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	<title>excavation Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>​बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-2)​ : मिट्टी के अंदर दबी मिथिला की संस्कृति जैसे कह रही है: &#8216;अंत तक पहुंचना हो तभी उत्खनन ​की शुरुआत करना&#8217;</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-culture-of-mithila-buried-beneath-the-soil-is-telling-us-something</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 03 Mar 2026 12:09:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[asi]]></category>
		<category><![CDATA[Blirajgarh]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[excavation]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बाबू बरही (झंझारपुर)/दरभंगा/पटना/नई दिल्ली : उन दिनों बिहार और उड़ीसा के लेफ्टिनेंट गवर्नर थे चार्ल्स एस बेली। कालखंड 1915 का था। पटना में डाक बंगला चौराहे से पटना उच्च न्यायालय के रास्ते आगे जाने वाली सड़क &#8216;बेली रोड&#8217;, चार्ल्स बेली ने नाम पर ही अलंकृत हैं। इनकी अध्यक्षता में पटना में आज से 111-साल पहले [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-culture-of-mithila-buried-beneath-the-soil-is-telling-us-something">​बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-2)​ : मिट्टी के अंदर दबी मिथिला की संस्कृति जैसे कह रही है: &#8216;अंत तक पहुंचना हो तभी उत्खनन ​की शुरुआत करना&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बाबू बरही (झंझारपुर)/दरभंगा/पटना/नई दिल्ली : उन दिनों बिहार और उड़ीसा के लेफ्टिनेंट गवर्नर थे चार्ल्स एस बेली। कालखंड 1915 का था। पटना में डाक बंगला चौराहे से पटना उच्च न्यायालय के रास्ते आगे जाने वाली सड़क &#8216;बेली रोड&#8217;, चार्ल्स बेली ने नाम पर ही अलंकृत हैं। इनकी अध्यक्षता में पटना में आज से 111-साल पहले 1915 में बिहार और उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी ​संस्था का निर्माण हुआ। बिहार-ओड़िसा विभाजन के बाद यह बिहार रिसर्च सोसाइटी ​के नाम से जाना जाता है। बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी के बाद ​यह संस्थान अपनी तरह की दूसरी सबसे​ पुरानी और सम्पन्न संस्था है।आज 3 मार्च, 2026 है। आज से 17-वर्ष पहले 2 मार्च, 2009 को बिहार रिसर्च सोसाइटी को बिहार सरकार अधिग्रहण किया था। ​और जब से बिहार सरकार के अधीन आया, बिहार रिसर्च सोसाइटी ही नहीं, शिक्षण, शोध से संबंधित जितनी भी संस्थाएं थी, बिलख बिलख कर मृत्युप्राय होती गयी। शब्द कटु हैं, लेकिन विचारणीय हैं।</strong> </p>
<p><em>आज होली की पूर्व संध्या भी है। आज ऐतिहासिक चंद्रग्रहण भी है। इसी समय मिथिला में मिथिला की माताएं &#8216;सप्ता-बिपता&#8217; व्रत करती हैं। भगवान सूर्य की उपासना करती हैं अपने पति, संतानों की लम्बी आयु, सुख-समृद्धि के लिए मंगल कामना करती हैं। सप्ता-बिपता&#8217; कथा के अनुसार विपत्ति के दिनों में नल-देवयंती का पुत्र एक विशाल पोखर में डूब जाता है। समयांतराल उसे एक मछली निगल जाती है। जब नल-देवयंती का समय सापेक्ष होने लगता है, एक दिन एक मछुआरा को विशालकाय मछली जाल में फंसती है। वह राजा के पास लेकर आता है। नौकरानी &#8216;चेरिया&#8217; जो मछली को साफ करने बैठती है, मछली की बोली सुनती है। मछली निर्देश देती है कि किस प्रकार वह काटे, साफ करे, क्योंकि नल-देवयंती का पुत्र अंदर है। &#8216;चेरिया&#8217; यह सुनकर बिलखने लगती है । आज मिथिला के बलिराजगढ़ में जब मिट्टी उत्खनन की बात शुरू हुई है तो ऐसा लगता है जैसे वहां की मिट्टी भी बोल रही हो, कह रही हो &#8220;अगर मिथिला की सांस्कृतिक गौरव-गाथा को वास्तविक रूप में जानना है, तो अंत तक जानने के लिए ही उत्खनन की शुरुआत करना, अन्यथा मुझे जमीन के अंदर ही रहने देना, मरे साथ अब राजनीति नहीं करना, थक गयी हूँ।&#8221;</em></p>
<p>मिथिला के लोग अगर दरभंगा राज के अंतिम राजा महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह के नहीं हुए, ललित नारायण मिश्र के नहीं हुए, तो किसी के नहीं होंगे। सब समय और अवसरवादी अवसरों का खेल है। स्वाधीन भारत में अगर मिथिला के लोग सिर्फ इन दो महात्मनों के हुए होते, बिना किसी राजनीति और राजनीतिक लाभ के, तो शायद मिथिला का जो रूप और स्वरूप आज है, वह कुछ अलग होता। प्रदेश ही नहीं, देश ही नहीं, वैश्विक पटल पर मिथिला का आज तूती बोला जाता। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1-scaled.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="aligncenter size-full wp-image-7420" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1-2048x1150.jpg 2048w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p>लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जितनी राजनीति देश के किसी अन्य प्रांतों में नहीं हुई, विशेषकर आज़ाद भारत में, मिथिला अपने ही लोगों की &#8216;स्वहित राजनीति&#8217; का शिकार होता गया। मिथिला के लोग (अपवाद छोड़कर) स्वहित में राजनीति का जाल बिछाते गए, कुछ फंसते गए, उच्च फंसाते गए। परिणाम यह हुआ कि &#8216;राजनेता&#8217;, &#8216;समाज-सेवक&#8217; तो बढ़ते गए, उनका पचास किलो का शरीर और तीन ​अंक वाला बैंक का खाता, जमीन-जायदाद में हज़ारो नहीं, अलबत्ता लाखों गुना का इजाफा हो  गया; लेकिन &#8216;मिथिला और मिथिला के आम लोग&#8217; आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक यहाँ तक की राजनीतिक &#8216;विपन्नता&#8217; का शिकार होते गए, गरीबी रेखा के नीचे धंसते गए और सिर्फ मतदाता या अनुयायी बनकर &#8216;ताली बजाते&#8217; रह गए। </p>
<p><strong>दुर्भाग्य यह है कि सत्ता के गलियारे में बैठे लोग एक तरफ जहाँ मिथिला, मैथिली, मिथिला की गरिमा और संस्कृति की &#8216;तथाकथित विकास&#8217; के नाम पर जनमानस को लुभाकर स्वयं &#8216;संभ्रांत&#8217; हो रहे हैं, मिथिला की मिट्टी बिलख रही है। लेकिन सुनेगा कौन? क्योंकि आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मधुबनी जिले के बलिराजगढ़ में उत्खनन के लिए एक कागज़ पर मंजूरी क्या दिया, मिथिला के लोग यह दावा करने लगे कि यह उत्खनन मिथिला की इतिहास और गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत को उजागर करेगी। इस &#8216;तथाकथित उत्खनन&#8217; से किसे कितना लाभ होगा, यह तो सत्ता में बैठे गणमान्य के अलावे बलिराजगढ़ की वीरान बंजर जमीन जानती ही हैं। </strong></p>
<p>आज मिथिला में स्थिति यह है कि जिस कार्य पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने कार्यादेश का फरमान जारी किया है, और यह भी कहा है कि यह फरमान एक वर्ष की अवधि के लिए ही मान्य है; मिथिला के लोग इतने प्रसन्न हैं कि वे 3 जनवरी, 1975 को मिथिला के समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर बम्ब धमाके में मृत्यु को प्राप्त किये ललित नारायण मिश्र का नाम भी सुनना नहीं चाहते, जहां तक बलिराजगढ़ अन्वेषण और उत्खनन का सवाल है। आज मिथिला के नेताद्वय, जो अपने हाथों में बलिराजगढ़ के बारे में कागज के पन्नों पर लिखे तथ्यों को आने से पहले नाम तक नहीं जाते थे, उसकी भौगोलिक स्थिति के बारे में कहना ही क्या, अख़बारों के पन्नों से लेकर टीवी के पर्दों और सामाजिक क्षेत्र के मीडिया प्लेटफॉर्मों पर अपनी-अपनी छवि देखकर प्रसन्न हो रहे हैं। इसे कहते हैं राजनीति। वैसे बलिराजगढ़ में उत्खनन से क्या निकलेगा यह तो समय निर्धारित करेगा। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2352-scaled.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2352-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="aligncenter size-full wp-image-7421" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2352-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2352-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2352-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2352-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2352-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2352-2048x1150.jpg 2048w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p><strong>हकीकत यह है कि अगर ललित नारायण मिश्र, प्रोफ़ेसर उपेंद्र ठाकुर, डॉ. सीताराम रॉय, डॉ. शिवकुमार मिश्र, पटना उच्च न्यायालय के अधिवक्ता सुनील कुमार कर्ण ​(कर्ण द्वारा पटना उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर नहीं किया गया होता), या साईकिल से मिथिला के पुरातत्वों की खोज करने वाले मुरारी कुमार झा बलिराजगढ़ के बारे में पिछले चार-पांच दशक और अधिक समय पूर्व से आज तक नहीं लिखे होते, प्रश्न नहीं ​किये होते, न्यायालय में सरकार के रवैय्ये की बात नहीं उठाये होते, तो शायद आज ये &#8216;सफेदपोश&#8221; नेतागण बलिराजगढ़ का नाम भी नहीं जानते। अगर ऐसा नहीं होता तो पटना उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर होने के बाद सत्ता के गलियारे से याचिककर्ता के घर में फोन की घंटी नहीं बजी होती &#8211; याचिका वापस लें, वापस लें, नहीं कहा गया होता, न्यायालय में जनहित याचिका &#8216;डिस्पोज ऑफ&#8217; के बदल &#8216;डिसमिस&#8217; नहीं किया गया होता । आज प्रदेश  मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कालखंड में बलिराजगढ़ में एकत्रित जल में गाय-भैंस-बकरी नहाता है, लोग-बाग़ खुले में शौच करते हैं, अपनी-अपनी गाड़ियां धोते हैं, बच्चे उस परिसर में क्रिकेट खेलते हैं और दरवाजे के आसपास कुत्ते विचरण करते हैं। जबकि सत्ता के गलियारे में मिथिला की गरिमा और संस्कृति की बात करते थक नहीं रहे हैं लोग। </strong></p>
