैल, 1925 को एक आह्वान के साथ &#8211; &#8220;आइए, गरीब और अमीर, किसान और मजदूर, उच्च और नीच, जित और पराजित को ठुकराइए, प्रदेश में राष्ट्रीय ज्वाला जगाइए और देश तथा संसार के सामने अपनी शक्तियों को ऐसा प्रमाणित कीजिये, जिसका आने वाली संतानें स्वतंत्र भारत के रूप में गर्व करे &#8211; खंडवा से &#8216;कर्मभूमि&#8217; का पुनः प्रकाशन शुरू हुआ। सम्पादन का कार्य माखनलाल चतुर्वेदी के सर पर था। वह माखनलाल चतुर्वेदी ही थे जिन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में महाकोशल अंचल से पहली गिरफ़्तारी दी थी। वे एक सफल पत्रकार थे और &#8216;प्रभा&#8217;, &#8216;कर्मवीर&#8217; तथा &#8216;प्रताप&#8217; का संपादन भी किये थे। </p>
<p><strong>आज से अस्सी साल पहले <strong>4 अप्रैल, 1946 को ब्रिटिश कैबिनेट मिशन</strong> ने तत्कालीन मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना के साथ बातचीत प्रारम्भ किया था। वैसे ब्रिटिश कैबिनेट मिशन, जिसमें लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस, सर स्टैफ़ोर्ड क्रिप्स और ए.वी. अलेक्जेंडर शामिल थे, सत्ता के हस्तांतरण पर चर्चा करने के लिए 24 मार्च, 1946 को भारत आये, लेकिन उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को 4 अप्रैल, 1946 को पूछा था कि एक अलग पाकिस्तान से उन्हें क्या फायदा होगा?  </strong></p>
<p>साल 1973 में वैसे दिसंबर महीने में अहमदाबाद के एल.डी. कालेज ऑफ़ इंजीनियरिंग और मोरबी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रावासों में लगभग 20 से 25 फीसदी शुल्क में वृद्धि हुई। इस वृद्धि के परिणामस्वरुप छात्र उग्र हुए और कालेज परिसर से सड़क पर आ गए। इस घटना क्रम में कई छात्रों का निलंबन भी हुआ और आंदोलन का स्वरुप भी उत्तरोत्तर बदलते गया था।कालेज छात्रावास के खाने की शुल्क में वृद्धि का राजनीतिकरण शुरू हो गया। दिन, सप्ताह, और महीना बदल रहा था और आंदोलन का स्वरुप भी। छात्रों की मांग उत्तरोत्तर गुजरात के लोगों की मांग बन गयी। करीब 63-दिनों के आंदोलन के बाद 9 फरवरी, 1974 को तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को मुख्यमंत्री कार्यालय से बाहर आना पड़ा। गुजरात विधानसभा को भंग हो गया । </p>
<figure id="attachment_7569" aria-describedby="caption-attachment-7569" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-2.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7569" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7569" class="wp-caption-text">पटना के फ़्रेज़र रोड पर आकाशवाणी भवन के प्रवेश द्वार पर आज जहाँ जूते की यह दूकान है, कल यहाँ यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया-यूनीवार्ता का दफ्तर हुआ करता था</figcaption></figure>
<p>गुजरात की घटना की कहानी यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया के साथ-साथ प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया समाचार एजेंसी भी प्रेषित कर रहा था, जो पटना के अख़बारों के पन्नों को रंग रहा था। जैसे-जैसे पटना से प्रकाशित तत्कालीन अखबारें &#8211; आर्यावर्त, इंडियन नेशन, सर्चलाइट और प्रदीप &#8211; क्रांतिकारी शब्दों से रंग रहे थे, पटना के तत्कालीन विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं भी गुजरात के छात्रों के समर्थन में सड़क पर उतर रहे थे। उन दिनों समाचार एजेंसियों से प्रसारित अक्षरों का रंग और अख़बारों में प्रकाशित समाचारों के अक्षरों का रंग दोनों &#8220;काला&#8221; ही था। वह तो तत्कालीन नेतागण थे, कुछ सत्ता में बैठे तो कुछ सत्ता पर कब्ज़ा करने को तत्पर, जो काले अक्षरों को राजनीतिक रंगों में रंगकर स्वार्थलाभ के लिए दण्ड बैठकी कर रहे थे। </p>
<p><strong>बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों, विशेषकर पटना विश्वविद्यालय के छात्रों की ख़बरें भी स्थानीय अख़बारों के पन्नों पर छपना शुरू हो गया था। शैक्षिक स्तर में गिरावट, महंगाई, बेकारी, शासकीय अराजकता और राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण के मुद्दों को घसीटकर पटना के डाक बंगला चौराहे पर लाया जा रहा था। नेतृत्वहीन आंदोलन कभी फ़्रेज़र रोड पर कुस्ती लड़ता था तो कभी गाँधी मैदान में। कभी विश्वविद्यालय प्रांगण में तो कभी रेलवे पटरियों पर। </strong></p>
<p>बाद में, कई छात्रों ने जयप्रकाश नारायण से अनुरोध किया कि वह आंदोलन का नेतृत्व करें। साल 1902 में जन्में जयप्रकाश नारायण भी सत्तर वसंतों को पार कर 72-वर्ष की आयु में सांस ले रहे थे। इस अवस्था में वे यह जानते थे कि वे &#8216;हिंसक आंदोलन&#8217; का नेतृत्व नहीं कर सकते हैं। तदर्थ उन्होंने शर्त रखा कि वे तभी आंदोलन का नेतृत्व करेंगे जब आंदोलन पूर्णरूपेण &#8216;अहिंसक&#8217; होगा। कोई भी राजनीतिक दल इसमें शरीक होकर रोटियां नहीं सकेंगे। छात्रों को सभी शर्तें मंजूर थी। कहने के लिए भले &#8216;राजनीतिक पार्टियों का प्रवेश इस आंदोलन में निषेध था, लेकिन नेता कब किसी का हुआ है, अपनों को छोड़कर।  बिहार के नेता तो इसके गवाह है ही, चाहे जगन्नाथ मिश्र हों, लालू यादव हों, नीतीश कुमार हों, उपेंद्र कुशवाहा हो &#8211; आज सभी अपने-अपने परिवारों को प्रदेश की राजनीती में पनाह दे रहे हैं। खैर, जैसे-जैसे आंदोलन देशव्यापी होता गया, चंद्रशेखर, मोहन धारिया, हेमवती नंदन बहुगुणा, जगजीवन राम, रामधन, रामकृष्ण हेगड़े जैसे दर्जनों लोग आंदोलन का हिस्सा बनते गए। </p>
<p>18 मार्च 1974 को पटना में छात्रों और युवाओं द्वारा आंदोलन हुआ। उसी दिन बिहार विधानसभा का संयुक्त अधिवेशन होना तय था। तत्कालीन राज्यपाल आर.डी. भंडारे संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करने वाले थे। वे किसी भी हाल में दोनों सदनों के संयुक्त बैठक को संबोधित करने के लिए विधानसभा पहुंचना चाहते थे। लेकिन आंदोलनकारियों के सामने भंडारी का कहाँ चलना था। रणनीति यह बनी थी कि आंदोलनकारी छात्र राज्यपाल को विधानमंडल भवन में जाने से रोकेंगे और उनका घेराव करेंगे। उस दिन सत्ताधारी विधायक सुबह 6 बजे ही विधानमंडल पहुंच गए थे। दूसरी तरफ विपक्षी विधायकों ने राज्यपाल के अभिभाषण का बहिष्कार किया। लेकिन भंडारे की गाड़ी को रास्ते में रोक लिया। पुलिस को लाठियों का प्रयोग करना पड़ा। आंसू गैस के गोले भी छोड़े गए। कई छात्र हताहत भी हुए। </p>
<figure id="attachment_7570" aria-describedby="caption-attachment-7570" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-3.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7570" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7570" class="wp-caption-text">पटना संग्रहालय (पुराना) के पास यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया का दफ्तर था</figcaption></figure>
<p>और यहीं जन्म हो गया जयप्रकाश नारायण के करीबी छात्र नेता लालू प्रसाद यादव जो &#8216;समाजवाद&#8217; की लड़ाई लड़ते-लड़ते, समाजवाद को पीछे धकेल कर, नब्बे के दशक के मध्य में 950-करोड़ रूपये वाला चारा घोटाला में मुख्य अभियुक्त तो बने ही, राजनीति में परिवारवाद का विरोध करने वाले लालू यादव अपने और अपने ससुराल के सभी प्रमुख लोगों को राजनीति में न केवल प्रवेश दिए, बल्कि विधायक, सांसद, मंत्री, उप-मुख्यमंत्री भी बना दिए। पटना स्थित यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया यानी यूएनआई समाचार एजेंसी इन तमाम घटनाओं का चश्मदीद गवाह रहा। </p>
<p>अब तक लालू यादव के साथ-साथ सुशील मोदी और अन्य तत्कालीन छात्र नेता अब तक &#8216;छपास रोग&#8217; से ग्रसित हो गए थे। यूएनआई, पीटीआई दफ्तरों में बैठना शुरू कर दिए थे। कहानियों का रंग कैसे बदलता है, सीखना शुरू कर दिए थे। जय प्रकाश नारायण का आंदोलन तूल पकड़ रहा था। तभी <strong>शायद उस दिन 4 अप्रैल ही था, साल 1974</strong> का जब तत्कालीन छात्र नेता लालू यादव अख़बारों की सुर्खियों में बने रहने के लिए स्वयं को भूमिगत कर बाजार में &#8216;अपहरण&#8217; का अफवाह फैला दिए थे। लालू यादव के अपहरण की खबर न केवल प्रदेश के अख़बारों में, बल्कि देश दुनिया में भी प्रकाशित हुआ था। खैर। </p>
<p>स्वतंत्र भारत में जब बिहार को पहला मुख्यमंत्री बने श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) के रूप में मिला, यूएनआई पटना में उपस्थित था &#8216;आर्यावर्त&#8217; और &#8216;दी इंडियन नेशन&#8217; समाचार पत्रों के कार्यालय परिसर में। साल 1959 में यूएनआई के स्थापना के बाद आर्यावर्त और इंडियन नेशन अख़बारों के संस्थापक दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह ने तत्कालीन प्रबंधक उपेंद्र आचार्य और तत्कालीन संपादक ब्रजनंदन आज़ाद को यूएनआई के विस्तार और प्रसार के लिए सम्पूर्ण जिम्मेदारी दी। महाराजा ने कहा कि जब तक यूएनआई पटना में &#8216;स्थापित&#8217; नहीं हो जाता, यह &#8216;हमारे परिसर&#8217; से कार्य करेगा &#8211; बिना किसी किराये के। और इस तरह मजहरुल हक़ पथ पर यूएनआई अवतरित हुआ। </p>
<p>श्रीकृष्ण सिंह के बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) आए । बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967 तक, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968 तक, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968 तक, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968 तक, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972 तक, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969 तक, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970 तक, कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979 तक, केदार पांडे 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973 तक, अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975 तक, जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990 तक, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980 तक, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985 तक, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988 तक, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 तक और सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए । </p>
<p>बहरहाल, अनुग्रह नारायण सिन्हा इंस्टीट्यूट के एक वरिष्ठ प्राध्यापक, जो बिहार के अखबारी दुनिया के लोगों से विशेष ताल्लुक रखते थे, एक शर्त पर कि हम उनका नाम नहीं लेंगे, कहते हैं:  &#8220;श्रीकृष्ण सिन्हा के बाद नीतीश कुमार तक प्रदेश से प्रकाशित अख़बारों में 22 मुख्यमंत्रियों का नाम प्रकाशित हुआ है। अब 23 वां नाम भी प्रकाशित होने वाला है। श्रीकृष्ण सिन्हा को अगर छोड़ भी दें तो अब तक मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठे मुख्यमंत्रियों ने स्थानीय अख़बारों और संवाद एजेंसियों का जितना अपने हित में इस्तेमाल किया, यह एक गहन शोध का विषय है। अपवाद छोड़कर, शायद ही कोई मुख्यमंत्री होंगे या उनके मंत्रिमंडल के सदस्य होंगे, प्रदेश के अधिकारी, पदाधिकारी, नेताओं द्वारा संरक्षित और सम्पोषित ठेकेदार, अपराधी होंगे, जिनका प्रदेश के बाहर दिल्ली में, नोएडा में, गाजियाबाद में, लखनऊ में, कानपुर में, कोलकाता में,चेन्नई में, मुंबई में, राजस्थान में, मध्यप्रदेश में, उत्तराखंड में सम्पत्तियों का साम्राज्य है । लेकिन यूएनआई और पीटीआई के लिए अपना एक कमरा भी नहीं मुहैय्या हुआ। </p>
<blockquote><p>जय प्रकाश नारायण आंदोलन से जन्म लिए नेता जो प्रदेश की सत्ता में हिस्सेदार रहे, की बात ही नहीं करें। चाहे बाहुबली हों या नेता, सबों ने मिलकर बिहार का चतुर्दिक लुटे और लूट रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि किसी ने भी यहाँ से प्रकाशित, या बिहार का अपना अख़बार या एजेंसी, जिसमें छप छप कर सभी चवन्नी छाप से आदमकद के नेता बने, इसके प्रति ध्यान नहीं दिए। अगर ध्यान दिए होते तो इन 65 वर्षों में यूएनआई जैसे प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी की भी अपनी एक जमीन होती जहाँ उसकी जमीर की तूती बोली जाती। यूएनआई का अंत सिर्फ उस संस्थान के प्रबंधन या कर्मचारी यूनियन को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। इसके इस अंत के लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रदेश सरकार के साथ-साथ दिल्ली के सिंहासन पर बैठे लोग भी हैं।&#8221;</p></blockquote>
<p>वे आगे कहते हैं: &#8220;श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर नीतीश कुमार तक के वर्षों मे आधे कालखंड में लालू प्रसाद यादव-राबड़ी देवी और नीतीश कुमार कुल 35 वर्षों तक सत्ता में विराजमान रहे, मुख्यमंत्री रहे, शेष 35 वर्षों में कांग्रेस पार्टी के नेताओं के साथ-साथ अन्य राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने मुख्यमंत्री पद संभाले। लेकिन श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर डॉ. जगन्नाथ मिश्र (1990) तक 35 वर्षों में विभिन्न मुख्यमंत्री के कालखंड में बिहार का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक क्षेत्रों की सेवाओं में जितना पतन हुआ, 1990 में लालू यादव का बिहार के राजनीतिक पटल पर अभ्युदय के बाद, उनकी पत्नी और अंततः नीतीश कुमार के कालखंड में बिहार रसातल की ओर चला गया, जा रहा है।&#8221;</p>
<p><strong>अगर पत्रकारिता की दृष्टि से देखें तो प्रदेश में पत्रकारिता के अंत की शुरुआत तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के बिहार प्रेस बिल से हो गया था। लालू यादव, नीतीश कुमार शिक्षित होते हुए भी पत्रकारिता को नेश्तोनाबूद कर दिया। राबड़ी देवी तो अशिक्षित थी। इससे भी अधिक दुखद बात यह है कि सत्तर, अस्सी, नब्बे के ज़माने में बिहार में, खासकर प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया या फिर यूनाइटेड  न्यूज ऑफ़ इंडिया के जो कर्ताधर्ता थे, जितने सम्मानित वे थे, आज उस सम्मान के एक फीसदी के भी लोग पत्रकारिता के क्षेत्र में नहीं हैं। कल तक प्रदेश की पत्रकारिता में प्रदेश के लोग थे। आज प्रदेश का अपना कोई भी अखबार नहीं है। सभी बाहरी व्यापारियों ने अपने-अपने उत्पाद को बेचने के लिए, लाभ कमाने के लिए यहाँ आये हैं। उन्हें यूएनआई जैसी शब्दों की जरुरत नहीं है।&#8221; </strong></p>
<p>यूनीवार्ता के प्रमुख रहे (अब अवकाश प्राप्त) महेश सिन्हा कहते हैं कि &#8220;अपनी स्थापना से लेकर 2000 साल तक यूएनआई और यूनीवार्ता का रुतबा इतना मजबूत था कि प्रदेश के मुख्यमंत्री स्वयं कार्यालय आते थे। वे न केवल पत्रकारों का सम्मान करते थे, बल्कि उनकी नज़रों में पत्रकारिता सम्मानित थी। दो मुख्यमंत्रियों &#8211; अब्दुल गफूर और कर्पूरी ठाकुर &#8211; का आना-जाना आम था। उन दिनों पत्रकारों की इतनी अधिक अहमियत थी कि संस्थान के मालिक भी मंत्रियों, चाहे केंद्रीय मंत्री हों या प्रदेश के मुख्यमंत्री, से मिलने के लिए पत्रकारों से मिन्नत किया करते थे। आज समय बदल गया है। आज मंत्री और मुख्यमंत्री का राजनीतिक स्वरूप भी बदल गया है, पत्रकार और पत्रकारिता तो बदला ही है। </p>
<figure id="attachment_7571" aria-describedby="caption-attachment-7571" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7571" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7571" class="wp-caption-text">किदवईपुरी आईएएस कालोनी में आया यूएनआई का कार्यालय</figcaption></figure>
<p><strong>यूएनआई, पटना कार्यालय की यात्रा </strong></p>
<p><strong>इंडियन नेशन &#8211; आर्यावर्त </strong>परिसर से जब यूएनआई अपना दफ्तर फ़्रेज़र रोड पर ही माड़वाड़ी वासा के सामने वाली गली में, जिसमें कई होटल कल भी थे, आज भी हैं, के एक प्रकाश होटल में दो कमरे में गया, उस कालखंड में यूएनआई एक तरफ जहाँ अपने शब्दों के वजूद को मजबूत कर रहा था, वहीँ प्रदेश की पत्रकारिता से राष्ट्र की पत्रकारिता को नया आयाम देने को संकल्पित था। प्रकाश होटल से यूएनआई अपना कार्यालय पटना जंक्शन की ओर से आती सड़क फ़्रेज़र रोड जब आकाशवाणी के पास से दाहिने मुड़कर गाँधी मैदान की ओर निकलती है, यहीं बाएं हाथ मंजीत सिंह होटल के आगे स्थित एक मकान के पहली मंजिल पर यूएनआई का कार्यालय खुला कई सारे टेलीप्रिंटर्स के साथ। इस भवन के नीचले हिस्से में एक मंगोलिया नामक बार खुला था। </p>
<p>उस कालखंड में, डाक बांग्ला चौराहे के नुक्कड़ के बाएं हाथ कोने पर शराब की एक दूकान के अलावे, या फिर न्यू डाक बांग्ला रोड में सेन्ट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया के सामने शराब की दूकान के अलावे कहीं अन्यत्र को अड्डा नहीं था। परिणाम यह हुआ की मैंगोलिया बार और उसका अगला हिस्सा प्रदेश के सम्मानित, शिक्षित लोगों का अड्डा बन गया। इस स्थान पर संध्याकाळ में प्रदेश के नेताओं के अलावे अधिकारियों, पदाधिकारियों, लेखकों, रंगकर्मियों की भीड़ एकत्रित होती थी। विभिन्न विषयों पर चर्चाएं होती थी। प्रेस ट्रस्ट का कार्यालय उन दिनों बन्दर बगीचा के नुक्कड़ पर था और वहां भी प्रदेश के संभ्रांत एकत्रित होते थे, लेकिन यूएनआई की बात ही कुछ अलग थी। </p>
<p><strong>पटना साइंस कॉलेज में तक़रीबन 41-वर्ष &#8216;भूगर्भ शास्त्र&#8217; पढ़ाने और सांइस कालेज के प्राचार्य पद से अवकाश ग्रहण करने वाले डॉ. बसंत मिश्र</strong> का पटना की पत्रकारिता से विशेष लगाव रहा है, जहाँ तक उच्चतर शिक्षा का रिपोर्टिंग का प्रश्न है। साढ़े पांच दशक से अधिक समय तक वे शिक्षा के क्षेत्र का रिपोर्टिंग पहले इंडियन नेशन और बाद में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के लिए करते आये हैं। बसंत मिश्र कहते हैं: &#8220;देश के विख्यात पत्रकार फ़रज़न्द अहमद सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्षों में इंडियन नेशन के लिए विश्वविद्यालय संवाददाता थे। उन दिनों ब्रजनन्दन आज़ाद इंडियन नेशन के संपादक और दीनानाथ झा सहायक संपादक हुआ करते थे। जब फ़रज़न्द जी यूएनआई का संवाददाता बन गए तो मैं इंडियन नेशन में विश्वविद्यालय का समाचार लिखने लगा। उस समय छात्र था, लेकिन लिखने का बहुत शौक था। ब्रजनन्दन आज़ाद और दीनानाथ झा मुझे इंडियन नेशन में विश्वविद्यालय और शिक्षा संबधी समाचार लिखने को कहे और मेरी यात्रा शुरू हो गयी। बाद में पटना विश्वविद्यालय के साइंस कालेज में व्याख्याता बनने के बाद भी मैं लिखने का काम नहीं छोड़ा जो मेरी पहचान और व्यक्तित्व का एक अभिन्न हिस्सा बन गया। </p>
<figure id="attachment_7572" aria-describedby="caption-attachment-7572" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-5.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7572" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-5.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-5-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-5-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-5-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-5-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7572" class="wp-caption-text">कृष्णानगर, रोड नंबर &#8211; 6 में किराये के मकान में आया यूएनआई कार्यालय </figcaption></figure>
<p>ज्ञातव्य हो कि राजू भरतन ने द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया (जनवरी 1992) में &#8216;चित्रगुप्त सहाय @चित्रगुप्त&#8217; के बारे में लिखते कहा था कि असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण 1930 में जेल में बंद ब्रज नंदन &#8216;आजाद&#8217; एक उच्च सम्मानित पत्रकार थे, जो पटना से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी दैनिक &#8216; इंडियन नेशन&#8217; और इसके हिंदी संस्करण &#8216;आर्यावर्त&#8217; में लिखे गए अपने तीखे संपादकीय लेखों के लिए जाने जाते थे। चित्रगुप्त श्रीवास्तव उनके अपने छोटे भाई थे। चित्रगुप्त पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर किये थे, साथ ही, पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की थी। चित्रगुप्त की बेटी सुधा श्रीवास्तव, जो मुंबई विश्वविद्यालय से प्रोफ़ेसर के पद से अवकाश प्राप्त की थी, कही थी,  चित्रगुप्त को गायन में अधिक रुचि थी और अपने भाई को बिना बताए, वे पेशेवर गायक बनने की गुप्त इच्छा रखते थे। अपनी दो डिग्रियों के बल पर चित्रगुप्त को पटना विश्वविद्यालय में नौकरी मिल गई। लेकिन जब उनके मित्र मदन सिन्हा (जो बाद में एक प्रसिद्ध छायाकार बने और 1974 में विनोद खन्ना अभिनीत फिल्म &#8216; इम्तिहान&#8217; का निर्देशन भी किया ) ने उन्हें मुंबई जाकर फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाने का सुझाव दिया, तो चित्रगुप्त मान गए। यह निर्णय उनके भाई को पसंद नहीं आया।</p>
<blockquote><p>बसंत मिश्र कहते हैं: &#8220;उन दिनों जब फरजंद साहब यूएनआई गए, मैं अक्सर यहां आया-जाया करता था। वहां धैर्यानन्द झा पहले से थे। बाद में श्री बीएन झा प्रबंधक के रूप में आये। चंद्रमोहन मिश्र का मेरे परिवार से बहुत मधुर सम्बन्ध था। उनकी पत्नी के कहने पर बीएन झा कुछ कुछ समय के लिए, जब तक वे पटना में स्थिर न हो जाएँ, मेरे घर में किराये पर रहे। यूएनआई को पिछले 55 से अधिक वर्षों से देखता आया हूँ। यूएनआई के द्वारा लिखे गए, भेजे गए संवादों को देखता आया हूँ, उसकी गरिमा को भी देखा हूँ; लेकिन आज जब उसकी स्थिति के बारे में अख़बारों में पढ़ता हूँ, देखता हूँ, मन दुखी हो जाता है।&#8221;</p></blockquote>
<p>कोई तीन दशक तक <strong>पटना यूएनआई का चीफ ऑफ़ ब्यूरो रहने वाले शिवाजी सिंह आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम</strong> को कहते हैं कि &#8220;आकाशवाणी के प्रवेश द्वार के बाएं हाथ नुक्कड़ पर कल जहाँ यूएनआई का कार्यालय था, उस भवन के नीचे मैंगोलिया बार था। आज वहां जूते का शो रूम हैं। इस स्थान से यूएनआई का कार्यालय पटना म्यूजियम (पुराना) के सामने आया। कुछ वर्ष यहाँ से सेवा देने के बाद यूएनआई का कार्यालय किदवईपुरी स्थित आईएएस कालोनी में आ गया। यह कालखंड नब्बे के दशक का प्रारंभिक वर्ष था। सं 1995 आते-आते श्रीकृष्ण नगर रोड नंबर आठ पर यूएनआई कार्यालय का बोर्ड टंगा। यह सभी किराये का मकान था। यहाँ  1998-1999 तक था। </p>
<figure id="attachment_7573" aria-describedby="caption-attachment-7573" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-6.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7573" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-6.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-6-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-6-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-6-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-6-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7573" class="wp-caption-text">डॉ. जीडीएन सिंह परिसर में यूएनआई का कार्यालय</figcaption></figure>
<p>शिवाजी सिंह कहते हैं: &#8220;यह कड़वा सच है कि UNI में ‘जिस किसी’ को भी (कुछ अपवादों को छोड़कर) पद या थोड़ी-सी शक्ति मिली, उसने खुद को ‘खुदा’ समझने में देर नहीं लगाई। चाहे प्रबंधन हो या यूनियन, इस प्रवृत्ति से कोई भी अछूता नहीं रहा। अहंकार इतना बढ़ गया कि संस्था के हितों की चिंता वे भूल गए । ऐसे लोगों ने अपनी ऊर्जा, समय और मेहनत संस्था को आगे बढ़ाने या बचाने के बजाय व्यक्तिगत बदले, हिसाब बराबर करने और असहमति रखने वालों या ‘सलाम’ नहीं करने वालों को सबक सिखाने में लगा दी । ऐसे लोगों को “साहब” बनने का बड़ा शौक़ था । सच है ख़ाली बर्तन ज़्यादा शोर मचाता है।&#8221;</p>
<blockquote><p>इधर दिल्ली स्थित यूएनआई मुख्यालय में प्रशासन के साथ साथ प्रबंधन में भी &#8216;गिरावट&#8217; आने लगा, वित्तीय स्थिति दयनीय होने लगी। यह नरेश मोहन का कार्यकाल था। शिवाजी सिंह कहते हैं कि &#8220;उन दिनों साज सज्जा पर करीब पंद्रह से बीस लाख रुपये खर्च किए गए थे । उस समय कार्यालय के एक हॉल और तीन कमरे थे। आप अंदाजा लगाएं कि इन जगहों में 8 एसी, 15 कंप्यूटर, 50 से भी अधिक ट्यूबलाईट, रिवॉल्विंग चेयर, रेफ़्रिजरेटर, वाटर कूलर आदि लगाए गए थे जबकि उस समय पीटीआई के दफ्तर में एक कंप्यूटर और एक एसी से काम चल रहा था। पटना में उस समय किसी मीडिया हाउस का कार्यालय यूएनआई जैसा नहीं था। </p></blockquote>
<p>पटना के ही एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि &#8216;वह दृश्य देखकर आज भी मन खिन्न हो जाता है कि कैसे दिल्ली कार्यालय में प्रशासनिक बदलाव होने के बाद आर्थिक लूट प्रारम्भ हुआ था। यूएनआई के पास उस कालखंड में जो भी पैसे एकत्रित थे, उसे धीरे-धीरे समाप्त करने की दिशा में लोग लग गए। यहाँ पटना कार्यालय में इतने अधिक विस्तार के साथ ही कार्यालय में बिजली का अत्यधिक लोड होने के कारण एक स्पेशल ट्रांसफार्मर भी यूएनआई के लिए लगाया गया था जिसका किराया 45 हज़ार के क़रीब देना पड़ता था। उस समय ट्रांसफार्मर का रेंट समेत बिजली बिल क़रीब 70 हज़ार रुपया के आस पास आता था।</p>
<p>श्रीकृष्णापुरी से यूएनआई का कार्यालय 2010 में जब बोरिंग रोड स्थित डाक्टर जी.एन. सिंह के तीन कमरे के मकान में शिफ्ट हुआ तब किराया 12,000 और बिजली का बिल दो से ढाई हज़ार रुपया हो गया। यहाँ किसी कमरे में एसी नहीं लगा था। दस साल में जब किराया बढ़ते बढ़ते 31 हजार हो गया और किराया समय पर नहीं दिया जा रहा था तब मकान मालिक ने मकान ख़ाली करने को कहा। दिल्ली हेड ऑफिस का निर्देश जारी किया कि पांच से दस हज़ार रुपये किराया का मकान ढूंढा जाए। इतना कम किराया पर यूएनआई जैसी प्रतिष्ठित संस्था के लिए अच्छे स्थान पर मकान मिलना असंभव था। कहते हैं कि यूएनआई में जो भी कर्मचारी बचे थे वे पुराने मकान मालिक से काफ़ी मिन्नत के बाद उसी परिसर में एक गराजनुमा कमरा में पाँच हज़ार रुपये मासिक किराया पर ऑफिस को 2020 में शिफ्ट कर दिया गया। इस स्थान पर शौचालय था और ना ही पीने के पानी की व्यवस्था । अमानवीय स्थिति में लोग वहां काम करने को मजबूर थे ।  </p>
<p><strong>कोरोना काल में लोग जब घर से काम कर रहे थे तो बहुत ज़्यादा मुश्किल पत्रकारों को नहीं थी लेकिन ग़ैर पत्रकार ज्यादा परेशानी में थे उन्हें हर दिन दफ़्तर आना होता था। इस गराजनुमा कार्यालय में यूएनआई के लोग पांच साल से अधिक रहे। विगत 31 मार्च 2026 को यूएनआई कार्यालय को एक नया पता मिला। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद के घर से दस कदम दूर स्थित एक मकान के बेसमेंट में स्थित एक छोटे से कमरे में। </strong></p>
<p>ओह !!</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/in-1959-uni-was-housed-in-a-single-room-today-it-has-moved-to-a-room-in-the-basement">पटना का UNI: 1959 में एक कमरा में था, आज बेसमेंट के एक कमरे में आ गया, जबकि प्रदेश के नेता, मंत्री अरबपति, खरबपति (भाग-4)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8216;चिठ्ठी-चिठ्ठी खेलते&#8217; यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया &#8216;अस्तित्वहीन&#8217; हो गया, वह कहने से &#8216;कतराते&#8217; रहे, वे सुनने के लिए &#8216;तरसते&#8217; रहे (भाग-3)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Mar 2026 12:24:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[eviction]]></category>
		<category><![CDATA[journalism]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>रफ़ी मार्ग, नई दिल्ली : बड़े बुजुर्ग कहते हैं हकलाकर ही सही, तुतलाकर ही सही बोलो ज़रूर। लेकिन देश का प्रसिद्ध न्यूज़ एजेंसी यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया, जिसने भारतीय पत्रकारिता को मूर्धन्य हस्ताक्षरों से अलंकृत किया, न वह और उसके लोग मुख से अपनी बात, परेशानी उनसे बोल सके जो कुछ भी करने की ताकत [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रफ़ी मार्ग, नई दिल्ली : बड़े बुजुर्ग कहते हैं हकलाकर ही सही, तुतलाकर ही सही बोलो ज़रूर। लेकिन देश का प्रसिद्ध न्यूज़ एजेंसी यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया, जिसने भारतीय पत्रकारिता को मूर्धन्य हस्ताक्षरों से अलंकृत किया, न वह और उसके लोग मुख से अपनी बात, परेशानी उनसे बोल सके जो कुछ भी करने की ताकत रखते थे, और वे इंतज़ार करते कार्यालय से बाहर होते गए। बस,  चिट्ठी-चिट्ठी खेलते यूएनआई एक दिन 9-रफ़ी मार्ग से बेदखल हो गया।</strong>  </p>
<blockquote><p>जिस कालखंड में यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया को सरकार के तरफ़ से देश के संसद और प्रधानमंत्री कार्यालय से सौ कदम दूर भूखंड का आवंटन हुआ, उस भूखंड से यूएनआई को न्यायालय के आदेश पर बाहर निकालने के बीच श्रीमती  इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पीवी नरसिंहराव, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी जैसे पत्रकार और पत्रकारिता को समझने वाले प्रधानमंत्री आए। लेकिन इन छह दशकों में यूएनआई सरकार, शासन, व्यवस्था, विभागों के साथ चिठ्ठी-चिट्ठी खेलता रहा और एक दिन सरकार द्वारा आवंटित भूखंड से बेदखल होकर बाहर कर दिया गया। लोग बाग कहते हैं यह पत्रकारिता पर कुठाराघात है, जबकि सत्ता के गलियारे में बैठे उन दिनों के लोगों का कहना है “वे खुलकर कहने से कतराते रहे, हम खुलकर सुनने को तरसते रहे। न वे 9-रफ़ी मार्ग से विजय चौक के रास्ते रायसीना पहाड़ी पर आए और न हमें कभी मसले को सुलझाने के लिए बुलाए। जो गए वे राजनीति की रोटियां सेक कर निकल गए।”</p></blockquote>
<p>समयांतराल देश के राजनीतिक गलियारे में भ्रष्टाचार का आलम इतना अधिक हो गया कि उस यूएनआई को जी-टीवी के मालिक सुभाष चंद्रा द्वारा ख़रीदने की खबर एजेंसी के तत्कालीन अधिकारी, पदाधिकारी, रक्षक, संरक्षक सबों को राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव और उनके सहयोगी तथा राज्यसभा के सदस्य प्रेमचंद गुप्ता से मिली थी। कहते हैं लालू यादव ने हँसकर कहा था: &#8220;मेरा मित्र यूएनआई को खरीद लिया है,&#8221; यही सात शब्द थे जो उस दिन आग की तरह देश की राजधानी दिल्ली से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में &#8216;बिजली की तरह&#8217; फैली थी। </p>
<p><strong>दुर्भाग्य यह है कि अपने स्थापना काल से लेकर आज तक, जिन-जिन लोगों के बारे में लिखकर यूएनआई के शब्द उन्हें &#8216;आम आदमी&#8217; से &#8216;खास आदमी&#8217; तक बनाया, &#8216;शोहरत&#8217; दिलाया, सबों ने एजेंसी के अस्तित्व के साथ &#8216;तथाकथित तौर पर राजनीति ही किये&#8217;, किसी ने भी आगे बढ़कर समस्याओं के समाधान का मार्ग नहीं ढूंढा, ढूंढने में मदद नहीं किया। इधर, यूएनआई के कार्यालय में तो राजनीति चरम की ओर अग्रसर थी ही। </strong></p>
