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	<title>chiefminister Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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		<title>भारतकीसड़कों से भारतकीकहानी (18) ✍ दोषी सिर्फ दिल्ली का ऑटो वाला ही क्यों ? हम-आप भी तो दोषी हैं 🙏</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 30 Aug 2022 03:03:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[auto]]></category>
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		<category><![CDATA[transport department]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आप दिल्ली के किसी मेट्रो स्टेशन में उतरें, सड़क पर आएं या फिर अपने घर से बाहर निकल कर किसी ऑटो वाले से अपने गंतव्य पर जाने के बारे में पूछें। आप भाग्यशाली होंगे आपको तुरंत कोई ले जाने के लिए तैयार हो जाय ।  आप ऑटो में बैठें और यात्रा प्रारम्भ करने से पहले [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आप दिल्ली के किसी मेट्रो स्टेशन में उतरें, सड़क पर आएं या फिर अपने घर से बाहर निकल कर किसी ऑटो वाले से अपने गंतव्य पर जाने के बारे में पूछें। आप भाग्यशाली होंगे आपको तुरंत कोई ले जाने के लिए तैयार हो जाय ।</strong> </p>
<p>आप ऑटो में बैठें और यात्रा प्रारम्भ करने से पहले उसे &#8216;मीटर&#8217; चलाने के लिए कहें। आपके शब्द अभी ख़त्म भी नहीं हुए होंगे, सामने सीट पर बैठा ड्राइवर तक्षण कहेगा &#8216;मीटर ख़राब&#8217; है। फिर शुरू होगी किराये की खींच-खींच। या तो आप उसकी बात मानकर, उसके द्वारा बताये किराये का मोल-जोल कर चलने को तैयार हो जायेंगे, या फिर तपती गर्मी, हड्डी-पसली में छेद करने वाली ठंड के मौसम में, बारिश में भीगते दूसरे ऑटो की प्रतीक्षा करने लगेंगे। </p>
<p>यह एक दिन की बात नहीं, रोजमर्रे की बात हो गयी है। अगर आप किसी ऑटो वाले को प्रशासन, पुलिस की धमकी देंगे तो सामने बैठा वह महाशय बॉलीवुड के अभिनेता या खलनायक जैसा मुस्कुरा देगा। उसकी हंसी से हम-आप तक्षण इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि दोनों में गहरा प्रेम है। </p>
<p>दिल्ली देश ही नहीं, दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला एक शहर है। सन 1960 में दिल्ली की आबादी 2283000 थी और आज, यानी 2022 में 32066000 के आस-पास है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अन्य राज्यों से रोजी-रोजगार के लिए नित्य आना-जाना अलग। </p>
<p><iframe title="भारतकीसड़कों से भारतकीकहानी (18) ✍ दोषी सिर्फ दिल्ली का ऑटो वाला ही क्यों ? हम-आप भी तो दोषी हैं 🙏" width="696" height="392" src="https://www.youtube.com/embed/92Id9jk48AI?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture" allowfullscreen></iframe></p>
<p>यह नहीं कह सकते कि इन विगत वर्षों में शहर में और आस-पास के इलाकों में सुख-सुविधाओं में बढ़ोत्तरी नहीं हुआ है, लेकिन जिस तेजी से शहर की जनसंख्या में वृद्धि हुई, उस तेजी से यहां के भौतिक संरचना में बदलाव नहीं हो सका। उसी आधारभूत समस्याओं में एक समस्या ऑटो और ऑटो वालों की है। </p>
<p>एक रिपोर्ट के आधार पर 1997 में दिल्ली में परमिट वाले 82,138 ऑटो रिक्शा थे। सरकार ने ऑटो रिक्शा से होने वाले प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए इस संख्या के आगे परमिट जारी करना बंद कर दिया। जबकि उस समय शहर की जनसंख्या 1,34,51,000 थी। जनसंख्या जहां तेजी से बढ़ती गई, वहीं ऑटो रिक्शा की संख्या स्थिर रही क्योंकि सरकार ने नए परमिट जारी नहीं किए। वर्ष 2002 में सरकार ने 5 हजार नए परमिट जारी किए जिससे कुल ऑटो रिक्शा की संख्या बढ़कर 87,138 हो गई। </p>
<p>वर्तमान में दिल्ली की जनसंख्या बढ़कर 3,20,66 ,000 है जबकि ऑटो रिक्शा की संख्या मात्र 1,18 95,000 है। इतना ही नहीं परमिट की अनुपलब्धता के कारण एक ऑटो रिक्शा की शो-रूम कीमत जहां 1.75 लाख रुपये के लगभग है, वहीं बिचौलियों और दलालों के कारण सड़क पर उतरते समय इसकी कीमत 4.5 लाख से 5 लाख हो जाती है। ऑटो चालकों के द्वारा मीटर से न चलने और मनमाना किराया वसूलने के पीछे बड़ा कारण यह भी है।</p>
<p>सवाल यह है कि अगर निजी वाहनों का सड़क पर आगमन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है, यानी कोई भी व्यक्ति 100 रुपये देकर, बैंक से लोन लेकर, तत्काल शो-रम से चार पहिया वाहन खरीद कर दिल्ली सड़कों पर उतर सकता है, चाहे वे वाहन चलाने में निपुण हों अथवा नहीं, फिर  ऑटो पर परमिट क्यों, इसकी संख्या पर पाबंदी क्यों? </p>
<p>आखिर खुद जीने के लिए, परिवार का पालन-पोषण करने के लिए एक कल्याणकारी राज्य को इतना तो सोचना ही पड़ेगा। हम सभी मामलों में ऑटो वालों को दोषी नहीं ठहरा सकते। ऑटो वाला भी इसी समाज का हिस्सा है और जो सत्ता अथवा प्रशासन में बैठे हैं, वे भी इसी समाज का हिस्सा हैं। कानून से ऊपर कोई नहीं है। एक बेहतर दिल्ली बनाने के लिए, ऑटोवाला और यात्रियों के बीच सुखमय-मधुर सम्बन्ध बनाये रखने के लिए हमें बेहतर सोचना पड़ेगा। </p>
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		<title>मानिए या नहीं मानिए &#8220;राजेश्वरी&#8221; भाग्यशाली है, तेजस्वी उप-मुख्यमंत्री फिर बने वियाह के ठीक आठ महीने बाद और चचिया ससुर मगध सम्राट</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/state/tejaswis-wife-rajeshwari-is-lucky</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 10 Aug 2022 12:46:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[chiefminister]]></category>
		<category><![CDATA[deputy CM]]></category>
		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
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		<category><![CDATA[swearing]]></category>
		<category><![CDATA[tejashwi yadav]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : बिहार की चमत्कारिक राजनीतिक उठापटक में भले लोग बेवजह प्रशांत किशोर को तवज्जो दे रहे हों, उनकी राजनीतिक &#8216;विशेषज्ञता&#8217; का विश्लेषण कर रहे हों, या फिर वे &#8216;स्वयंभू विशेषण&#8217; करने पर आमादा हों, सच तो यह है कि आज ठीक आठ महीने के बाद बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री-द्वय लालू प्रसाद यादव-राबड़ी देवी [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : बिहार की चमत्कारिक राजनीतिक उठापटक में भले लोग बेवजह प्रशांत किशोर को तवज्जो दे रहे हों, उनकी राजनीतिक &#8216;विशेषज्ञता&#8217; का विश्लेषण कर रहे हों, या फिर वे &#8216;स्वयंभू विशेषण&#8217; करने पर आमादा हों, सच तो यह है कि आज ठीक आठ महीने के बाद बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री-द्वय लालू प्रसाद यादव-राबड़ी देवी के कनिष्ठ पुत्र तेजस्वी यादव की नव-विवाहिता पत्नी रशेल आइरिस का भाग्य यादव परिवार के लिए &#8220;सौभाग्यवती&#8221; हो गया। </strong></p>
<p>सुश्री रशेल आइरिस और तेजस्वी यादव का विवाह आज के ही दिन आठ माह पहले 10 दिसंबर, 2021 को नई दिल्ली में हुई थी। सुश्री रशेल आइरिस का भाग्य आज इतना प्रखर हो गया कि अपने पति को प्रदेश का उप-मुख्यमंत्री दोबारा बना दी और अपने चचिया ससुर श्री नीतीश कुमार को आठवीं बार मगध का सम्राट, यानि मुख्यमंत्री ऑफ़ बिहार &#8211; नितीश कुमार। </p>
<figure id="attachment_4307" aria-describedby="caption-attachment-4307" style="width: 1080px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1-2.jpeg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1-2.jpeg" alt="" width="1080" height="1080" class="size-full wp-image-4307" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1-2.jpeg 1080w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1-2-300x300.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1-2-1024x1024.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1-2-150x150.jpeg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1-2-768x768.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1-2-24x24.jpeg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1-2-48x48.jpeg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/1-2-96x96.jpeg 96w" sizes="(max-width: 1080px) 100vw, 1080px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4307" class="wp-caption-text">मुख्यमंत्री नीतीश कुमार &#8211; सबके हैं</figcaption></figure>
<p>कहते हैं कि बिहार की राजनीति को &#8216;समझने&#8217; के लिए प्रशांत किशोर को अभी कई वर्ष लगेंगे, बशर्ते पूरा प्रदेश &#8220;लोभी&#8221; ना हो जाए। क्योंकि &#8220;लोभी गाँव में ठग भूखा नहीं मरता।&#8221; </p>
<p>नीतीश (71) कल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के मुख्यमंत्री के तौर पर इस्तीफा दे दिया था और सात दलों के महागठबंधन के विधायकों के समर्थन से नयी सरकार बनाने का दावा भी किया। आज प्रदेश के राज्यपाल फागू चौहान ने उन्हें गोपनीयता की शपथ दिलाई है। राजद नेता तेजस्वी यादव ने भी उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। शपथ ग्रहण के बाद तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार के पैर भी छुए।</p>
<figure id="attachment_4308" aria-describedby="caption-attachment-4308" style="width: 1080px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2-2.jpeg"><img decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2-2.jpeg" alt="" width="1080" height="1080" class="size-full wp-image-4308" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2-2.jpeg 1080w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2-2-300x300.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2-2-1024x1024.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2-2-150x150.jpeg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2-2-768x768.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2-2-24x24.jpeg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2-2-48x48.jpeg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/2-2-96x96.jpeg 96w" sizes="(max-width: 1080px) 100vw, 1080px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4308" class="wp-caption-text">उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव &#8211; आपका आभार</figcaption></figure>
<p>वैसे सुश्री रशेल आइरिस वर्तमान राजनीतिक बदलाव पर श्री नीतीश कुमार के साथ-साथ प्रदेश के लोगों को अन्तःमन से धन्यवाद दी हैं, लेकिन आतंरिक सूत्रों का मानना है कि सास श्रीमती राबड़ी देवी और ससुर श्री लालू प्रसाद यादव अपनी नई दुल्हन को बहुत आशीर्वाद भी दिए हैं। सूत्रों का कहना है कि विगत कई वर्षों के बाद घर में हंसी-ख़ुशी वापस आयी है। यह भी कहा जा रहा है कि इस आगामी छठ पर्व में तेजस्वी यादव की पत्नी &#8220;राजेश्वरी&#8221; भी अपनी सास के साथ भगवान् सूर्य को अर्ध्य देंगी। ज्ञातव्य हो कि तेजस्वी यादव विवाह बंधन में बंधने के बाद पहली बार जब घर पहुंचे थे तो उनके पिता लालू प्रसाद यादव अपनी बहु को आशीष देते समय नया नाम भी दिया था &#8211;  राजेश्वरी। </p>
