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	<title>farming Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>चलें खेत की ओर: &#8216;ऋषि कृषि&#8217; ही भारत के 640930+ गावों से होने वाले प्रवास को रोक सकता है, लोगों को खुशहाल बना सकता है&#8217; (भाग-5)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/agriculture/only-rishi-krishi-can-stop-migration-of-labours-from-indias-villages</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 18 Jul 2023 02:47:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कृषि]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पूर्णिया।/ पटना / नई दिल्ली : भारत का &#8216;किसान&#8217; समाज का एक &#8216;शोषित वर्ग&#8217; है &#8211; यह बात कटु सत्य है। किसानों के नाम पर, खेती के नाम पर, पैदावारों के नाम पर देश में जिस तरह की &#8216;राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक&#8217; पहलुओं की राजनीति होती है, वह दिखने में भले &#8216;आकर्षक&#8217; दिखे और उसका &#8216;लघु [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पूर्णिया।/ पटना / नई दिल्ली :  भारत का &#8216;किसान&#8217; समाज का एक &#8216;शोषित वर्ग&#8217; है &#8211; यह बात कटु सत्य है। किसानों के नाम पर, खेती के नाम पर, पैदावारों के नाम पर देश में जिस तरह की &#8216;राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक&#8217; पहलुओं की राजनीति होती है, वह दिखने में भले &#8216;आकर्षक&#8217; दिखे और उसका &#8216;लघु गामी प्रभाव&#8217; भी नेताओं के पक्ष में हो; लेकिन इसका दूरगामी प्रभाव बहुत &#8216;भयंकर&#8217; होता है, हो रहा है &#8211; यह सर्वविदित है। अन्यथा, 21 फीसदी क्षेत्रों में वन, 24 फीसदी क्षेत्रों में बंजर भूमि और 51 फ़ीसदी क्षेत्रों में खेती होने के वावजूद आज भारत का किसान &#8216;त्राहिमाम&#8217; का जीवन नहीं जीता। कुछ तो है जो &#8216;गलत&#8217; है और भारत के किसानों के प्रति &#8216;सहोदर&#8217; नहीं है। </strong></p>
<p>लेकिन शोषित वर्ग होने का अर्थ यह नहीं है कि हम अपनी किस्मत और व्यवस्था पर, व्यवस्था से जुड़े लोगों पर, अपने प्रति अत्याचारों पर दुःख करें, आंसू बहाएं। आज जिस तरह विज्ञान में परिवर्तन हो रहा है, विज्ञान आधुनिकता से ओतप्रोत हो रहा है; किसानों को प्रकृति की ओर उन्मुख होना चाहिए, प्राकृतिक कृषि की ओर अग्रसर होना चाहिए। कृषि के क्षेत्र में खाद से लेकर खाद्यान तक माफियाओं के बर्चस्व को तोड़ने के लिए अपना बाज़ार खुद बनाना चाहिए। खाद, रसायन आदि के निर्माता आज जिस कदर भारतीय कृषि व्यवस्था पर अपना अधिपत्य जमाये बैठे हैं, उसे तोड़ने का भरपूर प्रयास करनी चाहिए। क्योंकि देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर मोदी भी यही चाहते हैं कि देश का कृषक खुद बोए, खुद फसल उगाये, खुद काटे और खुद बाजार में बेचे &#8211; बिना किसी बिचौलिए के। कार्य कठिन जरूर है, लेकिन दशकों पुरानी त्रादसी की बेड़ियों को तोड़ने के लिए &#8216;आंसू बहाना तो रोकना होगा और इसका एकमात्र उत्तर है &#8211; प्राकृतिक कृषि, ऋषि कृषि । </p>
<figure id="attachment_5005" aria-describedby="caption-attachment-5005" style="width: 2032px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar2.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar2.jpg" alt="" width="2032" height="1395" class="size-full wp-image-5005" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar2.jpg 2032w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar2-300x206.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar2-1024x703.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar2-768x527.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar2-1536x1054.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar2-100x70.jpg 100w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar2-218x150.jpg 218w" sizes="(max-width: 2032px) 100vw, 2032px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5005" class="wp-caption-text">हमें श्रमिकों को, खासकर महिला श्रमिकों को, अपने परिवार का हिस्सा समझना होगा</figcaption></figure>
<p>बिहार में प्राकृतिक कृषि के अग्रणी <strong>&#8216;समर शैल प्राकृतिक फार्म&#8217;</strong> के संस्थापक<strong> श्री हिमकर मिश्रा</strong> का कहना है की &#8216;देश का किसान सबसे शोषित वर्ग में जरूर है, लेकिन आज की इस व्यवस्था में जहाँ उंगलियों पर विश्व के दरवाजे खुलते हैं, चाहे ज्ञान का हो, विज्ञान का हो, विचार का हो, व्यापार का हो; किसानों को रोना अब शोभा नहीं देता। आज समय आ गया है कि देश का प्रत्येक किसान अपने-अपने सामर्थ भर, अपनी-अपनी उपलब्ध भूमि पर प्राकृतिक कृषि करें। प्राकृतिक खेती कृषि के क्षेत्र में दशकों से आ रही त्राहिमाम स्थिति को सुखमय बना देगा। यह मेरा विश्वास है। यही कारण है कि आज विश्व के कोने-कोने में शिक्षित पलायित लोग प्राकृतिक कृषि करने अपने देश वापस आ रहे हैं।&#8221; श्री मिश्रा स्वयं भारत के एक श्रेष्ठतम कॉर्पोरेट घराने को छोड़कर आज ऋषि कृषि कर रहे हैं। आज उनका प्राकृतिक फार्म की चर्चा न केवल भारत, बल्कि विश्व के कोने-कोने में हो रही है। </p>
<p>मिश्रा का कहना है कि प्राकृतिक कृषि गाँव से पलायित होने वाले लोगों को, श्रमिकों को रोकने में बहुत मददगार होगा। अगर हम संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग के जनसंख्या प्रभाग द्वारा जारी इंटरनेशनल माइग्रेंट स्टॉक 2019 के एक रिपोर्ट को देखें तो पूरे विश्व में तक़रीबन 17.5 मिलियन लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रवास करते हैं। श्री मिश्रा कहते हैं कि &#8220;आपको जानकार आश्चर्य होगा कि इस आंकड़े में भारत अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों के शीर्ष स्रोत के रूप में उभरा है। यानी पूरे विश्व की जो प्रवासी आबादी है उसमें भारत का योगदान तक़रीबन 6.4 प्रतिशत है।&#8221;</p>
<figure id="attachment_5006" aria-describedby="caption-attachment-5006" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/3-foto.jpg"><img decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/3-foto.jpg" alt="" width="2048" height="1536" class="size-full wp-image-5006" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/3-foto.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/3-foto-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/3-foto-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/3-foto-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/3-foto-1536x1152.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5006" class="wp-caption-text">समर शैल प्राकृतिक फार्म के श्रमिकों के बीच हिमकर मिश्रा</figcaption></figure>
