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	<title>hindi Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>&#8216;मर्दों&#8217; के लिए &#8216;भाई साहब&#8217;, &#8216;जनानियों&#8217; के लिए &#8216;मैडम&#8217; और हिंदी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 02 Mar 2025 06:08:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बहिरा नाचे अपने ताल]]></category>
		<category><![CDATA[hindi]]></category>
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		<category><![CDATA[sammelan]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अपने 16वें जन्मदिन के अवसर पर मैं नहीं जानता था कि आठवें दिन पाटलिपुत्र नरेश महादेव मेरी जीवन रेखा की शुरुआत पटना के मजहरुल हक़ पथ से लिखने जा रहे हैं। मैं इस धरती पर 10 जनवरी 1959 को अवतरित हुआ था । उस दिन 10 जनवरी था और साल था 1975 । तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b2/hindi-and-bhai-saheb-and-madam">&#8216;मर्दों&#8217; के लिए &#8216;भाई साहब&#8217;, &#8216;जनानियों&#8217; के लिए &#8216;मैडम&#8217; और हिंदी</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अपने 16वें जन्मदिन के अवसर पर मैं नहीं जानता था कि आठवें दिन पाटलिपुत्र नरेश महादेव मेरी जीवन रेखा की शुरुआत पटना के मजहरुल हक़ पथ से लिखने जा रहे हैं। मैं इस धरती पर 10 जनवरी 1959 को अवतरित हुआ था । उस दिन 10 जनवरी था और साल था 1975 । तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी विश्व में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए, विश्व की अन्य भाषाओँ के साथ तनकर खड़े होने के लिए महाराष्ट्र के नागपुर में पहला विश्व हिंदी सम्मेलन का उद्घाटन कर रही थी। उस सम्मलेन का आयोजन राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा ने किया था। स्वतंत्र भारत ही नहीं, विश्व में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए वह पहला विश्व हिंदी सम्मेलन था। </strong></p>
<p>उन दिनों हम पटना कॉलेज के सामने वाले किराये के मकान में रहते थे, जहाँ बिजली की कोई व्यवस्था नहीं थी। लालटेन से घर में भी सांझ दिया जाता था, और उसी की रोशनी से पढ़कर जीवन को भी प्रकाशमय बनाने का प्रयास होता था। लेकिन लोकनायक जयप्रकाश नारायण के घर से कोई पौने किलोमीटर दूर कदमकुआं स्थित विश्व हिंदी सम्मेलन के सम्मानार्थ ऐतिहासिक पीले रंग वाले हिंदी साहित्य सम्मलेन भवन को बिजली की झालड़ से चकमका दिया गया था। मैं इसलिए स्वयं को और अपने जन्मदिन को हिंदी को मजबूत बनाने के लिए समर्पित कर दिया उस दिन से &#8211; भले विगत पांच दशकों से जीवन यापन के लिए अंग्रेजी अखबारों, पत्रिकाओं में कार्य करना पड़ा हो। खैर। </p>
<p>पिछले दिनों हिन्दी के एक लेखक एक जलेबी की दूकान पर गए। लेखक ने दुकानदार से कहा कि “पाँच जलेवी देना भैय्या।” दुकानदार बोला: पन्द्रह रुपये देना। </p>
<p>लेखक बहुत ही मायूसी के साथ दूकानदार को कहते हैं कि &#8216;मैं तो सिर्फ चार शब्द में याचना किया और इन चार शब्दों को जब मैं लिखकर किसी पत्र-पत्रिका या कारपोरेट घरानों में हिंदी नहीं जानने वाले पैजामा का नारा पकडे अधिकारी को दूंगा, तो वे मुझे 30 पैसे प्रति शब्द के हिसाब से (वह भी बहुत याचना के बाद) भुगतान करेंगे। यानी मुझे एक रूपया बीस पैसा मिलेगा । मैं इन पांच जलेबी के लिए पन्द्रह रुपये कहाँ से लाऊंगा ? </p>
<blockquote><p>दुकानदार लेखक की स्थिति को समझते हुए लेखक के हाथ में “एक पाव जलेवी” रखते कहता है: “तभी तो हिन्दी साहित्य की माँ – बहन हो रही है। इतना ही नहीं, मर्दों के लिए &#8216;भाई-साहब-भाई साहब&#8217; और &#8216;जनानियों&#8217; के लिए &#8216;मैडम&#8217; का सम्बोधन तो आय गले का कांटा हो गया है हिंदी के आँगन में।&#8221;</p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/2.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6211" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>वह तो धन्यवाद दीजिये जिस समय रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र, मधुशाला, अलंकार, आनन्द मठ, एक गधे की वापसी, गबन, गोदान, गोरा, निर्मला, कबुलीबाला, जीना तो पड़ेगा, अंधायुग, मुद्रा राक्षस, उखड़े खम्बे आदि कहानियों, कविताओं की रचना की गई। उन दिनों भारतीय भाषाओँ में लेखक, लेखनी और शब्दों की कीमत थी। </strong></p>
<p>लेकिन आज आज़ादी के इतने वर्ष बाद, जबकि देश में अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है, भारतीय मुद्राओं का मोल अंतर्राष्ट्रीय बाजार में लुढ़क रहा है, बल्कि हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओँ के शब्दों की कीमत तो लुढ़की ही नहीं; लोगों ने तो उसे “चरित्रहीन” भी बना दिया। नहीं तो आज अपने ही देश में, अपनी ही भाषा 20 पैसे से 30 पैसे प्रतिशब्द कैसे बिकती। वैसी स्थिति में “मेरे प्यारे देश! देह या मन को नमन करूँ मैं ? किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं?&#8221; </p>
<p>हिंदी के पत्रकार इस बात को मानते हैं कि हिन्दी में लिखने की संभावना बहुत कम है और लिखने के पैसे तो नहीं के बराबर हैं। इसलिए कई लोग जो &#8216;बाममार्गी&#8217; थे, वे दक्षिणपंथी&#8217; हो गए, कई &#8216;मध्यमार्ग&#8217; अपना लिए। </p>
<p>लिखने में एक बड़ा झंझट यह है कि आपके नाम से छपेगा। पाठक वही होंगे। इसलिए कोई भी बहुत ज्यादा नहीं छापेगा। जब अच्छे पैसे मिलते थे तो सम्पादकीय पृष्ठ के एक लेख के 1000 रुपए मिलते थे। महीने के चार-छह हजार में क्या होता है। और जो इतने पैसे देता था वो इतना बिकता था कि आप कहीं और नहीं लिख सकते थे। </p>
<p>उन दिनों बैंक में खाता खोलना आसान था। किसी भी नाम से खाता खुल सकता था। हम लोग दो-चार नाम से लिखते थे। रेडियो से भी पैसे मिलते थे और अनुवाद भी करता था। सब मिलाकर चल जाता था। अब काम लगातार कम हुआ है। दूसरे नाम से खाता ही नहीं खुलेगी। आयकर और जीएसटी के नियमों का उल्लंघन है। इसलिए संभावना लगातार कम हुई है जबकि काम करने वाले बढ़े हैं। नौकरियां भी कम हुई हैं। जहां पहले 50 लोग होते थे वहां 10 हैं वो भी सस्ते वाले। पुराने अनुभवी लोग बेरोजगार हैं। सस्ते या मुफ्त में काम करने के लिए तैयार। इसलिए यह हाल हुई है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/4.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6212" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>यदि देखा जाय तो हिंदी का गला घोटने का प्रयास आज़ादी के बाद से लगातार किया जाता रहा है। जिम्मेदार लोगों द्वारा, अंग्रेजी अनिवार्यता कई परीक्षाओं से लेकर योग्यता का एक अनुचित मापदंड आज भी बनी हुई है। भारतीय समाज में, ऐसे में हिंदी भाषा का जो भी उत्कर्ष हो सका हैं, वो इसके अपने विशाल पाठक वर्ग व बड़ी आबादी की बोलचाल की भाषा होने से हो सका हैं, जिसके मूल में कहीं न कहीं बाज़ारवादी मजबूरी भी हैं जिसमें ग्राहक की रुचि,भाषा आदि सर्वोपरी हैं!</strong> </p>
<p>लेकिन बड़ा प्रश्न ये हैं कि हिन्दी लेखन को प्रोत्साहन देना आवश्यक हैं &#8211; आर्थिक व जनजागरण दोनों स्तर पर क्योंकि हिंदी पत्र पत्रिकाओं में लेखन पर जो पारिश्रमिक दिया जा रहा हैं, वो बेहद कम हैं। इससे न तो हिंदी बचेगी और ना ही लेखक। इतना ही नहीं, हिंदी भाषा प्रेमियों और मर्मज्ञों की उदासीनता के चलते भाषा की मूल आत्मा अपने स्वरूप को खो देगी, वैसे भी देवनागरी लिपि को आज हिंगलिश लिपि सोशल मीडिया के दौर में अतिक्रमण कर रही है। </p>
<p>हिंदी के प्रबुद्धों का कहना है कि हिंदी वालों का सबसे ज्यादा शोषण किया हैं। हिंदी गुटबाजी से निकले तो कुछ हो, नए लोगों को कोई प्रोत्साहित करे तो कुछ हो। आजकल तो एक गुट नयी हिंदी का भी नारा लगाने लगी है, यहाँ भी बंटवारा! सबको मुफ्त में लिखने वाले चाहिए। हिंदी वाले केवल उसी को पैसा देते हैं जो पहले से ही समर्थ और समृद्ध या लोकप्रिय है। बेड़ा गर्क कर रखा है! लेकिन, उम्मीद है कि ये हालत बदलेंगे! हम तो प्रार्थना ही कर सकते हैं। </p>
<p>इनके अलावा जो सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है वह यह कि इनके द्वारा लेखकों को कितना भुगतान किया जा रहा है । आजकल जैसा कि देखने में आ रहा है, पाठकों की तुलना में लेखकों की संख्या में अपार वृद्धि हुई है। और यही कारण है कि पत्र पत्रिकायें ज्यादा शब्द समृद्ध लोगों से लिखवाने से बच रहे हैं और जिनसे लिखवाया जा रहा है, उनको बीस से तीस पैसे प्रति शब्द दिये जा रहे हैं। यही वो कड़ी है जिसके कारण हिन्दी की दुर्दशा हुई है, क्योंकि ज्यादा शब्द संपन्न लेखक इस काम से हाथ खींच रहे हैं। इससे हाथ खींचना इसलिये उनकी मजबूरी बन चुकी है क्योंकि यह किसी भी तरह उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में सक्षम नहीं है, और बेहतर लोगों के लेखन के क्षेत्र में ना रहने से हिन्दी को जो नुकसान हुआ है वह दयनीय है। </p>
<p><strong>बहरहाल, पचौरी साहब, हिंदी साहित्यकार हैं, लिखते हैं: साहित्य क्या राजनीति से कम है? वहां जाति है, तो यहाँ भी जाती है। वहाँ धर्म है, तो यहाँ भी है। वहां विचारहीनता है, तो यहाॅ॑ भी है। वहां परिवारवाद है, तो यहाँ भी है। वहाॅ॑ ललित और दलित विमर्श है, तो यहाँ भी है। वहां स्त्री विमर्श है, तो यहाँ भी है। वहां सबका साथ, सबका विकास है, तो यहाँ भी है।‌ वहां झूठ-सच है, तो यहां सचमुच का &#8220;झूठा-सच&#8221; है। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/3.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6213" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/03/3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>इतना ही नहीं, अब तो अखिल भारतीय साहित्यकार मोर्चा भी बन गया है और नारा भी है &#8216;हर पुस्तक एक मशाल&#8217; है। लेकिन उन्होंने यह भी लिखा कि &#8220;जब एक काव्यात्मक पंक्ति राजनीति को बदलने का दावा कर सकती है, तब साहित्य राजनीति को बदलने का दावा क्यों नहीं कर सकता?&#8221; इसलिए उन्होंने हरेक छोटे-बडे़, अच्छे-बुरे साहित्यकारों से अपील कर दिए, &#8216;आवहु मिलकर सब रोवहु भारत आई। हा हा! साहित्य की दुर्दशा न देखी जाई।&#8217; आओ, सब मिलकर चुनाव लड़ो, जीतो और अपनी साहित्यिक सरकार बनाकर दिखा दो कि अब साहित्य ही है, जो समाज, जनतंत्र और आप सबकी रक्षा कर सकता है। यही सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा व स्वास्थ्य दे सकता है। राजनीति की बनाई सड़क टूट सकती है, घर फूट सकता है, लेकिन साहित्य में बनी सड़क न कभी टूटती है, न ही घर फूटता है।&#8221; </p>