<figure id="attachment_7429" aria-describedby="caption-attachment-7429" style="width: 1515px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-7.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-7.jpg" alt="" width="1515" height="1254" class="size-full wp-image-7429" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-7.jpg 1515w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-7-300x248.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-7-1024x848.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-7-768x636.jpg 768w" sizes="(max-width: 1515px) 100vw, 1515px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7429" class="wp-caption-text">उपेंद्र ठाकुर​ (अब दिवंगत)</figcaption></figure>
<p>आज से 34-वर्ष पहले दी जर्नल ऑफ़ दी बिहार रिसर्च सोसाइटी, जिसके संपादक रहे थे उपेंद्र ठाकुर, जनवरी-दिसंबर 1990-1992 के अंक (VOLS.LXXVI-LXXVIII) में &#8216;पुरातत्व की दृष्टि में मिथिलापुरी: बलिराजगढ़&#8217; शीर्षक में दस पन्नों का दस्तावेज-रूपी लेख प्रकाशित किया था। उपेंद्र ठाकुर मगध विश्वविद्यलय के एन्सिएंट इंडिया एंड एशियन स्टडीज के विभागध्यक्ष थे। इसी तरह सत्तर के दशक के उत्तरार्ध डॉ. सीताराम रॉय बलिराजगढ़ पर विस्तार से व्याख्या किय थे, जिसका दस्तवेजीकरण भी हुआ था, ताकि तत्कालीन सरकार, व्यवस्था और पुरात्तव से जुड़े लोगों का ध्यान बलिराजगढ़ की और आकर्षित किया जाय। </p>
<p>सैद्धांतिक रूप से इस लेख के प्रकाशन के पूर्व अथवा उसके बाद, बिहार के सत्ता के गलियारे में बैठे राजनेताओं, मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, संस्कृति मंत्री के कार्यालय में इस लेख की प्रतियां अवश्य गयी होगी। नब्बे के दशक में मुख्यमंत्री कार्यालय से डॉ. जगन्नाथ मिश्र कांग्रेस पार्टी को बोरिया-बिस्तर बांधकर विदा करने के बाद स्वयं निकल गए थे और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लालू प्रसाद यादव का आगमन हो गया। वैसे बिहार में जितने भी शोध संस्थान हैं, चाहे मिथिला शोध संस्थान  हो, मैथिली अकादमी हो, संस्कृत अकादमी हो, काशी प्रसाद जायसवाल शोध संसथान हो, यह बिहार रिसर्च सोसाइटी हो या अन्य, सबों की हालत और हालात प्रदेश के राजनेताओं के साथ-साथ स्वहित में उनके साथ जुड़े लोगों ने नेश्तोनाबूत कर दिया।  लालू यादव को प्रदेश के पुरातत्व से कितना लगाव था, यह तो सर्वविदित है। </p>
<figure id="attachment_7422" aria-describedby="caption-attachment-7422" style="width: 1363px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-3.jpg" alt="" width="1363" height="1993" class="size-full wp-image-7422" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-3.jpg 1363w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-3-205x300.jpg 205w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-3-700x1024.jpg 700w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-3-768x1123.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-3-1050x1536.jpg 1050w" sizes="auto, (max-width: 1363px) 100vw, 1363px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7422" class="wp-caption-text">कुदाल सेना के संस्थापक राम लखन झा (अब दिवंगत)</figcaption></figure>
<p><strong>कुदाल सेना और बलिराजगढ़ </strong></p>
<p>आज के लोगों को तो शायद यह भी ज्ञात नहीं होगा कि बलिराजगढ़ की खुदाई के लिए नब्बे के दशक के पूर्वार्ध वर्षों में रामलखन झा ने कुदाल सेना&#8217; का गठन कर दिया था। झा उन दिनों, न केवल प्रदेश में सत्ता के गलियारे में कुर्सी तोड़ते नेताओं और अधिकारियों को ललकार था, बल्कि प्रदेश क विद्वानों, विदुषियों और पुरातत्व प्रेमियों को आह्वान भी किया था कि वे मिथिला की सांस्कृतिक इतिहास और गरिमा को स्थापित और मजबूत करने क लिए बलिराजगढ़ की खुदाई करने आगे आएं। क्योंकि व्यवस्था इस दिशा में अपना  कदम नहीं उठा रहा था। उन दिनों उनकी बातों को बहुत ही प्रमुखता के साथ तत्कालीन अख़बारों में स्थान मिला था। वे कुदाल सेना का गठन किये थे। लेकिन सरकार में बैठे लोग कान में तेल और रुई डालकर सो गए थे। राजनीति में बैठे लोग समाज की संस्कृति के साथ कितने जुड़े होते हैं यह आज भी प्रदेश के उपेक्षित पुरातत्व स्थानों के साथ साथ बंजर और वीरान पड़े बलिराजगढ़ ज्वलंत दृष्टान्त है। </p>
<figure id="attachment_7432" aria-describedby="caption-attachment-7432" style="width: 776px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Sunil-umar-karn.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Sunil-umar-karn.jpg" alt="" width="776" height="967" class="size-full wp-image-7432" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Sunil-umar-karn.jpg 776w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Sunil-umar-karn-241x300.jpg 241w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Sunil-umar-karn-768x957.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 776px) 100vw, 776px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7432" class="wp-caption-text">सुनील कुमार कर्ण, अधिवक्ता, पटना उच्च न्यायालय</figcaption></figure>
<p><strong>बिहार रिसर्च सोसाइटी की भूमिका </strong></p>
<p>बिहार रिसर्च सोसाइटी, देश के इंडोलॉजिकल और ओरिएंटल स्टडीज़ के सबसे पुराने इंस्टीट्यूशन में से एक है, जो रिसर्चर्स के लिए स्वर्ग था। 108 साल पहले इसकी शुरुआत से ही दुनिया भर के स्कॉलर्स इस केंद्र में आते रहे हैं, जिसके पास 10,000 से ज़्यादा संस्कृत और तिब्बती मैन्युस्क्रिप्ट्स का रेयर और मशहूर कलेक्शन है। जनवरी 1915 में पटना में बिहार और उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी के तौर पर उस समय के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर चार्ल्स एस बेली की चेयरमैनशिप में शुरू हुई यह इंस्टीट्यूशन हिस्ट्री, आर्कियोलॉजी, न्यूमिज़माटिक्स, फिलॉसफी, फिलोलॉजी, एंथ्रोपोलॉजी और फोकलोर में रिसर्चर्स के एकेडमिक इंटरेस्ट को पूरा करती रही। बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी के बाद बिहार रिसर्च सोसाइटी अपनी तरह की दूसरी सबसे पुरानी इंस्टीट्यूशन है। </p>
<p>शायद आज के लोगों को मालूम हो अथवा नहीं, बिहार बनने के कुछ समय बाद ही, सरकार ने राज्य में संस्कृत स्टडी को रीऑर्गेनाइज़ करने का काम शुरू किया। सरकार की स्कीम में एक काम संस्कृत मैन्युस्क्रिप्ट्स का सर्वे करना था। इस मकसद के लिए दो इलाकों, मिथिला और पुरी को चुना गया। मिथिला में खोज के नतीजे में, स्मृति, साहित्य, ज्योतिष और वेदों पर मैन्युस्क्रिप्ट्स की चार वॉल्यूम की एक डिस्क्रिप्टिव कैटलॉग पब्लिश हुई। सोसाइटी ने आगे पूर्णिया, शाहाबाद, भागलपुर, पटना और गया ज़िलों पर डॉ. बुकानन की रिपोर्ट्स पब्लिश कीं। ये पब्लिकेशन इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी में रखी ओरिजिनल मैन्युस्क्रिप्ट्स और डॉ. बुकानन की रखी डायरियों से किए गए थे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-1.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="alignright size-full wp-image-7423" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-1.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-1-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-1-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-1-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-1-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p>एंथ्रोपोलॉजी के क्षेत्र में भी, बिहार रिसर्च सोसाइटी ने कीमती योगदान दिया है। इसके पहले सेक्रेटरी, राय बहादुर एस सी रॉय ने आदिवासियों के सामाजिक संगठन और रीति-रिवाजों का अध्ययन करने के लिए छोटानागपुर क्षेत्र का एक बड़ा सर्वे किया। नतीजे सोसाइटी के जर्नल में पब्लिश किए गए। सोसाइटी ने भारतीय इतिहास और आर्कियोलॉजी के क्षेत्र में भी बड़ी तरक्की की। हालांकि, बिहार रिसर्च सोसाइटी का सबसे कीमती सेक्शन तिब्बती सेक्शन है। </p>
