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	<title>jallad Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>तिहाड़ जेल-3 ✍ &#8220;ब्लैक वारंट&#8221; &#8216;निर्गत&#8217; और &#8216;निष्पादित&#8217; करने वालों के बीच &#8216;सामाजिक खाई&#8217; 😢 आखिर वह भी तो न्यायालय द्वारा प्रदत कार्यों को ही निष्पादित करता है</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/social-trench-between-those-who-issue-and-execute-a-black-warrant</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 28 Mar 2025 05:52:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[death]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>जेल रोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली: आज से 30-वर्ष पहले 15 सितम्बर, 1995 को टी.एल.वी. प्रसाद के निर्देश में &#8216;मणिवानां&#8217; की कहानी पर आधारित पहले तमिल फिल्म &#8220;अमिधिपड़े&#8221; बनी। बाद में उसका हिंदी संस्करण &#8220;जल्लाद&#8221; के नाम से बनी थी। &#8220;जल्लाद&#8221; फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती, मौशुमी चटर्जी, रम्भा, माधो और कई अन्य अदाकार और अदाकारा काम [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/social-trench-between-those-who-issue-and-execute-a-black-warrant">तिहाड़ जेल-3 ✍ &#8220;ब्लैक वारंट&#8221; &#8216;निर्गत&#8217; और &#8216;निष्पादित&#8217; करने वालों के बीच &#8216;सामाजिक खाई&#8217; 😢 आखिर वह भी तो न्यायालय द्वारा प्रदत कार्यों को ही निष्पादित करता है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जेल रोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली: आज से 30-वर्ष पहले 15 सितम्बर, 1995 को टी.एल.वी. प्रसाद के निर्देश में &#8216;मणिवानां&#8217; की कहानी पर आधारित पहले तमिल फिल्म &#8220;अमिधिपड़े&#8221; बनी। बाद में उसका हिंदी संस्करण &#8220;जल्लाद&#8221; के नाम से बनी थी। &#8220;जल्लाद&#8221; फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती, मौशुमी चटर्जी, रम्भा, माधो और कई अन्य अदाकार और अदाकारा काम किये थे। फिल्म में संगीत दिया था आनंद मिलन। &#8220;जल्लाद&#8221; फिल्म ने मिथुन चक्रवर्ती को शानदार नाम दिया। मिथुन चक्रवर्ती दो किरदारों की भूमिका निभाए थे और उस किरदार के लिए नेशनल अवॉर्ड से भी नवाजा गया था। इतना ही नहीं, इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर भी कमाल का प्रदर्शन किया। उस साल कमाई के मामले में वह फिल्म 11वें नंबर पर थी। </strong></p>
<p>मिथुन चक्रवर्ती आज भारतीय अभिनेता, निर्माता और राजनीतिज्ञ बन गए हैं। उनके घर के दीवारों पर तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और चार फिल्मफेयर पुरस्कार का सम्मान लटका होगा। <strong>इतना ही नहीं, विगत 8 अक्टूबर, 2024 को उन्हें 70वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया जो भारतीय फिल्म जगत में सबसे सम्मानित पुरस्कार माना जाता है।</strong></p>
<blockquote><p>यहाँ मिथुन चक्रवर्ती के बहाने, उनकी फिल्म &#8216;जल्लाद&#8217; के बहाने जिसने कमाई, नाम और शोहरत में मामले में उस कालखंड में हस्ताक्षर किया था, विगत तीन दशकों में क्या मिथुन चक्रवर्ती कभी भारत के वास्तविक &#8220;जल्लादों&#8221; के बारे में सोचे कि वह कैसे जी रहा है? उसकी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, वैचारिक स्थितियां कैसी हैं? शायद नहीं। अगर देखे होते, पूछे होते तो शायद भारत लें &#8216;वास्तविक जल्लादों&#8217; की स्थिति आज ऐसी नहीं होती। वह भी इसी समाज का हिस्सा है और वह भी न्यायालय द्वारा प्रदत कार्यों को की निष्पादित कर रहा है।</p></blockquote>
<p>भारत सरकार में तत्कालीन कानून मंत्री अरुण जेटली को प्रस्तुत अपनी 187 वीं रिपोर्ट में, भारतीय विधि आयोग ने कहा था कि वर्तमान में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 354(5) के अनुसार मृत्युदंड के निष्पादन की विधि &#8216;मृत्यु तक फांसी&#8217; है। उच्चतम न्यायालय ने बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1982) 3 एससीसी 25 में कहा है कि मृत्यु दंड की सजा के निष्पादन में होने वाली शारीरिक पीड़ा और कष्ट भी कम क्रूर और अमानवीय नहीं है। इसलिए आयोग ने मृत्यु दंड के निष्पादन का मानवीय तरीका उपलब्ध कराने के लिए अध्ययन किया। भारतीय विधि आयोग का वह रिपोर्ट (डीओ संख्या 6(3)/85/2003-एलसी(एलएस) 17 अक्टूबर, 2003) मृत्यु दंड के निष्पादन विधि और आकस्मिक मामलों से संबंधित था। </p>
<figure id="attachment_6234" aria-describedby="caption-attachment-6234" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/572872-cji-dy-chandrachud-and-sc-2justice-jagannadha-rao.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/572872-cji-dy-chandrachud-and-sc-2justice-jagannadha-rao.jpg" alt="" width="1280" height="720" class="size-full wp-image-6234" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/572872-cji-dy-chandrachud-and-sc-2justice-jagannadha-rao.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/572872-cji-dy-chandrachud-and-sc-2justice-jagannadha-rao-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/572872-cji-dy-chandrachud-and-sc-2justice-jagannadha-rao-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/572872-cji-dy-chandrachud-and-sc-2justice-jagannadha-rao-768x432.jpg 768w" sizes="(max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6234" class="wp-caption-text">न्यायमूर्ति एम. जगन्नाथ राव (अब दिवंगत)</figcaption></figure>