<p><strong>श्री मिश्रा आगे कहते हैं: &#8220;यह तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर की बात हुई। अगर घरेलु प्रवास पर नजर डालें तो आज भारत के कुल 640930 गाँव की स्थिति ऐसी है कि गाँव में एक ओर जहाँ &#8216;वृद्धों&#8217; का भरमार है, वहीँ &#8216;कृषि अथवा घरेलु कार्यों&#8217; को करने के लिए &#8216;लोग&#8217; नहीं हैं। यहाँ तक कि कृषि कार्यों में पहले जहाँ &#8216;पुरुषों&#8217; का &#8216;बोलबाला&#8217; था, आज &#8216;महिलाएं&#8217; आ रही हैं। वैसे अपने परिवार को बेहतर जीवन प्रदान करने के लिए पुरुषों के सामने कोई विकल्प नहीं है, और वे नौकरी, रोजी रोटी की तलाश में अपने-अपने गाँव की सीमाओं को लांघकर करीब 3000 शहरों की ओर उन्मुख हो रहे हैं। लेकिन प्राकृतिक कृषि इसे रोक सकती है।&#8221;</strong></p>
<p>बहरहाल, अगर हम पिछले वर्षों की जनगणना के आंकड़ों को देखते हैं, खासकर 2001 और 2011 की, जो 2000 के दशक की शुरुआत में आर्थिक विकास द्वारा लाए गए प्रवासन पैटर्न में बदलाव का संकेत देते हैं। काम के लिए शहरी क्षेत्रों में प्रवास की वार्षिक वृद्धि दर 1990 से 2001 (2.4% प्रति वर्ष) की तुलना में 2001 और 2011 के बीच दोगुनी (4.5% प्रति वर्ष) हो गई है।भारतीय रेलवे के आंकड़ों के आधार पर आंतरिक श्रमिक प्रवासियों पर सबसे पहला सांख्यिकी, वर्ष 2011 और 2016 के बीच हर साल राज्यों के बीच औसतन 9 मिलियन लोगों का प्रवाह दर्ज करता है। वैसे भारत सरकार के द्वारा प्रवासन की निरंतर समस्याओं के समाधान के लिए 2015 में &#8220;प्रवासन पर कार्य समूह&#8221; का गठन किया था। लेकिन उस समूह का क्या हश्र हुआ, यह कोई नहीं जानता। </p>
<figure id="attachment_5007" aria-describedby="caption-attachment-5007" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/3-1-1.jpg"><img decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/3-1-1.jpg" alt="" width="2048" height="1062" class="size-full wp-image-5007" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/3-1-1.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/3-1-1-300x156.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/3-1-1-1024x531.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/3-1-1-768x398.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/3-1-1-1536x797.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5007" class="wp-caption-text"><br />विश्वास और बंधन &#8211; समर शैल प्राकृतिक फार्म के श्री हिमकर मिश्रा और महिला श्रमिक</figcaption></figure>
<p>कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि 2011 का एनएसओ आंकड़ा महिला प्रवासियों की उच्च दर की रिपोर्ट करता है, जो पुरुष प्रवासियों द्वारा गठित 10.7% की तुलना में कुल आंतरिक प्रवासियों का 47.9% है। आँकड़े बताते हैं कि कुल प्रवासन के 71% के पीछे का कारण &#8216;विवाह&#8217; है, जिसमें महिलाएँ 86.8% हैं। यह &#8216;स्वाभाविक&#8217; भी है। आम तौर पर रोजी-रोटी और नियोजन की तलाश में जब &#8216;युवक&#8217; / पुरुष वर्ग गाँव से बाहर निकलते हैं, विवाहोपरांत अपनी पत्नियों को भी उसी स्थान पर ले जाते हैं, जहाँ वे हैं। यह आम तौर पर सड़क पर रिक्सा-रेडी चलने वालों से लेकर सरकार, गैर-सरकारी-अर्ध-सरकारी-निजी सभी क्षेत्रों में कार्य करने वाले पुरुषों पर लौ होता है। शेष जो महिलाएं गाँव में रहती है &#8211; वृद्ध, बच्चे और विधवा &#8211; वे कृषि क्षेत्र में कार्य करते हैं। </p>
<p><strong>श्री मिश्रा कहते हैं: &#8220;कृषि में महिलाकरण में वृद्धि मुख्य रूप से पुरुषों द्वारा बढ़ते ग्रामीण-शहरी प्रवास, महिला-प्रमुख परिवारों के बढ़ने और नकदी फसलों के उत्पादन में वृद्धि के कारण है, जो प्रकृति में श्रम प्रधान हैं। महिलाएं कृषि और गैर-कृषि गतिविधियों दोनों में महत्वपूर्ण कार्य करती हैं और इस क्षेत्र में उनकी भागीदारी बढ़ रही है। देश में असंतुलित होती इस व्यवस्था का एकमात्र निदान है &#8216;प्राकृतिक कृषि&#8217; जो न केवल देश के लोगों को, पुरुषों को, महिलाओं को उनके श्रमों से अधिक लाभ देगा, बल्कि देश को भी उन्नतशील बनाएगा। यह अलग बात है कि भारत का लगभग 80 फीसदी से अधिक किसान आज भी महान कृषि दार्शनिक मासानोबू फुकूओका को या उनके ऊपर लिखी पुस्तक &#8216;द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन&#8217; का नाम भी सुना होगा।&#8221; </strong></p>
<figure id="attachment_5008" aria-describedby="caption-attachment-5008" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Bora-.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Bora-.jpg" alt="" width="2048" height="1536" class="size-full wp-image-5008" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Bora-.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Bora--300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Bora--1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Bora--768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Bora--1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5008" class="wp-caption-text">प्राकृतिक फार्म &#8211; उपज और कृषक</figcaption></figure>
<p>खैर। आपने कभी सोचा कि 1.27+ अरब की आबादी के साथ भारत दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश है। करीब 3.288 मिलियन वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के साथ यह दुनिया का सातवां सबसे बड़ा देश है। इसकी 7,500 किलोमीटर से अधिक लंबी तटरेखा है। भारत एक विविधतापूर्ण देश है जहाँ 22 से अधिक प्रमुख भाषाएँ और 415 बोलियाँ बोली जाती हैं। भारत में दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला &#8211; उत्तर में हिमालय, पश्चिम में थार रेगिस्तान, पूर्व में गंगा का डेल्टा और दक्षिण में दक्कन पठार के साथ &#8211; है। भारत में कृषि-पारिस्थितिकी विविधता का घर है। हमारा देश दूध, दालों और जूट का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। यह चावल, गेहूं, गन्ना, मूंगफली, सब्जियां, फल और कपास का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। यह मसालों, मछली, मुर्गी पालन, पशुधन और वृक्षारोपण फसलों के अग्रणी उत्पादकों में से एक है। करीब 2.1 ट्रिलियन डॉलर मूल्य वाला भारत अमेरिका और चीन के बाद दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। </p>