<figure id="attachment_4309" aria-describedby="caption-attachment-4309" style="width: 1080px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3-1.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3-1.jpeg" alt="" width="1080" height="1080" class="size-full wp-image-4309" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3-1.jpeg 1080w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3-1-300x300.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3-1-1024x1024.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3-1-150x150.jpeg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3-1-768x768.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3-1-24x24.jpeg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3-1-48x48.jpeg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/3-1-96x96.jpeg 96w" sizes="auto, (max-width: 1080px) 100vw, 1080px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4309" class="wp-caption-text">आ घर लौट चलें &#8211; सब माफ़</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, शपथ ग्रहण के बाद नीतीश कुमार 2024 के लिए विपक्ष से एकजुट रहने की अपील की और वे मीडिया से बात की। नाम लिए बिना उन्होंने भाजपा पर हमला बोला। नीतीश ने कहा, &#8216;2014 में आने वाले, 2024 में रहेंगे तब ना। हम रहें या न रहें, वे 2024 में नहीं रहेंगे। मैं विपक्ष को 2024 के लिए एकजुट होने की अपील करता हूं।&#8217; प्रधानमंत्री पद के सवाल पर उन्होंने कहा कि मैं इस पद का उम्मीदवार नहीं हूं।</p>
<p><strong>उधर, किशोर साहब अलगे कहते फिर रहे हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ गठबंधन में असहज महसूस कर रहे थे और इसी वजह से उन्होंने दूसरे दलों के साथ गठबंधन करने का फैसला किया। हकीकत यह है कि सत्तर-वर्षीय खांटी बिहारी नेता, जो जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति रूपी राजनीतिक बीज से अंकुरित होकर प्रदेश का कमान आठवीं बार संभाले हैं; प्रशांत किशोर &#8220;पुनः चुंबकीय ध्रुव से चिपकना चाहते हैं, जबकि बख्तियारपुर वाले लगातार &#8216;विकर्षण&#8217; वाली ऊँगली आगे किये हुए हैं।</strong> </p>
<figure id="attachment_4310" aria-describedby="caption-attachment-4310" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/8.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/8.jpeg" alt="" width="1280" height="853" class="size-full wp-image-4310" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/8.jpeg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/8-300x200.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/8-1024x682.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/8-768x512.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4310" class="wp-caption-text">आइए नीतीश बाबू, आपका स्वागत है।</figcaption></figure>
<p>इतना ही नहीं, टीवी पर यब भी बोलते सुना जा रहा है कि &#8220;बिहार की राजनीति अभी बिहार में ही रहेगी। सन 2012-13 के बाद से यह छठा प्रयोग है। इन सभी समय नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बने। हालांकि, बिहार की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। मैं उम्मीद करता हूं कि नयी सरकार कुछ अच्छा करेगी। यह देखना होगा कि नयी सरकार कुछ करती है या नहीं, क्योंकि राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और जनता दल (यूनाइटेड) का भ्रष्टाचार सहित कई मुद्दों पर रुख एकदम अलग है।&#8221;</p>
<figure id="attachment_4311" aria-describedby="caption-attachment-4311" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/10.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/10.jpeg" alt="" width="1280" height="853" class="size-full wp-image-4311" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/10.jpeg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/10-300x200.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/10-1024x682.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/10-768x512.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4311" class="wp-caption-text">बड़ा नीमन ननकिरबा है हमरा छोटका</figcaption></figure>
<p>उधर, उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का कहना है कि सांप्रदायिक तनाव भाजपा द्वारा फैलाया जा रहा था, वे क्षेत्रीय दलों को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं।महागठबंधन इतना मजबूत है कि विधानसभा में विपक्ष में सिर्फ भाजपा बचेगी। नीतीश कुमार द्वारा लिया गया मुश्किल फैसला एक ऐसा फैसला है जिसकी जरूरत थी। बिहार ने वही किया जो देश को करने की जरूरत है। हमने उन्हें रास्ता दिखाया है। हमारी लड़ाई बेरोजगारी के खिलाफ रही है। हमारे मुख्यमंत्री ने गरीबों और युवाओं का दर्द महसूस किया। हम गरीबों और युवाओं को एक महीने के भीतर बंपर नौकरी देंगे, यह इतना भव्य होगा कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। </p>
<figure id="attachment_4312" aria-describedby="caption-attachment-4312" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/15.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/15.jpeg" alt="" width="1280" height="853" class="size-full wp-image-4312" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/15.jpeg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/15-300x200.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/15-1024x682.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/08/15-768x512.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4312" class="wp-caption-text">बड़े दिनों के बाद याद आया नीतीश जी</figcaption></figure>
<p>बिहार कांग्रेस के प्रभारी भक्त चरण दास ने बुधवार को चुटकी लेते हुए कहा कि हमें लगता है कि राज्य में भाजपा का पतन महाराष्ट्र में उसकी राजनीति और दलबदल इंजीनियरिंग का जवाब है। भगवा खेमे पर निशाना साधते हुए भक्त चरण दास ने कहा कि भाजपा मुक्त बिहार एक नया संदेश है जो लोगों को भेजा गया है। दास ने कहा कि जब देश की प्रगति, देश की आजादी और इसकी पहचान की बात आती है तो कांग्रेस हमेशा एक मजबूत स्तंभ रही है। भगवा पार्टी सभी छोटी पार्टियों का सफाया करना चाहती है। दास ने दावा किया कि वह भारत में सिर्फ एक पार्टी (भाजपा), एक रंग&#8230; और एक धर्म की स्थापना करना चाहता है। यह पूछे जाने पर कि क्या नई महागठबंधन की बिहार सरकार का अध्यक्ष कांग्रेस से होगा, जिसके पास विधानसभा में 19 विधायक हैं, दास ने कहा कि जो होगा अच्छे के लिए होगा।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/state/tejaswis-wife-rajeshwari-is-lucky">मानिए या नहीं मानिए &#8220;राजेश्वरी&#8221; भाग्यशाली है, तेजस्वी उप-मुख्यमंत्री फिर बने वियाह के ठीक आठ महीने बाद और चचिया ससुर मगध सम्राट</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>आखिर बंगाल के वे कौन &#8216;दो अधिकारी&#8217; हैं जो डॉ बिधान चंद्र राय के जन्मस्थान की मुसीबत भरी बातों को मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी तक नहीं पहुँचने दे रहे हैं (भाग-1)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 06 Jun 2022 12:30:43 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bidhanchandra roy]]></category>
		<category><![CDATA[cadre]]></category>
		<category><![CDATA[chiefminister]]></category>
		<category><![CDATA[ias]]></category>
		<category><![CDATA[office]]></category>
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		<category><![CDATA[west bengal]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / कलकत्ता / दिल्ली : पटना के खजांची रोड स्थित अघोर प्रकाश शिशु सदन विद्यालय परिसर पाकिस्तान के इस्लामाबाद या करांची में नहीं है। यह विश्व के किसी भी ऐसे प्रदेश अथवा भूमि पर स्थित नहीं है जो संवेदनशील क्षेत्र में हो। यह स्थान किसी ऐसे जगह पर भी नहीं है जहाँ भारत राष्ट्र का एक नागरिक, [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / कलकत्ता / दिल्ली : पटना के खजांची रोड स्थित अघोर प्रकाश शिशु सदन विद्यालय परिसर पाकिस्तान के इस्लामाबाद या करांची में नहीं है। यह विश्व के किसी भी ऐसे प्रदेश अथवा भूमि पर स्थित नहीं है जो संवेदनशील क्षेत्र में हो। यह स्थान किसी ऐसे जगह पर भी नहीं है जहाँ भारत राष्ट्र का एक नागरिक, दिव्यांग सहित, नहीं पहुंच सकता है। यह हवाई मार्ग, जलमार्ग, रेलमार्ग, सड़क मार्ग से मुद्दत से जुड़ा है। कोई भी व्यक्ति, किसी भी मार्ग से यहाँ पहंच सकता है &#8211; अपना माथा टेक सकता है। विश्व के सिख समुदाय के लिए जितना ही महत्वपूर्ण स्थान पटना साहेब का गुरुद्वारा है, जहाँ सिख संप्रदाय के अंतिम गुरु का जन्म हुआ था; अशोकराज पथ &#8211; नयाटोला (बारीपथ ) के बीचोबीच खजांची रोड में स्थित अघोर शिशु विद्यामंदिर का परिसर न केवल भारत के राजनेताओं के लिए एक धार्मिक स्थान है, बल्कि भारत के लगभग साढ़े बारह लाख ऐलोपैथी चिकित्सकों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कोई भी धार्मिक स्थान। </p>
<p>परन्तु आज यह स्थान बिहार ही नहीं, बंगाल ही नहीं, उड़ीसा ही नहीं दिल्ली के रायसीना हिल पर बैठे राजनितिक मठाधीशों की उपेक्षा का शिकार हो गया है। इतना ही नहीं, डॉ बिधान चंद्र राय के जन्मस्थान की मुसीबत भरी बातों को, ताकि इसे एक राष्ट्रीय धरोहर के रूप में निखारा जा सके, बंगाल में मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी तक पहुँचने नहीं दे रहे हैं। खजांची रोड के अधिकार &#8220;उदास&#8221; हैं, जबकि कलकत्ता के राईटर्स बिल्डिंग में मुख्यमंत्री कार्यालय बैठे &#8220;अधिकारी-द्वय&#8221; चाय-बिस्कुट-मुढ़ी का आनंद उठा रहे हैं। इस कार्य से उन्हें क्या फ़ायदा प्राप्त हो रहा है, इस बात का खुलासा तो वे ही करेंगे; लेकिन समय दूर नहीं है जब &#8220;खुलासा सार्वजनिक हो जायेगा आखिर करोड़ों-अरबों की उस संपत्ति से किसे फायदा कराने को संकल्पित हैं। </strong></p>
<p>अगर ऐसा नहीं होता तो आज भारत के कर्मठ राजनीतिज्ञ, पश्चिम बंगाल के द्वितीय मुख्यमंत्री डॉ बिधान चंद्र राय का जन्मस्थान इतना उपेक्षित नहीं होता। परिसर के बाहर पटना के लोग कूड़ा-करकट-मल-मूत्र नहीं फेकते। वैसे, दिल्ली ने नार्थ ब्लॉक में इस बात की भी चर्चाएं हो रही हैं कि डॉ बिधान चंद्र राय के जन्मस्थान को &#8216;धरोहर स्थान/संरक्षित स्थान&#8221; बनाने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह कृतसंकल्प हैं &#8211; बिना किसी राजनीति के। </p>
