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	<title>governor Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>जब राज्यपालों का वेतन ​66,000/- रुपये से 1,20,000 रुपये ​प्रतिवर्ष था, और उसे भी क़तर दिया गया</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 22 Oct 2025 03:17:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[administration]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>​नई दिल्ली : बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि भारत के लाट साहबों (राज्यपालों) को स्वतंत्रता प्राप्ति की तारीख के महज 144 घंटों के अंदर, यानी 15 अगस्त, 1947 के छठे दिवस भारतीय प्रशासन का पहला डंडा उन पर पड़ा और वेतन की राशि में कटौती ही नहीं, छपट दी गई थी। लेकिन तत्कालीन [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>​नई दिल्ली : बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि भारत के लाट साहबों (राज्यपालों) को स्वतंत्रता प्राप्ति की तारीख के महज 144 घंटों के अंदर, यानी 15 अगस्त, 1947 के छठे दिवस भारतीय प्रशासन का पहला डंडा उन पर पड़ा और वेतन की राशि में कटौती ही नहीं, छपट दी गई थी। लेकिन तत्कालीन लाट साहबों ने अपने केंद्र के शासनाध्यक्षों के प्रति, अधिनियमों के प्रति चूं तक नहीं किये।</strong></p>
<p>वजह था भारत आज़ाद हो गया था। देश का प्रत्येक नागरिक स्वाधीन भारत में सांस लेना प्रारम्भ किया था। लोगों की जिंदगी एक नए सिरे से प्रारम्भ हुई थी। अगर आज किसी भी लाट साहबों का तनख़ाह, या यूँ कहें कि किसी भी सरकारी कर्मचारी का तनख़ाह इस कदर छपट दिया जाय तो भारत के सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर होने में समय नहीं लगेगा।</p>
<p><strong>21 अगस्त, 1947 को भारत के पत्र सूचना कार्यालय द्वारा निर्गत दस्तावेज (बीएनवी/आरआरए 490-21-8-47) के अनुसार तत्कालीन सरकार &#8216;इण्डिया (प्रोविजनल कांस्टीच्यूशन) ऑर्डर&#8217; के तहत यह निर्णय ली थी कि भारत के दो लाट साहबों (बम्बई और मद्रास) को छोड़कर सभी प्रांतों के लाट साहबों की तनख़ाह में &#8216;समानता&#8217; लाई जाय, यानी, उस समय जिन्हे सबसे कम तनखाह मिलता था, उनके बराबर सबों की तनखाह की जाय।</strong></p>
<blockquote><p>दस्तावेज के अनुसार, उस समय लाट साहबों का वेतन प्रति वर्ष 66,000/- रुपये से 1,20,000 रुपये तक था। मसलन, मद्रास, बम्बई, बंगाल और यूनाइटेड प्रोविंस के लाट सभों को प्रति वर्ष 1,20,000/- वेतन मिलता था, जबकि पंजाब और बिहार के लाट साहबों को 1,00,000/- रूपये प्रति वर्ष तनखाह मिलता था। इसी तरह सेंट्रल प्रोविंस के लाट साहब को 72,000/ प्रति वर्ष और असम तथा उड़ीसा के लाट साहबों को 66,000/- रुपये प्रति वर्ष वेतन मिलता था।</p></blockquote>
<p>दस्तावेज के अनुसार, &#8220;The India (Provisional Constitution) Order brings down the salaries of all Governors uniformly to the lowest level, namely, Rs. 66,000/- per annum, but exempts the present incumbents of two Governorships (Bombay and Madras) who are staying on.&#8221;</p>
<p>इतना ही नहीं, दस्तावेज में आगे भी लिखा गया कि &#8220;Since the salaries of Governors are not free of income-tax the effective net salary of a Governor after 15th August is about Rs. 3,000/- a month.&#8221; आज भारत के राज्यपालों का वेतन 3,50,000/- रुपये प्रतिमाह है। यानी सन 1947 की तुलना में आज़ादी के 75 वर्ष बाद सौ गुना से भी अधिक की वृद्धि हुई है। अन्य सुविधाओं की तो बात ही नहीं करें।</p>
<p>बहरहाल, संविधान के अनुच्छेद 153 में राज्यपाल का उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है कि, प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा। लेकिन सातवें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में यह जोड़ा गया कि एक व्यक्ति एक ही समय दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल भी रह सकता है, जिस तरह से हम वर्तमान में देखते हैं कि कुछ राज्यपाल दो राज्यों के राज्यपाल भी होते हैं। राज्यपाल की नियुक्ति भारत का राष्ट्रपति करता है। भारत का राष्ट्रपति राज्यपाल की नियुक्ति 5 वर्षों की अवधि के लिए की जाती है। कोई भी व्यक्ति भारत देश का नागरिक हो, न्यूनतम उम्र 35 वर्ष का हो, राज्यपाल पद पर चुने जाने के समय किसी भी लाभ के पद पर नहीं हो और राज्यपाल पद पर चयनित होने के लिए उसे राज्य विधान सभा के सदस्य की सभी योग्यताओं को पूरा करता हो। 1982 के राजपाल (अनुमोदन भत्ते और विशेषाधिकार) अधिनियम के अनुसार 5 साल की कार्यकाल अवधि के दौरान उनकी सुविधाओं में कोई कटौती नहीं की जा सकती है।</p>
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		<title>आज &#8216;केंद्रीय&#8217; प्रचलन के तहत &#8216;लाटरी&#8217; से &#8216;प्राचार्य&#8217; की नियुक्ति​, कल &#8216;केंद्रीय लोक निर्माण विभाग&#8217; के तर्ज पर &#8216;निविदा&#8217; से &#8216;कुलपति और शिक्षकों&#8217; की बहाली ​होगी</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/on-the-line-of-cpwd-vioce-chancellors-and-teachers-will-be-appointed-through-tender</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2025 09:13:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[appointment]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>गांधी मैदान (पटना) : जयराम दास दौलत राम से आरिफ मोहम्मद खान तक बिहार 42 राज्यपालों, जो प्रदेश के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी होते हैं, का चश्मदीद गवाह रहा है। यानी 1947 से 2025 तक औसतन राज्यपालों/कुलाधिपतियों का सेवा काल एक साल आठ महीने रहा है। बिहार के मामले में यह सत्य है। बिहार के [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/on-the-line-of-cpwd-vioce-chancellors-and-teachers-will-be-appointed-through-tender">आज &#8216;केंद्रीय&#8217; प्रचलन के तहत &#8216;लाटरी&#8217; से &#8216;प्राचार्य&#8217; की नियुक्ति​, कल &#8216;केंद्रीय लोक निर्माण विभाग&#8217; के तर्ज पर &#8216;निविदा&#8217; से &#8216;कुलपति और शिक्षकों&#8217; की बहाली ​होगी</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>गांधी मैदान (पटना) : जयराम दास दौलत राम से आरिफ मोहम्मद खान तक बिहार 42 राज्यपालों, जो प्रदेश के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी होते हैं, का चश्मदीद गवाह रहा है। यानी 1947 से 2025 तक औसतन राज्यपालों/कुलाधिपतियों का सेवा काल एक साल आठ महीने रहा है। बिहार के मामले में यह सत्य है। बिहार के लोग ही नहीं, देश के सभी 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में नियुक्त होने वाले राज्यपालों में दस राज्यपालों का नाम, अथवा देश के सभी विश्वविद्यालयों के कुलाधिपतियों में पांच कुलाधिपतियों का नाम सम्बंधित विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं नहीं बता पाएंगी &#8211; यह भी उतना ही सत्य है। </strong></p>
<p>लेकिन जिनका नाम आज भी उनके मानस पटल पर अंकित है, अथवा होगा, वे &#8216;तारीख&#8217; में दर्ज नहीं होते, और वे हैं &#8216;शिक्षक&#8217;। हमारी शैक्षिक व्यवस्था चाहे कितनी भी ख़राब हो, चरमरा गयी हो, हम बिना छत वाले विद्यालयों में, बिना पानी और शौचालय वाले महाविद्यालयों में पढ़कर शिक्षा प्राप्त किये हों, कर रहे हों &#8211; हम शिक्षकों को, शिक्षकेत्तर कर्मचारियों को नहीं भूलते। लेकिन &#8216;कुलपति&#8217; और &#8216;कुलाधिपति&#8217; का नाम जानते तक नहीं &#8211; क्योंकि वे सभी राजनीतिक पदस्थापना के तहत आते हैं। परम्परानुसार, संबद्ध राज्य से उनका दूर-दूर का कोई संबंध नहीं होता, बाहरी व्यक्ति होते, केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हैं राज्यों में। वैसी स्थिति में अतः यह कहना या स्वीकार करना उतना ही अपच्य है कि उनका योगदान प्रदेश के विकास में होगा, क्योंकि अब तक 42 कुलाधिपति तो महज &#8216;तारीख&#8217; बनकर रह गए। </p>
<p>साल 1996 था। जश्ने आज़ादी के 49वां दिवस का झंडोत्तोलन हो गया था। उस अवसर के पंद्रह दिन बाद पटना उच्च न्यायालय के आदेश से पटना कालेज के इतिहास में एक ऐतिहासिक घटना घटी थी। शायद आज प्रदेश के कुलाधिपति के कार्यालय के साथ-साथ शिक्षक संघ या छात्र संघ को भी मालूम नहीं हो। पटना कॉलेज के एक वरिष्ठ शिक्षक की सेवा अवधि सिर्फ दो दिन बची थी। दो दिन बाद वे सेवानिवृत होने वाले थे। परंपरा के अनुसार नहीं, कानूनन वे पटना कॉलेज के प्राचार्य पद के लिए वरिष्ठ शिक्षक होने के कारण प्रबल दावेदार थे। लेकिन कुलाधिपति के कार्यालय से उन्हें प्राचार्य नहीं बनाकर अन्य शिक्षक को पद पर आसीन कर दिया गया था। </p>
<blockquote><p>फिर क्या था। प्रोफ़ेसर साहब कुलाधिपति के आदेश को पटना उच्च न्यायालय घसीट कर ले गए। वादी और प्रतिवादी के वकीलों में बहस हुआ। न्यायमूर्ति दोनों के जिरह को सुने। लेकिन वादी का पलड़ा भारी देखकर प्रतिवादी को, आदेश दिया कि प्रोफ़ेसर साहब को उनके हक़ के अनुसार &#8216;दो दिन के लिए ही सही&#8217;, प्राचार्य पद पर आसीन किया जाए।पटना कालेज के स्थापना काल से अब तक बने 94 प्राचार्यों की सूची में &#8217;67 वें प्राचार्य&#8217; के रूप में दो दिन का प्राचार्य बनकर पटना कॉलेज के इतिहास में अपना नाम लिखा दिए। </p></blockquote>
<p><strong>पटना कालेज के तत्कालीन मैथिली विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अमरेश पाठक 31-08-1996 को सेवामुक्त होने वाले थे। उन दिनों प्रोफ़ेसर एन.पी. वर्मा पटना कालेज के प्राचार्य थे। नियमतः वरिष्ठ शिक्षक होने के कारण प्राचार्य पद पर सेवानिवृत होने के पूर्व &#8211; दो दिन के लिए ही सही &#8211; उन्हें प्राचार्य बनना था। लेकिन कुलाधिपति के कार्यालय से ऐसा निर्णय नहीं हुआ। उन दिनों डॉ. अख़लाक़-उर-रहमान किदवई कुलाधिपति थे। डॉ. पाठक कुलाधिपति के आदेश को लेकर पटना उच्च न्यायालय पहुंचे जहाँ न्यायालय का आदेश उनके पक्ष में हुआ। साथ ही, यह आदेश भी हुआ की दो दिन के लिए ही सही, डॉ. पाठक को पटना कालेज का प्राचार्य बनाया जाए। डॉ. पाठक 30 और 31 अगस्त 1996 को पटना कालेज के प्राचार्य रहे।</strong></p>
<figure id="attachment_6949" aria-describedby="caption-attachment-6949" style="width: 2335px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-4.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-4.jpg" alt="" width="2335" height="1643" class="size-full wp-image-6949" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-4.jpg 2335w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-4-300x211.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-4-1024x721.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-4-768x540.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-4-1536x1081.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-4-2048x1441.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-4-100x70.jpg 100w" sizes="(max-width: 2335px) 100vw, 2335px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6949" class="wp-caption-text">पटना कालेज</figcaption></figure>
<p>इस बात का जिक्र यहाँ इसलिए कर रहा हूँ कि नब्बे के दशक के बाद, या यूँ कहें कि जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के बाद से बिहार की शिक्षा व्यवस्था सत्यानाश हो गई। लेकिन महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों से लेकर शिक्षकेत्तर कर्मचारियों और छात्र-छात्राओं का संघ इतना मजबूत था, कि नियमों के विरुद्ध आवाज उठाने में लोग कोताही नहीं करते थे। आज परिस्थिति कुछ अलग है। आज पूरे परिसर में कहीं से चूं की आवाज भी नहीं आती। क्या शिक्षक संघ, क्या छात्र संघ, क्या कर्मचारी संघ &#8211; सभी इस बात को स्वीकार करते हैं कि पटना विश्वविद्यालय की गरिमा धूमिल हो रही है, हो गयी है; राजनेताओं द्वारा पूरे परिसर के शैक्षणिक वातावरण को समाप्त कर दिया गया है, फिर भी &#8216;उसे दुरुस्त करने की दिशा में कोई पहल नहीं है। शब्द कटु हैं, लेकिन सत्य यही है। </p>
<p>आज अगर इण्डियन नेशन अख़बार के संपादक श्री दीनानाथ झा होते तो शायद पटना विश्वविद्यालय की धूमिल होती गरिमा के विरुद्ध आवाज जरूर उठाते। व्यवस्था के विरुद्ध, कुलपति, कुलाधिपति की भागीदारी के विरुद्ध अपना सम्पादकीय स्थान &#8216;खाली&#8217; जरूर छोड़ते या फिर खिलने में कोई कोई कोताही नहीं करते। दुर्भाग्य यह है कि 1990 के बाद बिहार में मुख्यमंत्री कार्यालय और उनके मंत्रिमंडल में वही लोग आये, बैठे जो जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति से उपजे थे। बिहार के विश्वविद्यालयों के वर्तमान कुलाधिपति भी उसी आंदोलन के उपज है, लेकिन उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के। </p>
<p><strong>लालू प्रसाद यादव के पुत्र पूर्व-उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव की बात यहाँ नहीं करूँगा क्योंकि शिक्षा के महत्व को शायद वे नहीं समझेंगे; लेकिन चाहे लालू प्रसाद यादव हो, चाहे नीतीश कुमार हों, कभी उन लोगों ने न तो छात्र अथवा शिक्षकों से किसी भी तरह का कोई पन्गा लिया और ना ही शैक्षिक वातावरण को ठीक करने की कोशिश किया। वे संघ की ताकत को जानते हैं, आज जिस कुर्सी पर हैं, उसकी ताकत के बदौलत। लेकिन वे उस ताकत का अब &#8216;मजबूत&#8217; नहीं, बल्कि &#8216;कमजोर&#8217; बनाकर रखना चाहते हैं, ताकि कुर्सी पर कोई खतरा नहीं हो। यह भी उतना ही सच है। आज प्रदेश में जो भी शैक्षिक वातावरण है, शैक्षणिक संस्थानों में भ्रष्टाचार व्याप्त है, भाई-भतीजावाद है, पैसे की उगाही है, या वे सभी कारण, जिसके चलते प्रदेश में शिक्षा का यह हाल है; उसके लिए मुख्यमंत्री कार्यालय, शिक्षा मंत्री कार्यालय या फिर कुलपति, कुलाधिपति, शिक्षक संघ, छात्र संघ का कार्यालय जिम्मेदार है। </strong></p>
<p>एक दृष्टान्त देता हूँ। आज बिहार के लोगों को, खासकर शिक्षा-जगत में जो हैं, यह मालूम नहीं होगा कि 1963-1967 के कालखंड में, जब प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय में कृष्ण वल्लभ सहाय थे (2 अक्टूबर, 1963 &#8211; 5 मार्च, 1967) थे, पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के सदस्यों की ताकत इतनी अधिक थी, कि छात्र संघ के पदाधिकारियों से मिलने मुख्यमंत्री स्वयं उनके छात्रावास में आते थे। नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल के लोगों के बारे में या कुलाधिपति के कार्यालय के लोगों के बारे में नहीं कह सकता&#8217; परन्तु नीतीश कुमार या लालू यादव इस बात को जानते हैं, यह कह सकता हूँ। </p>
<blockquote><p>प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि &#8220;उन दिनों मुख़्यमंत्री के साथ इतना तामझाम नहीं होता था। सहाय साहेब स्वयं और अपने कुछ साथियों के साथ पटना साइंस कालेज के कैवेंडिस छात्रावास में तत्कालीन छात्र संघ के पदाधिकारियों से मिलने आते थे। आज पटना विश्वविद्यालय ही नहीं, बिहार के अन्य विश्वविद्यालयों में शिक्षक संघ, शिक्षकेत्तर कर्मचारी संघ या छात्र संघों की क्या स्थिति है, यह सभी अवगत हैं। वैसी स्थिति में अगर &#8220;लॉटरी के आधार पर, पर्ची निकालकर कालेजों के प्राचार्यों की नियुक्ति होती है तो इसके जिम्मेदार कौन हैं? </p></blockquote>
<p>पटना विश्वविद्यालय ही नहीं, बिहार के किसी भी विश्वविद्यालयों की गरिमा को मिट्टी पलीद करने में शिक्षकों का हाथ कम नहीं है। &#8216;राजनीति में प्रवेश करना सभी नागरिकों का मौलिक अधिकार है,&#8217; यह &#8216;सर्वमान्य&#8217; है, परन्तु बिहार का शैक्षिक इतिहास इस बात का गवाह है कि शिक्षकों ने अपने-अपने संस्थानों को राजनीति की तुलना में &#8216;द्वितीय स्थान&#8217; दिया। ऐसे सैकड़ों शिक्षक हैं जो नौकरी की शुरुआत भले कालेजों से किये, समयांतराल, कालेजों से अवकाश अथवा वेतन-रहित अवकाश लेकर जीवन पर्यन्त राजनीति में कुर्सी हथियाने में लगे रहे। कालेजों का मुख कभी नहीं देखे। </p>
<p><strong>लेकिन, इन वर्षों में इन विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति की भूमिका भी सराहनीय नहीं रहा। कुलाधिपति होने के नाते प्रदेश के राज्यपालों ने कभी भी इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाये। वजह भी है। सैद्धांतिक रूप से राज्यपाल भले देश के राष्ट्रपति का प्रतिनिधित्व राज्यों में करते हों; हकीकत यह है कि वे कल भी प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर टकटकी निगाहों से देखते रहते थे, आदेश की प्रतीक्षा करते रहते थे; आज भी स्थिति जस-का-तस है। </strong></p>
<p>विगत दिनों जब एक अभूतपूर्व कदम के तहत पटना विश्वविद्यालय के पांच कॉलेजों को ड्रॉ के जरिए प्राचार्य उपलब्ध कराया गया &#8211; इसे प्रदेश ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर अख़बारों में, पत्रिकाओं में लिखा गया, टीवी पर दिखाया गया। बिहार के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति आरिफ मोहम्मद खान, जो 24 सितम्बर 2024 को बिहार का राज्यपाल नियुक्त हुए थे, विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार &#8216;लॉटरी के माध्यम से प्राचार्यों को कालेजों का आवंटन किये। जब राष्ट्रव्यापी सुर्खिया बनने लगी, अपने इस कदम का बचाव करते हुए कहा, &#8220;हमने एक ऐसी प्रणाली अपनाई है जिसमें प्रिंसिपल की नियुक्ति व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से निर्देशित नहीं होती है।&#8221; विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार की एक अधिसूचना के अनुसार, नए प्रिंसिपलों की नियुक्तियां बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग की सिफारिश पर की गई हैं।&#8221;</p>
<p><strong>उनका कहना है कि यह प्रक्रिया तीन सदस्यीय समिति की देखरेख में आयोजित की गई, जिसमें विश्वविद्यालय के कुलपति और कुलाधिपति कार्यालय का एक प्रतिनिधि शामिल था। वे कहते हैं कि बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों के अंगीभूत महाविद्यालयों में नए प्राचार्यों की पदस्थापना में रैंडम / लाटरी सिस्टम का औचित्य बताते कहते हैं की वे केंद्र के सिस्टम को ज्यों का त्यों उठा लिए हैं। जिस मापदंड पर भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति होती है , वे उसी प्रणाली को अपनाये हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हालात यह बन गए हैं कि कुछ महाविद्यालयों में प्राचार्य बनाने के लिए सिफारिशें आ रही थी, कुछ ऐसे भी थे जहाँ कोई जाना नहीं चाहता थे।&#8221; </strong></p>
<figure id="attachment_6950" aria-describedby="caption-attachment-6950" style="width: 1200px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Adobe-Express-file-13.png"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Adobe-Express-file-13.png" alt="" width="1200" height="675" class="size-full wp-image-6950" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Adobe-Express-file-13.png 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Adobe-Express-file-13-300x169.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Adobe-Express-file-13-1024x576.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Adobe-Express-file-13-768x432.png 768w" sizes="(max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6950" class="wp-caption-text">कुलाधिपति आरिफ मोहम्मद खान</figcaption></figure>
<p><strong>इस पहल के आधार पर नागेंद्र प्रसाद वर्मा (मगध महिला कॉलेज), अनिल कुमार (पटना कॉलेज), अलका (पटना साइंस कॉलेज), सुहेली मेहता (वाणिज्य महाविद्यालय) और योगेंद्र कुमार वर्मा (पटना लॉ कॉलेज) को नियुक्त किया गया । राज्यपाल-सह-कुलाधिपति ने संवाददाताओं से कहा, &#8220;हमने एक ऐसी प्रणाली अपनाई है जिसमें प्रिंसिपल की नियुक्ति व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से निर्देशित नहीं होती है&#8230; विभिन्न विश्वविद्यालयों में। अब सवाल यह है कि &#8220;गृह विज्ञान या मानविकी का प्रोफेसर विज्ञान और वाणिज्य के लिए विशेष कॉलेज कैसे चला सकता है? यह उच्च शिक्षा के संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य को पराजित करता है। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा राज्य सरकार की प्राथमिकता नहीं है।&#8221;</strong></p>
<blockquote><p>विगत दिनों जब पटना विश्वविद्यालय के पांच महाविद्यालओं को &#8216;पर्ची&#8217; निकालकर प्राचार्य दिया गया, और प्रदेश के विश्वविद्यालय के कुलाधिपति अपने बचाव के लिए यह कहकर ढोल पीटने लगे की &#8220;हमने एक ऐसी प्रणाली अपनाई है जिसमें प्रिंसिपल की नियुक्ति व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से निर्देशित नहीं होती है,&#8221; समय दूर नहीं है जब प्रदेश में शिक्षकों, प्राध्यापकों, प्राचार्यों और कुलपतियों के लिए &#8216;निविदा&#8217; निकाले जायेंगे। </p></blockquote>
<p>लेकिन कुलाधिपति इस बात से अनभिज्ञ हैं कि आज से साढ़े चार दशक पहले जब जगन्नाथ कौशल चंडीगढ़ से बिहार के राज्यपाल बनकर आए थे, तब उनके बच्चों ने भी पटना विश्वविद्यालय में नामांकन कराया था। बिहार नेशनल कॉलेज में एक कार्यक्रम के दौरान कॉमन रूम का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा था, “यदि मेरा वश चले तो मैं राज्य के सभी विश्वविद्यालयों को बंद कर दूं, ताला लगा दूं।” विश्वविद्यालय के कुलाधिपति के मुख से ऐसे शब्द क्या निकले, कौशल साहब ऐसे गए कि फिर कभी गौतम-महावीर-चन्द्रगुप्त की धरती पर फिर वापस नहीं आ सके। </p>
<figure id="attachment_6951" aria-describedby="caption-attachment-6951" style="width: 770px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Adobe-Express-file-14.png"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Adobe-Express-file-14.png" alt="" width="770" height="431" class="size-full wp-image-6951" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Adobe-Express-file-14.png 770w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Adobe-Express-file-14-300x168.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/Adobe-Express-file-14-768x430.png 768w" sizes="(max-width: 770px) 100vw, 770px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6951" class="wp-caption-text">मुख्यमंत्री नीतीश कुमार</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, इस साल मार्च में, बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग ने लगभग 115 प्रोफेसरों के एक पैनल को शॉर्टलिस्ट किया, जिन्हें राज्य भर के कॉलेजों में प्राचार्य बनने के योग्य माना गया। उत्साह था, शैक्षणिक हलकों में प्रत्याशा का माहौल था। शीर्ष रैंकिंग वाले उम्मीदवार उन संस्थानों में नेतृत्व की भूमिका निभाने की उम्मीद कर रहे थे, जहां उन्होंने लंबे समय तक काम किया था, और उन संस्थानों में जहां कई लोग कभी छात्र रहे थे। </p>
<p>राजभवन की देखरेख में और वीडियो पर दर्ज की गई कार्यवाही के साथ, पटना विश्वविद्यालय के कुलपति अजय कुमार सिंह, रजिस्ट्रार शालिनी और कुलाधिपति के प्रतिनिधि रहमत जहान वाली तीन सदस्यीय समिति एक बॉक्स से चिट लेने के लिए विश्वविद्यालय परिसर में एकत्र हुई। प्रत्येक चिट के साथ, शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों का भाग्य एक ऐसे कॉलेज में सील कर दिया गया, जिसके बारे में उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उन्हें नियुक्त किया जाएगा। </p>
