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	<title>gst Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>निश्चिन्त रहें !! १८% हो या ५६% !!  टैक्स का कम होना उनका मार्ग प्रशस्त नहीं करेगा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संजय कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 23 Dec 2018 05:58:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अन्य]]></category>
		<category><![CDATA[election]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली ​: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को कहा था, &#8220;आज &#8230; हमलोग एक ऐसी स्थिति के लिए काम कर रहे हैं जब 99 प्रतिशत वस्तुओं / सेवाओं पर जीएसटी 18 प्रतिशत से कम हो जाएगा।&#8221; यह खबर अगले दिन सभी अखबारों में प्रमुखता से छपी। बहुत कम ने यह बताया कि जीएसटी से [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>नई दिल्ली ​: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को कहा था, &#8220;आज &#8230; हमलोग एक ऐसी स्थिति के लिए काम कर रहे हैं जब 99 प्रतिशत वस्तुओं / सेवाओं पर जीएसटी 18 प्रतिशत से कम हो जाएगा।&#8221; यह खबर अगले दिन सभी अखबारों में प्रमुखता से छपी। बहुत कम ने यह बताया कि जीएसटी से संबंधित घोषणा वित्त मंत्री को करनी चाहिए न कि प्रधानमंत्री को और शनिवार को जब जीएसटी कौंसिल की बैठक होनी थी तो प्रधानमंत्री का मंगलवार को ऐसा कहना संदेश देने जैसा था। यही नहीं 99 प्रतिशत वस्तुओं / सेवाओं पर जीएसटी कम होने का दावा भी भ्रम फैलाने वाला था। इस बारे में मैंने बुधवार, 19 दिसंबर को विस्तार से लिखा था। अब कल वह बैठक हुई। क्या उसमें 99 प्रतिशत वस्तुओं की दर 18 प्रतिशत से कम हुई? क्या आपके अखबार ने उसी प्रमुखता से बताया? ढूंढ़िए पढ़िए और जानिए।</p>
<p>इंडियन एक्सप्रेस ने बुधवार को इस खबर को पहले पन्ने पर लीड बनाया था। आज भी चार कॉलम में लीड है। फ्लैग शीर्षक है, “सरकारी खजाने के लिए प्रति वर्ष 5500 करोड़ रुपए का कदम”। मुख्य शीर्षक है, “जीएसटी कौंसिल ने दर और कम की सिर्फ 28 आयटम अब सर्वोच्च स्लैब में रह गए”। अंग्रेजी दैनिक ‘द टेलीग्राफ’ ने लिखा है कि 34 आयटम पर 28 प्रतिशत टैक्स था और इसमें से सात पर (इंडियन एक्सप्रेस ने छह लिखा है) टैक्स कम किया गया है। क्या यह 99 प्रतिशत है? शीर्षक इसपर शांत है। दरअसल यह 97.9 प्रतिशत बैठता है। टेलीग्राफ ने लिखा है कि दो प्रमुख वस्तुओं &#8211; सीमेंट और ऑटोमोबाइल पार्ट्स (वाहनों के पुर्जे) पर अब भी 28 प्रतिशत टैक्स है। 28 प्रतिशत टैक्स वाले अन्य आयटम में एयरकंडीशनर और डिश वाशर जैसे लक्जरी तथा पान मसाला, सिगरेट जैसे सिन (पाप) आयटम हैं।</p>
