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	<title>history Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>&#8220;मोदी है तो मुमकिन है&#8221; का नारा दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर &#8216;चारो खाने चित्त&#8217;, आप शताब्दी पुराने &#8216;आठ विरासतों को देख भी नहीं सकते&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 08 May 2026 05:55:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[पुरातत्व]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली, 8 मई:  पिछले वर्ष 3 अप्रैल को एक प्रश्न के लिखित जवाब में, केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के राज्य मंत्री टोखन साहू ने संसद को बताया कि केंद्र सरकार ने दिल्ली गोल्फ क्लब की लीज़ 2050 तक बढ़ा दी है। यह फैसला क्लब को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की उसकी गुज़ारिश को ध्यान में रखते हुए लिया [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/archaeology/modi-hai-toh-mumkin-hai-slogan-lies-flat-on-its-face-at-the-entrance-of-the-delhi-golf-club">&#8220;मोदी है तो मुमकिन है&#8221; का नारा दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर &#8216;चारो खाने चित्त&#8217;, आप शताब्दी पुराने &#8216;आठ विरासतों को देख भी नहीं सकते&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली, 8 मई:  पिछले वर्ष 3 अप्रैल को एक प्रश्न के लिखित जवाब में, केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के राज्य मंत्री टोखन साहू ने संसद को बताया कि केंद्र सरकार ने दिल्ली गोल्फ क्लब की लीज़ 2050 तक बढ़ा दी है। यह फैसला क्लब को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की उसकी गुज़ारिश को ध्यान में रखते हुए लिया गया है, खासकर इसलिए क्योंकि 2016 से गोल्फ ओलंपिक खेलों का हिस्सा बन गया। </strong></p>
<blockquote><p>अब जब मंत्रीजी लीज-अवधि बढ़ा ही दिए हैं, स्वाभाविक है, इस बात की जानकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को होगा ही। इस दृष्टि से &#8221;मोदी है तो मुमकिन है&#8217; का नारा दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर &#8216;चारो खाने चित&#8217; दिखाई दिया। देश के लोगों को, खासकर पुरातत्व और विरासत प्रेमियों को, चाहे वे &#8216;देशज&#8217; हों या &#8216;विदेशज&#8217;, यह समझ लेना चाहिए कि वे कई शताब्दी पुराने न्यूनतम आठ पुरातत्वों को अपने जीवनकाल में देखने से वंचित रह जायेंगे। </p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/4.mov"></a></p>
<p>जनसँख्या के दृष्टिकोण से अगर भारत के लोगों की आयु संभाविता (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) को देखें तो सरकारी आंकड़ों के मुताबिक यह 70 वर्ष है 2026 तक। इस दृष्टि से भारत में आज 162.8 मिलियन लोग 60+ वर्ष के हैं। यानी आगामी 2050 में, जब तक दिल्ली गोल्फ क्लब का विस्तारित लीज अवधि है, वे सभी अपने जीवन प्रत्याशा उम्र से 15 वर्ष अधिक के रहेंगे, अगर जीवित रहे तो। और आज जो 50-वर्ष के हैं, जिनकी संख्या करीब 250 मिलियन है, दिल्ली गोल्फ क्लब की अगली लीज के नवीकरण के समय जीवन प्रत्याशा उम्र को पार कर जायेंगे। यानी इस धरती पर पैदा होने के बाद भी उन्हें अपने देश, देश की राजधानी में स्थित ऐतिहासिक पुरातत्वों, विरासतों को देखे बिना धरती से कूच करना होगा। फिर &#8216;मोदी है तो मुमकिन है&#8217; का क्या मतलब? </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7729" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>विडम्बना यह है कि एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक विरासतों और धरोहरों की गरिमा के प्रति न केवल भारत के लोगों के लिए, बल्कि वैश्विक स्तर पर आकर्षण का मार्ग ढूंढ रहे हैं, प्रशस्त कर रहे हैं; वहीं दूसरे तरफ उन्हीं के मंत्रिमंडल के लोग देशज-विदेशज पर्यटकों को दिल्ली गोल्फ क्लब के अंदर के विरासतों को देखने से वंचित कर रहे हैं। यानी केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय और मंत्री के सामने सम्मानित प्रधानमंत्री की बातों का, विचारों का &#8211; कोई मोल नहीं।</strong>  </p>
<p>संसद में साहू ने कहा कि &#8220;पिछली बार लीज़ का विस्तार दिल्ली गोल्फ क्लब के अनुरोध पर वर्ष 2050 तक किया गया। यह विस्तार दिल्ली गोल्फ क्लब के उस अनुरोध को ध्यान में रखते हुए किया गया जिसमें क्लब को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की बात कही गई थी, क्योंकि 2016 से गोल्फ ओलंपिक खेलों का हिस्सा बनने वाला था।&#8221; मंत्री के अनुसार, इस उद्देश्य के लिए बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने के लिए, दिल्ली गोल्फ क्लब ने लंबी अवधि की योजना के तहत लीज़ को 2070 तक बढ़ाने का अनुरोध किया था। दिल्ली गोल्फ क्लब की स्थापना 1930 के दशक की शुरुआत में एक म्युनिसिपल कोर्स के तौर पर हुई थी और पहले इसे लोधी गोल्फ क्लब के नाम से जाना जाता था। मंत्री ने &#8216;लीज अवधि&#8217; तो विस्तारित कर दिए, लेकिन यह नहीं सोचे कि प्रधानमंत्री का सांस्कृतिक विरासतों से संबंधित प्रयासों का क्या होगा?</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7730" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>वैसे, दिल्ली गोल्फ क्लब के आस-पास ही नहीं, दिल्ली सल्तनत के लोगों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अगर पुराने कानूनों को रद्द करने, उनमें संशोधन करने पर विशेष जोर दिया और परिणामस्वरूप अगस्त 2025 तक 1,500 से अधिक पुराने या अनावश्यक केंद्रीय अधिनियमों को रद्द किया जा सकता है; तो दिल्ली गोल्फ क्लब के लीज को &#8216;शर्तयुक्त&#8217; क्यों नहीं किया जा सकता है, ताकि भारत के लोगों को ऐतिहासिक पुरातत्व और विरासतों को, जो परिसर के अंदर है, प्रतिबंधित है, देखने से वंचित नहीं होना पड़े। लोगों का कहना है कि सरकार ने विभिन्न कानूनों के तहत 3,700 से अधिक प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया है या उन्हें सरल बनाया है, और 40,000 से अधिक अनुपालन आवश्यकताओं को समाप्त कर दिया है। ज्ञातव्य हो कि भारत के विधि आयोग और विधायी विभाग द्वारा गठित दो-सदस्यीय समिति द्वारा 1824 ऐसे केंद्रीय कानूनों की पहचान किये गए थे, जो अब अनावश्यक और पुराने हो चुके थे। </p>
<p><strong>इतना ही नहीं, 1 जुलाई, 2024 से, भारतीय दंड संहिता, 1860 और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की जगह क्रमशः भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ने ले ली है। मुख्य बदलावों में सामुदायिक सेवा की शुरुआत, कानूनी प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण, न्याय के लिए अनिवार्य समय-सीमाएं, आतंकवाद की परिभाषाएं, और धाराओं का पुनर्कर्मांकन तथा उन्हें सुव्यवस्थित किया गया। ऐसी स्थिति में, अगर प्रधानमंत्री देश के लोगों के कल्याणार्थ, देश की गरिमा के लिए अंग्रेजी हुकूमत कालीन कानूनों को भारतीय बना सकते हैं तो फिर दिल्ली गोल्फ क्लब के अंदर स्थित पुरातत्व को देखने, समझने के लिए भारत के लोगों के लिए विशेष पहल तो कर ही सकते हैं। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7731" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>वैसे भी, यह क्लब कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के तहत रजिस्टर्ड है—जिसका मतलब है कि यह एक ऐसी कंपनी है जिसका मकसद कॉमर्स, कला, विज्ञान, खेल, शिक्षा, रिसर्च, समाज कल्याण, धर्म, दान या पर्यावरण की सुरक्षा को बढ़ावा देना है। धारा 8 कंपनियों का मुनाफा सिर्फ़ उसी मकसद के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है जिसके लिए उन्हें बनाया गया है। यह क्लब आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 12A के तहत भी रजिस्टर्ड है, जिससे इसे आयकर देने से भी छूट मिलती है। आय-व्यय के बारे में तो सरकार का कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय है ही, जांच करने के लिए। </p>
<p>जाकिर हुसैन रोड पर 179 एकड़ ज़मीन पर बना है दिल्ली गोल्फ क्लब, जिसे केंद्र सरकार ने 1950 के दशक की शुरुआत में क्लब को लीज पर दिया था। हाई कोर्ट में कर्मचारियों की एक याचिका के मुताबिक, भले ही इस ज़मीन की कीमत पचपन हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा है, फिर भी क्लब केंद्र सरकार को हर महीने प्रति एकड़ सिर्फ़ 16,620 रुपये की नाममात्र की लाइसेंस फीस देता है। </p>
<p><strong>प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर शहरी विकास मंत्रालय ने अपने तीन अधिकारियों को क्लब की जनरल कमेटी का सदस्य बनाया है। क्लब आवेदन और सब्सक्रिप्शन फीस लेता है। इसके अलावा, सदस्यता के लिए चुने गए आवेदकों से एंट्री फीस 3.5 लाख रुपये से लेकर 15 लाख रुपये तक ली जाती है, जिसमें लागू टैक्स भी शामिल होता है। कहते हैं यहाँ करीब 4000 + सदस्य हैं। इस क्लब की खासमखास विशेषता यह है कि चतुर्दिक लाल रंग से रंगे चारदीवारी वाले इस क्लब में भारतीय नौकरशाहों, न्यायविदों, न्यायमूर्तियों, राजनेताओं, व्यापारियों, कारोबारियों, के साथ-साथ खिलाड़ियों की सदस्यता की सूची काफी लम्बी है। </strong> </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7732" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><em>दिल्ली गोल्फ क्लब परिसर में नौ स्मारक स्थित हैं। <br />
1. लाल बंगला (प्रवेश द्वार के पास), <br />
2. गोल्फ क्लब में होल नंबर 6 के पास स्थित मस्जिद, <br />
3. गोल्फ क्लब में होल नंबर 4 के पास स्थित बगीची, <br />
4. गोल्फ क्लब में होल नंबर 10 के पास स्थित सैयद आबिद का मकबरा, <br />
5. गोल्फ क्लब में होल नंबर 14-16 के पास स्थित अज्ञात मकबरा, <br />
6. गोल्फ क्लब में होल नंबर 18 के पास स्थित अज्ञात मकबरा, <br />
7. बारह खंभा, 8. मीर तकी का मकबरा और <br />
9. स्विमिंग पूल से सटा हुआ स्मारक। </em></p>
<p>प्रवेश द्वार पर स्थित लाल बंगला को छोड़कर, दिल्ली गोल्फ क्लब में, ऐतिहासिक इमारतों को उनके अपने इतिहास से पूरी तरह से काट दिया गया है। अब वे किसी सांस्कृतिक या पुरातात्विक परंपरा की प्रतिनिधि बनकर खड़ी नहीं हैं, बल्कि उन्हें महज़ एक सजावटी वस्तु के तौर पर इस्तेमाल परिसर के अंदर है। अब तो इनके लाल बलुआही रंग को भी बदलकर सफ़ेद कर दिया गया है। परिसर के अंदर स्थित विरासतों की बात तत्काल के लिए किनारे कर, लाल बंगला, जो क्लब के प्रवेश द्वार के पास बाएं तरफ स्थित है, करते हैं। यह &#8216;प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958&#8217; के तहत संरक्षित है। लाल रंग के एक बोर्ड पर लिखा है। कहते हैं कि सर लाल बंगला ही &#8216;राष्ट्रीय स्मारक&#8217; घोषित है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7733" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>लेकिन यहाँ की अवस्था, बंगले की स्थिति, साफ़-सफाई देखकर ऐसा लगता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी शायद फाइलों पर अधिक साफ़-सफाई दिखा रहे हैं। इस बात को न तो संस्कृति मंत्रालय या भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी प्रधानमंत्री को बताएँगे। शौचालय में प्रवेश जैसा मार्ग जो एक तरफ पुरातत्व और दूसरे तरफ दिल्ली गोल्फ क्लब द्वारा निर्मित लोहे के बाड़ से घिरा है, लाल बंगला परिसर की ओर जाता है। यहाँ निजी क्षेत्र के एक सुरक्षाकर्मी दिखे तो जरूर, लेकिन परिसर की गंदगी को देखकर, सूखे पत्तों का विशाल अम्बार देखकर, मिट्टी से बनी कई परतों की काई को देखकर यह नहीं कहा जा सकता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इसकी देखरेख करता है। </strong></p>
<p>दिल्ली गोल्फ क्लब के अंदर बिखरे हुए लगभग 10 स्मारक एक पहेली के टुकड़ों की तरह हैं। सबसे पहले तो, इनमें से ज़्यादातर जगहों पर जाना मना है और परिसर में प्रवेश करने के लिए क्लब अधिकारियों से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है।  इसका मतलब यह भी है कि न केवल पर्यटक, बल्कि दिल्ली के कई लोग भी इन मध्ययुगीन इमारतों के अस्तित्व से अनजान हैं। इसके अलावा, गोल्फ कोर्स शायद एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ कोई दिल्ली के सभी सात शहरों के अवशेष देख सकता है। इनमें से ज़्यादातर स्मारक भव्य हैं, लेकिन वे गुमनाम मकबरे हैं — जो शहर के वास्तुशिल्प इतिहास के दस्तावेज़ीकरण में कमियों की ओर इशारा करते हैं।</p>
<blockquote><p>लाल बलुआ पत्थर से बने दो मकबरों का एक समूह, जो निजामुद्दीन की ओर  से आते फ्लाईओवर से दिखाई देता है, का निर्माण 1779-80 में हुआ था। इन उत्तर-मुगलकालीन संरचनाओं के केंद्र में चौकोर कमरे हैं, कोनों पर छोटे चौकोर कमरे हैं जिनके बीच आयताकार हॉल हैं, और चौकोर छतों के केंद्र में गुंबद हैं। प्रवेश द्वार के पास वाला मकबरा ज़्यादा पुराना लगता है, जिसमें एक ऊँचे चबूतरे पर एक चौकोर कमरा बना है। दोनों का लेआउट केंद्रीय कक्ष के चारों ओर बने बड़े मकबरों जैसा है, लेकिन आकार में ये छोटे हैं। पास में ही उत्तर-मुगलकालीन दो-मंज़िला प्रवेश द्वार है, जिसमें एक केंद्रीय मंडप और गुंबददार छतरियाँ बनी हैं। </p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="aligncenter size-full wp-image-7734" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-17-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p>लाल बंगला परिसर में घूमने, देखने से प्रतीत होता है कि यहाँ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी, या उनके द्वारा ठेकेदारी प्रथा से ही सही, श्रमिक कभी आये ही नहीं हैं। इस स्मारक या इस परिसर की मरम्मत कभी हुई ही नहीं है। यह जानना शोध का विषय है कि आखिर इसके रखरखाव पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अब तक कितनी राशि व्यय की है।अंदर प्रवेश के साथ दाहिने हाथ दिल्ली गोल्फ क्लब द्वारा निर्मित टेंट दीखते हैं। सामने क्लब के मैदान में घास काटने वालों की भीड़ दिखाई देती है। सामने मैदान में सफ़ेद रंग का मकबरा नुमा विरासत दिखाई देता है, जो सफ़ेद रंग का दीखता है । कहते हैं कि वह मकबरा सैयद आबिद, शाहजहाँ की सेना के एक प्रमुख सिपाही—खान दौराँ खान—के सहयोगी थे, की है। सामने लोहे के ग्रिल पर रसोइयों का वस्त्र भी दिखाई दिया। इस हिस्से में क्लब के कई पुराने सामानों के अलावे टूटे-फूटे सामानों का भण्डार भी दिखा। </p>
<p><strong>कोई पांच साल पहले, यानी 19 अगस्त, 2021 को दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली गोल्फ क्लब और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से एक याचिका पर उनका पक्ष पूछा था । इस याचिका में दावा किया गया था कि नागरिकों को क्लब परिसर में स्थित स्मारकों को देखने की अनुमति नहीं दी जा रही है। जस्टिस रेखा पल्ली ने केंद्र, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, दिल्ली सरकार के पुरातत्व विभाग और दिल्ली गोल्फ क्लब को नोटिस भी जारी किए थे, जवाब भी माँगा था। कोर्ट ने केंद्र और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से अपने जवाब में विशेष रूप से इस बात का ज़िक्र करने को कहा कि यहाँ के अन्य ऐसे ही स्मारकों में प्रवेश की अनुमति है या नहीं क्योंकि मामला सिर्फ़ दिल्ली गोल्फ क्लब से जुड़ा नहीं है। लेकिन आज जब दिल्ली गोल्फ क्लब के प्रवेश द्वार पर खड़े होकर अंदर स्थिर विरासतों को देखने पर प्रतिबन्ध देखा तो पांच साल पहले की घटना याद आ गयी। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="aligncenter size-full wp-image-7735" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-18-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p>बहरहाल, लाल बंगला के मामले में, इस बात पर कुछ बहस है कि यहाँ किसे दफनाया गया है। ज्यादातर ऐतिहासिक खोजें इस बात की पुष्टि करती हैं कि यह मकबरा बेगम जान—सम्राट शाह आलम द्वितीय की बेटी—और उनकी माँ नवाब ज़ीनत महल साहिबा (जिन्हें लाल कुँवर के नाम से भी जाना जाता था) का है; शायद इसी नाम के कारण इस स्मारक का नाम भी पड़ा हो। कुछ अन्य लोगों का मानना है कि यह मकबरा लाल कुंवर का हो सकता है, जो औरंगजेब के बेटे जहाँदार शाह की पत्नी थीं। मूल लाल बंगला परिसर में तीन गुंबददार मकबरे है। प्राचीन प्रवेश द्वार के पास वाला मकबरा लगभग 1626 ईस्वी में बनाया गया था और इसमें सैयद आबिद की कब्र है, जो शाहजहाँ के प्रमुख सैनिकों में से एक, खान दौरन खान के सहयोगी थे। यह मकबरा आम जनता के लिए सुलभ नहीं है क्योंकि यह दिल्ली गोल्फ क्लब के परिसर के अंदर स्थित है। शेष दो मकबरों में मुग़ल शैली की वास्तुकला को दर्शाता है। ये मकबरे पास में ही बने सफ़दरजंग के मकबरे से वास्तुकला के मामले में काफ़ी मिलते-जुलते हैं।</p>
<p>कहते हैं कि लाल कुँवर को कभी गाने वाली लड़की, कभी नाचने वाली लड़की, कभी &#8216;नौच गर्ल&#8217; या &#8216;कंचनी&#8217; कहकर पुकारा जाता था। उनका दरबार से पहले कोई लेना-देना नहीं था और न ही वे किसी शाही परिवार से थीं, लेकिन धीरे-धीरे वे जहाँदार शाह की सबसे पसंदीदा साथी बन गईं। कहा जाता है कि उनके पिता, ख़ुसूसियत ख़ान, अकबर के ज़माने के मशहूर संगीतकार मियाँ तानसेन के वंशज थे। लाल कुंवर का बादशाह पर बहुत ज़्यादा असर था। उन्होंने बादशाह को ऐशो-आराम और मौज-मस्ती में डूबे रहने के लिए उकसाया, जिसकी वजह से आख़िरकार बादशाह का बहुत ही शर्मनाक पतन हुआ। इसका एक बहुत ही बुरा उदाहरण यह है कि उन्होंने अपनी सहेली ज़ुहरा को, जो दिल्ली की सड़कों पर फल और सब्ज़ियाँ बेचती थी, बादशाह की सबसे खास सेविका बना दिया था।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7736" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-13-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>जहाँदार शाह का राज बहुत कम समय तक चला—29 मार्च 1712 से 11 फ़रवरी 1713 तक। उन्हें और लाल कुँवर, दोनों को ही जेल में डाल दिया गया था। इसके बाद जहाँदार शाह को पीट-पीटकर मार डाला गया और फिर उनका सिर काट दिया गया। जहाँदार शाह के शव को बाद में दिल्ली की सड़कों पर घुमाया गया—दो हाथियों से उल्टा लटकाकर—और फिर उन्हें हुमायूँ के मकबरे में दफना दिया गया। लाल कुंवर सज़ा से बच गईं, और 17 जून 1759 को अपनी मृत्यु तक उन्हें सुहागपुरा में निर्वासित रखा गया। यह भी कहा जाता है कि दोनों मकबरे ज़ीनत महल साहिबा (जिन्हें प्यार से लाल कुंवर भी कहा जाता था) और बेगम जान के थे; ये दोनों ही दिवंगत मुगल बादशाह शाह आलम II (1728-1806) की माँ और बेटी थीं। </strong></p>
<p>कैर स्टीफन ने अपनी किताब &#8220;The Archaeology and Monumental Remains of Delhi&#8221; (1876 में प्रकाशित) में लिखा है कि इस मकबरे में एक कब्र मौजूद थी, जिसे हाल ही में वहाँ से हटा दिया गया था। यह कब्र बेगम जान की थी—जो शाह आलम II की बेटी थीं। मज़े की बात यह है कि पहले मकबरे में मौजूद कब्रों में से एक कब्र को भी इन्हीं बेगम जान का बताया जाता है! हो सकता है कि पहले मकबरे में मौजूद दूसरी कब्र शाही परिवार के किसी और सदस्य की रही हो। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि मुझे पूरा यकीन है कि पिछले कई सालों में ऐसी बहुत सी कब्रें (या स्मारक) गायब हो चुकी होंगी।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7737" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>कुछ विद्वानों का यह भी दावा है कि इस मकबरे में &#8211; जो अब पूरी तरह खाली है &#8211; कभी और भी कब्रें मौजूद थीं। ये कब्रें मिर्ज़ा सुल्तान परवेज़, मिर्ज़ा दारा बख्त (जिनकी मृत्यु 1849 में हुई थी; ये बीसवें और आखिरी मुगल बादशाह, बहादुर शाह ज़फ़र के सबसे बड़े बेटे थे) और मिर्ज़ा दाऊद की थीं। यह बात थोड़ी अजीब लगती है कि मिर्ज़ा दारा बख्त की मृत्यु के महज़ 25 साल बाद प्रकाशित हुई कैर स्टीफन की किताब में इन लोगों का कोई ज़िक्र नहीं मिलता। इस तरह, यह भी एक और रहस्य बनकर ही रह जाता है। इस बात का भी ज़िक्र मिलता है कि तीन लापता मकबरे अकबर द्वितीय (मृत्यु 1837) के परिवार से जुड़े हैं। ज़ाहिर है, इस जगह में काफ़ी बदलाव आए हैं। लाल बंगला की कुछ मूल इमारतें अब हमेशा के लिए खत्म हो चुकी हैं, इसके घेरे के बचे हुए हिस्से को गोल्फ़ कोर्स में बदल दिया गया है, और पिछले कुछ सालों में छतरियों को भी हटा दिया गया है; ऐसे में आज यहाँ जो कुछ भी बचा है, वह उस मूल स्वरूप का बस एक छोटा सा हिस्सा भर है जो कभी यहाँ मौजूद था।</p>