<p>तब तो आप यह भी नहीं सोचे होंगे कि भारत की जलवायु दक्षिण में आर्द्र और शुष्क उष्णकटिबंधीय से लेकर उत्तरी इलाकों में शीतोष्ण अल्पाइन तक भिन्न है और इसमें पारिस्थितिकी तंत्र की एक विशाल विविधता है। करीब 34 वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट में से चार और 15 डब्ल्यूडब्ल्यूएफ वैश्विक 200 पर्यावरण-क्षेत्र पूरी तरह या आंशिक रूप से भारत में आते हैं। दुनिया के भूमि क्षेत्र का केवल 2.4 प्रतिशत हिस्सा होने के कारण, भारत में 45,000 से अधिक पौधों और 91,000 जानवरों की प्रजातियों सहित सभी दर्ज प्रजातियों में से लगभग आठ प्रतिशत शामिल हैं। </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Bhains-fotor.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Bhains-fotor.jpg" alt="" width="2048" height="1536" class="aligncenter size-full wp-image-5009" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Bhains-fotor.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Bhains-fotor-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Bhains-fotor-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Bhains-fotor-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Bhains-fotor-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a></p>
<p><strong>विशेषज्ञ तो यह भी कहते हैं कि अपने संबद्ध क्षेत्रों के साथ, कृषि, भारत में आजीविका का सबसे बड़ा स्रोत है। इसके 70 प्रतिशत ग्रामीण परिवार अभी भी अपनी आजीविका के लिए मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर हैं, जिनमें 82 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत हैं। भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक (वैश्विक उत्पादन का 25%), उपभोक्ता (विश्व खपत का 27%) और आयातक (14%) है। भारत में 190+ मिलियन से अधिक मवेशी आबादी है। खाद्यानों की बात अगर नहीं भी करें तो भारत विश्व में फलों और सब्जियों के कुल उत्पादन का तक़रीबन 10.9% और 8.6% उत्पादन करता है। </strong></p>
<p>आकंड़े यह भी कहते हैं कि भारत में करीब 146.45 मिलियन &#8216;परिचालन जोत&#8217; है। प्रधान मंत्री-किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) योजना में 110.94 मिलियन लाभार्थी निबंधित हैं जिन्हें अप्रैल-जुलाई 2021 के लिए 2,000 रुपये की आय सहायता किस्त मिली है। राष्ट्रीय सांख्यिकी का मानना है कि भारत में तक़रीबन  93.09 मिलियन &#8216;कृषि परिवार&#8217; हैं, यानी देश में आधिकारिक तौर पर 90 मिलियन से अधिक से लेकर लगभग 150 मिलियन तक किसान हैं। भारत नॉमिनल जीडीपी के हिसाब से दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और क्रय शक्ति समानता (पीपीपी) के हिसाब से तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।</p>
<figure id="attachment_5010" aria-describedby="caption-attachment-5010" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/I-4-fotor-.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/I-4-fotor-.jpg" alt="" width="2048" height="1536" class="size-full wp-image-5010" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/I-4-fotor-.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/I-4-fotor--300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/I-4-fotor--1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/I-4-fotor--768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/I-4-fotor--1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5010" class="wp-caption-text">समर शैल प्राकृतिक फार्म का एक विहंगम दृश्य</figcaption></figure>
<p>लेकिन, भारत में अभी भी कई चिंताएँ हैं । जैसे-जैसे भारतीय अर्थव्यवस्था में विविधता आई है और विकास हुआ है, सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 1951 से 2011 तक लगातार कम हुआ है। उत्पादन में खाद्य पर्याप्तता हासिल करने के बावजूद, भारत अभी भी दुनिया के भूखे लोगों का एक चौथाई हिस्सा है और 190 मिलियन से अधिक कुपोषित लोगों का घर है। ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट के अनुसार, भारत 5 साल से कम उम्र में स्टंटिंग के मामले में 132 देशों में से 114वें स्थान पर है और 5 साल से कम उम्र में शारीरिक कमजोरी के मामले में 130 देशों में से 120वें स्थान पर है और एनीमिया की व्यापकता के मामले में 185 देशों में से 170वें स्थान पर है। देश में गर्भवती महिलाओं समेत 50 प्रतिशत महिलाएं और 60 प्रतिशत बच्चे एनीमिया से प्रभावित हैं। </p>
<p>हालाँकि भारत में कृषि ने अनाज में आत्मनिर्भरता हासिल कर रही है, लेकिन उत्पादन संसाधन गहन, अनाज केंद्रित और क्षेत्रीय पक्षपातपूर्ण है। देश के जल संसाधनों पर बढ़ते तनाव के कारण निश्चित रूप से नीतियों के पुनर्गठन और पुनर्विचार की आवश्यकता होगी। मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण भी देश में कृषि के लिए बड़ा खतरा है। कृषि के आसपास के सामाजिक पहलुओं में भी बदलते रुझान देखे जा रहे हैं। कृषि में महिलाकरण में वृद्धि मुख्य रूप से पुरुषों द्वारा बढ़ते ग्रामीण-शहरी प्रवास, महिला-प्रमुख परिवारों के बढ़ने और नकदी फसलों के उत्पादन में वृद्धि के कारण है, जो प्रकृति में श्रम प्रधान हैं। महिलाएं कृषि और गैर-कृषि गतिविधियों दोनों में महत्वपूर्ण कार्य करती हैं और इस क्षेत्र में उनकी भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन उनके काम को उनके घरेलू काम के विस्तार के रूप में माना जाता है, और घरेलू जिम्मेदारियों का दोहरा बोझ बढ़ जाता है। </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/12345-fotor-202307188442.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/12345-fotor-202307188442.jpg" alt="" width="2048" height="1536" class="aligncenter size-full wp-image-5011" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/12345-fotor-202307188442.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/12345-fotor-202307188442-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/12345-fotor-202307188442-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/12345-fotor-202307188442-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/12345-fotor-202307188442-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a></p>
<p><strong>प्राकृतिक कृषि के मामले में श्री मिश्रा कहते हैं कि &#8220;कोई भी नई विधि विकसित करने का सामान्य तरीका यही है कि पूछो, ‘क्यों न इसे आजमाया जाए?’ या ‘क्यों न उसे परखा जाए?’ हमारी कोशिश है कि खेती का एक ऐसा सुखद प्राकृतिक तरीका इजाद किया जाय जो खेती के काम को कठिन की बजाए, आसान बनाए। मैं उस दार्शनिक से बहुत प्रभावित हुआ और अंततः अपने पुस्तैनी जमीन पर प्राकृतिक कृषि को अनुवादित किया। हमें जोतने, रासायनिक खाद देने या कीटनाशकों का उपयोग करने की कोई जरूरत नहीं होती है । यदि आप ऐसा करने पर वाकई उतर आते हैं तो आपको शायद ही फिर कोई अन्य कृषि-विधियों की जरूरत रह जाती है।&#8221;</strong></p>
