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	<title>indian express Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>शाहरुख़ खान की वालिदा और वालिद का इंतकाल 35-45 साल पहले हुआ, उनके कब्र आज भी जीवित हैं, लेकिन &#8230;&#8230;​ दिल्ली में कब्रिस्तानों पर राजनीति जारी है</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/shah-rukh-khans-parents-graves-are-still-alive-today-politics-over-cemeteries-continues-in-delhi</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 06 May 2026 03:22:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bahadur Shah Zfara]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बहादुरशाह ज़फर मार्ग, नई दिल्ली : मैं नहीं जानता हूँ कि बॉलीवुड के मशहूर कलाकार शाहरुख़ खान से मैं कभी रूबरू हो पाउँगा या नहीं। मैं नहीं जानता हूँ कि वे मुझे मिलने को बुलाएँगे या नहीं। मैं यह भी नहीं जानता हूँ कि जंगे आज़ादी में मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/shah-rukh-khans-parents-graves-are-still-alive-today-politics-over-cemeteries-continues-in-delhi">शाहरुख़ खान की वालिदा और वालिद का इंतकाल 35-45 साल पहले हुआ, उनके कब्र आज भी जीवित हैं, लेकिन &#8230;&#8230;​ दिल्ली में कब्रिस्तानों पर राजनीति जारी है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बहादुरशाह ज़फर मार्ग, नई दिल्ली : मैं नहीं जानता हूँ कि बॉलीवुड के मशहूर कलाकार शाहरुख़ खान से मैं कभी रूबरू हो पाउँगा या नहीं। मैं नहीं जानता हूँ कि वे मुझे मिलने को बुलाएँगे या नहीं। मैं यह भी नहीं जानता हूँ कि जंगे आज़ादी में मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीदों और क्रांतिकारियों के वंशजों की खोज से सम्बंधित मेरे प्रयास की बातों को वे सुनेंगे या नहीं। लेकिन आज शाहरुख़ खान की वालिदा मोहतरमा लतीफ़ फातिमा और उनके वालिद मोहतरम मीर ताज मोहम्मद जी सुबह सवेरे रूबरू होने के लिए &#8216;फरमान&#8217; जारी कर दिए। आज सुबह तक ऐसी कोई बात नहीं थी कि मैं उनके कब्रों पर आऊंगा।</strong> </p>
<p>लेकिन समय कुछ और चाहता था तभी तो उनके वालिद और वालिदा के इंतकाल के क्रमशः 46-वर्ष और 35-वर्ष बाद मैं उनके कब्रों पर जीते-जी आपकी उपस्थिति दर्ज किया &#8216;भींगी आंखों&#8217; के साथ। थरथराते होठों से अपनी बातें कही। अश्रुपूरित भी हुआ। मेरी बातों को उस कब्रिस्तान में चीर निद्रा में सोये, उनके आसपास आराम फरमाते सैकड़ों, हज़ारों रूहें भी मेरी बात सुन रहे थे। फिर मन हल्का कर दिल्ली के इस सौ साल से अधिक पुराने कब्रिस्तान में, जहाँ लाखों लोग, महिला, पुरुष, बच्चे, जो मुद्दत से चीर निद्रा में सोये हैं, उनसे मिला, अपनी बातों को बताया, उनसे दुआएं भी माँगा और फिर मन हल्का कर दिल्ली स्थित कब्रिस्तानों पर कहानी करने में जुट गया क्योंकि विगत कुछ वर्षों से दिल्ली सल्तनत में कब्रिस्तानों पर भी राजनीति हो रही है। </p>
<blockquote><p>अभी सुबह के कोई साढ़े दस बजे हैं और मैं शाहरुख़ खान के वालिद मीर ताज मोहम्मद और वालिदा लतीफ़ फातिमा के कब्रों के पास हूँ। जिस दिन मोहतरमा लतीफ़ फातिमा जी का इंतकाल हुआ था, उस समय कलकत्ता से प्रकाशित आनंद बाजार पत्रिका समूह के &#8216;संडे&#8217; पत्रिका में संवाददाता था। उसके अगले साल बहादुरशाह ज़फर मार्ग पर स्थित दी इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में संवाददाता बनकर आया था। फातिमा जी का इंतकाल 15 अप्रैल, 1991 को हुआ था जबकि शाहरुख़ खान के वालिद का इंतकाल 19 सितम्बर, 1980 को हुआ था। आज इन दोनों के कब्रों के अलावे, लगभग 110+ वर्ष पुराने इस कब्रिस्तान में लाखों लोग सोये हैं अमन और शांति से। </p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7710" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम इंडियन एक्सप्रेस ही नहीं, लन्दन के तर्ज पर कभी &#8216;फ्लीट रोड&#8217; कहा जाने वाला बहादुरशाह ज़फर मार्ग के पीछे और आईटीओ की दिशा से लालकिले की ओर जाने वाली सड़क (रिंग रोड) के बाएं हाथ स्थित है। इसे दिल्ली गेट कब्रिस्तान के नाम से भी जाना जाता है। 1950 के दशक तक यह सड़क सुनसान थी और यहाँ कीकर और बबूल के पेड़ उगे हुए थे। आज भी उस परिवेश का नजारा देखा जा सकता है। उसी कालखंड में इस इलाके में कई अखबारों के दफ़्तर खुले। सबसे पहले 1953 में &#8216;इंडियन एक्सप्रेस&#8217; ने अपना दफ़्तर खोला, जिसके बाद &#8216;पैट्रियट&#8217;, &#8216;नेशनल हेराल्ड&#8217;, &#8216;टाइम्स ऑफ़ इंडिया&#8217;, &#8216;नवभारत टाइम्स&#8217;, &#8216;उर्दू मिलाप&#8217; और कई दूसरे अख़बारों के दफ़्तर भी यहाँ खुल गए। आज भी दिल्ली गेट की दिशा से आईटीओ की ओर जाने वाला बहादुरशाह ज़फर मार्ग के बाएं हाथ निचली सड़क, जहाँ अख़बारों का दफ्तर है, के पीछे सैकड़ों नहीं, बल्कि हज़ारों कीकर और बबूल के बड़े-बड़े बृक्ष खड़े हैं। </p>
<p><strong>जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम &#8211; दिल्ली के सबसे पुराने और ऐतिहासिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण मुस्लिम कब्रिस्तानों में से एक है। यह कब्रिस्तान शाहजहानाबाद, यानी पुरानी दिल्ली के चारदीवारी के ठीक बाहर है। वैसे इस कब्रिस्तान की शुरुआत मुगल काल में हुई थी, लेकिन इसकी जड़ें तुगलक वंश तक जाती हैं। पारंपरिक रूप से, इस्लामी दफ़न शहर की दीवारों के बाहर होते थे, और यह जगह धीरे-धीरे पुरानी दिल्ली के निवासियों के लिए एक मुख्य दफ़नगाह बन गई। मीर ताज मोहम्मद और लतीफ़ फातिमा के कब्रों के पास खड़े होकर जितनी दूर तक निगाह पहुँच रही थी, लाखों लोगों का अंतिम विश्राम स्थल दिख रहा था। शाहरुख़ खान के वालिद और वालिदा का कब्र देखकर ऐसा लगा जैसे यह कल ही यहाँ आराम फरमाने आयी हों। यहाँ मुशीर झिंझियानवी जैसे जाने-माने कवि, यूनुस जाफ़री जैसे विद्वान, और कल्लू निहारीवाले जैसे मशहूर स्थानीय लोग शामिल हैं । </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-3.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7711" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>बहरहाल, शाहरुख़ खान के वालिद और वालिदा के फरमान का अमल करते आज सुबह-सवेरे जब दिल्ली गेट पर आया, पैर जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम की ओर बढ़ने लगे। वैसे दिल्ली गेट आज भी अपने अंदर अनगिनत ऐतिहासिक घटनाओं को समेटे हैं, लेकिन हम कब्रिस्तान की ओर बढ़ रहे हैं, पता नहीं क्यों ? कहते हैं समय आपको वहां जरूर लेकर जायेगा, जहाँ समय ने आपने किये लिखा है। नब्बे के कालखंड में जब इंडियन एक्सप्रेस में संवाददाता था, चाहे-अनचाहे इस कब्रिस्तान में आया करते थे। </p>
<p>अब तक कल का लाल दरवाजा, जो बाद में खुनी दरवाजा के रूप में कलंकित हुआ, के पास पहुंचा था जहाँ दाहिने हाथ मौलाना आज़ाद मेडिकल कालेज का प्रवेश द्वार बना है। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान, या यूँ कहें कि आज़ाद भारत के पहले पांच &#8211; छह साल तक यहाँ दिल्ली की पुरानी सेंट्रल जेल हुआ करती थी। मुग़ल कल में यह स्थान सरायों के लिए विख्यात था। इससे दस कदम पर ही लाल किले में प्रवेश के लिए दिल्ली गेट था, आज भी है। अंग्रेजों के कालखंड में वह सराय जेल में बदल गया था जिसे भारतीय क्रांतिकारियों और आपराधिक कैदियों को रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। यहीं 1912 में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग की हत्या की कोशिश के षड्यंत्रकारियों के साथ-साथ, दिल्ली असेम्बली बम कांड के षड्यंत्रकारी, खासकर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को रखा गया था। बहादुर शाह के बेटों और एक पोते को इसी लाल दरवाजा पर ब्रिटिश मेजर हडसन ने गोली मार दी थी। आज यह सड़क लुटियंस दिल्ली और पुरानी दिल्ली के बीच एक कड़ी का काम करती है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7724" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>आजादी के बाद के भारत में, दिल्ली में लड़कियों के लिए लेडी हार्डिंग कॉलेज के अलावा कोई मेडिकल कॉलेज नहीं था। भारत में जिन जगहों पर पहले से मेडिकल कॉलेज मौजूद थे, वे थीं बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास और अमृतसर वगैरह। उस समय दिल्ली की आबादी 20 लाख थी, और एक मेडिकल कॉलेज की ज़रूरत महसूस की जाने लगी थी। 1936 में, इरविन अस्पताल के पहले मेडिकल सुपरिटेंडेंट, लेफ्टिनेंट कर्नल क्रूइकशैंक ने दिल्ली के लिए एक अलग मेडिकल कॉलेज बनाने के बारे में सोचा। एक योजना बनाई गई और पेश की गई कि इरविन अस्पताल के ठीक सामने, मौजूदा रामलीला मैदान के पास एक मेडिकल कॉलेज बनाया जाए। बदकिस्मती से, 1939 में दूसरे विश्व युद्ध की वजह से यह योजना रद्द कर दी गई।1939 से 1947 तक इरविन अस्पताल दिल्ली में इलाज के लिए सबसे सम्मानित जगह थी। यह दौर राजनीतिक रूप से भारत के लिए बहुत अनिश्चितता भरा था। विश्व युद्ध की वजह से ब्रिटिश सरकार पर पैसों की भारी तंगी थी और भारत की आज़ादी भी नज़दीक ही थी, इसलिए किसी ने दिल्ली में मेडिकल कॉलेज बनाने के बारे में नहीं सोचा। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7712" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>आज़ाद भारत में 1947 से 1955 के बीच ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता जिससे पता चले कि किसी ने नया मेडिकल कॉलेज बनाने के बारे में सोचा हो। लेकिन दस्तावेज यह कहता है कि डॉ. पी. डिश ने दिल्ली में मेडिकल कॉलेज की कमी की समस्या के बारे में चीफ कमिश्नर ए. डी. पंडित को बताया और उन्होंने डॉ. डिश को सलाह दी कि वे तत्कालीन गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत से इस बारे में बात करें। संयोग से, डॉ. डिश नेहरू जी के निजी डॉक्टर भी थे। यह कहा जाता है कि उस समय नेहरू जी इसके लिए तैयार नहीं थे, क्योंकि आर्थिक हालात ठीक नहीं थे। उसी समय, उनके कुछ साथियों ने दिल्ली की ठेठ बोली में कहा: “पंडितजी, करेला में भी तीन मेडिकल कॉलेज हैं।” पंडितजी ने चिल्ला कर जवाब दिया, &#8220;केरल, मेरे प्यारे दोस्त, करेला नहीं; करेला तो एक सब्जी है।&#8221;</p>
<p>पंडितजी का मूड ठीक करने के लिए, डॉ. पी. सी. ढांडा ने बड़ी होशियारी से बात का रुख मोड़ दिया और एक सुझाव दिया कि अगर कोई मेडिकल कॉलेज मंजूर होता है, तो उसे उनके जाने-माने साथी मौलाना आज़ाद के नाम पर रखना सबसे सही श्रद्धांजलि होगी, जो उनके बहुत करीब थे। इसी बीच, भारत सरकार को भी स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की ज़रूरत महसूस हुई, जिसमें मेडिकल कॉलेजों और मेडिकल शिक्षा की ज़रूरतें भी शामिल थीं। भारत सरकार ने दूसरी पंचवर्षीय योजना में—जिसे 2 मई 1956 को पास किया गया था, देश के स्वास्थ्य स्तर को बेहतर बनाने के लिए कई लक्ष्य रखे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7713" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>इस जेल का ज़िक्र कई ऐतिहासिक विवरणों में मिलता है, जिनमें सैयद अहमद खान की &#8216;आसार-उस-सनादीद&#8217; और &#8216;द इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़&#8217; में छपी 1858 की एक नक्काशी शामिल है। आज मौलाना आज़ाद मेडिकल कालेज प्रागण में पुरानी जेल के सम्मानार्थ एक स्थान सुरक्षित है, जहाँ उन दिनों दर्जनों क्रांतिकारियों को फांसी पर लटकाया गया था। साल 1958 में केंद्रीय कारावास तिहाड़ के बनने के बाद दिल्ली की जेल यानी तिहाड़ जेल बन गयी और दिल्ली की पुरानी जेल इतिहास के पन्नों में दफ़न हो गया। बहरहाल, दिल्ली गेट की दिशा से इंडियन एक्सप्रेस भवन के पहले पूरब की ओर जाने वाली सड़क पर मुड़ा। यह इस नुक्कड़ से कब्रिस्तान की दूरी सौ कदम से अधिक नहीं है। मुज्जे विश्वास है कि आज इस सड़क पर स्थित कार्यालयों में काम करने वाले लोग इस कब्रिस्तान के बारे में शायद जानते भी होंगे। वे तो यह भी नहीं जानते होंगे कि इसी कब्रिस्तान में शाहरुख़ खान के वालिद और वालिदा के अलावे भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी और बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी के नेता सैय्यद शहाबुद्दीन भी आराम फार्मा रहे हैं। खैर। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7725" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/KK-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम में समुदाय की गहरी भावना झलकती है। यहाँ कई कब्रों पर ऐसे पत्थर लगे हैं जिन पर न सिर्फ़ मरने वाले का नाम लिखा है, बल्कि पुरानी दिल्ली की उन तंग गलियों का भी ज़िक्र होता है जहाँ वे कभी रहते थे। शहरीकरण के दबाव और जगह की कमी के बावजूद, इस कब्रिस्तान का रखरखाव बहुत अच्छी तरह से किया जाता है। इसमें कुछ खास हिस्से भी हैं, जैसे कि मृत पैदा हुए शिशुओं के लिए एक अलग जगह।  इतना ही नहीं, कोविड-19 में मृत्यु को प्राप्त किये लोगों को इस कब्रिस्तान में एक अलग हिस्सा दिया है। अनेकानेक चुनौतियों के बाद भी यह दिल्ली के मुस्लिम समुदाय के लिए एक शक्तिशाली सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रतीक बना हुआ है, जो तेज़ी से बदलते शहरी परिवेश में परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है। इस जगह पर जाने से पुरानी दिल्ली के बहु-स्तरीय इतिहास की एक अनोखी झलक मिलती है, जहाँ हर कब्र शहर के दिल में बिताए गए जीवन की एक कहानी बयाँ करती है।</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7714" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>कुछ वर्ष पहले दिल्ली में कब्रिस्तानों की समस्याओं और स्थिति का अध्ययन करने का विचार दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार द्वारा सामने रखा गया था। कहते हैं कि यह पहल शहर में मुस्लिम आबादी में हो रही वृद्धि और कब्रिस्तानों के लिए जगह की कमी को लेकर मुस्लिम समुदाय की बढ़ती चिंताओं को ध्यान में रखते हुए किया गया था । अख़बारों में, टीवी पर पर, पत्रिकाओं में इस बात को बारम्बार लिखा जा रहा था, कहा जा रहा था कि दिल्ली में  कब्रिस्तानों के लिए जगह धीरे-धीरे कम होती जा रही है। इसके कई कारण भी बताए गए। मसलन, कब्रिस्तान की ज़मीन पर अतिक्रमण, शहरीकरण, नए कब्रिस्तानों के लिए ज़मीन का आवंटन न होना, मस्जिदों और दरगाहों से जुड़े कब्रिस्तानों की भारी मांग, और कंक्रीट की कब्रों का निर्माण। </p>
<p>तत्कालीन शोधों में, जो बाद में प्रतिवेदन का रूप लिया, यह कहा गया कि  दिल्ली वक्फ बोर्ड और अन्य एजेंसियों के साथ पंजीकृत अधिकांश मुस्लिम कब्रिस्तान, पिछले कुछ वर्षों में व्यावहारिक रूप से विलुप्त हो चुके हैं। सार्वजनिक और सरकारी, दोनों ही प्रकार की एजेंसियों ने कब्रिस्तानों पर या तो कब्जा कर लिया है अथवा उन पर अतिक्रमण कर लिया है। वहीं दूसरी ओर, नगर-नियोजन योजनाओं में नए कब्रिस्तानों के लिए नई भूमि भी आवंटित नहीं की गयी। परिणाम यह हुआ की प्रतिवेदन में इस बात को उद्धृत किया गया कि मौजूदा (तत्कालीन) कब्रिस्तानों में शेष बची जगह, मुश्किल से अगले दो वर्षों के लिए ही हो सकती है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7715" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>लेकिन जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम में कब्र खोदने वाले एक श्रमिक, जिसे कब्र खोदने के लिए 700/- रुपये मजदूरी मिलते हैं, कहता है कि &#8220;मैं कई वर्षों से यहाँ काम करता हूँ। इस कब्रिस्तान में लाखों लोग, बड़े, बच्चे, महिला, पुरुष आराम फार्मा रहे हैं। कई जन्म के साथ ही यहाँ आ गया तो कई जीवन के अंतिम दिनों में बीमारी के कारण यहाँ आये। कई गरीब थे तो कइ अमीर, कई जनाजों के पीछे गिनती के लोग थे तो कई जनाजों के पीछे समुदाय के काफी लोग थे। आज कल कब्रिस्तानों को भी राजनीति में घसीटा जा रहा है। सरकारी मुलाजिम और सरकार के साथ जुड़े लोग कागज पर यह दिखने लगे हैं की दिल्ली के कब्रिस्तानों में जगह की किल्लत है। यह कहना गुनाह है। इस कब्रिस्तान में पीछे सौ सैलून से लाखों लोग ,आराम फरमा रहे हैं। यकीन  कीजिये, आने वाले सौ सालों तक यहाँ लाखों लोग अगर आएंगे तो अल्लाह उन्हें भी दो गज जमीन मिबा किसी तकलीफ के दे देंगे।&#8221;  </p>