<p>दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, जो बाद में सर्वोच्च न्यायालय में भी न्यायाधीश बने, न्यायमूर्ति एम. जगन्नाथ राव (अब दिवंगत) ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि &#8220;आयोग ने दुनिया भर में प्रचलित मृत्यु दंड के निष्पादन के विभिन्न तरीकों पर विचार किया। इस परामर्श पत्र पर कई प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुईं। आयोग ने सिफारिश की है कि सीआरपीसी, 1973 की धारा 354(5) में संशोधन करके अभियुक्त की मृत्यु होने तक घातक इंजेक्शन द्वारा मृत्यु दंड के निष्पादन का वैकल्पिक तरीका उपलब्ध कराया जाए। मृत्युदंड के निष्पादन के तरीके के बारे में उचित आदेश पारित करना न्यायाधीश के विवेक पर निर्भर होगा। मृत्युदंड के निष्पादन के तरीके के प्रश्न पर दोषी को अवश्य सुना जाएगा, इससे पहले कि ऐसा विवेक प्रयोग किया जाए। इसके अलावा, वर्तमान में, ऐसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय में अपील का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है, जहां उच्च न्यायालय सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित मृत्युदंड की पुष्टि करता है या जहां उच्च न्यायालय सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित सजा को बढ़ाता है और मृत्युदंड देता है।&#8221;</p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=tRFQW6NNUNA&#038;t=3s">@अखबारवाला001 (233) ✍ दिल्ली के तिहाड़ कारावास में वह सब कुछ होता है जो कारावास में नहीं होनी चाहिए 😢</a></p>
<p>न्यायमूर्ति एम.जगन्नाथ राव ने कहा था कि &#8220;आयोग, विभिन्न प्रतिक्रियाओं और विचारों पर विचार करने के बाद, मृत्युदंड की पुष्टि या देने वाले उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील का वैधानिक अधिकार प्रदान करने की सिफारिश करता है। तदनुसार, सर्वोच्च न्यायालय (आपराधिक अधिकार क्षेत्र का विस्तार) अधिनियम, 1970 को सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार प्रदान करने के लिए उपयुक्त रूप से संशोधित किया जाना चाहिए। सशस्त्र बलों के संबंध में एक और पहलू महत्वपूर्ण है। अभी तक सेना अधिनियम, 1950, नौसेना अधिनियम, 1957 और वायु सेना अधिनियम, 1950 के तहत कोर्ट मार्शल द्वारा पारित मौत की सजा के खिलाफ अपील के अधिकार का कोई प्रावधान नहीं है। आयोग ने प्रतिक्रियाओं और विचारों पर विचार करने के बाद सिफारिश की है कि ऊपर वर्णित कोर्ट मार्शल द्वारा पारित मौत की सजा के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जानी चाहिए।&#8221;</p>
<blockquote><p>विधि आयोग का का सुझाव था कि &#8220;कानूनों में मौत की सजा के निष्पादन के मौजूदा तरीकों में से एक यानी &#8216;गर्दन से लटकाना&#8217; को &#8216;आरोपी के मरने तक घातक इंजेक्शन लगाने&#8217; से बदल दिया जाना चाहिए। एक और प्रावधान होना चाहिए कि घातक इंजेक्शन कोर्ट मार्शल द्वारा पारित मौत की सजा के निष्पादन का एक वैकल्पिक तरीका होना चाहिए। इसलिए आयोग ने सिफारिश की है कि इन उद्देश्यों के लिए इन अधिनियमों में उपयुक्त संशोधन किए जा सकते हैं। अंत में,  मौत की सजा के मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच द्वारा की जानी चाहिए। यह भी सिफारिश की गई है कि इन उद्देश्यों को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के नियमों में उचित संशोधन किया जा सकता है।&#8221;</p></blockquote>
<p>भारत विधि आयोग के एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2000 से 2015 के मध्य न्यायालयों ने 1790 लोगों को मौत की सजा सुनाई थी। उसमें 63  प्रतिशत अभियुक्तों की सजा कम कर दिया गया था और 29 प्रतिशत अभियुक्त उच्च न्याययालयों द्वारा रिहा कर दिए गए थे। शेष मामले लंबित पड़े हैं, क्योंकि उनके निर्णयों की प्रतियां खोजी नहीं जा सकी थी। इसलिए विधि आयोग ने निष्कर्ष दिया कि 95 प्रतिशत मामलों में मृत्युदंड गलत तरीके से दिया जाता था।</p>
<p>कहते हैं कि प्रत्येक देश में समाज को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए कानून बनाए जाते हैं ताकि लोगों के मन में डर बना रहें और वह किसी भी गलत काम को करने से पहले दो बार सोचे। जो जैसा जुर्म करता है कानून उसको उसके किए की सजा जरूर देता है। जब इंसान जघन्य और विरल किसी अपराध को अंजाम देता है, तो ऐसे में मौत की सजा दिए जाने का प्रावधान है। विभिन्न देशों में कई अलग-अलग तरीके से इंसान को मौत के घाट उतारा जाता है। कहीं गोली मार दी जाती है तो कहीं पत्थर मार-मारकर मुजरिम को मार दिया जाता है। </p>
<p>हालांकि ज्यादातर देशों में मौत की सजा के रूप में फांसी दे दी जाती है। बात अगर अपने देश भारत की करें तो भारत में फांसी की सजा का चलन ब्रिटिश काल से पहले से है। यद्यपि देश में फांसी की सजा बहुत ही कम लोगों को दी जाती है। हिन्दुस्तान में रेयर ऑफ रेयरेस्ट केस में ही अपराधी को फांसी की सजा सुनाए जाने का प्रावधान है। मौत की सजा सर्वोच्च दंड है जिसे भले ही अदालत सुनाती हो, लेकिन उसे अंजाम तक पहुंचाने का काम जल्लाद ही करता है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Jallad-3.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Jallad-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6236" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Jallad-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Jallad-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Jallad-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Jallad-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Jallad-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>विडम्बना यह है कि आजादी के 78-साल बाद भी आज तक किसी ने इस काम को अंजाम देने के लिए नौकरी की दरख्वास्त तक नहीं दी है। इन वर्षों में दो परिवारों के लोग खानदानी पेशे के रूप में इस काम को कर रहे हैं, लेकिन देश और विश्व में बदलती आर्थिक, सामाजिक, न्यायिक, सांस्कृतिक और अन्य सोच के कारण अब इन परिवारों की अगली पीढ़ियां इस पेशे को अपनाने के लिए तैयार नहीं है। तमिलनाडु की वेल्लोर सेंट्रल जेल में आखिरी बार 1983 में फांसी लगाई गई थी, जबकि तमिलनाडु राज्य में आखिरी बार 1995 में सलेम सेंट्रल जेल में सीरियल कीलर शंकर को फांसी दी गई थी।</p>