<p><strong>बहरहाल, विगत दिनों भारत का सर्वोच्च न्यायालय के  न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति  एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने दिल्ली पुलिस को राजधानी में सभी सुरक्षित स्मारकों और हेरिटेज जगहों को अतिक्रमण और तोड़-फोड़ से बचाने का निर्देश दिया। साथ ही, इन इमारतों को बचाने की तुरंत जरूरत पर ज़ोर दिया। कंजर्वेशनिस्ट और इतिहासकार स्वप्ना लिडल की रिपोर्ट पर कार्रवाई करते हुए, जिसमें इन ज़रूरी चिंताओं को बताया था। कोर्ट ने कहा, “हम दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को निर्देश देते हैं कि वे उन सभी लोकल स्टेशन हाउस ऑफिसर को निर्देश दें जो या तो सुरक्षित हैं या हेरिटेज या ऐतिहासिक महत्व की जगहों की कैटेगरी में आते हैं, ताकि उन्हें अतिक्रमण या तोड़-फोड़ के खतरे से बचाया जा सके।” कोर्ट दिल्ली के रहने वाले राजीव सूरी की एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें डिफेंस कॉलोनी में शेख अली की गुमटी को बचाने की मांग की गई थी। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7738" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/L-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>न्यायालय ने लिडल की रिपोर्ट की जांच की, जिसमें महरौली में प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट्स के 100 मीटर के बैन एरिया में बन रहे स्ट्रक्चर दिखाने वाली तस्वीरें शामिल थीं। उन्होंने कई जगहों पर तोड़-फोड़ के मामलों का भी ज़िक्र किया। लिडल ने दिल्ली सरकार को अपने आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट द्वारा कंज़र्व किए जा रहे कई स्ट्रक्चर को &#8220;प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट्स&#8221; के तौर पर नोटिफ़ाई करने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया। सीनियर एडवोकेट शिखिल सूरी ने कहा, “दिल्ली में 48 मॉन्यूमेंट हैं जिन्हें दिल्ली सरकार को प्रोटेक्टेड के तौर पर नोटिफाई करना है, लेकिन 2015 से ऐसा नहीं किया गया है।” उनकी रिपोर्ट में 1397 के मॉन्यूमेंट ‘तरबूज का गुंबद’ का उदाहरण दिया गया, जो अभी साउथ दिल्ली के एक स्कूल में है। इसमें दिल्ली गोल्फ क्लब में मुगल-काल के तीन स्ट्रक्चर को भी मार्क किया गया है जो बहुत खराब हालत में हैं।</p>
<p>पीठ ने कहा: “हमें लगता है कि गोल्फ क्लब के अंदर के स्ट्रक्चर पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किए गए हैं। इंटेक ने दिल्ली गोल्फ क्लब द्वारा स्ट्रक्चर का पूरी तरह से मेंटेनेंस करने की ज़िम्मेदारी को पूरा करने के लिए सुपरविज़न और विजिलेंस न रखकर आंखें मूंद ली हैं। हमें नई दिल्ली म्यूनिपाल कौंसिल का ऐसा बर्ताव लापरवाही का एक बड़ा मामला लगता है।” नई दिल्ली म्यूनिपाल कौंसिल के वकील ने बताया कि ज़मीन क्लब को लीज़ पर दी गई थी। बेंच ने कहा, “एक बार जब आप इसे दे देते हैं, तो आप इस पर सोते रहते हैं और इसकी परवाह नहीं करते। ऐसा लगता है कि राज्य इन स्ट्रक्चर की हेरिटेज वैल्यू को नहीं समझता है। वे पूरी तरह से खराब हो चुके हैं और उन पर पेड़-पौधे उग रहे हैं।”इंटेक की 2021 की रिपोर्ट में दिल्ली में 1,100 से ज़्यादा नोटिफ़ाइड हेरिटेज साइट्स और स्ट्रक्चर्स का डॉक्यूमेंटेशन है, जो मुगल-पूर्व से लेकर कॉलोनियल समय के आखिर तक के समय को कवर करते हैं।</p>
<p>इतना ही नहीं, विगत दिनों अपने आदेश के जानबूझकर किए गए उल्लंघन पर सख्त रुख अपनाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक को अवमानना का नोटिस जारी किया है। यह नोटिस राष्ट्रीय राजधानी में 173 अधिसूचित विरासत स्थलों के संरक्षण की स्थिति पर जवाब दाखिल करने में विफल रहने के कारण जारी किया गया है।</p>
<p><strong>तस्वीरें: संजय शर्मा </strong></p>
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		<title>​फरीद खान को शेरखान की उपाधि किसने नवाजा था : मूल्य: 50 लाख रुपये यानी पटना का लोहानीपुर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 24 Apr 2025 11:50:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मुखियाजी उवाच]]></category>
		<category><![CDATA[boring road]]></category>
		<category><![CDATA[gandhi maidan]]></category>
		<category><![CDATA[history]]></category>
		<category><![CDATA[lohanipur]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना : पटना की लगभग सभी मुहल्लों, सडकों की अपनी-अपनी कहानियां हैं। विगत दिनों “कौन बनेगा करोड़पति के मंच पर जब 50,00,000 रुपये का एक ऐतिहासिक प्रश्न पूछा गया की “फरीद खान जो बाद में शेर शाह सूरी के नाम से प्रसिद्द हुए, उन्हें शेर खान की उपाधि से किसने नबाजा था?” अकस्मात् पटना का लोहानीपुर मोहल्ला याद आ गया। “कौन बनेगा करोड़पति” का यह प्रश्न बहुत कठिन था। यह अमिताभ बच्चन साहेब भी मान रहे थे। सामने हॉट सीट पर बैठीं महाराष्ट्र की मोहतरमा के लिए तो कठिन था ही। आम तौर पर महाराष्ट्र के लोग शिवाजी महाराज से आगे निकलते ही नहीं। आप मानेंगे नहीं, लेकिन जब भी मौका मिले, आजमा लीजियेगा। मोहतरमा मंच के चारो तरफ लगे कैमरे को देख रहीं थी। स्वाभाविक भी है। प्रश्न भी पांच रुपये का था नहीं। प्रश्न को फ्लिप करने का विकल्प लिया गया। लेकिन “नियमानुसार” अमिताभ बच्चन साहब कहते हैं “आपका ऑप्शन लॉक हो गया है। लेकिन हमें जाने से पहले इस प्रश्न का उत्तर दर्शकों को बताना होगा। आप किसी एक विकल्प को चुनें।” मोहतरमा विकल्प चुनतीं हैं और उनका उत्तर गलत होता है। सही उत्तर होता है: मुहम्मद शाह नूहानी ।</strong></p>
<p>पटना के लोग शायद नहीं जानते होंगे की आज का “लोहानीपुर” मोहल्ला कल का “नुहानीपुर” ही था। जिसका नामकरण मुहम्मद शाह नूहानी के नाम पर था। मुहम्मद शाह नूहानी बिहार के तत्कालीन सुलतान थे और यहीं शेरशाह कार्य भी करते थे। इसी लोहानीपुर या नुहानीपुर मोहल्ले में बिहार के दीवान नवाब मीर कासिम का जन्म हुआ था। शेरशाह का बचपन का नाम फरीद खां था। फरीद खां के पिता हसन खां जौनपुर के एक छोटे जमींदार थे। वैसे शेर शाह का जन्म 1472 में होशियारपुर जिले के बजबाड़ा नामक स्थान हुआ था और राज्याभिषेक दिल्ली में हुआ था। कहा जाता है कि एक बार शिकार पर गए नुहानी के साथ शेरशाह ने तलवार के एक ही वार से एक शेर को मार दिया । उसकी इस बहादुरी से प्रसन्न होकर शाह नूहानी ने उसे ‘शेर खाँ’ की उपाधि प्रदान की। राज्याभिषेक के बाद वे “शेरशाह” की उपाधि को धारित किये। सन 1539 में शेरशाह और हुमायूं के बीच ऐतिहासिक युद्ध हुआ जो “चौसा-युद्ध” के नाम से जाना जाता है। </p>
<p>इन्होने रोहतासगढ़ किले का निर्माण करवाया। सोने, चांदी और ताम्बे के सिक्के चलवाये। कलकत्ता से पेशावर तक सड़क निर्माण कराया जिसे आज ग्रेंड ट्रंक रोड के नाम से जाना जाता है। इन्होने ने ही डाक-प्रथा चलवाई । सन 1541 में मगध की राजधानी “पाटलिपुत्र”, शेरशाह का “पटना” बना। दिल्ली का पुराना किला शेरशाह का ही उपहार है जिसे वे हुमायूँ द्वारा निर्मित दीन पनाह ईमारत को तोड़कर बंबई थे। इनकी मृत्यु 1545 में हुई और आज भी सासाराम में स्थित शेरशाह का मकबरा विश्व का ऐतिहासिक घरोहर है।</p>
<p><strong>वैसे पटना का इतिहास और परंपरा सभ्यता की शुरुआत से ही आरम्भ होती है। पटना का पुराना नाम पाटलिपुत्र या पाटलीपट्टन था जो 600 ईसा पूर्व इतिहास में पाया गया। पटना का नाम समय के साथ परिवर्तित होकर पाटलिग्राम, कुसुमपुर, अजीमाबाद और आधुनिक दौर में पटना नाम से जाना जाता है। चंद्रगुप्त मौर्य ने 4वी. ईसा में यहाँ अपनी राजधानी बनाई। इसके बाद इस नगर का महत्त्व कम होता गया और 16वी ईसा में इसे फिर पहचान मिली जब शेरशाह सूरी का शासन आया। एक अन्य मान्यता के अनुसार पट्टन नाम के एक ग्राम से आज का पटना का जन्म हुआ।</strong> </p>
<p>कहा जाता है कि आजादशत्रु ने पाटलिपुत्र बनाई। प्राचीन ग्राम पाटली के साथ पट्टन जुड़ कर पाटलिपुत्र बना। ग्रीक इतिहास में पाटलीबोथरा शब्द आता है जो शायद पाटलिपुत्र ही था। आजादशत्रु ने इस नगर के लिय कई सुरक्षा इन्तेजाम कराया ताकि लिक्छवियों के लगातार आक्रमण से इसे बचाया जा सके। उसने पाया की यह नगर तीन दिशाओ से नदियों से घिरा था जो इसे नदियों के किला की सुरक्षा प्रदान करती थी। आजादशत्रु का पुत्र अपनी राजधानी राजगृह से पटना ले आया और यह स्थिति मौर्य और गुप्त काल में भी यथावत रही। सम्राट अशोक ने यहीं से अपना शासन किया। </p>
<p>चंद्रगुप्त मौर्य और समुद्रगुप्त जैसे पराक्रमी शासको की यह राजधानी रही। यहीं से चन्द्रगुप्त ने अपने सेना पश्चिमी सीमा पर ग्रीको से लोहा लेने भेजा था और चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने शक और हूणों को वापस धकेला था। चन्द्रगुप्त काल में यही पर ग्रीक दूत मेगास्थनीज आ कर रहा था। प्रसिद्ध यात्री फाहियान 3वी. ईसा में और व्हेनसान 7वी. ईसा यहाँ की यात्रा कि और उस काल कि रहन सहन और शासन पद्धति पर विस्तार से लिखा। कौटिल्य जैसे विद्वान यहाँ रहे और अर्थशास्त्र जैसी रचना लिखी। यह नगर प्राचीन काल से ही ज्ञान और विद्वत्ता के स्रोत्र के रूप में प्रसिद्धी पाई। औरंगजेब का पोता शहजादा अजिमुशान को 1703 ई. में पटना का गवर्नर बनाया गया। इसके पहले शेरशाह ने अपनी राजधानी बिहारशरीफ से पटना बनाया। शहजादा अजिमुशान ने पटना को आधुनिक और सुन्दर शहर का रूप देने का प्रयास किया और इसका नाम अजीमाबाद रखा।</p>
<figure id="attachment_6365" aria-describedby="caption-attachment-6365" style="width: 1957px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Patna-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Patna-2.jpg" alt="" width="1957" height="1214" class="size-full wp-image-6365" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Patna-2.jpg 1957w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Patna-2-300x186.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Patna-2-1024x635.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Patna-2-768x476.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Patna-2-1536x953.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Patna-2-356x220.jpg 356w" sizes="auto, (max-width: 1957px) 100vw, 1957px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6365" class="wp-caption-text">बोरिंग रोड चौराहा, पटना</figcaption></figure>
<p><strong>पटना का ऐतिहासिक बोरिंग रोड का नाम इस इलाके में हुए “पहली बोरिंग” के कारण पड़ा। आप शायद जानते भी होंगे कि जब हम बिहार और उड़ीसा के प्रथम लेफ्टिनेंट गवर्नर सर स्टुअर्ट कॉल्विन बेले के नाम पर बनी सड़क (बेली रोड) (अब नेहरू पथ) से पटना उच्चन्यायालय के सामने पटना वीमेंस कॉलेज के दीवार के साथ दाहिने बोरिंग रोड नमक सड़क पर चलते हैं, तो सड़क पर ही अनुग्रह नारायण सिंह के नाम वाले कालेज के पास पहली बोरिंग हुई थी। यही कारण है कि इस सड़क का नाम बोरिंग रोड हो गया। इतना ही नहीं, बोरिंग रोड चौराहे से जो रास्ता राजापुर होते मुख्य सड़क से मिलती है और जिसके नीचे बहुत चौड़ा पाईप बिछा है शहर के पानी को गंगा में फेंकने के लिए; बोरिंग केनाल रोड के नाम से विख्यात हुआ।</strong> </p>
<p>बेली रोड का निर्माण और नामकरण सन 1912 के आस-पास ही है जब बंगाल प्रोविंस अलग हुआ था और पटना बिहार और ओड़िसा की राजधानी बानी। उस समय बिहार और उड़ीसा के प्रथम लेफ्टिनेंट गवर्नर सर स्टुअर्ट कॉल्विन बेले थे। “बेले” ही बिहारी-स्टाईल में अप्भ्रन्सित होकर “बेली” हो गए और सड़क बेली रोड। बेली रोड की शुरुआत डाकबंगला चौराहे से प्रारम्भ होता है। इस चौराहे को बीच से एक सड़क फाड़ती है जिसका एक छोड़ पटना रेलवे स्टेशन जाता है और दूसरा ऐतिहासिक गांधी मैदान। इस सड़क को फ्रेजर रोड के नाम से जाना जाता है, जिसका नामकरण बंगाल के लेफ्टिनेंट गर्वनर सर ए एच एल फ्रेजर के नाम पर वर्ष 1906 में हुआ। </p>
<p>गाँधी मैदान से पटना गुलजारबाग के रास्ते गुरु गोविन्द सिंह के जन्म स्थान पटना सिटी (अब पटना साहेब) की ओर जाने वाली ऐतिहासिक सड़क “अशोक राज पथ” सम्राट अशोक के नाम से दर्ज है। गुलजारबाग अपने क्षेत्र के बगीचों के कारण प्रसिद्धि पाया और नाम भी। पटना सिटी के दक्षिण -पूर्व स्थित बड़ी और छोटी पहाड़ी का नामाकरण अशोक मौर्य ने करवाया था। बौद्ध स्तूपों के कारण इनका नाम बड़ी एवं छोटी पहाड़ी पड़ा। इसी तरह पटना सिटी स्थित त्रिपोलिया जहां तीन पोल या तीन प्रकार के फाटक हुआ करते थे। मुगलकाल में एक ऐसा बाजार था जिसमें आने-जाने के लिए तीन बड़े द्वार या रास्ते थे। वही त्रिपोलिया अस्पताल के पास मुगलकाल में चिडिय़ा मारने वाले लोग रहा करते थे। जिस कारण मोहल्ले का नाम मीर शिकार टोह पड़ा। </p>
<p><strong>यहीं पटना सिटी में ही जहाँ चुंगीकर कार्यालय है “मालसलामी” के नाम से विख्यात हुआ। इसका वजह यह था कि यहाँ “सलामी” या टैक्स के रूप में व्यापारियों की अपने माल के बदले एक निश्चित रकम देना पड़ता था। मालसलामी मुहल्ला के दक्षिण नगला या नगरा मोहल्ला नगरम से बना है। अजातशत्रु ने सर्वप्रथम यहां चारदीवारी वाला नगर बसाया था। पटना साइंस कॉलेज के इलाका जो बादशाही गंज के नाम से मशहूर हुआ। इस क्षेत्र में औरंगजेब का पोता फर्रुखसियर आया था जिसे खुश करने के लिए मोहल्ले का नाम बादशाही गंज रखा गया। बाद में इसी मोहल्ले में ठठेरों की बस्ती विकसित हुई जिसे ठठेरी बाजार कहा जाने लगा। अब आइये “दरियापुर” मोहल्ला। कहा जाता है कि अफगानों के शासनकाल में बिहार का तत्कालीन गर्वनर दरियाखां नूहानी के नाम पर मोहल्ले का नाम दरियापुर पड़ा।</strong> </p>
<figure id="attachment_6366" aria-describedby="caption-attachment-6366" style="width: 1957px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Patna-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Patna-1.jpg" alt="" width="1957" height="1214" class="size-full wp-image-6366" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Patna-1.jpg 1957w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Patna-1-300x186.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Patna-1-1024x635.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Patna-1-768x476.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Patna-1-1536x953.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/04/Patna-1-356x220.jpg 356w" sizes="auto, (max-width: 1957px) 100vw, 1957px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6366" class="wp-caption-text">ऐतिहासिक गोलघर</figcaption></figure>
<p>गांधी मैदान के पश्चिम दक्षिण स्थित छज्जूबाग मोहल्ले का नाम छज्जू माली के नाम पर पड़ा। जो विशाल बाग-बगीचे का देखभाल किया करते थे। इस बगीचे के प्रमुख आम अलीवर्दी और सिराजुद्दौला को भेजा जाता था। इस मोहल्ले में छज्जू शाह का मकबरा आज भी है। पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल के पास एक मोड़ पर कुआं हुआ करता था जहां पर एक व्यक्ति प्रतिदिन आकर मक्खन बेचा करता था। आने वाले दिनों इस जगह का नाम मखानियां कुआं हो गया। पटना कॉलेज और खुदाबख्श लाइब्रेरी के बीच उत्तर की ओर जाने वाली सड़क खजांची रोड से जानी जाती है। 19 वीं सदी के अंत और 20 वीं सदी के प्रथम चरण में सरकार को ब्याज पर कर देने वाले धनी व्यक्ति रहा करते थे जिन्हें खजांची बाबू भी कहा जाता था। इन्हीं लोगों के कारण इस मोहल्ले का नाम खजांची रोड पड़ा। यह खजांची रोड ही है जहाँ पश्चिम बंगाल के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ विधान चंद्र रॉय का जन्म हुआ था, जहाँ अपनी माता के नाम पर एक विद्यालय खुला था – अधोर शिशु विद्या मंदिर । </p>
<p><strong>पटना कॉलेज के दक्षिण निचली सड़क पर स्थित भिखना पहाड़ी बौद्ध भिक्षुओं का गढ़ हुआ करता था। मौर्य काल में यहां बौद्ध मठ थे जिसमें बौद्ध भिक्षु रहा करते थे। इसके अलावा भिखना कुआं देवी एवं भिखना कुंवर नामक एक संत रहा करते थे। जिसके बाद इस मोहल्ले का नाम भिखना पहाड़ी रखा गया। इसी तरह, बौद्ध भिक्षु हरे-भरे बाग में टहला करते थे जिसे रमन के नाम से भी जानते थे। इस क्षेत्र को अंग्रेजों ने मनीसरूल्ला नामक नवाब को दिया जो शाह आलम द्वितीय से दीवानी अधिकार प्राप्त किया। आर्य कुमार रोड से सटे मछुआरों की बस्ती वाला मोहल्ला मछुआ टोली के नाम से विख्यात हुआ। इस मोहल्ले के लोग गंगा नदी और दरियापुर गोला से बरसात के मौसम में मछली पकड़ लाकर बेचा करते थे। मछुआ टोली के सटे मोहल्ले जहां बरसात के दिनों में पानी लग जाता था। जिसके कारण लंगर वाले नाव चला करता था। जिसके कारण इस मोहल्ले का नाम लंगर टोली पड़ा।</strong> </p>
<p><strong>इसी तरह, जहांगीर कालीन बिहार के गवर्नर मिर्जा रुस्तम सफवी के पुत्र मिर्जा मुराद 17वीं सदी में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हुआ करते थे। उन्हीं के नाम पर मोहल्ले का नाम मुरादपुर पड़ा। पीरबहोर मोहल्ला का नाम संत दाता पीरबहोर के नाम पर पड़ा। जिनका मजार आज भी दाता मार्केट से सटे है। संत दाता पीरबहोर शाह अरजान के समकालीन थे। पटना के दक्षिण एरिया में स्थित शहर का विशाल मोहल्ला कंकड़बाग बना है। कंकड़बाग का इलाका बादशाह अकबर द्वारा ईरान के शाह तहमरूप के पुत्र को जागीर के रूप में प्रदान किया गया था। लाल बालू, मिट्टी, कंकड़ और झाडिय़ों के कारण यह इलाका कंकड़बाग से मशहूर हुआ।</strong></p>
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		<title>​चाहिए तो यह कि मिथिला के लोग अपने-अपने गांव, प्रखंड, जिला के बारे में इतिहास को मजबूत करें, यहाँ तो प्रस्तावित राज्य के मंत्रिमंडल का गठन कर रहे हैं, लेकिन श्री बिनयानन्द झा की बात कुछ और है </title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Dec 2024 13:03:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[किताब]]></category>
		<category><![CDATA[book]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[history]]></category>
		<category><![CDATA[madhubani]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>​मधुबनी / नई दिल्ली : आप माने अथवा नहीं। आजकल दरभंगा के टावर चौक से दिल्ली के जंतर मंतर तक, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यालय से लेकर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के कार्यालय तक बिहार को काट-छांट कर अलग मिथिला ​राज्य बनाने की चर्चाएं आम हैं। मिथिला क्षेत्र [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/book/people-of-mithila-should-strengthen-the-history-of-their-respective-villages-blocks-and-districts">​चाहिए तो यह कि मिथिला के लोग अपने-अपने गांव, प्रखंड, जिला के बारे में इतिहास को मजबूत करें, यहाँ तो प्रस्तावित राज्य के मंत्रिमंडल का गठन कर रहे हैं, लेकिन श्री बिनयानन्द झा की बात कुछ और है </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>​<strong>मधुबनी / नई दिल्ली : आप माने अथवा नहीं। आजकल दरभंगा के टावर चौक से दिल्ली के जंतर मंतर तक, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यालय से लेकर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के कार्यालय तक बिहार को काट-छांट कर अलग मिथिला ​राज्य बनाने की चर्चाएं आम हैं। मिथिला क्षेत्र के राजनीति में सक्रिय रहने वाले लोग न केवल प्रस्तावित अलग राज्य के निर्माण में किन-किन जिलों को बिहार से अलग कर मिथिला राज्य में​ अंकित कर देना चाहिए की सूची बनाकर मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को पेश कर रहे हैं, बल्कि राज्य बनने के बाद कौन-​कौन महापुरुष और महिला नए राज्य के मंत्रिमंडल में शामिल होंगे, ​कौन मुख्यमंत्री बनेंगे, कौन वित्त मंत्रीं बनेंगे, कौन शिक्षा मंत्री बनेंगे की ​मन-ही-मन सूची बनाने में भी कोताही नहीं कर रहे हैं। ​यह अलग बात है कि उत्तर बिहार इस गंगा तराई क्षेत्र के इन जिलों में राज्य के 11 नदियों की पानी के अलावे कुछ नहीं है और शैक्षिक दर का फीसदी भी महिला-पुरुष मिलकर 60 फीसदी से अधिक नहीं पहुंच पाया है। </strong></p>
<p>मिथिला के महात्मनों का कहना है कि अब तक 24 जिलों को प्रस्तावित राज्य में शामिल करने का प्रस्ताव है। इन जिलों में अररिया, बेगूसराय, दरभंगा, कटिहार, खगड़िया, किशनगंज, मधेपुरा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, सहरसा, समस्तीपुर, शिवहर, सीतामढ़ी, सुपौल, पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, वैशाली, लखीसराय, मुंगेर, शेखपुरा, जमुई, भागलपुर और बांका शामिल हैं। ​जबकि &#8216;प्रस्तावित मंत्रिमंडल की सूची&#8217; को &#8216;सार्वजनिक&#8217; नहीं कर रहे हैं। यह अलग बात है कि दिल्ली सल्तनत में &#8216;मैथिली&#8217; भाषा के &#8216;तथाकथित विकास और विस्तार के लिए&#8217; राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति हेतु बना &#8220;मैथिली &#8211; भोजपुरी अकादमी&#8221; दिल्ली सरकार के &#8220;दारू का बोतल गिनने वाले भवन में स्थित है। हालात यह है कि यहाँ मैथिली अथवा भोजपुरी के अलावे सभी भाषाओं में वार्तालाप होती है और दिल्ली में रहने वाले मैथिली भाषा भाषी मुद्दत से मूक-बधिर बने हैं। यह राजनीति हैं।  </p>