<p>वे आगे लिखते हैं: &#8220;बहुत हो लिया इस-उसके दस्तखत के नीचे अपने दस्तखत करना। माँ सरस्वती के वरद पुत्र-पुत्रियों, किस-किस के पिछलग्गू बने रहोगे और कब तक? ये एक्शन के दिन हैं। हे मेरे लेखक, अपने को देख। सब नेता भ्रष्ट और कलंकी। अकेला तू अभ्रष्ट और निष्कलंकी। तू होता भी कैसे? तुझे मौका ही नहीं मिला। एक मौका तो लेकर देख। तेरी सात पुश्तें तर जाएंगी। इसलिए अपनी पार्टी बना। चुनावों में कूद। टिकट दे। टिकट ले। सोच तो। न जाने कितने बजर बट्टू तेरी कविताओं की एक एक दो-दो लाइनें गलत-सलत सुना-सुनाकर गद्दीनशी हो गए। जब कबीर, सूर, तुलसी, रहीम, निराला, दिनकर, गालिब, फैज, दुष्यंत, राहत इंदौरी और नजीर बनारसी की दो-चार लाइनें जपकर मामूली नेता सत्ता तक पहुॅ॑च सकते हैं, तो तू क्यों नहीं पहुॅ॑च सकता? </p>
<p>बहुत रो चुका कि कविता नहीं छपती। कहानी नहीं छपती। राॅयल्टी नहीं मिलती। एक बार कमान हाथ में ले, फिर देख बड़े से बड़ा प्रकाशक तेरी ग्रंथावली छापने के लिए एक लाइन लगाएगा। नोबेल वाले हाथ जोड़े खड़े होंगे। साहित्य का नया युग आएगा। तभी वह राजनीति का चमचा बनने की जगह उसके आगे जलने व चलने वाली मशाल बन सकेगा। इसीलिए मैं &#8216;जाली नोट&#8217; के गाने की तर्ज पर चेताता हूॅ॑ कि हे कलम के धनी प्रतिभा पुंज, तू लुंज-पुंज मत बन। &#8216;छुरी बन कांटा बन ओ माई सन, सब कुछ बन किसी का चमचा नहीं बन!&#8217; </p>
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		<title>सरकारी निर्णयानुसार साल में सात-दिन या पंद्रह-दिन के लिए सज-धज कर जब मेज पर बैठती है हिंदी  😢</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Dec 2024 12:34:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[शिक्षा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पहली जनवरी को अंतर्राष्ट्रीय वैश्विक दिवस से लेकर 26 दिसंबर को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल स्थापना दिवस तक साल के ३६५ दिनों में करीब १९१+ दिनों का अलंकरण महत्वपूर्ण दिवसों के रूप में अंकित है। इन ३६५ दिनों में ३५१ और ३५८ दिन ‘हिन्दी&#8217; किसी दीवार से सटकर चुपचाप सहमी पड़ी होती है। अकस्मात् ७ [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पहली जनवरी को अंतर्राष्ट्रीय वैश्विक दिवस से लेकर 26 दिसंबर को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल स्थापना दिवस तक साल के ३६५ दिनों में करीब १९१+ दिनों का अलंकरण महत्वपूर्ण दिवसों के रूप में अंकित है। इन ३६५ दिनों में ३५१ और ३५८ दिन ‘हिन्दी&#8217; किसी दीवार से सटकर चुपचाप सहमी पड़ी होती है। अकस्मात् ७ दिन (हिन्दी सप्ताह) और १४ दिन (हिन्दी पखवाड़ा) के लिए ‘फूल-माला पहनाकर, सुसज्जित कर लोगबाग, अधिकारी, पदाधिकारी, मंत्री, संत्री उसे सामने की मेज पर बैठा देते हैं &#8216;दर्शनार्थ&#8217; और फिर कहते भी नहीं थकते है &#8216;हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा।&#8217; उसकी स्थिति कुछ वैसी ही होती है जैसे गणतंत्र दिवस पर मातृभूमि के लिए अपने प्राणों को अर्पित करने वाले गीतों का गाना-बजाना। भारत के लोग, शिक्षित, अशिक्षित सभी लोग बजाते हैं। मिथिला सहित, बिहार सहित, देश के सभी ७८७ जिलों, ६४९४८१ गाँवों, २.६८ ग्राम पंचायतों में तो बजता ही है। बेचारी हिंदी। वैसे चाहे महिला (स्त्रीलिंग) सशक्तिकरण के बारे में लोगबाग, समाज, सरकार और व्यवस्था कितना भी ढ़ोल पिट लें, महिला जानती है समाज के संभ्रांत लोग, राजनेता, दबंग कितना सशक्त होने दिए हैं &#8211; उसी तरह जैसे गुड़ का मार धोकड़ा।</strong> </p>
<p>अंग्रेजी में <strong>‘कॉन्सोनेंट’</strong> और <strong>‘वॉवेल’</strong> तो नर्सरी के बच्चे भी जानते हैं परंतु क्या आपने कभी अपने बच्चों से पूछा है कि <strong>‘हिन्दी’</strong> को किस <strong>‘लिपि’</strong> में लिखा जाता है ?</p>
<p>कभी आपने अपने बच्चों को यह बताया है कि हिन्दी को जिस लिपि में लिखा जाता है उसमें कितने <strong>‘स्वर’</strong> और कितने <strong>‘व्यंजन’</strong> होते हैं ? </p>
<p>आपने कभी अपने बच्चों को पूछा है अथवा बताया है कि भारत में किस भाषा को भारतीय संविधान के तहत फक्र से <strong>‘राजभाषा’</strong> के रूप में स्वीकार किया गया है ? </p>
<p>कभी आप यह जानने और अपने छोटे स्कुल जाते बच्चे-बच्चियों को, विशेषकर जिन्हें राजनीति शास्त्र पढ़ने में, भारत में प्रजातन्त्र के स्वरुप को जानने-समझने में उत्सुकता है, बताने में अपनी अभिरुचि दिखाये हैं कि भारत के <strong>संसद</strong> में किन-किन संसदीय कार्य के लिए <strong>‘केवल हिन्दी का प्रयोग’</strong>; किन-किन कार्यों के लिए हिन्दी और अंग्रेजी, दोनों का प्रयोग निर्धारित है और यह भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के तहत आवश्यक है ?  ​</p>
<p>या फिर, कभी आपने पूछा कि हम <strong>हिंदी दिवस</strong> क्यों मानते हैं? </p>
<p>नहीं न !​  वैसे मन करे तो अपने बच्चों से एक बार पूछिए जरूर कि हम &#8216;हिंदी दिवस क्यों मानते हैं? और <strong>किस दिन</strong> मनाते हैं?</p>
<p>एक ज़माने में हमारे बड़े-बुजुर्ग हिन्दी अथवा स्थानीय भाषा के समाचार-पत्र, पत्रिका हाथ में देकर कहते थे ‘इसे पढ़ो, जोर से पढ़ो’, ‘इसे देखकर लिखो, शब्दों और वाक्यों में शुद्धि पर विशेष ध्यान रखना’ – हम सभी ऐसा करते थे और हिन्दी भाषा बलबान थी, हम बलबान थे, सुदृढ़ थे । आज “हिन्दुस्तान में ही हिन्दी लंगड़ी, लुल्ही हो रही है। लेखक से लेकर समाज के लोग और सरकार की नजर में यह कोई अहमियत नहीं रख पा रही है – इसलिए बेचारी लुढकती चली जा रही है।</p>
<p>इतना ही नहीं, आज भारत में प्रकाशित अधिकाँश हिन्दी समाचार-पत्रों/पत्रिकाओं में समाचार लिखने वाले पत्रकारों से लेकर, कहानी, राजनीतिक समीक्षा या टिपण्णी लिखने वाले लोग भी, अपने लेखन को पाठकों के सामने ऐसे ‘हिन्दी की टाँग तोड़कर, पट्टी बाँध कर’ परोसते हैं। लेखन की क्रिया में ‘अंग्रेजी भाषा का प्रयोग धरल्ले” से हो रही है। </p>
<p>कहते हैं किसी राष्ट्र का समाचार पत्र / पत्रिकाएं उस राष्ट्र की भाषा को जीवित रखते हैं, भाषा की वजूदता बरक़रार रखते हुए उसे सुदृढ़ बनाते हैं ताकि आने वाली पीढ़ियों को अपनी भाषा पर गर्व हो, फक्र हो। ऐसा नहीं है कि पहले इन समाचार-पत्रों/पत्रिकाओं में लेखन की क्रिया में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग धड़ल्ले से होता था – प्रयोग ही नहीं होता था, क्योंकि लेखकों के पास ‘शब्दों’ का इतना अपार भण्डार था की ‘वाक्यों के विन्यास में एक शब्द ही संपूर्ण बातों को सामने रख देता था।</p>
<p>सोसल मिडिया के जन्म के पश्चयात तो सोसल मिडिया पर लोग अपने हिन्दी लेखन को जिस तरह परोसते हैं, देखकर, पढ़कर मन खिन्न हो जाता है। </p>
<p><strong>भारत में आज बच्चे कबीरदास, तुलसीदास, सूरदास, संत विदास, मीराबाई, रहीम, रसखान, भूषण, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बिहारी, भीष्म साहनी, महाबीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलि शरण गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, सियाराम शरण गुप्त, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन ‘अज्ञेय’, मुंशी प्रेमचंद, सुभद्रा कुमारी चौहान, जैनेन्द्र कुमार, यशपाल, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, माखनलाल चतुर्वेदी, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, गया प्रसाद शुक्ल, महादेवी वर्मा, शरतचंद चट्टोपाध्याय, कमलेश्वर, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’, गोपाल सिंह ‘नेपाली’, हरिवंश राय ‘बच्चन’, सोहन लाल द्विवेदी, नागार्जुन, सुमित्रानंदन पन्त, दुष्यंत कुमार, त्रिलोचन, भवानी प्रसाद मिश्र का नाम भी नहीं जानते होंगे, क्योंकि आज अधिकांश हिन्दी की किताबों में इनका नाम दीखता ही नहीं, या फिर बड़े-बुजुर्ग इन हिन्दी के हस्ताक्षरों के बारे में अपने बच्चों को बताने की जबाबदेही अपने कंधे से झटक दिए हैं।</strong> </p>
<p>आपको यह बताकर तकलीफ भी हो रही है कि रामधारी सिंह ‘दिनकर’, जो भारत के ‘राष्ट्रकवि’ हैं, उनकी साहित्य ही नहीं, उनके पैतृक घर को, स्थानीय लोगों के अतिरिक्त कोई पूछने वाला भी कोई नहीं है । </p>
<p>इतना ही नहीं; हरिवंश राय ‘बच्चन’ को अब लेखक के रूप में भारत के स्कूल जाते बच्चे नहीं जानते, वे जानते हैं की वे फिल्म जगत के महान कलाकार अमिताभ बच्चन के पिता है, जबकि अमिताभ बच्चन के एक और भाई हैं। यह है स्थिति हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य लेखकों, कवियों की। </p>
<p>भारत में हिन्दी की स्थिति चाहे सामाजिक दृष्टि से देखें, साहित्यिक दृष्टि से देखें, सांस्कृतिक दृष्टि से देखें, बोलचाल की दृष्टि से देखें या फिर आप जिस भी नजर से भी देखें “मरी” तो नहीं है, परंतु मुद्दत से मरणासन्न” होती चली जा रही है। कब दम तोड़ देगी, कहा नहीं जा सकता ! </p>