<p>इनपर टैक्स कम नहीं करने का पुराना निर्णय है। ऐसे में आंकड़ों की बात अलग कर दें तो इन वस्तुओं का महत्व और इनपर 28 प्रतिशत टैक्स का मतलब समझ में आएगा। इसीलिए, इसे कम नहीं किया गया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि कौंसिल ने इन दो आयटम पर टैक्स कम करने के प्रभाव को इस समय बहुत ज्यादा माना और इनपर टैक्स कम नहीं करने का निर्णय लिया। आप जानते हैं कि जीएसटी कौंसिल में अब तीन गैर भाजपाई वित्त मंत्री बढ़ गए हैं और पहले की तरह भाजपा का बहुमत नहीं रहा। टेलीग्राफ ने लिखा है कि इन दो वस्तुओं से सरकार को 34,000 (एक्सप्रेस 33,000) करोड़ रुपए टैक्स में मिलते हैं। हालांकि, वित्त मंत्री ने कहा है कि अगला लक्ष्य सीमेंट पर टैक्स की दर दुरुस्त करना होगा।</p>
<p>हिन्दुस्तान टाइम्स में भी यह खबर लीड है। शीर्षक है, “जीएसटी कौंसिल ने आम उपयोग के 23 आयटम पर टैक्स कम की”। उपशीर्षक है, “टीवी, मूवी टिकट, पावर बैंक कर की कम दर में लाए गए”। हिन्दुस्तान टाइम्स ने अपनी इस मुख्य खबर के साथ तीन कॉलम में एक और खबर छापी है। इस खबर का शीर्षक है, “सरकार की नजर मध्यमवर्ग और व्यापारियों पर विपक्ष ने कहा वोट मिलने में सहायक नहीं होगा”। इस बार एक और खास निर्णय हुआ है। वह है, ब्रांडेड और फ्रोजन सब्जियों पर टैक्स पांच से शून्य कर दिया जाना। इसके मुकाबले याद कीजिए कि सैनिटेरी नैपकिन को टैक्स मुक्त करने में कितनी समस्या आई थी और आखिरकार उसे कब व कैसे टैक्स मुक्त किया गया तथा उसके पहले सरकार की ओर से क्या कहा गया था।</p>
<p>टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी इस खबर को लीड बनाया है। शीर्षक है, “23 आयटम्स पर जीएसटी दर कम की गई, कुछ और पर अगले महीने कम हो सकती है”। इंट्रो है, “सिर्फ सीमेंट और अन्य उत्पाद 28 प्रतिशत टैक्स की दर में रह गए”। अखबार ने अरुण जेटली का एक कोट प्रमुखता से छापा है। इसके मुताबिक 28 प्रतिशत जीएसटी की दर खत्म होने वाली है और उसमें सिर्फ लक्जरी व सिन आयटम रहेंगे। तीन आयटम उच्च आयवर्ग के उपयोग वाले हैं और आम उपयोग का सिर्फ एक आयटम रह गया है। आप पहले पढ़ चुके हैं कि यह ‘एक’ आयटम, वाहनों के पुर्जे और सीमेंट है। पता नहीं वित्त मंत्री किसे आम आदमी के उपयोग का मानते हैं।</p>
<p>वैसे तो यह सरकारी खबर है और महत्वपूर्ण सूचना भी। इसलिए, सभी अखबारों में लीड के रूप में छपना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन 99 प्रतिशत आयटम पर जीएसटी कम होने के दावे पर शीर्षक में कहीं चर्चा न होने का क्या मतलब लगाया जाए? ना पूर्व घोषणा वाले दिन उस पर सवाल उठाया गया ना आज जब वैसा नहीं हुआ। दैनिक भास्कर में यह खबर आज भी लीड है और विस्तार से जानकारी दी गई है। हालांकि जो महत्वपूर्ण बात है उसे हाईलाइट नहीं किया गया है। क्या आप जानते थे कि विकलांगों के काम आने वाले साधनों के पुर्जों और उपस्करों पर टैक्स पहले 28 प्रतिशत था। इसे अब पांच प्रतिशत कर दिया गया है। अब आप तय कीजिए कि बड़ा काम पहले हुआ था या अब हुआ है।</p>
<p>दैनिक जागरण में यह खबर लीड है। शीर्षक है, “दो दर्जन वस्तुओं और सेवाओं पर घटा जीएसटी”। उपशीर्षक है, “केंद्र ने जनता व कारोबारियों को बड़ी राहत दी है आम चुनाव से पहले”। पता नहीं, इसे सीधे क्यों नहीं कहा गया है कि, &#8220;केंद्र ने आम चुनाव से पहले जनता व कारोबारियों को बड़ी राहत दी&#8221;। हालांकि, मामला 99 प्रतिशत वस्तुओं का था। जागरण ने शीर्षक में 23 को दो दर्जन कर दिया।</p>
