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	<title>festival Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>​&#8217;छठ महापर्व&#8217; Vs &#8216;पूर्वांचल की राजनीति&#8217; : प्रदर्शनी में नहीं आते हैं, वोट के लिए दुर्गन्धित यमुना नदी में छलांग लगाते हैं</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/editorial/chhath-mahaparv-vs-politics-of-purvanchal</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 02 Oct 2026 07:17:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लोधी एस्टेट (नई दिल्ली): राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश के आगमन के अलावे कोई भी वाहन मैक्स मूलर मार्ग से दाहिने हाथ के.के.बिरला के नाम से अंकित सड़क और उस सड़क के बाएं हाथ स्थित इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) मुख्यालय की ओर नहीं मुड़ी। किसी भी वाहनों का &#8216;हूटर&#8217; नहीं [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>लोधी एस्टेट (नई दिल्ली): राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश के आगमन के अलावे कोई भी वाहन मैक्स मूलर मार्ग से दाहिने हाथ के.के.बिरला के नाम से अंकित सड़क और उस सड़क के बाएं हाथ स्थित इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) मुख्यालय की ओर नहीं मुड़ी। किसी भी वाहनों का &#8216;हूटर&#8217; नहीं बजा। प्रदेश की सांस्कृतिक गरिमा पर व्याख्यान देने वाले, तथाकथित रूप से स्वयं को &#8216;गरिमा बचाने का रक्षक&#8217; कहे जाने वालों के लिए इससे &#8216;दुखद&#8217; दृष्टान्त और कुछ नहीं हो सकता है।</strong> </p>
<blockquote><p>चाहिए तो यह था कि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड राज्यों &#8211; जहाँ &#8216;छठ महापर्व&#8217; के रूप में मनाया जाता है &#8211; से निर्वाचित और चयनित होकर लोकसभा और राज्य सभा में बैठने वाले सांसदों के अलावे दिल्ली विधानसभा में &#8216;पूर्वांचल और छठ की राजनीति&#8217; कर कुर्सी से चिपकने वाले विधायकगण, बिहार के कलाकारों द्वारा आयोजित चार-दिवसीय &#8216;अर्घ्य&#8217; प्रदर्शनी अपनी उपस्थिति देकर कलाकारों के साथ-साथ इन्टैक के प्रयास का मनोबल बढ़ाते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। </p></blockquote>
<figure id="attachment_7933" aria-describedby="caption-attachment-7933" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-2.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7933" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7933" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>लोकसभा में बिहार के 40 और राज्य सभा में 16 सांसदों (कुल: 56) का प्रतिनिधित्व है। जबकि उत्तर प्रदेश से लोकसभा में 80 और राज्य सभा में 31 सांसद (कुल: 111 सांसद) हैं। और झारखण्ड से 14 लोकसभा और 6 राज्य सभा (कुल: 20) सांसदों का प्रतिनिधित्व हैं। दिल्ली विधानसभा में कुल 70 स्थानों में कोई 30 स्थानों पर वैसे लोग बैठे हैं जो पूर्वांचल और छठ को आधार मानकर अपने-अपने विधानसभा क्षेत्र में राजनीति करते हैं, मतदाताओं की मानसिकता पर हावी होते हैं। दुर्भाग्य यह है कि 187 सांसदों और 30 विधायकों (कुल: 217 सांसदों/विधायकों) में एक फीसदी, यानी 2.17 फीसदी नेताओं की हूटर बजती गाड़ियां इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज मुख्यालय की ओर नहीं मुड़ी। </p>
<figure id="attachment_7934" aria-describedby="caption-attachment-7934" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-3.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7934" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7934" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p><strong>वैसे दिल्ली का यह इलाका यमुना पार के इलाके की चलता में, क़ुतुब मीनार से भी ऊँची ऊंचाई रखता है, लेकिन शायद लोगों ने छठ महापर्व की सांस्कृतिक गरिमा को नहीं समझ सके। यह अलग बात है कि बंगाल के दुर्गापूजा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निजी तौर पर यह चाहते हैं कि &#8216;छठ महापर्व यूनेस्को के सांस्कृतिक धरोहर सूची में अंकित हो।</strong> </p>
<figure id="attachment_7935" aria-describedby="caption-attachment-7935" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-4.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7935" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7935" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>घनश्याम दास बिरला के पुत्र कृष्ण कुमार बिरला (के.के.बिरला) के नाम अंकित 71-लोधी एस्टेट में विगत 28 सितम्बर से 1 अक्टूबर तक चार दिवसीय &#8216;अर्घ्य&#8217; प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था। भारत में विरासत के प्रति जागरूकता और उसके संरक्षण को बढ़ावा देने को लेकर से 27 जनवरी 1984 में नई दिल्ली में ‘इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज’ के नाम से एक सोसाइटी की स्थापना की गई थी। श्रीमती पुपुल जयकर ने 1984 में राजीव गांधी के साथ मिलकर इस संस्था को बनाने का विचार रखा और इसकी शुरुआत की। राजीव गांधी इस ट्रस्ट के पहले चेयरमैन बने। हालांकि इस पहल के पीछे पुपुल जयकर मुख्य सूत्रधार थीं, लेकिन ट्रस्ट को औपचारिक रूप से भारत की प्रमुख सांस्कृतिक हस्तियों, नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवियों के एक मुख्य संस्थापक समूह के साथ स्थापित किया गया था। इंटैक की पहली गवर्निंग काउंसिल में राजीव गांधी (पहले चेयरमैन), पुपुल जयकर, कपिला वात्स्यायन, एल. के. झा, एम. जी. के. मेनन, मार्तंड सिंह, राजीव सेठी, बी. के. थापर आदि शामिल थे। </p>
<figure id="attachment_7936" aria-describedby="caption-attachment-7936" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7936" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7936" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p><strong>आज इंटैक को दुनिया के सबसे बड़े विरासत संगठनों में से एक माना जाता है, जिसके देश भर में 228 से ज़्यादा चैप्टर हैं। यह सच है कि पिछले 42 सालों में, इंटैक ने न केवल हमारी प्राकृतिक और निर्मित विरासत, बल्कि अमूर्त विरासत के संरक्षण और बचाव में भी अहम भूमिका निभाई है। </strong></p>
<p>और यह भी उतना ही सच है कि इन 42-वर्षों में शायद पहली बार इंटैक के राष्ट्रीय पदाधिकारियों के साथ-साथ बिहार चैप्टर के राज्य संयोजक श्री भैरव लाल दास, सह-संयोजक डॉ. शिव कुमार मिश्र, सुश्री मनीषा झा, सुश्री अलका दास और  सैकड़ों महिला-पुरुष कलाकारों द्वारा एक सकारात्मक प्रयास किया गया जिससे न केवल सांस्कृतिक घरोहर के रूप में छठा महापर्व को यूनेस्को सूचि में अंकित करने की बात की गयी, बल्कि राष्ट्र के लिए एक गौरवशाली प्रयास की शुरुआत भी की गयी।  दुर्भाग्य यह रहा कि एक दर्शक के रूप में भी इन नेताओं, अथवा केंद्र और राज्य सरकार में ऊँचे-ऊँचे सिंहासनों पर बैठे अधिकारी भी अपनी उपस्थिति दर्ज किये। </p>
<figure id="attachment_7937" aria-describedby="caption-attachment-7937" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7937" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7937" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>ज्ञातव्य है कि अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए यूनेस्को का अंतर-सरकारी समिति का इक्कीसवां सत्र 30 नवंबर से 5 दिसंबर 2026 तक चीन के शियामेन में आयोजित होने जा रहा है। इस सत्र की अध्यक्षता पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के संस्कृति और पर्यटन उप-मंत्री, महामहिम श्री गाओ झेंग करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में बिहार के कलाकार और इंटैक के लोग चाहते हैं कि इस सत्र में भारत का महान धार्मिक परंपरागत पर्व छठ यूनेस्को के अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में दर्ज हो जाये। परन्तु नेताओं और अधिकारियों का क्या? वे तो मतदाताओं को &#8216;ज्ञान को बुटी&#8217; पिलाने में पीछे नहीं रहते, खासकर चुनाव के समय। भारत में औसतन 15 करोड़ लोग, महिला-पुरुष इस पर्व को मानते हैं, शामिल होते हैं। </p>
<figure id="attachment_7938" aria-describedby="caption-attachment-7938" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7938" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7938" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p><strong>बिहार अथवा पूर्वांचल के नेताओं पर, जो छठ महापर्व को राजनीतिक बाजार में बेचकर, मतदाताओं की मानसिकता के साथ कबड्डी खेलकर दिल्ली विधानसभा में बैठते हैं, बैठे हैं &#8211; आप तनिक भी भरोसा नहीं कर सकते हैं। दिल्ली के सिकंदर लोधी के नाम से अंकित लोधी एस्टेट परिसर में स्थित इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज मुख्यालय में संपन्न चार-दिवसीय &#8216;अर्घ्य&#8217; प्रदर्शनी समारोह गवाह है। </strong></p>
<figure id="attachment_7939" aria-describedby="caption-attachment-7939" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7939" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7939" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>​दिल्ली में पूर्वांचली वोटरों की संख्या लगभग 40 से 43 लाख से ज़्यादा है, जो दिल्ली के कुल वोटरों का लगभग 25% से 33% (और अनुमानों के अनुसार 40% तक) हिस्सा हैं।​ विगत विधानसभा के चुनाव में, जिसमें करीब दो-दशक बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी, पूर्वांचल के कई उम्मीदवार जीते हैं। चंदन कुमार चौधरी संगम विहार से 344 वोटों से जीते हैं। सतीश उपाध्याय मालवीय नगर से 2131 वोटों से जीते हैं। कपिल मिश्रा करावल नगर से 23355 वोटों से जीते हैं। बीजेपी के अभय वर्मा लक्ष्मी नगर से 11542 वोटों से जीते हैं। बीजेपी उम्मीदवार पंकज सिंह विकासपुरी से 12876 वोटों से जीते हैं।​ संजीव झा बुराड़ी से 20,601 वोटों से जीते हैं। अनिल झा किराड़ी से 21,871 वोटों से जीते हैं। गोपाल राय बाबरपुर से 18,994 वोटों से जीते हैं।</p>
<figure id="attachment_7940" aria-describedby="caption-attachment-7940" style="width: 1366px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1.jpg" alt="" width="1366" height="1843" class="size-full wp-image-7940" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1.jpg 1366w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1-222x300.jpg 222w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1-759x1024.jpg 759w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1-768x1036.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1-1138x1536.jpg 1138w" sizes="auto, (max-width: 1366px) 100vw, 1366px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7940" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>इन 70 सीटों में से लगभग 20 सीटों पर पूर्वांचल के ​मतदाताओं के कारण ही जीते। यही वजह है कि सभी राजनीतिक पार्टियां शुरू से ही पूर्वांचल-बहुल सीटों पर पूर्वांचल के उम्मीदवारों को मैदान में उतारती रही हैं।​ दिल्ली विधानसभा में ऐसी कई सीटें हैं जहां पूर्वांचल के वोटर नतीजों पर बड़ा असर डालते हैं। बुराड़ी, बादली, किराड़ी, नांगलोई, मॉडल टाउन, जनकपुरी, विकासपुरी, उत्तम नगर, द्वारका, मटियाला, पालम, राजेंद्र नगर, देवली, संगम विहार, बदरपुर, पटपड़गंज, लक्ष्मी नगर, सीमापुरी, गोकुलपुरी और करावल नगर ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां पूर्वांचल के लोग राजनीतिक पार्टियों की जीत-हार तय करते हैं।​ </p>