<p>असल में, यह तिब्बत में जमा किए गए भारतीय रिपॉजिटरी का एक हिस्सा है, जिसे मशहूर भारतीय पंडितों, खासकर बौद्धों ने, जो पुराने समय में अपने धर्म और ज्ञान का प्रचार करने के लिए वहां गए थे। यह सेक्शन महापंडित राहुल सांकृत्यायन की कड़ी मेहनत की वजह से बना है, जो इंडोलॉजी के इतिहास में एक बड़ा नाम है। राहुल कलेक्शन में संस्कृत किताबों के तिब्बती भाषा में सही अनुवाद हैं, जो ज़्यादातर 7वीं और 13वीं सदी AD के बीच तिब्बती बौद्ध भिक्षुओं ने लिखे थे, जो संस्कृत साहित्य के अच्छे जानकार थे। इस कलेक्शन में हाथ से बने कागज़ पर लकड़ी के ब्लॉक से छपी ज़िलोग्राफ़्ड किताबें, खुरदुरे कागज़ पर हाथ से लिखी कुछ मैन्युस्क्रिप्ट और पुरानी मैथिली में तालपत्र पर लिखे संस्कृत के फ़ोटो वाले टेक्स्ट शामिल हैं।</p>
<p>1930 के दशक में एक महान बौद्ध विद्वान, पंडित राहुल सांकृत्यायन ने तिब्बत से बहुत सारी मैन्युस्क्रिप्ट्स दान की थीं जो आज भी दुनिया में रेयर हैं। दान की गई चीज़ों में ज़ाइलोग्राफ, फिल्म शामिल थीं। नेगेटिव और पेंटिंग के अलावा बौद्ध धर्म, फिलॉसफी, तंत्र, आर्ट और कल्चर पर ज़रूरी किताबें भी हैं। सोसाइटी के पास जो तिब्बती ग्रंथ हैं, वे ल्हासा एडिशन हैं और उनकी एक्यूरेसी और अच्छी प्रिंटिंग को देखते हुए उन्हें सबसे अच्छा एडिशन माना जाता है। कांग-ग्यूर (कैनन) और तांग-ग्यूर (कमेंट्री) सीरीज़ के पूरे टेक्स्ट के अलावा, इस सेक्शन में इतिहास, फिलॉसफी, ज्योतिष और भारतीय और तिब्बती भिक्षुओं की बायोग्राफी समेत अलग-अलग टॉपिक पर 1619 अलग-अलग टेक्स्ट हैं, जिनमें से कई नालंदा और विक्रमशिला की पुरानी यूनिवर्सिटी से जुड़े हैं। जब दलाई लामा फरवरी 1979 में BRS आए, तो वे इसका बड़ा कलेक्शन देखकर बहुत खुश हुए।</p>
<p><strong>बहरहाल, 2004 के कालखंड में राज्य सरकार ने पटना के सिर्फ़ 88 साल पुराने अंतराष्ट्रीय लेवल पर मशहूर इंडोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट, बिहार रिसर्च सोसाइटी (BRS) को अपने कब्ज़े में लेने का फ़ैसला किया। जैसे ही सोसाइटी यह फैसला हुआ, सोसाइटी में सभी एकेडमिक और रिसर्च एक्टिविटीज़ पूरी तरह से रुक गई। 2 मार्च, 2009 को तत्कालीन सर्कार ने इसे पूर्णरूपेण अधिग्रहित कर ली। और उसके बाद बिहार रिसर्च सोसाइटी ही नहीं, प्रदेश के अन्य शोध संस्थानों का जो हश्र हुआ वह सर्वविदित हैं। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2369-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2369-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="aligncenter size-full wp-image-7424" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2369-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2369-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2369-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2369-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2369-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2369-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p><strong>आइये बलिराजगढ़ चलते हैं</strong></p>
<p><strong>आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम ​बिहार राज्य इंटेक के को-कन्वेनर और पुरातत्वविद डॉ. शिव कुमार मिश्र</strong> से पुरातत्व की दृष्टि में मिथिला, खासकर बलिराजगढ़ के बारे में ​विस्तार से बातचीत किया। वे कहते हैं कि भारत-नेपाल सीमा के निकट बिहार के उत्तरी भाग में करीब दो सौ एकड़ का एक विशाल भू-भाग है जिसे लोग बलिराजगढ़ (मधुबनी जिला) या बलीगढ़ या बलराजगढ़ के नाम से जानते हैं। यद्यपि यह स्थल बिहार के अन्य प्राचीन स्थलों से अधिक आकर्षक है किन्तु इसके ऐतिहासिकता के लिए सामग्रियों का सर्वथा अभाव है। बिहार एवं मिथिला के इतिहास लेखकों में इस स्थल के प्रति कोई विशेष अभिरुचि नहीं मिलती है। अभी तक इस स्थल का पुरातात्विक उत्खनन कार्य तीन बार हो चुका है। यद्यपि पुरातात्विक दृष्टिकोण से ये उत्खनन अत्यल्प एवं अपूर्ण रहे हैं किन्तु इससे प्राप्त पुरावशेष मिथिला एवं बिहार की गौरवशाली संस्कृति को प्रतिबिंबित करती है।</p>
<p>मिश्र का कहना है कि बलिराजगढ़ की ऐतिहासिकता पर मतैक्य नहीं है। स्थानीय परम्परानुसार यह महाकाव्यों एवं पुराणों में वर्णित दानवराज बलि की राजधानी का ध्वंसावशेष है किन्तु पुरातात्विक उत्खननों से जानकारी मिलती है कि इसका निर्माण दूसरी सदी ई.पू. में हुआ था। इस प्रकार स्थानीय परंपरा को सही मानना अनुचित होगा। ओ मैले के अनुसार स्थानीय लोगों का विश्वास या कि इस समय भी राजा बलि अपने सैनिकों के साथ इस किले में रहते हैं। और इसी सम्भावना के भय से कोई भी इस भूमि को खेती के लिए जोतने को हिम्मत नहीं करता था। वे केवल दिन में मवेशियों को इस भूमि पर चराते थे किन्तु रात को इसे देखने से भी डरते थे। इस तरह प्रचलित अफवाहों के चलते इस भूमि एवं किला की सुरक्षा अपने-आप होती रही। </p>
<p><strong>उन्होंने आगे कहा कि एक अनुमण्डल अधिकारी ने इस गढ़ का उत्खनन कराना आरम्भ किया किन्तु वह गंभीर रूप से बुखार से पीड़ित हो गया। जिससे लोगों में यह अवधारणा बनी कि राजा बल ने ही उसे बीमार कर दिया है। बुकानन के अनुसार बेणु, बरिजन एवं सहस्रमल का चौथा भाई बल एक राजा था। इन चारों भाइयों ने एक-एक किला बनवाया जो उनके नामों से जाना जाता है। इन्हीं किलाओं में से बलिराजगढ़ भी एक है। </strong></p>
<p>मिश्र का मानना है कि बुकानन के अनुसार वे लोग डोमकटा ब्राह्मण थे, जो महाभारत में वर्णित राजा विराट के बाद तथा युधिष्ठिर के समकालीन थे। लेकिन इस मत को स्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि अन्य किलाओं से बलराजगढ़ बहुत दूर है साथ ही सहसमल के किले की पहचान अभी तक नहीं की जा सकी है। एक अन्य विद्वान ने इस गढ़ को विदेहराज जनक के अन्तिम सम्राट द्वारा निर्मित माना है। </p>
<figure id="attachment_7425" aria-describedby="caption-attachment-7425" style="width: 1515px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-6.jpg" alt="" width="1515" height="1254" class="size-full wp-image-7425" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-6.jpg 1515w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-6-300x248.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-6-1024x848.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-6-768x636.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1515px) 100vw, 1515px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7425" class="wp-caption-text">बिहार राज्य इंटेक के को-कन्वेनर और पुरातत्वविद डॉ. शिव कुमार मिश्र</figcaption></figure>
<p>​शिव कुमार मिश्र के अनुसार जनक राजवंश के अंतिम चरण में आकर जनक वंश कई शाखाओं में बंट गया और उन शाखाओं का शासन विदेह राज्य के अन्तर्गत ही विभिन्न भूखण्डों पर रहा होगा और यह गढ़ उन्हीं में से किसी एक शाखा द्वारा बनवाया गया किला का ध्वंसावशेष है। उनके अनुसार किसी बलवान राजा द्वारा निर्मित कराने के कारण ही इस किला का नाम बलीगढ़ पड़ा। किन्तु इस मत के लिए ऐतिहासिक तथ्यों का सर्वथा अभाव है। प्रो. उपेंद्र झा ने बलिगढ़ का उल्लेख करते हुए लिखा है कि प्रख्यात चीनी यात्री हेनसांग ने तीरभुक्ति भ्रमण के क्रम में वैशाली गए तथा वैशाली से चेन-सु-ना सम्भवतः बलिगढ़ गए और वहाँ से बड़ी नदी अर्थात् महानंदा के निकट गए।</p>
<blockquote><p>शिव कुमार मिश्र कहते हैं कि बलिराजगढ़ की ऐतिहासिकता के लिए एक तर्क यह है कि विदेह राज जनक की राजधानी अर्थात् रामायण में वर्णित मिथिलापुरी यहीं स्थित थी। यद्यपि मिथिलापुरी की समता आधुनिक जनकपुर (नेपाल) से की गई है किन्तु पुरातात्विक सामग्रियों के अभाव में इसे सीधे मान लेना कठिन है। अन्यान्य विद्वानों ने भी आधुनिक जनकपुर को प्राचीन मिथिलापुरी मानने से इन्कार किया है। रामायण के अनुसार राम, लक्ष्मण एवं विश्वामित्रजी गौतम-आश्रम से ईशानकोण की ओर चलकर मिथिला नरेश के यज्ञमण्डप पहुंचे।&#8221; गौतमआश्रम की पहचान दरभंगा जिले के बह्मपुर गाँव से की गई है। जिसका उल्लेख स्कन्दपुराण में भी मिलता है। आधुनिक जनकपुर गौतम आश्रम अर्थात् ब्रह्मपुर से ईशानकोण में न होकर उत्तर दिशा में है। </p></blockquote>