<p>आज स्थिति यह है कि यूएनआई, जिसकी तूती कभी 9-रफ़ी मार्ग से बोली जाती थी, जहाँ से कहानियों के माध्यम से शब्दों का अलंकरण होता था, आज एजेंसी के सभी पत्रकार और गैर-पत्रकार अपने-अपने कार्य तो कर रहे हैं, लेकिन अपने-अपने घरों से, मीडिया सेंटर से, सड़क के किनारे चाय की दुकानों पर बैठकर अपने लैपटॉप से कहानियां भेज रहे हैं। दफ्तर में जहाँ लोगबाग एक-दूसरे से मिलकर अपना-अपना सुख-दुःख बांटते थे, आज व्हाटएप पर संवाद का आदान-प्रदान कर रहे हैं। जो भी सब्सक्राइबर्स बचे हैं, उन तक अपनी सेवा उपलब्ध कराने के लिए निजी क्षेत्र की कंपनी को रखकर वेबसाइट चला रहे हैं। यूएनआई का क्रियाकलाप पुनः कोरोना काल में प्रवेश कर चुका है। </p>
<p>यूएनआई कर्मचारी यूनियन के पूर्व अध्यक्ष और कन्फेडरेशन ऑफ़ न्यूजपेपर्स एंड न्यूज एजेंसीज एम्पलॉयज ऑर्गेनाइजेशन के कोषाध्यक्ष एम एल जोशी, जो यूएनआई को विगत चार दशकों से देखते आ रहे हैं, कहते हैं: &#8220;यूएनआई को इस स्थिति तक लाने में कौन दोषी है, कौन नहीं, इस बात पर चर्चा सार्वजनिक होनी चाहिए। साथ ही, इस ऐतिहासिक एजेंसी के अस्तित्व को पुनः स्थापित करने की कोशिश भी होनी चाहिए। हमें दुख है की देश का कोई भी नेता इसे बचाने के लिए आगे नहीं आए। लेकिन जब यह पूछा कि यूएनआई इन वर्षों में निजी तौर पर कितने प्रधान मंत्रियों से मिलकर, बात कर इस मसले को सुलझाने का पहल किया ? वे कहते हैं “चिट्ठी लिखी गई थी।” </p>
<p><strong>कौन हैं 29+ फीसदी शेयर के मालिक अवीक सरकार </strong></p>
<p>बहरहाल, शेष बातें तो इतिहासकार बताएँगे, लेकिन एक बात तो तय है कि कलकत्ता में प्रफुल्ल कुमार सरकार (जिनके नाम से प्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट भी है) और सुरेश चंद्र मजूमदार द्वारा तत्कालीन ब्रितानिया सरकार के शासन के विरुद्ध आनंद बाजार पत्रिका अख़बार का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ था। दोनों ने मिलकर बंगाल के लोगों, खासकर क्रांन्तिकारियों, श्रमिकों की आवाज बुलंद करने के लिए 13 मार्च, 1922 को इस अख़बार को स्थापित किये थे। उन दिनों यह अख़बार चार पन्नों में संध्याकाल प्रकाशित होता था इस विश्वास के साथ कि यह का सूर्योदय बेहतर होगा। आज का सांध्यकालीन अख़बार कल का प्रातःकालीन बनेगा। ऐसा हुआ भी। लेकिन कल का यूएनआई, जो क्षितिज पर चमक रहा था, आज उसके लिए अवसान हो गया &#8211; यह भी उतना ही सच है। </p>
<figure id="attachment_7530" aria-describedby="caption-attachment-7530" style="width: 643px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Aveek_Sarkar_-_Kolkata_2011-12-08_7542_Cropped.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Aveek_Sarkar_-_Kolkata_2011-12-08_7542_Cropped.jpeg" alt="" width="643" height="939" class="size-full wp-image-7530" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Aveek_Sarkar_-_Kolkata_2011-12-08_7542_Cropped.jpeg 643w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Aveek_Sarkar_-_Kolkata_2011-12-08_7542_Cropped-205x300.jpeg 205w" sizes="auto, (max-width: 643px) 100vw, 643px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7530" class="wp-caption-text">अवीक सरकार</figcaption></figure>
<p>बिस्मिल्लाह खान का जन्म हो गया था और वे शहनाई की दुनिया में अपना नाम स्थापित करने के लिए शहनाई में अपने मामा अली बक्स &#8216;विलायतु&#8217; खान के साथ बनारस स्थित विश्वनाथ मंदिर के चबूतरे पर &#8216;उस्ताद&#8217; बनने के लिए अपनी साँसें फूंक चुके थे। बिस्मिल्लाह खान का जन्म 21 मार्च, 1916 को डुमरांव (बिहार) में हुआ था, जबकि प्रफुल्ल सरकार को आनंद बाजार पत्रिका स्थापित करने के 23 वर्ष बाद 9 जून, 1945 उनके पुत्र अशोक कुमार सरकार को अवीक सरकार के रूप में पुत्ररत्न प्राप्त हुआ था। यानी प्रफुल्ल सरकार दादा बन गए। समय का खेल देखिए &#8211; आनंद बाजार पत्रिका भी क्षितिज पर पहुंचा, बिस्मिल्लाह खान भी विश्वनाथ मंदिर के चबूतरे से उठकर भारत रत्न बन गए; लेकिन अवीक सरकार और एबीपी समूह द्वारा लगभग 30 फीसदी यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया में शेयर होने के बाद भी यूएनआई रोता-बिलखता अपने परिसर से बाहर निकाल दिया गया।  </p>
<p><strong>जिस दिन श्री अवीक सरकार का जन्म हुआ था, उस कालखंड में सन 1942 में शुरू हुए &#8216;अंग्रेज भारत छोड़ो&#8217; आंदोलन अपने अंतिम चरण में लगभग प्रवेश कर चुका था। 9 जून, 1945 को कांग्रेसी नेता जवाहरलाल नेहरू को बरेली केंद्रीय कारा में स्थानांतरित किया गया था, और छह दिन बाद, उन्हें रिहा किया गया था। यह दौर एक तरफ जहाँ कलकत्ता से प्रकाशित समाचार पत्रों, मसलन आनंद बाजार पत्रिका, अमृत बाजार पत्रिका, बंदेमातरम, युगांतर जैसे क्रांतिकारी विचारधारा वाले अख़बारों के लिए क्षितिज पर छाने का समय था, पाठकों का विश्वास जितने का समय था, वहीँ वह दौर अंग्रेजी हुकूमत के लिए सूर्यास्त का समय संकेत दे रहा था। द्वितीय विश्वयुद्ध भी समाप्त हो गया था और सभी का ध्यान भारत की स्वतंत्रता पर केंद्रित हो रहा था।</strong> </p>
<p>आज अवीक सरकार, आनंद बाजार पत्रिका प्रकाशन समूह के उपाध्यक्ष और एडिटर एमेरिटस हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक किया। अपने ब्रिटेन प्रवास के दौरान उन्होंने &#8216;द संडे टाइम्स&#8217; के संपादक सर हेरोल्ड इवांस के अधीन प्रशिक्षण ली। &#8220;पेपर टाइगर्स&#8221; के लेखक निकोलस कोलरिज ने अपनी किताब में अवीक सरकार को &#8220;भारत का सबसे परिष्कृत अख़बार मालिक&#8221; बताया है, और आगे उन्हें &#8220;बेहद उम्दा पसंद और चुनाव वाला व्यक्ति&#8221; बताया है &#8211; फिर चाहे वह उनके खाने की बात हो या उनके कपड़ों की। आज अवीक सरकार &#8216;प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया&#8217;, &#8216;एबीपी न्यूज़ नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड&#8217;, &#8216;सीमा गैलरी प्राइवेट लिमिटेड&#8217; और &#8216;सरकार कंसल्टेंट्स प्राइवेट लिमिटेड&#8217; के निदेशक भी हैं। लेकिन यूएनआई के मामले में अवीक सरकार के साथ-साथ अन्य 26 शेयर होल्डरों ने जो &#8216;बर्ताव&#8217; किया, शायद समय में लिखा जायेगा। </p>
<p><strong>कितने-कितने शेयर के मालिक हैं कौन-कौन?  </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Share-1-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Share-1-2.jpg" alt="" width="2047" height="1365" class="aligncenter size-full wp-image-7532" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Share-1-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Share-1-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Share-1-2-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Share-1-2-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Share-1-2-1536x1024.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>आप कहेंगे कि यहाँ आविक सरकार पर इतनी बातें क्यों कही जा रही है। जरूरी है। यदि यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया के स्थापना काल के शेयरहोल्डिंग पैटर्न को देखा जाय (जो दस्तावेज कहता है), कुल 27 शेयर होल्डरों में आनंदबाजार पत्रिका प्राइवेट लिमिटेड, 6-प्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट, कलकत्ता-700001 का 2214 (फेस वैल्यू 100) यानी कुल शेयर का 21.73 प्रतिशत के साथ-साथ आविक सरकार C/o एबीपी लिमिटेड, 6-प्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट, कलकत्ता का 759 शेयर (7.45 %) और भी है। यानी कुल 2973 शेयर अर्थात 21.73 + 7.43 = 29.16 प्रतिशत उनका ही है। शेष में 70.84 फीसदी में 26 अन्य शेयर होल्डर्स हैं। इसके अन्य शेयर होल्डरों में दूसरे स्थान पर 1200 (फेस वैल्यू 100) शेयर के साथ &#8216;द स्टेट्समैन&#8217; शामिल है, जिसका प्रतिशत में 11.78 प्रतिशत है। तीसरे स्थान पर एक्सप्रेस पब्लिकेशन (मदुरै) लिमिटेड, एक्सप्रेस गार्डन्स, 29-2, मेनरोड, अम्बत्तुर इंडस्ट्रियल एस्टेट, चेन्नई-600058 है, जिनके पास 801 शेयर (7.86 %) के अलावे दी इंडियन एक्सप्रेस लिमिटेड, एक्सप्रेस टावर्स, नरीमन पॉइंट, मुंबई- का 125 शेयर (1.23 %) है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Share-3-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Share-3-4.jpg" alt="" width="2047" height="1365" class="aligncenter size-full wp-image-7533" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Share-3-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Share-3-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Share-3-4-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Share-3-4-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Share-3-4-1536x1024.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>अमृत बाजार पत्रिका, 9-इंडिया एक्सचेंज प्लेस, 7 वां तल्ला, रूम नंबर-1A, कलकत्ता-700001 का 744 शेयर (7.3 %) और तुषार कांति घोष का 5 शेयर (0.05 %) है। बेनेट कोलेमन एंड कंपनी लिमिटेड का 548 शेयर (5.38 %) है, मणिपाल मीडिया नेटवर्क लिमिटेड का 600 शेयर (5.89%), दी प्रिंटर (मैसूर) लिमिटेड का 600 (5.89 %), नवा समाज लिमिटेड का 50 शेयर (0.49%), एच.टी. मीडिया लिमिटेड का 738 शेयर (7.24%)  संतोषनाथ, हिंदुस्तान टाइम्स लिमिटेड का 1 शेयर (0.01%), कस्तूरी एंड साँस लिमिटेड, कस्तूरी बिल्डिंग, माउन्ट रोड, चेन्नई का 345 शेयर (3.39%), सकल पेपर्स प्राइवेट लिमिटेड, पुणे का 100 शेयर (0.98%), जुगांतर लिमिटेड का 5 शेयर (0.05%), न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशंस लिमिटेड, माझारूलहक पथ, पटना का 736 शेयर (7.24%),  नव भारत, नागपुर का 250 शेयर (2.45 %) , जागरण प्रकाशन लिमिटेड का 150 शेयर (1.47%) के साथ पीसी गुप्ता, जागरण प्रकाशन लिमिटेड का 1 शेयर (0.01%), एससी रॉय, 36-न्यू रोड, अलीपुर, कोलकाता का 2 शेयर (0.02%), राइटर्स एंड पब्लिशर्स लिमिटेड, जी-3A, काननवाले चैम्बर्स, माहिम वेस्ट, मुंबई का 100 शेयर (0.98%), एसोसिएटेड पब्लिशर्स (मद्रास) लिमिटेड का 5 शेयर (0.05%), सर्वेंट्स ऑफ़ पीपुल्स सोसाइटी, गोपालबंधु भवन, कटक का 100 शेयर (0.98%), राम एस तरनेजा और रानी तरनेजा, 4-पश्मीना, 33 A, पेडर रोड, मुंबई का 6 शेयर (0.06%), मोहम्मद यूनुस असोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड, हेराल्ड हॉउस, बहादुरशाह ज़फर मार्ग,नई दिल्ली का 1 शेयर (0.01%), और जी कस्तूरी का 1 शेयर (0.01%) है। </p>
<figure id="attachment_7531" aria-describedby="caption-attachment-7531" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Photo-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Photo-3.jpg" alt="" width="2047" height="1365" class="size-full wp-image-7531" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Photo-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Photo-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Photo-3-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Photo-3-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Photo-3-1536x1024.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7531" class="wp-caption-text">यूएनआई परिसर का दृश्य जिस रात परिसर को न्यायालय के आदेश से खाली कराया गया था। तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>क्या कहते हैं यूएनआई कर्मचारी के नेता एम एल जोशी </strong></p>
<p>यूएनआई कर्मचारी यूनियन के पूर्व अध्यक्ष और कन्फेडरेशन ऑफ़ न्यूजपेपर्स एंड न्यूज एजेंसीज एम्पलॉयज ऑर्गेनाइजेशन के कोषाध्यक्ष एम एल जोशी <strong>आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम </strong>से बात करते हुए कहते हैं: &#8220;इतने बड़े-बड़े लोगों के शेयर होल्डर्स होते हुए भी कोई यूएनआई को बचाने में आगे नहीं आये। वैसे यूएनआई के सम्पूर्ण हादसे के लिए एबीपी सम्पूह और समूह के स्वामी अवीक सरकार को दोषी हैं ।&#8221; आर्यावर्तइंडियननेशन।कॉम अवीक सरकार की बातों को जानने के लिए ईमेल भी किया ताकि यह स्पष्ट हो सके कि क्या सच में एबीपी समूह दोषी है? लेकिन इस कहानी को लिखते समय तक उनका कोई उत्तर नहीं आया। </p>
<blockquote><p>जोशी का कहना है कि सन 1979 में पालेकर वेज बोर्ड आया था। न्यायमूर्ति (अवकाशप्राप्त) डीजी पालेकर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश रह चुके थे। पालेकर के बाद मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश यू.एन. बछावत का वेज बोर्ड बना था, जो बछावत वेज बोर्ड के नाम से जाना गया। यह वेज बोर्ड 1989 में अपना अनुशंसा प्रस्तुत किया। बछावत के बाद गौहाटी उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति के.पी.एस. मणिसाना की अध्यक्षता वाला मणिसाना वेज बोर्ड 2000 में अपना रिपोर्ट प्रस्तुत किया और अंत में मुंबई उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरबख्श राय मजिथा की वेजबोड अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत किया। </p></blockquote>
<figure id="attachment_7534" aria-describedby="caption-attachment-7534" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/4-scaled.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/4-scaled.jpeg" alt="" width="2560" height="1707" class="size-full wp-image-7534" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/4-scaled.jpeg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/4-300x200.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/4-1024x683.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/4-768x512.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/4-1536x1024.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/4-2048x1365.jpeg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7534" class="wp-caption-text">यूएनआई परिसर से सभी कर्मचारियों, पत्रकारों, गैर-पत्रकारों को हटाने के बाद प्रवेश द्वार सील करते अधिकारी &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा<br /></figcaption></figure>
<p>जोशी का कहना है कि उस समय तक हिंदुस्तान टाइम्स समूह के वरिष्ठ अधिकारी नरेश मोहन यूएनआई की देखरेख करने के लिए आ गए थे। मणिसाना वेज बोर्ड पत्रकारों और ग़ैर-पत्रकारों के वेतन और अन्य आर्थिक सुविधाओं में लाभ अनुशंसित किया था। उस समय एक जॉइंट एक्शन कमिटी भी बना जो यह निर्णय लिए की वेज बोर्ड के अनुशंसा को तीन बार में लागू कर भुगतान किया जायेगा। अगर देखा जाय तो यूएनआई की आर्थिक स्थिति में अधोमुखी गिरावट यहीं से प्रारम्भ हुआ। वैसे इसके लिए सिर्फ नरेश मोहन (अब दिवंगत) को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है, उनके अलावे सभी शेयर होल्डर उतने ही दोषी हैं। नरेश मोहन के समय यूएनआई के पास 25 करोड़ रूपये का एफडीआर था। लेकिन वेज बोर्ड लागु होने के साथ ही, एफडीआर क्रमशः समाप्त होने लगा। इसका मुख्य कारण था आमदनी के अन्य श्रोतों की कमी। </p>
<p><strong>जब उनसे पूछा कि यूएनआई एक प्रतिष्ठित और विश्वसनीय समाचार सेवा होने के बाद भी इसका सब्सक्रिप्शन समाप्त क्यों होता गया? जोशी का कहना था कि &#8220;आम तौर पर दोनों समाचार एजेंसियों में नब्बे फीसदी से अधिक शेयर होल्डर्स एक ही है। यह कहना मुश्किल है, लेकिन जब व्यवहार को देखते हैं तो यही प्रतीत होता है कि उन लोगों का पीटीआई के प्रति एक अलग सोच है और यूएनआई के प्रति अलग। परिणामस्वरूप वे पीटीआई के सब्सक्रिप्शन को बरकरार रखते यूएनआई का सब्सक्रिप्शन समाप्त करने लगे। सब्सक्रिप्शन का समाप्त होना आर्थिक रूप से कमजोर करने का तरीका बना। इतना ही नहीं, उन शेयर होल्डरों का यूएनआई के क्रियाकलाप में भी कोई दिलचस्पी नहीं रहा। साथ ही, यूएनआई के तरफ से अगर कोई भी सकारात्मक पहल की जाती थी, तो उसमें उनका समर्थन तो नहीं ही रहता था, अलबत्ता रोड़े भी अटकने लगे थे। जब वित्तीय स्थिति ख़राब होने लगी थी, कई मर्तबा फाइनेंसियल मोबिलाइजेशन के लिए जो भी प्रस्ताव लाये जाते थे, उसे ठुकराना उन शेयर होल्डरों की एक आदत हो गयी थी। यूएनआई में 27 शेयर होल्डर्स थे, उनमें कई &#8216;निष्क्रिय&#8217; थे। इसका सबसे बड़ा कारण था मुनाफा का नहीं बाँट पाना।&#8221;</strong></p>
<p>जोशी का कहना है कि जब भी बाहर से पैसे एकत्रित करने का प्रयास किया गया, स्वाभाविक है पैसा निवेश करने वाला अपना आधिपत्य भी चाहेगा, लेकिन ये शेयर धारक ऐसा नहीं होने देना चाहते थे। साल 2006 में जब वित्तीय स्थिति संकट में आने लगी, यूएनआई के साथ-साथ कर्मचारियों का भविष्य भी संकट में दिखने लगा, नरेश मोहन पत्रकार और गैर-पत्रकारों के साथ बैठक किये। अब तक संस्थान में पुरानी पद्धतियां, तकनीक बदलने लगी थी, लोगों की जरूरतें कम होने लगी थी, स्वाभाविक है प्रबंधन अतिरिक्त लोगों को हटाने पर आमादा होगी, नरेश मोहन ने भी यही किया था। उनके अनुसार करीब 350 &#8216;अनुत्पादक&#8217;, &#8216;अतिरिक्त&#8217; लोगों को या तो बाहर निकालने पर जोर दे रहे थे, या फिर यह कर रहे थे कि वेतन को कम करना होगा, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई विकल्प नहीं था। यूनियन का प्रतिनिधि होने के कारण यह दोनोने शर्त हमें मंजूर नहीं थी। नरेश मोहन जाने से पहले एक कमेटी बनाकर चले गए जिसका कर्ताधर्ता एम.के लौल थे। अब तक वित्तीय स्थित बैकलॉग में चली गयी थी। </p>
<p><strong>जब जी टीवी के मालिक सुभाष चंद्रा यूएनआई आये </strong></p>
<p>जोशी आगे कहते हैं कि 2006 में निदेशक मंडलों का निर्णय हुआ कि एजेंसी का शेयर किसी और के हाथों बेचा जाए ताकि पैसे का एकत्रीकरण हो। और यहीं आगमन हुआ &#8211; एस्सेल ग्रुप के प्रमुख सुभाष चंद्रा का, जो यूएनआई का 51 प्रतिशत हिस्सेदारी 32 करोड़ रुपये में खरीद कर आगे आये। इसमें चार अन्य बोली लगाने वाले भी थे, लेकिन सुभाष चंद्रा को &#8216;अप्रूव&#8217; किया गया। जब उनसे पूछा कि आखिर इतने शेयर होल्डरों की उपस्थिति में, उसमें भी धनाढ्यों की उपस्थिति में सुभाष चंद्रा कहाँ से अवतरित हो गए और बोर्ड ने उन्हें कैसे &#8216;अप्रूव&#8217; कर दिया? शेष अन्य चार बोली लगाने वालों का क्या हुआ? जोशी कहते हैं 26 सितंबर, 2006 को बोर्ड की वार्षिक आम बैठक हुई। उस बैठक में कुछ हो अथवा नहीं, &#8216;लोब्बिंग&#8217; प्रारम्भ हो गया। दो फांक में बंट गए। लेफ्ट विंग और राइट विंग हो गया। इसमें दिल्ली के साथ साथ राष्ट्रीय नेताओं ने भी आकर विरोध करने लगे। इस बात पर दो राय नहीं थी की यूएनआई को पैसों की ज़रूरत थी ताकि तत्कालीन आर्थिक विपन्नता और मुसीबतों का सामना किया जा सके। लेकिन इस बात का भी उतना ही भय था की सुभाष चंद्रा यूएनआई पर कब्ज़ा भी कर सकते हैं या फिर इस प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी का उपयोग अपनी संस्थान को मजबूत करने में भी कर सकते हैं। चार शेयर होल्डरों &#8211; एबीपी समूह, दी हिन्दू समूह, मणिपाल और डेक्कन हेराल्ड इस मसले को लेकर दोनों शेयर धारक और कुछ अन्य &#8216;कंपनी लॉ बोर्ड&#8217; पहुँच गए।&#8221;</p>
<figure id="attachment_7535" aria-describedby="caption-attachment-7535" style="width: 800px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/zee.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/zee.jpg" alt="" width="800" height="450" class="size-full wp-image-7535" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/zee.jpg 800w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/zee-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/zee-768x432.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 800px) 100vw, 800px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7535" class="wp-caption-text">सुभाष चंद्रा, जी-टीवी के मालिक </figcaption></figure>
<p>3 अक्टूबर, 2006 को सुभाष चंद्रा यूएनआई दफ्तर आये। चारो तरफ से उनका घेराव भी हुआ था। वह बात भी करना चाहे, यह भी कहे कि किसी को नहीं निकला जाएगा। तीन घंटे तक हो-हल्ला होता राह। लेकिन वह नहीं हो सका जो वे चाहते थे। 5 अक्टूबर, 2006 को धरना-प्रदर्शन भी हुआ। इस कालखंड में प्रियरंजन दास मुंशी, जनार्दन द्विवेदी और अन्य नेताओं ने भी इस प्रकरण में शामिल हुए। जो बैठक यूएनआई के परिसर में होना था, वह ललित होटल में चला गया। इस बीच, कंपनी लॉ बोर्ड ने सुभाष चंद्र की खरीद को निरस्त का दिया और यूएनआई को अपने स्तर पर अन्य उपायों के साथ धन एकत्रित करने को कहा। साथ ही, यह भी कहा कि अगर शेयरहोल्डर्स खुद ही इस न्यूज़ एजेंसी की सेवाओं का सब्सक्रिप्शन ले लें, तो इससे बहुत मदद मिलेगी। सब्सक्रिप्शन की दरें अखबार के प्रसार के आधार पर हर महीने 10,000 रुपये से लेकर 7 लाख रुपये तक की है ।</p>
<p><strong>इस बीच, यूएनआई को एक और आर्थिक धक्का लगा जब अचानक 17 लाख रुपये मासिक की सब्सिडी समाप्त हो गयी। यह सब्सिडी नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ़ उर्दू लैंग्वेज&#8217; से मिलती थी केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के तहत उर्दू भाषा को बढ़ावा देने के लिए मुख्य निगरानी संस्था के तौर पर काम करती है। यह सब्सिडी उन छोटे और मध्यम प्रसार वाले उर्दू अखबारों के लिए एक वित्तीय सहायता थी, जिसके जरिए वे यूएनआई की सेवा 50 प्रतिशत कम कीमत पर हासिल कर सकते थे। सब्सिडी रद्द होने के कारण कई उर्दू अखबारों ने यूएनआई से अपनी सदस्यता वापस ले ली।</strong> </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-1-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-1-scaled.jpg" alt="" width="1067" height="2560" class="aligncenter size-full wp-image-7536" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-1-scaled.jpg 1067w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-1-125x300.jpg 125w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-1-427x1024.jpg 427w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-1-768x1842.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-1-640x1536.jpg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-1-854x2048.jpg 854w" sizes="auto, (max-width: 1067px) 100vw, 1067px" /></a></p>
<p>ज्ञातव्य हो कि यूएनआई 1992 में उर्दू टेलीप्रिंटर सेवा प्रारम्भ करने वाली पहली समाचार एजेंसी थी। इस घटना के बाद भी यूएनआई को आर्थिक झटका लगा। वैसे आज तक इस बात का खुलासा नहीं हो पाया कि इतने बड़े समाचार एम्पायर का मालिक होने के बाद भी अचानक सुभाष चंद्रा को यूएनआई जैसी संस्था के प्रति लगाव कैसे हो गया? लोगों का कहना है कि शायद यूएनआई जिस स्थान पर स्थित था, वह जमीन किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकता है, खासकर जो &#8216;व्यवसायी&#8217; हैं। इस दृष्टि से अगर एबीपी, या दी हिन्दू, या मणिपाल, या डेक्कन हेराल्ड सुभाष चंद्रा के खरीद-फरोश के लिए कंपनी लॉ बोर्ड के पास गया तो क्या गलत किया ?</p>
<p><strong>क्या कहते हैं भूमि और विकास मंत्रालय के एक अवकाश प्राप्त अधिकारी </strong></p>
<p>बहरहाल, भारत सरकार के <strong>भूमि और विकास मंत्रालय</strong> के एक अवकाश प्राप्त अधिकारी (अपना नाम नहीं लिखने के शर्त पर) <strong>आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम</strong> को कहते हैं: &#8220;शेयरहोल्डर तो यह कंपनी (दी न्यूजपेपर एंड पब्लिकेशन लिमिटेड) भी था। सवा-सात प्रतिशत शेयर का मालिक था यह कंपनी। इस कंपनी के तत्कालीन प्रबंधन उपेंद्र आचार्य के नेतृत्व में शुरुआती दिनों में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाया। यहाँ तक कि पटना के अलावे भी यूएनआई को स्थापित करने में मदद किये। लेकिन अचानक संस्थान के स्वामी महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद जो हश्र उनकी कंपनी का हुआ, दरभंगा राज का हुआ; आज यूएनआई उसी रास्ते पर है। यूएनआई के स्थापना के बीस वर्ष बाद दिल्ली शहर के सबसे महत्वपूर्ण इलाके में कार्यालय के लिए भूमि आवंटित हुआ। 1979 के बाद, केंद्र सरकार में कई ऐसे अवसर थे, जिस अवसर का लाभ उठाकर यूएनआई 9-रफ़ी मार्ग पर एक बेहतरीन और आकर्षक भवन खड़ा कर सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-2.jpg" alt="" width="1617" height="1355" class="aligncenter size-full wp-image-7537" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-2.jpg 1617w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-2-300x251.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-2-1024x858.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-2-768x644.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-2-1536x1287.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1617px) 100vw, 1617px" /></a></p>
<p><strong>वे आगे कहते हैं: &#8220;अपनी मृत्यु से कुछ पूर्व तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में भीष्म नारायण सिंह  और बूटा सिंह शहरी विकास और हाउसिंग मंत्री थे। उस समय कुछ चर्चाएं भी हुयी थी। अगर कोई आगे बढ़ता तो मामला उसी समय निपट जाता। इसके बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। राजीव गांधी पत्रकारों और पत्रकारिता के साथ बहुत मधुर सम्बन्ध था। एक बार उन्होंने इस विषय की चर्चा भी किये थे। फिर पीवी नरसिम्हा राव आये, अटल बिहार वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह आये। यूएनआई के साथ-साथ यूएनआई के संवाददाताओं और प्रबंधकों के साथ (कुछ खास शेयर होल्डर सहित) इन प्रधानमंत्रियों का जितना बेहतर सम्बन्ध था, शायद आज के लोग सोच भी नहीं सकते। सत्ता के गलियारे में इस बात की चर्चा भी थी कि अगर यूएनआई सरकार से देश की बेहतर पत्रकारिता के नाम पर आर्थिक मदद (बैंक ऋण सहित) मांगता है, तो शायद न तो प्रधानमंत्री कार्यालय और ना ही शहरी विकास मंत्रालय पीछे होता। लेकिन यहां तो यूएनआई के तत्कालीन अधिकारियों, यहाँ तक कि पत्रकारगण भी, सरकार और मंत्रालय के साथ चिठ्ठी-चिठ्ठी खेलने में लगे रहे और चिठ्ठी-चिठ्ठी का वह खेल इतना भयंकर हो गया कि देश का एक महत्वपूर्ण समाचार एजेंसी अपनी जमीन और जमीर से बेदखल हो गया &#8211; यह दुर्भाग्य है।&#8221;</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-3.jpg" alt="" width="1399" height="1965" class="aligncenter size-full wp-image-7538" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-3.jpg 1399w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-3-214x300.jpg 214w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-3-729x1024.jpg 729w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-3-768x1079.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-3-1094x1536.jpg 1094w" sizes="auto, (max-width: 1399px) 100vw, 1399px" /></a></p>
<p>भूमि और विकास मंत्रालय के अधिकारी आगे कहते हैं: &#8220;मेरी आयु आज 85+ वर्ष की है। मेरी आयु के लोग जो यूएनआई से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े थे, आज उनकी संख्यां ऊँगली की गिनती पर आ गयी है, आज के लोग, चाहे वे सत्ता के गलियारे में हैं या सत्ता के बाहर, या फिर सत्ता में अपनी पहचान बनाने के लिए सभी तरह के कर्मकांड कर रहे हैं, वे उस दौड़ के बारे में सोच भी नहीं सकते जब यूएनआई के पत्रकार से लेकर गैर-पत्रकार तक, इस संस्थान को बनाने में कितनी मेहनत किये थे। लेकिन, 1979 के बाद से लगातार, यूएनआई के तत्कालीन और आने वाले अधिकारी चिठ्ठी-चिठ्ठी का खेल खेलते इसके अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिए। हम सिर्फ शेयर होल्डर्स को दोषी नहीं करार कर सकते हैं। यहाँ कार्य करने वाले लोग, चाहे पत्रकार हो या गैर पत्रकार उतना ही दोषी हैं। आज भी समय है कि लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस विषय का निदान के लिए गुहार करें। गुहार करने से हम छोटे नहीं हो जायेंगे और अगर सैकड़ों परिवारों के हित के लिए छोटे हो भी जाते हैं (जैसा लोग सोचते हैं) तो इसमें कोई बुराई नहीं है। यह मेरी सोच है। ऐसा नहीं कि हमें क्या लाभ होगा, बल्कि इसलिए की यूएनआई की पत्रकारिता बच पायेगी।&#8221;</p>
<p><strong>चिठ्ठी-चिठ्ठी का खेला </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-4.jpg" alt="" width="1422" height="1352" class="aligncenter size-full wp-image-7539" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-4.jpg 1422w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-4-300x285.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-4-1024x974.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-4-768x730.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-4-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1422px) 100vw, 1422px" /></a></p>
<p><strong>*</strong> 14.12.1979 को भूमि और विकास कार्यालय (L&#038;DO) द्वारा यूएनआई के पक्ष में एक आवंटन पत्र जारी किया गया था, जिसके द्वारा 9, रफी मार्ग, नई दिल्ली में स्थित भूमि आवंटित की गई थी। उक्त पत्र में भूखंड का क्षेत्रफल 1.453 एकड़ (0.588 हेक्टेयर) दर्ज किया गया था। यह आवंटन न केवल यूएनआई के लाभ के लिए किया गया था, बल्कि चार अन्य सहभागी समाचार मीडिया संस्थानों &#8211; प्रेस एसोसिएशन ऑफ इंडिया, प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, समाचार भारती और हिंदुस्तान समाचार &#8211; के संबंध में भी किया गया था; इसका उद्देश्य एक संयुक्त कार्यालय परिसर का निर्माण करना था, जिसमें उक्त समाचार मीडिया संगठनों के कार्यालय स्थित हो सकें।</p>
<p><strong>*</strong> 08.08.1980 को, दिनांक 14.12.1979 के आवंटन पत्र में संशोधन किया गया, जिसके तहत प्लॉट के क्षेत्रफल के साथ-साथ उससे संबंधित देय प्रीमियम और ज़मीनी किराए के संबंध में कुछ छोटे-मोटे बदलाव किए गए। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-5a-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-5a-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="aligncenter size-full wp-image-7540" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-5a-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-5a-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-5a-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-5a-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-5a-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-5a-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p><strong>*</strong> 14.12.1979 की आवंटन चिट्ठी के अनुसार, जमीन का औपचारिक कब्जा सौंपे जाने की तारीख से दो साल के अंदर प्रस्तावित इमारत का निर्माण पूरा करना ज़रूरी था। </p>