<figure id="attachment_7941" aria-describedby="caption-attachment-7941" style="width: 1365px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-9.jpg" alt="" width="1365" height="1664" class="size-full wp-image-7941" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-9.jpg 1365w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-9-246x300.jpg 246w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-9-840x1024.jpg 840w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-9-768x936.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-9-1260x1536.jpg 1260w" sizes="auto, (max-width: 1365px) 100vw, 1365px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7941" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<blockquote><p>पूर्वांचल के वोटरों में बिहार, बिहार से सटे उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों और झारखंड के लोगों का एक बड़ा समूह दिल्ली की राजनीति को प्रभावित करता है। एक अनुमान के मुताबिक, पूर्वांचल के वोटरों की आबादी 43 लाख से ज़्यादा है। दिल्ली विधानसभा चुनावों में 25 फ़ीसदी से ज़्यादा वोटर पूर्वांचल से हैं।</p></blockquote>
<figure id="attachment_7942" aria-describedby="caption-attachment-7942" style="width: 1362px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-11.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-11.jpg" alt="" width="1362" height="1368" class="size-full wp-image-7942" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-11.jpg 1362w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-11-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-11-1020x1024.jpg 1020w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-11-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-11-768x771.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1362px) 100vw, 1362px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7942" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>दुर्भाग्यवश, पूर्वांचल के नेता अथवा मतदाता, जो छठ के समय मतों की राजनीति करने में कोई कोताही नहीं करते। विश्वास नहीं हो तो आगामी महीने में संपन्न होने वाले छठ पूजा में देख का गवाह बन जाएँ। क्योंकि यमुना नदी खराब हो चुके बहते पानी वाले इकोसिस्टम का एक आम उदाहरण है। इंसानी गतिविधियों और बढ़ते प्रदूषण के कारण दिल्ली-​राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में यह नदी एक सीवेज नाले में बदल गई है। इस नदी में होने वाले कुल प्रदूषण के लिए अकेले दिल्ली 79% ज़िम्मेदार है। नालों से रोज़ाना सैकड़ों टन बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड वाला कचरा नदी में गिरता है। </p>
<figure id="attachment_7943" aria-describedby="caption-attachment-7943" style="width: 1362px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-12.jpg" alt="" width="1362" height="1368" class="size-full wp-image-7943" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-12.jpg 1362w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-12-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-12-1020x1024.jpg 1020w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-12-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-12-768x771.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1362px) 100vw, 1362px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7943" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>प्रदूषण कम नहीं हो पाता क्योंकि मॉनसून के अलावा बाकी महीनों में नदी में पानी का बहाव बहुत कम या बिल्कुल नहीं होता। ​पानी की गुणवत्ता इंडेक्स से पता चलता है कि दिल्ली में घुसने से पहले नदी के पानी की क्वालिटी ठीक-ठाक होती है, लेकिन दिल्ली में यह बहुत ज़्यादा प्रदूषित हो जाती है और इसकी क्वालिटी बहुत खराब हो जाती है, जो आगरा नहर तक ऐसी ही बनी रहती है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की गलत जगह और ट्रीटमेंट क्षमता और असल में पैदा होने वाले सीवेज के बीच तालमेल न होने की वजह से लगभग 60% बिना ट्रीट किया हुआ गंदा पानी यमुना नदी में मिल जाता है। </p>
<figure id="attachment_7944" aria-describedby="caption-attachment-7944" style="width: 1362px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-15.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-15.jpg" alt="" width="1362" height="1368" class="size-full wp-image-7944" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-15.jpg 1362w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-15-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-15-1020x1024.jpg 1020w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-15-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-15-768x771.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1362px) 100vw, 1362px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7944" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>​<strong>परन्तु इतना होने के बाद भी प्रदेश के नेतागण, चाहे मंत्रिमंडल में बैठे हों अथवा नहीं, छठ महापर्व के आगमन के पूर्व से ही छठ के डाले और कोनिया पर राजनीतिक खेला शुरू कर देते हैं। मतदाताओं की मानसिकता को अपने वश में करने के उद्देश्य से इस प्रदूषित यमुना में छलांग लगाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते, ताकि अख़बारों के पन्नों पर, टीवी के स्क्रीनों पर उनका चेहरा चकमकाते रहे। दिल्ली में लगभग 40 लाख पूर्वांचली वोटर हैं, जो राजधानी क्षेत्र के कुल वोटरों का 25 प्रतिशत हैं। गौरतलब है कि बीजेपी का दिल्ली में एक अलग विंग के तौर पर &#8216;पूर्वांचल मोर्चा&#8217; भी है। दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियों में रहने वाले पूर्वांचली वोटरों की अहमियत का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी हालिया चुनावी रैली में उनके मुद्दों का ज़िक्र किया था।</strong></p>
<figure id="attachment_7945" aria-describedby="caption-attachment-7945" style="width: 1362px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-10.jpg" alt="" width="1362" height="1368" class="size-full wp-image-7945" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-10.jpg 1362w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-10-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-10-1020x1024.jpg 1020w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-10-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-10-768x771.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1362px) 100vw, 1362px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7945" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>​बहरहाल, ​पूर्वांचल और छठ की राजनीति का गवाह है 1993 में लाल बिहारी तिवारी, कीर्ति आज़ाद और परवेज़ हाशमी विधायक बने। 1998 के विधानसभा चुनावों में परवेज़ हाशमी, मीरा भारद्वाज और महाबल मिश्रा जीते। 2009 के लोकसभा चुनावों में महाबल मिश्रा पश्चिमी दिल्ली से लोकसभा पहुँचे। 2014 से 2024 के लोकसभा चुनावों के बीच, मनोज तिवारी ने बीजेपी की ओर से तीन बार संसदीय चुनाव जीता। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के 2022 के एक लेख में बताया गया है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग (जिन्हें पूर्वांचली कहा जाता है) शहर की 70 विधानसभा सीटों में से 16 पर संख्या के हिसाब से अन्य समुदायों से ज़्यादा हैं और शहर की कुल आबादी का 30% हिस्सा हैं। कई दशकों तक दिल्ली की राजनीति में जाटों, पंजाबी खत्रियों और ब्राह्मणों का दबदबा रहा। संख्या के हिसाब से, सभी जातियों के पंजाबी मूल के लोग दिल्ली की कुल आबादी का कम से कम 35% से 40% हिस्सा माने जाते हैं। इनमें ज़्यादातर हिंदी बोलने वाले पंजाबी हिंदू हैं, जबकि एक बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग पंजाबी बोलने वाले सिखों का है। </p>
<figure id="attachment_7946" aria-describedby="caption-attachment-7946" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7946" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7946" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/editorial/chhath-mahaparv-vs-politics-of-purvanchal">​&#8217;छठ महापर्व&#8217; Vs &#8216;पूर्वांचल की राजनीति&#8217; : प्रदर्शनी में नहीं आते हैं, वोट के लिए दुर्गन्धित यमुना नदी में छलांग लगाते हैं</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>अपनी &#8216;उंगलियों को क्रॉस करके&#8217; रखें, &#8216;छठ महापर्व&#8217; यूनेस्को के &#8216;अमूर्त सांस्कृतिक विरासत&#8217; की सूची में अंकित होने वाला है</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-chhath-mahaparv-is-set-to-be-inscribed-on-unescos-list-of-intangible-cultural-heritage</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 25 Sep 2026 11:12:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[chhth]]></category>
		<category><![CDATA[culture]]></category>
		<category><![CDATA[festival]]></category>
		<category><![CDATA[UNESCO]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना​ / नई दिल्ली : अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए यूनेस्को का अंतर-सरकारी समिति का इक्कीसवां सत्र 30 नवंबर से 5 दिसंबर 2026 तक चीन के शियामेन में आयोजित होने जा रहा है। इस सत्र की अध्यक्षता पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के संस्कृति और पर्यटन उप-मंत्री, महामहिम श्री गाओ झेंग करेंगे। संभव है इस [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-chhath-mahaparv-is-set-to-be-inscribed-on-unescos-list-of-intangible-cultural-heritage">अपनी &#8216;उंगलियों को क्रॉस करके&#8217; रखें, &#8216;छठ महापर्व&#8217; यूनेस्को के &#8216;अमूर्त सांस्कृतिक विरासत&#8217; की सूची में अंकित होने वाला है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना​ / नई दिल्ली : अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए यूनेस्को का अंतर-सरकारी समिति का इक्कीसवां सत्र 30 नवंबर से 5 दिसंबर 2026 तक चीन के शियामेन में आयोजित होने जा रहा है। इस सत्र की अध्यक्षता पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के संस्कृति और पर्यटन उप-मंत्री, महामहिम श्री गाओ झेंग करेंगे। संभव है इस सत्र में भारत का महान धार्मिक परंपरागत पर्व छठ यूनेस्को के अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में दर्ज हो जाये। अपनी-अपनी उंगलियां क्रॉस करके रखें।</strong><br />
 <br />
इसी तैयारी के क्रम में यानी &#8220;छठ&#8221; को यूनेस्को के अमूर्त्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल करने के उद्देश्य से इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज अपने कार्यालय में प्रदर्शनी करने जा रहा है। भारत में औसतन 15 करोड़ लोग, महिला-पुरुष इस पर्व को मानते हैं, शामिल होते हैं। जानकारी के अनुसार बिहार की सभी लोक कलाओं में छठ महापर्व को आधार बनाकर ‘अर्घ्य ’ प्रदर्शनी का आयोजन 28 सितम्बर से 1 अक्टूबर तक होगा। </p>