<p><strong>बिडम्बना यह है कि हिन्दी को, जिसे भारतीय संविधान के तहत राजभाषा का दर्जा प्राप्त है – अलग बात है की भारत के पंचायत से संसद तक होने वाले संपूर्ण कार्यों में, यहाँ तक की बोलचाल की भाषा में भी, हिन्दी का प्रयोग “अछूत” की तरह किया जाता है – सरकारी-स्तर पर प्रत्येक साल संपूर्ण देश के सरकारी, गैर-सरकारी, स्वायत्त और निजी संस्थानों में “हिन्दी सप्ताह, हिन्दी – पखवारा” मनाकर लोग-बाग़ अपनी हिन्दी, राजभाषा को नमन और श्रद्धांजलि अगले एक साल के लिए पुनः दे देते हैं। यानि, साल के ३६५ दिनों में ३५१ और ३५८ दिन ‘हिन्दी किसी दीवाल से सटकर चुपचाप पड़ी होती है और अकस्मात् ७ दिन (हिन्दी सप्ताह) और १४ दिन (हिन्दी पखवाड़ा) के लिए ‘फूल-माला पहनाकर, सुसज्जित कर सामने की मेज पर बैठा दी जाती है। </strong></p>
<p>संसद में विचार व्यक्त करने के लिये आज भी धड़ल्ले से अंग्रेजी का प्रयोग हो रहा हो। हिन्दी के आवेदन पत्र पर अंग्रेजी में ही अपनी राय, विचार लिखने की परम्परा हावी हो गयी है । अंग्रेजी बोलने वालों को तेज तरार, बुद्धिमान एवं प्रतिष्ठित समझने एवं हिन्दी बोलने वालों को अनपढ़, गवार जानने के परम्परा हावी हो गयी । अंग्रेजी विद्यालय में बच्चों को शिक्षा के लिये भेजना शान शौकत बन चुका है , तो कैसे कोई कह सकता है, यह वही देश हैं जिस देश की 90 प्रतिशत जनता हिन्दी जानती समझती एवं बोलती है और जिस देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी है। </p>
<p>हिन्दी की आज यहीं वर्तमान दशा है, जहां हिन्दी अपने ही लोगों से पग-पग पर उपेक्षित हो रही है। इस दशा में क्या दिशा मिल सकती है, सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। दोहरेपन की नीति के कारण आज तक स्वतंत्रता के ७० वर्ष उपरान्त भी इस देश को सही मायने में एक भाषा नहीं दे पाये जिसमें पुरा देश बातचीत कर सके। </p>
<p>जिस भाषा को अंग्रेजों ने हमारे ऊपर थोपा, उसे आज भी बड़े शौक से अपनी दिनचर्या में उतारे बैठे है। अंग्रेज तो इस देश से चले गये, पर अंग्रेजियत आज भी हावी है। जब भी हिन्दी दिवस आता है, हिन्दी पखवाड़ा, सप्ताह का आयेजन कर, हिन्दी पर लम्बे – लम्बें वक्तव्य देकर, प्रतियोगिता आयोजित कर कुछ लोगों को हिन्दी के नाम पर सम्मान, इनाम देकर इतिश्री कर ली जाती हैं। </p>
<p>अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुए विश्व के किसी देश ने भी अंग्रेजी को नहीं अपनाया । भारत को छोड़ हर मुल्क की आज अपनी भाषा है। इसी कारण विदेश दौरे पर गये भारतीय प्रतिनिधि द्वारा अपना संबोधन अंग्रेजी में देते ही यह सुनना पड़ा कि क्या भारत की अपनी कोई भाषा नहीं ? </p>
<p>हिन्दी भाषा सिर्फ भारत में ही नहीं बोली जाती है बल्कि भारत और अन्य देशों मसलन फिजी, मॉरीसस, गयाना, सूरीनाम, नेपाल, संयुक्त राज्य अमेरिका दक्षिण अफ्रीका यमन, युगांडा, सिंगापूर, नेपाल, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान आदि देशों में भारत से प्रवासित लोग हिन्दी भाषा बोलते हैं, समझते हैं, लिखते हैं, पढ़ते हैं। </p>
<p>राष्ट्रभाषा राष्ट्र की आत्मा होती है। जिसमें पूरा देश संवाद करता है। जिससे राष्ट्र की पहचान होती है । यह तभी संभव है जब हम सभी दोहरी मानसिकता को छोड़कर राष्ट्रभाषा हिन्दी को अपने जीवन में अपनाने की शपथ मन से लें। तभी सही मायने में हिन्दी का राष्ट्रीय स्वरूप उजागर हो सकेगा। हिन्दी के राष्ट्रीय स्वरुप उजागर होने की आज महत्ती आवश्यकता है। जिसमें देश की एकता अस्मिता समाहित है। </p>
<p><strong>वैसे हिन्दी भाषा की एक लंबी संघर्ष–यात्रा रही है। आज भी हिंदी से जुड़े अनेक यक्ष प्रश्नों का समाधान अपेक्षित है, जैसे– हिंदी भाषा की आज क्या स्थिति है? सूचना प्रौद्योगिकी की भाषा के रूप में हिंदी भाषा कितनी उपयुक्त है? देश में हिंदी भाषा का क्या स्थान है? अंतर्राष्ट्रीय फलक पर हिंदी का प्रसार संतोषजनक है अथवा नहीं? हिंदी में अनुवाद की क्या स्थिति है? हिंदी भाषा कहाँ और किस रूप में होनी चाहिए? हिंदी भाषा का साहित्यिक रूप कैसा हो? मीडिया की भाषा के रूप में हिंदी भाषा से क्या अपेक्षाएं हैं? संपर्क भाषा के रूप में तथा अध्ययन के माध्यम की भाषा के रूप में हिंदी भाषा के स्वरूप में क्या अंतर होना चाहिए? हिंदी भाषा के मानकीकरण को प्रभावी बनाने के लिए क्या प्रावधान होने चाहिए?</strong></p>
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		<title>साल 1962 : स्थान: व्हीलर सीनेट हॉल, पटना : &#8220;परशुराम की प्रतीक्षा&#8221; का पहला पाठ: रामधारी सिंह दिनकर और राम वचन राय</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 29 May 2024 13:31:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[hindi]]></category>
		<category><![CDATA[parshuram ki pratiksha]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
		<category><![CDATA[poets]]></category>
		<category><![CDATA[ramdhari singh dinkar]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>हिंदी साहित्य के आधुनिक धनुर्धरों को यह मालूम हो अथवा लेकिन बिहार के हिंदी साहित्य के दो हस्ताक्षरों को मिठाई बहुत भाता था । मिठाई में एक गर्म और दूसरा शीतल। एक के लिए देर रात भी उस ज़माने में पचास पैसे रिक्शा भाड़ा देकर पटना के डाक बंगला चौराहे के नुक्कड़ पर &#8216;लखनऊ स्वीट [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हिंदी साहित्य के आधुनिक धनुर्धरों को यह मालूम हो अथवा लेकिन बिहार के हिंदी साहित्य के दो हस्ताक्षरों को मिठाई बहुत भाता था । मिठाई में एक गर्म और दूसरा शीतल। एक के लिए देर रात भी उस ज़माने में पचास पैसे रिक्शा भाड़ा देकर पटना के डाक बंगला चौराहे के नुक्कड़ पर &#8216;लखनऊ स्वीट हॉउस&#8217; या फिर पटना कालेज के सामने एनीबेसेंट रोड के नुक्कड़ पर स्थित पिंटू होटल जाना कठिन नहीं होता था। दोनों स्थानों का रसगुल्ला पाटलिपुत्र के मिठाई के इतिहास में स्वर्णाक्षरों  में लिखा जाता था। <br />
जबकि जलेबी की प्राप्ति के लिए विगत दिनों जहाँ देश के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी राजेंन्द्र नगर गोल चक्कर पर वहां के निवासियों का अभिवादन कर आगे बढ़े थे, उसी नुक्कड़ पर एक दूकान होती थी जहाँ की जलेबी बहुत प्रसिद्द था । मैला आँचल के लेखक श्री फणीश्वरनाथ रेणु को जहाँ सफ़ेद रुई जैसा रसगुल्ला पसंद था, वहीँ परशुराम की प्रतीक्षा के लेखक को गरमा-गरम जलेबी।</strong></p>
<p>दोनों लेखकों के घरों की दूरी पैदल चलने पर भी 300 सेकेंड्स से अधिक की नहीं थी। एक जहाँ से आर्य कुमार रोड अपना अस्तित्व समाप्त कर राजेंद्र नगर में विलीन हो जाता था, अंतिम कदम से कुछ पूर्व रहते थे भारत के लोगों द्वारा अलंकृत राष्ट्रकवि रामधारी सिंह &#8216;दिनकर&#8217;, जबकि उसी मार्ग पर आगे बिहार सरकार के जन सम्पर्क विभाग के आवासीय क्षेत्र में रहते थे फणीश्वरनाथ रेण। खैर। </p>
<p>उन दिनों दिनकर जी अपने आर्य कुमार रोड निवास में रहते थे। इस दिनकर भवन का निर्माण मेरे जन्म के तीन साल पहले हुआ था। दिनकर भवन के साथ ही &#8216;उदयाचल&#8217; प्रकाशन भी बना। साल 1956 -57 था। उदयाचल प्रकाशन के साथ ही हिंदी साहित्य के एक और धनुर्धर श्री छविनाथ पाण्डे रहते थे। श्री पाण्डेय यहाँ 1937 अपना आवास बनाये थे। इनके घर से कोई 135 डिग्री के कोण पर बाएं हाथ  सन 1956 में आये पटना विश्व विद्यालय के तत्कालीन हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष श्री राम खेला वन राय। राम खेला वन  राय साहब के घर के ठीक सामने वाला घर &#8216;आनंद भवन&#8217; 1954 में बना। यह मकान नोवेल्टी एंड कंपनी के मालिक श्री तारानंद झा का था। उन्हीं के दूकान में मेरे पिता एक छोटी से नौकरी करते थे और मैं अपने पिता रूपी ब्रह्माण्ड के नीचे मालिक के इस घर में सन 1965 में पदार्पित हो गया था। &#8216;आनंद भवन&#8217; के आगे वाला मकान श्री जयनाथ मिश्र जी का था जो सन1937-38 में नोवेल्टी स्टेशनरी चलाते थे। </p>
<p>उस दिन दिनकर भवन के दरवाजे पर अचानक दरवाजे की कुण्डी बजी। सामने के कमरे में दिनकर जी कुछ लिख रहे थे। गर्दन नीचे किये आवाज दिए &#8220;कौन&#8221;? दरवाजे से आवाज आयी : &#8216;मैं रामवचन राय हूँ। पटना कालेज में स्नातक का छात्र हूँ। आपसे मिलने के लिए बहुत दिनों से यत्न कर रहा हूँ।&#8221; </p>
<p>दिनकर ही आवाज सुनकर अंदर आने को कहे। वे अब तक अपनी गर्दन नीचे ही किये थे। सामने एक कुर्सी रखी  थी। गर्दन नीचे रखे ही दाहिने हाथ की ऊँगली में कलम फसाये उस पर बैठने का इशारा किये। रामवचन बाबू अनुशासन को उत्कर्ष पर रखते बहुत अदब से कुर्सी पर बैठे ताकि कोई कुर्सी की खरखराहट नहीं हो, आवाज नहीं निकले और लिखने में दिनकर जी को कोई व्यवधान नहीं हो। </p>
<p>दिनकर जी बांह वाला गंजी (बनियान) पहने थे जो पसीने से भीगा था। आँखों पर चश्मा लटका था जो बार-बार चेहरे पर पसीने के कारण नीचे फिसल रहा था और दिनकर जी बाएं हाथ से बार-बार उसे अपने स्थान पर पहुंचा दिया करते थे। घड़ी  की सूई आगे बढ़ रही थी। तभी अचानक दाहिने हाथ की उंगलियों में लिपटा रोशनाई वाला कलम कागज पर अंतिम शब्द लिखकर, पूर्ण विराम लगाया। इस पूर्णविराम के साथ दिनकर जी का गर्दन भी उठा। </p>
<p>दुबले-पतले राम वचन बाबू के चेहरे को पढ़ते दिनकर जी कहते हैं: &#8220;रुको !!! मैं कपड़ा पहनकर आता हूँ। पटना विश्वविद्यालय चलना है। वहां सभी प्रतीक्षा कर रहे हैं। </p>
<p>साल सन 1962 था और चीनी आक्रमण के परिणाम स्वरूप भारत को मिली पराजय से क्षुब्ध होकर दिनकर  के मन में जो तिलमिलाहट पैदा हुई उसका उद्बोधन आत्म अभिव्यंजना ही परशुराम की प्रतीक्षा काव्यकीर्ति के रूप में पटना के आर्य कुमार रोड के इस भवन में लिखा गया था । जीवन की प्रत्येक परिस्थितियों में क्रांति का राग अलापने वाला कवि दिनकर इस रचना में परशुराम की प्रतीक्षा करता है। कविता सूर धर्म की यहां परशुराम धर्म में बदल गया है। एक समय था जब उसे अर्जुन एवं भीम जैसे वीरों की आवश्यकता थी। किंतु आज उसे लगता है कि देश पर जो संकटकाल मंडरा रहा है उसके घने बादलों में छिपे परशुराम का कुठार ही बाहर ला सकता है। इसलिए दिनकर  ने परशुराम धर्म अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया है।</p>