<p>मुंबई पर आतंकी हमले के दोषी पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब की सुरक्षा पर सरकार करीब 36 करोड़ रुपए खर्च की, लेकिन उसे फांसी पर चढ़ाने वाले जल्लाद को इस काम के लिए कितने पैसे मिले, यह तो सरकारी क्षेत्र में कुर्सियों पर बैठे अधिकारी से लेकर मंत्रालय में बैठे राजनेता बेहतर जानते हैं। महाराष्ट्र में फिलहाल जल्लाद का कोई पद नहीं है।महाराष्ट्र के 1970 के जेल नियमों के मुताबिक किसी को भी जल्लाद के लिए ट्रेनिंग दी जा सकती है। फिर भी पूरे महाराष्ट्र में एक भी रजिस्टर्ड जल्लाद नहीं है। असम में भी कोई जल्लाद उपलब्ध नहीं है। यही स्थिति दिल्ली की तिहाड़ जेल, उत्तर प्रदेश, पंजाब और पश्चिम बंगाल की जेलों की है। </p>
<p><strong>चलिए तिहाड़ कारावास चलते हैं और आपको मिलाते हैं कालू और फकीरा से । उसकी त्वचा काला होने के कारण उसका नाम कालू रखा गया होगा, परन्तु फकीरा तो कालू से भी अधिक काला था, इसलिए लोग उसे &#8216;भूत&#8217; कहते थे। उसकी बड़ी बड़ी मूंछें थी और वह हमेशा पंजाबी में चुटकुले सुनाता रहता था, जिसे सुनकर हम सभी लोग हंस पड़ते थे। कालू अत्यंत विशाल कद काठी वाला गोल आदमी था और दोनों में सर्वाधिक शांत स्वाभाव वाला था। वे दोनों अत्यंत निपुण पेशेवर जल्लाद थे। जैसे ही उनकी सुरक्षा में गई कारण उन्हें लेकर जेल के अंदर आती थी, वे डिप्टी सुपरिन्टेन्डेन्ट के विश्राम कक्ष में अपना डेरा जमा लेते थे। उनका विश्राम कक्ष उनके कार्यालय से जुड़ा हुआ एक अन्य कमरा होता था। </strong></p>
<p>तिहाड़ जेल के पूर्व जेलर सुनील कुमार गुप्ता कहते हैं: &#8220;एक जल्लाद का काम बड़े अनोखे रिवाजों वाला होता है। हमें प्रत्येक नियमों का बड़े सावधानी से पालन करना होता था, क्योंकि यमराज के द्वारपलों से कौन मिलना जुलना चाहेगा। ऐसी ही एक प्रथा दोनों जल्लादों में से प्रत्येक को एक-एक शराब की बोतलें देने की थी &#8211; हम उन्हें ओल्ड मोंक रम देते थे। जेल परिसर के अंदर मद्यपान कठोरता पूर्वक निषिद्ध है, परंतु नियमों का उल्लंघन केवल कैदियों द्वारा ही नहीं, अपितु जेलरों द्वारा भी किया जाता था। इस खास परंपरा में फांसी से पहले शराब का उन्मुक्त सेवन स्वीकार्य था।&#8221; </p>
<p><strong>गुप्ता का कहना है कि उन्हें बंगाल के एक जल्लाद नाटा मल्लिक का साक्षात्कार याद है जिसमें उसने कहा था की फांसी देने से पहले जमकर शराब पिता था। वह फांसी देने से घटनों पहले खाना छोड़ देता था और केवल शराब पिता था, ताकि उसकी कोई भावना शेष नहीं रहे। &#8220;मुझे नहीं मालूम की क्या कालू और फकीरा भी वैसा ही करते थे, परन्तु जब उन्हें उनकी रम को बोतल मिल जाती थी तो वे अत्यंत प्रसन्न हो जाते थे।&#8221; नाटा मल्लिक एक अन्य रिवाज का भी पालन करता था &#8211; अपना काम पूरा करने के बाद बाद फांसी के तख्ते पर भी थोड़ी शराब उड़ेल देता था। वह कहता था की वह शराब उस व्यक्ति की आत्मा के लिए होती थी, जिसे उसने फांसी पर लटकाया था।</strong> </p>
<blockquote><p>गुप्ता का कहना है कि &#8220;फांसी से पहले एक बड़ा खतरा इस बात का होता था कहीं जल्लादों का अपहरण न हो जाय। मैं आस्वस्त होकर यह बात नहीं कह सकता कभी जल्लाद गायब हुए थे या नहीं, परन्तु जेल अधिकारी इसे लेकर इतने अधिक चिंतित रहते थे की वे जल्लादों को कभी जेल परिसर छोड़ने की अनुमति नहीं देते थे। यह भय उस समय और अधिक बढ़ जाता था जब किसी आतंकवादी या किसी बहु-प्रसंसित व्यक्ति को फांसी दी जानी होती थी, क्योंकि उसके समर्थक उतावलेपन में कुछ भी कर सकते थे। यही कोई उन्हें वहां से लेकर चला गया तो क्या होगा? ऐसा विचार ही अपने आप में अत्यंत डरावना था। यदि वैसा हुआ तो कैदी को फांसी पर कौन लटकाएगा ? इन्हीं सब कारणों से जल्लादों की गतिविधियों को इस हद तक परदे के अंदर रखा जाता था की उनके बारे में जेल कर्मियों को भी कोई जानकारी नहीं होती थी।&#8221; </p></blockquote>
<p>कहते हैं कालू और फकीरा एक साथ क्यों काम करते थे, इसका भी एक कारण था। यदि किसी एक जल्लाद के हाथ-पाऊँ सुन्न हो जाते तो दूसरा जल्लाद आगे बढ़कर उस काम को पूरा कर देता था। बहरहाल, तिहाड़ जेल में ऐसा कभी नहीं हुआ। जल्लाद यह मानते हैं कि वे अत्यंत मूल्यवान हैं, इसलिए नाटा मल्लिक की भांति कालू ने उसे पारिवारिक कारोबार का रूप देने का प्रयास किया। उन दोनों ने अपने पुत्रों को अपना दायित्व सौंपने के लिए प्रशिक्षित किया। </p>
<p>14 अगस्त 2004 को बलात्कारी और हत्यारे धनञ्जय चटर्जी को फांसी देने के पूर्व मल्लिक ने अपने अपने साक्षात्कार के दौरान कहा था: &#8220;एक बार मैंने अपने साथ एक सहायक रखने का प्रयास किया था। चटर्जी ने वर्ष 1990 में एक किशोरी का बलात्कार कर हत्या की थी। जब उसकी सजा के बारे में समाचार चैनलों में बहुत अधिक बहस हुयी थी तो इस जल्लाद के ऊपर भी समाचार जगत ने विचारणीय मात्रा में ध्यान दिया था। 83-वर्षित नाटा मल्लिक ने फांसी की दुनिया में लोगों के समक्ष पहली बार उससे जुड़े रहस्य्मय तरीकों को उजागर किया था। &#8216;जैसे ही हम फांसी के फंदे पर पहुंचे, मेरा सहायक मूर्छित हो गया।  लेकिन मेरा पुत्र पूरी तरह ठीक था। मैं जानता था कि वह अच्छा प्रशिक्षु सिद्ध होगा।&#8217; नाटा मल्लिक के पिता भी अंग्रेजों के जमाने में जल्लाद थे। नाटा के बारे में माना जाता है कि उसने 25 से ऊपर फांसी पर लटकाने का कार्य किया था। अब उसका लड़का मेहताब भी जल्लाद है.</p>