<blockquote><p>स्थान : इंटेक मुख्यालय, <br />
71 लोधी इस्टे्ट,<br />
के.के.बिड़ला लेन, नई दिल्ली </p></blockquote>
<p>UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में किसी विरासत को शामिल करने के लिए, देशों को मूल्यांकन के लिए एक नॉमिनेशन डॉसियर (नामांकन दस्तावेज) जमा करना होता है। हर देश हर दो साल में एक विरासत को नामांकित कर सकता है। <br />
इंटैक बिहार राज्य  के संयोजक भैरव लाल दास के अनुसार ‘अर्घ्य‘ का शुभारंभ राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश द्वारा 28 सितम्बर को 11 बजे करेंगे। इंटैक के अध्यक्ष अशोक सिंह ठाकुर, सदस्य सचिव रविन्द्र  सिंह एवं क्राफ्ट डिविजन की प्रमुख बिन्दु वन्दना मनचन्‍दा भी उपस्थित रहेंगी। छठ महापर्व को यूनेस्को के अमूर्त्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल करने के उद्देश्य से आयोजित इस प्रदर्शनी की क्युरेटर मिथिला चित्रकला की विदुषी चितेरी मनीषा झा एवं अलका दास हैं। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7871" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>नीषा झा एवं अलका दास के अनुसार 30 सितम्बर को 2.00 बजे से इस प्रदर्शनी में ही छठ की ऐतिहासिकता पर एक विद्वत संगोष्ठी का भी आयोजन किया गया है जिसमें कैलाश कुमार मिश्र, दक्षेस विश्वविद्यालय के प्रो. देवनाथ पाठक, सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद दरभंगा के प्रो. विद्यानाथ झा, दिल्ली  विश्वविद्यालय के प्रो. राधा माधव भारद्वाज एवं रिपुंजय ठाकुर, पटना के डा मनोज कुमार अम्बष्ठ आदि शामिल होंगे। </p>
<p><strong>भारत की अन्य यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासतें हैं &#8211; कुटियाट्टम (संस्कृत थिएटर) (2008), वैदिक मंत्रोच्चार की परंपरा (2008), रामलीला (रामायण का पारंपरिक प्रदर्शन) (2008), रम्माण, भारत के गढ़वाल हिमालय के धार्मिक उत्सव और परंपरा का मंचन (2009, छऊ नृत्य (2010), कालबेलिया लोक गीत और नृत्य (राजस्थान) (2010),मुडियेट्टू (केरल) का अनुष्ठान थियेटर और नृत्य नाटक  (2010), लद्दाख का बौद्ध जप: हिमालयी लद्दाख क्षेत्र, जम्मू और कश्मीर, भारत में पवित्र बौद्ध ग्रंथों का पाठ ((2012), मणिपुर का संकीर्तन, अनुष्ठान गायन, ढोलक बजाना और नृत्य करना (2013), जंडियाला गुरु, पंजाब, भारत के ठठेरों के बीच पारंपरिक तौर पर पीतल और ताँबे के बर्तन बनाने का शिल्प (2014), नवरोज (2016), योग (2016), कुंभ मेला (2017), कोलकाता की दुर्गा पूजा (2021), गुजरात का गरबा (2023), और रोशनी का त्योहार, दीपावली (2024)। </strong></p>
<p>इंटैक बिहार के सह-संयोजक डा शिव कुमार मिश्र के अनुसार बिहार के 35 लोक कलाकारों को इस प्रदर्शनी में स्थान दिया गया है। ये कलाकार छठ व सूर्य पूजा से जुड़ी परंपराओं पर आधारित कलाकृतियाँ प्रदर्शित करेंगे। इन कलाकृतियों और शिल्प के जरिए, यह प्रदर्शनी छठ से जुड़े प्रतीकों, रीति-रिवाजों और मान्यताओं को उजागर करेगी। इसमें यह दिखाने की कोशिश की जाएगी कि कैसे लोक कलात्मक परंपराएँ छठ महापर्व के सांस्कृतिक महत्व को पीढ़ियों तक संजोकर रखती हैं और आगे बढ़ाती हैं। </p>
<figure id="attachment_7872" aria-describedby="caption-attachment-7872" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7872" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7872" class="wp-caption-text">​पटना के गंगा घाट पर छठ</figcaption></figure>
<blockquote><p>अर्घ्य की खास बात यह है कि यहां आने वालों को न सिर्फ़ तैयार कलाकृतियाँ देखने को मिलेंगी बल्कि उन्हें कलाकारों को काम करते हुए देखने, इन परंपराओं से जुड़े लोगों से मिलने, उनकी कार्य-प्रक्रिया को समझने और कला, रीति-रिवाज व समुदाय के बीच के रिश्ते को महसूस करने का मौका भी मिलेगा। यह प्रदर्शनी छठ पर्व के कलात्मक और सांस्कृतिक महत्व पर आधारित है। आयोजकों के अनुसार ‘’अर्घ्य’’ सिर्फ़ एक प्रदर्शनी नहीं है, यह एक अर्पण है। यह कला एवं परंपराओं का मिलन, रीति-रिवाजों और कलात्मक अभिव्यक्तियों का संगम भी है।</p></blockquote>
<p>यह विरासत को सिर्फ़ अतीत से मिली चीज़ के तौर पर नहीं, बल्कि आज भी रची, अपनाई और आगे बढ़ाई जा रही चीज़ के तौर पर देखने का अवसर प्रदान करती है। प्रदर्शनी में मिथिला पेंटिंग, पटना कलम, मंजुषा कला, भोजपुरी, सिक्की , पेपरमेशी, टेराकोटा, सुजनी, बैद्यनाथ सहित बिहार की सभी क्षेत्रों की प्रचलित एवं लोकप्रिय कला विधाओं को स्थान दिया गया है। इस प्रदर्शनी में अर्चना सिन्हा, मृणाल सिंह, मनु मीनाक्षी, साधना देवी, मिंकी दास, सविता कुमारी, प्रो. दिनेश कुमार, तृप्ति रानी, संजु दास, निभा लाभ, ममता भारती, संतोष कुमार, रामू कुमार, जितेन्द्र मोहन, अर्चना चौधरी, विनीता, प्रतीक प्रभाकर, ज्ञानती देवी, चारू वर्मा,  सोमा आनंद, मनोज चौधरी, संजय कुमार जायसवाल, अर्चना कुमारी, कंचन, नूतन लाभ, अमृता शांभवी, अन्नु झा सहित 35 से अधिक कलाकारों की कलाकृतियां प्रदर्शित होंगी। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7873" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>छठ चार दिनों का त्योहार है और इसमें साफ-सफाई का खास ध्यान रखा जाता है। इस त्योहार में गलती की कोई जगह नहीं होती। इस व्रत को करने के नियम इतने कठिन हैं, इस वजह से इसे महापर्व और महाव्रत के नाम से संबोधित किया जाता है। मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर ( तालाब ) के किनारे यह पूजा की जाती है।  मार्कण्डेय पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी ने अपने आप को छह भागों में विभाजित किया है। इनके छठे अंश को सर्वश्रेष्ठ मातृदेवी के रूप में जाना जाता है, जो ब्रह्मा की मानस पुत्री हैं। वो बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को इन्हीं देवी की पूजा की जाती है। इस व्रत को करने से संतान को लंबी आयु का वरदान मिलता है। </strong></p>
<p>कथा के अनुसार प्रियव्रत नाम के एक राजा थे। उनकी पत्नी का नाम मालिनी था। दोनों की कोई संतान नहीं थी। इस बात से राजा और उसकी पत्नी बहुत दुखी रहते थे। उन्होंने एक दिन संतान प्राप्ति की इच्छा से महर्षि कश्यप द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। इस यज्ञ के फलस्वरूप रानी गर्भवती हो गईं। नौ महीने बाद संतान सुख को प्राप्त करने का समय आया तो रानी को मरा हुआ पुत्र प्राप्त हुआ। इस बात का पता चलने पर राजा को बहुत दुख हुआ।  संतान शोक में वह आत्महत्या का मन बना लिया। लेकिन जैसे ही राजा ने आत्महत्या करने की कोशिश की उनके सामने एक सुंदर देवी प्रकट हुईं।  </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-7-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-7-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7874" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-7-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-7-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-7-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-7-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-7-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>देवी ने राजा को कहा कि मैं षष्ठी देवी हूं। मैं लोगों को पुत्र का सौभाग्य प्रदान करती हूं। इसके अलावा जो सच्चे भाव से मेरी पूजा करता है, मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ को पूर्ण कर देती हूं। यदि तुम मेरी पूजा करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करूंगी। देवी की बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन किया। राजा और उनकी पत्नी ने कार्तिक शुक्ल की षष्टी तिथि के दिन देवी षष्टी की पूरे विधि-विधान से पूजा की। इस पूजा के फलस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से छठ का पावन पर्व मनाया जाने लगा। छठ व्रत के संदर्भ में एक अन्य कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया। </p>
<p><strong>हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार, छठ पूजा कार्तिक महीने के छठे दिन मनाई जाती है। लोग विशेष प्रसाद और अनुष्ठान करने के लिए गंगा के पानी को अपने घरों में भी ले जाते हैं। इस दिन घरों को अच्छी तरह से साफ किया जाता है। छठ के दूसरे दिन, जिसे खारना के नाम से भी जाना जाता है, में भक्तों को एक दिन का उपवास करना शामिल है, जो देर शाम को पृथ्वी माता की पूजा करने के बाद टूट जाता है। भगवान को चढ़ावे में चावल पुडिंग (खीर) और फल शामिल हैं, जो परिवार के सदस्यों और दोस्तों के बीच वितरित किए जाते हैं। छठ का तीसरा दिन शाम के प्रसाद के लिए प्रसाद (प्रसाद) की तैयारी में जाता है, जिसे संझिया अर्घ्य भी कहा जाता है। चौथे और अंतिम दिन, परिवार के सदस्य और दोस्त सूर्योदय से पहले नदियों के तट पर जाते हैं और उगते सूरज को प्रसाद अर्घ्य देते हैं। इस अनुष्ठान के बाद, भक्त अपना उपवास तोड़ते हैं और पड़ोसियों और रिश्तेदारों को प्रसाद वितरित करते हैं।</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7875" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>ज्ञातव्य हो की विगत वर्ष रोशनी का त्योहार, दीपावली को UNESCO की &#8216;मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत&#8217; (Intangible Cultural Heritage) की सूची में शामिल किया गया था। इसकी घोषणा 8-13 दिसंबर 2025 तक नई दिल्ली के लाल किले में आयोजित UNESCO की अंतर-सरकारी समिति के 20वें सत्र में की गई। यह इस सूची में शामिल होने वाली 16वीं भारतीय विरासत है। इसे 194 सदस्य देशों के प्रतिनिधियों, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और UNESCO के वैश्विक नेटवर्क के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में अपनाया गया। रोशनी का यह त्योहार समुदायों द्वारा आगे बढ़ाई जाने वाली एक जीवंत परंपरा है, जिसे पीढ़ियों से लगातार नया रूप दिया जाता रहा है। यह सामाजिक एकता को बढ़ावा देता है और विकास में योगदान देता है।</p>
<p>भारत के लिए दीपावली सिर्फ़ एक सालाना त्योहार नहीं है; यह करोड़ों लोगों की भावनाओं और संस्कृति से गहराई से जुड़ी एक जीवंत परंपरा है। हर साल, जब शहरों, गांवों और विदेशों में बसे भारतीयों के घरों में दीये जगमगाते हैं, तो दीपावली खुशी, नई शुरुआत और जुड़ाव की जानी-पहचानी भावना को फिर से जगाती है। यह लोगों को रुकने, याद करने और एक साथ आने के लिए प्रेरित करती है ताकि दुनिया को यह बताया जा सके कि क्यों यह त्योहार मानवता की अनमोल सांस्कृतिक परंपराओं में जगह पाने का हकदार है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7876" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>दीपावली, जिसे दिवाली भी कहा जाता है, कार्तिक अमावस्या को मनाई जाती है, जो आमतौर पर अक्टूबर या नवंबर में आती है। दीपावली का मूल दर्शन सभी लोगों के लिए समृद्धि, नई शुरुआत और खुशहाली का जश्न मनाना है। इसका समावेशी स्वरूप अलग-अलग लोगों और समुदायों के बीच आपसी सम्मान और विविधता में एकता को बढ़ावा देता है; नतीजतन, इस त्योहार का कोई भी पहलू सामाजिक एकजुटता और सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान के सिद्धांतों के खिलाफ नहीं है। घरों, सड़कों और मंदिरों को ढेरों दीयों से रोशन किया जाता है, जिनसे निकलने वाली सुनहरी रोशनी अंधेरे पर उजाले और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक होती है। बाज़ार रंग-बिरंगे कपड़ों और बारीक कारीगरी वाली हस्तशिल्प की चीज़ों से भरे होते हैं जो रोशनी में चमकते हुए त्योहार के माहौल को और भी शानदार बनाते हैं। शाम होते ही आसमान आतिशबाजी की शानदार रोशनी से जगमगा उठता है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-chhath-mahaparv-is-set-to-be-inscribed-on-unescos-list-of-intangible-cultural-heritage">अपनी &#8216;उंगलियों को क्रॉस करके&#8217; रखें, &#8216;छठ महापर्व&#8217; यूनेस्को के &#8216;अमूर्त सांस्कृतिक विरासत&#8217; की सूची में अंकित होने वाला है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>दिल्ली के एक कांफ्रेस हॉल में जहाँ कक्ष में किसी किनारे बोतल में पानी रखा मिलेगा, विद्वान-विदुषी-विशेषज्ञ &#8216;नदी उत्सव&#8217; मानते मिलेंगे😢</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Sep 2023 03:07:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बहिरा नाचे अपने ताल]]></category>