<figure id="attachment_5503" aria-describedby="caption-attachment-5503" style="width: 1459px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/Dionkar-fotor-20240529183222.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/Dionkar-fotor-20240529183222.jpg" alt="" width="1459" height="2048" class="size-full wp-image-5503" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/Dionkar-fotor-20240529183222.jpg 1459w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/Dionkar-fotor-20240529183222-214x300.jpg 214w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/Dionkar-fotor-20240529183222-730x1024.jpg 730w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/Dionkar-fotor-20240529183222-768x1078.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/05/Dionkar-fotor-20240529183222-1094x1536.jpg 1094w" sizes="auto, (max-width: 1459px) 100vw, 1459px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5503" class="wp-caption-text">राष्ट्रकवि रामधारी सिंह &#8216;दिनकर&#8217;</figcaption></figure>
<p><strong>हे वीर बन्धु ! दायी है कौन विपद का ?<br />
हम दोषी किसको कहें तुम्हारे वध का ?</p>
<p>यह गहन प्रश्न; कैसे रहस्य समझायें ?<br />
दस-बीस अधिक हों तो हम नाम गिनायें।<br />
पर, कदम-कदम पर यहाँ खड़ा पातक है,<br />
हर तरफ लगाये घात खड़ा घातक है।</strong></p>
<p>मुद्दत बाद श्री राम वचन बाबू से बात हुई। राम वचन बाबू 83 वसंत के गवाह है और सम्प्रति बिहार विधान परिषद् के सम्मानित सदस्य हैं। श्री राम वचन बाबू का कहना है कि रामधारी सिंह दिनकर को &#8216;राष्ट्रकवि&#8217; का अलंकरण भारत अथवा प्रदेश की सरकार नहीं दी है, अपितु राष्ट्र के प्रति अपनी वेदना-संवेदना को जिस कदर वे शब्दों में ढ़ालकर तत्कालीन समाज के लोगों को, खासकर युवकों को, युवतियों को राष्ट्र के प्रति अपनी वचनवद्धता, समर्पण का पाठ पढ़ाया है, भारत के लोगों ने उन्हें राष्ट्रकवि बना दिया। वे अपने शब्दों से राष्ट्र में एक चेतना लाना चाहते थे, लाये भी। </p>
<p>श्री राम वचन बाबू से जब पूछा कि &#8216;आखिर रामधारी सिंह दिनकर&#8217; को प्रोत्साहित करने वाला कोई तो रहा होगा जो उन्हें आर्य कुमार रोड के नुक्कड़ वाले घर से निकाल कर कुल 3287263 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल का राष्ट्रकवि बनाया ?</p>
<p>श्री रामवचन बाबू वृद्धावस्था वाली हंसी हँसते कहते हैं कि &#8216;रामधारी सिंह दिनकर के निर्माण में श्री काशी  प्रसाद जायसवाल की भूमिका अक्षुण है। श्री जायसवाल साहब थे तो उत्तर प्रदेश के लेकिन वे अपना कार्यक्षेत्र बिहार बनाया। विदेशी शिक्षा प्राप्त करने के बाद जब वे भारत आये वे पहले कलकत्ता विश्वविद्यालय में व्याख्याता बने। लेकिन देश में राजनीतिक गतिविधियां बदल रही थी। वे कुछ समय कलकत्ता में वकालत शुरू किये।  लेकिन सन् 1914 आते-आते वे पटना आ गए। काशी प्रसाद जायसवाल के समकालीन थे आचार्य रामचंद्र शुक्ल। </p>
<p>कहते हैं कि बिहार के तत्कालीन प्रशासन एडवर्ड गेट ने &#8216;बिहार रिसर्च सोसाइटी&#8217; से जब &#8216;बिहार रिसर्च जर्नल&#8217; के प्रकाशन का प्रबंध किया तो श्री जायसवाल उसके प्रथम संपादक हुए। उन्होंने &#8216;पाटलिपुत्र&#8217; का भी संपादन किया। &#8216;पटना म्यूजियम&#8217; की स्थापना भी आपकी ही प्रेरणा से हुई। सन 1935 में &#8216;रायल एशियाटिक सोसाइटी&#8217;ने लन्दन में भारतीय मुद्रा पर व्याख्यान देने के लिये श्री जायसवाल को आमंत्रित किया था। इन्होने दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया, सैकड़ों लेख लिखे, कवितायेँ लिए तो प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से राष्ट्र की स्वाधीनता से सम्बंधित था। </p>
<p>श्री राम वचन बाबू कहते हैं: &#8220;उन्हीं दिनों रविंद्रनाथ टैगोर पटना आये थे। श्री काशी प्रसाद जायसवाल दिनकर को उनसे मिलाना चाहते थे। दिनकर जी उन दिनों लहेरियासराय में सब-रजिस्ट्रार की नौकरी करते थे। वे भागे-भागे पटना आये थे उनसे मिलने। </p>
<p>जब उनसे पूछा कि &#8216;आखिर दिनकर के भी तो कोई विरोधी रहे होंगे उन दिनों भी? श्री राम वचन बाबू मुस्कुराये और कहे: &#8220;निजी तौर पर कोई मनमुटाव नहीं था, लेकिन अगर प्रतिस्पर्धा थी तो श्री केदार नाथ मिश्र प्रभात जी से। प्रभात जी का जन्म आरा में हुआ था। हिंदी साहित्य में प्रभात जी का योगदान अक्षुण है। </p>
<p><strong>बहरहाल, राम वचन बाबू आगे कहते हैं: &#8220;उस दिन परशुराम की प्रतिज्ञा का अंतिम शब्द लिखने के बाद दिनकर जी मुझे कहे कि &#8216;रुको मैं कपडा पहनकर आता हूँ।&#8221; और वे ऊपर वाले कमरे में चले गए। कुछ क्षण बाद सफ़ेद धोती, लम्बा बांह वाला कुर्ता पहने, कंधे पर एक द्वितीय वस्त्र, हाथ में एक एक छाता लिए बिना फीते वाला काला रंग का जूता पहने दिनकर जी नीचे उतरे।&#8221;</strong></p>
<p>मैं पहली बार रामधारी सिंह दिनकर को इस दृश्य में  देखा था। उन्हें देखकर ऐसा लगा की जिस व्यक्ति के चेहरे पर इतना तेज हो, वह दिनकर ही हो सकता हैं। </p>
<p><strong>उन दिनों गाड़ी-सवारी की बात प्रतिष्ठा&#8217; की बात नहीं थी। वे आगे-आगे चल रहे थे और मैं एक छात्र के रूप में उनसे एक कदम पीछे-पीछे। उन दिनों किसी शिक्षक अथवा किसी शिक्षित, प्रतिष्ठित व्यक्ति के साथ नहीं, बल्कि एक कदम पीछे चलना उनसे सम्मान देना होता था। हम उनके साथ चल रहे थे, यह मेरे लिए सम्मान का विषय था। हम रास्ते भर पढाई-लिखाई की बातें होती गयी। हम दोनों आर्य कुमार रोड, बारी पथ, खजांची रोड के रास्ते अशोक राजपथ पर पहुँच गए थे। रास्ते में सैकड़ों लोग उस दिव्य पुरुष को प्रणाम कर रहे थे।अशोक राजपथ पर पहुँचते-पहुँचते दर्जनों छात्र साथ हो गए थे। हम सभी पटना विश्वविद्यालय की ओर अग्रसर थे। अब तक नहीं जानते थे कि आखिर कहाँ जा रहे हैं। </strong></p>
<p>पटना विश्वविद्यालय के व्हीलर सीनेट हॉल के प्रवेश द्वार से जैसे ही परिसर में प्रवेश लिए, पटना विश्वविद्यालय के सैकड़ों शिक्षक, प्राध्यापक, विभिन्न विभिन्न महाविद्यालयों के प्राचार्यगण खड़े थे दिनकर जी की प्रतीक्षा में। तभी आगे आये पटना विश्वविद्यालय के कुलपति श्री जॉर्ज जैकोब। श्री जैकोब 14 मार्च, 1962 से 13 मार्च, 1965 तक विश्वविद्यालय के कुलपति थे। पटना विश्वविद्यालय के स्थापना काल (1 अक्टूबर, 1917) के बाद श्री जैकोब विश्वविद्यालय के 14 वें कुलपति थे।</p>
<p>उन दिनों अनुशासन अपने उत्कर्ष पर था। श्री जैकोबकी अगुआई में सैकड़ों शिक्षक जब दिनकर जी का अभिनन्दन किये, मैं स्वयं को भाग्यवान समझ रहा था। मैं उस क्षण का गवाह था। उस भीड़ में भी उन्होंने मुझे इशारा कर अंदर प्रवेश करने के लिए कहा। मैं जैसे ही अंदर प्रवेश कर रहा था, मुझे बहुत सम्मान के साथ व्हीलर सीनेट हॉल में लगी हजारों कुर्सियों में सबसे आगे वाली कतार पर बैठने को कहा गया। मैं तो महज एक छात्र था। फिर मंच पर लोगों का अपने-अपने तरह से छात्रों, छात्राओं, समाज के लोगों को राष्ट्र  के प्रति उनके कर्तव्यों का बोध कराया गया। अब तक मैं अनभिज्ञ था &#8211; आखिर आज यहां क्या हो रहा है ? दिनकर जी क्या कहने वाले हैं?</p>
<p><strong>तभी मंच से पटना विश्वविद्यालय के कुलपति श्री जॉर्ज जैकोब की घोषणा हुई कि भारत-चीन युद्ध में भारत की करारी हार पर श्री रामधारी सिंह दिनकर द्वारा रचित &#8220;परशुराम की प्रतिज्ञा&#8221; का पहला पाठ करेंगे। आज एक इतिहास लिखा जा रहा है और हम सभी भाग्यशाली हैं कि आज इस इतिहास का साक्षी हैं। </strong>  </p>
<p>आज कुलपतियों की संख्या 53 हो गयी है। लेकिन आज तक कोई दूसरा दिनकर जन्म नहीं लिया। अलबत्ता विश्वविद्यालय प्रांगण में गोलियों की बौछार अवश्य हो रही है। कलम नहीं, डंडे चल  रहे हैं।गंगा की धारा की तरह विश्वविद्यालय में शिक्षा बहुत दूर चली गयी है। पुस्तकालय वीरान हो गया है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/parshuram-ki-pratiksha">साल 1962 : स्थान: व्हीलर सीनेट हॉल, पटना : &#8220;परशुराम की प्रतीक्षा&#8221; का पहला पाठ: रामधारी सिंह दिनकर और राम वचन राय</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>हिंदी पत्रकारों को &#8216;चमचा&#8217; नहीं, &#8216;काँटा&#8217; बनना होगा, अन्यथा &#8216;अंग्रेजी&#8217; पत्रकार &#8216;ब्रितानिया&#8217; सरकार जैसा कब्ज़ा कर लेंगे।</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/tale-of-hindi-journalists-in-indian-media</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Jan 2022 12:02:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[crying]]></category>
		<category><![CDATA[hindi]]></category>
		<category><![CDATA[journalists]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>विगत दिनों &#8216;जनसत्ता&#8217; अखबार के मूर्धन्य पत्रकार और वर्तमान में अनुवाद कम्युनिकेशंस के अधिष्ठाता संजय कुमार सिंह लिखित कुछ शब्द फेसबुक पर पढ़ा। उस लेख में मूलतः दो पत्रकारों द्वारा एक छोड़ से दूसरे छोड़ पर फोन पर बातचीत हो रही थी। वाचक की छोड़ से आने वाले प्रत्येक शब्द में वेदन, रुदन, त्रादसी तो [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/tale-of-hindi-journalists-in-indian-media">हिंदी पत्रकारों को &#8216;चमचा&#8217; नहीं, &#8216;काँटा&#8217; बनना होगा, अन्यथा &#8216;अंग्रेजी&#8217; पत्रकार &#8216;ब्रितानिया&#8217; सरकार जैसा कब्ज़ा कर लेंगे।</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>विगत दिनों &#8216;जनसत्ता&#8217; अखबार के मूर्धन्य पत्रकार और वर्तमान में अनुवाद कम्युनिकेशंस के अधिष्ठाता संजय कुमार सिंह लिखित कुछ शब्द फेसबुक पर पढ़ा। उस लेख में मूलतः दो पत्रकारों द्वारा एक छोड़ से दूसरे छोड़ पर फोन पर बातचीत हो रही थी। वाचक की छोड़ से आने वाले प्रत्येक शब्द में वेदन, रुदन, त्रादसी तो थी। अगर मोबाईल के रास्ते नाक और आँख से निकलने वाले जल का आवागमन होता, तो शायद श्रोता के छोड़ पर बाल्टी में पानी एकत्रित हो जाता। वेदना का मूल सार था &#8211; अवकाश प्राप्त हिंदी पत्रकार अपने जीवन के अंतिम बसंत कैसे जिएं ?</strong> </p>