<p>बिहार सं 22 मार्च, 1912 को बंगाल से काटकर अपने अस्तित्व में आया था। लगभग 24 वर्ष बाद, 1 अप्रैल, 1936 को बिहार का पहला खंडन हुआ और उस खंडन से ओड़िसा राज्य का अस्तित्व बना। ओड़िसा राज्य बनने के कोई 64 वर्ष बाद बिहार का फिर दो फांक हुआ झारखण्ड राज्य ​बनाने के लिए। सन 2000 से पहले, तत्कालीन दक्षिण बिहार के स्थानीय लोगों की दशकों से चल रही क्रांति, जिसमें कई सौ लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दिए, 15 नवम्बर, 2000 को झारखण्ड राज्य अपने अस्तित्व में आया। अब उत्तर बिहार के गंगा तराई क्षेत्र में स्थित जिलों को काटकर मिथिला राज्य बनाने की राजनीति चल रही है। ​खैर। </p>
<p>इन सभी बातों की चर्चा यहाँ इसलिए कर रहा हूँ कि जिस 24 जिलों को प्रस्तावित मिथिला राज्य में शामिल करने की बात की जा रही है, उन जिलों में रहने वाले औसतन 95+ फीसदी लोग (अपवाद छोड़कर) अपने गाँव, प्रखंड और जिला के इतिहास, भूगोल से आज भी अपरिचित हैं। औसतन लोगों से यदि यह पूछा जाय कि उनके जिले के चारो तरफ किन-किन जिलों का सीमा लगा है, शायद नहीं बता पाएंगे। उनसे उनके जिलों के ऐतिहासिक तथ्यों, पुरातत्वों के बारे में पूछा जाय, उनके जिला का नाम कैसे बना, कहाँ से आया, पूछा जाय, शायद नहीं बता पाएंगे। इतना ही नहीं, वर्तमान काल में पंचायत से लेकर संसद तक उनके गांव-जिलों का प्रतिनिधित्व करने वाले जनप्रतिनिधि के बारे में जानकारी (अगर राजनीति में नहीं हैं) शायद भूल होगी। वैसे आज कुछ युवापीढ़ी इस दिशा में सक्रीय हैं ताकि सरकारी स्तर के अलावे अपने-अपने गाँव, प्रखंड, पंचायत, जिला के बारे में एक वृहत डाटाबेस बनाया जा सके। </p>
<p><strong>लेकिन, मिथिला के मधुबनी में रहने वाले श्री विनयानन्द झा की बात कुछ अलग है। पटना विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में और मगध विश्वविद्यालय से प्राचीन भारतीय इतिहास और एशियाई अध्ययन विषय में स्नातकोत्तर की उपाधि रखने वाले श्री झा मंगरौनी गाँव के रहने वाले हैं। जीवन में वृति कुछ भी नहीं रहा लेकिन कृषि को अपने आजीविका का साधन बनाये रखे। जिस तरह खेतों में फसलों की हरियाली कभी कम नहीं होने दिए, श्री झा जीवन पर्यन्त अपने पाठ्य विषय इतिहास को भी स्वयं से दूर नहीं होने दिए। जीवन पर्यन्त सामाजिक एवं सांस्कृतिक ​क्षेत्रों में लिखते रहे। &#8220;मधुबनी : वर्तमान और अतीत​&#8217; पुस्तक उसी ज्ञान और सोचा का परिणाम है जिसके माध्यम से बिहार के मधुबनी जिला की राजनीतिक- सांस्कृतिक इतिहास का वर्णन 18 अध्यायों में ​उन्होंने किया है। यह किताब आज की पीढ़ियों के लिए ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए भी, जो मधुबनी को समझना चाहेंगे, महत्वपूर्ण हो सकता है। </strong></p>
<figure id="attachment_5936" aria-describedby="caption-attachment-5936" style="width: 1920px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-2.jpg" alt="" width="1920" height="1353" class="size-full wp-image-5936" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-2.jpg 1920w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-2-300x211.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-2-1024x722.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-2-768x541.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-2-1536x1082.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-2-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 1920px) 100vw, 1920px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5936" class="wp-caption-text">श्री विनयानन्द झा, लेखक</figcaption></figure>
<p>श्री झा कहते हैं कि भारत के सांस्कृतिक इतिहास में मिथिला का योगदान सतत श्लाघनीय एवं महत्त्वपूर्ण रहा है। मिथिला की भौगोलिक सीमाएँ समय-समय पर घटती-बढ़ती रहीं और सत्ता का केन्द्र भी भिन्न काल में भिन्न स्थान पर रहा। किन्तु आदि काल से मिथिला-संस्कृति का केन्द्र वह क्षेत्र रहा जो वर्तमान में प्रशासनिक दृष्टि से मधुबनी जिला अभिहित है। इस मधुबनी जिला को थोड़ा और पश्चिम में वर्तमान सीतामढ़ी शहर तक, पूर्व में वर्तमान सुपौल-सहरसा तक एवं दक्षिण में दरभंगा जिला के तरौनी से प्रारंभ कर मनीगाछी प्रखण्ड के उजान गाँव तक विस्तारित करें तो हम पाएँगे कि इस भूखंड में मिथिला की सारस्वत अवदानों का नब्बे प्रतिशत समाहत हो जाएगा। </p>
<p>​किताब में कहा गया है कि प्राचीन विदेह राज की राजधानी भी इसी क्षेत्र के अन्तर्गत थी न कि वर्तमान में मान्य जनकपुर ऐसा मत कुछ गवेषकों ने व्यक्त किया है। मध्य एवं आधुनिक काल में सुगीना के ओइनवारों एवं भौर के खण्डवलाओं ने मिथिला में सुदृढ़ राज्य स्थापित किए। बौद्धिक गतिविधियों की दृष्टि से इन दोनों राजवंशों का शासन काल स्वर्ण युग कहा जा सकता है। कर्णाट काल में भी इस क्षेत्र के वीरेश्वर, गणेश्वर और चण्डेश्वर आदि महत्वपूर्ण मंत्री एवं अन्य पदों पर रहे। </p>
<p>​झा का कहना है कि मिथिला भूमि मोक्षदायिनी क्षेत्र कहलाती है क्योंकि यहाँ के विदेह राजा सीरध्वज ने पृथ्वी के गर्भ से जगज्जननी जानकी का प्रादुर्भाव करवाया। कालांतर में कपिल, कणाद, जैमिनी, गौतम, याज्ञवल्क्य, वाचस्पति, उदयन, गंगेश, अयाची, शंकर, पक्षधर, मदन, गोकुलनाथ एवं लक्ष्मीनाथ गोसाई आदि असंख्य महर्षियों-मनीषियों ने अपने ज्ञान और आध्यात्मिक चिन्तन एवं शिक्षण से समस्त मनवता को आलोकित किया। वास्तव में पाणिनि के अनुसार, &#8220;मध्यन्ते रिपवः अत्र इति मिथिला&#8221; अर्थात जहां वासना और अन्य बुराइयों रूपी शत्रुओं का नाश हो जाता है, वह मिथिला है। उसी मिथिला की आत्मा के रूप में सदा से, मधुबनी परिसर जाना जाता है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-3.jpg" alt="" width="1353" height="1920" class="aligncenter size-full wp-image-5937" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-3.jpg 1353w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-3-211x300.jpg 211w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-3-722x1024.jpg 722w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-3-768x1090.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-3-1082x1536.jpg 1082w" sizes="auto, (max-width: 1353px) 100vw, 1353px" /></a></p>
<p><strong>बृहदारण्यकोपनिषद् की मैत्रेयी ब्राह्मण में याज्ञवल्क्य ने अद्वैत ब्रह्म का वर्णन &#8216;मधुविद्या&#8217; के रूप में किया है। मधुविद्या का उद्गम स्थल होने के कारण इस क्षेत्र का नाम मधुबनी पड़ा हो संभाव्य है। यह संभावना ऐसे में और प्रबल हो जाती है जब हम मधुबनी के संनिकट मंगलवनी (मंगरौनी) पाते हैं जिसका इतिहास अति प्राचीन और प्रशस्त है बृहद्विष्णुपुराण में उसे मंगलदात्री (मंगला मंगलवनीं विरजा पापहारिणीम्) ग्राम के रूप में उल्लिखित किया गया है। &#8216;मंगल&#8217; का अर्थ होता है शास्त्र सम्मत आचार का पालन और मंगलवनी (मंगरौनी) गाँव विविध शास्त्रों में न मात्र उच्च कोटि के विद्वानों से सर्वदा विभूषित रहा अपितु मिथिला संस्कृति के प्रतीक के रूप में भी विख्यात रहा है। </strong></p>
<p>मधुबनी परिसर में जहाँ वैदिक पौराणिक काल में अनेक आर्षगण हुए वहीं ऐतिहासिक काल में भी कई ऐसे मनीषीगण हुए जिन्होंने समस्त विश्व में अपने प्रतिमान स्थापित किए। साहित्य की बात की जाय तो कालिदास (उच्चैठ) श्रृंगार रस के जिस शिखर पर प्रतिष्ठित हैं वहाँ कोई दूसरा पहुँचने की कल्पना भी नहीं कर सकता है। शृंगार और भक्ति रसों पर समान अधिकार रखनेवाले उत्तर भारत की क्षेत्रीय भाषाओं के आदि कवि विद्यापति (विस्फी) मधुर गीतों के लिए सदैव विश्व में समादृत रहे हैं। विद्यापति के परवर्तियों में मैथिली साहित्य को जहाँ मनबोध (मंगरीनी) ने एक नवीन दिशा दी वहीं विनोदानन्द झा &#8216;बीनू&#8217; (मंगरीनी) ने इस साहित्य में नवीन रीति की रचनाओं और अतुकान्त कविताओं का श्रीगणेश किया। साहित्य अकादमी में जब मैथिली भाषा की रचनाओं को पुरस्कृत किया जाना प्रारंभ हुआ तब प्रथम पुरस्कार पानेवाले लेखक इसी क्षेत्र के यशोधर झा (सतलखा) थे। साथ ही अब तक की पुरस्कृत कृतियों में आधा के करीब लेखक इसी क्षेत्र के साहित्यकार हैं। </p>
<p>योगासन को सामान्यजनों में लोकप्रिय कर उसके महत्त्व को विश्वस्तर पर प्रतिष्ठित करने में भी इस क्षेत्र के धीरेन्द्र ब्रह्मचारी (चानपुरा) का विशेष योगदान रहा। आध्यात्मिक क्षेत्र में आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों का देश में एक विशिष्ट स्थान है और वे चार धाम के रूप में प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में उन चारों पीठों में एक पुरी के गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी भी मधुबनी (हरिपुर) के हैं।​ मिथिला की लोक कलाएँ आज विश्व में न सिर्फ विख्यात हैं बल्कि ग्रामीण जनों विशेषकर महिलाओं के आर्थिक उत्थान में योगदान कर उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा अभिवृद्धि में भी महत्त्वपूर्ण रहा है। लोक कला की विविध विधाओं में भी मधुबनी क्षेत्र का वर्चस्व रहा है। इन कलाओं ने विशेषतः चित्रकला जो &#8216;मधुबनी पेंटिग्स&#8217; के रूप में विश्व विख्यात है, कई ग्रामीण महिलाओं को राष्ट्रीय पुरस्कारों से विभूषित किया हैं एवं राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/PHOTO-2024-12-09-17-33-13.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/PHOTO-2024-12-09-17-33-13.jpg" alt="" width="842" height="1234" class="aligncenter size-full wp-image-5938" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/PHOTO-2024-12-09-17-33-13.jpg 842w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/PHOTO-2024-12-09-17-33-13-205x300.jpg 205w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/PHOTO-2024-12-09-17-33-13-699x1024.jpg 699w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/PHOTO-2024-12-09-17-33-13-768x1126.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 842px) 100vw, 842px" /></a></p>
<p>अंग्रेजो के खिलाफ जब 1857 में स्वतंत्रता संग्राम देश के कतिपय क्षेत्रों में प्रारंभ हुआ तव पूर्वांचल में उसका नेतृत्व बिहार के वीर कुंवर सिंह ने किया। जगदीशपुर के बाबू कुँवर सिंह के गुरु इसी क्षेत्र (मंगरीनी) के भिखिया झा थे जिनकी प्रेरणा एवं आशीर्वचनों से आप्लावित कुँवर सिंह एवं उनके असंख्य वीर अनुयायियों ने मातृभूमि की मुक्ति हेतु हँसते-हँसते अपने-अपने प्राणों की आहुति दे दी। बीसवीं शताब्दी में जब गाँधीजी के नेतृत्व में स्वातंत्र्य आंदोलन ने जोर पकड़ा तब इस क्षेत्र के युवाओं ने बढ़ कर महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। कालान्तर में उनमें से कई राजकीय एवं राष्ट्रीय राजनीति में देदीप्यमान हुए। विभिन्न राजनीतिक दलों में राज्य और राष्ट्र स्तर पर इस क्षेत्र ने अनेक नेताओं को जन्म दिया है। बिहार के कई मुख्य मंत्री जो इस क्षेत्र के नहीं थे अपने मुख्य मंत्रीत्व काल में इसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। इसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर राजनीतिक सरोवर में विहार करने वाले वरिष्ठ पत्रकार डॉ. गौरीशंकर राजहंस राजदूत के पद को सुशोभित कर चुके हैं तो वहीं इस क्षेत्र के आदित्यनाथ झा और धनिक लाल मंडल राज्यपाल के पदों पर विराजमान हो चुके हैं। </p>
<p>गाँधीजी ने जब विदेशी वस्त्रों का वहिष्कार कर &#8220;स्वदेशी का नारा दिया तब इस क्षेत्र की महिलाओं ने चरखा चला कर मधुबनी के खादी वस्त्रों को देश में शिखर पर प्रतिष्ठित कर इस क्षेत्र को गौरवान्वित किया।​ किताब में आगे कहा गया है कि मधुबनी क्षेत्र का जो पुरातात्विक महत्त्व है उसका सही आकलन नहीं किया जा सका है। बलिराजगढ़ के उत्खनन एवं अन्य प्राचीन गाँवों के प्राचीन मंदिरों-मूर्तियों के शोधात्मक अध्ययन से इस दिशा में भारतीय इतिहास की कई अनसुलझी कड़ियों का समाधान हो सकता है। </p>
<p><strong>आध्यात्मिक दृष्टि से यह क्षेत्र प्राचीन काल से पुनीत माना जाता रहा है जिस कारण हम इस क्षेत्र में मंदिरों की बहुलता पाते हैं। ऐसे महत्व के कई प्रमुख स्थानों में कपिलेश्वर, विदेश्वर, मदनेश्वर, कल्याणेश्वर, चण्डेश्वर, उच्चैठ, डोकहर, सौराठ, मंगरीनी, कोइलख, भगवतीपुर, शिलानाथ, भवानीपुर, फुलहर एवं जमयरि आदि के नाम लिए जा सकते हैं। राज दरभंगा द्वारा निर्मित राजनगर, मधुवनी एवं मंगरीनी के मंदिरों एवं मूर्तियों के शिल्प स्थापत्य की दृष्टि से भव्य हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि मिथिला के तीन शक्ति पीठों के रूप में प्रसिद्ध मंगरीनी, डोकहर एवं उच्चैठ न केवल तांत्रिक त्रिकोण यंत्र का रूप बनाता है अपितु उसके मध्य स्थित सौराठ का सोमनाथ शक्ति एवं शिव द्वारा सृष्टि उत्पति पालन एवं विनाश की दार्शनिक व्याख्या भी प्रस्तुत करता है।</strong> </p>
<p>किन्तु अति प्राचीन काल से मिथिला वैदुष्य परम्परा के लिए विख्यात रहा है। वैदिक युग हो या पौराणिक काल या फिर प्राचीन मध्य या वर्तमान काल प्रत्येक समय में भारतीय संस्कृति एवं साहित्य में मिथिला के मनीषियों का योगदान श्लाघ्य रहा है। यहाँ कोई तक्षशिला नालन्दा या विक्रमशिला न रहते हुए भी यहाँ की शिक्षण परम्परा हेतु गवेषकों ने अमूर्त संस्था मिथिला विश्वविद्यालय पद का प्रयोग किया है। इस शैक्षणिक परम्परा को पल्लवित या विकसित करने के लिए कोई उल्लेखनीय राजकीय अनुदान या संरक्षण अतीत में नहीं मिलता रहा। फिर भी यहाँ के ग्रामीण आचायों ने अपने सीमित संसाधनों से भारतीय शिक्षा एवं संस्कृति के &#8216;विकास में जो अमूल्य योगदान किया है वह अद्वितीय है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-1.jpg" alt="" width="1920" height="1353" class="aligncenter size-full wp-image-5939" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-1.jpg 1920w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-1-300x211.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-1-1024x722.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-1-768x541.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-1-1536x1082.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Madhubani-1-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 1920px) 100vw, 1920px" /></a></p>
<p>वैसे तो मिथिला के कई गाँवों का इस दृष्टि से अपना विशेष महत्व है लेकिन जिन ग्रामों ने इस क्षेत्र में अपना वर्चस्व रख मिथिला-संस्कृति को नेतृत्व प्रदान किया उनमें मधुबनी क्षेत्र के गाँवों की प्रधानता रही। ऐसे कुछ मधुबनी क्षेत्र के गाँव निम्नलिखित हैं: मंगरौनी, पिलखवाड़, हरिनगर, हरिपुर, भौर, रेवाम (रमा), सरिसव, पाही, तोहना, लालगांज, ठाड़ी, नवानी एवं गंगोली आदि। इन सबों में मंगरीनी, लालगंज एवं सरिसय की परम्पराएँ लम्बी एवं विशिष्ट हैं। विशेषतः मंगरीनी को दिनेशचन्द्र भट्टाचार्य सदृश विद्वान् ने संस्कृत-संस्कृति का महानतम केन्द्र कहा है। भारत के इस अनुपम विद्यापीठ (मंगरौनी) में न मात्र असंख्य श्रेष्ठ आचार्य हुए अपितु विभिन्न शास्त्रों के अगणित श्रेष्ठ मनीषी और लेखक भी हुए, साथ ही मिथिला और बंगाल के कई प्रमुख विद्या केन्द्र और विद्वान्गण इसी विद्यापीठ की देन हैं। न्याय शास्त्र की एक विशिष्ट शाखा जो नव्यन्याय के रूप में प्रसिद्ध है उसका प्रादुर्भाव भी यहीं हुआ जिसका प्रसार कालान्तर में सरिसव होकर मिथिला के श्रोत्रिय क्षेत्र में एवं वंगाल के नरद्वीप होकर शेष भारत में हुआ।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/book/people-of-mithila-should-strengthen-the-history-of-their-respective-villages-blocks-and-districts">​चाहिए तो यह कि मिथिला के लोग अपने-अपने गांव, प्रखंड, जिला के बारे में इतिहास को मजबूत करें, यहाँ तो प्रस्तावित राज्य के मंत्रिमंडल का गठन कर रहे हैं, लेकिन श्री बिनयानन्द झा की बात कुछ और है </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>आप मिथिला के हैं तो आप अपने गाँव के पांच ऐतिहासिक स्थल और पुरातत्वों का नाम बताएं जिस पर आपको नाज हो ✍ सर !!! हें..हें&#8230;हें&#8230;.हैं !!!!! नहीं जानते हैं 😢</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 27 Nov 2024 04:03:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: आज ही नहीं, आने वाले समय में जब देश के बच्चों, नौजवानों से पूछा जायेगा की भारत के तीसरे प्रधान मन्त्री कौन थे? तब बच्चे गर्दन घुमाकर गुगुल करेंगे। अगर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित भारतीय प्रशासनिक सेवा के अन्तर्वीक्षा में टेबुल के दूसरे तरफ बैठे महानुभाव अभ्यर्थी से पूछ बैठें की [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/others/name-five-historical-sites-and-archaeological-sites-of-your-village-of-which-you-are-proud">आप मिथिला के हैं तो आप अपने गाँव के पांच ऐतिहासिक स्थल और पुरातत्वों का नाम बताएं जिस पर आपको नाज हो ✍ सर !!! हें..हें&#8230;हें&#8230;.हैं !!!!! नहीं जानते हैं 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: आज ही नहीं, आने वाले समय में जब देश के बच्चों, नौजवानों से पूछा जायेगा की भारत के तीसरे प्रधान मन्त्री कौन थे? तब बच्चे गर्दन घुमाकर गुगुल करेंगे। अगर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित भारतीय प्रशासनिक सेवा के अन्तर्वीक्षा में टेबुल के दूसरे तरफ बैठे महानुभाव अभ्यर्थी से पूछ बैठें की &#8220;यौ !! अहाँक गामक पांच टा ऐतिहासिक स्थान/पुरातत्वक नाम की? (अपने गाँव या जिला का कोई ऐतिहासिक पुरातत्व का नाम बताएं), तो अभ्यर्थी कहीं गलती से किसी पूर्ववर्ती – मृत नेता का नाम न बता बैठें। सुनने में अटपटा लगता है, पढ़ने में तो बुरा लगेगा ही; परन्तु जब आराम से सोचेंगे तो “यथार्थ” लगने लगेगा। क्योंकि मिथिलांचल में घर-घर नेता पनपते हैं, पंचायत से विधानसभा, विधान परिषद् के रास्ते संसद में बैठने के लिए, लेकिन प्रदेश के रक्षार्थ, सम्मानार्थ बिरले कोई कदम बढ़ाते हैं। </strong></p>
<p>आंकड़ों के अनुसार देश में तक़रीबन 3645 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। अगर औसतन भारतीयों से पूछा जाय की वे अपने ही राज्य में स्थित न्यूनतम 10 ऐतिहासिक पुरातत्व और घरोहरों का नाम बताएं, तो उम्मीद है वे पांच अथवा छठे नाम बताते-बताते दम तोड़ देंगे। वजह यह है कि उन्हें उन ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहरों में कोई दिलचस्पी नहीं है (अपवाद छोडकर्) यदि इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो देश के सम्पूर्ण क्षेत्रफल में औसतन प्रत्येक 892 किलोमीटर पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। इनमे सबसे अधिक 743 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर उत्तर प्रदेश में हैं, यानि उत्तर प्रदेश के 324 प्रति किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। </p>
<p><strong>उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान कर्णाटक का है जहाँ 506 राष्ट्रीय स्तर के ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। तीसरा स्थान तमिलनाडू का है जहाँ 413 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पांचवा स्थान गुजरात (293 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर); छठा स्थान मध्य प्रदेश (292 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर); सातवां स्थान महाराष्ट्र (285 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर), आठवां स्थान राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली जहाँ174 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। भौगोलिक क्षेत्रफल के दृष्टि से राजस्थान बहुत बड़ा भूभाग है, लेकिन यहाँ 162 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पश्चिम बंगाल में 136 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; आंध्र प्रदेश में 129 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; हरियाणा में 91 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; ओडिसा में 79 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; बिहार में 70 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; जम्मू-कश्मीर में 56 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; असम में 55 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; छत्तीसगढ़ में 47 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; उत्तराखंड में 42 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; हिमाचल प्रदेश में 40 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; पंजाब में 33 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; केरल में 27 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; गोवा में 21 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; झारखण्ड में 13 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं और अंत में दमन-दीव में 12 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर स्थित हैं। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527.png" alt="" width="1280" height="869" class="alignleft size-full wp-image-5920" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527.png 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527-300x204.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527-1024x695.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527-768x521.png 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a></p>