		<category><![CDATA[embankment]]></category>
		<category><![CDATA[festival]]></category>
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		<category><![CDATA[nadi utsav]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दिल्ली और दरभंगा : विगत वर्ष भारत के न्यायालय में एक मुकदमा आया था कि दिल्ली में यमुना नदी के क्षेत्र को काट कर, बांधकर अट्टालिकाएं बनाई जा रही है। यमुना को काट कर गगनचुम्बी अट्टालिकाएं बनी और आने वाले समय में यह क्रिया भी जारी रहेगी। यह बात यहाँ इसलिए उद्धृत कर रहा हूँ [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b2/three-day-nadi-utsav-in-delhi">दिल्ली के एक कांफ्रेस हॉल में जहाँ कक्ष में किसी किनारे बोतल में पानी रखा मिलेगा, विद्वान-विदुषी-विशेषज्ञ &#8216;नदी उत्सव&#8217; मानते मिलेंगे😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दिल्ली और दरभंगा : विगत वर्ष भारत के न्यायालय में एक मुकदमा आया था कि दिल्ली में यमुना नदी के क्षेत्र को काट कर, बांधकर अट्टालिकाएं बनाई जा रही है। यमुना को काट कर गगनचुम्बी अट्टालिकाएं बनी और आने वाले समय में यह क्रिया भी जारी रहेगी। यह बात यहाँ इसलिए उद्धृत कर रहा हूँ कि देश में नदियों के बारे में, उसकी रक्षा के बारे में जितनी भी बातें होती हैं, वह कागज़ पर अधिक होती हैं। बड़े-बड़े विद्वान-विदुषी इस बात को कहते भी नहीं थकते प्राचीन ग्रंथों में नदियों का वर्णन, नदियों के किनारे सांस्कृतिक विरासत और लोक एवं सांस्कृतिक परंपराओं में नदियों का उल्लेख है, लेकिन वास्तविक रूप में नदियों की धाराओं को स्वहित में मोड़ने में तनिक भी संकोच नहीं करते। विश्वास नहीं हो तो से ऊपर हरिद्वार नदी की धरा को देखिये और नीचे पटना को सुन्दर बनाने में गंगा को दूर, बहुत दूर भगाने में आधुनिक मगध नरेश की भूमिका देखिये। मियाज़ &#8216;टंच&#8217; हो जायेगा। </strong></p>
<p>इधर आज ज्ञात हुआ कि दिल्ली में आयोजित &#8216;नदी उत्सव&#8217; कांफ्रेंस हॉल में शुरू होगा जहाँ कोने में &#8216;बोतल में पानी&#8217; रखा मिलेगा जो भारत की नदियों का प्रतीक माना जायेगा । प्राचीन ग्रंथों में नदियों का वर्णन, नदियों के किनारे सांस्कृतिक विरासत और लोक एवं सांस्कृतिक परंपराओं में नदियों का उल्लेख समेत कई विषयों पर चर्चा कांफ्रेस हॉल में होगा। दिल्ली सल्तनत के विद्वान, विदुषी यह मानते हैं कि ‘नदी उत्सव’ नदी संस्कृति, इसकी परंपराओं, अनुष्ठानों और जल ज्ञान का दस्तावेजीकरण करने का एक प्रयास है।विद्वानों और विदुषियों का कहना है कि आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी नदियों को धन्यवाद देना भूल गये हैं और यह आयोजन नदियों से जुड़ाव को याद करने की एक पहल है । गजब की सोच है। मानना पड़ेगा। ऐसा लगता है जैसे &#8216;इण्डिया&#8217; बनाम &#8216;भारत&#8217; की बात देख रहे हैं। </p>
<p>दिल्ली में आयोजित इस &#8216;नदी उत्सव&#8217; को देखकर, उसके बारे में जान कर मिथिला की एक कहावत तत्काल मानस पटल पर छा गया। जिस महामहोपाध्याय ने मिथिला का चित्रण ‘पग-पग पोखर, माछ, मखान, मधुर बोल मुसकी मुख पान । विद्या, वैभव, शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक’ इन शब्दों में किये थे, वे बहुत दूरदर्शी थे। लगता है वे सरस्वती के वरद पुत्र थे और उन्हें ज्ञात था कि आने वाले समय में मिथिला के लोग उनकी कविता को मिथिला के चौराहों पर ‘पाठ’ करके, मिथिला का गुणगान करके अपने-अपने हिस्से की मिथिला अपने नाम लिखाएँगे। प्रदेश के लेखाकार में ‘एक खास किस्म के लोग’ दरभंगा राज का ‘मुहर’ लेकर तैयार भी रहेंगे जो आतंरिक-बाहरी माफिआओं के साथ मिलकर मिथिला (दरभंगा राज और उसकी गरिमा) को बेचकर, उसे मिट्टी पलीद करेंगे और स्वयं ‘संभ्रांत’ और ‘धनाढ्यों’ की श्रेणी में सूचीबद्ध हो जायेंगे, नेता, अभिनेता भी हो सकते हैं।</p>
<figure id="attachment_5121" aria-describedby="caption-attachment-5121" style="width: 994px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/Woman_Yamuna_froth.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/Woman_Yamuna_froth.jpeg" alt="" width="994" height="658" class="size-full wp-image-5121" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/Woman_Yamuna_froth.jpeg 994w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/Woman_Yamuna_froth-300x199.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/Woman_Yamuna_froth-768x508.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 994px) 100vw, 994px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5121" class="wp-caption-text">दिल्ली में यमुना नदी Photo: Outlook</figcaption></figure>
<p>यहाँ दिल्ली में विद्वान लोग कह रहे हैं कि दिल्ली में चौथा &#8216;नदी उत्सव&#8217; मनाया जा रहा है। वे यमुना नदी के किनारे भी इस उत्सव को मनाएंगे । आधिकारिक सूत्रों के अनुसार  इस उत्सव में विभिन्न विषयों पर पर्यावरणविदों और विद्वानों के साथ विद्वत चर्चा, फिल्म स्क्रीनिंग, प्रख्यात कलाकारों की प्रस्तुतियां, कठपुतली शो और विभिन्न पुस्तकों पर चर्चा होंगी। यह आयोजन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्रण मिशन और जनपद सम्पदा प्रभाग की ओर से 22 सितंबर से 24 सितंबर, 2023 तक आयोजित किया जा रहा है। </p>
<p>यकीन  मानिए जो सम्मानित व्यक्ति, विद्वद्जन, विदुषी, सामाजिक सरोकार रखने वाले गणमान्य लोग, संस्थाएं इसमें भाग ले रहे हैं, तीन दिन बाद दिल्ली प्रशासन, केंद्र सरकार और अन्य निकायों की आलोचना करने में तनिक भी हिचकी नहीं लेंगे। इस तीन दिवस के बीच जो महानुभाव यमुना नदी की स्वच्छता और पर्यावरण में इसकी सकारात्मक भूमिका का व्याख्यान करेंगे, तीन दिन बाद आईटीओ चौराहे पर, जंतर मंतर पर, विजय चौक पर, यहाँ तक कि यमुना नदी में गर्दन तक पानी में खड़े होकर यमुना नहीं और पानी की आलोचना करेंगे। </p>
<figure id="attachment_5122" aria-describedby="caption-attachment-5122" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/7.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-5122" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/7.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/7-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/7-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/7-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/7-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5122" class="wp-caption-text">दरभंगा का एक पोखर फोटो: @अखबारवाला001</figcaption></figure>
<p>मिथिला में कवि महोदय यह भी जानते थे इस कविता में वे जिस ‘संज्ञा’, ‘सर्वनाम’, ‘विशेषण’ ‘क्रिया’ का इस्तेमाल कर रहे हैं, आने वाले दिनों में वह ‘अपभ्रंश’ ही नहीं, ‘विध्वंस’ का रूप ले लेगा। मानसिक रूप से समाज के कुछ सम्मानित लोगों के लिए यह शब्द बाजार अवश्य देगा, उनकी ‘रोजी-रोटी’ का साधन अवश्य बनेगा। वे यह भी जानते थे कि मिथिला के समाज में ‘विद्या’ महत्वहीन हो जायेगा। ‘वैभव’, ‘लक्ष्मी’ को प्राप्त करने, उन पर अपना-अपना अधिपत्य ज़माने की होड़ में ‘विद्या’, ‘विद्यालय,’, ‘गुरुकुल’, ‘गुरुजन’, जो समाज का पथ-प्रदर्शक थे, मिथिला की सड़कों पर उनकी वही स्थिति होगी जैसी भारत के नगरों, महानगरों में मुख्य सड़क के दाहिने-बाएं ‘पगडण्डी’ नुमा सड़क होती है और जहाँ लिखा होता है ‘साईकिल और पैदल चलने वालों का रास्ता। यानी ‘साईड लाईन’ हो जायेंगे। इतना ही नहीं, दुर्भाग्य का पराकाष्ठा तब होगा जब उस रास्ते को भी समाज के ‘वैभवशाली’, ‘बाहुबली’, ‘पहलवान’, ‘दबंग’, ‘लाठीधारी’, ‘बंदूकधारी’, ‘कट्टाधारी’ व्यक्ति, जो तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था से संरक्षित, पोषित रहेंगे (इसमें मिथिला वासी भी सम्मिलित रहेंगे), कब्ज़ा किये बैठे होंगे। समाज में ‘अशिक्षा’ के कारण मूक-बधिर लोगों का, चापलूस-चाटुकारों का बोलबाला हो जायेगा।</p>
<p>अगर ऐसा नहीं होता तो आज मिथिला की सड़कों से लेकर पटना के सर्कुलर रोड, सरपेंटाइन रोड के रास्ते दिल्ली के राजपथ और जंतर-मंतर तक इस कविता का पाठ नहीं किया जाता – ‘पग-पग पोखर, माँछ, मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या, वैभव, शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक&#8217;” । लोगों को स्वयं समझने की, सोचने की, मंथन करने की, विवेचना करने की, विश्लेषण करने की शक्ति होते हुए भी, वह ‘दिग्भ्रमित’ होना, ‘गुमराह’ होना, ‘बरगलाना’ अधिक श्रेयस्कर समझता है तो हम क्या कर सकते हैं।</p>
<p>इधर दिल्ली के संस्कृति मंत्रालय में लोग कह रहे हैं कि भारतीय संस्कृति में नदियों की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान देते हैं।  उनका कहना है कि हमारे देश में नदियां न केवल पवित्र और पूज्य मानी जाती हैं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के जीवन का आधार भी हैं। सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे हुआ है। भारत के बड़ी संख्या में शहर, गांव और कस्बे नदियों के किनारे बसे हैं । उनकी पहचान नदियों से ही होती है। भारतीय समाज ने नदियों को हमेशा सर्वोच्च सम्मान दिया है, नदियों को हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग माना है। संस्कृति मंत्रालय के अधीन कला एवं संस्कृति को समर्पित संस्थान, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र पिछले कुछ वर्षों से बड़े पैमाने पर &#8216;नदी उत्सव ’ आयोजित कर रहा है। </p>
<figure id="attachment_5123" aria-describedby="caption-attachment-5123" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/DSC_8982-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/DSC_8982-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="size-full wp-image-5123" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/DSC_8982-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/DSC_8982-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/DSC_8982-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/DSC_8982-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/DSC_8982-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/DSC_8982-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5123" class="wp-caption-text">दरभंगा का एक पोखर फोटो: @अखबारवाला001</figcaption></figure>