<p>अमर उजाला में भी यह खबर लीड है और शीर्षक बिल्कुल लोक-लुभावन – “टीवी, कंप्यूटर, टायर समेत 23 वस्तुएं सस्ती, 6 सेवाओं पर जीएसटी में कमी”। उपशीर्षक है, “नए साल से पहले तोहफा दिव्यांगों के लिए व्हीलचेयर जैसे जरूरी सामान पर जीएसटी 28 से 5 फीसदी किया”। किन वस्तुओं पर टैक्स कम हुआ है उसकी सूची मुख्य खबर के साथ है और उसका शीर्षक है, “कैमरा समेत ये वस्तुएं भी सस्ती”। तीन हिन्दी राज्यों में चुनाव हारने के बाद जीएसटी कम कर मध्यमवर्ग को खुश करने की सरकार की कोशिश इस शीर्षक से पूरी तरह स्पष्ट है।</p>
<p>नवभारत टाइम्स में भी खबर लीड है। शीर्षक है, &#8220;न्यू ईयर पर छोटा गिफ्ट, 23 चीजों पर घटा जीएसटी&#8221;। उपशीर्षक है, &#8220;सीमेंट-रियल एस्टेट पर चुप्पी, आम चुनाव से पहले बड़े तोहफे की तैयारी&#8221;? एक बॉक्स में बताया गया है कि किन वस्तुओं पर टैक्स कितना कम हुआ और कारोबारियों को क्या राहत मिली। इसका शीर्षक है, &#8220;एक जनवरी से मूवी टिकट, टीवी, मोबाइल बैट्री सस्ते होंगे।&#8221; नवभारत टाइम्स ने दिल्ली में नई कार महंगी होने की खबर को इसके साथ जोड़कर छापा है।</p>
<p>हिन्दुस्तान में भी यह खबर लीड है। शीर्षक है, &#8220;तोहफा : टीवी-कंप्यूटर समेत 23 वस्तुएं सस्ती।&#8221; नवोदय टाइम्स ने इसे केंद्र का न्यू ईयर गिफ्ट कहा है। शीर्षक है, “टीवी,एसी, सिनेमा टिकट सस्ते”। राजस्थान पत्रिका में यह खबर ढंग से छपी है। लगभग सभी पहलू प्रमुखता से पहले ही पन्ने पर हैं। मोदी ने कहा था, “99 प्रतिशत वस्तुएं 28 प्रतिशत स्लैब से होंगी बाहर” के साथ।</p>
<p>जीएसटी कम करने की घोषणा से लेकर असल में क्या हुआ और कुछ प्रमुख अखबारों ने अपने पाठकों को क्या बताया उसकी चर्चा मैंने यहां की है ताकि आप अपने अखबार की सूचना से तुलना कर सकें और अपने अखबार को जान सकें।  </p>
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		<title>जीएसटी ​यानि &#8216;किंकर्तव्यविमूढ़&#8217;​ क्रेता-विक्रेता-व्यापारी और सरकार बल्ले-बल्ले ​</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Desk Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Nov 2018 02:40:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[किताब]]></category>
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		<category><![CDATA[finance]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सुरुचि सुमन आमतौर पर लोग किताब लिखते हैं तो माता-पिता, गुरु, अभिभावक को समर्पित करते हैं पर संजय कुमार सिंह की यह किताब “जीएसटी की अबूझ पहेली से परेशान देश भर के छोटे कारोबारियों, व्यापारियों और व्यवसायियों को समर्पित है, जो जीएसटी को जाने-समझे बगैर इसे स्वीकार करने के लिए मजबूर हुए। ना इसका विरोध [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सुरुचि सुमन</strong></p>