<figure id="attachment_6952" aria-describedby="caption-attachment-6952" style="width: 2335px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-2.jpg" alt="" width="2335" height="1643" class="size-full wp-image-6952" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-2.jpg 2335w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-2-300x211.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-2-1024x721.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-2-768x540.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-2-1536x1081.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-2-2048x1441.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-2-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 2335px) 100vw, 2335px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6952" class="wp-caption-text">सुहेली मेहता</figcaption></figure>
<p><strong>आर्यावर्तइंडियननेशन(डॉट)कॉम</strong> से बात करते पटना विश्वविद्यालय के वाणिज्य महाविद्यालय के प्राचार्य पद पर चुनी गई सुहेली मेहता कहती हैं: &#8220;मैं नहीं ज्वाइन करूंगी वाणिज्य महाविद्यालय। मैं पैनल के रैंक में शीर्ष पर थीं। अगर कुलाधिपति इस बात की गवाही दे रहे हैं कि भारतीय प्रशासनिक सेवा में नियुक्ति भी उसी आधार पर होती, जिसका उन्होंने अनुकरण किया है, तो क्या अच्छे अंक लाने वाले अभ्यर्थियों को &#8216;होम कैडर&#8217; नहीं मिलता है ? हम जिस महाविद्यालय में पढ़े, जहाँ से अपने पढ़ने-पढ़ाने का कार्य शुरू की; उसी कॉलेज का नेतृत्व करने का सपना देखा था, फिर अव्वल आने के बाद मुझे तो अपना होम-कैडर (मगध महिला कालेज) मिला चाहिए। लेकिन 2 जुलाई को चकनाचूर हो गया। </p>
<p>परंपरागत रूप से, बिहार की उच्च शिक्षा में नियुक्तियों में एक संरचित प्रोटोकॉल का पालन किया जाता है इसके अतिरिक्त, कुलाधिपति कार्यालय इस प्रक्रिया की देखरेख के लिए एक प्रतिनिधि को नामित करेगा। लेकिन यह पुरानी प्रणाली भ्रष्टाचार के आरोपों से ग्रस्त थी। हालांकि नई लॉटरी-आधारित नीति बिहार भर के सैकड़ों कॉलेजों को प्रभावित करती है, लेकिन पटना विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले पाँच प्रतिष्ठित कॉलेजों में प्राचार्यों की नियुक्ति ने अकादमिक समुदाय में सबसे ज़्यादा अशांति पैदा की है। परंपरागत रूप से, पटना कॉलेज में प्राचार्य पद के लिए (विश्वविद्यालय आयोग द्वारा) केवल सामाजिक विज्ञान या मानविकी के सबसे वरिष्ठ प्रोफेसरों पर ही विचार किया जाता था, यह परंपरा पचास वर्षों से भी ज़्यादा समय से चली आ रही है। </p>
<p>उत्तर प्रदेश के रसायन विज्ञान के प्राध्यापक अनिल कुमार को लॉटरी के माध्यम से 1863 में स्थापित पटना कॉलेज का प्रमुख चुना गया। उनकी नियुक्ति पहली बार विज्ञान के किसी संकाय सदस्य द्वारा इस ऐतिहासिक रूप से कला-केंद्रित संस्थान का नेतृत्व करने का प्रतीक है। छपरा स्थित जय प्रकाश विश्वविद्यालय के इतिहास के व्याख्याता नागेंद्र प्रसाद वर्मा को मगध महिला कॉलेज का प्राचार्य नियुक्त किया गया । बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय की गृह विज्ञान संकाय सदस्य अलका यादव को पटना साइंस कॉलेज के लगभग सौ साल के इतिहास में पहली महिला प्राचार्य नियुक्त किया गया। कुलाधिपति के कहने, दावा करने का आधार चाहे जो भी हो, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि &#8220;लॉटरी प्रणाली भ्रष्टाचार, लॉबिंग और बाहरी दबाव पर अंकुश लगा सकती है, लेकिन यह गारंटी नहीं देती कि ड्रॉ से एक मजबूत शैक्षणिक नेता उभरेगा।&#8221;</p>
<p><strong>पटना विश्वविद्यालय के एक शिक्षक कहते हैं: चाहिए तो यह था कि जिन जिन लोगों ने अपनी नियुक्ति या पदस्थापना के लिए कुलाधिपति कार्यालय के दरवाजे को खटखटाये, या किसी और को खटखटाने के लिए कहे, उन सभी अभ्याथियों का नाम निरस्त कर देते, पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को प्रेषित कर देते या फिर सचिवालय थाना में सरकारी कार्य में हस्तक्षेप के कारण उनके विरुद्ध प्रथम प्राथमिकी दर्ज करवा देते। यकीन मानिए यह इतिहास होता। कुलाधिपति का नाम “तारीख में नहीं, इतिहास में दर्ज होता। प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में सकारात्मक प्रभाव पड़ता। लेकिन उन्होंने केंद्रीय चयन पद्धति का दृष्टांत देकर प्राचार्यों की नियुक्ति और पदस्थापन के लिए लाटरी निकाल दिए। समय दूर नहीं है जब केंद्रीय लोक निर्माण विभाग की पद्धति के तर्ज पर महाविद्यालयों में शिक्षकों और विश्वविद्यालयों के कुलपति और अप कुलपति की नियुक्ति और पदस्थापन के लिए निविदा निकाल दिया जाय। क्योंकि कुलाधिपति कहें या राज्यपाल, आख़िर आपके प्रदेश के तो होते नहीं और प्रदेश में केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हैं और वे वही करते हैं जो केंद्र चाहेगा। आपके मुख्यमंत्री कुछ कर नहीं सकते, शिक्षा मंत्री कुछ कर नहीं सकते-सभी का जमीर और वजूद पर प्रश्नवाचक चिह्न लगा हैं।” </strong></p>
<figure id="attachment_6953" aria-describedby="caption-attachment-6953" style="width: 2335px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-3.jpg" alt="" width="2335" height="1643" class="size-full wp-image-6953" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-3.jpg 2335w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-3-300x211.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-3-1024x721.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-3-768x540.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-3-1536x1081.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-3-2048x1441.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-3-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 2335px) 100vw, 2335px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6953" class="wp-caption-text">पटना कालेज</figcaption></figure>
<p><strong>1839 में गवर्नर जनरल लार्ड ऑकलैंड के आदेश से पटना में एक केन्द्रीय कॉलेज को स्थापित करने की योजना बनी और 1841-42 में पटना हाई स्कूल में कुछ बदलाव करके इस योजना को साकार रूप प्रदान किया गया। 26 सितम्बर 1844 को इस स्कूल कॉलेज का दर्जा प्राप्त हो गया। किन्तु ढाई वर्ष पश्चात ही यह कॉलेज बंद हो गया क्योंकि इस कॉलेज को चलाने में पटनावासियों ने रुचि नहीं ली। 1856-57 में पुनः कॉलेज खोलने की योजना असफल रही। योजना बनाने वालों के बीच आपसी मतभेद रहा। फलस्वरूप अप्रैल 1858 में पटना हाई स्कूल भी बंद हो गया। सन 1857 के आज़ादी के आन्दोलन के शंखनाद के कोई पांच साल बाद 1863 को पटना के गंगा नदी के किनारे इस शैक्षणिक संस्थान को स्थापित किया गया था। दुर्भाग्य यह है कि कभी अपने में स्वर्णिम इतिहास समेटे पटना कॉलेज  ने समाज और शिक्षा जगत को काफी कुछ दिया। पटना कालेज “पूर्व का ऑक्सफोर्ड नहीं रहा। </strong></p>
<p>लेकिन आज रसायन विज्ञान के प्राध्यापक अनिल कुमार पटना कॉलेज के प्राचार्य के रूप में पद आवंटित होने पर एक छात्र कहता हैं: &#8220;यह समझ से परे है कि कुर्सी पर बैठने के बाद राजनेता स्वयं को सबसे ऊपर, सब ज्ञानी कैसे समझने लगते हैं। बिहार के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र नेता रह चुके हैं। यहाँ पटना विश्वविद्यालय के पूर्ववर्ती छात्र नेताओं की कमजोरी है कि वे सत्ता के सिंहासन पर बैठने के बाद सबसे अधिक अगर सत्यानाश किये तो शिक्षा और शैक्षणिक व्यवस्था को। शिक्षकों से लेकर छात्रों-छात्राओं तक, सभी को राजनीति का स्वाद चखाकर शैक्षणिक व्यवस्था को चकनाचूर कर दिए। आज तक कभी उन लोगों ने शैक्षिणक सत्र को दुरुस्त नहीं कर पाए, कक्षा की समय-सारिणी को ठीक नहीं कर पाए, प्रदेश का शिक्षा मंत्री कभी किसी महाविद्यालयों या विश्वविद्यालयों की स्थिति को देखने, समझने की कोशिश नहीं किये। आज अचानक लाटरी के आधार पर रसायन शास्त्र के शिक्षक को कला संकाय वाले महाविद्यालय में पदस्थापित कर दिया गया। गृह-विज्ञानं पढ़ाने वाली शिक्षिका को पटना साइंस कालेज का प्राचार्य बना दिया गया।&#8221;</p>
<p>सुहेली मेहता कहती हैं: &#8220;एक ऐसा संस्थान जिसकी शैक्षणिक विशेषज्ञता मेरी योग्यता और अनुशासन से बिल्कुल मेल नहीं खाती, मैं वहां की प्राचार्य बनकर क्या कर लूंगी ? मैंने शुरू से ही लॉटरी सिस्टम का विरोध किया। मैंने लॉटरी सिस्टम के खिलाफ पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ सका क्योंकि मुझ पर अपनी अपील वापस लेने का दबाव था।  कुलाधिपति के इस निर्णय से बिहार के विश्वविद्यालयों के छात्र और शिक्षक कुलाधिपति द्वारा लागु की जाने वाली प्रणाली को समझ नहीं पा रहे हैं।  उनका कहना है &#8216;यह मनमानी&#8217; है। राजनेताओं ने, चाहे कुलाधिपति ही क्यों न हों, शिक्षा जगत को एक प्रयोगशाला बना दिए हैं। छात्रों, शिक्षको को उपकरण। वैसे कुछ इसे एक प्रगतिशील प्रणाली स्थापित करने की दिशा में एक कदम के रूप में भी देखते हैं जो बिहार में चीजों को हिला सकता है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-1.jpg" alt="" width="2335" height="1643" class="aligncenter size-full wp-image-6954" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-1.jpg 2335w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-1-300x211.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-1-1024x721.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-1-768x540.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-1-1536x1081.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-1-2048x1441.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-1-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 2335px) 100vw, 2335px" /></a></p>
<p>लोग कहते हैं वर्तमान कुलाधिपति आरिफ मोहम्मद खान का कार्य करने का तरीका अलग है। ये भी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र नेता रह चुके हैं उसी कालखंड में जब नीतीश कुमार या लालू यादव पटना विश्वविद्यालो छात्र नेता बन रहे थे । आरिफ मोहम्मद खान अलीगढ़ मुस्लिक विश्वविद्यालय छात्र संघ के पहले सचिव (1972-73) बने और फिर अध्यक्ष (1973-74) बने। तीन साल बाद, उत्तर प्रदेश के सियाना विधानसभा क्षेत्र से विधायक (1977-80) बने। फिर सातवीं, आठवीं, नवमी और बारहवीं लोकसभा में कानपुर और बहराइच से सांसद बने। केंद्र में मंत्री भी रहे। लेकिन अगर यही तरीका है उनके कार्य करने का, तो यह शोध का विषय है। </p>
<p><strong>हकीकत यह है कि बिहार में धूल चाटती शिक्षा की स्थिति का अगर कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार है तो वह है संवैधानिक दृष्टि से सबसे सबल हैं और कल से लेकर आज तक के कुल 41 विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति हैं। आज बिहार में 41 विश्वविद्यालय है जिसमें 8 राष्ट्रीय स्तर के हैं, 4 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, 20 राज्य विश्वविद्यालय हैं, 7 निजी विश्वविद्यालय हैं, 1 डीम्ड विश्वविद्यालय है और 4 केंद्र द्वारा पोषित। इन विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति होने के नाते क्या अब तक राज्यपाल भवन का जबाबदेही नहीं था कि अपने सभी संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल कर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को अव्वल बनाते? शायद नहीं। </strong></p>
<p>आज़ादी के बाद भारत के 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में पदस्थापित राज्यपालों, उप-राज्यपालों की कार्य अवधि और उस अवधि के दौरान राज्य का प्रथम नागरिक, संवैधानिक प्रमुख होने के नाते प्रदेशों का कितना विकास हो पाया है, इसकी विवेचना तो देश के वातानुकूलित कक्षों में बैठे राजनीतिक समीक्षक और विशेज्ञों के साथ-साथ अवकाश प्राप्त प्रदेश प्रमुख ही करेंगे। इन आठ महीनों में वे प्रदेश का विकास करने में सफल होंगे अथवा सेवा काल के समाप्ति के साथ ‘पोस्ट रिटायरमेंट बेनिफिट्स’ के साथ जीवन का समय गुजरेंगे, आज ही नहीं, आने वाले दिनों में भी राजनीतिक विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों के लिए बहुत बड़ा शोध का विषय रहेगा। दुर्भाग्य यह है कि प्रदेश के मुख्यमंत्रियों के अलावे इन विशेषज्ञों का ध्यान प्रदेश प्रमुख की ओर जाता ही नहीं है। </p>
<p>नई प्रणाली के तहत, बिहार के 13 विश्वविद्यालयों में प्रिंसिपल की नियुक्तियां की जाएंगी, जिसमें 115 पद भरे जाएंगे। पटना विश्वविद्यालय के अंतर्गत पाँच कॉलेजों के लिए निकाली गई लॉटरी अब राज्य के शेष संस्थानों में भी इसी तरह लागू होने वाली है। पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य और पटना विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के पूर्व डीन प्रोफेसर तरुण कुमार ने एक इंटरव्यू में कहा, &#8220;संकाय नियुक्तियों और तबादलों से लेकर प्राचार्यों की नियुक्ति तक अपनी पहुँच बढ़ाकर, राजभवन ने कुलपति को वस्तुतः विश्वविद्यालय के एक प्रधान लिपिक—मात्र एक &#8216;बड़ा बाबू&#8217;—में बदल दिया है।&#8221; वे आगे कहे: &#8220;राजभवन और विधानसभा जैसी संस्थाओं में भ्रष्टाचार गहराई तक समाया हुआ है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम लॉटरी सिस्टम के ज़रिए इसका समाधान करना शुरू कर दें। क्या इन संस्थानों को अपनी नियुक्तियों के लिए भी लॉटरी सिस्टम अपनाना चाहिए?&#8221;</p>
<p>बिहार के वर्तमान राज्यपाल श्री आरिफ मोहम्मद खान प्रदेश के राज्यपाल भवन की सूची पट्टिका में 42 वें स्थान पर अंकित हैं। आज़ादी के बाद सर्वप्रथम जयरामदास दौलतराम प्रदेश के राज्यपाल बनाये गए।  उनकी कार्य अवधि छः माह की थी।आज प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का आधिकारिक आवास जिस सड़क पर स्थित है, वह सड़क (अणे मार्ग) बिहार के दूसरे राज्यपाल माधव श्रीहरि अणे के नाम से अंकित है। इसने बाद आये आर. आर. दिवाकर और फिर  जाकिर हुसैन । जाकिर हुसैन के बाद एम. ए. एस. अय्यंगार, नित्यानंद कानूनगो, न्यायमूर्ति यू.एन. सिन्हा (कार्यवाहक), देव कांत बरुआ, और रामचन्द्र धोंडीबा भंडारे प्रदेश के राज्यपाल बने। भंडारे के बाद राज्यपाल भवन में आये जगन्नाथ कौशल, न्यायमूर्ति के.बी.एन. सिंह (कार्यवाहक), अखलाकुर रहमान किदवई, पी. वेंकटसुब्बैया, गोविंद नारायण सिंह जो 11 महीने की अवधि पूरा कर घर चले गए। अब आये न्यायमूर्ति दीपक कुमार सेन (कार्यवाहक), आर.डी. प्रधान, जगन्नाथ पहाड़िया, न्यायमूर्ति जी.जी. सोहोनी (कार्यवाहक), मोहम्मद सलीम, बी. सत्य नारायण रेड्डी (कार्यवाहक) । </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-5.jpg" alt="" width="2335" height="1643" class="aligncenter size-full wp-image-6955" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-5.jpg 2335w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-5-300x211.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-5-1024x721.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-5-768x540.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-5-1536x1081.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-5-2048x1441.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-5-100x70.jpg 100w" sizes="auto, (max-width: 2335px) 100vw, 2335px" /></a></p>
<p>बिहार के <strong>वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र</strong> कहते हैं कि 1990 के बाद जब लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने, बिहार के विश्वविद्यालयों की स्थिति तेजी से बिगड़ गई। कुलपतियों की नियुक्ति में मेरिट की सबसे बड़ी क्षति हुई, और जातीय आधार पर नियुक्तियों की परंपरा शुरू हुई। विश्वविद्यालयों को विभिन्न जातियों के नाम पर “डिस्ट्रिब्यूट” कर कुलपति बनाए जाने लगे। राजभवन की जगह आर्य कुमार रोड की एक गली में राष्ट्रीय जनता दल के नेता रंजन प्रसाद यादव के घर कुलपतियों की बैठक होने लगी। यहीं पर उच्च शिक्षा विभाग के निदेशक और इंटरमीडिएट काउंसिल के अध्यक्ष भी बैठने लगे। यहीं नीतिगत फैसले लिए जाने लगे, यहां तक कि शिक्षकों के प्रोमोशन और डिमोशन के फैसले भी वहीं होते थे। तत्कालीन राज्यपाल मोहम्मद शफी कुरैशी, जो चांसलर भी थे, ने एक बार कहा था, “अब तो रंजन यादव सुपर चांसलर हो गए हैं।” एक कुलपति, जो दिल्ली-पटना राजधानी एक्सप्रेस से नेता जी के साथ सफर कर रहे थे, उनके साथ नेता जी का परिवार भी था। बच्चे ने कोच में शौच कर दिया, और कुलपति ने अपने हाथों से सफाई की।</p>
<p>लालू प्रसाद यादव के आगमन के साथ शिक्षा लज्जित होकर गंगा में गोंता लगाने लगी और पुरे प्रदेश में तथकथित नेताओं का जन्म होने लगा। इसी कालखंड में पहले राज्यपाल आये मोहम्मद शफी कुरैशी, फिर आए अखलाकुर रहमान किदवई,  सुंदर सिंह भंडारी, न्यायमूर्ति बी.एम. लाल (अभिनय), सूरज भान (अतिरिक्त प्रभार), वी. सी. पांडे, एम आर जोइस, वेद प्रकाश मारवाह, बूटा सिंह, गोपालकृष्ण गांधी, आर. एस. गवई, आर. एल. भाटिया, देवानंद कोंवर, डी. वाई. पाटिल, केशरी नाथ त्रिपाठी (अतिरिक्त प्रभार), राम नाथ कोविन्द, सत्यपाल मलिक, लालजी टंडन, फाल्गुन चौधरी, राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर, और आज विराजमान हैं आरिफ मोहम्मद खान। </p>
<p>इन वर्षों में जे.जी.जेनिंग्स, वी.एच.जैक्सन, सर एस.सुल्तान हमद, स्टीवर्ट मैकफर्सन, न्यायमूर्ति के. एम. नूर, सचिदानंद सिन्हा, सी. पी. एन. सिंह, सारंगधर सिंह, डॉ के एन बहल, वी.के.एन. मेनन, डॉ बासुदेव नारायण , डॉ बलभद्र प्रसाद, श्री बी एन राय, डॉ जॉर्ज जैकब, डॉ. के.के.दत्ता, महेंद्र प्रताप, के. अब्राहम, सचिन दत्त), श्रीमती रमोला नंदी , श्री डी. एन. शर्मा, डॉ. ए.के. धन, जी.एस. ग्रेवाल, डॉ. टी. बी. मुखर्जी, डॉ. आर. सी. सिन्हा  पटना विश्वविद्यालय के कुलपति बने।सत्तर के दशक के अंत में पटना कालेज के प्राचार्य, स्नातकोत्तर अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. केदार नाथ प्रसाद कुलपति बने। अस्सी के दशक के प्रारंभिक वर्षों में सबसे पहले कुलपति बने डॉ. आर. शुक्ला, डॉ. एस. पी. सिन्हा, डॉ. जी. पी. सिन्हा, डॉ. के. एन. प्रसाद, डॉ एस एन दास, डॉ ए एल साहा, डॉ. आर.के.अवस्थी, डॉ. एम. मोहिउद्दीन, राहुल सरीन, अनिल कुमार, डॉ. एस. एन. पी. सिन्हा, डॉ एस नज़र अहसन, डॉ एल एन राम, डॉ. के.के. झा, डॉ. विभाष के. यादव, डॉ.जगन्नाथ ठाकुर, डॉ सैयद एहतेशामुद्दीन, प्रो. वाई. सी. सिम्हाद्री, डॉ श्याम लाल, डॉ सुदीप्तो अधिकारी, प्रो. शंभु नाथ सिंह, प्रो. यू.के. सिन्हा,  प्रोफेसर अरुण कुमार सिन्हा, प्रो. येदला सी. सिम्हाद्री, प्रो.सुधीर कुमार श्रीवास्तव, प्रो. रासबिहारी सिंह, प्रो. (डॉ.) एच.एन. प्रसाद ( प्रो. (डॉ.) गिरीश कुमार चौधरी , प्रो. के.सी. सिंह और प्रो. अजय कुमार सिंह। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-6.jpg" alt="" width="2315" height="1422" class="aligncenter size-full wp-image-6956" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-6.jpg 2315w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-6-300x184.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-6-1024x629.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-6-768x472.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-6-1536x943.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-6-2048x1258.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/07/PU-6-356x220.jpg 356w" sizes="auto, (max-width: 2315px) 100vw, 2315px" /></a></p>
<p>लव कुमार मिश्र कहते हैं: “पहले जब शारंगधर सिंह, के.के. दत्त, सचिन दत्त और महेन्द्र प्रताप जैसे विद्वान कुलपति होते थे, वे शिक्षा मंत्री के यहां भी नहीं जाते थे। स्वयं मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह पटना विश्वविद्यालय के कुलपति से सलाह लेने उनके घर जाते थे। 1977 तक पटना विश्वविद्यालय के कुलपति का आधिकारिक आवास गांधी मैदान के दक्षिण कोने पर था, जहां अब मौर्य होटल है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. केदारनाथ प्रसाद, जो इंडियन एजुकेशन सर्विस के अधिकारी थे, ने मुख्य सचिव को लिखित आपत्ति दी थी कि उनकी अनुमति के बिना पटना कॉलेज में डीएम ने पुलिस भेज दी। उन्होंने कहा था कि वे प्रमंडल के आयुक्त से भी वरिष्ठ हैं। जब पटना के डीएम ने राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय में परीक्षा पर रोक लगाई, तो कुलपति अतर देव सिंह ने विरोध करते हुए परीक्षा का आयोजन कराया। वे भी इंडियन एजुकेशन सर्विस के अधिकारी थे।”</p>
<p>मिश्र आगे कहते हैं “यदि आज विश्वविद्यालयों की स्थिति खराब है, तो उसके लिए राज्यपाल भी जिम्मेदार हैं। पिछले 15 वर्षों में बिहार में कुछ ऐसे राज्यपाल भी आए, जिन पर खुले तौर पर यह आरोप लगे कि उनके करीबियों ने दो-दो करोड़ रुपये में कुलपति पद बेचे। एक बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजभवन द्वारा नियुक्त छह कुलपतियों की नियुक्ति को रोक दिया था। वर्तमान में सत्ता पक्ष के अनुषांगिक संगठनों द्वारा भेजे गए नामों पर नियुक्तियाँ हो रही हैं। एक कुलपति ने दावा किया कि उनका नाम “हाई कमान” से भेजा गया था। जब हम विद्यार्थी थे, तब कुलपति भी लेक्चर लेने आते थे। मुझे स्मरण है कि सचिन दत्त, जो केंद्र में वित्त सचिव थे, सेवानिवृत्त होकर पटना विश्वविद्यालय के कुलपति बने और पटना कॉलेज के बी.ए. लेक्चर थिएटर में इकोनॉमिक्स पढ़ाने आते थे। महेन्द्र प्रताप, जो कैम्ब्रिज से पीएचडी थे, अंग्रेजी का क्लास लेते थे। जॉर्ज जैकब और ए.के. धान, जो यूपीएससी के अध्यक्ष रहे थे, कुलपति रहते हुए भी कक्षाएं लेते थे। अब यदि राज्यपाल को पीड़ा हो रही है, रोना आता है, तो उन्होंने ऐलान कर दिया है – अब राजभवन में नहीं, कॉलेज में ही बैठकें होंगी।” </p>
<p>हाल के वर्षों में राज्य के लगभग सभी विश्वविद्यालय पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। राज्य के बाहर के लोग शायद इस पर विश्वास न करें, लेकिन यहां एक ही विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रति-कुलपति, रजिस्ट्रार और 20 प्राचार्य भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेजे जा चुके हैं। मगध विश्वविद्यालय के कुलपति राजेंद्र प्रसाद के आवास से निगरानी विभाग ने तीन करोड़ रुपये नकद बरामद किए थे। इसी विश्वविद्यालय के तीन अन्य कुलपति – प्रो. अरुण कुमार, प्रो. फहीमुद्दीन अहमद और प्रो. बी.एन. रावत – भी जेल भेजे गए। वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, बिहार विश्वविद्यालय, मिथिला विश्वविद्यालय और कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति भी जेल गए हैं। एक कुलपति पर आरोप है कि एक ‘अति महत्वपूर्ण व्यक्ति’ की पत्नी ने उनके विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा दी, आठ विषयों में से केवल एक में उपस्थित हुईं, बाकी सात में अनुपस्थित रहीं, फिर भी प्रथम श्रेणी में पास कर दी गईं। राज्य में दो कुलपतियों पर उनकी ही महिला शिक्षकों ने यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। पिछले महीने पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुल सचिव ने राज्यपाल से लिखित शिकायत की और थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई कि उन्हें अपने ही कुलपति से जान का खतरा है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/on-the-line-of-cpwd-vioce-chancellors-and-teachers-will-be-appointed-through-tender">आज &#8216;केंद्रीय&#8217; प्रचलन के तहत &#8216;लाटरी&#8217; से &#8216;प्राचार्य&#8217; की नियुक्ति​, कल &#8216;केंद्रीय लोक निर्माण विभाग&#8217; के तर्ज पर &#8216;निविदा&#8217; से &#8216;कुलपति और शिक्षकों&#8217; की बहाली ​होगी</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>बिहार के पांचवें ​महामहिम अयंगार​ के बाद 42वें महामहिम आरिफ मोहम्मद खान​ पधारे थे कोसी-मिथिला क्षेत्र मैथिली भाषा भाषी को सूत्रबद्ध करने &#8211; 88.4 एफएम बजाना न भूलें</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 22 May 2025 06:28:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मुखियाजी उवाच]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[governor]]></category>