<p>इस तरह गौतम आश्रम से ईशानकोण में बलिराजगढ़ को छोड़कर कोई ऐसा ऐतिहासिक स्थल नहीं दिखाई देता है जिस पर प्राचीन मिथिलापुरी होने की सम्भावना व्यक्त किया जा सके। पुनः पुरातात्त्विक उत्खननों के रिपोर्टों से ऐसी सूचना मिलती है कि पानी की सतह ऊँची रहने के कारण पूर्ण उत्खनन नहीं हो सका फिर भी तीसरी शताब्दी ई.पू. के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। इसलिए ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि पूर्ण उत्खनन होने पर तीसरी शताब्दी ई.पू. से पहले की सामग्री भी निश्चित रूप से प्राप्त हो सकती है। अब गौतम आश्रम से ईशानकोण में इस तरह के पुरावशेष अन्य स्थानों से नहीं प्राप्त हुए हैं अतः बलिराजगढ़ के पक्ष में ऐसा तर्क दिया जा सकता है कि बाल्मीकि की मिथिलापुरी इसी स्थल पर स्थित थी।</p>
<p>मिश्र का कहना है कि पालि साहित्य में कहा गया है कि अंग की राजधानी चंपा (आधुनिक भागलपुर) से मिथिला नगर की दूरी साठ योजन थी। महाउम्मग्ग जातक के अनुसार नगर के चारों द्वारों पर चार बाजार थे जिसे यवभञ्ज्यक कहा जाता था। भिक्षा के लिए पांच घर बनवाए गए थे जो चारों द्वारों पर एवं नगर के बीच में अवस्थित थे। नगर को चारों तरफ से पार करने के लिए गलियारे बने हुए थे। जातकों में दीवारों, द्वारों एवं परकोटों का भी उल्लेख मिलता है। राजा ऊपर के महल में रहते थे। महल में हवा आने के लिए पूरब से खिड़की रहता था। इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि बौद्ध काल में मिथिला नगर बहुत विकसित था। और इस तरह के विकसित नगर का पुरावशेष मिथिला में अन्यत्र कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। अतः इस आधार पर भी कहा जा सकता है कि बौद्धकालीन मिथिलानगर का ध्वंशावशेष भी बलिराजगढ़ ही है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-2.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="aligncenter size-full wp-image-7426" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-2.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-2-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-2-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-2-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-2-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a></p>
<p>मिश्र आगे कहते हैं कि महाभारत में मिथिला के अन्तिम राजा कराल जनक का उल्लेख है तथा बौद्ध साहित्य में कलार जनक का उल्लेख है। सम्भवतः दोनों एक ही था। कलार जनक का समय आठवी शताब्दी ई.पू. माना गया है। बौद्ध ग्रन्य दीपवंश से संकेत मिलता है कि कलार जनक के पश्चात् उसके वंश के पच्चीस राजाओं ने मिथिला नगर पर शासन किया किन्तु इन राजाओं के नामों का उल्लेख नहीं किया गया है। प्रोफेसर योगेन्द्र मिश्र ने भी कलार जनक के पश्चात् इक्कीस राजाओं द्वारा मिथिला पर शासन करने की बात स्वीकार की है। उनके अनुसार कराल जनक के पश्चात् ई.पू. 347 तक विदेह में राजतन्त्र स्थापित था। ऐसा लगता है कि ई.पू. चौथी सदी के पश्चात् विदेह राज्य का क्षेत्र छोटा हो गया तथा छोटे-छोटे राजा इस पर शासन करने लगे। बलिराजगढ़ के अल्प उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों से इस बात की पुष्टि होती है कि इन कालों में भी प्रशासन का केन्द्र यहीं रहा। साथ ही मौर्य, गुप्त एवं बाद के समयों के प्राप्त पुरावशेषों से भी यह बात साबित होती है कि बलिराजगढ़ इन कालों में प्रशासनिक केन्द्र रहा तथा यहाँ एक विकसित एवं सुव्यवस्थित नगर बना रहा।</p>
<p><strong>मिश्र जी कहते हैं सर्वप्रथम आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के मध्य-पूर्वी अंचल द्वारा 1962-63 ई. में एक लघुस्तर का उत्खनन कराया गया। ​उसके अनुसार सुरक्षा दीवार मिट्टी की ईटों से निर्मित है तथा ऐसा लगता है कि इसका निर्माण दूसरी शताब्दी ई.पू. में हुआ जिसका उपयोग पालवंश के समय तक हुआ। दीवार का निर्माण एवं मरम्मत कार्य तीन चरणों में हुआ। ऐसा लगता है कि किसी भीषण बाढ़ में दीवार क्षतिग्रस्त हो गया जिसका पुनर्निर्माण कराया गया हो। रिपोर्ट के अनुसार सिक्के, हड्डियों के औजार, मनके, शुंगकालीन मिट्टी से निर्मित मूर्तियों के फलक तथा एक मन्दिर का भग्नावशेष आदि प्राप्त हुए हैं। प्राप्त फलकों में  बाएँ सिर कटी हुई महिला तथा दाएँ पुरुष के सिर का फलक है। पुरुष के सिर पर पगड़ी तथा आभूषण दिखाई दे रहे हैं। महिला का चित्र भी आभूषणों से सुसज्जित मालूम होता है। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-last.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-last.jpg" alt="" width="2047" height="1150" class="alignright size-full wp-image-7433" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-last.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-last-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-last-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-last-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-last-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>चित्र IB किसी देवता का फलक जैसा मालूम होता है। चित्र IC मिथुन फलक है इसमें मकर का चित्र भी नीचे से दिखाई देता है जिससे किसी देवी का फलक होने की सम्भावना लगती है। गंगादेवी का वाहन मकर है फिर भी इस फलक के लक्षणों से गंगादेवी के फलक की संज्ञा देना सम्भव नहीं जान पड़ता। लक्षणों से यह मिथुन फलक जैसा ही मालूम पड़ता है जिसका सिर चित्र 1A के सिर से मिलता है। मिथुन फलक आभूषणों एवं वस्त्रों से सुसज्जित दिखाई देता है। सिर पर बड़ी पगढ़ी तथा गले में हार है, हाथ में कोई अख जैसा मालूम होता है। फलक का दूसरा भाग टूटा हुआ मालूम पड़ता है किन्तु फलक पर बारीकी से कारीगरी की गई है। ID चित्र में बाएँ से एक महिला एक बच्चा को अपनी गोद में लेकर खड़ी है। इसे &#8216;अंक धात्री&#8217; का फलक माना जा सकता है। दाहिनी ओर की फलक में एक महिला एक बच्चा की गोद में लेकर खड़ी है। बच्चा का बायाँ हाथ महिला के बाएँ स्तन को स्पर्श कर रहा है जिससे स्पष्ट होता है कि माँ एवं बच्चा का यह फलक है जिसे &#8216;क्षीर भात्री&#8217; की संज्ञा दी जा सकती है। इस फलक की महिला का सिर टूटा हुआ है तथा गर्दन में एक सुन्दर हार है जो दोनों स्तन को स्पर्श करती हुई नीचे तक लटकती है। अंक धात्री का सिर साड़ी से ढ़का हुआ है तथा ललाट में बिन्दी जैसा मालूम होता है। इससे ऐसा संकेत मिलता है कि उसी काल से मिथिला की नारियों में सिर पर साड़ी लेने एवं बिन्दी करने की परम्परा कायम है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2361-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2361-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="aligncenter size-full wp-image-7427" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2361-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2361-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2361-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2361-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2361-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2361-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p>​शिवकुमार मिश्र आगे कहते हैं कि पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय बिहार, पटना, के तत्वावधान में 1972-73 में दूसरी बार उत्खनन कार्य चलाया गया। इस रिपोर्ट के अनुसार किले की सुरक्षा-दीवार का निर्माण दो चरणों में कराया गया। पहले चरण में 50x20x4 में से.मी. आकार के बड़े ईटों का प्रयोग किया गया था। ऐसा लगता है कि असली दीवार किसी भीषण बाढ़ में क्षतिग्रस्त हो गया जिसे बाद में पुनर्निर्माण कराया गया। असली दीवार उत्तरी-कृष्ण-मार्जित (एन.बी.पी.) मृदभाण्ड के टुकड़े मिले हैं जिससे ऐसा अनुमान लगाया गया है कि दूसरी सदी ई.पू. में इसका निर्माण हुआ था। रिपोर्ट के अनुसार दो सांस्कृतिक कालों के पुरावशेष मिले हैं। प्राप्त पुरावशेषों में हड्डी की कीलें, कान्ति ताम्र सिक्के, ताम्बे और एन्टीमनी छड़े, मिट्टी की पकी हुई गोलियाँ एवं मनके, स्वस्तिक चिह्न के साथ एक सील, एक लोहे का कुल्हारी एवं अत्यन्त सुन्दर तथा अर्द्ध-कीमती पत्थरों के मनके आदि है। इन पुरावशेषों के साथ-साथ उत्तरी-कृष्ण-मार्जित मृदभाण्ड (एन.बी.पी. वेयर) एवं धूसर और लाल मृदभाण्ड के टुकड़े मिले है।</p>