<p>आमतौर पर लोग किताब लिखते हैं तो माता-पिता, गुरु, अभिभावक को समर्पित करते हैं पर संजय कुमार सिंह की यह किताब “जीएसटी की अबूझ पहेली से परेशान देश भर के छोटे कारोबारियों, व्यापारियों और व्यवसायियों को समर्पित है, जो जीएसटी को जाने-समझे बगैर इसे स्वीकार करने के लिए मजबूर हुए। ना इसका विरोध कर पाए और ना झेल पाए। अब भी उधेड़बुन में हैं और समझते हैं कि सरकार काले धन पर नियंत्रण के लिए यह सब कर रही है।” और यह यूं ही नहीं है। किताब पढ़ते हुए कई बार लगता है कि ऐसा है तो वाकई गड़बड़ है। और इसका तो विरोध होना ही चाहिए। पर जैसा कि लेखक ने लिखा है, देश के आम कारोबारी ना इसका विरोध कर पाए और ना झेल पाए। और तो और एक बड़े ट्रांसपोर्टर के आत्महत्या करने की खबर हम सब पढ़ ही चुके हैं। नोटबंदी और जीएसटी से परेशान ट्रांसपोर्टर प्रकाश पांडे ने मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक अपनी फरियाद पहुंचाने का प्रयास किया। सबने उनकी गुहार सुनी पर कार्रवाई किसी ने नहीं की। </p>
<p>पुस्तक में संजय ने अपनी बात कहने के साथ-साथ जीएसटी पर जाने माने अर्थशास्त्रियों की टिप्पणियों का अनुवाद भी शामिल किया है। इनमें वन नेशन, वन टेंशन – अंशुमान तिवारी; पूंजी के आदिकालीन एकत्रीकरण की व्यवस्था : प्रभात पटनायक; झन्नाटेदार बदलाव क्यों जरूरी है : टीसीए शरदराघवन; जीएसटी : आधुनिक सुधार है, सरकारी नालायकी के साथ : चेतन भगत और मौजूदा स्वरूप को जारी रखना भारी भूल : इंदिरा राजरमण, प्रमुख हैं। एक अध्याय का शीर्षक है, सस्ते मजदूर और व्यस्त ठेकेदार बनाएगा जीएसटी। कुछ अनाम शिकायतें भी शामिल की गई हैं। जैसे व्यापारी मित्रों के नाम एक सीए का खुला पत्र और जीएसटी पर एक व्यापारी की सुनिए। इससे भी पता चलता है कि जीएसटी वाकई झंझट ही झंझट है।</p>
<p>पुस्तक में संजय ने सैनिटेरी नैपकिन पर जीएसटी खत्म करने के मामले की भी चर्चा की है और यह बताने की कोशिश की है कि जीएसटी स्वभाव से ही जटिल है और इसके पक्ष में उन्होंने यह उदाहरण दिया है। उन्होंने लिखा है, सैनिटेरी नैपकिन को जीएसटी से मुक्त करने में एक साल लग गए और यह 99वें अध्याय का शीर्षक है। इसमें उन्होंने कहा है, सैनिटेरी नैपकिन पर जीएसटी का मामला हाईकोर्ट में था। केंद्र सरकार इसके खिलाफ सुप्रीमकोर्ट गई। तर्क दिए पर सुप्रीम कोर्ट ने इसपर स्टे दे दिया। वह इसपर विचार करना चाहती थी और इस मामले को खुद देखना। इस बीच अचानक जीएसटी कौंसिल ने सैनिटेरी नैपकिन को जीएसटी मुक्त कर दिया। केंद्र सरकार ने अदालत में कहा था कि सैनिटेरी नैपकिन को टैक्स मुक्त करने से देसी निर्माता इसपर इनपुट क्रेडिट नहीं ले पाएंगे और उत्पाद महंगा हो जाएगा। अगर ऐसा ही था तो बाद में फैसला इसीलिए लिया गया कि सुप्रीम कोर्ट जीएसटी पर विचार न करे। दूसरी ओर, इससे यह भी साबित होता है केंद्र सरकार या जीएसटी कौंसिल ऐसा कर पाती तो पहले ही कर देती। उसने समस्या कोर्ट को बताई भी थी और शायद इसीलिए अदालत इस मामले को स्वंय सुनना चाहती थी पर सरकार ने फिलहाल इसे बचा लिया है।</p>