<p><strong>कब्रिस्तानों की प्रबंधन संरचनाएं कब्रिस्तानों की ज़मीन के मालिकाना हक की प्रकृति पर निर्भर करती हैं। जहां दिल्ली वक्फ बोर्ड, दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन और समुदायों के मालिकाना हक वाले कब्रिस्तानों के लिए प्रबंधन समितियां मौजूद हैं; वहीं कुछ जगहों पर ऐसे कब्रिस्तान भी हैं जिनका मालिकाना हक परिवारों या समुदायों के पास है, और वहां किसी भी तरह की प्रबंधन समिति मौजूद नहीं है। कब्रिस्तानों में रखरखाव के लिए कर्मचारी/व्यक्ति बहुत कम जगहों पर ही उपलब्ध हैं, क्योंकि ज़्यादातर कब्रिस्तानों (कुल 131 में से 85 या 65%) में इस काम के लिए कोई भी मौजूद नहीं है। कब्रिस्तानों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही के स्तर को बेहतर बनाने की गुंजाइश है, खासकर उन कब्रिस्तानों में जो रखरखाव के लिए पैसे लेते हैं और खर्च करते हैं।</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7716" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>जिन कब्रिस्तानों में एक महीने में कम अंतिम संस्कार होते हैं (51 कब्रिस्तानों में 5 या उससे कम अंतिम संस्कार), उनकी संख्या उन कब्रिस्तानों से ज़्यादा है जहां ज्यादा अंतिम संस्कार होते हैं (9 कब्रिस्तानों में 30 से ज़्यादा अंतिम संस्कार)। कब्रिस्तान में दस्तावेजों की ज़रूरत बहुत कम होती है, क्योंकि कब्रिस्तानों में अंतिम संस्कार के समय केवल पहचान का सबूत मांगा जाता है। ज़्यादातर कब्रिस्तानों (75 या 57%) ने बताया कि उनके अधिकार क्षेत्र में होने वाली मौतों की संख्या के हिसाब से उनके पास जगह कम है। इतना ही नहीं, जहां ज़्यादातर कब्रिस्तान (73 या 56%) इस सुविधा का इस्तेमाल करने के लिए लोगों से कोई पैसा नहीं लेते, वहीं जो कब्रिस्तान पैसे लेते हैं (42 या 32%), उनमें पैसे की रकम 201 रुपये से लेकर 2000 रुपये के बीच होती है। साथ ही, ज़्यादा क्षमता वाले कब्रिस्तानों (4 कब्रिस्तानों की क्षमता 5000 से ज़्यादा है) की संख्या, कम क्षमता वाले कब्रिस्तानों (25 कब्रिस्तानों की क्षमता 200 या उससे कम है) की तुलना में कम है।</p>
<p>दस्तावेजों के अनुसार, कहने के लिए तो दिल्ली में 704 मुस्लिम कब्रिस्तान हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से महज 131 कब्रिस्तान हैं जो मौजूद हैं।शहर के 11 ज़िलों में से, दक्षिण दिल्ली में सबसे ज़्यादा कब्रिस्तान (33 या 25%) है। इसके बाद उत्तर-पश्चिम दिल्ली (19), उत्तर दिल्ली (17), दक्षिण-पश्चिम दिल्ली (11), उत्तर-पूर्व दिल्ली (10), पश्चिम दिल्ली और पूर्वी दिल्ली (हर एक में 9), दक्षिण-पूर्वी दिल्ली (8), मध्य दिल्ली (6), शाहदरा (5), और नई दिल्ली (4)है। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि 131 कब्रिस्तानों में से 16 अभी इस्तेमाल में नहीं हैं। इस्तेमाल न होने के कारणों में कब्रिस्तान की ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर कानूनी मामले, खराब बनावट जिसके कारण पानी भर जाता है या दूसरी समस्याएँ हैं, और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के साथ विवाद शामिल हैं।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-9.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7717" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-9.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-9-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-9-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-9-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-9-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<blockquote><p>दिल्ली में क़ब्रिस्तानों की समस्याओं और उनकी स्थिति का अध्ययन करते समय बहादुर शाह ज़फ़र का यह शेर याद आ जाता है, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद कुछ इस प्रकार है: &#8220;ज़फ़र कितना बदनसीब है कि उसे अपने प्यारे वतन में दफ़्न होने के लिए दो गज़ ज़मीन भी नसीब न हुई!&#8221; हालाँकि यह शेर उन्होंने अपने निर्वासन काल (रंगून, जिसे अब म्यांमार में यांगून कहा जाता है) के संदर्भ में कहा था, लेकिन दिल्ली के क़ब्रिस्तानों के अध्ययन के संदर्भ में भी यह पूरी तरह प्रासंगिक है।</p></blockquote>
<p>भारत की जनगणना 2011 के अनुसार, दिल्ली में मुस्लिम आबादी 20 लाख (दो मिलियन) से भी अधिक है। शहर में मुस्लिम आबादी में हो रही वृद्धि के साथ-साथ, क़ब्रिस्तानों के लिए जगह की कमी को लेकर समुदाय की चिंताएँ भी लगातार बढ़ती जा रही हैं। हाल के दिनों की समाचार रिपोर्टों से यह संकेत मिलता है कि क़ब्रिस्तानों के लिए उपलब्ध जगह धीरे-धीरे कम होती जा रही है। इसके पीछे कई कारण हैं, जैसे—क़ब्रिस्तान की ज़मीन पर अतिक्रमण, शहरीकरण, नए क़ब्रिस्तानों के लिए ज़मीन का आवंटन न होना, मस्जिदों और दरगाहों से जुड़े क़ब्रिस्तानों की भारी माँग, और कंक्रीट की क़ब्रें बनाने का चलन। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-10.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7718" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-10.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-10-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-10-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-10-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-10-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>कब्रिस्तानों की उम्र जहाँ 34% कब्रिस्तान 101 से 200 साल पुराने हैं, वहीं कुल कब्रिस्तानों में से 12% (या 16) 200 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। दूसरे शब्दों में, शहर के लगभग आधे कब्रिस्तान (46%) 100 साल से ज़्यादा पुराने हैं। 51 से 100 साल की श्रेणी में 24 कब्रिस्तान (18%) हैं, और 26 कब्रिस्तान (20%) 10 से 50 साल पुराने हैं। 10 साल से कम की श्रेणी में सिर्फ़ पांच कब्रिस्तान (4%) होने से, यह कहा जा सकता है कि शहर में मुस्लिम आबादी बढ़ने के बावजूद, हाल के दिनों में बहुत कम कब्रिस्तान बनाए गए हैं। </p>
<p>इतना ही नहीं, क्षेत्रफल की दृष्टि से ज्यादातर कब्रिस्तान (68% या 89) आकार में छोटे हैं, जिनका क्षेत्रफल 10 बीघा या उससे कम है। इन 68% कब्रिस्तानों में से; 38% के पास एक से पाँच बीघा जमीन है, 22% के पास छह से 10 बीघा जमीन है और केवल 8% बहुत छोटे हैं जिनके पास एक बीघा से भी कम जमीन है। तुलनात्मक रूप से बड़े आकार के कब्रिस्तानों में, 14% के पास 11 से 20 बीघा जमीन है, 8% के पास 20 से 50 बीघा ज़मीन है और केवल 2% या तीन कब्रिस्तानों के पास 50 बीघा से ज़्यादा ज़मीन है। कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जा कब्रिस्तान की ज़मीन पर कब्ज़ा एक बड़ी चुनौती है, जिसके कारण इसके मूल उद्देश्य के लिए उपलब्ध जगह लगातार कम होती जा रही है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-11.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-11.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7719" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-11.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-11-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-11-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-11-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-11-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>ऐसे सैकड़ों कब्रिस्तान हैं जो कागज़ों में तो मौजूद हैं, पर मुख्य रूप से कब्ज़े के कारण ज़मीनी स्तर पर उनका कोई अस्तित्व नहीं है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि DWB के पास 624 कब्रिस्तानों की सूची है, लेकिन उनमें से ज्यादातर आज ढूँढ़े नहीं जा सकते। दिल्ली के 131 कब्रिस्तानों में से, 43 (33%) कब्रिस्तानों की ज़मीन पर कब्ज़ा हो चुका है। जहाँ 30% कब्रिस्तानों में कब्ज़े वाले क्षेत्र का आकार एक से पाँच बीघा के बीच है, वहीं नौ कब्रिस्तानों (21%) में यह एक बीघा से भी कम है। इतना ही नहीं, बड़े आकार की जमीन पर कब्ज़े वाले कब्रिस्तानों की संख्या कम है: चार कब्रिस्तानों में 11 से 20 बीघा ज़मीन पर कब्ज़ा है; दो-दो कब्रिस्तानों में छह से 10 बीघा और 21 से 50 बीघा ज़मीन पर कब्ज़ा है; और केवल एक कब्रिस्तान में 50 बीघा से ज़्यादा ज़मीन पर कब्जे की सूचना मिली है।</strong></p>
<p>दिल्ली गेट-रिंग रोड कब्रिस्तान के सचिव शमीम अहमद खान का कहना है कि &#8220;इस बात को नाकारा नहीं जा सकता कि जनसंख्या की वृद्धि के मद्दे नजर कब्रिस्तानों के पास जितनी जमीन होने किये, वह नहीं है। कई कब्रिस्तान क़ानूनी डाव-पेच में पड़े हैं। अगर सर्कार एयर व्यवस्था के लोग चाहे तो इस मसले को बहुत आसानी से सुलझाया जा सकता है। मथुरा रोड से भैरव मंदिर के रास्ते जब रिंग रोड पर पहुँचते हैं, वहां करीब 14 एकड़ जमीन जो कब्रिस्तान का था, उसे जोतकर मिलेनियम पार्क बना दिया गया है। जब लोग जन्म लेंगे तो उनकी मृत्यु तय है। वैसी स्थिति में उन्हें इज्जत के साथ दफ़नाने की जबावदेही तो सरकार की ही होनी चाहिए। वैसे दिल्ली गेट कब्रिस्तान दिल्ली के किसी भी कब्रिस्तान से सभी मामले में बेहतर है। यहाँ भी जमीन की किल्लत है। आम तौर पर हम एक कब्र पर उसी परिवार के लोग को न्यूनतम दस साल के बाद जगह देते हैं। हमारे कब्रिस्तान में कोरोना काल में तक़रीबन 1600 लोगों को दफनाया गया था। यहाँ जन्म के साथ मृत्यु को प्राप्त करने या छोटे-छोटे बच्चों के आराम के लिए अलग स्थान है।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-12.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7720" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-12.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-12-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-12-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-12-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-12-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>शमीम अहमद खान का कहना है कि किसी भी कब्रिस्तान में, जहाँ समाज के बड़े-बड़े लोग, अमीर लोग आराम फार्मा रहे हैं, मेरा मानना है कि उनके परिवार के लोगों को कब्रिस्तानों में आकर देखना जरूर चाहिए कि आखिर जहाँ वे अपने लोगों को आराम से सुलाए थे, उनका कब्र कैसा है। कहना नहीं चाहिए, लेकिन दफ़नाने के बाद, शायद ही लोग कभी देखने आते हैं। वे कब्रिस्तानों को जीवंत बनाये रख सकते हैं, लेकिन ऐसा करते नहीं। जब उनसे पूछा कि शाहरुख़ खान की वालिदा और वालिद यहीं आराम फार्मा रहे हैं, क्या कभी वे आये हैं? खान साहब कहते है, &#8216;मुझसे मुलाकात नहीं हुई है।&#8217;</p>
<p>कब्रिस्तान की ज़मीनों पर ज्यादातर (24 या 56%) समुदाय के लोगों/संगठनों ने कब्ज़ा कर लिया है। सरकार, 10 कब्रिस्तानों की ज़मीनों पर कब्ज़ा करने वाली के तौर पर, कब्जा करने वालों की सूची में दूसरे स्थान पर है। एक समाचार रिपोर्ट में दर्ज DWB के एक RTI जवाब के अनुसार, शहर में कब्रिस्तानों की संख्या में कमी ज्यादातर जनता और सरकारी एजेंसियों द्वारा किए गए कब्जे के कारण है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने दिल्ली में 11 कब्रिस्तानों पर कब्ज़ा कर लिया है। लोगों के साथ बातचीत और समाचार रिपोर्टों से पता चला कि मथुरा रोड पर दिल्ली पब्लिक स्कूल, रिंग रोड पर इंद्रप्रस्थ पार्क और लोधी रोड पर CGO कॉम्प्लेक्स कब्रिस्तान की ज़मीन पर बनाए गए हैं। छह कब्रिस्तानों की ज़मीनों पर निजी व्यक्तियों ने कब्ज़ा कर लिया है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-13.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-13.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7721" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-13.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-13-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-13-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-13-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-13-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>कुल कब्रिस्तानों में से 46 कब्रिस्तान बसी हुई कॉलोनियों में स्थित हैं। हालांकि 15% उत्तरदाताओं ने कब्रिस्तानों को अन्य क्षेत्रों में स्थानांतरित करने का समर्थन किया, लेकिन सभी 46 कब्रिस्तानों को अन्य क्षेत्रों में स्थानांतरित करने की गुंजाइश है, क्योंकि वे आवासीय क्षेत्रों में स्थित हैं। किसी धार्मिक स्थल के बहुत करीब या उसके भीतर स्थित कब्रिस्तान, कई मुसलमानों के लिए अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार करने के लिए एक पसंदीदा विकल्प होता है। मौजूदा 131 कब्रिस्तानों में से 17 (13%) मस्जिदों के बहुत करीब स्थित हैं, छह किसी पीर या मज़ार की कब्र के पास स्थित हैं, और पाँच ईदगाह की जमीन के भीतर संचालित हो रहे हैं। हालाँकि, 103 कब्रिस्तान (79%) ऐसे हैं जो किसी भी धार्मिक स्थल के बहुत करीब स्थित नहीं हैं। ये केवल कब्रिस्तान की ज़मीन हैं। कब्रिस्तान की जमीन के स्वामित्व के संबंध में, उनमें से अधिकांश (47%) का स्वामित्व DWB के पास है। इसके बाद 29 कब्रिस्तानों (22%) के मामले में जमीन का सामुदायिक स्वामित्व आता है, जिसका अर्थ है गाँव या ग्राम सभा या किसी विशिष्ट जाति समूह का स्वामित्व। जहाँ आठ कब्रिस्तानों के मामले में ज़मीन MCD की है और पाँच कब्रिस्तानों के मामले में DDA की, वहीं 11 कब्रिस्तान ऐसे हैं जो निजी व्यक्तियों की ज़मीन पर बने हैं।</strong> </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-14.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-14.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7722" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-14.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-14-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-14-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-14-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-14-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>कहते हैं कि जो इलाके किसी खास कब्रिस्तान पर निर्भर होते हैं, वे उसकी भौगोलिक पहुँच के साथ-साथ उस सुविधा पर लोगों की निर्भरता की सीमा को भी दर्शाते हैं। 72 कब्रिस्तानों (सबसे ज़्यादा संख्या) के मामले में, कब्रिस्तानों पर निर्भर सबसे दूर के इलाके दो से पाँच किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। जबकि 19 कब्रिस्तानों के मामले में सबसे दूर के इलाके कब्रिस्तान से छह से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं, 17 कब्रिस्तानों के मामले में सबसे दूर के इलाके दो किलोमीटर से कम दूरी पर और तीन कब्रिस्तानों के मामले में 10 किलोमीटर से ज़्यादा दूरी पर स्थित हैं। शहर के केवल 32 कब्रिस्तानों में ही नमाज़-ए-जनाज़ा के लिए जगह है और 33 में पानी के बोरवेल हैं। जहाँ 77 कब्रिस्तानों में चारदीवारी है और 31 में स्ट्रीट लाइटें हैं, वहीं केवल 30 में ही गार्ड तैनात हैं। जिन कब्रिस्तानों में चारदीवारी नहीं है, वे खुले मैदानों की तरह हैं। </p>