<p>आप इसे दूसरे शब्दों में इस कदर देखें: &#8220;डाक्टरों और दवाओं की जरूरत तभी पड़ती है, जब लोग ‘बीमार वातावरण’ पैदा करते हैं। औपचारिक शिक्षा की वैसे मानव को कोई जरूरत नहीं होती। लेकिन जब मानव ऐसी स्थिति का निर्माण कर देता है, तो उसको खुद को जीने के लिए शिक्षित करना ही पड़ता है। इसी तरह, बच्चे को संगीत की देन प्राप्त है यह तभी कहा जा सकता है, जब उस बच्चे का मन अपने आप संगीत से भर उठता है। लगभग हर व्यक्ति यह तो मानता है कि ‘कुदरत’ एक अच्छी चीज है। लेकिन ऐसे लोग कम ही हैं जो प्राकृतिक और अप्राकृतिक के बीच मौजूद फर्क को समझ सकें।</p>
<p>यदि एक मात्र नई कली को किसी फलदार वृक्ष में कैंची से काटकर अलग कर दिया जाए तो उससे एक ऐसी अव्यवस्था पैदा हो सकती है जिसे फिर दुबारा ठीक नहीं किया जा सकता। अपने स्वाभाविक आकार में बढ़ते हुए वृक्ष की शाखाएं तने से, जो बारी-बारी से निकलती (फूटती) है, उससे उन्हें सूर्य का प्रकाश एक-समान मात्रा में मिलता है। यदि इस क्रम को भंग कर दिया जाए तो शाखाओं में ‘टकराव’ पैदा हो जाता है। </p>
<figure id="attachment_5012" aria-describedby="caption-attachment-5012" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/I-27-fotor-202307188726.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/I-27-fotor-202307188726.jpg" alt="" width="2048" height="1536" class="size-full wp-image-5012" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/I-27-fotor-202307188726.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/I-27-fotor-202307188726-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/I-27-fotor-202307188726-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/I-27-fotor-202307188726-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/I-27-fotor-202307188726-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5012" class="wp-caption-text">फार्म का निरीक्षण करते</figcaption></figure>
<p>प्राकृतिक खेती, कृषि की प्राचीन पद्धति है। यह भूमि  प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखती है। प्राकृतिक खेती में रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों का प्रयोग नहीं होता है, बल्कि प्रकृति में आसानी से उपलब्ध होने वाले प्राकृतिक तत्वों, तथा जीवाणुओं के उपयोग से खेती की जाती है | यह पद्धति पर्यावरण के अनुकूल है तथा फसलों की लागत कम करने में कारगर है | प्राकृतिक खेती में जीवामृत, घन जीवामृत एवं बीजामृत का उपयोग पौधों को पोषक तत्व प्रदान करने के लिए किया जाता है | </p>
<figure id="attachment_5013" aria-describedby="caption-attachment-5013" style="width: 2045px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/jpj-fotor-2023071881157.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/jpj-fotor-2023071881157.jpg" alt="" width="2045" height="1285" class="size-full wp-image-5013" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/jpj-fotor-2023071881157.jpg 2045w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/jpj-fotor-2023071881157-300x189.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/jpj-fotor-2023071881157-1024x643.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/jpj-fotor-2023071881157-768x483.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/jpj-fotor-2023071881157-1536x965.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2045px) 100vw, 2045px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5013" class="wp-caption-text">प्रकृति का एक और स्वरुप: श्री हिमकर मिश्रा (नीचे) और पिता श्री समर मिश्रा कुर्सी पर</figcaption></figure>
<p>प्राकृतिक खेती भारतीय परंपरा में निहित एक रसायन-मुक्त कृषि प्रणाली है जो पारिस्थितिकी, संसाधन पुनर्चक्रण और खेत पर संसाधन अनुकूलन की आधुनिक समझ से समृद्ध है। इसे कृषि पारिस्थितिकी आधारित विविध कृषि प्रणाली माना जाता है जो फसलों, पेड़ों और पशुधन को कार्यात्मक जैव विविधता के साथ एकीकृत करती है। यह काफी हद तक ऑन-फार्म बायोमास रीसाइक्लिंग पर आधारित है, जिसमें बायोमास मल्चिंग, ऑन-फार्म गाय के गोबर-मूत्र फॉर्मूलेशन के उपयोग पर प्रमुख जोर दिया गया है; मिट्टी के वातन को बनाए रखना और सभी सिंथेटिक रासायनिक आदानों का बहिष्कार। प्राकृतिक खेती से खरीदे गए इनपुट पर निर्भरता कम होने की उम्मीद है। इसे रोजगार बढ़ाने और ग्रामीण विकास की गुंजाइश के साथ एक लागत प्रभावी कृषि पद्धति माना जाता है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/agriculture/only-rishi-krishi-can-stop-migration-of-labours-from-indias-villages">चलें खेत की ओर: &#8216;ऋषि कृषि&#8217; ही भारत के 640930+ गावों से होने वाले प्रवास को रोक सकता है, लोगों को खुशहाल बना सकता है&#8217; (भाग-5)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8216;प्राकृतिक आपदाओं&#8217; से बचने के लिए &#8216;बंजर भूमि&#8217; को &#8216;हरा-भरा&#8217;, &#8216;कृषि योग्य&#8217; बनाना होगा और इसके लिए प्राकृतिक कृषि ही एकमात्र विकल्प है (भाग-4)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/agriculture/barren-land-has-to-be-made-green-cultivable-to-avoid-natural-calamities</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 17 Jul 2023 02:50:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कृषि]]></category>
		<category><![CDATA[agriculture]]></category>
		<category><![CDATA[cultivation]]></category>
		<category><![CDATA[farming]]></category>
		<category><![CDATA[haldi]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[nursing]]></category>
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		<category><![CDATA[revolution]]></category>
		<category><![CDATA[samar shail natural farm]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पूर्णिया / पटना / नई दिल्ली : आज देश में पर्यावरण को बचाने सम्बन्धी जितने ढ़ोल &#8211; नगाड़े पिटे जाएँ, सरकारी कोषागार से पैसे पानी की तरह बहाया जाए, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि देश में &#8216;वनों से भरी&#8217; भूमि की तुलना में &#8216;बंजर&#8217; भूमि की फीसदी अधिक है और [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/agriculture/barren-land-has-to-be-made-green-cultivable-to-avoid-natural-calamities">&#8216;प्राकृतिक आपदाओं&#8217; से बचने के लिए &#8216;बंजर भूमि&#8217; को &#8216;हरा-भरा&#8217;, &#8216;कृषि योग्य&#8217; बनाना होगा और इसके लिए प्राकृतिक कृषि ही एकमात्र विकल्प है (भाग-4)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पूर्णिया / पटना / नई दिल्ली : आज देश में पर्यावरण को बचाने सम्बन्धी जितने ढ़ोल &#8211; नगाड़े पिटे जाएँ, सरकारी कोषागार से पैसे पानी की तरह बहाया जाए, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि देश में &#8216;वनों से भरी&#8217; भूमि की तुलना में &#8216;बंजर&#8217; भूमि की फीसदी अधिक है और बढ़ रही है । आज कृषि के क्षेत्र में हम भले &#8216;आत्मनिर्भरता&#8217; की बात करें, लेकिन सरकारी आंकड़े यह भी कहते हैं कि देश में आज सिर्फ 51 फीसदी जमीन पर खेती होती है, जबकि चार फीसदी भूमि पर चरागाह है। आज देश में 21 फीसदी जमीनों पर ही &#8216;वन&#8217; है जबकि &#8216;बंजर&#8217; भूमि की फीसदी 24 फीसदी है। यह आंकड़े मैं नहीं, सरकारी दस्तावेजों में अंकित है। </strong></p>