<p>औसतन वैसे ऐतिहासिक पुरातत्वों को छोड़कर, जो “दुधारू गाय” है, देश के हज़ारों-हज़ार पुरातत्वों की स्थिति, “सोचनीय” ही नहीं, “निंदनीय” भी है। ​वर्तमान वित्तीय वर्ष में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को लगभग 1273.91 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ था ताकि देश में ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थानों को, पुरातत्वों को सुरक्षित और संरक्षित रखा जा सके। पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में यह राशि 142.83 करोड़ अधिक थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय का एक हिस्सा है जिसका अहम् कार्य ऐतिहासिक स्थानों और पुरातत्वों को बचाना है। यह तो केंद्रीय स्तर की बात हुई देश में प्रत्येक राज्यों का संस्कृति मंत्रालयों के साथ साथ देश के कुल 787 जिलों के जिलाधिकारियों का भी यह दायित्व है कि स्थानीय रूप से उनके अपने-अपने क्षत्रों के ऐसे स्थानों और पुरातत्वों की देखभाल करे। </p>
<p>विगत दिनों पूर्व में कोसी से आरम्भ होकर पश्चिम में गंडक तक 24 योजन और दक्षिण में गंगा से आरम्भ होकर उत्तर में हिमालय की तराई तक 16 योजन में फैले मिथिला इलाके को अपनी साइकिल के पहियों से नापने वाले ललित नारायण मिथिला विश्वविदयालय, दरभंगाके प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के ​शोधार्थी मुरारी कुमार झा से बात हुई। झा बाबू अपने नाम के आगे &#8216;पुरातत्व&#8217; लिखते हैं । मेरे बाबूजी कहते थे कि अगर एक मनुष्य अपने जीवन काल में अपने नाम का ही अर्थ समझ लिया, अथवा अपने नाम का सार्थकता सिद्ध करने का यत्न-प्रयत्न किया, तो इससे बेहतर जीवन ​उद्देश्य और कुछ नहीं हो सकता है। मुरारी बाबू अपने जीवन के इस अल्पायु में अपने नाम का सार्थकता लगभग 90 फीसदी सिद्ध कर लिए हैं।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3.jpg" alt="" width="1280" height="799" class="alignright size-full wp-image-5921" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3-300x187.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3-1024x639.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3-768x479.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a></p>
<p>मेरा मानना है पढ़ना-लिखना, नौकरी-पेशा करना, घर-परिवार होना, घन कामना यह सभी जीवन का एक दूसरा पक्ष है जो पहले (उपरोक्त) पक्ष की तुलना में द्वितीय स्थान पर है। मुरारी बाबू अपने सामर्थ्य भर मिथिला क्षेत्र में गुमनाम ऐतिहासिक स्थलों, पुरातत्वों को न केवल ढूंढ रहे हैं, बल्कि वर्तमान ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों को भी दस्तावेज के रूप में उन खोजों को, तस्वीरों के साथ, फिल्मों के साथ समर्पित करेंगे। मिथिला में मुझे अभी तक ऐसे कोई भी युवक अथवा युवती नहीं दिखे हैं। श्री मुरारी बाबू और उनका कार्य अद्वितीय हैं।</p>
<p>आज अगर दरभंगा के महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह जीवित होते तो शायद मुरारी बाबू को अपने सर पर बैठाकर  सम्मानित करते &#8211; अर्थ से, सामर्थ्य से, महाराजा मुरारी बाबू के पीछे खड़े हो जाते क्योंकि उस काल खंड में मिथिला में विचारवान लोगों की किल्लत नहीं थी। आज राज परिवार में उस सोच के लोग नहीं हैं, अतः उनसे उम्मीद करना मूर्खता होगी। मिथिला में आज &#8216;सामर्थ्यवान&#8217; लोगों की तो बाढ़ है, गली-कूचियों में नेताओं का जमघट है, प्रत्येक नेता अरबपति, खरबपति है; परन्तु दुर्भाग्यवश &#8216;विचारवान&#8217;, &#8216;संवेदनशील&#8217;, &#8216;पुरातत्वों के प्रति प्रेम&#8217; लोगों की सुखाड़ है। खैर। </p>
<p><strong>मुरारीजी शायद देश का पहला शोधार्थी है जो साइकिल को अपने शोध का हिस्सा बनाकर मिथिलांचल के ऐतिहासिक पुरातत्वों को ढूंढकर दस्तावेज बना रहे हैं। उधर राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए 55 फीसदी शैक्षिक दर वाले मिथिलांचल में मैथिली भाषा भाषी मतदाताओं को अपनी भाषा में संविधान का ज्ञान प्राप्त करने के लिए संविधान दिवस पर मैथिली भाषा में संविधान का लोकार्पण किया गया और पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर उनके मंत्रिमंडल के आला मंत्री-संत्री-अधिकारीगण दांत निपोड़ रहे हैं, कह रहे हैं &#8220;अच्छा !!!! वह आर्यन काल का है&#8230;. अच्छा गुप्ता काल का है, अच्छा वह&#8230;. क्योंकि न उन्हें पुरा से मतलब है और ना ही तत्व से। फिर मिथिला का इतिहास बचेगा कैसे?</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2.jpg" alt="" width="1313" height="720" class="alignleft size-full wp-image-5922" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2.jpg 1313w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2-300x165.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2-1024x562.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2-768x421.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1313px) 100vw, 1313px" /></a></p>
<p>मुरारी जी कहते हैं कि वे मूलतः मिथिला परिक्षेत्र के दरभंगा जिला स्थित लवानी गाँव(बिहार) के निवासी हैं और वर्तमान समय में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा से पुरातत्त्व विषय में Ph.D. उपाधि हेतु शोध कार्य कर रहे हैं।  वे कहते हैं कि आज से नौ वर्ष पूर्व जब वे पुरातत्त्व के क्षेत्र में शोध के उद्देश्य से भ्रमण का योजना बनाये, तब साधन और संसाधन का अभाव सामने था। किंतु, उन्होंने भ्रमण हेतु अपने साइकिल को साधन के रूप में प्रयोग में लाना आरंभ किया।मुरजी जी कहते हैं: &#8220;आज तक में मैं अपने साइकिल से लगभग 1.5 लाख किलोमीटर सफ़र तय करते हुए पुरास्थल, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व के गाँव, प्राकृतिक सम्पदा आदि के अन्वेषण के उद्देश्य से लगभग 600 से अधिक यात्रा किया हूँ, जिसमें एक दिन में सबसे लम्बी दूरी 202 किमी. रही है। इस बार लगभग 300 किमी. दूरी तय करते हुए एक शोधपूर्ण यात्रा वृत्तांत प्रकाशित कराने की योजना है।&#8221;</p>
<p><strong>उनका मानना है कि &#8220;मिथिला, भारत के सबसे प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्रों में से एक है, जिसे ऐतिहासिक, धार्मिक और प्राकृतिक धरोहरों का केंद्र माना जा सकता है। इस क्षेत्र में प्राचीन मंदिरों, पुरास्थलों, नदियों, झीलों और सांस्कृतिक धरोहरों का भंडार है। हमारी कोशिश है कि सभी स्थलों तक पहुंचकर उसका व्यापक रूप से शोध और दस्तावेज़ीकरण किया जाय।&#8221; </strong></p>
<p>मुरारी जी कहते हैं: &#8220;मेरी साइकिल यात्रा (300किमी) दिसंबर 2024 के प्रथम सप्ताह में होगी और इसमें लगभग 3000 से अधिक पुरास्थल, प्राचीन मंदिर, प्राकृतिक धरोहर, क्षेत्रीय आयूर्वेद, गाँव, नदी, नहर, पोखर, झील, पक्षी अभ्यारण, कृषि, पशुपालन सहित अन्य महत्त्वपूर्ण स्थलों का विवरण और सूचीकरण किया जाएगा। इस परियोजना के अंतर्गत प्रकाशित होने वाली पुस्तक में इन सभी स्थलों का विवरण और चित्रण सहित उनसे जुड़ी सांस्कृतिक व्याख्या सम्मिलित होगी। यह परियोजना मिथिला की धरोहर और संस्कृति को संरक्षित और प्रचारित करने के साथ ही आम जनमानस को धरोहर संरक्षण के प्रति जागरूक करने हेतु एक व्यापक प्रयास का हिस्सा है।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2.jpg" alt="" width="2048" height="1536" class="alignright size-full wp-image-5923" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a></p>
<p>​<strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> जब परियोजना का उद्देश्य​ पूछा तो मुरारी जी कहते हैं कि &#8220;इस परियोजना का उद्देश्य एक साइकिल यात्रा के माध्यम से मिथिला क्षेत्र के पुरास्थलों, प्राचीन मंदिरों, प्राकृतिक धरोहरों और सांस्कृतिक विरासतों का गहन अध्ययन और उनका सूचीकरण के साथ ही इस वृत्तांत को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करना है, ताकि इन धरोहरों के बारे में शोधपूर्ण जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक​ पहुंचना है ताकि लोगों में अपने क्षेत्र के सांस्कृतिक विरासतों के बारे में पता चले।  इससे स्थानीय  और राष्ट्रीय स्तर पर धरोहर और संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।​&#8221;</p>
<p><strong>​जब उनसे पूछा कि इस यात्रा, शोध और पुस्तकी की छपाई के लिए आर्थिक श्रोत क्या है? मुरारजी जी कुछ क्षण रुके, लम्बी सांस लिए और फिर कहते हैं: &#8220;यही बिडम्बना है। यही हमारा दुर्भाग्य है। हम वीरसातों की महत्ता को तो समझते हैं, उसे उजागर करने के लिए सतत प्रयन्तशील हैं और चाहते हैं कि वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक दस्तावेज छोड़े जो उनके गान, प्रखंड, अंचल, जिला, क़स्बा के धरोहरों का जिवंत दृष्टान्त होगा। अर्थ के मामले में हम हैं कमजोर जो जाते हैं। हम एक शोधार्थी हैं। हम जानते हैं कि जिस कार्य को हम कर रहे हैं वह न केवल जिला प्रशासन के लिए, प्रदेश की सरकार के लिए या फिर केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है, इस कार्य से करोड़ों रूपये कमाए जा सकते हैं। हम अपने प्रदेश के, देश के लोगों से, जो देश से बाहर रहते हैं, उसने प्रार्थना कर रहे हैं कि इस कार्य में वे सभी हमारा हाथ पकड़ें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि मिथिला में लोग हाथ पकड़ते नहीं, हाथ झटक देते हैं।&#8221;</strong></p>
<p>झा का जन्म 15 फरवरी 1994ई० को दरभंगा जिले के ही बेनीपुर प्रखंड अंतर्गत आने वाले लवानी गाँव के एक साधारण किसान परिवार में हुआ और इनका लालन-पालन एवं सम्पूर्ण पढाई जिले के ही बहादुरपुर प्रखंड अंतर्गत देकुली गाँव स्थित नाना-नानी के घर से हुआ।​ ​स्नातकोत्तर के दौरान ही 02 दिसंबर 2015 को तत्कालीन विभागाध्यक्ष डॉ मदन मोहन मिश्र, शिक्षक डॉ अयोध्या नाथ झा और विभागीय कर्मचारी श्री कैलाश प्रसाद के समक्ष प्राचीन इतिहास विभाग(मोतीमहल परिसर) से प्राप्त हुए 1341ई० के &#8220;मोती महल स्तंभ लेख&#8221; के ऐतिहासिक खोज के साथ ही इन्होंने पुरातत्व के दुनिया में अपना पहला कदम रखा। किंतु, आगे की खोज जारी रखने हेतु इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में साधन और संसाधन का अभाव था, बावजूद इसके; इन्होंने अपना खोज-कार्य जारी रखा। चूंकि, नवीन खोज करना इनका प्रथम पसंद था; इसीलिए तत्काल इन्होंने भ्रमण हेतु अपने साइकिल को ही साधन के रूप में उपयोग किया।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7.jpeg" alt="" width="1159" height="1600" class="aligncenter size-full wp-image-5924" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7.jpeg 1159w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7-217x300.jpeg 217w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7-742x1024.jpeg 742w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7-768x1060.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7-1113x1536.jpeg 1113w" sizes="auto, (max-width: 1159px) 100vw, 1159px" /></a></p>
<p>स्वतंत्र भारत में, खासकर मिथिला क्षेत्र में मुरारी जी शायद पहला शोधार्थी है जो साइकिल से ही पुरास्थलों को खोजने हेतु दूर-दूर तक जाते हैं। दरभंगा के आनंदपुर से विदा होकर चार घंटे  पुरास्थल (गिरिजा स्थान फुलहर) पर कार्य करने के उपरांत कुल 13 घंटे में पुनः आनंदपुर आ गए थे, यानी कि 202 किमी की दूरी अपने साइकिल से 9 घंटे में तय किए। ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के स्थलों को खोजने के लिए अपने साइकिल से ये अभी तक दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, वैशाली, पटना आदि जिलों के लगभग 400 से 500 पुरास्थलों का भ्रमण कर चुके हैं। इससे संबंधित इनके दर्जन भर से अधिक आलेख भी प्रकाशित हैं। इनके सहयोग से देकुली (बहादुरपुर, दरभंगा) से एक शिवलिंग, ओझौल (बहादुरपुर, दरभंगा) से विष्णु प्रतिमा, भटौरा मठ (शिवाजीनगर, समस्तीपुर) से विष्णु प्रतिमा को दरभंगा जिला स्थित महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में संगृहीत किया जा चूका है। धरोहर संरक्षण हेतु, इन्हें विगत वर्ष मार्च महीने में चंद्रगुप्त साहित्य महोत्सव के दौरान &#8216;पुरातत्व भूषण सम्मान-2023&#8242; से सम्मानित किया गया।</p>
<p>​मुरारीजी कहते हैं: &#8220;केवल दरभंगा जिला को ही लें तो, शंकरपुर डीह, खैरा-सिरुआ, कुर्सों-नदियामी, इनाई, महथावन आदि पुरास्थलों से प्राचीन सिक्के, भच्छी, कोर्थू, पिपरौलिया, पंचोभ, तिलकेश्वर मठ, दरभंगा राज परिसर आदि पुरास्थलों से अभिलेख, बहेरा, बरई, शंकरपुर डीह, देवकुली, रतनपुर, ब्रह्मपुर, हावीडीह, कोर्थू आदि पुरास्थलों से प्राचीन भवनों मंदिरों के प्रमाण, रमौली, हरहच्चा, कोइलवाड़ा, महथावन, वाराही आदि पुरास्थलों से टेराकोटा और समस्त दरभंगा जिला से सैकड़ों प्रतिमाएं प्राप्त हुए हैं और समय-समय प्राप्त होते रहते हैं। इस जिले के 300 से अधिक ऐसे पुरास्थल और गांव हैं, जहां विभिन्न प्रकार के पुरावशेष बिखरे पड़े हैं। ये सभी पुरावशेष ईस्वी पूर्व से आधुनिक काल तक के हैं, जिसका वैज्ञानिक परीक्षण और अध्ययन होना अति आवश्यक है।​ मेरी कोशिश है कि अपनी यात्रा के दौरान ऐतिहासिक धरोहर, प्राकृतिक धरोहर, मानव स्वास्थ्य, जल संचयन एवं संरक्षण, संस्कृति के संरक्षण, जैविक कृषि आदि के महत्व को बताते हुए स्थानीय लोगों को जागरूक ​करते रहें क्योंकि जीवन में निरंतरता, लगन, एकाग्रता, सहनशीलता और बुद्धिमता सबसे आवश्यक है।&#8217;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari5.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari5.jpeg" alt="" width="667" height="591" class="aligncenter size-full wp-image-5925" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari5.jpeg 667w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari5-300x266.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 667px) 100vw, 667px" /></a></p>
<p>मुरारी ​जी एक समर्पित और बहु-आयामी शोधकर्ता और पुरातत्वविद हैं, जो मिथिला क्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, और प्राकृतिक धरोहरों को संरक्षित करने में गहरी रुचि रखते हैं। मुरारी ​जी का मुख्य शोध मिथिला क्षेत्र की पुरातात्विक धरोहर पर केंद्रित है। उनके शोध का उद्देश्य दरभंगा जिले और इसके आस-पास के क्षेत्रों में छिपी प्राचीन धरोहरों और स्थलों की पहचान करना और उन्हें संरक्षित करना है। उन्होंने कई अज्ञात और अपरिचित स्थलों का अन्वेषण किया है, जिन्हें अब तक नजरअंदाज किया गया था।</p>
<p>उनके शोध कार्य का सबसे अनोखा पहलू यह है कि उन्होंने किसी विशेष साधन के बजाय अपनी साइकिल का उपयोग करके हजारों किलोमीटर की यात्रा की। उन्होंने अपनी साइकिल को &#8216;हवाई जहाज&#8217; नाम दिया और अब तक लगभग 1,50,000 किलोमीटर की दूरी तय की है। इस यात्रा के दौरान उन्होंने मिथिला की सांस्कृतिक धरोहरों का गहन अध्ययन किया और उन्हें संरक्षित करने का प्रयास किया। इतिहास और पुरातत्व के अलावा, मुरारी कुमार झा भूगोल और प्रकृति में भी गहरी रुचि रखते हैं। उन्होंने मिथिला के भौगोलिक परिदृश्य, नदियों, झीलों, और प्राकृतिक संसाधनों का अध्ययन किया है। वे इन प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण और संवर्धन के प्रति भी समर्पित हैं, खासकर जल प्रबंधन और पारिस्थितिक संतुलन के क्षेत्रों में।</p>
<p>मिथिला की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली और कृषि पद्धतियों का भी मुरारी ने गहन अध्ययन किया है। वे आयुर्वेद, कृषि, और पशुपालन में पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय की वकालत करते हैं। उन्होंने स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर आयुर्वेदिक पौधों और पारंपरिक कृषि तकनीकों का संरक्षण और प्रोत्साहन किया है। मुरारी कुमार झा एक कुशल लेखक भी हैं। उन्होंने मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर, पुरातात्विक स्थलों, और स्थानीय परंपराओं पर कई लेख और पुस्तकों का लेखन किया है। उनकी लेखनी में गहराई और स्पष्टता है, जो पाठकों को मिथिला की समृद्ध धरोहर के प्रति आकर्षित करती है। इसके अलावा, कला में उनकी रुचि, खासकर मिथिला पेंटिंग्स और अन्य पारंपरिक कलाओं में, उन्हें एक बहु-आयामी व्यक्तित्व बनाती है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/others/name-five-historical-sites-and-archaeological-sites-of-your-village-of-which-you-are-proud">आप मिथिला के हैं तो आप अपने गाँव के पांच ऐतिहासिक स्थल और पुरातत्वों का नाम बताएं जिस पर आपको नाज हो ✍ सर !!! हें..हें&#8230;हें&#8230;.हैं !!!!! नहीं जानते हैं 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>प्रधानमंत्री ने श्री राम जन्मभूमि मंदिर को समर्पित छह स्मारक डाक टिकट जारी किए</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 18 Jan 2024 12:49:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[देश]]></category>
		<category><![CDATA[ayodhya]]></category>
		<category><![CDATA[history]]></category>
		<category><![CDATA[postage]]></category>
		<category><![CDATA[ramjanmbhumi]]></category>
		<category><![CDATA[ramjanmbhumi trust]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली : प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज श्री राम जन्मभूमि मंदिर को समर्पित छह विशेष स्मारक डाक टिकट जारी किए, साथ ही विश्व के अलग-अलग देशों में प्रभु श्रीराम से जुड़े जो डाक टिकट पहले जारी हुए हैं, उनका भी एक एल्बम आज जारी किया गया। उन्होंने इस अवसर पर भारत और विदेशों में प्रभु [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/pm-releases-commemorative-postage-stamps-on-shri-ram-janmbhoomi-mandir">प्रधानमंत्री ने श्री राम जन्मभूमि मंदिर को समर्पित छह स्मारक डाक टिकट जारी किए</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली : प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज श्री राम जन्मभूमि मंदिर को समर्पित छह विशेष स्मारक डाक टिकट जारी किए, साथ ही विश्व के अलग-अलग देशों में प्रभु श्रीराम से जुड़े जो डाक टिकट पहले जारी हुए हैं, उनका भी एक एल्बम आज जारी किया गया। उन्होंने इस अवसर पर भारत और विदेशों में प्रभु राम के सभी भक्तों को बधाई दी।</strong></p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि हम सभी जानते हैं कि पत्र या महत्वपूर्ण दस्तावेज भेजने के लिए लिफाफे पर ये टिकट चिपकाए जाते हैं। लेकिन वे एक अन्य उद्देश्य भी पूरा करते हैं। डाक टिकट ऐतिहासिक घटनाओं को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने के माध्यम के रूप में भी काम करते हैं। इसलिए जब भी आप किसी को डाक टिकट के साथ कोई पत्र या वस्तु भेजते हैं, तो आप उन्हें इतिहास का एक टुकड़ा भी भेज रहे होते हैं। ये टिकट सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि इतिहास की किताबों, कलाकृतियों और ऐतिहासिक स्थलों का सबसे छोटा रूप हैं।</p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि ये स्मारक टिकट हमारी युवा पीढ़ी को प्रभु राम और उनके जीवन के बारे में जानने में भी मदद करेंगे। उन्होंने कहा कि इन टिकटों पर कलात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से प्रभु राम के प्रति भक्ति व्यक्त की गई है और लोकप्रिय चौपाई &#8216;मंगल भवन अमंगल हारी&#8217; के उल्लेख के साथ राष्ट्र के विकास की कामना की गई है। इन टिकटों पर सूर्यवंशी राम के प्रतीक सूर्य की छवि है, जो देश में नए प्रकाश का संदेश भी देता है। इनमें पुण्य नदी सरयू का चित्र भी है, जो राम के आशीर्वाद से देश को सदैव गतिमान रहने का संकेत करती है। मंदिर के आंतरिक वास्तु के सौंदर्य को बड़ी बारीकी से इन डाक टिकटों पर प्रिंट किया गया है।</p>
<p>प्रधानमंत्री ने उन संतों की भी प्रशंसा की, जिन्होंने राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के साथ मिलकर स्मारक टिकट जारी करने में डाक विभाग का मार्गदर्शन किया।</p>