<p>चाहिए तो यह था कि किसी भी राजनेताओं का परवाह किये बिना, चाहे वे प्रदेश के मुख्यमंत्री हों, प्रदेश के लाटसाहब हों, दिल्ली सल्तनत में बैठे देश के प्रधानमंत्री हों या सम्मानित राष्ट्रपति महोदय हों; देश का 12,50,000+ ऐलोपैथी चिकित्सक और इण्डियन मेडिकल एसोसिएशन, इण्डियन मेडिकल काउन्सिल के अधीन निबंधित चिकित्सकों के साथ-साथ आला अधिकारी एक कदम आगे बढ़कर अपने उस महान &#8220;डाक्टर&#8221; के &#8220;जन्मस्थान&#8221; को मंदिर में तब्दील कर देते, एक इतिहास बना देते &#8211; जिनके नाम पर भारत में प्रत्येक वर्ष पहली जुलाई को &#8220;डॉक्टर्स डे (डाक्टर दिवस) मनाया जाता है, देश के कोने-कोने में डॉ बिधान चंद्र राय की प्रतिमा पर, तस्वीरों पर फूलमाला अर्पित करते हैं। यह कैसा सम्मान है?</p>
<p>वैसे विश्व के विभिन्न देशों में अलग-अलग दिनों में &#8216;डॉक्टर्स डे&#8217; मनाया जाता है। मसलन ऑट्रेलिया में 30 मार्च को, कुवैत में 3 मार्च को, ब्राज़ील में 18 अक्टूबर को, कनाडा में 1 मई को, चीन में 19 अगस्त को, इंडोनेसिया में 24 अक्टूबर को और युनाइटेड स्टेट्स में 30 मार्च को। लेकिन यदि देखा जाय तो सभी अपने-अपने राष्ट्रों में अपने-अपने देशों के चिकित्सकों को, जिनके सम्मानार्थ यह दिवस मनाया जाता है, सम्मान दिया जाता है । भारत के मामले में डॉ बिधान चंद्र राय एक ऐसे डाक्टर हैं, जिनका जन्म और मृत्यु एक ही तिथि को हुआ &#8211; 1 जुलाई &#8211; हाँ, जन्म का साल 1882 था और मृत्यु का वर्ष 1962 था। </p>
<p>सबसे बड़ी बिडंबना यह है कि इण्डियन मेडिकल एसोसिएशन और विश्व स्वास्थ संगठन का आंकड़ा यह कहता है कि भारत में कुल उपलब्ध ऐलोपैथी चिकित्सकों में तक़रीबन 52+ फ़ीसदी चिकित्सक महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्णाटक, आँध्रप्रदेश और उत्तरप्रदेश में &#8216;अभ्यास&#8217; (प्रैक्टिस) करते हैं, शेष 48 फ़ीसदी देश के अन्य 23 राज्यों और आठ केंद्र शासित प्रदेशों में &#8216;प्रैक्टिस&#8217; करते हैं। स्वाभाविक है बिहार भी उसी 23 राज्यों में एक है। </p>
<figure id="attachment_4087" aria-describedby="caption-attachment-4087" style="width: 730px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/06/Bhaskar.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/06/Bhaskar.jpeg" alt="" width="730" height="548" class="size-full wp-image-4087" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/06/Bhaskar.jpeg 730w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/06/Bhaskar-300x225.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 730px) 100vw, 730px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4087" class="wp-caption-text">डॉ बिधान चंद्र राय का फ़ाइल फोटो (दैनिक भास्कर के सौजन्य से)</figcaption></figure>
<p>इससे भी बड़ी बिडंबना यह है कि देश की कुल आवादी में प्रत्येक 1400+ व्यक्तियों पर एक डाक्टर हैं। वैसी स्थिति में एक ओर जहाँ हम &#8216;डाक्टरों की व्यस्तता&#8217;, &#8216;उनके समय की किल्लत&#8217; का अंदाजा लगा सकते हैं; वहीँ सरकार, के नज़रों में, चाहे प्रदेश की हो या देश की, उनकी क्या अहमियत है; विशेषकर जो सत्ता में कुर्सी हथियाये बैठे हैं, यह विश्व स्वास्थ संगठन और  इण्डियन मेडिकल एसोसिएशन का आंकड़ा दर्शाता है। अगर इस दृष्टि से देखें तो इन 12,50,000 भारतीय ऐलोपैथी डाक्टरों की नजर में &#8216;डॉक्टर्स डे&#8217; महज एक खानापूर्ति वाला दिवस है, फिर डॉ बिधान चंद्र राय के जन्मस्थान के प्रति उनके मन में &#8216;वेदना&#8217; और &#8216;संवेदना&#8217; का नहीं होना भी कोई गलत बात नहीं है। </p>
<p>बहरहाल, पटना के खजांची रोड के लोगों की बात छोड़िये, पटना शहर की बात छोड़िये, बिहार प्रदेश की बात छोड़िये, पूरे देश की भी बात करें तो शायद 90 फ़ीसदी लोगों को यह मालूम नहीं होगा कि भारत में &#8220;डाक्टर दिवस&#8221; किनके नाम पर है और जिनके नाम पर यह दिवस मनाया जाता है उस महान व्यक्ति का जन्मस्थान कहाँ है ? पटना के लोग बहुत भाग्यशाली हैं कि अगर वे श्रीकृष्ण सिंह से लेकर नितीश बाबू तक जैसे राजनीतिक योद्धागण बिहार की भूमि पर अवतरित हुए, तो श्री प्रफुल्ल चंद्र घोष के बाद पश्चिम बंगाल का दूसरा मुख्य मंत्री डॉ बिधान चंद्र रॉय, जिनका जन्म पटना के खजांची रोड में उसे सफ़ेद रंग वाला दो मंजिला मकान, जो ऐतिहासिक ज्ञानपीठ प्रकाशन से कोई 100 गज की दूरी पर है, हुआ था &#8211; अघोर शिशु विद्या मंदिर प्रांगण स्थित भवन में। यह भवन उन्ही का है।</p>
<p>डॉ बिधान चंद्र राय का जन्म जुलाई 1, 1882 को हुआ था। वे पश्चिम बंगाल के द्वितीय मुख्यमंत्री थे और मृत्यु तक 14 वर्ष तक वे इस पद पर थे। उनके जन्मदिन को देश में &#8220;डॉक्टर्स डे&#8221; के रूप में मनाया जाता है। उन्हे सं 1961 में भारत रत्न की उपाधि से भी अलंकृत किया गया था। डॉ रॉय पटना के अशोक राज पथ पर स्थित टी के घोष अकादमी में भी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त किये थे। विधानचंद्र राय का प्रारंभिक जीवन अभावों के मध्य ही बीता। बी. ए. परीक्षा उत्तीर्ण कर वे सन् 1901 में कलकत्ता चले गए। वहाँ से उन्होंने एम. डी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्हें अपने अध्ययन का व्यय भार स्वयं वहन करना पड़ता था। योग्यता छात्रवृत्ति के अतिरिक्त अस्पताल में नर्स कार्य करके वे अपना निर्वाह करते थे।</p>
<figure id="attachment_4088" aria-describedby="caption-attachment-4088" style="width: 730px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/06/Dainik-Bhaskar.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/06/Dainik-Bhaskar.jpeg" alt="" width="730" height="548" class="size-full wp-image-4088" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/06/Dainik-Bhaskar.jpeg 730w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/06/Dainik-Bhaskar-300x225.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 730px) 100vw, 730px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4088" class="wp-caption-text">डॉ बिधान चंद्र राय का फ़ाइल फोटो (दैनिक भास्कर के सौजन्य से)</figcaption></figure>
<p>अर्थाभाव के कारण डॉक्टर बिधान चंद्र राय ने कलकत्ता के अपने पाँच वर्ष के अध्ययन काल में पाँच रुपए मूल्य की मात्र एक पुस्तक खरीदी थी। मेधावी इतने थे कि एल.एम.पी. के बाद एम.डी. परीक्षा दो वर्षों की अल्पावधि में उत्तीर्ण कर कीर्तिमान स्थापित किया। फिर उच्च अध्ययन के निमित्त इंग्लॅण्ड गए। विद्रोही बंगाल का निवासी होने के कारण प्रवेश के लिए उनका आवेदनपत्र अनेक बार अस्वीकृत हुआ। बड़ी कठिनाई से वे प्रवेश पा सके। दो वर्षों में ही उन्होंने एम. आर. सी. पी. तथा एफ. आर. सी. एस. परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर लीं। कष्टमय एवं साधनामय विद्यार्थी जीवन की नींव पर ही उनके महान् व्यक्तित्व का निर्माण हुआ। स्वदेश लौटने के पश्चात् डाक्टर राय ने सियालदह में अपना निजी चिकित्सालय खोला और सरकारी नौकरी भी कर ली। लेकिन अपने इस सीमित जीवनक्रम से वे संतुष्ट नहीं थे।</p>
<p>सन् 1923 में वे सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी जैसे दिग्गज राजनीतिज्ञ और तत्कालीन मंत्री के विरुद्ध बंगाल-विधान-परिषद् के चुनाव में खड़े हुए और स्वराज्य पार्टी की सहायता से उन्हें पराजित करने में सफल हुए। यहीं से इनका राजनीति में प्रवेश हुआ। डाक्टर राय, देशबंधु चितरंजन दस के प्रमुख सहायक बने और अल्पावधि में ही उन्होंने बंगाल की राजनीति में प्रमुख स्थान बना लिया। सन् 1928 में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन की स्वागत समिति के वे महामंत्री थे। डा. राय राजनीति में उग्र राष्ट्रवादी नहीं वरन् मध्यम मार्गी थे। लेकिन सुभाष चंद्र बोस और यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में वे सुभाष बाबू के साथ थे।</p>
<p>वे विधानसभाओं के माध्यम से राष्ट्रीय हितों के लिए संघर्ष करने में विश्वास करते थे। इसलिए उन्होंने &#8216;गवर्नमेंट ऑव इंडिया एक्ट&#8217; के बनने के बाद स्वराज्य पार्टी को पुन: सक्रिय करने का प्रयास किया। सन् 1934 में डाक्टर अंसारी की अध्यक्षता में गठित पार्लमेंटरी बोर्ड के डाक्टर राय प्रथम महामंत्री बनाए गए। महा निर्वाचन में कांग्रेस देश के सात प्रदेशों में शासन रूढ़ हुई। यह उनके महामंत्रित्व की महान सफलता थी।अपनी मौलिक योग्यता के कारण वे सन् 1909 में &#8216;रॉयल सोसायटी ऑव मेडिसिन&#8217;, सन् 1925 में &#8216;रॉयल सोसायटी ऑव ट्रॉपिकल मेडिसिन&#8217; तथा 1940 में &#8216;अमेरिकन सोसायटी ऑव चेस्ट फिजिशियन&#8217; के फेलो चुने गए। डा. राय ने सन् 1923 में &#8216;यादवपुर राजयक्ष्मा अस्पताल&#8217; की स्थापना की तथा &#8216;चित्तरंजन सेवासदन&#8217; की स्थापना में भी उनका प्रमुख हाथ था। कारमाइकल मेडिकल कॉलेज को वर्तमान विकसित स्वरूप प्रदान करने का श्रेय डा. राय को ही है। वे इस कालेज के अध्यक्ष एवं जीवन पर्यंत &#8216;प्रोफेसर ऑव मेडिसिन&#8217; रहे।</p>
<figure id="attachment_4089" aria-describedby="caption-attachment-4089" style="width: 730px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/06/Bhaskar1.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/06/Bhaskar1.jpeg" alt="" width="730" height="548" class="size-full wp-image-4089" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/06/Bhaskar1.jpeg 730w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/06/Bhaskar1-300x225.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 730px) 100vw, 730px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4089" class="wp-caption-text">डॉ बिधान चंद्र राय का फ़ाइल फोटो (दैनिक भास्कर के सौजन्य से)</figcaption></figure>
<p>कलकत्ता एवं इलाहबाद विश्वविद्यालयों ने डा. राय को डी. एस-सी. की सम्मानित उपाधि प्रदान की थी। वे सन् 1939 से 45 तक &#8216;ऑल इंडिया मेडिकल काउंसिल&#8217; के अध्यक्ष रहे। इसके अतिरिक्त वे &#8216;कलकत्ता मेडिकल क्लब&#8217;, &#8216;इंडियन मेडिकल एसोसिएशन,&#8217; &#8216;जादवपुर टेक्निकल कालेज&#8217;, &#8216;राष्ट्रीय शिक्षा परिषद&#8217;, भारत सरकार के &#8216;हायर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालाजी&#8217;, &#8216;ऑल इंडिया बोर्ड ऑफ बायोफिज़िक्स&#8217;, तथा जादवपुर विश्वविद्यालय के अध्यक्ष एवं अन्यान्य राष्ट्रीय स्तर को संस्थाओं के सदस्य रहे। चिकित्सक के रूप में उन्होंने पर्याप्त यश एवं धन अर्जित किया और लोकहित के कार्यों में उदारतापूर्वक मुक्त हस्त दान दिया। बंगाल के अकाल के समय आपके द्वारा की गई जनता की सेवाएँ अविस्मरणीय हैं।</p>
<p>डाक्टर बिधान चंद्र राय वर्षों तक कलकत्ता कारपोरेशन के सदस्य रहे तथा अपनी कार्यकुशलता के कारण दो बार मेयर चुने गए। उन्होंने कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य के रूप में सविनय अवज्ञा आंदोलन में जेल यात्रा की। वे सन् 1942 से सन् 1944 तक कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे तथा विश्वविद्यालयों की समस्याओं के समाधान में सदैव सक्रिय योग देते रहे।15 अगस्त, सन् 1947 को उन्हें उत्तर प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया गया पर उन्होंने स्वीकार नहीं किया। प्रदेश की राजनीति में ही रहना अधिक उपयुक्त समझा। वे बंगाल के स्वास्थ्य मंत्री नियुक्त हुए।</p>