<figure id="attachment_6237" aria-describedby="caption-attachment-6237" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-1.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="size-full wp-image-6237" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-1.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-1-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled-1-2048x1367.jpg 2048w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6237" class="wp-caption-text">तिहाड़ के पूर्व जेलर सुनील कुमार गुप्ता</figcaption></figure>
<p><strong>पूर्व जेलर कहते हैं: &#8220;कालू इतना आश्वस्त था कि  उसका पुत्र उसके बाद वह जिम्मेदारी संभाल लेगा। उसने काम पाने के लिए हमारी तथा अन्य अनेक जेलों में इश्तिहार छपवा कर भेजे थे &#8211; विशेषज्ञ जल्लाद की सेवाएं किराये पर उपलब्ध।  वास्तव में हम उसकी सेवाएं कभी नहीं ले सके, क्योंकि अपने पिता की भांति वह कोई सरकारी कर्मचारी नहीं था, जो की एक पूर्व शर्त थी। हमें यह काम करने के लिए किसी अपने व्यक्ति की आवश्यकता थी, क्योंकि वे मामले को गोपनीय रखने हेतु विश्वसनीय एवं कानून से बंधे हुए थे। निश्चय ही, संगणना के बाद कालू के मौत के इस कारोबार को अपने पुत्र के लिए अपने पदचिन्हों पर चलने हेतु आकर्षक एवं लाभदायक पाया होगा।&#8221; </strong></p>
<p>बहरहाल, प्रवीण शर्मा क्वोरा पर लिखते हैं कि सभी देशों में मृत्युदंड अलग अलग तरीके से दिया जाता है। विकसित देशों में जल्लाद को प्रतिमाह लगभग 5000 अमेरिकी डॉलर के बराबर वेतन दिया जाता है। परंतु हमारे देश में जल्लादों को विकसित देशों के जल्लादों के बनिस्पत बहुत कम वेतन मिलता है। बावजूद इसके भी जल्लाद फांसी देने का कार्य करते हैं। 1980 से पहले जल्लाद को प्रतिमाह जेल प्रशासन (जिस जेल में जल्लाद की नियुक्ति की गई होती है) द्वारा 100 रुपये प्रतिमाह दिया जाता था। 1980 कि बाद यह रकम बढ़कर 3000 प्रतिमाह कर दी गई। परंतु यह भी वक्त के लिहाज से बहुत कम थी इसलिए अब उन्हें 5000 रुपये प्रतिमाह वेतन दिया जाता है। निर्भया कांड के दोषियों को फांसी देने के लिए मेरठ के पवन जल्लाद को नियुक्त किया गया है जिसकी चार पीढ़ियों द्वारा यह कार्य किया जा रहा है। पहले पवन जल्लाद अपने दादा कालू की फांसी देने में सहायता किया करता था। बाद में उसने अपने पिता की भी मदद की। परंतु अब वह स्वतंत्र रूप से यह कार्य करता है और मिलने वाले 5000 रुपये प्रतिमाह वेतन से खुश हैं। आमतौर पर वो साइकल पर कपड़े की फेरी लगाते हैं.</p>
<p>जल्लाद पवन का कहना है कि वो केवल अपना काम कर रहे हैं। जब वो किसी को फांसी देते हैं तो उन्हें कुछ भी महसूस नहीं होता। क्योंकि उन्हें मालूम है कि जिसे वो फांसी देने जा रहे हैं, उसने जरूर कोई ऐसा अपराध किया होगा कि उसे अदालत ने मृत्युदंड की सजा दी है। इसी तरह, जब अजमल कसाब को फांसी की सजा दी जाने वाली थी तो उसे फांसी देने के लिए तमाम आवेदन जेल में पहुंचे थे। लेकिन ये जिम्मा उत्तर प्रदेश के जल्लाद मम्मू सिंह को दिया गया, जो पवन के पिता थे। मम्मू की खास बात थी कि वो फांसी की सजा देते समय रस्सी को मुलायम और तेजी से सरकाने लायक बनाने में एक्सपर्ट थे। जिस समय कसाब को फांसी देने का काम मम्मू को दिया गया, तब वो 66 साल के हो चुके थे। बीमारी की वजह से कसाब की फांसी से पहले उनकी मौत हो गई।  </p>
<figure id="attachment_6238" aria-describedby="caption-attachment-6238" style="width: 1602px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-28-at-10.34.10-AM.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-28-at-10.34.10-AM.png" alt="" width="1602" height="1031" class="size-full wp-image-6238" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-28-at-10.34.10-AM.png 1602w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-28-at-10.34.10-AM-300x193.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-28-at-10.34.10-AM-1024x659.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-28-at-10.34.10-AM-768x494.png 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-28-at-10.34.10-AM-1536x989.png 1536w" sizes="auto, (max-width: 1602px) 100vw, 1602px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6238" class="wp-caption-text">तिहाड़ जेल के मुख्य द्वार पर</figcaption></figure>
<p>मम्मू ने दाता राम से लेकर कामता प्रसाद तक अपने जीवनकाल में 15 लोगों को फांसी पर लटकाया था। साल 1973 में उसने बुलंद शहर के रहने वाले दाता राम को सबसे पहले मेरठ जेल में फांसी दी थी। साल 1982 में उसने तिहाड़ जेल में बंद शातिर अपराधी रंगा और बिल्ला को पिता कालू जल्लाद के साथ मिलकर फांसी पर लटकाया था। साल 1997 में जयपुर में कामता प्रसाद तिवारी को फांसी दी थी। साल 1989 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारों सतवंत सिंह और केहर सिंह को फांसी पर लटकाया था। मम्मू को भी फांसी देने के लिए कई राज्यों में बुलाया गया था। वर्षों तक वह परिवार ख़राब आर्थिक स्थिति से जूझता रहा, लेकिन न समाज, न प्रशासन और ना ही व्यवस्था और ना ही जेल के अधिकारी कभी मदद का हाथ बढ़ाये। उसी दुःख के कारण एक इंटरव्यू में वह कहा भी था कि वो नहीं चाहता कि उसके परिवार से अब कोई इस पेशे में आए लेकिन उसका बेटा पवन भी उसके बाद अब जल्लाद है। </p>
