<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>indiannation Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
	<atom:link href="http://www.aryavartaindiannation.com/tag/indiannation/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://www.aryavartaindiannation.com/tag/indiannation</link>
	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
	<lastBuildDate>Tue, 24 Mar 2026 05:14:46 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=7.0.7</generator>
	<item>
		<title>पत्रकार, गैर-पत्रकार बिलखते रहे, दरभंगा राज की &#8216;गरिमा&#8217; को बचाने का &#8216;तथाकथित दावा&#8217; करने वाले महाराजा द्वारा स्थापित &#8216;यूएनआई&#8217; को बचाने के लिए ​कभी ​आगे नहीं आये</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/eviction-of-uni-news-agency</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/eviction-of-uni-news-agency#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Mar 2026 03:24:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[aryavarta]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[eviction]]></category>
		<category><![CDATA[indiannation]]></category>
		<category><![CDATA[new delhi]]></category>
		<category><![CDATA[uni]]></category>
		<category><![CDATA[united news of india]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=7498</guid>

					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली: अपने स्थापना के 65वें वर्ष में भारत का एक विश्वसनीय समाचार एजेंसी &#8211; यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया &#8211; को बेघर इसलिए होना पड़ा कि उसके स्थापना काल के 27-शेयरधारकों ने इस संस्थान को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए शायद दशकों पहले ही मन बना चुके थे। संतानहीन दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ.सर [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/eviction-of-uni-news-agency">पत्रकार, गैर-पत्रकार बिलखते रहे, दरभंगा राज की &#8216;गरिमा&#8217; को बचाने का &#8216;तथाकथित दावा&#8217; करने वाले महाराजा द्वारा स्थापित &#8216;यूएनआई&#8217; को बचाने के लिए ​कभी ​आगे नहीं आये</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली: अपने स्थापना के 65वें वर्ष में भारत का एक विश्वसनीय समाचार एजेंसी &#8211; यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया &#8211; को बेघर इसलिए होना पड़ा कि उसके स्थापना काल के 27-शेयरधारकों ने इस संस्थान को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए शायद दशकों पहले ही मन बना चुके थे। संतानहीन दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ.सर कामेश्वर सिंह और उनका &#8216;दी न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशंस लिमिटेड&#8217; का यूएनआई के स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान था, की मृत्यु के बाद उनके परिवार के लोगों ने भी, एक महत्वपूर्ण शेयर होल्डर होने के वावजूद, पत्रकारिता के इस मंदिर को बचाने, दरभंगा राज की गरिमा को बरक़रार रखने के लिए एक भी कदम आगे नहीं बढ़ाये, जिसकी उम्मीद यहाँ के पत्रकार और गैर-पत्रकार किये थे। </strong></p>
<p>अगर ऐसा नहीं होता तो यूएनआई के स्थापना के 18 वर्ष बाद, तत्कालीन सरकार द्वारा आवंटित भूखंड &#8211; 9, रफ़ी मार्ग &#8211; पर एक आलीशान भवन बन गया होता। आज देश से प्रकाशित समाचार पत्र और पत्रिकाओं के मालिक/संपादक यूएनआई की सेवा (सब्सक्रिप्शन) लेते होते। आज यूएनआई जैसी पत्रकारिता से सम्बंधित विश्वसनीय संस्था को जीवन के इस वृद्धावस्था में बेघर नहीं होना होता। आज दशकों कार्य किये पत्रकार, गैर पत्रकारों को जीवन के अंतिम वसंत में रोजी-रोटी की तलाश में &#8216;अग्निपथ&#8217; पर नहीं चलना होता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जिन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए यूएनआई की स्थापना की गई थी, आज संसद मार्ग से तत्कालीन योजना भवन से मुड़ती सड़क के सामने 9-रफ़ी मार्ग की मिट्टी भी बिलख रही है &#8211; स्थापना काल के शेयरधारकों ने छल कर दिया।<br />
 <br />
<strong>यह कहा जाता है कि औसतन यूएनआई के स्थापना काल में वे ही शेयर धारक बने तो पहले से ही एक दूसरे समाचार एजेंसी के भी शेयर धारक थे। यह भी कहा जाता है कि उस समाचार एजेंसी में नियमों/शर्तों में यह बात उद्धृत किया गया था कि &#8216;जो भी शेयरधारक हैं, उन्हें एजेंसी का सब्सक्रिप्शन लेना बाध्यकारी होगा।&#8217; यह शर्त यूएनआई के स्थापना काल में लोगों ने नहीं रखा। शायद यही कारण है कि स्थापना और सेवा शुरुआत के कुछ वर्षों के बाद ही शेयर धारकों ने न केवल अपनी भागीदारी यूएनआई के प्रति, उनके कार्य कलाप के प्रति, आमदनी-खर्च के प्रति अपनी जबाबदेही से हाथ धोने लगे, बल्कि समाचार, लेख और एजेंसी द्वारा प्रदत्त सभी सुविधाओं के सब्सक्रिप्शन को भी निरस्त करते गए। </strong></p>
<p>&#8216;वास्तविक यूएनआई&#8217; के लोगों का कहना है कि विगत दो दशकों और अधिक समय में यूएनआई के शेयर धारकों को न जाने कितने बार संपर्क स्थापित करने की कोशिश की गयी, निवेदन किया गया, विनती की गयी; दुर्भाग्यवश दरभंगा राज के दी न्यूजपेपर एंड पब्लिकेशन लिमिटेड, जो एक महत्वपूर्ण शेयर धारक थे, विनती को नहीं सुना। काश !! महाराजाधिराज जीवित होते। परिणाम यह हुआ कि यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया &#8216;तथाकथित आतंरिक राजनीतिक चक्रव्यूह के साथ-साथ विपन्नता से ग्रसित होता गया। कल जिसके शब्दों की तूती बोली जाती थी, आज उसके शब्दों को सुनने वाला कोई नहीं दिखा रहा है। यह अलग बात है कि अनेकानेक प्रेस विज्ञप्तियां जारी हो रही है, भर्त्सना की जा रही है।  </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-8.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7500" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<blockquote><p>शायद देश के पत्रकार इस बात से अनभिज्ञ होंगे कि यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया की स्थापना के बाद बिहार की राजधानी पटना में इसकी पहली शाखा &#8216;दी न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशंस लिमिटेड (आर्यावर्त और दी इंडियन नेशन दैनिक समाचार पत्र का प्रकाशक) के मजहरूल हक़ रोड स्थित आलीशान भवन के परिसर में खुला था। &#8216;दी न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशंस लिमिटेड&#8217; के मालिक दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह यूएनआई के स्थापनकालीन 27-शेयर होल्डरों में प्रमुख थे।</p></blockquote>
<p>इस परिसर में कुछ वर्ष कार्य करने के बाद उसी मार्ग पर आगे डी लाल एंड संस के पीछे जाने वाली गली में स्थित होटल में दो कमरे से कार्य करना शुरू किया। सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्षों में आकाशवाणी, पटना के प्रवेश द्वार पर स्थित एक बंगाली परिवार के मकान के प्रथम मंजिल पर आया। उसी भवन के निचले तले में &#8216;मंगोलिया बार&#8217; खुला। यूएनआई का यह कार्यालय बिहार सहित राष्ट्रीय स्तर पर सत्तर के दशक और उसके बाद होने वाली राजनीतिक महाभारतों का प्रथम द्रष्टा रहा। </p>
<p><strong>ज्ञातव्य हो कि स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की मानसिक उपज से स्थापित साथ-सत्तर-अस्सी-नब्बे के ज़माने तक का भारत का सबसे अधिक जीवंत समाचार एजेंसी का आज़ादी के 78 वर्ष आते-आते यह हश्र हो गया । कहते हैं उन दिनों देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू अपने आधिकारिक यात्रा पर जम्मू-कश्मीर गए थे। प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया था यूएनआई के स्थापना से पूर्व। जिस दिन पंडित नेहरू जम्मू और कश्मीर में थे, पीटीआई के पत्रकार और गैर-पत्रकार अपनी मांगों के समर्थजन में हड़ताल पर थे। परिणाम यह हुआ की पंडित नेहरू की यात्रा की खबर देश के अख़बारों में प्रकाशित नहीं हो पाया, सिवाय जम्मू और कश्मीर के स्थानीय अख़बारों को छोड़कर, या फिर टेलीफोन/ट्रंकाल से प्रेषित समाचार का प्रकाशन को छोड़कर। </strong></p>
<p>पंडित नेहरू तत्काल पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. विधानचंद्र रॉय को एक ऐसा समाचार एजेंसी बनाने को कहे, जिसमें देश के सभी अख़बारों के मालिकों का हिस्सा हो और वे निष्पक्षता के साथ-साथ शब्दों की गरिमा को बरकरार रखकर, समाचार और लेख उपलब्ध करा सके। यह भी कहा जाता है कि डॉ. रॉय इस सम्बन्ध में सबसे पहले दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह से संपर्क स्थापित कर इस दिशा में पहल करने की बात की। यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया का गठन इसी सोच पर किया गया और उसकी पहली कहानी 21 मार्च, 1961 को टेलीप्रिंटर के माध्यम से देश के प्रमुख शहरों और राजधानियों से प्रकाशित अख़बारों में प्रकशित हुयी थी। </p>
<blockquote><p>दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. कामेश्वर सिंह द्वारा स्थापित और पटना से प्रकाशित &#8216;दी इंडियन नेशन (1930) और &#8216;आर्यावर्त (1940) के प्रकाशक &#8216;दी न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशन्स लिमिटेड&#8217; के तत्कालीन महाप्रबंधक श्री उपेंद्र आचार्य को यूएनआई की बेहतर स्थापना कराने, भागीदारी निभाने (अर्थ और सामर्थ्य दोनों से) का दायित्व सौंपा गया। दी न्यूजपेपर एंड पब्लिकेशन्स लिमिटेड का इस एजेंसी की स्थापना में क्या योगदान रहा, यह आज की व्यवस्था या आज के पत्रकार नहीं समझ पाएंगे। उपेंद्र आचार्य जब कार्यालय से अवकाश मुक्त हुए तो उनके स्थान पर आये &#8216;मास्टर साहब&#8217; यानी काली कान्त झा। उस कालखंड में, जब यूएनआई अपने उत्कर्ष की ओर उन्मुख था, उसके इतिहास में शायद यह पहली घटना थी जब दी न्यूजपेपर एंड पब्लिकेशन्स लिमिटेड का प्रतिनिधित्व करते काली कान्त झा दो बार यूएनआई के अध्यक्ष बने थे। साल 1971 और 1972 का कालखंड था। </p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7501" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>यूएनआई के स्थापना के अगले वर्ष 1 अक्टूबर, 1962 को महाराजाधिराज डॉ. कामेश्वर सिंह का निधन हो गया। महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद &#8216;मास्टर साहब&#8217; अपने जीते-जी और सेवाकाल /अवकाश प्राप्त करने के बाद भी, यथासंभव अपने संस्थान के साथ-साथ यूएनआई के स्थापना उद्देश्य की प्राप्ति में भरपूर योगदान दिया। लेकिन कालांतर में यूएनआई के अन्य शेयरधारकों से वह सहयोग नहीं मिल पाया जिसकी अपेक्षा थी। परिणाम यह हुआ की वास्तविक यूएनआई &#8216;उपेक्षित&#8217; होता चला गया और अंततः यह आर पी गुप्ता का हो गया।  </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letyter-1-scaled.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letyter-1-scaled.jpg" alt="" width="1159" height="2560" class="aligncenter size-full wp-image-7512" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letyter-1-scaled.jpg 1159w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letyter-1-136x300.jpg 136w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letyter-1-463x1024.jpg 463w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letyter-1-768x1697.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letyter-1-695x1536.jpg 695w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letyter-1-927x2048.jpg 927w" sizes="(max-width: 1159px) 100vw, 1159px" /></a></p>