<p>संजय सिंह लिखते हैं: &#8220;छह आठ महीने पहले एक अनजान नंबर से फोन आया था। फोन करने वाले ने पूछा कि संजय जी आपका नंबर मेरे पास काफी समय से सेव है मैं पहचान नहीं पा रहा हूं कि आप कौन हैं। सभ्य और बुजुर्ग सी आवाज थी तो मैंने अपना परिचय बता दिया। उन्होंने भी अपना नाम और हाल-चाल सब बताया। मैंने उनका नंबर सेव कर लिया। लंबी बात हुई। मैं भी रिटायर, बेरोजगार की ही श्रेणी में हूं सो अच्छा ही लगा। उसके बाद शायद दो बार या एक ही बार फोन आया था। हालचाल और पत्रकारिता राजनीति पर बात हुई। रिटायरमेंट के बाद बुढ़ापे में परेशानी झेल रहे हैं वह भी मुद्दा था। बच्चों के बारे में मैंने पूछा नहीं, उन्होंने बताया नहीं या बताया भी हो तो मुझे याद नहीं है। पर वे साथ नही रहते हैं। शायद खबर भी नहीं लेते हैं या हों ही नहीं। </p>
<p>आज फिर उनका फोन आया था। रुआंसे लग रहे थे। मैंने उत्साहपूर्वक बात कर स्थिति समझने और संभालने की कोशिश थी। अंदाजा तो था पर मैं भी किसी की कितनी मदद कर सकता हूं। बातचीत में उन्होंने कहा कि कई दिनों बाद आज ठीक से खाना खाया हूं। चूंकि नियमित खाना नहीं खाता इसलिए खाना था भी तो खा नहीं पाया और ऐसी ही बातें। काम नहीं है। तुम्हारा काम कैसा चल रहा है आदि। अंत में उन्होंने कहा कि किसी से कुछ पैसे दिलवा सको तो दिला दो। मैंने उनसे उनका शहर पूछा। बातचीत में जिन नामों की चर्चा आई थी उनसे बात करने के लिए कहा। पर वे यही कहते रहे कि कितना मांगू। सब से मांग चुका हूं। शर्म आती है। और फलां तो फोन भी नहीं उठाता। उसके पास काम हैं, पैसे होंगे तो व्यस्त रहता है। उससे बात नहीं हो पाती। आदि आदि। मतलब संकट सिर्फ अभी का नहीं है। </p>
<p>कुछ पैसे मैं उन्हें अभी दे दूं तो फिर अगली बार वो मुझसे मांगने में हिचकेंगे या दो-चार बार मैं दे दूं तो मुझे ही फोन उठाना बंद करना पड़ेगा। क्या गोबर पट्टी में जहां हिन्दी वालों की और भिन्न पार्टियों की सरकार है। पत्रकारों को खिलाने-पिलाने को बुरा नहीं माना जाता रहा है वहां किसी बूढ़े-बुजुर्ग पत्रकार के लिए कोई व्यवस्था नहीं हो सकती है? अगर सरकार नहीं कर रही हैं तो कौन करेगा? क्या यह हमारा काम और हमारी जिम्मेदारी नहीं है? हो सकता मुझे जरूरत ना पड़े पर क्या मुझे अपने बुढ़ापे में किसी साथी की मदद न कर पाने का अफसोस नहीं रहे इसके लिए अभी कुछ नहीं करना चाहिए। किसी एक साथी की मदद करने से कब तक काम चल पाएगा। मुझे लगता है कि रिटायर, बुजुर्ग या अक्षम पत्रकारों के लिए कुछ किया जाना चाहिए। फिलहाल तो उक्त पत्रकार को भी सहायता की जरूरत है। </p>
<p>क्या हम कुछ करेंगे या ताली-थाली ही बजाते रहेंगे। जो पत्रकारिता नहीं कर रहे हैं वही कुछ दान सुख प्राप्त कर लें। चारण पत्रकारिता की स्थायी -कमाऊ व्यवस्था कर दें जिससे साथियों का जीवन आराम से निकल सके। जिनका समय निकल गया वो तो अब अफसोस ही कर सकते हैं। हमारी अपनी स्थिति वैसी ही नहीं हो यह कैसे तय होगा? पहले लोकोपकार करने वाले बहुत सारे लोग और संस्थाएं होती थीं। अब सब पीएम केयर्स में समाहित है। विदेशी दान उड़ाने की संभावनाओं पर सरकार की नजर है। ऐसे में यह काम करना तो सरकार को ही चाहिए पर सरकार के समर्थक करवा सकते हैं या इसे गैर जरूरी बता सकते हैं?&#8221; खैर। </p>
<p><strong>मेरी जिंदगी अख़बारों के पन्नों के बीती हैं। उन दिनों पटना में प्रकाशित अख़बारों की कीमत छः पैसे से 15 पैसे के बीच ही कुस्ती-कबड्डी करती थी। वजह भी था &#8211; मालिक को समाज का सरोकार था और वह बनिया जाति से नहीं आते थे । जीवन के प्रारंभिक दिनों में पटना की सड़कों पर कभी अपने कन्धों पर, तो कभी साईकिल के हैंडिल और कैरियर पर, अख़बारों को बांधकर, रखकर अख़बारों के थोक विक्रेता के रास्ते प्रकाशक से पाठक तक पहुँचाया हूँ। स्वतंत्र भारत में हिंदी के मूर्धन्य ज्ञानी-महात्मा उसे &#8216;अखबार विक्रेता&#8217; कहते हैं; जबकि अंग्रेजी साहित्य के विशारद &#8216;हॉकर&#8217;। </strong></p>
<p>बात साठ के दशक के उत्तरार्ध और सत्तर के दशक के मध्य की है। उन दिनों पटना ही नहीं देश के किसी भी शहर की सड़कों पर न तो कुकुरमुत्तों की तरह पत्रकार जन्म लिए थे, और ना ही पत्रकारों मालिकों के द्वारा, शासन-प्रशासन के द्वारा, सत्ताधारियों के द्वारा उनका मानसिक-आर्थिक-बौद्धिक बलात्कार ही होता था। विदेशी मुद्राओं द्वारा भारतीय मुद्राओं का भी बलात्कार प्रारम्भ नहीं हुआ था। भारतीय मुद्रा भी पटना के सड़कों पर, कालिदास रंगालय में बेखौफ &#8216;कत्थक नृत्य&#8217; करते थे। परिणाम यह था की गरीब भी अमीरों के सामने अपने 56 इंच सीने को 66, 76 इंच बनाकर दिखाने में तनिक भी हिचकी नहीं लेते थे। गरीब और धनि समाज में थे तो जरूर उन दिनों भी, लेकिन 36 का आंकड़ा शब्दकोष में दीखता नहीं था। </p>
<p>जब कदमकुंआ वाले लालाजी, आप उन्हें जयप्रकाश नारायण भी कहें (पटना के नेता तो उन्हें लोकनायक&#8217; कहते नहीं थकते) पटना की सड़कों पर आंदलन का नेतृत्व किये, हमारी तो निकल पड़ी। टीवी का जमाना नहीं था। सोशल मीडिया भारतीय मीडिया घरानों के गर्भ में पनपा भी नहीं था । न तो समाज &#8216;स्मार्ट&#8217; हुआ था और ना ही &#8216;शहर&#8217; &#8211; क्योंकि नेताओं की सोच कोइलवर से आगे दिल्ली की ओर नहीं निकली थी। वह तो सम्मानित प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी को धन्यवाद दीजिए कि &#8216;दिव्यांग&#8217; शहरों को भी &#8216;स्मार्ट&#8217; शहर बनाकर धन्य-धान्य कर दिए। नारा भी बुलंद कर दिए &#8211; सोच बदलो , देश बदलेगा। </p>
<p><strong>अब उन्हें कौन समझाए कि भूखा पेट तो भगवान् का भी भजन नहीं होता, भूखा पेट पत्रकार क्या लिखेगा, समाज का सोच क्या बदलेगा ? लेकिन सम्मानित प्रधानमंत्री जानते थे कि उन्हें अब पत्रकारों की कोई जरुरत नहीं हैं, भारत सरकार में भी पत्र और सूचना कार्यालय की जरूरत नहीं है &#8211; क्योंकि वे खुद एक पत्रकार हैं। खुद प्रेस रिलीज बनाते हैं, अपनी बातें लिखते हैं, अपनी तस्वीरों के साथ &#8216;ट्वीट&#8217; कर देते हैं। भारत स्थित मीडिया घरानों के मालिकों, उसमें कार्य करने वाले पत्रकारों को लपकना है तो लपक लो, छापना है तो छाप लो &#8211; क्योंकि उनके करोड़ों अनुयायी हैं।</strong> </p>
<p>स्थिति बद से बत्तर तब हो गयी, जब अंग्रेजी माध्यम के पत्रकारों ने अंग्रेजी मीडिया घरानों को &#8216;नमस्कार&#8217; कर &#8216;हिंदी&#8217; बोलने लगे, &#8216;बतियाने&#8217; लगे और हिंदी मीडिया में ढुकने लगे। अंग्रेजी पत्रकारों की एक आदत हिंदी अख़बारों के मालिकों पर बहुत भारी पड़ा &#8211; उन्हें प्रभावित करने में। अंग्रेजी अखबार वाले &#8216;कमर&#8217;, &#8216;कन्धा&#8217; अधिक हिलाते हैं। बीड़ी नहीं पीते चाहे क्रेडिट कार्ड पर लोन लेकर ही सिगरेट पीना पड़े, फ़िल्टर वाला। सड़क के किनारे चाय की दूकान पर बैठकर चाय नहीं पीते। मोदी जी अपने बचपन में जिस चाय की दूकान पर काम करते थे, उसके बारे में बेहतरीन शब्दों का विन्यास कर, लिखकर उसे भी बेच देते हैं, क्योंकि अंग्रेजी मीडिया घरानों के पत्रकारों पर बनिया मालिकों का विशेष प्रभाव होता है। विश्वास नहीं हो तो पटना के अशोक राज पथ से लेकर डिक्की के राजपथ तक भ्रमण-सम्मलेन कर आंक लीजिये। </p>
<p><strong>हिंदी मीडिया घरानों के मालिकों को कन्धा-कमर हिलाकर, उन्हें पत्रकारिता के साथ घर के लिए आलू, पियाज, मटर, साग-सब्जी लाने के साथ-साथ &#8216;स्मार्ट शहरों के आलीशान होटलों में बैठकर शराब पीने का भी मार्ग बना लेते हैं। यानी हिंदी मीडिया घरानों पर अंग्रेजी हुकूमतों का कब्ज़ा हो जाता है। इसका मूल कारण यह है कि हिंदी मीडिया घराने के मालिक चाहे खरबपति क्यों न हों, वे &#8220;इंट्रोवर्ट&#8221; होते हैं। </strong></p>
<p>ये सब कार्य &#8216;शिष्टता&#8217; से भी हिंदी मीडिया घरानों में कार्य करने वाले हिंदी में बोलने-बतियाने वाले पत्रकार &#8216;स्टाईल&#8217; से नहीं कर पाते। अगर कमर और कन्धा हिलाने की कोशिश किये भी तो शरीर के 206 हड्डियां में कोई न कोई खिसक जाती है। अब सब तो &#8216;समूह&#8217; में विश्वास करते हैं कि जब तक अंतिम सांस नहीं ले लेंगे तब तक न तो मीडिया को छोड़ेंगे और ना ही &#8216;डिमॉनेटाइजेशन&#8217; के बाद भी भारतीय मुद्रा के आगमन श्रोत का मार्ग अवरुद्ध करेंगे। कभी मौका मिले तो ऐसे महान पत्रकारों से वार्तालाप अवश्य कर लें &#8211; ज्ञान का पिटारा है इनके पास। लेकिन व्यवहार में दूसरे की थाली को भी छीन कर बिना डकार लिए गटकने में कोई कसर नहीं छोड़ते। खैर।</p>
<p>पिछले दिनों हिन्दी के एक लेखक एक जलेबी की दूकान पर गए। लेखक ने दुकानदार से कहा: “पाँच जलेवी देना भैय्या।” दुकानदार बोला: पन्द्रह रुपये देना। लेखक बहुत ही मायूसी के साथ दूकानदार को कहते हैं: मैं तो सिर्फ चार शब्द में याचना किया, और इन चार शब्दों को जब मैं लिखकर किसी पत्र-पत्रिका या कारपोरेट घरानों में हिंदी नहीं जानने वाले पैजामा का नारा पकडे अधिकारी को दूंगा, तो वे मुझे ३० पैसे प्रतिशब्द के हिसाब से (वह भी बहुत याचना के बाद) भुगतान करेंगे, यानी मुझे १ रुपये २० पैसे मिलेंगे। मैं इन पांच जलेबी के लिए पन्द्रह रुपये कहाँ से लाऊंगा ? दुकानदार लेखक की स्थिति को समझते हुए लेखक के हाथ में “एक पाव जलेवी” रखते कहता है: “तभी तो हिन्दी साहित्य की माँ – बहन हो रही है। </p>