<p>इसी तरह, मुंबई हमले के गुनहगार और पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब को फांसी देने का जिम्मा बाबू जल्लाद को सौंपा गया था। हालांकि बाबू की पहचान कभी उजागर नहीं हो पाई। बाद में बताया गया कि वो पुलिस का ही कोई कांस्टेबल, जिसे फिर नागपुर जेल में याकूब मेमन को वर्ष 2015 में फांसी देने के लिए बुलाया गया था। इन दोनों फांसियों के लिए उसे 5000-5000 रुपए दिए गए थे। फिर, अहमदुल्ला लखनऊ के जल्लाद थे। जल्लाद का काम उनके पिता से उन तक 1965 में आया। उन्हें लगा कि जल्लाद का काम मानवता के खिलाफ है, अतः उन्होंने इस कार्य को छोड़ दियाधार्मिक हो गए। महाराष्ट्र का एक जल्लाद था अर्जुन भीका जाघव जो इस कार्य को नब्बे के दशक में छोड़ दिया। </p>
<p>क्रमशः </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/social-trench-between-those-who-issue-and-execute-a-black-warrant">तिहाड़ जेल-3 ✍ &#8220;ब्लैक वारंट&#8221; &#8216;निर्गत&#8217; और &#8216;निष्पादित&#8217; करने वालों के बीच &#8216;सामाजिक खाई&#8217; 😢 आखिर वह भी तो न्यायालय द्वारा प्रदत कार्यों को ही निष्पादित करता है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>तिहाड़ जेल-2 ✍ तिहाड़ जेल की &#8216;काल&#8217; कोठरियां, &#8216;लीवर&#8217; खींचने के लिए &#8216;जल्लाद&#8217; को जेल अधीक्षक का &#8216;अंतिम&#8217; आदेश और अंतिम &#8216;सांस&#8217; के लिए &#8216;बाहरी&#8217; ताकत का प्रयोग</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 Mar 2025 05:41:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[administration]]></category>
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		<category><![CDATA[hanging]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>जेल रोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली : रघुराज सिंह, रोहित ऋषभ, सिंगावरापु महालक्ष्मुडु, भावना वेंकडू, कंचारगुंटा सुब्बैया, कालीदिंडी वेंकट, नरसिम्हा राजू, चेंचू चाइना, रामी रेड्डी, जमुला लक्ष्मी, रेड्डी पोरेड्डीपेड्डा, हनमंत भीमप्पा भास्करी, नाथूराम गोडसे, नारायण दत्तात्रय आप्टे, हमाम सिंह, भगवान सिंह, राम सिंह, सोहन सिंह गाडगी, रोशन लाल, रतन बाई जैन, बीरेन्द्र नाथ दत्ता,  पांडुरंग तात्यासाहेब [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/tihar-jail-use-of-external-force-for-the-last-breath">तिहाड़ जेल-2 ✍ तिहाड़ जेल की &#8216;काल&#8217; कोठरियां, &#8216;लीवर&#8217; खींचने के लिए &#8216;जल्लाद&#8217; को जेल अधीक्षक का &#8216;अंतिम&#8217; आदेश और अंतिम &#8216;सांस&#8217; के लिए &#8216;बाहरी&#8217; ताकत का प्रयोग</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जेल रोड (तिहाड़ जेल), नई दिल्ली : रघुराज सिंह, रोहित ऋषभ, सिंगावरापु महालक्ष्मुडु, भावना वेंकडू, कंचारगुंटा सुब्बैया, कालीदिंडी वेंकट, नरसिम्हा राजू, चेंचू चाइना, रामी रेड्डी, जमुला लक्ष्मी, रेड्डी पोरेड्डीपेड्डा, हनमंत भीमप्पा भास्करी, नाथूराम गोडसे, नारायण दत्तात्रय आप्टे, हमाम सिंह, भगवान सिंह, राम सिंह, सोहन सिंह गाडगी, रोशन लाल, रतन बाई जैन, बीरेन्द्र नाथ दत्ता,  पांडुरंग तात्यासाहेब शिंदे, गोपाल चंद्र घोष, प्यारे लाल, राम गोपाल, नारायण सिंह, बिल्ला, रंगा, मोहम्मद शरीफ,श्रीचंद, मंज़ूर अहमद, जय चंद, हुकुम चंद, उजागर सिंह उर्फ संता सिंह, करतार सिंह, मकबूल भट्ट, सतवंत सिंह, केहर सिंह, अजमल कसाब, अफजल गुरु, याकूब मेनन, मुकेश सिंह, विनय शर्मा &#8211; ये सभी नाम लगभग 539 अपराधियों की सूची में अंकित हैं जिन्हें भारत के विभिन्न कारावासों में फांसी पर तब तक लटकाये रखा गया जब तक वह अंतिम सांस नहीं ले लिया, मृत्यु को प्राप्त नहीं कर लिया ।लेकिन 31 जनवरी, 1982 को फांसी पर लटकाने के बाद भी एक अपराधी की मौत नहीं हुयी थी &#8211; उसके अंतिम सांस के लिए बाहरी ताकत का इस्तेमाल किया गया था</strong>। </p>
<p>साल 2015 में, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली ने 1947 से भारत में फांसी दिए गए व्यक्तियों की एक सूची तैयार की और पाया कि 1 जनवरी से 15 अगस्त 1947 की अवधि सहित कम से कम 752 अपराधियों को फांसी दी गई थी। आजादी के बाद भारत में पहली फांसी नाथूराम गोडसे को दी गई थी और मेमन से पहले आखिरी बार फांसी की सजा संसद भवन पर हमले के दोषी अफजल गुरु को दी गई थी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 1947 के बाद से देश में अब तक कुल 56 लोगों को फांसी दी गई है और याकूब मेमन भारत में फांसी की सजा पाने वाला 57वां अपराधी है। ब्रिटिश हुकूमत में किसी को दी गई पहली फांसी महाराजा नंदकुमार का नाम आता है जिन्हें 5 अगस्त 1775 में उन्हें कलकत्ता में फांसी पर लटका दिया।  </p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=tRFQW6NNUNA&#038;t=3s">@अखबारवाला001 (233) ✍ दिल्ली के तिहाड़ कारावास में वह सब कुछ होता है जो कारावास में नहीं होनी चाहिए 😢</a></p>