<p>सन् 1948 में डॉ प्रफुल्ल चंद्र घोष के त्यागपत्र देने पर प्रदेश के मुख्यमंत्री निर्वाचित हुए और जीवन पर्यत इस पद पर बने रहे। विभाजन से त्रस्त तथा शरणार्थी समस्या से ग्रस्त समस्या प्रधान प्रदेश के सफल संचालन में उन्होंने अपूर्व राजनीतिक कुशलता एवं दूरदर्शिता का परिचय दिया। उनके जीवनकाल में वामपंथी अपने गढ़ बंगाल में सदैव सफल मनोरथ रहे। बंगाल के औद्योगिक विकास के लिए वे सतत प्रयत्नशील रहे। दामोदर घाटी निगम और दुर्गापुर इस्पात नगरी उन्ही का दें है। डॉ. बिधानचंद्र राय अपनी मृत्यु से छः माह पूर्व अपनी माँ के सम्मानार्थ 29 दिसंबर, 1961 को एक विद्यालय खोलने के लिए दिए थे।  डाक्टर राय की माँ का नाम श्रीमती अघोर कामिनी देवी बिधान था। </p>
<p>यह बात भी अलग है कि उनके भवन के प्रवेश द्वार के दाहिने तरफ खजांची रोड के मोहतरम-मोहतरमायें-दूकानदार-रेड़ीवाला, खोमचा वाला, सब्जी वाला मुद्दत तक कचड़ा फेंकता था। उन दिनों उस रास्ते निकलना मुश्किल होता था। साँसे रोक कर चलते थे। आज भी स्थिति बेहतर नहीं होगी। अगर स्थिति सुधर गयी होगी तो धन्यवाद दें। वैसे बिहार ही नहीं, भारत में स्वच्छता और सफाई के लिए मुहिम तो सत्तर के दसक में एक और बिहारी डॉ बिंदेश्वर पाठक द्वारा प्रारम्भ किया गया था। लेकिन तकलीफ इस बात की रही &#8211; बिहार के लोगों में भी और डॉ पाठक के मन में भी &#8211; की सन 2014 आते-आते सफाई और स्वच्छता का कॉर्पोरेटाइजेशन हो गया, राजनीतिकरण हो गया, नाम-काम हथियाने की परम्परा प्रारम्भ हो गया &#8211; शेष तो आप सभी जानते ही हैं।</p>
<p>समय का दुर्भाग्य देखिये। प्रोविंसियल एसेम्ब्ली के दौरान श्री प्रफुल्ल चंद्र घोष के बाद (15 अगस्त, 1947 से 22 जनवरी, 1948) तक बंगाल में मुख्य मंत्री रहें। स्वतंत्र भारत में बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री के रूप में डाक्टर राय 23 जनवरी, 1948 से 25 जनवरी, 1950 तक, फिर 26 जनवरी, 1950 से अपनी अंतिम सांस 1 जुलाई, 1962 तक बंगाल के मुख्यमंत्री बने रहे। स्वतंत्र भारत में राष्ट्रपति शासन के अलावे, बंगाल में अब तक आठ मुख़्यमंत्री बने &#8211; अजय कुमार मुखर्जी, सिद्धार्थ शंकर रे, ज्योति बासु, बुद्धदेव भट्टाचार्य और सुश्री ममता बनर्जी &#8211; लेकिन किसी ने इस ऐतिहासिक स्थान पर विचार नहीं किया जिन्होंने बंगाल को एक दिशा दिया था। </p>
<p>जानकार सूत्रों के अनुसार विगत दिनों अघोर शिशु विद्यालय ट्रस्ट के कुछ अधिकारी बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी से मिलकर अपनी बातें, डॉ बिधान चंद्र राय के जन्मस्थान से सम्बंधित बातें, उसे ऐतिहासिक स्थान बनाने सम्बन्धी बातों को लेकर मिलने की इक्षा व्यक्त किये थे। अधिकारियों की मानसिकता की इतनी अधिक राजनीतिकरण हो गया है कि वे डाक्टर बिधान चंद्र राय के जन्मस्थान से जुड़े अधिकारियों की इक्षा को आसनसोल आते-आते दफ़न कर दिया। बंगाल सचिवालय और मुख्यमंत्री कार्यालय के वे अधिकारीगण अपने प्रदेश के मुख्यमंत्री तक खजांचिरोड के अधिकारियों की बात को पहुँचाने से मन कर दिया। अब अगर सुश्री ममता बनर्जी तक बात पहुंचेगी ही नहीं, फिर बंगाल की सरकार अपने पूर्व मुख्यमंत्री के बारे में सोचेंगे कैसे। वैसे डॉ बिधान चंद्र राय की तुलना न तो ज्योति बसी से की जा सकती है और ना ही बुद्धदेव भट्टाचार्य से। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/bangal-officers-creating-obstacle">आखिर बंगाल के वे कौन &#8216;दो अधिकारी&#8217; हैं जो डॉ बिधान चंद्र राय के जन्मस्थान की मुसीबत भरी बातों को मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी तक नहीं पहुँचने दे रहे हैं (भाग-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>शिक्षा प्रसार में बिहार के लोग &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; को और जमींदारों-राजाओं को नकेल कसने में &#8216;लौह पुरुष&#8217; को अगर भूल गए &#8230; तो समझिये इतिश्री देवाखंडे </title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/krishn-vallabh-sahay-the-iron-man-of-bihar</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 May 2022 08:07:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : आप माने अथवा नहीं। बिहार में जब भी &#8216;यादव&#8217; उपनाम पर चर्चा होगी, दो यादवों का नाम अवश्य आएगा और उनका भी नाम आएगा जो पिछड़ी जातियों के नाम पर &#8216;लच्छेदार राजनीतिक पराठे सकते&#8217; आये हैं। अब इसे उनका &#8216;सौभाग्य&#8217; कहिये या मतदाताओं का &#8216;दुर्भाग्य&#8217; &#8211; बिहार के लोग प्रारम्भ [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : आप माने अथवा नहीं। बिहार में जब भी &#8216;यादव&#8217; उपनाम पर चर्चा होगी, दो यादवों का नाम अवश्य आएगा और उनका भी नाम आएगा जो पिछड़ी जातियों के नाम पर &#8216;लच्छेदार राजनीतिक पराठे सकते&#8217; आये हैं। अब इसे उनका &#8216;सौभाग्य&#8217; कहिये या मतदाताओं का &#8216;दुर्भाग्य&#8217; &#8211; बिहार के लोग प्रारम्भ से &#8216;लपेटे&#8217; में आते रहे हैं। आज़ाद भारत में सन 1947 के बाद अगर बिहार की गलियों में चौथी पीढ़ी के मतदाता हो गए हैं, तो प्रदेश के विधानसभा और विधान परिषद् में भी &#8216;उस ज़माने के लोग&#8217; कहाँ बचे हैं। आज नीतीश कुमार, लालू यादव, सुशील मोदी, रवि शंकर प्रसाद, राधा मोहन सिंह, शत्रुघ्न सिन्हा, उपेंद्र कुशवाहा, मीरा कुमार, नन्द किशोर यादव, चिराग पासवान जैसे &#8216;जनता से कटे &#8211; कुर्सी से जुड़े&#8217; नेताओं को तो सभी जानते हैं; कोई &#8216;अनुयायी&#8217; हैं तो कोई &#8216;पिछलग्गू&#8217; &#8211; लेकिन आज बिहार के चौथी पीढ़ी के मतदाता शायद &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; और बिहार के &#8216;लौह पुरुष&#8217; को जानता होगा। </strong></p>
<p>#आर्यावर्त #इण्डियन नेशन अखबार उन दोनों &#8216;महामानवों&#8217; को देखा है और आज के परिपेक्ष में ही नहीं, आने वाले समय में भी, जब भी लिखने की बात होगी &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; और बिहार का &#8216;लौह पुरुष&#8217; को एक दूसरे से अलग रखकर शब्दबद्ध नहीं किया जा सकता है। अन्य राजनीतिक गतिविधियों पर चर्चाएं होंगी, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उस ज़माने में &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; शिक्षा के प्रचार-प्रसार के प्रति बहुत अधिक प्रतिबध्द थे। सामाजिक क्षेत्र के मीडिया के अभ्युदय और शब्दकोषों में बदलते शाब्दिक अर्थों के मद्दे नजर अगर आज की मीडिया &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; को शिक्षा जगत से जोड़कर देखेगी तो तत्काल उन्हें &#8216;शिक्षा माफिया&#8217; शब्द से अलंकृत करने में तनिक भी बिलम्ब नहीं करेगी। </p>
<p>लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकत है कि अविभाजित बिहार में &#8216;आरएलएसवाई&#8217; नामक शैक्षिक संस्थाओं का प्रदेश में &#8216;शैक्षिक-दर&#8217; बढ़ाने में योगदान अवश्य है, चाहे &#8216;पांच फ़ीसदी&#8217; ही क्यों न हो। अगर पांच फीसदी को ही आधार माने तो वर्तमान मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार के साथ-साथ प्रदेश के आला अधिकारी अगर प्रदेश का शैक्षिक दर 69.83 का आंकड़ा मानते हैं तो स्वाभाविक है कि &#8216;आरएलएसवाई&#8217; का पांच फ़ीसदी योगदान है। इससे भी बड़ी बात यह है कि कुछ देर के लिए अगर &#8216; शेर-ए-बिहार&#8217; को उस ज़माने के &#8216;शिक्षा माफिया&#8217; मान भी लें, तो बिहार के मतदाता से लेकर जो मतदान के दिन घर से नहीं निकलते हैं, इस बात को स्वीकार अवश्य करेंगे की &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; के बेटे के पास &#8216;स्नातक&#8217; का प्रमाण पत्र अवश्य है। जबकि सन नब्बे से 2005 तक प्रदेश का बागडोर सँभालने वाले &#8216;यादवों की अगली पीढ़ी के नेता&#8217; के बेटों ने दसवीं-बारहवीं का प्रमाण पत्र भी नहीं प्राप्त कर सके। यानी  मानसिकता में &#8216;अंतर&#8217; तो है, जहाँ तक शिक्षा का सवाल है। खैर। </p>
<figure id="attachment_4054" aria-describedby="caption-attachment-4054" style="width: 640px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3.jpeg" alt="" width="640" height="629" class="size-full wp-image-4054" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3.jpeg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3-300x295.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3-24x24.jpeg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/KBS-Family-Photo-1963-3-48x48.jpeg 48w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4054" class="wp-caption-text"><br />श्री कृष्ण बल्लभ सहाय और उनका परिवार।  साल 1963</figcaption></figure>
<p><strong>बहरहाल, आप माने या नहीं, जब &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; वृद्ध हो गए, तब बिहार की राजनीतिक मानचित्र पर लालू यादव अवतरित हुए थे &#8211; &#8216;स्वयंभू यादव नेता&#8217; बनकर। वैसे लालू यादव स्वयं को यादवों का, दलितों का, प्रदेश के गरीब-गुरबों का &#8216;स्वयंभू&#8217; नेता कह लें, हकीकत तो यह है कि असली नेता तो रामलखन सिंह यादव थे जो सं 1952 से 1991 तक बिहार विधान सभा में मुस्तैद रहे। जिसका हुए, उसका कभी हाथ नहीं छोड़े और जिसका नहीं हुए, उसका कभी ऊँगली भी नहीं पकड़े। सं 1991 में बिहार विधान सभा से निकलकर दिल्ली लोक सभा में विराजमान हुए। रसायन और उर्वरक के कैबिनेट मंत्री बने, बिहार की राजनीतिक इतिहास में, खासकर शिक्षा के विस्तार और विकास के अध्याय में जो पन्ने लिखे, जोड़े; आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी उस पन्ने से अधिक पन्ना कोई नहीं लिख सका।</strong> </p>
<p>&#8216;दहशत&#8217; था &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; का &#8216;सम्मान&#8217; के साथ। &#8216;लोग&#8217; दूर से डरते अवश्य थे, लेकिन पास आते ही पिघल जाते थे। लोग घबराते जरूर थे, लेकिन &#8216;थरथराते&#8217; नहीं थे। आज के नेता इस सम्मान के बारे में सोच नहीं सकते, चाहे &#8216;ब्राह्मण&#8217; हों, &#8216;क्षत्रिय&#8217; हो, &#8216;वैश्य&#8217; हो, &#8216;शूद्र&#8217; हो, &#8216;यादव&#8217; हों, &#8216;कुर्मी&#8217; हो, &#8216;कायस्थ&#8217; हो, &#8216;पासवान&#8217; हो, &#8216;कुशवाहा&#8217; हो; क्योंकि &#8216;सम्मान&#8217; &#8216;अर्जित&#8217; किया जाता है बहुत मसक्कत से, और वर्तमान राजनीतिक गलियारे में, चाहे पटना का सरपेंटाइन रोड हो या दिल्ली का संसद मार्ग औसतन 90 फीसदी से अधिक नेतागण उस सम्मान से कोसों दूर हैं । वह तो &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217;  ही थे कि तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री पी वी नरसिम्हा राव की सरकार &#8216;नो कॉन्फिडेंस मोशन&#8217; में बची थी। खैर। </p>