<p><strong>और उसका ज्वलंत दृष्टान्त विगत दिनों देखा गया जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने शहर के प्रमुख सेंट्रल दिल्ली इलाके में यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया को आवंटित की गई जमीन का आवंटन रद्द करने के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि कोई भी डिफ़ॉल्ट करने वाला लाइसेंसी, जो उस मकसद को ही पूरा करने में नाकाम रहा हो जिसके लिए उसे जमीन आवंटित की गई थी, सरकारी जमीन को &#8220;बंधक&#8221; बनाकर नहीं रख सकता। और शुक्रवार शाम को दिल्ली पुलिस ने रफ़ी मार्ग स्थित यूएनआई के दफ़्तर को सील कर दिया। यह कार्रवाई तब हुई जब दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने अपने 98 पन्नों के आदेश में कहा कि यह न्यूज़ एजेंसी अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में नाकाम रहने के बावजूद, 45 साल से भी ज़्यादा समय से सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा जमाए बैठी थी।</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letyter-2-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letyter-2-scaled.jpg" alt="" width="1848" height="2560" class="aligncenter size-full wp-image-7514" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letyter-2-scaled.jpg 1848w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letyter-2-217x300.jpg 217w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letyter-2-739x1024.jpg 739w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letyter-2-768x1064.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letyter-2-1109x1536.jpg 1109w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-Letyter-2-1478x2048.jpg 1478w" sizes="auto, (max-width: 1848px) 100vw, 1848px" /></a></p>
<p>न्यायालय ने कहा कि यह ज़मीन असल में न्यूज़ मीडिया संगठनों के लिए एक कॉम्प्लेक्स ऑफ़िस बनाने के मकसद से आवंटित की गई थी, लेकिन दशकों तक इस पर कोई निर्माण कार्य नहीं हुआ। यूएनआई ने 2023 में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफ़िस द्वारा जारी उस पत्र को चुनौती दी थी जिसमें शर्तों का उल्लंघन करने के आधार पर उसका आवंटन रद्द कर दिया गया था। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि इतने सालों में कई बार आवंटन पत्र जारी किए जाने और कई मौके दिए जाने के बावजूद, न तो निर्माण कार्य शुरू करने के लिए कोई ठोस कदम उठाया गया और न ही आवंटन की शर्तों का पालन किया गया।</p>
<p>न्यायालय ने कहा, &#8220;याचिकाकर्ता को अलग-अलग अलॉटमेंट पत्रों के ज़रिए जो अधिकार दिए गए हैं, वे एक &#8216;सामान्य लाइसेंसी&#8217; के अधिकारों जैसे ही हैं। ज़ाहिर है कि याचिकाकर्ता का लाइसेंस कभी भी रद्द किया जा सकता है, खासकर तब जब वह मकसद ही 45 साल से भी ज़्यादा समय से पूरी तरह से अधूरा पड़ा हो, जिसके लिए उसे यह लाइसेंस दिया गया था।&#8221; असल में, न्यायालय का मानना था कि लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफ़िस ने यूएनआई को लगातार डिफ़ॉल्ट करने और अपनी जिम्मेदारियों को पूरा न करने के बावजूद, ज़रूरत से ज़्यादा और असामान्य रियायतें दीं।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7502" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>न्यायालय का मानना था कि &#8220;आवंटन रद्द करने का आदेश बिल्कुल सही है, क्योंकि इसमें इस बात का ध्यान रखा गया है कि याचिकाकर्ता इमारत बनाने में पूरी तरह से नाकाम रहा है और उसकी तरफ़ से लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं की गई, जिसका कोई उचित स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया।&#8221; न्यायालय ने आगे कहा कि इस मामले के तथ्यों से एक ऐसी स्थिति सामने आती है, जिसमें एक लाइसेंसी ने दशकों तक अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा न करके, सरकारी ज़मीन को असल में बंधक बनाकर रखा हुआ था। खैर।</strong> </p>
<p>बहरहाल, आज पटना ही नहीं, दिल्ली ही नहीं, भारत के किसी भी कोने में अगर संपादक की कुर्सी पर बैठे वरिष्ठतम पत्रकार इस बात को स्वीकार करेंगे कि अपने स्थापना काल से लेकर उस कालखंड तक, जब यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इण्डिया अधोगति की ओर उन्मुख हुआ, या अनेकानेक कारणों से उन्मुख होने लगा था, यूएनआई द्वारा जारी समाचार या लेख का एक-एक शब्द सत्यता की तराजू पर जितना जांचा-परखा, नपा-तौला होता था, उतना देश की किसी भी समाचार एजेंसी का नहीं था। </p>
<p>इस बात का जिक्र यहाँ इसलिए कर रहा हूँ कि अगर यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया को बचाने के क्रम में सबसे पहले इसके शेयर होल्डर्स आगे आये होते तो शायद आज अपने स्थापना के 65 वे वर्ष में, अपने पहली कहानी के निर्गत होने के 65वें वर्ष में यूएनआई कार्यालय के दफ्तर से देर रात पत्रकारों को, गैर पत्रकारों को, अधिकारियों को, चपरासियों को दिल्ली पुलिस बाहर नहीं निकाल पाती। इसमें दिल्ली पुलिस को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। उसे जो आदेश निर्गत हुआ, वह उसका पालन कर रहा था। लेकिन यूएनआई के स्थापना काल अथवा उसके कुछ समय बात तक भी यूएनआई के शेयर होल्डरों ने जो लुक्का-छिप्पी की राजनीति कर इस संस्थान में कार्य करने वाले हज़ारों कर्मियों और उनके परिवारों के साथ क्रूर मजाक किये।</p>
<p><strong>यूएनआई के शेयर होल्डरों में 27 लोगों/संस्थाओं का नाम है। यह नाम कोई साधारण नाम नहीं, बल्कि भारतीय पत्रकारिता में अपना हस्ताक्षर है। एसोसिएटेड पब्लिशर्स, 856/57, अन्ना सलाई, चेन्नई-600002, सर्वेन्ट्स ऑफ़ दी पीपुल्स सोसाइटी (दी समाज), गोपबंधु भवन, बक्शी बाजार, कटक; श्री जी कस्तूरी, दी हिन्दू, कस्तूरी बिल्डिंग्स, माउन्ट रोड, चेन्नई-600002; मोहम्मद यूनुस, एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड, हेराल्ड हॉउस, बहादुरशाह ज़फर मार्ग, ने दिल्ली- 110002; राम एस तरनेजा और रानी एस टरनेजा, फ्लेट-2012, प्लेनेट गोदरेज, एक्वा टावर-II, केके मार्ग, जैकब सर्किल, महालक्ष्मी, मुंबई-400001; दी स्टेट्समैन लिमिटेड, 4 चौरंगी स्क्वायर, कोलकाता-700001; बैनेट, कोलेमन एंड कंपनी लिमिटेड, डॉ. डीएन रोड, मुंबई-400001; मणिपाल मीडिया नेटवर्क लिमिटेड, उदयवाणी बिल्डिंग्स, मणिपाल-576119 (एसके); दी प्रिंटर्स (मैसूर) लिमिटेड, 16-महात्मा गाँधी रोड, बंगलोर-560001; नवा समाज लिमिटेड, 37-फार्मलैंण्ड लेआउट्स, रामदास पथ, नागपुर-440010; आनंद बाजार पत्रिका लिमिटेड, 6 &#8211; प्रफुल्ल सरकार स्ट्रीट, कोलकाता-700001; एचटी मिडिया लिमिटेड, हिंदुस्तान टाइम्स हॉउस, 18-20, कस्तूरबा गाँधी मार्ग, नई दिल्ली-110001; सकाळ पेपर प्राइवेट लिमिटेड, 595-बुधवार पथ, पुणे-411002; जुगांतर लिमिटेड, १४, आनंद चटर्जी लें, कोलकाता-700003; अमृत बाजार पत्रिका लिमिटेड, ९-इनिडा एक्सचेंज प्लेस, ७वां तल्ला, रम नंबर-1 ए, कोलकाता-700001; नेव्स्पपेर्स एंड पब्लिकेशंस लिमिटेड, मजहरुल हक़ पथ, पटना; दी इंडियन एक्सप्रेस लिमिटेड, एक्सप्रेस टावर, नरीमन पॉइंट, मुंबई-440021; नव भारत, नव भारत भवन, पीबी नंबर-382, नागपुर-440018; श्री अविक कुमार सरकार, C/o एबीपी लिमिटेड, 6-प्रफुल्ला सर्कार स्ट्रीट, कोलकाता-700001; एक्सप्रेस पब्लिकेशंस (मदुरै) लिमिटेड, एक्सप्रेस गार्डन्स, 29, 2मेन रोड, अम्बत्तूर इंडस्ट्रियल एस्टेट, चेन्नई-208005; श्री तुषार काँटी घोष, अमृत बाजार पत्रिका लिमिटेड, 72-1, बाघ बाजार स्ट्रीट, कोलकाता-700003; श्री एससी रॉय, 36, न्यू रोड, अलीपोल, कोलकाता-700021; श्री पीसी गुप्ता, जागरण प्रकाशन लिमिटेड, 2-सर्वोदय नगर, कानपूर; श्री संतोष नाथ, हिंदुस्तान टाइम्स लिमिटेड, कस्तूरबा गाँधी मार्ग, नई दिल्ली-110001 और मेसर्स राइटर्स एंड पब्लिसर्स लिमिटेड, जी-3ए, कानन वाले चैम्बर्स, मोगलाम, माहिम वेस्ट, मुंबई-400006 </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7503" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>इन 27 शेयर होल्डरों में 17वां नाम &#8216;न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशंस लिमिटेड, मजहरुल हक़ पथ, पटना-800001&#8217; का है। यह प्रकाशन दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह का था। यूएनआई के स्थापना के अगले वर्ष 1 अक्टूबर, 1962 को महाराजा अंतिम सांस लिए। महाराजा संतानहीन थे। अगर महाराजा की मृत्यु के बाद दरभंगा राज के लोग &#8211; जो उनकी संपत्ति के भागीदार हुए &#8211; यूएनआई की गरिमा के साथ महाराजा की गरिमा को बचने के लिए आगे आये होते, तो शायद कल का वास्तविक यूएनआई, आज का &#8216;गुप्ता जी के यूएनआई&#8217; नहीं होता। </p>
<p><strong>बहरहाल, दस्तावेजों के अनुसार, 14.12.1979 को भूमि और विकास कार्यालय (L&#038;DO), भारत सरकार द्वारा यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया के पक्ष में एक आवंटन पत्र जारी किया गया था, जिसके द्वारा 9, रफी मार्ग, नई दिल्ली में स्थित भूमि आवंटित की गई थी। उक्त पत्र में भूखंड का क्षेत्रफल 1.453 एकड़ (0.588 हेक्टेयर) दर्ज किया गया था। यह आवंटन न केवल यूएनआई के लाभ के लिए किया गया था, बल्कि चार अन्य सहभागी समाचार मीडिया संस्थानों &#8211; प्रेस एसोसिएशन ऑफ इंडिया, प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, समाचार भारती और हिंदुस्तान समाचार &#8211; के संबंध में भी किया गया था; इसका उद्देश्य एक संयुक्त कार्यालय परिसर का निर्माण करना था, जिसमें उक्त समाचार मीडिया संगठनों के कार्यालय स्थित हो सकें।</strong></p>
<p>पत्र (भारत सरकार, कार्य और आवास मंत्रालय, भूमि और विकास कार्यालय, निर्माण भवन सं. L.II.1(576)/78, नई दिल्ली, दिनांक 14 दिसंबर 1979) में कहा गया था &#8220;मुझे यह कहने का निर्देश दिया गया है कि राष्ट्रपति महोदय ने यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया को &#8211; यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया तथा चार अन्य सहभागी समाचार मीडिया, यथा प्रेस एसोसिएशन ऑफ इंडिया, प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, समाचार भारती और हिंदुस्तान समाचार की ओर से &#8211; रफी मार्ग, नई दिल्ली पर स्थित लगभग 1.453 एकड़ या 0.588 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले भूखंड (जैसा कि संलग्न L&#038;DO की योजना सं. 3453 में दर्शाया गया है) के आवंटन को मंजूरी प्रदान की है; यह आवंटन इन समाचार मीडिया संस्थानों के कार्यालयों को समायोजित करने हेतु एक संयुक्त कार्यालय परिसर के निर्माण के लिए किया गया है।&#8221; </p>
<p>पत्र में यह भी कहा गया कि &#8220;यह आवंटन &#8216;पट्टे और शाश्वत पट्टे के समझौते&#8217; में दी गई शर्तों और निबंधनों के अधीन है। 08.08.1980 को, दिनांक 14.12.1979 के उपर्युक्त आवंटन पत्र में संशोधन किया गया, जिसके तहत प्लॉट के क्षेत्रफल के साथ-साथ उससे संबंधित देय प्रीमियम और ज़मीनी किराए के संबंध में कुछ छोटे-मोटे बदलाव किए गए। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7504" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>14.12.1979 की आवंटन चिट्ठी के अनुसार, याचिकाकर्ता को जमीन का औपचारिक कब्जा सौंपे जाने की तारीख से दो साल के अंदर प्रस्तावित इमारत का निर्माण पूरा करना ज़रूरी था। इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि याचिकाकर्ता द्वारा 14.12.1979 की आवंटन चिट्ठी में दी गई शर्तों के अनुसार इमारत/मिश्रित कार्यालय परिसर के निर्माण की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया था। इसके बावजूद, 07.11.1986 की एक संशोधित आवंटन चिट्ठी जारी की गई, जिसने 08.08.1980 की पिछली कार्यालय चिट्ठी संख्या L-I-II-I(576)/78 का स्थान ले लिया।</p>
<p><strong>पत्र के अनुसार, &#8216;इस कार्यालय के पत्र संख्या L-1(576)/78 दिनांक 8.8.80 को रद्द करते हुए, मुझे यह कहने का निर्देश दिया गया है कि राष्ट्रपति महोदय ने यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया, प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया और प्रेस एसोसिएशन के लिए एक संयुक्त कार्यालय परिसर के निर्माण हेतु, रफ़ी मार्ग, नई दिल्ली पर 1 एकड़ जमीन के एक भूखंड के आवंटन को मंजूरी देने की कृपा की है। यह आवंटन &#8216;समझौता ज्ञापन&#8217; और &#8216;स्थायी पट्टा&#8217; में दी गई शर्तों और निबंधनों के अधीन है, जिसमें निम्नलिखित बातें भी शामिल की गयी: (i) साइट के आवंटन की तारीख इस पत्र की तारीख मानी जाएगी और इस आवंटन के संबंध में सभी भुगतान, कब्ज़ा सौंपने के प्रस्ताव की तारीख या कब्ज़ा लेने की तारीख—इनमें से जो भी पहले हो—उस तारीख से देय हो जाएंगे। (ii) यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया, प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया और प्रेस एसोसिएशन को, जिस तारीख से पक्षों को जमीन में प्रवेश करने की अनुमति दी जाती है, उस तारीख से 24 महीनों के भीतर, क्षेत्र के वास्तुशिल्प परिवेश के अनुरूप भवन का निर्माण करना आवश्यक होगा। (iii) उक्त समाचार मीडिया को ज़मीन के लिए सुरक्षा राशि 3 लाख रुपये प्रति एकड़ की रियायती दर पर और लाइसेंस शुल्क सुरक्षा राशि का 2.1% प्रति वर्ष की दर से भुगतान करना आवश्यक होगा। पट्टा-धारण अधिकार  प्रदान किए जाने पर, सुरक्षा राशि को ज़मीन के लिए &#8216;प्रीमियम&#8217; माना जाएगा और उक्त समाचार मीडिया प्रीमियम के 2% की दर से वार्षिक ज़मीनी किराया देने के लिए उत्तरदायी होगा।</strong></p>