<p>बहरहाल, भारत के विधि आयोग की 187 वीं रिपोर्ट में कहा गया है कि फांसी दिए जाने से एक दिन पहले कैदी को वजन, माप-तौल, गर्दन की नाश टूटना सुनिश्चित करने के लिए फंदे का आकार, गले का आकार और शरीर की अन्य आवशयक माप-तौल की भयावह प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। जैसे ही तख्ता हटना है, कैदी का शरीर उसके नीचे बने कुएं में झूल जाता है। कई बार ऐसा भी होता है कि गर्दन की नस टूटे बिना भी कैदी की मृत्यु हो जाती है। उसकी आँखें लगभग उसके सिर से बाहर निकल आती है। उसकी जीभ मुंह से बाहर निकलकर ऐंठ जाती है। उसकी गर्दन टूट भी सकती है और कई बार फंदे की रस्सी अपने साथ गर्दन की एक और की त्वचा और मांस भी खींच लेती है। कैदी का पेशाब निकल जाता है। वह मल त्याग कर देता है, जिसे देखकर वहां बैठे साक्षी लगभग सभी फांसियों को देखकर मूर्छित हो जाते हैं या उन्हें किसी के सहायता से साक्षी कक्ष से बाहर निकला जाता है। डाक्टर द्वारा एक छोटी से सीधी पर चढ़कर स्टेथोस्कोप से उसकी ह्रदय गति सुनंने और उसकी मृत्यु की घोषणा से पूर्व कैदी का शव लगभग 8 से 14 मिनट तक रस्सी से लटकता रहता है। जेल का एक गार्ड फांसी पर लटकाये गए व्यक्ति के पैरों के पास खड़ा होकर उसके शरीर को मजबूती से पकड़े रहता है, क्योंकि फांसी के कुछ मिनटों के दौरान कैदी सांस लेने के लिए काफी संघर्ष करता हैं। </p>
<figure id="attachment_6227" aria-describedby="caption-attachment-6227" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3560-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3560-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="size-full wp-image-6227" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3560-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3560-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3560-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3560-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3560-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3560-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6227" class="wp-caption-text">तिहाड़ जेल</figcaption></figure>
<blockquote><p>भारत के विभिन्न कारावासों में अब तक फांसी पर लटका कर मौत दिए गए अपराधियों की अपनी-अपनी कहानियां अवश्य होंगी । वहां उपस्थित जेल के अधिकारियों सहित, चिकित्सक या जल्लाद, या जिनकी देखरेख में कैदियों को फांसी पर लटकाया गया होगा, प्रथम द्रष्टा के रूप में अलग-अलग स्थितियों से सामना किये होंगे । लेकिन महात्मा गांधी को जिस तारीख को गोली मारकर हत्या की गयी थी, कैलेण्डर के मुताबिक उस तारीख के अगले दिन, परन्तु साल 1948 के स्थान पर 1982 को सुबह-सवेरे दिल्ली के तिहाड़ जेल में जो घटना हुई, शायद कहीं नहीं हुई होगी।</p></blockquote>
<p>अगर हुई भी होगी तो वहां उपस्थित जेल अधिकारी उस घटना को सार्वजनिक करने या दबाने में कितनी भूमिका निभाए होंगे, यह भी एक गहन शोध का विषय है। आम तौर पर जेल अधिकारी या जिन पर फांसी देने का अंतिम दायित्व सौंपा जाता है, किसी भी अप्रिय अथवा अनहोनी घटना को सार्वजनिक नहीं करते, आखिर नौकरी का सवाल है। लेकिन विगत दिनों जब दिल्ली स्थित केंद्रीय करावास तिहाड़ के पूर्व जेलर सुनील कुमार गुप्ता से बात कर रहे थे तो वे सेवा सन्हिता के साथ-साथ अपनी कर्तव्यनिष्ठा को मद्दे नजर रखते ऐसी बहुत सी बातें उजागर किये जिसे राष्ट्र के लोग नहीं जानते। यह अलग बात है कि गुप्ता जी को अपने 35-साल के सेवावधि के अंतिम दौर वह सब सहना पड़ा, जिसकी वे अपेक्षा नहीं किया थे। वे राजनितिक के साथ-साथ प्रशासनिक कार्रवाइयों का सामना भी किये। </p>
<blockquote><p>यह अलग बात है कि भारत के सभी जेलों में कमोवेश स्थिति एक जैसी ही है, कहीं अधिक त्रासदी है तो कहीं कम। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उन स्थियों को लाने में राजनीतिक लोगों से लेकर समाज के दबंगों, अधिकारियों, और जेल के अंदर सजा भुगत रहे कैदियों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। 31 जनवरी, 1982 को तिहाड़ में हुए उस विचित्र घटना का परिणाम यह हुआ कि उस घटना के तीन दशक बाद यह निर्णय लिया गया कि किसी भी फांसी के लिए पोस्टमार्टम अनिवार्य है। क्योंकि रंगा-बिल्ला को फांसी देने के बाद बिल्ला की मृत्यु तो तत्काल हो गयी थी, परन्तु रंगा की नाड़ियां चल रही थी। जेल के एक कर्मचारी को कुएं में उतरकर उसके शरीर को नीचे की ओर खींचा ताकि उसकी शेष सांस बाहर निकल जाय। यह मानवता के विरुद्ध है।</p></blockquote>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=tRFQW6NNUNA&#038;t=307s">दिल्ली के तिहाड़ कारावास में वह सब कुछ होता है जो कारावास में नहीं होनी चाहिए 😢</a></p>
<p>आइये ऐतिहासिक तिहाड़ जेल चलते हैं। 31 जनवरी, 1982 को अत्यंत सवेरे रंगा और बिल्ला की गर्दनों में फंदे डाले गए। उसके चेहरों को काले कपड़ों से ढँक दिया गया ताकि वह यह नहीं देख पाय की उसके आसपास क्या हो रहा है। बिल्ला सुबकते हुए आंसू बहा रहा था, जबकि रंगा किसी विजेता की तरह अंतिम समय तक यही नारा लगता रहा &#8216;जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल।&#8217; जैसे ही वह अपने मौत के कुएं में लटका, उसके चेहरों का रंग बदल गया था। वह कुछ वैसा ही था, जैसे भय की स्थिति में चमड़ी अपना रंग बदलकर काली हो जाती है। यह ऐसा भय था, जो उसकी आँखों में साफ़ दिखाई दिया था। काली ने फकीरा के सहयोग से खटका (लीवर) खींच दिया और गड्ढे में जाकर बिल्ला और रंगा की जीवन लीला समाप्त हो गई। </p>
<figure id="attachment_6228" aria-describedby="caption-attachment-6228" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="size-full wp-image-6228" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3582-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6228" class="wp-caption-text">​पूर्व जेलर सुनील कुमार गुप्ता</figcaption></figure>