<p>आयोग ने अपनी रिपोर्ट में एक स्टडी का हवाला देते हुए कहा कि शहर में हर साल तकरीबन 13,000 मुस्लिमों का अंतिम संस्कार होता है लेकिन 2017 तक मौजूदा कब्रिस्तानों में 29,370 लोगों को ही दफनाने की जगह बची थी। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर इसी हिसाब से दफनाने का सिलसिला जारी रहा तो तो आज से एक साल बाद तक कोई जगह नहीं बचेगी। ऐसे में इसके लिए अभी से जरूरी हल खोजने की जरूरत है। वैसे आधिकारिक रूप से दिल्ली में मुसलमानों की कितनी संख्या है यह तो आगामी जनगणना में आएगी, लेकिन जनगणना 2011 के आंकड़ों से प्राप्त 2026 के अनुमानों के आधार पर, दिल्ली में मुस्लिम आबादी लगभग 1.41 मिलियन के आस-पास है, जो कुल आबादी का लगभग 13% से 15% है। इतना ही नहीं, कब्रिस्तानों की स्थिति भी बेहतर नहीं है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-15-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-15-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7723" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-15-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-15-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-15-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-15-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-15-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>इस्तेमाल हो चुकी सभी ज़मीनों का दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा है, क्योंकि हमारा धर्म तीन साल बाद कब्रिस्तानों को समतल करने की इजाज़त देता है। कुछ सालों के बाद एक ही परिवार के कई शवों के लिए एक ही कब्र का इस्तेमाल करते हैं। ईसाई कब्रिस्तानों पर दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि आयोग को सिर्फ़ 13 चालू कब्रिस्तान मिले, जिनमें से एक — कश्मीरी गेट स्थित लोथियन कब्रिस्तान — बंद हो चुका है और उसे एक संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया गया है। कुल कब्रिस्तानों में से सिर्फ़ पाँच ही शहर के सभी ईसाइयों के लिए खुले हैं, जबकि पाँच कब्रिस्तान सिर्फ़ पारिवारिक कब्रों या एक ही कब्र में दो शव दफनाने (doubling) के लिए खुले हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इनमें से दो कब्रिस्तान — एक ओखला में और दूसरा महरौली में — क्रमशः सिर्फ़ पादरी परिवारों और &#8216;चर्च ऑफ़ नॉर्थ इंडिया&#8217; के सदस्यों के लिए खुले हैं।</p>
<p><strong>तस्वीरें: संजय शर्मा </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/shah-rukh-khans-parents-graves-are-still-alive-today-politics-over-cemeteries-continues-in-delhi">शाहरुख़ खान की वालिदा और वालिद का इंतकाल 35-45 साल पहले हुआ, उनके कब्र आज भी जीवित हैं, लेकिन &#8230;&#8230;​ दिल्ली में कब्रिस्तानों पर राजनीति जारी है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>नीतीश कुमार के हाथों &#8216;इंडियन एक्सप्रेस&#8217; अख़बार का &#8216;लोकार्पण&#8217; : &#8216;अख़बार&#8217; का &#8216;कद घटा&#8217; या &#8216;नीतीश कुमार&#8217; का &#8216;कद बढ़ा&#8217;, एक &#8216;गहन शोध&#8217; का विषय</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/nitish-kumars-launch-of-indian-express-its-a-matter-of-deep-research</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Jun 2025 05:31:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[edition]]></category>
		<category><![CDATA[indian]]></category>
		<category><![CDATA[indian express]]></category>
		<category><![CDATA[newspapers]]></category>
		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : बिहार की पत्रकारिता के इतिहास में शायद यह पहली घटना थी जब प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने घर इंडियन एक्सप्रेस जैसे अख़बार के मालिक, संपादक, अधिकारी और पत्रकारों को बुलाकर उनके ही अखबार को लोकार्पित किये। बाबू श्रीकृष्ण सिन्हा के कालखंड से आज तक कभी भी ऐसी घटना नहीं हुई थी। [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/nitish-kumars-launch-of-indian-express-its-a-matter-of-deep-research">नीतीश कुमार के हाथों &#8216;इंडियन एक्सप्रेस&#8217; अख़बार का &#8216;लोकार्पण&#8217; : &#8216;अख़बार&#8217; का &#8216;कद घटा&#8217; या &#8216;नीतीश कुमार&#8217; का &#8216;कद बढ़ा&#8217;, एक &#8216;गहन शोध&#8217; का विषय</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : बिहार की पत्रकारिता के इतिहास में शायद यह पहली घटना थी जब प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने घर इंडियन एक्सप्रेस जैसे अख़बार के मालिक, संपादक, अधिकारी और पत्रकारों को बुलाकर उनके ही अखबार को लोकार्पित किये। बाबू श्रीकृष्ण सिन्हा के कालखंड से आज तक कभी भी ऐसी घटना नहीं हुई थी। अलबत्ता, उन दिनों अख़बारों के सम्पादकों की, मालिकों की ऊंचाई इतनी अधिक थी की मुख्यमंत्रियों को पैदल चलकर उनके कार्यालयों तक पहुंचना होता था। यह घटना किसी भी पत्रकार को सोचने पर विवश कर दिया है कि इससे इंडियन एक्सप्रेस अख़बार की &#8216;गरिमा&#8217; कम हुई, अथवा राजनीतिक बाजार में नीतीश कुमार अपना मोल बढ़ाये, या एक्सप्रेस जैसे अख़बार के मालिकों को, संपादकों को, संवाददाताओं का कद छोटा किया। आज अगर &#8216;रामनाथ गोयनका&#8217; जीवित होते तो शायद यह दुर्घटना नहीं घटी होती। </strong></p>
<blockquote><p>घर वापसी अच्छी बात है। इंडियन एक्सप्रेस के पटना संस्करण के लोकार्पण के अवसर पर जब संस्थान के अध्यक्ष विवेक गोयनका की &#8216;घर वापसी&#8217; वाली बात अख़बारों के पन्नों के साथ-साथ इंटरनेट पर प्रकाशित हुआ, रामनाथ गोयनका के जन्मस्थान दरभंगा के लोग हंसने लगे। दरभंगा के टाउन हॉल से पश्चिम कायस्थों और मारवाड़ियों की वस्तियों से लेकर दक्षिण के उर्दू बाजार इलाके के लोग भी हंस रहे थे। रामनाथ गोयनका का जन्म 3 अप्रैल 1904 को इसी इलाके में  हुआ था। लोगों का कहना हैं कि &#8216;अपने जीवन काल में गोयनका जी दरभंगा से जाने वाले किसी भी व्यक्ति को मुंबई में बहुत सम्मान करते थे, यह सच है; लेकिन यह भी उतना ही सच है कि विगत कई दशकों में गोयनका परिवार का कोई भी व्यक्ति दरभंगा की मिट्टी पर पैर नहीं रखे हैं। फिर कैसा घर वापसी?&#8221; </p></blockquote>
<p>इस &#8216;ऐतिहासिक घटना&#8217; के बाद पूर्व दिशा की ओर मुखकर मन ही मन गुनगुनाने लगा-&#8216;उगहु हे सूरज देव भइल अरघिया के बेर&#8217;- एक्सप्रेस का घर जाकर राजनेता के हाथों अख़बार का संस्करण लोकार्पित करना एक्सप्रेस की पत्रकारिता के लिए शुभ संकेत नहीं है, यह कुछ अलग संवाद दे रहा है। आज रामनाथ गोयेनका की आत्मा भी मन ही मन सोचती होगी कि क्या ऐसे दिन देखने के लिए ही इस अखबार को स्थापित किया था। जो राजनेता कुर्सी पर चिपके रहने के लिए कब किसके साथ चल देगा, प्रदेश के मतदाता क्या, पार्टी के विधायक भी नहीं जानते, वैसी स्थिति में इंडियन एक्सप्रेस को पटना लाने के पीछे, इसे लोकार्पित करने के पहले एक-अन्ने मार्ग क्या-क्या शर्त रखा होगा, यह गहन शोध का विषय है। </p>
<p><strong>मुख्यमंत्री महोदय को इंडियन एक्सप्रेस अखबार हाथ में लिए, एक्सप्रेस के संपादक उन्नी राजन, संतोष कुमार और अन्य गणमान्य लोगों को पंक्ति बद्ध तस्वीर खिंचवाते देख, ट्विटर और सामाजिक क्षेत्र के अन्य प्लेटफार्मों पर चिपका देख अचानक वरिष्ठ पत्रकार अक्षय मुकुल भी याद आ गए जो नौ वर्ष पहले 2 नवंबर 2016 को, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रामनाथ गोयनका पत्रकारिता उत्कृष्टता पुरस्कार की अध्यक्षता कर रहे थे,  कार्यक्रम का बहिष्कार किए थे। अक्षय मुकुल इंडियन एक्सप्रेस के संस्थापक के सम्मान में स्थापित पुरस्कार से अलंकृत किए गए थे । लेकिन एक पत्रकार के रूप में उन्हें इस बात की तकलीफ़ थी कि जिस व्यक्ति के नाम पर यानी रामनाथ गोयनका के नाम पर स्थापित पुरस्कार जिस व्यक्ति के हाथों दिया जा रहा था, उनके साथ मंच पर खड़े होकर पुरस्कार प्राप्त करना, उनके साथ तस्वीर खिंचवाना पत्रकारिता के लिए शुभ नहीं है।  उनकी अनुपस्थिति में उनकी पुस्तक, गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया के प्रकाशक हार्पर कॉलिन्स इंडिया के प्रकाशक और मुख्य संपादक कृष्ण चोपड़ा ने उनकी ओर से पुरस्कार ग्रहण किया था।</strong> </p>
<figure id="attachment_6725" aria-describedby="caption-attachment-6725" style="width: 1985px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-3-1-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-3-1-scaled.jpg" alt="" width="1985" height="2560" class="size-full wp-image-6725" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-3-1-scaled.jpg 1985w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-3-1-233x300.jpg 233w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-3-1-794x1024.jpg 794w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-3-1-768x990.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-3-1-1191x1536.jpg 1191w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-3-1-1588x2048.jpg 1588w" sizes="auto, (max-width: 1985px) 100vw, 1985px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6725" class="wp-caption-text">चुनाव से पूर्व इंडियन एक्सप्रेस का पटना आना अनेकानेक प्रश्न उठा रहे हैं </figcaption></figure>
<p>इंडियन एक्सप्रेस के पटना संस्करण का अपने घर पर लोकार्पण करते नीतीश कुमार ने कहा कि अच्छी पत्रकारिता नागरिकों को सशक्त बनाती है और सुशासन के लिए आवश्यक है। पटना संस्करण इंडियन एक्सप्रेस का 11वां संस्करण है। यहाँ के अलावे यह नई दिल्ली, मुंबई, नागपुर, अहमदाबाद, वडोदरा, जयपुर, लखनऊ, कोलकाता, चंडीगढ़, पुणे से प्रकाशित होता है। नीतीश कुमार कहते हैं: “मैं इंडियन एक्सप्रेस के पटना संस्करण के शुभारंभ पर बहुत खुश हूं। यह अच्छी बात है कि अखबार पटना आया है। मैं अपने कॉलेज के दिनों से ही अखबार का शौकीन पाठक रहा हूं। अच्छी पत्रकारिता नागरिकों को सशक्त बनाती है और सुशासन के लिए आवश्यक है।”</p>
<p><strong>आश्चर्य की बात तो यह है कि बंगाल की आवाज यानी आनंद बाज़ार पत्रिका समूह द्वारा प्रकाशित दी टेलीग्राफ अखबार का पटना संस्करण नीतीश कुमार के ऐतिहासिक कालखंड में ही दिसंबर 14 2018 को पटना को नमस्कार कर अनंत यात्रा पर निकला गया। इस अखबार में काम करने वाले कामगारों का, पत्रकारों का, गैर-पत्रकारों का क्या हुआ, उसके परिवार, परिजनों का क्या हाल हुआ, उम्मीद नहीं है कि नीतीश कुमार कभी पूछे भी होंगे। इससे वर्षों पहले आर्यावर्त, इंडियन नेशन, सर्चलाइट, प्रदीप और अनेकानेक दैनिक पटना में अंतिम सांस लिया और प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर सभी राजनेता, अभिनेता मूकदर्शक बने रहे। खैर। </strong></p>
<p>पटना से इंडियन एक्सप्रेस के प्रकाशन को बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के क्या भाजपा, क्या राष्ट्रीय जनता दल सभी स्वागत किया। प्रदेश के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का कहना था &#8216;यह बहुत गर्व और सम्मान की बात है कि इंडियन एक्सप्रेस पटना में आया है। यह अख़बार अपनी निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए जाना जाता है। हम जमीनी स्तर से लेकर शासन तक की अच्छी और व्यापक रिपोर्ट की उम्मीद कर रहे हैं।&#8221; इसी तरह, राजद के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा  कि &#8220;ऐसे युग में जहां सनसनीखेजता समझदारी पर विजय पा लेती है और कई मीडिया प्लेटफॉर्म अपना संतुलन खो चुके हैं, इंडियन एक्सप्रेस शोर पर समाचार का झंडा बुलंद करता है&#8230; उच्च गुणवत्ता वाले, अच्छी तरह से तर्क किए गए संपादकीय और ऑप-एड पर कोई समझौता नहीं करता है जो हमें राजनीति, नीति, समाज और अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर सूक्ष्म दृष्टिकोण की सराहना करने में मदद करता है।&#8221; अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरु अनुसार, “द इंडियन एक्सप्रेस के पटना/बिहार संस्करण के लॉन्च की खबर सुनकर बहुत खुशी हुई। मुझे उम्मीद है कि यह संस्करण यहां पत्रकारिता के लिए मानक स्थापित करेगा।”</p>
<p>संस्थान का कहना है कि पटना संस्करण का लॉन्च 1975 में आपातकाल लागू होने के 50 साल पूरे होने के महीने में हुआ है। लोकार्पण की घोषणा करते हुए, मुख्य संपादक राज कमल झा ने कहा: &#8220;अपनी खोजी और व्याख्यात्मक पत्रकारिता के माध्यम से, मूल फील्ड रिपोर्टिंग पर जोर देते हुए, हम बदलते बिहार की कहानी के साथ न्याय करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करेंगे।&#8221; जबकि, इंडियन एक्सप्रेस के अध्यक्ष विवेक गोयनका ने कहा: “बिहार हमेशा रामनाथ जी के दिल में एक बहुत ही खास जगह रखता था। पटना संस्करण हमारे समृद्ध इतिहास को एक राज्य और उसके लोगों के रोमांचक भविष्य की कहानी बताने के लिए इस्तेमाल करेगा।” मुख्यमंत्री को धन्यवाद देते हुए उन्नी राजन शंकर ने कहा: “पटना में इंडियन एक्सप्रेस बिहार की आवाज़ को पूरे देश तक ले जाएगा। प्रौद्योगिकी और समाज में इस तरह के विध्वंसकारी बदलाव के समय में यह और भी प्रासंगिक हो जाता है।” इस अवसर पर इंडियन एक्सप्रेस के उपाध्यक्ष (मार्केटिंग, उत्तर) प्रदीप शर्मा और पटना स्थित वरिष्ठ सहायक संपादक संतोष सिंह मौजूद थे। </p>
<figure id="attachment_6722" aria-describedby="caption-attachment-6722" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/akshay-mukul.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/akshay-mukul.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-6722" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/akshay-mukul.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/akshay-mukul-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/akshay-mukul-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/akshay-mukul-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/akshay-mukul-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6722" class="wp-caption-text">अक्षय मुकुल &#8211; गजब का पत्रकार</figcaption></figure>
<p>चलिए <strong>अक्षय मुकुल की पत्रकारिता</strong> पर चलते हैं। 2 नवंबर 2016 को, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रामनाथ गोयनका पत्रकारिता उत्कृष्टता पुरस्कार की अध्यक्षता कर रहे थे &#8211; जिसे इंडियन एक्सप्रेस ने अपने संस्थापक के सम्मान में स्थापित किया था &#8211; कम से कम एक प्राप्तकर्ता अपनी अनुपस्थिति के कारण चर्चा में था। टाइम्स ऑफ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार अक्षय मुकुल ने समारोह का बहिष्कार किया। मुकुल के स्थान पर उनकी पुस्तक, गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया के प्रकाशक हार्पर कॉलिन्स इंडिया के प्रकाशक और मुख्य संपादक कृष्ण चोपड़ा ने उनकी ओर से पुरस्कार ग्रहण किया।</p>
<p><strong>मुकुल, जो करीब 20 वर्षों तक एक संवाददाता के रूप में काम कर चुके थे, को उनकी पुस्तक के लिए पुस्तकों (गैर-काल्पनिक) की श्रेणी में रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, जो हिंदुत्व के वैचारिक आधार पर प्रकाश डालती है &#8211; विडंबना यह है कि यह प्रधानमंत्री की राजनीति का मुख्य आधार है। अगस्त 2015 में अपनी रिलीज़ के बाद से, गीता प्रेस एंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया ने शानदार समीक्षा प्राप्त की है और टाटा लिटरेचर लाइव जैसे साहित्यिक पुरस्कार जीते हैं! बुक ऑफ द ईयर अवार्ड और अंग्रेजी में सर्वश्रेष्ठ गैर-काल्पनिक कृति के लिए अट्टा गलाटा-बैंगलोर लिटरेचर फेस्टिवल बुक प्राइज। मुकुल को आरएनजी पुरस्कारों से कोई शिकायत नहीं थी। यह पुरस्कार जीतना एक “सम्मान” था। उनकी समस्या प्रधानमंत्री से पुरस्कार प्राप्त करने में थी। मुकुल ने कहा, “मैं इस विचार के साथ नहीं रह सकता कि मोदी और मैं एक ही फ्रेम में हों, कैमरे की ओर देखकर मुस्कुरा रहे हों और वे मुझे पुरस्कार दे रहे हों।” और बहुत सारी बातें उन दिनों अख़बारों के पन्नों पर सुर्खियां बनी थी। </strong></p>
<p>वैसे इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि इंडियन एक्सप्रेस का मुद्रण आज भी काले अक्षरों में ही होता है। लेकिन पटना सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिहार में अख़बार खुलने, प्रकाशन होने और राजनेताओं द्वारा इस्तेमाल होने के बाद जिस तरह डाक बंगला चौराहे पर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है, उसके विरुद्ध आज किसी भी अखबार के संस्थान के स्वामियों में यान पत्रकारों में, यहाँ तक की सम्पादकों में ताकत नहीं है।  खासकर नब्बे के दशक के बाद से। कल जब बिहार में इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबार का पटना संस्करण लांच करते प्रदेश के मुख्यमंत्री को देखा तो हैरान रह गया। उससे भी अधिक यह देखकर लगा कि एक्सप्रेस के संपादक से लेकर अधिकारी और संवाददाता तक पैदल चलकर मुख्यमंत्री आवास पहुंचे। जब यह कहा गया कि पटना संस्करण को 1975 में आपातकाल लागू होने के 50 साल पूरे होने के महीने में हो रहा है, अचानक आर्यावर्त-इंडियन नेशन अखबार के दफ्तर का पोर्टिको याद आ गया। </p>