<p><strong>वह तो धन्यवाद दीजिये  जिस समय रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र, मधुशाला, अलंकार, आनन्द मठ, एक गधे की वापसी, गबन, गोदान, गोरा, निर्मला, कबुलीबाला, जीना तो पड़ेगा, अंधायुग, मुद्रा राक्षस उखड़े खम्बे आदि कहानियों, कविताओं की रचना की गई, उन दिनों भारतीय भाषाओँ में लेखक, लेखनी और शब्दों की कीमत थी । लेकिन आज आज़ादी के 75 वर्ष बाद, जबकि देश में अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है, भारतीय मुद्राओं का मोल अंतर्राष्ट्रीय बाजार में लुढ़का, बल्कि हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओँ के शब्दों की कीमत तो लुढ़की ही नहीं; लोगों ने तो उसे “चरित्रहीन” बना दिया नहीं तो आज अपने ही देश में, अपनी ही भाषा २० पैसे से ३० पैसे प्रतिशब्द कैसे बिकती। बाजार में क्रेताओं की संख्या तो भरमार है ही, लेखकों की तो बाढ़ से है – बारहो महीना, छतीसो दिवस। वैसी स्थिति में “मेरे प्यारे देश! देह या मन को नमन करूँ मैं ? किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं? </strong></p>
<p>हिंदी के पत्रकार इस बात को मानते हैं कि हिन्दी में लिखने की संभावना बहुत कम है और लिखने के पैसे तो नहीं के बराबर हैं। इसलिए कई लोग जो &#8216;बाममार्गी&#8217; थे, वे दक्षिणपंथी&#8217; हो गए, कई &#8216;मध्यमार्ग&#8217; अपना लिए। लिखने में एक बड़ा झंझट यह है कि आपके नाम से छपेगा। पाठक वही होंगे। इसलिए कोई भी बहुत ज्यादा नहीं छापेगा। जब अच्छे पैसे मिलते थे तो एडिट पेज के एक लेख के 1000 रुपए मिलते थे। महीने के चार-छह हजार में क्या होता है। और जो इतने पैसे देता था वो इतना बिकता था कि आप कहीं और नहीं लिख सकते थे। उन दिनों बैंक में खाता खोलना आसान था। किसी भी नाम से खाता खुल सकता था। हम लोग दो-चार नाम से लिखते थे। रेडियो से भी पैसे मिलते थे और अनुवाद भी करता था। सब मिलाकर चल जाता था। अब काम लगातार कम हुआ है। दूसरे नाम से खाता ही नहीं खुलेगी। आयकर और जीएसटी के नियमों का उल्लंघन है। इसलिए संभावना लगातार कम हुई है जबकि काम करने वाले बढ़े हैं। नौकरियां भी कम हुई हैं। जहां पहले 50 लोग होते थे वहां 10 हैं वो भी सस्ते वाले। पुराने अनुभवी लोग बेरोजगार हैं। सस्ते या मुफ्त में काम करने के लिए तैयार। इसलिए यह हाल हुई है। </p>
<p><strong>यदि देखा जाय तो हिंदी का गला घोटने का प्रयास आज़ादी के बाद से लगातार किया जाता रहा है। जिम्मेदार लोगों द्वारा, अंग्रेजी अनिवार्यता कई परीक्षाओं से लेकर योग्यता का एक अनुचित मापदंड आज भी बनी हुई है। भारतीय समाज में, ऐसे में हिंदी भाषा का जो भी उत्कर्ष हो सका हैं वो इसके अपने विशाल पाठक वर्ग व बड़ी आबादी की बोलचाल की भाषा होने से हो सका हैं जिसके मूल में कहीं न कहीं बाज़ारवादी मजबूरी भी हैं जिसमें ग्राहक की रुचि,भाषा आदि सर्वोपरी हैं! लेकिन बड़ा प्रश्न ये हैं कि हिन्दी लेखन को प्रोत्साहन देना आवश्यक हैं आर्थिक व जनजागरण दोनों स्तर पर क्योंकि हिंदी पत्र पत्रिकाओं में लेखन पर जो पारिश्रमिक दिया जा रहा हैं वो बेहद कम हैं।  इससे न तो हिंदी बचेगी और ना ही लेखक। इतना ही नहीं, हिंदी भाषा प्रेमियों और मर्मज्ञों की उदासीनता के चलते भाषा की मूल आत्मा अपने स्वरूप को खो देगी, वैसे भी देवनागरी लिपि को आज हिंगलिश लिपि सोशल मीडिया के दौर में अतिक्रमण कर रही है।</strong> </p>
<p>हिंदी के प्रबुद्धों का कहना है कि हिंदी वालों का सबसे ज्यादा शोषण किया हैं। हिंदी गुटबाजी से निकले तो कुछ हो, नए लोगों को कोई प्रोत्साहित करे तो कुछ हो। आजकल तो एक गुट नयी हिंदी का भी नारा लगाने लगी है, यहाँ भी बंटवारा! सबको मुफ्त में लिखने वाले चाहिए। हिंदी वाले केवल उसी को पैसा देते हैं जो पहले से ही समर्थ और समृद्ध या लोकप्रिय है। बेडा गर्क करके रखा है! लेकिन, उम्मीद है कि ये हालत बदलेंगे! हम तो प्रार्थना ही कर सकते हैं। </p>
<p>इनके अलावा जो सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है वह यह कि इनके द्वारा लेखकों को कितना भुगतान किया जा रहा है । आजकल जैसा कि देखने में आ रहा है, पाठकों की तुलना में लेखकों की संख्या में अपार वृद्धि हुई है । और यही कारण है कि पत्र पत्रिकायें ज्यादा शब्द समृद्ध लोगों से लिखवाने से बच रहे हैं और जिनसे लिखवाया जा रहा है, उनको बीस से तीस पैसे प्रति शब्द दिये जा रहे हैं, और यही वो कड़ी है जिसके कारण हिन्दी की दुर्दशा हुई है, क्योंकि ज्यादा शब्द संपन्न लेखक इस काम से हाथ खींच रहे हैं। इससे हाथ खींचना इसलिये उनकी मजबूरी बन चुकी है क्योंकि यह किसी भी तरह उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में सक्षम नहीं है, और बेहतर लोगों के लेखन के क्षेत्र में ना रहने से हिन्दी को जो नुकसान हुआ है वह दयनीय है। </p>
<p><strong>बहरहाल, सुधीश पचौरी साहब, हिंदी साहित्यकार हैं, लिखते हैं: साहित्य क्या राजनीति से कम है? वहां जाति है, तो यहाँ भी जाती है। वहाँ धर्म है, तो यहाँ भी है। वहां विचारहीनता है, तो यहाॅ॑ भी है। वहां परिवारवाद है, तो यहाँ भी है। वहाॅ॑ ललित और दलित विमर्श है, तो यहाँ भी है। वहां स्त्री विमर्श है, तो यहाँ भी है। वहां सबका साथ, सबका विकास है, तो यहाँ भी है।‌ वहां झूठ-सच है, तो यहां सचमुच का &#8220;झूठा-सच&#8221; है। </strong></p>
<p>इतना ही नहीं, अब तो अखिल भारतीय साहित्यकार मोर्चा भी बन गया है और नारा भी है &#8216;हर पुस्तक एक मशाल&#8217; है। लेकिन उन्होंने यह भी लिखा कि &#8220;जब एक काव्यात्मक पंक्ति राजनीति को बदलने का दावा कर सकती है, तब साहित्य राजनीति को बदलने का दावा क्यों नहीं कर सकता?&#8221; इसलिए उन्होंने हरेक छोटे-बडे़, अच्छे-बुरे साहित्यकारों से अपील कर दिए, &#8216;आवहु मिलकर सब रोवहु भारत आई। हा हा! साहित्य की दुर्दशा न देखी जाई।&#8217; आओ, सब मिलकर चुनाव लड़ो, जीतो और अपनी साहित्यिक सरकार बनाकर दिखा दो कि अब साहित्य ही है, जो समाज, जनतंत्र और आप सबकी रक्षा कर सकता है। यही सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा व स्वास्थ्य दे सकता है। राजनीति की बनाई सड़क टूट सकती है, घर फूट सकता है, लेकिन साहित्य में बनी सड़क न कभी टूटती है, न ही घर फूटता है।&#8221;</p>
<p>वे आगे लिखित हैं: &#8220;बहुत हो लिया इस-उसके दस्तखत के नीचे अपने दस्तखत करना। माँ सरस्वती के वरद पुत्र-पुत्रियों, किस-किस के पिछलग्गू बने रहोगे और कब तक? ये एक्शन के दिन हैं। हे मेरे लेखक, अपने को देख। सब नेता भ्रष्ट और कलंकी। अकेला तू अभ्रष्ट और निष्कलंकी। तू होता भी कैसे? तुझे मौका ही नहीं मिला। एक मौका तो लेकर देख। तेरी सात पुश्तें तर जाएंगी। इसलिए अपनी पार्टी बना। चुनावों में कूद। टिकट दे। टिकट ले। सोच तो। न जाने कितने बजर बट्टू तेरी कविताओं की एक एक दो-दो लाइनें गलत-सलत सुना-सुनाकर गद्दीनशी हो गए। जब कबीर, सूर, तुलसी, रहीम, निराला, दिनकर, गालिब, फैज, दुष्यंत, राहत इंदौरी और नजीर बनारसी की दो-चार लाइनें जपकर मामूली नेता सत्ता तक पहुॅ॑च सकते हैं, तो तू क्यों नहीं पहुॅ॑च सकता?</p>
<p>बहुत रो चुका कि कविता नहीं छपती। कहानी नहीं छपती। राॅयल्टी नहीं मिलती। एक बार कमान हाथ में ले, फिर देख बड़े से बड़ा प्रकाशक तेरी ग्रंथावली छापने के लिए एक लाइन लगाएगा। नोबेल वाले हाथ जोड़े खड़े होंगे। साहित्य का नया युग आएगा। तभी वह राजनीति का चमचा बनने की जगह उसके आगे जलने व चलने वाली मशाल बन सकेगा। इसीलिए मैं &#8216;जाली नोट&#8217; के गाने की तर्ज पर चेतातू हूॅ॑ कि हे कलम के धनी प्रतिभा पुंज, तू लुंज-पुंज मत बन। &#8216;छुरी बन कांटा बन ओ माई सन, सब कुछ बन किसी का चमचा नहीं बन!&#8217; </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/tale-of-hindi-journalists-in-indian-media">हिंदी पत्रकारों को &#8216;चमचा&#8217; नहीं, &#8216;काँटा&#8217; बनना होगा, अन्यथा &#8216;अंग्रेजी&#8217; पत्रकार &#8216;ब्रितानिया&#8217; सरकार जैसा कब्ज़ा कर लेंगे।</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>हिन्दी: 30 पैसे प्रति शब्द: दिनकरजी अब कहिये-किसको नमन करूँ मैं भारत! किसको नमन करूँ मैं?</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/book/hindi-thirty-paise-per-word</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 23 Sep 2018 13:06:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[किताब]]></category>
		<category><![CDATA[book]]></category>
		<category><![CDATA[hindi]]></category>
		<category><![CDATA[market]]></category>
		<category><![CDATA[wirters]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली : पिछले दिनों हिन्दी के एक लेखक एक जलेवी की दूकान पर गए। लेखक ने दुकानदार से कहा: &#8220;पाँच जलेवी देना भैय्या।&#8221; दूकानदार बोला: पन्द्रह रूपये देना। लेखक बहुत ही मायूसी के साथ दूकानदार को कहते हैं: मैं तो सिर्फ चार शब्द में याचना किया, और इन चार शब्दों को जब मैं लिखकर [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/book/hindi-thirty-paise-per-word">हिन्दी: 30 पैसे प्रति शब्द: दिनकरजी अब कहिये-किसको नमन करूँ मैं भारत! किसको नमन करूँ मैं?</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>नई दिल्ली : <em>पिछले दिनों हिन्दी के एक लेखक एक जलेवी की दूकान पर गए। लेखक ने दुकानदार से कहा: &#8220;पाँच जलेवी देना भैय्या।&#8221; दूकानदार बोला: पन्द्रह रूपये देना। लेखक बहुत ही मायूसी के साथ दूकानदार को कहते हैं: मैं तो सिर्फ चार शब्द में याचना किया, और इन चार शब्दों को जब मैं लिखकर किसी पत्र-पत्रिका या कारपोरेट घरानों में हिन्दी नहीं जानने वाले पैजामा का नारा पकडे अधिकारी को दूंगा, तो वे मुझे ३० पैसे प्रतिशब्द के हिसाब से (वह भी बहुत याचना के बाद) भुगतान करेंगे, यानि मुझे १ रूपये २० पैसे मिलेंगे।  मैं इन पांच जलेवी के लिए पन्द्रह रूपये कहाँ से लाऊंगा ? दूकानदार लेखक की स्थिति को समझते हुए लेखक के हाथ में &#8220;एक पाव जलेवी&#8221; रखते कहता है: &#8220;तभी तो हिन्दी साहित्य की माँ &#8211; बहन हो रही है&#8221; &#8211; आप जलेवी खाएं और मीठे-मीठे शब्दों का श्रिंगार कर मीठी-मीठी बातें भी लिखें, देश को जरुरत है। </em> </p>