<p>पुस्तक की प्रस्तावना में लेखक ने लिखा है, “प्रस्तुत पुस्तक एक छोटे कारोबारी के रूप में जीएसटी को जानने समझने की कोशिश का हिस्सा है। जीएसटी लागू होने के बाद यह बताये जाने पर कि कई स्थितियों में 20 लाख रुपए प्रतिवर्ष से कम का कारोबार भी जीएसटी से मुक्त नहीं है, लगभग 100 दिनों तक लगातार और उसके बाद अलग-अलग मौकों पर लिखी गई टिप्पणियों का संकलन है। संभव है, इनमें से कुछ अब व्यर्थ लगें, लागू न हों या बदल गए हों। जीएसटी के नियमों के अनुसार कंप्यूटर पर ई-मेल इंटरनेट के जरिए अपने राज्य के बाहर के ग्राहकों के लिए काम करने वालों का जीएसटी पंजीकरण जरूरी है। और यह पहले के नियमों की तरह नहीं है कि आप पंजीकरण न कराएं पर कार्रवाई तभी होगी जब पकड़े जाएंगे।” यह लिखने पढ़ने का काम करने वाले सभी लोगों के लिए चिन्ता की बात है।</p>
<p>समस्या जीएसटी से कम और इसके छोटे कारोबार विरोधी रुख से ज्यादा है। हालंकि, इस पूरी व्यवस्था का असर यह हुआ है कि छोटे कारोबार बंद होते जा रहे हैं और छोटे कारोबार जो बंद हो जाएं उनका दोबारा चालू होना लगभग असंभव है। बड़े कारोबार तो टैक्स लगा देंगे और खर्चा जोड़ देंगे। समस्या उनके साथ हैं जिनके पास काम ही कम है। जो पहले ही जरूरत भर नहीं कमाते हैं वे टैक्स भरने और रिटर्न दाखिल करने का खर्च कहां से लाएं। दुखद यह है कि सरकार ऐसे लोगों की एक नहीं सुन रही है अगर उसे लगता है कि जीएसटी से फायदा होगा तो क्या उसने कभी हिसाब लगाया कि फायदा कितना होगा और कारोबार बंद होने से कितना नुकसान होगा। स्पष्ट है इसका उत्तर नहीं ही होगा पर सरकार इस बात से निश्चित है कि जीएसटी का विरोध नहीं हो रहा है और आम मतदाता तक इसकी सूचना नहीं है।</p>
<p>यह किताब अमैजन (goo.gl/yNcS4W) और प्रकाशक के वेबसाइट (goo.gl/KUxVj8) पर जाकर भी ऑर्डर की जा सकती है। 248 पेज के इस पुस्तक की कीमत है 299 रुपए।</p>
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		<title>जीएसटी के कारण भारत में उद्योग-धन्धे चौपट हो रहे हैं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संजय कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 Mar 2018 16:52:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[व्यापार]]></category>
		<category><![CDATA[businessmen]]></category>
		<category><![CDATA[gst]]></category>
		<category><![CDATA[कारोबारी-व्यापारी]]></category>
		<category><![CDATA[जीएसटी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>जल्दी के विवाह, यानि &#8220;कनपट्टी&#8221; में सिन्दूर भारत में जीएसटी (गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स) की शुरुआत एक जुलाई 2017 से हुई है और यह देश भर में लागू है। 122वां संविधान संशोधन विधेयक पास होने के बाद इसे लागू किया गया है। जीएसटी के संचालन के लिए जीएसटी कौंसिल बनाई गई है। केंद्रीय वित्त मंत्री [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>जल्दी के विवाह, यानि &#8220;कनपट्टी&#8221; में सिन्दूर </p></blockquote>