<p>यह भी उद्धृत किया गया कि ये मीडिया यूनिट्स आपस में एक समझौता करेंगी कि वे निर्माण की लागत किस आधार पर साझा करेंगी। इस समझौते में अन्य संबंधित मामलों का भी प्रावधान होगा, जिसमें निर्माण की व्यवस्था, संपत्ति का प्रबंधन आदि शामिल हैं। वे इस समझौते की तीन प्रतियां इस कार्यालय को भेजेंगी, और ये प्रतियां लाइसेंस समझौते (यानी, सरकार के साथ उनके द्वारा किए जाने वाले समझौता ज्ञापन) का हिस्सा बनेंगी। इस आवंटन के तहत सरकार को सुरक्षा राशि/लाइसेंस शुल्क/प्रीमियम/भूमि किराया और अन्य बकाया राशियों के भुगतान की जिम्मेदारी संयुक्त और पृथक होगी।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7505" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>जिन मीडिया यूनिट्स को संयुक्त रूप से भूमि आवंटित की गई है, वे उस भूमि को सीमांकन द्वारा विभाजित करने या उस पर संबंधित पक्षों के हिस्से को अलग से चिह्नित करने के हकदार नहीं होंगे। यदि इस संयुक्त आवंटन के पक्षों द्वारा कोई उल्लंघन किया जाता है, तो पुनः प्रवेश का अधिकार केवल भवन के उस हिस्से तक और चूक करने वाले पक्ष के भूमि में अविभाजित हित तक ही सीमित रहेगा। यह भी कहा गया कि भवन योजना पर स्पष्ट रूप से दर्शाएंगे कि इस आवंटन के तहत प्रत्येक पक्ष को कितनी जगह आवंटित की गई है, और उसे सरकार को भेजेंगे। यह योजना सरकार और पक्षों के बीच होने वाली पट्टा विलेख का हिस्सा बनेगी।</p>
<p><strong>यह भी उल्लेख किया गया कि यदि मीडिया यूनिट्स की आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद कोई अतिरिक्त जगह बच जाती है, तो सरकार को यह अधिकार होगा कि वह किसी अन्य समाचार संगठन को जगह खरीदने या उस संयुक्त कार्यालय भवन में आवास किराए पर लेने के लिए प्रायोजित करे। भूमि का उपयोग केवल उसी उद्देश्य के लिए किया जाएगा जिसके लिए इसे आवंटित किया गया है; पट्टादाता की पूर्व अनुमति के बिना इसका उपयोग किसी अन्य उद्देश्य के लिए बिल्कुल भी नहीं किया जाएगा। इस ज़मीन पर किसी भी तरह की रिहायशी यूनिट बनाने की इजाज़त नहीं होगी, सिवाय केयरटेकर या चौकीदार की यूनिट के। केयरटेकर या चौकीदार की रिहायशी यूनिट का प्लिंथ एरिया पट्टेदार अपनी पूरी मर्ज़ी से तय करेगा, लेकिन यह चौकीदार के रहने के लिए 34 वर्ग मीटर (365 वर्ग फ़ीट) से ज़्यादा नहीं होगा, और केयरटेकर के रहने के लिए 55.75 वर्ग मीटर (600 वर्ग फ़ीट) से ज़्यादा नहीं होगा।</strong></p>
<p>पत्र में यह भी लिखा गया कि अगर उक्त मीडिया यूनिट्स बनाने वाली कंपनी/सोसायटी/सहकारी सोसायटी बंद हो जाती है या मुनाफ़ा कमाने वाली कंपनी में बदल जाती है, तो सरकार के पास लाइसेंस (समझौता ज्ञापन) को रद्द करने या वापस लेने, या पट्टा विलेख को रद्द करने का अधिकार होगा।  यह तय किया गया था कि आवंटित भूखंड का क्षेत्रफल 1 एकड़ जमीन का संयुक्त आवंटन यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया (50%), प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया (25%) और प्रेस एसोसिएशन (25%) किया जायेगा। </p>
<p>07.11.1986 के आवंटन पत्र में यह प्रावधान था कि उक्त मीडिया संस्थानों को आपस में एक समझौता करना होगा, जिसमें यह तय किया जाएगा कि प्रस्तावित भवन के निर्माण की लागत किस आधार पर आपस में बांटी जाएगी; साथ ही, इसमें अन्य प्रासंगिक मामलों को भी शामिल किया जाएगा, जिनमें संपत्ति के निर्माण, प्रबंधन और रखरखाव की व्यवस्थाएं शामिल हैं। परन्तु, 07.11.1986 के आवंटन पत्र के अनुसार जो आवश्यक कदम उठाए जाने थे, वे नहीं उठाए गए; क्योंकि न तो संबंधित आवंटियों के बीच कोई समझौता किया गया और न ही आवश्यक निर्माण कार्य शुरू करने के लिए कोई कदम उठाया गया।</p>
<p>आगे, 17.06.1999 को जारी एक पत्र के अनुसार, 9, रफी मार्ग, नई दिल्ली में स्थित जमीन प्लॉट का कुल क्षेत्रफल 1.841 एकड़ था, जिसमें से 1 एकड़ जमीन पहले ही यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया, प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया और प्रेस एसोसिएशन को संयुक्त रूप से आवंटित की जा चुकी थी। इस पत्र में आगे शेष 0.841 एकड़ जमीन प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और विदेश व्यापार संयुक्त महानिदेशक, वाणिज्य मंत्रालय को आवंटित करने का प्रस्ताव था। इसमें आगे यह भी परिकल्पना की गई थी कि पूरे प्लॉट पर एक मिश्रित भवन का निर्माण केंद्रीय लोक निर्माण विभाग द्वारा किया जाएगा, जिसमें विभिन्न आवंटिती उक्त आवंटन पत्र में निर्दिष्ट अनुपात में निर्मित स्थान को साझा करने के हकदार होंगे। </p>
<p>परन्तु, 17.06.1999 की आवंटन पत्र की धारा (xi) में निहित शर्त के बावजूद, उक्त भूमि/आवंटित क्षेत्र के संबंध में कोई समझौता ज्ञापन या कोई पट्टा विलेख निष्पादित नहीं किया गया । इसके बाद, उक्त भूमि के संबंध में 27.06.2000 को एक संशोधित आवंटन पत्र जारी किया गया, जो 17.06.1999 के पिछले आवंटन पत्र में आंशिक संशोधन किया गया था, जिसके अनुसार, 5289.52 वर्ग मीटर भूमि के आवंटन की स्वीकृति प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया के पक्ष में समान रूप से किया गया था।  इस पत्र के अनुसार, संयुक्त कार्यालय भवन का निर्माण करना था।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7506" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>आगे, 27.06.2000 एक और पत्र जारी किया गया जिसका उद्देश्य प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया, प्रेस एसोसिएशन और वाणिज्य मंत्रालय के विदेश व्यापार के संयुक्त महानिदेशक के पक्ष में पहले किए गए आवंटनों को रद्द करना था । उक्त पत्र के अनुसार, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को 1244.76 वर्ग मीटर और यूएनआई को 620.76 वर्ग मीटर अतिरिक्त भूमि आवंटित करने का प्रावधान था।  यह आवंटन उस 1400 वर्ग मीटर भूमि के अतिरिक्त थी जो पहले ही प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को आवंटित की जा चुकी थी, और उस 2024 वर्ग मीटर भूमि के अतिरिक्त थी जो पहले ही यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया को आवंटित की जा चुकी थी। पांच साल बाद, L&#038;DO द्वारा 30.03.2005 को यूएनआई को दी गयी 620.76 वर्ग मीटर का वह अतिरिक्त क्षेत्र रद्द कर दिया गया, जो मूल रूप से आवंटित 2024 वर्ग मीटर भूमि के अतिरिक्त आवंटित किया गया था। </strong></p>
<p>09.10.2012 के पत्र के माध्यम से यह बताया गया कि 9, रफी मार्ग, नई दिल्ली में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया के लिए एक मिश्रित भवन के निर्माण हेतु नेशनल बिल्डिंग्स कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड के माध्यम से स्वीकृति प्रदान कर दी है; यह स्वीकृति सेंट्रल पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट के स्थान पर दी गई है, जिसे पहले निष्पादन एजेंसी के रूप में परिकल्पित किया गया था। 20.02.2018 को, यूएनआई ने भूमि और विकास कार्यालय (L&#038;DO) को एक पत्र प्रेषित किया जिसमें यह स्पष्टीकरण मांगा गया था कि क्या यूएनआई, भारतीय प्रेस परिषद और शहरी विकास मंत्रालय के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता किया जाना चाहिए, इस तथ्य को देखते हुए कि तब तक लगभग 620 वर्ग मीटर का अतिरिक्त क्षेत्र CPWD/सरकारी उपयोग के लिए निर्धारित किया जा चुका था। </p>
<p>तीन माह बाद,  यूएनआई ने L&#038;DO को 30.05.2018 को एक रिमाइंडर भेजा, जिसमें उसने इस मामले में स्पष्टीकरण के लिए अपने अनुरोध को दोहराया। इसके बाद, यूएनआई ने L&#038;DO को 09.12.2019 को एक और पत्र भेजा, जिसमें L&#038;DO के कार्यालय में 29.11.2018 को हुई एक बैठक का ज़िक्र किया गया था। उस बैठक में यह बात सामने आई कि 620 वर्ग मीटर का वह अतिरिक्त क्षेत्र, जो पहले याचिकाकर्ता को आवंटित किया गया था और जिसका आवंटन बाद में 30.03.2005 के पत्र के ज़रिए रद्द कर दिया गया था, अब &#8216;प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया&#8217; को आवंटित करने का प्रस्ताव था। इसके परिणामस्वरूप, 620.76 वर्ग मीटर का वह क्षेत्र, अंततः 15.03.2021 के पत्र के जरिए &#8216;प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया&#8217; को आवंटित कर दिया गया।</p>
<p>यानी, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को कुल 3,265.52 वर्ग मीटर का क्षेत्र आवंटित किया गया था, जिसमें 17.06.1999 के पत्र द्वारा आवंटित 1,400 वर्ग मीटर, 27.06.2000 के पत्र द्वारा आवंटित 1,244.76 वर्ग मीटर, और 15.03.2021 के पत्र द्वारा आवंटित 620.76 वर्ग मीटर शामिल थे। इसके विपरीत, यूएनआई के पास 2,024 वर्ग मीटर का आवंटन बना रहा। विशेष रूप से, इस तथ्य के बावजूद कि प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को आवंटित भूमि का विस्तार यूएनआई को आवंटित भूमि से अधिक था। व्यावहारिक तौर पर प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया केवल नाममात्र के कब्जे में रहा, जबकि भूमि के पूरे भूखंड का वास्तविक भौतिक कब्जा यूएनआई के पास ही बना रहा।</p>
<p><strong>यदि देखा जाए तो 9, रफ़ी मार्ग, नई दिल्ली स्थित भूमि के संबंध में समय-समय पर कई आवंटन पत्र जारी किए गए। जिन संस्थाओं के पक्ष में आवंटन की परिकल्पना की गई थी, साथ ही उनमें से प्रत्येक को आवंटित की जाने वाली प्रस्तावित भूमि का विस्तार भी, कई अवसरों पर बदलता रहा। इन घटनाक्रमों के बावजूद, आवंटन का मूल उद्देश्य, यानी उक्त भूखंड पर एक मिश्रित कार्यालय भवन का निर्माण, किसी भी समय पूरा नहीं हो सका। इस बीच, 23.11.2022 के एक पत्र के माध्यम से, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने एक आपत्ति उठाई, जिसमें कहा गया था कि याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर 620 वर्ग मीटर भूमि के उस हिस्से पर एक रेस्तरां/कैंटीन चलाना शुरू कर दिया है, जो प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को आवंटित किया गया था; और यह कार्य उसने बिना किसी पूर्व सूचना के तथा आवंटन को नियंत्रित करने वाले नियमों और शर्तों का उल्लंघन करते हुए किया है।</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-A-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-A-scaled.jpg" alt="" width="2123" height="2560" class="aligncenter size-full wp-image-7507" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-A-scaled.jpg 2123w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-A-249x300.jpg 249w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-A-849x1024.jpg 849w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-A-768x926.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-A-1274x1536.jpg 1274w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-A-1699x2048.jpg 1699w" sizes="auto, (max-width: 2123px) 100vw, 2123px" /></a></p>
<p>इतना ही नहीं, एक हलफनामे से यह पता चलता है कि, उससे भी पहले, यूएनआई ने 24.01.2022 के एक पत्र के माध्यम से, प्रस्तावित भवन के निर्माण के बाद और उसका कब्ज़ा प्राप्त करने के उपरांत, उस भवन के 70% तक हिस्से को व्यावसायिक रूप से पट्टे पर देने की अनुमति मांगी थी। यह कहा गया था कि यूएनआई बहुत ज़्यादा आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा था और उस पर अपने मौजूदा और पुराने कर्मचारियों को देने वाली सैलरी और दूसरे बकाए का काफ़ी बड़ा बोझ जमा हो गया था। हालांकि, यूएनआई ने प्रस्तावित इमारत के बन जाने के बाद उसके एक हिस्से को कमर्शियल तौर पर लीज़ पर देने की जो अनुमति माँगी थी, उसे L&#038;DO ने 29.03.2022 की बातचीत के ज़रिए नामंज़ूर कर दिया।</p>
<p>इस बीच, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया, जिसे ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा अलॉट किया गया था, उस ज़मीन पर मिली-जुली इमारत के तेज़ी से निर्माण के लिए लगातार ज़ोर देता रहा। परन्तु, 18.05.2022 के एक ईमेल के ज़रिए यूएनआई ने बताया कि, मौजूदा आर्थिक हालात को देखते हुए, वह फ़िलहाल प्रस्तावित मिली-जुली इमारत के निर्माण में हिस्सा लेने में असमर्थ है और उसने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया से अनुरोध किया कि या तो वह अपने शेयरधारकों द्वारा प्रस्तावित फ़ंड आने के नतीजे का इंतज़ार करे या फिर ज़मीन के अपने अलॉट किए गए हिस्से पर निर्माण का काम आगे बढ़ाए। </p>