		<category><![CDATA[journalism]]></category>
		<category><![CDATA[radio]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सहरसा / पटना / नई दिल्ली : हिन्दू धर्म के अठारह प्रमुख पुराणों में &#8216;वायु पुराण&#8217; में एक श्लोक है &#8220;मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना​ &#8211; कुंडे कुंडे नवं पयः ​- जातौ जातौ नवाचाराः ​- नवा वाणी मुखे मुखे​&#8221; ​अर्थात जितने मनुष्य हैं, उतने विचार ​हैं। एक ही गाँव के अंदर अलग-अलग कुऐं के पानी का स्वाद [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/head-prowess/after-the-fifth-governor-of-bihar-the-42nd-had-visited-kosi-mithila-region">बिहार के पांचवें ​महामहिम अयंगार​ के बाद 42वें महामहिम आरिफ मोहम्मद खान​ पधारे थे कोसी-मिथिला क्षेत्र मैथिली भाषा भाषी को सूत्रबद्ध करने &#8211; 88.4 एफएम बजाना न भूलें</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सहरसा / पटना / नई दिल्ली : हिन्दू धर्म के अठारह प्रमुख पुराणों में &#8216;वायु पुराण&#8217; में एक श्लोक है &#8220;मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना​ &#8211; कुंडे कुंडे नवं पयः ​- जातौ जातौ नवाचाराः ​- नवा वाणी मुखे मुखे​&#8221; ​अर्थात जितने मनुष्य हैं, उतने विचार ​हैं। एक ही गाँव के अंदर अलग-अलग कुऐं के पानी का स्वाद अलग-अलग होता ​है। एक ही संस्कार के लिए अलग-अलग जातियों में अलग-अलग रिवाज होता है तथा एक ही घटना का बयान हर व्यक्ति अपने-अपने तरीके से करता है।​ वायु पुराण का यह श्लोक मिथिला-भारत, मिथिला-बिहार, कोसी-मिथिला&#8217; में अक्षरशः ​लागू होता है। चाय की दूकान से लेकर शाश्त्रार्थ हेतु ​बने कक्ष तक भ्रमण-सम्मेलन करके देख लीजिये​ &#8211; लाखों नहीं, करोड़ों लोग मिलेंगे जो मैथिली भाषा भाषी होने के बावजूद​,​ वैचारिक मतभेद के कारण अलग- विचारधाराओं में बह रहे हैं। लेकिन ईस्ट एंड वेस्ट 88.4 एफएम रेडियो शीघ्र ही मिथिला-मैथिल और मैथिली को &#8216;मेरा नहीं&#8217;, अपितु &#8216;हमारा व्यवहार&#8217; है, में तब्दील करने जा रहा है। </strong></p>
<p>इस बात का यहाँ इसलिए जिक्र कर रहा हूँ कि सम्पूर्ण भारत के साथ-साथ विश्व के कोने-कोने में रहने वाले मैथिली भाषा-भाषी लोगों की संख्या कितनी है, यह आज़ादी के 78 वर्ष बाद भी &#8216;स्पष्ट&#8217; नहीं है​, प्रदेश के मुख्यमंत्री ​नीतीश कुमार भले राजनीतिक लाभ के लिए जातिगत जनगणना एक बार नहीं, सौ बार करा लें। लेकिन आखिर कहीं न कहीं, किसी न किसी आंकड़े को मानकर चलना पड़ेगा। एक आंकड़े के अनुसार भारत में लगभग सात करोड़ लोग हैं जो मैथिली भाषा​ भाषी हैं। इसमें विद्वान से लेकर विदुषी तक ​सभी की गणना है​, चाहे वे​ इस पृथ्वी पर कहीं भी रहते हों। </p>
<p><strong>अब, जब भारत सरकार द्वारा मैथिली भाषा को उच्चतम स्थान प्रदान करने के लिए भारत के संविधान को मैथिली में अनुवाद  करने की बात आयी और इन सात करोड़ मैथिली भाषा​ भाषी लोगों, विद्वानों, विदुषियों, शास्त्रार्थ कर्ताओं में से भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय​, मधेपुरा की संबंध इकाई ईस्ट एंड वेस्ट टीचर्स ट्रेंनिंग कॉलेज​, पटुवाहा​, सहरसा में भारतीय भाषा संस्थान​, मैसूर​, शिक्षा मंत्रालय​, भारत सरकार के राष्ट्रीय अनुवाद मिशन द्वारा भारतीय संविधान का मैथिली अनुवाद हेतु दस दिवसीय कार्यशाला का आयोजन ​किया ​गया और फिर  भारतीय भाषा संस्थान​, मैसूर के अधिकारी डॉ तारीख खान ​द्वारा  ईस्ट एंड वेस्ट टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज​, सहरसा के अध्यक्ष डॉ रजनीश रंजन को ​समन्वयक ​चुना गया &#8211;  यह सम्मान उन सात करोड़ मैथिली भाषा​ भाषी लोगों से अलग तो अवश्य कर  देता हैं​ डॉ. रजनीश रंजन-श्रीमती मनीषा रंजन को। आप माने या नहीं माने, बतकुच्चन करें या राजनीति करें​, सच तो यही है।</strong> </p>
<figure id="attachment_6600" aria-describedby="caption-attachment-6600" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-2.jpg" alt="" width="1600" height="1066" class="size-full wp-image-6600" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-2.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-2-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-2-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/5-2-1536x1023.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6600" class="wp-caption-text">उद्घाटन से पूर्व सरस्वती की अर्चना करते महामहिम</figcaption></figure>
<p>​कहते हैं कि मैथिली का मानक रूप सोतीपुरा है जिसे मध्य मैथिली भी कहा जाता ​है। मुख्य रूप से दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया, समस्तीपुर, अररिया और सहरसा जिलों में बोली जाती ​है। नेपाल में यह धनुषा, महोत्तरी, सिराहा, सप्तरी, सरलाही और सुनसारी और मोरंग जिलों में बोली जाती है। बज्जिका बोली जिसे पश्चिमी मैथिली के नाम से भी जाना जाता है, मुख्य रूप से सीतामढी, मुजफ्फरपुर, वैशाली और शिवहर जिलों और नेपाल के रौतहट और सरलाही जिलों में बोली जाती है। थोथी बोली मुख्य रूप से कोसी, पूर्णिया​, मुंगेर​, मोकामा और नेपाल के कुछ निकटवर्ती जिलों में बोली जाती है। जबकि अंगिका बोली मुख्य रूप से भागलपुर, बांका, मुंगेर​, झारखंड के गोड्डा, साहेबगंज, दुमका जिलों में और उसके आसपास बोली जाती है। </p>
<p>​<strong>आइये चलते हैं सहरसा के पटुवाहा गाँव स्थित ईस्ट एंड वेस्ट टीचर्स ट्रेंनिंग कॉलेज​ जहाँ विगत दिनों कोसी-मिथिला क्षेत्र के इतिहास में शायद पहली बार प्रदेश का कोई राज्यपाल का भ्रमण-सम्मेलन हुआ था &#8211; एक सकारात्मक पहल को मूर्त रूप देने। </strong></p>
<p>साठ के दशक के उत्तरार्ध कोसी-मिथिला क्षेत्र में जो जन्म लिए, शायद वे अपने जिला में अब तक किसी लाट साहब के आगमन का चश्मदीद गवाह नहीं हुए होंगे। उस कालखंड के पूर्वार्ध जन्म लिए लोगों को शायद याद होगा कि प्रदेश के पांचवें राज्यपाल महामहिम की मदभूषि अनंतशयनं अयंगार​, जो आजादी के बाद प्रदेश के पांचवें राज्यपाल थे ((12 मई, 1962 से 06 दिसंबर, 1967) सहरसा जिले के बनगाँव-महिषी स्थित उग्रतारा स्थान व मंडन धाम पर ​पधारे थे। आज भी महिषी गांव में एक पौराणिक सड़क का नाम राजपाल रोड के नाम से जाना ​जाता है। </p>
<blockquote><p>महामहिम अयंगार​ के बाद राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान प्रदेश के 42 वें महामहिम हैं जो कोसी-मिथिला क्षेत्र के पटुवाहा गाँव पधारे थे। यानी स्वाधीनता के बाद बिहार में अब तक 42 राज्यपाल बने, लेकिन दो को छोड़कर किसी ने भी गंगा-कोसी नदियों की धाराओं को नहीं लांघे। इस दृष्टि से आप स्वयं इस क्षेत्र की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक गरिमा के प्रति प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में बैठे लोगों की मानसिकता को आंक सकते हैं &#8211; क्योंकि कोसी-मिथिला क्षेत्र का यह इलाका सरस्वती का मंदिर के रूप में भी जाना जाता है।</p></blockquote>
<p>सहरसा जिले की स्थापना 1 अप्रैल, 1954 को हुआ और इन 71 वर्षों में सहरसा में कितना विकास हुआ सरकारी स्तर पर, यह सहरसा के मतदाता तो जानते ही हैं, अधिकारी, पदाधिकारी, विधायक, सांसद और सरकार के नुमाइंदे भी अवगत है। समस्या चाहे शिक्षा की हो, स्वास्थ्य की हो, सड़क की हो, रोजगार की हो, विकास की हो, संस्कृति की हो, भाषा की हो, गरिमा की हो, सोच की हो।​ </p>
<figure id="attachment_6601" aria-describedby="caption-attachment-6601" style="width: 2035px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-5.jpg" alt="" width="2035" height="1199" class="size-full wp-image-6601" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-5.jpg 2035w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-5-300x177.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-5-1024x603.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-5-768x452.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-5-1536x905.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2035px) 100vw, 2035px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6601" class="wp-caption-text">​श्रीमती मनीषा रंजन राज्यपाल का स्वागत करती</figcaption></figure>
<p><strong>लेकिन पटुवाहा स्थित ईस्ट एंड वेस्ट टीचर्स ट्रेंनिंग कॉलेज​ और उसके संस्थापक डॉ. रजनीश रंजन-श्रीमती मनीषा रंजन ​का मैथिली भाषा के उन्नयन में कितना योगदान रहा, यह तो मैथिली में अनुवादित भारत का संविधान कई दशकों तक गवाही देता रहेगा। इतना ही नहीं, राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ​द्वारा ईस्ट एण्ड वेस्ट 88.4 एफएम रेडियो​, जिसका वह विधिवत प्रसारण हेतु उद्घाटन ​भी किया, की आवाज &#8216;ट्रांसमिशन और एप्लिकेशन&#8217; के माध्यम से विश्व के कोने कोने तक पहुंचेगा ताकि मैथिली भाषा भाषी लोगों को अपनी जमीन, अपनी संस्कृति, अपनी गरिमा, अपना ज्ञान, अपने धरोहर आदि के बारे में जानकारी भी मिले और वे भागीदार भी बनें। </strong></p>
<p>जब डॉ. रजनीश रंजन से पूछा कि प्रदेश के मुख्यालय से करीब 225 किलोमीटर दूर, व्यावहारिक और आधुनिक दृष्टि से पिछड़े इस इलाके में &#8216;शिक्षक-प्रशिक्षण विद्यालय खोलना&#8217; और फिर &#8216;88.4 एफएम रेडियो&#8217; का उद्घोषण के पीछे की क्या कहानी है जबकि भारत के 113 शहरों में 388 निजी एफएम रेडियो स्टेशन संचालित हैं​ ? </p>
<p>​डॉ. रंजन पहले मुस्कुराये और फिर लम्बी सांस लेते कहते हैं: &#8220;ईस्ट एंड वेस्ट शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज का उद्देश्य शिक्षा देना तो है ही, ठोस नैतिक आधार पर शिक्षण के पेशे को विकसित करना भी है। यह आवश्यक नहीं है कि शिक्षित लोगों में भी नैतिकता हो ही। आज ही नहीं, कल भी और आने वाले दिनों में भी समाज में शिक्षकों की आवश्यकता होगी ही। अगर वर्तमान स्थिति को देखें तो आज समाज में बेहतर शिक्षकों की भी किल्लत है। अगर छात्र-छात्राएं भारत का भविष्य हैं, तो शिक्षक भी राष्ट्र के निर्माता हैं।&#8221;</p>
<p><strong>डॉ. रंजन कहते हैं कि &#8220;छात्र-छात्राओं को हम बेहतर और नैतिक आधार पर मजबूत शिक्षा तब तक नहीं दे सकते, जब तक शिक्षकों का विशाल समूह बेहतर जानकार और नैतिकता-बौद्धिकता की कसौटी पर खड़े न उतरें। हम दंपत्ति के साथ-साथ इस संस्थान से जुड़े सभी लोग वही कर रहे हैं। हमें ख़ुशी है कि इस शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय की स्थापना के बाद आज तक हम 3000 से अधिक छात्र-छात्राओं को प्रदेश का बेहतरीन अध्यापक बनाने में सफल रहे हैं जो आज निजी क्षेत्रों के साथ-साथ सरकारी क्षेत्र के शैक्षणिक संस्थानों अध्यापन का कार्य कर रहे हैं।&#8221;</strong></p>
<p>&#8220;जहाँ तक रेडियो स्टेशन का सवाल है,&#8221; डॉ. रंजन आगे कहते हैं कि &#8220;इसकी एक लम्बी कहानी है। दो दशक पहले शिक्षा प्राप्त करने के क्रम में मैं भी पत्रकारिता की शिक्षा के प्रति उन्मुख हुआ था। पटना विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में शिक्षा प्राप्त किया। उसी काल खंड में पटना में रेडियो मिर्ची का आगमन हुआ था और वे अपने संस्थान में नए-नए पत्रकारों की नियुक्ति करने के लिए आवेदन मांगे थे। उन दिनों आकाशवाणी पटना के वरिष्ठ अधिकारी श्री के.के. लाल, जो हम सभी को पत्रकारिता का वर्ग भी लेने आते थे, आवेदन प्रेषित करने के लिए कहे। कई इच्छुक अभ्यर्थी आवेदन भी प्रेषित किये। मैं भी एक था उनमें।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/2.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/2.jpeg" alt="" width="512" height="267" class="alignleft size-full wp-image-6602" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/2.jpeg 512w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/2-300x156.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 512px) 100vw, 512px" /></a></p>
<blockquote><p>&#8220;मैने अपने बारे में &#8211; नाम, पता, सम्पर्क, शिक्षा आदि &#8211; जो भी लिखा था, उसका शीर्षक &#8216;आत्मवृत&#8217; लिखा। रेडियो मिर्ची के अधिकारी उस शब्द को देखकर &#8216;भड़क&#8217; गए और मेरी उम्मीदवारी को निरस्त कर दिए। वहां उपस्थित कई लोग &#8216;आत्मवृत&#8217; शब्द को सुनकर हंसे भी। जो मेरे मित्र थे, वे मेरी उम्मीदवारी को निरस्त होते देख दुखी हो गए। फिर अपने माता-पिता को नमन करते, हंसते-मुस्कुराते मैं यह कहते निकला कि चलो अब अपना ही रेडियो स्टेशन खोलेंगे।&#8221;</p></blockquote>
<p>डॉ. रंजन कहते हैं: &#8220;लोगों को यह ज्ञान नहीं होता, अथवा आधुनिकता के प्रवाह में लोग यह नहीं समझना चाहते, समझते कि सरस्वती कब हमारी जिह्वा पर बैठेंगी, समय कब लोगों के मुख से कौन सा शब्द निकलेगा, नहीं जानते। कोसी-मिथिला क्षेत्र में सरस्वती का साक्षात् निवास है। शायद उन दिनों देवी सरस्वती मेरी जिह्वा पर बैठी थी &#8211; अब अपना ही रेडियो स्टेशन खोलेंगे &#8211; और दो दशक बाद कोसी-मिथिला क्षेत्र स्थित सहरसा में माननीय राज्यपाल के हाथों एफएम 88.4 रेडियो का शुभारम्भ शायद उसी कड़ी के एक श्रृंखला है। वैसे देश के 234 नए शहरों में 730 नए निजी एफएम रेडियो चैनलों और खुलने वाले हैं जिसकी स्वीकृति माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार दे दी है।&#8221;</p>
<p>डॉ. रंजन से जब पूछा कि प्रदेश के मुख्यालय से इतनी दूर इस रेडियो के मध्य से आप क्या कहना चाहते हैं श्रोताओं को? डॉ. रंजन कहते हैं: &#8220;हमारे प्रयास की सफलता अथवा यहाँ तक पहुँचने में समाज के सभी लोग, शुभेक्षु, प्रसंशक, आलोचक तो हैं ही, सबसे बड़ी ताकत बने हमारे भाई श्री उदयनारायण सिंह &#8216;नचिकेता&#8217; और मेरी अर्धांगिनी श्रीमती मनीषा रंजन जी। मनीषा जी इस रेडियो के महानिदेशक भी हैं।&#8221;</p>
<p><strong>वे कहते हैं कि &#8220;ईस्ट एण्ड वेस्ट 88.4 एफएम सम्पूर्णता के साथ मिथिला-बिहार, मधुबनी-मिथिला और कोसी-मिथिला के लोगों को समर्पित है चाहे वे मिथिला के भौगोलिक क्षेत्र में रहते हों अथवा रोजीरोटी के खातिर विश्व के किसी कोने में रहते हों। हम संयोग को प्रयोग कर व्यावहारिकता में सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं। हम मैथिली भाषा, मिथिला की संस्कृति विरासत, मिथिला की भाषा, साहित्य, व्यंजन, गरिमा, मिथिला की पौराणिक शिक्षा, मिथिला का अनुशासन, कला, शिल्प, लोक चित्रकला, इतिहास, पुरातत्व, सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाज, धार्मिक स्थान आदि को शब्दों के माध्यम से, कार्यक्रमों के माध्यम से प्रत्येक लोगों के दरवाजे तक पहुँचाना चाहते हैं। कुछ रेडियो के ट्रांसमिशन से पहुंचेंगे और शेष विज्ञान के विकास के साथ एप्लीकेशंस से। हम चाहेंगे कि विश्व में रहने वाला प्रत्येक मैथिली भाषा भाषी अपनी भाषा के माध्यम से एक दूसरे से जुड़ें। कभी कोई श्रोता बनें तो कभी कोई वाचक।&#8221;</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-6.jpg" alt="" width="2035" height="1199" class="aligncenter size-full wp-image-6603" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-6.jpg 2035w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-6-300x177.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-6-1024x603.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-6-768x452.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Dr-6-1536x905.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2035px) 100vw, 2035px" /></a></p>
<p>वैसे, डॉ. रंजन दंपत्ति का मानना है कि वैसे आज रेडियो की किल्लत नहीं है देश में, लेकिन हमारी सोच &#8216;आकस्मिक&#8217; नहीं है। हम भाषा, शब्द, मिलावट के मामले में कभी भी समझौता नहीं करेंगे। हम कभी नहीं चाहेंगे कि रेडियो में प्रसारण के माध्यम से जिन शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं, वह शब्द कर्ण प्रिय नहीं हो, वह शब्द आत्मा तक नहीं पहुंचे। आज भी रेडियो ही एक ऐसा माध्यम है जो गाँव के खेतों के आड़ पर रखकर सुना जाता है। हमारी पहुँच समाज के कोने-कोने तक है। विज्ञान के विकास, मोबाईल और एप्लिकेशन के विकास के साथ साथ यह और भी बेहतर हो गया है। हमारी कोशिश होगी कि हम समय की महत्ता को स्वीकारते, वैज्ञानिक आविष्कारों के माध्यम से, अपने रेडियो के सहारा समाज में सकारात्मक बातों को लेकर पहुंचें। मनोरंजन तो होगा ही, लेकिन लन्दन, अमेरिका, फ़्रांस, जर्मनी, जापान में रहने वाली &#8216;धीया&#8217; (बेटियां) जब अपनी बात यहाँ कहेंगी &#8216;धीया से सिया&#8217; कार्यक्रम में तो कोसी-मिथिला, मधुबनी- मिथिला, मिथिला-बिहार की बेटियों को, बहुओं को, बहनों की सोच भी बदलेगी, वे भी जीवन में आगे बढ़ने के बारे में सोचेंगी।&#8221;</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/head-prowess/after-the-fifth-governor-of-bihar-the-42nd-had-visited-kosi-mithila-region">बिहार के पांचवें ​महामहिम अयंगार​ के बाद 42वें महामहिम आरिफ मोहम्मद खान​ पधारे थे कोसी-मिथिला क्षेत्र मैथिली भाषा भाषी को सूत्रबद्ध करने &#8211; 88.4 एफएम बजाना न भूलें</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>कोसी-मिथिला क्षेत्र के सहरसा के लोगों को याद भी नहीं है बिहार के राज निवास से कोई महामहिम यहाँ आये थे 👣 लेकिन आरिफ मोहम्मद खान पदार्पित हुए  (भाग-1)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 May 2025 13:00:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मुखियाजी उवाच]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[chief minister]]></category>
		<category><![CDATA[culture]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
		<category><![CDATA[governor]]></category>
		<category><![CDATA[kosi]]></category>
		<category><![CDATA[mithila]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सहरसा/पटना/नई दिल्ली : कौन बनेगा करोड़पति में अगर अमिताभ बच्चन अपने सामने हॉट सीट पर बैठे सम्मानित महोदया अथवा महोदय से एक करोड़ का प्रश्न पूछें कि बिहार के वह कौन से लाट साहेब थे, जो बिहार के निर्माण के बाद पहली बार गंगा-कोसी नदी पार कर कोसी क्षेत्र में, खासकर सहरसा जिला में कदम [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/head-prowess/the-people-of-kosi-mithila-region-do-not-remember-when-governor-had-come">कोसी-मिथिला क्षेत्र के सहरसा के लोगों को याद भी नहीं है बिहार के राज निवास से कोई महामहिम यहाँ आये थे 👣 लेकिन आरिफ मोहम्मद खान पदार्पित हुए  (भाग-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सहरसा/पटना/नई दिल्ली : कौन बनेगा करोड़पति में अगर अमिताभ बच्चन अपने सामने हॉट सीट पर बैठे सम्मानित महोदया अथवा महोदय से एक करोड़ का प्रश्न पूछें कि बिहार के वह कौन से लाट साहेब थे, जो बिहार के निर्माण के बाद पहली बार गंगा-कोसी नदी पार कर कोसी क्षेत्र में, खासकर सहरसा जिला में कदम रहे थे? या फिर दो करोड़ का प्रश्न पूछें कि &#8216;पटना के गाँधी मैदान का नाम &#8216;गांधी मैदान&#8217; नामकरण से पहले क्या था?&#8217; तो क्या होगा ? </strong></p>
<p>उम्मीद है बच्चन साहेब उत्तरदाता से निराश होंगे। इतना ही नहीं यदि प्रश्न को बदलने का प्रावधान भी अख्तियार करेंगे, फिर भी उन्हें दो नए प्रश्नों को प्रस्तुत करने से पूर्व इन दोनों प्रश्नों का उत्तर देना होगा &#8211; कौन बनेगा करोड़पति का यही नियम है। यहाँ भी संभवतः बिहार सरकार के सचिवालय से लेकर राज्यपाल महोदय के कार्यालय में पदस्थापित अधिकारी-पदाधिकारी-मंत्री-संत्री नहीं बता पाएंगे या फिर राजकीय अभिलेखागार में भी इस सम्बन्ध में कोई अभिलेख नहीं निकाल पाएंगे। गाँधी मैदान का नाम भले &#8216;हिचकी लेते, जोखिम उठाते उत्तरदाता बताने की कोशिश भी करें, पहला प्रश्न का उत्तर देना &#8216;मुश्किल&#8217; नहीं, &#8216;नामुमकिन&#8217; होगा। </p>
<p><strong>राज्यपाल या लाट साहेब का कोसी-मिथिला क्षेत्र के सहरसा शहर में आगमन का जिक्र यहाँ इसलिए कर रहा हूँ कि न केवल कोसी-मिथिला-सहरसा के इतिहास में, बल्कि बिहार के इतिहास में निकट के दशकों में प्रदेश के राज्यपाल का यहाँ भ्रमण-सम्मेलन नहीं सुना हूँ। यह भी नहीं पढ़ा हूँ कि बिहार के राज्यपाल अपने प्रदेश के सबसे उपेक्षित जिला, जो अब 71 वां स्थापना दिवस मना रहा है, आये हों। वैसे राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान की आयु भी सहरसा जिला की आयु के समकक्ष ही है। अलबत्ता वे दो वर्ष बड़े ही हैं। इसके लिए सोनबरसा (सहरसा) का एक दंपत्ति &#8211; डॉ. रजनीश रंजन और श्रीमती मनीषा रंजन &#8211; काबिले तारीफ़ के हकदार हैं। </strong></p>
<p>बहरहाल, इतिहास यह कहता है कि 1911 में, किंग जॉर्ज पंचम का दिल्ली में राज्याभिषेक हुआ और ब्रिटिश भारत की राजधानी दिल्ली में स्थानांतरित कर दी गई। 21 मार्च, 1912 को बंगाल के नए गवर्नर थॉमस गिब्सन कारमाइकल ने कार्यभार संभाला और घोषणा की कि अगले दिन, 22 मार्च से बंगाल प्रेसीडेंसी को बंगाल, उड़ीसा, बिहार और असम के चार सूबों में विभाजित कर दिया जाएगा ।  पुनःश्च भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत 1 अप्रैल 1936 को  बिहार और उड़ीसा अलग-अलग प्रांत का अस्तित्व मिला। 1 अप्रैल 1936 को सर जेम्स डेविड सिफ्टन को बिहार का पहला राज्यपाल नियुक्त किया गया, जबकि मुहम्मद यूनुस को राज्य का पहला प्रधानमंत्री घोषित किया गया।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-1-fotor-2025052118212.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-1-fotor-2025052118212.jpg" alt="" width="1593" height="763" class="aligncenter size-full wp-image-6591" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-1-fotor-2025052118212.jpg 1593w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-1-fotor-2025052118212-300x144.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-1-fotor-2025052118212-1024x490.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-1-fotor-2025052118212-768x368.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-1-fotor-2025052118212-1536x736.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1593px) 100vw, 1593px" /></a></p>