<p>जय प्रकाश नारायण का सम्पूर्ण क्रांति बिहार ही नहीं, देश के लोगों के मगज पर चढ़ रहा था। देश के मतदाता देश की राजनितिक व्यवस्था में बदलाव चाहते थे। स्वाभाविक है। सत्तारूढ़ के अलावे विपक्ष के नेताओं को भी सत्ता का रसास्वादन करने का संवैधानिक अधिकार है। देश का क्या होगा, यह न तो उन दिनों लोगों को, राजनेताओं को चिंता थी, न आज है। पंचायत से संसद तक चाहे क्रिया-कलाप ठीक-ठाक संचालित होता भी रहे, कुर्सियों को देखकर कुकुरमुत्तों की तरह पनपते नेताओं को खुजली होने लगती है, वे चक्रव्यूह रचने लगते हैं, ताकि सतारूढ़ दल धराम से नीचे गिरे और वे मुस्कुराते शपथ लेकर कुर्सी से चिपक जायँ। यह मानव का लक्षण है। जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के समय बिहार में यह बात तनिक अधिक देखने को मिला।  </p>
<p>वैसे तो चौथी विधान सभा से ही, लेकिन पांचवी विधान सभा काल आते-आते सरकारी महकमे में “आया-राम-गया-राम” वाली बात पटना के सर्कुलर रोड, सरपेंटाइन रोड, बेली रोड, फ़्रेज़र रोड पर अधिक प्रचलित हो गया था। मंत्री से लेकर संत्री तक, अधिकारी से लेकर चपरासी तक, जिलाधिकारी से लेकर मुंशी तक सभी हनुमान चालीसा पढ़ते सोते थे और सुवह विष्णुसहस्रनाम पढ़ते जागते थे, ताकि विपत्ति का पहाड़ न टूट पड़े उनपर ।  </p>
<figure id="attachment_6726" aria-describedby="caption-attachment-6726" style="width: 1524px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/1a.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/1a.jpg" alt="" width="1524" height="922" class="size-full wp-image-6726" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/1a.jpg 1524w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/1a-300x181.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/1a-1024x620.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/1a-768x465.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1524px) 100vw, 1524px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6726" class="wp-caption-text">साल 1975: इंडियन नेशन अख़बार के तत्कालीन संपादक दीना नाथ झा</figcaption></figure>
<p>राजनेताओं की तो बात ही नहीं करें। उनकी गर्दन हमेशा बक्सर के पुल पर लटका होता था। कब नीचे गंगा में प्रवाहित हो जायेंगे, कब पदच्युत हो जायेंगे, कब कौन लंगड़ी मार देगा, कब कौन छिटकिनी लगाकर मुंह के बल गिरा देगा, कोई नहीं जानता था। विहार विधान सभा और विधान परिषद् में आज भी दर्जनों “सम्मानित विधायकगण” हैं, जिनकी स्थिति फ़्रेज़र रोड के कोने पर स्थित (उस समय) उडप्पी से आर्यावर्त-इण्डियन नेशन के कार्यालय से दस कदम आड़े पिंटू होटल तक आते-आते भय से रक्तचाप बढ़ जाता था। वे गवाह होंगे,  सांस ले रहे हैं । कई बार ऐसी स्थिति का सामना वे सभी किये थे जब ‘प्रेस रिलीज’ निर्गत करते समय जिस पदभार का मुहर प्रेस रिलीज पर लगाए थे, समाचार बनने के समय तक पदभार से मुक्त हो जाया करते थे। बिहार विधान परिषद् में आज भी ऐसे अनेकानेक माननीय सदस्य हैं जो उन दिनों उस समय के उभरते नेताओं के पीछे-पीछे चलते थे। वे हँसते थे तो इस ठहाका लगा देते थे। </p>
<p>लेकिन आज वे राजनीति में मठाधीश बने बैठे हैं। उन दिनों पटना से प्रकाशित आर्यावर्त-इंडियन नेशन समाचार पत्रों में अपना नाम प्रकाशित करने के लिए, अपना विज्ञप्ति छपाने के लिए, जो सुबह से शाम तक “दण्ड बैठकी” करते थे, आज उसी संस्थान के सैकड़ों-हज़ारों कर्मचारियों, उनके परिवारों को “प्राणायाम” कराते नहीं थकते। कई तो प्राणायाम करते ईश्वर को प्राप्त हो गए, कुछ कतारबद्ध हैं। लेकिन उन्हें क्या? राजनीतिक गलियारे में, मंत्री-संत्री की कुर्सियों पर चिपकने के बाद जनता के बारे में कौन सोचता है? या उन लोगों के बारे में कौन सोचता है, जो शुरूआती दिनों में ‘ऊँगली’ पकड़कर नाम, प्रतिष्ठा, शोहरत दिलाया था। खैर। </p>
<p><strong>उन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री थे अब्दुल गफ्फूर। कहने के लिए तो छठा विधान सभा कालखंड था, लेकिन गफ्फूर साहेब 13 वें मुख्यमंत्री के रूप में कुर्सी पर बैठे थे। एक मुख्यमंत्री का कार्यकाल, जो पांच साल का (विधान सभा अवधि के बराबर) होनी चाहिए थी, औसतन ढाई-साल और उससे कम की अवधि में कुर्सी को नमस्कार कर “भूतपूर्व” हो जाया करते थे। गफूर साहब 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975 तक बिहार राज्य के तेरहवें मुख्यमंत्री के रूप में सेवा किये । वे राजीव गांधी के समय में कैबिनेट मंत्री के रूप में भी शोभायमान हुए थे। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दें गफ्फूर साहेब। </strong></p>
<p>वैसे, 1967 और 1971 के बीच, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तूती बोलती थी, चाहे पार्टी हो या सरकार। सबों को अपने नियंत्रण में ले ली थी श्रीमती गाँधी। आज की तरह ही, उन दिनों भी केंद्रीय सरकार का अर्थ केंद्रीय मंत्रिमंडल कोई नहीं था, बल्कि प्रधानमंत्री के सचिवालय ही हो गया था। सम्पूर्ण सरकार वहीँ केंद्रित थी। जो उनके भरोसे मंद थे, उनका तेवर कुछ और था, जो विश्वासभाजन नहीं थे, उनकी तो तो बात ही नहीं करें। सत्तर के दशक के प्रारंभिक महीनों, वर्षों में जो हुआ वह देश जानता है, जहां तक राजनीति का सवाल है। परन्तु जो नहीं जानता है वह यह की उन दिनों आर्यावर्त-इण्डियन नेशन-मिथिला मिहिर पत्र समूह का सम्पादकगण न केवल अपनी कलम में ताकत रखते थे, बल्कि उस समय के मंत्रियों, चाहे मुख्यमंत्री ही क्यों न हो, पुलिसकर्मियों चाहे पुलिस महानिदेशक ही क्यों न हो, उन्हें उनकी औकात दिखने की क्षमता रखते थे। कुछ ऐसी ही ऐतिहासिक घटना हुई थी उस दिन। </p>
<figure id="attachment_6728" aria-describedby="caption-attachment-6728" style="width: 2194px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-4-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-4-scaled.jpg" alt="" width="2194" height="2560" class="size-full wp-image-6728" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-4-scaled.jpg 2194w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-4-257x300.jpg 257w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-4-878x1024.jpg 878w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-4-768x896.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-4-1317x1536.jpg 1317w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-4-1756x2048.jpg 1756w" sizes="auto, (max-width: 2194px) 100vw, 2194px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6728" class="wp-caption-text">इंडियन एक्सप्रेस के सहायक संपादक संतोष कुमार सिंह, जो बिहार के संवाददाता भी है</figcaption></figure>
<p>1975 की तपती गर्मी के दौरान अचानक भारतीय राजनीति में भी बेचैनी दिखी। यह सब हुआ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले से जिसमें इंदिरा गांधी को चुनाव में धांधली करने का दोषी पाया गया और उन पर छह वर्षों तक कोई भी पद संभालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। लेकिन इंदिरा गांधी ने इस फैसले को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की और 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी । उस दिन आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा, “जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील क़दम उठाए हैं, तभी से मेरे ख़िलाफ़ गहरी साजिश रची जा रही थी।” 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में देश में आपातकाल घोषित था।जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के तहत पटना के दो प्रमुख अख़बारों के दफ्तरों को सुपुर्दे ख़ाक करने की तैयारी हो चुकी थी। नेता से लेकर, व्यापारी तक, पुलिस से लेकर अपराधी तक, आंदोलन में कतारबद्ध लोगबाग यह निर्णय ले लिए थे कि अमुक दिन पहले सर्चलाइट-प्रदीप और फिर आर्यावर्त-इण्डियन नेशन – मिथिला मिहिर का दफ्तर फूंका जायेगा।</p>
<p><strong>सर्चलाइट-प्रदीप जलकर स्वाहा हो गया परन्तु, जब आर्यावर्त-इण्डियन नेशन की बात आई तो इण्डियन नेशन के तत्कालीन संपादक दीनानाथ झा सामने खड़े हो गए। उस दिन वैसे तो संस्थान के लगभग सभी कर्मचारी गोलबंद हो गए थे, लेकिन संध्याकाळ होते-होते संस्थान के मुख्य द्वार के बजाय पिछले दीवारों को, जो जमाल रोड से मिलती थी, लांघ कर अपने-अपने घरों की ओर बच-बचाकर कूच कर रहे थे। धीरे-धीरे सम्पूर्ण परिसर वीरान हो गया। मुख्य द्वार पर 50-60 किलो शारीरिक वजन वाले दरवान ही रह गए थे। यह स्थान प्रवेश द्वार के ठीक सामने पोर्टिको का था। दिना बाबू वहीं बैठ गए। अब तक ‘जॉब-विभाग’ में कार्य करने वाले बागेश्वरी प्रसाद ही बच गए थे, जो दीना बाबू के बगल में खड़े थे। बागेश्वरी प्रसाद का शारीरिक वजन भले 65 किलो के आसपास रहा होगा उस शाम, लेकिन उन्होंने हज़ारों-हज़ार किलो के मानसिक वजन वाले लोग जैसा कार्य किया था। दीना बाबू उन्हें भी जाने को कहे। वे दीना बाबू का बाहर सम्मान करते थे। </strong></p>
<p>इसी बीच लाइनों विभाग में कार्य करने वाला जयप्रकाश, जो शरीर से कोई छः फिट लम्बा था, कुछ पल दीना बाबू और बागेश्वरी प्रसाद के पास खड़े रहे, लेकिन तक्षण संस्थान के पिछले दीवार की ओर भागे, जिधर से सभी कर्मचारी अपने-अपने घरों की ओर उन्मुख थे। जयप्रकाश जोर से आवाज लगाया : “रुक जाओ…रुक जाओ कहीं दीना बाबू अपना दाह नहीं कर लें। वे कह रहे हैं अगर संस्थान बचेगा तभी हम सभी कर्मचारियों का जीवन है, अन्यथा कोई अस्तित्व नहीं है। सभी कर्मचारियों के कदम वापस हो गए। परिसर में अखबार बेचने वालों की साईकिल लगी थी, संख्या सैकड़ों में थी। सभी साईकिल सामने के भवन के छत पर क्षणभर में चले गए। ईंट, पत्थर आदि भी एकत्रित हो गए। चतुर्दिक आंदोलनकारी भी भर गए थे फ़्रेज़र रोड पर। लेकिन ऊपर से साइकिलों, पत्थरों और ईंटों के प्रहार से वे संस्थान के अंदर प्रवेश नहीं ले सके। इस बीच, दिना बाबू तत्कालीन पुलिस महानिदेशक वाई.एन. झा से संस्थान की सम्पूर्ण सुरक्षा के लिए सुरक्षा बल मुहैया करने को कहा। पुलिस महानिदेशक, बिहार में प्रचलित उस कहावत को चरितार्थ कर दिए जब एक व्यक्ति के पेशाब की जरूरत हुई और वह व्यक्ति कहने लगा की वह पिछले छः माह से पेशाब किया ही नहीं और अगले एक वर्ष तक लघुशंका करेगा भी नहीं। अब तक पोर्टिको में कर्मचारियों का बैठक बन गया था। टेलीफोन भी लग गए थे। </p>
<p><strong>दूसरे दिन प्रदेश के मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर अपने चेला-चपाटियों के साथ आर्यावर्त-इण्डियन नेशन कार्यालय में धमके। प्रांगण के अंदर प्रवेश के साथ ही कार्यालय परिसर के समस्त कर्मचारी गोलबंद हो गए। मुख्यमंत्री अपने काफिले के साथ पोर्टिको तक पहुंचे। दीना बाबू वहीँ थे। अब्दुल गफूर को देखते ही दीनानाथ झा का रक्तचाप बढ़ गया। वे जब गुस्स में होते थे तो उनका सम्पूर्ण शरीर कांपने लगता था। दृश्य बहुत संवेदनशील था। दीनानाथ जी बाहर गेट के तरफ अपनी ऊँगली से इशारा करते अब्दुल गफूर को बाहर निकलने को कहा। स्थिति बद से बत्तर हो रही थी। एक पत्रकार और मुख्यमंत्री आमने सामने था। तभी फोन की घंटी टनटनायी – “हेल्लो !!! रेस्पेक्टेड दीना बाबू, मैडम विश तो टॉक तो यु…. प्लीज सर।” </strong></p>
<p>फोन के दूसरे छोड़ पर दिल्ली से श्रीमती इंदिरा गाँधी थीं। अब्दुल गफूर उलटे पैर वापस अपने कार्यालय में आ गए। फ़्रेज़र रोड पर बड़े-बड़े बसों में लदे तक़रीबन 50 बन्दुक, राइफलों से लैश केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के लोग कार्यालय परिसर में प्रवेश लिए और बिहार के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक तत्काल प्रभाव से हस्तानांतरित हो गए। इसके बाद विद्याचरण शुक्ल – अब्दुल गफूर के साथ फिर एक बार रूबरू बकझक हुआ। और दोनों नेता पुनः मुंह के बल गिरे। पत्रकारिता में सम्मान था। पत्रकार भी सम्मानित थे। </p>
<p>सत्तर के दशक या उससे पूर्व की पत्रकारिता की तुलना नब्बे के दशक के बाद से लगातार, आज तक, हम नहीं कर सकते हैं। उन दिनों की पत्रकारिता, या पत्रकारों के प्रति, पत्रकारिता के प्रति तत्कालीन राजनेताओं का जो सम्मान था, पत्रकारों की कलम में जो ताकत थी, उनकी जो सोच थी, समाज के प्रति उनकी जो प्रतिबद्धता थी; आज की तुलना नहीं कर सकते हैं। आज सब कुछ बदल गया है। मालिकों की सोच बदल गयी है। कर्मचारियों की सोच बदल गयी है। लेकिन बाबूजी कहते थे: “अंतिम दम तक लड़ना सीखो, क्या पता अंतिम चाल में ही कामयाबी मिल जाय।” आज आर्यावर्त – इंडियन नेशन – मिथिला मिहिर अखबार बंद हो गया, नामोनिशान मिटा दिया पटना के फ़्रेज़र रोड पर। कुछ कर्मचारी भी दोषी थे, कुछ प्रबंधन भी, मालिक तो थे ही। </p>
<p><strong>क्या एक्सप्रेस चुनाव प्रचार-प्रसार के लिए आया है पटना </strong></p>
<p>2025 में होने वाली विधानसभा का चुनाव अपनी शुरूआती तारीख से 18 वीं संख्या की होगी। बिहार का पहला मुख्यमंत्री बने श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) तक।  इसके बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) तक। बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970, कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979, केदार पांडे 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973, अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975, जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 और सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक। </p>
<p>प्रदेश का चुनावी इतिहास इस बात का गवाही है कि कांग्रेस पार्टी को उखाड़ फेंकने के लिए बनी जनता पार्टी 1977 के चुनाव में जहाँ 214 स्थान प्राप्त की थी, वहीँ 1980 के चुनाव में 42 सीटों के साथ चौधरी चरण सिंह वाली सेकुलर जनता पार्टी सबसे बड़ी दूसरी पार्टी थे। उस चुनाव में सीपीआई को 23, भारतीय जनता पार्टी को 21, इंडियन कांग्रेस (यु) को 14, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को 11, जनता पार्टी (जेपी) को 13, जनता पार्टी (राजनारायण) को एक तथा 23 निर्दलीय विधायक जीतकर विधान सभा पहुंचे थे। 1985 के चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर आयी थी जहाँ उसने 323 संख्या वाली विधान सभा में 196 सीटें प्रतप्त की थी जो बहुमत से अधिक थी। नौवां विधान सभा का कालखंड में डॉ. जगन्नाथ मिश्र 94 दिनों (6 दिसंबर, 1989 से 10 मार्च, 1990) के मुख्यमंत्री थे। प्रदेश के लोग इस बात से इंकार नहीं करेंगे 10 मार्च 1990 से प्रदेश रसातल की ओर उन्मुख हो गया। </p>
<p>सं 1951 में बिहार में बिहार में विधानसभा चुनाव की शुरुआत हुई थी। अन्य चुनावों की बात और परिणाम अगर छोड़ भी दें तो आज़ादी के बाद बिहार में पहली बार 1977 में कांग्रेस पार्टी बड़ी तरह परास्त हुई। उस कालखंड में विधानसभा के 324 सीटों में कांग्रेस पार्टी महज 57 सीटों पर सिमट गई। लेकिन जो भी पार्टी सरकार में आयी, वह पांच वर्ष पूरा नहीं कर पायी। परिणाम स्वरुप तीन वर्ष बाद 1980 में मध्यवर्ती चुनाव में कांग्रेस पार्टी 169 सीटों पर कब्ज़ा कर पूर्ण बहुमत के साथ सर्कार भी बनायीं। वैसे 1980 से पहले प्रदेश में दो बार मध्यवर्ती चुनाव हुआ था। पहला चुनाव संपन्न हुआ था 1969 में और दूसरा 1972 में। सन 1969 में कांगेस को 118 स्थान मिले थे जबकि  सं 1972 के मध्यवर्ती चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 318 सीटों में से 167 स्थान मिले थे। </p>
<p><strong>बिहार में अख़बारों का इतिहास </strong></p>