<p>​<strong>उस रिपोर्ट के अनुसार मिट्टी से निर्मित कुछ मूर्तियों के फलक प्राप्त हुए है जो दूसरी सदी ई.पू. से दूसरी सदी ई. के हैं किन्तु एक पुरात्तत्त्वविद् इसे शतप्रतिशत सही नहीं मानते हैं। उनके अनुसार चित्र 2A में सबसे ऊपर बीच का फलक गुप्तकाल (पांचवीं-छठी सदी ई.) का है एवं ऊँगलियों से बनाया गया है। सबसे नीचे बायीं ओर का फलक किसी महिला का है जिसका समय गुप्तकाल में रखना उचित होगा। चित्र 24 में दाहिनी ओर के फलक को किसी बौने का फलक कहा गया है। किन्तु इस फलक में चित्र को नंगा दिखाया गया है जो किसी बौना के लिए सम्भव नहीं है अतः यह किसी बच्चा के चित्र का फलक है। इस चित्र में बच्चा हँस रहा है जिससे उसके कुछ दाँत स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो रहे हैं। बच्चा की कमर में चौड़ी कमरबन्द, बाँहों में भुजबन्द तथा पाँवों में चौड़ी पट्टियों है तथा हाथों में कोई एक लम्बा वस्तु या खिलौना है।</strong> </p>
<p>इसका काल दूसरी सदी ई.पू. न होकर छठी सदी ई. मानना उचित होगा। चित्र 2B के मूर्तियों को भी दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी सदी ई. के बीच का माना गया है जबकि सबसे नीचे हाथी (बाएँ का चित्र) के मूर्ति का काल तीसरी सदी ई.पू. अर्थात् उत्तर मौर्यकाल में रखा जा सकता है। इस चित्र में अन्य मूर्तियाँ भेड़, सांड़ आदि जानवरों का है। इसी उत्खनन में दूसरे काल अर्थात् ​200 ई, से ​600 ई. तक के भी पुरावशेष मिले हैं जिनमें मिट्टी से निर्मित पशुओं की मूर्तियाँ, पत्थरों के मनके, मिट्टी की पकी हुई गोलियों एवं वृत्ताकार छिद्रयुक्त आयताकार खपड़े आदि प्रमुख है। इस दूसरी सतह की मोटाई 1.60 मीटर है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2360-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2360-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="aligncenter size-full wp-image-7428" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2360-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2360-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2360-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2360-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2360-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2360-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p><strong>1974-75 ई. में भी इसी विभाग के द्वारा उत्खनन कार्य कराया गया। इस वर्ष भी पानी के ऊँची सतह के कारण पूर्ण उत्खनन कार्य नहीं हो सका। पहले की भाँति सांस्कृतिक कालों की जानकारी इस वर्ष भी मिली। पहले काल में पुरुष एवं महिला के चित्रों के फलक, पशुओं एवं जानवरों के चित्रों के फलक मिले हैं। अन्य महत्वपूर्ण पुरावशेषों में मिट्टी के पके हुए पहिए, टूटे हुए खिलौने के गाड़ी, कापर-एन्टीमनी छड़, लोहे की कीलें तथा विभिन्न अर्द्ध कीमती (अर्द्ध-बहुमूल्य) पत्थरों से निर्मित विभिन्न आकार के मनके आदि मिले हैं। इस सतह से उत्तरी-कृष्ण-मार्जित मृद्भाण्ड तथा धूसर एवं लाल मृद्भाण्ड के टुकड़े मिले हैं जिनके कंधे पर नक्काशी के चित्र मिलते है। पहले उत्खनन की भाँति खपड़े भी मिले हैं। दूसरे सांस्कृतिक काल के पुरावशेषों में, मिट्टी से निर्मित जानवरों के मूर्तियाँ, पत्थरों के मनके, मिट्टी की पकी हुई मनके एवं गोलियाँ, मुद्भाण्ड के टुकड़े आदि मिले हैं। इस उत्खनन से प्राप्त मिट्टी से निर्मित मूर्तियों के फलक चित्र 3.A एवं 38 में है। इन्हें शुंगकालीन माना गया है। किन्तु चित्र 3A का बीच वाला मूर्ति गुप्तकालीन है। यह मूर्ति अजमुखी नैगमेष की है। नैगमेष को संतानदायिनी देवी &#8216;षष्ठी&#8217; का पति कहा गया है।</strong></p>
<p>इस प्रकार इन उत्खनन कार्यों के रिपोर्टों से स्पष्ट रूप से दो सांस्कृतिक कालों की जानकारी मिलती है। पहले काल के अन्तर्गत तीसरी सदी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ई. सन् तक एवं दूसरे काल के अन्तर्गत दूसरी शताब्दी ई. से छठी शताब्दी ई. तक के पुरावशेष मिलते हैं। गढ़ की सुरक्षा दीवार का निर्माण दो चरणों में हुआ था। प्रथम चरण 50x20x4 से.मी. माप के ईंटों का प्रयोग हुआ है जबकि दूसरे चरण में 40x20x2 से.मी. माप का। यद्यपि उत्खनन कार्य एक बहुत ही कम स्थान पर किया गया है किन्तु उससे बड़े ही महत्वपूर्ण पुरावशेष मिले हैं। प्रथम काल के अन्तर्गत लगभग दो मीटर मोटी सतह मिलती है जिसमें पक्की ईंटों से निर्मित आवासीय मकानों के अवशेष प्राप्त हुए है। इसमें एक कूओं मिला है जिसका व्यास 1.40 मीटर है तथा यह फनाकार ईंटों से निर्मित है। एक मण्डल-कूप (रिंगवेल) भी मिलता है जिसके व्यास का माप 1.25 मीटर है।</p>
<figure id="attachment_7430" aria-describedby="caption-attachment-7430" style="width: 1363px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-4.jpg" alt="" width="1363" height="698" class="size-full wp-image-7430" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-4.jpg 1363w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-4-300x154.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-4-1024x524.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Bali-4-768x393.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1363px) 100vw, 1363px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7430" class="wp-caption-text">शोधार्थी मुरारी कुमार झा और प्रोफ़ेसर जय शंकर झा</figcaption></figure>
<p>मिश्र का कहना है कि इसके निर्माण में फनाकार ईंटों का प्रयोग किया गया है जिसकी लम्बाई 24 से.मी. तथा एक ओर की चौड़ाई ​19 से.मी. और दूसरी ओर ​15 से.मी. चौड़ी है। ये ईंट ​2.5 से.मी. मोटी है। बड़ी संख्या में खंडित खपड़े मिलते हैं जो तत्कालीन खपड़ों की अच्छी बनावटों की सूचना देती है। ये आयताकार खपड़े एक तरफ वक्त है जिससे ऐसा मालूम होता है कि इसे बंधक विधि के द्वारा जोड़ा जाता था। मिट्टी से निर्मित पुरुष एवं श्री दोनों की ही मूर्तियाँ एवं फलकें मिलती हैं। ये मूर्तियाँ एवं फलकों के चित्र आभूषणों से सुसज्जित है तथा केश-विन्यास अनोखे ढंग से किए गए हैं। केश बाँधने का तरीका भी अत्यन्त ही सुन्दर है जिसे तत्कालीन समाज के श्रृंगार के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। विभिन्न प्रकार के आभूषणों, जो मूर्तियों पर मिलते हैं, वे तत्कालीन मूर्तिकारों की ही कुशलता को नहीं दर्शाती है बल्कि विभित्र प्रकार के स्वर्णकारों की कुशलता को भी स्पष्ट करते हैं। बिना फलक वाले मूर्तियों के केश-विन्याश एवं कलाकृति तत्कालीन सामाजिक लोगों के शारीरिक अंगों को भी प्रतिबिंबित करती है। </p>
<p>पशुओं एवं जानवरों की मूर्तियों, जिसमें अधिकांशतः सांड़ों एवं भेड़ों की मूर्तियां मिलती हैं। इससे तत्कालीन कृषि व्यवस्था तथा पशुपालन कार्य प्रतिबिम्बित होता है। इन पुरावशेषों के अलावा मिट्टी की पकी हुई गोलियों एवं मनके आदि मिलते है जिसमें ऐसा कहा जाता है कि बड़े गोलियों का प्रयोग युद्ध एवं बड़े जानवरों के शिकार के लिए किया जाता था जबकि छोटे गोलियों का प्रयोग सम्भवतः छोटी पक्षियों एवं छोटे जानवरों को चोट पहुँचाने के लिए किया जाता था। मिट्टी की पकी हुई मनके का प्रयोग सम्भवतः पशुओं को माला बनाकर पहनाने में किया जाता था। हड्डियों के कीलों का प्रयोग जानवरों का शिकार करने तथा मछलियों को मारने में किया जाता था।</p>
<p>उत्खनन से अनेक प्रकार के पत्थरों के मनके मिले हैं। इन पत्थरों में गोमेद, स्फटिक, जैस्पर, पुष्पराज (टोपैज), कानैलियन आदि प्रमुख हैं। मनकों का प्रयोग महिलाएँ माला बनाकर पहनने में करती थीं। उत्खनन से उत्तर-कृष्ण-मार्जित मृद्भाण्ड के टुकड़े के साथ ही धूसर एवं लाल मृद्भाण्ड के टुकड़े भी मिले हैं किन्तु पूरे सतह पर लाल मृ‌द्भाण्ड के उद्योग होने का प्रमाण मिलता है। उत्तरी-कृष्ण-मार्जित मृ‌द्भाण्ड के टुकड़ों में तस्तरी एवं कटोरे के आकार का ढाँचा मिलता है जो अत्यन्त ही सुन्दर हैं। काले, सुनहले एवं चाकलेट रंग में रंगे हुए मृद्भाण्ड के टुकड़े भी मिले हैं। काला एवं धूसर मृद्भाण्ड एवं उत्तरी-कृष्ण-मार्जित मृद्भाण्ड के टुकड़े प्रकार एवं बनावट में अलग नहीं मालूम होते हैं। लाल मृद्भाण्ड टुकड़ों के ढाँचों से अनेक प्रकार के बर्तनों के आकार-प्रकार के विषय में स्पष्टता होती है। इनके भांड, नाली या द्रोणिका, टोटीदार बर्तनें, मूठयुक्त कड़ाही एवं बर्तनें सछिद्र बर्तबाने (जार्स), ढक्कन वाली छोटी बर्तनें, मुठयुक्त ढक्कनें, कलशें आदि के बनावट मिलते हैं। लाल मृद्भाण्ड के कंधे पर बंधे हुए रस्सी की भाँति चित्र स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं साथ ही कुछ बर्तनों पर चटाई, बंशी या कंघी की भाँति छाप मिलते हैं। इस प्रकार तत्कालीन उद्योग-धंधों, रहन-सहन एवं कलाकारिता के विषय में स्पष्ट जानकारी मिलती है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2342-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2342-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="aligncenter size-full wp-image-7431" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2342-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2342-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2342-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2342-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2342-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2342-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p><strong>उपलब्ध सामग्रियों के आधार पर कहा जा सकता है कि बलिराजगढ़ प्राचीन मिथिलानगर का ध्वंशावशेष है तथा यहाँ सदियों तक एक सुन्दर एवं विकसित नगर स्थापित रहा किन्तु इस स्थल का पूर्ण पुरातात्विक उत्खनन एवं शोध होना अति आवश्यक है। इसके बाद ही इसका गौरवशाली इतिहास उजागर होगा। फिर भी यहाँ से प्राप्त पुरावशेषों से प्राचीन मिथिला एवं बिहार के लोगों के रहन-सहन, वेशभूषा, उद्योग-धंधे, धार्मिक एवं आर्थिक क्रियाकलापों के विषय में जानकारी मिलती है। कला के क्षेत्र में मूर्तिकारों की कुशलता देखने को मिलती है जो स्वर्णकारों की भी कुशलता को प्रतिबिंबित करती है। इससे स्पष्ट होता है कि मिथिला में शुंगकाल के पूर्व ही अनेक कलाओं का विकास हो चुका था जो मिथिला के इतिहास लेखन के लिए एक महत्वपूर्ण सामग्री है।</strong></p>