<p>राष्ट्रकवि रामधारी सिंह &#8216;दिनकर&#8217; जी का आज ११० वां जन्म दिन है। छियासठ वर्ष पूर्व सन १९७४ में वे &#8216;हिन्दी&#8217; और &#8216;हिन्दुस्तान&#8217; से अपना नश्वर शरीर लेकर कूच किये थे। दिनकर के जन्म के बाद ही नहीं, स्वतन्त्र भारत के जन्म के समय में भी, भारत का रुपया डॉलर की तुलना में बराबर था, इसलिए हिन्दुस्तान में हिन्दी की ही नहीं; बल्कि समस्त भारतीय भाषाओँ में लेखक, लेखनी और शब्दों की कीमत थी &#8211; रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र, मधुशाला, अलंकार, आनन्द मठ, एक गधे की वापसी, गबन, गोदान, गोरा, निर्मला, कबुलीबाला, जीना तो पड़ेगा, अंधायुग, मुद्रा राक्षस उखड़े खम्बे इत्यादि रचनाएँ जीवंत गवाह हैं। </p>
<p><strong>आज़ादी के ७२ साल बाद न केवल रुपयों का मोल अंतर्राष्ट्रीय बाजार में लुढ़का, बल्कि हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओँ के शब्दों की कीमत तो लुढ़की ही नहीं; लोगों ने तो उसे &#8220;चरित्रहीन&#8221; बना दिया नहीं तो आज अपने ही देश में, अपनी ही भाषा २० पैसे से ३० पैसे प्रतिशब्द कैसे बिकती। बाजार में क्रेताओं की संख्या तो भरमार है ही, लेखकों की तो बाढ़ से है &#8211; बारहो महीना, छतीसो दिवस। वैसी स्थिति में &#8220;मेरे प्यारे देश! देह या मन को नमन करूँ मैं ? किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं?</strong></p>
<figure id="attachment_734" aria-describedby="caption-attachment-734" style="width: 548px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/09/Sanjaya.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/09/Sanjaya.jpg" alt="​संजया कुमार सिंह" width="548" height="751" class="size-full wp-image-734" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/09/Sanjaya.jpg 548w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/09/Sanjaya-219x300.jpg 219w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/09/Sanjaya-306x420.jpg 306w" sizes="auto, (max-width: 548px) 100vw, 548px" /></a><figcaption id="caption-attachment-734" class="wp-caption-text">​संजया कुमार सिंह</figcaption></figure>
<p>जनसत्ता के पूर्व पत्रकार और अनुवाद कम्युनिकेशन के कर्ताधर्ता संजया कुमार सिंह कहते हैं कि ​यह सही है कि हिन्दी में लिखने की संभावना बहुत कम है और लिखने के पैसे तो नहीं के बराबर हैं। मैंने इसीलिए अनुवाद का काम चुना लिखने का नहीं। लिखने में एक बड़ा झंझट यह है कि आपके नाम से छपेगा। पाठक वही होंगे। इसलिए कोई भी बहुत ज्यादा नहीं छापेगा। एक अखबार हफ्ते में एक ज्यादा से ज्यादा हो। जब अच्छे पैसे मिलते थे तो एडिट पेज के एक लेख के 1000 रुपए मिलते थे। महीने के चार-छह हजार में क्या होता है। और जो इतने पैसे देता था वो इतना बिकता था कि आप कहीं और नहीं लिख सकते थे। उन दिनों बैंक में खाता खोलना आसान था। किसी भी नाम से खाता खुल सकता था। हमलोग दो-चार नाम से लिखते थे। रेडियो से भी पैसे मिलते थे और अनुवाद भी करता था। सब मिलाकर चल जाता था। अब काम लगातार कम हुआ है। दूसरे नाम से खाता ही नहीं खुलेगी। आयकर और जीएसटी के नियमों का उल्लंघन है। इसलिए संभावना लगातार कम हुई है जबकि काम करने वाले बढ़े हैं। नौकरियां भी कम हुई हैं। जहां पहले 50 लोग होते थे वहां 10 हैं वो भी सस्ते वाले। पुराने अनुभवी लोग बेरोजगार हैं। सस्ते या मुफ्त में काम करने के लिए तैयार। इसलिए यह हाल हुई है।</p>
<p>जहां तक रेट की बात है – यह पैसा सिर्फ टाइपिंग या टाइप किए पेज में करेक्शन लगाने के लिए भी कम है। लेकिन अपेक्षा यह होगी कि इतने में मौलिक लेख मिलेगा और वह भी टाइप करके। आजकल कंप्यूटर मेनटेन करने का जो खर्च है – इतने पैसे में वह भी नहीं निकलेगा। पर सवाल उनके बजट का है। ऐसे ही काम अब इधर उधर से आते हैं। अच्छे पैसे वाले काम दलालों के जरिए कमीशन लेकर ही मिलते हैं। मुझे कई लोगों ने कहा कि लिंक्ड इन पर काम बहुत है। अब आप यह रेट दिखा रहे हैं। असल में सब जगह एक ही हाल है। दूर के ढोल सुहाने लगते हैं। मुझे किसी ने एक वेब साइट के बारे में बताया। बहुत काम है। उसका मेल आया है 550 पेज की किताब का अनुवाद 37500 रुपए में करना है। 70 रुपए प्रति पेज भी नहीं। इतने में टाइप नहीं होगा। इन्हें अनुवाद चाहिए। मैंने 1990 में 35 पैसे शब्द अनुवाद किया है लगभग 40 साल बाद कितना होना चाहिए आप सोच सकते हैं। लिखने का उससे ज्यादा होना चाहिए।   </p>
<figure id="attachment_735" aria-describedby="caption-attachment-735" style="width: 569px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/09/Vinay-Dwividi.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/09/Vinay-Dwividi.jpg" alt="विनय द्विवेदी " width="569" height="643" class="size-full wp-image-735" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/09/Vinay-Dwividi.jpg 569w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/09/Vinay-Dwividi-265x300.jpg 265w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/09/Vinay-Dwividi-372x420.jpg 372w" sizes="auto, (max-width: 569px) 100vw, 569px" /></a><figcaption id="caption-attachment-735" class="wp-caption-text">विनय द्विवेदी</figcaption></figure>
<p>​जबकि भारत स्वाभिमान उत्तर प्रदेश (मध्य)  के प्रांतीय प्रवक्ता विनय द्विवेदी का मानना है कि हिंदी का गला घोटने का प्रयास आज़ादी के बाद से लगातार किया जाता रहा ​है। ​जिम्मेदार लोगों द्वारा, अंग्रेजी अनिवार्यता कई परीक्षाओं से लेकर योग्यता का एक अनुचित मापदंड आज भी बनी हुई ​है। भारतीय समाज में, ऐसे में हिंदी भाषा का जो भी उत्कर्ष हो सका हैं वो इसके अपने विशाल पाठक वर्ग व बड़ी आबादी की बोलचाल की भाषा होने से हो सका हैं जिसके मूल में कहीं न कहीं बाज़ारवादी मजबूरी भी हैं जिसमें ग्राहक की रुचि,भाषा आदि सर्वोपरी हैं!​ </p>
<p>​लेकिन बड़ा प्रश्न ये हैं कि हिन्दी लेखन को प्रोत्साहन देना आवश्यक हैं आर्थिक व जनजागरण दोनों स्तर पर क्योंकि हिंदी पत्र पत्रिकाओं में लेखन पर जो पारिश्रमिक दिया जा रहा हैं वो बेहद कम हैं अब 20-30 पैसे प्रति शब्द का पारिश्रमिक लेकर कोई कैसे अपने परिवार का भरण पोषण कर सकता हैं?​ ​और वो हिंदी साहित्य की सेवा भी करता रहे सम्भव नहीं,​ ​इस पर जिम्मेदार लोगों को ध्यान देना चाहिए नही हिंदी भाषा प्रेमियों और मर्मज्ञों की उदासीनता के चलते भाषा की मूल आत्मा अपने स्वरूप को खो देगी, वैसे भी देवनागरी लिपि को आज हिंगलिश लिपि सोशल मीडिया के दौर में अतिक्रमण कर रही ​है। </p>
<p>​जागरण डॉट कॉम, मुंबई के ​असिस्टेंट डेस्क एडिटर इंटरटेनमेंट हीरेंद्र झा का​ मानना है कि हिंदी वालों ने हिंदी वालों का सबसे ज्यादा शोषण किया ​हैं। मैंने जब अपना करियर शुरू किया और कुछेक पत्र पत्रिकाओं में लिखने लगा तब वो बस बाईलाइन के नाम पर ही हमसे ​लिखवाते। हम भी नाम छपा देख कर खुश हो जाते​, लेखनी के बदले पैसे तो खैर भूल ही ​जाइये। जब पैसे नहीं मिलते हैं तो यह आत्मविश्वास जगाने में कि मैं लिख सकता हूँ, खासा वक़्त लग जाता ​है। इससे बड़ा नुक्सान क्या होगा? </p>
<figure id="attachment_736" aria-describedby="caption-attachment-736" style="width: 489px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/09/Harendra-jha.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/09/Harendra-jha.jpg" alt="हरेन्द्र झा " width="489" height="512" class="size-full wp-image-736" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/09/Harendra-jha.jpg 489w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/09/Harendra-jha-287x300.jpg 287w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/09/Harendra-jha-401x420.jpg 401w" sizes="auto, (max-width: 489px) 100vw, 489px" /></a><figcaption id="caption-attachment-736" class="wp-caption-text">हरेन्द्र झा</figcaption></figure>
<p>पैसे की गड़बड़झाला का आलम यह है कि कई लिखने वाले लिखना छोड़कर किसी और सेक्टर में जॉब करके सेटल्ड हो जाना ज़रूरी समझ रहे ​हैं। हिंदी गुटबाजी से निकले तो कुछ हो​, नए लोगों को कोई प्रोत्साहित करे तो कुछ ​हो। आजकल तो एक गुट नयी हिंदी का भी नारा लगाने लगी ​है, यहाँ भी बंटवारा! सबको मुफ्त में लिखने वाले ​चाहिए। हिंदी वाले केवल उसी को पैसा देते हैं जो पहले से ही समर्थ और समृद्ध या लोकप्रिय ​है। बेडा गर्क करके रखा है! लेकिन, उम्मीद है कि ये हालत बदलेंगे! हम तो प्रार्थना ही कर सकते ​हैं। </p>
<p>अंकुश जी जो नए कवियों के लिए हिंदीनामा चलाते हैं, कहते हैं कि ​हिन्दी लेखन में ख़ास तौर से पत्र पत्रिकाओं में आजकल जो लिखा जा रहा है वह किस हद तक इस बात में सक्षम है कि उसे कोई पूर्ण रूप से रोज़गार का साधन मान सके, इस बात को समझने के लिये हमें कुछ बातों को ध्यान में रखना होगा जैसे कि पत्र &#8211; पत्रिकाओं की गुणवत्ता और भविष्य में उनकी क्या दिशा और दशा रहेगी यह भी। </p>
<p>इनके अलावा जो सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है वह यह कि इनके द्वारा लेखकों को कितना भुगतान किया जा रहा है । आजकल जैसा कि देखने में आ रहा है, पाठकों की तुलना में लेखकों की संख्या में अपार वृद्धि हुई है । और यही कारण है कि पत्र पत्रिकायें ज्यादा शब्द समृद्ध लोगों से लिखवाने से बच रहे हैं और जिनसे लिखवाया जा रहा है, उनको बीस से तीस पैसे प्रति शब्द दिये जा रहे हैं, और यही वो कड़ी है जिसके कारण हिन्दी की दुर्दशा हुई है, क्योंकि ज्यादा शब्द संपन्न लेखक इस काम से हाथ खींच रहे हैं। इससे हाथ खींचना इसलिये उनकी मजबूरी बन चुकी है क्योंकि यह किसी भी तरह उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में सक्षम नहीं है, और बेहतर लोगों के लेखन के क्षेत्र में ना रहने से हिन्दी को जो नुकसान हुआ है वह दयनीय है। </p>