<p>मिथिला के किसी भी स्थान पर खड़े होकर मिथिला के बाबू, बबुआइन और बौआसिन लोग अगर “पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या वैभव शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक” कविता पाठ करते मिल जायँ, तो समझ लीजिये वे ‘सरेआम झूठ’ बोल रहे हैं। अपने-अपने हितों के रक्षार्थ वे स्थानीय लोगों को बरगला रहे हैं। इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते हैं कि वे राजनीति में प्रवेश करने के लिए मिथिला की कविता पाठ करना प्रारम्भ कर दिए हों जो उनके अनेकानेक प्रयासों में, एक यह भी प्रयास हो। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि जिस समय इस कविता की रचना हुई होगी, उस कवि के नजर में मिथिला और उसकी गरिमा अपने उत्कर्ष पर रहा होगा। मिथिला के सभी क्षेत्रों में, प्रत्येक कदम पर, प्रत्येक घरों के सामने-पीछे छोटा-बड़ा पोखर रहा होगा। तत्कालीन राजा-महाराजा-महाराजाधिराज स्थानीय लोगों के सम्मानार्थ, तत्कालीन पानी की समस्याओं के निदानार्थ अपने खर्च पर पोखर, तालाब बनबाये होंगे। यह सच भी है।</p>
<p>अब जब मिथिला में असंख्य पोखर / तालाब रहा होगा तो उसके महार (इम्बैंकमेंट) पर पान की खेती, मखान की खेती होती होगी, जिसका उपयोग अपने-अपने घरों में, आगंतुकों के लिए, सगे-सम्बन्धियों के लिए किया जाता होगा। कोई सौ वर्ष पहले तक मिथिला में ‘शिक्षा’ चाहे ‘प्राथमिक’ हो, ‘माध्यमिक’ हो या ‘उच्च शिक्षा हो – पढ़ने वालों के साथ-साथ पढ़ाने वालों की किल्लत नहीं थी। अपने-अपने क्षेत्र के अनेकानेक आचार्य, प्राचार्य, महामहोपाध्याय समाज में उपलब्ध थे। शिक्षा के मामले में बनारस और इलाहाबाद की दूरियां मिथिला से अधिक नहीं थी। पाटलिपुत्र में भी मिथिला के लोग आकर शिक्षित होते थे। लेकिन, दुर्भाग्य यह रहा कि शिक्षा प्राप्ति के बाद उन्हें समाज को जो वापस करना था, वह नहीं कर सके। मिथिला के ग्रामीण इलाकों से खेतिहर-परिवारों से लेकर विद्वानों के परिवारों तक, जो भी शिक्षा के लिए शहर की ओर उन्मुख हुए, कभी वापस नहीं आये। और वापस भी आये तो वृद्धावस्था में। परिणाम यह हुआ कि मिथिला की जो अपनी पारम्परिक शिक्षा और शिक्षा पद्धति थी, उसका सर्वनाश हो गया।</p>
<p>&#8216;नदी उत्सव का दस्तावेज कहता है कि  इस उत्कृष्ट पहल की कल्पना डॉ सच्चिदानंद जोशी ने लोगों के बीच उनकी पारिस्थितिकी और पर्यावरण के बारे में जागरूकता पैदा करने और संवेदनशील बनाने के लिए की थी। ‘नदी उत्सव’ 2018 में शुरू हुआ था, जिसका उद्घाटन कार्यक्रम गोदावरी नदी के तट पर स्थित महाराष्ट्र के नासिक शहर में किया गया था। दूसरा ‘नदी उत्सव’ कृष्णा नदी के तट पर स्थित आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा शहर में और तीसरा ‘नदी उत्सव ’ गंगा नदी के तट पर स्थित बिहार के मुंगेर शहर में आयोजित किया गया था। </p>
<p>समय बदल रहा था। समाज बदल रहा था। सोच बदल रहे थे। स्वाभाविक है शिक्षा का स्वरूप भी में बदलेगा ही। लेकिन तकलीफ इस बात की है कि आज भी हम उसी कविता पाठ को दोहरा रहे हैं और कहते थक भी नहीं रहे है कि “पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या वैभव शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक” – खासकर तब जब बिहार के ग्रामीण इलाकों में शैक्षिक दर पुरुषों में 57 फीसदी और महिलाओं में 29 फीसदी है। बिहार का यह ग्रामीण इलाका, चाहे गंगा के उस पार का हो या गंगा के इस पार का। मिथिला भी इसी आकंड़े के अधीन है। पूरे प्रदेश में औसतन शैक्षिक दर 69 फीसदी है। इसमें पुरुषों के हिस्से 70 फीसदी और महिलाओं के हिस्से 53 फीसदी है। यानी दोनों के बीच आज भी 17 फीसदी का फासला है और यही 17 फीसदी का फासला, चाहे मिथिला में पंचायत का चुनाव हो, दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, भागलपुर, मुंगेर, आदि शहरों में जिला परिषद् का चुनाव हो या बिहार के विधान सभा और विधान परिषद का चुनाव हो – निर्णायक होता है। ‘वे’ विजय ‘घोषित’ हो जाते हैं और ‘आप’ अपनी किस्मत को कोसते जीवन पर्यन्त ‘हार’ का सामना करते “पग-पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या वैभव शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक” कविता पाठ सुनते रहते हैं।</p>
<figure id="attachment_5124" aria-describedby="caption-attachment-5124" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/6.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-5124" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/6.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/6-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/6-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/6-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/6-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5124" class="wp-caption-text">मधुबनी (बिहार) का एक पोखर फोटो: @अखबारवाला001</figcaption></figure>
<p>इधर &#8216;नदी महोत्सव&#8217; के तीन दिवसीय कार्यक्रम 22 सितंबर को पूर्वाह्न 10.30 बजे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के उमंग कॉन्फ्रेंस हॉल में शुरू होगा।इन तीन दिनों में 18 फिल्में भी दिखाई जाएंगी। इनमें से छह फिल्में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) ने निर्मित की हैं। कठपुतली शो के भाग के रूप में ‘यमुना गाथा’ का प्रदर्शन पूरन भट्ट द्वारा किया जाएगा। इस राष्ट्रीय सेमिनार में पांच शैक्षणिक सत्र होंगे, जिसमें वरिष्ठ विद्वान गोलमेज सम्मेलन में भाग लेंगे। उन्होंने कहा कि तीन दिवसीय कार्यक्रम के दौरान एक पुस्तक मेले का भी आयोजन किया जाएगा, जिसमें विभिन्न प्रकाशन संस्थान नदियों और पर्यावरण से संबंधित अपनी पुस्तकें लाएंगे। कार्यक्रम में दिखाये जाने वाले 18 वृतचित्रों में से पांच को पुरस्कृत करने की भी योजना है। वृतचित्र फिल्म फेस्टिवल के लिए भारत के लगभग सभी राज्यों से फिल्म निर्माताओं ने फिल्में भेजी थीं, जिनमें से 12 को स्क्रीनिंग के लिए चुना गया। </p>
<p>उधर, सबसे महत्वपूर्ब बात तो माँछ (मछली) से सम्बंधित है। माँछ की कथा-व्यथा बनारसी पान जैसी है। बनारस में पान की खेती नहीं होती, लेकिन हज़ारों-हज़ार पान की दुकानें हैं। प्रत्येक चार दुकान या चार मकान के बाद पान की दुकानें मिलेंगी। लगभग सभी किस्मों के पान यहाँ, जगन्नाथ जी, गया और कलकत्ता आदि स्थानों से आते हैं। पान का जितना बड़ा व्यावसायिक केन्द्र बनारस है, शायद उतना बड़ा केन्द्र विश्व का कोई नगर नहीं है। काशी में इसी व्यवसाय के नाम पर दो मुहल्ले बसे हुए हैं। केवल शहर के पान विक्रेता ही नहीं, बल्कि दूसरे शहरों के विक्रेता भी इस समय इस जगह पान खरीदने आते हैं। </p>
<p>बस इतना ही समझ लें कि आज मिथिला में माँछ का उपलब्धता जितना है वह मिथिला के दो फीसदी लोगों की आवश्यकता पूरी नहीं कर सकता। मिथिला के बाज़ारों में जो माँछ आप देख रहे हैं वह सन 1911 से पहले देश की राजधानी जिस प्रदेश में थी, वहां से और आंध्र प्रदेश से आती है। मिथिला में महज ‘ठप्पा’ लगता है। अब सोचिये खाते हैं बंगाल की – आंध्र की मछली और आज भी कविता पाठ किये हैं “पग-पग पोखर माँछ ,,,,” जब इस कविता की रचना की गयी थी माछ, पान और मखान मिथिला की शान, पहचान अवश्य थी। लेकिन समय के साथ मिथिला अपनी इस पहचान को न सिर्फ खो दिया है, बल्कि इन सभी चीजों पर अब दूसरे प्रदेशों द्वारा कब्जा भी हो गया है। इस दृष्टि से मिथिला की पहचान खतरे में है और लोग बाग़ है कि इस खतरे में भी खतरा उठाना चाहते हैं ‘मिथिला को अलग राज्य का दर्जा दो” – गजब है।</p>
<p>हकीकत यह है कि पूरे मिथिला में स्थित पोखरों की संख्या को अगर तनिक बाद में अध्ययन करें तो सिर्फ दरभंगा के महाराजा के साम्राज्य में तक़रीबन 9113 पोखर और तालाब थे। इसमें दरभंगा शहर में ही 350 के आस-पास थे। आज अगर अवकाश है (वैसे मिथिला के लोग वेवजह व्यस्त होते हैं। मोबाईल पर घंटी आज बजायेंगे तो तीसरे दिन हेल्लो ट्यून सुनाई देदा) तो शहर में धूम लें और पोखरों, तालाबों की संख्या, उसकी स्थिति, उसमें दौड़ती मछलियों से, खिलते माखन से, महारों पर लगे पानों की खेती की स्थिति से अवगत हो लें। यकीन मानिए ‘भोकार’ नहीं, ‘चीत्कार’ मारकर रोने लगेंगे, अगर आखों में पानी होगा तो। </p>
<figure id="attachment_5125" aria-describedby="caption-attachment-5125" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/5-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/5-1.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-5125" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/5-1.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/5-1-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/5-1-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/5-1-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/09/5-1-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5125" class="wp-caption-text">मधुबनी (बिहार) का एक पोखर फोटो: @अखबारवाला001</figcaption></figure>
<p>वास्तविकता यह है कि मिथिला की पहचान पर, माँछ पर, पान पर, मखान पर ग्रहण लग गया है और ‘अवसरवादी’ लोगों का हाल यह है कि दिन-रात-सुबह-शाम अपने-अपने हितों के लिए ‘पग-पग पोखर, पान , मखान ..” कविता पाठ करते थक नहीं रहे हैं। इन कविता वाचकों को शायद यह मालूम भी नहीं होगा कि पान की खेती करने के लिए दो-रस मिट्टी की जरूरत होती है। न ज्यादा पानी और न ज्यादा धूप की जरूरत होती। पानी इतना हमेशा चाहिए, ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे। यहां तो लोगों की आखों में नमी नहीं है, बेचारी मिट्टी क्या करे। यही कारण है कि कलकत्तिया पान दरभंगिया बनाकर मिथिला के बाज़ार पर अधिपत्य जमा लिया है, कब्ज़ा कर लिया है यानी ‘सुतल छी आ वियाह होईत अछि’ वाली कहावत सिद्ध हो रही है और कविता वाचक पाठ करते नहीं थक रहे हैं “पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या वैभव शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक” – पूरी मिथिला की सांख्यिकी आप निकालें, यहाँ दरभंगा जिले में रोज तकरीबन 8 टन मछली की खपत है, लेकिन दरभंगा ज़िले से मात्र 500 किलो तक भी मछली बाजार में नहीं पहुंच पाती है। </p>
<p>एक बात गर्दन से नीचे नहीं उतरता वह यह कि जब पोखर और तालाबों की संख्या उत्तरोत्तर शून्य की ओर अग्रसर है, फिर पानी में पैदा होने वाला मखान कहाँ से आ रहा है? मखान को सुपर फूड का दर्जा मिला है। ‘जी-टैग’ भी मिला है। कई तरह के कंपनियां अपने अपने नाम की ब्रांडिंग भी कर लिए हैं। कहा जाता है कि मल्लाह जाति के लोग ही मखाना की खेती करते थे/हैं। आंकड़ों के अनुसार, बिहार में निषाद समाज की करीब 21 उपजातियां हैं। करीब चार दर्जन ‘सरनेम’ लगाए बैठे हैं। प्रदेश की सम्पूर्ण आबादी में करीब एक करोड़ 70 लाख लोग निषाद जाति के हैं। लेकिन सवाल यह है कि जो समाज के लोग, उनका परिवार, बाल-बच्चा बिहार के, तालाबों-पोखरों में पहले गर्दन भर पानी में डूब कर मखान की खेती करने में अपना सौभाग्य समझते थे, आज ठेंघुने और घुटने पर पानी नहीं है उन तालाबों और पोखरों में। स्थानीय लोगों के कूड़ों – कचरों से भरा उन तालाबों और पोखरों पर आज आलीशान भवन और धन अर्जित करने वाले अन्य ‘निर्जीव’ संस्थानें बन गयी है। लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं। रोजी-रोटी-शिक्षा-चिकित्सा की तलाश में लोग पलायन कर रहे हैं और मिथिला के लोग बाग़ हैं की कविता पाठ कर रहे हैं “पग-पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या, वैभव, शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक” । </p>