<figure id="attachment_5229" aria-describedby="caption-attachment-5229" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150316.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150316.jpg" alt="" width="2200" height="1508" class="size-full wp-image-5229" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150316.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150316-300x206.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150316-1024x702.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150316-768x526.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150316-1536x1053.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150316-2048x1404.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150316-100x70.jpg 100w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150316-218x150.jpg 218w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5229" class="wp-caption-text">PM releases Commemorative Postage Stamps on Shri Ram Janmbhoomi Mandir &amp; a book of stamps, in New Delhi on January 18, 2023.</figcaption></figure>
<p>प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि भगवान श्रीराम, माता सीता और रामायण से संबंधित शिक्षाएं समय, समाज, जाति, धर्म और क्षेत्र की सीमाओं से परे, हर एक व्यक्ति से जुड़ी हैं। सबसे मुश्किल कालखंड में भी त्याग, एकता और साहस दिखाने वाली रामायण, अनेक मुश्किलों में भी प्रेम की जीत सिखाने वाली रामायण पूरी मानवता को खुद से जोड़ती है। यही कारण है, कि रामायण पूरे विश्व में आकर्षण का केंद्र रही है। आज जिन पुस्तकों का लोकार्पण हो रहा है, वो इन्हीं भावनाओं का प्रतिबिंब हैं कि कैसे पूरे विश्व में भगवान राम, माता सीता और रामायण को बहुत गौरव से देखा जाता है।</p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कंबोडिया, कनाडा, चेक गणराज्य, फिजी, इंडोनेशिया, श्रीलंका, न्यूजीलैंड, थाईलैंड, गुयाना, सिंगापुर उन कई देशों में से हैं, जिन्होंने भगवान राम के जीवन की घटनाओं पर बहुत रुचि के साथ डाक टिकट जारी किए हैं। उन्होंने कहा कि भगवान श्री राम और माता जानकी की कहानियों के बारे में सम्‍पूर्ण जानकारी वाला जारी किया गया नया एल्बम हमें उनके जीवन के बारे में जानकारी देगा। यह हमें बताएगा कि भगवान राम किस तरह भारत से बाहर भी उतने ही महान आदर्श हैं, और कैसे विश्व की तमाम सभ्यताओं पर प्रभु राम का कितना गहरा प्रभाव रहा है।</p>
<figure id="attachment_5230" aria-describedby="caption-attachment-5230" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150321.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150321.jpg" alt="" width="2200" height="1693" class="size-full wp-image-5230" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150321.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150321-300x231.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150321-1024x788.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150321-768x591.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150321-1536x1182.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240118150321-2048x1576.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5230" class="wp-caption-text">PM releases Commemorative Postage Stamps on Shri Ram Janmbhoomi Mandir &amp; a book of stamps, in New Delhi on January 18, 2023.</figcaption></figure>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि महर्षि वाल्मिकी का वह आह्वान आज भी अमर है जिसमें उन्होंने कहा था: यावत् स्थास्यन्ति गिरयः, सरितश्च महीतले। तावत् रामायणकथा, लोकेषु प्रचरिष्यति॥ अर्थात्, जब तक पृथ्वी पर पर्वत हैं, नदियां हैं, तब तक रामायण की कथा, श्रीराम का व्यक्तित्व लोक समूह में प्रचारित होता रहेगा।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/nation/pm-releases-commemorative-postage-stamps-on-shri-ram-janmbhoomi-mandir">प्रधानमंत्री ने श्री राम जन्मभूमि मंदिर को समर्पित छह स्मारक डाक टिकट जारी किए</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>श्री राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे 🌺 सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने 🙏</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 18 Jan 2024 05:22:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>* ऐसे अवसर पर भवुक होना स्वाभाविक है। भाव-विह्वल होना प्रकृति का नियम है। आज भारतभूमि पर अथवा इस भूमि से दूर अपने &#8211; अपने जीवन यापन करने के लिए जेद्दोजेहद कर रहे करोड़ों &#8216;आस्तिकों&#8217; के लिए, जिन्हे राम से, मर्यादा से, पुरुषोत्तम से अगाध प्रेम और समर्पण है, पहली बार जीवन में कुछ अलग [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>* ऐसे अवसर पर भवुक होना स्वाभाविक है। भाव-विह्वल होना प्रकृति का नियम है। आज भारतभूमि पर अथवा इस भूमि से दूर अपने &#8211; अपने जीवन यापन करने के लिए जेद्दोजेहद कर रहे करोड़ों &#8216;आस्तिकों&#8217; के लिए, जिन्हे राम से, मर्यादा से, पुरुषोत्तम से अगाध प्रेम और समर्पण है, पहली बार जीवन में कुछ अलग तरह के मनोभाव से गुजर रहे होंगे। खासकर भारत केव प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जिन्हे &#8216;समय&#8217; और उनका प्रारब्ध&#8217; उन्हें सभी भारतवासियों का प्रतिनिधित्व करने का निमित्त बनाया है। ये एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है। हे राम !! हे मर्यादा !! ये मर्यादित !! हे पुरुषोत्तम !! हे दशरथ पुत्र &#8230;&#8230;</p>
<p>* आज हम उस ऐतिहासिक क्षण में प्रवेश कर रहे हैं जब कुछ घंटों बाद गर्भ-गृह में श्रीराम लल्ला की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम पूर्ण होगा। विभिन्न राज्यों के लोग लगातार जल, मिट्टी, सोना, चांदी, मणियां, कपड़े, आभूषण, विशाल घंटे, ढोल, सुगंध इत्यादि के साथ आ रहे हैं। उनमें से सबसे उल्लेखनीय है माँ जानकी के मायके द्वारा भेजे गए भार (एक बेटी के घर स्थापना के समय भेजे जाने वाले उपहार) जो जनकपुर (नेपाल) और सीतामढ़ी (बिहार) के ननिहाल से अयोध्या आये हैं । रायपुर, दंडकारण्य क्षेत्र स्थित प्रभु के ननिहाल से भी विभिन्न प्रकार के आभूषणों आदि के उपहार भेजे गए हैं। </p>
<p>* भारत के इतिहास में पहली बार पहाड़ों, वनों, तटीय क्षेत्रों, द्वीपों आदि के वासियों द्वारा एक स्थान पर ऐसे किसी समारोह में प्रतिभाग किया जा रहा है जो अपने आप में अद्वितीय होगा। शैव, वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य, पात्य, सिख, बौद्ध, जैन, दशनाम शंकर, रामानंद, रामानुज, निम्बार्क, माध्व, विष्णु नामी, रामसनेही, घिसापंथ, गरीबदासी, गौड़ीय, कबीरपंथी, वाल्मीकि, शंकरदेव (असम), माधव देव, इस्कॉन, रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, भारत सेवाश्रम संघ, गायत्री परिवार, अनुकूल चंद्र ठाकुर परंपरा, ओडिशा के महिमा समाज, अकाली, निरंकारी, नामधारी (पंजाब), राधास्वामी और स्वामीनारायण, वारकरी, वीर शैव इत्यादि कई सम्मानित परंपराएँ इसमें भाग लेंगी। </p>
<p>* भारतीय आध्यात्मिकता, धर्म, संप्रदाय, पूजा पद्धति, परंपरा के सभी विद्यालयों के आचार्य, 150 से अधिक परंपराओं के संत, महामंडलेश्वर, मंडलेश्वर, श्रीमहंत, महंत, नागा सहित 50 से अधिक आदिवासी, गिरिवासी, तातवासी, द्वीपवासी आदिवासी परंपराओं के प्रमुख व्यक्तियों की कार्यक्रम में उपस्थिति रहेगी, जो श्री राम मंदिर परिसर में प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के दर्शन हेतु पधारेंगे। प्राण प्रतिष्ठा भारत के आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूजनीय सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी, उत्तर प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल जी, उत्तर प्रदेश के आदरणीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी महाराज और अन्य गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में होगी। </p>
<figure id="attachment_5208" aria-describedby="caption-attachment-5208" style="width: 640px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/3-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/3-1.jpg" alt="" width="640" height="960" class="size-full wp-image-5208" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/3-1.jpg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/3-1-200x300.jpg 200w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5208" class="wp-caption-text">हे राम !! हे मर्यादा !! हे पुरुषोत्तम</figcaption></figure>
<p><strong>अयोध्या / नई दिल्ली : कहते हैं उत्तरा के गर्भ में जब अभिमन्यु थे, चक्रव्यूह तोड़ने के बारे में चर्चाएं हो रही थी। कुछ क्षण के लिए उत्तरा की आँखें लग गयी और अभिमन्यु चक्रव्यूह तोड़ने सम्बन्धी संवाद को नहीं सुन सका। समयांतराल महाभारत में अभिमन्यु का क्या हश्र हुआ, हम सभी जानते हैं। यही अभिमन्यु का प्रारब्ध था। ईश्वर की रचना भी कुछ वैसी ही थी। </p>
<p>लेकिन जब श्रीमती हीराबेन के गर्भ में एक बालक का अभ्युदय हुआ, हीराबेन का मातृहृदय ईश्वर के प्रति समर्पित था। वह सजग थी और ईश्वर तथा समय तो सजग थे ही। अन्यथा अगर ऐसा नहीं होता तो भारत के राजनीतिक मानचित्र पर जिस व्यक्ति को किनार-दरकिनार करने वालों की किल्लत नहीं थी, वह शनैः शनैः भारत ही नहीं, विश्व के मानचित्र पर भारत राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कैसे करता। दशरथ पुत्र राम की जन्मभूमि पर अनंतकाल से हो रही राजनीति को उखाड़ फेंक कर मर्यादा पुरुषोत्तम राम को कैसे स्थापित करता। यही समय है। यही प्रारब्ध है और यही ईश्वर चाहते भी थे। </strong> </p>
<p>आप माने अथवा नहीं। यह भी संभव है कि इन शब्दों को पढ़ने के बाद आपके मन में अनेकानेक &#8216;नकारात्मक&#8217; सोच मेरे प्रति आने लगे। अनेकानेक &#8216;नकारात्मक शब्दों से मेरा अलंकरण आप करने लगें। लेकिन मेरे बाबूजी कहते थे कि &#8216;जीवन में ईश्वर और समय द्वारा लिखित किसी के प्रारब्ध को कोई बदल नहीं सकता है, छीन नहीं सकता है। आज ही नहीं आने वाले कई शताब्दियों तक जब भी &#8216;विष्णु और महेश&#8217; का नाम लिया जायेगा, जब भी बनारस और अयोध्या का उच्चरण लोग करेंगे, स्वतः वर्त्तमान काल के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ का नाम पर्यायवाची हो जायेगा । </p>
<p>इसे मैं अपना भी प्रारब्ध मानता हूँ कि आज मैं रामजन्म स्थान पर बने ऐतिहासिक मंदिर के बारे में कहानी लिख रहा हूँ। चौंतीस वर्ष पहले जब इसका बीजारोपरान हुआ था तत्कालीन नेता लालकृष्ण आडवाणी के हाथों सोमनाथ से, मैं चश्मदीद गवाह था धनबाद में। इस स्थान के बारे में कहानियों की श्रृंखला अनंत है, लेकिन जो तथ्य मेरे प्रारब्ध में थे, जो शब्द मुझे लिखना था, आज तक किसी ने नहीं लिखा। आज बाबूजी की बातें बहुत याद आ रही है। <strong>आज 2024 साल का जनवरी महीना का 18 तारीख है। आज से 75 वर्ष पहले अयोध्या में  जिस विवाद की शुरुआत हुई थी, उस विवाद का अंत आज से चार दिवस बाद हो जायेगा। कौशल्या-दशरथ पुत्र राम अपने जन्मस्थान पर विराजेंगे। </strong></p>
<p><strong>प्रारब्ध की बात देखिये। जिस दिन रामजन्म भूमि &#8211; बाबरी मस्जिद विवाद की शुरुआत हुई थी, यानी 22/23 दिसंबर, 1949, उस तिथि को श्रीमती हीराबेन मोदी के गर्भ में एक बालक का बीजारोपन हो गया था। सन 1949 की उस तारीख के नौ-माह बाद 17 सितम्बर, 1950 को हुआ नरेंद्र मोदी का जन्म हुआ। </strong></p>
<p>मनुष्य योनि में देवकी पुत्र कृष्ण का जन्म भी हुआ था &#8211; एक उद्येश्य की पूर्ति करने के लिए। कृष्ण तो विष्णु के अवतार थे। लेकिन मोदी मनुष्य योनि में एक ऐसे अवतार हैं जो भारत ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व में &#8216;राम के प्रति विश्वास और आस्था रखने वालों की ओर से दशरथ पुत्र राम को ससम्मान उनकी जन्मभूमि पर विराजने के लिए अपने जीवन उद्दैश्य को पूरा किया।  </p>
<figure id="attachment_5209" aria-describedby="caption-attachment-5209" style="width: 768px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/4-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/4-1.jpg" alt="" width="768" height="960" class="size-full wp-image-5209" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/4-1.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/4-1-240x300.jpg 240w" sizes="auto, (max-width: 768px) 100vw, 768px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5209" class="wp-caption-text">हे दशरथ पुत्र  !! हम अपने कर्तब्य का निर्वहन करने को सज्ज हैं</figcaption></figure>
<p><strong>राजनीतिक दृष्टि से आधुनिक भारत के राजनेतागण चाहे इस सम्पूर्ण मामले को जिन रंगों में रंगे, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस स्थान के विवाद में आने के साथ ही एक बालक का गर्भ में अभ्युदय हो गया था जो राम को लाने का मार्ग प्रशस्त करेगा, किया। आज ही नहीं, आने वाले कई सदियों तक, जब भी भगवान् राम की बात होगी, अयोध्या की बात होगी, राम जन्मभूमि की बात होगी, देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी का नाम स्वतः लोगों के मुख पर आ जायेगा। आप माने अथवा नहीं। </strong> </p>
<p>विगत दिनों श्री राम जन्मभूमि मंदिर’ का शिलान्यास की गयी थी तो इसकी शुरुआत ‘‘सियावर रामचंद्र की जय’’ के उद्घोष से की गई । वह उद्घोष सिर्फ राम की नगरी में ही नहीं, बल्कि इसकी गूंज पूरे विश्व में सुनाई दे रही है, आज भी । देशवासियों को और विश्व में फैले करोड़ों राम भक्तों को उस ‘‘पवित्र’’ अवसर पर ‘‘कोटि कोटि’’ बधाई दी। </p>
<p>प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के अनुसार जिस प्रकार स्वतंत्रता दिवस लाखों बलिदानों और स्वतंत्रता की भावना का प्रतीक है, उसी तरह राम मंदिर का निर्माण कई पीढ़ियों के अखंड तप, त्याग और संकल्प का प्रतीक है। यह मंदिर राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय भावना का प्रतीक बनेगा तथा करोड़ों लोगों की सामूहिक शक्ति का भी प्रतीक बनेगा। यह आने वाली पीढ़ियों को आस्था और संकल्प की प्रेरणा देता रहेगा। राम मंदिर के लिए कई सदियों तक कई पीढ़ियों ने लगातार प्रयास किया और आज का यह दिन उसी तप, त्याग और संकल्प का प्रतीक है।’’ राम मंदिर के लिए चले आंदोलन में अर्पण भी था, तर्पण भी था, संघर्ष भी था, संकल्प भी था। </p>
<p>मोदी ने कहा था बरसों से टाट और टेंट के नीचे रह रहे ‘‘हमारे रामलला’’ के लिए अब एक भव्य मंदिर में रहेंगे। उनके अनुसार ‘‘टूटना और फिर उठ खड़ा होना, सदियों से चल रहे इस व्यतिक्रम से राम जन्मभूमि अब मुक्त होगा ‘जिनके त्याग, बलिदान और संघर्ष से आज ये स्वप्न साकार हो रहा है, जिनकी तपस्या राम मंदिर में नींव की तरह जुड़ी हुई है। मैं उन सबको आज 130 करोड़ देशवासियों की तरफ से नमन करता हूं। राम का मंदिर भारतीय संस्कृति का आधुनिक प्रतीक बनेगा, हमारी शाश्वत आस्था का प्रतीक बनेगा, राष्ट्रीय भावना का प्रतीक बनेगा। ये मंदिर करोड़ों-करोड़ों लोगों की सामूहिक शक्ति का भी प्रतीक बनेगा।</p>
<p>बहरहाल, प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने 22 जनवरी को अयोध्या धाम में मंदिर में श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के लिए 11 दिवसीय विशेष अनुष्ठान शुरू किया। उन्होंने कहा था कि “ये एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है। जैसा हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है, हमें ईश्वर के यज्ञ के लिए, आराधना के लिए, स्वयं में भी दैवीय चेतना जागृत करनी होती है। इसके लिए शास्त्रों में व्रत और कठोर नियम बताए गए हैं, जिन्हें प्राण प्रतिष्ठा से पहले पालन करना होता है। </p>
<p>एक भावनात्मक संदेश में प्रधानमंत्री ने प्राण प्रतिष्ठा से पहले पूरे देश में राम भक्ति की भावना का उल्लेख किया। इस क्षण को ईश्वर का आशीर्वाद बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, मैं भावुक हूँ,भाव-विह्वल हूँ! मैं पहली बार जीवन में इस तरह के मनोभाव से गुजर रहा हूँ, मैं एक अलग ही भाव-भक्ति की अनुभूति कर रहा हूं। मेरे अंतर्मन की ये भाव-यात्रा, मेरे लिए अभिव्यक्ति का नहीं, अनुभूति का अवसर है। चाहते हुए भी मैं इसकी गहनता, व्यापकता और तीव्रता को शब्दों में बांध नहीं पा रहा हूं। आप भी मेरी स्थिति भली भाँति समझ सकते हैं।”</p>
<figure id="attachment_5210" aria-describedby="caption-attachment-5210" style="width: 1610px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240117150125-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240117150125-scaled.jpg" alt="" width="1610" height="2560" class="size-full wp-image-5210" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240117150125-scaled.jpg 1610w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240117150125-189x300.jpg 189w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240117150125-644x1024.jpg 644w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240117150125-768x1221.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240117150125-966x1536.jpg 966w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/H20240117150125-1288x2048.jpg 1288w" sizes="auto, (max-width: 1610px) 100vw, 1610px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5210" class="wp-caption-text">प्रारब्ध  और विश्वास</figcaption></figure>
<p>प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर के लिए आभार व्‍यक्‍त किया, &#8221;मुझे उस सपने के पूरा होने के समय उपस्थित होने का सौभाग्य मिला है, जिस स्वप्न को अनेकों पीढ़ियों ने वर्षों तक एक संकल्प की तरह अपने हृदय में जिया, मुझे उसकी सिद्धि के समय उपस्थित होने का सौभाग्य मिला है। प्रभु ने मुझे सभी भारतवासियों का प्रतिनिधित्व करने का निमित्त बनाया है। ये एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है।”इस पवित्र अवसर पर ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों और परमात्‍मा का आशीर्वाद मांगा और खुशी व्यक्त की कि वह नासिक धाम- पंचवटी से अनुष्ठान शुरू करेंगे जहां प्रभु श्रीराम ने काफी समय बिताया था।</p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा, “शरीर के रूप में, तो मैं उस पवित्र पल का साक्षी बनूंगा ही,  लेकिन मेरे मन में, मेरे हृदय के हर स्पंदन में, 140 करोड़ भारतीय मेरे साथ होंगे। आप मेरे साथ होंगे&#8230;हर राम भक्त मेरे साथ होगा। और वो चैतन्य पल, हम सबकी सांझी अनुभूति होगी। मैं अपने साथ राम मंदिर के लिए अपने जीवन को समर्पित करने वाले अनगिनत व्यक्तित्वों की प्रेरणा लेकर जाऊंगा। हम सब इस सत्य को जानते हैं कि ईश्वर निराकार है। लेकिन ईश्वर, साकार रूप में भी हमारी आध्यात्मिक यात्रा को बल देते हैं। जनता-जनार्दन में ईश्वर का रूप होता है, ये मैंने साक्षात देखा है, महसूस किया है। लेकिन जब ईश्वर रूपी वही जनता शब्दों में अपनी भावनाएं प्रकट करती है, आशीर्वाद देती है, तो मुझमें भी नई ऊर्जा का संचार होता है। आज, मुझे आपके आशीर्वाद की आवश्यकता है।” </p>
<p><strong>बहरहाल, 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम की तैयारियां जोरों पर है। राम मंदिर का गर्भगृह कुछ ऐसे बनाया गया है कि 25 फीट दूर से श्रद्धालु भगवान राम की छवि निहार सकेंगे। दीवारों पर देवी-देवताओं की मूर्तियां उकेरी हैं। तीन मंजिला राम मंदिर पारंपरिक नागर शैली में बनाया गया है। मुख्य गर्भगृह में श्रीराम लला की मूर्ति है और पहली मंजिल पर श्री राम दरबार होगा। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अनुसार, राम मंदिर में 5 मंडप (हॉल) होंगे। इसमें नृत्य मंडप, रंग मंडप, सभा मंडप, प्रार्थना और कीर्तन मंडप।</strong></p>
<figure id="attachment_5211" aria-describedby="caption-attachment-5211" style="width: 790px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/rsz_photo-2024-01-17-14-43-12_1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/rsz_photo-2024-01-17-14-43-12_1.jpg" alt="" width="790" height="675" class="size-full wp-image-5211" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/rsz_photo-2024-01-17-14-43-12_1.jpg 790w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/rsz_photo-2024-01-17-14-43-12_1-300x256.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/rsz_photo-2024-01-17-14-43-12_1-768x656.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 790px) 100vw, 790px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5211" class="wp-caption-text">रामलला का घर</figcaption></figure>