<p>जबकि, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया द्वारा यूएनआई को संबोधित 19.07.2022 की एक चिट्ठी में यह दर्ज है कि प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने कई मौकों पर याचिकाकर्ता से 620 वर्ग मीटर जमीन खाली करने का अनुरोध किया था, जो उसे आवंटित की गई थी। प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने 20.07.2022 के पत्र के ज़रिए L&#038;DO से इस मुद्दे को सुलझाने के लिए एक मीटिंग बुलाने का अनुरोध किया। हालांकि, यह मामला अनसुलझा ही रहा। इसके अतिरिक्त, यह भी संज्ञान में आया है कि L&#038;DO द्वारा 29.09.2022 को लंबित मुद्दों पर विचार-विमर्श करने हेतु बुलाई गई बैठक में यूएनआई उपस्थित नहीं हुआ। </p>
<p>यदि देखा जाए तो यूएनआई कथित तौर पर संपत्ति के एक हिस्से का उपयोग ऐसे उद्देश्यों के लिए कर रहा था, जिसकी परिकल्पना आवंटन की शर्तों के तहत नहीं की गई थी; गंभीर वित्तीय बाधाओं के कारण प्रस्तावित मिश्रित भवन के निर्माण में भाग लेने में अपनी असमर्थता स्पष्ट रूप से व्यक्त कर दी थी; यूएनआई ने यह रुख अपनाया था कि भारतीय प्रेस परिषद, याचिकाकर्ता की भागीदारी के बिना, स्वतंत्र रूप से निर्माण कार्य आगे बढ़ा सकती है; और परियोजना से संबंधित लंबित मुद्दों को सुलझाने के लिए L&#038;DO द्वारा बुलाई गई बैठकों में भाग नहीं लिया। परिणाम यह हुआ कि L&#038;DO द्वारा यूएनआई को दिनांक 12.01.2023 का एक &#8216;कारण बताओ नोटिस&#8217; जारी किया गया। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-B.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-B.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7508" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-B.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-B-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-B-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-B-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-B-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>एक महीने दो दिन बाद यूएनआई ने उपर्युक्त &#8216;कारण बताओ नोटिस&#8217; के संबंध में दिनांक 14.02.2023 को एक &#8216;अस्पष्ट&#8217; और &#8216;मनमाना&#8217; जवाब प्रस्तुत किया। अन्य बातों के साथ-साथ, यह कहा कि चूंकि उस समय उसके पास &#8216;निदेशक मंडल&#8217; (Board of Directors) नहीं था, इसलिए वह उक्त &#8216;कारण बताओ नोटिस&#8217; का समुचित जवाब देने में असमर्थ होगा। इन पृष्ठभूमि के तहत, दिनांक 29.03.2023 का वह विवादित निरस्तीकरण पत्र जारी किया गया, जिसके द्वारा याचिकाकर्ता के पक्ष में किया गया आवंटन रद्द कर दिया गया। बाद में, बैंकरप्सी कोड, 2016 के तहत, यूएनआई के कुछ कर्मचारियों/पूर्व-कर्मचारियों द्वारा, यूएनआई के विरुद्ध कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस शुरू किया गया; यह प्रक्रिया नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल, नई दिल्ली बेंच (कोर्ट-II)  द्वारा दिनांक 19.05.2023 को पारित आदेश के माध्यम से शुरू हुई। परिणामस्वरूप, कोड की धारा 14 के प्रावधानों के अनुसार, एक मोरेटोरियम (स्थगन) लागू हो गया।</strong></p>
<p>इस बीच, 07.11.2023 को, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने एक आवेदन (CM APPL. 58548/2023) दायर किया, जिसमें उसने मौजूदा कार्यवाही में खुद को शामिल करने की मांग की।  साथ ही, यह भी तर्क दिया कि, विचाराधीन ज़मीन के सह-आवंटी होने के नाते, कार्यवाही में उसकी भागीदारी के अभाव में उक्त संपत्ति में उसके अधिकारों की पर्याप्त रूप से रक्षा नहीं हो पाएगी। इसके बाद, चूंकि याचिकाकर्ता को कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस में शामिल कर लिया गया था, इसलिए यूएनआई की ओर से एक आवेदन (CM APPL. 9313/2024) दायर किया गया, जिसमें यह मांग की गई कि IBC के तहत स्थगन अवधि (moratorium period) के समाप्त होने तक मौजूदा कार्यवाही को स्थगित रखा जाए।</p>
<p>कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस की प्रक्रिया NCLT द्वारा 12.02.2025 को पारित एक आदेश के साथ समाप्त हुई, जिसके तहत सफल रिज़ॉल्यूशन आवेदक, यानी &#8216;द स्टेट्समैन लिमिटेड&#8217; द्वारा प्रस्तुत रिज़ॉल्यूशन योजना को मंज़ूरी दे दी गई। तत्पश्चात, 08.07.2025 को, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने एक आवेदन (CM APPL. 39879/2025) दायर किया, जिसमें अन्य बातों के अलावा यह आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता विचाराधीन ज़मीन पर अनधिकृत निर्माण कार्य कर रहा है; इसके साथ ही, यह निर्देश देने की मांग की गई कि उस स्थल (साइट) पर सभी प्रकार के निर्माण कार्य तत्काल रोक दिए जाएं ।</p>
<p>तत्पश्चात, 13.08.2025 को, प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने इसके बाद एक और आवेदन (CM APPL. 50043/2025) दायर किया, जिसमें अन्य बातों के अलावा यह निर्देश देने की मांग की गई कि याचिकाकर्ता को किसी भी प्रकार की बाधा या रुकावट पैदा करने से रोका जाए, अथवा 9, रफी मार्ग, नई दिल्ली स्थित उस ज़मीन के हिस्से तक पहुँचने या उसका उपयोग करने से किसी भी तरह से न रोका जाए, जिसे L&#038;DO द्वारा प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया को आवंटित किया गया है। इन बातों के मद्दे नजर, दिनांक 11.07.2025 और 18.08.2025 के आदेशों के माध्यम से, इस न्यायालय ने भूमि और विकास कार्यालय (Land and Development Office) को निर्देश दिया कि वह संबंधित स्थल का भौतिक निरीक्षण करे, ताकि यह जाँच की जा सके कि क्या वहाँ कोई नया निर्माण हुआ है, और उसके बाद एक स्थिति रिपोर्ट (status report) रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करे।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-C.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-C.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7509" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-C.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-C-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-C-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-C-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/UNI-C-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<blockquote><p>दिनांक 14.07.2025 को, उक्त निरीक्षण किया गया और इस संबंध में एक निरीक्षण/स्थिति रिपोर्ट L&#038;DO द्वारा दिनांक 04.08.2025 को दायर की गई, जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि यूएनआई द्वारा अनधिकृत निर्माण गतिविधियाँ की जा रही थीं, और ऐसी गतिविधियों के परिणामस्वरूप संबंधित भूखंड की प्रकृति में बदलाव आ गया था। 24.09.2025 को, यूएनआई ने CM APPL. 50043/2025 में लगाए गए आरोपों का खंडन करते हुए एक जवाब दाखिल किया, और यह तर्क देने की मांग की कि केवल मरम्मत और नवीनीकरण का काम किया गया था, और संबंधित ज़मीन पर कोई स्थायी ढांचा नहीं बनाया गया था।</p></blockquote>
<p>09.07.2025 को, यूएनआई ने भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष को एक पत्र लिखा, जिसमें उसने तत्काल आधार पर निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने का अपना इरादा व्यक्त किया। इसके बाद, 19.08.2025 के पत्र के माध्यम से, याचिकाकर्ता ने भारतीय प्रेस परिषद को एक और पत्र लिखा, जिसमें उसने भारतीय प्रेस परिषद द्वारा एकतरफा रूप से संपत्ति की स्थिति को बदलने के प्रयास पर आपत्ति जताई; इस प्रयास में संबंधित ज़मीन पर अपना बोर्ड लगाना भी शामिल था। उक्त पत्र में, याचिकाकर्ता ने दावा किया कि पूरी ज़मीन L&#038;DO द्वारा 08.08.1980 के पत्र के माध्यम से &#8216;यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया&#8217; को आवंटित की गई थी।</p>
<p>इसके जवाब में, भारतीय प्रेस परिषद ने 21.08.2025 के पत्र के माध्यम से एक जवाब भेजा, जिसमें यह दावा किया गया कि आवंटन पत्रों में निहित शर्तों के अनुसार निर्माण कार्य न कर पाने का कारण उनकी ओर से हुई चूक थी। इसमें आगे इस बात पर भी ज़ोर दिया गया कि संबंधित ज़मीन में भारतीय प्रेस परिषद की हिस्सेदारी लगभग 62% है, और इसलिए उसे संबंधित ज़मीन पर अपना बोर्ड लगाने का पूरा अधिकार है। जबकि, दिनांक 24.09.2025 की निरीक्षण रिपोर्ट से पुनः यह संकेत मिलता है कि याचिकाकर्ता द्वारा संपत्ति पर कुछ अनधिकृत निर्माण किए गए थे, जो इस न्यायालय द्वारा दिनांक 19.09.2025 को पारित &#8216;यथास्थिति&#8217; (status quo) आदेश का स्पष्ट उल्लंघन है। हालाँकि, यूएनआई ने 24.09.2025 की उक्त निरीक्षण रिपोर्ट पर आपत्ति जताई है और एक जवाब दाखिल करते हुए यह तर्क दिया है कि कोई भी अनाधिकृत निर्माण कार्य नहीं किया गया था, और मौजूदा संरचना पर केवल नवीनीकरण और मरम्मत का काम किया गया था।</p>
<p><strong>सभी तस्वीरें &#8211; संजय शर्मा</strong><br />
<strong>क्रमशः&#8230;..</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/eviction-of-uni-news-agency">पत्रकार, गैर-पत्रकार बिलखते रहे, दरभंगा राज की &#8216;गरिमा&#8217; को बचाने का &#8216;तथाकथित दावा&#8217; करने वाले महाराजा द्वारा स्थापित &#8216;यूएनआई&#8217; को बचाने के लिए ​कभी ​आगे नहीं आये</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/eviction-of-uni-news-agency/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>1</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>नेताओं ने तो हमेशा &#8216;छात्रों&#8217; का इस्तेमाल किया है &#8216;सत्ता के लिए&#8217;, फिर केबी सहाय का गोली कांड हो या जेपी का आंदोलन</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/interview/politicians-always-used-students-for-power</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/interview/politicians-always-used-students-for-power#comments</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 May 2022 14:08:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इंटरव्यू]]></category>
		<category><![CDATA[aaryavart]]></category>
		<category><![CDATA[firing]]></category>
		<category><![CDATA[indiannation]]></category>
		<category><![CDATA[intervyu]]></category>
		<category><![CDATA[kb sahaya]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
		<category><![CDATA[police]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
		<category><![CDATA[shivnath]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=4049</guid>

					<description><![CDATA[<p>पटना : विगत दिनों पटना के एक मित्र किसी बात के सिलसिले में &#8220;सोडा फाउंटेन&#8221; की चर्चा किये। सुनते ही 26 वां स्वाधीनता दिवस का महीना याद आ गया। साल सन 1973 था और अगली सुबह पटना से प्रकाशित &#8216;आर्यावर्त&#8217;, &#8216;इण्डियन नेशन&#8217;, &#8216;सर्चलाइट&#8217;, &#8216;प्रदीप&#8217; अखबार खूब बेचे थे। सुबह-सवेरे पटना के गाँधी मैदान में पटना [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/interview/politicians-always-used-students-for-power">नेताओं ने तो हमेशा &#8216;छात्रों&#8217; का इस्तेमाल किया है &#8216;सत्ता के लिए&#8217;, फिर केबी सहाय का गोली कांड हो या जेपी का आंदोलन</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना : विगत दिनों पटना के एक मित्र किसी बात के सिलसिले में &#8220;सोडा फाउंटेन&#8221; की चर्चा किये। सुनते ही 26 वां स्वाधीनता दिवस का महीना याद आ गया। साल सन 1973 था और अगली सुबह पटना से प्रकाशित &#8216;आर्यावर्त&#8217;, &#8216;इण्डियन नेशन&#8217;, &#8216;सर्चलाइट&#8217;, &#8216;प्रदीप&#8217; अखबार खूब बेचे थे। सुबह-सवेरे पटना के गाँधी मैदान में पटना से बाहर जाने वाले बस यात्रियों के हाथों तो बेचे ही थे, गाँधी मैदान से पटना विश्वविद्यालय के रानी घाट प्राध्यापक आवासीय क्षेत्र तक इतने अखबार बेचे थे कि जेब में &#8216;रेजकी&#8217; (खुदरा पैसा) दोनों तरफ इस कदर लटक गया था, जैसे बारह वर्ष की आयु में &#8216;हाइड्रोसील&#8217; बिमारी हो गया हो। बुशर्ट से &#8216;सेप्टिपिन&#8217; निकालकर जेब में लगा लिया था ताकि मेहनत की कमाई सड़क पर न गिरे। साईकिल की गति भी धीमी गति की समाचार जैसी हो गयी थी। कहने के लिए तो &#8220;छात्रों का कमाल&#8221; था, लेकिन भीड़ में &#8220;छात्र को पहचानना&#8217; मुश्किल ही नहीं &#8216;नामुमकिन&#8217; उस दिन भी होता था, आज तो सार्वभौमिक सत्य है क्योंकि बिहार ही नहीं, देश के कोने-कोने के राजनेता किस करवट बैठकर कुर्सी के लिए &#8216;वायुत्याग&#8217; करेंगे कोई नहीं समझता।</strong> <br />