<p>इसी बहाने आनंद वर्धन लिखित बिहार में अख़बारों के जन्म और मृत्यु को भी देखते चलते हैं। 19वीं सदी के उत्तरार्ध से, बिहार ने भारतीय प्रेस के स्थिर विकास में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। बिहार के प्रेरित और उद्यमी पुरुषों द्वारा स्थापित और स्वामित्व वाले तथा प्रांत से संचालित समाचार प्रकाशन, ब्रिटिश शासन के तहत बिहार की यात्रा का हिस्सा थे। स्वतंत्रता के कुछ दशक बाद भी यह ऐसा ही रहा। विद्वानों और शोधकर्ताओं ने बिहार के प्रेस के लंबे इतिहास में कुछ पहलुओं को तलाशने की कोशिश की है। बिहार सरकार और केंद्र सरकार के तत्वावधान में किए गए दो आधिकारिक अध्ययन बिहार में समाचार प्रकाशनों के विकास पर जानकारी के उपयोगी स्रोत हैं: एन कुमार की जर्नलिज्म इन बिहार (बिहार राज्य गजेटियर, बिहार सरकार, 1971 के पूरक के रूप में) और जे नटराजन की हिस्ट्री ऑफ इंडियन जर्नलिज्म (प्रेस आयोग, प्रकाशन विभाग, 1954 की रिपोर्ट का दूसरा भाग)। हाल के वर्षों में, इतिहासकार सुमिता सिंह ( भारतीय इतिहास कांग्रेस की कार्यवाही , खंड 73, 2012) और मीडिया आलोचक सेवंती निनान ( हेडलाइंस फ्रॉम द हार्टलैंड , 2007) ने भी बिहार में समाचार प्रकाशन के शुरुआती चरणों पर उपयोगी सामग्री खोजी है। विभिन्न स्रोतों से बिहार में प्रेस के विकास में मील के पत्थर की रूपरेखा उभरती है। </p>
<p><strong>आधुनिक इतिहास में, बिहार में पहला ज्ञात समाचार प्रकाशन 1856 तक का माना जा सकता है। उससे पहले, जैसा कि बिहार रिसर्च सोसाइटी के जर्नल में उल्लेख किया गया है , 1850 में शाह कबीरुद्दीन अहमद द्वारा एक प्रिंटिंग प्रेस स्थापित की गई थी। हालाँकि, इसका उपयोग समाचार पत्र प्रकाशित करने के लिए नहीं किया गया था। </strong></p>
<p>यह पहला अख़बार ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए प्रकाशित किया गया था। उस समय पटना के कमिश्नर विलियम टेलर ने 3 सितंबर, 1856 को उर्दू अख़बार अख़बार-ए-बिहार का प्रकाशन शुरू करने की पहल की। बिहार को अपना पहला अख़बार देखने में 16 साल लग गए, जिसे क्षेत्र के शिक्षित लोगों के बीच अच्छी खासी पाठक संख्या मिली। 1872 में, बालकृष्ण भट्ट और केशवराम भट्ट द्वारा स्थापित एक हिंदी अख़बार बिहार बंधु ने कलकत्ता से प्रकाशन शुरू किया, लेकिन 1874 में इसे पटना ले जाया गया। मुंशी हसन अली इसके पहले संपादक थे। पटना में एक उचित बिहार-आधारित अख़बार बनने के बाद, बिहार बंधु ने कानूनी अदालतों में हिंदी की शुरूआत के लिए एक सफल अभियान शुरू किया। अगले दशकों में अलग-अलग संपादकों के तहत, अख़बार ने 20वीं सदी के दूसरे दशक तक अपनी यात्रा जारी रखी। जिस साल बिहार में पहला हिंदी अख़बार शुरू हुआ, उसी साल पहला अंग्रेज़ी अख़बार भी शुरू हुआ। बिहार हेराल्ड की स्थापना 1872 में हुई थी। इसका संपादन गुरु प्रसाद सेन ने किया और 1900 में अपनी मृत्यु तक वे इस पद पर बने रहे। हालाँकि, यह अख़बार बिहार में रहने वाले बंगालियों के हितों पर केंद्रित था और इसलिए इसकी कवरेज बहुत व्यापक नहीं थी। </p>
<p><strong>अगले दो दशकों के दौरान, बिहार में तीन नए अंग्रेजी अख़बारों ने अलग-अलग वर्षों में अपनी यात्रा शुरू की: इंडियन क्रॉनिकल (1881), बिहार टाइम्स (1894), और बिहार गार्जियन (1899)। इनमें से, बिहार टाइम्स ने बंगाल प्रांत से बिहार को अलग करने के एक दृढ़ समर्थक के रूप में अपनी पहचान बनाई। बिहार टाइम्स की स्थापना 1894 में सचिदानंद सिन्हा ने की थी, जब वे अपनी यूनिवर्सिटी की पढ़ाई पूरी करने के बाद इंग्लैंड से लौटे थे। उनके साथ उनके समकालीन महेश नारायण, विशेश्वर सिंह, सालिग्राम सिंह, महावीर सहाय और नंद किशोर लाल भी थे। महेश नारायण इसके पहले संपादक थे और 1907 में अपनी मृत्यु तक उन्होंने इसका संपादन किया। सचिदानंद सिन्हा उस समय बिहार से एक महत्वपूर्ण बौद्धिक आवाज़ थे, और उन्होंने अखबार का समर्थन किया। राष्ट्रीय आंदोलन में एक बेहद सम्मानित व्यक्ति, उन्होंने भारत की संविधान सभा के पहले अध्यक्ष की अस्थायी जिम्मेदारी संभाली, इससे पहले कि एक और प्रतिष्ठित बिहारी, डॉ राजेंद्र प्रसाद, संविधान सभा के पूर्णकालिक अध्यक्ष के रूप में उनकी जगह लेते। बिहार टाइम्स ने बंगाल प्रांत से बिहार को अलग करने के लिए एक संपादकीय अभियान चलाया, और इस मांग की पत्रकारीय अभिव्यक्ति में इसकी भूमिका का उल्लेख इतिहासकार सुमिता सिंह ने अलग बिहार के निर्माण में प्रेस की भूमिका (2012) में किया है। 19वीं सदी के आखिरी सालों और 20वीं सदी की शुरुआत में बिहार में जातिगत संबद्धता के आधार पर एक अलग तरह का प्रकाशन भी देखा जा सकता था। हालाँकि, वे मूल रूप से सामुदायिक समाचार पत्र थे, समाचार पत्र नहीं, और इसमें पटना से कायस्थ गजट (1889) , गया से कायस्थ मैसेंजर, क्षत्रिय समाचार, भूमिहार ब्राह्मण पत्रिका, तेली समाचार और रौनियार वैश्य शामिल थे ।</strong></p>
<p>1906 में बिहार टाइम्स ने अपना नाम बदलकर बिहारी रख लिया । उसी साल बिहार गार्जियन ने अपना नाम बदलकर बिहारी रख लिया । दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों अख़बारों ने अदालत के आदेश के बाद अपने नए नामों की अलग-अलग स्पेलिंग तय कर ली। नया नाम बिहारी ज़्यादा दिन तक नहीं चल सका और कुछ ही सालों में बंद हो गया। बिहारी का प्रकाशन सच्चिदानंद सिन्हा के साथ-साथ सैयद हसन इमाम के संपादकीय के तहत हुआ। 1913 में जब यह दैनिक बना तो इसके संपादक महेश्वर प्रसाद थे। लेकिन यह इस रूप में सिर्फ़ चार साल ही चला और 1917 में बंद हो गया। </p>
<figure id="attachment_6727" aria-describedby="caption-attachment-6727" style="width: 1363px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/ssssssss.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/ssssssss.jpg" alt="" width="1363" height="1949" class="size-full wp-image-6727" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/ssssssss.jpg 1363w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/ssssssss-210x300.jpg 210w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/ssssssss-716x1024.jpg 716w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/ssssssss-768x1098.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/ssssssss-1074x1536.jpg 1074w" sizes="auto, (max-width: 1363px) 100vw, 1363px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6727" class="wp-caption-text">आज The Hindustan Times में कार्य करने वाले पत्रकारों को शायद मालूम नहीं हो कि पटना अथवा दिल्ली से प्रकाशित The Hindustan Times का वजूद यही अख़बार है।</figcaption></figure>
<p>हालांकि, एक साल बाद ही सचिदानंद सिन्हा ने पटना से एक और समाचार प्रकाशन शुरू करके इस कमी को पूरा किया, अंग्रेजी समाचार द्विसाप्ताहिक, सर्चलाइट । 1920 में यह त्रैमासिक और फिर 1930 में दैनिक बन गया। सर्चलाइट की शुरुआत के प्रयासों में कई लोगों ने सहयोग किया , जिसका आधार एक प्रगतिशील राष्ट्रवादी संपादकीय दृष्टिकोण था, जिसमें डॉ राजेंद्र प्रसाद भी शामिल थे, जो अखबार के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। सैयद हैदर हुसैन और महेश्वर प्रसाद सर्चलाइट के पहले दो संपादक थे, लेकिन बाद के वर्षों में सीआर सौम्याजुलु और एस रंगा अय्यर जैसे संपादकों के उत्तराधिकार ने अखबार का संपादन किया। इसके शुरुआती कुछ दशकों में मुरली मनोहर प्रसाद इसके सबसे लंबे समय तक संपादक रहे। बाद में, के रामाराव, एम शर्मा, डीके शारदा, टीजेएस जॉर्ज, एससी सरकार, एसके राव और आरके मक्कड़ पटना में इसके संपादकीय कार्यालय के प्रमुख रहे। </p>
<p>1930 में, बिहार को प्रांत में एक नया अंग्रेजी समाचार पत्र मिला, इंडियन नेशन । इसकी स्थापना दरभंगा के महाराजा ने की थी, जो आंशिक रूप से बिहार के मिथिला क्षेत्र पर अख़बार के अधिक ध्यान को समझाता है। यह इसके कर्मचारियों की संरचना में भी स्पष्ट था, क्योंकि कर्मचारियों का एक बड़ा हिस्सा मिथिला क्षेत्र से था। 1941 में, इंडियन नेशन को दैनिक आर्यवर्त के रूप में एक सहयोगी हिंदी प्रकाशन भी मिला । आज़ादी के बाद लगभग चार दशकों तक इन दैनिकों ने बड़े राष्ट्रीय अख़बारों की व्यापक पहुँच और संसाधनों के मुक़ाबले अपनी स्थिति बनाए रखी। ख़ास तौर पर, सर्चलाइट की रिपोर्ट्स की चर्चा उच्च पदों पर बैठे भ्रष्टाचार के खिलाफ़ होती थी, कभी-कभी तो हद से भी आगे निकल जाती थी। 1960 के दशक में, बिहार की केबी सहाय के नेतृत्व वाली सरकार में भ्रष्टाचार और सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ़ रिपोर्ट्स के कारण इसके संपादक टीजेएस जॉर्ज को जेल जाना पड़ा। यहां तक कि इसका हिंदी प्रकाशन, प्रदीप , 1970 के दशक के आरंभ में भ्रष्टाचार विरोधी जेपी आंदोलन के दौरान समाचार का सबसे अधिक मांग वाला स्रोत था। </p>
<p><strong>हालाँकि, 1980 के दशक के उत्तरार्ध में परिदृश्य बदल गया। इस समय, बिड़ला समूह ने सर्चलाइट और प्रदीप का अधिग्रहण कर लिया था । हालाँकि, इसने पटना में उनके संपादकीय कामकाज और सामग्री निर्माण में कोई छेड़छाड़ नहीं की। फिर 1986 में, बिड़ला समूह ने फैसला किया कि अब उनके राष्ट्रीय अखबारों &#8211; हिंदुस्तान टाइम्स और हिंदुस्तान &#8211; के लिए बिहार मीडिया बाजार में प्रवेश करने का समय आ गया है। अपने राष्ट्रीय अखबारों के लिए रास्ता बनाने के लिए, सर्चलाइट और प्रदीप को पूरी तरह से बंद कर दिया गया। अंग्रेजी समाचार पत्र क्षेत्र में अग्रणी टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी शीघ्र ही इसका अनुसरण किया और 1980 के दशक के अंत में पटना संस्करण शुरू किया।  इसी समय, इंडियन नेशन और आर्यवर्त को अपने सीमित फोकस, घटती पाठक संख्या और यूनियन हड़तालों के कारण समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। प्रिंट उत्पादन के तकनीकी उन्नयन में निवेश करने में उनकी विफलता ने उनकी परेशानियों को और बढ़ा दिया। विज्ञापन राजस्व में ठहराव या गिरावट ऐसे कारकों का संचयी प्रभाव था। इंडियन नेशन किसी तरह 90 के दशक में चलता रहा, लेकिन बीच-बीच में छपने के बाद दशक के अंत में बंद हो गया। आर्यावर्त भी बंद हो गया। </strong></p>
<p>1990 के दशक के प्रारंभ में, विद्वान अरविंद एन दास ने अपनी पुस्तक, द रिपब्लिक ऑफ बिहार (पेंगुइन, 1992) में इन परिवर्तनों का उल्लेख किया था। उन्होंने लिखा: &#8220;शहर में लंबे समय से एक समृद्ध प्रेस का बोलबाला रहा है। अब हालांकि सर्चलाइट और प्रदीप जैसे प्रमुख स्थानीय समाचारपत्रों को विशाल हिंदुस्तान टाइम्स और हिंदुस्तान के रूप में राष्ट्रीय मीडिया प्रतिष्ठान में शामिल कर लिया गया है , लेकिन इंडियन नेशन , आर्यावर्त और बिहार हेराल्ड जैसे अन्य समाचारपत्रों की मृत्यु हो गई है , लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे नए और बड़े प्रकाशन राज्य में सामने आए हैं।&#8221; हालांकि, यह भी सवाल है कि 1980 के दशक के बाद से राष्ट्रीय मीडिया को बिहार की ओर क्या आकर्षित करने लगा। दास और मीडिया आलोचक सेवंती निनान की किताबों ने इसका जवाब देने की कोशिश की है। दास ने कहा, &#8220;यह आश्चर्य की बात नहीं है कि बिहार, जो कि प्रति व्यक्ति आय में बहुत कम है, में समाचार पत्रों का संयुक्त प्रसार मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों से कहीं अधिक है।&#8221; </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-2-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-2-2.jpg" alt="" width="1984" height="2559" class="aligncenter size-full wp-image-6731" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-2-2.jpg 1984w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-2-2-233x300.jpg 233w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-2-2-794x1024.jpg 794w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-2-2-768x991.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-2-2-1191x1536.jpg 1191w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/06/Express-2-2-1588x2048.jpg 1588w" sizes="auto, (max-width: 1984px) 100vw, 1984px" /></a></p>
<p>पंद्रह साल बाद, निनान ने बिहार के अख़बार बाज़ार में बड़े मीडिया खिलाड़ियों के निवेश के बारे में अपने तर्क में उसी संभावना को पहचाना। हेडलाइंस फ्रॉम द हार्टलैंड में , निनान ने लिखा: &#8220;भारत के सबसे पिछड़े राज्य के रूप में अपनी छवि के बावजूद, बिहार एक अख़बार के लिए एक अच्छा निवेश था। यहाँ की आबादी राजनीतिक रूप से जागरूक थी, भले ही साक्षरता कम थी। और प्रेषण और कृषि संपदा के कारण, राज्य में बहुत सारा पैसा था जिसका दोहन किया जा सकता था।&#8221; यहाँ, यह देखना भी दिलचस्प है कि दास ने किस तरह एक दुष्चक्र की ओर इशारा किया जिसने 1980 और 1990 के दशक में बिहार के प्रमुख अखबारों को आर्थिक रूप से कमज़ोर कर दिया था। स्थिर विज्ञापन राजस्व के कारण उनके पास प्रिंट उत्पादन तकनीक में निवेश करने के लिए बहुत कम पैसे बचे थे, और उनके संचालन की पुरानी तकनीक ने उन्हें संभावित विज्ञापनदाताओं के लिए आकर्षक नहीं बनाया। दास ने यह भी तर्क दिया कि पाठकों की कम क्रय शक्ति विज्ञापनदाताओं के उदासीन दृष्टिकोण का कारण है। दास ने तर्क दिया, &#8220;जबकि प्रसार में वृद्धि हुई है, विज्ञापन आनुपातिक रूप से नहीं बढ़े हैं&#8230;नतीजतन, मुद्रण तकनीक या प्रकाशन गुणवत्ता में बहुत कम सुधार हुआ है। इसलिए, उदाहरण के लिए, रंगीन मुद्रण की कोई सुविधा नहीं है &#8211; उच्च श्रेणी के विज्ञापन के लिए एक आवश्यक आवश्यकता जो प्रकाशन के लिए आवश्यक सब्सिडी प्रदान करती है।&#8221;</p>
<p>पाटलिपुत्र टाइम्स जैसे अख़बार को नए सिरे से शुरू करने के छिटपुट प्रयास भी लंबे समय तक नहीं चल पाए। अभी भी कई हिंदी दैनिक और अविनाश चंद्र मिश्रा की राजनीतिक समाचार पत्रिका, समकालीन तापमान (1997 में स्थापित) जैसी पत्रिकाएँ हैं, जो क्षेत्रीय समाचार क्षेत्र में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं। पटना में स्थित कुछ उर्दू समाचार प्रकाशनों को राज्य में अभी भी सीमित पाठक मिल रहे हैं। हालाँकि, पटना स्थित हिंदी और उर्दू प्रकाशन अब उस पहुंच और प्रभाव के आसपास भी नहीं हैं जो बिहार स्थित समाचार प्रकाशनों के पास हुआ करता था। राज्य से मीडिया उद्यम प्रयास स्पष्ट रूप से स्थानीय टेलीविजन समाचार चैनलों या डिजिटल स्पेस में स्थानांतरित हो गए हैं। डिजिटल उपस्थिति को राज्य की राजधानी में स्थित विशेष रूप से ऑनलाइन समाचार प्लेटफार्मों के प्रसार में देखा जा सकता है।</p>
<p><strong>1990 के दशक के मध्य में जब बिहार में चारा घोटाला उजागर हुआ था, तब राष्ट्रीय समाचार पत्रों के पटना संस्करण ने इस पर पूरी दिलचस्पी से काम नहीं किया था। रांची स्थित क्षेत्रीय दैनिक प्रभात खबर ने इसके विभिन्न चरणों, जिसमें केंद्रीय जांच ब्यूरो की जांच भी शामिल थी, पर काम किया। उस समय यह एक बहुत ही लोकप्रिय अखबार था। कोई भी व्यक्ति आश्चर्य में पड़ सकता है कि क्या बिहार का कोई प्रमुख दैनिक अखबार इस घिनौनी कहानी को बता सकता था। पटना का कोई भी प्रमुख अखबार इस कहानी को बताने के लिए बच नहीं पाया। </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/nitish-kumars-launch-of-indian-express-its-a-matter-of-deep-research">नीतीश कुमार के हाथों &#8216;इंडियन एक्सप्रेस&#8217; अख़बार का &#8216;लोकार्पण&#8217; : &#8216;अख़बार&#8217; का &#8216;कद घटा&#8217; या &#8216;नीतीश कुमार&#8217; का &#8216;कद बढ़ा&#8217;, एक &#8216;गहन शोध&#8217; का विषय</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>संवाददाता के लेखन पुस्तिका से ✍ 30-साल पहले जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के शयन कक्ष में देर रात 1.00 बजे फोन की घंटी टनटनाया </title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 07 Feb 2025 11:39:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[bhattacharjee]]></category>
		<category><![CDATA[indian express]]></category>
		<category><![CDATA[judiciary]]></category>
		<category><![CDATA[justice]]></category>