<p><strong>बलिराजगढ़ की सभी तस्वीरें : राज झा, मधुबनी </strong><br />
<strong>क्रमशः &#8230;.. </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-culture-of-mithila-buried-beneath-the-soil-is-telling-us-something">​बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-2)​ : मिट्टी के अंदर दबी मिथिला की संस्कृति जैसे कह रही है: &#8216;अंत तक पहुंचना हो तभी उत्खनन ​की शुरुआत करना&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-1): &#8216;अन्वेषण और उत्खनन&#8217; के नाम पर बहुत बड़ा खेल, अधिकारियों की निगाहें &#8216;निदेशक&#8217; की कुर्सी पर, मिथिला के नेताओं की नजर &#8216;कोषागार&#8217; पर, कहानियां अख़बारों के पन्नों पर और इतिहास पर गोबर पाथने की परम्परा</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/balirajgarh-a-big-game-in-the-name-of-exploration-and-excavation-part-1</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Mar 2026 11:58:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[archeology]]></category>
		<category><![CDATA[balirajgrh]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[excavation]]></category>
		<category><![CDATA[mithila]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बाबू बरही (झंझारपुर)/दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: ये दो तस्वीरें काफी है बिहार के लोगों की मानसिकता को दर्शाने के लिए। आप माने या न माने, आपकी मर्जी। यह महज दो तस्वीरें नहीं है, बल्कि प्रदेश के लोगों की मानसिकता, चाहे वे शिक्षित हो, विद्वान हों, विदुषी हों, अशिक्षित हों, नेता हों, अभिनेता हो, समाजसेवी हो, अधिकारी हों, पदाधिकारियों [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/balirajgarh-a-big-game-in-the-name-of-exploration-and-excavation-part-1">बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-1): &#8216;अन्वेषण और उत्खनन&#8217; के नाम पर बहुत बड़ा खेल, अधिकारियों की निगाहें &#8216;निदेशक&#8217; की कुर्सी पर, मिथिला के नेताओं की नजर &#8216;कोषागार&#8217; पर, कहानियां अख़बारों के पन्नों पर और इतिहास पर गोबर पाथने की परम्परा</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बाबू बरही (झंझारपुर)/दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: ये दो तस्वीरें काफी है बिहार के लोगों की मानसिकता को दर्शाने के लिए। आप माने या न माने, आपकी मर्जी। यह महज दो तस्वीरें नहीं है, बल्कि प्रदेश के लोगों की मानसिकता, चाहे वे शिक्षित हो, विद्वान हों, विदुषी हों, अशिक्षित हों, नेता हों, अभिनेता हो, समाजसेवी हो, अधिकारी हों, पदाधिकारियों हों, ठेकेदारों हों, धनाढ़्य हों, दरिद्र हों, नेता हों, मंत्री हों । यह दो तस्वीरें प्रदेश के नेताओं और अधिकारियों की, खासकर जो सत्ता के गलियारे में स्वयं को शक्तिहीन होने से अनवरत बचाने का प्रयास करते हैं, का जीता-जागता दृष्टान्त है, आप मानें या नहीं मानें आपकी मर्जी। </strong></p>
<p>इन दो तस्वीरों में एक तस्वीर 11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने के क्रम में अंग्रेजों की गोलियों से मृत्यु को प्राप्त किये क्रांतिकारी राम गोविन्द सिंह के पैतृक घर का दीवार है। राम गोविन्द सिंह दशरथ्था (पटना जिला) गांव के रहने वाले थे और पुनपुन हाई स्कूल के नौवीं कक्षा के छात्र थे। पटना सचिवालय के सामने स्थित सात-मूर्ति में एक राम गोविन्द सिंह भी हैं। पटना के तत्कालीन जिलाधिकारी डब्ल्यू जी आर्चर ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने  आदेश दिया था।मुझे उम्मीद है बिहार के 90 से अधिक फीसदी लोग, युवापीढ़ी, इस नाम से परिचित नहीं होंगे। दीवारों की दशा की बात छोड़िये। दूसरी तस्वीर झंझारपुर लोकसभा क्षेत्र के बलिराजगढ़ ब्लॉक में स्थित मिथिला ही नहीं, बिहार ही नहीं, सम्पूर्ण राष्ट्र की संस्कृति से जुड़े और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन बलिराजगढ़ किले का दीवार है। दोनों बिहार में ही है और दोनों दीवारों पर गोबर पाथने की परंपरा कल भी था, आज भी है और कल भी जारी रहेगा। </p>
<p><strong>हो भी कैसे ? आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण भले बिहार में शैक्षिक दर 74+ फीसदी पर हस्ताक्षर करे, प्रदेश के शिक्षा विभाग के अधिकारी, मंत्री राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर बिहार से प्रवासित और पलायित लोगों की उपलब्धियों पर अपना ठप्पा और मुहर लगाकर, बिहारी है-बिहारी है, कहकर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को लुभाकर राशियों का आवंटन कराने में सफल हो जाए;  हकीकत में बिहार का शैक्षिक दर क्या है? महिला और पुरुषों के शैक्षिक दर के बीच कितने का फासला है? उनकी सोच के बीच कितना बड़ा खाई है? प्रदेश के इतिहास और ऐतिहासिक स्थलों का महत्व उनकी नज़रों में, चाहे नेता हों, अभिनेता हों, अधिकारी हो, पदाधिकारी हों, मतदाता हों, कितना है &#8211; इस बात का साक्षात् दृष्टान्त यह दो तस्वीरें हैं। आप मानें या नहीं। </strong></p>
<figure id="attachment_7407" aria-describedby="caption-attachment-7407" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7407" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7407" class="wp-caption-text">बलिराजगढ़ का प्रवेश द्वार और कुत्ता -तस्वीर: श्री राज झा</figcaption></figure>
<p>श्रीकृष्ण सिन्हा को छोड़ दीजिये, सन 1961 से 2026 तक, विगत 65 वर्षों में बिहार का मुख्यमंत्री कार्यालय और कक्ष में 21 व्यक्तियों &#8211; बिनोदानंद झा, कृष्ण बल्लभ सहाय, महामाया प्रसाद सिन्हा, सतीश प्रसाद सिंह, बीपी मंडल, भोला पासवान  शास्त्री,हरिहर सिंह, दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर, केदार पांडे, अब्दुल गफूर, जगन्नाथ मिश्र, राम सुन्दर दास, चंद्रशेखर सिंह, बिंदेश्वरी दुबे, भागवत झा &#8216;आज़ाद&#8217;, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, जीतनराम मांझी और नीतीश कुमार &#8211; को कक्ष में आते, मंत्रिमंडल बनाते, फिर जाते देखा है। अपवाद को छोड़कर, किसी का भी, चाहे मुख्यमंत्री हों या मंत्रिमंडल के लोग, प्रदेश की ऐतिहासिक गरिमा को बचाने, सुरक्षित और संरक्षित रखने में &#8216;निजी अभिरुचि&#8217; नहीं दिखा। </p>
<blockquote><p>&#8216;आधिकारिक अभिरुचि&#8217; के अनेकानेक कारण हो सकते हैं। प्रदेश की राजनीतिक गलियारे में अपने-अपने वजूद को कायम रखने के लिए तमाम लोगों ने, कुछ मंच से, तो कुछ नेपथ्य से, वे सभी कार्य किये जिसकी जरुरत नहीं थी, जहाँ तक प्रदेश के विकास का, वजूद का सवाल था, और आज भी है। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो आज बाबूबरही विधानसभा क्षेत्र और झंझारपुर लोकसभा क्षेत्र में आने वाला बलिराजगढ़ भी नालंदा, राजगीर, पावापुरी, बोधगया, विक्रमशिला जैसे स्थानों की सूची में दर्ज होता। </p></blockquote>
<p>बाबूबरही विधान सभा क्षेत्र से 1977 से 2024 तक नौ विधायक चुनकर प्रदेश के विधानसभा की कुर्सी पर बैठे। उसी तरह झंझारपुर लोकसभा क्षेत्र से 1971 से 2024 तक नौ सांसद चुनकर गए। यह क्षेत्र मिथिला का क्षेत्र हैं जहाँ आज़ादी के बाद अभी तक शैक्षिक-दर मगध और भोजपुर क्षेत्र के शैक्षिक दरों से न्यूनतम नौ फीसदी कम है। मिथिला में जहाँ सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 55.18 फीसदी शैक्षिक दर है, वहीँ भोजपुर में 66.19 फीसदी और मगध में 64.92 फीसदी है। </p>