 <br />
भारत के लाल किले पर 15 अगस्त को झंडोत्तोलन होने से कोई तीन माह पूर्वं, यानी 12 मई, 1947 को पटना के गांधी मैदान के पास तत्कालीन &#8216;एलिफिंस्टन और रीजेंट सिनेमा हॉल&#8217; के बीच दाहिने कोने पर सत्यनारायण झुनझुनवाला एक खुला रेस्तरां खोले। इस रेस्तरां के दाहिने तरफ तो छोटा-मोटा भवन आकार का रेस्तरां था, लेकिन खुले गार्डननुमा मैदान में टेबुल-कुर्सी लगी होती थी। शाम के समय पटना के लोग बाग़, संभ्रांत महामानव सहित, यहाँ सपरिवार आकर जलपान, चाय, काफी, या अन्य भोज्य पदार्थों का आनंद लेते थे। पटना शहर में एक विशेष जगह बन गया था यह स्थान।</p>
<p>झुनझुनवाला साहेब लन्दन से एक मशीन मंगाए थे &#8211; नाम था सोडा फाउंटेन &#8211; और उसी मशीन के नाम पर इस रेस्तरां का नामकरण हो गया। क्या रिक्शावाला, क्या बस वाला, क्या नेता, क्या मंत्री, क्या छात्र, क्या अध्यापक, क्या डाक्टर, क्या व्यापारी, क्या हज़ामत बनाने वाला &#8211; सभी इस रेस्तरां के ग्राहक थे। गाँधी मैदान के इस छोड़पर &#8216;सोडा फाउंटेन&#8217; और &#8216;खादी ग्रामोद्योग&#8217; दोनों &#8216;आइकॉन&#8217; बन गया था। सत्ताईस अगस्त, 1973 की रात में झुनझुनवाला साहेब पूरे दिन की बिक्री का हिसाब-किताब कर &#8216;गद्दी&#8217; से उतड़े अगली सुबह दूकान खोलने की तैयारी करने के लिए। अगली सुवह भी सब ठीक-ठाक था। लेकिन इधर सूर्यदेव जैसे-जैसे ब्रह्माण्ड में ऊपर चढ़ रहे थे, &#8216;सोडा फाउंटेन&#8217; का अस्तित्व खतरे की ओर उन्मुख हो रहा था &#8211; शांति पूर्वक। कहीं कोई आभास नहीं था अगले पल क्या होने वाला है। </p>
<p>&#8216;सोडा फाउंटेन&#8217; में खचाखच ग्राहक थे। खुले गार्डेन में गरमा-गरम समोसे, पकौड़ियाँ हरी-हरी चटनियों के साथ लोग बाग़ आनंद ले रहे थे। आसमान में बादल बन रहा था। तापमान भी शारीरिक सहज के अधीन था। तभी &#8216;गद्दी&#8217; (कैश काउंटर) पर बैठे सज्जन की आवाज धीरे-धीरे ऊँची होने लगी थी और सामने खड़े चार-पांच छात्रों की आवाज उस आवाज को दबाते, ऊपर उठ रहा था। मामला महज &#8216;साढ़े-सात&#8217; रुपये की पिछले बकाये राशि की थी जिसे गद्दी पर बैठे महानुभाव सामने खड़े ग्राहक से मांग रहे थे। इसलिए कहते हैं &#8220;उधार प्रेम की कैंची है।&#8221;</p>
<p>ग्राहक पटना विश्वविद्यालय के छात्र थे और गद्दी पर बैठे सज्जन से गलती यह हो गई कि वे &#8220;पटना के छात्र&#8221; से &#8220;बकाये पैसे मांग लिए&#8221; &#8211; देखते ही देखते वह &#8216;साढ़े सात रुपये की राशि सोडा फाउंटेन के लिए साढ़ेसाती बन गया। पहले मुंह चल रहा था, फिर हाथ चला, फिर हॉस्टल के कमरों में लगी मच्छरदानी का डंडा, फिर असली डंडा, फिर हौक्की का डंडा, फिर तोड़-फोड़, फिर माचिस की एक छोटी तिल्ली ने सोडा फाउंटेन का नामोनिशान मिटा दिया। हज़ारों छात्रों के गुस्सा को सोडा फाउंटेन के झुनझुनवाला साहेब नहीं झेल सके। देखते ही देखते &#8216;सोडा फाउंटेन&#8217; अगले दिन प्रकाशित अख़बारों के पन्नों पर तस्वीरों के साथ प्रकाशित हुई। </p>
<p>वैसे कई वर्ष पहले फिर सोडा फाउंटेन अपने स्वरूप में आ गया लेकिन कल सोडा फाउंटेन के संस्थापक सम्मानित श्री सत्यनारायण झुनझुनवाला साहेब के पोते श्री समीर झुनझुनवाला से बात करने की कोशिश किये ताकि उन्हें कहानी में समेट सकूँ, वे बहुत व्यस्त थे। कहते हैं: &#8220;सन्डे से पहले तो बात हो ही नहीं सकती, बहुत अधिक व्यस्तता है।&#8221; मैं उनकी बातों का सम्मान करते फोन रख दिया। अब उन्हें कैसे कहते कि &#8216;हम भी बेरोजगार नहीं हैं। देश में शब्दों की कीमत भले नहीं हो, विद्यार्थियों की कीमत आज भी है।&#8221; खैर। </p>
<p><strong>&#8216;सोडा फाउंटेन&#8217; के पास एक घटना सं 1973 की घटना से भी अधिक कष्टदायक थी जब साथ चल रहे एक छात्र के सिर पर बिहार की पुलिस गोली अचानक टकराती है। गोली अपना काम कर जाती है। कुछ सेकेण्ड पहले हँसते छात्र का शरीर &#8216;पार्थिव&#8217; हो जाता है। तक़रीबन 59 राउंड गोलियां चलाई गई थी तत्कालीन बिहार पुलिस के द्वारा और बुद्ध &#8211; महावीर &#8211; गुरु गोविन्द सिंह &#8211; चाणक्य &#8211; चन्द्रगुप्त &#8211; कुंवर सिंह के बिहार का नेतृत्व कर रहे थे बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय और साल सन 1967 था और जनवरी महीना का 5 तारीख । कहते हैं इस गोली कांड के बाद बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय यानी केबी सहाय कभी राजनीतिक गलियारे में नहीं दिखे, सत्ता और शासन की बात तो मीलों दूर। </strong></p>
<p>उस गोलीकांड का चश्मदीद गवाह थे तत्कालीन &#8216;दी इण्डियन नेशन&#8217; अखबार के संवाददाता श्री जनार्दन ठाकुर, असित सेन और किशोर जी। असित सेन और किशोर जी &#8216;छायाकारी&#8217; का भी कलाकारी जानते थे। कितने लोग मरे उस गोली कांड में, यह तो &#8216;माँ गंगा&#8217; भी नहीं बता सकी जिनके आँगन में तत्कालीन प्रशासन के प्रशासक पार्थिव शरीरों को उठाकर गंगा को समर्पित कर रहे थे। लेकिन असित सेन और किशोर जी&#8217; का कैमरा सब कुछ देख रहा था। </p>
<p>जिस छात्र के सिर पर गोली लगी थी, उसके &#8216;सहपाठी&#8217; से आज <strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> बात किया। दोनों पटना के अशोक राजपथ पर स्थित टी के घोष अकादमी का छात्र थे। उस दिन दोनों घर के कुछ कार्य करने के लिए गांधी मैदान की ओर आये थे और कार्य समाप्त करने के बाद &#8216;हँसते-खेलते&#8221; घर जा रहे थे। सत्तर+ वर्षीय अशोक कुमार झा उस घटना को याद करके आज भी हरकम्पित हो गए। अशोक जी &#8216;दी इण्डियन नेशन&#8217; अखबार के तत्कालीन &#8216;एसोसिएट एडिटर&#8217;, जो बाद में संपादक भी बने और बिहार की पत्रकारिता में अपना हस्ताक्षर भी किये, दिवंगत श्री दीनानाथ झा के पुत्र हैं। पेशे से पटना उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। </p>
<p>अशोक जी कहते हैं: &#8220;के बी सहाय के गोलीकांड के सामने सोडा फाउंटेन की सं 1973 की घटना तो नगण्य है। सन 1973 में तो एक जिद ने सोडा फाउंटेन को नेस्तनाबूद कर दिया। उस घटना में कोई मरा नहीं। लेकिन उस गोली कांड में कितने लोग मरे, आज तक कोई नहीं जान पाया है। मैं अपने मित्र के साथ बात करते चला जा रहा था। नवमी कक्षा में पढता था। आस-पास कुछ भीड़-भाड़ अवश्य थी, काफी संख्या में लोग एकत्रित भी थे, खासकर खादी ग्रामोद्योग के पास, लेकिन उस क्षण तक यह अंदाजा नहीं था कि कुछ क्षण बाद क्या होने वाला है। अचानक भगदड़ हुई। खादी ग्रामोद्योग को अग्नि को सुपुर्द कर दिया गया। तभी मेरे साथ चलते मित्र का शरीर खून से लथपथ जमीन पर गिर गया। उसके माथे में गोली लगी थी। सभी भाग रहे थे। हम भी अपने बाए हाथ भागे जो आगे एक बड़ा नाला की ओर जाता था।&#8221;</p>
<p>अशोक जी आगे कहते हैं: &#8220;उस समय किसी को भी यह होश नहीं था कि नाले की गहराई कितनी है &#8211; एक तरह से जलियाँवाला बाग़ के उस कुएं जैसा था। यही नाला आगे अशोक राज पथ को लांघते, बी एन कालेज छात्रावास के बगल से तत्कालीन अंटाघाट होते गंगा में मिलती थी, आज भी मिलती हैं। सैकड़ों लोग कूदे थे उस नाले में। पैर में चप्पल कहीं रास्ते में ही निकल गया था। पूरा शरीर नाले की गंदगी से तर-बतर था। उन दिनों न तो सुलभ शौचालय जन्म लिया था और ना ही सफाई-स्वच्छता शब्द का राजनीतिकरण, व्यवसायीकरण हुआ था। उसी नाले में पैखाना भी फेका था। कई घंटों के बाद बाकरगंज की पतली गली के रास्ते, उस समय के इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भवन के पीछे से, गलियों से रोते-बिलखते एग्जिविशन रोड के नुक्कड़ पर पहुंचे थे। फिर बाएं हाथ लालजी टोला के लिए बढे।&#8221;</p>
<p>झा साहब कहते हैं: &#8220;लालजी टोला में नुक्कड़ पर भारतीय वायु सेना का दफ्तर था और गली आगे जहाँ बाएं मुड़ती थी, &#8216;पैरागाओं ड्रिंक्स&#8217; का दफ्तर था। उस गोली कांड का प्रभाव पूरे पटना शहर पर अब तक हो गया था। पूरा शहर पुलिस की गिरफ्त में थी तो जरूर, लेकिन उपद्रवकारियों का क्रिया कलाप भी कम नहीं था। अब तक &#8216;पैरागाओं ड्रिंक्स&#8217; का हज़ारों बोतल सड़क पर, दफ्तरों के शीशों पर टूट चुके थे। यहाँ से मेरा घर अधिक दूर नहीं था, फिर भी पैर में चप्पल नहीं होने के कारण और गली-सड़क पर शीशे का कार्पेट बिछा होने के कारण चलना मुश्किल था। उधर, घर पर कोहराम मचा हुआ था। मरने वालों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ रही थी। माँ गली में खड़ी थी। पिताजी दफ्तर में थे। मोहल्ले के लोग चिंतित थे। उस गली का मैं एकमात्र बच्चा था जो अब तक बाहर था। जैसे ही माँ मुझे देखी, मेरी ओर दौड़कर मुझे पकड़ी और बिना मेरी दशा को देखे मारना शुरू कर दी। बहुत मार लगी थी उस शाम। आज भी जब उस घटना को याद करता हूँ, मन भर जाता है।&#8221;</p>
<p>अशोक जी कहते हैं: &#8220;उस ज़माने के ही नहीं, उसके बाद आज तक शायद जो पत्रकारिता &#8216;जनार्दन ठाकुर जी किये थे, उस गोली कांड और उसके बाद का, शायद अब तक किसी भी पत्रकार ने नहीं किया होगा। उस समय का &#8216;बेस्ट इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म&#8217; था। ठाकुर जी, असित सेन और किशोर जी उस समय के बहुत ही बेहतरीन पत्रकार-छायाकार थे। जनार्दन ठाकुर तो मुख्यमंत्री कार्यालय से कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों को निकालकर अपने अखबार में प्रकाशित किये थे। जनार्दन ठाकुर &#8211; असित सेन का रिपोर्टिंग इतना भयावह था कि के.बी. सहाय की कुर्सी तो गई ही, वे कभी प्रदेश की राजनीतिक गलियारे में दिखे भी नहीं। इस घटना के बाद ही जनार्दन ठाकुर दिल्ली की ओर कूच किये और असित सेन भी बिहार की सीमा रेखा से बाहर निकल गए। जनार्दन ठाकुर पटना से प्रकाशित &#8216;सर्चलाइट&#8217; अखबार में पत्रकारिता प्रारम्भ किये थे। साल 1959 था। बाद में &#8216;इण्डियन नेशन&#8217; आये और फिर आगे आनंद बाजार पत्रिका समूह के रास्ते भारतीय पत्रकारिता का एक स्तम्भ बन गए। सत्तर के दशक में राजनेताओं और अधिकारियों द्वारा किस कदर सत्ता का दुरुपयोग किया गया, उनके द्वारा लिखित &#8220;ऑल द प्राइम मिनिस्टर मैन&#8221; गवाह है। जनार्दन ठाकुर का देहांत 12 जुलाई, 1999 को हुआ।&#8221;</p>
<p>कहा जाता है कि कामराज प्लान के अधीन सं 1963 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विनोदानंद झा मुख्यमंत्री कार्यालय से बाहर निकाले गए। उनके इस्तीफे से पटना की राजनीति गर्म हो गयी।  तत्कालीन नेताओं ने अपना-अपना पासा फेंकना शुरू कर दिया। झा जी को सत्ता के गलियारे में चक्कर लगाना चाहते थे। पूरे प्रकरण को अपने हाथ में रखना चाहते थे। वे मुख्यमंत्री पद के लिए वीरचंद पटेल का पासा फेंके तो सही, लेकिन दूसरे ही क्षण उन्हें ऐसा लगा कि पटेल साहब &#8216;गुजरात&#8217; से नहीं बल्कि बिहार के कुर्मी समुदाय से आते हैं। उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि वीरचंद के नाम पर सभी पिछड़ा वर्ग के लोग एकजुट हो जाएंगे। साथ ही, ब्राह्मण समुदाय भी उनके साथ खड़ा रहेगा। लेकिन खेल तो आकर्षण-विकर्षण का था। तत्कालीन राजपूत समुदाय के नेता सत्येंद्र नारायण सिंह पटेल साहब के नाम पर सहमत नहीं थे। भूमिहार समुदाय के महेश प्रसाद सिन्हा भी मौका के फ़िराक में थे। </p>
<p>समय बदल रहा था। ब्राह्मण, राजपुत, भूमिहार, पिछड़ा, अगला सभी सुतुर्मुर्ग की तरह एक पैर पर खड़े थे। कई लोग के बी सहाय के पक्ष में खड़े दिखने लगे। इस बीच, रामलखन यादव पिछड़े वर्ग के विधायकों को एकजुट करने लगे और अंततः  के.बी. सहाय बिहार के चौथे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले लिए। सहाय साहब कोई साढ़े तीन साल मुख्यमंत्री रहे। इस बीच बिहार में &#8216;कनखजूरा&#8217; का उत्पादन भी बढ़ गया था राजनीतिक गलियारे में और दिल्ली में आ गई थी श्रीमती इंदिरा गाँधी। सहाय साहब के विरुद्ध पटना से क़्वींटल के भाव में शिकायतें दिल्ली पहुँचने लगी। उनके मंत्रियों मसलन, रामलखन सिंह यादव, महेश प्रसाद सिन्हा, राघवेन्द्र नारायण सिंह, सत्येन्द्र नारायण सिंह और खुद के बी सहाय पर भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी को बढ़ावा देने का आरोप लग रहा था। </p>