<p>बिल्ला और रंगा को सुबह सोकर उठने के बाद एक कप चाय दी गयी थी, जिसे देखकर लगता था कि जेल में कैदियों को उनके अंतिम समय में सर्वोत्तम उपलब्ध सेवाएं प्रदान की जाती थी। यह सुनिश्चित किया जाता था कि उन्हें प्राप्त अधिकारों का दृढ़ता से पालन हो। उन दोनों से अंतिम बार पूछा गया कि क्या वे अपनी-अपनी वसीयत लिखवाने के लिए किसी मजिस्ट्रेट को बुलाना चाहते हैं? बिल्ला और रंगा दोनों इंकार कर दिया था। इसके बाद कैदियों को स्नान करने के लिए प्रोत्साहित किया गया और उन्हें काले कपडे पहना दिए गए। उनके हाथों और पाओं को हथकड़ियों से जकड दिया गया और ब्लैक वारंट में निर्धारित समय से मात्र 10 मिनट पूर्व उन्हें फांसी के तख्ते पर लाया गया। जहाँ तक नियमों की बात है, महाराष्ट्र में यदि कैदी के परिवार वाले उसकी फांसी देखने के इच्छुक होते हैं तो उन्हें उसकी अनुमति दी जाती है। परन्तु दिल्ली राज्य में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए फांसी के समय केवल जेल के अधिकारी ही उपस्थित थे। </p>
<p><strong>अगली सुबह जनवरी का अंतिम दिन था। तिहाड़ अपने आखिरी काम के लिए तैयार थी। समूचे जेल रोड को बंद कर दिया गया था। मीडिया वाले कुछ न कुछ समाचार पाने के लिए प्रतीक्षा कर रहे थे। सच्चाई यह थी कि उन्हें कुछ भी दिखाई देने वाला नहीं था, यहाँ तक की उन्हें उनसे मिलने आने वाले पारिवारिक सदस्यों की भी एक झलक नहीं मिली, क्योंकि फांसी कोठी अत्यंत वीरान क्षेत्र में थी और आम लोगों की दृष्टि से ओझल थी। इस फांसी घर के बारे में कोई उल्लेखनीय बात नहीं थी, सिवाय इसके की फांसी के तख्ते के नीचे 15 फीट गहरा एक कुआं था। वह कुआं लकड़ी के दो तख्तों से ढंका हुआ था, जो आपसे में एक लोहे के सरिये से जुड़े थे। उस कुएं के ऊपर लोहे के एक पाइप से  फांसी के फंदे लटके हुए थे। तख्ते के एक ओर एक लीवर (खटका) बना हुआ था। जब उस लीवर को खींचा जाता था तो दोनों तख्ते अलग होकर खुल जाते थे तथा तख्तों पर पड़े हुए व्यक्ति का शरीर गड्ढे में झूल जाता था और अचानक उसकी मृत्यु हो जाती थी। सैद्धांतिक रूप से लीवर खींचने के तुरंत बाद मृत्यु हो जानी चाहिए, परन्तु उस सुबह जांच के दौरान सिद्धांत और व्यवहार में अंतर था।</strong> </p>
<p>बिल्ला और रंगा के अपराध के विषय में कोई संदेह नहीं था। उन्हें ब्लैक वारंट में निर्दिष्ट तिथि से एक सप्ताह पूर्व जेल नंबर &#8211; 3 स्थित फांसी कोठी में ले आया गया। तिहाड़ के इस विशेष भाग में 16 काल कोठरियां हैं और उनमें मृत्यु दंड प्राप्त कैदियों को फांसी के अंतिम सप्ताह में रखा जाता है। फांसी का तख़्त इसी ईमारत में बना हुआ है, जिसे अन्य कैदियों कमी दृष्टि से पूर्णतया अलग रखा जाता है ताकि वे फांसी की तैयारी को नहीं देख सकें। </p>
<p>वैसे, उच्चतम न्यायलय के अनेक ऐसे निर्णय आये हैं जिनमें कहा गया है कि एकांत कारावास एक प्रकार से उत्पीड़न है, जिसे किसी पर भी लागु नहीं किया जा सकता। परन्तु लाल कोठरियों को पूर्णतया आवश्यक माना गया है। यही कारण है की उस क्षेत्र को तमिल नाडु स्पेशल पुलिस के विशेष प्रहरियों की सघन निगरानी में रखा जाता है। उन प्रहरियों को वहां दो-दो घंटों की पालियों में तैनात किया जाता है और उन्हें इस बात का विशेष निर्देश होता है कि वे पल भर के लिए भी कैदी के ऊपर से नजरें न हटाएँ.इसे बुनियादी तौर पर्व &#8216;आत्महत्या निगरानी&#8217; कहा जाता है और इसी कारण से कैदियों की सभी निजी वस्तुओं, जिसमें पैजामे का नाड़ा भी शामिल है, को उनसे दूर रखा जाता है, क्योंकि उस नाड़े के जरिये कैदी अपनी जिंदगी खुद ही समाप्त कर सकता है। </p>
<p>परिवार के सदस्यों और मित्रों के साथ एक आखिरी मुलाक़ात को छोड़कर किसी को उससे मिलने की अनुमति नहीं दी जाती है। संयोगवश यह निर्णय करना कैदी पर निर्भर होता है कि वह आखिरी मुलाकात चाहता है अथवा नहीं। कुछ कैदी किसी से भी मिलने के इक्षुक नहीं होते हैं। उन्हें अपनी अंतिम वसीयत लिखने का भी अवसर दिया जाता है और उसके साक्ष्य के रूप में जिला मजिस्ट्रेट को बुलाया जाता है। चौबीस घंटे के एक चक्र में कैदी को आधे घंटे के लिए आसपास घूमने की अनुमति दी जाती है। शेष समय का उपयोग कैदी द्वारा अपनी मृत्यु के लिए मानसिक रूप से तैयार होने के लिए किया जाता है। </p>
<p><strong>बिल्ला और रंगा के लिए ब्लैक वारंट  जारी होने की सुचना अख़बारों तक पहुँच गयी थी। गुप्ता के अनुसार, &#8220;मुझे इस बात की कोई जानकारी नहीं थी की इस खबर के लिक होने का स्रोत क्या था, क्योंकि हिंदुस्तान टाइम्स के पत्रकार  प्रभा दत्त ने जेल अधीक्षक के पास रंगा और बिल्ला का साक्षात्कार लेने की याचिका दी थी। जब जेल अधिकारियों ने उन्हें अनुमति देने से इंकार कर दिया तो वह उच्चतम न्यायालय पहुँच गयी और उसके पीछे पीछे समाचार एजेंसी के कुछ पत्रकार न्यायालय पहुँच गए। अपनी याचियका में प्रभा दत्त ने कहा था की कैदी का पक्ष सुनना महत्वपूर्ण है और अपने ऐतिहासिक निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने कहा की वे मिल सकते हैं, बशर्ते कि दोनों स्वयं उनसे मिलने के इक्छुक हों।&#8221;</strong></p>
<figure id="attachment_6229" aria-describedby="caption-attachment-6229" style="width: 1709px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3553-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3553-scaled.jpg" alt="" width="1709" height="2560" class="size-full wp-image-6229" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3553-scaled.jpg 1709w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3553-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3553-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3553-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3553-1026x1536.jpg 1026w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/DSC_3553-1367x2048.jpg 1367w" sizes="auto, (max-width: 1709px) 100vw, 1709px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6229" class="wp-caption-text">तिहाड़ जेल</figcaption></figure>