<blockquote><p>बिहार के 42वें राज्यपाल का सहरसा शहर में भ्रमण-सम्मेलन की चर्चा आगे करेंगे, पहले उनकी यात्रा के बहाने राजभवन का इतिहास के पन्नों पर जमी मिट्टी को पोछने की कोशिश करता हूँ। हो सकता है आज की पीढ़ी को, छात्र-छात्राओं को इससे लाभ हो। वजह यह भी है कि बिहार में स्थित उच्च शिक्षा हेतु सभी विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति राज्यपाल ही होते हैं, भले विगत 78 वर्षों में सम्मानित कुलाधिपतिगण प्रदेश की उच्च शिक्षा के प्रति उदासीन रहे हों। </p></blockquote>
<p>इतिहास गवाह है कि 1 दिसंबर, 1913 को भारत के वायसराय लॉर्ड चार्ल्स बैरन हार्डिंग द्वारा बिहार राजभवन की आधारशिला रखी गई पटना को प्रदेश की राजधानी बनाने के लिए, एक नया शहर बसाने के लिए। शासन की एक नई संरचना आकार लेने लगी। बिहार के प्रथम उपराज्यपाल, सर चार्ल्स स्टुअर्ट बेली ने 21 नवंबर, 1912 को अपने पटना के छज्जूबाग निवास पर बांकीपुर दरबार आयोजित करने का आह्वान किया। दरबार में, पाँच आधिकारिक और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने अपने ज्ञापन पढ़े। वे जिन निकायों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे वे थे: बिहार लैंडहोल्डर्स एसोसिएशन, पटना जिला बोर्ड, पटना नगर पालिका, प्रांतीय मुस्लिम लीग, प्रधान भूमिहार सभा, क्षत्रिय प्रांतीय सभा और बंगाली सेटलर्स एसोसिएशन। वे पटना के प्राचीन इतिहास को याद करते हुए चाहते थे कि नई राजधानी प्राचीन गौरव को प्रतिबिंबित करे।</p>
<p>विचार-विमर्श की कार्यवाही से गुजरने के बाद, बेली ने श्रोताओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा: &#8220;मैं पटना की पुरानी भव्यता और भारत पर शासन करने वाले सबसे महान राजवंशों में से एक की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध शहर पाटलिपुत्र की स्थिति का बार-बार उल्लेख करते हुए प्रसन्नता से देखता हूँ। आपको इसकी परंपराओं पर गर्व करने का हर कारण है और हालाँकि पटना ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं और हाल के वर्षों में व्यापार केंद्र के रूप में इसका बहुत महत्व कम हो गया है, हम उम्मीद कर सकते हैं कि एक महान प्रांत की राजधानी के रूप में यह कम से कम अपनी पूर्व समृद्धि का कुछ हिस्सा वापस पा लेगा। सरकार की ओर से इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया जाएगा। </p>
<p><strong>वायसराय हार्डिंग ने 1913 में पटना में राजभवन के निर्माण की आधारशिला रखी। साल 1916 तक तीन प्रमुख इमारतें &#8211; राजभवन, पुराना सचिवालय और पटना उच्च न्यायालय &#8211; कब्जे के लिए तैयार हो गईं। उन्होंने आगे कहा, &#8220;सिविल स्टेशन का लेआउट एक ऐसा मामला है जो साइट के चयन के बाद से ही विचाराधीन है। अब योजनाएँ तैयार की जा रही हैं और मेरा मानना ​​है कि जब वे पूरी हो जाएँगी तो वे डिज़ाइन की उपयुक्तता या प्रस्तावित इमारतों की गरिमा के बारे में शिकायत की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ेंगी।&#8221; </strong></p>
<p>अजीब संयोग से, यह भारत की राजधानी नई दिल्ली और ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा के निर्माण का भी समय था, जबकि दक्षिण अफ्रीका की राजधानी प्रिटोरिया पहले से ही स्थापित थी। वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर को चुना, जिन्होंने प्रिटोरिया में दक्षिण अफ्रीका की यूनियन बिल्डिंग्स को डिज़ाइन किया था, ताकि नई दिल्ली की इमारतों की शहरी योजना और डिज़ाइनिंग की जा सके। </p>
<figure id="attachment_6592" aria-describedby="caption-attachment-6592" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-2.jpg" alt="" width="1600" height="1066" class="size-full wp-image-6592" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-2.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-2-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-2-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-2-1536x1023.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6592" class="wp-caption-text">सहरसा की धरती पर आपका स्वागत है</figcaption></figure>
<p>पटना के नए शहर &#8211; या न्यू कैपिटल एरिया &#8211; की योजना और डिजाइन के लिए उन्होंने जिस आर्किटेक्ट को चुना, वह न्यूजीलैंड के जे एफ मुनिंग्स थे, जो लुटियंस और बेकर के काम से परिचित थे और उन्होंने ढाका में भी इमारतों का डिजाइन तैयार किया था। मुनिंग्स को रांची और पटना के सरकारी आवासों (जिसे बाद में गवर्नर हाउस कहा गया), सचिवालय (जिसे अब पुराने सचिवालय के नाम से जाना जाता है) और पटना उच्च न्यायालय की इमारतों के डिजाइन का काम सौंपा गया था। पटना के नए राजधानी क्षेत्र के लिए चुनी गई जगह एक विशाल आयताकार जगह थी, जिसमें आज का संजय गांधी जैविक और वनस्पति उद्यान, जिसे पटना चिड़ियाघर के नाम से जाना जाता है, पटना गोल्फ क्लब और बेली रोड, गार्डिनर रोड और हार्डिंग रोड से घिरा पटना हवाई अड्डे तक का इलाका शामिल था। सचिवालय और सरकार के अन्य कर्मचारियों के लिए सरकारी क्वार्टर गर्दनीबाग में रेलवे लाइन के दक्षिण में स्थित होने थे। </p>
<p><strong>जब प्रांतीय सरकार ने लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधीन काम करना शुरू कर दिया था, तो बिहार सचिवालय को चलाने के लिए ढाका से लिपिक कर्मचारी और अधिकारी लाए गए थे। वे गर्दनीबाग में तंबुओं में रहते थे। 1913 से रांची में गवर्नमेंट हाउस का काम शुरू हो गया था और यह दो साल में बनकर तैयार हो गया, लेफ्टिनेंट गवर्नर बेली तुरंत वहां चले गए। साल के अंत में वायसराय हार्डिंग ने पटना में गवर्नमेंट हाउस/राजभवन के निर्माण की आधारशिला रखी। बिहार के गवर्नमेंट हाउस, मौजूदा पुराने सचिवालय और पटना हाईकोर्ट की इमारतों को बनने में तीन साल लग गए। इस बीच, प्रमुख सड़कें &#8211; बेली, हार्डिंग, सर्पेन्टाइन और गार्डिनर रोड &#8211; भी बनाई गईं और 1916 तक तीन प्रमुख इमारतें &#8211; राजभवन, पुराना सचिवालय और पटना हाईकोर्ट &#8211; रहने के लिए तैयार हो गईं। लॉर्ड हार्डिंग ने 3 फरवरी, 1916 को इनका उद्घाटन किया।</strong> </p>
<p>ऐसा होने से पहले, बेली ने 28 जनवरी, 1916 को एक और महत्वपूर्ण अधिसूचना जारी की थी। इस अधिसूचना ने आधिकारिक तौर पर पटना को बिहार प्रांत की राजधानी के रूप में नामित किया। इसने 1864 में गठित पटना नगर पालिका को पटना सिटी नगर पालिका में परिवर्तित करने की भी अधिसूचना जारी की, और इस तरह, पटना के नए शहर के लिए एक अलग नगर निकाय के लिए मंच तैयार किया। औपनिवेशिक काल में बिहार ने आखिरकार एक आधुनिक राज्य के रूप में काम करना शुरू कर दिया। पटना उच्च न्यायालय ने 1 मार्च, 1916 से काम करना शुरू कर दिया, जिससे बिहार पर कलकत्ता उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो गया और न्यायिक प्रशासन का नियंत्रण भी इससे अलग हो गया। </p>
<figure id="attachment_6593" aria-describedby="caption-attachment-6593" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-10.jpg" alt="" width="1600" height="1066" class="size-full wp-image-6593" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-10.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-10-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-10-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-10-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-10-1536x1023.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6593" class="wp-caption-text">सहरसा की धरती पर आपका स्वागत है</figcaption></figure>
<p>इस बीच, सरकार ने पटना में या उसके पास एक विश्वविद्यालय की स्थापना को सक्षम करने के लिए 19 मई, 1913 को एक समिति नियुक्त की। परिणामस्वरूप, 1 अक्टूबर, 1917 को पटना विश्वविद्यालय अस्तित्व में आया, जिसने बिहार में उच्च शिक्षा के संस्थानों के विस्तार के लिए मंच तैयार किया। 1946 में, बिहार में पुरुषों के लिए 18 और महिलाओं के लिए दो कॉलेज थे। 1949 में, यह बढ़कर 25 कॉलेज हो गया, जिसमें पुरुष और तीन महिलाएँ थीं, और छात्रों की संख्या 17,756 पुरुष और 433 महिलाएँ थीं। </p>
<p>पुलिस तंत्र के अनुसार, 1937 में बिहार में 12,698 अधिकारी और कांस्टेबल थे। हालाँकि, 1917-18 में महात्मा गांधी के चंपारण &#8216;सत्याग्रह&#8217; के समय, राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की गतिशीलता बदल गई। बिहार असहयोग आंदोलन, गांधी के दांडी मार्च और सविनय अवज्ञा आंदोलन का भागीदार और गवाह बन गया, जिसकी परिणति भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में हुई।<br />
बिहार राज्य, अपने न्यायिक प्रशासन, नागरिक नौकरशाही, पुलिस और जेल प्रशासन, और राजस्व संग्रह मामलों के साथ, 1920 तक उपराज्यपाल की अध्यक्षता में था। इसके बाद, भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत प्रशासनिक सुधारों के साथ राज्यपाल की संस्था का युग शुरू हुआ। </p>
<p><strong>राजभवन की दो दीवारों पर उपराज्यपालों और राज्यपालों के काले और सफेद चित्र &#8211; फ्रेम किए गए और टंगे हुए हैं, जैसे ही कोई इसके पोर्टिको से भवन में प्रवेश करता है &#8211; इस समृद्ध इतिहास की एक पहचान के रूप में काम करते हैं। कुल मिलाकर, बिहार और उड़ीसा में 1936 तक औपनिवेशिक काल में चार उपराज्यपाल और 13 राज्यपाल थे, और इसके बाद, जब उड़ीसा बिहार से अलग हो गया, तो 14 अगस्त, 1947 तक बिहार में आठ राज्यपाल थे। द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) के दौरान, बिहार में चार मौकों पर राज्यपाल रहे &#8211; थॉमस अलेक्जेंडर स्टीवर्ट, थॉमस जॉर्ज रदरफोर्ड, रॉबर्ट फ्रांसिस मुंडी &#8211; राज्य के अंतिम ब्रिटिश गवर्नर सर ह्यूग डॉव (13 मई, 1946 से 14 अगस्त, 1947) थे। फिलिप मैसन ने अपनी पुस्तक ‘मेन हू रूल्ड इंडिया’ में उल्लेख किया है कि उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान युद्धकालीन सेवाएं प्रदान करते हुए अनुकरणीय कार्य किया था। स्वतंत्रता के बाद की अवधि में, बिहार में अब तक 38 राज्यपाल हो चुके हैं। </strong></p>
<p>इसके अलावा, औपनिवेशिक काल में बिहार और उड़ीसा में कुल मिलाकर चार कार्यवाहक राज्यपाल थे। आजादी के बाद बिहार में आठ कार्यवाहक राज्यपाल हुए। साथ ही, अब तक तीन मौकों पर पश्चिम बंगाल के दो राज्यपालों &#8211; गोपालकृष्ण गांधी और केशरी नाथ त्रिपाठी &#8211; ने बिहार के राज्यपाल का दोहरा प्रभार संभाला है, जिसमें त्रिपाठी दो बार प्रभारी रहे। कुल मिलाकर, स्वतंत्रता पूर्व या स्वतंत्रता के बाद के काल में कोई भी महिला बिहार के उपराज्यपाल या राज्यपाल के पद पर नहीं रही है। एडवर्ड अल्बर्ट गेट दो बार उपराज्यपाल बने। इसी तरह, जब 1920 में राज्यपाल की संस्था अस्तित्व में आई, उड़ीसा के रायपुर से सत्येंद्र प्रसन्ना सिन्हा, जिन्हें लॉर्ड बैरन सिन्हा के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय मूल के पहले राज्यपाल थे। ह्यूग लैंसडाउन स्टीफेंसन और डेविड सिफ्टन ने तीन बार राज्यपाल का पद संभाला जब जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे, तब तीन राज्यपाल थे। </p>
<figure id="attachment_6594" aria-describedby="caption-attachment-6594" style="width: 2000px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Governor.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Governor.jpg" alt="" width="2000" height="800" class="size-full wp-image-6594" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Governor.jpg 2000w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Governor-300x120.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Governor-1024x410.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Governor-768x307.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Governor-1536x614.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2000px) 100vw, 2000px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6594" class="wp-caption-text">बिहार के राज्यपाल</figcaption></figure>
<p>आर आर दिवाकर, जाकिर हुसैन और एम ए एस अयंगर &#8211; ने पांच साल का अपना पूरा कार्यकाल पूरा किया। किदवई ने छह साल और दूसरे कार्यकाल में पांच साल तक सेवा की। पांच मौकों पर, पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश &#8211; यू एन सिन्हा, के बी एन सिंह, दीपक कुमार सेन, जी जी सोहोनी और बी एम लाल &#8211; ने कार्यवाहक राज्यपाल के रूप में कार्य किया। बिहार और उड़ीसा की सीमा को फिर से परिभाषित किया गया क्योंकि उड़ीसा बिहार से अलग हो गया, जब जेम्स डेविड सिफ्टन (1932-37) राज्यपाल थे। इसके अलावा, तत्कालीन छोटा नागपुर और संथाल परगना प्रशासनिक प्रभागों के जिलों से मिलकर बना झारखंड नवंबर 2000 में अलग हो गया, जब विनोद चंद्र पांडे ने पद संभाला। दूसरे और तीसरे राज्यपाल, क्रमशः माधव श्रीहरि अने और आर आर दिवाकर के कार्यकाल के दौरान, बिहार ने उल्लेखनीय छलांग लगाई। 2 जनवरी, 1952 को पटना विश्वविद्यालय को दो भागों &#8211; पटना विश्वविद्यालय और बिहार विश्वविद्यालय &#8211; में विभाजित कर दिया गया, जिससे उच्च शिक्षा के प्रसार का मार्ग प्रशस्त हुआ।</p>
<p><strong>जयराम दास दौलतराम आज़ादी के बाद पहले राज्यपाल थे। उनके नाम पर लिए गए पहले फ़ैसलों में 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 9 अगस्त को विधानसभा के पास राष्ट्रीय ध्वज फहराने की कोशिश करते समय पुलिस की गोलीबारी में शहीद हुए सात छात्रों के नाम पर एक स्मारक बनाने के आदेश और औपनिवेशिक काल के विशाल ‘मैदान’ (जिसे रेसकोर्स मैदान भी कहा जाता है) का नाम बदलकर गांधी मैदान रखना शामिल था। विभाजन के दौरान हुई हिंसा को रोकने की अपील में महात्मा गांधी मैदान के एक कोने में अनशन पर बैठे थे, जहाँ अब उनकी प्रतिमा स्थापित है।</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-7.jpg" alt="" width="1600" height="1066" class="aligncenter size-full wp-image-6595" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-7.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-7-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-7-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Arif-7-1536x1023.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a></p>
<p>बहरहाल, सहरसा की धरती पर प्रदेश के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान का आगमन कोसी-मिथिला क्षेत्र के लिए एक इतिहास है और इस इतिहास के निर्माता है सोन बरसा के एक कृषक के पुत्र और  पुत्रवधू डॉ. रजनीश रंजन और श्रीमती मनीषा रंजन। वैसे सहरसा जिले की स्थापना 1 अप्रैल, 1954 को हुआ था और इन 71 वर्षों में सहरसा में कितना विकास हुआ सरकारी स्तर पर, यह सहरसा के मतदाता तो जानते ही हैं, अधिकारी, पदाधिकारी, विधायक, सांसद और सरकार के नुमाइंदे भी अवगत है। समस्या चाहे शिक्षा की हो, स्वास्थ्य की हो, सड़क की हो, रोजगार की हो, विकास की हो, संस्कृति की हो, लका की हो, भाषा की हो, गरिमा की हो, सोच की हो।  </p>
<p>इस बीच, डॉ. रजनीश रंजन-श्रीमती मनीषा रंजन द्वारा उठाये गए कदम से आशा की किरण दिख अवश्य रही है। तभी तो कई दशक बाद प्रदेश के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान स्वयं आकर ईस्ट एण्ड वेस्ट 88.4 एफएम रेडियो का विधिवत प्रसारण हेतु उद्घाटन किया। ईस्ट एंड वेस्ट शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज का उद्देश्य शिक्षा देना तो है ही, ठोस नैतिक आधार पर शिक्षण के पेशे को विकसित करना भी है, यह बात डॉ. रंजन कहते हैं । वैसे आंकड़ों के अनुसार, भारत के 113 शहरों में 388 निजी एफएम रेडियो स्टेशन संचालित हैं। इन स्टेशनों को 36 निजी प्रसारकों द्वारा चलाया जाता है। 234 नए शहरों में 730 नए निजी एफएम रेडियो चैनलों की हाल ही में स्वीकृति के साथ भारत में निजी एफएम रेडियो स्टेशनों की संख्या में वृद्धि होने की उम्मीद है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/88.4-FM.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/88.4-FM.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-6596" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/88.4-FM.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/88.4-FM-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/88.4-FM-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/88.4-FM-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/88.4-FM-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>क्रमशः&#8230;. आगे पढ़िए : दो दशक पूर्व रेडियो-पत्रकारिता में नौकरी के लिए प्रेषित आवेदन में जब अभ्यर्थी ने लिखा &#8220;आत्मवृत&#8221; और अन्तर्वीक्षा लेने वाले अधिकारी भड़क गए, शब्द सुनकर उपस्थित लोग हंसने लगे , दो दशक बाद वही अभ्यर्थी भारतीय रेडियो की श्रृंखला में 88.4 FM रेडियो जोड़ा </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/head-prowess/the-people-of-kosi-mithila-region-do-not-remember-when-governor-had-come">कोसी-मिथिला क्षेत्र के सहरसा के लोगों को याद भी नहीं है बिहार के राज निवास से कोई महामहिम यहाँ आये थे 👣 लेकिन आरिफ मोहम्मद खान पदार्पित हुए  (भाग-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8216;छात्र-शिक्षकवृंद, मुख्यमंत्रीगण तो हैं ही, बिहार के &#8216;विश्वविद्यालयों में नेस्तनाबूद शैक्षिक वातावरण के लिए 42 &#8216;कुलाधिपति&#8217; भी उतने ही हैं &#8216;जिम्मेदार&#8217; हैं  परन्तु &#8216;ज्ञान&#8217; सभी देते हैं (भाग-1)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/chancellors-are-also-responsible-for-the-destroyed-educational-system-in-bihar</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 May 2025 04:59:53 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[arif mohammad khan]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[chief ministers]]></category>
		<category><![CDATA[education]]></category>
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		<category><![CDATA[mafia]]></category>
		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना: सम्भवतः विगत तीन दिनों से देश के वरिष्ठ पत्रकारों, नेताओं, विशेषज्ञों से पूछ रहा हूँ कि क्या भारत के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान है कि किसी राज्य का व्यक्ति अपने राज्य का राज्यपाल नहीं बन सकता है। संविधान के अनुच्छेद 153 और 157 के तहत राज्यपाल हेतु जो अहर्ताएं निर्धारित हैं, उसका पालन [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/chancellors-are-also-responsible-for-the-destroyed-educational-system-in-bihar">&#8216;छात्र-शिक्षकवृंद, मुख्यमंत्रीगण तो हैं ही, बिहार के &#8216;विश्वविद्यालयों में नेस्तनाबूद शैक्षिक वातावरण के लिए 42 &#8216;कुलाधिपति&#8217; भी उतने ही हैं &#8216;जिम्मेदार&#8217; हैं  परन्तु &#8216;ज्ञान&#8217; सभी देते हैं (भाग-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना: सम्भवतः विगत तीन दिनों से देश के वरिष्ठ पत्रकारों, नेताओं, विशेषज्ञों से पूछ रहा हूँ कि क्या भारत के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान है कि किसी राज्य का व्यक्ति अपने राज्य का राज्यपाल नहीं बन सकता है। संविधान के अनुच्छेद 153 और 157 के तहत राज्यपाल हेतु जो अहर्ताएं निर्धारित हैं, उसका पालन होना आवश्यक है। लेकिन सबों का उत्तर &#8216;नकारात्मक&#8217; ही रहा। आज़ादी के बाद आज तक एक राज्य में जन्म लिए व्यक्ति दूसरे राज्य का राज्यपाल बनते आ रहे हैं और कहते हैं &#8216;यही परम्परा&#8217; है। वैसे प्रदेश का एक व्यक्ति का अगर अपने प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने में कोई संवैधानिक अर्चन नहीं है, तो राज्यपाल / कुलाधिपति के मामले में भी देश के विद्वान-विदुषियों को, राजनीतिक विशेषज्ञों को इस दिशा में पहल करनी चाहिए। बदलाव की शुरुआत करने की अपेक्षा की नजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर ही उठती है, क्योंकि मोदी जी हैं तो मुमकिन है। </strong></p>
<p>जब अपने प्रदेश के नेता अपने ही पंचायत क्षेत्र, विधानसभा क्षेत्र, लोकसभा क्षेत्र, राज्यसभा क्षेत्र का विकास मतदाताओं के नाक रगड़ने पर भी नहीं करते (विधानमंडल/संसद द्वारा विधायकों/सांसदों को विकास के लिए अनुमोदित राशि का आवंटन और बिना खर्च उस राशि का पड़ा होना आंक लें), तो फिर दूसरे प्रदेश से आयातित राज्यपाल उस प्रदेश के विकास में कितना भूमिका निभाएंगे &#8211; यह एक गंभीर शोध का विषय है। वजह यह है कि आज़ादी के बाद बिहार में अब तक दूसरे राज्यों से 42 महानुभाव (मोहतरमा नदारत) आयातित हुए और राज्यपाल की कुर्सी पर विराजमान हुए। हालांकि,  प्रदेश के राज्यपाल बिहार  के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी होते हैं, दुर्भाग्यवश  प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने में &#8216;सूई मात्र&#8217; भी पहल नहीं किये विगत 78 वर्षों में  &#8211; कुलाधिपति का कार्यालय गवाह है। </p>
<blockquote><p>दूसरी ओर, जब आज के परिपेक्ष में प्रदेश की राजनीतिक व्यवस्था को देखते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि बिहार के वर्तमान राज्यपाल/बिहार के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी हैं, जिस कार्य की शुरुआत केरल में किये थे, बिहार में दोहरा रहे हैं। यह मैं नहीं, राजनीतिक धनुर्धर कह रहे हैं। अपनी राज्यपाल की सेवा अवधि के दौरान केरल में आरिफ मोहम्मद खान के साथ स्थानीय सरकार से नोकझोंक भी हुई थी, अखबारों के पन्ने गवाह हैं। वे &#8216;विवाद&#8217; में भी आये। वैसी स्थिति में इस बात से इंकार नहीं कर सकते हैं कि आने वाले दिनों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए भी उनकी गतिविधि &#8216;अपच्य&#8217; हो जाय। </p></blockquote>
<p>वैसे नीतीश कुमार अपने कार्यकाल में अब तक कभी भी छात्रों के साथ &#8216;पन्गा&#8217; नहीं लिए, भले प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था रसातल में चली गयी हो, चली जा रही हो। नब्बे के दशक के प्रारंभिक वर्षों से आज तक विगत 35 वर्षों में प्रदेश का कमान जिन दो व्यक्तियों &#8211; लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार &#8211; के हाथों केंद्रित रहा, प्रदेश में शिक्षा के विकास को कितना महत्व दिया, यह वर्तमान स्थिति से आँका जा सकता है। इतना ही नहीं, पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव, उनकी पत्नी पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, उनके दोनों पुत्र &#8211; एक पूर्व उप-मुख्यमंत्री और दूसरे पूर्व मंत्री &#8211; की नज़रों में शिक्षा का क्या महत्व रहा, यह उनकी शैक्षणिक योग्यता दर्शाता है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि &#8216;वैसे वर्तमान राज्यपाल और कुलाधिपति आरिफ मोहम्मद खान भी छात्रों की ताकत को जानते हैं और प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो जानते ही नहीं। </p>
<figure id="attachment_6577" aria-describedby="caption-attachment-6577" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3.jpg" alt="" width="1600" height="900" class="size-full wp-image-6577" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-3-1536x864.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6577" class="wp-caption-text">राज्यपाल के रूप में शपथ लेते आरिफ मोहम्मद खान</figcaption></figure>