<p>आज &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; का जिक्र इसलिए कर रहा हूँ कि आज से कोई नौ दिन बाद बिहार के लोग अपने प्रदेश के &#8216;लौह पुरुष&#8217; को श्रद्धांजलि देंगे। सन 1974 के 3 जून को बिहार के लौह पुरुष बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय यानी के.बी. सहाय &#8216;आकस्मिक मृत्यु&#8217; को प्राप्त किये। लगभग इन पांच दशकों में यह सार्वजानिक नहीं हो पाया की बाबू के बी सहाय को किसने मारा, क्यों मारा जब वे अपने हिंदुस्तान एम्बेसेडर (BRM 101) की अगली सीट पर बैठे थे और एक ट्रक उनके हँसते-मुस्कुराते शरीर को &#8220;पार्थिव&#8221; बना दिया। पटना-हज़ारीबाग की वह सड़क आज तक उस घटना को नहीं भूल पायी है। </p>
<figure id="attachment_4055" aria-describedby="caption-attachment-4055" style="width: 640px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3.jpeg" alt="" width="640" height="640" class="size-full wp-image-4055" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3.jpeg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3-300x300.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3-150x150.jpeg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3-24x24.jpeg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3-48x48.jpeg 48w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-Hazaribagh-3-96x96.jpeg 96w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4055" class="wp-caption-text">श्री कृष्ण बल्लभ सहाय तत्कालीन बिहार के हज़ारीबाग में। साल: 1963</figcaption></figure>
<p>पालीगंज, अनिशाबाद, औरंगाबाद, बख्तियारपुर, रांची, नालंदा, कोडरमा, बेतिया, गया, नवादा और न जाने कितने शहर हैं बिहार के, जो उन दिनों भले &#8216;स्मार्ट शहरों&#8217; की गिनती में नहीं थे, लेकिन उन शहरों में स्थित रामलखन सिंह यादव के नाम की शैक्षणिक संस्थाओं से शिक्षा प्राप्त कर छात्र-छात्राएं अपने परिवार, समाज और प्रदेश का नाम रोशन किये थे। कल की ही तो बात हैं बिहार के बाइसवें मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार पटना विश्वविद्यालय के मगध महिला कॉलेज में भले यह स्वीकार कर लिए हों कि &#8220;जब वे इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ते थे, महिलाएं नहीं होती थी, जब कोई महिला कालेज परिसर में आती थी सभी उसे देखने लगते थे।&#8221; परन्तु, हकीकत यह है कि रामलखन सिंह यादव अपनी शैक्षणिक संस्थाओं में महिलाओं को विशेष स्थान दिए थे। वे महिला शिक्षा के पक्षधर ही नहीं, अग्रणी भी थे। यह बात अलग है कि नीतीश कुमार अपनी बात 2022 में कह रहे हैं, जबकि सत्तर के दशक और उसके पूर्व से ही रामलखन सिंह यादव के महाविद्यालयों में महिलाएं शिक्षा प्राप्त करती थी। </p>
<p>बहरहाल, बिहार में तीसरी विधान सभा काल में दो व्यक्ति मुख़्यमंत्री कार्यालय में बैठे। सन 1962 के चुनाव के बाद श्री बिनोदानंद झा के नेतृत्व में सरकार बनी। बिनोद बाबू &#8216;राजमहल&#8217; विधान सभा क्षेत्र से चुनाव जीत कर आये थे। लेकिन पांच साल नहीं चले  और उन्हें महात्मा गांधी के जन्मदिन के अवसर पर सं 1963 में मुख्यमंत्री की कुर्सी के बी सहाय के हाथ सौंपना पड़ा। सहाय बाबू 2 अक्टूबर, 1963 से 5 मार्च, 1967 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रहे। तीसरी विधान सभा के बाद से लगातार बिहार में &#8216;आया राम &#8211; गया राम&#8217; सिद्धांत पर सरकार बन रही थी, चल रही थी, जा रही थी। चौथे विधान सभा, जिसका चुनाव 1967 में हुआ था, चार मुख्यमंत्री महोदय, मसलन जनक्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा, शोषित दल के सतीश प्रसाद सिंह, बी पी मंडल और कांग्रेस के भोला पासवान शास्त्री का मुख्यमंत्री कार्यालय में &#8216;उदय&#8217; और &#8216;अस्त&#8217; हुआ। इसी तरह पांचवी विधान सभा (1969) में हरिहर प्रसाद, भोला पासवान शास्त्री, दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर का उदय-अस्त हुआ। लेकिन आज अगर पिछले 22 मुख्यमंत्रियों को एक नजर में देखें, तो बाबू श्रीकृष्ण सिन्हा को छोड़कर, कुछ ही मुख्यमंत्री हैं जिन्हें आज भी बिहार के लोग, बिहार के मतदाता, प्रदेश के विद्वान-विदुषी से लेकर अशिक्षित और अज्ञानी तक &#8211; नहीं भुला है और शायद भूल भी नहीं पायेगा। उन्हीं &#8216;ना भूलने वाले मुख्यमंत्रियों&#8221; की सूची में एक हैं बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय। </p>
<p>31 दिसंबर, 1998 को, यानि अपनी मृत्यु से कोई आठ साल पहले &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; राम लखन सिंह यादव ने &#8216;बिहार के लौह पुरुष&#8217;  के बी सहाय के बारे में, उनके साथ अपनी सानिग्धता के बारे में, अपने प्रेम-सम्मान और विश्वास के बारे में, जनता के प्रति उनकी सोच के बारे में कुछ शब्द लिखे थे। यह लेख पटना से प्रकाशित &#8216;आज&#8217; समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ था। इस लेख को सहाय साहब के पौत्र राजेश सहाय अपने ब्लॉग पर बहुत सम्मान के साथ सुरक्षित रखे हैं। विगत दिनों जब &#8216;सोडा फ़ाउंटेंन&#8217; की कहानी &#8216;खादी ग्रामोद्योग&#8217; आगजनी की कहानी, पुलिस गोली काण्ड की कहानी लिखा, तो ऐसा लगा कि आज की पीढ़ी को बाबू राम लखन सिंह यादव का बाबू कृष्ण बल्लभ सहाय के प्रति कितना सम्मान था, उन दिनों की राजनीतिक हालात कैसी थी, क्यों वह सब हुआ &#8211; इस बात को अगर आज की पीढ़ी के लोग देखेंगे, पढ़ेंगे तो जानकारी स्वरुप ही सही, बेहतर अवश्य होगा। &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; राम लखन सिंह यादव के शब्दों को हम राजेश सहाय को धन्यवाद अर्पित करते हूबहू यहाँ रख रहे हैं। </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/RLS.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/RLS.jpg" alt="" width="899" height="769" class="alignleft size-full wp-image-4056" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/RLS.jpg 899w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/RLS-300x257.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/RLS-768x657.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 899px) 100vw, 899px" /></a></p>
<p>&#8220;स्वर्गीय कृष्ण बल्लभ सहाय जो आम तौर पर के.बी.सहाय के नाम से जाने जाते थे, जन्मकाल से ही एक विलक्षण प्रतिभा संपन्न, स्मरण शक्ति में बेजोड़, अंग्रेजी (साहित्य) भाषा के अच्छे ज्ञाता, छात्र जीवन में अपने समय में मेट्रिक परीक्षा में प्रदेश में सर्वोत्तम, अंग्रेजी आनर्स में विश्वविद्यालय भर में सर्वोत्तम और गेट गोल्ड मेडलिस्ट विचार एवं व्यवहार तथा आचार में पक्के समाजवादी, गरीबों विशेष कर पिछड़े वर्गों हरिजन, आदिवासियों तथा अल्प संख्यकों के पक्के हिमायती, किसानों के प्रणेता, ज़मींदारी प्रथा उन्मूलन के भारत भर में सर्वप्रथम जनक तथा बिहार के लौह पुरुष के रूप में बराबर याद किये जायेंगें। </p>
<p>कृष्ण बल्लभ बाबू का जन्म इकतीस दिसम्बर 1898 को पटना ज़िले में फतुआ थाना अन्तर्गत शेखपुरा ग्राम में एक साधारण कायस्थ परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री गंगा प्रसाद पुलिस विभाग में दरोगा के पद पर पदस्थापित थे। इनकी माँ एक अनुशासन प्रिय एवं दृढ इच्छा शक्ति की धनी महिला थी। जो बात उनके मन में बैठ जाती उस पर वे दृढ रहती थी। ऐसी ही एक घटना कृष्ण बल्लभ बाबू के जन्म के बाद सात वर्ष बीतते-बीतते घटी। कृष्ण बल्लभ बाबू तीन भाई थे। एक की मृत्यु तो हमलोगों से संपर्क से पहले हो चुकी थी, जिनके पुत्र आज भी तारा बाबू के रूप में जीवित हैं। दूसरे भाई डॉक्टर दामोदर प्रसाद एक कुशल डॉक्टर के रूप में लोगों की सेवा में आजीवन लगे रहे। दरियापुर पटना स्थित इनके मकान में कृष्ण बल्लभ बाबू के साथ अन्य राजनीतिज्ञों का जमावड़ा रहता था, जिसमें श्री के. पी. सहाय श्री गंगा शरण सिंह एवं श्री उमाकांत की चर्चित त्रिगुट मंडली प्रतिदिन यहाँ बैठा करती थी।  </p>
<p>सन 1906 में कृष्ण बल्लभ बाबू के बहन की शादी तय हुई। इनके दादा ने शादी तय की थी। लेकिन पता नहीं कैसे इनकी माँ को सूचना हो गयी कि होने वाले वर के पेट में पिलही रोग है। उन्होने इनके पिता दरोगाजी को मजबूर किया कि वे स्वयं जा कर लड़के को देखें कि हकीकत क्या है। वे जाने को तैयार भी हुए लेकिन गांवों और विशेषकर गांवों की महिलाओं की चर्चा के दवाब में आकर जाने के समय अपनी यात्रा स्थगित कर दी क्योंकि पिता के प्रति यह अविश्वास होता। बदकिस्मती से ठीक शादी होने के बाद मंडप में इनकी माँ ने परिक्षण के समय देख लिया कि लड़के के पेट में पथरी है और वह वहीं पर मूर्छित हो कर गिर गया। बरात विदाई के ठीक चौथाडी के दिन उस लड़के का देहांत हो गया। इसके बाद इनकी माँ ने तय किया कि अब वह किसी भी हालात में शेखपुरा में नहीं रहेंगीं और बाध्य होकर उनके दादा को भी उनकी ज़िद के सामने झुकना पड़ा। </p>
<p>कृष्ण बल्लभ बाबू सात वर्ष की उम्र में ही अपने भाई बहन के साथ माँ के आदेशानुसार माँ के साथ पुनपुन स्टेशन आकर ट्रैन से हजारीबाग के लिए रवाना हो गए जहाँ वे अपने परिवार समेत आजीवन रहे। </p>
<p>प्राइमरी शिक्षा उन्होनें हजारीबाग धर्मशाला प्राइमरी विद्यालय से तथा मेट्रिक तक की शिक्षा ज़िला स्कूल हजारीबाग से प्राप्त की। मेट्रिक की परीक्षा में उन्होनें बिहार भर में प्रथम स्थान प्राप्त किया। 1916 में मेट्रिक परीक्षा पास करने के बाद 1919 में संत कोलंबस कॉलेज से अंग्रेजी स्नातक परीक्षा में गोल्ड मैडल के साथ पास किया। तत्कालीन गवर्नर श्रीमान  गेट  के  हाथों  उन्हें  यह गोल्ड  मैडल  मिला। इसके बाद उन्होनें एम.ए. (अंग्रेजी) में तथा लॉ प्रथम वर्ष में एडमिशन लिया। एक वर्ष तक दोनों विषयों को पढने के बाद 1921 में महात्मा गाँधी के आह्वान पर अपने उज्जवल भविष्य को तिलांजलि देकर अपना जीवन पूर्ण रूप से राष्ट्र को समर्पित करते हुए 1921, 1928, 1929, 1932, 1934, 1940, 1942 में तमाम आज़ादी की लड़ाईयों में साक्रिय रूप से हिस्सा लेने कारण उन्हें वर्षों जेल में जीवन बिताना पड़ा। </p>
<p>जैसा कि मैंने प्रारम्भ में ही इनके कई गुणों के बारे में लिखा है, कुछ व्यक्तिगत जीवन की घटनाओं से पता चल जाएगा कि वे गुण इनमें किस प्रकार कूट कूट कर भरे थे। कृष्ण बल्लभ बाबू की पत्नी की मृत्यु के बाद तीन शादियां हुई थी। पहली शादी उनके छात्र जीवन में ही नवादा ज़िले के दरियापुर ग्राम में तत्कालीन पुलिस दरोगा श्री विशेश्वर नाथ की पुत्री से हुई। ससुराल में प्रथम बार एक शादी में सम्मलित होने गए। तेज़ छात्र होने के नाते उन्हें देखने के लिए उनके संबंधी और ग्राम के लोग भीड़ लगाए थे। बरात आने के दिन करीब दस हलवाई और अन्य नौकर बहुत सुबह से ही मिठाई और पूरी लोगों के खाने के लिए तैयार करते रहे। दोपहर में उन्हें खाने के लिए सूखा चूड़ा एवं गुड़ दिया गया तभी उनके ससुर दरोगाजी आकर उन नौकरों को पीटने लगे कि काम छोड़ कर नाश्ता क्यों कर रहा है? इस घटना ने कृष्ण बल्लभ बाबू के दिमाग पर गहरा असर किया और उन्होंने तय किया कि इन गरीबों के मार खाने के बाद इनके द्वारा तैयार किया गया भोजन करना भारी गुनाह है। उन्होंने बहाना किया कि उनके पेट में दर्द हो गया है और उन्हें शीघ्र पटना पहुंचा दिया जाए। उनकी सास ने अपने पति की बातों की अवहेलना करते हुए कृष्ण बल्लभ बाबू की इच्छानुसार बिना समय गंवाए उन्हें शीघ्र पटना भेज दिया। यह घटना साबित करती है कि गरीबों के प्रति उनके दिल में कितना दर्द था। </p>