<p>भारत में जीएसटी (गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स) की शुरुआत एक जुलाई 2017 से हुई है और यह देश भर में लागू है। 122वां संविधान संशोधन विधेयक पास होने के बाद इसे लागू किया गया है। जीएसटी के संचालन के लिए जीएसटी कौंसिल बनाई गई है। केंद्रीय वित्त मंत्री इसके चेयरमैन हैं। शुरू में जीएसटी को, &#8220;एक देश, एक टैक्स&#8221; कहा गया था पर इसमें केंद्र और राज्य सरकार के लिए आधा-आधा टैक्स वसूला जाता है और शून्य से लेकर 28 प्रतिशत तक की पांच दरें हैं। 0.25 प्रतिशत और 3 प्रतिशत की विशेष दर सिर्फ दो आयटम रफ डायमंड (अनगढ़ हीरे) और सोने के लिए हैं। पेट्रेलियम उत्पाद और भूसंपदा अभी तक जीएसटी से मुक्त हैं और यह सब &#8220;एक देश, एक टैक्स&#8221;; के दावे का मजाक उड़ाने के लिए पर्याप्त हैं।</p>
<p>असल में जीएसटी को बगैर तैयारी के जल्दबाजी में थोप दिया गया है। इसके पक्ष में तर्क यह है कि तैयारी के चक्कर में पड़ने पर आदर्श स्थिति आती ही नहीं और लागू होना टलता रहता। दूसरी ओर, इस कारण उद्योग धंधे चौपट हो रहे हैं। इसका असर देश की अर्थव्यवस्था के साथ सामान्य व्यक्ति के जीवन यापन पर पड़ेगा जो पहले से ही बहुत अच्छी स्थिति में नहीं था। लागू करने से पहले आवश्यक तैयारी नहीं करने का ही नतीजा है कि टैक्स की दर बार-बार बदल रही है। इससे बाजार में अराजकता की स्थिति है। ग्राहकों को टैक्स में छूट का लाभ नहीं मिलता और बेईमान व्यापारी लाभ कमा रहे हैं। टैक्स रिटर्न फाइल करने की अवधि और दायरे में आने वाले उद्यमी सब बदले गए। बदले जाते रहे। इसलिए स्थिरता नहीं आई, वसूली कम हुई। और इसके अलग नुकसान हैं।</p>
<p>वैसे तो जीएसटी एक उलझी हुई प्रक्रिया है और इसे सोच समझ कर लागू किया जाना चाहिए था। ऐसा नहीं करके पूरे देश को जीएसटी की प्रयोगशाला बना दिया गया है और उसका नुकसान सारे देश को उठाना पड़ेगा। यह सब एक अच्छे पोर्टल और सॉफ्टवेयर से अपेक्षाकृत रूप से बहुत आसानी से हो सकता था। पर इसके लिए अच्छे सॉफ्टवेयर का विकास करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए था। अभी हालत यह है कि अकाउंटिंग के काम करने वाले खुश हैं कि उन्हें काम और पैसे मिल रहे हैं पर देर-सबेर जब सॉफ्टवेयर बन जाएगा तो ये बेरोजगार हो जाएंगे। हालांकि, ऐसे लोग भी महानगरों में ही हैं छोटे शहरों में काम जानने वालों की भारी कमी है। इससे व्यापारी चाहकर भी टैक्स नहीं दे सकते, रिटर्न दाखिल करने की मुश्किल प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाएंगे और परेशान किए जाएंगे या कारोबार छोड़कर रिटर्न दाखिल करने के लिए परेशान रहेंगे। कर आधार बढ़ाने के लिए जीएसटी में ज्यादा से ज्यादा उद्योग-धंधों और पेशों को कर दायरे में लाने की कोशिश की गई है ताकि टैक्स की दर कम की जा सके। पर टैक्स इतनी ज्यादा रखी गई वह गुजरात चुनाव से पहले और अभी तक कम की जा रही है।</p>