<p><strong>आरिफ मोहम्मद अन्य राज्यपालों/कुलाधिपतियों जैसे नहीं हैं।  इनका कार्य करने का तरीका कुछ अलग है। प्रदेश के मुख्यमंत्री (पूर्व मुख्यमंत्री सहित), नीतीश कुमार मंत्रिमंडल के किसी भी मंत्री से अधिक शिक्षित, जुझारू हैं। वाक्पटुता अधिक है,  क्योंकि ये भी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र नेता रह चुके हैं उसी कालखंड में जब नीतीश कुमार या लालू यादव पटना विश्वविद्यालो छात्र नेता बन रहे थे । आरिफ मोहम्मद खान अलीगढ़ मुस्लिक विश्वविद्यालय छात्र संघ के पहले सचिव (1972-73) बने और फिर अध्यक्ष (1973-74) बने। तीन साल बाद, उत्तर प्रदेश के सियाना विधानसभा क्षेत्र से विधायक (1977-80) बने। फिर सातवीं, आठवीं, नवमी और बारहवीं लोकसभा में कानपुर और बहराइच से सांसद बने। केंद्र में मंत्री भी रहे। लेकिन चर्चा में अपनी वाक्पटुता के कारण आये। नीतीश और लालू के जीवनवृत भी कुछ ऐसा ही है। हाँ, ये अकेले हैं और बिहार में नीतीश &#8211; लालू का समूह है।</strong> </p>
<p>अब सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार अपने ही राज्य में, राज्य के बाहर से आये (ऐसा होता आया है) राज्यपाल के क्रियाकलापों पर अपनी पैनी निगाह नहीं रखे होंगे? यह माना नहीं जा सकता। आखिर विधानसभा का चुनाव आने वाला है। अगर चुनाब के मद्दे नजर प्रदेश में कोई राजनीतिक एजेंडा कार्य करना प्रारम्भ किया है तो निश्चित तौर पर नीतीश कुमार अपने राजनीतिक जीवन के इस पड़ाव पर बिहार के मतदाताओं की नज़रों में हंसी के पात्र नहीं बनना चाहेंगे? नितीश कुमार को चाहे कितने भी तथाकथित अलंकरणों से नवाजा गया हो, हकीकत तो यह अवश्य है कि उन्होंने सत्ता की गलियारे से लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार को बहुत दूर कर दिया। हां, वर्तमान राजनीतिक समीकरणों के मद्दे नजर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि नीतीश कुमार को भी राजनीति की मुख्यधारा (मुख्यमंत्री कार्यालय) से बाहर निकालने का प्रयास नहीं हो रहा है। कोई तो है जो नेपथ्य से सब कुछ कर रहा है। ऐसी स्थिति में आने वाले दिनों में आरिफ मोहम्मद खान &#8211; नीतीश कुमार &#8211; लालू यादव अख़बारों की सुर्ख़ियों में छा जाएँ। गाँठ बाँध लीजिये। </p>
<figure id="attachment_6578" aria-describedby="caption-attachment-6578" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-6578" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6578" class="wp-caption-text">पटना कॉलेज का ऐतिहासिक कॉरिडोर</figcaption></figure>
<p><strong>हाक़ी-डैगर-बन्दूक-पिस्तौल के बीच बिलखती शिक्षा </strong></p>
<p>बहरहाल, हॉकी स्टिक से डैगर, फिर डैगर से कट्टा, कट्टा से बन्दूक, पिस्टल, बम तक आने में बिहार के विश्वविद्यालय परिसरों को चार दशक भी नहीं लगा। जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के कालखंड और उसके बाद जिस तरह प्रदेश ने नेताओं ने बिहार के सभी विश्वविद्यालयों के छात्रों का स्वहित में इस्तेमाल कर शैक्षिक वातावरण को मिट्टी में मिलाया, आज अगर पटना विश्वविद्यालय के बिहार नेशनल कॉलेज परिसर में गोलियां चली तो विश्वविद्यालय के कुलाधिपति को इतनी तकलीफ क्यों हो रही है। वे भी तो छात्र आंदोलन के उपज हैं। आज़ादी के बाद अब तक बिहार में 42 राज्यपाल बने जो पटना विश्वविद्यालय सहित, बिहार सभी विश्वविद्यालयों कुलाधिपति भी थे। लेकिन इन वर्षों में कोई भी कुलाधिपति विश्वविद्यालय परिसर में शैक्षिक वातावरण का निर्माण कैसे हो, नहीं सोचे। अगर सोचे होते तो शायद प्रदेश की शैक्षिक व्यवस्था का यह हश्र नहीं होता। </p>
<blockquote><p>आज के लोगों को ज्ञात हो अथवा नहीं, लेकिन मुद्दत पहले पटना साइंस कॉलेज के प्रोफ़ेसर बिल्टू सिंह की हत्या की गयी थी। प्रोफ़ेसर रघुजी वर्मा को मौत के घाट उतार दिया गया था। वाणिज्य महाविद्यालय के प्रधानाचार्य प्रोफ़ेसर पी.एन. शर्मा पर बम फेंक कर कातिलाना हमला किया गया था। पटना साइंस कॉलेज के स्नातकोत्तर रसायन शास्त्र विभाग के प्रोफ़ेसर सिद्धेश्वर प्रसाद को 22 वर्ष पहले गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। उसकी कालखंड में पटना कॉलेज के पूर्व अंग्रेजी विभागाध्यक्ष और पटना विश्वविद्यालय सीनेट के सदस्य प्रोफेसर शैलेंद्र धारी सिंह की उनके घर के पास निर्मम हत्या की गयी थी। पटना विश्वविद्यालय के ही दक्षिण एशियाई इतिहास विभाग की प्रोफ़ेसर पापिया घोष के साथ उनकी और उनकी बुज़ुर्ग नौकरानी मालती देवी की हत्या कर दी गई थी। पिछले वर्ष पटना लॉ कॉलेज परिसर में अंतिम वर्ष के एक छात्र, हर्ष राज, की हॉकी स्टिक, लोहे की रॉड, ईंट और लाठी से 10 से अधिक अज्ञात लोगों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी।</p></blockquote>
<p>सत्तर के दशक के बाद आज तक, न केवल पटना विश्वविद्यालय, बल्कि बिहार के सभी विश्वविद्यालयों में कितनी गोलियां चली, कितने बम्ब फटे, कितने हॉकी स्टिक का इस्तेमाल कर अपना-किताब बराबर किया गया, यह इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है की बिहार के शिक्षा मंदिरों को अब ईंट की दीवारों से, लोहे के ग्रिलों से जकड़ दिया गया है। आखिर इन गिरती, लुढ़कती मानसिकता, व्यवस्था के कालखंडों में भी तो इन विश्वविद्यालयों में कुलपति थे, प्रदेश में इन विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक और प्रशासकीय व्यवस्था को देखने के लिए कुलाधिपति थे &#8211; लेकिन किसी ने कुछ भी नहीं किया। </p>
<figure id="attachment_6579" aria-describedby="caption-attachment-6579" style="width: 1363px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1.jpg" alt="" width="1363" height="1811" class="size-full wp-image-6579" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1.jpg 1363w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1-226x300.jpg 226w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1-771x1024.jpg 771w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1-768x1020.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Patna-College1-1156x1536.jpg 1156w" sizes="auto, (max-width: 1363px) 100vw, 1363px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6579" class="wp-caption-text">पटना कॉलेज का प्रवेश द्वार</figcaption></figure>
<p><strong>प्रदेश के कुलाधिपति ही जिम्मेदार है </strong></p>
<p>बिहार में धूल चाटती शिक्षा की स्थिति का अगर कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार है तो वह है बिहार के &#8216;लाट साहब&#8217;, यानी प्रदेश के प्रथम नागरिक, जो संवैधानिक दृष्टि से सबसे सबल हैं और कल से लेकर आज तक के कुल 41 विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति हैं। आज बिहार में 41 विश्वविद्यालय है जिसमें 8 राष्ट्रीय स्तर के हैं, 4 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, २० राज्य विश्वविद्यालय हैं, 7 निजी विश्वविद्यालय हैं, 1 डीम्ड विश्वविद्यालय है और 4 केंद्र द्वारा पोषित। इन विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति होने के नाते क्या अब तक राज्यपाल भवन में आये 42 कुलाधिपतियों का जबाबदेही नहीं था कि अपने सभी संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल कर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को अव्वल बनाते? शायद नहीं। </p>
<p>आज़ादी के बाद भारत के 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में पदस्थापित राज्यपालों, उप-राज्यपालों की कार्य अवधि और उस अवधि के दौरान राज्य का प्रथम नागरिक, संवैधानिक प्रमुख होने के नाते प्रदेशों का कितना विकास हो पाया है, इसकी विवेचना तो देश के वातानुकूलित कक्षों में बैठे राजनीतिक समीक्षक और विशेज्ञों के साथ-साथ अवकाशप्राप्त प्रदेश प्रमुख ही करेंगे, लेकिन हमारे प्रदेश बिहार में एक औसतन राज्यपालों की कार्य अवधि एक साल आठ महीने ही है। इन आठ महीनों में वे प्रदेश का विकास करने में सफल होंगे अथवा सेवा काल के समाप्ति के साथ &#8216;पोस्ट रिटायरमेंट बेनिफिट्स&#8217; के साथ जीवन का समय गुजरेंगे, आज ही नहीं, आने वाले दिनों में भी राजनीतिक विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों के लिए बहुत बड़ा शोध का विषय रहेगा। दुर्भाग्य यह है कि प्रदेश के मुख्यमंत्रियों के अलावे इन विशेषज्ञों का ध्यान प्रदेश प्रमुख की ओर जाता ही नहीं है। </p>
<p>बिहार के वर्तमान राज्यपाल श्री आरिफ मोहम्मद खान प्रदेश के राज्यपाल भवन की सूची पट्टिका में 42 वें स्थान पर अंकित हैं। आज़ादी के बाद सर्वप्रथम जयरामदास दौलतराम (15 अगस्त 1947-11 जनवरी 1948) प्रदेश के राज्यपाल बनाये गए।  उनकी कार्य अवधि छः माह की थी। आज प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का आधिकारिक आवास जिस सड़क पर स्थित है, वह सड़क (अणे मार्ग) बिहार के दूसरे राज्यपाल माधव श्रीहरि अणे के नाम से अंकित है। अणे 12 जनवरी 1948 &#8211; 14 जून 1952 तह राज्यपाल थे। इसने बाद आये आर. आर. दिवाकर (15 जून 1952 &#8211; 5 जुलाई 1957) और फिर  जाकिर हुसैन (6 जुलाई 1957 &#8211; 11 मई 1962) । जाकिर हुसैन के बाद एम. ए. एस. अय्यंगार (12 मई 1962 &#8211; 6 दिसम्बर 1967), नित्यानंद कानूनगो (7 दिसंबर 1967 &#8211; 20 जनवरी 1971), न्यायमूर्ति यू.एन. सिन्हा (कार्यवाहक) (21 जनवरी 1971 से 31 जनवरी 1971), देव कांत बरुआ (1 फरवरी 1971 से 4 फरवरी 1973) और रामचन्द्र धोंडीबा भंडारे (4 फरवरी 1973 से 15 जून 1976) प्रदेश के राज्यपाल बने। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC.jpg" alt="" width="1920" height="1080" class="aligncenter size-full wp-image-6580" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC.jpg 1920w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BNC-1536x864.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1920px) 100vw, 1920px" /></a></p>
<p><strong>शायद बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि बिहार के एक लाट साहब अपने दो साल की कार्य अवधि में पटना के इतिहास को जानने और समझने में दिलचस्पी दिखाए और यत्र-तत्र-सर्वत्र धूमने की इच्छा भी जाहिर किये। प्रदेश के लाट साहब&#8217; की इच्छा थी &#8211; पूरी तो होगी ही।  लाट साहब बिहार के नहीं थे। महाराष्ट्र में जन्म लिए बाबा साहब आंबेडकर के सहकर्मी भी थे और अनुयायी भी। दो बार सांसद भी बने। जिस कालखंड में वे बिहार के राज्यपाल थे उस कालखंड में बिहार के जनसम्पर्क निदेशक थे मोहम्मद सफी साहब और सफी साहब के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी की राज्यपाल के साथ पटना के इतिहास को बताने के लिए किस महानुभाव को लिया जाय। दो व्यक्तियों का नाम बार-बार आ रहा था श्री बेदार साहब (खुदाबक्श पुस्तकालय के निदेशक) और शिक्षाविद श्री सुरेंद्र गोपाल। परन्तु के आर्यावर्त अखबार के तत्कालीन समाचार संपादक श्री रामजी मिश्र मनोहर को चुने और दीघा से दीदारगंज तक गंगा में स्टीमर से भ्रमण किये। गंगा तट पर बसा प्रत्येक ऐतिहासिक स्थानों, भवनों को मनोहर साहब व्याख्या किये। अंत में भंडारे साहेब को कहना पड़ा कि &#8220;मनोहर जी आप पटना के इनसाइक्लोपीडिया हैं।&#8221; लेकिन इस भ्रमण सम्मलेन से बिहार को क्या मिला? प्रदेश के इतिहास को क्या मिला? ऐतिहासिक स्थलों को क्या मिला?</strong></p>
<p>भंडारे के बाद राज्यपाल भवन में आये जगन्नाथ कौशल (16 जून 1976 से 31 जनवरी 1979), न्यायमूर्ति के.बी.एन. सिंह (कार्यवाहक) (31 जनवरी 1979 से 19 सितंबर 1979), अखलाकुर रहमान किदवई (20 सितंबर 1979 से 15 मार्च 1985), पी. वेंकटसुब्बैया (15 मार्च 1985 से 25 फरवरी 1988), गोविंद नारायण सिंह (26 फरवरी 1988 से 24 जनवरी 1989) तक। गोविन्द नारायण सिंह के बारे में उस कालखंड में चर्चाएं आम थी कि वे प्रदेश में स्थित सभी विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति होने के कारण कुलपतियों की कक्षा लेने में तनिक भी संकोच नहीं करते थे। वे राज्यपाल भवन के बाहर मैदान में बैठ जाते थे, जहाँ कुलपतियों की बैठक होती थी। डांट-फटकार होती थी और फिर सभी अपने-अपने रास्ते। अख़बारों में छपता था, आकाशवाणी पटना के प्रादेशिक समाचार में वाचन होता था। गोविन्द नारायण सिंह भी 11 महीने की अवधि पूरा कर घर चले गए। अब आये न्यायमूर्ति दीपक कुमार सेन (कार्यवाहक) (24 जनवरी 1989 से 28 जनवरी 1989), आर.डी. प्रधान (29 जनवरी 1989 से 2 फरवरी 1989), जगन्नाथ पहाड़िया (3 मार्च 1989 से 2 फरवरी 1990), न्यायमूर्ति जी.जी. सोहोनी (कार्यवाहक) (2 फरवरी 1990 से 16 फरवरी 1990), मोहम्मद सलीम (16 फरवरी 1990 से 13 फरवरी 1991), बी. सत्य नारायण रेड्डी (कार्यवाहक) (14 फरवरी 1991 से 18 मार्च 1991) तक। </p>
<figure id="attachment_6581" aria-describedby="caption-attachment-6581" style="width: 466px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-Kumar.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-Kumar.jpg" alt="" width="466" height="559" class="size-full wp-image-6581" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-Kumar.jpg 466w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Law-Kumar-250x300.jpg 250w" sizes="auto, (max-width: 466px) 100vw, 466px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6581" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र</figcaption></figure>
<p><strong>बिहार के वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्र कहते हैं कि 1990 के बाद जब लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने, बिहार के विश्वविद्यालयों की स्थिति तेजी से बिगड़ गई। कुलपतियों की नियुक्ति में मेरिट की सबसे बड़ी क्षति हुई, और जातीय आधार पर नियुक्तियों की परंपरा शुरू हुई। विश्वविद्यालयों को विभिन्न जातियों के नाम पर &#8220;डिस्ट्रिब्यूट&#8221; कर कुलपति बनाए जाने लगे। राजभवन की जगह आर्य कुमार रोड की एक गली में राष्ट्रीय जनता दल के नेता रंजन प्रसाद यादव के घर कुलपतियों की बैठक होने लगी। यहीं पर उच्च शिक्षा विभाग के निदेशक और इंटरमीडिएट काउंसिल के अध्यक्ष भी बैठने लगे। यहीं नीतिगत फैसले लिए जाने लगे, यहां तक कि शिक्षकों के प्रोमोशन और डिमोशन के फैसले भी वहीं होते थे। तत्कालीन राज्यपाल मोहम्मद शफी कुरैशी, जो चांसलर भी थे, ने एक बार कहा था, &#8220;अब तो रंजन यादव सुपर चांसलर हो गए हैं।&#8221; एक कुलपति, जो दिल्ली-पटना राजधानी एक्सप्रेस से नेता जी के साथ सफर कर रहे थे, उनके साथ नेता जी का परिवार भी था। बच्चे ने कोच में शौच कर दिया, और कुलपति ने अपने हाथों से सफाई की।</strong></p>
<p>लालू प्रसाद यादव के आगमन के साथ शिक्षा लज्जित होकर गंगा में गोंता लगाने लगी और पुरे प्रदेश में तथकथित नेताओं का जन्म होने लगा। इसी कालखंड में पहले राज्यपाल आये मोहम्मद शफी कुरैशी (19 मार्च 1991 से 13 अगस्त 1993), फिर आए अखलाकुर रहमान किदवई (14 अगस्त 1993 से 26 अप्रैल 1998), सुंदर सिंह भंडारी (27 अप्रैल 1998 से 15 मार्च 1999), न्यायमूर्ति बी.एम. लाल (अभिनय) (15 मार्च 1999 से 5 अक्टूबर 1999), सूरज भान (अतिरिक्त प्रभार) (6 अक्टूबर 1999 से 22 नवंबर 1999), वी. सी. पांडे (23 नवंबर 1999 से 12 जून 2003), एम आर जोइस (12 जून 2003 से 31 अक्टूबर 2004), वेद प्रकाश मारवाह (1 नवंबर 2004 से 4 नवंबर 2004), बूटा सिंह (5 नवंबर 2004 से 29 जनवरी 2006), गोपालकृष्ण गांधी (31 जनवरी 2006 से 21 जून 2006), आर. एस. गवई ( 22 जून 2006 से 9 जुलाई 2008), आर. एल. भाटिया (10 जुलाई 2008 से 28 जून 2009), देवानंद कोंवर (29 जून 2009 से 21 मार्च 2013), डी. वाई. पाटिल (22 मार्च 2013 से 26 नवंबर 2014), केशरी नाथ त्रिपाठी (अतिरिक्त प्रभार) (27 नवंबर 2014 से 15 अगस्त 2015) आदि। </p>
<p><strong>भारत के चौदहवें राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द पटना के राज्यपाल की कुर्सी से ही आये थे। वे 16 अगस्त 2015 से 20 जून 2017) तक लाट साहब थे। कोविंद साहब का राज्यपाल भवन में समय समाप्त हुआ, वे राष्ट्रपति भवन आ गए। उनके राज्यपाल के रूप में कार्यकर्ते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोध गया भ्रमण किये थे। बिहार के लोगों को आस्वाशन दिए की गया को सांस्कृतिक शहर बनाएंगे। कोविंद साहब राष्ट्रपति बनकर अवकाश भी ले लिए, प्रधानमंत्री पहली बार से तीसरी बार प्रधानमंत्री बने, गया और बोधा गया आज भी वैसा ही है। फिर राज्यपाल भवन में आये केशरी नाथ त्रिपाठी (अतिरिक्त प्रभार) (20 जून 2017 से 29 सितंबर 2017), सत्यपाल मलिक (30 सितंबर 2017 से 23 अगस्त 2018), लालजी टंडन (23 अगस्त 2018 से 28 जुलाई 2019), फाल्गुन चौधरी (29 जुलाई 2019 &#8211; 13 फरवरी 2023), राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर 14 फरवरी 2023 से 1 जनवरी 2025 और आज विराजमान हैं आरिफ मोहम्मद खान (2 जनवरी 2025 से लगातार ) । </strong></p>
<blockquote><p>प्रदेश के विश्वविद्यालय अभी तक 42 कुलाधिपतियों को आते-जाते देखा है। लेकिन शिक्षा व्यवस्था के साथ प्रदेश की अन्य व्यवस्था &#8216;अव्यवस्थित&#8217; ही रहा, और आगे भी रहेगा। क्योंकि अगर 78 वर्ष की आज़ादी में प्रदेश के राज्यपाल निवास में 42 लाट साहेब &#8216;आये और गए&#8217; तो पटना विश्वविद्यालय में अब तक 55 (आज़ादी के पहले 6 और 49 आज़ादी के बाद)  कुलपति का भी वही हश्र रहा। </p></blockquote>
<p>इन वर्षों में जे. जी. जेनिंग्स (01.10.1917 -15.10.1920), वी. एच. जैक्सन (16.10.1920 से 14.10.1923), सर एस. सुल्तान अहमद (15.10.1923 &#8211; 11.11.1930), स्टीवर्ट मैकफर्सन (12.11.1930 से 22.08.1933), न्यायमूर्ति के. एम. नूर (23.08.1933 से 22.08.1936), सचिदानंद सिन्हा (23.08.1936 से 31.12.1944), सी. पी. एन. सिंह (01.01.1945 से 20.06.1949), सारंगधर सिंह (21.06.1949 से 01.01.1952), डॉ के एन बहल (02.01.1952 से 31.01.1953), वी.के.एन. मेनन (30.03.1953 से 31.12.1953), डॉ बासुदेव नारायण (01.01.1954 से 19.03.1957), डॉ बलभद्र प्रसाद (20.03.1957 से 11.07.1960), श्री बी एन राय (12.07.1960 से 28.02.1962), डॉ जॉर्ज जैकब (14.03.1962 से 13.03.1965), डॉ. के.के.दत्ता (14.03.1965 से 13.11.1970), महेंद्र प्रताप (14.11.1970 से 20.04.1972), के. अब्राहम (21.04.1972 से 07.05.1972), सचिन दत्त (08.05.1972 से 10.08.1973), श्रीमती रमोला नंदी (11.08.1973 से 16.09.1973), श्री डी. एन. शर्मा (17.09.1973 से 07.01.1977), डॉ. ए.के. धन (11.01.1977 से 24.08.1978), जी.एस. ग्रेवाल (25.07.1978 से 01.08.1978), डॉ. टी. बी. मुखर्जी (02.08.1978 से 31.07.1979), डॉ. आर. सी. सिन्हा (05.08.1979 से 08.08.1979) पटना विश्वविद्यालय के कुलपति बने। </p>
<p>सत्तर के दशक के अंत में पटना कालेज के प्राचार्य, स्नातकोत्तर अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. केदार नाथ प्रसाद कुलपति बने। वे 09.18.1979 से 21.04.1980 तक कार्यालय में थे। लव कुमार मिश्र कहते हैं: &#8220;पहले जब शारंगधर सिंह, के.के. दत्त, सचिन दत्त और महेन्द्र प्रताप जैसे विद्वान कुलपति होते थे, वे शिक्षा मंत्री के यहां भी नहीं जाते थे। स्वयं मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह पटना विश्वविद्यालय के कुलपति से सलाह लेने उनके घर जाते थे। 1977 तक पटना विश्वविद्यालय के कुलपति का आधिकारिक आवास गांधी मैदान के दक्षिण कोने पर था, जहां अब मौर्य होटल है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. केदारनाथ प्रसाद, जो इंडियन एजुकेशन सर्विस के अधिकारी थे, ने मुख्य सचिव को लिखित आपत्ति दी थी कि उनकी अनुमति के बिना पटना कॉलेज में डीएम ने पुलिस भेज दी। उन्होंने कहा था कि वे प्रमंडल के आयुक्त से भी वरिष्ठ हैं। जब पटना के डीएम ने राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय में परीक्षा पर रोक लगाई, तो कुलपति अतर देव सिंह ने विरोध करते हुए परीक्षा का आयोजन कराया। वे भी इंडियन एजुकेशन सर्विस के अधिकारी थे।&#8221;</p>
<p>अस्सी के दशक के प्रारंभिक वर्षों में सबसे पहले कुलपति बने डॉ. आर. शुक्ला (22.04.1980 से 13.07.1981), डॉ. एस. पी. सिन्हा (14.07.1981 से 03.02.1983), डॉ. जी. पी. सिन्हा (04.02.1983 से 31.10.1985), डॉ. के. एन. प्रसाद (31.10.1985 से 17.04.1987), डॉ एस एन दास (18.04.1987 से 01.09.1988), डॉ ए एल साहा (02.09.1988 से 14.12.1988), डॉ. आर.के.अवस्थी (15.12.1988 से 25.06.1990), डॉ. एम. मोहिउद्दीन (26.06.1990 से 25.06.1993), राहुल सरीन (26.06.1993 से 05.05.1994), अनिल कुमार (06.05.1994 से 20.01.1995), डॉ. एस. एन. पी. सिन्हा (21.01.1995 से 20.01.1998), डॉ एस नज़र अहसन (21.01.1998 से 02.04.2001), डॉ एल एन राम (03.04.2001 से 23.06.2001), डॉ. के.के. झा (01.08.2001 से 31.07.2004), डॉ. विभाष के. यादव (01.08.2004 से 16.08.2004), डॉ.जगन्नाथ ठाकुर (16.08.2004 से 23.08.2005), डॉ सैयद एहतेशामुद्दीन (24.08.2005 से 20.11.2006), प्रो. वाई. सी. सिम्हाद्री (20.11.2006 से 21.01.2008), डॉ श्याम लाल (25.01.2008 से 24.01.2011), डॉ सुदीप्तो अधिकारी (25.01.2011 से 01.08.2011), प्रो. शंभु नाथ सिंह (02.08.2011 से 22.03.2013), प्रो. यू.के. सिन्हा (22.03.2013 से 26.04.2013), प्रोफेसर अरुण कुमार सिन्हा (26.04.2013 से 31.01.2014), प्रो. येदला सी. सिम्हाद्री (31.01.2014 से 31.01.2017), प्रो.सुधीर कुमार श्रीवास्तव (31.01.2017 से 01.05.2017), प्रो. रासबिहारी सिंह (02.05.2017 से 01.05.2020), प्रो. (डॉ.) एच.एन. प्रसाद (02.05.2020 से 23.09.2020), प्रो. (डॉ.) गिरीश कुमार चौधरी (23.09.2020 से 25.10.2023), प्रो. के.सी. सिंह (26.10.2023 से 03.05.2024), प्रो. अजय कुमार सिंह (03.07.2024 से ) और आज आरिफ मोहम्मद खान हैं। कल ये भी संख्या में जुड़ जायेंगे।  </p>
<p><strong>मिश्र कहते हैं &#8220;यदि आज विश्वविद्यालयों की स्थिति खराब है, तो उसके लिए राज्यपाल भी जिम्मेदार हैं। पिछले 15 वर्षों में बिहार में कुछ ऐसे राज्यपाल भी आए, जिन पर खुले तौर पर यह आरोप लगे कि उनके करीबियों ने दो-दो करोड़ रुपये में कुलपति पद बेचे। एक बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजभवन द्वारा नियुक्त छह कुलपतियों की नियुक्ति को रोक दिया था। वर्तमान में सत्ता पक्ष के अनुषांगिक संगठनों द्वारा भेजे गए नामों पर नियुक्तियाँ हो रही हैं। एक कुलपति ने दावा किया कि उनका नाम “हाई कमान” से भेजा गया था। जब हम विद्यार्थी थे, तब कुलपति भी लेक्चर लेने आते थे। मुझे स्मरण है कि सचिन दत्त, जो केंद्र में वित्त सचिव थे, सेवानिवृत्त होकर पटना विश्वविद्यालय के कुलपति बने और पटना कॉलेज के बी.ए. लेक्चर थिएटर में इकोनॉमिक्स पढ़ाने आते थे। महेन्द्र प्रताप, जो कैम्ब्रिज से पीएचडी थे, अंग्रेजी का क्लास लेते थे। जॉर्ज जैकब और ए.के. धान, जो यूपीएससी के अध्यक्ष रहे थे, कुलपति रहते हुए भी कक्षाएं लेते थे। अब यदि राज्यपाल को पीड़ा हो रही है, रोना आता है, तो उन्होंने ऐलान कर दिया है – अब राजभवन में नहीं, कॉलेज में ही बैठकें होंगी।&#8221;</strong></p>