<p>बिहार के 38 जिलों से प्रदेश के विधानसभा में बैठने वाले कुल 243 विधायकों में 130-135 सम्मानित विधायकगण गंगा के उस पार, यानी मिथिला क्षेत्र से आते हैं; जबकि देश के संसद में बिहार से आने वाले 40 सांसदों में 24-25 सांसद मिथिला क्षेत्र से ही हैं। अब सवाल यह है कि जब ये सम्मानित विधायक और सम्मानित सांसदगण &#8216;जनहित&#8217; से अधिक &#8216;स्वहित&#8217; में विश्वास रखते हों, फिर बाबूबरही ब्लॉक स्थित बलिराजगढ़ ऐतिहासिक स्थल का यह हश्र होना, लाजिमी है। </p>
<p>विगत दिनों भारत के विज्ञापन-जगत के हस्ताक्षर और मधुबनी के विख्यात पत्रकार राज झा, जो बलिराजगढ़ का भ्रमण किये थे, उनके यह शब्द सम्पूर्ण गाथा का निचोड़ है। उन्होंने कहा: अभी वहां कुछ भी नहीं है। धूल उड़ रही है। चारो तरफ मिट्टी का पहाड़ है। बीच-बीच में खोदा हुआ है। कुछ दिखता नहीं है। थोड़ा बहुत ईंट पत्थर दीखता हैं। लोग क्रिकेट खेलने, गाय भैंस चराने, गाय-बैल-भैंस को नहलाने, गाडी धोने के लिए तालाब का इस्तेमाल करते हैं। हालाँकि बॉउण्टरी वाल है, लेकिन कई जगह से टूटी हुयी है। एक गेट है उसमें ताला लगा है और बंद है, जहाँ पुरातत्व का साइन बोर्ड लगा हुआ है। बाकी जगह से भी प्रवेश है। मंन्दिर के पास से आप प्रवेश कर सकते हैं। अंदर गए थे। उबड़ खाबड़ है। लोगों का कहना है कि खुदाई को रातो रात बंद कर दिया गया था। उसमें क्या मिला था, या नहीं मिला था लोगों को नहीं मालूम। मिटटी उबड़ खाबड़ है, समतल से बंद नहीं किया गया है। स्थानीय लोगों को कुछ भी जानकारी नहीं है इसके बारे में।&#8221; खैर। </p>
<figure id="attachment_7408" aria-describedby="caption-attachment-7408" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1437" class="size-full wp-image-7408" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-300x168.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-1536x862.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7408" class="wp-caption-text">बलिराजगढ़ परिसर में दशकों पहले हुए उत्खनन से बने तालाब, तालाब में जमा पानी और पानी में नाहते भैंस।  इससे बेहतर स्थिति नहीं हैं बिहार में ऐतिहासिक पुरातत्वों की। दुःखद। तस्वीर: श्री राज झा</figcaption></figure>
<p><strong>पिछले दिनों जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भारत सरकार के अन्वेषण और उत्खनन विभाग, धरोहर भवन, नई दिल्ली के  पत्रांक F.No. T-17033/9/2020-EE (13926)/26 फरवरी, 2026  में बिना किसी दीर्घकालीन स्थिरता वाली परियोजना बनाये भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक ने मंज़ूरी दी, साथ ही यह भी कहा कि यह मंज़ूरी इस पत्र के जारी होने की तारीख से एक साल के लिए वैद्य है, मन में सैकड़ों सवालों का उठना स्वाभाविक सा लगा। सबसे पहले यह लगा कि &#8220;कहीं यह आदेश सांकेतिक और राजनीतिक लाभ के लिए तो नहीं है ?&#8221; शायद बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि डॉ. हरिओम शरण जो अभी सुपरिन्टेन्डेन्ट आर्कियोलॉजिस्ट हैं, निदेशक की कुर्सी पर नजर लगाए हैं। लोगों का यह भी कहना है कि शायद बलिराजगढ़ के अवशेषों की खुदाई उनके प्रोफ़ाइल में एक ईंट का कार्य करेगा। </strong></p>
<p>पत्र में लिखा गया: &#8220;आर्कियोलॉजिकल वर्क्स कोड के पैरा 12.9.1 के तहत, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक की मंज़ूरी दी जाती है। यह मंजूरी बिहार के मधुबनी ज़िले के बलिराजगढ़ में राजा बलि का गढ़ नाम से मशहूर पुराने किले के अवशेषों पर खुदाई करने के लिए है। खुदाई की जाने वाली जगह को साथ में दिए गए साइट प्लान पर लाल रंग से मार्क किया गया है।</p>
<p>यह खुदाई डॉ. हरिओम शरण, सुपरिंटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, पटना सर्कल के डायरेक्शन में की जाएगी। आर्कियोलॉजिकल वर्क्स कोड के पैरा 12.9.1 से 12.15 के अनुसार, जहाँ भी ज़रूरत हो, खर्च की मंज़ूरी ली जा सकती है। खुदाई के दौरान मिली पुरानी चीज़ों की पूरी लिस्ट इस ऑफिस को दी जानी चाहिए। ऑफिसर को इस बारे में समय-समय पर जारी नियमों और निर्देशों का सख्ती से पालन करना चाहिए। खुदाई के नतीजों की एक डिटेल्ड रिपोर्ट फील्डवर्क पूरा होने के तीन महीने के अंदर डायरेक्टर जनरल को जमा करनी होगी। खुदाई का काम कब शुरू किया जाए और कब बंद किया जाए, इसकी जानकारी इस ऑफिस को दी जा सकती है। यह मंज़ूरी इस लेटर के जारी होने की तारीख से एक साल के लिए वैलिड है।&#8221; </p>
<blockquote><p>आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी, लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आला अधिकारी भी इस बात को स्वीकार करेंगे जिस आनन्-फानन में, बिना किसी दीर्घकालीन स्थिरता वाली परियोजना पर अध्ययन किये अन्वेषण और उत्खनन विभाग द्वारा यह पत्र निर्गत किया गया, &#8216;राजनीति से प्रेरित&#8217; है। यह आदेश किसी &#8216;अदृश्य इरादे&#8217; से भी निर्गत किया गया हो, नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है । भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में अधिकारीगण सिर्फ &#8216;ऊपर के आदेश&#8217; को मानते हैं और ऊपर का आदेश कहाँ से आता है, कब आता है &#8211; यह सभी जानते हैं। </p></blockquote>
<p>भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कार्यालय में &#8216;अपवाद को  छोड़कर&#8217;, शायद ही कोई अधिकारी हैं जो वास्तविक रूप से इन अन्वेषण और उत्खनन में विश्वास रहते हैं। सभी (अपवाद छोड़कर) की निगाहें &#8216;निदेशक&#8217; बनने अथवा अवकाश प्राप्ति से पूर्व सुरक्षित और सुसज्जित पदों पर आसीन होने का स्वप्न होता है। अब सवाल यह है कि अगर उत्खनन का आदेश बिना किसी दीर्घकालीन स्थिरता वाली परियोजना बनाये ही जारी किया गया है तो यकीन मानिये, यह राजनीति ही है मिथिला की भूमि के साथ। क्योंकि मिथिला क्षेत्र से राजनीतिक गलियारे में धोती सिटने वाले या फिर रंग-बिरंगे पाग पहनने वाले मिथिला की संस्कृति और गरिमा को बचाने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को तैयार करने के लिए करते हैं। </p>
<figure id="attachment_7409" aria-describedby="caption-attachment-7409" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7409" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7409" class="wp-caption-text">बलिराजगढ़ अवशेष : तस्वीर &#8211; राज झा</figcaption></figure>
<p>इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते हैं कि इस मद में कई सौ करोड़ राशि सरकारी खजाने से निकल जाय और बलिराजगढ़ में अब तक हुए चार खुदाइयों जैसा ही पाँचवाँ भी हो, और फिर मिट्टी से ढंक दिया जाय। विश्वास नहीं हो तो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आला अधिकारियों से पूछकर देखिये, मांगकर देखिये की पिछले एक-डेढ़ दशक में बिहार में सम्पन उत्खनन और एंटिक्विटी की उपलब्धिता से सम्बंधित कार्यों का प्रतिवेदन प्रकाशित हुआ है या नहीं? उत्तर ना ही मिलेगा। यकीन नहीं होता तो देश में 2022-2023/2023-2024/2024-2025 में सरकारी खजाने से केंद्रीय संरक्षित स्मारक/स्थल के संरक्षण और रखरखाव (अन्वेषण और उत्खनन नहीं) पर कितना आवंटन हुआ और क्या खर्च हुआ। </p>
<p><strong>विगत दिनों (12 फरवरी, 2026) केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने राज्यसभा में लिखित उत्तर बताया कि देश भर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधीन 3686 केंद्रीय संरक्षित स्मारक/स्थल हैं। इनके संरक्षण एवं रखरखाव की नियमित प्रक्रिया है जो राष्ट्रीय संरक्षण नीति के अनुसार स्मारक/स्थलों की आवश्यकता और संसाधनों की उपलब्धता के अनुसार की जाती है। पिछले तीन वर्षों के दौरान इन स्मारक/स्थलों के लिए 2022-23 में 392.71 करोड़ का आवंटन (खर्च: 391.93 करोड़),  2023-24 में 443.53 का आवंटन (खर्च:  443.53 अरोड रूपए)  और 2024-25 में 313.43 करोड़ रुपये का आवंटन (खर्च: 313.04 करोड़ रूपये) हुआ। खैर। </strong></p>
<p>वैसे, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का इतिहास भारत के पुराने अतीत को बचाने की कहानी है, जो इसके औपचारिक रूप से बनने से बहुत पहले 1784 शुरू हुई थी। भारत के इतिहास को सही तरीके से पढ़ने की दिशा में पहला कदम सर विलियम जोन्स ने 1784 में उठाया था। उन्होंने कलकत्ता में एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना की। इस ग्रुप ने संस्कृत और फ़ारसी में पुराने ग्रंथों की पढ़ाई को बढ़ावा दिया। 1837 में एक बड़ी कामयाबी मिली जब जेम्स प्रिंसेप ने पुरानी ब्राह्मी लिपि को सफलतापूर्वक समझ लिया। इससे चट्टानों और खंभों पर लिखे पुराने लेखों को पढ़ना मुमकिन हो गया। सं 1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना स्थापना हुई। </p>