<p>इन दशाओं और दुर्दशाओं के मद्दे नजर देश में एक ऐसी खेती की जरूरत है जो न केवल पर्यावरण के अनुकूल हो, उसे मजबूत और समृद्ध करने वाली हो; बल्कि लागत की दृष्टि से भी कम हो, आर्थिक तौर पर कृषकों पर कम भार डाले, किसान आत्म हत्या नहीं करे, उन्नत किस्म का फसल उत्पन्न करे और समाज के साथ देश भी आत्मनिर्भर हो। यही कारण है कि आज देश-विदेश में लाखों, अरबों की कमाई करने वाले युवक, युवतियां, जिनके गाँव में अपनी जमीन है, अथवा पट्टे पर ही सही जमीन प्राप्त होने की सुविधा है, भारत की गाँव की ओर आ रहे हैं &#8211; प्राकृतिक खेती करने के लिए। </p>
<p>प्राकृतिक खेती एक ऐसी खेती है जो प्रकृति की जीवन से मेल खाती है। यह उत्पादन प्रणालियों और फसल उत्पादन को नियोजित तो करती ही है, साथ ही, प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र में सूर्य के प्रकाश, नमी, मिट्टी, फसलों, जीवित प्राणियों और रोगाणुओं के बीच परस्पर समन्वय रखकर बेहतर पैदावार करती है। प्राकृतिक खेती की ओर आकर्षण आज की पीढ़ियों को आत्मविश्वास जगा रहा है। यह सच है कि आज भी भारत के जिन 51 फीसदी जमीनों पर खेती होती है, उस पर काम करने वाले किसानों की शिक्षा और तकनीकी योग्यता &#8216;शून्य&#8217; ही है और अधिकतर मामले में वे अपने &#8216;अनुभवों&#8217; के आधार पर खेती करते आ रहे हैं, कर रहे हैं। </p>
<figure id="attachment_4997" aria-describedby="caption-attachment-4997" style="width: 780px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-7.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-7.jpeg" alt="" width="780" height="1040" class="size-full wp-image-4997" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-7.jpeg 780w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-7-225x300.jpeg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-7-768x1024.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 780px) 100vw, 780px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4997" class="wp-caption-text">हल्दी का पौधा</figcaption></figure>
<p><strong>लेकिन आज शैक्षिक और तकनिकी योग्यताधारी जब उन किसानों का हाथ पकड़ रहे हैं, उत्पादन की गुणवत्ता के साथ-साथ उत्पादन की मात्रा में भी वृद्धि होना स्वाभाविक है। कभी बिहार-बंगाल-उड़ीसा राज्यों का काला पानी कहा जाने वाला &#8216;पूर्णिया&#8217; जिला के रामनगर इलाके में सैकड़ों एकड़ भूमि पर &#8216;प्राकृतिक खेती&#8217; को अनुवादित करने वाले मुद्दत तक देश के &#8216;कॉर्पोरेट घरानों, खासकर रिलायंस में वरिष्ठ पदों को सँभालने वाले श्री हिमकर मिश्रा एक दृष्टान्त है। श्री हिमकर मिश्रा आज न केवन राष्ट्रीय, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय कृषि-विशेषज्ञों को अपनी ओर आकर्षित भी कर रहे हैं।</strong>   </p>
<p>प्राकृतिक खेती को &#8220;कीटनाशक मुक्त खेती&#8221; भी कहा जा सकता है । यह एक कृषि-पारिस्थितिक रूप से मजबूत कृषि प्रणाली है जिसमें फसलें, पेड़ और पशुधन शामिल हैं, जो कार्यात्मक जैव विविधता के सर्वोत्तम उपयोग की अनुमति देता है। यह मिट्टी की उर्वरता बहाली, वायु गुणवत्ता, और न्यूनतम और/या ग्रीनहाउस गैस जैसे कई अन्य लाभ प्रदान करते हुए किसानों की आय बढ़ाने का वादा करता है। </p>
<p>श्री मिश्रा कहते हैं: &#8220;आज 48 वर्ष हो रहे हैं प्राकृतिक खेती को जमीनी सतह पर अनुवादित करने को। यह खेती प्राकृतिक कृषि के अन्वेषक, जापानी किसान और दार्शनिक  <strong>मासानोबू फ़ुकुका</strong> के सिद्धांतों पर आधारित है। मसानोबू फुकुओका एक जापानी किसान और दार्शनिक थे। सं 1975 में उनके उपन्यास &#8220;द वन-स्ट्रॉ रेवोल्यूशन&#8221; में इस कृषि पद्धति को लोकप्रिय बनाया। प्राकृतिक खेती को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पृथ्वी की रक्षा के लिए एक प्रकार के पुनर्स्थापनात्मक कृषि व्यवसाय योजना के रूप में मान्यता प्राप्त है।&#8221;</p>
<figure id="attachment_4998" aria-describedby="caption-attachment-4998" style="width: 810px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16.jpeg" alt="" width="810" height="810" class="size-full wp-image-4998" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16.jpeg 810w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16-300x300.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16-150x150.jpeg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16-768x768.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16-24x24.jpeg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16-48x48.jpeg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-16-96x96.jpeg 96w" sizes="auto, (max-width: 810px) 100vw, 810px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4998" class="wp-caption-text">हल्दी</figcaption></figure>
<p>श्री मिश्रा आगे कहते हैं कि &#8220;आज देश की सरकार भी एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में प्राकृतिक खेती को स्वीकार की है। और यही कारण है कि आज किसानों को रसायन मुक्त खेती अपनाने के लिए प्रेरित करने और प्राकृतिक खेती की पहुंच बढ़ाने के लिए , सरकार ने भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (बीपीकेपी) को बढ़ाकर 2023-24 तक एक अलग और स्वतंत्र योजना के रूप में प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन (एनएमएनएफ) तैयार किया है।&#8221;</p>
<p><strong>&#8220;समर शैल प्राकृतिक फार्म&#8221;</strong> के संस्थापक श्री हिमकर मिश्रा का कहना है कि &#8220;आत्मनिर्भर भारत हमारे प्रधानमंत्री जी का सपना है। आत्मनिर्भर तभी बन सकते हैं जब हमारी कृषि, हमारा एक-एक किसान आत्मनिर्भर हो। ऐसा तभी संभव है जब हम रासायनिक कृषि की जगह प्राकृतिक कृषि के सिद्धांतो को आत्मसाध करें एवं प्राकृतिक खेती को एक जन आंदोलन का स्वरुप दें। प्राकृतिक कृषि भारत के लिए कोई नई चीज़ नहीं है। यह प्राचीनकाल से भारतीय संस्कृति, भारतीय सभ्यता और हमारी परंपराओं का अंग है। हमारे वेदों, पुराणों, उपनिषदों में प्राकृतिक खेती के ज्ञान का खजाना मिलता है। यह खेती हमारी जड़ों से जुड़ी है। हमारे पूर्वज सदियों पहले से प्राकृतिक खेती करते रहे हैं।&#8221;</p>