<p>बहरहाल, अन्य वर्षों की तरह उस वर्ष भी तत्कालीन राजनीतिक गलियारे के खिलाड़ियों ने &#8216;बिहार के, खासकर पटना विश्वविद्यालय के छात्रों का प्रयोग किया &#8211; ब्रह्मास्त्र के रूप में। प्रदेश में प्रशासन से जुड़ी सैकड़ों मुद्दे थे, लेकिन छात्रों का उपयोग &#8216;कालेज शुल्क&#8217;, &#8216;वर्ग&#8217;, &#8216;शिक्षकों की उपस्थिति&#8217; आदि बातों पर निशाना साध कर सड़क पर उतार दिया। इस्तेमाल करने वाले राजनेता अपने-अपने घरों में प्राकृतिक आनंद ले रहे थे। किसान, मजदूर, गरीब-गरमा, अर्थहीन, दीन माता-पिता एक उम्मीद से अपने-अपने बेटा-बेटियों को पढ़ने के लिए कालेज भेजे थे। सोचे थे अगर पढ़ लेगा तो जीवन सुधर जायेगा। उन्हें क्या पता कि उनके बाल-बच्चे किताबों से दूर और राजनेताओं के करीब आ गए हैं। खैर। </p>
<p><strong>उस दिन 5 जनवरी था और साल सन 1967- प्रदर्शन शांतिपूर्वक चल रही थी। के बी सहाय का नाम मुख्यमंत्री कार्यालय के बाहर गोदना जैसा लिखा था जो तत्कालीन नेताओं को हजम नहीं हो रहा था। दो दिन बाद, यानी नया साल का मुबारकबाद देने-लेने के बाद (यह कहा जाता है) प्रदर्शन का रुख बदला और पटना के गांधी मैदान के कोने पर खादी भंडार को निशाना बनाया गया। यह भी कहा जाता है कि कुछ लोग (जो तत्कालीन राजनीतिक गलियारे में चहलकदमी करते थे) खादी भंडार के छत से प्रदर्शनकारियों पर, पुलिस पर पत्थर बरसाने लगे और अंदर से ही किसी व्यक्ति ने खादी भंडार में माचिस की एक तिल्ली राजनीति के नाम पर फेंक दी।</strong> </p>
<p>बस क्या था। गोलियां चलने लगी, लोग जख्मी होते गए, कई दर्जन लोगों की सांसे भी बंद हुई। राजनेताओं का क्या &#8211; आज &#8216;विपक्ष&#8217; में हैं, कल &#8216;पक्ष&#8217; में हो गए &#8211; प्रदर्शनकारियों को भरपूर मदद किये &#8216;स्वहित&#8217; में। पटना से दूर केबी सहाय के पैतृक घर हजारीबाग और नवादा में भी हल्ला बोला गया, हमला किया। सहाय &#8216;निःसहाय&#8217; हुए, सरकार गिरी और फिर पटना पश्चिम विधान सभा क्षेत्र से विजय उम्मीदवार महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री कार्यालय में रखी कुर्सी पर विराजमान हुए। केबी सहाय सरकार के भ्रष्टाचार की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस टी एल वेंकटराम अय्यर की अध्यक्षता में एक आयोग बैठाया गया और पटना की सड़कों पर, गली-कूचियों में कुल 330 दिनों तक &#8220;मैय्या-बाबू (महामाया बाबू) जिंदाबाद&#8221; का नारा छोटे-छोटे बच्चे लगते रहे।</p>
<p>इसी क्रम में <strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> पटना के बहुत पुराने छायाकार इश्तियाक अहमद साहब से बात किया। अहमद साहेब पटना में मौर्या के सामने &#8216;डेफोडिल्स स्टूडियो&#8217; का मालिक हैं। अहमद साहेब बनारस के रहने वाले हैं। नेशनल हाई स्कूल, बनारस से मैट्रिक पास किये थे। साल सन 1954 था। अहमद साहेब कहते हैं: &#8220;एक तो मैं पढ़ने में बहुत तेज-तर्राक नहीं था और दूसरे उन दिनों बनारस में पढ़ने के साधन भी नहीं थे हम जैसे गरीब-गुरबा परिवारों के लिए। किसी तरह मैट्रिक पास कर लिए और काम की तलास में जुट गए। जिनसे मिलने जाते थे काम नहीं देते थे और दौड़ाते भी थे। सभी पूछते थे क्या करोगे? जब कहता था कि &#8216;कुछ&#8217; भी काम करूँगा, कुछ बोलते नहीं थे। मन खिन्न हो गया था। परिवार से काम करने का दबाव अलग।&#8221;</p>
<p>इश्तियाक जी कहते हैं कि उन दिनों बनारस में धर्मवीर जी नामक एक व्यक्ति थे। धर्मवीर जी का एक स्टूडियो था। उन दिनों वे पूरे बनारस में सबसे अव्वल थे अपने क्षेत्र में। जब उनके पास पहुंचा तो वे आंखों में आंखें डालकर पूछे &#8211; क्या काम करोगे? फोटोग्राफी सीखोगे? डार्करूम का काम सीखोगे? यह सभी शब्द मेरे लिए बिलकुल नया था। मैं &#8216;हां&#8217; कह दिया और धर्मवीर जी का हो गया, उनके स्टूडियो और डार्क रूम का हो गया। दो साल तक उनसे बहुत कुछ सीखा। इतना सीखा की हम अपने पैर पर खड़े हो सकते थे। आज जो भी हूँ उनके सिख के कारण ही हूँ।&#8221;</p>
<p>अहमद साहेब आगे कहते हैं: सं 1964 में मैं बनारस से पटना आ गया। पूरा इलाका खाली दिखता था। बिहार की राजधानी होने के बाद भी शहर बिलकुल शांत दिखती थी। उन दिनों पटना की सड़कों पर फोटोग्राफर नामक जीव नहीं दीखते थे। अखबार तो छपता ही था &#8211; आर्यावर्त, इण्डियन नेशन, सर्चलाइट, प्रदीप &#8211; और अख़बारों में तस्वीरें भी छपती थी, लेकिन तस्वीर कौन देता था, कौन फोटोग्राफर था, यह नहीं जान पाता था। </p>
<p>&#8220;इसी बीच किसी एक कार्यक्रम में इण्डियन नेशन अखबार के रिपोर्टर केशव कुमार जी से मुलाकात हो गई। केशव जी पटना सिटी के रहने वाले थे। छोटे-नाटे कद के, लेकिन दुरुस्त। व्यायाम वाला शरीर था। एक क्षण में ही वे घुलमिल गए और कहा कि  इण्डियन नेशन में फोटो दोगे ? मेरी वही स्थिति थी कि एक भूखा आदमी को एक रोटी और एक गिलास ठंडा पानी मिल जाय। मेरी आंखें भर आई थी जब वे पूछे थे। उस दिन के बाद से जीवन पर्यन्त वे मेरे &#8216;अभिभावक&#8217; रहे। मैं अन्तःमन से उन्हें प्रणाम करता रहा। उनका सम्मान करता रहा और वे अपने एक छोटे भाई की तरह मुझे संरक्षित करते गए। वे जहाँ भी जाते थे, मुझे मिलाते थे, ताकि आने वाले समय में अगर उन्हें तस्वीर से सम्बंधित कोई कार्य पड़े, मुझे याद करें। डॉ एस एन उपाध्याय, डॉ ए एन पाण्डे, डॉ बी मुखोपाध्याय, डॉ लाला सूर्यनन्दन सभी लोगों से उन्होंने ही मिलवाया और मैं भी जीवन पर्यन्त उनका सेवक बना रहा। किसी को भी किसी भी काम की जरुरत होती थी &#8211; बनारसी को बुलाओ &#8211; कहते थे। &#8221;</p>
<p>इश्तियाक साहब कहते हैं: &#8220;उस दिन यानी 5 जनवरी को जब गांधी मैदान के पास गोलियां चल रही थी, पटना सचिवालय के सामने भी छात्रों का प्रदर्शन, नारे वाजी और अन्य बातें चल रही थी। उन दिनों पुलिस की संख्या भी उतनी अधिक नहीं थी, जितनी आज है। प्रदर्शनकारियों को इस बात की खबर हो गयी थी की गांधी मैदान के पास गोलियां चली है। वे भी उग्र हो रहे थे। लेकिन उग्रता को दबाने के,लिए पुलिस आंसू गैस के गोले छोड़ रही थी। मैं सचिवालय के मुख्य द्वार के पास ही खड़ा था। उन दिनों &#8216;प्रेस&#8217; नाम का कोई हौआ तो था नहीं, सड़क कर्मभूमि होने के कारण लोग नाम से, चेहरे से जानते थे; इसलिए खतरा का कोई प्रश्न नहीं रहता था।&#8221;</p>
<p>कुछ क्षण रुकने के बाद, एक लम्बी सांस लेते इश्तियाक जी कहते हैं: &#8220;लेकिन उस दिन गाँधी मैदान के पास जो भी हुआ वह ह्रदय विदारक था। अगले दिन के अख़बारों में जिस तरह लिखा गया था, एक-एक शब्द ह्रदय को चीर रहा था। मैं उस दिन अपने भगवान् से, अल्लाह से दुआ किये की आने वाले समय में कभी कोई ऐसी घटना नहीं हो। दर्जनों से अधिक माताओं की कोख़ सुनी हो गयी। पिता का पुत्र मृत्यु को प्राप्त किया। केबी सहाय उस गोली कांड के बाद जो गए, फिर नहीं दिखे।&#8221;</p>
<p><strong>बहरहाल, इश्तियाक साहब के पास बिहार के राजनेताओं की तस्वीरों का विशाल भण्डार है। सं 1979 में वे अजय भवन के कोने पर &#8216;बनारस फोटो गैलरी&#8217; नामक एक दूकान खोले। आज उनके दो बेटे हैं फ़ैज़ अहमद और फ़िरोज अहमद। फ़ैज़ साहब को एक बेटा एक बेटी हैं जबकि फिरोज साहव को दो बेटे हैं। बनारस से रिस्ता आज भी है क्योंकि बनारस के बिना तो इस पृथ्वी पर जी ही नहीं सकता लोग, लेकिन इश्तियाक साहब के बाद &#8216;कैमरे&#8217; और फोटो से रिस्ता अगली पीढ़ी को नहीं है। </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/interview/politicians-always-used-students-for-power">नेताओं ने तो हमेशा &#8216;छात्रों&#8217; का इस्तेमाल किया है &#8216;सत्ता के लिए&#8217;, फिर केबी सहाय का गोली कांड हो या जेपी का आंदोलन</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/interview/politicians-always-used-students-for-power/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>2</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>विशेष रिपोर्ट: क्या पाटलिपुत्र बिल्डर के मालिक न्यायालय में &#8216;चुप&#8217; रहकर &#8216;अकेले&#8217; कानून की &#8216;मार को सहन&#8217; करेंगे, अपनी छवि &#8216;नेस्तनाबूद&#8217; होने देंगे या मुंह खोलेंगे ?</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/crime/patliputra-builder-may-open-mouth</link>
					<comments>http://www.aryavartaindiannation.com/crime/patliputra-builder-may-open-mouth#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Sep 2021 06:23:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अपराध]]></category>
		<category><![CDATA[arrest]]></category>
		<category><![CDATA[aryavarta]]></category>
		<category><![CDATA[builder]]></category>
		<category><![CDATA[crime]]></category>
		<category><![CDATA[employees]]></category>
		<category><![CDATA[highcourt]]></category>
		<category><![CDATA[indiannation]]></category>
		<category><![CDATA[laundering]]></category>
		<category><![CDATA[maoney]]></category>
		<category><![CDATA[patliputra]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.aryavartaindiannation.com/?p=3466</guid>

					<description><![CDATA[<p>पटना : पाटलिपुत्र बिल्डर के मालिक अनिल कुमार सिंह, जो अभी प्रवर्तन निदेशालय के गिरफ्त में &#8216;रिमांड&#8217; पर हैं, इतने भी &#8216;सज्जन&#8217; नहीं हैं कि वे प्रवर्तन निदेशालय, न्यायालय और कानून की मार को अकेले अपने गाल पर रसीद होने दें और अपने व्यवसाय को, समाज में अपनी छवि और प्रतिष्ठा को पटना के फ़्रेज़र रोड [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/crime/patliputra-builder-may-open-mouth">विशेष रिपोर्ट: क्या पाटलिपुत्र बिल्डर के मालिक न्यायालय में &#8216;चुप&#8217; रहकर &#8216;अकेले&#8217; कानून की &#8216;मार को सहन&#8217; करेंगे, अपनी छवि &#8216;नेस्तनाबूद&#8217; होने देंगे या मुंह खोलेंगे ?</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना : पाटलिपुत्र बिल्डर के मालिक अनिल कुमार सिंह, जो अभी प्रवर्तन निदेशालय के गिरफ्त में &#8216;रिमांड&#8217; पर हैं, इतने भी &#8216;सज्जन&#8217; नहीं हैं कि वे प्रवर्तन निदेशालय, न्यायालय और कानून की मार को अकेले अपने गाल पर रसीद होने दें और अपने व्यवसाय को, समाज में अपनी छवि और प्रतिष्ठा को पटना के फ़्रेज़र रोड में सार्वजनिक रूप से नशोनाबूद होने दें। इतना ही नहीं, न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशन के द्वारा दिनांक 21 मई, 2014 को कोतवाली थाना में दर्ज प्राथमिकी और कर्मचारी तथा पत्रकार यूनियन द्वारा न्यायालय में पेश अब तक के सभी दस्तावेजों के आधार पर सभी लांछनों को स्वीकार कर लें बिना किसी हलचल के कि उस सम्पूर्ण पैसे के लें-देन में कौन-कौन लोग सम्मिलित थे, जिन्होंने सैकड़ों कर्मचरियों, उनके परिवारों के हकों को मारकर अपने-अपने कमर में पैसे लपेटे थे। स्वाभाविक है दरभंगा के लालकिले से लेकर पटना के महाराजा कॉम्प्लेक्स के पीछे बनी गगनचुम्बी ईमारत में &#8216;उस द्रव्य का इस्तेमाल कर&#8217; फ्लैटों को खरीदने वालों के रास्ते, दक्षिण दिल्ली स्थित कई फ्लैटों में दरभंगा महाराज की सम्पत्तियों से लाभान्वित होने वाले महिला, पुरुष &#8211; सभी हलचल में आ गए होंगे। सवाल अब &#8220;न्यायालय&#8221; का है, सवाल अब &#8220;न्याय&#8221; का है। अब सवाल कई सौ करोड़ का है कि क्या पाटलिपुत्र बिल्डर के मालिक न्यायालय में &#8216;चुप&#8217; रहकर &#8216;अकेले&#8217; कानून की &#8216;मार को सहन&#8217; करेंगे, अपनी छवि &#8216;नेस्तनाबूद&#8217; होने देंगे या &#8216;सच&#8217; बोलने के लिए मुंह खोलेंगे ? </strong></p>