<p><strong>* </strong>यूएनआई दावा किया कि उक्त आवंटन चिट्ठी में तय किया गया प्रीमियम और जमीन का किराया विधिवत चुका दिया गया था, और प्लॉट पर मौजूद मौजूदा ऊपरी ढांचे की घटी हुई लागत भी जमा कर दी गई थी। इसके अलावा यह भी कहा गया है कि 22.01.1981 का एक समझौता ज्ञापन, और उसके साथ 25.02.1981 की एक सुधार विलेख, जिसमें उक्त समझौता ज्ञापन में संशोधन करने की मांग की गई थी, निष्पादित किए गए थे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-5b-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-5b-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="aligncenter size-full wp-image-7541" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-5b-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-5b-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-5b-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-5b-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-5b-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-5b-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p><strong>*</strong> 07.11.1986 की एक संशोधित आवंटन चिट्ठी जारी की गई, जिसने 08.08.1980 की पिछली कार्यालय चिट्ठी संख्या L-I-II-I(576)/78 का स्थान ले लिया।</p>
<p><strong>*</strong> 07.11.1986 के आवंटन पत्र के खंड (xi) में यह प्रावधान था कि उक्त मीडिया संस्थानों को आपस में एक समझौता करना होगा, जिसमें यह तय किया जाएगा कि प्रस्तावित भवन के निर्माण की लागत किस आधार पर आपस में बांटी जाएगी; साथ ही, इसमें अन्य प्रासंगिक मामलों को भी शामिल किया जाएगा, जिनमें संपत्ति के निर्माण, प्रबंधन और रखरखाव की व्यवस्थाएं शामिल हैं। यह स्वीकार्य है कि 07.11.1986 के आवंटन पत्र के अनुसार जो आवश्यक कदम उठाए जाने थे, वे नहीं उठाए गए; क्योंकि न तो संबंधित आवंटियों के बीच कोई समझौता किया गया और न ही आवश्यक निर्माण कार्य शुरू करने के लिए कोई कदम उठाया गया।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-6-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-6-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1785" class="aligncenter size-full wp-image-7542" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-6-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-6-300x209.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-6-1024x714.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-6-768x536.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-6-1536x1071.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-6-2048x1428.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-6-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p><strong>*</strong> 17.06.1999 को, 9, रफी मार्ग, नई दिल्ली में स्थित ज़मीन के संबंध में एक और आवंटन पत्र जारी किया गया। उक्त पत्र में यह दर्ज है कि प्लॉट का कुल क्षेत्रफल 1.841 एकड़ था, जिसमें से 1 एकड़ जमीन पहले ही यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया, प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया और प्रेस एसोसिएशन को संयुक्त रूप से आवंटित की जा चुकी थी। इस पत्र में आगे शेष 0.841 एकड़ जमीन प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और विदेश व्यापार संयुक्त महानिदेशक, वाणिज्य मंत्रालय को आवंटित करने का प्रस्ताव था। इसमें आगे यह भी परिकल्पना की गई थी कि पूरे प्लॉट पर एक मिश्रित भवन का निर्माण केंद्रीय लोक निर्माण विभाग द्वारा किया जाएगा, जिसमें विभिन्न आवंटिती उक्त आवंटन पत्र में निर्दिष्ट अनुपात में निर्मित स्थान को साझा करने के हकदार होंगे।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-7-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-7-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1785" class="aligncenter size-full wp-image-7543" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-7-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-7-300x209.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-7-1024x714.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-7-768x536.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-7-1536x1071.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-7-2048x1428.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-7-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p><strong>*</strong> 27.06.2000 की तारीख वाले पत्र का उद्देश्य प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया, प्रेस एसोसिएशन और वाणिज्य मंत्रालय के विदेश व्यापार के संयुक्त महानिदेशक के पक्ष में पहले किए गए आवंटनों को रद्द करना था।  उक्त संचार में आगे प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को 1244.76 वर्ग मीटर और याचिकाकर्ता को 620.76 वर्ग मीटर अतिरिक्त भूमि आवंटित करने का प्रावधान है; यह आवंटन उस 1400 वर्ग मीटर भूमि के अतिरिक्त है जो पहले ही प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को आवंटित की जा चुकी थी, और उस 2024 वर्ग मीटर भूमि के अतिरिक्त है जो पहले ही याचिकाकर्ता/यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया को आवंटित की जा चुकी थी।</p>
<p><strong>*</strong> इसके बाद, L&#038;DO द्वारा 30.03.2005 को यूएनआई को भेजे गए संचार के माध्यम से, 620.76 वर्ग मीटर का वह अतिरिक्त क्षेत्र रद्द कर दिया गया, जो यूएनआई को मूल रूप से आवंटित 2024 वर्ग मीटर भूमि के अतिरिक्त आवंटित किया गया था।<br />
 <br />
<a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-8-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-8-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1785" class="aligncenter size-full wp-image-7544" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-8-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-8-300x209.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-8-1024x714.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-8-768x536.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-8-1536x1071.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-8-2048x1428.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-8-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p><strong>*</strong> 09.10.2012 के पत्र के माध्यम से यह सूचित किया गया था कि सक्षम प्राधिकारी ने 9, रफी मार्ग, नई दिल्ली में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया के लिए एक मिश्रित भवन के निर्माण हेतु नेशनल बिल्डिंग्स कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड के माध्यम से स्वीकृति प्रदान कर दी है; यह स्वीकृति सेंट्रल पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट के स्थान पर दी गई है, जिसे पहले निष्पादन एजेंसी के रूप में परिकल्पित किया गया था। </p>
<p><strong>*</strong> 20.02.2018 को, यूएनआई ने भूमि और विकास कार्यालय (L&#038;DO) को एक पत्र भेजा, जिसमें यह स्पष्टीकरण मांगा गया था कि क्या याचिकाकर्ता, भारतीय प्रेस परिषद और शहरी विकास मंत्रालय के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता किया जाना चाहिए, इस तथ्य को देखते हुए कि तब तक लगभग 620 वर्ग मीटर का अतिरिक्त क्षेत्र केंद्रीय लोक निर्माण विभाग /सरकारी उपयोग के लिए निर्धारित किया जा चुका था। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-9-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-9-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1785" class="aligncenter size-full wp-image-7545" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-9-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-9-300x209.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-9-1024x714.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-9-768x536.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-9-1536x1071.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-9-2048x1428.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-9-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p><strong>*</strong> यूएनआई ने L&#038;DO को 30.05.2018 को एक रिमाइंडर भेजा, जिसमें उसने इस मामले में स्पष्टीकरण के लिए अपने अनुरोध को दोहराया।</p>
<p><strong>*</strong> यूएनआई ने L&#038;DO को 09.12.2019 को एक और पत्र भेजा, जिसमें L&#038;DO के कार्यालय में 29.11.2018 को हुई एक बैठक का ज़िक्र किया गया था। उस बैठक में यह बात सामने आई कि 620 वर्ग मीटर का वह अतिरिक्त क्षेत्र, जो पहले याचिकाकर्ता को आवंटित किया गया था और जिसका आवंटन बाद में 30.03.2005 के पत्र के ज़रिए रद्द कर दिया गया था, अब &#8216;प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया&#8217; को आवंटित करने का प्रस्ताव था। इसके परिणामस्वरूप, 620.76 वर्ग मीटर का वह क्षेत्र, अंततः 15.03.2021 के पत्र के जरिए &#8216;प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया&#8217; को आवंटित कर दिया गया। </p>
<p><strong>*</strong> 26. 23.11.2022 के एक पत्र के माध्यम से, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने एक आपत्ति उठाई, जिसमें कहा गया था कि यूएनआई ने कथित तौर पर 620 वर्ग मीटर भूमि के उस हिस्से पर एक रेस्तरां/कैंटीन चलाना शुरू कर दिया है, जो प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को आवंटित किया गया था; और यह कार्य उसने बिना किसी पूर्व सूचना के तथा आवंटन को नियंत्रित करने वाले नियमों और शर्तों का उल्लंघन करते हुए किया है।</p>
<p><strong>*</strong> 24.01.2022 के एक पत्र के माध्यम से, प्रस्तावित भवन के निर्माण के बाद और उसका कब्जा प्राप्त करने के उपरांत, उस भवन के 70% (सत्तर प्रतिशत) तक हिस्से को व्यावसायिक रूप से पट्टे पर देने की अनुमति मांगी थी। हालांकि, यूएनआई  ने प्रस्तावित इमारत के बन जाने के बाद उसके एक हिस्से को कमर्शियल तौर पर लीज़ पर देने की जो अनुमति माँगी थी, उसे L&#038;DO ने 29.03.2022 की बातचीत के ज़रिए नामंज़ूर कर दिया। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-10.jpg" alt="" width="1577" height="1864" class="aligncenter size-full wp-image-7546" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-10.jpg 1577w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-10-254x300.jpg 254w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-10-866x1024.jpg 866w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-10-768x908.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-10-1300x1536.jpg 1300w" sizes="auto, (max-width: 1577px) 100vw, 1577px" /></a></p>
<p><strong>*</strong> 18.05.2022 के एक ईमेल के ज़रिए बताया कि, मौजूदा आर्थिक हालात को देखते हुए, वह फ़िलहाल प्रस्तावित मिली-जुली इमारत के निर्माण में हिस्सा लेने में असमर्थ है और उसने प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया से अनुरोध किया कि या तो वह अपने शेयरधारकों द्वारा प्रस्तावित फ़ंड आने के नतीजे का इंतज़ार करे या फिर ज़मीन के अपने अलॉट किए गए हिस्से पर निर्माण का काम आगे बढ़ाए।</p>
<p><strong>*</strong> 19.07.2022 की एक चिट्ठी में यह दर्ज है कि प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने कई मौकों पर याचिकाकर्ता से 620 वर्ग मीटर ज़मीन खाली करने का अनुरोध किया था, जो उसे आवंटित की गई थी।  प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने 20.07.2022 के पत्र के ज़रिए L&#038;DO से इस मुद्दे को सुलझाने के लिए एक मीटिंग बुलाने का अनुरोध किया। हालांकि, यह मामला अनसुलझा ही रहा।</p>
<p><strong>*</strong> 08.08.2022 को यूएनआई द्वारा प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को भेजे गए एक ई-मेल में, यूएनआई ने फिर से कहा कि वह आर्थिक दिक्कतों की वजह से प्रस्तावित इमारत के निर्माण में हिस्सा लेने की स्थिति में नहीं है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-11.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-11.jpg" alt="" width="1577" height="1864" class="aligncenter size-full wp-image-7547" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-11.jpg 1577w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-11-254x300.jpg 254w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-11-866x1024.jpg 866w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-11-768x908.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-11-1300x1536.jpg 1300w" sizes="auto, (max-width: 1577px) 100vw, 1577px" /></a></p>
<p><strong>* </strong>12.01.2023 को L&#038;DO द्वारा यूएनआई को एक &#8216;कारण बताओ नोटिस&#8217; जारी किया गया।  </p>
<p><strong>*</strong>  14.02.2023 को &#8216;कारण बताओ नोटिस&#8217; के संबंध में एक अस्पष्ट और मनमाना जवाब प्रस्तुत किया। यूएनआई, अन्य बातों के साथ-साथ, यह कहा कि चूंकि उस समय उसके पास &#8216;निदेशक मंडल&#8217; नहीं था, इसलिए वह उक्त &#8216;कारण बताओ नोटिस&#8217; का समुचित जवाब देने में असमर्थ होगा।  </p>
<p><strong>*</strong> 29.03.2023 का वह विवादित निरस्तीकरण पत्र जारी किया गया, जिसके द्वारा यूएनआई के पक्ष में किया गया आवंटन रद्द कर दिया गया।</p>
<p><strong>*</strong> 12.02.2025 को CIRP की प्रक्रिया NCLT द्वारा को पारित एक आदेश के साथ समाप्त हुई, जिसके तहत सफल रिज़ॉल्यूशन आवेदक, यानी &#8216;द स्टेट्समैन लिमिटेड&#8217; द्वारा प्रस्तुत रिज़ॉल्यूशन योजना को मंज़ूरी दे दी गई। </p>
<p><strong>*</strong>  08.07.2025 को, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने एक आवेदन दायर किया, जिसमें अन्य बातों के अलावा यह आरोप लगाया गया कि यूएनआई विचाराधीन ज़मीन पर अनधिकृत निर्माण कार्य कर रहा है; इसके साथ ही, यह निर्देश देने की मांग की गई कि उस स्थल (साइट) पर सभी प्रकार के निर्माण कार्य तत्काल रोक दिए जाएं। <br />
<strong><br />
*</strong> 13.08.2025 को, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने इसके बाद एक और आवेदन दायर किया, जिसमें अन्य बातों के अलावा यह निर्देश देने की मांग की गई कि यूएनआई को किसी भी प्रकार की बाधा या रुकावट पैदा करने से रोका जाए। </p>
<p><strong>*</strong> 11.07.2025 और 18.08.2025 के आदेशों के माध्यम से, न्यायालय ने भूमि और विकास कार्यालय को निर्देश दिया कि वह संबंधित स्थल का भौतिक निरीक्षण करे, ताकि यह जांच की जा सके कि क्या वहाँ कोई नया निर्माण हुआ है, और उसके बाद एक स्थिति रिपोर्ट रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करे।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-12.jpg" alt="" width="1168" height="1862" class="aligncenter size-full wp-image-7548" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-12.jpg 1168w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-12-188x300.jpg 188w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-12-642x1024.jpg 642w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-12-768x1224.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-12-964x1536.jpg 964w" sizes="auto, (max-width: 1168px) 100vw, 1168px" /></a></p>
<p><strong>* </strong>14.07.2025 को, उक्त निरीक्षण किया गया और इस संबंध में एक निरीक्षण/स्थिति रिपोर्ट L&#038;DO द्वारा दिनांक 04.08.2025 को दायर की गई, जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि यूएनआई द्वारा अनधिकृत निर्माण गतिविधियाँ की जा रही थी, और ऐसी गतिविधियों के परिणामस्वरूप संबंधित भूखंड की प्रकृति में बदलाव आ गया था। </p>
<p><strong>*</strong> 24.09.2025 को, यूएनआई आरोपों का खंडन करते हुए एक जवाब दाखिल किया, और यह तर्क देने की मांग की कि केवल मरम्मत और नवीनीकरण का काम किया गया था, और संबंधित ज़मीन पर कोई स्थायी ढांचा नहीं बनाया गया था।</p>
<p><strong>* </strong>09.07.2025 को, याचिकाकर्ता ने भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष को एक पत्र लिखा, जिसमें उसने तत्काल आधार पर निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने का अपना इरादा व्यक्त किया। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-13.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-13.jpg" alt="" width="1161" height="1316" class="aligncenter size-full wp-image-7549" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-13.jpg 1161w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-13-265x300.jpg 265w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-13-903x1024.jpg 903w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letter-13-768x871.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1161px) 100vw, 1161px" /></a></p>
<p><strong>*</strong> 19.08.2025 के पत्र के माध्यम से, यूएनआई ने भारतीय प्रेस परिषद को एक और पत्र लिखा, जिसमें उसने भारतीय प्रेस परिषद द्वारा एकतरफा रूप से संपत्ति की स्थिति को बदलने के प्रयास पर आपत्ति जताई; इस प्रयास में संबंधित ज़मीन पर अपना बोर्ड लगाना भी शामिल था। </p>
<p><strong>*</strong>  21.08.2025 को भारतीय प्रेस परिषद ने पत्र के माध्यम से यूएनआई को एक जवाब भेजा, जिसमें यह दावा किया गया कि आवंटन पत्रों में निहित शर्तों के अनुसार निर्माण कार्य न कर पाने का कारण यूएनआई की ओर से हुई चूक थी।<br />
 <br />
<strong>*</strong> 27.08.2025 को L&#038;DO द्वारा याचिकाकर्ता को एक पत्र भेजा गया। </p>
<p><strong>*</strong> 19.09.2025 को न्यायालय द्वारा पारित आदेश के अनुपालन में, विचाराधीन संपत्ति का एक और संयुक्त निरीक्षण किया गया। </p>
<p><strong>*</strong> 24.09.2025 की निरीक्षण रिपोर्ट से पुनः यह संकेत मिलता है कि यूएनआई द्वारा संपत्ति पर कुछ अनधिकृत निर्माण किए गए थे, जो न्यायालय द्वारा पारित &#8216;यथास्थिति&#8217; आदेश का स्पष्ट उल्लंघन है। </p>
<p><strong>*</strong>  24.09.2025 की उक्त निरीक्षण रिपोर्ट पर यूएनआई आपत्ति जताई है और जवाब में तर्क दिया है कि कोई भी अनाधिकृत निर्माण कार्य नहीं किया गया था, और मौजूदा संरचना पर केवल नवीनीकरण और मरम्मत का काम किया गया था।</p>
<figure id="attachment_7550" aria-describedby="caption-attachment-7550" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-5-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-5-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7550" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-5-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-5-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-5-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-5-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-5-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7550" class="wp-caption-text">यूएनआई कार्यालय से न्यायालय आदेश के बाद पत्रकारों, गैर-पत्रकारों को परिसर खाली कराते दिल्ली पुलिस के कर्मी। तस्वीर: संजय शर्मा </figcaption></figure>
<p><strong>आगे क्या हुआ सभी जानते हैं। </strong></p>
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		<title>बिहार के पांचवें ​महामहिम अयंगार​ के बाद 42वें महामहिम आरिफ मोहम्मद खान​ पधारे थे कोसी-मिथिला क्षेत्र मैथिली भाषा भाषी को सूत्रबद्ध करने &#8211; 88.4 एफएम बजाना न भूलें</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 22 May 2025 06:28:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मुखियाजी उवाच]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सहरसा / पटना / नई दिल्ली : हिन्दू धर्म के अठारह प्रमुख पुराणों में &#8216;वायु पुराण&#8217; में एक श्लोक है &#8220;मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना​ &#8211; कुंडे कुंडे नवं पयः ​- जातौ जातौ नवाचाराः ​- नवा वाणी मुखे मुखे​&#8221; ​अर्थात जितने मनुष्य हैं, उतने विचार ​हैं। एक ही गाँव के अंदर अलग-अलग कुऐं के पानी का स्वाद [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/head-prowess/after-the-fifth-governor-of-bihar-the-42nd-had-visited-kosi-mithila-region">बिहार के पांचवें ​महामहिम अयंगार​ के बाद 42वें महामहिम आरिफ मोहम्मद खान​ पधारे थे कोसी-मिथिला क्षेत्र मैथिली भाषा भाषी को सूत्रबद्ध करने &#8211; 88.4 एफएम बजाना न भूलें</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सहरसा / पटना / नई दिल्ली : हिन्दू धर्म के अठारह प्रमुख पुराणों में &#8216;वायु पुराण&#8217; में एक श्लोक है &#8220;मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना​ &#8211; कुंडे कुंडे नवं पयः ​- जातौ जातौ नवाचाराः ​- नवा वाणी मुखे मुखे​&#8221; ​अर्थात जितने मनुष्य हैं, उतने विचार ​हैं। एक ही गाँव के अंदर अलग-अलग कुऐं के पानी का स्वाद अलग-अलग होता ​है। एक ही संस्कार के लिए अलग-अलग जातियों में अलग-अलग रिवाज होता है तथा एक ही घटना का बयान हर व्यक्ति अपने-अपने तरीके से करता है।​ वायु पुराण का यह श्लोक मिथिला-भारत, मिथिला-बिहार, कोसी-मिथिला&#8217; में अक्षरशः ​लागू होता है। चाय की दूकान से लेकर शाश्त्रार्थ हेतु ​बने कक्ष तक भ्रमण-सम्मेलन करके देख लीजिये​ &#8211; लाखों नहीं, करोड़ों लोग मिलेंगे जो मैथिली भाषा भाषी होने के बावजूद​,​ वैचारिक मतभेद के कारण अलग- विचारधाराओं में बह रहे हैं। लेकिन ईस्ट एंड वेस्ट 88.4 एफएम रेडियो शीघ्र ही मिथिला-मैथिल और मैथिली को &#8216;मेरा नहीं&#8217;, अपितु &#8216;हमारा व्यवहार&#8217; है, में तब्दील करने जा रहा है। </strong></p>
<p>इस बात का यहाँ इसलिए जिक्र कर रहा हूँ कि सम्पूर्ण भारत के साथ-साथ विश्व के कोने-कोने में रहने वाले मैथिली भाषा-भाषी लोगों की संख्या कितनी है, यह आज़ादी के 78 वर्ष बाद भी &#8216;स्पष्ट&#8217; नहीं है​, प्रदेश के मुख्यमंत्री ​नीतीश कुमार भले राजनीतिक लाभ के लिए जातिगत जनगणना एक बार नहीं, सौ बार करा लें। लेकिन आखिर कहीं न कहीं, किसी न किसी आंकड़े को मानकर चलना पड़ेगा। एक आंकड़े के अनुसार भारत में लगभग सात करोड़ लोग हैं जो मैथिली भाषा​ भाषी हैं। इसमें विद्वान से लेकर विदुषी तक ​सभी की गणना है​, चाहे वे​ इस पृथ्वी पर कहीं भी रहते हों। </p>
<p><strong>अब, जब भारत सरकार द्वारा मैथिली भाषा को उच्चतम स्थान प्रदान करने के लिए भारत के संविधान को मैथिली में अनुवाद  करने की बात आयी और इन सात करोड़ मैथिली भाषा​ भाषी लोगों, विद्वानों, विदुषियों, शास्त्रार्थ कर्ताओं में से भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय​, मधेपुरा की संबंध इकाई ईस्ट एंड वेस्ट टीचर्स ट्रेंनिंग कॉलेज​, पटुवाहा​, सहरसा में भारतीय भाषा संस्थान​, मैसूर​, शिक्षा मंत्रालय​, भारत सरकार के राष्ट्रीय अनुवाद मिशन द्वारा भारतीय संविधान का मैथिली अनुवाद हेतु दस दिवसीय कार्यशाला का आयोजन ​किया ​गया और फिर  भारतीय भाषा संस्थान​, मैसूर के अधिकारी डॉ तारीख खान ​द्वारा  ईस्ट एंड वेस्ट टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज​, सहरसा के अध्यक्ष डॉ रजनीश रंजन को ​समन्वयक ​चुना गया &#8211;  यह सम्मान उन सात करोड़ मैथिली भाषा​ भाषी लोगों से अलग तो अवश्य कर  देता हैं​ डॉ. रजनीश रंजन-श्रीमती मनीषा रंजन को। आप माने या नहीं माने, बतकुच्चन करें या राजनीति करें​, सच तो यही है।</strong> </p>
<figure id="attachment_6600" aria-describedby="caption-attachment-6600" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-2.jpg" alt="" width="1600" height="1066" class="size-full wp-image-6600" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-2.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-2-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-2-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-2-1536x1023.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6600" class="wp-caption-text">उद्घाटन से पूर्व सरस्वती की अर्चना करते महामहिम</figcaption></figure>
<p>​कहते हैं कि मैथिली का मानक रूप सोतीपुरा है जिसे मध्य मैथिली भी कहा जाता ​है। मुख्य रूप से दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया, समस्तीपुर, अररिया और सहरसा जिलों में बोली जाती ​है। नेपाल में यह धनुषा, महोत्तरी, सिराहा, सप्तरी, सरलाही और सुनसारी और मोरंग जिलों में बोली जाती है। बज्जिका बोली जिसे पश्चिमी मैथिली के नाम से भी जाना जाता है, मुख्य रूप से सीतामढी, मुजफ्फरपुर, वैशाली और शिवहर जिलों और नेपाल के रौतहट और सरलाही जिलों में बोली जाती है। थोथी बोली मुख्य रूप से कोसी, पूर्णिया​, मुंगेर​, मोकामा और नेपाल के कुछ निकटवर्ती जिलों में बोली जाती है। जबकि अंगिका बोली मुख्य रूप से भागलपुर, बांका, मुंगेर​, झारखंड के गोड्डा, साहेबगंज, दुमका जिलों में और उसके आसपास बोली जाती है। </p>
<p>​<strong>आइये चलते हैं सहरसा के पटुवाहा गाँव स्थित ईस्ट एंड वेस्ट टीचर्स ट्रेंनिंग कॉलेज​ जहाँ विगत दिनों कोसी-मिथिला क्षेत्र के इतिहास में शायद पहली बार प्रदेश का कोई राज्यपाल का भ्रमण-सम्मेलन हुआ था &#8211; एक सकारात्मक पहल को मूर्त रूप देने। </strong></p>
<p>साठ के दशक के उत्तरार्ध कोसी-मिथिला क्षेत्र में जो जन्म लिए, शायद वे अपने जिला में अब तक किसी लाट साहब के आगमन का चश्मदीद गवाह नहीं हुए होंगे। उस कालखंड के पूर्वार्ध जन्म लिए लोगों को शायद याद होगा कि प्रदेश के पांचवें राज्यपाल महामहिम की मदभूषि अनंतशयनं अयंगार​, जो आजादी के बाद प्रदेश के पांचवें राज्यपाल थे ((12 मई, 1962 से 06 दिसंबर, 1967) सहरसा जिले के बनगाँव-महिषी स्थित उग्रतारा स्थान व मंडन धाम पर ​पधारे थे। आज भी महिषी गांव में एक पौराणिक सड़क का नाम राजपाल रोड के नाम से जाना ​जाता है। </p>
<blockquote><p>महामहिम अयंगार​ के बाद राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान प्रदेश के 42 वें महामहिम हैं जो कोसी-मिथिला क्षेत्र के पटुवाहा गाँव पधारे थे। यानी स्वाधीनता के बाद बिहार में अब तक 42 राज्यपाल बने, लेकिन दो को छोड़कर किसी ने भी गंगा-कोसी नदियों की धाराओं को नहीं लांघे। इस दृष्टि से आप स्वयं इस क्षेत्र की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक गरिमा के प्रति प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में बैठे लोगों की मानसिकता को आंक सकते हैं &#8211; क्योंकि कोसी-मिथिला क्षेत्र का यह इलाका सरस्वती का मंदिर के रूप में भी जाना जाता है।</p></blockquote>
<p>सहरसा जिले की स्थापना 1 अप्रैल, 1954 को हुआ और इन 71 वर्षों में सहरसा में कितना विकास हुआ सरकारी स्तर पर, यह सहरसा के मतदाता तो जानते ही हैं, अधिकारी, पदाधिकारी, विधायक, सांसद और सरकार के नुमाइंदे भी अवगत है। समस्या चाहे शिक्षा की हो, स्वास्थ्य की हो, सड़क की हो, रोजगार की हो, विकास की हो, संस्कृति की हो, भाषा की हो, गरिमा की हो, सोच की हो।​ </p>
<figure id="attachment_6601" aria-describedby="caption-attachment-6601" style="width: 2035px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-5.jpg" alt="" width="2035" height="1199" class="size-full wp-image-6601" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-5.jpg 2035w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-5-300x177.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-5-1024x603.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-5-768x452.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-5-1536x905.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2035px) 100vw, 2035px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6601" class="wp-caption-text">​श्रीमती मनीषा रंजन राज्यपाल का स्वागत करती</figcaption></figure>
<p><strong>लेकिन पटुवाहा स्थित ईस्ट एंड वेस्ट टीचर्स ट्रेंनिंग कॉलेज​ और उसके संस्थापक डॉ. रजनीश रंजन-श्रीमती मनीषा रंजन ​का मैथिली भाषा के उन्नयन में कितना योगदान रहा, यह तो मैथिली में अनुवादित भारत का संविधान कई दशकों तक गवाही देता रहेगा। इतना ही नहीं, राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ​द्वारा ईस्ट एण्ड वेस्ट 88.4 एफएम रेडियो​, जिसका वह विधिवत प्रसारण हेतु उद्घाटन ​भी किया, की आवाज &#8216;ट्रांसमिशन और एप्लिकेशन&#8217; के माध्यम से विश्व के कोने कोने तक पहुंचेगा ताकि मैथिली भाषा भाषी लोगों को अपनी जमीन, अपनी संस्कृति, अपनी गरिमा, अपना ज्ञान, अपने धरोहर आदि के बारे में जानकारी भी मिले और वे भागीदार भी बनें। </strong></p>
<p>जब डॉ. रजनीश रंजन से पूछा कि प्रदेश के मुख्यालय से करीब 225 किलोमीटर दूर, व्यावहारिक और आधुनिक दृष्टि से पिछड़े इस इलाके में &#8216;शिक्षक-प्रशिक्षण विद्यालय खोलना&#8217; और फिर &#8216;88.4 एफएम रेडियो&#8217; का उद्घोषण के पीछे की क्या कहानी है जबकि भारत के 113 शहरों में 388 निजी एफएम रेडियो स्टेशन संचालित हैं​ ? </p>
<p>​डॉ. रंजन पहले मुस्कुराये और फिर लम्बी सांस लेते कहते हैं: &#8220;ईस्ट एंड वेस्ट शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज का उद्देश्य शिक्षा देना तो है ही, ठोस नैतिक आधार पर शिक्षण के पेशे को विकसित करना भी है। यह आवश्यक नहीं है कि शिक्षित लोगों में भी नैतिकता हो ही। आज ही नहीं, कल भी और आने वाले दिनों में भी समाज में शिक्षकों की आवश्यकता होगी ही। अगर वर्तमान स्थिति को देखें तो आज समाज में बेहतर शिक्षकों की भी किल्लत है। अगर छात्र-छात्राएं भारत का भविष्य हैं, तो शिक्षक भी राष्ट्र के निर्माता हैं।&#8221;</p>
<p><strong>डॉ. रंजन कहते हैं कि &#8220;छात्र-छात्राओं को हम बेहतर और नैतिक आधार पर मजबूत शिक्षा तब तक नहीं दे सकते, जब तक शिक्षकों का विशाल समूह बेहतर जानकार और नैतिकता-बौद्धिकता की कसौटी पर खड़े न उतरें। हम दंपत्ति के साथ-साथ इस संस्थान से जुड़े सभी लोग वही कर रहे हैं। हमें ख़ुशी है कि इस शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय की स्थापना के बाद आज तक हम 3000 से अधिक छात्र-छात्राओं को प्रदेश का बेहतरीन अध्यापक बनाने में सफल रहे हैं जो आज निजी क्षेत्रों के साथ-साथ सरकारी क्षेत्र के शैक्षणिक संस्थानों अध्यापन का कार्य कर रहे हैं।&#8221;</strong></p>