<p>विगत शनिवार को बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने पटना में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में आरोप लगाये कि बिहार के विश्वविद्यालय अराजक तत्वों के हाथों सौंप दिए गए हैं। राज्यपाल ने पहले बीएन कॉलेज में हुई बम की घटना में एक छात्र की मौत पर रोआंसी आवाज में कहा कि मेरा दिल रोता है, जब सुनता हूं, जो कुछ भी यूनिवर्सिटी में हो रहा है। यह हैरत की बात है कि यूनिवर्सिटी में बम मार के तीन दिन पहले बच्चे की जान ले ली गई। राज भवन में मीटिंग हुई। कुलपति से पूछा कि उस मीटिंग में जो फैसले लिए गए थे, उस पर क्या कार्रवाई हुई उसकी रिपोर्ट भी अभी तक नहीं आई है? तो कुलपति ने कहा कि रिपोर्ट आ गई है। फिर कहते हैं यूनिवर्सिटी सरस्वती का मंदिर है और इसे अराजक तत्वों  के हवाले हमने कर दिया है। फिर हाथ जोड़कर कहने लगे कि हमारा देश ज्ञान की संस्कृति है, अगर ज्ञान के मंदिर में बम चलेंगे या ऐसी घटना होती है, जिससे शर्मिंदा होना पड़े, यह तो मैं कह भी नहीं सकता हूँ। कुलाधिपति महोदय विश्वविद्यालय परिसर में भ्रमण-सम्मलेन करने निकल गए। हॉस्टल में अवैध कब्जा को लेकर नाराज हो गए। लेकिन नीतीश कुमार अपनी आँखें बंद नहीं रखे हैं।<br />
 <br />
45 साल पहले जब जगन्नाथ कौशल चंडीगढ़ से बिहार के राज्यपाल बनकर आए थे, तब उनके बच्चों ने भी पटना विश्वविद्यालय में नामांकन कराया था। उसी विवादास्पद बिहार नेशनल कॉलेज में एक कार्यक्रम के दौरान कॉमन रूम का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा था, &#8220;यदि मेरा वश चले तो मैं राज्य के सभी विश्वविद्यालयों को बंद कर दूं, ताला लगा दूं।&#8221; आज की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। हाल के वर्षों में राज्य के लगभग सभी विश्वविद्यालय पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। राज्य के बाहर के लोग शायद इस पर विश्वास न करें, लेकिन यहां एक ही विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रति-कुलपति, रजिस्ट्रार और 20 प्राचार्य भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेजे जा चुके हैं। मगध विश्वविद्यालय के कुलपति राजेंद्र प्रसाद के आवास से निगरानी विभाग ने तीन करोड़ रुपये नकद बरामद किए थे। इसी विश्वविद्यालय के तीन अन्य कुलपति – प्रो. अरुण कुमार, प्रो. फहीमुद्दीन अहमद और प्रो. बी.एन. रावत – भी जेल भेजे गए। वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, बिहार विश्वविद्यालय, मिथिला विश्वविद्यालय और कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति भी जेल गए हैं। एक कुलपति पर आरोप है कि एक ‘अति महत्वपूर्ण व्यक्ति’ की पत्नी ने उनके विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा दी, आठ विषयों में से केवल एक में उपस्थित हुईं, बाकी सात में अनुपस्थित रहीं, फिर भी प्रथम श्रेणी में पास कर दी गईं। राज्य में दो कुलपतियों पर उनकी ही महिला शिक्षकों ने यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। पिछले महीने पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुल सचिव ने राज्यपाल से लिखित शिकायत की और थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई कि उन्हें अपने ही कुलपति से जान का खतरा है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders.jpg" alt="" width="1994" height="1213" class="aligncenter size-full wp-image-6582" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders.jpg 1994w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders-300x182.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders-1024x623.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders-768x467.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/BN-Colelge-Founders-1536x934.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1994px) 100vw, 1994px" /></a></p>
<blockquote><p>पटना विश्वविद्यालय के एक अवकाश प्राप्त प्राध्यापक का कहना है कि “जब प्रदेश में शिक्षा को अपाहिज कर गंगा में डुबकी लगाने के लिए छोड़ दिया गया, आप सीनेट और सिंडिकेट की बात करते हैं। आज ‘सीनेट’ और ‘सिंडिकेट’ का अर्थ और भावार्थ बताने वालों की भी किल्लत है शैक्षणिक संस्थानों में। हम किस संस्कार और गरिमा की बात करते हैं? पटना विश्वविद्यालय का सीनेट हॉल अपने ही प्रदेश के एक नागरिक का देन है जिन्होंने आज से सौ वर्ष पहले शिक्षा के महत्व को समझा। शिक्षाओं की बैठकी का महत्व समझा। दीक्षांत समारोह का महत्व समझा। आज अगर विश्वविद्यालय अथवा प्रदेश की सरकार उस स्थान पर मॉल या वातानुकूलित बाजार खोलने की बात कर दे तो यकीन कीजिये प्रदेश के लाखों लोग पैसे फूंकने को तैयार हो जाएंगे । आज शिक्षा का कोई मोल नहीं है। शिक्षा को व्यापार बना दिया गया है। प्रदेश में जो भी पढ़ने पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं हैं वे अपने जीवन निर्माण के लिए, पढ़ने के लिए प्रदेश से पहले ही बाहर निकल जाते हैं।”</p></blockquote>
<p>बहरहाल, <strong>बी.एन. कॉलेज की स्थापना 1889 में कुल्हरिया राज, भोजपुर, बिहार के दो उत्साही शिक्षाविदों और राष्ट्रवादियों बाबू बिशेश्वर सिंह और शालिग्राम सिंह </strong>ने की थी। 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन के बाद औपनिवेशिक शासन के दौरान, इन दोनों भाइयों ने छात्रों के बीच राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़काने की सख्त जरूरत महसूस की और इस कॉलेज का नाम बिहार नेशनल कॉलेज रखा, लेकिन तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उन पर राष्ट्रीय शब्द को हटाने के लिए बहुत दबाव डाला और राजा की उपाधि और एक बहुत बड़ी जागीर देने का वादा किया। लेकिन चूंकि ये भाई इस मायने में दूसरे ज़मींदारों से अलग थे कि जहाँ दूसरे लोग शिक्षा के प्रसार को अपने अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरा मानते थे, वहीं ये सिंह भाई शिक्षा के उत्कृष्ट और महान उद्देश्यों के लिए प्रतिबद्ध थे, इसलिए उन्होंने दबावों के आगे घुटने नहीं टेके। उस समय बिशेश्वर सिंह कलकत्ता कॉलेज ऑफ़ लॉ में अंतिम वर्ष (लॉ) के छात्र थे। कलकत्ता के गवर्नर जनरल ने उन्हें कॉलेज से निकाल दिया। इतना ही नहीं जब बिशेश्वर सिंह ने पीएल प्रमाण पत्र प्राप्त करने के बाद पटना सिविल कोर्ट में वकालत शुरू की तो उन्हें बार एसोसिएशन में बैठने की भी इजाजत नहीं दी गई। उन्हें अनेक कष्टों और परेशानियों का सामना करना पड़ा। सरकार ने उन्हें विद्रोही घोषित कर दिया और अंततः शालिग्राम सिंह के पुत्र शशिशेखर सिंह, जो न्यायमूर्ति केबीएन सिंह के पिता थे, की 1942 में गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसलिए यह राष्ट्रीय शब्द बहुत ही सार्थक है जिसका लंबा और गौरवशाली इतिहास आज भी छात्रों में राष्ट्रवादी भावनाओं और जज्बे को भर देता है। सात शहीदों में शामिल जगपति कुमार इसी कॉलेज के छात्र थे।</p>
<p><strong>शुरू में कॉलेज में अंग्रेजी, संस्कृत, फारसी, हिंदी, दर्शनशास्त्र आदि की ऑनर्स स्तर तक शिक्षा दी जाती थी। बिहार में पहली बार इसी कॉलेज में लॉ की पढ़ाई शुरू हुई थी। प्रो. आत्माराम, जो बाद में पटना कॉलेज के प्राचार्य बने, लॉ संकाय के प्रथम प्रभारी थे। तीन संकायों में स्तरीय शिक्षा दी जाती है, मानविकी संकाय, विज्ञान संकाय और सामाजिक विज्ञान संकाय। स्नातकोत्तर स्तर पर अंग्रेजी में पढ़ाई होती है। चार व्यावसायिक पाठ्यक्रम: फंक्शनल इंग्लिश, बायोटेक्नोलॉजी, बीसीए और बीबीए सफलतापूर्वक और कुशलतापूर्वक चलाए जा रहे हैं। कई छात्रों ने वैश्विक स्तर पर अपनी योग्यता साबित की है। 1892 में, कलकत्ता विश्वविद्यालय ने इसे प्रथम स्तर के कॉलेज का दर्जा दिया। 1923 में, पटना के तत्कालीन आयुक्त एकडेल एर्लियो के प्रयासों से इस कॉलेज को सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया और इसे पूर्ण घाटा अनुदान कॉलेज का दर्जा दिया गया। 1952 में, इस कॉलेज को पटना विश्वविद्यालय की एक घटक इकाई में बदल दिया गया।</strong></p>
<p>श्री अक्षय कुमार मजूमदार, डॉ. डी.एन. सेन, मोइनुल हेग, डॉ. डी.पी. विद्यार्थी, डॉ. एस.के. बोस, डॉ. अमरनाथ सिन्हा, डॉ. एम.पी. सिन्हा, डॉ. पी.के. पोद्दार और अन्य जैसे गतिशील और ऊर्जावान प्राचार्यों के तहत कॉलेज ने शानदार विकास किया है। कॉलेज देश के अन्य शैक्षणिक संस्थानों के लिए रोल मॉडल है।  इस कॉलेज के छात्रों और शिक्षकों ने समाज के हर क्षेत्र में अपनी जगह बनाई है और विभिन्न क्षेत्रों में पथप्रदर्शक और अग्रणी रहे हैं। इस कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. मोइनुल हक ने भारतीय ओलंपिक टीम का नेतृत्व किया था। उनकी याद में पटना के राजेंद्र नगर में मोइनुल हक स्टेडियम की स्थापना की गई है। भारत के पहले अटॉर्नी जनरल लाल नारायण शर्मा, 11 साल तक केंद्रीय मंत्री रहे और त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल प्रो. सिद्धेश्वर प्रसाद, सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक और पद्म भूषण पुरस्कार विजेता डॉ. बिंदेश्वर पाठक इसी महाविड़फयालय के छात्र रहे। भारत के माननीय न्यायमूर्ति मिहिर कुमार झा, पटना उच्च न्यायालय आदि इस कॉलेज के पूर्व छात्र रहे हैं। पद्म पुरस्कार विजेता जैसे डॉ. मोइनुल हक (1971 में पद्म श्री), डॉ. कलीम अजीज (1989 में पद्म श्री), डॉ. शैलेंद्र नाथ श्रीवास्तव (2003 में पद्म श्री), डॉ. शरफे आलम (2004 में पद्म श्री) भी इसी महाविद्यालय के छात्र थे। </p>
<p><strong>लेकिन इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि 1990 में जब प्रदेश का बागडोर लालू प्रसाद यादव के हाथों आया, जो ऐतिहासिक चारा घोटाला में मुख्य आरोपी, सजा पाने वाले रहे, इसी महाविद्यालय के छात्र थे। लव कुअमार मिश्र कहते हैं कि &#8216;हाल के वर्षों में राज्य के लगभग सभी विश्वविद्यालय पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। राज्य के बाहर के लोग शायद इस पर विश्वास न करें, लेकिन यहां एक ही विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रति-कुलपति, रजिस्ट्रार और 20 प्राचार्य भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेजे जा चुके हैं। मगध विश्वविद्यालय के कुलपति राजेंद्र प्रसाद के आवास से निगरानी विभाग ने तीन करोड़ रुपये नकद बरामद किए थे। इसी विश्वविद्यालय के तीन अन्य कुलपति – प्रो. अरुण कुमार, प्रो. फहीमुद्दीन अहमद और प्रो. बी.एन. रावत – भी जेल भेजे गए। वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, बिहार विश्वविद्यालय, मिथिला विश्वविद्यालय और कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति भी जेल गए हैं। </strong></p>
<p>उनके अनुसार, एक कुलपति पर आरोप है कि एक ‘अति महत्वपूर्ण व्यक्ति’ की पत्नी ने उनके विश्वविद्यालय से एम.ए. की परीक्षा दी, आठ विषयों में से केवल एक में उपस्थित हुईं, बाकी सात में अनुपस्थित रहीं, फिर भी प्रथम श्रेणी में पास कर दी गईं। राज्य में दो कुलपतियों पर उनकी ही महिला शिक्षकों ने यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। पिछले महीने पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुल सचिव ने राज्यपाल से लिखित शिकायत की और थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई कि उन्हें अपने ही कुलपति से जान का खतरा है। <br />
बहरहाल, आज प्रदेश ही नहीं, देश-विदेश में रहने वाले विद्वान-विदुषियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण शोध का विषय है कि विगत 78 वर्षों में बिहार के राज्यपाल / कुलाधिपति की कार्यालय/कुर्सी पर कोई विदुषी क्यों नहीं विराजमान हुई? इतना ही नहीं इतिहास साक्षी है कि पटना विश्वविद्यालय के इतिहास में आज तक सिर्फ 37 दिनों के लिए श्रीमती रमोला नंदी (11.08.1973 से 16.09.1973) को छोड़कर कोई भी विदुषी कुलपति भी नहीं बनी और लगातार पुरुषों ने सिंहासन पर कब्ज़ा बनाये रखा। </p>
<figure id="attachment_6583" aria-describedby="caption-attachment-6583" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6.jpg" alt="" width="1600" height="1066" class="size-full wp-image-6583" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6-768x512.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/05/Bihar-6-1536x1023.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6583" class="wp-caption-text">डॉ. रजनीश रंजन और श्रीमती मनीषा रंजन और राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान</figcaption></figure>
<p><strong>आइये राज्यपाल के साथ सहरसा चलते हैं </strong></p>
<p>सहरसा जिले की स्थापना &#8216;अप्रैल फूल&#8217; के दिन 1 अप्रैल, 1954 को हुआ था। विगत 71 वर्षों में सहरसा में कितना विकास हुआ सरकारी स्तर पर, यह सहरसा के मतदाता तो जानते ही हैं, अधिकारी, पदाधिकारी, विधायक, सांसद और सरकार के नुमाइंदे भी अवगत है, चाहे समस्या शिक्षा की हो, स्वास्थ्य की हो, सड़क की हो, रोजगार की हो। आज पुरे देश में श्रमिकों का पलायन जितना सहरसा-मधेपुरा क्षेत्र से हो रहा है, दुखद है। ऐसे मुनाफा कमाने के उद्देश्य से ही सही, इन क्षेत्रों में निजी क्षेत्रों का प्रादुर्भाव एक सकारात्मक संकेत दे रहा है। इसी कड़ी के तहत डॉ. रजनीश रंजन और श्रीमती मनीषा रंजन की अगुवाई में विगत 15 मई को सहरसा जिला के  राष्ट्रीय राजमार्ग 107 पर स्थित ईस्ट एन वेस्ट टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज परिसर में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ईस्ट एण्ड वेस्ट 88.4 एफएम रेडियो का विधिवत प्रसारण हेतु उद्घाटन किया। इस कॉलेज इसका उद्देश्य बी.एड. और डी.एल.एड. की शिक्षा देना तो है ही, ठोस नैतिक आधार पर शिक्षण के पेशे को विकसित करना है। वैसे आंकड़ों के अनुसार, भारत के 113 शहरों में 388 निजी एफएम रेडियो स्टेशन संचालित हैं। इन स्टेशनों को 36 निजी प्रसारकों द्वारा चलाया जाता है। 234 नए शहरों में 730 नए निजी एफएम रेडियो चैनलों की हाल ही में स्वीकृति के साथ भारत में निजी एफएम रेडियो स्टेशनों की संख्या में वृद्धि होने की उम्मीद है। </p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;</strong> </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/chancellors-are-also-responsible-for-the-destroyed-educational-system-in-bihar">&#8216;छात्र-शिक्षकवृंद, मुख्यमंत्रीगण तो हैं ही, बिहार के &#8216;विश्वविद्यालयों में नेस्तनाबूद शैक्षिक वातावरण के लिए 42 &#8216;कुलाधिपति&#8217; भी उतने ही हैं &#8216;जिम्मेदार&#8217; हैं  परन्तु &#8216;ज्ञान&#8217; सभी देते हैं (भाग-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8220;देते न आप साथ तो मर जाते हम कभी के &#8230; अपनी जुबान से आपके जज्बात कहेंगे&#8221; : ​मोदी जी से आरिफ मोहम्मद खान🙏</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/bihar-gets-new-governor-arif-mohammad-khan</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Jan 2025 06:20:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : जिस वर्ष पटना के वीणा सिनेमा गृह में मनोज कुमार द्वारा निर्देशित और निर्मित &#8220;शोर&#8221; सिनेमा का प्रदर्शन प्रारम्भ हुआ, साल 1972 था। उस वर्ष बिहार के वर्तमान लाट साहब आरिफ मोहम्मद खान की आयु 21 वर्ष रही होगी और वे भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित मतदान करने हेतु न्यूनतम [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : जिस वर्ष पटना के वीणा सिनेमा गृह में मनोज कुमार द्वारा निर्देशित और निर्मित &#8220;शोर&#8221; सिनेमा का प्रदर्शन प्रारम्भ हुआ, साल 1972 था। उस वर्ष बिहार के वर्तमान लाट साहब आरिफ मोहम्मद खान की आयु 21 वर्ष रही होगी और वे भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित मतदान करने हेतु न्यूनतम आयु को प्राप्त किये होंगे। मनोज कुमार, जाया भादुड़ी, प्रेमनाथ, नंदा, कामिनी कौशल, मदनपुरी, असरानी और अन्य कलाकारों द्वारा अभिनीत कोई दो घंटा पचास मिनट के उस सिनेमा में एक गीत था:</strong></p>
<p><em>पानी रे पानी, <br />
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, <br />
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, <br />
जिसमें मिला दो लगे उस जैसा</em></p>
<p>इस गीत को लिखा था इंद्रजीत सिंह तुलसी और संगीत दिया था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल तथा गाया था मुकेश और लता मंगेशकर। आज सुबह-सवेरे रेडियो पर इस गीत को सुनकर बिहार के लाट साहब याद आ गए। अस्सी के दशक के उत्तरार्ध से दिल्ली की सड़कों पर, राजनेताओं के घरों में, कार्यालयों में उनका आना-जाना याद आ गया। नब्बे के दशक में ऐतिहासिक हवाला काण्ड याद आ गया जिसे मैं इंडियन एक्सप्रेस अखबार के लिए कवर करता था। </p>
<p><strong>&#8216;शोर&#8217;</strong> सिनेमा का वह गीत <strong>&#8220;पानी रे पानी&#8221;</strong> जैसे ही समाप्त हुआ, रेडियो पर सन 1970 में असित सेन द्वारा निर्देशित और मुशीर रियाज़ द्वारा निर्मित <strong>&#8220;सफर&#8221;</strong>, जिसमें शर्मीला टैगोर, राजेश खन्ना, अशोक कुमार, फिरोज खान जैसे कलाकार काम किये थे, का गीत जिसके गीतकार थे इंदीवर, संगीतकार कल्याण जी आनंद जी और गायक मुकेश बजने लगा। क्या इत्तिफाक था। गीत के बोल थे:</p>
<p><em>जो तुमको हो पसंद, वही बात करेंगे, <br />
तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे, <br />
जो तुमको हो पसंद। </p>
<p>चाहेंगे, निभाएंगे, सराहेंगे आप ही को,<br />
आँखों में दम है जब तक, देखेंगे आप ही को,<br />
अपनी जुबान से आपके जज्बात कहेंगे <br />
तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे <br />
जो तुमको </p>
<p>देते न आप साथ तो मर जाते हम कभी के <br />
पुरे हुए हैं आप से, अरमान जिंदगी के <br />
हम जिंदगी को आपकी सौगात कहेंगे <br />
तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे <br />
जो तुमको हो पसंद</em> </p>
<p>बहरहाल, कोई तीन दशक तक &#8216;बेरोजगार&#8217; रहने के बाद 68-वर्ष की आयु में अंततः आरिफ मोहम्मद खान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह का आशीर्वाद मिल गया था। देश में 18 और अधिक वर्ष के कई करोड़ मतदाता आसमान की ओर टकटकी निगाह से आज भी देख रहे हैं कि मोदी जी की निगाह उनकी ओर भी हो। उनके शहर में, प्रदेश में कल-कारखाने खुले ताकि उन्हें भी रोजगार मिले, चाहे 58 या 60 वर्ष तक ही हो। वजह भी है जब 70 और अधिक वर्ष के लोग अंतिम साँस तक कुर्सी से चिपके रहना चाहते हैं तो युवकों को, युवतियों का क्या होगा? ख़ैर। </p>
<figure id="attachment_6000" aria-describedby="caption-attachment-6000" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Aarif-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Aarif-1.jpg" alt="" width="2048" height="1536" class="size-full wp-image-6000" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Aarif-1.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Aarif-1-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Aarif-1-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Aarif-1-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Aarif-1-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6000" class="wp-caption-text">आप का आभारी हूँ प्रधानमंत्री जी</figcaption></figure>
<p>साल था 2019 और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिल्ली सल्तनत में आए पाँच वर्ष हो गये थे। उनके इर्द गिर्द वाले रहने वाले लोग नेताओं के बारे में उनका जीवन वृत्त और राजनीतिक चरित्र का विवरण प्रधान मंत्री कार्यालय तक पहुँचा चुके थे। तहक़ीक़ात के बाद रायसीना हिल से फरमान जारी हुआ। 6 सितम्बर, 2019 को आरिफ़ मोहम्मद ख़ान को वामपंथी के गढ़ केरल का राज्यपाल बनाकर भेज दिया गया। पांच वर्ष 117 दिन राज्यपाल भवन में रहने के बाद उन्हें चाणक्य-चन्द्रगुप्त-बुद्ध की नगरी में लाटसाहब बनाकर प्रेषित कर दिया गया। 73-वर्ष की आयु में नियोजन काल में बढ़ोत्तरी हो, इससे बेहतर और क्या हो सकता है। </p>
<p><strong>बुद्ध की नगरी में इस बात की चर्चाएं आम हैं कि लाटसाहब का पद उन्हें प्रधानमंत्री का प्रसाद है, अन्यथा बिहार जैसे प्रदेश में बुलंदशहर में जन्म लिए व्यक्ति का क्या काम है? लोग तो यह भी कहते हैं कि बिहार में शायद अब ऐसा कोई शिक्षित, विचारवान, विवेकशील, दक्ष, सक्षम, दूरदर्शी व्यक्ति का अभाव ही नहीं, बल्कि किल्लत भी है जो प्रधानमंत्री की बैगनी रंग वाली आँखों का तारा हो। वैसे अपवाद छोड़कर आजादी के बाद से राजनीतिक पार्टियों ने, चाहे कांग्रेस हो, जनता पार्टी हो, एनडीए हो, यूपीए हो, भाजपा हो, सबों ने अपने-अपने कालखंडों में राजनीतिक दृष्टि से बिहार को नेताओं के लिए डंपिंग ग्राउंड या आराम कक्ष बनाकर ही रखा है। लाट साहब के अलावे कई ऐसे नेता हैं जिन्हे प्रदेश के विधानसभा, विधान परिषद और  राज्यसभा  में कुर्सी देकर उनके राजनीतिक गुरुओं ने ऋण मुक्त होने का प्रयास किया है। चलिए, यह शोध का विषय है।</strong> </p>
<p>पटना के डाकबंगला चौराहे से लेकर दिल्ली के कर्तव्य पथ तक लोग इस बात पर बारंबार चर्चा करते नहीं थक रहे हैं कि खान साहब को उनकी नौकरी में विस्तार और बिहार का लाट साहब आगामी चुनाब के मद्दे नजर किया गया है। वैसे ‘आलाकमान’ शब्द कांग्रेस के लिए इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन ‘सोच बदलो-देश बदलेगा’ नारा के तहत अब भाजपा में भी इस्तेमाल होने लगा है। तदनुसार भाजपा आलाकमान का मानना है कि खान साहब आगामी विधानसभा चुनाव में ब्रह्मास्त्र हो सकते हैं। बिहार में करीब 17+ फ़ीसदी मुसलमानों को आगामी चुनाब में वर्तमान राजनीतिक पार्टियों से काटकर भारतीय जनता पार्टी अपने पक्ष में लाने के लिए भेजी है ताकि मुसलंमान मतदाताओं को यह विश्वास हो कि मोदी सरकार उनके समुदाय के लोगों को भी लाट साहब बनाती हैं। </p>
<blockquote><p>बिहार में 2011 जनगणना के अनुसार करीब 17557809 + मुसलमानों की आवादी है । अन्य राज्यों के अलावे किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कोशी का क्षेत्र मुस्लमान  बाहुल्य जिला है। सांख्यिकी के अनुसार विगत ढ़ाई दशकों में बिहार में मुसलमानों की विभिन्न जाति आवादी औसतन 35 फीसदी बढ़ी है मसलन पसमंदा, शेख, अन्सारी सुरजापुरी, धुनिया और मन्सूरी। खैर।</p></blockquote>
<p>मैं पटना के टीके घोष विद्यालय में पढ़ता था। उस विद्यालय के पुस्तकालय के दक्षिणी दीवार पर सामने डॉ. ज़ाकिर हुसैन की तस्वीर लगी थी। डॉ. हुसैन की तस्वीर के साथ प्रदेश के उन सभी राजनेताओं की तस्वीर पंक्तिबद्ध थी जिनका न केवल देश के स्वाधीनता आंदोलन में अमूल्य योगदान रहा था, बल्कि स्वतंत्र भारत में प्रदेश की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक विकास में अनवरत योगदान हो रहा था। साल था 1968 और देश को आज़ाद हुए महज 21 वर्ष हुए थे। डॉ. जाकिर हुसैन सन् 1957 से 1962 तक बिहार के लाट साहब थे। जो तस्वीर हमारे  विद्यालय के दीवार पर लटकी थी, वह तस्वीर उनके लाट साहब कार्यकाल वाली ही थी। हम सभी बच्चे उनकी कर्मठता, योग्यता के कारण नित्य नमन अवश्य करते थे। राज्यपाल की अवधि पूरा करने के पाँच साल बाद डॉ. जाकिर हुसैन देश का तीसरा राष्ट्रपति बने थे । डॉ. जाकिर हुसैन एक साल 355 दिन राष्ट्रपति कार्यालय में विराजमान रहे और कार्यालय में ही अंतिम सांस लिए। </p>
<figure id="attachment_6001" aria-describedby="caption-attachment-6001" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-5.jpg" alt="" width="2048" height="1536" class="size-full wp-image-6001" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-5.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-5-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-5-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-5-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-5-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6001" class="wp-caption-text">चलिए बिहार में जाकर काम सभालें </figcaption></figure>