		<category><![CDATA[mumbai high court]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>गजब की है दिल्ली। यहाँ की पत्रकारिता के बारे में तो पूछिए ही नहीं। अच्छे-अच्छे लोग यहाँ गच्चा खा जाते हैं। यहाँ चिकनी-चुपड़ी सड़क, उपगामी-अधोगामी सड़क, मेटो रेल, गगनचुम्बी इमारतों को देखकर यह कतई नहीं सोच सकते हैं कि यहाँ पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वाले, काम सीखने वालों को उनके वरिष्ठ या संपादक उनके कार्य [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/from-the-reporters-notebook">संवाददाता के लेखन पुस्तिका से ✍ 30-साल पहले जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के शयन कक्ष में देर रात 1.00 बजे फोन की घंटी टनटनाया </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>गजब की है दिल्ली। यहाँ की पत्रकारिता के बारे में तो पूछिए ही नहीं। अच्छे-अच्छे लोग यहाँ गच्चा खा जाते हैं। यहाँ चिकनी-चुपड़ी सड़क, उपगामी-अधोगामी सड़क, मेटो रेल, गगनचुम्बी इमारतों को देखकर यह कतई नहीं सोच सकते हैं कि यहाँ पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वाले, काम सीखने वालों को उनके वरिष्ठ या संपादक उनके कार्य सम्बन्धी पुरुषार्थ  का क़द्र करते हों, उन पर विश्वास करते हों।</strong></p>
<p>देश में तक़रीबन 125000 से अधिक समाचार पत्र/पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है। वैसे 900+ निबंधित निजी टीवी चैनल हैं, लेकिन भारत के आसमानों के रास्ते कोई 4000 चैनेल्स 140 करोड़ लोगों के टीवी स्क्रीन पर पहुँचता है। आज जिस तरह देश की सड़कों पर चार पहिया वाहनों में, दो-पहिया वाहनों में नंबर प्लेट के आगे, शीशों पर, अतिरिक्त प्लेट लगाकर &#8216;पत्रकार&#8217;, &#8216;संपादक&#8217;, &#8216;संपादक के सहयोगी&#8217;, &#8216;पत्रकार संघ के अध्यक्ष&#8217; लिखा उसी प्रकार दिख रहा है जैसे &#8216;पार्षद के मित्र&#8217;, विधायकजी का साला&#8217; &#8216;मंत्री जी का पोता&#8217;, &#8216;मंत्री जी के दूर के रिस्तेदार, &#8216;थाना प्रभारी का दामाद / साला&#8217; आदि लिखा दिख रहा है। आज तो स्थिति ऐसी है कि वास्तविक रूप में बेहतरीन पत्रकार होने के बावजूद दफ्तरों में आपकी पूछ नहीं होती होगी, अगर आप सिर्फ अपने कार्य से, अपनी कहानियों से मतलब रखते होंगे। आपको सभी लोग कहते होंगे &#8216;बहुत एटीट्यूड&#8217; रखती है/रखता है। </p>
<p>दिल्ली से प्रकाशित इण्डियन एक्सप्रेस में कार्य की शुरुआत करने के साथ ही, सर्वप्रथम देर रात तक रहने की आदत डाल लिया। रात्रिकालीन सत्र में जो भी सहकर्मी होते थे उन्हें आठ-साढ़े आठ बजते बजते घर जाने को कह देते थे। परिणाम यह हुआ कि समय के साथ-साथ सभी को &#8216;यह आदत&#8217; से हो गई आठ-साढ़े आठ तक निकलना। एक्सप्रेस ब्यूरो में तो बड़े-बड़े संवाददाता थे, उसमें एक &#8216;सर्वोच्च न्यायालय&#8217; कवर करते थे। श्री नायर साहब नाम था उनका। मैं निचली अदालत के साथ साथ दिल्ली उच्च न्यायालय कवर करता था। </p>
<blockquote><p>उस रात कोई साढ़े-बारह के करीब &#8216;एक्सप्रेस बम्बई&#8217; कार्यालय से एक फोन आया, साथ ही, कम्प्टयूटर पर संवाद भी। संवाद था कि बम्बई उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए एम भट्टाचार्जी द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अज़ीज़ मुसब्बर अहमदी (25 अक्टूबर, 1994 से 24 मार्च, 1997) को अपना त्यागपत्र प्रेषित करना। न्यायमूर्ति ए एम भट्टाचार्जी के विरुद्ध चर्चा हो गई थी कि वे मुस्लिम लॉ और संविधान से सम्बंधित एक किताब के लिए एक लन्दन स्थित प्रकाशक से $ 80 000 स्वीकार किये थे, साथ ही, एक दूसरे &#8216;मैन्युस्क्रिप्ट&#8217; के लिए $ 75 000 का ऑफर भी स्वीकार के अधीन था।&#8221; उस ज़माने में यह एक बहुत बड़ी घटना थी।</p></blockquote>
<p>एक्सप्रेस के सम्पादकीय कक्ष में सहायक समाचार संपादक श्री राजेश्वर प्रसाद साहब ड्यूटी पर थे। वे संवाददाता कक्ष में दौड़ते-भागते आये। मुझे देख लम्बी सांस लेते कहते हैं: &#8220;ओ माई गॉड !!!! शिवनाथ !!! यह कहानी बम्बई से है। तुम सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से बात कर इसे &#8216;कंफर्म&#8217; करो और कोई 1500 + शब्दों में कहानी लिखकर तत्काल प्रेषित करो। यह आज का लिड है और बम्बई कार्यालय बैठा है इस कहानी के लिए।&#8221; </p>
<p>प्रसाद साहेब सारी बातें एक सांस में बोल गए। सम्पादकीय विभाग (डेस्क) पर भूचाल आ गया था। प्रथम पृष्ठ का ले-आउट बदल गया था। उन दिनों श्री पी सी एम त्रिपाठी जी समाचार संपादक थे (त्रिपाठी जी आपको श्रद्धांजलि) । मैं श्री प्रसाद साहेब का अपने प्रति यह विश्वास देखकर उछल गया। प्रसाद साहेब कहते हैं: &#8220;तुम अपने काम में लग जाओ पहले। मैं तुम्हारे काम में हाथ बंटाता हूँ।&#8221; उधर श्री प्रसाद साहब लाइब्रेरी जाकर न्यायमूर्ति ए एम भट्टाचार्जी से सम्बंधित जितने भी समाचार प्रकाशित हुए थे, का कतरन लाने में लग गए। अब तक रात का कोई 12 बजकर 40 मिनट हो गया था और छोटी-बड़ी सुइयों की रफ़्तार भी ह्रदय गति जैसी बढ़ गई थी । </p>
<p>इस घटना से कोई एक महीना पहले सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अज़ीज़ मुसब्बर अहमदी साहब से मेरी मुलाककट हुई थी एक कार्यक्रम में। मैं उनसे निजी तौर पर मिला था। जब मैं बताया कि मैं &#8220;एक्सप्रेस&#8221; का रिपोर्टर हूँ, वे मुझे पीठ ठोके और कहे कभी भी, किसी भी समय आप बात कर सकते हैं। उनका इतना बोलना था कि मैं अपनी डायरी और कलम उनके तरफ कर दिया ताकि &#8216;अंदर वाला नंबर&#8217; मिल जाय। वे अपने शयन कक्ष वाला नंबर लिख दिए। एक रिपोर्टर को और क्या चाहिए। शायद यही मेरा प्रारब्ध था और समय भी यह चाह रहा था। अब तक प्रसाद साहब मेरे सामने बैठ गए थे &#8216;पैडिंग&#8217; वाला अंश कंप्यूटर पर लिख रहे थे। नीचे डेस्क से लोगों का आना जाना बढ़ गया था।</p>
<p><strong>मैं डायरी में न्यायमूर्ति अज़ीज़ मुसब्बर अहमदी द्वारा लिखित नंबर निकला। सामने ऊँगली घुसाकर डॉयल करने वाला फोन को अपनी ओर खिंचा और फिर सात अंकों पर सात बार ऊँगली घुसाकर गोल चक्कर को घुमाया। तत्काल दूसरे छोड़ पर &#8216;ट्रिंग-ट्रिंग&#8217; होने लगी। कुछ ही सेकेण्ड बाद दूसरे छोड़ से आवाज आई &#8220;हेल्लो&#8221; &#8211; इससे पहले की दूसरे छोड़ से मुझसे पूछा जाता, न्यायमूर्ति का &#8216;हेल्लो&#8217; शब्द को पहचान लिया और सुनते ही मैं अंग्रेजी को दरभंगा में छोड़कर हिंदी में बोल पड़ा: &#8220;सर प्रणाम। मैं एक्सप्रेस वाला शिवनाथ झा बोल रहा हूँ। माफ़ कर देंगे इतनी रात फोन करने के लिए। लेकिन नौकरी का सवाल है।&#8221; मेरी बात वे समझ गए थे। आखिर देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे वे।</strong> </p>
<p>मैं बोलता रहा: &#8220;सर !! बम्बई कार्यालय से अभी एक संवाद आया है कि न्यायमूर्ति ए एम भट्टाचार्जी अपना त्यागपत्र आपके पास प्रेषित कर दिए हैं?&#8221; </p>
<p>न्यायमूर्ति अज़ीज़ मुसब्बर अहमदी कहते हैं: &#8220;उस दिन का नंबर आज आपको काम आ गया &#8230;.  जी। वे अपना त्यागपत्र शाम में भेजे हैं। शेष कहानी आप जानते ही हैं। लेकिन आप मुझे उल्लेखित नहीं करेंगे।&#8221; <br />
 <br />
न्यायमूर्ति का &#8216;हाँ&#8217; शब्द मेरे लिए दिल्ली सल्तनत का किला फ़तेह जैसा था। ऐसा लग रहा था कि लाल किले पर मैं अपना झंडा गाड़ दिया हूँ आज रात। प्रसाद साहब का चेहरा चमक रहा था। वे झट से उठे और कहते नीचे डेस्क की ओर भागे : &#8220;शिवनाथ !!!! तुम्हारे लॉगिन में टाइप किया है। उसे निकालकर कहानी में जोड़ लेना। शेष और बातें जोड़ते दस मिनट के अंदर स्टोरी रिलीज कर देना। मैं बम्बई ऑफिस को बताता हूँ। वह इंतज़ार कर रहा है। वेल डन शिवनाथ।&#8221;</p>
<p>उस रात मैं &#8220;शेर&#8221; था &#8220;एक्सप्रेस&#8221; में। अभी तक रात का 1.10 हो गया था। कोई 1800 शब्दों की कहानी बन गई थी। श्री प्रसाद साहेब का चेहरा चमक रहा था। कहानी को मेरे नाम से तत्काल बम्बई कार्यालय प्रेषित किया गया। बम्बई कार्यालय उस समाचार को देखकर बहुत खुश हुआ। वहां यह समाचार &#8216;डीप डबल कॉलम (ऊपर से नीचे बॉटम तक) मेरे नाम से प्रकाशित हुआ By Shivnath Jha ।</p>
<p>इधर दिल्ली में घड़ी की सुइयाँ आपसे में लड़ रही थी। कभी छोटी सुई ऊपर तो कभी बड़ी सुई ऊपर। फोन चार कोने पर चार लोग बैठे थे। राजनीति हो रही थी क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय कवर करने वाले संवाददाता (श्री नायर साहब) और दिल्ली संस्करण की सम्पादिका श्रीमती कुमी कपूर मुझ जैसे छोटे से रिपोर्टर के वजूद पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे थे। कह रहे थे कि लोवर जुडिसियरी कवर करने वाला रिपोर्टर का क्या वजूद है की देर रात सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश फोन पर इस कहानी को कन्फर्म करे।&#8221; श्री प्रसाद साहेब &#8216;हताश&#8217; हो गए। श्रीमती कुमी कपूर मेरी कहानी को &#8216;अंडर प्ले&#8217; कर दी &#8211; 1800 शब्दों की कहानी &#8216;एक पैरा&#8217; में सुबह के दिल्ली संस्करण के प्रथम पृष्ठ पर एक कोने में प्रकाशित हुआ। </p>
<p>अगले दिन सुबह की मीटिंग में अश्विनी सरीन के साथ-साथ मेरे मेट्रो के सभी रिपोर्टर उपस्थित थे। सरीन साहब &#8216;शेर&#8217; की तरह गरज रहे थे। वजह भी था &#8211; उनके रिपोर्टिंग रूम और रिपोर्टर को &#8216;अंडर एस्टीमेट&#8217; किया गया। तभी श्रीमती कुमी कपूर का प्रवेश हुआ। कुमी कपूर के चेहरे के भाव से यह विदित था कि वे &#8216;राजनीति&#8217; में फंस गई थी रात को। अपना निर्णय लेने में चूक गयी थी वे। इससे पहले भी कुमी कपूर एक गलती की थी उसका जिक्र बाद में करूँगा। उनकी नजर उठ नहीं रही थी। मैं तो उनके सामने बहुत छोटा सा रिपोर्टर था, लेकिन वे भी समझ रही थी कि &#8216;मैं उन्हें आंक लिया हूँ&#8217; अब तक, जहाँ तक पत्रकारिता का सवाल है।</p>
<p><strong>इससे पहले की रिपोर्टर कक्ष में श्री सरीन साहब का गर्जन तेज हो &#8211; श्रीमती कुमी कपूर कहती हैं: &#8220;सॉरी शिवनाथ, आप सही थे, आपकी कहानी सही थी। आपकी बात देर रात जस्टिस अहमदी से हुई थी। दिल्ली में आपकी कहानी के साथ जस्टिस नहीं हुआ । सॉरी। &#8221; दिल्ली के सम्पादकीय विभाग में, चाहे अखबार हो या आज का टीवी, प्रधानमंत्री कार्यालय से अधिक राजनीति होती है </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/from-the-reporters-notebook">संवाददाता के लेखन पुस्तिका से ✍ 30-साल पहले जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के शयन कक्ष में देर रात 1.00 बजे फोन की घंटी टनटनाया </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>रिनैरेटिंग &#8220;कमला&#8221; : लुढ़कती भारतीय मुद्रा का मोल लोगों की मानसिकता को भी दबोची, &#8216;गुम महिलाएं&#8217; मिलती नहीं, आज़ादी के 34वें वर्ष में &#8216;कमला&#8217; बिकती थी 2300/- रुपये में, आज भी &#8216;बिकती&#8217; है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 27 Mar 2024 12:37:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[ashwini sarin]]></category>
		<category><![CDATA[indian express]]></category>
		<category><![CDATA[investigative journalism]]></category>
		<category><![CDATA[kamla]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दरियागंज-बहादुर शाह ज़फर मार्ग (नई दिल्ली) : भारत ही नहीं, विश्व में आम सिनेमा दर्शकों की यही धारणा है कि भारतीय सिनेमा मसाला फिल्मों और घटिया कहानियों पर आधारित होता है। यह सच नहीं है। खासकर मुझ जैसा एक अखबारवाला पत्रकार की नजर से। यह अलग बात है कि मुंबई के अलावे दक्षिण और बंगाल में जितनी [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/renarrating-ashwini-sarins-kamala-story">रिनैरेटिंग &#8220;कमला&#8221; : लुढ़कती भारतीय मुद्रा का मोल लोगों की मानसिकता को भी दबोची, &#8216;गुम महिलाएं&#8217; मिलती नहीं, आज़ादी के 34वें वर्ष में &#8216;कमला&#8217; बिकती थी 2300/- रुपये में, आज भी &#8216;बिकती&#8217; है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरियागंज-बहादुर शाह ज़फर मार्ग (नई दिल्ली) : भारत ही नहीं, विश्व में आम सिनेमा दर्शकों की यही धारणा है कि भारतीय सिनेमा मसाला फिल्मों और घटिया कहानियों पर आधारित होता है। यह सच नहीं है। खासकर मुझ जैसा एक अखबारवाला पत्रकार की नजर से। यह अलग बात है कि मुंबई के अलावे दक्षिण और बंगाल में जितनी भी असाधारण फिल्में, विशेषकर मानव तस्करी और वेश्यावृत्ति जैसी सामाजिक मुद्दों पर बनी है, वह प्रत्यक्ष रूप से सच्ची घटनाओं पर आधारित है। </p>
<p>लेकिन इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता है कि सिनेमा बनाने वाले, चाहे वेश्यावृत्ति पर बनायें, चाहे महिला-बच्चियों की तस्करी पर बनायें या फिर भगत सिंह-राजगुरु-सुखदेव और अन्य क्रांतिकारियों पर बनाएं जो आज़ादी के दौरान मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों को उत्सर्ग किये, या फिर स्वतंत्र भारत में अपनी देश की सीमाओं पर लड़ते, सड़कों पर आपराधिक तत्वों से लड़ते मृत्यु को प्राप्त करते हैं &#8211; उन पर फिल्म बनाये &#8211; अंततः मौद्रिक लाभ उन्हें ही होता है। </strong></p>
<p>जिस विषय या व्यक्ति पर फिल्म बनाते हैं वह जमीन पर यूँ ही बिलखते रहता है जीवन पर्यन्त। यहाँ तक कि कभी-कभी अर्थ के अभाव में मरने के बाद भी उसका पार्थिव शरीर गुमनाम रह जाता है । आज भी बनारस में एक ऐसा व्यक्ति है जो अपने जीवन काल में हज़ारों गुमनाम पार्थिव शरीरों को उठाकर अग्नि तक पहुँचाया है। खुदा-न-खास्ते कभी फिल्म निर्माता या फिल्म में काम करने वाले कलाकार, अदाकारा से रूबरू हो जाएँ ऐसे व्यक्ति जिनकी कहानियों पर फिल्म बनी होती है, तो वे पहचानते भी नहीं। इतना ही नहीं, भारत के समाचार पत्रों में इन सामाजिक कुरीतियों को उजागर करने वाले पत्रकारों, जो अपनी जान को जोखिम में रखकर शब्दों की सिलाई कर, कहानियों की श्रृंखला बनता है, उसे भी नहीं पहचानते &#8211; सच तो यही है। खैर। </p>
<p>विगत चार-पांच दशकों में इन मुद्दों को अख़बार के पन्नों पर लाने वाले रिपोर्टरों की कहानियों पर आधारित फिल्म के निर्मातागण कितनी फिल्म बनाये, यह कहना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है। इस व्यापार में लगे कानूनन कितने लोग दण्डित हुए, यह भी आंकना मुश्किल है। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि विगत पांच दशकों में इस क्षेत्र में काम करने वाले लोग जो कल पैदल-साईकिल पर चलते थे, सड़कों के किनारे रोटी-प्याज खाकर जीवन यापन करते थे; आज एक अलग समाज के स्वामी हो गए हैं। हमारे देश में कानून की किल्लत नहीं है। कानून के रखवालों की भी किल्लत नहीं है। लेकिन आज यह कई लाख करोड़ और अधिक का व्यवसाय बन गया है। आखिर कहीं से तो इस व्यवसाय को संरक्षण है? कोई तो सम्पोषित कर रहा है ?</p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=NxwE91T2obE&#038;t=1382s">@अखबारवाला001(188) एक &#8220;कमला&#8221; के लिए ​जेल , आज भारत में &#8220;13,50,000 गुम कमला&#8221; को ढूंढने वाला कोई नहीं😢</a></p>
<p>बहरहाल, संभव है आज बहुत लोगों को याद भी होगा या नहीं या फिर याद करना भी चाहते होंगे अथवा नहीं, कह नहीं सकता। अस्सी के दशक के पूर्वार्ध एक फिल्म बनी थी &#8211; कमला। दूरदर्शन पर इस फिल्म को बार-बार दिखाया गया था। वैसे वह फिल्म विजय तेंदुलकर के रंगमंच की कहानी पर आधारित कही गयी थी, लेकिन तेंदुलकर की कहानी भी एक सच्ची घटना पर आधारित थी, जिस घटना को भारत के अख़बारों के पन्नों पर सबसे पहले दी इण्डियन एक्सप्रेस के तत्कालीन संवाददाता अश्विनी सरीन ने लाया था। आज के नब्बे फीसदी से अधिक संवाददाता, जो अपराध बीट पर भी काम करते होंगे, नहीं जानते होंगे। </p>
<p>मैं भाग्यशाली था और हूँ भी कि मैं सरीन साहब के विभाग में, उनके अधीन एक संवाददाता के रूप में काम किया नब्बे के दशक में। उन दिनों भी और आज भी, सरीन साहब की नजर में मैं एक बेहतरीन संवाददाता था और हूँ। किसी ज़माने में मारवाड़ियों, बंगालियों काजमघट रहा रिंग रोड और दरियागंज के बीच के इलाके से तत्कालीन लोगों के पलायन से सम्बंधित कहानी करने के क्रम में उस इलाके में भटक रहा था। नब्बे के दशक में जहाँ पुरानी कोठियों जैसी भवनें थी, विशालकाय बरगद और पीपल का वृक्ष इलाके में भरे परे थे, कुछ नहीं दिख रहे थे। अपने मानस पटल पर काफी जोर डालने के बाद भी उस दृश्य को दरियागंज के उस इलाके में नहीं देख पा रहा था। हां, सड़क के किनारे अंग्रेजों के ज़माने में लगे गए सार्वजनिक नल अवश्य दिखा। सैकड़ों मकानों की दीवारों पर पीपल के वृक्ष, घरों की चौखटों से निकलते उसकी जड़ अवश्य दिखे। ऐसा लग रहा था कि मुद्दत से वह भी कारावास की जिंदगी जी रहा है जहाँ यातना के सिवाय और कुछ नहीं है &#8211; न खाना और न पानी &#8211; और उसी की तलाश में उन वृक्षों की जड़े बाहर की ओर उन्मुख हो रही थी। </p>