<p>&#8220;जहाँ तक रेडियो स्टेशन का सवाल है,&#8221; डॉ. रंजन आगे कहते हैं कि &#8220;इसकी एक लम्बी कहानी है। दो दशक पहले शिक्षा प्राप्त करने के क्रम में मैं भी पत्रकारिता की शिक्षा के प्रति उन्मुख हुआ था। पटना विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में शिक्षा प्राप्त किया। उसी काल खंड में पटना में रेडियो मिर्ची का आगमन हुआ था और वे अपने संस्थान में नए-नए पत्रकारों की नियुक्ति करने के लिए आवेदन मांगे थे। उन दिनों आकाशवाणी पटना के वरिष्ठ अधिकारी श्री के.के. लाल, जो हम सभी को पत्रकारिता का वर्ग भी लेने आते थे, आवेदन प्रेषित करने के लिए कहे। कई इच्छुक अभ्यर्थी आवेदन भी प्रेषित किये। मैं भी एक था उनमें।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/2.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/2.jpeg" alt="" width="512" height="267" class="alignleft size-full wp-image-6602" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/2.jpeg 512w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/2-300x156.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 512px) 100vw, 512px" /></a></p>
<blockquote><p>&#8220;मैने अपने बारे में &#8211; नाम, पता, सम्पर्क, शिक्षा आदि &#8211; जो भी लिखा था, उसका शीर्षक &#8216;आत्मवृत&#8217; लिखा। रेडियो मिर्ची के अधिकारी उस शब्द को देखकर &#8216;भड़क&#8217; गए और मेरी उम्मीदवारी को निरस्त कर दिए। वहां उपस्थित कई लोग &#8216;आत्मवृत&#8217; शब्द को सुनकर हंसे भी। जो मेरे मित्र थे, वे मेरी उम्मीदवारी को निरस्त होते देख दुखी हो गए। फिर अपने माता-पिता को नमन करते, हंसते-मुस्कुराते मैं यह कहते निकला कि चलो अब अपना ही रेडियो स्टेशन खोलेंगे।&#8221;</p></blockquote>
<p>डॉ. रंजन कहते हैं: &#8220;लोगों को यह ज्ञान नहीं होता, अथवा आधुनिकता के प्रवाह में लोग यह नहीं समझना चाहते, समझते कि सरस्वती कब हमारी जिह्वा पर बैठेंगी, समय कब लोगों के मुख से कौन सा शब्द निकलेगा, नहीं जानते। कोसी-मिथिला क्षेत्र में सरस्वती का साक्षात् निवास है। शायद उन दिनों देवी सरस्वती मेरी जिह्वा पर बैठी थी &#8211; अब अपना ही रेडियो स्टेशन खोलेंगे &#8211; और दो दशक बाद कोसी-मिथिला क्षेत्र स्थित सहरसा में माननीय राज्यपाल के हाथों एफएम 88.4 रेडियो का शुभारम्भ शायद उसी कड़ी के एक श्रृंखला है। वैसे देश के 234 नए शहरों में 730 नए निजी एफएम रेडियो चैनलों और खुलने वाले हैं जिसकी स्वीकृति माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार दे दी है।&#8221;</p>
<p>डॉ. रंजन से जब पूछा कि प्रदेश के मुख्यालय से इतनी दूर इस रेडियो के मध्य से आप क्या कहना चाहते हैं श्रोताओं को? डॉ. रंजन कहते हैं: &#8220;हमारे प्रयास की सफलता अथवा यहाँ तक पहुँचने में समाज के सभी लोग, शुभेक्षु, प्रसंशक, आलोचक तो हैं ही, सबसे बड़ी ताकत बने हमारे भाई श्री उदयनारायण सिंह &#8216;नचिकेता&#8217; और मेरी अर्धांगिनी श्रीमती मनीषा रंजन जी। मनीषा जी इस रेडियो के महानिदेशक भी हैं।&#8221;</p>
<p><strong>वे कहते हैं कि &#8220;ईस्ट एण्ड वेस्ट 88.4 एफएम सम्पूर्णता के साथ मिथिला-बिहार, मधुबनी-मिथिला और कोसी-मिथिला के लोगों को समर्पित है चाहे वे मिथिला के भौगोलिक क्षेत्र में रहते हों अथवा रोजीरोटी के खातिर विश्व के किसी कोने में रहते हों। हम संयोग को प्रयोग कर व्यावहारिकता में सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं। हम मैथिली भाषा, मिथिला की संस्कृति विरासत, मिथिला की भाषा, साहित्य, व्यंजन, गरिमा, मिथिला की पौराणिक शिक्षा, मिथिला का अनुशासन, कला, शिल्प, लोक चित्रकला, इतिहास, पुरातत्व, सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाज, धार्मिक स्थान आदि को शब्दों के माध्यम से, कार्यक्रमों के माध्यम से प्रत्येक लोगों के दरवाजे तक पहुँचाना चाहते हैं। कुछ रेडियो के ट्रांसमिशन से पहुंचेंगे और शेष विज्ञान के विकास के साथ एप्लीकेशंस से। हम चाहेंगे कि विश्व में रहने वाला प्रत्येक मैथिली भाषा भाषी अपनी भाषा के माध्यम से एक दूसरे से जुड़ें। कभी कोई श्रोता बनें तो कभी कोई वाचक।&#8221;</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-6.jpg" alt="" width="2035" height="1199" class="aligncenter size-full wp-image-6603" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-6.jpg 2035w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-6-300x177.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-6-1024x603.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-6-768x452.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-6-1536x905.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2035px) 100vw, 2035px" /></a></p>
<p>वैसे, डॉ. रंजन दंपत्ति का मानना है कि वैसे आज रेडियो की किल्लत नहीं है देश में, लेकिन हमारी सोच &#8216;आकस्मिक&#8217; नहीं है। हम भाषा, शब्द, मिलावट के मामले में कभी भी समझौता नहीं करेंगे। हम कभी नहीं चाहेंगे कि रेडियो में प्रसारण के माध्यम से जिन शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं, वह शब्द कर्ण प्रिय नहीं हो, वह शब्द आत्मा तक नहीं पहुंचे। आज भी रेडियो ही एक ऐसा माध्यम है जो गाँव के खेतों के आड़ पर रखकर सुना जाता है। हमारी पहुँच समाज के कोने-कोने तक है। विज्ञान के विकास, मोबाईल और एप्लिकेशन के विकास के साथ साथ यह और भी बेहतर हो गया है। हमारी कोशिश होगी कि हम समय की महत्ता को स्वीकारते, वैज्ञानिक आविष्कारों के माध्यम से, अपने रेडियो के सहारा समाज में सकारात्मक बातों को लेकर पहुंचें। मनोरंजन तो होगा ही, लेकिन लन्दन, अमेरिका, फ़्रांस, जर्मनी, जापान में रहने वाली &#8216;धीया&#8217; (बेटियां) जब अपनी बात यहाँ कहेंगी &#8216;धीया से सिया&#8217; कार्यक्रम में तो कोसी-मिथिला, मधुबनी- मिथिला, मिथिला-बिहार की बेटियों को, बहुओं को, बहनों की सोच भी बदलेगी, वे भी जीवन में आगे बढ़ने के बारे में सोचेंगी।&#8221;</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/head-prowess/after-the-fifth-governor-of-bihar-the-42nd-had-visited-kosi-mithila-region">बिहार के पांचवें ​महामहिम अयंगार​ के बाद 42वें महामहिम आरिफ मोहम्मद खान​ पधारे थे कोसी-मिथिला क्षेत्र मैथिली भाषा भाषी को सूत्रबद्ध करने &#8211; 88.4 एफएम बजाना न भूलें</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>तिहाड़ जेल-5 ✍ उस रास्ते का अंत &#8216;शौचालय&#8217; में था 👣 तभी चार्ल्स शोभराज दिल्ली पुलिस के गिरफ्त में आ गया 👁 फिर जेल से भागने के लिए</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 30 Mar 2025 07:11:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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		<category><![CDATA[charles shobhraaj]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>जेलरोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली : भारत को आज़ाद होने से कोई तीन वर्ष पहले 6 अप्रैल, 1944 को एक भारतीय पिता और एक वियतनामी माँ के यहाँ साइगॉन (बियतनाम) में जन्मे हतचंद भाओनानी गुरुमुख शोभराज यानी 81-वर्षीय चार्ल्स शोभराज अपने जीवन का चालीस से अधिक बहुमूल्य वर्ष, विश्व के अन्य कारावासों की बात न भी [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-end-of-that-road-was-in-the-toilet-when-charles-sobhraj-was-caught">तिहाड़ जेल-5 ✍ उस रास्ते का अंत &#8216;शौचालय&#8217; में था 👣 तभी चार्ल्स शोभराज दिल्ली पुलिस के गिरफ्त में आ गया 👁 फिर जेल से भागने के लिए</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जेलरोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली : भारत को आज़ाद होने से कोई तीन वर्ष पहले 6 अप्रैल, 1944 को एक भारतीय पिता और एक वियतनामी माँ के यहाँ साइगॉन (बियतनाम) में जन्मे हतचंद भाओनानी गुरुमुख शोभराज यानी 81-वर्षीय चार्ल्स शोभराज अपने जीवन का चालीस से अधिक बहुमूल्य वर्ष, विश्व के अन्य कारावासों की बात न भी करें तो भारत और नेपाल के कारावासों में गुजारे है। &#8220;लोहों को चकित करने की आदत से ओत-प्रोत जीवन शैली वाला चार्ल्स शोभराज अंततः नेपाल से रिहाई के बाद आजकल फ़्रांस में दिखाई दे रहे हैं। तत्कालीन दस्यु महारानी फूलन देवी की रिहाई (1994) के तीन साल बाद फरवरी 1997 में अपनी 20-वर्षीय कारावास की सजा पूरी करने के बाद वैसे शोभराज को फ्रांसीसी अधिकारियों को सौंप दिया गया था, लेकिन कुछ ही वर्ष बाद नेपाल में उनकी गिरफ्तारी हुई थी।</strong> </p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=tRFQW6NNUNA&#038;t=120s">@अखबारवाला001 (233) ✍ दिल्ली के तिहाड़ कारावास में वह सब कुछ होता है जो कारावास में नहीं होनी चाहिए 😢</a></p>
<p>नब्बे के दशक में दिल्ली से प्रकाशित अख़बारों, पत्रिकाओं में दो लोगों &#8211; एक महिला और एक पुरुष &#8211; का नाम बहुत अधिक प्रमुखता के साथ प्रकाशित होता था। एक थीं बागी फूलन देवी, जिन्हें ग्वालियर जेल से तिहाड़ जेल हस्तानांतरित किया गया था और दूसरे थे &#8211; चार्ल्स शोभराज। ग्वालियर जेल से तिहाड़ हस्तानांतरण के बाद फूलन देवी के परिवार के लोग, खासकर उनके चाचा हरफूल सिंह और उनका परिवार अत्यधिक सचेष्ठ था ताकि वे शीघ्र ही जेल से रिहाई हो। फूलन देवी की रिहाई में और रिहाई के बाद राजनीति में प्रवेश के लिए दो समाजवादी नेताओं को सर्वाधिक श्रेय दिया जा सकता है। एक: मुलायम सिंह यादव और दूसरे: अमर सिंह। तिहाड़ कारावास से रिहाई के बाद फूलन देवी वर्षों भारत के संसद में विराजमान रहीं। वहीँ चार्ल्स शोभराज तिहाड़ से रिहाई के बाद सैद्धांतिक रूप से भले फ़्रांस के अधिकारियों को सौंपे गए हों, कुछ ही साल बाद नेपाल पुलिस के गिरफ्त में आ गए और लगभग 19 वर्ष तक नेपाल के कारावास में बंद रहे। </p>
<blockquote><p>कहते हैं 60 के दशक की शुरुआत में भारत आने से पहले, चार्ल्स एक किशोर अपराधी थे। छोटे-मोटे अपराधों के ज़रिए छोटी-छोटी रकम कमाना और भारत पहुंचना उनका मकसद था। विज्ञान में स्नातक करने के बाद, चार्ल्स शोभराज 1967 के आसपास पहले 1967 के आसपास भारत आये और फिर नवंबर 1971 में।  कहते हैं उस कालखंड में उपासपोर्ट नहीं होने के कारण वे दिल्ली पुलिस के गिरफ्त में आये। वह बहुत छोटी बात थी। जेल आना-जाना उसकी रोजमर्रे की आदत जैसी हो गई थी। शोभराज खुद को एक आकर्षक व्यक्ति के रूप में पेश करता था। वह विदेशियों से दोस्ती करता था, उन्हें नशीला पदार्थ खिलाता था और लूटता था। यह उसका काम करने का तरीका था।</p></blockquote>
<figure id="attachment_6254" aria-describedby="caption-attachment-6254" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-SUNDAY.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-SUNDAY.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6254" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-SUNDAY.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-SUNDAY-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-SUNDAY-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-SUNDAY-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-SUNDAY-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6254" class="wp-caption-text">संडे पत्रिका (आनंद बाजार पत्रिका समूह) की विशेष कहानी</figcaption></figure>
<p>भारत से रिहाई के बाद शोभराज 2003 में नेपाल गए जहाँ उसे गिरफ्तार किया गया और मुकदमा चलाया गया।  मुकदमें में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। 21 दिसंबर 2022 को नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने उसे उसकी बढ़ती उम्र के कारण जेल से रिहा करने का आदेश दिया, जबकि वह अपनी जेल की सज़ा के 19 साल काट चुका था। काठमांडू में, शोभराज 29 वर्षीय अमेरिकी रेडियोलॉजी छात्र कोनी जो ब्रोंज़िच और 26 वर्षीय कनाडाई बैकपैकर और मौसमी खनिक लॉरेंट कैरियर की हत्या के लिए 20 साल की आजीवन कारावास की सजा काट रहा था। कहते हैं वह हर व्यक्ति के मनोविज्ञान को पढ़ सकता था और ठीक से समझ जाता था कि वे क्या चाहते हैं। शोभराज ने अपराध के अंतर्राष्ट्रीय जीवन की शुरुआत की और 1975 में थाईलैंड में पहुँच गए। शिष्ट और परिष्कृत, वह एक युवा अमेरिकी महिला की हत्या में शामिल था, जिसका शव बिकनी पहने हुए समुद्र तट पर पाया गया था। &#8220;बिकनी किलर&#8221; के नाम से प्रसिद्ध शोभराज पर दर्जनों हत्याओं का आरोप लगाया गया।</p>
<figure id="attachment_6261" aria-describedby="caption-attachment-6261" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Nepal1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Nepal1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6261" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Nepal1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Nepal1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Nepal1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Nepal1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Nepal1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6261" class="wp-caption-text">चार्ल्स शोभराज नेपाल में</figcaption></figure>
<p><strong>आइये चलते हैं तिहाड़ जेल के पूर्व जेलर सुनील कुमार गुप्ता के पास जिन्होंने तिहाड़ के एक-एक कैदियों को हजी नहीं, तिहाड़ की भौगोलिक स्थिति को ही नहीं, वहां की गिरती-लुढ़कती प्रशासनिक व्यवस्था और उस व्यवस्था में गोंते लगाते कई एक भ्रष्ट अधिकारीयों, कर्मचारियों को अपने 35-वर्ष के सेवा काल में देखे थे। वैसे तिहाड़ जेल के अंदर चार्ल्स शोभराज की कहानियां ऐतिहासिक हो सकती है, लेकिन उसके जेल से भागने की तुलना में वे नगण्य हैं।</strong> </p>
<p>शोभराज के जेल से भागने की घटना 6 जुलाई, 1976 को हुई थी। यद्यपि वह भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में कई हत्याओं के सिलसिले में खोजा जा रहा था, उसके ऊपर 60 फ़्रांसिसी पर्यटकों को नशा देने के प्रयास में प्रत्यावर्तन का भी मुकदमा चल रहा था। लेकिन जिस आदमी ने दुनिया भर के लोगों को मुर्ख बनाया था, अंततः वह दिल्ली में पकड़ा गया था। दिल्ली के विक्रम होटल में 60 पर्यटकों को नशा खिलाकर लूटने की उसकी कोशिश विफल हो गयी थी। उसने सैलानियों को नशे की जो खुराक दी थी, वह थोड़ी काम थी और उसके शिकारों को डायरिया हो गया था। शोभराज के ऊपर संदेह करते हुए उन्होंने होटलवालों पर पुलिस बुलाने और उससे पूछताछ करने गिरफ्तार करने का दबाव डाला। अतः इस मामले में शोभराज की योजना शौचालय में पहुंचकर उलटी पर गयी। यानी चार्ल्स शोभराज की पहली पकड़ शौचालय में हुई। </p>
<figure id="attachment_6255" aria-describedby="caption-attachment-6255" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-3.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="size-full wp-image-6255" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-3.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-3-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-3-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6255" class="wp-caption-text">तिहाड़ जेल के पूर्व जेलर सुनील कुमार गुप्ता</figcaption></figure>
<p><strong>सुनील गुप्ता के अनुसार, &#8220;वास्तव वह अकेला मामला नहीं था, जिसमें वह सजा काट रहा था। उसके ऊपर 3 जनवरी, 1976 को वाराणसी में एक इजरायली नागरिक एलन एरन जैकब्स की हत्या का भी आरोप था। उसने उसके मामले में भी नशीली दबाव का प्रयोग किया था। शोभराज और एक अन्य विदेशी, एक महिला, ने वाराणसी के नटराज होटल में जैकब्स और मोहन लाल नमक एक भारतीय के साथ प्रवेश किया। एक और जहाँ मोहन लाल और जैकब्स एक ही कमरे में एक साथ ठहरे, वहीँ दूसरी ओर शोभराज और वह महिला ने फ़्रांसिसी दंपत्ति होने का बहाना बनाकर मिस्टर नैपियर पोनेंट और मिसेज निकोल पोनेंट के छद्म नाम से होटल में प्रवेश किया। अगले दिन वे दोनों उस होटल से यह बहाना बनाकर निकल आये कि उन्हें उसके बजाय क्लर्क होटल में ठहरना पसंद है। वे दोनों उस होटल में इस बार श्रीमती एवं श्री एलन जैकब्स के नकली नाम से क्लर्क होटल में ठहरे और उन्होंने भुगतान करने के लिए जैकब्स के फॉरेक्स ट्रैवेलर्स चेक का प्रयोग किया।</strong> </p>
<p>5 जनवरी को वे दोनों होटल नटराज में वापस गए और वहां जैकब्स और मोहन लाल के बारे में पूछताछ की। होटल के कर्मचारी ने उन्हें बताया कि पिछली रात जब एक परिचारक उसके कमरे में पानी देने गया था तो वह जीवित था और उसने शोभराज को मोहन लाल को कोई गोली देते हुए देखा था। कुछ घंटे बाद वह दंपत्ति और मोहन लाल वहां से चले गए थे, लेकिन जैकब्स जिनक फॉस्फेट के जहर से मरा पड़ा पाया गया था। </p>
<p>16 मार्च, 1986 को रविवार था और उस दिन गुप्ता जी की छुट्टी थी। बाद में वह कहानी कई बार सुने तो उन्होंने महसूस किया कि काश !! उस दिन वे वहां होते !! सबसे पहले चेतावनी देना वाला व्यक्ति सिपाही आनंद प्रकाश था। वह एक मोटे कपडे से अपना चेहरा ढंके हुए जेल के क्वार्टर तक आया। उसके चेहरा छिपाने का कारण बाद में पता चला। जब उसने जेल के डिप्टी सुपरिन्टेन्डेन्ट के कार्यालय की घंटी बजे, उस समय वह कुछ बोल नहीं पा रहा था। बड़ी मुश्किल से वह जेल नंबर 3 के प्रभारी से इतना ही कह पाया, &#8220;भागो, जल्दी करो !&#8217; बाद में जेल नंबर 3 के सहायक अध्यक्ष वीडी पुष्करणा ने कहा कि उसने जो कुछ देखा, वह उसकी कल्पना से पड़े था। वह एक निकृष्ट दुखद कथा से होकर गुजरा था। जेल के सभी दरवाजे खुले पड़े थे। जेल स्टाफ, जिसमें द्वारपाल, सुरक्षा दस्ता और यहाँ तक कि ड्यूटी ऑफिसर शिवराज यादव तक या तो सोये हुए थे या हक्का-बक्का नजर आ रहे थे। </p>
<figure id="attachment_6256" aria-describedby="caption-attachment-6256" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-DElhi-Police.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-DElhi-Police.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6256" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-DElhi-Police.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-DElhi-Police-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-DElhi-Police-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-DElhi-Police-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-DElhi-Police-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6256" class="wp-caption-text">चार्ल्स शोभराज और दिल्ली पुलिस</figcaption></figure>
<p>पुष्करणा ने देखा की गेट की छवियां अपने बास्तविक स्थान पर नहीं थी। वहां योग्य तमिलनाडु पुलिस के संतरियों को तिहाड़ की पहरेदारी के किये इसलिए चुना गया था, क्योंकि भौगोलिक रूप से भिन्न भाषा उन्हें उत्तर भारतीय अपराधियों से मेल जोल बढ़ने से रोकती थी। उस दिन वे गिरे पड़े थे। आम तौर पर जेल के चारो ओर बने ऊँचे निगरानी टावरों से उन्हें एक संतरी काफी दूर सड़क पर अपनी थ्री नॉट थ्री राइफल के साथ लेटा दिखाई पड़ा था। सिपाही आनंद प्रकाश ने अपना चेहरा शर्मा के कारण नहीं छिपाया था, बल्कि इसलिए छिपाया था कि उसे भी नशा दिया गया था। जब वह नींद से जाएगा तो खुद को औंधे मुंह गिरा पाया और उसके चेरे पर जलन हो रही थी। </p>
<p>पुष्करणा जानता था की तिहाड़ में अवश्य ही कुछ बहयनक, भयानक रूप से कोई गलत घटना हुयी है। इसलिए बहुत लम्बे अंतराल के बाद पहली बार वैधानिक कारणों से बजर &#8211; खतरे की घंटी &#8211; बजाया गया था। वह इस कारण से नहीं बजाय गया था की कोई नम्बरदार किसी खूंखार नए कैदी से प्रतिशोध लेना चाहता था, या की वे जेल के अंदर कोई लड़ाई शुरू करना चाहते थे।  इस बार जब उसे बजाय गया तो वास्तव में आपात स्थिति थी। और ऐसा महसूस हुआ जैसे जेल संख्या &#8211; 3 की समुच जनसंख्या वहां से पलायन कर गयी थी। नियमानुसार, खतरे की घंटी बजने के साथ ही कैदियों की गिनती शुरू हो जाती है। जब गिनती समाप्त हुयी तो 900 में से केवल 12 कैदी, जो खास तौर से उसी जेल में थे, फरार हुए थे। लेकिन भागने वालों में तिहाड़ का अति प्रसिद्द चार्ल्स गुरुमुख शोभराज भी शामिल था। </p>
<blockquote><p>सुनील गुप्ता कहते हैं: &#8220;मुझे अच्छी तरह याद है कि जब मैं अपरान्ह 3 बजे खबर सुनी तो मैं अपने घर में बैठा टीवी देख रहा था। तभी दूरदर्शन ने अपने नियमित कार्यक्रमों को अचानक रोक कर कारा टूट की घोषणा की और यह भी बताया कि चार्ल्स शोभराज जेल से फरार हो गया है। मैं तत्काल अपनी ड्यूटी पर पहुँच गया। ऑफिस पहुँचने के बाद हमने घटनाओं को क्रमशः जोड़ना प्रारम्भ कर दिया। एक महत्वपूर्ण सुराग यह था कि प्रत्येक मूर्छित प्रहरी अपने हाथ में पचास रुपये का नोट पकडे हुआ था। इस प्रकार, पुष्करणा ने अनुमान लगाया कि पहले उन्हें पैसे का लालच दिया गया और उसके बाद उन्हें चार्ल्स शोभराज द्वारा उसके तथाकथित जन्मदिन के बहाने नशीली मिठाइयां खिला दी गई।</p></blockquote>
<p>दिल्ली के पुलिस तत्कालीन उपायुक्त अजय अग्रवाल ने संवाददाताओं को बताया था की  वार्डर के पास आकर दो लोगों ने किसी कैदी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में फल और मिठाइयां बांटने की इजाजत मांगी थी। वार्डर शिवराज यादव ने उन्हें वैसे करने की अनुमति दे दी थी, जिसके बाद आगंतुकों ने उसे और अन्य पांच प्रहरियों को मिठाइयां दी थी। मिठाइयां खाने के तत्काल बाद ड्यूटी पर तैनात जेलकर्मी मूर्छित हो गए और उन्हें घंटों बाद होश आया। </p>
<figure id="attachment_6257" aria-describedby="caption-attachment-6257" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Aljajira.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Aljajira.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6257" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Aljajira.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Aljajira-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Aljajira-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Aljajira-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Aljajira-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6257" class="wp-caption-text">चार्ल्स शोभराज (तस्वीर अलजज़ीरा के सौजन्य से)</figcaption></figure>
<p>सुनील गुप्ता कहते हैं: &#8220;जांच करने के बाद हमने पाया कि डेविड हॉल नमक एक पूर्व कैसी उस दिन चार्ल्स शोभराज से मिलने आया था और उसी ने उसके भागने में मुख्य भूमिका अदा की थी। ब्रितानी नागरिक हॉल ने नशीली पदार्थों के तस्करी के आरोप में तिहाड़ जेल में सजा काटी थी, बाद में रिहा हुआ था। मैंने तो उसे अच्छी तरह नहीं जानता था, परन्तु शोभराज को उसके बारे में पूरी जानकारी थी। विदेशी नागरिक होने के कारण दोनों में भाईचारा उत्पन्न हो गया था और जब शोभराज ने उसकी जमानत की अर्जी लिखने में सहायता की तो उसकी मित्रता और अधिक प्रगाढ़ हो गई। आगे जांच करने से पता चला कि जिस दिन हॉल शोभराज से मिलने आया था, उस दिन उसे कुछ सामान दिया था &#8211; संभवतः वह वही सामग्री थी, जिसका प्रयोग शोभराज ने जेलकर्मियों को बेहद करने हेतु किया था।&#8221;</p>
<p>शोभराज को अपनी कोठरी में अपना खाना स्वयं पकाने की सुविधा प्राप्त थी, जिसका उसने अनुचित लाभ उठाया। इस घोषणा के बाद उस दिन उसका जन्मदिन था। उसने जेल में मिठाइयां बनाई और उसमें एक विशेष सामग्री -लारपोज नामक नींद की गोली मिला दी। कहते हैं उसने 820 गोलियों का इस्तेमाल किया था। उसने अपनी 12 अन्य कैदियों को शामिल किया था। ये कैदी वे थे, जो अपने आप जेल से भागने की हिम्मत नहीं कर सकते थे। उसमें से दो कैदी वे थे, जो ड्योढ़ी पर रहकर जेल प्रशासन का काम किया करते थे। वे छोटे मोटे अपराधी थे और उन्होंने बाद में दावा किया था कि उन दोनों को भी शोभराज ने नशीली मिठाइयां खिला दी थी। जब अख़बारों में उसका नाम अख़बारों में प्रकाशित हो गया तो वे इस बात से डर गए कि अब उनकी तलाश की जाएगी। अधिक बिलम्ब होने से पूर्व ही उन दोनों ने जनकपुरी ठाणे में आत्मसमर्पण कर दिया और तिहाड़ में वापस लौट गए। </p>
<p><strong>सुनील गुप्ता के अनुसार: &#8220;लेकिन वास्तविकता यह है कि पुलिस उस घटना को उसके आत्मसमर्पण के रूप में नहीं दिखाना चाहती थी। अपनी प्रतिष्ठा को बनाये रखने की कोशिश में पुलिस ने घोषणा की कि उसने दो लोगों को गिरफ्तार का लिया है। परन्तु वह केवल अपनी छवि बचने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं थी। जैसे ही अन्तर्रष्ट्रीय समाचार जगत में एक अन्य चार्ल्स शोभराज गिरोह के करतब की खबर प्रकाशित की वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के साथ साथ दिल्ली पुलिस के उच्च पदस्थ अधिकारी तिहाड़ की ओर दौड़ पड़े। उपराज्यपाल एच.के.एल. कपूर एवं पुलिस आयुक्त वेद मारवाह ने तिहाड़ का दौड़ा किया और आदेश दिया की वीडी पुष्करणा एवं अन्य कर्मियों को गिरफ्तार करने उनसे पूछताछ की जाय। अखबारों में ऐसी कहानियों की बाढ़ आ गई कि किस प्रकार शोभराज अपने हाथों से  जेल अधिकारियों को खाना खिलाता था, अथवा कि कैसे वह जेल कर्मचारियों की अर्जियां लिखता था और कैसे उसे रिश्वत के शक्ल में मोटी रकम दिया जाता था। </strong></p>
<figure id="attachment_6258" aria-describedby="caption-attachment-6258" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Tihar.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Tihar.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6258" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Tihar.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Tihar-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Tihar-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Tihar-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Tihar-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6258" class="wp-caption-text">तिहाड़ जेल के बाहर</figcaption></figure>
<p>विडंबना यह थी कि वास्तविक कहानी कभी बाहर नहीं आई। इसलिए एक और जहाँ पुष्करणा को दण्डित किया गया था, डिप्टी सुपरिन्टेन्डेन्ट आर.टी.एल. डिसूजा को कोई फटकार भी नहीं लगाई गई। उस समय उसके बारे में यह कहानी चल रही थी कि डिसूजा एक वरिष्ठ रक्षा अधिकारी का रिश्तेदार था, जिसने उपराज्यपाल से उसके बचाव के लिए संपर्क किया, क्योंकि उपराज्यपाल स्वयं भी रक्षा सेवा से आये थे। यह भी निर्विवाद सत्य है कि भागने ऐसे पहले चार्ल्स शोभराज का जेल संख्या 1 से जेल संख्या 3 में रहस्यमय तरीके से स्थानांतरित किया गया था। उसे जेल संख्या -1 से क्यों हटाया गया? क्या उसका स्थानांतरण उसके भागने के योजना का एक अंग था? जेल संख्या &#8211; 3 एक नई जेल थी इसलिए उसके कर्मचारी जेल संख्या &#8211; 1 के कर्मचारियों से भांति सुप्रशिक्षित नहीं थे। एक अन्य संयोग यह था कि लगभग उसी समय नशे के कारोबारी डेविड हॉल को मात्र 12000 रुपये की जमानत पर छोड़ दिया गया था। </p>
<p>वरिष्ठ स्तर पर कोई भी जेल अधिकारी नहीं चाहता था कि शोभराज के भागने के मामले में गंभीरता से जांच हो, क्योंकि उन्हें अपनी अकर्मण्यता एवं अयोग्यता उजागर होने का भय था। बहरहाल, सार्वजनिक चीख पुकार को देखते हुए एक अवकाश प्राप्त फ्रंटियर सर्विस ऑफिसर के नेतृत्व में आतंरिक जांच करने का आदेश देना पड़ा। रिपोर्ट में शिवराज यादव, पुष्करणा एवं पांच ने लोगों का नाम शामिल किया गया था और बताया गया कि इन्हीं लोगों ने चार्ल्स शोभराज को लारपोज जैसी  नशीली दवाइयाँ और मिठाइयां लाने की अनुमति दी थी। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि इन्ही लोगों की लापरवाही से जेल कर्मचारियों को शोभराज के षड़यंत्र का शिकार होना पड़ा। सभी पांच आरोपियों को सलाखों के पीछे डाल दिया गया, जो बाद में रिहा हो गए। </p>
<p>भारत में उसे पहली बार 1973 में नई दिल्ली के अशोका होटल स्थित एक जेवरात की दूकान को लूटने के असफल प्रयास के लिए जेल में डाला गया था। इस दौरान वह झूठी बिमारी के बहाने अस्पताल में भर्ती हुआ और वहां से भाग खड़ा हुआ था। दरअसल, लोगों को जहर देकर भागने का शोभराज का तरीका बहुत पुराना था। साल 1971-1972 के दौरान उसे काबुल में होटल कांटिनेंटल का बिल चुकाए बिना भागने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। वहां भी वह बीमार होने के बहाने अस्पताल में दाखिल हुआ और वहां से पहरेदारों को नशा खिलाकर भाग निकला। </p>
<blockquote><p>लेकिन तिहाड़ में उस सारे तमाशे के 23 दिनों बाद चार्ल्स शोभराज तिहाड़ जेल में वापस आ गया। उसे गोआ में गिरफ्तार किया गया था। जेल से फरार होने के बाद वह अपने दोस्त डेविड हॉल के साथ गोआ चला गया था। उसी दौरान अजय सिंह तोमर नामक व्यक्ति को अपने बैग में एक जिन्दा बम और कुछ कारतूस के साथ एक रेलगाड़ी पर सवार होते समय बम्बई मुंबई में गिरफ्तार किया गया। उसके बाद पुलिस उसे लेकर उस होटल में गयी जहाँ एक अन्य भगोड़ा अपराधी देवकुमार ब्रह्मदत्त त्यागी छिपा हुआ था। पूछताछ करने पर दोनों ने पुलिस को बताया की शोभराज और हॉल उससे अलग होकर गोआ चले गए थे। पुलिस शोभराज के पास से एक रिवॉल्वर और हॉल से 12000 अमेरिकन डालर नकद बरामद किए थे। </p></blockquote>
<p>बहरहाल, शोभराज की गिरफ्तारी तिहाड़ जेल के कुछ अधिकारियों के लिए अत्यंत तनावपूर्ण थी। पुलिस ने जब जेल तोड़ षड्यंत्र की तह तक जाने के लिए पूछताछ की तो सभी के साँसे थम गयी थी। क्या शोभराज उन्हें बर्वाद कर देगा? क्या वह पुलिस को उन लोगों का नाम बता देगा जो उसके पे रोल पर थे? वह हर समय अपने घुटनों बांधकर एक गुप्त ध्वनि रिकार्डर (छिपाए रखता था, ताकि वह सुपरिन्टेन्डेन्ट और डिप्टी सुपरिन्टेन्डेन्ट की रिष्वस्त मांगने वाली आवाज को रिकार्ड कर सके। उसे भगाने के बारे में हुई इतनी सारी पूछताछ के बाद क्या वह खुला रहस्य सामने आ पाया? लेकिन उनके लिए चिंता करने की जरुरत नहीं थी, क्योंकि बड़े से बड़े रहस्योद्घाटन के बाद भी वहां कुछ बदलता नहीं था। </p>
<figure id="attachment_6259" aria-describedby="caption-attachment-6259" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-DP.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-DP.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6259" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-DP.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-DP-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-DP-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-DP-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-DP-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6259" class="wp-caption-text">चार्ल्स शोभराज पुलिस के गिरफ्त में</figcaption></figure>