<p>दूसरी घटना हजारीबाग ज़िले के गिद्धौर थाने में घटी जहां उनके पिता पदस्थापित थे। गर्मियों की छुट्टी में पिताजी के आदेशानुसार वे वहीं थाना में छुट्टी बिताने गए। संयोगवश कुछ दिनों के लिए उनके पिता एक पठान जमादार को उनके गार्डियन के रूप में सौंप कर कहीं बाहर गए। कृष्ण बल्लभ बाबू खाते, गाय का दूध पीते और बचा हुआ दूध नौकर को पिला देते थे। एक दिन सुबह जमादार उनके पास आये और जब उन्हें मालूम हुआ कि गाय का दूध नौकर पिता है तब उसने उस नौकर को लाठी से इतना मारा कि वह बेहोश हो गया। उसने उन्हें भी डांटा तुम नौकर को आगे दूध पिलाओगे तो तुम्हारी गति भी यही होगी। वह नौकर खैनी खाता था इसलिए चुक्का में चूना रखता था। कृष्ण बल्लभ बाबू ने अपने हाथ से हल्दी पीस कर चूना के साथ गर्म कर के उसके बदन में पूरा लेप दिया। रात्रि में जब उसकी तबियत ठीक हुई तब उससे उन्होंने कहा कि पिताजी के आने पर कह देना कि आवश्यक कार्यवश मैं आज ही पटना जा रहा हूँ। इस घटना के बाद कृष्ण बल्लभ बाबू पिता के लाख कहने के बाद भी किसी थाने में नहीं गए। इससे गरीबों के प्रति उनके मन में अपार श्रद्धा एवं भाव प्रकट होता है। </p>
<figure id="attachment_4057" aria-describedby="caption-attachment-4057" style="width: 640px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay-2.jpg" alt="" width="640" height="460" class="size-full wp-image-4057" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay-2.jpg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay-2-300x216.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4057" class="wp-caption-text">श्री कृष्ण बल्लभ सहाय और अन्य गणमान्य लोग &#8211; साल: 1963</figcaption></figure>
<p>कृष्ण बल्लभ बाबू ने समाजवाद को अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में मूर्त रूप दिया। रहन-सहन, खान-पान, पारिवारिक जीवन, लोगों के प्रति उनका व्यवहार, उनके द्वारा किये गए काम, जिस पर भी आप नज़र डालें उसकी झलक साफ़ दृष्टिगोचर होती है। वे भीतर और बाहर पारदर्शी थे वे स्पष्टवादी, ईमानदार एवं निसंकोच, सच्चाई के साथ अपने बातों को स्पष्ट रूप से रखने के आदि थे। उनकी स्मरण शक्ति अद्वितीय थी। सात वर्ष की उम्र से जबसे वे अपने गांव शेखपुरा छोड़ कर हजारीबाग गए आजीवन छोटी या बड़ी घटनाएं समय और तिथि समेत अच्छी तरह याद रहती थी। आवश्यकतानुसार बिना किसी कागज़ को देखे सारी घटनाएं वे बतला देते थे। जब बिहार की राजनीति में तात्कालिक मुख्यमंत्री से कुछ विभेद पैदा हुआ और उनके ऊपर कई तरह के गंभीर आरोप और आक्षेप समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाया गया था तब उन्होंने सब का जवाब एक लंबे वक्तव्य में दिया। </p>
<p>उन दिनों वे हजारीबाग में थे। 1957 में चुनाव हारने के बाद उन्होनें आवास एवं गाडी से झंडा उतरवाया। सभी कर्मचारियों को एक साथ खड़ा कर उन्हें धन्यवाद् दिया। सबको एक एक सर्टिफिकेट दिया और वहीं से गाडी में बैठ कर रवाना होने से पूर्व सभी कर्मचारियों को सरकार में जहां भी रहे अनुशासन, ईमानदारी एवं निष्ठा से कार्य करने की सलाह दी। सरकारी आवास में पुनः उन्होंने पैर नहीं रखा। मुझसे इतना ही पुछा कि मैं हजारीबाग में उन्हें खबर कर दूं कि एक दिन के बाद वे कहाँ आवेंगें। मैंने उनके साथ रहने का प्रबंध पहले ही कर लिया था इसलिए कहा कि निसंकोच सीधे मेरे घर पहले आ जाएँ। वे ठीक तीसरे दिन आये और मेरे ही निवास के निकट नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आई. एन. ए. की सरकार के मंत्री स्वर्गीय परमानन्द जी का बड़ा मकान जो गुलाब गार्डन के नाम से मशहूर था उसी में उनका निवास रखा गया। लेकिन कुछ ही दिनों के बाद उन्होनें बड़े मकान को छोड़ कर उसी प्रांगण में उनके नौकरों के रहने का तीन रूम का मकान था उसमे बिना किसी से राय लिए रहने लगे। </p>
<p>उन दिनों समाचार पत्रों में छपी अनर्गल बातों का जवाब देना हुआ तब उन्होनें हजारीबाग से संध्या समय फ़ोन किया कि दो अंग्रेजी स्टेनोग्राफर को सुबह से ही तैयार रखें। आदेशानुसार सब कुछ तैयार रखा गया और वे हजारीबाग से चल कर सीधे सात बजे सुबह गुलाब गार्डन पहुँच गए। गार्डन में ही एक पेड़ के नीचे बैठ कर बिना हाथ में कागज़ या चिट लिए दोनों स्टेनोग्राफरों को एक एक कर डिक्टेशन अंग्रेजी में देते रहे और पूरा टाइप होने पर यथोचित संशोधन किया। वक्तव्य लंबा था। उसकी कई प्रतियां तैयार की गयी और यह कह कर कि मैं इसे प्रेस में प्रकाशनार्थ भेज दूंगा, वे उसी संध्या को हजारीबाग के लिए रवाना हो गए। मैं चाहता था कि वह अभी प्रकाशित न हो क्योंकि इससे बहुत झगडे पैदा होंगें। लेकिन हजारीबाग पहुंचने के बाद भी उन्होनें कहा कि इसे प्रकाशित करा ही देना चाहिए। तब मैंने उसे प्रकाशनार्थ भेज दिया। उसके सम्बन्ध में बहुत प्रचार किया गया कि यह वक्तव्य कदम कुआँ के ब्रेन ट्रस्ट लोगों ने सप्ताहों बैठ कर सब कागज़ात निकाल कर ड्राफ्ट किया है। मैं और श्री एल. एन. झा को ही यह पता था यह कैसे और कहाँ ड्राफ्ट हुआ था। कृष्ण बल्लभ बाबू की स्मरण शक्ति क्या थी यह तो इसका सिर्फ एक छोटा सा उदाहरण था। </p>
<p>बिहार में सर्वप्रथम ज़मींदारी उन्मूलन का कानून बनाया गया वे इसके जनक थे। उसके चलते बिहार के ज़मींदारों से, बड़े-बड़े लोगों से और ख़ास कर रामगढ के राजा कामाख्या नारायण सिंह ने जन्म भर उनकी राजनैतिक शत्रुता और मुकदमे लगे रहे, चूँकि कृष्ण बल्लभ बाबू ही राजस्व और जंगल विभाग के मंत्री बराबर रहे। मुझे याद है लैंड सीलिंग बिल को पेश करते हुए उन्होने कहा था कि ज़मींदारों और बड़े-बड़े भूपतियों का जो रवैया है पता नहीं यह कानून कब लागू होगा। लेकिन मैं तो कम से कम रास्ता प्रशस्त कर रहा हूँ कि आगे शीघ्रताशीघ्र ही इसे लागू करने के लिए कानून बनाने में समय खर्च न हो। इस कानून का भी बड़ा विरोध हुआ और मुकदमे में कई दिनों तक लटका रहा। विनोबा भावे के भूदान आंदोलन को बढ़ने सहयोग करने ज़मीन माँगने में भी कृष्ण बल्लभ बाबू आगे रहे। सबसे बड़ी बात यह हुई कि 1954 में देश में सबसे पहले कृष्ण बल्लभ बाबू के द्वारा ही बिहार भूदान एक्ट बनाया गया। कहा जा सकता है कि ज़मीन संबंधी सारे प्रगतिशील कदम बिहार में उन्हीं के द्वारा उठाये गए।  </p>
<p>1967 का चुनाव सारे उत्तर भारत विशेष कर बिहार के लिए बहुत ही मील का पत्थर साबित हुआ। इस साल आम चुनाव के पूर्व से ही आम मतभेद, अराजपत्रित कर्मचारियों एवं छात्रों के बीच विरोधी दलों द्वारा उन्हें तरह-तरह की मांगों को सरकार द्वारा स्वीकृत करवाने के मुद्दों पर आक्रामक और हिंसक रास्ते पर ले जाकर भयंकर आंदोलन करवाने के चलते कांग्रेस की बड़ी क्षति हुई। कृष्ण बल्लभ बाबू पटना शहर से ही उम्मीदवार बने और उनका विरोध महामाया प्रसाद सिन्हा ने किया। पटना में हिंसक आंदोलन पर बहुत लाचार होकर पुलिस और मजिस्ट्रेट को आगज़नी से शहर को बचाने तथा आत्मरक्षार्थ गोली चलानी पड़ी। खादी भवन जैसी संस्था में भी लोगों ने आग लगायी। </p>
<p>मैं स्वयं भी दक्षिण पटना से उम्मीदवार था। उक्त घटनाओं के चलते हमलोगों के चुनाव पर बुरा असर पड़ा। कृष्ण बल्लभ बाबू को हम लोगों ने बहुत समझाया बुझाया लेकिन वे अपने हर चुनाव भाषण में पटना में मतदाताओं को कहते रहे कि मेरे रहते जिस तरह की हिंसक घटनाएं घाटी हैं उसे बर्दाश्त नहीं कर सकता हूँ और किसी प्रकार की जांच करवाने को तैयार नहीं हूँ। हाँ आप चाहें तो मुझे वोट न दें और जिसे चाहे गद्दी पर बिठा दें। </p>
<figure id="attachment_4058" aria-describedby="caption-attachment-4058" style="width: 640px" class="wp-caption alignleft"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-5-Oct-Editors-Meet.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-5-Oct-Editors-Meet.jpeg" alt="" width="640" height="529" class="size-full wp-image-4058" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-5-Oct-Editors-Meet.jpeg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-5-Oct-Editors-Meet-300x248.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4058" class="wp-caption-text">सम्पादकों के साथ बैठक। चित्र में आर्यावर्त अखबार के तत्कालीन संपादक श्रीकांत ठाकुर &#8216;विद्यालंकार&#8217; भी है</figcaption></figure>
<p>उन दिनों राष्ट्रिय कांग्रेस के अध्यक्ष कामराज नादर थे उन्होनें पटना आगमन पर उन्हें समझाया कि यहां जो गोलीकांड हुआ है उसी कि न्यायिक जांच करवा दी जाए। श्री नादर ने जब यह प्रस्ताव कृष्ण बल्लभ बाबू के समक्ष रखा तब बिना किसी प्रकार की बात किये उन्होंने अपना त्याग पत्र बिहार कांग्रेस पार्टी नेतृत्व एवं मुख्यमंत्री पद से उनके हाथ में दे दिया क्योंकि जांच का आदेश देकर वे प्रशासन को नाजायज़ ढंग से हतोत्साहित नहीं करना चाहते थे। हारने के बावजूद उनके ऊपर जरा सी भी उदासी नहीं आई। इससे स्पष्ट है कि वे कितने सख्त प्रशासक थे और प्रजातंत्र में उनका कितना विश्वास था। जिस कारगर ढंग से मजबूती से स्वयं जाकर जमशेदपुर, रांची आदि जगहों पर उन्होंने मुसलमानों पर हुए दंगों को दबाया वह अद्वितीय था। </p>
<p>इसी प्रकार की एक और घटना घटी। भारत के गृह मंत्री और उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल ने बेतिया राज के साठी की जमीन को लेकर श्री कृष्ण सिंह को देहरादून में सफाई देने के लिए बुला भेजा। श्री बाबू बहुत ही मर्माहत हुए। कृष्ण बल्लभ बाबू ने उन्हें जाने से रोक स्वयं सरदार पटेल से मिले सुश्री मणि देवी पटेल और सरदार पटेल के सचिव श्री शंकर के समक्ष ही सरदार पटेल ने कृष्ण बल्लभ बाबू को और कुछ कहने से पहले ही कहा कि कृष्ण बल्लभ साठी की ज़मीन वापस करनी होगी। कृष्ण बलभ बाबू ने जवाब दिया &#8220;साठी कि ज़मीन कभी वापस नहीं होगी।“ सरदार गुस्से से गुर्राते हुए बोले &#8220;क्यों?&#8221; कृष्ण बल्लभ बाबू का जवाब था आप केवल केंद्र सरकार के उपप्रधान मंत्री ही नहीं अपितु सारे देश के और कांग्रेसजनों की इज़्ज़त के संरक्षक भी हैं। बिना सुने आपके द्वारा फाँसी की सजा नहीं होनी चाहिए। सरदार ने शांतिपूर्वक जब सारे कागज़ात देखे और कृष्ण बल्लभ बाबू ने बिहार सरकार के निर्णय पर जो सफाई दी उससे सरदार पटेल पूर्णरूपेण संतुष्ट हुए। उलटे जिन लोगों ने चार्ज लगाया था उन्हीं के ऊपर सरदार पटेल ने अपनी नाराज़गी जाहिर किया। सरदार पटेल के आग्रह पर उनकी राय के अनुसार साठी ज़मीन के बारे में कानून बना। लेकिन जैसा कृष्ण बल्लभ बाबू ने कहा था वह कानून कोर्ट द्वारा रद कर दिया गया। उक्त घटना से उनके सख्त प्रशासक और नीडर राजनेता होने का प्रमाण साबित होता है। </p>