<p>देवताओं, देवी-देवताओं की मूर्तियां मंदिर के स्तंभों और दीवारों को सुशोभित करती हैं। 32 सीढ़ियां चढ़कर श्रद्धालु सिंहद्वार से प्रवेश कर सकेंगे। मंदिर के चारों तरफ आयताकार परकोटा रहेगा। मंदिर में दिव्यांग और बुजुर्ग तीर्थयात्री के लिए भी विशेष सुविधाएं हैं। रैंप और लिफ्ट भी हैं। मंदिर ट्रस्ट का कहना है कि मंदिर के पास एक ऐतिहासिक कुआं (सीता कूप) है, जो प्राचीन काल का है। इसके अलावा, 25,000 लोगों की क्षमता वाला एक तीर्थयात्री सुविधा केंद्र (पीएफसी) का निर्माण किया जा रहा है। यह तीर्थयात्रियों के लिए चिकित्सा सुविधाएं और लॉकर सुविधा प्रदान करेगा। </p>
<p>मंदिर का पारंपरिक नागर शैली में निर्माण हुआ है । मंदिर की लंबाई (पूर्व से पश्चिम) 380 फीट, चौड़ाई 250 फीट और ऊंचाई 161 फीट है। मंदिर तीन मंजिला है, जिसकी प्रत्येक मंजिल 20 फीट ऊंची है। इसमें कुल 392 खंभे हैं। 44 दरवाजे हैं। मुख्य गर्भगृह में भगवान श्रीराम का बचपन का स्वरूप (श्री राम लला की मूर्ति) है, जबकि पहली मंजिल पर श्रीराम का दरबार होगा। पांच मंडप (हॉल) &#8211; नृत्य मंडप, रंग मंडप, सभा मंडप, प्रार्थना और कीर्तन मंडप। मंदिर के चारों तरफ आयताकार परकोटा होगा। </p>
<p>चारों दिशाओं में इसकी कुल लंबाई 732 मीटर और चौड़ाई 14 फीट है। राम मंदिर परिसर के चारों कोनों पर चार मंदिर होंगे, इनमें सूर्य देव, देवी भगवती, गणेश भगवान और भगवान शिव को समर्पित होंगे। उत्तरी भुजा में मां अन्नपूर्णा का मंदिर, जबकि दक्षिणी भुजा में हनुमान जी का मंदिर है। अन्य मंदिर महर्षि वाल्मिकी, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि अगस्त्य, महर्षि विश्वामित्र, निषाद राज, माता शबरी और देवी अहिल्या की पूज्य पत्नी को समर्पित रहेंगे। मंदिर में कहीं भी लोहे का इस्तेमाल नहीं किया गया है।</p>
<figure id="attachment_5212" aria-describedby="caption-attachment-5212" style="width: 854px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/PHOTO-2024-01-17-14-43-18.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/PHOTO-2024-01-17-14-43-18.jpg" alt="" width="854" height="1280" class="size-full wp-image-5212" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/PHOTO-2024-01-17-14-43-18.jpg 854w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/PHOTO-2024-01-17-14-43-18-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/PHOTO-2024-01-17-14-43-18-683x1024.jpg 683w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/01/PHOTO-2024-01-17-14-43-18-768x1151.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 854px) 100vw, 854px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5212" class="wp-caption-text">रामलला का घर</figcaption></figure>
<p><strong>इतिहास </strong></p>
<p>* मीर बाक़ी बाबर के सिपहसलार 1528 &#8211; 29  में बाबरी मजदीद बनबाई। बाबर नाम में बाक़ी ताशकंडी के नाम से उल्लेख है। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि 1529  में बाबर ने उसे सेना से निकाला था। जबकि बाबरनामा में ज़िक्र है कि उसे छुट्टी पर भेजा गया था। </p>
<p>* फ़्रांसीसी बुकानन एक ब्रिटिश सर्वेयर्थे जिन्होंने 1813 -14 में अपनी सर्वे रिपोर्ट में लिखी इसमें पहली बार ज़िक्र किया की अयोध्या में मस्जिद की दीवार पर शिलालेश मिला है जिसमे इसे बाबरी मस्जिद कहा गया है। </p>
<p>* 1885  में महंत  रहुबर दास ने पहली बार मंदिर निर्माण के लिए फैजाबाद सिविल कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका ख़ारिज हो गई लेकिन इससे मंदिर निर्माण की क़ानूनी लड़ाई का रास्ता खुल गया। </p>
<p>* 1949  में मूर्तियाँ प्रकट होने के साथ परमहंश रामचंद्र दास का नाम चर्चा में आया। तब वे हिंदू सभा के नगर अध्यक्ष थे। 1990  में अयोध्या में कार सेवकों को जुटाया। 31  जुलाई 2003  को92  वर्ष की आयु में निधन हो गया। </p>
<p>* 1949  मूर्तियाँ प्रकट होने के बाद दर्ज हुए fir में महंत अभिराम दस का भी नाम था। वे मूलतः बिहार के दरभंगा के थे। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा था कि रामलला ने सपने में आकर अपने जन्म का सटीक स्थान बताया है। </p>
<p>* गोपाल सिंह विशारद ने रामलला के दर्शन और पूजन के व्यक्तिगत आधिकार पर 1950  में फैजाबाद कोर्ट में मुक़दमा दायर किया था। ये राम मंदिर विवाद के शुरुआती चार सिविल मुक़दमों में से एक था। 1986  में उनके निधन के बाद उनके बेटे  राजेंद्र सिंह केस की पैरवी करते रहे। </p>
<p>* के के नायर 1949  में मूर्तियाँ प्रकट होने के वक्त फैजाबाद के ज़िलाधिकारी थे। राज्य सरकार और पंडित नेहरू के कहने पर नायर ने मूर्तियाँ नहीं हटाई थी। 1952  में अवकाश  लेकर जनसंघ के टिकट पर बहराइच के सांसद बने। 7  सितंबर 1977  को उनका देहांत हो गया। </p>
<p>* मंदिर आंदोलन में सक्रिय महंत नृत्य गोपाल आंदोलन का जन्म 11  जून 1938  को मथुरा के कहौला में हुआ था। वे 1990  में कार सेवकों का नेतृत्व किए। ये श्री रामजन्मभूमि ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं। </p>
<p>* 1946 में यूपी के बिजनौर में जन्मे चंपत राय आरएसएस से जुड़े है। संगठन के प्रचारक के तौर पर मंदिर आंदोलन को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई। आज वे रामजन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट के महासचिव हैं। </p>
<p>* 1986  में राजीव गांधी ने गर्भ गृह  का ताला खोलने का आदेश दिया था। सन 1991 में उनकी हत्या कर दी गई। </p>
<p>* 1990  में मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे। उन्हीं के आदेश पर 30  अक्तूबर  1990  को कार सेवकों पर गोलियाँ चली थी । अगले चुनाव में उनकी सरकार नहीं रही। विगत 10  अक्तूबर 2022  को उनका निधन हो गया। </p>
<p>* विश्व हिंदू परिषद के संस्थकों में एक थे अशोक सिंहल। बाबरी मस्जिद ढाँचे के टूटने पर दर्ज प्राथमिकी में इनका भी नाम था। विगत 17 नवम्बर 2015 को इनका निधन हो गया। </p>
<p>* सोमनाथ से लाल कृष्ण आडवाणी ने 25 सितम्बर 1989 को मंदिर के लिये रथ यात्रा शुरू की थी। प्राथमिकी में इनका भी नाम था। आज बीजेपी मार्गदर्शक मण्डल का हिस्सा हैं। आड़नी को पदयात्रा के बजाय रथयात्रा की सलाह प्रमोद महाजन ने थी। </p>
<p>* मुरली मनोहर जोशी मंदिर आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिये। </p>
<p>* नरसिम्हा राव के कार्यकाल में ही 6  दिसंबर 1992  को बाबरी मस्जिद का ढाँचा गिराया गया था। </p>
<p>* कल्याण सिंह उस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री थे जब ढाँचा गिराया गया था। उनका नाम उन 13 लोगों में था । ढाँचा गिरने के बाद उनकी सरकार को बर्खास्त कर दी गई।21  अगस्त 2021  को इनका देहांत हो गया। </p>
<p>* मंदिर आंदोलन में उमा भारती मुख्य वक्ताओं में रहीं। </p>
<p>* बतौर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में ही राममंदिर मामले की सुनवाई में तेज़ी आयी और 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने राम मंदिर निर्माण को मंज़ूरी दे दी। </p>
<p>* सीबीआई कोर्ट के जज एस के यादव 30  सितंबर 2020  को बाबरी ढाँचा गिराए जाने वाले सभी 32  आरोपियों को बरी किया था। अवकाश के बाद वे उत्तर प्रदेश में उप लोकायुक्त बने। </p>
<p>* जस्टिस रंजन गोगाई ने आयोध्य मामले पर फ़ैसला देने वाली पाँच जजों वाली संविधान पीठ की अध्यक्षता की। 17 नबम्बर 2019 को अवकाश के बाद वे राज्य सभा में मनोनीत हुए। </p>
<p>* संविधान पीठ के सदस्य शरद अरविंद बोबडे जस्टिस गोगाई के बाद मुख्य न्यायाधीश बने। 23  अप्रैल 2021 को अवकाश के बाद वे महाराष्ट्र लॉ यूनिवर्सिटी नागपुर के चांसलर बने। </p>
<p>* अयोध्या पर बनी पीठ में जस्टिस धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ भी थे। आज वे मुख्य न्यायाधीश हैं। </p>
<p>* चौथे जज थे अशोक  भूषण। 2021  में अवकाश के बाद वे नेशनल कंपनी लॉ अपीलीय ट्रिब्यूनल का चेयरपर्सन हैं। और अंत में पीठ के पाँचवे जज थे एस अब्दुल नज़ीर । जनवरी 2023  में अवकाश के बाद उन्हें आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/sriram-temple-ayodhya">श्री राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे 🌺 सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने 🙏</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>कोयला तो गुण से &#8216;हीरा&#8217; है, लेकिन लोगों ने उसे &#8216;काला&#8217; शब्द से अलंकृत कर दिया इसलिए जिसे कोयले की नजर लग गई वह गया &#8216;समय से पहले&#8217;, आज झरिया मोड़ और कतरास मोड़ गवाही देता है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 27 Sep 2023 12:42:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>धनबाद (झारखण्ड) : बाबूजी कहते थे कि कोयला काला होता है। काजल भी काला होता है। लेकिन दोनों में मौलिक अंतर यह है कि काजल &#8216;नजर न लगे&#8217;, और &#8216;सुन्दर&#8217; भी दिखें, इसलिए लगाते हैं। जबकि कोयले की नजर बहुत तीख़ी होती है। कोयला को उसके गुण से नहीं, बल्कि संस्कार से लोग उसे &#8216;काला&#8217; [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/crime/bloody-holi-of-dhanbad-coal-belt">कोयला तो गुण से &#8216;हीरा&#8217; है, लेकिन लोगों ने उसे &#8216;काला&#8217; शब्द से अलंकृत कर दिया इसलिए जिसे कोयले की नजर लग गई वह गया &#8216;समय से पहले&#8217;, आज झरिया मोड़ और कतरास मोड़ गवाही देता है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>धनबाद (झारखण्ड) : बाबूजी कहते थे कि कोयला काला होता है। काजल भी काला होता है। लेकिन दोनों में मौलिक अंतर यह है कि काजल &#8216;नजर न लगे&#8217;, और &#8216;सुन्दर&#8217; भी दिखें, इसलिए लगाते हैं। जबकि कोयले की नजर बहुत तीख़ी होती है। कोयला को उसके गुण से नहीं, बल्कि संस्कार से लोग उसे &#8216;काला&#8217; शब्द से अलंकृत कर दिए। वह तो हीरा होता है। और हीरा अपने अपमान का बदला लेने में कोई क्षण नहीं छोड़ता। मौके की तलास उसे हमेशा होता है। यही कारण है कि जिस किसी को कोयले की नजर लग गई उसका अंत निश्चित है &#8211; समय से पूर्व, गाँठ बाँध लो। और इसका गवाह है धनबाद-झरिया का कोयला क्षेत्र उस दिन भी था और आज भी है । जिन्होंने धनबाद को देखा है वे इस बात से भी अवगत होंगे। </strong></p>
<p>पटना की सड़कों पर साठ के ज़माने से अखबार बेचने और फिर सत्तर के दशक के मध्य से अख़बार में नौकरी शुरू कर पत्रकारिता की नींव रखने के क्रम में &#8216;अर्थ&#8217; से धनाढ्य तो नहीं हो पाया, लेकिन विगत वर्षों में जिसे एक बार देख लिया, दशकों बाद भी भुला नहीं पाया। धनबाद का ठांये भी उसी श्रृंखला का एक हिस्सा है। </p>
<p>कोयलांचल की काली, लेकिन रक्तरंजित मिट्टी आज भी पिछले छह दशकों का खुनी इतिहास याद रखे है। धनबाद-झरिया कोयलांचल के बारे में जब भी कोई अख़बार वाला, शोधकर्ता, पत्रकार, लेखक, विश्लेषक धनबाद की खुनी होली के बारे में जानना चाहता है तो वह धनबाद समाहरणालय के वातनुकूलत कक्ष में बैठे अधिकारियों के पास नहीं पहुंचकर, कतरास मोड़ की काली मिट्टी पर पालथी मारकर बैठते हैं। चाय की चुस्की के साथ वहां की मिटटी एक-एक घटना को प्रत्यक्षदर्शी होने का गवाही देती है। उस ज़माने में इतने मंहगे हथियार भी उपलब्ध नहीं थे। उधर विदेशी मौद्रिक बाजार में भारतीय रुपये का मोल बढ़ रहा था, स्थित होता था, इधर कोयलांचल में कोयले की नजर लगे लोगों की जिंदगी सस्ती होती जा रही थी &#8211;  ठांये ठांये ठांये। </p>
<p>कतरास मोड़ की मिटटी कहती है कि सन 1967 में रामदेव सिंह, फिर 1967 में ही चमारी पासी, 1977 में श्रीराम सिंह की हत्या हुई। सं 1978 में बीपी सिन्हा को गोली मारी गयी। पांच साल बाद सन 1983 में शफी खान, फिर 1984 में मो असगर, 1985 में लालबाबू सिंह, 1986 में मिथिलेश सिंह, 1987 में जयंत सरकार की हत्या हुई। </p>
<p>हत्या का सिलसिला अभी रुका नहीं था। इसके बाद 1986 में अंजार, 1986 में शमीम खान, 1988 में उमाकांत सिंह, 1989 में मो सुल्तान की हत्या हुई। उसी वर्ष 1989 में ही राजू यादव को मौत के घाट उतारा गया। 15 जुलाई, 1998 को धनबाद जिले के कतरास बाजार स्थित भगत सिंह चौक के पास दिन के उजाले में मारुति कार पर सवार कुख्यात अपराधियों ने अत्याधुनिक हथियारों से अंधाधुंध गोलियां चलाकर विनोद सिंह की हत्या कर दी। </p>
<p>चाय की चुस्की लेते कतरास मोड़ की मिट्टी आगे कहती है कि 25 जनवरी, 1999 को दोपहर के लगभग साढ़े बारह बजे सकलदेव सिंह सिजुआ स्थित अपने आवास से काले रंग की टाटा जीप पर धनबाद के लिए निकले ही थे। हीरक रोड पर पहुंचते ही दो टाटा सूमो (एक सफेद) सकलदेव सिंह की गाड़ी के समानांतर हुई। सूमो की पिछली खिड़की का काला शीशा थोड़ा नीचे सरका और उसमें से एक बैरेल सकलदेव सिंह को निशाना साधकर दनादन गोलियां उगलने लगी। जवाब में सकलदेव सिंह की गाड़ी से भी फायरिंग होने लगी। दोनो गाड़ियां काफी तेज चल रही थी और साथ में फायरिंग भी हो रही थी और अंतत : बंदूक की गोलियों ने सकलदेव सिंह को हमेशा के लिए खामोश कर दिया। </p>
<p>कतरास मोड़ की मिटटी का मानना है कि कोयलांचल में खून की होली के लिए &#8216;होली पर्व&#8217; का होना आवश्यक नहीं है। यहाँ वर्चस्व स्थापित काने के लिए, वर्चस्व बनाये रखने के लिए कभी भी, कहीं भी खून की होली हो जाती है। सं 1994 में मणींद्र मंडल, 1998 मो नजीर, 1998 में ही विनोद सिंह की हत्या हुई। सन 2000 में रवि भगत, 2001 जफर अली और नजमा व शमा परबीन, 2002 गुरुदास चटर्जी की हत्या हुई। उसी वर्ष 2002 में ही सुशांतो सेनगुप्ता की हत्या हुई। सन 2003 प्रमोद सिंह, फिर 2003 में राजीव रंजन सिंह, 2006 में गजेंद्र सिंह, 2009 में वाहिद आलम, 2011 में इरफान खान, सुरेश सिंह, 2012 में इरशाद आलम उर्फ सोनू और 2014 में टुन्ना खान तथा 2017 में रंजय सिंह की हत्या हुई। </p>
<p>आठ दिसंबर, 2011 की रात लगभग साढ़े नौ बजे करोड़पति कोयला व्यवसायी और कांग्रेस नेता सुरेश सिंह (55) की धनबाद क्लब में गोली मार कर हत्या कर दी गयी। इतना ही नहीं, अनेकों बार एस के राय जो इंटक के नेता भी थे, पर हमला हुआ। कोयलांचल की इसी खुनी होली और कोयले से कमाई के कारण ही बिनोद बिहारी महतो,  शिबू सोरेन आदि नेता भी बने। इसी कमाई के कारण अविभाजित बिहार और बाद में झारखण्ड के साथ-साथ देश के सभी राज्यों के नेताओं की नजर, केंद्र में बैठे मंत्रियों की पैनी नजर इस काले सोने की ओर लगी होती है। काला होने के बाद भी सभी इसे प्यार करते हैं। </p>
<figure id="attachment_5136" aria-describedby="caption-attachment-5136" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/2.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/2.jpeg" alt="" width="1200" height="800" class="size-full wp-image-5136" /></a><figcaption id="caption-attachment-5136" class="wp-caption-text">धनबाद का जलता कोयला खदान</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, आज जब सुना की तत्कालीन कोयला माफिया सूर्यदेव सिंह के भाई को बाहुबली रामधीर सिंह को धनबाद की एक अदालत ने विनोद सिंह हत्याकांड के मामले में कोई रियायत नहीं दी, कोयलांचल में प्रचलित शक्क्ति-युद्ध याद आ गया। रामधीर सिंह धनबाद के एक अन्य कोयला माफिया और सत्तर-अस्सी-नब्बे के ज़माने के बाहुबली सकलदेव सिंह और उनके भाई बिनोद सिंह की हत्या का अपराधी थे। </p>
<p>वैसे 25 जनवरी 1999 को भूली मोड़ के पास सकलदेव सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, उस मुकदमें में धनबाद के जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रिजवान अहमद की अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए उनकी रिहाई का फैसला सुनाया था, लेकिन आज वे बिनोद सिंह हत्या कांड के अपराध में कारावास में ही रहे। उन्हें उम्र कैद की सजा है। बिनोद सिंह बिहार जनता खान मजदुर संघ के महामंत्री और जनता दल के नेता सकलदेव सिंह के भाई थे। उनकी हत्या 15 जुलाई, 1998 को की गई। कहते हैं सकलदेव सिंह &#8211; विनोद सिंह के पिता मुखराम सिंह अविभाजित बिहार के छपरा ज़िले के उरहर पुर गांव से धनबाद के सिजुआ आये थे रोजी-रोटी की तलाश में। </p>
<p>प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार 15 जुलाई, 1998 को कतरास हटिया शहीद भगत सिंह चौक के पास ताबड तोड़ गोलियों से हमला कर विनोद सिंह और उनके चालक मन्नु अंसारी को मौत के घाट उतार दिया गया था। उस समय सुबह का कोई 8.40 बजा था। विनोद सिंह कोल डंप जाने के लिए अपनी नई एम्बेस्डर कार से निकले थे। उस कार को मन्नु अंसारी चला रहा था।  पंचगढी बाजार में गाडियां जाम में थोडी देर फंसी रही। सुबह-सवेरे जैसे ही कतरास हटिया भगत सिंह चौक के पास जैसे ही पहुंचे, एक सादे रंग की मारुति कार दोनों गाडियों को ओवरटेक कर आगे रुकी, मारुति से तीन लोग उतरे और विनोद सिंह की गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। विनोद सिंह और मन्नु खून से लथपथ गिरे हुए थे। कहते हैं उस हमलावरों में रामधीर सिंह और राजीव रंजन सिंह शामिल थे। रामधीर सिंह झरिया के पूर्व विधायक स्वर्गीय सूर्यदेव  सिंह के पांच भाइयों में सबसे छोटे है।  रामधीर  सिंह को &#8216;सिंह मेन्शन&#8217;   के रणनीतिकार के रूप में देखा जाता रहा है। </p>
<p>कहते हैं वे सूर्य देव सिंह के द्वारा स्थापित जनता मजदूर संघ के वह अध्यक्ष भी रह चुके है। लेकिन सजायाफ्ता होने के बाद उन्हें इस पद से हटा दिया गया। विनोद सिंह हत्याकांड में लोअर कोर्ट ने 2015 में रामधीर सिंह को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। डेढ़ साल से अधिक समय तक फरार रहने के बाद उन्होंने धनबाद कोर्ट में सरेंडर किया था। विधि का विधान देखिये उनकी पत्नी इंदू देवी धनबाद नगर निगम की मेयर रह चुकी हैं। विनोद सिंह हत्याकांड में विगत 25 अगस्त को झारखंड हाईकोर्ट की डिवीजन-बेंच ने रामधीर सिंह की अपील पर सुनवाई पूरी कर ली थी और फैसला सुरक्षित रख लिया था। इतना ही नहीं, रामधीर सिंह के बेटे शशि सिंह पर कोयला कारोबारी व कांग्रेस नेता सुरेश सिंह की हत्या का भी आरोप है। सुरेश सिंह की हत्या 7 दिसंबर 2011 को हुई थी। इस हत्या के बाद शशि  सिंह धनबाद से फरार हो गए। धनबाद पुलिस अभी भी शशि सिंह को ढूंढ रही है। सुरेश सिंह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से चुनाव भी लड़ चुके थे। </p>
<figure id="attachment_5138" aria-describedby="caption-attachment-5138" style="width: 750px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/image_750x_63eac146e37f4.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/image_750x_63eac146e37f4.jpeg" alt="" width="750" height="721" class="size-full wp-image-5138" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/image_750x_63eac146e37f4.jpeg 750w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/image_750x_63eac146e37f4-300x288.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/image_750x_63eac146e37f4-24x24.jpeg 24w" sizes="auto, (max-width: 750px) 100vw, 750px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5138" class="wp-caption-text">रामधीर सिंह</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, धनबाद की काली, लेकिन रक्तरंजित मिट्टी इस बात की गवाही आज भी देती है कि कोयले की अवैध कमाई की पृष्ठभूमि 1950 में बिंदेश्वरी प्रसाद सिन्हा @बीपी सिन्हा ने डाली थी। उन दिनों सम्पूर्ण कोयलांचल में  सिन्हा साहब का एकछत्र राज था। सिन्हा साहेब बरौनी के रहने वाले थे और राजनीति में उनकी विशेष पकड़ थी। वे सर्वप्रथम सं 1950 में धनबाद पदार्पित हुए। उनमें बहुत बातें ईश्वरीय थी। लिखना, बोलना जैसा सरस्वती की देन थी। उनका वही आकर्षण तत्कालीन कोलियरी मालिकों को आकर्षित किया। वे इंटक से जुड़े और ताकतवर मजबूत नेता के रूप में उदित हुए। </p>
<p><strong>उसी समय उन्होंने कोयलांचल में युवा पहलवानों की फौज बनाई, जिसमें सूर्यदेव सिंह इनके सबसे विश्वासपात्र थे। इनका इतना दबदबा था कि इन्हीं की मर्जी से कोयला खदान चलती थी। सिन्हा का आवास व्हाईट हाउस के रूप में मशहूर हुआ करता था और पूरे इलाकेे में माफिया स्टाइल में उनकी तूती बोलती थी।</strong> </p>
<p>उस दिन मार्च महीने का 29 तारीख था और साल 1978 था। धनबाद के गांधी नगर स्थित आवास सह कार्यालय में सिन्हा साहेब रेकर्ड प्लेयर पर अपने पोते गौतम के साथ गाना सुन रहे थे। घर में उस वक्त आसपास के चार-पांच लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचे। अचानक दो-तीन लोग बरामदे में पहुंचे और एक ने पूछा साहेब हैं? जवाब हां में मिलने पर वे लोग लौट गये। </p>
<p>इस बीच अचानक बिजली गुल हो गयी और कुछ सेकेंड में बिजली आ भी गयी।  सिन्हा साहेब को पूछने वाले लोग इतने में ही 10-11 व्यक्तियों को साथ ले कर बरामदे में शोर करते हुए प्रवेश किये। शोर सुन कर साहेब पूछते हैं कौन आया है? क्या हो रहा है? जवाब मिलता है डाकू आये हैं। </p>