<p>वैसे, मैं नहीं समझता हूँ आज बिहार के किसी भी विद्यालय में (अपवाद छोड़कर) प्रदेश में राष्ट्रपति के प्रतिनिधित्व करने वाले राज्यपाल की तस्वीर दीवारों पर लटकती दिखती होंगी। वजह भी है। जयरामदास दौलतराम, माधवश्रीहरी अन्ने, रंगनाथ रामचंद्र दिवाकर, जाकिर हुसैन, माड़भूषि अनन्तसायनम अय्यंगार, नित्यानंद कानूनगो (1971 का कालखंड तक) के बाद ऐसे प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले कोई भी व्यक्ति राज्यपाल के कार्यालय में नहीं आये जिनका प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रदेश के विकास से कोई भावनात्मक सम्बद्ध रहा हो। </p>
<blockquote><p>स्वाभाविक है विद्यालयों में सन 1971 के बाद अपने प्रदेश के प्रथम नागरिक की तस्वीर का नहीं लटकना। इसके अलावे सत्तर के दशक के बाद से देश ही नहीं, बिहार में भी, जिस तरह कुकुरमुत्तों की तरह घर-घर, गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले नेताओं का अभ्युदय हुआ, शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षा और शिक्षण पतन हुआ, शिक्षित और विचारवान व्यक्ति उन राजनेताओं के भय के कारण या तो प्रदेश की मिट्टी से पृथक हो गए, या फिर मिट्टी पलीद होने से बचने के लिए अपने सिद्धांतों के साथ स्वयं मिट्टी में मिल गए।</p></blockquote>
<p> <br />
देवकांत बरुआ, आरडी भंडारे, जगन्नाथ कौशल, ए आर किदवई, पी वेंकट सुब्बैया, गोविन्द नारायण सिंह, रामचंद्र दत्तारे प्रधान, जगन्नाथ पहाड़िया, मोहम्मद यूनुस सलीम, मोहम्मद सफी कुरैशी, सुन्दर सिंह भंडारे, विनोद चंद्र पांडे, न्यायमूर्ति (सेवा निवृत) मंदगड़े रामा जॉइस, वेद प्रकाश मारवाह, बूटा सिंह, आर. एस. गवई, आर. एल. भाटिया, देवानंद कुंवर, डॉ. डी वाई पाटिल, केशरी नाथ त्रिपाठी, रामनाथ कोविंद, सत्यपाल मालिक, लालजी टंडन, फागु चौहान या फिर राजेन्द्र विश्वनाथ आर्लेकर, जो बिहार के लाट साहब की कुर्सी पर बैठे, प्रदेश के विकास में उनका क्या योगदान रहा, यह बात या तो वे स्वयं जानते होंगे अथवा राजभवन की कुर्सियां। प्रदेश के मतदाताओं को कुछ लेना देना नहीं है, चाहे शिक्षित हों या अशिक्षित। </p>
<p><strong>सांख्यिकी कहता है कि बिहार का शैक्षिक दर 61.80 फीसदी है जिसमें पुरुषों की साक्षरता दर 71.20 फीसदी और महिलाओं की 51.50 फीसदी। वैसे प्रदेश की शैक्षिक पुस्तिका इस बात का दावा करती है कि विगत 20 वर्षों में बिहार का शैक्षिक दर जो 2001 में 47.00 फीसदी था, बढ़कर 61.80 फीसदी हुआ है। लेकिन वहीँ बाबू लोग यह भी कहते हैं कि इन सांख्यिकी में वे सभी अंक भी शामिल हैं जिनके बाल-बच्चे बिहार के बाहर के शैक्ष्णिक संस्थानों में शिक्षा ग्रहण करते हैं, शिक्षित हुए हैं। इतना ही नहीं, प्रदेश में शहरी और ग्रामीण शिक्षा दर में जो फासला है वही प्रदेश के राजनीतिक पार्टियों के नेताओं का भविष्य निर्धारित करता है। आंकड़े के अनुसार, शहरी क्षेत्र की साक्षरता जहाँ 71.9 फीसदी हैं, वहीँ ग्रामीण इलाके का 43.9 फीसदी है। यानी दोनों के बीच 28 फीसदी का फर्क है।</strong> </p>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि 3 &#8211; 4 फीसदी मतों के इधर-उधर से सरकार का गठन और सरकार का पतन हो जाता है, यहाँ तो 28 फीसदी अशिक्षित, अनपढ़ मतदाता सभी राजनीतिक पार्टियों का केंद्र बिंदु होता है। इतना ही नहीं, शहरी क्षेत्रों में जहाँ पुरुषों की साक्षरता दर 79.9 फीसदी है, वहीँ शहरी क्षेत्र के महिलाएं 62.6 फीसदी है। जबकि, ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुष 57.1 फीसदी साक्षर है और महिलाएं 29.6 फीसदी ही साक्षर है। अशिक्षा में अल्पसंख्यकों का दर सबसे अधिक है। स्वाभाविक है इन अशिक्षित मतदाताओं को लुभाने के लिए, अल्पसंख्यकों के मतों को जाति के आधार पर काटने, बांटने, छांटने के लिए आला नेता तो उपाय ढूंढेंगे ही। अब परजीवी नेताओं को देखें। आज देश की अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में नहीं है, बिहार में दागी और जेल में सजा काट रहे विधायकों समेत पूर्व विधायकों की मौज चल रही है, क्योंकि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली राज्य सरकार 991 विधायकों के पेंशन पर हर महीने 4.94 करोड़ रुपये खर्च कर रही है, यह अनुत्पादक है। यह बात मैं नहीं शिव  प्रकाश राय की आरटीआई के जवाब में हुआ है।<br />
 <br />
चलिए डॉ. श्रीकृष्ण सिंह पथ, टेलर रोड, राजबंशी नगर में विचरण करते हैं। कहते हैं कि बिहार के वर्तमान लाट साहब उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर की पैदाइश है। दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया और लखनऊ विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण किये हैं। सं 1972-1973 के कालखंड में जब देश में राजनीतिक भूचाल लाने की व्यूह रचना बन रही थी, जय प्रकाश नारायण तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ मोर्चे बना रहे थे, आरिफ मोहम्मद खान अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे। इससे पहले वे छात्र संघ  का सचिव थे। सत्तर के कालखंड में ही वे अपने गृह जिला के सियाना विधानसभा क्षेत्र से भारतीय क्रांति दल के टिकट पर चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं सके। </p>
<p>जीत हासिल 1977 में हुई और 26 वर्ष की आयु में उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य बने। राजनीति में प्रवेश के लिए हरी झंडी से स्वागत हो गया। छब्बीस वर्ष की आयु में विधायक होना, वह भी उस समय जब देश में स्वतंत्र भारत के तत्कालीन राजनेताओं द्वारा सत्ता के गलियारे में अपनी पैठ ज़माने के लिए राजनीतिक  आज़ादी के लिए दूसरी लड़ाई लड़े जाने के लिए बीजारोपण हो रहा था।दिल्ली पर सत्ता हासिल करने के लिए देश में उभरते नेताओं का एक विशाल समूह मन ही मन राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता &#8216;सिंहासन खाली करो की जनता आ रही है&#8217; का पाठ कर रहे थे। देश में कोहराम मच गया था। आंदोलन को नेतृत्व का अभाव था और उस अवसर पर जयप्रकाश नारायण का अभ्युदय हुआ। </p>
<p>जयप्रकाश नारायण भी कभी कांग्रेस में थे, लेकिन समयान्तराल कांग्रेस के विपक्षी हो गए। उसी राजनीतिक उथल-पुथल में खान साहब कांग्रेस के हो गए। वर्तमान राजनीतिक परिपेक्ष में भाजपा के लिए आरिफ़ मोहम्मद खान सबसे दक्ष दिखे मोदी को, खासकर जब बिहार में विधानसभा का चुनाब होने वाला है। वैसे भी आरिफ मोहम्मद खान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा द्वारा पोषित, सम्पोषित नहीं होने के बाद भी समय को ध्यान में रखकर उनकी ही बातों को देश के सामने रखते चले गए। स्वाभाविक है जब एक अल्पसंख्यक समुदाय का आदमी उनकी (भाजपा और आरएसएस) बातों को परोसेगा तो आकर्षण तो होगा ही।</p>
<figure id="attachment_6002" aria-describedby="caption-attachment-6002" style="width: 480px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/anil-tyagi.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/anil-tyagi.jpg" alt="" width="480" height="480" class="size-full wp-image-6002" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/anil-tyagi.jpg 480w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/anil-tyagi-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/anil-tyagi-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/anil-tyagi-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/anil-tyagi-48x48.jpg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/anil-tyagi-96x96.jpg 96w" sizes="auto, (max-width: 480px) 100vw, 480px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6002" class="wp-caption-text">अनिल त्यागी, संपादक जी-फाइल</figcaption></figure>
<p>देश के जाने माने <strong>पत्रकार और जी-फाइल के संपादक अनिल त्यागी</strong> कहते हैं कि &#8220;आरिफ मोहम्मद खान अच्छा वक्ता है, अच्छा अधिवक्ता है, लेकिन जब राजनीति में जीवित रहने का प्रश्न उठता है तो उनके पास विकल्प क्या है? कोई दो दशक तक राजनीति में बेरोजगार रहने के बाद &#8221;बुद्धम शरणम् गच्छामि&#8221; के जगह &#8221;कमलम शरणम गच्छामि&#8221; कर आरिफ मोहम्मद खान राजनीति में जीवित हो गए। कांग्रेस में जा नहीं सकते, जनता दल या बहुजन समाज पार्टी से निकले हुए हैं, समाजवादी में देख नहीं सकते या देश के अन्य राजनीतिक पार्टियां उन्हें स्थान क्यों दे? वैसी स्थिति में भाजपा का टोपी पहन लिए। जहाँ तक बिहार का राज्यपाल होने का सवाल है, चुनाव सर पर है, आरिफ मोहम्मद खान मुसलमान हैं और बिहार में मुसलमानों की संख्या सरकार बनाने और सरकार गिराने में अपना भूमिका अदा करने की क्षमता रखता है। स्वाभाविक है कि भाजपा को लाभ होगा।&#8221;</p>
<p><strong>त्यागी आगे कहते हैं कि बिहार में &#8220;नीतीश कुमार को मनोभ्रंश (डेमेन्सिया) की बीमारी हो गयी है। बिहार की राजधानी पटना की गलियों से लेकर राज्य के सबसे बाहरी जिलों के खेतों तक, लोग अपने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कथित रहस्यमयी बीमारी के बारे में बात कर रहे हैं। यह एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में कोई नहीं जानता, लेकिन हर कोई इसके बारे में अटकलें लगाता है। चिकित्सा विशेषज्ञ भी हैरान हैं। वे चिकित्सा की सीमाओं को पार करने और वैज्ञानिक अनिश्चितता के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए तैयार नहीं हैं। लेकिन जब दबाव डाला गया और जांच की गई, तो उनमें से कुछ ने तर्क दिया कि मुख्यमंत्री संभवतः कुछ बीमारियों से पीड़ित हैं जो अंततः तंत्रिका कोशिकाओं के विनाश और मस्तिष्क को नुकसान पहुंचा सकती हैं या पहुंचा रही हैं। आम बोलचाल में इसे डिमेंशिया कहा जाता है। लेकिन स्पष्ट निष्कर्ष पर न पहुंचें।&#8221;</strong></p>
<figure id="attachment_6004" aria-describedby="caption-attachment-6004" style="width: 640px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/aaa.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/aaa.jpg" alt="" width="640" height="360" class="size-full wp-image-6004" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/aaa.jpg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/aaa-300x169.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6004" class="wp-caption-text">मुझे भेज दिए तो मैं आ गया</figcaption></figure>
<p>&#8220;राजनीतिक पंडितों का मानना है कि बिहार पर राज्य के एक पूर्व मुख्य सचिव और बिहार कैडर के एक आईएएस अधिकारी का शासन है, जो केंद्र में प्रधानमंत्री कार्यालय के मैट्रिक्स और भूलभुलैया के भीतर तैनात हैं। बिहार पर दिल्ली का शासन है, पटना पर नई दिल्ली का। नीतीश बाबू के कथित असामान्य व्यवहार पर भी विचार करें- पटना रैली और राज्य विधानसभा के सेंट्रल हॉल में पीएम नरेंद्र मोदी के पैर छूना। उनके पार्टी के सदस्य उनके अपरंपरागत व्यवहार के बारे में बात करते हैं। चूंकि यह मुख्यमंत्री की आलोचना करने या उनके बारे में बुरा बोलने का गलत समय है, इसलिए कोई भी उंगली या हाथ नहीं उठा रहा है। जेडीयू के अलावा, यह भाजपा के लिए भी अनुकूल है, यहां तक कि तेजस्वी यादव को भी, जिनकी नजर राज्य की गद्दी पर है।&#8221; स्वाभाविक है इस मनोभ्रंश का इस्तेमाल तो कोई करेगा ही। </p>
<p>उधर देश के जाने माने <strong>पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक उमाकांत लखेड़ा</strong> कहते हैं कि &#8220;यह आज की बात नहीं है। आरिफ़ मोहम्मद पहले युवा कांग्रेस वाले समूह में आये। अरुण नेहरू, सत्यपाल मालिक, अरुण सिंह आदि थे। अस्सी के दशक में कांग्रेस में शामिल हुए और शामिल होते ही 1980 में कानपुर और 1984 में बहराइच से लोकसभा के लिए चुने गए। राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में मंत्री भी बने। अच्छे वक्ता तो शुरू से रहे, समय को परखने की कला भी जानते थे, जानते हैं। सन 1986 में, उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ बिल के पारित होने पर मतभेदों के कारण भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस छोड़ दी, जिसे राजीव गांधी ने लोकसभा में पेश किया था। वह मुस्लिम पुरुषों को कुरान के अनुसार इद्दत अवधि के बाद अपनी तलाकशुदा पत्नी या पत्नियों को कोई रखरखाव देने से बचने में सक्षम बनाने वाले कानून के खिलाफ थे और इस मुद्दे पर राजीव गांधी के साथ मतभेदों के कारण उन्होंने इस्तीफा दे दिया।&#8221; </p>
<figure id="attachment_6005" aria-describedby="caption-attachment-6005" style="width: 1177px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lakhera.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lakhera.jpg" alt="" width="1177" height="1167" class="size-full wp-image-6005" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lakhera.jpg 1177w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lakhera-300x297.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lakhera-1024x1015.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lakhera-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lakhera-768x761.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lakhera-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lakhera-48x48.jpg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/lakhera-96x96.jpg 96w" sizes="auto, (max-width: 1177px) 100vw, 1177px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6005" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार उमाकांत लखेड़ा</figcaption></figure>
<p>यह सब तब शुरू हुआ जब 62 वर्षीय मुस्लिम महिला शाह बानो ने अप्रैल 1978 में अपने तलाकशुदा पति मोहम्मद अहमद खान, जो कि मध्य प्रदेश के इंदौर में एक प्रसिद्ध वकील थे, से भरण-पोषण की मांग करते हुए अदालत में याचिका दायर की। शाह बानो के पति खान ने नवंबर में बाद में तीन तलाक बोलकर उसे तलाक दे दिया और कहा कि वह उसे कोई भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं है क्योंकि वह इस्लामी कानून के तहत उसकी पत्नी नहीं है। दोनों की शादी 1932 में हुई थी और उनके पाँच बच्चे थे &#8211; तीन बेटे और दो बेटियाँ। शाह बानो के पति ने खान और उनकी दूसरी पत्नी के साथ रहने के बाद तीन साल पहले उसे घर से बाहर जाने के लिए मजबूर किया था। शाह बानो, जो अपने पति के खिलाफ अदालत गई थी, ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 123 के तहत अपने और अपने पांच बच्चों के लिए भरण-पोषण का दावा दायर किया। अगस्त 1979 में, शाह बानो ने स्थानीय अदालत में भरण-पोषण का मामला जीत लिया, जिसने खान को उसे भरण-पोषण प्रदान करने का आदेश दिया। हालांकि, खान ने इस आधार पर दावे का विरोध किया कि भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार पति को तलाक के बाद केवल इद्दत अवधि के लिए भरण-पोषण प्रदान करना आवश्यक है। कई साल बाद शाह बानो ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में संशोधित भरण-पोषण भत्ते की मांग करते हुए एक और याचिका दायर की। अप्रैल 1985 में, एक ऐतिहासिक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाया और उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया कि वह अपने पति से भरण-पोषण पाने की हकदार है।</p>
<p>जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले में गुजारा भत्ता पाने के अधिकार को बरकरार रखा, इस फैसले ने मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े मामलों में न्यायिक अतिक्रमण के दावे को लेकर एक राजनीतिक विवाद को जन्म दिया। ऐतिहासिक फैसला, जिसने नियमित अदालतों में विवाह और तलाक के मामलों में समान अधिकारों के लिए मुस्लिम महिलाओं की लड़ाई की नींव रखी थी, मुस्लिम समुदाय के भीतर अच्छा नहीं रहा। 1984 में चुनी गई तत्कालीन राजीव गांधी सरकार पर मुस्लिम महिला (तलाक पर संरक्षण अधिनियम), 1986 पारित करने के लिए दबाव डाला। इस कानून ने शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। 1986 के मुस्लिम महिला (तलाक के अधिकारों पर संरक्षण) अधिनियम ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को कमजोर कर दिया और तलाकशुदा महिला को केवल इद्दत की अवधि के दौरान या तलाक के 90 दिनों बाद तक भरण-पोषण देने की अनुमति दी।</p>
<p>राजीव गांधी के मुस्लिम तुष्टीकरण के सबसे मुखर विरोधी आरिफ मोहम्मद खान के रूप में अपनी सरकार के भीतर से प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। राजीव गांधी सरकार में राज्य मंत्री रहे आरिफ मोहम्मद खान ने संसद के पटल पर शाह बानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का जोरदार बचाव किया था। हालांकि, जब मुस्लिम कट्टरपंथियों ने राजीव गांधी पर दबाव डालना शुरू किया, तो सरकार ने शाह बानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को दरकिनार करने के लिए एक कानून लाने के लिए यू-टर्न ले लिया। जब राजीव गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए मौलवियों के दबाव में आकर हार मान ली, तो निराश आरिफ मोहम्मद खान ने राजीव गांधी मंत्रिमंडल से बाहर निकलने और कांग्रेस पार्टी छोड़ने का फैसला किया। </p>
<p>फिर बाबरी मस्जिद का ताला खुलने की बात आयी। साल था 1986 और उस घटना में भी आरिफ मोहम्मद खान घटनाओं के केंद्र में थे। आरिफ मोहम्मद का मानना था कि बाबरी मस्जिद का ताला खुलना हिंदू समुदाय की मांगों को पूरा करने के लिए एक संतुलनकारी कार्य था, क्योंकि राजीव गांधी सरकार ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के लिए भरण-पोषण पर शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) की मांगों के आगे घुटने टेक दिए थे। खान का मानना था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले (शाह बानो मामले) को पलटने और ताले हटाने की घोषणा दो सप्ताह के भीतर हुई। अधिकांश लोगों को यह एक संतुलनकारी कदम लगा और उन्हें उम्मीद थी कि अब दोनों आंदोलनकारी पक्ष संतुष्ट होंगे। </p>
<figure id="attachment_6006" aria-describedby="caption-attachment-6006" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-2.jpg" alt="" width="2048" height="1536" class="size-full wp-image-6006" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-2.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-2-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-2-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-2-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-2-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6006" class="wp-caption-text">मायावती, कांशीराम और आरिफ मोहम्मद खान (तस्वीर के लिए आभार)</figcaption></figure>
<p>1986 में ताले खोलने के पीछे की राजनीति पर बोलते हुए खान ने कहा था कि &#8220;एआईएमपीएलबी ने जोर देकर कहा कि शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला &#8216;मिल्ली तशक्खुस&#8217; के लिए खतरा है, जो एक अलग और विशिष्ट सामुदायिक पहचान है, और उन्होंने आंदोलन के दौरान बहुत आक्रामक और धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल किया&#8230; लेकिन 15 जनवरी, 1986 को इस आशय की घोषणा ने एक गंभीर झटका दिया और एक सप्ताह के भीतर सरकार को शाह बानो मामले से ध्यान हटाने के लिए कुछ करने की आवश्यकता महसूस हुई।&#8221; उन्होंने कहा था कि, &#8220;उस समय अयोध्या काम आया और स्थानीय प्रशासन &#8211; यानी जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक &#8211; व्यक्तिगत रूप से जिला न्यायालय (फैजाबाद) के समक्ष पेश हुए और कहा कि विवादित ढांचे के मुख्य द्वार से ताला हटाने से कोई कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा नहीं होगी।&#8221;फरवरी 1986 में फैजाबाद जिला न्यायालय के आदेश पर बाबरी मस्जिद के ताले खोले गए। खैर। </p>
<p>इस घटना के बाद आरिफ मोहम्मद खान जनता दल में शामिल हो गए और 1989 में फिर से लोकसभा के लिए चुने गए। जनता दल के शासन के दौरान खान ने नागरिक उड्डयन और ऊर्जा मंत्रालय के केंद्रीय मंत्री के रूप में कार्य किया। जनता दल को भी उन्होंने नमस्कार किया और फिर कांशीराम-मायावती वाली बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए। शायद यह सब इसलिए किये होंगे कि कांग्रेस छोड़ने के बाद कांग्रेस उन्हें टिकट देने की बात सोचती भी नहीं। फिर जनता दल में भी उनके सम्बन्ध अच्छे नहीं रहे। संसद में बैठन के लिए बहुजन समाज पार्टी के अलावे दूसरा कोई विकल्प नहीं था। सन 1998 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर बहराइच से लोकसभा में प्रवेश किया। खान ने 1984 से 1990 तक मंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। यानी सन 1990 के बाद राजनीतिक दृष्टि से &#8216;बेरोजगार&#8217; रहे। देश की बदलती राजनीतिक व्यवस्था, स्वरूप और नेतृत्व को भांपते  2004 में आरिफ मोहम्मद खान भारतीय जनता पार्टी। कहते हैं उस वर्ष कैसरगंज निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। </p>
<figure id="attachment_6007" aria-describedby="caption-attachment-6007" style="width: 1316px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-3-fotor-2025010311475.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-3-fotor-2025010311475.jpg" alt="" width="1316" height="1535" class="size-full wp-image-6007" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-3-fotor-2025010311475.jpg 1316w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-3-fotor-2025010311475-257x300.jpg 257w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-3-fotor-2025010311475-878x1024.jpg 878w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Arif-3-fotor-2025010311475-768x896.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1316px) 100vw, 1316px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6007" class="wp-caption-text">का गवर्नर साहब !!!!! आइये&#8230; आइये</figcaption></figure>
<p><strong>अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की राजनीतिक कालखंड से लेकर 2000 के दशक वाले राजनीतिक कालखंड तक, देश में न केवल गंगा सफाई योजना और नामानि गंगे योजनाओं के तहत गंगा का पानी और प्रवाह बढ़ता गया, बदलता गया; देश में राजनीतिक नेतृते के साथ-साथ विचारधारों में में आमूल परिवर्तन आये। &#8216;सोच बदलो&#8217; और &#8216;देश बदलेगा&#8217; का नारा भी बुलंद हुआ।  वैसे में बुलंदशहर का वह व्यक्ति राजनीति में जीवित रहने के लिए भाजपा के शरण में आ गया। </strong></p>
<p>वरिष्ठ <strong>पत्रकार और भारतीय प्रेस पूर्व सदस्य राजीव रंजन नाग</strong> का कहना है कि &#8220;आरिफ मोहम्मद खान हिन्दू, हिन्दुत्वा, संस्कृति, धार्मिक सभी ग्रंथों को पढ़ लिए हैं, कंठस्थ कर लिए हैं जो अंततः भाजपा और नरेंद्र मोदी, अमित शाह की बोली में निहित होता है। अपनी वाक्पटुता के कारण खान किसी को भी दस मिनट में प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। अन्यथा औसतन राजनीतिक पार्टियों में उनका कालखंड पांच साल से अधिक नहीं होता है चाहे कांग्रेस हो, जनता दल हो, बहुजन समाज पार्टी हो। आज भाजपा में है। कल अगर बिहार में भाजपा की सरकार नहीं बन पाई (जिसके निमित्त उन्हें भेजा गया है ताकि मुसलमानों का मत भाजपा के पक्ष में किया जा सके) तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि उन्हें उठाकर कर्तव्य पथ पर रख दिया जाय। ये किरण बेदी जैसा व्यक्तित्व तो रखते नहीं।&#8221;</p>