<p>बहरहाल, मिथिला में स्थित पोखरों, तालाबों की वर्तमान स्थिति को देखते यह कह सकते हैं कि “पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या वैभव शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक” महज एक ढोंग है और इन कहावतों को व्यापारीकरण कर रहे हैं। उसी तरह जिस तरह दिल्ली में नदी महोत्सव का। इतना ही नहीं, अब तो मिथिला के पाग पर भी धावा बोल दिया गया है। ‘पाग’ तो अब रंगबिरंगा हो गया। सफ़ेद पाग कहीं दीखता नहीं। लाल-पाग और हल्दी-रंग नुमा पाग महज अवसर पर ही लोग माथे पर रखते हैं। अब तो ‘पान’, मखान, माँछ, मुस्की, आम, लताम (अमरुद), लीची सभी मिथिला के पाग पर दिखेंगे और राष्ट्रीय ही नहीं, अंतराष्ट्रीय बाजार में मिथिला पेंटिंग के नाम पर बेचे जा रहे हैं, जाएंगे और फिर कहते भी नहीं थकेंगे “पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान…..” ।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b2/three-day-nadi-utsav-in-delhi">दिल्ली के एक कांफ्रेस हॉल में जहाँ कक्ष में किसी किनारे बोतल में पानी रखा मिलेगा, विद्वान-विदुषी-विशेषज्ञ &#8216;नदी उत्सव&#8217; मानते मिलेंगे😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>सोहाग के पावनि के अतिरिक्त महिलाक बुद्धिमताक पावनि अछि बरसैत, सावित्री-सत्यवानक कथा दृष्टान्त अछि (मिथिलाक पावैन-तिहार:1)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[पीताम्बरी देवी]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 May 2022 13:38:22 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[mithila. vatsavitri]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बरसैत हमरा सब के भाग सोहाग के पावनि अछि। ई पावनि जेठ मास के आमावास्या तिथ के मनौल जाईत अछि। ई पावनि नव विवाहित जोड़ी से सुरहात होईत अछि आर जतेक दिन आसोहागिन रहै छि ओतेक दिन तक पुजै छथि। पहिल बेर पवनैतिन के सातटा बेईन, सातटा पनपथिया, पनपथिया में चना के औकरी, दू टा [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/mithilas-festival-vat-savitri">सोहाग के पावनि के अतिरिक्त महिलाक बुद्धिमताक पावनि अछि बरसैत, सावित्री-सत्यवानक कथा दृष्टान्त अछि (मिथिलाक पावैन-तिहार:1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बरसैत हमरा सब के भाग सोहाग के पावनि अछि। ई पावनि जेठ मास के आमावास्या तिथ के मनौल जाईत अछि। ई पावनि नव विवाहित जोड़ी से सुरहात होईत अछि आर जतेक दिन आसोहागिन रहै छि ओतेक दिन तक पुजै छथि। पहिल बेर पवनैतिन के सातटा बेईन, सातटा पनपथिया, पनपथिया में चना के औकरी, दू टा खिरोधनि जाहि मे एकटा में धान के लाबा आर एकटा मे  केराव के दाली । सात टा उरीद दाली के पीस के बर पका के माला बना के खिरोधनि में बान्हल जाय ये। पुरहर पातील माटी के नाग नागिन । साजी में कनिया पूतरा हुनको लेल अलग से एकटा बेईन एकटा पनपथिया।</strong></p>
<p>ओना गौरी नैहर सासुर दूनू ठाम के होइत अछि।सब किछु सासुर से भार अबै छनि यदि कोनो कारण वस नै अबै छनि ते माय ओरियान करै छथिन। पहिले दिन साझ में भगवती के गीत गावि के गौर वनै छथि गौर सिन्दूर हरैद दूभि धान धनि के बनै छथि पान के पात पर नव सरवा में राखल जाई छथि सरवा में सिन्दूर पिठार लगा देल जाईत अछि। साझ कोवर गीत होईत अछि। </p>
<p>आंगन में बर के गाछ वा नै ते वर के डाढ़ी  रोपि के सात टा आरतक पात सात टा नरी सात टा फल लके पवनैतिन नब वस्त्र, लहठी गहना गुड़िया जे पवनैतिन के रहै छनि सबटा पहिर के दुल्हा संग बैस के पावनि पूजै छथि। सिन्दूर दान होईत अछि कनिया पुतरा के से हो सिन्दूर दान होईत अछि। फेर कनिया सब के औकरी के खोईछ दै छथि। आर पांच टा अहिवाति संग बैस के भोजन करै छथि।</p>
<figure id="attachment_4072" aria-describedby="caption-attachment-4072" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3.jpeg" alt="" width="1200" height="1599" class="size-full wp-image-4072" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3.jpeg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3-225x300.jpeg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3-768x1023.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/3-1153x1536.jpeg 1153w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4072" class="wp-caption-text">बरसैत हमरा सब के भाग सोहाग के पावनि अछि।</figcaption></figure>
<p>एहि पावनि के दू टा कथा अछि। एकटा ब्राम्हण के बेटा वला जै में धोविन के बेटी बर द के मर लै छथि आर दूध लावा खाईले नाग अबै छथिन ते खिरोधनि में ल के जांघ तर के दैब रखै छथिन। आर नागिन के बर द के सब भैसुर दियादनि के जिया लै छथिन तखनि नाग के जांघ तर से बाहर करै छथिन।</p>
<p>आर दोसर सावित्री सत्यवान बला। जै में सत्यवान अल्पायु के छथि से बूझितो सावित्री विवाह क लै छथिन आर बर गाछ तर सत्यवान के मोन खराप भेलनि। जखनि यम प्राण ल के बिदा भेलखिन ते सावित्री से हो संग लागद बिदा भेलि। जखनि यम घुरय लेल कहलखिन ते ओ घुरैक लेल तैयार नहि भेलि तखनि यम हुनका वर मांगय कहलनि ओ तीन टा वर मंगलनि &#8211; पहिल: नैहर में सहोदर भाई, सासुर में सासु-ससुर जे आन्हर छलखिन हुनकर आखि आर सौ पुत्र । यम बिना सचनै एवमस्तु कहि देलनि। </p>
<p>फेर सावित्री पाछु लागले रहलखिन ते यम कहलखिन आब किया आबि रहल छि ते सावित्री कहलनि हमर स्वामी के अहा ल जा रहल छि ते हमरा पुत्र के बरदान किया देलौ। आब यम कि करितथि ओ सत्यवान के प्राण लौटा लेलखिन्ह। जखनि सावित्री बर गाछ तर एलि ते सत्यवान बैसल छलखिन आर पूछ लगलखिन अहा कतय चल गेल छलौ। सावित्री बर गाछ के पूजा केलनि आर सत्यवान के संग घर एलि। ओतय सासु ससुर देखय लागल रहथिन। जे राज्यपाट छोड़ी के जंगल में रहै छला ओ राज्य दैले आवि गलनि। </p>
<p>सावित्री सौभाग्यवती भेलि पुत्र वति भेलि धन धान्य से नैहर सासुर भरि गेलनि। तहिया से सब अहिवाति बरसाईत पूजय लगलि। जावत सब अहिवाति रहै छथि सब पूजै छथि बेढ़ दै छथि। एकटा बेईन से बर के होकै छथि नरी आरतक पात से हो बेढ़ दै छथि। कियों कियो अहुना जल फल से पूजा करै छथि। यदि होई छनि ते नव वस्त्र लहठी सिन्दूर टीकली पहिर के पूजा करै छथि। नवकनिया सात टा के सब किछु ल के पूजै छथि।</p>
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		<title>विवाहोपरांत 14-वर्ष तक &#8216;शिक्षा से वनवास&#8217;, &#8216;तीन बच्चों की माँ&#8217;, मिथिला की लड़कियों के लिए इतिहास रची प्रोफ़ेसर सुनीता झा</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/interview/bihar-girl-rewrites-history-in-education</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 12 Dec 2021 12:14:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इंटरव्यू]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[festival]]></category>
		<category><![CDATA[literature]]></category>
		<category><![CDATA[madhubani]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दरभंगा / पटना / नई दिल्ली: आज से दरभंगा स्थित कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय और मिथिला विश्वविद्यालय की धरती पर मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल का चौथा अध्याय प्रारम्भ हो रहा है। साहित्य के इस ऐतिहासिक समारोह में मिथिला के ही नहीं, बिहार प्रान्त के ही नहीं, भारतवर्ष के ही नहीं, वल्कि विश्व से गणमान्य विद्वान और [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/interview/bihar-girl-rewrites-history-in-education">विवाहोपरांत 14-वर्ष तक &#8216;शिक्षा से वनवास&#8217;, &#8216;तीन बच्चों की माँ&#8217;, मिथिला की लड़कियों के लिए इतिहास रची प्रोफ़ेसर सुनीता झा</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा / पटना / नई दिल्ली: आज से दरभंगा स्थित कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय और मिथिला विश्वविद्यालय की धरती पर मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल का चौथा अध्याय प्रारम्भ हो रहा है। साहित्य के इस ऐतिहासिक समारोह में मिथिला के ही नहीं, बिहार प्रान्त के ही नहीं, भारतवर्ष के ही नहीं, वल्कि विश्व से गणमान्य विद्वान और विदुषी पधार रहे हैं। सभी किताब और किताब से जुड़ी बातों पर चर्चा करेंगे। किताबों के पन्नों से आने वाली खुसबू से जीवन संवारने की बातें करेंगे। जिस तरह किताबों के पन्नों को एक धागे से बांधा जाता है, उसी तरह उन पन्नों में लिखे शब्दों से एक मनुष्य अपने जीवन को संवारने में कैसे कसीदाकारी करता है, इस बात पर भी अपना-अपना मंतव्य देंगे, क्योंकि जीवन में शिक्षा का क्या महत्व है यह वही बता सकता है जिसे शिक्षा की भूख अनवरत होती है। </p>
<p>इस मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल के अवसर पर आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम एक ऐसी महिला से आपको रूबरू करने जा रहा है, जो मिथिला ही नहीं, सम्पूर्ण प्रदेश और देश की वैसी सभी महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिनका विवाह भले नवमी कक्षा और उससे भी कम शिक्षित अवस्था में हो गई हो, लेकिन शिक्षा की भूख और अपने बच्चों के विश्वास के कारण 14 वर्ष शिक्षा से दूर रहने के बाद भी &#8211; आज न केवल दो-दो गोल्ड स्वर्ण पदकों से अलंकृत हैं, बल्कि एक सफल गृहणी, एक सफल माँ, एक सफल पत्नी, एक सफल बहु और एक सफल प्राध्यापक भी हैं &#8211; नाम हैं श्रीमती सुनीता झा। </strong></p>
<p>उन दिनों पटना से प्रकाशित <strong>&#8216;आर्यावर्त&#8217;</strong> और <strong>&#8216;दी इण्डियन नेशन&#8217;</strong> अख़बारों की कीमत 12 पैसे और 15 पैसे थे। पटना विश्वविद्यालय प्राध्यापक आवासीय कालोनी का अंतिम छोड़ पटना विधि महाविद्यालय के रास्ते रानी घाट के अंतिम छोड़ पर गंगा के किनारे समाप्त होता था। गंगा के दक्षिणी तट पर बसा पटना शहर के उत्तरी हिस्से में अनंतकाल से बहने वाली गंगा नदी में रानी घाट के इस बिंदु से 75 डिग्री कोण पर ऐतिहासिक गंडक नदी गंगा में मिलकर अपना अस्तित्व समाप्त करती थी। सन 1971 से सन 1975 के प्रारंभिक महीनों तक शायद ही कोई दिवस ऐसा रहा होगा, जिस दिन इस स्थान पर खड़ा होकर माँ गंगा का दर्शन नहीं करता था, साथ ही, मन-ही-मन गंगा की अविरल, निश्छल बहती धाराओं से अपने जीवन के बारे में बातचीत नहीं करता था। स्वयं से बात करता था, स्वयं गंगा नदी के एवज में जबाब भी देता था &#8211; मन ही मन यही प्रश्नोत्तर होता था &#8211; कुछ तो अच्छा होने वाला है। समय परीक्षा ले रहा है। उत्तीर्ण भी होना ही है। </p>
<figure id="attachment_3644" aria-describedby="caption-attachment-3644" style="width: 494px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9.jpeg" alt="" width="494" height="659" class="size-full wp-image-3644" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9.jpeg 494w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-225x300.jpeg 225w" sizes="auto, (max-width: 494px) 100vw, 494px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3644" class="wp-caption-text">नवमी कक्षा वाली सुनीता झा अपने पुत्र के साथ</figcaption></figure>
<p>उस सुबह बारिश हो रही थी। साल था 1971 और महीना जुलाई का। पटना के गाँधी मैदान से आगे, चिड़ियाखाना जाने वाले रास्ते के बीच में, प्रदेश की राजनीती और राजनेता कब करबट ले लेंगे या कब उन्हें दरबाजे से बाहर का रास्ता दिखा दिया जायेगा, यह मिथिला के तांत्रिक और ज्योतिषी भी नहीं बता सकते थे। मोबाईल युग, गूगल युग नहीं होने के बावजूद, पटना और दिल्ली के बीच संवाद की गति बहुत तीब्र थी। आप विश्वास नहीं करेंगे। लेकिन जैसे ही आप आज के गूगल पर बिहार के मुख्यमंत्रियों की सूची देखेंगे, आप हमारी बातों पर ताली ठोक देंगे। &#8221;आया-राम-गया-राम&#8221; का जमाना था। बीच-बीच में बाधा-दौड़ की गति पर रूकावट डालने के लिए &#8216;राष्ट्रपति शाशन&#8217; लगाने का उत्तम प्रावधान था। सन 1971 और 1975 के बीच पांच मुख्यमंत्रियों का आना-जाना और बीच में राष्ट्रपति शासन का लगना, इसका गवाह है। </p>