<p>इतने में सिन्हा साहेब जैसे ही कमरे से बाहर निकलते हैं मोटा सा एक आदमी लाइट मशीन गन से गोलियों की बौछार करने लगा । करीब सौ गोलियां चली । सिन्हा साहेब के शरीर को तब तक कई गोलियां बेध चुकी होती थी। सिन्हा साहेब खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़े थे। शरीर पार्थिव हो गया था। उस वक्त उनकी उम्र करीब 70 साल रही होगी। पूरे धनबाद ही नहीं, कोयलांचल से लेकर कलकत्ता तक, धनबाद से लेकर पटना के रास्ते दिल्ली तक कोहराम मच गया। </p>
<p><strong>सिन्हा साहेब की हत्या धनबाद कोयलांचल में कोयला माफिया और राजनीति के गंठबंधन के इतिहास की पहली बड़ी घटना थी। बंदूक व बाहुबल की ताकत के समानांतर ताकत रखने वाले सिन्हा साहेब की हत्या में उनके करीबी कई लोगों का नाम आया। सिन्हा साहेब का &#8216;अंत&#8217;, सूर्यदेव सिंह का &#8216;सूर्योदय&#8217; था। सम्पूर्ण कोयलांचल सूर्यदेव सिंह की ऊँगली पर चलने लगी और भारत कोकिंग कोल मुख्यालय जाने के प्रवेश द्वार से कोई 100 कदम पर स्थित सिंह मैंशन इतिहास रचना प्रारम्भ कर दिया।</strong> </p>
<p>कहा जाता है कि मजदूरों को काबू में रखने के लिए इन्होंने पांच लठैतों की एक टीम बनाये थे। इसमें बलिया के रहने वाले सूर्यदेव सिंह और स्थानीय वासेपुर के शफी खान आदि शामिल थे। उसी समय से उनकी दुश्मनी वासेपुर के शफी खान गैंग्स से शुरू हुई। सिन्हा साहेब की हत्या में सूर्यदेव सिंह का नाम आया था, लेकिन कुछ समय बाद वे इस काण्ड से बरी हो गए।</p>
<figure id="attachment_5139" aria-describedby="caption-attachment-5139" style="width: 640px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/013.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/013.jpg" alt="" width="640" height="854" class="size-full wp-image-5139" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/013.jpg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/013-225x300.jpg 225w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5139" class="wp-caption-text">सूर्यदेव सिंह (दिवंगत)</figcaption></figure>
<p>उन दिनों सूर्यदेव सिंह अपने उत्कर्ष पर थे। उत्तर प्रदेश के बलिया से आकर एक साधारण कोयला मजदूर के रूप में काम शुरू करने वाले सूर्यदेव सिंह ने कोयला मजदूरों की ट्रेड यूनियन की अगुवाई कर इतनी शोहरत हासिल की कि धनबाद की धरती पर पत्ता भी उनकी इक्षा के बिना नहीं हिलता था। जितने दबंग, उतने ही सामाजिक कार्यों में रुचि दिखाने वाले सूर्यदेव सिंह की लोकप्रियता का आलम रहा। चंद्रशेखर अब तक प्रधान मंत्री बने नहीं थे और जब प्रधानमंत्री बने तब भी सूर्यदेव सिंह को अपना परम-मित्र ही माना और कहा भी। चंद्रशेखर से नजदीकी के कारण उनका राजनीतिक रसूख परवान पर था। 1977 में सूर्यदेव सिंह पहली बार झरिया से विधायक बने। </p>
<p>उनकी मौत के बाद बच्चा सिंह उस सीट से विधायक बने। उसके बाद सूर्यदेव सिंह की पत्नी कुंती सिंह और अभी उनके बेटे संजीव सिंह झरिया से विधायक बने। सन 1977 से 2014 तक के विधान सभा चुनाव में झरिया विधान सभा सीट पर हमेशा सिंह मेंशन परिवार का ही कब्ज़ा रहा। केवल 1995 में राजद के टिकट पर आबो देवी को इस सीट से जीत मिल सकी थी। नवम्बर 1990 में जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे, तब वह सूर्यदेव सिंह से मिलने धनबाद आये थे। जून 15 सन 1991 में हार्ट अटैक से हुई उनकी मौत के बाद परिवार के बीच ही विवाद हो गया और सभी भाइयों के बीच वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई।  </p>
<p>सूर्यदेव सिंह के निधन के बाद उनकी पत्नी कुंती देवी को लोगों ने धनबाद जिले के झरिया विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक बनाया। उनकी राजनीतिक जमीन झरिया में इतनी पुख्ता थी कि उनके बेटे संजीव सिंह को लोगों ने विधानसभा भेजा। सूर्यदेव सिंह का धनबाद में बना आवास सिंह मेंशन आज भी है, फर्क सिर्फ इतना ही है कि सिंह मेंशन में रहने वाले पांच भाइयों में चार का कुनबा आज बिखर गया है। सूर्यदेव सिंह पांच भाई थे। विक्रमा सिंह अपने पैतृक गाँव बलिया में ही रह गये। जबकि राजन सिंह, बच्चा सिंह और रामधीर सिंह सूर्यदेव सिंह के साथ रहे। बाद में बच्चा सिंह ने सूर्योदय बना लिया तो राजन सिंह के परिवार ने रघुकुल। रामधीर सिंह का बलिया-धनबाद आना-जाना लगा रहा, लेकिन उनकी पत्नी इंदू देवी और बेटा शशि सिंह मेंशन में ही रहते हैं। </p>
<p>सिंह मेंशन हमेशा सुर्खियों में रहा और कोयला कारोबार से लेकर राजनीति तक इस परिवार का दबदबा रहा। एक रिपोर्ट के अनुसार सियासत में मजबूत दखल का प्रमाण यह है कि धनबाद नगर निगम की कुर्सी इन्हीं परिवारों के बीच रही। धीरे-धीरे नीरज सिंह भी राजनीति में तेजी से उभरने लगे। पिछले विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से खड़े हुए थे, जबकि उसके चचेरे भाई संजीव सिंह भाजपा के टिकट पर।  इस चुनाब के बाद परिवार के बीच विवाद और खुलकर सामने आ गया। नीरज सिंह 2019 के लोकसभा चुनाव में खड़े होने वाले थे, लेकिन नीरज सिंह की हत्या करा दी गई। </p>
<p>माना जा रहा है कि कोयले की लोडिंग प्वाईंट पर आउटसोर्सिंग कंपनियों पर कब्जे को लेकर हत्या हुई। आउटसोर्सिंग पर वर्चस्व के लिए बात-बात पर खून की होली खेली जाती है। यह भी कहा जाता है कि आउटसोर्सिंग कम्पनियां कमीशन के रूप में करोड़ों रुपए माफिया को देती हैं और इसके बदले माफियाओं द्वारा इनको सुरक्षा प्रदान की जाती है। यह भी कहा जाता है कि कोयलांचल में पदस्थापित पुलिस अधिकारियों की कमाई करोड़ों में होती है और ये धंधा बेरोकटोक चलता है।</p>
<p>एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार कोयलांचल में आठ बड़े गैंग में चार सौ करोड़ रुपए से भी अधिक की रंगदारी को लेकर खूनी खेल चलता रहता है। पिछले तीन दशकों में 350 से भी ज्यादा लोगों की हत्याएं माफियाओं ने कर दी, जबकि छोटे-छोटे प्यादे तो लगभग रोज ही मारे जाते हैं। कोयलांचल में 40 वैध खदाने हैं, जबकि इससे कहीं अधिक अवैध खनन। इन वैध खदानों से लगभग 1.50 लाख टन कोयले का उत्पादन होता है, जबकि इस उत्पादन में लोडिंग, अनलोडिंग और तस्करी में लगभग 400 करोड़ रुपए की रंगदारी माफिया के गुर्गे करते हैं। वैसे पिछले 50 साल से कोयलांचल में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है,  हर रोज एक छोटा गैंग उभरकर सामने आ जाता है। पर कोयलांचल में अभी भी ‘‘सिंह मेंशन’’ का ही दबदबा है, अब फर्क सिर्फ यह हो गया है कि सिंह मेंशन में भी बंटवारा हो गया और चारों भाईयों एवं उनके बेटों का अलग गैंग हो गया है। </p>
<p>इतने समय के बाद भी, इतने पैसे के बाद भी, इतनी हत्याओं के बाद भी, इतने नेताओं की उपस्थिति के बाद भी धनबाद में कोई ‘आमूल’ परिवर्तन नहीं हुआ। जिस अधिकारी के सेवा काल में सूर्यदेव सिंह पर कमान कैसा गया, सैकड़ों अधिकारी आये, दर्जनों डिप्टी कमिश्नर बदले गए, दर्जनों पुलिस अधीक्षक आये-गए; सैकड़ों – हज़ारों नेता बने, कोई पटना एक्सपोर्ट हुए तो कोई रांची और कोई दिल्ली; लेकिन हमारे शहर में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। आज भी गरीबी उतनी है है, आज भी कुत्तों के साथ जी बच्चे खाते हैं। पढ़ने के लिए स्कूल नहीं भेज पाते माता-पिता। इन सभी दृश्यों को अपने कैमरे में क्लिक-क्लिक करते, अख़बारों में छापते लगता जीवन गुजर गया, लेकिन उनके चेहरों पर आज तक हंसी नहीं देख पाया हूँ। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/crime/bloody-holi-of-dhanbad-coal-belt">कोयला तो गुण से &#8216;हीरा&#8217; है, लेकिन लोगों ने उसे &#8216;काला&#8217; शब्द से अलंकृत कर दिया इसलिए जिसे कोयले की नजर लग गई वह गया &#8216;समय से पहले&#8217;, आज झरिया मोड़ और कतरास मोड़ गवाही देता है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>#भारतकीसड़कों से #भारतकीकहानी (4) ✍️ लालकुआं (गाजियाबाद)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 28 Aug 2022 08:24:36 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi]]></category>
		<category><![CDATA[ghaziabad]]></category>
		<category><![CDATA[history]]></category>
		<category><![CDATA[independence]]></category>
		<category><![CDATA[lalkuaan]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मैं जानता हूँ कि भारत की कुल आवादी में मेरा स्थान कीड़े-मकोड़ों जैसा भी नहीं है, नगण्य है, शून्य है। चाहे सामाजिक हो, आर्थिक हो, सांस्कृतिक हो, बौद्धिक हो या फिर कुछ और जो मापदंड के आधार पर मनुष्य को पृथक कर &#8216;संभ्रांत&#8217; बनता है। सामाजिक क्षेत्र के इस ऐतिहासिक स्थान (फेसबुक) पर यह बात [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मैं जानता हूँ कि भारत की कुल आवादी में मेरा स्थान कीड़े-मकोड़ों जैसा भी नहीं है, नगण्य है, शून्य है। चाहे सामाजिक हो, आर्थिक हो, सांस्कृतिक हो, बौद्धिक हो या फिर कुछ और जो मापदंड के आधार पर मनुष्य को पृथक कर &#8216;संभ्रांत&#8217; बनता है। सामाजिक क्षेत्र के इस ऐतिहासिक स्थान (फेसबुक) पर यह बात लिखते मुझे तनिक भी संकोच नहीं हो रहा है, शर्म नहीं हो रहा है। </strong></p>
<p>लेकिन, मैं यह भी जानता हूँ कि भारत के कुल 135 करोड़ की आवादी में &#8220;मैं&#8221; &#8220;अकेला&#8221; व्यक्ति हूँ, &#8220;पत्रकार&#8221; हूँ (जहाँ तक मैं समझता हूँ) जो सन 1857-1947 जंगे आज़ादी में अपने प्राणों को उत्सर्ग करने वाले क्रांतिकारियों के आज के वंशजों को ढूंढकर, अपने सामर्थ भर किताबों से उनकी जिंदगियों में मुस्कान ला रहा हूँ। सुबह-सवेरे जब आईने में अपनी छवि देखता हूँ तो अपने पूर्वजों, माता-पिता, गुरुजनों द्वारा प्रदत ज्ञान और संस्कारों पर नाज होता है, गर्व महसूस करता हूँ, फर्क से सर ऊँचा रहता है। खैर। </p>
<p>मैं जहाँ बैठा हूँ वह स्थान भारतीय स्वाधीनता संग्राम का एक अहम् स्थान है। यह है ऐतिहासिक #लालकुआं, देश की राजधानी दिल्ली से कोई 25 किलोमीटर दूर दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ सड़क पर स्थित है यह स्थान। कभी यह किसानों के लिए उन्नत इलाका हुआ करता था। सड़क के दोनों तरफ दूर-दूर तक हरियाली नजर आती थी। फसल लगे होते थे। किसानों के चेहरों पर मुस्कान होता था। आज लालकुआं एक औद्योगिक क्षेत्र हो गया है। पूर्व-प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की दूरगामी सोच के कारण आज दिल्ली-मेरठ की दूरी न्यूनतम हो गयी है, सोच से परे । </p>
<p><iframe loading="lazy" title="#भारतकीसड़कों से #भारतकीकहानी (4) ✍️ लालकुआं (गाजियाबाद)" width="696" height="392" src="https://www.youtube.com/embed/8oWWV5BZBaE?start=138&#038;feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture" allowfullscreen></iframe></p>
<p>ऐतिहासिक दृष्टि से सन 1857 #मेरठक्रांति के बाद जब दिल्ली पर धाबा बोला गया था, हज़ारों-हज़ार क्रांतिकारी जब गाजियाबाद के रास्ते मेरठ से दिल्ली स्थित लालकिला की ओर निकल पड़े थे, इस स्थान के पास सैकड़ों क्रांतिकारी मृत्यु को प्राप्त हुए। तत्कालीन ब्रितानिया हुकूमत के अफसरान, पुलिस अधिकारी उन क्रांतिकारियों को मृत्यु के घाट उत्तर दिए थे। क्रांतिकारियों का लहू-लहान पार्थिव शरीर इसी कुएं में फेंका गया था। उन दिनों खेतों के बीचोबीच यह कुआ था। इस कुएं के पानी का प्रयोग किसान पीने के लिए करते थे। दिल्ली का रास्ता भी उन्हीं खेतों के बीच से निकलता था जहाँ किसानों के पसीने से फसल लहराते थे। लेकिन उस दिन खून से लथपथ क्रांतिकारियों का पार्थिव शरीर इस कुएं के पानी को लाल कर दिया था। मेरठ का यह हिस्सा लाल कुआं के नाम से विख्यात हुआ। इस ऐतिहासिक कुएं की जो दशा वर्तमान में हैं, यह इसका हकदार नहीं है। </p>
<p>सन 1857-1947 के क्रांतिकारियों के वंशजों की खोज से संबंधित हमारे दो दशक पुराने प्रयास का मानना है कि यह महज एक कुआं नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत का आराध्य है। सैकड़ों लोगों ने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों को यहाँ की मिट्टी को अर्पित किया है, अपने लहू से मिट्टी को, कुएं को स्नान कराया है, तभी यह स्थान लाल कुआं कहलाया। इसका बेहतरीन रख-रखाव आज की पीढ़ी कर सकती है, कल की पीढ़ी को भारत का इतिहास सुपुर्द करने के लिए। </p>
<p>एक भारतीय होने के नाते, एक पत्रकार होने के नाते, मैं अपने कर्म का निर्वाह कर रहा हूँ। अब तक सन 1857-1947 क्रांति के 75 शहीदों के वंशजों को ढूंढा हूँ भारत में। छः किताबों से छः परिवारों का जीवन भी बदला हूँ। शेष आप सभी विद्वान, विदुषी हैं🙏</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/bharat-ki-sadkon-se-bharat-ki-kahani4">#भारतकीसड़कों से #भारतकीकहानी (4) ✍️ लालकुआं (गाजियाबाद)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8216;पूस की वह रात&#8217;, प्रसव-पीड़ा में &#8216;अर्ध मृत&#8217; वह महिला, उसकी नाभि से जुड़ा &#8216;निष्प्राण&#8217; वह नवजात शिशु और श्रीमती श्यामा देवी का ईश्वरीय अवतरण &#8211; एक समर्पण</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/book/half-dead-woman-lifeless-newborn-and-the-devine-incarnation-of-smt-shyama-devi</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 18 May 2022 04:34:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[किताब]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[gopal]]></category>
		<category><![CDATA[history]]></category>
		<category><![CDATA[humanity]]></category>
		<category><![CDATA[journalism]]></category>
		<category><![CDATA[journalist]]></category>
		<category><![CDATA[life]]></category>
		<category><![CDATA[pandit]]></category>
		<category><![CDATA[tribute]]></category>
		<category><![CDATA[ujaan]]></category>
		<category><![CDATA[village]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>ग्राम &#8211; उजान (दरभंगा) : धनपत राय श्रीवास्तव का &#8216;हल्कू&#8217; गरीब किसान &#8216;पूस की उस रात&#8217; में बेहद खुश था। वजह भी था। &#8216;हल्कू&#8217; कर्ज से गर्दन भर डूबा था। उधर मालिक &#8216;सहना&#8217; का कर्जा अलग। हड्डी-पसली कपाने वाली &#8216;पूस की उस रात&#8217; में भी &#8216;हल्कू&#8217; को अपने मालिक का कर्ज चुकाने के लिए खेत [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/book/half-dead-woman-lifeless-newborn-and-the-devine-incarnation-of-smt-shyama-devi">&#8216;पूस की वह रात&#8217;, प्रसव-पीड़ा में &#8216;अर्ध मृत&#8217; वह महिला, उसकी नाभि से जुड़ा &#8216;निष्प्राण&#8217; वह नवजात शिशु और श्रीमती श्यामा देवी का ईश्वरीय अवतरण &#8211; एक समर्पण</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>ग्राम &#8211; उजान (दरभंगा) : धनपत राय श्रीवास्तव का &#8216;हल्कू&#8217; गरीब किसान &#8216;पूस की उस रात&#8217; में बेहद खुश था। वजह भी था। &#8216;हल्कू&#8217; कर्ज से गर्दन भर डूबा था। उधर मालिक &#8216;सहना&#8217; का कर्जा अलग। हड्डी-पसली कपाने वाली &#8216;पूस की उस रात&#8217; में भी &#8216;हल्कू&#8217; को अपने मालिक का कर्ज चुकाने के लिए खेत की रखवाली करना पड़ता था। &#8216;हल्कू&#8217; और उसकी पत्नी &#8216;मुन्नी&#8217; जो भी काम करते है, उसका अधिकांश हिस्सा उसके मालिक के पास जाता है। क्योंकि उधार के पैसे पर ब्याज दर इतनी अधिक थी कि &#8216;हल्कू&#8217; को लगता था कि वह पूरा कर्ज कभी नहीं चुका पाएगा। </strong></p>
<p>काफी मेहनत-मसक्कत करने के बाद &#8216;हल्कू&#8217; तीन रुपये बचा पाया था उस समय। उसे उस पैसे की बहुत जरूरत भी थी &#8211; एक कम्बल खरीदने के लिए। रात में बहुत ठंड लगती थी। &#8216;हल्कू&#8217; की पत्नी इस तीन रुपये को &#8216;सहना&#8217; को तत्काल नहीं देना चाहती थी। घर में अनाज का एक दाना भी नहीं था। एक तो ठंढ और उस पर पेट-पीठ एक। शरीर में उस ठंढ को बर्दाश्त करने की ताकत भी नहीं थी। लेकिन &#8216;हल्कू&#8217; उस पैसे को &#8216;सहना&#8217; को दे देना चाहता था। वह अपनी पत्नी से बारम्बार कह रहा था कि &#8216;रातों में ठंड को बर्दाश्त कर लेंगे, ठंड रातें मालिक की प्रताड़ना से बेहतर हैं,&#8217; और फिर वह तीन रुपये सहना को दे दिया। </p>
<p>अँधेरी और बेहद सर्द रात में &#8216;हल्कू&#8217; धूम्रपान करते हुए खेत पर अपने भाग्य को कोस रहा था। कभी अपने शरीर के बीच अपना चेहरा छुपा लेता था, तो कभी हाथ रगड़ता था, ताकि कहीं से कोई गर्मी प्राप्त हो जाय। उस रात वह मनुष्य और पशु के बीच के सारे भेदों को भुलाकर कुत्ते को अपने बिस्तर पर बुला लिया, उसे गले से लगाया। कुत्ते की शरीर से &#8216;हल्कू&#8217; को थोड़ी गर्मी मिली। लेकिन कुत्ते को खेत में किसी की आहट सुनाई दी और वह खेत की ओर भौंकते दौड़ गया। </p>
<p>&#8216;हल्कू&#8217; अपने भाग्य को कोसते सुबह का इन्तजार कर रहा था। इस बीच बगल के आम के बगीचे से वह आम के सूखे पत्ते लाता है और उसमें आग लगाता है। कुत्ता को भी अपने पास लाता है। कुछ पल ही सही, गर्मी दोनों महसूस करते हैं। ठंड की उस रात में शरीर गर्म होते ही उसकी आखें लग जाती है और इस बीच नील गाय &#8216;सहना&#8217; की खेत पर हमला बोल देती है। कुत्ता अपनी वफ़ादारी निभाता रहता है, भौंकता रहता है; लेकिन &#8216;हल्कू&#8217; का शरीर पूस की उस रात में गर्म होने के कारण जमीन पर ही सही, गहरी नींद में सोया रहता है। </p>
<p>जब सुबह होती है, &#8216;हल्कू&#8217; की पत्नी सम्पूर्ण दृश्य को देखकर उदास हो जाती है। लेकिन &#8216;हल्कू&#8217; मन-ही-मन बहुत खुश था  &#8211; अब उसे पूस की ऐसी पसली में छेद करने वाली रात में &#8216;सहना&#8217; की खेत का रखवाली नहीं करना होगा। अलबत्ता, मेहनत, मजदूरी, मसक्कत करके वह कर्ज चुका देगा। आज से कोई सौ-वर्ष पहले सन 1921 के आस-पास धनपत राय श्रीवास्तव यानी मुंशी प्रेमचंद ने &#8216;पूस की रात&#8217; की इस मार्मिक कहानी को शब्द बद्ध किये थे। एक लाचार मनुष्य की कहानी को समाज के सामने रखे थे। कहानी कृषि और किसानों की थी। आज सौ साल बाद भी किसानों की स्थिति में कोई बेहतर सुधार नहीं हो पाया है। खैर। </p>
<p><strong>मुंशी प्रेमचंद की इस &#8216;पूस की रात&#8217; कहानी के कोई 38-वर्ष बाद दरभंगा जिला के उजान गाँव के कनक पुर टोल में दिवंगत पीताम्बर झा के पुत्र गोपाल दत्त झा के घर में एक बालक का जन्म होता है। जब वह बालक अपनी माँ के गर्भ से महादेव रचित इस संसार में अपना पहला कदम रखता है, वह &#8216;रात भी पूस&#8217; की ही थी। उस रात भी हार-मांस गला देने वाली ठंड नेपाल की तराई वाले हिस्से को दबोचे हुए थी। इधर माँ के गर्भ से उस बच्चे का जन्म होता है और उधर कर्ज में डूबे &#8216;हल्कू&#8217; जैसे उस बालक के पिता की पत्नी प्रसव में मरणासन्न हो जाती है। कई दिनों से प्रसव-काल में उपयुक्त भोजन उसके गले से नीचे नहीं उतरा था। अन्न के अभाव में &#8216;हल्कू&#8217; की पत्नी &#8216;मुन्नी&#8217; से भी बत्तर उस महिला की आर्थिक, सामाजिक स्थिति थी। रात काफी गहरी थी। सन्नाटा चतुर्दिक था। गाँव में, आस-पास के फूस के घरों के दरवाजे बंद थे। सबों के घरों के बाहर दालानों पर घरों की रखवाली करने वाले कुत्तों का परिवार भी &#8216;गर्म-कोना&#8217; ढूंढकर सोया था अपने-अपने बच्चों के साथ।</strong> </p>
<figure id="attachment_4032" aria-describedby="caption-attachment-4032" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji.jpeg" alt="" width="2048" height="1397" class="size-full wp-image-4032" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji-300x205.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji-1024x699.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji-768x524.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji-1536x1048.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/maa-babuji-218x150.jpeg 218w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4032" class="wp-caption-text">विश्व कि सबसे सुन्दर महिला और प्रखर, ओजस्वी पुरुष, मेरे सर्वश्रेठ गुरु &#8211; दिवंगत माता-पिता</figcaption></figure>
<p>लेकिन उस रात प्रसव-पीड़ा से बेहोश हुई उस महिला की एक शुभेक्षु, जो उम्र में तो छोटी थी ही उससे, उसके बहुत बाद बहु बनकर आई थी उस गाँव में, उस परिवार में; परन्तु उस प्रसव वाली महिला से &#8216;अन्तःमन&#8217; से एक ऐसी तार से जुड़ी थी, जो उसे तत्काल सचेत कर रहा था, सजग रख रहा था &#8211; कहीं कोई &#8216;अपसकुन&#8217; न हो जाय। कहीं किसी की साँसे न रुक जाय। डाक्टर डी.स्कॉट नामक मनोवैज्ञानिक ऐसी अवस्था को &#8216;टेलीपैथी&#8217; कहते हैं जब दो मनुष्य &#8216;भावनात्मक&#8217; रूप से एक दूसरे से जुड़े होते हैं, उनके मष्तिष्क में एक &#8216;आतंरिक तरंग&#8217; उत्पन्न होते रहते हैं जो समय विशेष पर प्रकट कर देता है। </p>