<p>30 जनवरी, 1982 को एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में पांच पत्रकारों के एक समूह को बिल्ला और रंगा से अंतिम बार बातचीत करने के लिए तिहाड़ जेल के अंदर ले जाया गया। बहरहाल, रंगा प्रभा दत्त या अन्य पत्रकारों से मिलने वार्ता के लिए राजी नहीं हुआ। जिस सिमित अवधि के लिए पत्रकारों को बिल्ला से बातचीत करने की इजाजत दी गयी थी, उसने अंतिम बार खुद को निर्दोष होने की दलील पेश की। </p>
<p>गुप्ता कहते हैं: &#8220;फांसी पर लटकाये जाने के पूर्व मैं रात में तीन अन्य अधिकारियों के साथ लाल कोठरी के बाहर ड्यूटी पर तैनात था। वहां हमें सुनिश्चित करना था कि निगरानी पर रखे गए प्रहरी अपना काम ठीक से करें। अतः हमने अधीक्षक के कमरे में बैठकर प्रतीक्षा की। उस दिन मेरी मनोदशा का वर्णन करने के लिए मेरे पास उचित शब्दों का अभाव था। मैंने उस रात रात का भोजन नहीं किया, क्योंकि बेचैनी के कारण मैं स्वयं को दोषी जैसा महसूस कर रहा था। लगभग हर घंटे या उससे कुछ काम समय में मैं उनकी कोठरियों में जाकर देखता था कि वे क्या कर रहे हैं।  मेरे विपरीत, रंगा ने शांतिपूर्ण अपना खाना खाया और अन्य रातों की तरह करवट बदलकर सोने लगा।&#8221;</p>
<p>बहरहाल, उसके हाव भाव से कटाई नहीं लगा कि वह उसकी आखिरी रात थी। दूसरी ओर बिल्ला ने न तो खाना खाया और न सोया ही। वह अपनी कोठरी के अंदर सारी रात चहलकदमी करते खुद को  निर्दोष और रंगा को दोषी बताता रहा। परन्तु उसके सारे दावे पत्थर की दीवारों से टकराकर चूर चूर हो गए थे। उसकी दया याचिकाएं निरस्त हो चुकी थी और यद्यपि तिहाड़ के इतिहास में  कुछ ऐसी उदहारण थे की फांसी के ग्यारहवें घंटे में रोक लगा दी गयी थी। परन्तु उनके मामले में किसी को अंतिम मिनट में किये जाने वाले हस्तक्षेप की आशा नहीं थी। </p>
<p>ऐसे ही एक मामले में फांसी स्थगित कर दी गयी थी। फांसी पर लटकाई जाने वाली महिला कैदी की जब अंतिम चिकित्सा जांच की गयी तो उसे गर्भवती पाया गया था। लेकिन खूंखार से खूंखार अपराधी के साथ भी लोग अपना सम्बन्ध बना लेते है और आज भी आप जब किसी को मौत के भय से रट बिलखते देखते हैं तो आप स्वयं हिल जाते हैं। रंगा ने बिल्ला के आंसुओं को देखकर उसका मजाक उड़ाते हुए कहा था, देखो मर्द होकर रो रहा है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-27-at-11.07.58-AM.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-27-at-11.07.58-AM.png" alt="" width="1767" height="970" class="aligncenter size-full wp-image-6230" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-27-at-11.07.58-AM.png 1767w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-27-at-11.07.58-AM-300x165.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-27-at-11.07.58-AM-1024x562.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-27-at-11.07.58-AM-768x422.png 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/Screenshot-2025-03-27-at-11.07.58-AM-1536x843.png 1536w" sizes="auto, (max-width: 1767px) 100vw, 1767px" /></a></p>
<p>वैसे जेल नियमावलियां बताती है कि ऐसे मामलों में मृत्यु तत्काल हो जाती है। तख्ते के अचानक खुलने और शरीर के हवा में झूलने के कारण गर्दन की नस टूट जाती है और व्यक्ति की मौत हो जाती है। यही वह आदर्श स्थिति होती है, जिसे सुनिश्चित करने के लिए जल्लाद काम करते हैं। </p>
<blockquote><p>गुप्ता जी कहते हैं: &#8220;लेकिन मेरे पहली ही फांसी के दौरान बहुत विचित्र हुआ था। स्थापित नियमों के अंतर्गत जब डाक्टर ने दोनों की नाड़ी की जांच की तो ऐसा लगा कि बिल्ला की मृत्यु तो तत्काल हो गयी थी, परन्तु रंगा की नाड़ियां अभी भी चल रही थी। हमें बताया गया कि कि चूँकि वह काफी लम्बा था, इसलिए उसने अपनी सांस रोक ली थी और फांसी से बच गया था। इसलिए जेल के एक कर्मचारी को कुएं में उतरकर उसके शरीर को नीचे की और खींचने का काम सौंपा गया, ताकि उसकी बची खुश सांस भी बाहर निकल जाय। गार्ड ने खुद को सौंपी गयी जिम्मेदारी निभाई और इस प्रकार उसकी अंतिम सांस निकल गयी।&#8221;</p></blockquote>
<p>उस घटना के 32 वर्षों बाद शत्रुघ्न चौहान का निर्णय जारी किया गया जिसमें कहा गया की जेल में दी जाने वाली किसी भी फांसी के लिए पोस्टमार्टम अनिवार्य है। वरना यह सच्चाई बाहर आ जाती कि रंगा की फांसी में बाहरी सहायता की जरुरत पड़ी थी। बिल्ला और रंगा के परिवारों की और से उनके शवों को लेने भी कोई नहीं आया था, इसलिए दोनों के शवों को दफ़नाने की जिम्मेदारी हमारे ऊपर छोड़ दी गयी थी। जेल अधीक्षक ने उस दायित्व पत्र पर हस्ताक्षर किये जिसमें यह कहा गया था कि उन्होंने फांसियों को कार्यान्वित किया था। </p>
<p><strong>जेल नियमावली के प्रावधानों के अनुसार, जल्लादों को उसके तख्ते का लीवर खींचने का निर्देश देना जेल अधीक्षक का दायित्व है, जिसपर फांसी दिए जाने वाले कैदी खड़े होते हैं। तत्कालीन अधीक्षक एबी शुक्ला ने लाल रंग का रुमाल हवा में लहराया और जल्लादों को लिवर खींचने का संकेत दिया। उन्होंने उस लाल रुमाल को संभाल कर अपने पास रख लिया था और अपने दोस्तों को दिखाते थे की रंगा और बिल्ला को फांसी देने के लिए उसी रुमाल का प्रयोग हुआ था। </strong></p>
<p>✍ क्रमशः &#8230;&#8230;</p>
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