<p>सुनील गुप्ता कहते हैं: &#8220;अप्रैल 1986 में उसके तिहाड़ लौटने के बाद जब मैं उससे मिला और पूछा की वह क्यों भागा था? उसने बड़े आराम से मुस्कुराते हुए कहा: &#8220;मुझे सनसनी पैदा करना पसंद है।&#8221; ऐसा उसने इसलिए किया कि भारत में उसकी सजा लगभग ख़त्म होने वाली थी और उसके बाद उसे थाईलैंड में प्रत्यर्पित किया जाने वाला था और अनेक लोगों की हत्या करने के अपराध में उसे गोली मारी जाने वाली थी। जेल तोड़ की घटना ने भारतीय प्राधिकारियों को उसे लम्बी अवधि तक जेल में रखने का एक और अवसर प्रदान कर दिता था।&#8221; </p>
<p>इसके विपरीत, पुलिस का मत अलग था। उन्होंने एक अन्य कुख्यात कैदी और शोभराज के सहनिवासी एवं दिल्ली के प्रमुख कारोबारी राजेंद्र सेठिया पर आरोप मढ़ दिया। उस समय अभियोजकों ने आरोप लगाया था कि सेठिया ने शोभराज को भाड़े पर लिया था, ताकि वह बैंक घोटाले के मुख्य गवाह से अपना हिसाब चुकता कर सके, जिसमें वह स्वयं एक अभियुक्त था। वह गवाह कोई स्वामी सत्संगी नामक व्यक्ति था और उसकी हत्या करने के लिए सेठिया शोभराज से सहायता मांगी थी। इसके बदले सेठिया की पत्नी ने साफ़ तौर पर ब्रिटेन के खाते में 99000 अमेरिकी डालर जमा करवाए थे, और पुलिस का दावा था कि शोभराज के जेल से भागने से ठीक पहले वह राशि निकाल ली गयी थी। पुलिस की कहानी को पूर्णतया नकार दिया गया और सेठिया उसे निरस्त कराने के लिए न्यायालय चला गया। </p>
<p><strong>अपने प्रभावशाली मित्रों और पटे पटाये जेल कर्मियों के बावजूद शोभराज उस कठोर सच्चाई से बच नहीं सका जो उसे तिहाड़ में वापस लाये जाने के बाद उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। कहीं भी स्वतंत्रतता पूर्वक घूमने के स्थान पर अब उसे जंजीरों में जकड़कर अलग थलग वार्ड में बंद कर दिया गया था। उसे खूंखार आतंकवादियों के लिए बने उच्च सुरक्षा वार्ड में रखा गया था और उसकी सभी गतिविधियों पर चौबीसों घंटे सतर्क निगाह रखे जाने लागिओ थी। किसी सुरक्षा गार्ड को साथ लिए बिना उसे कहीं भी जाने की अनुमति नहीं थी। सभी चतुर कैदियों की तरह चार्ल्स शोभराज ने भी जेल की तपिश, ऊब और एकाकीपन से निजात पाने के लिए एक गुप्त मार्ग खोज लिया। होशियार कैदी बार बार कोर्ट जाते हैं।  कोर्ट में आप बाहरी, अपने परिवार के लोगों से मिल सकते हैं और आपको यहाँ अच्छा खाना मिल सकता है।</strong> </p>
<p>सुनील गुप्ता मुस्कुराते कहते हैं: &#8220;मुझे उसकी बेड़ियों में जकड़े जाने की विचित्र चाल के पीछे की कहानी याद है। हम उसे जंजीरों में जकड कर रखना चाहते थे, परन्तु भारतीय न्याय प्रणाली इस मामले में स्पष्ट इंगित करती है कि ऐसा करने के लिए केवल जेल सुपरिन्टेन्डेन्ट की इच्छा ही पर्याप्त नहीं थी। इसके लिए न्यायालय का वैधानिक निर्देश भी होना चाहिए। यह भी उसकी चाल थी। क्योंकि शारीरिक रूप से घिसटते हुए कैदी को देखना मानवाधिकारों के निकृष्टम उल्लंघनों में से एक माना जाता था। कोई भी जिला जज अपने नाम से ऐसा आदेश पारित करने का इच्छुक नहीं था। तीन महीने गुजर गए तब पी.के. बाहरी एक नए जज जिला एवं सत्र न्यायधीश आये। उन्होंने न केवल उसे जंजीरों में जकड़ने की अनुमति दी।  लेकिन उनका आदेश न केवल दोषपूर्ण था बल्कि उसका यह भी अर्थ था कि शोभराज को अनिश्चित काल तक बेड़ियों में रखा जा सकता है। एक विधि अधिकारी के रूप में मैं यह जानता था कि किसी कैदी को धिकतम तीन महीने तक ही जंजिदों में जकड़कर रखा जा सकता है।&#8221; खैर। </p>
<figure id="attachment_6260" aria-describedby="caption-attachment-6260" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Nepaal.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Nepaal.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-6260" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Nepaal.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Nepaal-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Nepaal-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Nepaal-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Charles-Nepaal-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6260" class="wp-caption-text">चार्ल्स शोभराज नेपाल में</figcaption></figure>
<p>उसे कभी भी किसी को चकित करने की आदत नहीं गयी थी। जब वह तन्हाई वार्ड में था, उसका डबल रोटी के बीच से थोड़ी मात्रा में हशीश पाई गयी थी और वह हमारे अनुमान से बाहर था कि कैसे कोई व्यक्ति इतनी उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्र में नशे का सामानंदर पहुँचाने में सफल हो गया था। दो सिपाहियो को निलंबित कर दिया गया और बाद में उन्हें शोभराज को नशे की आपूर्ति करने के आरोप में बर्खास्त कर दिया गया था। आप उस वयक्ति को दण्डित कैसे कर सकते हैं जो पहले से ही जंजीरों और बेड़ियों में जकड़ा हुआ हो ?</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Kiran-bedi.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Kiran-bedi.jpg" alt="" width="2047" height="869" class="aligncenter size-full wp-image-6252" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Kiran-bedi.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Kiran-bedi-300x127.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Kiran-bedi-1024x435.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Kiran-bedi-768x326.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Kiran-bedi-1536x652.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>अंततोगत्वा, साल 1997 में रिहा होकर भारत से फ़्रांस जाने से पूर्व वह किरण बेदी के तबादले का कारण भी बना। जिस समय (साल 1993) में किरण बेदी को महानिरीक्षा के रूप में तिहाड़ के 8000 से अधिक कैदियों की देखभाल के लिए नियुक्त किया गया था, उस समय जेल तोड़ की घटना को कई वर्ष बीत चुके थे और हथकड़ी-बेड़िया गुजरे ज़माने की बात होकर रह गयी थी। सभी कैदियों के लिए अब कोई न कोई काम करना जरुरी था और इसलिए किरण बेदी ने शोभराज को क़ानूनी सहायता प्रकोष्ठ में भेज दिया, जहाँ उसे एक टाइपराइटर दिया गया था।</strong> </p>
<p>कारागार नियमों के अनुसार, यह जेल प्रभारी को निर्णय करना होता था की किसे टाइपराइटर उपलब्ध कराया जाय। उनके निर्णय में कुछ भी गैर-क़ानूनी नहीं था, परन्तु उस समय दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना किरण बेदी को दण्डित करने के लिए कोई बहाना खोज रहे थे और वह बहाना उन्हें शोभराज के रूप में मिल गया और उन्हें जेल से हटा दिया गया । बहरहाल, 17 फरवरी, 1997 को अपनी 20 वर्षीय जेल की सजा पूरी करने के बाद 53-वर्षीय शोभराज को फ़्रांसिसी अधिकारियों  को सौंप दिया गया। यद्यपि उस समय भी उसके खिलाफ कुछ मामले लंबित थे, परन्तु सरकार ने उसे रिहा करना उचित समझा। लेकिन साल 2003 में नेपाल में पुनः गिरफ्तार किया गया। </p>
<p>क्रमशः &#8230;. </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-end-of-that-road-was-in-the-toilet-when-charles-sobhraj-was-caught">तिहाड़ जेल-5 ✍ उस रास्ते का अंत &#8216;शौचालय&#8217; में था 👣 तभी चार्ल्स शोभराज दिल्ली पुलिस के गिरफ्त में आ गया 👁 फिर जेल से भागने के लिए</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>जब तक छोटे-छोटे &#8216;ट्रिन्गर्स&#8217; को &#8216;संस्थागत संरक्षण&#8217; नहीं मिलेगा, उनकी कहानियां &#8216;चोरी&#8217; नहीं होंगी, देश की पत्रकारिता कभी सुधर नहीं सकती</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/unless-small-tringers-get-institutional-protection-the-countrys-journalism-can-never-improve</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Nov 2023 07:08:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली: कल की ही तो बात है। देश &#8216;राष्ट्रीय प्रेस दिवस&#8217; मना रहा था। गली-कूची से लेकर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा कल के राजपथ से आज के कर्तव्य पथ तक, सभी लोग पत्रकारों को पत्रकारिता का पाठ पढ़ा रहे थे। कोई कह रहे थे &#8216;देश की पत्रकारिता अधोगति&#8217; हो गई है। कोई कह [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/unless-small-tringers-get-institutional-protection-the-countrys-journalism-can-never-improve">जब तक छोटे-छोटे &#8216;ट्रिन्गर्स&#8217; को &#8216;संस्थागत संरक्षण&#8217; नहीं मिलेगा, उनकी कहानियां &#8216;चोरी&#8217; नहीं होंगी, देश की पत्रकारिता कभी सुधर नहीं सकती</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली: कल की ही तो बात है। देश &#8216;राष्ट्रीय प्रेस दिवस&#8217; मना रहा था। गली-कूची से लेकर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा कल के राजपथ से आज के कर्तव्य पथ तक, सभी लोग पत्रकारों को पत्रकारिता का पाठ पढ़ा रहे थे। कोई कह रहे थे &#8216;देश की पत्रकारिता अधोगति&#8217; हो गई है। कोई कह रहा था &#8216;पत्रकारिता का चरित्र&#8217; समाप्त हो गया है। अपने-अपने तरह से सभी शब्दों का अलंकरण कर &#8216;पत्र-पत्रिका और पत्रकारों&#8217; को नसीहत दे रहे थे। </strong></p>
<p>लेकिन किसी की भी ऊँगली &#8216;पाठकों&#8217; की ओर नहीं उठी। कोई उनके बारे में जिक्र नहीं किया जिनके बारे में कहानियां लिखी जाती है। कोई उनकी त्रादसी की ओर ऊँगली नहीं उठाये जो छोटे-छोटे कस्बों से, पंचायतों से, शहरों से काफी-मेहनत कर कहानियां भेजते हैं और उन कहानियों को मुख्यालय में बैठे उनके &#8216;वरिष्ठ&#8217;, &#8216;चीफ ऑफ़ ब्यूरो&#8217;, &#8216;संपादक&#8217; समाचार-बाजार में &#8216;बेचकर&#8217; मालिकों को मालिश कर खुद तो कुतब मीनार पर चढ़ जाते, लेकिन छोटे कस्बों, गाँव का, शहरों का वह समाचार-प्रेषक आसमान को निहारते, टीबी, कैंसर बीमारियों से लड़ते मृत्यु को प्राप्त करता है। उसकी मौत की खबर वह संपादक या चीफ ऑफ़ ब्यूरो तबज्जो नहीं देता है। </p>
<p><strong>आज पत्रकारों को &#8216;फॉलो&#8217; करने की जो बीमारी हो गई है, लोग बाग़ उन्हें &#8216;ईश्वरीय दर्जा&#8217; देने लगे हैं; लेकिन कोई नहीं जानता कि उन्हें उस ऊंचाई पर ले जाने में किसका-किसका हाथ है? सैकड़े 99 फ़ीसदी ऐसे पत्रकार जिन्हें आज टीवी पर देखा जाता है, लाखों-करोड़ों फॉलोवर्स होते हैं, अगर उस संस्था के छोटे-छोटे इंटर्न, रिपोर्टर, शोधकर्ता, पुस्तकालय के कर्मचारी, और सबसे बड़ी बात &#8216;महामहीम गूगल देवता&#8217; उनके मेज पर उस विषय से सम्बंधित बातों की पड़ताल कर कागज-कतरन नहीं रखें, &#8216;संक्षिप्त नोट&#8217; नहीं लिख कर रखें &#8211; वे चारो खाने चित हो जायेंगे और कक्ष का कैमरामैन अपनी नौकरी बचाने के लिए कैमरा को दूसरे तरफ घुमा देंगे। टीवी के स्क्रीन पर लिखा आने लगेगा &#8216;तकनिकी अवरोध के कारण हम आपको यह कार्यक्रम नहीं दिखा पा रहे हैं।&#8221; </strong></p>
<p>ये है आज की पत्रकारिता। बड़े-बड़े मीडिया घरानों में चमचे, चाटुकारों का साम्राज्य है। संपादक &#8216;मालिकों&#8217; का मालिश करते हैं। मालिक नेताओं का मालिश करते हैं। सीनियर, रोविंग, स्पेशल, डिप्टी, नेशनल, इंटरनेशनल, एडिटर, राइटरों के बीच छोटका पत्रकारों को कौन जानता, पूछता। अंग्रेजीं में उसे &#8216;स्ट्रिंगर&#8217; कहते हैं। जिस दिन इन छोटे-छोटे पत्रकारों को, जिनके पास न तो संस्था का परिचय-पत्र होता है और ना ही जिला मुख्यालय और प्रदेश की राजधानी के पत्र-सूचना विभाग का, को &#8216;आर्थिक, सामाजिक, संस्थागत संरक्षण नहीं प्राप्त होगा &#8211; भारतीय पत्रकारिता में कभी सुधार नहीं हो सकता। हां, इसके लिए उन्हें भी पानी जैसा पारदर्शी होना पड़ेगा। </p>
<p>बहरहाल, धनबाद के कोयला माफिया डॉन सूर्यदेव सिंह जीवित थे उन दिनों। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बहुत समीप समझे जाने वाले कांग्रेसी नेता जो बिंदेश्वरी दुबे को &#8216;छिटकिनी&#8217; मार कर बिहार के मुख्यमंत्री कार्यालय से बाहर निकाल कर खुद बैठे थे, प्रदेश की राजनीतिक इतिहास में &#8216;अमर&#8217; होना चाहते थे &#8211; नाम था भागवत झा &#8216;आज़ाद&#8217;। सामने से तो आज़ाद साहब बिहार से माफिया का नामोनिशान मिटाना चाहते थे, लेकिन परोक्ष रूप से उन्हें तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं से अपना कद ऊपर बनाना था। वे जानते थे कि बिंदेश्वरी दुबे, जगन्नाथ मिश्र का कोयलांचल के माफिआओं से भर-गर्दन प्रेम है। अतः माफियाओं को आगे कर अपनी राजनीति खेलना चाहते थे, खेले। </p>
<p>नौवां विधानसभा का कालखंड था। इस विधानसभा के समय-काल में बिहार में कांग्रेस पार्टी के चार मुख्यमंत्री &#8216;आये और गए&#8217; &#8211; बिंदेश्वरी दुबे (12 मार्च, 1985 से 13 फरवरी, 1988), भागवत झा &#8216;आज़ाद&#8217; (14 फरवरी, 1988 से 10 मार्च, 1989), सत्येंद्र नारायण सिन्हा (11 मार्च, 1989 से 6 दिसंबर, 1989) और डॉ. जगन्नाथ मिश्र (6 दिसंबर, 1989 से 10 मार्च, 1990) &#8211; नौवां विधानसभा से आज सत्रहवाँ विधानसभा तक बिहार फिर कभी कांग्रेसियों को मुख्यमंत्री कार्यालय के आस-पास नहीं देखा। </p>
<p><strong>उस समय धनबाद के उपायुक्त थे मदन मोहन झा। भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे। दो &#8216;झा जी&#8217; मिलकर धनबाद को &#8216;झंकार&#8217; कर  &#8216;झाझा&#8217; बनाने का प्रण लिए और शुरू हो गया कोयला माफियाओं के विरुद्ध खेल। धनबाद से पटना के रास्ते कलकत्ता, दिल्ली, बम्बई, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के शहरों से जुड़े सभी पत्रकार से लेकर संपादक और पत्र-पत्रिका के मालिक भी, नेता-अधिकारी, जो कोयला व्यवसाय में लिप्त थे या फिर धनोर्पार्जन का हिस्सा प्राप्त करते थे, पंक्तिबद्ध हो गए। भारत के नए और पुराने राष्ट्रीय राजधानी यानी दिल्ली से लेकर कलकत्ता के पत्रकार &#8216;धमाधम&#8217; धनबाद गिरने लगे। जो नहीं आ सके वे संध्या काळ उपायुक्त से फोन पर संपर्क साध कर कहानियां लिखने लगे। कुछ जो वहां के स्थानीय अख़बारों में प्रकाशित हो रहे थे, उसका अनुवाद कर दिल्ली-कलकत्ता भेजने लगे। </strong></p>
<p>मैं उन दिनों धनबाद से प्रकाशित &#8216;दी न्यू रिपब्लिक&#8217; अख़बार में आया ही था। दी इंडियन नेशन, पटना में मासिक वेतन मिलना लगभग बंद हो गया था। तभी एक दिन कोयला खदानों में कोयला निकासी के बाद &#8216;बालुओं&#8217; से भरने की प्रशासकीय पद्धति की जांच पड़ताल के लिए अपने एक छायाकार मित्र श्री जोयदेव गुप्ता &#8216;मनोज&#8217; के साथ भूमिगत खदानों की ओर निकल पड़े। दी न्यू रिपब्लिक से कुछ ही दिनों में दाना-पानी उठ गया था और हम श्री उत्तम सेनगुप्ता के अनुशंसा पर 6-प्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट, कलकत्ता का धनबाद संवाददाता के रूप में पहुंच गए थे दी टेलीग्राफ अखबार में। </p>
<p>दो दिन काफी मेहनत के बाद सुबह-सवेरे ट्रेन पकड़कर कलकत्ता पहुंच गए। दफ्तर में बैठकर अपनी कहानी टाइप करने लगे। उस समय कोई 12 बज रहा था दिन में। साल सन 1988 का प्रारंभिक वर्ष था। मदन मोहन झा मई 20, 1986 से मई 26, 1989 तक धनबाद समाहरणालय में विराजमान थे। कोई 22 पैराग्राफ की कहानी और कोल इण्डिया का कागज (दस्तावेज) के साथ बिजनेस संपादक के टेबुल पर रखने ही वाला था कि वे दफ्तर आ गए। </p>
<p>मुझे देखते ही कहते हैं: &#8220;हेल्लो !!! डॉन!!!&#8221; मैं उनका अभिवादन स्वीकार किया और मुस्कुरा दिया। कुर्सी पर बैठते ही वे उस कहानी को हाथ में लिए, मुझे देखे और मुस्कुराके कहते है : &#8220;ग्रेट !!! की भालो स्टोरी !!! इट्स &#8216;लिड स्टोरी&#8217;, विल कैरी इन टू पार्ट्स&#8221;। मैं छोटा सा संवाददाता था।  फिर मैं आनंद बाजार के कैंटीन में माँछ-भात खाकर कलकत्ता शहर की ओर निकल गया। वापसी ट्रेन शाम में थी। उन दिनों इस पत्र समूह में छोटे संवाददाता की भी बहुत तबज्जो थी।</p>
<p>दूसरे दिन दी टेलीग्राफ के प्रथम पृष्ठ मेरी कहानी का &#8216;इंडिकेटर&#8217; और बिजनेस पृष्ठ पर आठ कॉलम में बालू माफिया की कहानी (पहली क़िस्त) प्रकाशित हुई नाम के साथ। दी टेलीग्राफ अख़बार 12 बजते धनबाद आ जाता था। अब तक भारत कोकिंग कॉल से लेकर कॉल इण्डिया तक, धनबाद समाहरणालय से लेकर सिंह मैंशन तक &#8211; कोहराम मच गया था। उस कहानी के बाद आनंद बाजार पत्र समूह का मैं हो गया। दी टेलीग्राफ और संडे पत्रिका का मैं चहेता हो गया। एक कहानी ही धनबाद में पहचान दे दी और बीसीसीएल से लेकर जिला प्रशासन और कोयला माफियाओं के आखों का काँटा हो गया।  </p>
<figure id="attachment_5179" aria-describedby="caption-attachment-5179" style="width: 662px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/11/image003YXZW.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/11/image003YXZW.jpeg" alt="" width="662" height="418" class="size-full wp-image-5179" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/11/image003YXZW.jpeg 662w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/11/image003YXZW-300x189.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 662px) 100vw, 662px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5179" class="wp-caption-text">राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर केन्‍द्रीय सूचना एवं प्रसारण, युवा कार्यक्रम और खेल मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर और अन्य</figcaption></figure>
<p>यह बात यहाँ इसलिए उद्धृत कर रह हूँ की विगत 16 नवम्बर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर केन्‍द्रीय सूचना एवं प्रसारण, युवा कार्यक्रम और खेल मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर इस बात को स्वीकार  किये कि जिला और क़स्बा में पदस्थापित पत्रकारों को मेट्रो में काम करने वाले पत्रकार बराबर नहीं समझते तभी उन्होंने कहा कि &#8220;मेट्रो शहरों में पत्रकारों को दरभंगा, पुरी, सहारनपुर, बिलासपुर, जालंधर, कोच्चि आदि में अपने समकक्षों का सम्मान करना चाहिए- आपके दोस्तों को सम्मानित किया जाना चाहिए और उन्हें श्रेय दिया जाना चाहिए। स्‍टोरी मायने रखती है स्थान या स्टेशन के कोई मायने नहीं हैं! स्ट्रिंगरों को अच्छी तरह से भुगतान करना चाहिए, उन्हें पुरस्कृत करना और उनके आत्मविश्वास में सुधार करना एक जीवंत मीडिया परिदृश्य के लिए महत्वपूर्ण है।&#8221;</p>
<p>यह एक लाख फीसदी &#8216;सत्य&#8217; है। अनुषा रिजवी की कहानी, निर्देशन, पटकथा के तहत आमिर खान के प्रोडक्शन हॉउस से बनी ओंकारदास मानिकपुरी, रघुबीर यादव, शालिनी वत्स, मलाइका शेनॉय, नवाजुद्दीन सिद्दीकी अभिनीत &#8216;पीपली लाइव&#8217; फिल्म दृष्टान्त है। तभी तो  अनुराग सिंह ठाकुर &#8220;राष्ट्र निर्माण में मीडिया की भूमिका&#8221; पर विचार भी किया, साथ ही, &#8220;नॉर्म्‍स ऑफ जर्नलिस्टिक कंडक्‍ट, 2022&#8221; का विमोचन भी किया। इतना ही नहीं, यह भी कहने में तनिक भी संकोच नहीं किये कि ताकि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ भारतीय मीडिया को समझने, उसका विश्‍लेषण करने और उसके मानकों को संरक्षित करने का रास्‍ता आसान बनाने के स्‍वीकार्य तरीकों का पता लगाया जा सके।</p>
<p><strong>लेकिन उन दिनों &#8216;आर्यावर्त&#8217;, &#8216;दी इण्डियन नेशन&#8217; और आज भी आनंद बाजार पत्रिका समूह में कभी भी क़स्बा, जिला, प्रदेश में छोटी-सी-छोटी खबर को मुख्यालय तक भेजने वाला उस संवाददाता जो, जिसे भारत के प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय अख़बारों में &#8216;बित्ता&#8217; से, &#8216;इंची-टेप&#8217; से नापकर, शब्दों को गिनकर पैसा दिया जाता था (और है भी) अपने मुख्यालय में काम करने वाले दिग्गज पत्रकारों से अलग नहीं समझा। उनका &#8216;बाई-लाइन&#8221; कभी नहीं काटा। यहाँ तक कि कहानियों में और अतिरिक्त जानकारी देने, लिखने पर भी दूसरे लोग अपना नाम नहीं जोड़े। जबकि इस तरह की कैंसर नुमा बीमारी राष्ट्र की राजधानी और अन्य प्रदेशों की राजधानियों के प्रकाशित होने वाले पत्र-पत्रिकाओं में आम बात है। </strong></p>
<p>इतना ही नहीं, भारत के छोटे-छोटे स्थानों से आने वाले समाचारों को मुख्यालय में बैठे बड़े-बड़े पत्रकार &#8216;चोरी&#8217; भी करते हैं और अपना नाम कमाने के लिए शाम-दंड-भेद सभी पहलवानी भी का जाते हैं। भागलपुर का अंखफोड़बा काण्ड दृष्टान्त है।  लेकिन वे यह नहीं समझते कि वे भी &#8216;समय के सीसीटीवी&#8217; के अधीन हैं। </p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=i78Hm95Zdl8"></a></p>
<p>अनुराग सिंह ठाकुर कहते हैं कि भारत में एक स्वतंत्र और जिम्मेदार प्रेस का प्रतीक है। यह वह दिन था जिस दिन भारतीय प्रेस परिषद ने यह सुनिश्चित करने के लिए एक नैतिक प्रहरी के रूप में कार्य करना शुरू किया था कि न केवल शक्तिशाली माध्यम प्रेस अपेक्षित उच्च मानकों को बनाए रखे बल्कि यह किसी बाहरी कारकों के प्रभाव या खतरों से नहीं रुके। हालांकि दुनिया भर में कई प्रेस या मीडिया परिषदें हैं, भारतीय प्रेस परिषद एक अद्वितीय संगठन है क्योंकि यह एकमात्र संगठन है जो प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करने के अपने कर्तव्य में देश के साधनों पर भी अधिकार का प्रयोग कर सकता है। &#8220;राष्ट्र निर्माण में मीडिया की भूमिका&#8221; पर श्री स्वपन दासगुप्ता भी बोले। </p>
<p>श्री स्वपन दासगुप्ता ने कहा, &#8220;इंटरनेट और सोशल मीडिया ने पूरे मीडिया परिदृश्य को बदल दिया है। मुख्यधारा के मीडिया, जैसे अखबार और टेलीविजन, ने पूरी दुनिया में महत्वपूर्ण गिरावट देखी है। वैश्विक स्तर पर, इसमें 11 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। मुख्यधारा के मीडिया का अब समाचार देने का एकाधिकार नहीं है। श्री दासगुप्ता ने आगे कहा, &#8220;पूर्णतया एक समूह तक सीमित पत्रकारिता बढ़ रही है और लोग मुख्यधारा के मीडिया पर हावी रहने राजनीतिक समाचारों के अलावा स्वास्थ्य, विज्ञान, चिकित्सा, खेल जैसे समाचारों की तलाश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि डिजिटल मीडिया ने राष्‍ट्रीय सीमाओं को मिटा दिया है&#8221; जैसाकि वाणिज्यिक और आर्थिक पदचिह्न सहित भारत के रणनीतिक पदचिह्न दुनिया भर में बढ़ रहे हैं, जब तक हम भारत में निर्मित, भारत में आधारित मीडिया को आगे नहीं बढ़ाएंगे, भारतीय मूल्यों को आगे ले जाना, जो इसे आगे ले जा सकता है, उस दृष्टिकोण की हमारी संपूर्ण गुणवत्ता में हम कहीं न कहीं पीछे रह जाएंगे&#8221;।</p>
<figure id="attachment_5180" aria-describedby="caption-attachment-5180" style="width: 662px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/11/image005WDZ0.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/11/image005WDZ0.jpeg" alt="" width="662" height="426" class="size-full wp-image-5180" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/11/image005WDZ0.jpeg 662w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/11/image005WDZ0-300x193.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 662px) 100vw, 662px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5180" class="wp-caption-text">राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर केन्‍द्रीय सूचना एवं प्रसारण, युवा कार्यक्रम और खेल मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर और अन्य</figcaption></figure>
<p><strong>ठाकुर कहते हैं: &#8220;&#8221;प्रेस को एक शक्तिशाली आवाज और हमारे लोकतंत्र का एक योग्य चौथा स्तंभ बनाने वाले दिग्गजों को विनम्र श्रद्धांजलि देने का यह एक महत्‍वपूर्ण अवसर है।&#8221; उन्होंने कहा, &#8220;प्रेस के साथ स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले हमारे बड़े नेताओं की घनिष्ठ भागीदारी ने उन्हें संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से प्रेस की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित किया&#8221;। भारतीय प्रेस परिषद का जन्म बहुत बाद में हुआ, लेकिन प्रयोजन वही था: लोकतंत्र की रक्षा और मजबूती सुनिश्चित करना।&#8221; </strong></p>
<p>परन्तु,  &#8220;अफसोस की बात है कि प्रेस की स्वतंत्रता के लिए लाइट हाउस के रूप में भारतीय प्रेस परिषद के अस्तित्व में आने के एक दशक के भीतर, मौलिक अधिकारों के निलंबन के साथ-साथ इसे आपातकाल के दौरान समाप्त कर दिया गया था। यह मेरे लिए गर्व की बात है कि परिषद को संसद के एक ताजा कानून के जरिये नए सिरे से पुनर्जीवित किया गया और यह कार्य किसी और ने नहीं बल्कि सूचना और प्रसारण मंत्री के रूप में श्री लालकृष्ण आडवाणी जी ने किया। एक राष्ट्र के रूप में हमने तब से पीछे मुड़कर नहीं देखा है, हालांकि आईटी कानून के 66ए द्वारा लगाए गए अस्वीकार्य प्रतिबंधों के माध्यम से व्यवधान हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसे उचित रूप से खारिज कर दिया गया था। पिछले 75 वर्षों में, हमारे महान देश में लोकतंत्र फला-फूला है, वैसे ही मीडिया भी फला-फूला है।”</p>
<p>केंद्रीय मंत्री मानते हैं, तभी वे बोले भी : &#8220;मेट्रो शहरों में पत्रकारों को दर रभंगा, पुरी, सहारनपुर, बिलासपुर, जालंधर, कोच्चि आदि में अपने समकक्षों का सम्मान करना चाहिए- आपके दोस्तों को सम्मानित किया जाना चाहिए और उन्हें श्रेय दिया जाना चाहिए। स्‍टोरी मायने रखती है स्थान या स्टेशन के कोई मायने नहीं हैं! स्ट्रिंगरों को अच्छी तरह से भुगतान करना चाहिए, उन्हें पुरस्कृत करना और उनके आत्मविश्वास में सुधार करना एक जीवंत मीडिया परिदृश्य के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, दुनिया के साथ गति बनाकर रखते हुए, प्रेस परिषद को ट्रांसजेंडर प्रतिनिधित्व के साथ-साथ समाचारों में महिलाओं की सुरक्षा और विविध विचारों को बढ़ावा देने पर जोर देने की आवश्यकता है।”</p>
<p>उन्होंने कहा कि &#8220;सभी चीजें जिनका गति के साथ विस्तार होता है, भारत में मीडिया का विस्तार एक सतर्क नोट के योग्य है। मीडिया प्रशासन की अधिकांश संरचना स्व-नियामक है। लेकिन स्व-नियामक का मतलब गलती करने का लाइसेंस मिलना और जान-बूझकर गलती करना नहीं है।&#8221; इससे मीडिया की विश्‍वसनीयता खत्‍म होगी। पक्षपात और पूर्वाग्रह को अस्‍वीकार किया जाना चाहिए। यह मीडिया का काम है कि वह इस बारे में चिंतन करे और आत्मनिरीक्षण करे कि इंफोडेमिक के वायरस से खुद को कैसे बचाया जाए, जो भौगोलिक क्षेत्रों में समाज के बारे में दुर्भावनापूर्ण गलत सूचना फैलाता रहता है। ऐसी ही एक दूसरी चिंता पेड न्यूज और फर्जी खबरें है। इसी तरह सोशल मीडिया द्वारा फैशनेबल बनाई गई क्‍लिकबेट पत्रकारिता मीडिया की विश्वसनीयता में कोई योगदान नहीं देती; यह राष्ट्र-निर्माण में और भी कम योगदान देती है। मीडिया को इस बात की इजाजत नहीं देनी चाहिए कि जिम्मेदार, निष्पक्ष और संतुलित पत्रकारिता पर कोई और कब्‍जा करे।”</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/unless-small-tringers-get-institutional-protection-the-countrys-journalism-can-never-improve">जब तक छोटे-छोटे &#8216;ट्रिन्गर्स&#8217; को &#8216;संस्थागत संरक्षण&#8217; नहीं मिलेगा, उनकी कहानियां &#8216;चोरी&#8217; नहीं होंगी, देश की पत्रकारिता कभी सुधर नहीं सकती</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>शिक्षक दिवस पर विशेष ✍ कल अख़बार में नाम छपवाने के लिए &#8216;प्रेस रिलीज&#8217; लेकर दफ्तर में &#8216;दंड बैठकी&#8217; करते थे, आज बिहार के लोगों को प्राणायाम सीखा रहे हैं😢</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 Sep 2023 11:38:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना : जय प्रकाश नारायण का सम्पूर्ण क्रांति बिहार ही नहीं, देश के लोगों के मगज पर चढ़ रहा था। देश के मतदाता देश की राजनितिक व्यवस्था में बदलाव चाहते थे। स्वाभाविक है। सत्तारूढ़ के अलावे विपक्ष के नेताओं को भी सत्ता का रसास्वादन करने का संवैधानिक अधिकार है। देश का क्या होगा, यह न [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/special-on-teachers-daya-tribute-to-teacher">शिक्षक दिवस पर विशेष ✍ कल अख़बार में नाम छपवाने के लिए &#8216;प्रेस रिलीज&#8217; लेकर दफ्तर में &#8216;दंड बैठकी&#8217; करते थे, आज बिहार के लोगों को प्राणायाम सीखा रहे हैं😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना : जय प्रकाश नारायण का सम्पूर्ण क्रांति बिहार ही नहीं, देश के लोगों के मगज पर चढ़ रहा था। देश के मतदाता देश की राजनितिक व्यवस्था में बदलाव चाहते थे। स्वाभाविक है। सत्तारूढ़ के अलावे विपक्ष के नेताओं को भी सत्ता का रसास्वादन करने का संवैधानिक अधिकार है। देश का क्या होगा, यह न तो उन दिनों लोगों को, राजनेताओं को चिंता थी, न आज है। पंचायत से संसद तक चाहे क्रिया-कलाप ठीक-ठाक संचालित होता भी रहे, कुर्सियों को देखकर कुकुरमुत्तों की तरह पनपते नेताओं को खुजली होने लगती है, वे चक्रव्यूह रचने लगते हैं, ताकि सतारूढ़ दल धराम से नीचे गिरे और वे मुस्कुराते शपथ लेकर कुर्सी से चिपक जायँ। यह मानव का लक्षण है। जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के समय बिहार में यह बात तनिक अधिक देखने को मिला।</strong> </p>
<p>वैसे तो चौथी विधान सभा से ही, लेकिन पांचवी विधान सभा काल आते-आते सरकारी महकमे में “आया-राम-गया-राम” वाली बात पटना के सर्कुलर रोड, सरपेंटाइन रोड, बेली रोड, फ़्रेज़र रोड पर अधिक प्रचलित हो गया था। मंत्री से लेकर संत्री तक, अधिकारी से लेकर चपरासी तक, जिलाधिकारी से लेकर मुंशी तक सभी हनुमान चालीसा पढ़ते सोते थे और सुवह विष्णुसहस्रनाम पढ़ते जागते थे, ताकि विपत्ति का पहाड़ न टूट पड़े उनपर ।  </p>
<p>राजनेताओं की तो बात ही नहीं करें। उनकी गर्दन हमेशा बक्सर के पुल पर लटका होता था। कब नीचे गंगा में प्रवाहित हो जायेंगे, कब पदच्युत हो जायेंगे, कब कौन लंगड़ी मार देगा, कब कौन छिटकिनी लगाकर मुंह के बल गिरा देगा, कोई नहीं जानता था। विहार विधान सभा और विधान परिषद् में आज भी दर्जनों “सम्मानित विधायकगण” हैं, जिनकी स्थिति फ़्रेज़र रोड के कोने पर स्थित (उस समय) उडप्पी से आर्यावर्त-इण्डियन नेशन के कार्यालय से दस कदम आड़े पिंटू होटल तक आते-आते भय से रक्तचाप बढ़ जाता था। वे गवाह होंगे,  सांस ले रहे हैं । कई बार ऐसी स्थिति का सामना वे सभी किये थे जब ‘प्रेस रिलीज’ निर्गत करते समय जिस पदभार का मुहर प्रेस रिलीज पर लगाए थे, समाचार बनने के समय तक पदभार से मुक्त हो जाया करते थे। बिहार विधान परिषद् में आज भी ऐसे अनेकानेक माननीय सदस्य हैं जो उन दिनों उस समय के उभरते नेताओं के पीछे-पीछे चलते थे। वे हँसते थे तो इस ठहाका लगा देते थे। </p>
<p>लेकिन आज वे राजनीति में मठाधीश बने बैठे हैं। उन दिनों पटना से प्रकाशित आर्यावर्त-इंडियन नेशन समाचार पत्रों में अपना नाम प्रकाशित करने के लिए, अपना विज्ञप्ति छपाने के लिए, जो सुबह से शाम तक “दण्ड बैठकी” करते थे, आज उसी संस्थान के सैकड़ों-हज़ारों कर्मचारियों, उनके परिवारों को “प्राणायाम” कराते नहीं थकते। कई तो प्राणायाम करते ईश्वर को प्राप्त हो गए, कुछ कतारबद्ध हैं। लेकिन उन्हें क्या? राजनीतिक गलियारे में, मंत्री-संत्री की कुर्सियों पर चिपकने के बाद जनता के बारे में कौन सोचता है? या उन लोगों के बारे में कौन सोचता है, जो शुरूआती दिनों में ‘ऊँगली’ पकड़कर नाम, प्रतिष्ठा, शोहरत दिलाया था। खैर। </p>