<p>कायदे से पहले बड़े कारोबारियों को जीएसटी के दायरे में लिया जाता और फिर धीरे-धीरे छोटे कारोबारियों को शामिल करते जाते। साथ-साथ टैक्स दर में कमी होती रहती तो लोगों को लाभ सामने दिख रहा होता औऱ नकारात्मक प्रचार जैसी कोई स्थिति बनती ही नहीं। इसमें कोई शक नहीं है कि टैक्स का मामला बड़े कारोबारी को तो मानना ही है और उन्हें आवश्यक उपाय करने हैं। अगर शुरुआत बड़े कारोबारियों से की जाती तो शोर कम होता और अच्छी प्रतिक्रिया व व्यावहारिक परेशानियों से संबंधित जानकारी मिलती जिसके आधार पर संशोधन किए जा सकते थे। लेकिन यह सब नहीं किया गया। औऱ मांग के अनुसार टैक्स की दर बढ़ाई-घटाई जा रही है, सुविधाओं या अनुपालन में छूट दी जा रही है। इससे कारोबार को अलग परेशानी है और उन्हें रोज<br />
कीमतें बदलने से लेकर मशीनों की प्रोग्रामिंग, पुराने स्टॉक की कीमत में परिवर्तन जैसे काम बेकार करने पड़ रहे हैं।</p>
<p>जीएसटी कंप्यूटर औऱ इंटरनेट आधारित टैक्स प्रणाली है। इसमें कागज भरने और जमा करने की कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए इसके प्रावधान ऐसे हैं जो बिना कंप्यूटर या अच्छे सॉफ्टवेयर की उपलब्धता के मुश्किल लगते हैं। दूसरी ओर, हमारे यहां बहुत सारे कारोबारी ना तो पढ़े लिखे हैं और ना ही कंप्यूटर पर काम करते हैं। इसलिए, जीएसटी लागू होते ही कइयों के लिए कंप्यूटर खरीदना, चलाना जानना या कंप्यूटर जानने वाले की सेवा लेना आवश्यक हो गया है। ऑनलाइन रिटर्न फाइल करने के लिए अंग्रेजी आना भी जरूरी है। इस तरह जीएसटी लागू होने से अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर में निवेश करना भी जरूरी है। इससे पूंजी की आवश्यकता बढ़ गई है, टैक्स जमा करवाकर रीफंड लेने के नियम का अनुपालन करने से पूंजी फंस गई है। इससे कारोबार<br />
या व्यवसाय महंगा हो गया। देश भर में निर्बाध विद्युत आपूर्ति और ब्रॉडबैंड जैसी बुनियादी जरूरतें सुनिश्चित नहीं है तो मुश्किलें आनी ही थीं।</p>
<p>आम कारोबारी और व्यवसायी इन झंझटों में ना फंसें इसीलिए नियम है कि प्रतिवर्ष एक निश्चित राशि से कम का कारोबार करने वालों के लिए टैक्स पंजीकरण आवश्यक नहीं है। पर जीएसटी में कई मामलों में यह छूट प्रभावी नहीं है और बहुत मामूली कारोबार या व्यवसाय करने वाले के लिए भी जीएसटी पंजीकरण अनिवार्य है। ऐसे छोटे व्यवसायी अगर जीएसटी पंजीकरण न कराएं तो नियमानुसार पंजीकृत कारोबारी इनसे काम नहीं करा सकते (फिलहाल इसमें छूट दी गई पर कई दूसरी शर्तों और देर-सबेर छूट वापस लिए जाने पर) छोटे कारोबारों का बंद होना तय है। इसे जीएसटी नामक व्यापक लाभ के लिए आवश्यक माना गया है पर इस बात का कोई अनुमान नहीं है कि ऐसे कितने कारोबार या व्यवसायी इससे प्रभावित होकर कारोबार बंद करने को मजबूर होंगे। इसके अनुपात में जीएसटी लागू करने का लाभ कितना है। जीएसटी का लाभ यही बताया गया है कि पुरानी व्यवस्था में किसी उत्पाद के निर्माण में लगने वाले कच्चे माल, मूल्यवर्धन, पैकिंग आदि पर अलग- अलग टैक्स लगता है और टैक्स पर टैक्स लगने से कीमत बढ़ जाती है। इसलिए, जीएसटी में इनपुट ट्रैक्स क्रेडिट की व्यवस्था है। इस व्यवस्था का दुरुपयोग ना हो यह सुनिश्चित करने के लिए हर चीज का सबूत चाहिए और उसका मिलान होने के बाद ही छूट मिलेगी। इसलिए नियम मुश्किल भरे हैं और परेशान करने वाले लगते हैं।</p>