<p><strong>सन 1959 में &#8216;पूस की उस रात&#8217; को भी कुछ वैसी ही घटना हुई थी श्रीमती श्यामा देवी @ श्रीमती चन्द्रिका देवी के साथ &#8211; इनके मस्तिष्क में उस प्रसव पीड़ा से ग्रसित महिला के प्रति। अगर उस क्षण यह उपस्थित नहीं होती तो शायद न नवजात शिशु अगला सांस ले पाता और ना ही प्रसव-पीड़ा में अर्ध-मृत हुई वह महिला। माँ की नाभी से जुड़ा (शहरों में लोग एमिकल कॉड कहते हैं) वह बच्चा भी शेष बची सांसों को एमिकल कॉड से जुड़े अपनी माँ के साथ लेते महादेव के शरण में उपस्थित हो जाता &#8211; जीवन की शुरुआत करने से पूर्व ही जीवन का अंत हो जाता। लेकिन जच्चा-बच्चा दोनों महादेव की नजर में था और महादेव श्रीमती श्यामा देवी जी के मष्तिष्क में उस महिला के दर्द के प्रति एक तरंग उत्पन्न कर रहे थे। </strong></p>
<p>फिर अचानक श्रीमती श्यामा देवी उस अर्धमृत जच्चा-बच्चा के सामने प्रकट होती हैं। चिल्लाती हैं, अगल-बगल की महिलाएं कुछ काल बाद उपस्थित होती हैं। अब तक पुरुष समुदाय के लोग भी बाहर एकत्रित हो जाते हैं। श्रीमती श्यामा देवी सर्वप्रथम &#8216;उस बच्चे की नाभी&#8217; काटती हैं, पोछती हैं और फिर अपने स्तन से चिपका लेती है। अब तक कोई आवाज नहीं उस बच्चे के मुख से । अन्य महिलाएं उस महिला को सजग कर, सेवा-शुश्रूषा करती हैं ताकि वह मन और शरीर से जीवित&#8217; हो सके। अचानक श्रीमती श्यामा देवी की स्तन से चिपका वह बच्चा पूस की उस रात की सन्नाटे को चिरता चिल्लाता है। उसकी माँ की सांसे जीवित होती है। खून के सम्बन्ध में श्रीमती श्यामा देवी उस बच्चे की &#8216;भाभी&#8217; है और उसकी माँ &#8216;सास&#8217; &#8211; लेकिन अन्तःमन से सम्बन्ध हृदय का रहा और दोनों जीवन भर श्रीमती श्यामा देवी का ऋणी। आज भी है और जीवन की अंतिम सांस तक रहेगा।&#8221; श्रीमती श्यामा देवी महामहोपाध्याय श्री दिगंबर झा (हमारे पितामह श्री पीताम्बर झा के अपने भाई) के पुत्र श्री महाशय बाबू के पुत्र श्री श्रीमंत बाबू की पत्नी थी। </p>
<p><strong>और वह बच्चा&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8221;मैं ही हूँ।&#8221; </strong></p>
<p>माँ अपनी मृत्यु काल तक कहती रही: &#8216;तुम पहला दूध मनोर की माँ का पिये थे। मैं तो बेहोश थी, मरणासन्न। अगर उस क्षण वह नहीं होती तो न तुम होते और ना ही मैं। वह थी कि हम-तुम जीवित रहे। तुम्हारे जन्म के समय गरीबी अपने उत्कर्ष पर थी। घर में अन्न का दाना नहीं होता था। यही कारण है कि गर्भावस्था में तुम्हें भी भर पेट भोजन नहीं मिल सका, और मैं भी खा नहीं सकी। लेकिन जैसे जैसे समय नजदीक आ रहा था, मन में एक विश्वास का जन्म हो रहा था। जिस रात तुम जन्म लिए वह कहीं भी &#8216;अब घर में जश (यश) होगा और तुम &#8216;जशु (यशु) हो गए। कभी भी वे तुम्हें अपनी संतान से अलग नहीं समझी। तुम उनका हमेशा ऋणी रहोगे।&#8221; हमारी पीढ़ी से पहले की पीढ़ियों में श्रीमती श्यामा देवी अंतिम कड़ी हैं। मैं ह्रदय की गहराई से, अन्तःमन से आपको प्रणाम करता हूँ और महादेव से याचना करता हूँ कि आप स्वस्थ रहे।&#8221;</p>
<figure id="attachment_4033" aria-describedby="caption-attachment-4033" style="width: 720px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3d2a2a16-8db9-4cc1-8e2a-03791d517a81-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3d2a2a16-8db9-4cc1-8e2a-03791d517a81-1.jpg" alt="" width="720" height="1280" class="size-full wp-image-4033" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3d2a2a16-8db9-4cc1-8e2a-03791d517a81-1.jpg 720w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3d2a2a16-8db9-4cc1-8e2a-03791d517a81-1-169x300.jpg 169w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3d2a2a16-8db9-4cc1-8e2a-03791d517a81-1-576x1024.jpg 576w" sizes="auto, (max-width: 720px) 100vw, 720px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4033" class="wp-caption-text">श्रद्धेय, आदरणीय श्रीमती श्यामा देवी जिनके कारण आज मैं जीवित हूँ।</figcaption></figure>
<p><strong>आज मुद्दत बाद भाभी श्रीमती श्यामा देवी जी से बात हुई। उन दिनों हम लोगों के छः घरों का आँगन-बाहर लगभग एक था। बाहर दलान का कुछ हिस्सा भले बांस के जाफ़री से बंटा था, लेकिन आँगन की ओर छोटी-मोटी फूस-बांस की भित्ति जैसी थी, जो खुला ही होता था। गाँव से पूर्णिया के रास्ते पटना की ओर अग्रमुख होने से पहले अपने आँगन से दाहिने कोने पर स्थित अमरुद-हरश्रृंगार के पेड़ के नीचे से सबसे पहले श्री छत्रनाथ झा (श्री महाशय बाबू के सबसे छोटे पुत्र और महामहोपाध्याय श्री दिगंबर झा के पौत्र) के आंगन से श्री श्रीमंत भाई (महाशय बाबू के तीसरे पुत्र और महामहोपाध्याय श्री दिगंबर झा के पौत्र) के आंगन में आते थे।</strong> </p>
<p>इस आँगन के बाएं तरफ एक भित्ति वाला फूस का घर होता था, जिसे हम सभी &#8216;भंसाघर&#8217; अथवा &#8216;पूजाघर&#8217; कहते थे। इसी घर में रहती थी &#8216;मैंयाँ&#8217;, जो महाशय बाबू की पत्नी और मेधानाथ झा @ श्री जयंत बाबू, श्री दीवानाथ झा @ श्रीमंत बाबू, श्री चन्द्रनाथ झा @ श्री नांगर बाबू और श्री छत्रनाथ झा @ श्री छतर बाबू की माँ रहती थी। कद-काठी में दुबली-पतली, कम ऊंचाई की गोरी-चिट्टी महिला हमेशा तत्कालीन बच्चों को आशीष देते नहीं थकती थी। इस आँगन से जुड़ा था श्री जयंत बाबू का आँगन। उस ज़माने में श्री जयंत बाबू के आँगन के बाएं कोने पर (विश्राम घर के बगल में) जो रास्ता उनके गौशाला से बाहर दालान पर और फिर अंदर से श्री चन्द्रनाथ बाबू के घर की ओर जाती थी, एक चापाकल हुआ करता था। वैसे श्री चन्द्रनाथ बाबू (मेरे यज्ञोपवित संस्कार में आचार्य भी थे) के आँगन में भी चापाकल था, लेकिन हम बच्चों के लिए श्री जयंत बाबू के आँगन का चापाकल अधिक पहुँच में था। उसे बार-बार चलाने में बहुत ख़ुशी मिलती थी। </p>
<p>उन दिनों श्री रूप नाथ झा @ श्री मुनाई बाबू, श्री जयंत बाबू और श्री चन्द्रनाथ बाबू के घरों को छोड़कर हम तीन घरों में पानी का इस्तेमाल सामने स्थित उसी ऐतिहासिक इनार (कुआं) से होता था &#8211; चाहे पीने के लिए हो, स्नान के लिए हो, रसोई के लिए हो &#8211; इसी इनार का पानी जीवन-रेखा था। मुद्दत बाद आज श्रीमती श्यामा भाभी कहती हैं: &#8220;हम सभी के घरों में इसी इनार का पानी इस्तेमाल होता था। पानी बहुत मीठा था, आज भी है। आज समय बदल गया है। घरों का रूप-स्वरुप भी बदल गया है। स्वाभाविक है घरों के चहारदीवारी के अंदर चापाकल आ गया है और यह इनार धीरे-धीरे अकेले हो गया है। </p>
<p>उन दिनों इनके घर में जो महिला कार्य करती थी, उसका नाम उसके गाँव के गाम से जुड़ा था। वे &#8216;मझोरा वाली&#8217; के नाम से जानी जाती थी। इसी तरह छत्रनाथ बाबू के घर में कार्य करने वाली का नाम था &#8216;कुरसो वाली&#8217; और श्री जयंत बाबू के घर कार्य करने वाली एक वृद्ध महिला थी &#8216;डोमा माय&#8217; &#8211; सबसे बड़ी बात यह थी कि उन सभी महिलाओं को इतना अधिकार था कि वे हम बच्चों को कान पकड़कर दो थप्पड़ रसीद दे और कोई भी, किसी के माता-पिता भी नहीं, चूं शब्द भी नहीं करते थे । लेकिन कभी ऐसा मौका नहीं मिला &#8211; न उसे और न हम लोगों को।  </p>
<p>माँ कहती थी उन दिनों हमारे पुवारिया घर का आँगन के तरफ का बरामदा की ऊंचाई आँगन की सतह से बहुत कम थी। एक सुबह उसी बरामदे पर लेटकर, जिसमें माँ का पैर का हिस्सा आँगन में था, माँ मुझे दूध पीला रही थी। तभी एक विशाल काय &#8216;धामन सांप&#8217; माँ के पैर पर चढ़ते, मुझे लांघते, माँ के स्तन को स्पर्श करते आगे की ओर निकल गया। कहते हैं धामन सांप औसतन महिलाओं की दूध पीते उसे मृत्यु को भी प्राप्त करा देता है। उस क्षण माँ की स्थिति क्या हुई थी यह अपनी अंतिम सांस तक नहीं बता पायी। उस घटना के कई दशक तक, याद करते उसके रोंगटे खड़े हो जाते थे। मृत्यु से कुछ माह पहले माँ उस घटना को फिर दोहराई थी और रोने लगी। कहती थी उस दिन मुझे कुछ हो जाता, कोई बात नहीं, लेकिन अगर सांप तुम्हे कुछ कर देता तो मैं कैसे जी पाती। मैं हँसते हुए कहता था: : मेरा ना शिव है, फिर सर्प मुझे क्यों काटेगा?&#8221; और माँ हंस दी थी। </p>
<p>कोई बारह वर्ष पहले, 2010 में, जिस वर्ष माँ अपनी अनंत यात्रा पर निकली थी, गाजियाबाद स्थित घर में दरवाजे पर खड़ी होकर गाँव जाने की ज़िद कर रही थी। बड़े भाई गाँव में एक बहुत बेहतरीन घर बनाये हैं। मैं उन्हें बार-बार मना कर रहा था।  वह बार-बार कह रही थी &#8216;अगर मृत्यु को भी प्राप्त की तो उसी स्थान पर मरना चाहूंगी जहाँ मैं आयी थी। इस शब्द को सुनकर मुझे हंसी आ गयी। वह हँसते मेरी हंसी का कारण पूछी। </p>
<p><strong>उसे देखते मैंने कहा: मैं अपने पिता का संतान हूँ, उनके भाईयों &#8211; भतीजों का चहेता हूँ जो तंत्र विद्या में महारथ थे। तुम्हारी अंतिम यात्रा उसी स्थान से होगी जहाँ तुम अभी खड़ी हो। समय यही कहता है। तुम विश्व के किसी भी कोने में रहोगी, बाबूजी के पास जाने के लिए, अपने शुभेक्षुओं के पास पहुँचने के लिए, अपने माता-पिता के पास पहुँचने के लिए तुम्हे अपनी यात्रा की शुरुआत इस स्थान से करनी होगी, जहाँ तो अभी खड़ी हो। इस प्रारब्ध को कोई नहीं टाल सकता है। तुम लिख लो।&#8221; माँ मुस्कुरा दी। </strong></p>
<p>जून के महीने में माँ गाँव की ओर कूच की थी। अगस्त में गाँव में उसकी तबियत ख़राब हुई। हृदयाघात का शिकार हुई। मोहन बाबू, बेचन बाबू सभी उसे उसी क्षण मधुबनी लाये। सरकारी अस्पताल की स्थिति नारकीय थी। डाक्टर के स्थान पर &#8216;सुवर&#8217; मरीजों के वार्ड में चार-पांच बार हाल-चाल पूछने सपरिवार आते थे। लाखों मच्छर-कीड़े-मकोड़े भी अस्पताल में अपना साम्राज्य बना लिए थे। देश आज़ाद था। </p>
<p>माँ की सबसे प्रिय भाई और शिक्षक श्री जीवनाथ मिश्र (श्री जीबू बाबू, लालगंज) माँ को देखने आये। माँ की चौथी बेटी ममता मधुबनी में सपरिवार उसकी सेवा में समर्पित थी। अगली दिन मां दिल्ली की ओर रवाना हुई। उसके छोटे पुत्र और मैं साथ थे। सबों को सूचना दे दिया गया था अगर रास्ते में कुछ होता है तो हम बनारस की ओर प्रस्थान कर जाएंगे। लेकिन विधि का विधान तो निश्चित था। गाजियाबाद स्टेशन पर उसके बड़े पुत्र और गाँव के उसके बच्चे-बुतरू उसकी प्रतीक्षा में थे। यहाँ अस्पताल में भर्ती हुई। पांच दिन के बाद डाक्टर के अंतिम शब्द &#8220;घर ले जाएँ और सेवा करें&#8221; &#8211; अंतिम सूचना पर परिचायक था। यह सूचना &#8216;शिक्षक दिवस&#8217; के दिन की थी। कुछ सप्ताह बाद जितिया का पारण था। इस जिस दिन भारत की कोई माँ व्रत तोड़ती है, जिसे वह अपने बच्चों की हिफाजत के लिए रखती है &#8211; पारण के दिन। माँ को गढ़मुक्तेश्वर में गंगा को साक्षी मानकर मुखाग्नि दिया गया। उसका व्रत टूटा और वह अग्नि के रास्ते अपने पति के पास पहुँचने के लिए यात्रा की शुरुआत की। जाते समय उसके चेहरे पर तेज था। अपने संतान से हर माता-पिता हारना चाहता है &#8211; माँ हारकर भी जीत गयी। </p>
<p><strong>समय बीत रहा था। हम सभी तत्कालीन बच्चे भी बड़े हो रहे थे। शिक्षा हेतु स्थानीय उजान मिडिल स्कूल में नामांकन लिया। श्रीमंत बाबू के पुत्रों में चौथा और पांचवा पुत्र &#8211; श्री सेतु नाथ झा (भूंनी) और श्री होत्रीनाथ झा (गुन्नी) &#8211; उम्र में कुछ छोटा होने के बाद भी अन्तःमन से एक-दूसरे के प्रति बहुत समर्पित थे। उन सबों के घरों में चावल की खेती, अरहर की खेती बहुत अधिक होती थी, स्वाभाविक है घर में चावल का खपत भी बहुत अधिक था। हमारे घर की आर्थिक स्थिति धनपत राय के &#8216;हल्कू&#8217; और &#8216;मुन्नी&#8217; से भी बत्तर थी। चावल (भात) या अरहर दाल  मुद्दत हो जाया करता था। </strong></p>
<figure id="attachment_4035" aria-describedby="caption-attachment-4035" style="width: 2000px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1.jpg" alt="" width="2000" height="1500" class="size-full wp-image-4035" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1.jpg 2000w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/IMG_4987-1-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2000px) 100vw, 2000px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4035" class="wp-caption-text">विगत दिनों गाजियाबाद स्थित घर पर मिट्टी की कियारी में मिट्टी खनते समय खुर्पी बारम्बार एक ठोस पदार्थ से टकरा रही थी। धीरे से निकला तो शिवलिंग नुमा दिखा। मैं उसे माँ के द्वारा स्थापित कोई 22-वर्ष पुराना बरगद के वृक्ष के नीचे स्थान सुरक्षित कर दिया &#8211;  हे महादेव !!!</figcaption></figure>
<p>अक्सरहां स्कूल में हम सभी अपना-अपना टिफ़िन बदल लेते थे। बदलने की शुरुआत भुन्नी करता था। उसके टिफ़िन में चावल की रोटी और अन्य स्वादिष्ट पकवान होता था, जबकि मुझे मेरी माँ मकई, गेहूं की रोटी देती थी साथ में कुछ सब्जियां। आज जब श्रीमती श्यामा भाभी से इस बात का जिक्र किया तो &#8216;कुछ पल वे रुक गई। आवाज नहीं आने के बहाने से शायद फोन को होल्ड पर रख दीं। मेरा गला भी अवरुद्ध था। उन दिनों का दृश्य आँखों के सामने था। फिर कहती है: तुमको सभी बातें याद है यह फक्र की बात है। फिर माँ की तरह कहती है की सब समय है। समय प्रत्येक पल परीक्षा लेती है। उस दिन भी लेती थी। लेकिन तुम सभी तैयार रहते थे। आज का जीवन उसी परीक्षा का परिणाम है।&#8221;</p>
<p>उन दिनों जब हम अपने घर से सीधा श्री चन्द्रनाथ बाबू के घर के सामने से होते दाहिने हाथ मुख्य मार्ग पर पहुँचते थे &#8211; जहाँ से दाहिने हाथ शंकरी पोखर की ओर और बाएं गऊटोली होते एक रास्ता (कलमबाग-खेत होते) लोहना रोड स्टेशन की ओर और बाएं अपने मिडिल स्कूल की ओर जाती थी, इसी नुक्कड़ पर दाहिने हाथ एक विशालकाय परिसर में घर था। यहाँ &#8216;दाई मैंय्या&#8221; रहती थी। &#8216;दाई मैंय्या&#8217; श्रीमंत बाबू चारो भाइयों के पिता श्री महाशय बाबू की दूसरी माँ थी। गाँव में &#8216;सतमाय&#8217; कहते हैं। &#8216;दाईं मैंयाँ&#8217; के घर के ठीक सामने सड़क के बाए हाथ एक और वृद्ध विधवा का घर था। हम सभी इन्हे &#8216;काकी-मौसी&#8217; कहते थे। काकी-मौसी हमारे पितामह श्री पीताम्बर झा के भाई नीलाम्बर झा के प्रथम पुत्र की विधवा थी। नीलाम्बर झा के दूसरे पुत्र प्रोफेसर रूप नाथ झा जो न्यायशास्त्र, धर्मशास्त्र, दर्शनशास्त्र और ज्योतिषी के प्रखंड विद्वान थे। वे मिथिला रिसर्च इन्स्टीट्यूट दरभंगा में कुछ समय तक शास्त्रचूडामणि के प्राध्यापक भी थे। लगभग 46-वर्ष पहले, यानी जून 25, 1976 को इनका शरीर पार्थिव हो गया। </p>
<p>आज मुद्दत बाद बाबूजी याद आ गए जब श्री रुपनाथ झा (श्री मुनाई बाबू), जो उनके तंत्र-मन्त्र विद्या के गुरु और आचार्य  भी थे, एक दिन उन्हें दण्डित भी किये थे। मुद्दत पहले जब बाबूजी इस विद्या में महारथ हासिल किये था। एक दिन सत्यनारायण भगवान की पूजा हेतु धोती रंगकर बाहर सूखने दिए थे। घर में कार्य करने वाली एक महिला उस धोती को लेकर चली गयी। पूजा के समय धोती नहीं मिलने पर वे सीधा उस महिला के घर पहुंचे और धोती के बारे में पूछताछ किये। वह महिला नकार गयी। क्रोधित बाबूजी उसे बार-बार कह रहे थे कि धोती दे दो अन्यथा वह तुम्हारे साथ ही जाएगी। ऐसा ही हुआ। </p>
<p>बाबूजी क्रोधित अवस्था में अपने विद्या का प्रयोग किये। उसकी मृत्यु के बाद धोती उसी के घर से निकला। यह बात जब उनके भाई, जो गुरु भी थे, सुने, उन्हें दंड-स्वरुप अपना ही थूक चाटने का आदेश दिया। बाबूजी &#8216;ना&#8217; नहीं कह सकते थे। फिर एक चेतावनी भी दिए &#8211; जीवन में अपनी विद्या को सकारात्मक कार्यों में लगाना और याद रखना अगर तुम ऐसा करोगे तो जिस दिन मैं &#8211; यानी तुम्हारा बड़ा भाई और गुरु &#8211; जाऊंगा उसी दिन कामाख्या देवी का पट खुलेगा, सालाना पर्व के बाद। मेरी मृत्यु के 16-वर्ष बाद, उस तारीख से दो दिन पूर्व तुम अपनी यात्रा शुरू करोगे और उस दिन कामाख्या देवी का पट बंद रहेगा और बंदी का मध्य-दिवस रहेगा। ऐसा ही हुआ।  बाबूजी 23 जून, 1992 को उनके पास पहुंचे। माँ कामाख्या का पट्ट प्रत्येक वर्ष 22-23 और 24 जून का बंद रहता है स्वाजला पर्व के लिए। </p>
<p>बहरहाल, विगत दिनों अपने घर के सामने स्थित को दो-सौ साल पुराना इनार की कहानी लिखने के बाद, दरभंगा के अतिरिक्त नागपुर के एक विद्वद्जन का फोन आया कि वे उजान गाँव के कनकपुर टोल के उस इनार को पुनः जीवित करना चाहते हैं। नागपुर वाले महानुभाव का कहना है कि वे महादेव के अनन्य भक्त है और उनका विश्वास है कि उस क्षेत्र में महादेव के सर्प, गण अवश्य रहे होंगे, होंगे आज भी। उनका कि आज के समय में सरकारी-गैर सरकारी स्त्रोतों से एक और जहाँ पानी का स्त्रोत सामाजिक न रहकर &#8216;व्यक्तिगत&#8217; हो रहा है, जीव-जंतुओं को पीने के लिए पानी की उपलब्धिता नगण्य होती जा रही है। वैसी स्थिति में उस शताब्दी पुराने कुएं को अगर जीवित किया जाता है तो एक ओर जहाँ प्राकृतिक पुरात्तव जीवंत होगा, वहीँ हम मूक-बधिर जीव-जंतुओं के साथ भी न्याय कर  पाएंगे। </p>
<p><strong>आज श्रीमती श्यामा देवी, यानी हमारी पीढ़ी के बच्चों की भाभी, उस पीढ़ी की इकलौती माँ है, महिला है। पंडित लोक नाथ झा यानी लान्हि झा के चार पुत्रों &#8211; महामहोपाध्याय श्री दिगम्बर झा, वैयाकरण श्री पीताम्बर झा, महामहोपाध्याय श्री नीलाम्बर झा, पंडित श्री सीताम्बर झा और एक कन्या महामहोपाध्याय बालकृष्ण मिश्र तथा मही मिश्र की माँ श्रीमती कर्पूरी मिश्राइन &#8211; परिवार की इकलौती चिराग है जो सबों के सर पर आशीष और स्नेह का हाथ रखने का सामर्थ रखती हैं। महामहोपाध्याय श्री दिगम्बर झा की अगली पीढ़ियों में काशी के विद्वान महामहोपाध्याय श्री महाशय झा की मृत्यु आषाढ़ शुक्ल अष्टमी 1952 को हुआ। </strong></p>
<p>महाशय बाबू के अपने बेमातर भाई श्री दया नाथ झा यानि बंसन्त बाबू और उनकी पत्नी मुद्दत पहले मृत्यु को प्राप्त किये। उन्हें पुत्र नहीं था। महाशय बाबू को चार पुत्र था &#8211; श्री मेधा नाथ झा (श्री जयंत बाबू), श्री दीवा नाथ झा (श्री श्रीमंत बाबू), श्री चन्द्र नाथ झा (श्री नांगर बाबू) और श्री छत्र नाथ झा (श्री छतर बाबू) &#8211; ये सभी आज परमात्मा के पास उपस्थित हैं अपनी-अपनी अर्धांगिनियों के साथ। श्री जयंत बाबू के पुत्र श्री योगेश्वर झा (श्री बेचन झा) हैं। श्री श्रीमंत बाबू के पांच पुत्र हुए &#8211; श्री भीम नाथ झा (श्री मोहन बाबू), श्री सोम नाथ झा (श्री लाल बाबू), श्री जगन्नाथ झा (श्री जोहन बाबू), श्री सेतु नाथ झा (श्री भुन्नी बाबू) और श्री होत्री नाथ झा (श्री गुन्नी बाबू) &#8211; इसमें पांचों की अगली पीढ़ी और उसके आगे की पीढ़ियां श्रीमती श्यामा देवी की आशीष से बढ़ रही हैं। इन पांच भाईयों में श्री भीमनाथ झा विगत वर्ष अपने इष्टदेव के पास पहुँचने के लिए यात्रा की शुरुआत कर लिए। </p>
<p>श्री चन्द्रनाथ झा के तीन पुत्र हुए &#8211; श्री महेंद्र नाथ झा (श्री भोगन बाबू), श्री देवेंद्र नाथ झा (श्री चुनचुन बाबू) और श्री कला नाथ झा (श्री मिहिर बाबू) &#8211; आज सभी स्वस्थ हैं और उनकी अगली और आगे की पीढ़ियां श्रीमती श्यामा देवी के आशीष से बढ़ रही है। श्री चन्द्रनाथ बाबू और उनकी पत्नी अब इस संसार में नहीं हैं। महाशय बाबू के सबसे छोटे पुत्र श्री छत्र नाथ झा भी अब इस संसार में नहीं हैं। श्री छत्र नाथ झा के चार पुत्र हुए &#8211; श्री सुशील कुमार झा, श्री सुधीर कुमार झा, श्री सुनील कुमार झा और श्री अनिल कुमार झा। ईश्वर श्री सुनील को अपने पास बुला लिए। मैं दिल्ली में उस क्षण उपस्थित था अपने छोटे भाई के साथ। शेष सभी श्रीमती श्यामा देवी की आशीष से फल-फूल रहे हैं।  </p>
<p>श्री पीताम्बर झा के एक पुत्र श्री गोपाल दत्त झा और श्री गोपाल दत्त झा के तीन पुत्र &#8211; श्री काशीनाथ झा, श्री शिवनाथ झा, श्री गंगा नाथ झा और पांच बेटी। आज श्री गोपाल दत्त झा, उनकी पत्नी श्रीमती राधा देवी और उनकी चार बेटियां इस पृथ्वी पर नहीं हैं। गोपाल दत्त झा के तीनों पुत्रों की अगली पीढ़ी अपने-अपने शैक्षिक क्षेत्रों में अग्रसर हैं। महामहोपाध्याय न्यायिक पंडित नीलाम्बर झा के दूसरे पक्ष में दो बालक थे &#8211; न्याय प्रवर श्री रसिक नाथ झा और न्याय प्रवर प्रोफ़ेसर रूप नाथ झा। श्री रसिक नाथ झा की मृत्यु बहुत पहले हो गयी थी और श्रीमती काकी मौसी उन्हीं की विधवा थीं। पंडित रूप नाथ झा के एक पुत्र श्री श्यामनन्द झा (श्री शास्त्री) हुए। श्री शास्त्री जी ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में पुस्तकालय में थे। आज श्री रूप नाथ झा और श्री शास्त्री जी नहीं हैं। परन्तु इनकी अगली पीढ़ी के वंशज अपने-अपने क्षेत्रों में अग्रसर हैं।</p>
<p>अंततः, आज महामहोपाध्याय श्री दिगम्बर झा, वैयाकरण श्री पीताम्बर झा, महामहोपाध्याय श्री नीलाम्बर झा, पंडित श्री सीताम्बर झा के चौथी-पांचवी-छठी पीढ़ियों के वंशज  पूर्वजों के आशीष से खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं। हमें  विश्वास है कि त्रिनेत्रधारी महादेव सभी महात्मनों को, उनकी अर्धांगिनियों को अपने शरण में स्थान दे दिए होंगे। मुझे यह भी आशा है की महादेव उन महात्मनों के समय का बनाया हुआ इनार भी आने वाले  समय में जीवित हो जायेगा। </p>
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