<p>कभी कर्पूरी ठाकुर कुर्सी पर बैठे थे तो कभी भोला पासवान शास्त्री, कभी केदार पांडेय जी चिपकते थे कुर्सी से तो कभी अब्दुल गफूर साहब। &#8216;स्टॉप गैप&#8217; के लिए बलुआ बाजार वाले मिश्र जी तो तत्पर रहते ही थे। खैर। हम अख़बार वालों के लिए, चाहे अखबार में लिखते हों, या संपादन करते हों, या छापाखाना में काम करते हों, या ज्यादा-गर्मी-बरसात में अखबार बेचते हों; बीसो-उंगलियां घी में और शरीर कराही में रहता था। खूब अखबार छपता था, खूब अखबार बिकता था। गूगल बाबू तो गर्भ में भी अवतरित नहीं हुए थे, इसलिए कुकुरमुत्तों की तरह न तो पत्रकारिता पढ़ने-पढ़ाने, सीखने-सीखाने वाले संस्थानों का जन्म हो रहा था और ना ही गली-कूची में छायाकारों की चहल-कदमी होता था। सड़कों पर जब भी किसी स्कूटर पर, साइकिल पर किसी अख़बार का फोटोग्राफर दीखता था, सभी सम्मान और इज्जत के साथ उन्हें तारते थे। </p>
<p><strong>रानी घाट स्थित पटना विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों के लिए बने दो मंजिले आवासीय भवनों का अंतिम भवन के ऊपरी तल्ले पर दाहिने तरफ मेरे एक बहुमूल्य ग्राहक भी थे, अभिभावक भी थे, शिक्षक भी थे, सम्मानित महामानव भी थे। उनकी नजर में हम सभी भाई-बहनों का, माँ का, बाबूजी का सम्मान अपने उत्कर्ष पर रहता था। वे हमेशा इस बात पर बल देते थे कि मेरे माता-पिता एक आर्थिक बीमारी से ग्रसित हैं और घर के सभी बच्चे इस बीमारी से छुटकारा पाने के लिए कटिबद्ध हैं, प्रतिबद्ध हैं। वे यह भी जानते थे की आर्थिक बीमारी का सिर्फ और सिर्फ एक ही इलाज है &#8211; शिक्षित होना। शिक्षा ग्रहण करना और शिक्षा के माध्यम से अपने-अपने जीवन में आमूल परिवर्तन लाना।</strong> </p>
<figure id="attachment_3645" aria-describedby="caption-attachment-3645" style="width: 717px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-1.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-1.jpeg" alt="" width="717" height="564" class="size-full wp-image-3645" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-1.jpeg 717w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-1-300x236.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 717px) 100vw, 717px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3645" class="wp-caption-text">नवविवाहिता सुनीता झा अपने पति के साथ</figcaption></figure>
<p>उनकी अर्धांगिनी, उनकी दोनों बेटियां, उनके पुत्र, सबों की निगाहों में मेरा, मेरा माता-पिता का, भाई-बहनों का बहुत सम्मान था। स्वाभाविक है हम सभी भी उतने ही सम्मान करते थे, उन लोगों को। जानते हैं वे कौन थे और किसका परिवार था ? <strong>पटना विश्वविद्यालय के मैथिली विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ आनंद मिश्र।</strong> आनंद मिश्र साहेब के यहाँ हम दो अखबार &#8211; <strong>&#8216;आर्यावर्त&#8217;</strong> और <strong>&#8216;दी इण्डियन नेशन&#8217;</strong> देते थे। उन दिनों &#8216;आर्यावर्त&#8217; अखबार का मासिक बिल <strong>तीन रुपये नब्बे पैसे</strong> के आस पास और &#8216;दी इण्डियन नेशन&#8217; का <strong>चार रुपये सत्तर पैसे</strong> होता था। यानी दोनों अखबारों का कुल <strong>आठ रुपये बासठ-चौंसठ पैसे</strong> होता था। प्रत्येक माह के तीन तारीख को मुझे सुबह-सुबह दस रुपये मिल जाते थे। शेष अतिरिक्त पैसे कॉपी-पेन्सिल-कलम-इत्यादि के लिए होता था। वैसे अप्रत्यक्ष रूप से प्रत्येक माह एक रुपये चालीस पैसे अतिरिक्त मिलना इस बात का भी गवाह होता था की उन दिनों आटा मीलों से चालीस पैसे किलो आटा भी मिलता था। </p>
<p>श्री आनंद बाबू की पत्नी श्रीमती सीता देवी, जिन्हें हम सभी बहन कहते थे, मुझे जुलाई के महीने में भी थरथराते देखीं। मेरा पूरा शरीर भींगा था। लेकिन उनका अखबार मैं भींगने नहीं दिया था। वे तत्काल मुझे वस्त्र बदलने को कहीं, ताकि बीमार नहीं हो जाएँ। चौथे-पांचवें दिन, दोपहर को वे मेरे घर दस्तक दी। उन दिनों हम सभी पटना कॉलेज मुख्य द्वार के ठीक सामने ननकू होटल के ऊपर किराये के मकान में रहते थे। माँ का उनसे बहुत मिलन-सम्मेलन होता था। खूब बातें करती थी दोनों। वे हमेशा माँ का हौसला बनाकर रखती थी ताकि वह हिम्मत न हार दे। फिर अपने झोले से एक मैरून रंग का स्वेटर निकाली और मेरे हाथों में देते बोली &#8211; गर्मी में भी अगर मौसम ठीक नहीं रहे तो साथ में इसे रखना। अगर बारिश होती हो, तो पानी रुकने का इंतज़ार किया करना। अखबार दो घंटे बाद भी लोग पढ़ लेंगे, लेकिन तुम्हे स्वस्थ रहना बहुत जरुरी है। फिर मेरे माथे पर हाथ फेरती आशीष दी। मैं स्तब्ध था। निःशब्द था। उनके घर में शायद ही कोई अवसर हुआ होगा जब माँ के साथ जाने के बाद भूखे पेट वापस आये हों।  शायद ही कभी ऐसा अवसर हुआ होगा जब खाने-पीने का सामान, कुछ बना हुआ तो कभी कच्चा, मोटरी में नहीं मिला हो। </p>
<p><strong>आनंद बाबू और सीता बहन हमेशा यही कहती थी &#8211; हिम्मत नहीं हारना जीवन में । तुम समय को पछाड़ोगे, आज लिखबा लो। जीवन में तुम बहुत आगे जाओगे, आज लिख लो। अनेकानेक बातें हैं, सैकड़ों दृष्टान्त हैं जहाँ मैं उस परिवार के प्रति एहसानमंद हैं। उन बातों को शब्दबद्ध नहीं कर सकते हैं हम। </strong></p>
<p>दो दिन पहले आनंद बाबू &#8211; सीता बहन के बड़ी बेटी की तस्वीर देखा। मेरे पास उनका कोई संपर्क नहीं था। कोई चौदह वर्ष की आयु में सन 1975 में उसकी शादी हो गई थी। उस समय वह नवमी कक्षा की छात्रा थी पटना के बांकीपुर बालिका विद्यालय में। उनकी छोटी बहन भी उसी विद्यालय की छात्रा थी। बाबूजी की मृत्यु (1992) में अंतिम बार उन लोगों से मुलाकात हुई थी। मैं बाबूजी के देहावसान से कोई चार वर्ष पूर्व रोजी-रोटी की तलाश में, अपनी पत्रकारिता को और मजबूत करने के इरादे से पटना की भूमि छोड़ दिया था और दक्षिण बिहार के रास्ते पश्चिम बंगाल की राजधानी कलकत्ता से प्रकाशित दी टेलीग्राफ / संडे पत्रिका के रास्ते दिल्ली की ओर उन्मुख हो रहा था। मैं तो महज एक अदना सा मनुष्य था। ब्रह्माण्ड रूपी पिता का हाथ भी सर से उठ चुका था &#8211; लेकिन अपनी मेहनत को पूंजी मानकर दिल्ली की ओर उन्मुख हो गया था। </p>
<figure id="attachment_3646" aria-describedby="caption-attachment-3646" style="width: 710px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/6-1.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/6-1.jpeg" alt="" width="710" height="585" class="size-full wp-image-3646" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/6-1.jpeg 710w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/6-1-300x247.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 710px) 100vw, 710px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3646" class="wp-caption-text">प्रोफ़ेसर आनंद मिश्र और उनकी पत्नी श्रीमती सीता देवी</figcaption></figure>
<p>फिर अपने सगे-सम्बन्धियों से, शुभचिंतकों से आनंद बाबू के बड़ी बेटी &#8211; श्रीमती सुनीता झा &#8211; का नंबर प्राप्त किया। फिर श्रीमती पुनिता झा से भी बात किये। कुछ शब्दों के बाद ही हम सभी पचास वर्ष पूर्व रानी घाट के उसी आवास के बाहर, गंगा की ओर मजबूत इरादों के साथ पुनः देखने लगे, अपने-अपने कार्यों को अपनी-अपनी नज़रों से आंकने लगे। खुद का पीठ थपथपाने लगे। खुद हंसने लगे  और अपने-अपने दिवंगत माता-पिता-आनंद बाबू, सीता बहन और उन दिनों के सभी लोगों को याद कर अन्तःमन से उन्हें नमन करने लगे &#8211; क्योंकि निःसंदेह मेहनत हमारी थी, लेकिन शुभकामनाएं उन सबों का था। बाबूजी कहते भी थे &#8211; जीवन में महिलाओं का और बच्चों का आशीष और शुभकामनाएं बटोरने में कभी किल्लत नहीं करना। जीवन में उत्कर्ष पर रहेंगे। </p>
<p><strong>बातचीत के दौरान जब <strong>श्रीमती सुनीता झा</strong> अपने बारे में बतायी, मैं हतप्रत रह गया। मैं स्वयं को उसके सामने <strong>&#8216;बौना&#8217;</strong> समझने लगा। यह बात उसे बताया नहीं, लेकिन मन ही मन उसके चरणों का वंदन किया और तय कर लिया यह बात लिखूंगा ताकि आज ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए, खासकर मिथिला की बालिकाओं के लिए, जिनकी शादी कम उम्र में हो जाती है &#8211; सुनीता झा, उनकी सोच, उनकी मेहनत और उनके ससुराल के लोगों का सहयोग, उनके बच्चों का अपनी माँ के प्रति शैक्षिक सम्मान एक मील का पथ्थर है। श्रीमती सुनीता झा अपनी मेहनत से यह सिद्ध कर दिया कि एक विवाहित महिला भी, बच्चों की माँ भी &#8211; अगर शिक्षित होना चाहे, पढ़ना चाहे, आगे निकलना चाहे &#8211; वह कर सकती है, क्योंकि उन्होंने तीन बच्चों की माँ होने के बाबजूद, ससुराल में वृद्ध सास-ससुर की पुतोहु होने के बाद भी शिक्षा के प्रति अपनी भूख को शांत नहीं होने दी। इतना ही नहीं, इन शब्दों के साथ मैं श्रीमती सुनीता झा के तीनों पुत्रों &#8211; श्री कुमुद जी, श्री प्रवीण जी और श्री प्रतिक जी &#8211; को धन्यवाद देता हूँ कि वे सभी अपनी नवमी कक्षा पास माँ को, जो कोई चौदह वर्ष किताब से दूर रही, किताबों के प्रति आकर्षण जागृत कर, उसे माध्यमिक, इंटर, स्नातक, स्नातकोत्तर, गोल्ड मेडलिस्ट ही नहीं बनाया, बल्कि मिथिला विश्वविद्यालय में मैथिली विषय का प्राध्यापक भी बना दिया। </strong></p>
<p><strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> <strong>मधुबनी लिटरेचर फेस्टिवल</strong> के चौथे श्रृंखला के अवसर पर जो दरभंगा स्थित मिथिला विश्वविद्यालय &#8211; कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय प्रांगण में होने जा रहा है, श्रीमती सुनीता झा से बातचीत किया। उनकी बातों को सुनकर, उनके पति श्री कलानाथ झा &#8216;जीवन&#8217; की बातों को सुनकर श्रीमती सुनीता झा मिथिला की सैकड़ों, हज़ारों, लाखों महिलाओं के लिए एक दृष्टान्त मानता हूँ &#8211; जो विवाहोपरांत भी, बच्चे होने के बाद भी, पढ़ने की भूख को मरने नहीं दी। </p>
<p><strong>श्रीमती सुनीता झा</strong> कहती हैं: सन 1975 में मैं नवमी कक्षा में पटना के बांकीपुर बालिका उच्च विद्यालय में पढ़ती थी। मिथिला में बेटियों की शादी को लेकर जो सोच आज से पचास वर्ष पहले थी, आज &#8216;कुछ परिवर्तन के अलावे&#8217;, आम तौर पर वही है। अपवाद छोड़कर, विवाह के मामले में, आज भी लड़कियां अपने माता-पिता के निर्णयों का सम्मान करती हैं।  प्रत्येक माता-पिता यह चाहते हैं कि उनकी बेटी का विवाह किसी अच्छे घर में, संस्कारित घर में हो जहाँ न केवल उसे सम्मान मिले, बल्कि दो परिवारों के बीच रिश्तों का डोर और भी मजबूत हो। आज जो भी महिलाएं ससुराल में किसी भी नवविवाहिता की सास होती हैं, वह कल उसी स्थान पर, उसी घर में एक नवविवाहिता रही थी। स्वाभाविक है कि इन दो पीढ़ियों के बीच सास-बहु का सम्बन्ध, उनकी मानसिकता, उनकी सोच में जब तक पूर्णतया समन्वयन नहीं होगा, न लड़की सुरक्षित रहेगी और ना ही परिवार शांत रह पायेगा। इन तमाम संबंधों में लड़की के मायके और वर पक्ष के परिवारों का महत्वपूर्ण स्थान होता है। अनावश्यक रूप से लड़की के ससुराल में उसके माता-पिता का हस्तक्षेप होना, परिवार को अस्थिर कर देता है। </p>
<p>श्रीमती सुनीता झा के अनुसार: &#8220;मैं बहुत भाग्यशाली थी। मेरे पिता न केवल एक बेहतरीन शिक्षक थे, न केवल अपने विषय के मूर्धन्य हस्ताक्षर थे, न केवल समाज के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे; वे एक बेहतरीन इंसान भी थे और अपने दायरे को, अपनी जवाबदेही को बखूबी जानते थे। जब मेरी शादी की बात हुई, मेरे पिता बहुत ही स्नेह के साथ मुझसे कहे कि ऐसा परिवार नहीं मिलेगा। अल्प आयु में तुम्हारी शादी होने जा रही है, लेकिन शिक्षा के प्रति अपनी भूख कभी कम नहीं होने देना। समय आने पर तुम खुद-ब-खुद शैक्षिक धारा में प्रवेश पा जाओगी, यह पिता का आशीष है। कहते हैं प्रत्येक बच्चे का पिता उस बच्चे और परिवार के लिए एक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड होता है। मेरे लिए मेरे मायके में और ससुराल में दोनों पिता &#8211; ब्रह्माण्ड ही थे।&#8221;</p>