<p>इसलिए होना यह चाहिए था कि सभी संबंधित पक्षों को पहले नियम बताए जाते फिर उन्हें उनका मकसद बताया जाता और इसे आसान करने का तरीका सुझाने के लिए कहा जाता। अगर यह सब किया जाता तो नियम आसान बनने के साथ-साथ जनता को यकीन होता कि जो नियम हैं वो जरूरी हैं और व्यापक भलाई के लिए हैं। हालांकि, अभी भी, जीएसटी लागू करने की पूरी प्रक्रिया इस बात पर केंद्रित है कि कारोबारी और जनता टैक्स चोरी करती है। इसमें टैक्स वसूलने के तंत्र को एकदम छोड़ दिया गया है। निचले स्तर के बाबू से ले कर मंत्री तक सब ईमानदार तो हैं ही। उनपर किसी नजर-निगरानी की आवश्यकता नहीं है। सब कुछ कारोबारी साबित करे। जीएसटी के अलोकप्रिय होने का कारण यह गलत मान्यता भी है। इस कारण जीएसटी में बहुत सारी खामियां हैं। इन्हें दूर करना होगा। इसलिए, जीएसटी से लाभ क्या होगा यह तो भविष्य की बात है मूलभूत समस्या, बनी रहेगी।</p>
<p>जीएसटी में ग्राहक को जानना एक महत्वपूर्ण पहलू है। खासकर मोटी खरीदारी या नियमित सेवा देने वालों को। मकसद स्पष्ट है &#8211; जरूरत पड़ने पर उससे धन का स्रोत पूछा जा सके। फर्जी खर्चे न दिखाए जा सकें। इसी क्रम में सोने की खरीदारी करने वाले ग्राहकों के आयकर का स्थायी खाता संख्या लेना दुकानदारों के लिए आवश्यक कर दिया गया था। दुकानदारों का कहना है कि इससे बिक्री कम हो गई है। और सरकार ने कारोबारियों के दबाव में दो लाख तक की खरीद पर स्थायी खाता संख्या की बाध्यता खत्म कर दी। यह राशि बहुत बड़ी है और पति-पत्नी मिलकर हर साल दो-दो यानी चार लाख का सोना आयकर का स्रोत बताये बगैर खरीद सकते हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि देश का बहुत सारा काला पैसा इस तरह सोने में खप जाएगा जो नोटबंदी जैसे उपायों से भी पकड़ में नहीं आएगा। सरकार का यह कदम भ्रष्टाचार और कालाधन खत्म करने के सरकार के दावे की हवा निकाल देगा। इससे सरकार की मजबूरी का पता चलता है और यह भी कि वह चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करने को तैयार है।</p>
<p>अगर ऐसा है तो बाकी सब कुछ दिखावा, प्रचार है, व्यर्थ है। कभी भी बदल जाएगा, खत्म हो जाएगा। जीएसटी का एक और खतरनाक हिस्सा है ई-वे बिल। इसका अनुपालन भी काफी मुश्किल है। इसे टाल दिया गया गया था। पर अब लागू करने की तारीख करीब है कारोबारी कहते हैं मुश्किल है और सरकार इसे लागू करने पर आमादा है। इसकी कई परेशानियों के विस्तार में न जाकर यहां यही कहूंगा कि इसमें एक नियम है कि कोई सामान किस गाड़ी से जा रहा है उसका नंबर भी लिखा रहे। सुनने में यह वाजिब भी लगता है। पर ट्रांसपोर्टर कई बार अपना सामान एक स्थान तक एक गाड़ी से और फिर दूसरी गाड़ी से भेजते हैं। यह व्यावहारिक जरूरत है। हर बार नंबर बदलना या गाड़ी न बदलना व्यावहारिक तौर पर कितना मुश्किल है इसकी कल्पना की जा सकती है। ऐसे नियम ना माने जा सकते हैं और ना इसके लिए काम रुकेगा – ऐसे में आप समझ सकते हैं कि ऐसे नियमों से चोरी और भ्रष्टाचार ही बढ़ेगा। कीमतें बढ़ेंगी।</p>
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