<p>उनका मानना है कि प्राकृतिक कृषि इन चार सिद्धांत &#8211; हल नहीं, जुताई-निंदाई नहीं, कोई रासायनिक उर्वरक या तैयार की हुई खाद नहीं, हल द्वारा निराई, गुड़ाई नहीं तथा रसायनों पर कोई निर्भरता नहीं &#8211; पर आधारित है। इस कृषि व्यवस्था में हम प्रकृति के आदेशों का पालन करते हैं। प्राकृतिक खेती को रसायन मुक्त खेती के रूप में भी परिभाषित कर सकते हैं, जिसमें केवल प्राकृतिक आदानों का उपयोग करता है। श्री मिश्रा का मानना है कि &#8220;जब तक हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे, हम प्राकृतिक आपदाओं का शिकार होते रहेंगे। विश्व आज जहाँ ग्लोबल वार्मिंग की बात कर रहा है, हम सबों को मिलकर &#8216;बंजर भूमि&#8217; को &#8216;हरा-भरा&#8217; कृषि योग्य&#8217; बनाना होगा और इस क्रिया में प्राकृतिक कृषि ही एक मात्र विकल्प है।&#8221; </p>
<figure id="attachment_4999" aria-describedby="caption-attachment-4999" style="width: 1040px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-17.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-17.jpeg" alt="" width="1040" height="780" class="size-full wp-image-4999" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-17.jpeg 1040w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-17-300x225.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-17-1024x768.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-17-768x576.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1040px) 100vw, 1040px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4999" class="wp-caption-text">समर शैल प्राकृतिक फार्म में काम करती महिलाएं</figcaption></figure>
<p>उनके अनुसार, प्राकृतिक खेती में अन्य जिन सिद्धांतों को अपनाया जाता है, उससे अधिक महत्वपूर्ण &#8216;सात-सतह पर्यावरणीय सिद्धांत का अपनाना है। आम तौर पर हम ध्यान नहीं देते लेकिन खुले आसमान से लेकर जमीन और उसके अंदर तक जाने वाली सूर्य की रोशनी और उसका तप पेड़-पौधों से लेकर फसल और फलों के साथ-साथ सम्पूर्ण कृषि व्यवस्था को प्रभावित करता है। इसे दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि परिपक्व पारिस्थितिक तंत्र के घटक भागों के बीच बड़ी संख्या में संबंध होते हैं। जैसे पेड़, ग्राउंड कवर, मिट्टी, कवक, कीड़े और जानवर। ये प्राकृतिक परतें (सूर्य की अपेक्षित रौशनी) परतें कार्यात्मक पारिस्थितिकी प्रणालियों को डिजाइन और कार्यान्वित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले कई उपकरणों में से एक हैं जो टिकाऊ हैं और मनुष्यों के लिए प्रत्यक्ष लाभ हैं।</p>
<p><strong>उसी सात-सतही प्राकृतिक सिद्धांत के अंतिम सिंद्धांत का उत्पाद है &#8211; हल्दी </strong>और जमीन के अंदर उत्पन्न होने वाली वस्तुएं।आप भले माने अथवा नहीं, दुनिया भर में हल्दी की जितनी खपत होती है, भारत अकेले उसका 80 फीसदी उत्पादन करता है। भारत दुनिया में हल्दी का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। भारत से फ्रांस, जापान, अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, नीदरलैंड, अरब और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में हल्दी का निर्यात किया जाता है। दुनिया का 60% हल्दी एक्सपोर्ट भारत से किया जाता है। हल्दी का भारतीय रसोई घरों में एक प्रमुख स्थान है। भोजन में हल्दी को शामिल करने से हम कई तरह की बीमारियों से बच सकते हैं क्योंकि यह शरीर की इम्युनिटी को बढ़ाने में मददगार साबित होता है। </p>
<figure id="attachment_5000" aria-describedby="caption-attachment-5000" style="width: 1080px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-12.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-12.jpeg" alt="" width="1080" height="810" class="size-full wp-image-5000" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-12.jpeg 1080w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-12-300x225.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-12-1024x768.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-12-768x576.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1080px) 100vw, 1080px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5000" class="wp-caption-text">अपने फ़ार्म में कार्य करते समर शैल प्राकृतिक फार्म के संस्थापक श्री हिमकर मिश्रा</figcaption></figure>
<p>श्री मिश्रा कहते हैं: &#8220;इस फार्म में हल्दी के उत्पादन पर भी विशेष दिए दिए हैं। कई एकड़ों में फैले इस प्राकृतिक फार्म में हल्दी प्रचुर मात्रा में उपजाया जाता है।&#8221; वैसे देश के कई इलाके में किसान हल्दी की खेती की ओर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं और इसको लेकर तरह-तरह के प्रयोग व तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। कहते हैं कि अगर सही तकनीक और बीज की मदद से हल्दी की खेती की जाय तो एक एकड़ में 65-100 क्विंटल तक हल्दी उगा सकते हैं। आज भारत के बाज़ारों में हल्दी  60 से 100 रुपये प्रति किलो बिक रही है । हल्दी के कई किस्में है, मसलन भारत में हल्दी की लगभग 30 किस्में पाई जाती है इनमें लकाडोंग, अल्लेप्पी, मद्रास, इरोड, सांगली, सोनिया, गौतम, रश्मि, सुरोमा, रोमा, कृष्णा, गुन्टूर, मेघा, सुकर्ण, कस्तूरी, सुवर्णा, सुरोमा और सुगना, पन्त पीतम्भ आदि । </p>
<p>श्री मिश्रा का कहना है कि &#8220;हल्दी में प्रोटीन, वसा, पानी, कार्बोहाइड्रेट, रेशा और खनिज लवण की भी पर्याप्त मात्रा पायी जाती है। हल्दी में बहुत सारे औषधीय गुण होते हैं। ये फसल छायादार वाली जगह पर भी लगा सकते हैं। औषधीय गुण होने के कारण हल्दी को जानवर भी नहीं खाता है। इसके अलावा आयुर्वेदिक उपचार में भी हल्दी को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।जिसके कारण आयुर्वेदिक दवाइयों को बनाने के लिए भी इसका उपयोग अधिक मात्रा में कर रहे हैं। </p>
<p>उनका मानना है कि हल्दी उत्पादन के मामले में भारत को  विश्व में पहला स्थान प्राप्त होने के साथ-साथ सबसे बड़ा निर्यातक भी कहा जाता है | दुनिया के नीदरलैंड, यूनाइटेड किंगडम, जापान, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, सउदी अरब, जर्मनी और अमेरिका देशों में भारत से हल्दी का निर्यात किया जाता है। भारत में हल्दी की खेती पश्चिम बंगाल, केरल, मेघालय, तमिलनाडु, ओडिशा, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक राज्य में मुख्य तौर पर की जाती है, तथा अकेले आंध्र प्रदेश में 40 प्रतिशत हल्दी का उत्पादन किया जाता है। </p>