<figure id="attachment_6008" aria-describedby="caption-attachment-6008" style="width: 720px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Naag.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Naag.jpg" alt="" width="720" height="689" class="size-full wp-image-6008" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Naag.jpg 720w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Naag-300x287.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2025/01/Naag-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 720px) 100vw, 720px" /></a><figcaption id="caption-attachment-6008" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार राजीव रंजन नाग</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, शायद देश के मतदाता भूल गए हों, लेकिन न्यायालय के दस्तावेजों में आरिफ मोहम्मद खान का भी नाम ऐतिहासिक हवाला खंड में उद्धृत था। हवाला मामले में सीबीआई का तर्क था कि वे रिश्वत के तीन प्राप्तकर्ताओं में से एक थे। वैसे न्यायालय सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया था। </p>
<p><strong>अब सवाल यह है कि नीतीश कुमार और लालू यादव दिखाने के लिए पटना के गांधी मैदान में जितना कबड्डी-कबड्डी खेलें, कुस्ती लड़ें, पटना से दिल्ली और मुंबई तक अखबारवाले, टीवी वाले जो भी कहें, लिखें, दिखाएं &#8211; इतना गाँठ बाँध लीजिये भाजपा की सरकार के नाम पर, भाजपा का मुख्यमंत्री के नाम पर दोनों &#8220;सहोदर भाइयों से भी बढ़कर हैं। अब सुशिल मोदी हैं नहीं और बिहार में भाजपा का कोई भी ऐसा नेता नहीं है जो प्रदेश में भाजपा के लिए ब्रह्मास्त्र बनकर खड़ा रहे। हम तो कहेंगे कि आरिफ मोहम्मद खान को यहाँ से निवृत होने के बाद आजीवन पेंशन की व्यवस्था कर दिए हैं मोदी जी।</strong> </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/bihar-gets-new-governor-arif-mohammad-khan">&#8220;देते न आप साथ तो मर जाते हम कभी के &#8230; अपनी जुबान से आपके जज्बात कहेंगे&#8221; : ​मोदी जी से आरिफ मोहम्मद खान🙏</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>मधुबनी जिले के &#8216;सरिसब-पाही&#8217; और दरभंगा जिले के&#8217;उजान&#8217; गाँव के &#8216;दो झा की कहानी&#8217;, एक ने पिता को सम्मानित किया, दूसरे ने पुत्र को नया जीवन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 10 May 2022 11:31:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[aditya nath jha]]></category>
		<category><![CDATA[bithur]]></category>
		<category><![CDATA[bureaucracy]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>उजान (मधुबनी) : सत्तर के दशक में हमारे गाँव की सड़कों पर जब कभी मोटर गाड़ी अथवा बस जाती थी तो घंटों तक जमीन से आसमान तक मिट्टी का पाऊडर उड़ता दीखता था, जैसे मिट्टी को जीने का वजह मिल गया हो। मुद्दत से जमीन पर लोगों के पैर के नीचे दबते-दबते उसे भी दबे [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/aditya-nath-jha-and-shivnath-jha">मधुबनी जिले के &#8216;सरिसब-पाही&#8217; और दरभंगा जिले के&#8217;उजान&#8217; गाँव के &#8216;दो झा की कहानी&#8217;, एक ने पिता को सम्मानित किया, दूसरे ने पुत्र को नया जीवन</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>उजान (मधुबनी) : सत्तर के दशक में हमारे गाँव की सड़कों पर जब कभी मोटर गाड़ी अथवा बस जाती थी तो घंटों तक जमीन से आसमान तक मिट्टी का पाऊडर उड़ता दीखता था, जैसे मिट्टी को जीने का वजह मिल गया हो। मुद्दत से जमीन पर लोगों के पैर के नीचे दबते-दबते उसे भी दबे रहने की आदत हो गई थी। तभी अचानक एक बहुत भारी गाड़ी उधर से जाती थी, और न्यूटन का दूसरा सिद्धांत लागू हो जाता था। जमीन पर मुद्दत से सोयी पड़ी मिट्टी उस गाड़ी के पहिये को आगे निकलते ही, लम्बी सांसों के साथ आसमान में उड़ने लगती थी, विचरण करने लगती थी, मानो मिट्टी भी जीवंत हो गई हो। सम्पूर्ण वातावरण में एक बेहतरीन खुसबू फैल जाता था जो इस बात का गवाह होता था कि इस रास्ते कोई चार पहिया वाहन गया है, जिसने मिट्टी को भी जीवित कर दिया हो, जान फुक दिया हो। </strong></p>
<p>उन दिनों तक मेरे गाँव के अलावे बिहार के कोई पचास हज़ार से अधिक गाँव (आज यदि बिहार और झारखण्ड को जोड़ दिया जाय तो गाँव  की संख्या सतहत्तर हज़ार से अधिक हो गई है) पक्की सड़क की कल्पना तक नहीं की थी। पक्की सड़क देखी भी नहीं थी, गाँव के ग़रीब-गुरबों द्वारा बासमती चावल या गेहूं की रोटी की तरह। हां, राजनेताओं द्वारा जिस तरह &#8216;आश्वासन&#8217; दिया जाता है आज, उस दिन भी दिया जाता था और उसी आश्वासन पर क्या जीवित, क्या निर्जीव &#8211; ईंट, पत्थर सभी विश्वास करने लगते थे, सोचने लगते थे &#8211; &#8216;आज भले कष्ट है, कल ठीक हो जायेगा&#8217; । उन दिनों पत्थरों के टुकड़ों के साथ मिट्टी का लेप सड़क पर यदा-कदा अवश्य देखी जाती थी। बारिसों के मौसम में बैलगाड़ी, टायर गाड़ी की पहियों के निशान उन सड़कों पर कुछ उसी तरह दीखता था, जिस तरह समाज में हम जैसे गरीब-गुरबों के पीठों पर, कन्धों पर मेहनत के निशान बन जाते हैं। खैर। </p>
<p>बाबूजी के साथ पटना में रहने के कारण गाँव में लोग बाग़ &#8216;पटनिया&#8217; कह कर भी सम्बोधित करते थे। उनके सम्बोधन में &#8216;तालु&#8217; और &#8216;जिह्वा&#8217; के सञ्चालन से यह आभास हो जाता था कि महाशय गरीब ब्राह्मण के बेटा का मजाक उड़ा रहे हैं, अथवा पीठ थपथपा रहे हैं। माँ-बाबूजी उन दिनों कहते थे कि जिस तरह गाँव के किसी गरीब व्यक्ति की पत्नी अगर खूबसूरत हो, तो वह पूरे गाँव की &#8216;भौजाई&#8217; बन जाती है; &#8216;भावो&#8217; अथवा &#8216;पुतोहु&#8217; कोई नहीं बनाना चाहता उसे; उसी तरह समाज में जो गरीब होता है, चाहे किसी भी जाति अथवा संप्रदाय का हो, समाज के संभ्रांतों के लिए, धनाढ्यों के लिए वह महज एक हंसी का पात्र होता है। तुम भी उसी श्रेणी में हो, तुम्हारी गरीबी का मजाक भी लोग उसी तरह उड़ाएंगे जिस तरह पटना में पतंग उड़ाते हैं।लेकिन तुम अपना धैर्य नहीं खोना, अपना आपा नहीं खोना, चेहरे पर मुस्कराहट में कभी कमी नहीं करना। तुम एकलौते व्यक्ति होगे जो समय की पारखी नजर में होगे। समय तुम्हे प्रत्येक पग आंकेंगा, परीक्षा लेते रहेगा &#8211; तुम हमेशा सज्ज रहना। </p>
<p>उन दिनों पटना की सड़कें मेरे पदचाप को पहचान गई थी। साथ ही, पटना के गाँधी मैदान से पटना विश्वविद्यालय के रानी घाट स्थित प्रोफ़ेसर कालोनी तक सड़कों के प्रत्येक पग पर रहने, मिलने वाले &#8216;कुत्ते&#8217; बेहतरीन मित्र बन गए थे। उन दिनों आज की तरह &#8216;कुत्ते सामाजिक घरोहर नहीं हुए थे, जो समाज के लोगों को संभ्रांतों की श्रेणी में सूचीबद्ध कर सके। कुत्तों की जिंदगी, हम जैसे निर्धनों जैसी ही सड़कों पर जीने के लिए होती थी। उन सबों से नित्य सूर्योदय से पहले मुलाकात होती थी। कभी-कभी पटना के गाँधी मैदान के बाएं छोड़ पर स्थित बिहार राज्य पथ परिवहन निगम डिपो के प्रवेश द्वार के दाहिने कोने पर &#8216;अनिल बाबू&#8217; चाय वाले से &#8216;चमचम, डंडा बिस्कुट&#8217; उन मित्रों को दे देते थे, वे सभी खुश हो जाते थे। माँ कहती थी &#8211; &#8216;भूख सभी को लगती है, चाहे दो पाया हो या चार पाया, और तुम अपनी सामर्थ्य भर जो भी हो सके, खिलाते रहना उन जीवों को, सभी अन्तःमन से आशीष देंगे। </p>
<p>उस दिन अपने गाँव &#8216;उजान&#8217; से ननिहाल &#8216;लालगंज&#8217; जा रहे थे। हाफ पैंट, पैर में हवाई चप्पल (इससे अधिक की क्षमता नहीं थी) और सावा-रुपये &#8216;गज&#8217; कंट्रोल (राशन की दुकान) से मिलने वाला कपड़ा का बुशर्ट। बुशर्ट में कम कपड़ा लगता था और सिलाई भी बहुत कम थी। हमारी इस यात्रा के दो साल बाद मनोज कुमार द्वारा निर्मित रोटी-कपड़ा और मकान का वह गीत &#8216;कपड़े की सिलाई मार गई, बाकी जो कुछ बचा, मंहगाई मार गई&#8217; गीत हवा में उड़ी थी &#8211; जो सच भी था, लोग भोग रहे थे, मूक-बधिर होकर। </p>
<p>हमारे गाँव में, उन दिनों और आज भी, एक सीधी सड़क है जो उजान प्राथमिक विद्यालय के सामने से निकलती बाबा बिदेश्वर को प्रणाम करते राष्ट्रीय राजमार्ग से मिलती थी और फिर बाएं-दाहिने की ओर निकलती है। बाएं हमारा ननिहाल और दाहिने लोहना रोड, झंझारपुर, तमुरिया, चिकना, घोघरडीहा, परसा होते निर्मली की ओर जाती थी। हम अपने प्राथमिक विद्यालय के तत्कालीन शिक्षकों को प्रणाम कर सीधा सड़क नापते चला जा रहा था, जब तक बाबा बिदेश्वर का सदियों पुराना टीला पर स्थित मंदिर न आ जाय। यह मंदिर महादेव का शताब्दी-पुराना मंदिर है। इस मंदिर के सामने खुले मैदान में एक इनार (कुआँ का बड़ा भाई) पर रूककर हाथ-पैर धोकर बाबा बिदेश्वर को प्रणाम किया। जेब में सिर्फ उतने ही पैसे थे जिससे &#8216;बतासा&#8217; खरीदकर बाबा को प्रसाद भी चढ़ा दूँ और उसी प्रसाद को स्वयं ग्रहण, इनार का पानी पीकर अपनी आत्मा को तृप्त कर लूँ। </p>
<p>माँ कहती थी, &#8216;महादेव जानते हैं कि जो प्रसाद वह मुझे चढ़ाएगा, वह खुद ही ग्रहण करेगा, आखिर भूख तो उसे लगेगी ही, वह भी तो जीव ही है और जीवों को जिन्दा रखने का दाईत्व भी तो महादेव का ही है, बतासा तो एक बहाना है आराध्य और आराधना करने वालों के बीच।&#8217; फिर ऊँची टूटी-फूटी-अधपक्की&#8217; सड़क को पकड़कर मैं लालगंज की ओर अग्रमुख हो गया। </p>
<p><strong>लालगंज के पास ही सरिसब-पाही गांव है। कहा जाता है कि मिथिला की पुण्य भूमि के जितने पूज्य स्थल हैं उनमें सबसे विशिष्ट सरिसब ग्राम रत्न है। जब से मिथिला का इतिहास उपलब्ध है तब से इस गांव का इतिहास उपलब्ध है अपने अनेकों गौरव गाथाओं के साथ जो इसे अन्य सभी पूज्य स्थलों में विशिष्ट दर्शाता है। सरिसब एक विशाल गांव है जो मिथिला के प्राचीन नगर अमरावती के मध्य में स्थित है। इसके उत्तर में &#8216;भौर&#8217; और &#8216;रैयाम&#8217;, पृर्व में &#8216;लोहना&#8217; और &#8216;खररख&#8217;, दक्षिण में &#8216;गंगौली&#8217; और &#8216;सखवाड़&#8217; तथा पश्चिम में &#8216;पण्डौल&#8217; स्थित है। ये सभी ग्राम प्राचीन हैं और सभी ग्रामों का इतिहास उपलब्ध है परन्तु सरिसब इन सभी से सबसे प्राचीन है। सरिसब का अर्थ संस्कृत में &#8216;गौर सर्षप&#8217; है जिसका पर्यायवाची शब्द &#8216;सिद्धार्थ&#8217; है। प्राचीन काल में इस क्षेत्र में &#8216;गौर सर्षप&#8217; की खेती होती थी जिस कारण यह क्षेत्र &#8216;सिद्धार्थ&#8217; क्षेत्र से प्रसिद्ध हुआ। सिद्धार्थ क्षेत्र का उल्लेख पुराणों है। कपिल मुनि के आश्रम से दो योजन पूर्व सिद्धार्थ क्षेत्र अवस्थित है। कपिल  मुनि का एक आश्रम कपिलेश्वर में स्थित है। सरिसब की ग्राम देवता मां सिद्धेश्वरी हैं जिनकी प्रतिमा आज भी सरिसब ग्राम के मध्य में स्थित एक विशाल मन्दिर में पूजी रही है।</strong> </p>
<p>विगत दिनों सरिसब गाँव के श्री अमोल बाबू कहे थे कि चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मिथिला के सोदरपुर सरिसब मूल के अवदात कुल में महामहोपाध्याय भवनाथ मिश्र का जन्म हुआ था। आजीवन अयाचना व्रत के पालन के कारण भवनाथ मिश्र अयाची नाम से प्रसिद्ध हुए। इनका मातृकुल और पितृकुल आदिकाल से विद्या &#8211; वैभव से प्रशस्त रहा है। इनके पितामह विश्वनाथ मिश्र मीमांसा के पण्डित थे और पिता न्याय शास्त्र के उद्भट विद्वान थे। इनके मातामह वटेश्वर ने न्याय दर्शन में दर्पण नाम के ग्रन्थ का प्रणयन किया तथा मिमांसा में प्रभाकर संप्रदाय के महार्णव नाम के ग्रन्थ की रचना की। अयाची मिश्र  किसी गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त नहीं की । उन्होंने अपने घर में अपने अग्रज जीवनाथ मिश्र से सभी शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया। अर्जित ज्ञान को  समय समय पर अपने शिष्यों और औरस पुत्र शंकर मिश्र को समर्पित करते रहे। शंकर मिश्र ने पाँच वर्ष से कम आयु में ही अपूर्व मेधा का परिचय स्वरचित श्लोक द्वारा दे कर राजा द्वारा सम्मानित हुए। </p>
<p>बहरहाल, इसी सरिसब-पाही गाँव में जन्म लिए थे मिथिला के विभूति सर गंगा नाथ झा। सम्मानित गंगा नाथ जी के बारे में एक शब्द भी लिखना हमारी योग्यता से परे हैं। संस्कृत के हस्ताक्षर थे। अंग्रेजी के भीष्म पितामह थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति थे। इनके नाम पर आज भी दर्जनों शोध संस्थाएं हैं, पुस्तकालय है, वाचनालय है, विद्यालय है &#8211; ताकि इनका और इनके परिवार का नाम अमिट रहे। इनके सभी संतान शिक्षा, विद्वता, मानवता, आत्मीयता सभी दृष्टि से अपने-अपने क्षेत्रों में एक सफल योद्धा थे, हस्ताक्षर थे। डॉ अमरनाथ झा उसी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कुलपति बने जहाँ इनके पिता कुलपति थे। </p>
<p>सर गंगा नाथ झा के संतानों में एक थे डॉ आदित्य नाथ झा। श्री आदित्य बाबू अंग्रेजों के ज़माने में भारतीय प्रशासनिक सेवा की प्रतीक्षा में अव्वल आये थे। इनका बैच था सन 1936 का। श्री आदित्य बाबू असिस्टेंट मजिस्ट्रेट और कलेक्टर के रूप में युनाइटेड प्रोविंस में सेवा किये। जब 1939 में भारतीय पुलिस सेवा को सम्पूर्ण अधिकार हस्तांतरित किया गया, वे पूर्व भारत के प्रिंसली एस्टेट के सचिव रहे। </p>
<p>जब देश आज़ाद हुआ श्री आदित्य बाबू उत्तर प्रदेश शासन के मुख्य सचिव बने। वे लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी के अध्यक्ष भी रहे। प्रशासनिक सेवा की श्रेणी में उन्हें देश के महत्वपूर्ण नागरिक सम्मान &#8216;पद्मभूषण&#8217; से भी अलंकृत किया गया। समयांतराल, वे भारत सरकार में सचिव बने, फिर दिल्ली के उपराज्यपाल भी बने, साल था नवम्बर 1, 1966 से सन 1970 तक। श्री आदित्य बाबू से पहले, यानी भारत को स्वाधीनता प्राप्त होने के बाद सबसे पहले शंकर प्रसादा दिल्ली के उपराज्यपाल थे और वे कार्यालय में 1948 से 1954 तक विराजमान रहे। इसके बाद आये पंडित आनंद दत्ता हया जो सन 1954 से 1959 तक उपराज्यपाल के कार्यालय में थे। फिर आये भगवान सहाय जो 1959 से 1963 तक थे और फिर वेंकट विश्वनाथन जिन्होंने महज दो साल सेवा करने के बाद श्री आदित्य बाबू को दिल्ली के उपराज्यपाल का सिंहासन सौंपे। </p>
<p><strong>बहरहाल, श्री आदित्य बाबू भारतीय प्रशासनिक सेवा के अव्वल अधिकारी तो थे ही, संस्कृत का ज्ञान उन्हें पुस्तैनी मिला था। वे अपने ज़माने के अव्वल संस्कृत के वक्ता थे। यही कारण है कि जब वे उत्तर प्रदेश शासन के मुख्य सचिव थे, वे संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के &#8216;समवर्ती कुलपति&#8217; भी थे। वे भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय में सचिव भी बने। आज सरिसब-पाही के लोगबाग स्वयं को चाहे जो भी कह लें, स्वयं को अलंकृत कर लें; लेकिन सच तो यही है कि सरिसब-पाही ही नहीं, शायद मिथिला में  उनके बाद ऐसा सम्मान आज तक किसी को नहीं प्राप्त हुआ है। वैसे श्री गोविन्द बल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के शासन में सं 1937 से 1954 तक छाये रहे और उसी दौरान श्री आदित्य बाबू भी, लेकिन पंत जी के बाद जब श्री सम्पूर्णानन्द उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुए, आदित्य बाबू के सम्मान में चार-चाँद लगता गया। खैर।</strong> </p>
<p>माँ-बाबूजी कहते थे कि &#8216;जीवन में तुमसे तुम्हारी सम्पूर्ण वस्तुओं को कोई भी छीन सकता है, लेकिन तुम्हारा &#8216;प्रारब्ध&#8217; तुमसे कोई नहीं छीन सकता, माँ-बाप भी नहीं। ईश्वर ने जो प्रारब्ध तुम्हारे लिए लिखे हैं, माँ के गर्भ में उसकी नाभि के साथ जब तुम्हारी उत्पत्ति हुई, तुम्हारा विकास होता गया, हाथों में रेखाएं खींचती गई, ईश्वर तुम्हारा प्रारब्ध भी लिखते गए। जो कार्य तुम्हे करना है, जो कार्य तुम्हारे हाथों संपन्न होना है &#8211; वह अवसर, वह अधिकार तुमसे कोई नहीं छीन सकता, गाँठ बाँध लो&#8217; &#8211; माँ-बाबूजी की बातें सत्यता के उत्कर्ष पर था।  </p>
<p>आदित्य बाबू के पैतृक घर से हमारा पैतृक घर अगर हम उसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलें, जिस मार्ग पर सत्तर के दशक में अपने गाँव से ननिहाल पैदल चले थे; आज उस राष्ट्रीय राजमार्ग से सरिसब-पाही और उजान की दूरी कोई दस किलोमीटर की होगी, जिसे अधिकतम आधे घंटे में तय की जा सकती है। जिस वर्ष श्री आदित्य बाबू की मृत्यु हुई, मैं उजान से सरिसब-पाही की यात्रा कर रहा था और मेरा प्रारब्ध आदित्य बाबू के गांव से मेरे गांव आ रहा था, मेरे कपाल पर लिखने के लिए, और ऐसा ही हुआ। </p>
<p><strong>सन 1957 में जब भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का 100 वां वर्ष मनाया जा रहा था, उत्तर प्रदेश के वीर योद्धाओं को, जिन्होंने अपने-अपने परिवार और परिजनों को छोड़कर, मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने-अपने प्राणों को उत्सर्ग किये थे, इतिहास में एक अमिट अध्याय जोड़े थे; उन वीर-बांकुरों के परिवारों और परिजनों-वंशजों को उत्तर प्रदेश शासन के तरफ से सम्मानित किया जा रहा था। गजब का दृश्य था वह। वैसे उस आंदोलन को सौ वर्ष हो गए थे, लेकिन ऐसा लग रहा था कि कानपुर शहर का बिठूर गाँव और अवध के नबाव सिराजुदौला का शहर लखनऊ उस दिन जीवित हो गया था। </strong></p>
<p>ऐसा लग रहा था कि बाजीराव पेशवा &#8211; II, नाना साहेब, मणिकर्णिका @ रानी लक्ष्मी बाई, पाण्डु रंगराव टोपे @ तात्या टोपे और सैकड़ों अन्य क्रांतिकारियों की आवाज, उनके घोड़ों की टाप, तलवारों की टकराहट, अंग्रेजी हुकूमतों के अधिकारियों का &#8216;हाहाकार&#8217; बिठूर गाँव और गंगा के किनारे &#8216;मसेकर घाट&#8217; पर हो रहा हो। ऐसा लग रहा था जैसे चतुर्दिक भारत माता की जय का गगन चुम्बी शंखनाद हो रहा हो। हज़ारों लोगों के बीच लखनऊ में उत्तर प्रदेश शासन की ओर से, तत्कालीन राज्यपाल श्री वराह वेंकटगिरी के तरफ से तात्या टोपे के पौत्र श्री नारायण राव टोपे को सम्मानित किया जा रहा था। श्री नारायण राव टोपे कानपूर के गंगा तट पर स्थित तात्या टोपे के घर और मंदिर (बिठूर) में रहते थे। उन्हें सम्मान के साथ लखनऊ लाया गया था। आखिर देश को आज़ाद हुए महज दस वर्ष हुए थे, देश में प्रधानमंत्री का दफ्तर जवाहरलाल के अधीन ही था। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री गोविन्द बल्लभ पंत देश के गृह मंत्री बन गए थे। नारायण राव टोपे अपने पूर्वज तात्या टोपे की मृत्यु के बाद भी बिठूर की धरती का त्याग नहीं किये &#8211; उनके सम्मानार्थ। साथ ही, अपने पुत्र श्री विनायक राव टोपे से भी वचन लिए कि इस पवित्र स्थान को अभी नहीं त्यागेंगे। ऐसा ही हुआ। </p>
<p><strong>श्री नारायण राव टोपे को सम्मानित कर रहे थे श्री आदित्य बाबू। अपने हाथों से उन्हें पहले द्वितीय-वस्त्र के रूप में &#8216;रेशमी शॉल&#8217; से सम्मानित किये। फिर चांदी की एक थाल उनके हाथों में दिए जिस पर सन सत्तावन आंदोलन की मूर्ति बनी थी, एक प्रशस्ति पत्र  और फिर 1001/- रुपये नकद तथा सरकार की ओर से जीवन पर्यन्त मासिक मिलने वाली आर्थिक मदद। जिस चांदी की थाल, प्रशस्ति पत्र नारायण राव टोपे को सौंपा गया था, उस ताल पर श्री आदित्य बाबू का हस्ताक्षर था। लिखा था: &#8220;राज्यपाल, उत्तर प्रदेश शासन की ओर से &#8211; आदित्य नाथ झा, मुख्य सचिव।&#8221; यानी मधुबनी जिले के सरिसब-पाही का एक पुत्र उत्तर प्रदेश के एक क्रांतिकारी पुत्र के वंशज को सम्मानित कर रहे थे जिसका भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में अक्षुण भूमिका था। </strong></p>
<p>इस घटना के 49-वर्ष बाद, यानी सन 2006 के जून महीने में मैं तात्या टोपे के उसी घर में बिठूर में मंदिर में सपरिवार बैठा था और सामने बैठे थे श्री नारायण राव टोपे के पुत्र श्री विनायक राव टोपे, उनकी अर्धांगिनी श्रीमती सरस्वती टोपे, दो पुत्रियां और एक पुत्र। सन 1957 का सम्पूर्ण दस्तावेज सामने था। वह चांदी का थाल हाथ में था और आँखों से अश्रु उस थाल पर गिर रहा था। सम्पूर्ण वातावरण शांत था। पत्नी समझ गई थी। श्री नारायण राव टोपे स्तब्ध थे। वे समझ नहीं पा रहे थे आखिर मामला क्या है। </p>
<p>अपनी आंखों को पोछते जब मैं यह कहा: &#8220;टोपे साहब, ईश्वर की लीला देखें। जिस व्यक्ति ने आपके पिता को कोई 49 वर्ष पहले सम्मानित किया था, मैं उनका वंशज नहीं हूँ। शायद मुझे, मेरे माता-पिता को, मेरे घर-परिवार को उनका आज का परिवार, उनकी पीढ़ियां जानते भी नहीं होंगे। लेकिन &#8230;&#8230; वे सभी बहुत विद्वान थे । भारत के इतिहास में आज तक शायद एक विश्वविद्यालय में कुलपति बाप-बेटा नहीं हुआ है, लेकिन आदित्य बाबू के पिता और उनके भाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति बने। विद्वता में उस परिवार के सामने मेरी औकात नगण्य है। लेकिन विधि का विधान देखिये &#8211; जिस व्यक्ति ने आपके पिता को सम्मानित किया था, उनके गाँव से कोई दस किलोमीटर दूर रहने वाले उनके ही समाज (श्रोत्रिय) के एक दीन व्यक्ति का पुत्र आज आपको सम्मानित करने, आपके परिवार को, आपकी बेटियों को एक नई जिंदगी देने हेतु संकल्पित है।&#8221; श्री विनायक राव टोपे मंदिर के तरफ, जिस मंदिर में तात्या और उनकी माँ पूजा-अर्चना करती थी, अपना सर झुकाकर उन्हें नमन कर रहे थे। गंगा की ओर से शीतल हवा सम्पूर्ण वातावरण को शीतल कर रहा था। मैं वर्षों पहले ईश्वर द्वारा लिखित अपने प्रारब्ध को पढ़ रहा था। </p>
<p><strong>इस घटना के एक महीने बाद, यानी जुलाई 4, 2006 को विनायक राव टोपे की जिंदगी बदल गयी। जून महीने के अंतिम सप्ताह में हम (मेरी पत्नी, बेटा और मैं) बिठूर से उन्हें अपने घर गाजियाबाद लाये। सम्मान के साथ उन्हें अपने घर में रखा और फिर 4 जुलाई को &#8216;प्रगति टोपे&#8217; तथा &#8216;तृप्ति टोपे&#8217; की नौकरी के लिए मेरी पत्नी भारत सरकार के रेल मंत्रालय में बैठकर आवेदन लिखीं। फैक्स से कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ़ इण्डिया से नियुक्ति पत्र आया और अगले दिन मेरी पत्नी नोएडा स्थित कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ़ इण्डिया में दोनों बहनों को नौकरी ज्वाइन कराई। नौकरी ज्वाइन करने के बाद फिर लोकमत अख़बार के मालिक द्वारा विनायक राव टोपे का सम्मान किया गया। टोपे साहब को पांच लाख रुपये नकद दिए गए ताकि एक नई जिंदगी की शुरुआत हो। </strong></p>
<p>इस बीच टोपे साहब अपनी बड़ी बेटी प्रगति का विवाह ठीक किये और घर आकर न्योता दिए: &#8220;शिवनाथ जी&#8230;.. आप पति-पत्नी मिलकर हमारा जीवन बदल दिए। आपसे निवेदन है कि मेरी बेटी का कन्यादान आप कर दें।&#8221; तात्या टोपे के प्रपौत्र के मुख से यह बात सुनकर सरिसब-पाही और उजान गाँव की वह लम्बी सड़क याद आ गई। बाबा बिदेश्वर में स्थापित महादेव याद आ गए। दिवंगत श्री आदित्य बाबू याद आ गए। दिवंगत बाबूजी याद आ गए। फिर सोचा महज 55 मीटर समुद्र तल से तो ऊँचा है &#8216;मेरा गाँव उजान&#8217;, दरभंगा-मधुबनी इलाके में विद्वानों की, विदुषियों की, धनाढ्यों की, राजा-महाराजाओं की, अधिकारियों की, राज-नेताओं की किल्लत तो है नहीं; समुद्र-तल से जितनी ऊंचाई पर मेरा गाँव स्थित है, इस ऊंचाई पर तो बिहार सहित, दरभंगा-मधुबनी सहित, भारत के लाखों गाँव होंगे, फिर विधाता ने यह कड़ी कैसे जोड़ा? </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/aditya-nath-jha-and-shivnath-jha">मधुबनी जिले के &#8216;सरिसब-पाही&#8217; और दरभंगा जिले के&#8217;उजान&#8217; गाँव के &#8216;दो झा की कहानी&#8217;, एक ने पिता को सम्मानित किया, दूसरे ने पुत्र को नया जीवन</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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