<figure id="attachment_3647" aria-describedby="caption-attachment-3647" style="width: 706px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/a4cce034-200d-49e3-9acf-7b17140fdc61.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/a4cce034-200d-49e3-9acf-7b17140fdc61.jpg" alt="" width="706" height="450" class="size-full wp-image-3647" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/a4cce034-200d-49e3-9acf-7b17140fdc61.jpg 706w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/a4cce034-200d-49e3-9acf-7b17140fdc61-300x191.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 706px) 100vw, 706px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3647" class="wp-caption-text">प्रोफ़ेसर आनंद मिश्र और श्री रमानाथ झा &#8216;रमणजी&#8217;</figcaption></figure>
<p>सुनीता झा आगे कहती हैं: &#8220;विवाहोपरांत जब ससुराल आई तो उस उम्र में सामाजिक और पारिवारिक जवाबदेही सर पर आई। हमारे लिए ससुराल मेरा परिवार था। यहाँ माता-पिता (सास-ससुर) थे। नया समाज था। नए कुटुंब थे। मेरे ससुर &#8216;शिक्षा के पक्षधर&#8217; थे। उन्हें इस बात की ग्लानि थी कि विवाह के कारण मेरी शिक्षा बाधित हो गई है। वे हमेशा चाहते थे कि मैं अपनी शिक्षा को आगे ले चलूँ। लेकिन शायद समय कुछ और चाहता था। उत्तरोत्तर मेरे तीन बच्चे हुए। समय बीत रहा था। यह नहीं कहूँगी कि शिक्षा के प्रति भूख समाप्त हो रही थी, लेकिन घर-परिवार-बच्चे में कुछ इस कदर उलझती जा रही थी कि पढ़ने के अभिलाषा के प्रति लालसा कमजोर होने लगी थी। मेरे ससुर हमेशा चाहते थे कि मैं पढूं। वे घर में विभिन्न प्रकार के उपदेश दिया करते थे। संस्कृत के, मैथिली साहित्य के अनेकानेक दृष्टांतों को उद्धृत करते थे। मैं भी जानती थी कि वे सभी बातें इसलिए कह रहे हैं ताकि शिक्षा के प्रति लालसा कमजोर नहीं हो। वे सभी चाहते थे कि मैं &#8216;उत्तर मध्यमा&#8217; से शिक्षा को आगे बढ़ाऊं। लेकिन मैं ऐसा नहीं करना चाहती थी। मैं जानती थी कि &#8216;उत्तर मध्यमा&#8217; से शिक्षा प्राप्त करने में मैं अपनी नजर में वह सम्मान नहीं प्राप्त कर पाउंगीं जो मैं चाहती थी।&#8221; </p>
<figure id="attachment_3650" aria-describedby="caption-attachment-3650" style="width: 707px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/1-1.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/1-1.jpeg" alt="" width="707" height="680" class="size-full wp-image-3650" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/1-1.jpeg 707w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/1-1-300x289.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/1-1-24x24.jpeg 24w" sizes="auto, (max-width: 707px) 100vw, 707px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3650" class="wp-caption-text">प्रोफ़ेसर सुनीता झा अपने पति, माता-पिता और बच्चों के साथ</figcaption></figure>
<p>&#8220;कुछ पल रुक कर, एक लम्बी उच्छ्वास लेती&#8221;, सुनीता झा कहती हैं: &#8220;मेरा मझला बेटा बहुत बदमाश था बचपन में। पढ़ने में अब्बल तो था, लेकिन वह सिर्फ अपने पिता की भाषा को समझता था। इसलिए जब पढ़ने-पढ़ाने की बात होती थी, उसके पिता ही सामने होते थे। लेकिन उनके साथ भी समय की किल्लत थी। वे नौकरी करते थे। एक दिन पढ़ाने के लिए मैं उसे लेकर बैठी। बदलते वक्त में शिक्षा के क्षेत्र में बहुत परिवर्तन हुए हैं। पढ़ते-पढ़ाते समय एक आम बच्चे की तरह वह कहता है कि उस विषय को मैं नहीं जानती, मैं नहीं पढ़ा पाउंगीं। जिस समय उसके जिह्वा से यह शब्द निकला था, मुझे ऐसा लगा जैसे साक्षात् माँ सरस्वती उससे यह शब्द कह रही है। शायद मेरी पढाई का बीजारोपण उन्हीं शब्दों से होना था। हम दोनों माँ-बेटा एक-दूसरे को एक नजर देखे। मेरे चेहरे को वह बालक पढ़ लिया। शायद वह समझ गया कि उसकी बात मुझे अच्छा नहीं लगा, लेकिन मैं उसे कैसे कहें कि तुमने हमारे जीवन का एक अर्थ दे दिया है।&#8221;</p>
<p>सुनीता झा फिर कहती हैं: &#8220;घर में अन्य लोग भी उपस्थित थे। तभी मेरे ससुर और पति दोनों एक साथ कहते हैं &#8211; तुम भी क्यों न पढ़ती हो? अब तो बच्चे के साथ तुम भी शिक्षा ग्रहण कर सकती हो। मिथिला में, या यूँ कहें की बिहार में, औसतन एक लाख में शायद दस ही महिलाएं ऐसी होंगी जिन्हे विवाहोपरांत, बच्चे होने के बाद भी, ससुराल के लोग, पति, सास-ससुर आगे पढ़ने में सहायक होते हैं। मैं यहाँ एक बात और कहना चाहूंगी कि लड़कियों को भी विवाहोपरांत, बच्चे होने के बाद भी शिक्षा की ललक नहीं रहती है। महिलाएं भी विवाहोपरांत पढ़ने की जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहती हैं। शायद इन शब्दों को पढ़कर आज की शादीशुदा महिलाएं मेरी बात को स्वीकार नहीं करेंगी, या फिर मेरी आलोचना करेंगी; लेकिन हज़ारों-लाखों मैथिला की लड़कियों में, जिन्हे मैं जानती हूँ, मैं अकेली हूँ जो विवाहोपरांत नवमी कक्षा से आगे बढ़कर, आगे पढ़कर आज प्राध्यापक हूँ, अपने पैरों पर खड़ी हूँ। </p>
<figure id="attachment_3648" aria-describedby="caption-attachment-3648" style="width: 1024px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/72141fab-61b6-4504-ae39-3c2ee6a83fa3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/72141fab-61b6-4504-ae39-3c2ee6a83fa3.jpg" alt="" width="1024" height="769" class="size-full wp-image-3648" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/72141fab-61b6-4504-ae39-3c2ee6a83fa3.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/72141fab-61b6-4504-ae39-3c2ee6a83fa3-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/72141fab-61b6-4504-ae39-3c2ee6a83fa3-768x577.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3648" class="wp-caption-text">प्रोफ़ेसर सुनीता झा अपने पति परिवार के अन्य सदस्यों के साथ</figcaption></figure>
<p>जोड़ों से ठहाका लगाती सुनीता झा फिर कहती हैं: &#8220;जब मैं इंटर में पढ़ती थी, मेरा बेटा स्नातक (विज्ञान) का छात्र था। अक्सरहां, हम दोनों एक साथ कालेज जाते थे। मैं पहले आ जाती थी वापस, जबकि वह कॉलेज में ही रहता था अन्य कक्षाओं के लिए। एक दिन उसके कुछ दोस्त उससे पूछ बैठे कि जो महिला तुम्हे साथ रहती है, क्या वह तुम्हारी बहन या कोई रिश्तेदार है? मेरा बेटा जोर से हंसा और फिर अपने दोस्तों को कहा: &#8220;वह मेरी माँ&#8221; है और वह अपनी पढ़ाई पूरी कर रही है। उसके सभी दोस्त पहले तो आश्चर्चकित हुए, फिर मेरे बेटे से कहे कि ऐसी माँ वह पहली बार देखा हैं। कितनी अच्छी बात है कि माँ इस उम्र में भी पढ़ना चाहती है, अपनी पढाई पूरी करनी चाहती है। आज हमारे समाज में ऐसी माँ कहाँ मिलती है। स्नातक (प्रतिष्ठा) में मैथिली विषय में बेहतरीन अंक प्राप्त हुए। फिर उसी विषय में स्नातकोत्तर की। अव्वल परीक्षा फल हुआ। फिर पी.एचडी की और &#8220;नेट&#8221; में अव्वल आयी। जब पीएचडी कर रही थी, उस समय विषय को लेकर मन में अनेक अनेक प्रश्नोत्तर उठ रहा था। लेकिन मैं विषय कुछ अलग चुनी &#8211; मैथिली साहित्य में कला लेखिका का योगदान। सबों को बहुत पसंद आया।&#8221;</p>
<p>अपनी बातों को आगे बढ़ाते श्रीमती सुनीता झा कहती है: पढ़ना मेरे लिए बहुत आवश्यक था। पढ़ने से हम न केवल उस विषय में ज्ञान प्राप्त करते हैं, बल्कि जब आप-हम किसी दो विद्वद्जन या विदुषी के सामने खड़े होते हैं तो सामने वाले की सोच में बदलाव आता है। आम तौर पर महिलाओं को &#8216;गृहणी&#8221; से ही सम्बोधन मिलता है। मैं भी एक गृहणी ही थी, लेकिन तनिक हटकर। घर सभी सदस्यों की नजर में मैं मेहनतकश महिला थी। जो ठान ली थी, उसे पूरा भी की। इससे हमारे प्रति घर के प्रत्येक सदस्यों की सोच में सकारात्मक बदलाव आया। उससे भी अधिक मैं खुद अपनी नजर में अव्वल आई। आईने  के सामने खड़ी होकर खुद को देख सकती थी। नौकरी करना मेरे लिए जरूरी नहीं थी। पति बेहतरीन नौकरी में थे। लेकिन समय कुछ और चाहता था। बिहार में विगत दो दशक से अधिक समय से किसी भी सरकारी कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में अथवा विश्वविद्यालय से संबद्धता प्राप्त कॉलेजों में प्राध्यापकों की नियुक्ति नहीं हुई थी। कोई विज्ञापन नहीं निकल रहा था। अचानक बिहार लोक सेवा आयोग प्राध्यापकों की नियुक्ति की घोषणा की। साल था 2016 और नियुक्ति लिखित परीक्षा और अन्तर्वीक्षा के आधार पर थी। मेरे पति, बच्चे, ससुराल के सभी लोग मुझे परीक्षा में बैठने को प्रेरित किये। एक और परीक्षा दी और अव्वल आ गयी। फिर क्या था नवमी कक्षा पास सुनीता झा मिथिला विश्वविद्यालय की एक प्राध्यापिका हो गई। </p>
<figure id="attachment_3649" aria-describedby="caption-attachment-3649" style="width: 577px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-1.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-1.jpeg" alt="" width="577" height="753" class="size-full wp-image-3649" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-1.jpeg 577w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-1-230x300.jpeg 230w" sizes="auto, (max-width: 577px) 100vw, 577px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3649" class="wp-caption-text">प्रोफ़ेसर सुनीता झा अपने पति और माता-पिता के साथ</figcaption></figure>
<p><strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> जब उनसे पूछा कि जिस विषय में आप पढ़ाई की और प्राध्यापक बनी, उसी विषय में आपके पिता पटना विश्वविद्यालय के हस्ताक्षर थे। क्या लोगों ने यह तो नहीं कहा कि पिता के बल पर आगे पढ़ी है, नौकरी प्राप्त की है? श्रीमती सुनीता झा जोर से पहले हंसी और फिर आँचल की खूंट से अपनी आंखों को पोछती कहती है: &#8220;समाज में ऐसे लोगों की किल्लत नहीं है जो इस तरह की बातें सोचते हों। लेकिन जिस दिन नौकरी की चिठ्ठी मेरे हाथों में थी, उस दिन से कोई 108 माह पूर्व, यानी 2007 में ही मेरे पिता महादेव के शरण में अपनी उपस्थिति दर्ज कर दिए थे। मैं जो कुछ भी हासिल की वह मेरी खुद की मेहनत, मेरी खुद का संकल्प, नैहर और ससुराल वालों की शुभकामनाओं का परिणाम है। आज मेरे माता-पिता, भाई, मेरे सास-ससुर-इष्ट-अपेक्षित, सम्बन्धी जो भी इस पृथ्वी पर नहीं है, वे सभी स्वर्ग से मुझे जरूर देखते होंगे और फक्र करते होंगे। </p>
<p>सुनीता झा से जब उनके परिवार के बारे में पूछा तो वे कहती हैं: पति का साथ हमेशा रहा। कुछ दिन पहले मधुबनी ग्रामीण बैंक से शाखा प्रबंधक के रूप में अवकाश प्राप्त किये हैं। मेरे तीन पुत्र हैं। कुमुद, एक सॉफ्टवेयर इंजिनियर है और यूनाइटेड बैंक ऑफ़ स्विट्जरलैंड में कार्यरत है। दूसरा, प्रवीण, जो मेरी पुनःशिक्षा के सूत्रधार है, वह नॉर्वे में रेडियोलॉजिस्ट है और तीसरा प्रतीक, आईआईटी, रुड़की में एसोसिएट प्रोफ़ेसर (केमिकल इंजीनियरिंग) है। आज जब अपने बचपन के जीवन को पटना के रानीघाट स्थित गंगा के किनारे से आंकती हूँ तो अपने ऊपर फक्र महसूस करती हूँ। गंगा की अविरल धारा को कोई दो दशक तक रानीघाट के उस दो-मंजिले मकान से देखती थी। मैं भी समय की धारा में बहती चली गयी, लेकिन किनारे (शिक्षा) का साथ कभी नहीं छोड़ी &#8211; न मन से और ना ही आत्मा से। परिणाम आज सामने हैं। </p>
<p><strong>(इस आलेख के लेखक शिवनाथ झा को आप इन लिंको पर देख सकते हैं। https://www.facebook.com/aryavartaindianationpatna / https://www.facebook.com/savemartyrsfamilies</strong></p>
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