<p>तभी एक वृद्ध दिखे। मेरे एक कंधे पर झोला, दूसरे कंधे पर कैमरा लटका था। हाथ में कागज़ के कुछ टुकड़े और मोबाईल फोन का वीडियो कैमरा खुला था। जहाँ हम खड़े थे, हमारे दाहिने हाथ जाने वाला रास्ता लाल किला के दिल्ली दरवाजा की ओर जाता था। वे वृद्ध पूछे कि मैं पत्रकार हूँ? जवाब में &#8216;हामी&#8217; मिलने पर उनके चेहरे पर रौनक आ गयी, वे हंसने लगे, कहने लगे &#8216;आपकी वेशभूषा एक पत्रकार जैसी ही दिखती है, साथ ही, आपकी नजर भी किसी की तलाश कर रही है, ऐसा लगता हैं।&#8221; मैं फिर &#8216;हामी&#8217; भरा। वे फिर कहते हैं &#8216;माशाल्लाह !! आपकी मुरादें पूरी हो। </p>
<p>मैं टीवी तो नहीं देखता, आखों की रौशनी समय के साथ कमजोर हो गयी है, लेकिन आज भी अख़बार पढता हूँ और वह भी इण्डियन एक्सप्रेस। कब से इस अखबार को पढ़ना शुरू किया याद नहीं, कब तक पढूंगा पता नहीं।&#8221; उनकी बातों को बीच में काटकर मैं मुस्कुराते कहा: &#8220;मैं भी इस अखबार में नब्बे के दशक में मुद्दत तक काम किया था एक रिपोर्टर के रूप में।&#8221; इतना सुनते ही वे मेरा हाथ पकड़े, चूमे और पूछे&#8221; &#8216;आपका नाम क्या है?&#8221; मैं बहुत फक्र से कहा &#8220;शिवनाथ झा।&#8221; इतना सुनते ही वे फिर कहते हैं: &#8220;मैं आपके माथे पर टिक (चोटी) देख समझ गया था कि आप ब्राह्मण हैं। आप कुछ अलग दिख रहे हैं। मैं अपने जीवन में न आज़ादी के पहले और ना ही आज़ादी के बाद आज तक दिल्ली के किसी भी पत्रकार को चोटी रखते, समाचार का संकलन करते, सड़क पर नहीं देखा है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/03/D1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/03/D1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-5422" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/03/D1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/03/D1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/03/D1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/03/D1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/03/D1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>आपसे एक निवेदन है यदि संभव हो तो अस्सी के ज़माने में इण्डियन एक्सप्रेस में एक कहानी छपी थी एक लड़की को खदीदने वाली जो कमला के नाम से जानी जाती थी, उसी अख़बार का रिपोर्टर कोई सरीन था, किया था। उस कहानी को दोहराएं। आज भी समाज में लड़कियां बिक रही है। समाज में सभी तबके के माता-पिता, खासकर जो गरीब हैं, सहमे हैं।&#8221; यह बोलते वे अपनी आखों को गमछी से पोछ्ने लगे। नब्बे के उम्र में आंखों से बहती आंसू  वर्तमान कालखंड में महिला की स्थिति का प्रत्यक्ष गवाह था। </p>
<p>बहरहाल, नब्बे के दशक में जब दक्षिणी दिल्ली के एक डॉक्टर बजाज के पुत्र का अपहरण हुआ, मैं &#8216;सन्डे&#8217; पत्रिका में एक कहानी किया था &#8216;फॉर फ्यू लक्स मोर&#8217; शीर्षक से। &#8216;संडे&#8217; पत्रिका शनिवार को दिल्ली की सड़कों पर आ जाती थी। उस पत्रिका में कहानी प्रकाशन के अगले सप्ताह मुझे अश्विनी सरीन अपने सानिग्ध में काम करने के लिए बुला लिए। उस जमाने में ही नहीं, आज भी, चाहे पत्रकारिता के क्षेत्र में कितना भी पतन हो गया हो, इण्डियन एक्सप्रेस में काम करने के लिए अच्छे-अच्छे लोग तरसते हैं, मेरा तो कोई गॉड फादर नहीं था और मुझे &#8216;एक्सप्रेस&#8217; में नौकरी मिलना सिर्फ और सिर्फ अश्विनी सरीन की पारखी नजर के कारण था। कई बार डराए, धमकाए, लेकिन उन्होंने जो सिखाया, वह कभी नहीं भूलने वाला खोजी पत्रकारिता थी जो आज भी जीवित रखा हूँ स्वयं के अंदर।  </p>
<p>सरीन साहब का जिक्र यहाँ इसलिए कर रहा हूँ कि सन 1981 में, यानी आज से 43 साल पहले, राजस्थान-उत्तर प्रदेश &#8211; मध्य प्रदेश राज्यों की सीमाएं जहाँ कुछ-कुछ दूरी पर एक-दूसरे से मिलती हैं, शाहजहां के शहर आगरा से कोई 40 किलोमीटर दूर उन्होंने &#8216;कमला&#8217; नामक एक लड़की को खरीदकर दिल्ली लाये। उसे खरीदने के पीछे मकसद सिर्फ यही था कि आज़ाद भारत के 34 वर्ष होने के वाबजूद भारत के सुदूर गावों में, कस्बों में आज भी गरीबी के कारण लड़कियां बिकती हैं। आज तो भारत में बहुत बड़ा गिरोह काम कर रहा है जो देश के विभिन्न्न राज्यों से, केंद्र शाषित प्रदेशों से विभिन्न उम्र की लड़कियों को चोरी कर, अपहरण कर, लुभाकर, फुसलाकर वेश्यावृति के घंधे में लाया जा रहा है। </p>
<p>यह बात शासन भी जानती है, प्रशासन भी जाती है, मंत्री भी जानते हैं, अधिकारी भी जानते हैं। वैसे संविधान में महिलाओं को पुरुषों के बराबर सभी दृष्टि से अधिकार भी दिया गया है, कानून की किताबों में सैकड़ों कानून भी हैं &#8211; लेकिन सत्य यही है कि भारत की महिलाओं को समाज में जो अधिकार और सम्मान मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिली। इसमें दोष सिर्फ पुरुष समाज का ही नहीं है, महिला समाज भी बराबर के दोषी हैं। अश्विनी सरीन की कहानी के बाद विजय तेंदुलकर का एक नाट्य मंच भी हुआ और उसी कथा के आधार पर सन 1984 में श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या के पूर्व भारत के सिनेमाघरों के पर्दों पर जगमोहन मुंध्रा के निर्देशन में, मार्क जुबेर, दीप्ती नवल, शबाना आज़मी अभिनीत &#8216;कमला&#8217; फिल्म दिखाए जाने लगा। </p>
<p>सितम्बर 2023 तक भले संविधान में 106 संशोधन किये गए हों, महिलाओं के लिए सरकारी दस्तावेजों के अनुसार &#8216;सुरक्षित नियम&#8217; बनाये गए हों; हकीकत यह है कि आज 76 वर्ष आज़ादी के बाद भी देश के लोग, मतदाता अपने-अपने घरों में बेटियों को देख, घरों के बाहर समाज में दरिंदों को देख भयभीत हो रहे थे। आज भी भारत में अपहरण के मामले कम नहीं हैं। पहले की बात छोड़िये, भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन कार्यरत नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार सन 2019 और 2021 के बीच 13.13 लाख से भी अधिक लड़कियां और महिलाएं &#8216;गुम&#8217; हैं। इस बात को ब्यूरो भारत के संसद में भी उल्लिखित किया था। इतना ही नहीं, सन 1981 में जिस &#8216;कमला&#8217; को अश्विनी मध्य प्रदेश से खरीद कर लाये थे और उन्हें &#8216;दंड भी भुगतना पड़ा&#8217;, उसी मध्य प्रदेश में वहां की पुलिस सन 2021 तक 36104 गुम लड़कियों/महिलाओं को ढूंढ नहीं पायी, खोज नहीं पायी और उसे उसके परिवार और परिजनों से मिला नहीं पायी। लेकिन व्यवस्था के विरुद्ध कोई चूं तक नहीं किया। </p>
<p>सरीन साहब एक प्रेस कांफ्रेंस कर इस बात का खुलाशा किये थे सन 1981 में और फिर शुरू हो गयी कहानियों की श्रृंखला। सरीन साहब को बाद में तीन रात और चार दिन तक &#8216;लड़की की खरीदगी&#8217; के लिए तिहाड़ जेल में भी रहना पड़ा। अपने 84-घंटे के कारावास में उन्होंने तिहाड़ जेल की आंतरिक स्थिति, कैदियों का कैदियों के साथ, अधिकारियों का कैदियों के साथ व्यवहार, कैदियों के भोजन, स्वास्थ्य आदि अनेक तथ्यों का चश्मदीद गवाह बने, कागजों के साथ-साथ मानस पटल पर अंकित किया गया और फिर तिहाड़ से बाहर आने के बाद दी इण्डियन एक्सप्रेस के पन्नों पर कहानियों की श्रृंखला। अंततः प्रशासन के साथ-साथ दिल्ली सल्तनत के सभी संभ्रांत जो स्वतंत्र भारत में देश के लोगों की भलाई के लिए मलाई खाने वाले सभी सैद्धांतिक रूप से उनके समक्ष नतमस्तक हो गए। क्योंकि आज़ादी के 34 वर्ष बाद भी आज़ाद भारत में वही &#8216;लंहगा और वही चोली यानी वही कानून प्रचलित थी, जो 15 अगस्त 1947 से पहले था &#8211; दमनकारी नीति। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/03/Screenshot-2024-03-27-at-6.01.06-PM.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/03/Screenshot-2024-03-27-at-6.01.06-PM.png" alt="" width="1769" height="798" class="aligncenter size-full wp-image-5423" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/03/Screenshot-2024-03-27-at-6.01.06-PM.png 1769w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/03/Screenshot-2024-03-27-at-6.01.06-PM-300x135.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/03/Screenshot-2024-03-27-at-6.01.06-PM-1024x462.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/03/Screenshot-2024-03-27-at-6.01.06-PM-768x346.png 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/03/Screenshot-2024-03-27-at-6.01.06-PM-1536x693.png 1536w" sizes="auto, (max-width: 1769px) 100vw, 1769px" /></a></p>
<p>अस्सी के दशक में अश्विनी सरीन ने कोई आठ-नौ महीने राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के क्षेत्रों में घूमे थे। उस समय उनकी आयु 30-32 वर्ष से अधिक नहीं थी। लम्बा शरीर, दुबला-पतला, लेकिन सुडौल शरीर, गहरी मूंछ, उग्र दिमाग वाला पत्रकार चम्बल नदी की धाराओं को पार कर, बिहरों को पार कर दर्जनों बार राजस्थान-मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के उन बस्तियों में भ्रमण किये, जहाँ उस ज़माने में गरीब लड़कियों को, महिलाओं को समाज में बेचा जाता था &#8211; पैसों के लिए।अश्विनी &#8216;सीधा&#8217; लेकिन &#8216;मिर्चीदार&#8217; शब्दों का प्रयोग करते थे और सीधा प्रहार करते थे अपनी लेखनी से। कहते थे कि उन दिनों अश्विनी की मूंछें भले नीचे गिरी हुई थी, लेकिन भारतीय पत्रकारिता में उनकी कहानी &#8216;कमला&#8217; देश की पत्रकारिता को, खासकर खोजी पत्रकारिता को, एक नयी दिशा तो दिया ही, पत्रकारों का भी हौसला बढ़ाया।</p>
<p>&#8216;कमला&#8217; की कहानी &#8216;रिपोर्टर्स कक्ष और संपादक कक्ष के बीच गोपनीयता को भी गोपनीय कैसे रखा जाता है&#8217;, एक दृष्टान्त पेश किया। अश्विनी की दर्जनों कहानियां जो उस कालखंड में प्रकाशित हुए थे &#8211; प्रशासन और सत्ताधारियों के लिए नींद उड़ा दी थी। मसलन, करोड़ों रुपये के रक्षा वाहन निपटान रैकेट का पर्दाफाश, तिहाड़ जेल के कैदियों की जीवन स्थितियों पर एक मर्मस्पर्शी लेख और आपातकाल के दौरान परिवार नियोजन अत्याचारों की कहानियां अपने-आप में अजूबा है। इस बीच &#8216;कमला&#8217; की कहानी उनके पत्रकारिता जीवन में सुंदरता की एक और बिंदी लगा दिया। </p>
<p>&#8216;रिपोर्टर्स कक्ष और संपादक कक्ष के बीच गोपनीयता&#8217; की बात इसलिए कर रहा हूँ कि उन दिनों इण्डियन एक्सप्रेस के संपादक थे एस निहाल सिंह और कार्यकारी संपादक थे अरुण शौरी। एस निहाल सिंह के पिता सन 1955-1956 में दिल्ली के मुख्यमंत्री थे जो चौधरी ब्रह्म प्रकाश के बाद कुर्सी पर बैठे थे एक वर्ष के लिए । लेकिन एक्सप्रेस के संपादक को इस बात का भनक नहीं था कि रिपोर्टर-कक्ष और कार्यकारी संपादक के कक्ष के बीच क्या पक रहा है विगत आठ-नौ महीनों से। इतना ही नहीं, अश्विनी की पत्नी डॉ. उमा जी को या फिर इण्डियन एक्सप्रेस के मालिक श्री रामनाथ गोयनका, जो सम्पादकीय से बहुत नजदीक होते थे, उन्हें भी यह मालूम नहीं हो सका जब तक &#8216;कमला&#8217; की कहानी एक्सप्रेस के पन्नों पर प्रकाशित नहीं हुआ और दिल्ली ही नहीं देश में भूचाल नहीं आ गया। </p>
<p>कहते हैं कि सरीन को आगरा-मुरैना-मैनपुरी-एटा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर महिलाओं की तस्करी के बारे में पता चला और वे सज्ज हो गए कि इसकी पड़ताल होनी चाहिए। लेकिन उन्हें और उनके संपादक को एहसास हुआ कि एक सीधी कहानी का आवश्यक प्रभाव नहीं होगा समाज और व्यवस्था पर। और उन्होंने वास्तव में एक महिला को खरीदने का फैसला किया। चूंकि यह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत एक अपराध था, इसलिए उन्हें अपना मकसद स्थापित करना था: निर्विवाद सत्यनिष्ठा वाले पांच प्रतिष्ठित व्यक्तियों को विश्वास में लिया गया जिसमें सर्वोच्च न्यायालय में न्यायविद भी थे।</p>
<p>सरीन कई बार उस इलाके का दौरा किया &#8211; जहां पुरुषों से ज्यादा बंदूकें थी । प्रत्येक प्रयास के बाद, वह देह व्यापार से संबंधित एक कहानी लेकर आते थे और पूरे गोपनीयता के साथ दस्तावेजों के साथ अपनी कहानियों की कड़ियों को जोड़ते थे। यह भी सत्य है कि उन दिनों जब रिपोर्टर्स सरीन का दफ्तर से गायब होने का कारण पूछते थे तो कुछ-न-कुछ बहाना बना देते थे। समय गुजर रहा था। सरीन का विश्वास और उनकी मेहनत रंग ला रही थी। राजस्थान-मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के उस क्षेत्र में रहने वाले लोगों का, पुरुषों का, महिलाओं का विश्वास सरीन साहब के प्रति गहरा हो रहा है। </p>
<p>कहते हैं ऐसी रणनीति वाली कहानियों को करने के लिए उद्यमशील होना नितांत आवश्यक है। अधिकांश पत्रकारों का मानना था कि ऐसी कहानियों को सामने लाने में पग-पग पर खतरा मोल लेना होता है और सरीन ऐसा किये। अंत में उन्होंने कोई 2,300 रुपये के बदले में &#8216;कमला&#8217; को अपने कब्जे में ले लिया। फिर वे नई दिल्ली स्थित अपने घर लाये जहाँ कमला स्वयं को अधिक सुरक्षित पायी। यह भी कहा जाता है कि जब अश्विनी अपने घर लेकर कमला को आये, अश्विनी की पत्नी तब तक इन तमाम घटनाओं से वाकिफ नहीं थीं। &#8216;कमला&#8217; उनसे पूछी भी कि &#8216;उस कितने में खरीदा गया है? यहाँ इस घर में कमला और उमा दो महिलाएं एक साथ क्यों नहीं रह सकतीं?&#8221;</p>
<p>जैसे ही कहानी एक्सप्रेस के मुख पृष्ठ पर सामने आई, सरीन को देश भर में सराहना मिली। लेकिन समाज में, खासकर पत्रकारिता के क्षेत्र में, उन दिनों भी आलोचक थे, आज भी भरे-पड़े हैं, का कहना था कि कमला की कहानी को या फिर एक्सप्रेस के रिपोर्टर की कहानी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। लेकिन, एक्सप्रेस के तत्कालीन प्रधान संपादक एस. निहाल सिंह ने कहा: &#8220;तीन राज्यों में फैले इस संगठित अपराध को रोकने के लिए अधिकारियों द्वारा कुछ नहीं किया गया। कमला उस क्षेत्र में अभी भी प्रचलित गुलामी का प्रतीक है। हमारी कार्रवाई हमारे पाठकों को यह बताने का एकमात्र प्रभावी तरीका था कि उसके आसपास क्या हो रहा था और क्या बुराई से छुटकारा पाने के लिए कुछ तो करना ही होगा।” </p>
<p>इस सिलसिला का अंत यहीं नहीं हुआ। कहानियों का सिलसिला जारी रहा। इसका मुख्य उद्देश्य था आखिरी दम तक लड़ना ताकि समाज से इन कुरीतियों का अंत हो। यह पहली घटना नहीं थी। एक्सप्रेस निरंतर इस तरह की कहानियां किया था जैसे कि भागलपुर बंधन, आगरा महिला गृह और विचाराधीन कैदियों की स्थिति के मामलों में, अखबार ने अधिकारियों के खिलाफ जनता की राय बनाने की कोशिश की थी। शुरुआती लेख छपने के अगले दिन, जिस शहर में बिक्री पर बातचीत हुई थी, वहां की पुलिस ने कहा कि वे महिलाओं के साथ लेन देन करने के लिए रिपोर्टर के खिलाफ मामला दर्ज कर रहे हैं। इसके बाद दिल्ली पुलिस अनाथालय गई और कमला को यह कहते हुए ले गई कि वह एक महत्वपूर्ण गवाह बन सकती है और उसे उनकी सुरक्षा की जरूरत है। </p>
<p>तत्कालीन कार्यकारी संपादक अरुण शौरी ने कहा भी कि &#8220;हम अदालत से पूछेंगे कि क्या वैध जांच के लिए कानून को तोड़ा जा सकता है और बाद में जांच से उजागर हुई बुराई को कम करने के लिए कदम उठाने और इस तरह नागरिक अधिकारों के दायरे को बढ़ाने के अनुरोध के साथ अदालत का रुख करेंगे।&#8221; इस बीच, एक्सप्रेस सर्वोच्च न्यायालय चला गया, जिसने कमला को तब तक अनाथालय में वापस भेजने का आदेश दिया, जब तक कि अदालत यह तय नहीं कर लेती कि उसके साथ क्या किया जाना है। पुलिस स्टेशन में कई घंटों के बाद कमला को आश्रय स्थल में लौटा दिया गया, जहां आम तौर पर वयस्कों की देखभाल नहीं की जाती है।</p>
<p>चूंकि कमला की कहानी पहले पन्ने की खबर थी, इसलिए यह सवाल कि इसे लोगों की देखभाल कौन सी एजेंसियां करती हैं, कई बार पूछा गया, लेकिन इसका उत्तर नहीं दिया गया। कुछ हफ़्ते पहले एक सरकारी अनाथालय में एक युवा लड़के को अस्पताल ले जाया गया जहाँ पता चला कि उसके साथ बार-बार बलात्कार किया गया था। जांच चल रही थी। यह भी बताया गया था कि आगरा में गरीब महिलाओं के लिए एक घर में कैदियों को गंदी, वायुहीन काल कोठरियों में रखा जा रहा था और कई लोग इन स्थितियों के कारण पागल हो गए थे। भारत में अपने कमजोर या विकलांग सदस्यों की देखभाल करना परिवारों की अत्यधिक जिम्मेदारी है और यहां तक कि सबसे गरीब परिवारों में भी ऐसे दायित्वों को गंभीरता से लिया जाता है। लेकिन जहां पारिवारिक संबंध टूट गए हैं, वहां कुछ तैयार विकल्प हैं। कहते हैं कि अक्सर वंचितों और कमजोरों के पास अपने श्रम को गुलामी में बदलने या खुद को बेचने के अलावा कोई रास्ता नहीं होता है।</p>