<p>पाटलिपुत्र बिल्डर के मालिक अनिल कुमार तो जानते ही हैं, बस, न्यायालय को अब संतुष्ट होने का समय आ गया है ताकि सैकड़ों कर्मचारियों (कई दिवंगत भी हो गए हैं), उनके परिवारों को, अनाथ, असहाय बाल-बच्चों को पिता द्वारा अर्जित कमाई मिल सके, जीवन के अंतिम वसंत में न्याय मिल सके। उन सभी हतास कर्मचारियों, उनके परिवारों को भारतीय न्यायिक व्यवस्था पर, न्यायालय के न्यायमूर्तियों पर अटूट विस्वास है। यदि न्यायालय की वर्तमान हलचल को देखा जाय तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि आने वाले समय में उस प्राथमिकी में जिन दो अधिकारियों का हस्ताक्षर है, वे भी अपने परिवार और समाज में अपनी छवि को बरकरार रखने के लिए &#8220;मुंह खोलेंगे&#8221; ही न्यायालय के सामने। और जब इतना सब होने को संभावित है ही, फिर दी न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशन के तत्कालीन अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक, उक्त संस्थान के सभी शेयर होल्डर्स, जिन-जिन लोगों ने फ़्रेज़र रोड स्थित उक्त संस्थान की जमीन, भवन की बिक्री में, नए भवनों के निर्माण के बाद शर्तनामा के विरुद्ध फ्लैटों की बिक्री से &#8220;अवैध तरीके से घन अर्जित&#8221; किये हैं, सबों का न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से पंक्तिवद्ध होना स्वाभाविक है। </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/rsz_231.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/rsz_231.jpeg" alt="" width="846" height="1049" class="aligncenter size-full wp-image-3467" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/rsz_231.jpeg 846w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/rsz_231-242x300.jpeg 242w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/rsz_231-826x1024.jpeg 826w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/rsz_231-768x952.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 846px) 100vw, 846px" /></a></p>
<p><strong>अगर ऐसा नहीं होता तो विगत दिनों जिला न्यायालय के जिला न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुनील दत्त मिश्रा के न्यायलय में दी एन एण्ड पी कर्मचारी/पत्रकार यूनियन के वर्तमान कर्ताधर्ता हितचन्द्र झा को न्यायालय में उपस्थित होने का आदेश नहीं जारी किया जाता। उन्हें यह फरमान नहीं दिया जाता कि &#8216;दी एन एण्ड पी के तत्कालीन पत्रकारों, गैर-पत्रकारों, कर्मचारियों के जो भी बाकी-बकियौते हैं, उसका सम्पूर्ण दस्तावेज न्यायालय के सामने प्रस्तुत किया जाए। सूत्रों के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों ने पाटलिपुत्र बिल्डर के सभी बैंक खातों में &#8216;दी एन एण्ड पी कर्मचारी/पत्रकार&#8217; के बकाये भुगतान से सम्बंधित सभी आदान-प्रदान से सम्बंधित दस्तावेजों को देख चुकी है। अधिकारियों ने इस बात से भी आस्वस्त कर लिया है कि शर्तमाना के अनुसार जिस तल्ले और ऊपर के फ्लैटों की बिक्री से मिलने वाली राशि कर्मचारियों के भुगतान के निमित्त था, उन फ्लैटों की बिक्री के बाद आखिर पैसा किसने लिया, किसे भुगतान किया गया अथवा नहीं। </strong></p>
<p>वैसी स्थिति में, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकत है कि &#8220;न्याय&#8221; और &#8220;कानून&#8221; के सम्मानार्थ तथा दी न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशन के सैकड़ों असहाय कर्मचारियों और उनके परिवारों के रक्षार्थ कुमार शुभेश्वर सिंह (अब दिवंगत) के दोनों पुत्र राजेश्वर सिंह तथा कपिलेश्वर सिंह, महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह की तीसरी और अंतिम जीवित पत्नी महारानी अधिरानी कामसुन्दरी &#8211; ये सभी महाराजा की सम्पत्तियों के हिस्सेदार हैं &#8211; को अपना ऐतिहासिक निर्णय देने से पूर्व न्यायालय में उपस्थित होने का आदेश अवश्य देंगे।सन 2002 के करारनामे के अनुसार किसी भी कर्मचारी का भुगतान बकाया नहीं रह पायेगा क्योंकि आर्यावर्त-इण्डियन नेशन भूखंड पर बनने वाली अट्टालिका के द्वितीय तल्ले और उसके ऊपर निर्मित क्षेत्र में 45 फीसदी क्षेत्र, जो मालिक का हिस्सा होगा, प्रतिभूति के रूप में सुरक्षित रखा गया था/है, ताकि सभी कर्मचारियों को जीवित अथवा मरणोपरांत बकाया राशि मिल सके।” लेकिन ऐसा हुआ नहीं। </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/1-1.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/1-1.jpeg" alt="" width="1436" height="1882" class="aligncenter size-full wp-image-3468" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/1-1.jpeg 1436w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/1-1-229x300.jpeg 229w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/1-1-781x1024.jpeg 781w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/1-1-768x1007.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/1-1-1172x1536.jpeg 1172w" sizes="auto, (max-width: 1436px) 100vw, 1436px" /></a></p>
<p>सूत्रों के अनुसार, मनी लाॅन्ड्रिंग के मामले में गिरफ्तार किए गए पाटलिपुत्र बिल्डर लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर अनिल कुमार प्रवर्तन निदेशालय के रिमांड पर है। अनिल कुमार को ईडी ने गिरफ्तार करने के बाद 8 सितंबर को विशेष अदालत में पेश किया था, जहां से न्यायिक हिरासत में लेने के बाद उसे फुलवारी जेल भेज दिया गया था। पाटलिपुत्र बिल्डर अनिल कुमार के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी, रंगदारी, आर्म्स एक्ट, हत्या के प्रयास के करीब एक दर्जन आपराधिक मामले दर्ज हैं। उनपर अवैध तरीके से करीब 12 करोड़ 61 लाख से ज्यादा की चल-अचल संपत्ति अर्जित करने का भी आराेप है। अनिल कुमार के खिलाफ 2014 में पीएमएलए यानी कि प्रोविजन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के अंतर्गत मामला दर्ज किया था। जिसकी जांच चल रही थी। वहीं पाटलिपुत्र ग्रुप ऑफ कंपनी के मालिक और बिल्डर अनिल कुमार सिंह के खिलाफ राजधानी पटना के गांधी मैदान, कोतवाली समेत कई थानों में मामले दर्ज है। ईडी की जांच में यह भी पता चला है कि अनिल कुमार सिंह के द्वारा ब्लैक मनी का काफी रोटेशन किया गया है। </p>
<p><strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम से बात करते हितचन्द्र झा </strong>कहते हैं: &#8220;दिनांक 31 मार्च, 2002 को दी न्यूज पेपर्स एंड पालिकेशन्स लिमिटेड के प्रबंधन, पाटलिपुत्रा बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड, दी एन एंड पी कर्मचारी यूनियन, बिहार पत्रकार यूनियन के अधिकारियों के साथ  “मेमोरेंडम ऑफ़ अग्रीमेंट एंड सेटलमेंट” पर हस्ताक्षर हुआ। करारनामा चार पन्नों का था। प्रबंधन के तरफ से श्री एस एन दास, जो उस दिन निदेशक थे कंपनी के, श्री दिनेश्वर झा, मैनेजर; एम एम आचार्य, एक्टिंग सेक्रेटरी; श्री सी एस झा, एकाउंट्स ऑफिसर हस्ताक्षर किये और क्रेता पाटलिपुत्रा बिल्डर्स के तरफ से कंपनी के निदेशक श्री अनिल कुमार (स्वयं) और उनके एक प्रतिनिधि श्री आनंद शर्मा। दी न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशन लिमिटेड के कर्मचारी यूनियन के तरफ से थे श्री गिरीश चंद्र झा (अध्यक्ष), दिग्विजय कुमार सिन्हा (जेनेरल सेक्रेटरी), श्री एस एन विश्वकर्मा, जॉइंट सेक्रेटरी, श्री रमेश चंद्र झा, जॉइंट सेक्रेटरी और बिहार वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन के तरफ से हस्ताक्षर करता थे श्री शिवेंद्र नारायण सिंह (प्रेसिडेंट), श्री मिथिलेश मिश्रा (एग्जीक्यूटिव) ।&#8221;</p>
<p>ज्ञातव्य हो कि उस करारनामे पर कहीं भी संस्थान के स्वामी / भूखंड के स्वामी दिखाई नहीं दिए। लेकिन दस्तावेजों के आधार पर उक्त संस्थान दि न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशन्स लिमिटेड के शेयरों के बंटबारे में, दरभंगा राज की महिला लाभार्थियों की संख्या पुरुषों की तुलना में अधिक थी । महारानी अधिरानी कामसुन्दरी के साथ महिला लाभार्थियों की संख्या आठ थी, जो 11200 शेयरों की मालकिन थी (मूल्य: 1120000 रुपये); जबकि पुरुष लाभार्थियों की संख्या महज पांच ही थी और वे कुल 8800 शेयरों के साथ (मूल्य: 880000 रुपये) के स्वामी थे। अगर ये महिला लाभार्थीगण चाहती तो &#8220;इतिहास&#8221; लिख देती, परन्तु &#8220;चाहत ही नहीं&#8221; जगी। क्योंकि &#8220;शिक्षा की भूख&#8221; जरुरी है समाज में बदलाव के लिए। दृष्टान्त: अनपढ़, अशिक्षित परिवार में जन्म लेने के बाद भी शिक्षा की भूख &#8220;अहिल्या&#8221; को इतिहास में &#8220;अहिल्याबाई होल्कर&#8221; के नाम से स्वर्णाक्षरों में लिख दिया। अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 1725 में है और उनकी मृत्यु 1795 में। यानी 226 वर्ष का इतिहास आज भारत के बच्चों के मुख पर है। जबकि राज दरभंगा की महिलाओं को महाराजाधिराज की मृत्यु के महज 60 वर्ष बाद ही कोई जानता तक नहीं। </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/2.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/2.jpeg" alt="" width="1359" height="1887" class="aligncenter size-full wp-image-3469" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/2.jpeg 1359w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/2-216x300.jpeg 216w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/2-737x1024.jpeg 737w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/2-768x1066.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/2-1106x1536.jpeg 1106w" sizes="auto, (max-width: 1359px) 100vw, 1359px" /></a></p>
<p><strong>महाराजाधिराज की मृत्यु के बाद कलकत्ता उच्च न्यायालय की देख-रेख में जो भी फेमिली सेटेलमेंट हुआ, उसमें आर्यावर्त &#8211; इण्डियन नेशन &#8211; मिथिला मिहिर पत्र-पत्रिका के प्रकाशक कंपनी दि न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशन लिमिटेड के शेयरों के लाभार्थियों में महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह चैरिटेबल ट्रस्ट को अगर हटा दें, तो महारानी अधिराणी कामसुन्दरी साहब के अलावे, सात महिला लाभार्थी थी। पुरुष लाभार्थियों की संख्या महिलाओं की तुलना में कम थी। इसी फैमिली सेटलमेंट के शेड्यूल iv के अनुसार न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशन्स लिमिटेड के 100 रुपये का 5000 शेयर दरभंगा राज के रेसिडुअरी एस्टेट चैरिटेबल कार्यों के लिए अपने पास रखा। कोई 20,000 शेयर अन्य लाभान्वित होने वाले लोगों द्वारा रखा गया – मसलन: 100 रुपये मूल्य का 7000 शेयर (रुपये 7,00,000 मूल्य का) महरानीअधिरानी कामसुन्दरी साहेबा को मिला।  राजेश्वर सिंह और कपिलेशर सिंह (पुत्र: कुमार शुभेश्वर सिंह) को 7000 शेयर, यानी रुपये 7,00,000 मूल्य का इन्हे मिला। महाराजा कामेश्वर सिंह चेरिटेबल ट्रस्ट को 5000 शेयर, यानी रुपये 5,00,000 का मिला। श्रीमती कात्यायनी देवी को 100 रुपये मूल्य का 600 शेयर, यानि 60000 मूल्य का मिला। इसी तरह श्रीमती दिब्यायानी देवी को भी 100 रुपये मूल्य का 600 शेयर, यानि 60000 मूल्य का मिला। रत्नेश्वर सिंह, रामेश्वर सिंह और राजनेश्वर सिंह को 100 रुपये मूल्य का 1800 शेयर, यानि 180000 मूल्य का मिला। जबकि नेत्रायणि देवी, चेतानी देवी, अनीता देवी और सुनीता देवी को 100 रुपये मूल्य का 3000 शेयर, यानि 3,00,000 मूल्य का मिला। यह सभी शेयर उन्हें इस शर्त पर दिया गया कि वे किसी भी परिस्थिति में अपने-अपने शेयर को किसी और के हाथ नहीं हस्तांतरित करेंगे, सिवाय फैमिली सेटलमेंट के लोगों के। </strong></p>
<p>दस्तावेज के अनुसार पुरुषों की कुल शेयरों की संख्या 8800 थी (मूल्य: 880000 रुपये) जबकि महिलाओं की कुल शेयरों की संख्या 11200 जिसका मूल्य 11200000 था। दरभंगा राज के इतिहास में यह भी दर्ज किया जायेगा कि  सर कामेश्वर सिंह द्वारा अपने मृत्यु के पूर्व जो भी वसीयतनामा बनाया गया, जिन-जिन लोगों को संपत्ति का हिस्सा मिला, किसी ने भी “ह्रदय से दी न्यूजपेपर्स एंड पब्लिकेशन्स लिमिटेड द्वारा प्रकाशित आर्यावर्त-इंडियन नेशन – मिथिला मिहिर अख़बारों और पत्रिका के भविष्य को ह्रदय से नहीं स्वीकारा?  महाराजाधिराज दिनांक 1 अक्टूबर, 1962 को मृत्यु को प्राप्त हुए। वे दुर्गापूजा के अवसर पर कलकत्ता से अपने राज दरभंगा आये थे। वे अपने निवास दरभंगा हाउस, मिड्लटन स्ट्रीट, कलकत्ता से अपने रेलवे सैलून से नरगोना स्थित अपने रेलवे टर्मिनल पर कुछ दिन पूर्व उतरे थे। सभी बातें सामान्य थी उस सुवह, लेकिन क्या हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ जैसे अनेकानेक कारणों के बीच अपने सूट के बाथरूम के नहाने के टब में उनका जीवंत शरीर &#8220;पार्थिव&#8221; पाए गया । सर कामेश्वर सिंह की तीन पत्नियां थीं &#8211; महारानी राज लक्ष्मी, महारानी कामेश्वरी प्रिया और महारानी कामसुंदरी। महारानी कामेश्वरी प्रिय की मृत्यु आज़ाद भारत से पूर्व और अंग्रेज भारत छोड़ो आंदोलन के समय सं 1942 में हुई। महाराजाधिराज बहुत दुःखी थे उनकी मृत्यु के बाद, जैसा लोग कहते हैं। जिस सुबह महाराजाधिराज अंतिम सांस लिए, उसके बाद उनकी दोनों पत्नियां &#8211; महारानी राजलक्षी और महारानी कामसुन्दरी दाह संस्कार में उपस्थित थी, यह भी लोग कहते हैं। महारानी राजलक्ष्मी की मृत्यु सन 1976 में, यानि महाराजा की मृत्यु के 14 वर्ष बाद हुई और महारानी कामसुन्दरी आज भी जीवित हैं महाराजा के विधवा के रूप में।</p>