<p>उन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री थे अब्दुल गफ्फूर। कहने के लिए तो छठा विधान सभा कालखंड था, लेकिन गफ्फूर साहेब 13 वें मुख्यमंत्री के रूप में कुर्सी पर बैठे थे। एक मुख्यमंत्री का कार्यकाल, जो पांच साल का (विधान सभा अवधि के बराबर) होनी चाहिए थी, औसतन ढाई-साल और उससे कम की अवधि में कुर्सी को नमस्कार कर “भूतपूर्व” हो जाया करते थे। गफूर साहब 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975 तक बिहार राज्य के तेरहवें मुख्यमंत्री के रूप में सेवा किये । वे राजीव गांधी के समय में कैबिनेट मंत्री के रूप में भी शोभायमान हुए थे। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दें गफ्फूर साहेब। </p>
<p>वैसे, 1967 और 1971 के बीच, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तूती बोलती थी, चाहे पार्टी हो या सरकार। सबों को अपने नियंत्रण में ले ली थी श्रीमती गाँधी । आज की तरह ही, उन दिनों भी केंद्रीय सरकार का अर्थ केंद्रीय मंत्रिमंडल कोई नहीं था, बल्कि प्रधानमंत्री के सचिवालय ही हो गया था। सम्पूर्ण सरकार वहीँ केंद्रित थी। जो उनके भरोसे मंद थे, उनका तेवर कुछ और था, जो विश्वासभाजन नहीं थे, उनकी तो तो बात ही नहीं करें। सत्तर के दशक के प्रारंभिक महीनों, वर्षों में जो हुआ वह देश जानता है, जहां तक राजनीति का सवाल है। परन्तु जो नहीं जानता है वह यह की उन दिनों आर्यावर्त-इण्डियन नेशन-मिथिला मिहिर पत्र समूह का सम्पादकगण न केवल अपनी कलम में ताकत रखते थे, बल्कि उस समय के मंत्रियों, चाहे मुख्यमंत्री ही क्यों न हो, पुलिसकर्मियों चाहे पुलिस महानिदेशक ही क्यों न हो, उन्हें उनकी औकात दिखने की क्षमता रखते थे। कुछ ऐसी ही ऐतिहासिक घटना हुई थी उस दिन। </p>
<p>1975 की तपती गर्मी के दौरान अचानक भारतीय राजनीति में भी बेचैनी दिखी। यह सब हुआ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले से जिसमें इंदिरा गांधी को चुनाव में धांधली करने का दोषी पाया गया और उन पर छह वर्षों तक कोई भी पद संभालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। लेकिन इंदिरा गांधी ने इस फैसले को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की और 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी । उस दिन आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा, “जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील क़दम उठाए हैं, तभी से मेरे ख़िलाफ़ गहरी साजिश रची जा रही थी।” 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में देश में आपातकाल घोषित था।</p>
<p>जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के तहत पटना के दो प्रमुख अख़बारों के दफ्तरों को सुपुर्दे ख़ाक करने की तैयारी हो चुकी थी। नेता से लेकर, व्यापारी तक, पुलिस से लेकर अपराधी तक, आंदोलन में कतारबद्ध लोगबाग यह निर्णय ले लिए थे कि अमुक दिन पहले सर्चलाइट-प्रदीप और फिर आर्यावर्त-इण्डियन नेशन – मिथिला मिहिर का दफ्तर फूंका जायेगा। सर्चलाइट-प्रदीप जलकर स्वाहा हो गया परन्तु, जब आर्यावर्त-इण्डियन नेशन की बात आई तो इण्डियन नेशन के तत्कालीन संपादक दीनानाथ झा सामने खड़े हो गए। उस दिन वैसे तो संस्थान के लगभग सभी कर्मचारी गोलबंद हो गए थे, लेकिन संध्याकाळ होते-होते संस्थान के मुख्य द्वार के बजाय पिछले दीवारों को, जो जमाल रोड से मिलती थी, लांघ कर अपने-अपने घरों की ओर बच-बचाकर कूच कर रहे थे। धीरे-धीरे सम्पूर्ण परिसर वीरान हो गया। मुख्य द्वार पर 50-60 किलो शारीरिक वजन वाले दरवान ही रह गए थे। यह स्थान प्रवेश द्वार के ठीक सामने पोर्टिको का था। दिनाबाबू वहीं बैठ गए। अब तक ‘जॉब-विभाग’ में कार्य करने वाले बागेश्वरी प्रसाद ही बच गए थे, जो दीना बाबू के बगल में खड़े थे। बागेश्वरी प्रसाद का शारीरिक वजन भले 65 किलो के आसपास रहा होगा उस शाम, लेकिन उन्होंने हज़ारों-हज़ार किलो के मानसिक वजन वाले लोग जैसा कार्य किया था। दीना बाबू उन्हें भी जाने को कहे। वे दीना बाबू का बाहर सम्मान करते थे। </p>
<p>इसी बीच लाइनों विभाग में कार्य करने वाला जयप्रकाश, जो शरीर से कोई छः फिट लम्बा था, कुछ पल दीना बाबू और बागेश्वरी प्रसाद के पास खड़े रहे, लेकिन तक्षण संस्थान के पिछले दीवार की ओर भागे, जिधर से सभी कर्मचारी अपने-अपने घरों की ओर उन्मुख थे। </p>
<p>जयप्रकाश जोर से आवाज लगाया : <strong>“रुक जाओ…रुक जाओ कहीं दीना बाबू अपना दाह नहीं कर लें। वे कह रहे हैं अगर संस्थान बचेगा तभी हम सभी कर्मचारियों का जीवन है, अन्यथा कोई अस्तित्व नहीं है।</strong> </p>
<p>सभी कर्मचारियों के कदम वापस हो गए। परिसर में अखबार बेचने वालों की साईकिल लगी थी, संख्या सैकड़ों में थी। सभी साईकिल सामने के भवन के छत पर क्षणभर में चले गए। ईंट, पत्थर आदि भी एकत्रित हो गए। चतुर्दिक आंदोलनकारी भी भर गए थे फ़्रेज़र रोड पर। लेकिन ऊपर से साइकिलों, पत्थरों और ईंटों के प्रहार से वे संस्थान के अंदर प्रवेश नहीं ले सके। इस बीच, दिनाबाबू तत्कालीन पुलिस महानिदेशक वाई.एन. झा से संस्थान की सम्पूर्ण सुरक्षा के लिए सुरक्षा बल मुहैया करने को कहा। पुलिस महानिदेशक, बिहार में प्रचलित उस कहावत को चरितार्थ कर दिए जब एक व्यक्ति के पेशाब की जरूरत हुई और वह व्यक्ति कहने लगा की वह पिछले छः माह से पेशाब किया ही नहीं और अगले एक वर्ष तक लघुशंका करेगा भी नहीं। अब तक पोर्टिको में कर्मचारियों का बैठक बन गया था। टेलीफोन भी लग गए थे। </p>
<p>दूसरे दिन प्रदेश के मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर अपने चेला-चपाटियों के साथ आर्यावर्त-इण्डियन नेशन कार्यालय में धमके। प्रांगण के अंदर प्रवेश के साथ ही कार्यालय परिसर के समस्त कर्मचारी गोलबंद हो गए। मुख्यमंत्री अपने काफिले के साथ पोर्टिको तक पहुंचे। दीनाबाबू वहीँ थे । अब्दुल गफूर को देखते ही दीनानाथ झा का रक्तचाप बढ़ गया। वे जब गुस्स में होते थे तो उनका सम्पूर्ण शरीर कांपने लगता था। दृश्य बहुत संवेदनशील था। दीनानाथ जी बाहर गेट के तरफ अपनी ऊँगली से इशारा करते अब्दुल गफूर को बाहर निकलने को कहा। स्थिति बद से बत्तर हो रही थी। एक पत्रकार और मुख्यमंत्री आमने सामने था। तभी फोन की घंटी टनटनायी – “हेल्लो !!! रेस्पेक्टेड दीना बाबू, मैडम विश तो टॉक तो यु…. प्लीज सर।” </p>
<p>फोन के दूसरे छोड़ पर दिल्ली से श्रीमती इंदिरा गाँधी थीं। अब्दुल गफूर उलटे पैर वापस अपने कार्यालय में आ गए। फ़्रेज़र रोड पर बड़े-बड़े बसों में लदे तक़रीबन 50 बन्दुक, राइफलों से लैश केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के लोग कार्यालय परिसर में प्रवेश लिए और बिहार के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक तत्काल प्रभाव से हस्तानांतरित हो गए। इसके बाद विद्याचरण शुक्ल – अब्दुल गफूर के साथ फिर एक बार रूबरू बकझक हुआ। और दोनों नेता पुनः मुंह के बल गिरे। पत्रकारिता में सम्मान था। पत्रकार भी सम्मानित थे। </p>
<p>सत्तर के दशक या उससे पूर्व की पत्रकारिता की तुलना नब्बे के दशक के बाद से लगातार, आज तक, हम नहीं कर सकते हैं। उन दिनों की पत्रकारिता, या पत्रकारों के प्रति, पत्रकारिता के प्रति तत्कालीन राजनेताओं का जो सम्मान था, पत्रकारों की कलम में जो ताकत थी, उनकी जो सोच थी, समाज के प्रति उनकी जो प्रतिबद्धता थी; आज की तुलना नहीं कर सकते हैं। आज सब कुछ बदल गया है। मालिकों की सोच बदल गयी है। कर्मचारियों की सोच बदल गयी है। लेकिन बाबूजी कहते थे: “अंतिम दम तक लड़ना सीखो, क्या पता अंतिम चाल में ही कामयाबी मिल जाय।” </p>
<p>आज आर्यावर्त – इंडियन नेशन – मिथिला मिहिर अखबार बंद हो गया, नामोनिशान मिटा दिया पटना के फ़्रेज़र रोड पर। कुछ कर्मचारी भी दोषी थे, कुछ प्रबंधन भी, मालिक तो थे ही। प्रबंधन के लोगबाग ‘बूढ़ी संस्थान’ से छुटकारा पा कर, अपना हाथ धोकर गंगा नहाना चाह रहे थे, इसलिए जिधर लाभ का दीपक दिखा, गर्दन धुसा लिए। हताश कर्मचारियों के पास कोई विकल्प नहीं था। वह “भागते भूत को लंगोट ही सही’, में विस्वास करने लगे और मालिक तो “निरीह”, “कमजोर” “दूर दृष्टिहीन” हो ही गया था। वह चाह भी रहा था की किसी तरह इस जंजाल से, इस पीड़ा से मुक्ति मिले। वजह भी था: जिंन्हें पटना के इस स्थान पर एक-गज जमीन खरीदने की ताकत थी नहीं थी, मुफ्त में मिली सम्पत्तियों का कद्र करना नहीं जानते थे, चापलूसों, चाटुकारों, लोभियों, चमचों, अवसरवादियों के चक्रव्यूह में रहना पसंद करते थे, सभी गिद्ध की तरह मौका की तलाश में थे – अवसर मिलता गया, नोचते गए। </p>
<p><strong>सन 1975 में जब आर्यावर्त-दी इण्डियन नेशन पत्र समूह में मैट्रिक उत्तीर्ण कर नौकरी शुरू किया था, दी इण्डियन नेशन के तत्कालीन संपादक श्री दीनानाथ झा पहले सर पर हाथ रखकर &#8216;आशीष&#8217; दिए, फिर कहे: &#8216;गरीब के बच्चों को पत्रकारिता में नहीं आना चाहिए। लेकिन तुम अपवाद हो। तुम अपने जीवन में इतना ज्ञान एकत्रित करना, इतनी मेहनत करना, अपनी सोच को इतना मजबूत बनाना कि आने वाले समय में पत्रकारिता जगत के ही लोग तुम पर कहानी करने लगें। कल तुम अख़बार बेचे थे, हम गवाह हैं। आज उसी अखबार में नौकरी शुरू किये हो, हम गवाह हैं। कल इसी अखबार में तुम लिखोगे भी और मैं संपादक भी रहूँगा । मेरा आशीष है कि तुम पटना ही नहीं, बिहार ही नहीं, भारत ही नहीं, विश्व के बेहतरीन अख़बारों में लिखो। लोग तुम्हें तुम्हारे नाम से, काम से जाने। तुम्हारी पहचान कुछ अलग हो। जिस दिन ऐसा होगा मैं समझ लूंगा कि मुझे दक्षिणा मिला गया। उस दिन मैं रहूं या नहीं रहीं, तुम्हारे माता-पिता रहें अथवा नहीं, लेकिन तुम्हारे माता-पिता को गर्व होगा और सबसे महत्वपूर्ण तुम अपनी नज़रों में अव्वल दिखोगे।&#8221;</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/special-on-teachers-daya-tribute-to-teacher">शिक्षक दिवस पर विशेष ✍ कल अख़बार में नाम छपवाने के लिए &#8216;प्रेस रिलीज&#8217; लेकर दफ्तर में &#8216;दंड बैठकी&#8217; करते थे, आज बिहार के लोगों को प्राणायाम सीखा रहे हैं😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>जैसे-जैसे ✍ पत्रकारिता में अक्षरों का रंग बदलता गया, काला अक्षर &#8216;रंगीन&#8217; होता गया; &#8216;काले अक्षरों पर धब्बे लगते गए,&#8217; फ़र्जी पत्रकारों की बाढ़ आती गई😪दुःखद</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 18 Apr 2023 10:55:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[code of conduct]]></category>
		<category><![CDATA[journalism]]></category>
		<category><![CDATA[journalist]]></category>
		<category><![CDATA[rules]]></category>
		<category><![CDATA[scrititi]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>रायसीना हिल (नई दिल्ली) : आप माने अथवा नहीं। राजनेताओं के साथ-साथ, सत्ता की गलियारे में बैठे आला अधिकारियों और समाज के तथाकथित &#8216;ठेकेदारों&#8217; की यही इक्षा होती है कि उनके सगे-सम्बन्धी अगर भारतीय प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा, राजस्व सेवा, चिकित्सक, अभियंता, कॉर्पोरेट घराने के मालिक नहीं बन पाए (ऐसा हो नहीं सकता), राजनीतिक &#8216;उत्तराधिकारी&#8217; [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-existence-of-journalism-is-in-danger">जैसे-जैसे ✍ पत्रकारिता में अक्षरों का रंग बदलता गया, काला अक्षर &#8216;रंगीन&#8217; होता गया; &#8216;काले अक्षरों पर धब्बे लगते गए,&#8217; फ़र्जी पत्रकारों की बाढ़ आती गई😪दुःखद</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>रायसीना हिल (नई दिल्ली) : आप माने अथवा नहीं। राजनेताओं के साथ-साथ, सत्ता की गलियारे में बैठे आला अधिकारियों और समाज के तथाकथित &#8216;ठेकेदारों&#8217; की यही इक्षा होती है कि उनके सगे-सम्बन्धी अगर भारतीय प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा, राजस्व सेवा, चिकित्सक, अभियंता, कॉर्पोरेट घराने के मालिक नहीं बन पाए (ऐसा हो नहीं सकता), राजनीतिक &#8216;उत्तराधिकारी&#8217; नहीं बन पाए; तो अंततः देश में सबसे अधिक बिकने वाला &#8216;अंग्रेजी&#8217; दैनिक, सबसे अधिक दिखने वाला &#8216;टीवी&#8217; या फिर सबसे अधिक घरों में, खेत-खलिहानों में सुने जाने वाले रेडियो में वरिष्ठतम संवाददाता/संपादक बन जाए। भले उनकी पात्रता को देखते उनकी नियुक्ति &#8216;मध्य-पद&#8217; पर हो, लेकिन तीसरी तन्खाह मिलते-मिलते उनके नामों से दर्जनों &#8216;विशेष खबर&#8217; प्रकाशित हो जाए, &#8216;एयर&#8217; हो जाए और वे वरिष्ठ पत्रकारों की सूची में अंकित हो जायँ। संस्थानों के मालिक और मालकिन उन्हें अपने साथ चाय पिलाने में अपना गर्व समझें।</strong></p>
<p>जबकि उसी संस्था की सबसे निचली सीढ़ी पर मुद्दत से अपना-अपना &#8216;पिछवाड़ा&#8217; रगड़ने वाले गरीब पत्रकार (अर्थ और सामर्थ दोनों से), जो दिन-रात मेहनत और मसक्कत कर कहानियां निकलता हों, &#8216;पकने&#8217;, &#8216;छौंका&#8217; लगने के बाद जब पडोसने का समय हो, उसके हाथों से खींचकर &#8216;सम्मानित आकाओं द्वारा अनुशंसित पत्रकारों के नाम लिख दिया जाए । तभी तो कहानियां &#8216;लिक&#8217; होगी, &#8216;फाइलें&#8217; निकलेंगी, &#8216;विज्ञापन&#8217; वाला फाइलों पर हस्ताक्षर होगा, एक-फोन पर अधिकारियों का, नेताओं का &#8216;बाइट&#8217; मिलेगा। यह सब वर्तमान पत्रकारिता की चारित्रिक विशेषता है। आज जैसे-जैसे कहानियों में लिखे जाने वाले अक्षरों का रंग &#8216;रंग-बिरंगा&#8217; होते जा रहा है, पत्रकारिता का काला अक्षर अपना वजूद खो रहा है। काले अक्षरों पर भी &#8216;काला धब्बा&#8217; दिखने लगा है। परिणाम यह हो रहा है कि देश की पत्रकारिता की स्थिति आज &#8216;सफ़ेद&#8217; नहीं, बल्कि &#8216;लाल&#8217; हो गया है। </p>
<p>सत्तर के दशक में पटना से प्रकाशित &#8216;दी इण्डियन नेशन&#8217; अख़बार के संपादक थे श्री (दिवंगत) दीनानाथ झा, जिनके छत्र-छाया में मैं पत्रकारिता सीखा था। पचास वर्ष पूर्व भारतीय पत्रकारिता का भविष्य उन्होंने आंककर कहा था। क्योंकि ऐसा ज्ञान सिर्फ वही दे सकता है जो &#8216;वास्तव में पत्रकार&#8217; रहा हो, जिसका वजूद पत्रकारिता की बुनियाद को मजबूत बनाता हो।  आज अक्षरशः सत्य दिख रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो आज पत्रकार के भेष में अपराधी नहीं आते। हाथों में कलम के बजाए बंदूक, पिस्तौल नहीं दीखते। लिखने के नाम पर ठांय-ठांय नहीं करता । कुछ तो है जिसे देखने, तहकीकात करने और जड़ से उखाड़ फेंकने की जरुरत है आज। क्योंकि अगर आज चूक गए तो आने वाले दिनों में भारत की पत्रकारिता और पत्रकार दोनों प्रदूषित नदी की धाराओं में अपना अस्तित्व समाप्त कर देगा। पत्रकार और पत्रकारिता के नाम पर &#8220;कलंक&#8221; लिखा जाएगा। </p>
<p><strong>देश में पहले अख़बारों के पाठक हुआ करते थे। अब पाठकों से अधिक लेखक, आलोचक और समीक्षक हैं। पहले अख़बारों में जो तस्वीरें प्रकाशित होती थीं, उन तस्वीरों को खींचने वालों की पहचान छायाकार के रूप में होती थी। देश में &#8216;स्मार्ट फोन&#8217; के आगमन से प्रत्येक &#8216;स्मार्ट फोन धारक&#8217;, चाहे वह अपनी सोच और मानसिकता से &#8216;स्मार्ट&#8217; हो अथवा नहीं, &#8216;छायाकार&#8217; अवश्य हो गया है। समाजिक क्षेत्र के मीडिया घरानों के आगमन से इन छायाकारों के पंख लग गए। </strong></p>
<p>टीवी के प्रादुर्भाव के बाद टीवी के दर्शक होते थे। टीवी पर जो समाचार वाचक होते थे, उन्हें टीवी के दर्शक कभी हँसते, बोलते नहीं देखते थे; चिचियाने की बात स्वप्न में भी नहीं सोचें । रेडियो में समाचार वाचक अथवा विभिन्न कार्यक्रमों में मंच सँभालने वालों को जब लोगबाग देखते थे तो उनकी आवाज से उन्हें पहचानने की कोशिश करते थे, पहचानते थे कि &#8220;फलाने उद्घोषक&#8221; या &#8220;उद्घोषिका&#8221; हैं। बहुत सम्मान मिलता था उन्हें। आज भी उन दिनों के समाचार वाचक या उद्घोषक जो शरीर से जीवित हैं, उनकी आत्मा की गहराई आज के वाचक अथवा उद्घोषक नहीं माप सकते हैं। यह पक्का है । </p>
<p>विगत चार-पांच दशकों में, जैसे-जैसे सरकारी क्षेत्रों के रेडियो, टीवी आदि के कन्धों पर पैर रखकर, कुचलकर, लहलहूआन  कर निजी क्षेत्र के लोगबाग &#8216;पत्रकार&#8217; बनते गए, बाज़ारों में पत्रकार बनने के उद्योग, संस्थाएं खुलती गई, पत्रकारिता के लिए दूकानदारी बढ़ती गई, समाज के लोग बाग़, संभ्रांतों के परिवार और परिजन, संतान पत्रकारिता पढ़ते गए, चिकन-चुनमुम, गोरे-चिट्टे चेहरों के साथ कमर और गर्दन हिलाते पत्रकारिता में ढुकते गए &#8211; पत्रकारिता का वजूद, अस्तित्व समाप्त होता गया। </p>
<p>वजह भी है। नेताओं की नजर में जब देश का कोई मोल नहीं रहा, देश के विकास का कोई वजूद नहीं रहा, जिन मतदाताओं की मतों से देश के 28 राज्यों के विधान सभाओं में, आठ केंद्र शासित प्रदेशों में देश की जनता के कल्याणार्थ, देश के विकास के लिए रामायण से लेकर गीता पर हाथ रखकर कसमें खाते हैं &#8211; सभी झूठे हैं। अगर सच होता तो शायद विगत 75 वर्षों में देश की न्यायालयों में लंबित मुकदमों में सफ़ेद पोश नेताओं का, सफेदपोश अधिकारियों का, दलालों का, समाज-सेवियों का, वर्दी पहने अधिकारियों का नाम अंकित नहीं होता। वे जेल की चहारदीवारी के अंदर बंद नहीं होते। </p>
<p><strong>वैसी स्थिति में अगर समाज के सभी तबके के लोगों में, संस्थाओं में चारित्रिक गिरावट आई है तो पत्रकार भी तो उसी समाज के हिस्सा हैं। अगर न्यायालयों की न्यायिक व्यवस्था में गिरावट होने के बाद भी भारत के लोगों का न्यायिक व्यवस्था पर विश्वास है, न्याय पर विश्वास है, चाहे जीते-जी मिले अथवा नहीं, न्यायमूर्तियों पर विश्वास है, चाहे सेवा अवधि के बाद उनकी निगाहें देश के संसद की ओर ही क्यों न टिकी हो। उसी तरह लाख ही नहीं, करोड़ों दुर्गुणों के बाद आज भी भारत के अख़बारों के पाठकों का, रेडियो के श्रोताओं का, टीवी के दर्शकों का देश के पत्रकारों पर विश्वास है, भरोसा है। </strong></p>
<p>लेकिन विधानपालिका-कार्यपालिका-राजनेताओं-राजनीतिक पार्टियों-तथाकथित समाज सेवियों &#8211; वर्दी धारियों के साथ मिली-भगत, साठ-गाँठ के कारण आज &#8216;पत्रकारिता&#8217; शब्द का मूल्य और सिद्धांतों से अनभिज्ञ लोगों का विशाल समुदाय इस क्षेत्र में घर बना लिया है। आज जो अख़बार प्रकाशित कर रहे हैं, टीवी चला रहे हैं, रेडियो बजा रहे हैं &#8211; उनमें सैकड़े 99 फ़ीसदी लोगों को पत्रकारिता के मूल्यों और सिद्धांतों से दूर-दूर तक कोई रिस्ता नहीं है। </p>
<p><strong>एक दृष्टान्त:</strong> कई वर्ष पहले दिल्ली शहर में सबसे अधिक बिकने वाला एक दैनिक समाचार पत्र के मालिक ने आधिकारिक रूप से यह कहा था कि उन्हें &#8216;समाचार के मूल्यों&#8217; से कोई मतलब नहीं है। अगर प्रथम पृष्ठ की प्रथम कहानी कितना भी महत्वपूर्ण क्यों न हो, वह मौद्रिक मूल्यों की बाद होगी। अगर उस थान पर कोई पैसे देकर समाचार प्रकाशित करना चाहता है जिससे संस्था को आर्थिक लाभ की बात होगी, वे उस समाचार को वहां से हटाने का एकाधिकार सर्वाधिकार सुरक्षित रखते हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर पत्रकरों को, लेखकों को, सम्पादकों को संस्थान मोटी-मोटी रकमों पर रखता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वे आर्थिक मामलों पर दखलंदाजी करें। मोटी रकमों का भुगतान उन्हें तभी होता है जब संस्था की कमाई होती है। </p>
<p>बहरहाल, अगले महीने जून में भारत में रेडियो प्रसारण का 100 वर्ष हो जायेगा। सन 1923 में तत्कालीन अंग्रेजी शासन के दौरान बम्बई प्रेसिडेंसी रेडियो क्लब द्वारा एक कार्यक्रम का प्रसारण किया गया था। इसके चार साल बाद जुलाई महीने में इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी लिमिटेड के एक करारनामे के अनुसार देश में दो निजी रेडियो स्टेशन की स्थापना हुई। पहला बम्बई में और दूसरा कलकत्ता में। बम्बई से प्रसारण 23 जुलाई, 1927 से प्रारम्भ हुआ जबकि कलकत्ता से 26 अगस्त, 1927 से प्रसारण प्रारम्भ हुआ। तीन वर्ष के अंदर ही ये दोनों स्टेशन्स &#8216;लिक्विडेशन&#8217; में चला गया । लेकिन तत्कालीन सरकार प्रसारण सुविधा को प्रयोग के आधार पर अपने हाथ में ले ली और दो सालों तक चलाने की शुरुआत की और अंततः 1936 के जून महीने में अखंड भारत को &#8216;ऑल इण्डिया रेडियो&#8221; के रूप में प्रसारण हेतु एक सरकारी संस्था मिला।</p>
<p>स्वाधीनता के बाद भारत में दिल्ली, बम्बई, कलकत्ता, मद्रास, तिरुचिरापल्ली, और लखनऊ रेडियो स्टेशन के रूप में प्रसारण संस्थाएं मिली। जुलाई 1977 में पहली बार एफएम प्रसारण मद्रास रेडियो से प्रारम्भ हुआ। आज पूरे देश में तक़रीबन 400 शहरों में एफएम रेडियो बज रहा है। आकाशवाणी तो है ही । कहते हैं कि आज भारत की अर्थव्यवस्था में रेडियो उद्योग का विकास बहुत अधिक हुआ, खासकर मीडिया और इंटरटेनमेंट के क्षेत्र में। आशा है कि आने वाले समय में रेडियो की आमदनी 4000 करोड़ प्रतिवर्ष का व्ववसाय हो जायेगा। </p>
<p><strong>इसी तरह आज देश में कोई 900 निजी सेटेलाइट टीवी चैनेल्स हैं। शायद ही कोई भाषा है, जिसमें टीवी नहीं है। इतना ही नहीं, कोई 105443 निबंधित समाचार पत्र/पत्रिकाएं हैं जो देश की गली-कूचियों से लेकर राज्यों की जिला मुख्यालयों के रास्ते, राजधानियों को पार करते देश की राजधानी से प्रकाशित होती हैं। अब सवाल यह है कि अगर निजी क्षेत्रों में इतने सारे संवादों के प्रसारण हेतु संस्थाएं हैं लोगबाग भी तो होंगे ही। </strong></p>
<p>भारत के वरिष्ठ पत्रकार <strong>के विक्रम राव </strong>उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्य नाथ योगी को लिखते हैं कि &#8220;योगी जी, मीडिया को गटर में न जाने दें ! सरकारी मान्यता नियम लागू हों !!&#8221; </p>
<p>उनका लिखना जायज है। क्योंकि टीवी रिपोर्टर के छझ वेश में तीन शोहदों द्वारा माफिया अहमद &#8211; ब्रदर्स (अतीक और अशरफ) को भून देना, हम श्रमजीवी पत्रकारों के लिए वीभत्स हादसा है। क्योंकि पत्रकारिता हमारे लिए व्रत हैं, बाद में वृत्ति। अतः प्रयागराज का जघन्य कांड एक गंभीर चेतावनी है। हालांकि भारत सरकार का गृह मंत्रालय कल ही सुरक्षा की दृष्टि से जोखिम भरी घटनाओं की रिपोर्टिंग पर नियमावली तत्काल जारी कर रहा है। लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास पर पहरा तो बढ़ा दिया गया है। मगर मूल मसला है कि पत्रकार का कार्ड शासन ने थोक में अंधाधुंध जारी किया है। राजधानी में ही हजार हो गए हैं। कैसे ? क्यों ? सूचना निदेशालय हुलिया देखकर मान्यता देना बंद करे। ये तीन कथित संवाददाता फर्जी पहचानपत्र, वीडियो कैमरा, माईक आदि लिए थे। इनमें लवलेश तिवारी तो अपने आप को “महाराज” कहता है। उसकी आयु महज 22 साल है, जब कि मान्यता कार्ड पाने के लिए कम से कम पांच वर्ष का पत्रकारी कार्य होना अनिवार्य है। अर्थात फर्जी था। दूसरा हत्यारा अरुण मौर्य तो केवल 18 का है।</p>
<p>राव साहब का कहना है कि एक घृणित तथ्य का उल्लेख यहां लाजिमी है। राजीव गांधी की हत्या का रचयिता शिवरासन तमिलनाडु सरकार का मान्यता प्राप्त संवाददाता था। हाथ में बालपेन और नोटबुक थामें रहता था। गांधीजी का हत्यारा नाथूराम गोडसे भी पुणे के लुगदी साप्ताहिक का संपादक था। तालिबानियों के शत्रु अहमदशाह मसूद, शेरे पंजशीर, को 2007 में अलकायदा के बमबाजों ने संवाददाता बनकर उड़ा दिया था। आजकल तो मोबाइल फोन से ही कैमरा का काम भी हो जाता है। अतः जांच का कारण अधिक गंभीर और अपरिहार्य हो जाता हैं।</p>
<p>वे लिखते हैं: &#8220;योगी आदित्यनाथजी से मैं स्वयं सारे मान्यता कार्डों की पड़ताल का अनुरोध कर चुका हूं। फर्जी पत्रकारों की सूक्ष्म जांच हो। इसीलिए कि रवि और कवि की भांति रिपोर्टर भी बेरोकटोक, बेखौफ हर जगह पहुँच जाते हैं। मुनि नारद के वंशज जो ठहरे ! आश्वासन देने के बावजूद अभी तक ऐसी शासकीय जांच हुई ही नहीं है। आज लखनऊ के हजार मान्यताप्राप्त संवाददाताओं में वास्तव में कितने कार्यरत हैं ? मसलन, एक शर्त मान्यता की है कि प्रार्थी आधार कार्ड को नत्थी करे। सरकारी नियम है कि हर संवाददाता की L.I.U. जांच हो। ईमानदारी से ऐसी जांच हो, तो जालसाजी कटेगी। कई ऐसे मान्यताप्राप्त हैं जो राजधानी लखनऊ में रहते ही नहीं। जिलों के निवासी हैं। जाली पता दे दिया है, क्योंकि केवल लखनऊवासी ही राज्य का मान्यताप्राप्त संवाददाता हो सकता है।&#8221;</p>
<p>उनका कहना है कि &#8220;मुझे स्मरण आता है 1981 का प्रसंग। तब यूपी राज्य मान्यता समिति का मैं सदस्य था। मेरे साथ NUJ के अच्युतानन्द मिश्र (फोन : 9560880055/9560110055, अमर उजाला) भी थे। तब तक इंदिरा गांधी वापस सत्ता पर आ गई थीं। महाबली आरके धवन भी। धवन ने किसी पत्रकार की मान्यता हेतु मुख्यमंत्री के मार्फत सूचना सचिव/निदेशक को कहा था। पर हम लोगों ने नहीं होने दिया क्योंकि वह व्यक्ति कांग्रेस पार्टी कार्यकर्ता था,  संवाददाता नहीं। आज अधिकांश मान्यताप्राप्त संवाददाता क्या नियमानुसार हैं ? मैंने योगीजी से आग्रह भी किया था कि इस प्रकार की जांच सर्वप्रथम मेरे ही मान्यतापत्र की पड़ताल से शुरू की जाए। मेरे विषय में सारे उल्लिखित नियमों, शर्तों, आवश्यकताओं, अर्हताओं के आलोक में समुचित परीक्षा हो। यदि त्रुटि पाई जाए तो मेरी मान्यता निरस्त कर दी जाए। यहां उल्लेख कर दूं की कि मायावती सरकार ने द्वेषवश मेरी मान्यता (रोहित नंदन निदेशक थे) रद्द कर दी थी। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने मेरी मान्यता बहाल की। तब न्यायमूर्ति यूके धवन की खंडपीठ ने कठोर शब्दों में पूछा था : “मायावती शासन दुनिया की मीडिया को क्या संदेश देना चाहता है ? वरिष्ठतम संवाददाता की मान्यता अकारण काट दी ?” बहाली का हुक्म दिया।&#8221;</p>
<p>योगीजी के शासन से मैं फिर सविनय अनुरोध करता हूं कि सर्वप्रथम मेरी ही जांच हो। मैं भारत के छः राज्यों में मान्यता प्राप्त संवाददाता रहा हूं। भारत के शीर्षतम अंग्रेजी दैनिक “दि टाइम्स ऑफ इंडिया” में चार दशकों तक कार्यरत रहा। भारतीय प्रेस परिषद का छः वर्षों तक सदस्य रहने के अलावा भारत सरकार की प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो की केंद्रीय मान्यता समिति का दो बार सदस्य रहा। भाचावत तथा मणिसाणासिंह वेतन बोर्डों का नौ वर्षों तक सदस्य रहा। बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र, उत्तर प्रदेश विधान मण्डलों की तथा राज्यसभा की रिपोर्टिंग कर चुका हूं। पत्रकारी अनुभव के हिसाब से मैं नेहरू से नरेंद्र मोदी तक की रिपोर्टिंग मैं कर चुका हूँ। एक बुद्धिकर्मी हूं। मेहनत द्वारा हक मांगा और हासिल किया है। कोई कृपादान अथवा फर्जीवाड़ा से नहीं ! इसीलिए चाहता हूं कि मान्यताप्राप्त संवाददाता की गरिमा संजोयी जाये। अवनति खत्म हो। योगीजी से एक और आग्रह। जो भी समाचार संकलन करते हैं, लिखते पढ़ते ही उन्हें ही सुविधायें उपलब्ध हो।</p>
<p>अब एक जिक्र विभिन्न मुख्यमंत्रियों और मीडिया के सम्बन्धों में। मायावती की प्रेस कॉन्फ्रेंस में तो मैं जाता नहीं था। वे इमला लिखाकर चली जाती थीं। एक मुख्यमंत्री आए थे सुल्तानपुर वाले पं. श्रीपति मिश्र। उन्हें समझ ही नहीं चला समाचारपत्र है क्या ? यूं वे विधानसभा अध्यक्ष भी रहे थे। एक बार श्रमजीवी पत्रकारों की समस्याओं पर चर्चा करने से एक प्रतिनिधिमंडल लेकर इस कांग्रेसी मुख्यमंत्री के पास गया था। साथियों का परिचय मैंने कराया कि फलां लखनऊ श्रमजीवी पत्रकार यूनियन, यूपी पत्रकार यूनियन तथा इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (IFWJ) के पदाधिकारी हैं। पंडित श्रीपति मिश्र बोले : “अच्छा तीन संगठनों के हैं ?” मेरा जवाब था : “नहीं। जैसे आपकी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, प्रदेश कमेटी, जिला कमेटी, शहर कमेटी हैं”। तब उन्हें कौंधा। राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह को मैंने पाया कि सुबह वे दैनिकों में राज्य संबंधी समाचार पढ़कर जिलाधिकारियों से फोन पर ही जवाब तलब कर लेते थे।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-existence-of-journalism-is-in-danger">जैसे-जैसे ✍ पत्रकारिता में अक्षरों का रंग बदलता गया, काला अक्षर &#8216;रंगीन&#8217; होता गया; &#8216;काले अक्षरों पर धब्बे लगते गए,&#8217; फ़र्जी पत्रकारों की बाढ़ आती गई😪दुःखद</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्, गोविन्दं भज मूढ़मते &#8230;. यानी चश्मा उतारो फिर देखो यारो</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संजय कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 04 Dec 2022 07:18:53 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[journalism]]></category>
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		<category><![CDATA[pranoy roy]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली टेलीविजन (एनडीटीवी) के प्रोमोटर प्रणय रॉय और राधिका रॉय ने 2007 में अपने मौजूदा निवेशकों से शेयर वापस खरीदने की पेशकश की। सबसे पहले, एक अन्य इकाई जीए ग्लोबल इन्वेस्टमेंट्स से 7.73% हिस्सेदारी खरीदने की योजना थी। लेकिन इससे एक ऐसी शुरुआत हुई जिसे ओपन ऑफर कहा जाता है। ओपन ऑफर क्या है? पूंजी बाजार के [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली टेलीविजन (एनडीटीवी) के प्रोमोटर प्रणय रॉय और राधिका रॉय ने 2007 में अपने मौजूदा निवेशकों से शेयर वापस खरीदने की पेशकश की। सबसे पहले, एक अन्य इकाई जीए ग्लोबल इन्वेस्टमेंट्स से 7.73% हिस्सेदारी खरीदने की योजना थी। लेकिन इससे एक ऐसी शुरुआत हुई जिसे ओपन ऑफर कहा जाता है। ओपन ऑफर क्या है?</strong></p>
<p>पूंजी बाजार के नियमों के अनुसार, प्रोमोटर्स (या सामान्य तौर पर किसी भी निवेशक) को सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनी के बड़े हिस्से को खरीदते समय कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है। एक नियम अल्पसंख्यक शेयरधारकों से संबंधित है।</p>
<p>यदि आप कुछ सौ स्टॉक रखने वाली कंपनी में अल्पसंख्यक शेयरधारक हैं और आपको लगता है कि स्वामित्व संरचना में बड़े पैमाने पर बदलाव से कंपनी के भविष्य पर असर पड़ सकता है तो आपके पास निवेश से बाहर निकलने का पूरा अधिकार है। यही कारण है कि नियामक प्रवर्तकों (या निवेशकों) से अल्पसंख्यक शेयरधारकों के लिए एक अतिरिक्त खुली पेशकश करने के लिए कहता है, जब वे कुछ चुनिंदा निवेशकों से कंपनी का एक बड़ा हिस्सा खरीदते हैं। इस तरह, ओपन ऑफर आपको एक निश्चित कीमत पर अपने शेयर बेचने की अनुमति देगा और अगर आप चाहें तो निवेश से अलग हो सकते हैं।</p>
<p>इसलिए, रॉय दंपति ने जब कंपनी का 7.73% वापस खरीदा, तो उन्हें इस लेन-देन को पूरा करने के लिए एक खुली पेशकश करनी पड़ी। दुर्भाग्य से, उनके पास पैसे नहीं थे। इसलिए नकदी पूरी करने के लिए, उन्होंने एनडीटीवी के शेयरों को गिरवी रखकर इंडियाबुल्स फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड से लगभग ₹540 करोड़ उधार लिए।</p>