<p>नुकसान का तात्पर्य यहाँ उस नुकसान से है जिसने भाषा को समृद्ध करने की बजाय उसे क्षीण किया है। हालांकि हिन्दी बोलने, पढ़ने और लिखने वालों में पिछले कुछ सालों में वृद्धि हुई है, पर कितने लोग हिन्दी को उसकी पहचान के साथ जीवित रखे हुए हैं यह सोचने वाली बात है। और अगर पत्र &#8211; पत्रिकाओं द्वारा हिन्दी लेखकों की यूँ ही अनदेखी होती रही तो एक दिन हिन्दी सिर्फ एक भाषा बनकर रह जायेगी, यह सोचा जाना चाहिये कि हिन्दी केवल एक भाषा नहीं हमारी संस्कृति का हिस्सा है। अगर भाषा के साथ साथ उसकी संस्कृति को भी बचाये रखना है तो लेखकों को किये जा रहे भुगतान के बारे में सभी को सोचने की जरूरत ​है। </p>
<p>भोपाल में रहने वाले रविन्द्र जोगलेकर, जो एजुकेशन एंड एकेडेमिक्स नामक संस्थान में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर है, कहते हैं कि ​जहां तक मेरी स्मृति मे है,​ ​हिंदी लेखको के संस्मरणो,​ ​पत्रोंं या पत्रिकाओ/पत्रों में छपे लेखो के माध्यम से जो पारिश्रमिक के जो संदर्भ पढे है उनसे यही धारणा बनती रही है कि अमूमन यह लगभग हिंदी मे शुरु से ही रहा है कि हिंदी लेखक आर्थिक मोर्चे पर संघर्षत ही रहा है,​ ​इसके बावजूद हिंदी साहित्य सेवियों की अनवरवत यात्रा चली जा रही है,​ ​हिंदी के संघर्ष का एक बड़ा हिस्सा हिंदी के भाषा क्षेत्र में ही लड़ना पड़ा जहाँ किताबे पत्रिकाये खरीदकर पढ़ने की संस्कृति अन्य भारतीय भाषाओं के मुक़ाबले कमतर रही, इस कारण भी प्रकाशक आमदनी का रोना रोते रहे हैं,पर अब स्थिति काफी सुधरी है, प्रकाशक पारिश्रमिक कम या ज्यादा देता है यह भी एक सापेक्षिक धारणा है क्यूंकि यहाँ कोई मानक उतने स्पष्ट नही है रॉयल्टी के न एडिशन के।बहरहाल हिंदी का भविष्य उज्वल है क्योंकि हिंदी नए इस स्थिति से भी तालमेल बैठा लिया ​है। </p>
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		<title>​हिन्दी अख़बारों में शीर्षक देखकर ही लगता है अखबार &#8216;मालिकों&#8217; का है, न की &#8216;सम्पादकों&#8217; का</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संजय कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 21 Jul 2018 07:27:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[government]]></category>
		<category><![CDATA[headlines]]></category>
		<category><![CDATA[hindi]]></category>
		<category><![CDATA[modi]]></category>
		<category><![CDATA[news. newspapers]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आज का अंग्रेजी दैनिक दि टेलीग्राफ का शीर्षक भी कमाल का है इसका हिन्दी किया जाए तो मोटे तौर पर इस तरह होगा, &#8220;गले लगने से 56 ईंची सीना चूर हो गया और प्रतिक्रिया गुस्से व घृणा की थी&#8221; तूफानी गले लगना (या पड़ना, सात कॉलम में) लीड का शीर्षक है। इसके नीचे तीसरी लाइन [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>आज का अंग्रेजी दैनिक दि टेलीग्राफ का शीर्षक भी कमाल का है इसका हिन्दी किया जाए तो मोटे तौर पर इस तरह होगा, &#8220;गले लगने से 56 ईंची सीना चूर हो गया और प्रतिक्रिया गुस्से व घृणा की थी&#8221; तूफानी गले लगना (या पड़ना, सात कॉलम में) लीड का शीर्षक है। इसके नीचे तीसरी लाइन में लिखा है, वह भी कोष्ठक में, “और हां, सरकार 325-126 से जीत गई”। इसके मुकाबले हिन्दी के अखबारों का पहला पन्ना बहुत ही नीरस और थका हुआ लगता है। आइए देखें हिन्दी के कुछ अखबारों ने कल के अविश्वास प्रस्ताव को कैसा ट्रीटमेंट दिया है। कहने की जरूरत नहीं है कि लोकतंत्र में कल जैसा दिन कभी-कभी आता है और मीडिया ने इससे निपटने की खास तैयारी की होगी, करनी चाहिए। पर नतीजा क्या रहा?</p>
<p>हिन्दी अखबारों में दैनिक जागरण वैसे भी अलग ही रहता है। इसने तो सात कॉलम में नरेन्द्र मोदी के जवाब को ही शीर्षक बना दिया है। लीड के ऊपर पट्टी में एक शीर्षक है, सुमित्रा महाजन ने पढ़ाया संसदीय गरिमा का पाठ। इसकी खबर अंदर है। हालांकि, ईयर पैनल की जगह सुमित्रा महाजन की फोटो लगी है। जागरण की फ्लैग हेडिंग है, &#8220;औंधे मुंह गिरा विपक्ष का पहला अविश्वास प्रस्ताव, सरकार दो तिहाई बहुमत से जीती (इसमें दो तिहाई हाईलाइट किया हुआ है), कांग्रेस पर बरसे पीएम&#8221;।</p>
<p>शीर्षक है हम आपकी तरह सौदागर नहीं : मोदी। इसमें कहीं विपक्ष की कोई बात नहीं है। आंख मारने वाली एक और प्रधानमंत्री के गले लगने तथा उनसे बात करते राहुल की एक कुल तीन फोटो चार कॉलम में है और इसके नीचे एक खबर है, अति उत्साह में मर्यादा भूले राहुल गांधी और सिंगल कॉलम में आंख भी मारी। इसके नीचे चार कॉलम में ही एक खबर है राफेल पर गलतबयानी कर फंसे कांग्रेस अध्यक्ष। राहुल अतिउत्साह में थे ये अखबार को कैसे पता चला मैं नहीं जानता। संसद में उनकी इस कार्रवाई को बचकाना कहा गया था। यह तो मैंने सुना, पढ़ा औऱ देखा।</p>
<p>नया इंडिया का पहला पन्ना साफ सुथरा और कम माथा पच्ची करके बनाया हुआ लगता है। इसमें गले लगने वाली फोटो नहीं है। और प्रधानमंत्री के कथन, &#8220;अस्थिरता के लिए अविश्वास प्रस्ताव&#8221; को लीड बनाया गया है। राहुल के आरोपों को साथ ही बॉक्स में राहुल की फोटो के साथ लगाया गया है जबकि &#8216; टीडीपी ने भाजपा को दिया श्राप शीर्षक से एक बॉक्स फोल्ड के ऊपर है। कुल मिलाकर संतुलित है पर श्रम और संसाधन की कमी साफ दिखती है। वह अलग समस्या और विषय है।</p>
<p>प्रभात खबर ने यह खबर सात कॉलम में छापी है। पर राहुल के आरोप नहीं हैं। प्रधानमंत्री के जवाब को प्रमुखता दी गई है। शीर्षक है, 199 मतो से गिरा अविश्वास प्रस्ताव, मोदी बोले चार साल काम के बूते खड़ा हूं और अड़ा भी हूं। राहुल के भाषण की खबर छोटे बॉक्स में है शीर्षक औऱ फोटो कैप्शन एक सा है पर शुरुआत इसी से होती है कि राहुल के व्यवहार ने सभी को आश्चर्य में डाल दिया।</p>
<p>हिन्दी अखबारों में राजस्थान पत्रिका का पेज मेहनत करके बनाया हुआ और संतुलित लगता है। &#8220;राहुल की गांधी गीरी, मोदी का विपक्ष के &#8216;विश्वास&#8217; पर प्रहार&#8221; फ्लैग के साथ अविश्वास के बहाने चुनावी मंच बनी संसद सारी बातों को समेटने वाला शीर्षक है। नीचे तमाम प्रमुख बातें जो हुईं &#8211; का उल्लेख है। गले लगने की तीन तस्वीरें लीड के साथ हैं। सबसे दिलचस्प है राहुल की फोटो एक उंगली दिखाते हुए है तो मोदी की फोटो दोनों हाथों की एक-एक उंगली दिखाते हुए है।</p>
<p>दैनिक हिन्दुस्तान का पहला पेज सबसे कमजोर लगा। शीर्षक वही है जो सुबह ही लगाकर अखबार छापा जा सकता था। शिवसेना के बिना सरकार ने भरोसा जीता &#8211; की बैनर हेडिंग के बाद विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव खारिज &#8211; दोहराव है। दोनों ओर से खूब चले सियासी तीर और मोदी बोले अहंकार में लाए प्रस्ताव &#8211; खबर के नाम पर पाठकों को कूड़ा परोसने के अलावा कुछ नहीं है। विशेष संवावदाता की लीड खबर पर मैं टिप्पणी नहीं कर रहा पर डेस्क का काम बहुत कमजोर दिख रहा है। शाकाहारी किस्म का मामला है &#8211; किसी को कोई शिकायत नहीं, कुछ खास नहीं और बिल्कुल बेकार भी नहीं।</p>
<p>दैनिक भास्कर ने, &#8220;गले पड़ा अविश्वास&#8221; शीर्षक लगाया है। यह कुछ नया अनूठा करने की कोशिश है। पर किसके गले पड़ा यह अखबार और पाठक की राय में अलग हो सकता है। गले लगने वाली फोटो के ऊपर लिखा है 52 मिनट बोले राहुल। आप मुझसे नफरत करें, मुझे पप्पू कहें पर मेरे अंदर आपके लिए नफरत नहीं है। इसके साथ ही दो कॉलम में (गले लगने पर) मोदी का जवाब शीर्षक है &#8211; वोटिंग से पहले मेरी कुर्सी तक पहुंचने का उत्साह है। पर यहां तो जनता पहुंचाती है। इसके नीचे एक कॉलम में राहुल के आरोप और दूसरे में मोदी के जवाब हैं।</p>
<p>अमर उजाला ने राम विलास पासवान के बयान को प्रमुखता दी है कि एससी-एसटी ऐक्ट पर कोर्ट का फैसला उल्टा आया तो लाएंगे अध्यादेश। यह खबर अंदर के पेज पर है। लेकिन मुख्य खबर का शीर्षक बहुत ही रूटीन 199 वोटों से गिरा अविश्वास प्रस्ताव। राहुल बनाम मोदी में बदली चर्चा &#8211; कांग्रेस अध्यक्ष ने लगाए सीधे आरोप तो प्रधानमंत्री ने कहा प्रस्ताव से देश में अस्थिरता फैलाने की साजिश। गले लगने वाली फोटो का शीर्षक है, इस झप्पी ने सबको चौंकाया &#8230;. प्रस्ताव से ज्यादा इसी के चर्चे। इसके साथ लोकसभा अध्यक्ष का बयान भी है, अध्यक्ष खफा, बोलीं ड्रामा देख मैं भी हैरान।</p>
<p>कुल मिलाकर हिन्दी अखबारों में धार या पैनापन नहीं है। जहां चाटुकारिता नहीं है वहां भी नयापन नहीं है। जबकि टेलीग्राफ ने लीड के साथ पहले पेज पर डायपर में एक बच्चे की तस्वीर है और उसके साथ लिखा है, &#8220;भाजपा, रोने वाले बच्चे मत बनो बल्कि दुलारने लायक बच्चा बनो।&#8221; इसके नीचे कैप्शन है, अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राहुल गांधी के गले लगने से अप्रभावी लगे तो भाजपा ने मंत्री अनंत कुमार को सद्भावना और शांति के सदाबहार कार्य को &#8220;बचाकाना&#8221; कहने के लिए लगाया। अपने जवाब में मोदी ने राहुल के इस कृत्य को बचकानी हरकत कहा। अखबार ने लिखा है कि गले लगने के उस्ताद के शिकार देखने के लिए पेज चार देखें और पेज चार पर कई अंतरराष्ट्रीय हस्तियों से गले लगते प्रधानमंत्री की तस्वीर है।</p>
<p>मेरा मानना है कि राहुल का संसद में गले लगना बिल्कुल अलग किस्म का मामला था। अखबार इसपर अपनी राय क्यों न दें? और न दें तो अखबार में नया क्या है? ऐसे कितने दिन चलेंगे ये अखबार? </p>
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