<p>जब-जब बिहार को विपत्ति का सामना करना पड़ा कृष्ण बल्लभ बाबू ने आगे बढ़ कर कुशल नेतृत्व प्रदान किया। बाढ़ से उत्पन्न परिस्थिति, भयंकर भूकंप या फिर 1966-67 के भयंकर अकाल की परिस्थिति में कृष्ण बल्लभ बाबू ने श्री जय प्रकाश नारायण की अध्यक्षता में सक्षम लोगों के साथ एक केंद्रीय सहायता समिति बना कर चारो ओर से स्वयंसेवी संस्थाओं और सरकारों से सहायता लेकर बिहार की जनता को भीषण दुर्भिक्ष से बचाया। जब वे मंत्री नहीं थे तब बिहार निर्माता कोष समिति बनाकर राशि संग्रह कर राजेंद्र बाबू, श्री बाबू और अनुग्रह बाबू की याद में जनता की सेवा हेतु संस्थाओं को जन्म दिया। </p>
<p>कृष्ण बल्लभ बाबू ने यो तो सारे बिहार की सेवा आजीवन की, जिसके लिए वे बराबर याद किये ही जायेंगें- छोटानागपुर जहां आदिवासी, हरिजन एवं पिछड़े जातियों का ही बाहुल्य है वहां के मूल निवासी सबसे गरीब लेकिन जहां ज़मीन के नीचे अतः खनिज पदार्थ भरा पड़ा है और उससे सारा देश लाभान्वित हो रहा है, कृष्ण बल्लभ बाबू आजीवन इन गरीबों की सेवा करते रहे। भिन्न-भिन्न संस्थाओं के माध्यम से सेवा तो करते ही थे, उनके मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार सरकार छोटानागपुर में कुछ महीने बैठा करती थे। लेकिन उनके मुख्यमंत्री पद से हट जाने के बाद से आज तक छोटानागपुर की हालात बाद से बदतर होती जा रही है। आज छोटानागपुर को बाध्य होकर अलग राज्य बनाने पर विचार हो रहा है। </p>
<p>कृष्ण बल्लभ बाबू समाज सेवा और कांग्रेस के लिए सरदार पटेल, किदवई, इन्द्रभानु गुप्त जैसे लोगों की श्रेणी में आते हैं जो करोड़ों रुपये पार्टी फण्ड के लिए इकठ्ठा करते रहे लेकिन इसका उपयोग कभी भी अपने या अपने परिवार के लिए नहीं किया। जब कभी सौ दो सौ रुपये उनकी पत्नी घर खर्च के लिए उनसे मांगती थी -लाखों रुपये पारी फण्ड के होने के बावजूद उन्होनें नहीं दिया। कभी-कभी तो हमलोग भी उनके घर के निजी खर्च के लिए पैसे देते थे और पैसे आने पर वे उसे अवश्य लौट दिया करते थे। अपने राजनैतिक और सामाजिक जीवन के नज़दीकी लोगों से वे सख्त हिसाब लिया करते थे। श्री दीनानाथ पांडेय के गोलीकांड में मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री श्री बाबू के कहने पर मुझे छात्रों के बीच कार्य करने के लिए कुछ पैसे दिए गए। सभी खर्चे की विधिवत रसीद मैंने दी लेकिन मात्र इक्कीस रुपये का मैंने अन्यान्य खर्च हुए उस पर कृष्ण बल्लभ बाबू ने बड़ी कड़ाई से मुझसे हिसाब लिया। उनकी प्रतिदिन की आदत थी कि वे रात्रि में दिन भर का हिसाब रजिस्टर में दर्ज करने के बाद जांच कर अपना दस्तखत कर दिया करते थे।</p>
<figure id="attachment_4059" aria-describedby="caption-attachment-4059" style="width: 640px" class="wp-caption alignright"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay.jpg" alt="" width="640" height="473" class="size-full wp-image-4059" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay.jpg 640w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/05/1963-3-Oct-K.-B.-Sahay-300x222.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4059" class="wp-caption-text">श्री कृष्ण बल्लभ सहाय और अन्य गणमान्य लोग &#8211; साल: 1963</figcaption></figure>
<p>जब ज़मींदारी प्रथा उन्मूलन और जंगल कटाई को लेकर राजा रामगढ और कृष्ण बल्लभ बाबू में भयंकर मुक़दमेबाज़ी हुई तब बिहार मंत्रिमंडल ने बार-बार स्वीकृति प्रस्ताव लाने के बजाय खर्च करने के लिए उन्हें इजाज़त दे दी। उनके निजी सचिव श्री राणा जो उनके जेल के समय के सहयोगी थे मुकदमा के खर्चे का हिसाब रखते थे। कुछ महीने का हिसाब उन्होंने नहीं दिया। मुक़दमे के ही सिलसिले में श्री लाल नारायण सिंह, श्री बजरंग सहाय श्री कृष्ण बल्लभ बाबू के साथ ट्रैन से दिल्ली जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने अपने निजी सचिव श्री राणा से पूछा कि हिसाब आप क्यों नहीं दे देते हैं? श्री लाल नारायण सिंह और श्री बजरंग सहाय के कहने पर उन्होंने श्री राणा से लौटकर रांची में हिसाब देने की बात मान ली। संयोगवश एक विशेष घटना घटी। उस दिन रांची में मैं शत्रुघ्न बाबू एवं कामता बाबू (प्रसिद्ध कवि एवं साहित्यकार कामता प्रसाद सिंह काम जो डॉ. शंकर दयाल शर्मा, भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री एवं राज्यपाल के पिता थे) मौजूद थे। हिसाब माँगने पर श्री राणा ने कृष्ण बल्लभ बाबू को कहा &#8220;मैंने आपको धोखा दिया है और ट्रेज़री से रुपये निकाल कर निजी मद में खर्च कर दिया है।“ जब हमलोगों को मालूम पड़ा तब श्री राणा को सबसे पहले पकड़ा गया। श्रीबाबू ने मुख्य सचिव श्री एल.पी.सिंह को बुला कर इस सम्बन्ध में राय ली। श्री एल.पी.सिंह ने सही राय दी कि जितनी राशि राणा ने ट्रेज़री से नाजायज़ ढंग से निकाली है उतनी राशि पहले जमा कर दी जाए अन्यथा विरोधी लोग बवाल पैदा करेंगें। कृष्ण बल्लभ बाबू के कुछ समर्थकों ने रुपये लेकर जमा किया एवं राणा से उतना क़र्ज़ के रूप में हैण्ड नोट लिखवा लिया ताकि पीछे धोखा न दे। बात यहीं दब गयी। पटना ट्रेज़री कोषागार का लगातार चार दिनों तक तात्कालिक ज़िलाधिकारी ने रात दिन परिश्रम कर एक-एक कागज़ का मुआयना किया। लेकिन श्री राणा द्वारा निकाली गयी राशि का कोई सुराग नहीं मिला। </p>
<p>1967 में महामाया सरकार पांच व्यक्तियों पर मेरे समेत पांच जांच कमीशन बैठाई। सी.बी.आई. के डी.आई.जी. इंचार्ज थे। कमीशन के फैसले के बाद डी.आई.जी. ने मुझसे कहा लगभग सारे देश में विशेष कर राजनीतिज्ञों पर मैं जांच करता रहा हूँ लेकिन कृष्णा बल्लभ सहाय जैसा ईमानदार व्यक्ति बिरले मिला क्योंकि इस व्यक्ति के पास करोड़ों रुपये का लिखित हिसाब 1946 से अब तक मिला। इसके अतिरिक्त भी पार्टी फंड का पैसा उन्होंने अपने और अपने परिवार के किसी कार्य में नहीं लगाया। बाकी लोगों के हिसाब का तो पता नहीं चलता है कि राजनीतिज्ञ कैसे खर्च करते हैं।  कृष्ण बल्लभ बाबू अपने जीवन में राजनीती में रहने वाले गरीब कार्यकर्ताओं, जो लोग मर जाते उनकी विधवा या उनके आश्रितों के लिए एक अभिभावक के रूप में हमेशा मदद किया करते थे। </p>
<p>श्री बाबू की मृत्यु के बाद हम सब लोगों ने पंडित विनोदानंद झा को मुख्यमंत्री बनाने में बहुत ही मेहनत की। लेकिन पंडित झा ने बिलकुल सौ प्रतिशत झूठा षड्यंत्र रच कर पूरे कागज़ का पोथी बनाकर प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के हाथ में दे दिया कि मैं उन्हें मछली में विष दे कर मारने का षड्यंत्र रचा हूँ। मुझ समेत 36 लोगों को मुजरिम बना दिया गया। पंडित नेहरू ने आई.बी. इंटेलिजेंस के तात्कालिक निदेशक श्री मल्लिक द्वारा जांच करवाई। डी.आई.जी. श्री शुक्ल जांच अधिकारी बनाये गए। चार दिनों तक मुझसे पूछताछ की गयी। प्रधानमंत्री जी को भी मैंने सारी बातें बताई। श्री मल्लिक की ही रिपोर्ट पर पंडित विनोदानंद झा को पंडित नेहरू ने मुख्यमंत्री पद से हटाया और बाद में श्री कृष्ण बल्लभ बाबू मुख्यमंत्री बने। जब मुझ पर पंडित विनोदानंद झा ने षड्यंत्र का मुकदमा किया, तब मैंने एक बार कृष्ण बल्लभ बाबू की आँखों में आंसू गिरते हुए देखा था। मैंने उनसे कहा कि यदि वे मेरी वजह से विनोदानंद झा के सामने झुके, तब मैं अपना प्राण त्याग दूंगा। मैंने कहा कि ईश्वर पर मुझे पूरा भरोसा है और विनोदानंद झा स्वयं मुख्यमंत्री पद से हटाये जायेगे और हुआ भी वही। श्री मल्लिक ने जांच कर एक पत्र पंडित नेहरू को दिया कि पंडित विनोदानंद झा जैसे व्यक्ति को एक दिन भी मुख्यमंत्री पद पर रखना खतरनाक है। तात्कालिक गृह मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री और श्री सत्येंद्र बाबू स्वयं इन बातों से वाकिफ थे।&#8221;</p>
<p><strong>अख़बार का कतरन बिहार के लौह पुरुष श्री कृष्ण बल्लभ सहाय के पौत्र राजेश सहाय के ब्लॉग के सौजन्य से &#8211; राजेश सहाय संभवतः बिहार के किसी भी राजनेता के वंशज होंगे जिन्होंने अपने पूर्वज का दस्तावेजों को इस कदर सहेज कर रखें हैं। आपको मौका मिले तो अवश्य भ्रमण करें </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/krishn-vallabh-sahay-the-iron-man-of-bihar">शिक्षा प्रसार में बिहार के लोग &#8216;शेर-ए-बिहार&#8217; को और जमींदारों-राजाओं को नकेल कसने में &#8216;लौह पुरुष&#8217; को अगर भूल गए &#8230; तो समझिये इतिश्री देवाखंडे </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>ये ​पटना है बाबूजी&#8230;. यहाँ पूर्व प्रधान सचिव के साथ &#8216;पारस&#8217; में यह हो सकता है तो हम-आप किस खेत की मूली हैं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 14 Apr 2022 12:22:18 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>पटना : पूर्व प्रधान सचिव, बिहार सरकार Vijoy Prakash जी की आपबीती है । आप समझ सकते हैं कि इतने सम्पन्न और प्रभावशाली व्यक्ति के साथ जब ऐसा किया जा सकता है तब अन्य लोगों के साथ क्या किया जाता होगा? शर्मनाक है। ऐसे हॉस्पिटल पर तुरंत कार्रवाई होनी चाहिये। ये हॉस्पिटल लुटेरे ही नहीं हत्यारे भी हैं। न [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/public-voice/tale-of-bihars-former-top-boss">ये ​पटना है बाबूजी&#8230;. यहाँ पूर्व प्रधान सचिव के साथ &#8216;पारस&#8217; में यह हो सकता है तो हम-आप किस खेत की मूली हैं</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना : पूर्व प्रधान सचिव, बिहार सरकार Vijoy Prakash जी की आपबीती है । आप समझ सकते हैं कि इतने सम्पन्न और प्रभावशाली व्यक्ति के साथ जब ऐसा किया जा सकता है तब अन्य लोगों के साथ क्या किया जाता होगा? शर्मनाक है। ऐसे हॉस्पिटल पर तुरंत कार्रवाई होनी चाहिये। ये हॉस्पिटल लुटेरे ही नहीं हत्यारे भी हैं। न जाने कितनी जिंदगियों को ये बर्बाद किये होंगे?&#8221; आपके साथ भी ऐसा हो सकता है &#8211; लेकिन सम्मानित नीतीश बाबू तो ENT में रुई ठूसे होते हैं। आजकल तो देवानंद के माफित  काला चश्मा में लगा लिए हैं। समाज में काला चश्मा पहने लोग अंदर से रो रहा है यह मुस्कुरा रहा है &#8211; मालुमे नहीं होता। लेकिन नीतीश बाबू इतने निर्दय हो सके हैं या हो गए हैं &#8211; यह तो राजनीतिक गठबंधन ही बता सकता है या फिर नेता-डाक्टर का नेक्सस ही भंडाफोड़ सका हैं। </strong></p>
<p><strong>Vijoy Prakash</strong> जी लिखते हैं: &#8220;आज मैं पारस एचएमआरआई अस्पताल, पटना में इलाज कराने का एक भयानक अनुभव साझा करने जा रहा हूं ताकि हम इलाज करते समय सावधान हो जाएँ क्योंकि इस प्रकार की घटना किसी के साथ भी हो सकती है। मैं मार्च&#8217;22 के प्रथम सप्ताह में तीव्र दस्त और ज्वर के रोग से काफी पीड़ित हो गया था। तीन दिनों तक परेशानी बनी रही। घर पर रहकर ही इलाज करा रहा था।</p>
<p>चौथे दिन 11.3.&#8217;22 को  बुखार तो ख़त्म हो गया पर दस्त कम नहीं हो रहा था। सुबह अचानक मुझे चक्कर भी आ गया। चूंकि कुछ वर्षों से मैं एट्रियल फिब्रिलिएशन (एएफ) का रोगी रहा हूँ अतः सदा एक कार्डिया मोबाइल 6L साथ रखता हूँ। अपने कार्डिया मोबाइल 6Lपर जांच किया तो पता चला कि पल्स रेट काफी बढ़ा हुआ था और EKG रिपोर्ट एट्रियल फिब्रिलिएशन (AF) का संकेत दे रहा था। अतः तुरत अस्पताल चलने का निर्णय हुआ। <strong>पारस एच एम आर आई अस्पताल</strong> घर के करीब ही है। अतः सीधे हम उसके इमरजेंसी में ही चले गये। इमरजेंसी में <strong>डॉक्टर चन्दन</strong> के नेतृत्व में व्यवस्था अच्छी थी। तुरत ECG लिया गया। उसमें भी AF का ही रिपोर्ट आया। पर करीब आधे घंटे के बाद पुनः ECG  लिया गया। उसमें ECG सामान्य हो गया था। साइनस रिदम बहाल हो गया था। </p>