<p>लेकिन तभी, वैश्विक वित्तीय संकट ने पूरे परिदृश्य को बदल दिया। एनडीटीवी के शेयरों का मूल्य गिर गया और ऋण के समर्थन में गिरवी रखे शेयर ने अपना अधिकांश मूल्य खो दिया। संभावना है कि इंडियाबुल्स ने अपने पैसे चुकाने की मांग की हो। इसलिए अक्टूबर 2008 में, प्रवर्तकों ने इंडियाबुल्स फाइनेंशियल सर्विसेज को चुकाने के लिए आईसीआईसीआई बैंक से ₹375 करोड़ का एक और कर्ज लिया।</p>
<p>इस कर्ज की ब्याज दर 19% थी। स्थिति हताश करने वाली हो रही थी। इसी समय एक असामान्य सा हीरो पृष्ठभूमि में उभरता है &#8211; विश्वप्रधान कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड (या वीसीपीएल) के नाम से एक कर्जदाता। इस कंपनी ने एनडीटीवी को 10 साल की अवधि के लिए ब्याज मुक्त आधार पर ₹350 करोड़ का कर्ज दिया। बदले में, एनडीटीवी को वीसीपीएल को एक परिवर्तनीय (कनवर्टिबल) वारंट देनी पड़ी।</p>
<p>परिवर्तनीय वारंट एक वित्तीय इंस्ट्रूमेंट है (चेक भी वित्तीय इंस्ट्रूमेंट कहा जाता है) जो आपको कुछ शर्तों को पूरा करने पर निश्चित मूल्य पर शेयर खरीदने की अनुमति देगा। इस तरह, वारंट रखने वाले वीसीपीएल के पास एनडीटीवी के शेयर का बड़ा हिस्सा प्राप्त करने का अवसर था। जब तक शेयरों का यह हिस्सा एनडीटीवी के प्रवर्तकों के पास था, सब ठीक था।</p>
<p>लेकिन मुश्किल समय चल रहा था और एनडीटीवी के प्रवर्तकों के पास बहुत विकल्प नहीं थे। इसलिए उन्हें मानना पड़ा। तय हुआ कि एनडीटीवी के 29 प्रतिशत शेयर एक अलग फर्म आरआरपीआर (राधिका राय प्रणय राय) के जरिए रखा जाए और वीसीपीएल से कहा गया कि वे आरआरपीआर का पूरा शेयर वारंट के रूप में उन्हें दे देंगे। इस तरह, संक्षेप में एक रहस्यमयी इकाई वीसीपीएल के पास आरआरपीआर में वारंट हो गए और इसके जरिए एनडीटीवी में ~29 प्रतिशत शेयर हासिल करने का मौका।</p>
<p>अब सवाल है कि, वीसीपीएल कौन है, किसकी है &#8211; रहस्यमयी ऋणदाता? और यहीं से मामला दिलचस्प होना शुरू होता है। वीसीपीएल की स्थापना 2008 में ही हुई थी। इसका कोई ट्रैक रिकॉर्ड नहीं है और ऐसा नहीं लगता कि वह इस एक लेन-देन के अलावा भी कुछ कर रही थी। तो अगला सवाल होगा, किसकी है यह कंपनी या फर्म।</p>
<p>वीसीपीएल को जानने की कोशिश में पता चलता है कि उसने एक अन्य कंपनी, शिनानो रिटेल से पैसा उधार लिया था। और अंदाजा लगाइए कि शिनानो का मालिक कौन है? रिलायंस। जी हां, अंग्रेजी में रिलायंस मतलब भरोसा नहीं, रिलायंस ही। इसका मतलब यह हुआ कि इन सभी वर्षों में भारत के सबसे बड़े कॉरपोरेट में से एक का एनडीटीवी में (अप्रत्यक्ष रूप से) हिस्सा था। उस रिलायंस ने वीसीपीएल से हाथ धो लिया। दो अन्य इकाइयां &#8211; एमिनेंट नेटवर्क्स और नेक्स्टवेव टेलीवेंचर्स इस कंपनी के स्वामित्व के लिए आगे आईं। अफवाह यह है कि नए स्वामी के भी रिलायंस से कुछ अप्रत्यक्ष संबंध थे।</p>
<p>इसके बाद जब अडानी (पूरे नाम की जरूरत है क्या?) ने आगे बढ़कर वीसीपीएल को ₹113 करोड़ में खरीद लिया। और सौदे की घोषणा करने के कुछ ही मिनटों के भीतर इसने एक और धमाका किया। इसने एलान किया कि वीसीपीएल वारंट का उपयोग करेगा, जिसका मतलब हुआ आरआरपीआर का पूर्ण स्वामित्व। जो खेल हुआ है वह यही है। इसी से प्रणय राय और राधिका राय ने इस्तीफा दिया है और नए लोग निदेशक बनाए गए हैं जिनमें हिन्दी पत्रकारिता का एक जाना-माना नाम संजय पुगलिया का भी है। इस तरह, आरआरपीआर का स्वामित्व बदला है जिसके पास एनडीटीवी में 29% हिस्सेदारी है। इस तरह एनडीटीवी फिसलते हुए भी अपनी जगह पर है!</p>
<p>जून 2022 के शेयरहोल्डिंग पैटर्न के अनुसार प्रणय राय के 15.94 और रधिका राय के 16.32 प्रतिशत शेयर के साथ दोनों 32.26 प्रतिशत के मालिक हैं। आरआरपीआर होल्डिंग के 29.18 प्रतिशत अगर अडानी के पास हैं तो चार प्रतिशत शेयरों की खरीद से स्वामित्व बदल सकता है और जैसा ऊपर बताया गया वह किसी ना किसी नाम से है भी। लेकिन जैसा नियम है अडानी को इसके लिए खुली बिक्री का ऑफर करना होगा और यह ऑफर 5 दिसंबर तक खुला है। अभी तक राय दंपत्ति के काउंटर ऑफर की खबर नहीं है। इसलिए मुमकिन है खेल जल्दी ही पूरा हो जाए। इसमें कुछ तकनीकी पेंच भी हैं लेकिन जिसकी लाठी उसकी भैंस के जमाने में मामला दूर नहीं लगता है।</p>
<p>जो भी हो, अब अगर आप सोच रहे हैं कि वीसीपीएल के मालिकानों ने उसे अडानी को बेचने का फैसला क्यों किया, तो कोई भी अनुमान लगा सकता है। लेकिन इसके बाद जो होगा या हो सकता है वह एक के बाद एक कई तरह की प्रतिक्रियाओं को प्रेरित करेगा। एक तो यही कि रवीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया और जो वीडियो यू ट्यूब पर जारी किया उसे 24 घंटों में 50 लाख लोगों ने देखा। गुजरात में (और दिल्ली नगर निगम के लिए भी) मतदान है और एनडीटीवी (या एक स्वतंत्र मीडिया संस्थान) के साथ यह अन्याय और इसकी खबर का क्या असर होगा यह तो बाद में पता चलेगा। लेकिन खबरें तो बन और चल रही हैं।</p>
<p><strong>अब क्या हो सकता है</strong></p>
<p>आप कह सकते हैं कि इतने पैसे लगाकर भी कुछ नहीं मिला। जैसा पहले कहा जा चुका है, कंपनी पर नियंत्रण बदलने की कोशिश करने के लिए अभी और शेयर चाहिए तथा इसके लिए नियमानुसार खुली पेशकश की गई है तथा ₹294 प्रति शेयर के हिसाब से ऑफर खुला है। यहां तक मामला स्क्रिप्ट के अनुसार लगता है। दूसरी ओर, एनडीटीवी तख्ता पलट की कोशिशों का विरोध कर रहा है लेकिन उसका हश्र सबको पता है। इसलिए फिल्म का क्लाइमैक्स स्क्रिप्ट के अनुसार होगा या नया घटेगा यह देखने वाली बात होगी। दूसरी ओर, एनडीटीवी के प्रवर्तक भी बाजार से शेयर खरीद कर अपना हिस्सा बढ़ा सकते हैं और इस तरह अपनी स्थिति मजबूत कर सकते हैं लेकिन सारा खेल पैसे का है और राय दंपत्ति के पास पैसे होते तो यह स्थिति आती ही क्यों।</p>
<p><strong>रहस्यमयी ऋणदाता के लिए! पता नहीं।</strong></p>
<p>उपलब्ध शेयर होल्डिंग पैटर्न के अनुसार एनडीटीवी में एलटीएस इन्वेस्टमेंट फंड लिमिटेड के नाम से एक शेयरधारक है जिसके पास कंपनी का लगभग 9.75% हिस्सा है। इस फंड का अडानी के साथ एक अनोखा रिश्ता है। ऐसा लगता है कि फंड का लगभग 98% धन अडानी के चार शेयरों में ही निवेश किया गया है। इसलिए, फिल्म अभी जारी है देखते रहिए 6 बॉल में 36 रन बनाने जैसी स्थिति है और अभी हाल में खबर आई है कि एक नो बॉल हो जाए तो 42 रन बन सकते हैं। इसलिए जैसा क्रिकेट वैसा ही कॉरपोरेट वार। दांव नहीं लगाया हो तो आनंद पूरा है। इधर रहिए या उधर।</p>
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		<title>प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया चुनाव के बहाने: अपने ह्रदय को टटोलिये, जिसने पहचान दिया कहीं उस पत्रकारिता को लतिया कर राजनीतिक पार्टी का पिछलग्गू तो नहीं बन रहे हैं &#8216;स्वहित&#8217; में</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/dont-ditch-journalism</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 May 2022 05:19:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[journalism]]></category>
		<category><![CDATA[journalist]]></category>
		<category><![CDATA[parliament]]></category>
		<category><![CDATA[press]]></category>
		<category><![CDATA[press club of india]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया में क्लब के पदाधिकारियों के चयन हेतु &#8216;प्रत्यक्ष मतदान&#8217; का दिन था। ऐतिहासिक भीड़ थी। &#8216;अपरिचितों&#8217; की भीड़ में &#8216;जाना-पहचाना&#8217; चेहरा ढूंढ रहा था। पत्रकारों की पीढ़ियां बदल गई थी। कितनों के माथे के &#8216;बाल&#8217; अपने अस्तित्व से अलग हो गया था। कितनों के चेहरे जो मुद्दत पहले मूंछों&#8217; [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया में क्लब के पदाधिकारियों के चयन हेतु &#8216;प्रत्यक्ष मतदान&#8217; का दिन था। ऐतिहासिक भीड़ थी। &#8216;अपरिचितों&#8217; की भीड़ में &#8216;जाना-पहचाना&#8217; चेहरा ढूंढ रहा था। पत्रकारों की पीढ़ियां बदल गई थी। कितनों के माथे के &#8216;बाल&#8217; अपने अस्तित्व से अलग हो गया था। कितनों के चेहरे जो मुद्दत पहले मूंछों&#8217; के कारण पहचाने जाते थे, निमोछिया हो गए थे। कल तक जो 120-किलो शरीर का वजन दिल्ली की सड़कों पर रखे थे, सुटुक का सूखे &#8216;अल्हुए&#8217; जैसा हो गए थे। कई के वक्ष जो सम्मानित नरेंद्र मोदी के दिल्ली सल्तनत पर कब्ज़ा करने से बहुत पहले भी 56 इंच से भी अधिक नापे जाते थे, कल &#8216;उदर की चौड़ाई&#8217; 65 इंच से पार दिख रहा था। महिला पत्रकारों की घोर किल्लत थी, जैसे अकाल पड़ा हो। सुनने में यह भी आ रहा था कि भारत के महिला पत्रकार पुनः मुसको भवः होना चाहती हैं इस प्रेस क्लब में, लेकिन &#8216;प्रवेश शुल्क&#8217; अधिक होने के कारण कदम आगे नहीं बढ़ा पा रही हैं। हो भी कैसे ? आखिर वे &#8216;पत्रकार&#8217; भले हैं, &#8216;महिला&#8217; भी हैं और &#8216;माँ&#8217; भी &#8211; अतः परिवार की जिम्मेदारी &#8216;भारतीय पुरुष पत्रकारों&#8217; की तुलना में उन पर तो अधिक है। </strong></p>
<p>मैं उस भीड़ में अपनी मोटी-घनी मूंछ लिए चतुर्दिक जाना-पहचाना चेहरा ढूंढ रहा था, काम से कम 35-साल पुराना । गनीमत थी की विगत साढ़े तीन दशक से भी अधिक समय से दिल्ली में रहते हुए मूंछ पर कभी आंच नहीं आने दिए। जो पहचान उन दिनों थी, वही मूंछ आज भी &#8216;आधार कार्ड&#8217; कहिये या &#8216;पहचान पत्र&#8217; लोगों की निगाहों को आकर्षित कर रहा था। महिला मित्रों की कमी ह्रदय के कोने-कोने तक महसूस हो रही थी। जो मिलते थे, शारीरिक दूरियां बरकरार रखते एक-दूसरे से &#8216;बतिया&#8217; रहे थे &#8211; कह रहे थे कि महादेव को धन्यवाद देते हैं कि हम सभी जीवित हैं, साँसे ले रहे हैं और आज मतदान करने भी उपस्थित हुए हैं। अन्यथा दस हज़ार से भी अधिक सदस्यों वाली प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया में कौन किसे जानता हैं, नाम से, चेहरे से &#8211; अगर आप &#8216;उनके मंच के सदस्य&#8217; नहीं हैं। उन दिनों भी क्लब में प्रवेश तक &#8216;औपचारिकता&#8217; निभाने के लिए &#8216;हाय-हेलो&#8217; होता था, जैसे ही &#8216;दो-घूंट&#8217; अंदर उतरता था, अच्छे-अच्छे पहचान वाले अन्जान जैसा व्यवहार करने लगते थे। खैर। </p>
<p>कल प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया में पत्रकारिता के क्षेत्र में सम्मानित पत्रकारों का उदय &#8216;ध्यान आकर्षण&#8217; योग्य दिखा। नए-नए चेहरे दिखे।  उनके चेहरों पर रुतबा दिखा, &#8216;एटीच्यूड&#8217; दिखा । कहीं उम्मीदवार अपना पर्चा सुन्दर-सुन्दर महिलाओं के हाथों बंटवा रहे थे तो कहीं इवेंट-मैनेजमेंट के लोग पीला-पीला कपड़ा पहने &#8216;मतदाताओं&#8217; को आकर्षित कर रहे थे। लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, सुश्री मायावती, दिवंगत राजीव गांधी, भी कभी मतदाताओं को &#8216;इस कदर आकर्षित नहीं किये होंगे&#8217;, चुनाब के समय। सभी मोहतरम &#8216;सज-धज&#8217; कर मतदान हेतु आये थे। कोई किसी का पीठ ठोकने, तो कोई किसी का पैर खींचने । बड़ी-बड़ी लाखों-करोड़ों कीमत की गाड़ियां रायसीना रोड के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पंक्तिवद्ध थी। पत्रकारों की ऐसी-ऐसी गाड़ियों को देखकर भारत की पत्रकारिता खुद पर हंस रही थी। दिल्ली की यह पत्रकारिता देश की पत्रकारिता को दर्शा रहा था। दिल्ली पुलिस के सम्मानित अधिकारी भी इधर-उधर अपनी निगाहें कोने में बैठकर घुमा रहे थे। </p>
<p>हमारे ज़माने में पत्रकार या तो पटना की सड़कों पर साईकिल से चलते थे या पैदल। उनकी कलमों में इतनी ताकत थी की दिल्ली से 980 किलोमीटर दूर बैठकर भी प्रधान मंत्री कार्यालय में अपनी पत्रकारिता की छाप छोड़ते थे। आज तो आलम यह है कि दिल्ली में बिहार से प्रवासित लोगों को, चाहे वे भारतीय पत्रकारिता का अहम् हिस्सा ही क्यों न हो, सत्ता की गलियारे में खुद हिलते-डोलते नजर आते हैं। बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के बारे में तो पूछिए ही नहीं। कई पत्रकार तो सफेदपोश नेताओं के &#8216;अनुयायी&#8217; नहीं, बल्कि &#8216;पिछलग्गु&#8217; बनकर जीवन यापन का रास्ता ढूंढ रहे हैं। &#8216;कहीं कोई कुर्सी मिल जाय&#8217; की याचना के साथ सुबह-शाम अपने-अपने इष्ट नेताओं का जाप करते दीखते हैं।  जो सफल हो गए वे प्रदेश में अपने बुढ़ापे के लिए &#8216;विधायक पेंशन&#8217; निश्चित कर लिए, कई अभी लम्बी कतार में खड़े हैं।  </p>
<p>यह बात सिर्फ बिहार के पत्रकारों के साथ ही नहीं, देश के सभी 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों के पत्रकारों के साथ है &#8211; जो अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं द्वारा &#8216;संरक्षित&#8217;, &#8216;सम्पोषित&#8217; हैं। आखिर समय बदल रहा है। एक अमरीकी डालर के लिए जब 73+ भारतीय रुपये देने हों, तो कलम की कीमत भी तो वैसी ही होगी। दिल्ली की सड़कों पर, लाल-बत्तियों पर, चौराहों पर, भीड़-भाड़ वाले इलाकों में &#8216;पेट-पीठ&#8217; एक किये बच्चे, महिला, वृद्ध कहीं &#8216;कलम&#8217; बेच रही हैं तो कहीं &#8216;तिरंगा&#8217; &#8211; आखिर पेट तो सबों के है । अब तो पत्रकार बंधु-बांधव भी &#8216;कलम&#8217; रखना त्याग दिए हैं, &#8216;वायु त्याग&#8217; जैसा।  कमीजों के ऊपरी जेब में अब कलम नहीं दीखते, उसका स्थान स्मार्ट फोन ले लिया है। लिखने का काम, कथन-वक्तव्यों को रिकार्ड करने के लिए &#8216;स्मार्ट फोन&#8217; का इस्तेमाल करने लगे हैं। खैर।  </p>
<figure id="attachment_4046" aria-describedby="caption-attachment-4046" style="width: 2000px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244.jpg" alt="" width="2000" height="1325" class="size-full wp-image-4046" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244.jpg 2000w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244-300x199.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244-1024x678.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244-768x509.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244-1536x1018.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2000px) 100vw, 2000px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4046" class="wp-caption-text">स्थिर पानी और पानी में परछाई &#8211; आप भी देख सकते हैं</figcaption></figure>
<p>&#8216;लन्दन&#8217; के छाप पर उस ज़माने के &#8216;वेटेरन&#8217; पत्रकार श्री दुर्गा दास जी अविभाजित भारत की राजधानी दिल्ली में भी प्रेस प्रतिनिधियों के लिए एक &#8216;क्लब&#8217; बनाने को ठाने और बनाये भी। श्री दास जी उस समय एसोसिएटेड प्रेस ऑफ़ इण्डिया, जो बाद में प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया के रूप में विख्यात हुआ, के संपादक थे। अच्छा था कि वे सन 1930 के दशक में संपादक थे और सम्मानित भी थे। अन्यथा अगर आज की दौड़ के होते तो अपनी आखों के भारतीय पत्रकारिता की दशा ही नहीं, &#8216;दुर्दशा&#8217; को देखकर मन-ही-मन इतना रोते की उन्हें हृदयाघात हो जाता, या फिर जीने के लिए &#8216;ह्रदय में स्टंट&#8217; लगाना होता। खैर। न अब सम्मानित दुर्गा दास जी हैं और न तत्कालीन समय वाली पत्रकारिता। </p>
<p>कहते हैं कि 20 दिसंबर, 1957 को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की स्थापना हुई और उसका एक कंपनी के रूप में 10 मार्च 1958 को पंजीकरण हुआ। उनके प्रयासों की ही बदौलत भारत में ब्रिटिश हुकमरानी के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने इसके लिए 1 रायसीना रोड का बंगला आवंटित किया। यह भी कहा जाता है कि तत्कालीन आवंटन रद्द कर दिया गया तहत। जो भी, आज़ाद भारत के गृह मंत्री गोविन्द वल्लभ पंत 2 फरवरी, 1959 को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का उद्घाटन किया। आज भी पंत जी आदमकद तस्वीर प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया में टंगा है। इस क्लब में प्रारम्भ में महज ३० सदस्य थे और तत्कालीन हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक दुर्गा दास इसके पहले अध्यक्ष और दिग्गज पत्रकार डीआर मानकेकर पहले सेक्रेटरी जनरल थे। आज &#8216;आर्डिनरी&#8217; से लेकर &#8216;एसोसिएट&#8217; और &#8216;कॉर्पोरेट&#8217; सदस्यों की संख्या 9000 से अधिक है। </p>
<p>यही कारण है कि इस बार भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय द्वारा 300 से अधिक पत्रकारों को &#8211; जो साठ वर्ष से अधिक उम्र के हो गए हैं,  संस्थानों से अवकाश प्राप्त कर लिए हैं, लेकिन &#8216;फ्रीलांसर&#8217; के रूप में अपने शब्दों के सहारे दो वक्त की रोटी जुटाकर अपना और परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं &#8211; उन्हें &#8216;पत्र सूचना कार्यालय कार्ड (पीआईबी कार्ड) से मुक्त कर दिया गया है। उन वृद्ध पत्रकारों को उस कार्ड से जीवन के अंतिम वसंत में अपने बाल-बच्चों पर दवा-दारु-अस्पतालों के खर्च से बहुत आराम मिलता था। पिछली सरकार गैर-भाजपा सरकार में सूचना प्रसारण मंत्रालय और स्वास्थ्य मंत्रालय के सहयोग से उन्हें केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना के तहत यह सुविधा प्रदान की गई थी, जिसका अस्तित्व पीआईबी कार्ड से ही था। सरकारी मुलाजिम मूक-बधिर हैं। सूचना प्रसारण मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय को क्या कहें, कोई भी मंत्री अथवा मंत्रालय इस विषय पर चूं नहीं कर सकता। सभी कहते हैं &#8220;ऊपर का, आला कमान का आदेश&#8221; है। &#8216;आला-कमान&#8217; शब्द कांग्रेस में तो थी ही (परिणाम सामने है), अब भारतीय जनता पार्टी की नेतृत्व वाली सरकार में भी आ गयी है। </p>
<p>इस मामले में पत्रकार संघों, इकाईयों, यूनियनों से &#8220;हल्ला-बोल&#8221; की अपेक्षा करना बेकार है क्योंकि सभी अपने-अपने फ़िराक में हैं। सभी तो &#8216;फ़िराक गोरखपुरी&#8217; हैं नहीं और न सभी सूर्यकान्त त्रिपाठी &#8216;निराला&#8217; हैं। पत्रकारों, उनके संगठनों के बारे में कुछ सोचना मई-जून के महीने में &#8216;मूली&#8217; रोपने के बराबर है। अगर भारत के पत्रकार बंधु-बांधव कभी अपने समाज के लोगों के लिए, उनके कल्याणार्थ सोचे होते तो शायद आज भारत के चौराहों पर जिस कदर भारत के लोग पत्रकारों का फ़जीहत करते हैं, आलोचना करते हैं, गलियाते हैं &#8211; ऐसा नहीं होता। </p>
<p>एक दृष्टान्त: सत्तर के दशक में पटना रेलवे स्टेशन और डाक बंगला चौराहा को जोड़ने वाली सड़क फ़्रेज़र रोड के बाएं तरफ केंद्रीय कारा हुआ करता था। उस केंद्रीय कारा में आनंद मार्ग के बहुत से कार्यकर्त्ता बंद थे। आनंद मार्ग को &#8216;बैन&#8217; कर दिया दिया गया था। श्रीमती इंदिरा गांधी देश का कमान संभाली थी। जेल के चारो तरफ केंद्रीय रिजर्व पुलिस वल का पहरा रहता था। पटना के यूनाइटेड न्यूज़ एजेंसी (यूएनआई) के शिक्षक-तुल्य पत्रकार थे डी. एन. झा। झा साहेब अपने जीवन काल में कितने पत्रकार पैदा किये, यह अमूल्य शोध का विषय है। दुर्भाग्य यह है कि आज पटना के पत्रकार भी बाबू डी.एन. झा &#8211; बाबू बी.एन. झा को नहीं जानते होंगे। खैर , यह डिजिटल युग की पत्रकारिता हैं। </p>
<p>सम्मानित झा साहेब देर रात सड़क मार्ग से पैदल अपने घर जा रहे थे। इस बीच उन्हें &#8216;लघु शंका&#8217; की आवश्यकता हुई और वे आम नागरिक-नेताओं की तरह सड़क के बायीं ओर निवृत होने लगे। उन दिनों पटना की सड़कों पर &#8216;सुलभ शौचालय&#8217; महज एक &#8216;नवजात शिशु&#8217; के रूप में &#8216;रेंगना&#8217; शुरू किया था और &#8216;स्वच्छ भारत अभियान&#8217; तो भारत के अधिकारियों के &#8216;मानसिक गर्भ&#8217; में जन्म भी नहीं लिया था। सम्मानित अमिताभ बच्चन साहेब का &#8220;खुले में शौच नहीं करें&#8221; कथन दूरदर्शन पर भी नहीं आता था। हाँ, बच्चन साहेब पटना &#8216;वीणा सिनेमा&#8217;, एलिफिंस्टन सिनेमा&#8217; गृहों में &#8216;शोले&#8217; फिल्म में तस्वीर में दीखते थे। </p>
<p>सीआरपीएफ के जवान झा साहेब को दबोच लिए और कुछ डंडे भी रसीद दिए। अपना परिचय देते देते थक गए &#8216;झा साहेब&#8217;, लेकिन जवान एक भी नहीं सुने। अब तक उसकी बारी थी। यह बात कुछ सेकेण्ड में यूएनआई के दफ्तर में, तत्कालीन आर्यावर्त-इण्डियन नेशन-सर्चलाइट-प्रदीप-कौमी आवाज अख़बारों के दफ्तर में बिजली जैसी कौंध गई। समय पलट गया था, क्योंकि भारत के पत्रकार को इस कदर खुलेआम पीटना, जबकि वह &#8216;शंका&#8217; से मुक्त हो रहा था, अमानवीय माना गया। प्रदेश के मुख्य मंत्री कार्यालय और आवास की बात छोड़े, दिल्ली का प्रधान मंत्री कार्यालय में भी बत्तियां जल गयी थी। सीआरपीएफ के जवान और उसके आला अधिकारी को अपनी गलतियों का एहसास हो गया था। वजह भी था &#8211; उन दिनों सड़कों पर क्या राज नेता, क्या मंत्री, क्या अधिकारी सभी खुलेआम लघुशंका से मुक्त होते थे। गाँव-देहातों में तो &#8216;दीर्घ&#8217; भी खेतों में खुलेआम करते थे। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो शायद आज प्रदेश का यह हाल भी नहीं होता। </p>
<p>बहरहाल, श्री दुर्गा दास का क्लब मेरे जन्म के दस-माह पूर्व यानी 10 मार्च, 1958 को एक कंपनी के रूप में भारतीय कंपनियों की श्रृंखला में पंक्तिबद्ध हो गया। मेरा जन्म तो 10 जनवरी, 1959 को हुआ। मशहूर &#8216;बॉक्सर&#8217; जॉर्ज फोरमैन, मशहूर गायक जिम क्रॉस, बॉलीवुड के नायक ऋतिक रौशन, नायिका ऐश्वर्या राजेश, मशहूर बास्केट बॉल खिलाडी ग्लेंन रॉबिंसन, मशहूर पार्श्व गायक यसुदास का जन्म 10 जनवरी को ही हुआ था। आश्चर्य तो तब होता है जब भारतीय राजनीतिक मानचित्र पर 10 जनवरी को किसी भी राजनेता का जन्म तारीख नहीं देखता हूँ। कहते हैं 10 जनवरी को जन्म लेने वाले को जीवन में बहुत संघर्ष, मसक्कत करना पड़ता है और भारतीय राजनेता शायद उस श्रेणीं में नहीं हैं। बहरहाल, देश आज़ाद हो गया था। सन 1930 के दशक वाले पत्रकार वृद्ध होने लगे थे। पत्रकारिता में नई पीढ़ियों का अभ्युदय होने लगा था। देश का दो फांक में विभाजन भी हो गया था। रायसीना रोड-राजेंद्र प्रसाद रोड के मिलन-स्थल के कोने पर स्थित प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया उस ऐतिहासिक त्रादसी का चश्मदीद गवाह भी था। </p>
<p>जो भी हो, सन 1894 भूमि अधिग्रहण कानून के अधीन लगभग 300 से अधिक तत्कालीन लोगों की जमीन को अधिग्रहित किया गया था वायसराय के घर के निर्माण के लिए रायसीना पहाड़ पर । हुकूमत अंग्रेजी थी, स्वाभाविक है भारतीय गरीब लोगों को जमीन का हक़ देना ही पड़ा। अधिक बातें तो शहर के ज्ञानी-महात्मा बताएँगे, लेकिन ऐसा माना जाता है कि अंग्रेजी हुकूमत के दिनों की बातों को अगर नजर अंदाज कर भी दें, तो स्वतंत्र भारत में इस स्थान पर रहने वाले, दफ्तरों में बैठने वाले, संसद पर आधिपत्य जमाने वाले सम्मानित भारतीय स्वयं को सन 1947 के बाद से भारत के आवाम से न्यूनतम 18+ मीटर यानी 59+ फीट &#8220;ऊँचा&#8221; समझते हैं।उनकी अन्तःमन की इक्षा होती है कि &#8216;अगर एक बार ऊपर आ गए तो फिर अंतिम सांस बंद होने के बाद ही नीचे उतरें।&#8217; </p>
<p>अब स्वाधीनता के 75 वर्ष पर चाहे &#8216;आजादी का अमृत महोत्सव&#8217; मनाएं&#8217;, सच तो यही है कि देश में आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक दृष्टि से गरीब-गुरबा से लेकर दलित, महादलित भारतीयों की औसतन शारीरिक ऊंचाई पांच फुट आठ इंच से अधिक तो हैं नहीं। विज्ञान में चाहे कितना चमत्कार हो जाय, आम भारतीयों की ऊंचाई तो &#8220;जिराफ़&#8221; जैसी हो नहीं सकती। जो &#8216;मन से उंचा है भी&#8217;, मन पर इतना अधिक बोझ लिए बैठे हैं कि न उठ पाते हैं और ना ही आने वाली पीढ़ियों को उठने देते हैं। वैसी स्थिति में 59 फुट ऊँचे स्थान पर बैठे &#8216;महामानवों&#8217; को देखने के लिए तो उसे जमीन पर &#8216;चित्त&#8217; ही लेटना होगा, दूसरा कोई &#8216;विकल्प&#8217; नहीं है।  यही कारण है कि विगत 75-वर्षों से सन 1947 वाला 23 करोड़ आवाम से लेकर आज की 130+ करोड़ जनता तक सभी &#8220;चित&#8221; ही हैं। </p>
<p>&#8220;पट्ट&#8221; तो भारतीय संसद में &#8216;प्रत्यक्ष&#8217; और &#8216;परोक्ष&#8217; रूप से चयनित 545 लोक सभा के सम्मानित सांसद, 245 राज्य सभा के सम्मानित सांसद, राज्यों के विधान परिषदों के करीब 426 सम्मानित सदस्य, और 28 राज्यों तथा आठ केंद्र शासित प्रदेशों के कुल 4121 विधान सभाओं के सम्मानित सदस्य हैं। उन्हीं चयनित सदस्यों में सम्मानित प्रधान मंत्री महोदय हैं, भारतीय कैबिनेट के मंत्रीगण हैं, मुख्यमंत्रीगण हैं, लाट साहेब महोदय हैं । </p>
<p>खैर, अब अगर भारतीय संसद से दो सौ कदम पर प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया स्थित है। आज़ादी के बाद पूरे देश में कोई दो सौ के आस-पास समाचार पत्र प्रकशित होते थे, जब देश की आवादी 23 करोड़ थी; आज 130+ करोड़ लोगों के लिए एक लाख से अधिक समाचार पत्रों का निबंन्धन है। इसमें करीब 18,000 समाचार पत्र हैं और एक लाख से अधिक पत्रिकाएं हैं। इसके अलावे करीब 900 से अधिक टीवी चैनेल्स, जो 130+ करोड़ भारतीयों को क्षण-प्रतिक्षण की सूचना उपलब्ध कराते हैं। </p>
<figure id="attachment_4046" aria-describedby="caption-attachment-4046" style="width: 2000px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244.jpg" alt="" width="2000" height="1325" class="size-full wp-image-4046" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244.jpg 2000w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244-300x199.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244-1024x678.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244-768x509.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/Picture-244-1536x1018.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2000px) 100vw, 2000px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4046" class="wp-caption-text">स्थिर पानी और पानी में परछाई &#8211; आप भी देख सकते हैं</figcaption></figure>
<p>प्रारंभिक काल में तो एक सरकारी टीवी था, भारत के लोग &#8216;दूरदर्शन&#8217; के नाम से जानते थे। एक रेडियो था। लोग बाग़ &#8216;ये आकाशवाणी&#8217; है के नाम से परिचित थे। सामाजिक क्षेत्र के डिजिटल मीडिया के जन्म लेने के साथ ही, पारम्परिक संवाद में &#8216;ग्रहण&#8217; लगने का आभास होने लगा। आखिर समय बदल रहा था। देश को आज़ाद हुए भी सात दशक से अधिक हो गया था। जो उस समय वृद्ध थे, अपनी &#8216;राष्ट्रीयता&#8217; की मानसिकता को लेकर &#8216;मृत्यु&#8217; को प्राप्त करते गए। </p>
<p>आकंड़ों के अनुसार भारत में अभी 75+ वर्ष वाले कोई दो करोड़ 83 लाख लोग हैं जबकि 80+ उम्र के एक करोड़ 32 लाख और 90+ उम्र के बारह लाख के आस पास। अब सवाल यह है कि देश की कुल आवादी में 75 से अधिक उम्र के लोगों की संख्या, 75 से नीचे लोगों की संख्या के सामने &#8216;नगण्य&#8217; है और जो 75 से कम उम्र के हैं उनका फक्र के साथ यह कहना कि वे आज़ाद देश में जन्म लिए &#8211; गर्व की बात है। उनका देश की राजनीतिक व्यवस्था के प्रति, राजनेताओं के प्रति, राजनीतिक पार्टियों के प्रति &#8216;वचनबद्धता&#8217;, &#8216;प्रतिवद्धता&#8217; &#8216;झुकाव&#8217; स्वाभाविक है।  इसे आप उनका &#8216;जन्म सिद्ध अधिकार&#8217; भी कह सकते हैं । और इन एक लाख से अधिक पत्र-पत्रिकाओं में, टीवी चैनलों में, सामाजिक क्षेत्र के मीडिया में काम करने वाले सम्मानित पत्रकार बंधु-बांधव&#8217; भी तो इसी समाज के हैं। उनका नाम भी तो भारतीय जनगणना में अंकित है। </p>
<p>अब अगर प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया से मात्र दो सौ कदम पर भारत के कुल 3287263 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रों से &#8216;प्रत्यक्ष&#8217; और &#8216;परोक्ष&#8217; रूप से निर्वाचित लोग बाग़ आधुनिक ऐसो-आराम से सज्ज जीवन व्यतीत कर रहे हैं। भारतीय संसद के प्रवेश द्वार पर लिखा भी है &#8216;आम रास्ता नहीं है&#8217;, साथ ही प्रवेश द्वार के ठीक सामने सड़कों पर &#8216;अलकतरा&#8217; का पोचरा करने वाले आम भारतीयों की &#8216;सुक्खा-सुक्खी&#8217; न्यूनतम मजदूरी 178/- रूपया प्रतिदिन हो और उसकी तुलना में अन्य सभी सुख-सुविधाओं को छोड़कर सम्मानित सांसदों को, मंत्रियों को, मुख्य मंत्रियों को, राष्ट्रपति को, राज्यपालों को, अधिकारियों को, नेताओं को लाखों-लाख रुपयों में वेतन मिलता हो &#8211; चाहे अमेरिकन डॉलर की तुलना में भारतीय मुद्रा कितना भी लुढ़के &#8211; फिर तो &#8216;सजग पत्रकार&#8217;, &#8216;पहुँच वाले पत्रकार,&#8217; &#8216;राजनीतिक गलियारों के नामी पत्रकार&#8217; भी तो इसी समाज के हिस्सा हैं और उन्हें भी सर्वाधिकार है कि वे &#8216;बल्ले-बल्ले टाईप&#8217; जीवन व्यतीत करें। वैसे भी दिल्ली की हवा बहुत प्रदूषित है और &#8216;सुगंध&#8217; की तुलना में &#8216;दुर्गन्ध&#8217; का फैलाव समाज में अधिक होता है।</p>
<p>इतना ही नहीं, &#8216;बिना एक शब्द गलती के&#8217; हज़ारों-हज़ार शब्दों की कहानी लिखने वाले पत्रकार, जिसके नाम पर समाचार पत्रों के संपादक &#8216;सम्पादकीय&#8217; लिखते हैं, टीवी चैनलों के &#8216;प्राइम टाईम&#8217; में &#8216;कबड्डी का आयोजन करते हैं, उस &#8216;निरीह&#8217; पत्रकार की कहानी को राजनीतिक बाजार में बेचकर दिल्ली की लक्ष्मी नगर की तंग गलियों से निकलकर स्वम्भू-पत्रकार-संपादक-समाज के अधिष्ठाता दक्षिण दिल्ली के फार्म-हॉउसों में दंड-बैठकी करते नजर आएंगे और &#8216;सच्चा पत्रकार&#8217; बाहर गेट पर &#8216;चुपचाप&#8217; खड़ा रहेगा, कोने में। कोई पूछता भी नहीं है। कहते हैं &#8216;सेल्फ-रेस्पेक्ट&#8217; होनी चाहिए। </p>
<p>खैर। हम तो बस इतना ही कहेंगे की संस्था को बचाएं चाहे प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया हो या भारत का संसद या 28 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों का विधान सभा। अन्यथा आने वाले दिनों में वास्तविक राजनेताओं, राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ पत्रकार बंधु-बांधव जब अंतिम सांस लेंगे तो संसद में, विधान सभा परिसरों में, प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया के आँगन में उनकी आत्मा की शांति के लिए किसी &#8216;तुलसी के पौधे&#8217; का रोपण नहीं किया जायेगा; अलबत्ता छोटका-प्रवेश द्वार के कोने पर रखे एक फ्रेम में उनकी तस्वीर बदलती जाएगी। फिर दो मिनट का मौन रखा जायेगा। देश के 130+ करोड़ लोगों के 5337 सांसदों-विधायक प्रतिनिधियों के साथ-साथ दस हज़ार सदस्यों से अधिक संख्या वाले इस क्लब में &#8216;श्रद्धांजलि&#8217; देने वाले दस लोग भी एकत्रित नहीं होंगे। नेता लोग तो &#8216;ट्वीट&#8217; भी कर देंगे और उनके &#8216;पिछलग्गू&#8217; (फॉलोवर्स) उसे &#8216;रीट्वीट&#8217; भी करेंगे, टिपण्णी भी कर देंगे,  अपनी उपस्थिति दर्ज भी करेंगे वे। पत्रकारों के मामले में क्लब के मुख्य बैठकी से लोग बाहर भी नहीं आएंगे। जो आ भी गए वे जहाँ एक मिनट में औसतन लोग 12 से 16 बार साँस लेते हैं; वे 24 से 32 बार सांस लेकर निकलने की ताक में रहेंगे। कहीं अंदर &#8216;बार&#8217; में घंटी न बज जाए। </p>