<figure id="attachment_5001" aria-describedby="caption-attachment-5001" style="width: 1536px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-9.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-9.jpeg" alt="" width="1536" height="2048" class="size-full wp-image-5001" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-9.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-9-225x300.jpeg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-9-768x1024.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Haldi-9-1152x1536.jpeg 1152w" sizes="auto, (max-width: 1536px) 100vw, 1536px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5001" class="wp-caption-text">समर शैल प्राकृतिक फार्म</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, <strong>बेहतरीन औषधीय गुणों के कारण</strong> इस प्राकृतिक फार्म में <strong>काली हल्दी</strong> की खेती पर भी ध्यान दिया जा रहा है। काली हल्दी अपनी औषधीय गुणों के चलते प्रसिद्ध है। आयुर्वेद, होम्योपैथी और कई जरूरी दवाइयों के निर्माण में हल्दी का इस्तेमाल किया जाता है। विगत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर &#8216;कोरोना&#8217; बीमारी के फैलने के बाद पूरे विश्व में हल्दी की मांग बहुत अधिक हो गई है। कहते हैं हल्दी &#8216;इम्यूनिटी&#8217; को बढ़ता है, यानि यह एक प्रकार का &#8216;प्राकृतिक बूस्टर&#8217; है। स्वाभाविक है कि इस फसल के उत्पादन की ओर लोगों का आकर्षण। ज्ञातव्य हो कि काली भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में काली हल्दी की कीमत 500 से 4,000 रुपये प्रति किलो है। और इसका उत्पादन भी लोग अधिक नहीं कर पा रहे हैं। </p>
<p>कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि <strong>काली हल्दी</strong> के लिए भुरभुरी दोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती है। इसकी खेती करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि खेत में बारिश का पानी ना रुके। एक हेक्टेयर में काली हल्दी के करीब 2 क्विंटल बीज लग जाते हैं। इसकी खेती के लिए जून का महीना बेहतर माना जाता है। इसकी फसल को ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं रहती है। इसके औषधीय गुणों के कारण इसमें कीट नहीं लगते हैं। </p>
<p><strong>क्रमशः </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/agriculture/barren-land-has-to-be-made-green-cultivable-to-avoid-natural-calamities">&#8216;प्राकृतिक आपदाओं&#8217; से बचने के लिए &#8216;बंजर भूमि&#8217; को &#8216;हरा-भरा&#8217;, &#8216;कृषि योग्य&#8217; बनाना होगा और इसके लिए प्राकृतिक कृषि ही एकमात्र विकल्प है (भाग-4)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की नजर में है &#8216;रामनगर (पूर्णिया) की प्राकृतिक खेती&#039;(भाग-1)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/agriculture/indian-council-of-agricultural-research-is-eyeing-natural-farming-of-ramnagar-purnia</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Jul 2023 12:35:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कृषि]]></category>
		<category><![CDATA[agricultural]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पूर्णिया / पटना / नई दिल्ली : इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि आने वाले समय में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आई.ए.आर.सी.) के तहत निबंधित देश के सत्तर और अधिक सरकारी और निजी क्षेत्रों के कृषि विश्वविद्यालयों के शोधार्थी और विषय-विशेषज्ञ बिहार के सबसे पिछड़े इलाके पूर्णिया जिले के रामनगर क्षेत्र में वर्षों [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पूर्णिया / पटना / नई दिल्ली : इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि आने वाले समय में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आई.ए.आर.सी.) के तहत निबंधित देश के सत्तर और अधिक सरकारी और निजी क्षेत्रों के कृषि विश्वविद्यालयों के शोधार्थी और विषय-विशेषज्ञ बिहार के सबसे पिछड़े इलाके पूर्णिया जिले के रामनगर क्षेत्र में वर्षों से चल रहे &#8216;प्राकृतिक खेती&#8217; अथवा &#8216;ऋषि खेती&#8217; का गहन अध्ययन करने हेतु अपना-अपना दल भेजे। वैसे भारत सरकार के कृषि मंत्रालय में इस विषय पर &#8216;चर्चाएं&#8217; हो रही है। सूत्रों का कहना है कि देश में प्राकृतिक खेती को और अधिक मजबूत बनाने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी निजी तौर पर विशेष दिलचस्पी दिखा रहे हैं। </strong></p>
<p>उधर प्रदेश के आला अधिकारियों का कहना है कि मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार निजी तौर पर इस &#8216;प्राकृतिक कृषि कार्य&#8217; को देखना चाहते हैं। लेकिन दिल्ली के कृषि मंत्रालय के सूत्रों का मानना है कि &#8216;रामनगर में जिस तरह से भूमि को बिना किसी छेड़-छाड़ के नए-नए प्राकृतिक तरीकों का ईजाद किया जा रहा है, संभव है की केंद्रीय कृषि मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर इस कार्य को बढ़ावा देने हेतु स्वयं रामनगर की यात्रा करें। </p>
<p>सूत्रों का कहना है कि रामनगर में श्री हिमकर मिश्रा के नेतृत्व में स्थापित &#8216;समर-शैल प्राकृतिक फार्म&#8217; खेती का एक ऐसा सुखद प्राकृतिक तरीका ईजाद कर रहा है जो खेती के काम को कठिन की बजाय बहुत आसान बनाता है। इस कृषि विधि में जोतने, रासायनिक खाद देने, कीटनाशक दवा का प्रयोग करने की कोई जरुरत नहीं होती है। यह न केवल भूमि को बेहतर जीवन प्रदान करती है, बल्कि उत्पाद को भी प्रचुर मात्रा में पौष्टिक रखती है।&#8221;</p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/M3.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/M3.jpeg" alt="" width="780" height="1040" class="aligncenter size-full wp-image-4973" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/M3.jpeg 780w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/M3-225x300.jpeg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/M3-768x1024.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 780px) 100vw, 780px" /></a></p>
<p>कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने<strong> आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम</strong> को बताया कि &#8220;आज विश्व में प्राकृतिक संतुलन इसलिए बिगड़ा हुआ है, असंतुलित है क्योंकि मनुष्य अधिकाधिक सुधरी हुई तकनीकों का इस्तेमाल कर रहा है। परिणाम यह हो रहा है कि भूमि पूर्णतः उस पर आश्रित हो गई है। यह एक तर्क-वितर्क का पक्ष है। हकीकत यह है कि यदि हम प्राकृतिक संतुलन को बनाये रखने के लिए प्रकृति के साथ छेड़-छड़ के बजाय उसके नियमों के तहत चलें तो सभी परिणाम बेहतर ही होगा। कृषि और खेती के मामले में, चाहे धान की खेत हो, गेहूं की खेती हो, फलों की खेती हो, फूलों की खेती हो &#8211; सबों पर यह नियम लागु होता है। जानकारी के अनुसार पूर्णिया के रामनगर इलाके में समर शैल प्राकृतिक फार्म में कुछ इसी तरह का प्रयोग हो रहा है।&#8217;</p>