<p>बहरहाल, करारनाम के तीसरे पृष्ठ के अंतिम पैरा में लिखा था : “”As the security for payment of dues of employees the built up area of 45% of the owner share from second floor onwards would lein at the rate of Rs 1000/- (One thousand) per square feet in favour of total employees/workers (past  and present) against their dues amount. In case of non-payment of dues of workmen / employees  space equal to dues at rate of Rs 1000/- (One thousand) per square feet would be given to concerned employees. The space of built-up area so kept as security will be exempted proportionally as the employees get their balance dues in instalments.” और अंत में लिखा था: “All parties having read understood the contents purport of this agreement and settlement and in their full sence have put their respective signature of this document as a token of their consent and commitment in presence of witnesses for future reference and needful.”</p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/3.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/3.jpeg" alt="" width="1376" height="1965" class="aligncenter size-full wp-image-3470" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/3.jpeg 1376w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/3-210x300.jpeg 210w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/3-717x1024.jpeg 717w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/3-768x1097.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/3-1076x1536.jpeg 1076w" sizes="auto, (max-width: 1376px) 100vw, 1376px" /></a></p>
<p>पिछले 25 फरबरी, 2021 को न्यायालय श्रम आयुक्त बिहार-सह-अपीलीय प्राधिकार, उपादान भुगतान अधिनियम 1972 के अंतर्गत एक आदेश जारी करता है। यह आदेश इस बात का प्रमाण है कि करारनामे का पूर्णतः पालन नहीं हुआ और इस आदेश की तारीख तक भी लोगों का बकाया राशि नहीं मिला है। अनिल कुमार (निदेशक) मेसर्स पाटलिपुत्र बिल्डर्स प्राईवेट लिमिटेड, महाराजा कामेश्वर काम्प्लेक्स, फ़्रेज़र रोड, पटना के द्वारा उप-श्रमायुक्त-सह-नियंत्रक प्राधिकार, उपादान भुगतान अधिनियम, 1972 के अंतर्गत पटना द्वारा जी ए वाद संख्या 03/2012 से 124 /2012 में दिनांक 24-07-2017 को पारित आदेश के विरुद्ध एक अपील दायर किया था। इस अपील में विजय कांत राय, पिता श्री बासुदेव राय (अर्चना काम्प्लेक्स, प्रिंटिंग प्रेस, जिला सुपौल) को प्रतिवादी बनाया गया था। </p>
<p>अपील के अनुसार मेसर्स न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशन लिमिटेड की वित्तीय स्थिति खराब होने के बाद प्रबंधन द्वारा मेसर्स पाटलिपुत्र बिल्डर के साथ अपनी संपत्ति के बारे में समझौता किया गया था जिसके अनुसार पब्लिकेशन के बंद होने के बाद कर्मचारियों के देनदारियों का भुगतान मेसर्स पाटलिपुत्र बिल्डर द्वारा किया जायेगा। लेकिन पब्लिकेशन के बंद होने के बाद मेसर्स पाटलिपुत्र बिल्डर द्वारा कामगारों के बकाये राशि का भुगतान नहीं किया गया। बाद में, कामगारों के आवेदन पर उपादान भुगतान अधिनियम, 1972 के तहत कार्रवाई  प्रारम्भ की गयी एवं उक्त वाद में वादी कामगार श्री हितचन्द्र झा एवं अन्य 89 (नवासी) कामगारों के पक्ष में आदेश पारित करते हुए प्रबंधन को कुल 49 32 ३४२ /- रुपया भुगतान करने का आदेश दिया गया, जिसमें श्री विजय कान्त राय से सम्बंधित वाद संख्या 66/2012 में उपादान भुगतान हेतु आदेशित राशि 15 423 /- भी शामिल है। ज्ञातब्य हो कि मेसर्स पाटलिपुत्र बिल्डर द्वारा नियमानुसार श्रमायुक्त, बिहार-सह-अपीलीय प्राधिकार के न्यायालय में अपील ना करके सीधे माननीय पटना उच्च न्यायालय में सी डब्लू जे सी  संख्या 15986/2017 दायर किया गया जिसे दिनांक 29-03-2019 को आदेश पारित करते हुए माननीय उच्च न्यायालय द्वारा उपादान भुगतान अधिनियम, 1972 की धारा – 7 (7) के अनुसार अपीलीय प्राधिकार के समक्ष अपील दायर करने के आदेश निर्गत करते हुए निष्पादित कर दिया गया था।</p>
<p><strong>हितचन्द्र झा कहते </strong>हैं: &#8220;मई 21, 2014 को कोतवाली थाने में जो आवेदन दिया गया उसमें दी न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशन के तरफ से जिन दो महानुभावों ने हस्ताक्षर किये उस प्राथमिकी पर, वे सभी इस बात की प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब वह ऐतिहासिक अवसर आए जब न्यायालय में उपस्थित होकर समस्त बातों को न्यायमूर्ति के समक्ष प्रस्तुत कर सकूँ। जीवन के अंतिम वसंत में अगर सैकड़ों, हज़ारों परिवारों को न्याय मिल जाता है तो स्वयं को धन्य पाउँगा। </p>
<p>थानाध्यक्ष कोतवाली, पटना के पास दर्ज प्राथमिकी में लिखा गया है कि : &#8220;महाशय, सेवा में निवेदन है कि हम दी न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशंस मिलिटेड, फ़्रेज़र रोड, पटना का दिनांक 15-09-2202 तक निदेशक (डाइरेक्टर) एवं कार्यकारी सचिव थे। इस कंपनी के द्वारा हिंदी दैनिक समाचार पात्र आर्यावर्त तथा अंग्रेजी दैनिक इण्डियन नेशन का प्रकाशन किया जाता था।  कंपनी की आर्थिक हालत बहुत ख़राब हो जाने के कारण कंपनी अपना काम बंद कर दी।  आपसी समझौता के तहत दिनांक 15 &#8211; 09 &#8211; 2002 को हम लोगों के साथ साथ सभी कर्मचारी कंपनी को इस्तीफा दे दिए।&#8221; </p>
<p>प्राथमिकी में आगे लिखा है: &#8220;कर्मचारी का कानूनी बकाया राशि भुगतान के लिए दी न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशंस मिलिटेड एवं डेवेलपर्स कंपनी जिसका नाम पाटलिपुत्र बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड, महाराजा कामेश्वर कॉम्प्लेक्स, फ़्रेज़र रोड पटना तथा जिसके मालिक अनिल कुमार, पिता स्वर्गीय छट्ठु चौधरी है, एक डेवलपमेंट अग्रीमेंट दिनांक 31 &#8211; 03 &#8211; 2002 को संपन्न हुआ तथा डेवलपमेंट अग्रीमेंट के आलोक में एक त्रिपक्षीय समझौता दिनांक 10-09-2002 को हुआ। त्रिपक्षीय समझौते के अनुसार कर्मचारी की बकाया राशि की पूर्ण भुगतान होने तक कंपनी के 45 प्रतिशत बिल्ट अप एरिया को बेचा नहीं जायेगा और उसे सेक्युरिटी के रूप में कर्मचारियों के नाम सुरक्षित रखा जायेगा।&#8221;</p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/4.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/4.jpeg" alt="" width="1367" height="1895" class="aligncenter size-full wp-image-3471" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/4.jpeg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/4-216x300.jpeg 216w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/4-739x1024.jpeg 739w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/4-768x1065.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/09/4-1108x1536.jpeg 1108w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p>प्राथमिकी के अनुसार, :&#8221;डेवेलपर अनिल कुमार द्वारा एक जाली कागज़ बनाया गया की दी न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशंस मिलिटेड के निदेशक मंडल की दिनांक 24 -12-2004 को एक बैठक हुयी जिसमें प्रस्ताव पारित कर अनिल कुमार का ऑफिस, फ्लेट, दूकान बेचने के लिए अधिकृत किया गया तथा इस निर्णय प्रस्ताव सम्बन्धी अधिकार पत्र को भूतपूर्व कार्यवाहक सचिव द्वारा तैयार किया गया है एवं इस जाली अधिकार पात्र के आधार पर अनिल कुमार द्वारा बेईमानी कर ऑफिस, दूकान, फ्लेट आदि बेच दिया गया एवं गरीब कर्मचारिओं का वेतन आदि माध का बकाया रकम अनिल कुमार द्वारा गबन कर लिया गया। हम कंपनी के निदेशक एवं कार्य वाहक सचिव अपने अपने पदों से  अन्य कर्मचारियों की तरह दिनक 10-09-2002  को त्रिपक्षीय समझौते के आलोक में त्याग पात्र दे दिए थे। मैं कार्यवाहक सचिव त्याग पात्र के बाद बोर्ड ऑफ़ डाइरेक्टर (दी न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशंस मिलिटेड) का ओरिजिनल मिनट बुक अनिल नंदन सिंह, डाइरेक्टर इंचार्ज को  सौंप दिया।&#8221; </p>
<p>प्राथमिकी आगे कहता है: &#8220;मैं सर्वनारायण दास, भूतपूर्व निदेशक उक्त कथित बोर्ड ऑफ़ डिरेक्टर की बैठक के विषय में न कोई जानकारी थी, और न उपथित थे। उक्त त्रिपक्षीय समझौता में वर्णित है की कर्मचारी द्वारा अपनी बकाया राशि की प्रथम क़िस्त प्राप्त के बाद इस्तीफा दे दी जाएगी, तदनुकूल प्रथम क़िस्त प्राप्ति के बाद डिजनक 15-09-2002 को सभी कर्मचारियों द्वारा कंपनी को त्यागपत्र दे दी गयी थी। त्रिपक्षीय समझौता में वर्णित है की दी न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशंस मिलिटेड के नाम एक नया बैंक खाता खोला जायेगा, तदनुकूल पी एन बी बोरिंग रोड शाखा पटना में खाता नंबर 2910002100024908 खोला गया , साथ ही, अनिल कुमार द्वारा रकम की चार पोस्ट डेटेड चेक दी जाएगी जो उक्त खाते में जमा होगी और कम्चारी की भुगतान होगी। निवेदन यह है की वास्तव में अनिल कुमार द्वारा चार पोस्ट डेटेड चेक (कुल 5. 82 करोड़ ) दी न्यूज पेपर्स एंड पब्लिकेशंस मिलिटेड के नाम कर्मचारियों के भुगतान हेतु जारी किया गया जो निम्न प्रकार है (IDBI Bank, Kashi Palace, Dak Bungalow Road, Ptna, cheque No 26444/26445/26446 and 26447 Dated: 07 04 2003 Amount: Rs 1,47,00,000 each तथा तत्कालीन यूनियन के प्रधान सचिव दिग्विजय कुमार सिन्हा, पिता &#8211; मोती लाल सिंह, सकीं बड़हिया आश्रम, शिव मार्किट लें, शेखपुरा, थान शास्त्री नगर, जिला पटना को दिया गया तथा वह चेक षड्यंत्र के तहत न बैंक में जमा हुआ और न कर्मचारियों को भुगतान हुआ।&#8221;</p>
<p>प्राथमिकी के अनुसार, &#8220;इस तरह चार झूठा पोस्ट डेटेड चेक जारी कर अनिल कुमार सभी कर्मचारियों को धोखा देकर उनसे त्याग पात्र प्राप्त कर लिया और इस तरह उनके द्वारा गरीब कर्मचारियों की पसीने की कमाई करोड़ों की राशि गबन कर लिया गया। इन तथ्यों से स्पष्ट है कि अनिल कुमार का शुरू से ही बेईमानी का इरादा था। अब अनिल कुमार का कहना है की वे कर्मचारियों को सीधे तौर पर प्रत्यक्ष भुगतान किये, जिस भुगतान की जांच माननीय उच्च न्यायालय के आदेश पर महालेखाकार, बिहार पटना द्वारा वर्तमान में की जा रही है।  जानकारी मिली है कि अनिल कुमार द्वारा समर्पित मनी रिसिप्ट रजिस्टर पर कर्मचारियों का जाली हस्ताक्षर है। महालेखाकार के अंकेक्षक एवं कर्मचारियों के बिच इन मुद्दों पर बातचीत हुई एवं पता चला की धोखाधड़ी एवं जालसाजी का मामला की जांच उनके द्वारा नहीं की जा सकती। जाली हस्ताक्षर या बनाबटी दस्तावेज की जांच पड़ताल  पुलिस का काम है और यह पुलिस ही कर सकती है।&#8221;</p>
<p>प्राथमिकी आगे कहता है: &#8220;मैं (भूतपूर्व कार्यवाहक सचिव) वर्षों से स्पाइनल कॉर्ड की बिमारी से पीड़ित होने के कारण घर में सिमित हूँ। वर्ष 2006 में लम्बर 4 और 5 का ऑपरेशन करना पड़ा था। मैं 60 प्रतिशत विकलांग हूँ। हमारा लाखों बकाया राशि की अनिल कुमार द्वारा बेईमानी कर ली गई। अनेक कर्मचारी दवा के आभाव में तथा अनेक राशन के आभाव में मर गए। कुछ कर्मचारी श्रम विभाग, माननीय उच्च न्यायालय, पी एफ कार्यालय आदि में वर्षों से चक्कर लगा रहे हैं, परिणाम स्वरुप मजबूर होकर हमे आज सहस करना पड़ा है। अतः प्रार्थना है कि गहरा 419 420 467 468 471 406 /34 आईपीसी एवं अन्य धरोपण के तहत एफ आई आर दर्ज कर अपराधियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने की कृपा की जाय। </p>
<p>आपका विश्वासी </p>
<p>1. सर्व नारायण दास <br />
भूतपूर्व निदेशक <br />
साकिन मिथिला कॉलोनी,<br />
नासिरगंज थाना दानापुर जिला पटना </p>
<p>2. मदन मोहन आचार्य <br />
भूतपूर्व कार्यवाहक सचिव <br />
मिथिला कालोनी रोड नंबर 5  <br />
उत्तरी पटेल नगर <br />
थाना पाटलिपुत्र पटना &#8211; 24 <br />
दिनांक 6-4-2014</p>
<p>गवाह:<br />
हितचन्द्र झा <br />
दिनेश्वर झा <br />
शिवशंकर आचार्य <br />
चंद्रशेखर झा <br />
संजय कुमार झा <br />
शिवनाथ विश्वकर्मा </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/crime/patliputra-builder-may-open-mouth">विशेष रिपोर्ट: क्या पाटलिपुत्र बिल्डर के मालिक न्यायालय में &#8216;चुप&#8217; रहकर &#8216;अकेले&#8217; कानून की &#8216;मार को सहन&#8217; करेंगे, अपनी छवि &#8216;नेस्तनाबूद&#8217; होने देंगे या मुंह खोलेंगे ?</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>http://www.aryavartaindiannation.com/crime/patliputra-builder-may-open-mouth/feed</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