<figure id="attachment_7410" aria-describedby="caption-attachment-7410" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7410" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7410" class="wp-caption-text">बलिराजगढ़ अवशेष : तस्वीर &#8211; राज झा</figcaption></figure>
<p>यह कहा जाता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की औपचारिक स्थापना एक आदमी की पूरी कोशिशों का नतीजा थी। इसे अलेक्जेंडर कनिंघम ने शुरू किया था। वह एक ब्रिटिश आर्मी इंजीनियर थे जिन्हें आर्कियोलॉजी में बहुत दिलचस्पी थी। कनिंघम कई सालों से ज़रूरी बौद्ध जगहों का सर्वे कर रहे थे। उन्हें एहसास हुआ कि इस काम की देखरेख के लिए एक परमानेंट सरकारी संस्था की ज़रूरत है। वह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले डायरेक्टर-जनरल बने।</p>
<p><strong>वित्त की कमी की वजह से 1865 और 1871 के बीच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कुछ समय के लिए बंद हो गया था। लेकिन, भारत के वायसराय लॉर्ड लॉरेंस ने 1871 में सर्वे को फिर से शुरू किया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को बनाने में अहम भूमिका के लिए अलेक्जेंडर कनिंघम को अक्सर &#8216;इंडियन आर्कियोलॉजी का पिता&#8217; कहा जाता है। 1902 के सदी की शुरुआत में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को नई अहमियत और ताकत मिली। 1902 में, लॉर्ड कर्जन ने डायरेक्टर-जनरल का पद फिर से बहाल किया, जो पुराने स्मारकों को बचाने में पक्का यकीन रखते थे। सर जॉन मार्शल को 1902 में डायरेक्टर-जनरल बनाया गया। उन्होंने खुदाई और बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाली टेक्निक को मॉडर्न बनाया। मार्शल के समय की सबसे बड़ी कामयाबी 1921 और 1922 के बीच हड़प्पा और मोहनजो-दारो जैसी सिंधु घाटी सभ्यता की जगहों की खोज थी। इस खोज ने भारत के पुराने इतिहास की समझ को पूरी तरह से बदल दिया। बाद में, 1940 के दशक में, मॉर्टिमर व्हीलर ने भारत में आर्कियोलॉजी के लिए और ज्यादा साइंटिफिक तरीके शुरू किए।</strong></p>
<p>आज़ादी के बाद, सरकार ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को एक सही कानूनी ढांचा दिया। 1958 में, प्राचीन स्मारक और आर्कियोलॉजिकल साइट और अवशेष एक्ट (AMASR एक्ट) पास हुआ। इस एक्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को पूरे देश में सांस्कृतिक विरासत वाली जगहों को आधिकारिक तौर पर बचाने और सुरक्षित रखने की ताकत दी। आज, ASI संस्कृति मंत्रालय के तहत अपना काम जारी रखे हुए है, और UNESCO वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स समेत हज़ारों जगहों को मैनेज कर रहा है।</p>
<p>बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब देश का प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने 12 जुलाई 2018 को नई दिल्ली के तिलक मार्ग पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नए मुख्यालय &#8211; धरोहर भवन का उद्घाटन किया। उन्होने कहा भी कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने पिछले लगभग 150 सालों में बहुत बड़ा काम किया है। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री ने इतिहास और समृद्ध पुरातत्व विरासत पर गर्व करने के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि लोगों को अपने कस्बों, शहरों और इलाकों के स्थानीय इतिहास और पुरातत्व के बारे में जानने में आगे आना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्थानीय पुरातत्व के पाठ स्कूल के सिलेबस का हिस्सा बन सकते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भारत में आर्कियोलॉजी के लिए सबसे बड़ा संगठन है। यह देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की देखरेख करती है। यह देश भर में 3,600 से ज़्यादा स्मारकों और ऐतिहासिक जगहों की देखभाल करता है, जिन्हें राष्ट्रीय महत्व का माना जाता है। </p>
<figure id="attachment_7411" aria-describedby="caption-attachment-7411" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7411" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7411" class="wp-caption-text">बलिराजगढ़ : तस्वीर &#8211; राज झा</figcaption></figure>
<p>वापस फिर बलिराजगढ़ चलते हैं। कोई 61 वर्ष पहले रघुबीर सिंह के नेतृत्व में सर्वे के मिड-ईस्टर्न सर्कल ने एस. मुखेरी की मदद से दरभंगा से 80 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में बलिराजगढ़ में छोटे पैमाने पर खुदाई की। चार कटिंग की गईं, दो-दो डिफेंस-वॉल के आर-पार और दो-दो हैबिटेशन-एरिया में। इलाके में वॉटर-टेबल ज़्यादा होने की वजह से, कुदरती मिट्टी तक नहीं पहुँचा जा सका। फिर भी, खुदाई से किले की बनावट की डिटेल्स पर रोशनी पड़ी। डिफेंस-वॉल (प्लस X A) में मिट्टी-ईंटों का कोर था जिसके ऊपर ईंटों का कवर था, बाहरी कवर अंदर वाले कवर से चार गुना चौड़ा था। दीवार टूटी-फूटी थी और नीचे 5.18m और ऊपर 3-65m चौड़ी थी। मरम्मत समेत कंस्ट्रक्शन के तीन फेज़ पहचाने गए। सबसे शुरुआती फेज़ में मिट्टी की ईंटों का कोर (pl. XB) था, जिस पर पक्की ईंटों की दीवारें थीं, जिसके बाहरी हिस्से की चौड़ाई मिट्टी के प्लेटफॉर्म से लगभग तीन गुना थी, जिसमें मिट्टी के टुकड़े मिले हुए थे, जो किले के अंदरूनी हिस्से के सामने बने थे। भारी बाढ़ के कारण मज़बूती की ज़रूरत पड़ी, जैसा कि गाद के जमाव से पता चलता है। बचाव से पहले के जमाव से, उत्तरी काले पॉलिश किए हुए बर्तनों के टुकड़े मिले थे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA.jpg" alt="" width="2047" height="1150" class="aligncenter size-full wp-image-7412" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>ऐसा लगता है कि किलेबंदी दूसरी सदी B.C. में कहीं बनाई गई थी और पाल काल तक इस्तेमाल में रही; जुड़े हुए लेवल से मिली दूसरी चीज़ों में मोती, सिक्के, शुंग टेराकोटा पट्टिकाएँ (pl. XI), हड्डी की चीज़ें वगैरह शामिल थीं; इसके अलावा, साइट के अलग-अलग हिस्सों में BRG-2 से BRG-4 लेबल वाली तीन और कटिंग भी की गईं। इनमें से BRG-2 एक डंप पाया गया और उसमें कोई कब्ज़ा जमा नहीं था, लेकिन इस इलाके से सुंदर टेराकोटा पट्टिकाएँ मिलीं। BRG-3 में एक मंदिर के अवशेष मिले और BRG-4, जो दक्षिणी सुरक्षा पर था, ने BRG-1 जैसी ही जानकारी दी। बेड-रॉक; पीली मिट्टी, कंकड़-पत्थर के साथ मिली हुई; बोल्डर-जमाव; और लाल मिट्टी। उन्हें नदी के तल से शुरुआती पाषाण युग के कुछ औज़ार मिले, साथ ही पीली मिट्टी और ऊपर पड़े पत्थरों के अलग-अलग हिस्सों से भी। इसके अलावा, भीम-का-बांध और रेहाना जैसे आस-पास के इलाकों से भी मध्य और बाद के पाषाण युग के औज़ार इकट्ठा किए गए। इसके अलावा, रिंग या हैमर-स्टोन के दो टुकड़े और एक छोटे साइज़ का पॉलिश किया हुआ सेल्ट भी मिला। यह बात 61 साल पहले की है। </p>
<blockquote><p>बहरहाल, तिलक मार्ग के नुक्क्ड़ पर स्थित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के कार्यालय में बिहार के नेताओं को लेकर, जो इस प्रकरण के साथ राजनीतिक लाभ उठा रहे हैं, पर चर्चाएं आम हो रही हैं। कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि मिथिला के एक सांसद को तो यह भी मालूम नहीं था कि बलिराजगढ़ मिथिला में कहाँ है ? वे किसी भी विषय को लिखकर मांगते हैं और मंच पर उसे पढ़कर वाह-वाही लूटने में, ताली बजबाने में और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ तस्वीर &#8216;कपड़े पर बिना किसी सिकुड़न के&#8217; फोटो खिंचवाने पर कोई कसर नहीं छोड़ते। लोगों का तो यह भी कहना है कि संस्कृति मंत्रालय, बिहार के उच्च नेताओं, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आला अधिकारियों के बीच एक बड़ा खेल चल रहा है। बलिराजगढ़ उत्खनन इ नाम पर प्रचुर मात्रा में पैसा तो खर्च किया जायेगा (कागज पर) और अंततः इसका भी वही हश्र होगा जो पिछले चार उत्खनन में हुआ है।&#8221; &#8230;&#8230;.. </p></blockquote>
<p><strong>आगे जारी भाग-2 </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/balirajgarh-a-big-game-in-the-name-of-exploration-and-excavation-part-1">बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-1): &#8216;अन्वेषण और उत्खनन&#8217; के नाम पर बहुत बड़ा खेल, अधिकारियों की निगाहें &#8216;निदेशक&#8217; की कुर्सी पर, मिथिला के नेताओं की नजर &#8216;कोषागार&#8217; पर, कहानियां अख़बारों के पन्नों पर और इतिहास पर गोबर पाथने की परम्परा</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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