<p>उन दिनों संपादकों को लिखे पत्रों में जो लिखा गया था वह सरीन के प्रति सकारात्मक नहीं था। उसी समय दी हिंदुस्तान टाइम्स के तत्कालीन संपादक खुशवंत सिंह ने आक्रोश व्यक्त करने वालों को भोला बताया और उन्होंने अपने साप्ताहिक कॉलम में पूछा, &#8221;हमारे शिक्षित शहरी निवासी बनावटी विश्वास के किस हाथीदांत टावर में रहते हैं?उस प्रतिभाशाली जॉनी के लिए जिसने एक महिला को खरीदने के लिए ग्रामीण इलाकों में इतनी पेरी मेसनिंग की ताकि वह अपने पलायन के बारे में लिख सके, मैं केवल इतना कह सकता हूं कि अगर उसने हमारी झुग्गियों या भिखारियों के घरों में कुछ पूछताछ की, तो वह सस्ता सौदा कर लिया होता।&#8221; उन्होंने यह भी लिखा था कि: &#8220;शर्मनाक तथ्य यह है कि हमारे देश में इतनी भीषण गरीबी है कि मानव मांस मटन से कुछ ही अधिक कीमत पर बिकता है। अगर इन लेखों ने कुछ पाठकों को उनकी संतुष्टि से बाहर निकाला है तो मुझे मानना होगा कि कुछ अच्छा हासिल हुआ है।&#8221;</p>
<p>इस बीच, कमला दुखी रहती है और जिन लोगों ने उसे बचाया है, वे उसके लिए एकत्र किए गए 6,000 रुपये की धनराशि से उसके लिए एक पति ढूंढने के अलावा कोई राहत नहीं सोच सकते हैं। हालांकि वह कोई अपराधी नहीं थी और उस पर कोई आरोप नहीं लगाया गया था, लेकिन जब तक सुप्रीम कोर्ट एक्सप्रेस पत्रकारों की दलीलों पर सुनवाई नहीं करता, तब तक वह अपनी इच्छा के विरुद्ध अनाथालय में कैद थी । तत्कालीन पुलिस ने कमला को उसके आर्य समाज अभयारण्य से राज्य के स्वामित्व वाले नारी निकेतन में ले जाने का प्रयास किया, लेकिन अदालत ने हस्तक्षेप किया और संबंधित राज्यों से रिट का जवाब देने को कहा। कथित तौर पर दिल्ली प्रशासन की अब भी राय थी कि याचिकाकर्ताओं ने आईपीसी का उल्लंघन किया है। </p>
<p>लेकिन एक्सप्रेस के कार्यकारी संपादक ने कहा था कि &#8220;मैं समाज को नहीं बदल सकता। यह तब बदलेगा जब लोग इसे चाहेंगे। मैं सिर्फ समाज को एक दर्पण दिखा रहा हूं। मैं गांधीवादी तकनीक का उपयोग कर रहा हूं: छोटे मुद्दे उठाओ, डर हटाओ, प्रयास करो और शिक्षित करो।&#8221; लोग समाज में व्याप्त बुराइयों के बारे में बात करते हैं और हर व्यक्ति से अपना योगदान मांगते हैं।&#8221;</p>
<p>बाद में, टाइम्स पत्रिका ने भी कमला की दर्दनाक व्यथा को विश्वव्यापी बनाया, अपनी पत्रिका में जगह दिया। टाइम ने लिखा कि &#8220;तीन महीने पहले, देश के सबसे अधिक प्रसार वाले दैनिक द इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर अश्विनी सरीन ने 306 डॉलर में एक महिला को खरीदा और अनुभव के बारे में लिखा। मैंने मध्य प्रदेश के शिवपुरी के पास एक गाँव की एक छोटे कद की पतली महिला को 2,300 रुपये में खरीदा। यहां तक कि मुझे इस बात पर विश्वास करना भी मुश्किल हो रहा है कि मैं आज सुबह उस अधेड़ उम्र की महिला को पंजाब में भैंस की कीमत से आधी कीमत पर खरीदकर राजधानी लौटा हूं।&#8221;</p>
<p>उन दिनों कूमी कपूर भी सरीन जैसे एक रिपोर्टर थी जो बाद में एक्सप्रेस के स्थानीय संपादक भी बनी। सुश्री कपूर संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में पढ़ाई के दौरान मनोवैज्ञानिक अध्ययन भी की थी, &#8216;कमला&#8217; की बहुत इंटटव्यू भी की थी। कई बार उन्होंने लिखी भी थी कि &#8221;जब भी मैं उनसे मिलने जाता हूं तो वह मुझसे कहती हैं कि वह मेरे साथ आना चाहती हैं।&#8221; कमला के शरीर पर अनगिनत टैटू थे। उसकी कलाइयों और हाथों पर नीले टैटू के निशान थे। इस तरह के टैटू उस क्षेत्र की महिलाएं बनती हैं। कमला के शरीर पर &#8216;नीली&#8217; निशान सिर्फ टैटू के नहीं थे, बल्कि जब वह पहली बार यहां आई थी तो उसे पिटाई के कारण चोटें लगी थी और वह अल्पपोषित थी। जब वह पुरानी दिल्ली स्थित एक अनाथालय में रखी गई थी, वह अतार्किक व्यवहार करती थी। अश्लील भाषा का प्रयोग करती थी। चिल्लाती थी और वहां से निकलना चाहती थी। </p>
<p>कूमी कपूर, जिन्होंने कमला के जीवन को फिर से बनाने की कोशिश की, ने कहा था कि वह अपने परिवार के बारे में बहुत टालमटोल करती थी । उसने रिपोर्टर को बताया कि विधवा होने के बाद उसके जीजा ने उसे बेच दिया था। सरीन, जिन्होंने उसे खरीदा था, खुद को एक बड़े परिवार वाले डॉक्टर के रूप में पेश किया, जो अपने फार्म फोरमैन के लिए पत्नी की तलाश कर रहा था। व्यापारियों का विश्वास जीतने के बाद, उन्होंने मुरैना में पुलिस स्टेशन के सामने हुई एक बैठक में सौदे पर मुहर लगा दी। महिलाओं का व्यापार व्यापक रूप से फैला हुआ था। सरीन यह स्वीकार किये थे कि महिलाओं का व्यापार बड़े पैमाने पर होता था, कुछ को नौकरों के रूप में और कुछ को वेश्याओं के रूप में बेचा जाता था। उन्होंने कहा था कि कीमतें 21,000 रुपये या 2,800 डॉलर तक थीं, जो 15 साल की लड़की के लिए मांगी गई थीं। कूमी कपूर ने यहां तक कहा था कि कमला को वास्तव में बहुत गर्व था कि उसे इतनी ऊंची कीमत मिली थी। वह खुद को संपत्ति मानती थी। उसका मालिक एक आदमी उसके साथ अच्छा व्यवहार करता था, उसे भरपूर भोजन देता था, लेकिन दूसरा उसे भूखा रखता था और पीटता था। </p>
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<p>बहरहाल, अरुण शौरी के संस्मरण का यह पहला विशेष अंश 1980 के दशक की सबसे बड़ी कहानियों में से एक &#8211; कमला की कहानी को दर्शाता है, जिसे मध्य भारत में आदिवासी महिलाओं के शोषण को उजागर करने के प्रयास में एक पत्रकार ने खरीदा था।उन्होंने लिखा भी कि अश्विनी सरीन हमारी दिल्ली टीम में एक साहसी युवा पत्रकार थे। वह क्षेत्र में जाएंगे और तथ्यों का दस्तावेजीकरण करेंगे &#8211; परिवार नियोजन के नाम पर आपातकाल के दौरान अधिकारियों की ज्यादतियों से लेकर पुराने रक्षा वाहनों के निपटान में अनियमितताओं तक। तिहाड़ जेल में कैदियों को जिन स्थितियों में रखा जा रहा था, उन्हें प्रमाणित करने के लिए, उन्होंने खुद को &#8220;नशे में व्यवहार&#8221; के लिए गिरफ्तार कर लिया था, और खुद को जेल में डाल लिया था। जब वह अंदर थे, उन्होंने निश्चित रूप से स्थितियों के बारे में जानकारी एकत्र की, लेकिन, अधिक महत्वपूर्ण, वहां दवाओं के मुक्त प्रवाह के बारे में जानकारी एकत्र की। बाहर आने पर उन्होंने इस व्यापार के बारे में लिखा, जिसे पाठकों से काफी सराहना मिली।</p>
<p>धौलपुर-मुरैना इलाके में चुनाव कवर करते समय अश्विनी को पता चला था कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और यूपी के जंक्शन पर महिलाओं का व्यापार बड़े पैमाने पर होता है। समय-समय पर सामाजिक कार्यकर्ता इस कुप्रथा की ओर ध्यान आकर्षित करते थे और अधिकारी वर्ग इसका खंडन करता था। अश्विनी ने मुझे बताया कि वह उस क्षेत्र में जाने, वास्तव में एक महिला खरीदने और उसे दिल्ली लाने के लिए तैयार था। हमने प्रोजेक्ट को सभी से दूर रखा &#8211; घर पर और कार्यालय में। </p>
<p>बेशक, हमें इसमें कोई संदेह नहीं था कि एक महिला को खरीदना एक गंभीर मामला था। मैंने पांच प्रतिष्ठित व्यक्तियों को लिखा था &#8211; भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति वाईवी चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएन भगवती से। मैंने समझाया कि अश्विनी क्या करने वाले थे, और कारण वह ऐसा करने जा रहा था। कारण स्पष्ट और सरल था: एक अमानवीय प्रथा को खत्म करने के लिए कदम उठाने के बजाय, मध्य प्रदेश सरकार इसे झूठ के साथ कवर कर रही थी। हम तथ्यों को इस तरह उजागर करने जा रहे थे कि वे निर्विवाद हो जाएं। इससे सरकार पर अंततः गरीब जनजातीय लोगों को अपनी बहनों और बेटियों पर इस भयानक भाग्य का बोझ रोकने के लिए शिक्षित करने के लिए कदम उठाने का दबाव पड़ेगा।</p>
<p>अश्विनी ने ज़मीन की स्थिति जानने, संपर्क बनाने और स्थानीय लोगों का विश्वास जीतने के लिए क्षेत्र का दौरा करना शुरू किया। आत्मविश्वास जीतने के लिए, उसने खुद को कई किरदारों में ढाला, जिसमें एक लड़की की तलाश में पंजाब का एक ठाकुर भी शामिल था। यह छल लगभग आठ से नौ महीने तक जारी रहा। अश्विनी इस क्षेत्र में 10 बार गया। खुद को भारी जोखिम में डालकर, अश्विनी ने उन लोगों से सीधे संपर्क स्थापित किया जो महिलाओं को खरीदने और बेचने का कारोबार करते थे। गहन और मेहनती काम के बाद, उन्होंने मुरैना सर्किट हाउस में एक सौदा किया और महिला, कमला को खरीद लिया। उसे दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उसे सौंप दिया गया। अश्विनी का वृत्तांत उन वाक्यों से शुरू हुआ जो लंबे समय तक गूँजते रहे: &#8220;कल मैंने मध्य प्रदेश के शिवपुरी के पास एक गाँव की एक छोटे कद की पतली महिला को 2,300 रुपये में खरीदा। मेरे लिए भी इस बात पर यकीन करना मुश्किल हो रहा है कि मैं आज सुबह उस अधेड़ उम्र की महिला को पंजाब में भैंस की कीमत से आधी कीमत पर खरीदकर राजधानी लौटा हूं।&#8221;</p>
<p>हमने सोचा कि यह सबसे अच्छा होगा कि अश्विनी की प्रारंभिक कहानी के बाद, कमला से एक महिला से मुलाकात की जाए और उसका साक्षात्कार लिया जाए। उस समय दिल्ली में हमारी मुख्य रिपोर्टर कूमी कपूर उनसे मिलने गईं। बातचीत के दौरान, कमला अक्सर खुद को तीसरे व्यक्ति में संदर्भित करती थी&#8230; समय-समय पर, कमला असंगति में पड़ जाती थी; ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपनी क्षमताओं पर पूरी तरह अधिकार नहीं रखती थी। यहां तक कि पिछले दिन के दौरान वह जिस दौर से गुजरी थी, उसके प्रभाव को ध्यान में रखते हुए &#8211; बेचा जाना, एक बड़े, अज्ञात शहर में लाया जाना &#8211; कूमी ने अपनी प्रतिक्रियाओं को अनियमित माना। कूमी ने लिखा, &#8220;उसे बार-बार इस्तेमाल किया गया और छोड़ दिया गया।&#8221; &#8220;कोई आश्चर्य नहीं कि वह अब पागलपन की कगार पर है।&#8221;</p>
<p>कभी-कभी, व्यथित होने के बजाय, कमला ने इस तथ्य पर गर्व व्यक्त किया कि उसके लिए कीमत इतनी अधिक आंकी गई थी। कमला की प्रतिक्रियाओं ने एक और चिंताजनक तथ्य भी स्थापित किया। महिलाओं का व्यापार इतना व्यापक रहा होगा कि, कभी-कभी, कमला को लगता था कि उसका भाग्य सामान्य है: अश्विनी की पत्नी ने संवाददाताओं से कहा कि कमला ने उससे पूछा कि अश्विनी ने उसके लिए कितना भुगतान किया है, उमा; चूँकि अश्विनी ने कमला के लिए पहले ही भुगतान कर दिया था, इसलिए वे दोनों उसके साथ क्यों नहीं रह सकते थे। उनसे मिलने और उनकी बकवास, कभी-कभी विरोधाभासी, कभी-कभी कुछ हद तक असंगत प्रतिक्रियाओं को सुनने के बाद, कूमी ने निष्कर्ष निकाला कि कमला को &#8220;मनोरोग देखभाल की तत्काल आवश्यकता थी&#8221;।</p>
<p>अश्विनी, हर उस शहर में एक घरेलू शब्द बन गया जहां एक्सप्रेस प्रकाशित होता था। दूसरी ओर, सरकार गुस्से में आ गईं। उन्हें एक घृणित प्रथा के बारे में कुछ भी नहीं करते हुए दिखाया गया था। धौलपुर की स्थानीय पुलिस ने बताया कि वे अश्विनी के खिलाफ महिलाओं की तस्करी के आरोप में मामला दर्ज करेंगे। इसे रोकने के लिए, हमने सर्वोच्च न्यायालय में एक रिट दायर की जिसमें न्यायालय से अनुरोध किया गया कि वह इस व्यापार पर अंकुश लगाने के लिए सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कदमों के बारे में निर्देश दे और यह भी बताए कि कमला को कहाँ रखा जाना चाहिए।</p>
<p>हमारी बड़ी राहत के लिए, एक आर्य समाज संस्था जो अनाथों और निराश्रित महिलाओं के लिए घर चलाती थी, आर्य अनाथालय, उसे आश्रय प्रदान करने के लिए सहमत हुई। उसे वहां ले जाया गया. लेकिन, दिल्ली पुलिसकर्मियों का एक दस्ता कमला को अपने कब्जे में लेने के लिए आर्य समाज आश्रय स्थल पर पहुंच गया। सहकर्मी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास पहुंचे। देर शाम, न्यायमूर्ति भगवती ने निर्देश दिया कि कमला को अनाथालय में लौटा दिया जाए, और &#8220;अगले आदेश तक&#8221; स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिए। इस सारी भागदौड़ के बाद उस शाम दायर किए गए प्रेषण में यह निष्कर्ष निकाला गया: &#8220;कमला को शाम 5 बजे के आसपास घर से निकाल दिया गया था, वह शाम 7.30 बजे वापस आई, स्पष्ट रूप से चकित और परेशान थी: &#8220;क्या मैं एक बंदर हूं जिसे इस तरह से इधर-उधर धकेला जा रहा हूं? आप कमला के प्रति दयालु नहीं रहे,&#8221; उसने कहा। &#8220;आपके पास?&#8221;&#8216;</p>
<p>अश्विनी, कूमी और मैंने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट दायर की। न्यायमूर्ति भगवती और न्यायमूर्ति ए वरदराजन ने याचिका स्वीकार कर ली। उन्होंने निर्देश दिया कि कमला को स्थानांतरित न किया जाए; कमला को किस तरह की मदद की जरूरत है, इसका आकलन करने के लिए एम्स तुरंत एक मनोचिकित्सक को नियुक्त करे; सरकारों को न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना हम तीनों में से किसी के भी खिलाफ रिट की विषय वस्तु के आधार पर कोई कार्रवाई शुरू नहीं करनी चाहिए। और उन्होंने मध्य प्रदेश, यूपी, राजस्थान और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर पूछा कि महिलाओं की तस्करी को दबाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। मध्य प्रदेश सरकार, जिसने इस क्रूर व्यापार पर अंकुश लगाने के लिए कुछ नहीं किया था, ने अब मुरैना डिवीजन के आयुक्त को मामले की जांच करने और 10 दिनों के भीतर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।सरकार निष्कर्षों को सार्वजनिक नहीं करेगी। हमारे राज्य में एक उत्कृष्ट संवाददाता थे, एनके सिंह। उसे रिपोर्ट मिल गई। </p>
<p>कमिश्नर की पूछताछ से इस बात की पुष्टि हुई कि मुरैना और आसपास के इलाकों में महिलाओं का व्यापार फल-फूल रहा था। लड़कियों और महिलाओं को दूरदराज के स्थानों से लाया जाता था, खरीदा और बेचा जाता था, और दिल्ली और मेरठ जैसे केंद्रों में भेजा जाता था। &#8220;तस्कर,&#8221; एनके ने दर्ज की गई रिपोर्ट के हवाले से कहा, &#8220;स्थानीय राजनीति में प्रभावशाली हैं और राजनीतिक और सामाजिक दिग्गजों के संरक्षण का आनंद लेते हैं। ” अश्विनी की कहानी, और उसकी साहसिकता, एक घरेलू शब्द बन गई। प्रसिद्ध नाटककार विजय तेंदुलकर ने कमला के भाग्य को खूंटी पर रखकर एक नाटक लिखा। यह नाटक कमला नामक फिल्म का आधार बना। </p>
<p>अश्विनी के शानदार प्रयास का कई मायनों में दुखद अंत हुआ। जब कमला के लिए आश्रय ढूंढने के प्रयास जारी थे, तब एक दिन हमें पता चला कि वह बेचारी महिला &#8220;गायब&#8221; हो गई है। यह कैसे हो सकता है? कमला स्वस्थ दिमाग की नहीं थी, और इसलिए वह अकेले उस शहर में भाग नहीं सकती थी जिसके बारे में उसे कुछ भी नहीं पता था। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अनाथालय में प्रवेश को सख्ती से नियंत्रित किया गया था। इमारत में केवल एक प्रवेश द्वार था &#8211; एक ऊँचा द्वार जो हमेशा बंद रहता था। और गेट के बाहर पुलिस तैनात कर दी गई थी. वह कैसे बाहर निकल सकती थी या कूद सकती थी? उसका पता लगाने की कोशिशें जारी रहीं। उस वर्ष नवंबर में, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के पुलिस आयुक्त को उसका पता लगाने के लिए सभी प्रयास करने का निर्देश दिया। वह कभी नहीं मिली. सबसे संभावित स्पष्टीकरण? महिलाओं की खरीद-फरोख्त करने वाले लोगों ने जो पोल खुल जाती, उसे किसी तरह वहां से हटा दिया। </p>
<p>अश्विनी कुछ वर्षों तक अखबार में बने रहे। बाद में मैंने सुना कि उन्होंने पत्रकारिता छोड़ दी है और व्यवसाय में लग गए हैं। मेरा उससे संपर्क टूट गया था। यह सुनिश्चित करने के लिए कि मेरी याददाश्त कुछ विवरणों में मुझे धोखा न दे रही हो, मैंने एक पुराने सहकर्मी से उसका नंबर लिया। उनसे बात किये हुए लगभग चालीस वर्ष बीत गये होंगे। हमारी बातचीत को बमुश्किल कुछ ही मिनट हुए थे कि अश्विनी की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा कि वह &#8220;इतने भावुक&#8221; हो गए हैं कि फिलहाल बात नहीं कर सकते और बाद में वापस आएंगे। उसने अपनी पत्नी उमा को फोन लगाया। उन वर्षों में बने बांडों की बात करें। </p>
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