<p><strong>शोक-संवेदना व्यक्त करने के अवसर पर, शमशानों में, शवदाह गृहों में &#8216;बार-बार घड़ी की ओर देखना&#8217; एक &#8216;शरीर से जीवित&#8217;, परन्तु &#8216;आत्मा से मृत&#8217; लोगों में ही देखा जाता है। अगर विश्वास नहीं हो तो किसी की अंतिम यात्रा में चलकर आजमा लीजिए। और सबसे ताजा उदाहरण देखना हो तो &#8216;दूरदर्शन का फुटेज&#8217; देखिये जब भारत राष्ट्र के महामानव, देश के पत्रकार और पूर्व प्रधानमंत्री सम्मानित श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के पार्थिव शरीर को अग्नि को सुपुर्द किया जा रहा था। अन्य उपस्थित लोगों के अलावे, देश के एक ऐसे व्यक्ति अपनी कलाई पर बंधी घड़ी बार-बार देख रहे थे, जैसे कोई चोरी तो नहीं कर ली। और जैसे ही अग्नि की ज्वाला सम्मानित श्री वाजपेयी जी की शरीर को अपने में समाया, ज्वाला प्रज्वलित हुई, संस्कार स्थल वीरान हो गया। </strong></p>
<p>अंततः प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया का इस वर्ष का चुनाव संपन्न हो गया। परिणाम भी आ गया। संख्या अपना खेल खेल गया। जिसे अधिक मिला वे &#8216;विजयश्री&#8217; का झंडा लहराए, जिन्हें काम मिला वे सफल नहीं हो पाए। सब संख्या का खेल है। भारत के संसद से लेकर प्रदेशों के विधान सभाओं में, जिला परिषदों में &#8216;विजय&#8217; और &#8216;पराजय&#8217; का निर्णय &#8216;संख्या&#8217; ही करता है। कभी कोई संख्या का &#8216;इंतजाम&#8217; कर लेते हैं प्रधान मंत्री बने रहने के लिए, कोई नहीं कर पाता। लेकिन इस संस्था की गरिमा को बचाना हमारा प्रथम उद्देश्य होना चाहिए। साथ ही, यह भी नितांत आवश्यक है कि &#8216;पत्रकारिता&#8217; के बहाने हमें अपने-अपने ह्रदय को टटोलना होगा, स्वयं से भी पूछना होगा कि जिस पत्रकारिता ने, जिस संस्था ने हमें पहचान दिया कहीं हम उस पत्रकारिता और संस्था का इस्तेमाल कर, फिर उसे लतिया कर राजनीतिक पार्टी का पिछलग्गू तो नहीं बन रहे हैं &#8216;स्वहित&#8217; में। <br />
 </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/dont-ditch-journalism">प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया चुनाव के बहाने: अपने ह्रदय को टटोलिये, जिसने पहचान दिया कहीं उस पत्रकारिता को लतिया कर राजनीतिक पार्टी का पिछलग्गू तो नहीं बन रहे हैं &#8216;स्वहित&#8217; में</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8216;पूस की वह रात&#8217;, प्रसव-पीड़ा में &#8216;अर्ध मृत&#8217; वह महिला, उसकी नाभि से जुड़ा &#8216;निष्प्राण&#8217; वह नवजात शिशु और श्रीमती श्यामा देवी का ईश्वरीय अवतरण &#8211; एक समर्पण</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/book/half-dead-woman-lifeless-newborn-and-the-devine-incarnation-of-smt-shyama-devi</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 18 May 2022 04:34:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[किताब]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>ग्राम &#8211; उजान (दरभंगा) : धनपत राय श्रीवास्तव का &#8216;हल्कू&#8217; गरीब किसान &#8216;पूस की उस रात&#8217; में बेहद खुश था। वजह भी था। &#8216;हल्कू&#8217; कर्ज से गर्दन भर डूबा था। उधर मालिक &#8216;सहना&#8217; का कर्जा अलग। हड्डी-पसली कपाने वाली &#8216;पूस की उस रात&#8217; में भी &#8216;हल्कू&#8217; को अपने मालिक का कर्ज चुकाने के लिए खेत [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>ग्राम &#8211; उजान (दरभंगा) : धनपत राय श्रीवास्तव का &#8216;हल्कू&#8217; गरीब किसान &#8216;पूस की उस रात&#8217; में बेहद खुश था। वजह भी था। &#8216;हल्कू&#8217; कर्ज से गर्दन भर डूबा था। उधर मालिक &#8216;सहना&#8217; का कर्जा अलग। हड्डी-पसली कपाने वाली &#8216;पूस की उस रात&#8217; में भी &#8216;हल्कू&#8217; को अपने मालिक का कर्ज चुकाने के लिए खेत की रखवाली करना पड़ता था। &#8216;हल्कू&#8217; और उसकी पत्नी &#8216;मुन्नी&#8217; जो भी काम करते है, उसका अधिकांश हिस्सा उसके मालिक के पास जाता है। क्योंकि उधार के पैसे पर ब्याज दर इतनी अधिक थी कि &#8216;हल्कू&#8217; को लगता था कि वह पूरा कर्ज कभी नहीं चुका पाएगा। </strong></p>
<p>काफी मेहनत-मसक्कत करने के बाद &#8216;हल्कू&#8217; तीन रुपये बचा पाया था उस समय। उसे उस पैसे की बहुत जरूरत भी थी &#8211; एक कम्बल खरीदने के लिए। रात में बहुत ठंड लगती थी। &#8216;हल्कू&#8217; की पत्नी इस तीन रुपये को &#8216;सहना&#8217; को तत्काल नहीं देना चाहती थी। घर में अनाज का एक दाना भी नहीं था। एक तो ठंढ और उस पर पेट-पीठ एक। शरीर में उस ठंढ को बर्दाश्त करने की ताकत भी नहीं थी। लेकिन &#8216;हल्कू&#8217; उस पैसे को &#8216;सहना&#8217; को दे देना चाहता था। वह अपनी पत्नी से बारम्बार कह रहा था कि &#8216;रातों में ठंड को बर्दाश्त कर लेंगे, ठंड रातें मालिक की प्रताड़ना से बेहतर हैं,&#8217; और फिर वह तीन रुपये सहना को दे दिया। </p>
<p>अँधेरी और बेहद सर्द रात में &#8216;हल्कू&#8217; धूम्रपान करते हुए खेत पर अपने भाग्य को कोस रहा था। कभी अपने शरीर के बीच अपना चेहरा छुपा लेता था, तो कभी हाथ रगड़ता था, ताकि कहीं से कोई गर्मी प्राप्त हो जाय। उस रात वह मनुष्य और पशु के बीच के सारे भेदों को भुलाकर कुत्ते को अपने बिस्तर पर बुला लिया, उसे गले से लगाया। कुत्ते की शरीर से &#8216;हल्कू&#8217; को थोड़ी गर्मी मिली। लेकिन कुत्ते को खेत में किसी की आहट सुनाई दी और वह खेत की ओर भौंकते दौड़ गया। </p>
<p>&#8216;हल्कू&#8217; अपने भाग्य को कोसते सुबह का इन्तजार कर रहा था। इस बीच बगल के आम के बगीचे से वह आम के सूखे पत्ते लाता है और उसमें आग लगाता है। कुत्ता को भी अपने पास लाता है। कुछ पल ही सही, गर्मी दोनों महसूस करते हैं। ठंड की उस रात में शरीर गर्म होते ही उसकी आखें लग जाती है और इस बीच नील गाय &#8216;सहना&#8217; की खेत पर हमला बोल देती है। कुत्ता अपनी वफ़ादारी निभाता रहता है, भौंकता रहता है; लेकिन &#8216;हल्कू&#8217; का शरीर पूस की उस रात में गर्म होने के कारण जमीन पर ही सही, गहरी नींद में सोया रहता है। </p>
<p>जब सुबह होती है, &#8216;हल्कू&#8217; की पत्नी सम्पूर्ण दृश्य को देखकर उदास हो जाती है। लेकिन &#8216;हल्कू&#8217; मन-ही-मन बहुत खुश था  &#8211; अब उसे पूस की ऐसी पसली में छेद करने वाली रात में &#8216;सहना&#8217; की खेत का रखवाली नहीं करना होगा। अलबत्ता, मेहनत, मजदूरी, मसक्कत करके वह कर्ज चुका देगा। आज से कोई सौ-वर्ष पहले सन 1921 के आस-पास धनपत राय श्रीवास्तव यानी मुंशी प्रेमचंद ने &#8216;पूस की रात&#8217; की इस मार्मिक कहानी को शब्द बद्ध किये थे। एक लाचार मनुष्य की कहानी को समाज के सामने रखे थे। कहानी कृषि और किसानों की थी। आज सौ साल बाद भी किसानों की स्थिति में कोई बेहतर सुधार नहीं हो पाया है। खैर। </p>
<p><strong>मुंशी प्रेमचंद की इस &#8216;पूस की रात&#8217; कहानी के कोई 38-वर्ष बाद दरभंगा जिला के उजान गाँव के कनक पुर टोल में दिवंगत पीताम्बर झा के पुत्र गोपाल दत्त झा के घर में एक बालक का जन्म होता है। जब वह बालक अपनी माँ के गर्भ से महादेव रचित इस संसार में अपना पहला कदम रखता है, वह &#8216;रात भी पूस&#8217; की ही थी। उस रात भी हार-मांस गला देने वाली ठंड नेपाल की तराई वाले हिस्से को दबोचे हुए थी। इधर माँ के गर्भ से उस बच्चे का जन्म होता है और उधर कर्ज में डूबे &#8216;हल्कू&#8217; जैसे उस बालक के पिता की पत्नी प्रसव में मरणासन्न हो जाती है। कई दिनों से प्रसव-काल में उपयुक्त भोजन उसके गले से नीचे नहीं उतरा था। अन्न के अभाव में &#8216;हल्कू&#8217; की पत्नी &#8216;मुन्नी&#8217; से भी बत्तर उस महिला की आर्थिक, सामाजिक स्थिति थी। रात काफी गहरी थी। सन्नाटा चतुर्दिक था। गाँव में, आस-पास के फूस के घरों के दरवाजे बंद थे। सबों के घरों के बाहर दालानों पर घरों की रखवाली करने वाले कुत्तों का परिवार भी &#8216;गर्म-कोना&#8217; ढूंढकर सोया था अपने-अपने बच्चों के साथ।</strong> </p>
<figure id="attachment_4032" aria-describedby="caption-attachment-4032" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji.jpeg" alt="" width="2048" height="1397" class="size-full wp-image-4032" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji-300x205.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji-1024x699.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji-768x524.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji-1536x1048.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji-218x150.jpeg 218w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4032" class="wp-caption-text">विश्व कि सबसे सुन्दर महिला और प्रखर, ओजस्वी पुरुष, मेरे सर्वश्रेठ गुरु &#8211; दिवंगत माता-पिता</figcaption></figure>
<p>लेकिन उस रात प्रसव-पीड़ा से बेहोश हुई उस महिला की एक शुभेक्षु, जो उम्र में तो छोटी थी ही उससे, उसके बहुत बाद बहु बनकर आई थी उस गाँव में, उस परिवार में; परन्तु उस प्रसव वाली महिला से &#8216;अन्तःमन&#8217; से एक ऐसी तार से जुड़ी थी, जो उसे तत्काल सचेत कर रहा था, सजग रख रहा था &#8211; कहीं कोई &#8216;अपसकुन&#8217; न हो जाय। कहीं किसी की साँसे न रुक जाय। डाक्टर डी.स्कॉट नामक मनोवैज्ञानिक ऐसी अवस्था को &#8216;टेलीपैथी&#8217; कहते हैं जब दो मनुष्य &#8216;भावनात्मक&#8217; रूप से एक दूसरे से जुड़े होते हैं, उनके मष्तिष्क में एक &#8216;आतंरिक तरंग&#8217; उत्पन्न होते रहते हैं जो समय विशेष पर प्रकट कर देता है। </p>
<p><strong>सन 1959 में &#8216;पूस की उस रात&#8217; को भी कुछ वैसी ही घटना हुई थी श्रीमती श्यामा देवी @ श्रीमती चन्द्रिका देवी के साथ &#8211; इनके मस्तिष्क में उस प्रसव पीड़ा से ग्रसित महिला के प्रति। अगर उस क्षण यह उपस्थित नहीं होती तो शायद न नवजात शिशु अगला सांस ले पाता और ना ही प्रसव-पीड़ा में अर्ध-मृत हुई वह महिला। माँ की नाभी से जुड़ा (शहरों में लोग एमिकल कॉड कहते हैं) वह बच्चा भी शेष बची सांसों को एमिकल कॉड से जुड़े अपनी माँ के साथ लेते महादेव के शरण में उपस्थित हो जाता &#8211; जीवन की शुरुआत करने से पूर्व ही जीवन का अंत हो जाता। लेकिन जच्चा-बच्चा दोनों महादेव की नजर में था और महादेव श्रीमती श्यामा देवी जी के मष्तिष्क में उस महिला के दर्द के प्रति एक तरंग उत्पन्न कर रहे थे। </strong></p>
<p>फिर अचानक श्रीमती श्यामा देवी उस अर्धमृत जच्चा-बच्चा के सामने प्रकट होती हैं। चिल्लाती हैं, अगल-बगल की महिलाएं कुछ काल बाद उपस्थित होती हैं। अब तक पुरुष समुदाय के लोग भी बाहर एकत्रित हो जाते हैं। श्रीमती श्यामा देवी सर्वप्रथम &#8216;उस बच्चे की नाभी&#8217; काटती हैं, पोछती हैं और फिर अपने स्तन से चिपका लेती है। अब तक कोई आवाज नहीं उस बच्चे के मुख से । अन्य महिलाएं उस महिला को सजग कर, सेवा-शुश्रूषा करती हैं ताकि वह मन और शरीर से जीवित&#8217; हो सके। अचानक श्रीमती श्यामा देवी की स्तन से चिपका वह बच्चा पूस की उस रात की सन्नाटे को चिरता चिल्लाता है। उसकी माँ की सांसे जीवित होती है। खून के सम्बन्ध में श्रीमती श्यामा देवी उस बच्चे की &#8216;भाभी&#8217; है और उसकी माँ &#8216;सास&#8217; &#8211; लेकिन अन्तःमन से सम्बन्ध हृदय का रहा और दोनों जीवन भर श्रीमती श्यामा देवी का ऋणी। आज भी है और जीवन की अंतिम सांस तक रहेगा।&#8221; श्रीमती श्यामा देवी महामहोपाध्याय श्री दिगंबर झा (हमारे पितामह श्री पीताम्बर झा के अपने भाई) के पुत्र श्री महाशय बाबू के पुत्र श्री श्रीमंत बाबू की पत्नी थी। </p>
<p><strong>और वह बच्चा&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8221;मैं ही हूँ।&#8221; </strong></p>
<p>माँ अपनी मृत्यु काल तक कहती रही: &#8216;तुम पहला दूध मनोर की माँ का पिये थे। मैं तो बेहोश थी, मरणासन्न। अगर उस क्षण वह नहीं होती तो न तुम होते और ना ही मैं। वह थी कि हम-तुम जीवित रहे। तुम्हारे जन्म के समय गरीबी अपने उत्कर्ष पर थी। घर में अन्न का दाना नहीं होता था। यही कारण है कि गर्भावस्था में तुम्हें भी भर पेट भोजन नहीं मिल सका, और मैं भी खा नहीं सकी। लेकिन जैसे जैसे समय नजदीक आ रहा था, मन में एक विश्वास का जन्म हो रहा था। जिस रात तुम जन्म लिए वह कहीं भी &#8216;अब घर में जश (यश) होगा और तुम &#8216;जशु (यशु) हो गए। कभी भी वे तुम्हें अपनी संतान से अलग नहीं समझी। तुम उनका हमेशा ऋणी रहोगे।&#8221; हमारी पीढ़ी से पहले की पीढ़ियों में श्रीमती श्यामा देवी अंतिम कड़ी हैं। मैं ह्रदय की गहराई से, अन्तःमन से आपको प्रणाम करता हूँ और महादेव से याचना करता हूँ कि आप स्वस्थ रहे।&#8221;</p>
<figure id="attachment_4033" aria-describedby="caption-attachment-4033" style="width: 720px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3d2a2a16-8db9-4cc1-8e2a-03791d517a81-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3d2a2a16-8db9-4cc1-8e2a-03791d517a81-1.jpg" alt="" width="720" height="1280" class="size-full wp-image-4033" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3d2a2a16-8db9-4cc1-8e2a-03791d517a81-1.jpg 720w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3d2a2a16-8db9-4cc1-8e2a-03791d517a81-1-169x300.jpg 169w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3d2a2a16-8db9-4cc1-8e2a-03791d517a81-1-576x1024.jpg 576w" sizes="auto, (max-width: 720px) 100vw, 720px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4033" class="wp-caption-text">श्रद्धेय, आदरणीय श्रीमती श्यामा देवी जिनके कारण आज मैं जीवित हूँ।</figcaption></figure>
<p><strong>आज मुद्दत बाद भाभी श्रीमती श्यामा देवी जी से बात हुई। उन दिनों हम लोगों के छः घरों का आँगन-बाहर लगभग एक था। बाहर दलान का कुछ हिस्सा भले बांस के जाफ़री से बंटा था, लेकिन आँगन की ओर छोटी-मोटी फूस-बांस की भित्ति जैसी थी, जो खुला ही होता था। गाँव से पूर्णिया के रास्ते पटना की ओर अग्रमुख होने से पहले अपने आँगन से दाहिने कोने पर स्थित अमरुद-हरश्रृंगार के पेड़ के नीचे से सबसे पहले श्री छत्रनाथ झा (श्री महाशय बाबू के सबसे छोटे पुत्र और महामहोपाध्याय श्री दिगंबर झा के पौत्र) के आंगन से श्री श्रीमंत भाई (महाशय बाबू के तीसरे पुत्र और महामहोपाध्याय श्री दिगंबर झा के पौत्र) के आंगन में आते थे।</strong> </p>
<p>इस आँगन के बाएं तरफ एक भित्ति वाला फूस का घर होता था, जिसे हम सभी &#8216;भंसाघर&#8217; अथवा &#8216;पूजाघर&#8217; कहते थे। इसी घर में रहती थी &#8216;मैंयाँ&#8217;, जो महाशय बाबू की पत्नी और मेधानाथ झा @ श्री जयंत बाबू, श्री दीवानाथ झा @ श्रीमंत बाबू, श्री चन्द्रनाथ झा @ श्री नांगर बाबू और श्री छत्रनाथ झा @ श्री छतर बाबू की माँ रहती थी। कद-काठी में दुबली-पतली, कम ऊंचाई की गोरी-चिट्टी महिला हमेशा तत्कालीन बच्चों को आशीष देते नहीं थकती थी। इस आँगन से जुड़ा था श्री जयंत बाबू का आँगन। उस ज़माने में श्री जयंत बाबू के आँगन के बाएं कोने पर (विश्राम घर के बगल में) जो रास्ता उनके गौशाला से बाहर दालान पर और फिर अंदर से श्री चन्द्रनाथ बाबू के घर की ओर जाती थी, एक चापाकल हुआ करता था। वैसे श्री चन्द्रनाथ बाबू (मेरे यज्ञोपवित संस्कार में आचार्य भी थे) के आँगन में भी चापाकल था, लेकिन हम बच्चों के लिए श्री जयंत बाबू के आँगन का चापाकल अधिक पहुँच में था। उसे बार-बार चलाने में बहुत ख़ुशी मिलती थी। </p>
<p>उन दिनों श्री रूप नाथ झा @ श्री मुनाई बाबू, श्री जयंत बाबू और श्री चन्द्रनाथ बाबू के घरों को छोड़कर हम तीन घरों में पानी का इस्तेमाल सामने स्थित उसी ऐतिहासिक इनार (कुआं) से होता था &#8211; चाहे पीने के लिए हो, स्नान के लिए हो, रसोई के लिए हो &#8211; इसी इनार का पानी जीवन-रेखा था। मुद्दत बाद आज श्रीमती श्यामा भाभी कहती हैं: &#8220;हम सभी के घरों में इसी इनार का पानी इस्तेमाल होता था। पानी बहुत मीठा था, आज भी है। आज समय बदल गया है। घरों का रूप-स्वरुप भी बदल गया है। स्वाभाविक है घरों के चहारदीवारी के अंदर चापाकल आ गया है और यह इनार धीरे-धीरे अकेले हो गया है। </p>
<p>उन दिनों इनके घर में जो महिला कार्य करती थी, उसका नाम उसके गाँव के गाम से जुड़ा था। वे &#8216;मझोरा वाली&#8217; के नाम से जानी जाती थी। इसी तरह छत्रनाथ बाबू के घर में कार्य करने वाली का नाम था &#8216;कुरसो वाली&#8217; और श्री जयंत बाबू के घर कार्य करने वाली एक वृद्ध महिला थी &#8216;डोमा माय&#8217; &#8211; सबसे बड़ी बात यह थी कि उन सभी महिलाओं को इतना अधिकार था कि वे हम बच्चों को कान पकड़कर दो थप्पड़ रसीद दे और कोई भी, किसी के माता-पिता भी नहीं, चूं शब्द भी नहीं करते थे । लेकिन कभी ऐसा मौका नहीं मिला &#8211; न उसे और न हम लोगों को।  </p>
<p>माँ कहती थी उन दिनों हमारे पुवारिया घर का आँगन के तरफ का बरामदा की ऊंचाई आँगन की सतह से बहुत कम थी। एक सुबह उसी बरामदे पर लेटकर, जिसमें माँ का पैर का हिस्सा आँगन में था, माँ मुझे दूध पीला रही थी। तभी एक विशाल काय &#8216;धामन सांप&#8217; माँ के पैर पर चढ़ते, मुझे लांघते, माँ के स्तन को स्पर्श करते आगे की ओर निकल गया। कहते हैं धामन सांप औसतन महिलाओं की दूध पीते उसे मृत्यु को भी प्राप्त करा देता है। उस क्षण माँ की स्थिति क्या हुई थी यह अपनी अंतिम सांस तक नहीं बता पायी। उस घटना के कई दशक तक, याद करते उसके रोंगटे खड़े हो जाते थे। मृत्यु से कुछ माह पहले माँ उस घटना को फिर दोहराई थी और रोने लगी। कहती थी उस दिन मुझे कुछ हो जाता, कोई बात नहीं, लेकिन अगर सांप तुम्हे कुछ कर देता तो मैं कैसे जी पाती। मैं हँसते हुए कहता था: : मेरा ना शिव है, फिर सर्प मुझे क्यों काटेगा?&#8221; और माँ हंस दी थी। </p>
<p>कोई बारह वर्ष पहले, 2010 में, जिस वर्ष माँ अपनी अनंत यात्रा पर निकली थी, गाजियाबाद स्थित घर में दरवाजे पर खड़ी होकर गाँव जाने की ज़िद कर रही थी। बड़े भाई गाँव में एक बहुत बेहतरीन घर बनाये हैं। मैं उन्हें बार-बार मना कर रहा था।  वह बार-बार कह रही थी &#8216;अगर मृत्यु को भी प्राप्त की तो उसी स्थान पर मरना चाहूंगी जहाँ मैं आयी थी। इस शब्द को सुनकर मुझे हंसी आ गयी। वह हँसते मेरी हंसी का कारण पूछी। </p>
<p><strong>उसे देखते मैंने कहा: मैं अपने पिता का संतान हूँ, उनके भाईयों &#8211; भतीजों का चहेता हूँ जो तंत्र विद्या में महारथ थे। तुम्हारी अंतिम यात्रा उसी स्थान से होगी जहाँ तुम अभी खड़ी हो। समय यही कहता है। तुम विश्व के किसी भी कोने में रहोगी, बाबूजी के पास जाने के लिए, अपने शुभेक्षुओं के पास पहुँचने के लिए, अपने माता-पिता के पास पहुँचने के लिए तुम्हे अपनी यात्रा की शुरुआत इस स्थान से करनी होगी, जहाँ तो अभी खड़ी हो। इस प्रारब्ध को कोई नहीं टाल सकता है। तुम लिख लो।&#8221; माँ मुस्कुरा दी। </strong></p>
<p>जून के महीने में माँ गाँव की ओर कूच की थी। अगस्त में गाँव में उसकी तबियत ख़राब हुई। हृदयाघात का शिकार हुई। मोहन बाबू, बेचन बाबू सभी उसे उसी क्षण मधुबनी लाये। सरकारी अस्पताल की स्थिति नारकीय थी। डाक्टर के स्थान पर &#8216;सुवर&#8217; मरीजों के वार्ड में चार-पांच बार हाल-चाल पूछने सपरिवार आते थे। लाखों मच्छर-कीड़े-मकोड़े भी अस्पताल में अपना साम्राज्य बना लिए थे। देश आज़ाद था। </p>
<p>माँ की सबसे प्रिय भाई और शिक्षक श्री जीवनाथ मिश्र (श्री जीबू बाबू, लालगंज) माँ को देखने आये। माँ की चौथी बेटी ममता मधुबनी में सपरिवार उसकी सेवा में समर्पित थी। अगली दिन मां दिल्ली की ओर रवाना हुई। उसके छोटे पुत्र और मैं साथ थे। सबों को सूचना दे दिया गया था अगर रास्ते में कुछ होता है तो हम बनारस की ओर प्रस्थान कर जाएंगे। लेकिन विधि का विधान तो निश्चित था। गाजियाबाद स्टेशन पर उसके बड़े पुत्र और गाँव के उसके बच्चे-बुतरू उसकी प्रतीक्षा में थे। यहाँ अस्पताल में भर्ती हुई। पांच दिन के बाद डाक्टर के अंतिम शब्द &#8220;घर ले जाएँ और सेवा करें&#8221; &#8211; अंतिम सूचना पर परिचायक था। यह सूचना &#8216;शिक्षक दिवस&#8217; के दिन की थी। कुछ सप्ताह बाद जितिया का पारण था। इस जिस दिन भारत की कोई माँ व्रत तोड़ती है, जिसे वह अपने बच्चों की हिफाजत के लिए रखती है &#8211; पारण के दिन। माँ को गढ़मुक्तेश्वर में गंगा को साक्षी मानकर मुखाग्नि दिया गया। उसका व्रत टूटा और वह अग्नि के रास्ते अपने पति के पास पहुँचने के लिए यात्रा की शुरुआत की। जाते समय उसके चेहरे पर तेज था। अपने संतान से हर माता-पिता हारना चाहता है &#8211; माँ हारकर भी जीत गयी। </p>
<p><strong>समय बीत रहा था। हम सभी तत्कालीन बच्चे भी बड़े हो रहे थे। शिक्षा हेतु स्थानीय उजान मिडिल स्कूल में नामांकन लिया। श्रीमंत बाबू के पुत्रों में चौथा और पांचवा पुत्र &#8211; श्री सेतु नाथ झा (भूंनी) और श्री होत्रीनाथ झा (गुन्नी) &#8211; उम्र में कुछ छोटा होने के बाद भी अन्तःमन से एक-दूसरे के प्रति बहुत समर्पित थे। उन सबों के घरों में चावल की खेती, अरहर की खेती बहुत अधिक होती थी, स्वाभाविक है घर में चावल का खपत भी बहुत अधिक था। हमारे घर की आर्थिक स्थिति धनपत राय के &#8216;हल्कू&#8217; और &#8216;मुन्नी&#8217; से भी बत्तर थी। चावल (भात) या अरहर दाल  मुद्दत हो जाया करता था। </strong></p>
<figure id="attachment_4035" aria-describedby="caption-attachment-4035" style="width: 2000px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1.jpg" alt="" width="2000" height="1500" class="size-full wp-image-4035" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1.jpg 2000w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2000px) 100vw, 2000px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4035" class="wp-caption-text">विगत दिनों गाजियाबाद स्थित घर पर मिट्टी की कियारी में मिट्टी खनते समय खुर्पी बारम्बार एक ठोस पदार्थ से टकरा रही थी। धीरे से निकला तो शिवलिंग नुमा दिखा। मैं उसे माँ के द्वारा स्थापित कोई 22-वर्ष पुराना बरगद के वृक्ष के नीचे स्थान सुरक्षित कर दिया &#8211;  हे महादेव !!!</figcaption></figure>
<p>अक्सरहां स्कूल में हम सभी अपना-अपना टिफ़िन बदल लेते थे। बदलने की शुरुआत भुन्नी करता था। उसके टिफ़िन में चावल की रोटी और अन्य स्वादिष्ट पकवान होता था, जबकि मुझे मेरी माँ मकई, गेहूं की रोटी देती थी साथ में कुछ सब्जियां। आज जब श्रीमती श्यामा भाभी से इस बात का जिक्र किया तो &#8216;कुछ पल वे रुक गई। आवाज नहीं आने के बहाने से शायद फोन को होल्ड पर रख दीं। मेरा गला भी अवरुद्ध था। उन दिनों का दृश्य आँखों के सामने था। फिर कहती है: तुमको सभी बातें याद है यह फक्र की बात है। फिर माँ की तरह कहती है की सब समय है। समय प्रत्येक पल परीक्षा लेती है। उस दिन भी लेती थी। लेकिन तुम सभी तैयार रहते थे। आज का जीवन उसी परीक्षा का परिणाम है।&#8221;</p>
<p>उन दिनों जब हम अपने घर से सीधा श्री चन्द्रनाथ बाबू के घर के सामने से होते दाहिने हाथ मुख्य मार्ग पर पहुँचते थे &#8211; जहाँ से दाहिने हाथ शंकरी पोखर की ओर और बाएं गऊटोली होते एक रास्ता (कलमबाग-खेत होते) लोहना रोड स्टेशन की ओर और बाएं अपने मिडिल स्कूल की ओर जाती थी, इसी नुक्कड़ पर दाहिने हाथ एक विशालकाय परिसर में घर था। यहाँ &#8216;दाई मैंय्या&#8221; रहती थी। &#8216;दाई मैंय्या&#8217; श्रीमंत बाबू चारो भाइयों के पिता श्री महाशय बाबू की दूसरी माँ थी। गाँव में &#8216;सतमाय&#8217; कहते हैं। &#8216;दाईं मैंयाँ&#8217; के घर के ठीक सामने सड़क के बाए हाथ एक और वृद्ध विधवा का घर था। हम सभी इन्हे &#8216;काकी-मौसी&#8217; कहते थे। काकी-मौसी हमारे पितामह श्री पीताम्बर झा के भाई नीलाम्बर झा के प्रथम पुत्र की विधवा थी। नीलाम्बर झा के दूसरे पुत्र प्रोफेसर रूप नाथ झा जो न्यायशास्त्र, धर्मशास्त्र, दर्शनशास्त्र और ज्योतिषी के प्रखंड विद्वान थे। वे मिथिला रिसर्च इन्स्टीट्यूट दरभंगा में कुछ समय तक शास्त्रचूडामणि के प्राध्यापक भी थे। लगभग 46-वर्ष पहले, यानी जून 25, 1976 को इनका शरीर पार्थिव हो गया। </p>
<p>आज मुद्दत बाद बाबूजी याद आ गए जब श्री रुपनाथ झा (श्री मुनाई बाबू), जो उनके तंत्र-मन्त्र विद्या के गुरु और आचार्य  भी थे, एक दिन उन्हें दण्डित भी किये थे। मुद्दत पहले जब बाबूजी इस विद्या में महारथ हासिल किये था। एक दिन सत्यनारायण भगवान की पूजा हेतु धोती रंगकर बाहर सूखने दिए थे। घर में कार्य करने वाली एक महिला उस धोती को लेकर चली गयी। पूजा के समय धोती नहीं मिलने पर वे सीधा उस महिला के घर पहुंचे और धोती के बारे में पूछताछ किये। वह महिला नकार गयी। क्रोधित बाबूजी उसे बार-बार कह रहे थे कि धोती दे दो अन्यथा वह तुम्हारे साथ ही जाएगी। ऐसा ही हुआ। </p>
<p>बाबूजी क्रोधित अवस्था में अपने विद्या का प्रयोग किये। उसकी मृत्यु के बाद धोती उसी के घर से निकला। यह बात जब उनके भाई, जो गुरु भी थे, सुने, उन्हें दंड-स्वरुप अपना ही थूक चाटने का आदेश दिया। बाबूजी &#8216;ना&#8217; नहीं कह सकते थे। फिर एक चेतावनी भी दिए &#8211; जीवन में अपनी विद्या को सकारात्मक कार्यों में लगाना और याद रखना अगर तुम ऐसा करोगे तो जिस दिन मैं &#8211; यानी तुम्हारा बड़ा भाई और गुरु &#8211; जाऊंगा उसी दिन कामाख्या देवी का पट खुलेगा, सालाना पर्व के बाद। मेरी मृत्यु के 16-वर्ष बाद, उस तारीख से दो दिन पूर्व तुम अपनी यात्रा शुरू करोगे और उस दिन कामाख्या देवी का पट बंद रहेगा और बंदी का मध्य-दिवस रहेगा। ऐसा ही हुआ।  बाबूजी 23 जून, 1992 को उनके पास पहुंचे। माँ कामाख्या का पट्ट प्रत्येक वर्ष 22-23 और 24 जून का बंद रहता है स्वाजला पर्व के लिए। </p>
<p>बहरहाल, विगत दिनों अपने घर के सामने स्थित को दो-सौ साल पुराना इनार की कहानी लिखने के बाद, दरभंगा के अतिरिक्त नागपुर के एक विद्वद्जन का फोन आया कि वे उजान गाँव के कनकपुर टोल के उस इनार को पुनः जीवित करना चाहते हैं। नागपुर वाले महानुभाव का कहना है कि वे महादेव के अनन्य भक्त है और उनका विश्वास है कि उस क्षेत्र में महादेव के सर्प, गण अवश्य रहे होंगे, होंगे आज भी। उनका कि आज के समय में सरकारी-गैर सरकारी स्त्रोतों से एक और जहाँ पानी का स्त्रोत सामाजिक न रहकर &#8216;व्यक्तिगत&#8217; हो रहा है, जीव-जंतुओं को पीने के लिए पानी की उपलब्धिता नगण्य होती जा रही है। वैसी स्थिति में उस शताब्दी पुराने कुएं को अगर जीवित किया जाता है तो एक ओर जहाँ प्राकृतिक पुरात्तव जीवंत होगा, वहीँ हम मूक-बधिर जीव-जंतुओं के साथ भी न्याय कर  पाएंगे। </p>
<p><strong>आज श्रीमती श्यामा देवी, यानी हमारी पीढ़ी के बच्चों की भाभी, उस पीढ़ी की इकलौती माँ है, महिला है। पंडित लोक नाथ झा यानी लान्हि झा के चार पुत्रों &#8211; महामहोपाध्याय श्री दिगम्बर झा, वैयाकरण श्री पीताम्बर झा, महामहोपाध्याय श्री नीलाम्बर झा, पंडित श्री सीताम्बर झा और एक कन्या महामहोपाध्याय बालकृष्ण मिश्र तथा मही मिश्र की माँ श्रीमती कर्पूरी मिश्राइन &#8211; परिवार की इकलौती चिराग है जो सबों के सर पर आशीष और स्नेह का हाथ रखने का सामर्थ रखती हैं। महामहोपाध्याय श्री दिगम्बर झा की अगली पीढ़ियों में काशी के विद्वान महामहोपाध्याय श्री महाशय झा की मृत्यु आषाढ़ शुक्ल अष्टमी 1952 को हुआ। </strong></p>
<p>महाशय बाबू के अपने बेमातर भाई श्री दया नाथ झा यानि बंसन्त बाबू और उनकी पत्नी मुद्दत पहले मृत्यु को प्राप्त किये। उन्हें पुत्र नहीं था। महाशय बाबू को चार पुत्र था &#8211; श्री मेधा नाथ झा (श्री जयंत बाबू), श्री दीवा नाथ झा (श्री श्रीमंत बाबू), श्री चन्द्र नाथ झा (श्री नांगर बाबू) और श्री छत्र नाथ झा (श्री छतर बाबू) &#8211; ये सभी आज परमात्मा के पास उपस्थित हैं अपनी-अपनी अर्धांगिनियों के साथ। श्री जयंत बाबू के पुत्र श्री योगेश्वर झा (श्री बेचन झा) हैं। श्री श्रीमंत बाबू के पांच पुत्र हुए &#8211; श्री भीम नाथ झा (श्री मोहन बाबू), श्री सोम नाथ झा (श्री लाल बाबू), श्री जगन्नाथ झा (श्री जोहन बाबू), श्री सेतु नाथ झा (श्री भुन्नी बाबू) और श्री होत्री नाथ झा (श्री गुन्नी बाबू) &#8211; इसमें पांचों की अगली पीढ़ी और उसके आगे की पीढ़ियां श्रीमती श्यामा देवी की आशीष से बढ़ रही हैं। इन पांच भाईयों में श्री भीमनाथ झा विगत वर्ष अपने इष्टदेव के पास पहुँचने के लिए यात्रा की शुरुआत कर लिए। </p>
<p>श्री चन्द्रनाथ झा के तीन पुत्र हुए &#8211; श्री महेंद्र नाथ झा (श्री भोगन बाबू), श्री देवेंद्र नाथ झा (श्री चुनचुन बाबू) और श्री कला नाथ झा (श्री मिहिर बाबू) &#8211; आज सभी स्वस्थ हैं और उनकी अगली और आगे की पीढ़ियां श्रीमती श्यामा देवी के आशीष से बढ़ रही है। श्री चन्द्रनाथ बाबू और उनकी पत्नी अब इस संसार में नहीं हैं। महाशय बाबू के सबसे छोटे पुत्र श्री छत्र नाथ झा भी अब इस संसार में नहीं हैं। श्री छत्र नाथ झा के चार पुत्र हुए &#8211; श्री सुशील कुमार झा, श्री सुधीर कुमार झा, श्री सुनील कुमार झा और श्री अनिल कुमार झा। ईश्वर श्री सुनील को अपने पास बुला लिए। मैं दिल्ली में उस क्षण उपस्थित था अपने छोटे भाई के साथ। शेष सभी श्रीमती श्यामा देवी की आशीष से फल-फूल रहे हैं।  </p>
<p>श्री पीताम्बर झा के एक पुत्र श्री गोपाल दत्त झा और श्री गोपाल दत्त झा के तीन पुत्र &#8211; श्री काशीनाथ झा, श्री शिवनाथ झा, श्री गंगा नाथ झा और पांच बेटी। आज श्री गोपाल दत्त झा, उनकी पत्नी श्रीमती राधा देवी और उनकी चार बेटियां इस पृथ्वी पर नहीं हैं। गोपाल दत्त झा के तीनों पुत्रों की अगली पीढ़ी अपने-अपने शैक्षिक क्षेत्रों में अग्रसर हैं। महामहोपाध्याय न्यायिक पंडित नीलाम्बर झा के दूसरे पक्ष में दो बालक थे &#8211; न्याय प्रवर श्री रसिक नाथ झा और न्याय प्रवर प्रोफ़ेसर रूप नाथ झा। श्री रसिक नाथ झा की मृत्यु बहुत पहले हो गयी थी और श्रीमती काकी मौसी उन्हीं की विधवा थीं। पंडित रूप नाथ झा के एक पुत्र श्री श्यामनन्द झा (श्री शास्त्री) हुए। श्री शास्त्री जी ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में पुस्तकालय में थे। आज श्री रूप नाथ झा और श्री शास्त्री जी नहीं हैं। परन्तु इनकी अगली पीढ़ी के वंशज अपने-अपने क्षेत्रों में अग्रसर हैं।</p>
<p>अंततः, आज महामहोपाध्याय श्री दिगम्बर झा, वैयाकरण श्री पीताम्बर झा, महामहोपाध्याय श्री नीलाम्बर झा, पंडित श्री सीताम्बर झा के चौथी-पांचवी-छठी पीढ़ियों के वंशज  पूर्वजों के आशीष से खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं। हमें  विश्वास है कि त्रिनेत्रधारी महादेव सभी महात्मनों को, उनकी अर्धांगिनियों को अपने शरण में स्थान दे दिए होंगे। मुझे यह भी आशा है की महादेव उन महात्मनों के समय का बनाया हुआ इनार भी आने वाले  समय में जीवित हो जायेगा। </p>
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