<p><strong>मासानोबू फुकूओका</strong> पर लिखी गई पुस्तक <strong>&#8216;द वन स्ट्रा रेवोल्यूशन&#8217;</strong> का उद्धरण देते कृषि अधिकारी कहते हैं: &#8220;प्राकृतिक खेती में पेड़-पौधों में कटाई-छटाई और कीटनाशक उसी सीमा तक आवश्यक होता है, जिस सीमा तक वृक्ष अपने स्वाभाविक आकार-प्रकार से दूर होते हैं। प्रकृति में औपचारिक शिक्षण की कोई भूमिका नहीं होती। किसी फलदार वृक्ष में कैंची से काटकर अलग कर दिया जाए तो उससे एक ऐसी अव्यवस्था पैदा हो सकती है जिसे फिर दुबारा ठीक नहीं किया जा सकता।&#8221;</p>
<p>वे आगे कहते हैं: &#8220;अपने स्वाभाविक आकार में बढ़ते हुए वृक्ष की शाखाएं तने से, जो बारी-बारी से निकलती (फूटती) है, उससे उन्हें सूर्य का प्रकाश एक-समान मात्रा में मिलता है। यदि इस क्रम को भंग कर दिया जाए तो शाखाओं में ‘टकराव’ पैदा हो जाता है। वे एक-दूसरे पर आकर आपस में उलझ जाती हैं, और जिस स्थान पर सूर्य की किरणें प्रवेश नहीं कर पाती, वहां की पत्तियां मुरझा जाती हैं। यहीं से कीड़े लगना भी शुरू हो जाते हैं। यदि वृक्ष की कटाई-छंटाई नहीं की गई तो अगले वर्ष कुछ और शाखें मुरझा जाएंगी।&#8221; </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/7.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/7.jpeg" alt="" width="780" height="1040" class="aligncenter size-full wp-image-4974" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/7.jpeg 780w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/7-225x300.jpeg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/7-768x1024.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 780px) 100vw, 780px" /></a></p>
<p><strong>&#8216;समर-शैल प्राकृतिक फार्म&#8217; के संस्थापक श्री हिमकर मिश्रा के अनुसार: &#8220;इस फार्म में मल्टी लेयर&#8217; फार्मिंग होता है। इस मल्टी लेयर की विशेषता है कि सूर्य से निकलने वाली हानिकारक किरण सीधा जमीन पर नहीं पहुँच पाता। इस फार्म में किसी भी तरह का रासायनिक खाद या कीटनाशक का प्रयोग नहीं होता है और ना ही जमीन की जुताई की जाती है। फार्म में वायु प्रदुषण, मिटटी संरक्षण, जल संरक्षण को विशेष रूप से ध्यान में रखकर खेती की जाती है।&#8221; </strong></p>
<p>श्री मिश्रा का कहना है कि वे इस फार्म में सैकड़ों ऐसे बहुमूल्य पौधों को उपजाने के प्रयास कर रहे हैं जो न केवल प्राकृतिक दवाइयों के रूप में समाज के सबसे कमजोर वर्गों तक पहुँचाना है, बल्कि &#8216;इंडिजिनस मेडिसिन&#8217; के रूप में समाज के सभी वर्गों को न्यूनतम मूल्यों पर उपलब्ध हो सके। वे इस बात को स्वीकार करते हैं कि यह कृषि कार्य स्थानीय लोगों का मनोबल तो बढ़ाएगा ही, रोजगार का अवसर भी प्रचुर मात्रा में सृजन करेगा। </p>
<figure id="attachment_4976" aria-describedby="caption-attachment-4976" style="width: 960px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar.jpeg" alt="" width="960" height="539" class="size-full wp-image-4976" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar.jpeg 960w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar-300x168.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar-768x431.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4976" class="wp-caption-text">&#8216;समर-शैल प्राकृतिक फार्म संस्थापक श्री हिमकर मिश्रा </figcaption></figure>
<p>&#8216;प्राकृतिक खेत&#8217; या &#8216;ऋषि खेती&#8217; भारत का बहुत पुराण कृषि प्रणाली है। इस क्रिया में भूमि के प्राकृतिक स्वरूप को बनाये रखती है। इसमें रासायनिक खादों या कीटनाशक दवा का उपयोग नहीं होता है, बल्कि प्रकृति में आसानी से उपलब्ध प्राकृतिक तत्वों से खेती की जाती है। या पर्यावरण के अनुकूल तो है ही, कृषि-फसलों की लागत को भी कम रहती है। प्राकृतिक खेती जापान के एक किसान एवं दार्शनिक मासानोबू फुकुओका द्वारा स्थापित कृषि की पर्यवरणाक्षी पद्धति है। </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar-Babu-Story.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar-Babu-Story.jpg" alt="" width="1536" height="2048" class="aligncenter size-full wp-image-4975" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar-Babu-Story.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar-Babu-Story-225x300.jpg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar-Babu-Story-768x1024.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/07/Himkar-Babu-Story-1152x1536.jpg 1152w" sizes="auto, (max-width: 1536px) 100vw, 1536px" /></a></p>
<p>बहरहाल, श्री मिश्रा का कहना है कि &#8220;इस फार्म में हज़ारों बहुमूल्य पौधों के अतिरिक्त अब अगस्त्य पौधा लगाया जा रहा है।अगस्त्य पौधा पूर्णरूपेण चमत्कारी पौधा है जो रतौंधी, लिवर, कृमि एवं मिर्गी से ग्रसित रोगियों के लिए अचूक दबा के रूप में सिद्ध होगा। इस दिशा में वे देश-विदेश के विशेषज्ञों से इंटरनेट के माध्यम से सम्पर्क स्थापित कर रहे हैं। अगर मेरा प्रयास सफल हो गया तो आने वाले दिनों में औषधीय पौधों के मामले में समर-शैल प्राकृतिक फार्म&#8217; एक नई क्रांति की शुरुआत करेगा।&#8221;</p>
<p>ज्ञातव्य हो कि  अगस्त्य जैसे पौधे की खेती मुख्य रूप से भारत के अलावा थाईलैंड, मलेसिया, फिलीपींस, नॉदर्न ऑस्ट्रेलिया में बड़े पैमाने पर की जाती है। हमारी पूरी कोशिश होगी कि हम इस फार्म में इस पौधे को संरक्षित और सम्पोषित कर इलाके के लोगों को एक नया जीवन दें। अगस्त्य पौधे की ऊंचाई करीब 20-30 फिर तक होती है और इसे लिए गर्म परिवेश का होना आवश्य है। औसतन सितम्बर &#8211; अक्टूबर महीने में इस पौधे में फूल निकलते हैं। </p>
<p>प्राकृतिक खेती भारतीयपरंपरा में निहित एक रसायन-मुक्त कृषि प्रणाली है जो पारिस्थितिकी, संसाधन पुनर्चक्रण और खेत पर संसाधन अनुकूलन कीआधुनिक समझ से समृद्ध है। इसे कृषि पारिस्थितिकी आधारित विविध कृषि प्रणाली मानाजाता है जो फसलों, पेड़ोंऔर पशुधन को कार्यात्मक जैव विविधता के साथ एकीकृत करती है। यह काफी हद तकऑन-फार्म बायोमास रीसाइक्लिंग पर आधारित है, जिसमें बायोमास मल्चिंग, ऑन-फार्म गाय के गोबर-मूत्र फॉर्मूलेशन के उपयोग परप्रमुख जोर दिया गया है; मिट्टीके वातन को बनाए रखना और सभी सिंथेटिक रासायनिक आदानों का बहिष्कार। प्राकृतिकखेती से खरीदे गए इनपुट पर निर्भरता कम होने की उम्मीद है। इसे रोजगार बढ़ाने औरग्रामीण विकास की गुंजाइश के साथ एक लागत प्रभावी कृषि पद्धति माना जाता है।</p>
<p>क्रमशः </p>
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