<p>आपात स्थिति में प्रारंभिक देखभाल के बाद, मुझे डॉ. फहद अंसारी डीसीएमआर 3817 की देखरेख में एमआईसीयू में स्थानांतरित कर दिया गया। जब मुझे एमआईसीयू में ले जाया गया, तो मुझ पर दवाओं और परीक्षणों की बमबारी शुरू हो गई। कई तरह के टेस्ट प्रारम्भ हो गये और कई प्रकार की  दवाइयाँ लिखी  गईं । </p>
<p>12 मार्च 2022 को सुबह दस्त नियंत्रण में आ गया था। पर मुझे बताया गया कि हीमोग्लोबिन का स्तर नीचे हो गया है और प्लेटलेट की संख्या भी काफी कम हो गई है। अतः डॉक्टर रोग के निदान के संबंध में स्पष्ट नहीं थे। उन्हें लग रहा था कि कोई गंभीर इन्फेक्शन है। मैंने बताया भी कि मैं <strong>थाइलेसेमिया</strong> माइनर की प्रकृति का हूँ अतः मेरा हीमोग्लोबिन का स्तर नीचे ही रहता है और <strong>प्लेटलेट</strong> की संख्या भी कम ही रहती है। खून जांच में अन्य आंकड़े भी सामान्य से भिन्न रहते हैं। इसे ध्यान में रखकर ही निर्णय लेना बेहतर होगा। डॉक्टर ने खून चढ़ाने का निर्णय लिया और दोपहर में खून की एक बोतल चढ़ा दी गई।</p>
<p>दोपहर में ही मेरे अटेंडेंट को <strong>कॉम्बीथेर</strong> और <strong>डोक्सी</strong> नमक दवा को बाजार से लाने के लिए कहा गया क्योंकि वे अस्पताल की दुकान में उपलब्ध नहीं थे। जब मुझे दवा खाने के लिए कहा गया तो मैंने दवा के बारे में पूछा। उपस्थित नर्स ने <strong>कॉम्बिथेर</strong> नाम का उल्लेख किया। इंटरनेट के माध्यम से मुझे यह पता चला कि यह एक मलेरिया रोधी दवा है। अस्पताल आने के बाद से ही मुझे बुखार नहीं था। मेरा दस्त भी नियंत्रण में था। फिर मलेरिया-रोधी दवा क्यों? क्या मलेरिया परजीवी मेरे रक्त में पाये गये हैं? इस सम्बन्ध में मैंने नर्स से पूछताछ की।  </p>
<p>उनका कहना था कि चूँकि डॉक्टर ने यह दवा लिखा है इसलिए वे यह दवा खिला रही हैं। यदि मैं दवा नहीं खाऊंगा तो वे लिख देंगी कि मरीज ने दवा लेने से मना किया। इसपर मैंने कहा कि एक तरफ मुझे खून चढ़ाया जा रहा है क्योंकि <strong>हीमोग्लोबिन</strong> और <strong>प्लेटलेट</strong> कम बताये जा रहे हैं और मुझे AF भी है दूसरी ओर अनावश्यक दवा दिया जा रहा है जबकि मेरा बुखार और दस्त दोनों नियंत्रण में है, जिसका काफी अधिक ख़राब असर मेरे स्वास्थ्य पर हो सकता है जिससे बचा जाना चाहिए। अतः मैंने डॉक्टर से पुनः पूछकर ही दवा खाने की बात कहीं। मेरे बार-बार अनुरोध करने पर नर्स ने <strong>ICU के प्रभारी डॉक्टर प्रशांत</strong> को बुलाया। मैंने उनसे भी यही अनुरोध किया कि रक्त परीक्षण में मलेरिया परजीवी की स्थिति देखने पर ही ये दवा दी जाय। इस सम्बन्ध में वे प्रभारी डॉक्टर से संतुष्ट हो लें। डॉक्टर प्रशांत ने सम्बंधित डॉक्टर से बाते की और इस दवा को बंद करा दिया क्योंकि मलेरिया परजीवी हेतु रक्त परीक्षण में परिणाम नकारात्मक था। इस प्रकार मैं एक अनावश्यक दवा के कुप्रभाव से बच गया।</p>
<p>यहाँ मैं यह उल्लेख करना आवश्यक समझता हूँ कि हॉस्पिटल में दवाएं नर्स हीं देती हैं इसके पैकेट को भी मरीज को देखने नहीं दिया जाता और डॉक्टर का पूर्जा भी मरीज को नहीं दिखाया जाता है। सामान्यतया दवा देते समय मरीज को यह बताया भी नहीं जाता कि कौन सी दवा दी जा रही है। अतः दवा देने की पूरी जिम्मेदारी डॉक्टर और नर्स पर ही रहती है। यह संयोग ही था कि कॉम्बिथेर को बाजार से मंगवाया गया था। इसलिए मुझे इस दवा के बारे में जानकारी मिली और मैं इस दवा को लेने से पहले रक्त परीक्षण का रिपोर्ट देख लेने का अनुरोध कर पाया।</p>
<figure id="attachment_3920" aria-describedby="caption-attachment-3920" style="width: 1498px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Paras.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Paras.jpeg" alt="" width="1498" height="785" class="size-full wp-image-3920" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Paras.jpeg 1498w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Paras-300x157.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Paras-1024x537.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/04/Paras-768x402.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1498px) 100vw, 1498px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3920" class="wp-caption-text">हे पटना है बाबूजी, यहाँ पूर्व प्रधान सचिव के साथ &#8216;पारस&#8217; में यह हो सकता है तो हम-आप किस खेत की मूली हैं</figcaption></figure>
<p>13 मार्च 2022 को मेरी स्थिति में काफी सुधार था। सभी लक्षण सामान्य हो गये थे। दोपहर में मुझे सिंगल रूम नं. 265 में भेज दिया गया। आई सी यू से निकलने का ही मरीज के मनः स्थिति पर बहुत सकारात्मक असर पड़ता है। मैं बिल्कुल सामान्य सा महसूस करने लगा। रात में मैंने सामान्य रुप से भोजन किया। नींद भी अच्छी आयी। 14 मार्च 2022 की सुबह मैं बिल्कुल सामान्य महसूस कर रहा था। मैंने सामान्य रुप से शौच किया। अपने दाँत ब्रश किए। अपनी दाढ़ी बनाई और ड्यूटी बॉय की मदद से स्पंज स्नान किया। सब कुछ सामान्य था। फल का रस भी पिया।</p>
<p>सुबह करीब 6.45 बजे मैं अपने लड़के से मोबाइल पर बात कर रहा था। उस समय ड्यूटी पर तैनात नर्स दवा खिलाने आई। उसने मुझे<strong> थायरोक्सिन</strong> की गोलियों की एक बोतल दिया और मुझे इसे खोलकर एक टैबलेट लेने को कहा। चूंकि मेरे दाहिने हाथ में कैनुला लगा था, मैंने उससे ही इसे खोलने का अनुरोध किया। पर उसने कहा कि उसे इस तरह के बोतल  को खोलने में दिक्कत होती है। कोई विकल्प न होने के कारण और हाथ मे कैनुला लगे होने के बावजूद, मैंने खुद ढक्कन खोल दिया और उसे देकर मुझे एक टैबलेट देने के लिए कहा। उसने एक गोली निकालकर दिया और मैंने दवा ले ली। उसने मुझे दो और दवाएं दी, उसे भी मैंने खा लिया ।</p>
<p>इसी बीच उसने दराज से एक शीशी निकाली। मैंने इस दवा के बारे में पूछताछ की क्योंकि यह मेरे अस्पताल में रहने के दौरान पहले कभी नहीं दी गई थी। उसने कहा कि यह एक एंटीबायोटिक है। मैंने एंटीबायोटिक के नाम के बारे में पूछताछ की क्योंकि यह एक नई दवा थी जो मुझे दी जा रही थी और मुझे यह एहसास था कि मैं ठीक हो रहा हूँ। मेरे प्रश्न का उत्तर दिए बिना, उसने  IV कैनुला के माध्यम से दवा देना शुरू कर दिया। पूरी बातचीत के दौरान मैं अपने बिस्तर पर बैठा रहा और मोबाइल पर अपने लड़के से बात करता रहा।</p>
<p>जैसे ही यह नई दवा मेरे शरीर में आई, मेरी रीढ़ में जलन शुरू हो गया। मेरा शरीर गर्म होता जा रहा था। मेरा शरीर कांप रहा था। मुझे चक्कर जैसी अनुभूति भी होने लगी। मैंने फिर नर्स से पूछा कि उसने कौन सी दवा दी है। पर वह चुप रही। मैंने पुनः उस दवा की जानकारी मांगी जो उसने मुझे दी थी। वह चुप रही और दराज में लगी रही। मेरी ऊर्जा कम होती जा रही थी। मैंने फिर पूछा, &#8216;मैं बिल्कुल भी अच्छा महसूस नहीं कर रहा हूँ। कौन सी दवा दी हो।&#8217; इस नई दवा की प्रतिक्रिया बढ़ती जा रही थी। मुझे मस्तिष्क में अजीब सा स्पंदन हो रहा था। लग रहा था गिर जाऊंगा। मुझे लग रहा था कि ब्रेन हेमरेज तो नहीं हो रहा है। मेरे बार-बार बोलने पर भी वह नर्स लगातार मौन बनी रही। फिर मैं सारी ऊर्जा इकठ्ठा कर जोर से चिल्लाया, &#8216;तबीयत बहुत ख़राब हो रही  है। दवा बंद करो&#8217;। फिर भी उसके हाव-भाव में कोई तेजी नहीं दिखी और वह बहुत धीरे-धीरे दवा बंद करने आई। खैर, दवा बंद हो गयी। </p>
<p>मैंने तुरंत एक डॉक्टर बुलाने का अनुरोध किया। पर कोई नहीं आया। नर्स ने आकर मेरा बीपी लिया। कुछ देर बाद ड्यूटी पर डॉक्टर होने का दावा करने वाला एक व्यक्ति आया। उसे भी मैंने सारी बातें बताई। वह भी मेरी हालत के बारे में  कम चिंतित लग रहा था। उसने दराज खोली और कोई दवा ली और बाहर चला गया। मैंने उसे तुरंत ECG करने के लिए कहा ताकि मैं अपने दिल की स्थिति के बारे में सुनिश्चित हो सकूं। जिस फ्लोर पर वार्ड था उस फ्लोर पर कोई ECG मशीन नहीं था। वे एमआईसीयू विंग से एक मशीन लाए लेकिन वह ठीक से काम नहीं कर रहा था। फिर वे एक अन्य ECG मशीन लाए। मुझे बड़ी राहत मिली जब मैंने पाया कि ECG में कोई अनियमितता नहीं थी और ह्रदय की धड़कन साइनस रिद्म में होना बता रहा था। इस प्रक्रिया में करीब एक घंटा व्यतीत हो गया पर  मेरी बेचैनी जारी रही। यद्यपि शरीर में हो रहे बदलाव में धीरे-धीरे सुधार हो रहा था पर रीढ़ में असामान्य स्पंदन जारी रहा। यह कई दिनों तक चलता रहा।</p>
<p><strong><strong>मेरी पत्नी डॉ मृदुला प्रकाश,</strong> जो मेरे साथ मेरे वार्ड में थीं, मेरी स्थिति ख़राब होते देख चिंतित हो गयी । उन्होंने नर्स से दवा का नाम पूछा। नर्स ने इंजेक्शन की एक दूसरी शीशी जो ड्रावर में रखा था उसे दिखाया और कहा कि यही सुई दी गयी है। उन्होंने इसका एक फोटो ले लिया। यह <strong>एपिनेफ </strong>था। उसी समय मेरी  लड़की नूपुर निशीथ का फोन आ गया। उसे जब मेरी स्थिति बताई गई तो उसने पूछा कि पापा को कौन सी दवा दी गई है। दवा का नाम एपिनेफ बताने पर उसने कहा कि यह तो अंटी आजमटिक रोग की दवा है जो इमेर्जेंसी में दिया जाता है और  इसका हृदय पर काफी साइड इफेक्ट होता है। इसे क्यों दिया जा रहा है? </strong></p>
<p>तब घबड़ाकर डॉ प्रकाश नर्सों की डेस्क पर गईं और मेडिसिन लिस्ट मांगा तथा डॉक्टर का प्रेसक्रिप्शन भी मांगा। उन्हें न तो दवा का लिस्ट दिया गया और न डॉक्टर का प्रेसक्रिप्शन ही दिखाया गया। सभी नर्स वहाँ से हटकर दूसरी ओर चली गई ताकि उनसे ये सूचना नहीं ली  जा सके । </p>
<p>वह इस्तेमाल की हुई शीशी भी चाहती थी जिसे उन्हें दिखाया तो गया। पर जब उन्होंने इसे मांगा, तो  उन्हें यह नहीं दिया गया क्योंकि उन्हें कहा गया कि इसका इस्तेमाल स्थानीय जांच में किया जाएगा। जब उन्होंने  पूछा कि दवा क्यों दी गई है तो उन्हें बताया गया कि एपिनेफ को एसओएस के रूप में लिखा गया है। प्रभारी नर्स ने कहा कि उपस्थित नर्स ने शारीरिक परीक्षण के माध्यम से नाड़ी की दर 63 पाये जाने के कारण उक्त दवा दिया था। इसपर उन्होंने कहा कि नर्स ने दवा देने से पहले कभी नब्ज को छुआ तक नहीं था। नाड़ी की दर, रक्त चाप और तापमान तो दवा देने के बाद जब स्थिति खरब हो गई थी तब ली गई थी तो किस प्रकार नाड़ी के दर को आधार बनाकर यह दवा दिये जाने की बात कही जा रही है। उसके बाद  नर्स निरुत्तर हो गयीं और कोई जवाब नहीं दिया।  <br />
वार्ड में मरीज के चिकित्सा से सम्बंधित फ़ाइल नहीं रखी गयी थी। अतः किसी चीज के बारे में कोई जानकारी मरीज या उसके अटेंडेंट को उपलब्ध नहीं था। चूँकि सारी जानकारी नहीं दी जा रही थी और गलत सूचना दी जा रही थी, अतः मामला काफी संदेहास्पद बनता जा रहा था। सूचनाओं मे अपारदर्शिता मामले को काफी गंभीर बना रहा था ।  </p>
<p>घटना के लगभग 4.45 घंटे बाद उपस्थित <strong>चिकित्सक डॉ. फहद अंसारी </strong>ने लगभग 11.30 बजे वार्ड का दौरा किया। पहले तो उन्होंने अपने प्रोफाइल के बारे में बात की और कहा कि यह उनके लिए काला दिन है। उन्होंने घटना पर खेद जताया। उसने मेरी छाती की जांच की, मेरे मल के बारे में पूछा और कहा कि वे  मुझे तुरंत छुट्टी दे देंगे । कुछ जांच रिपोर्ट लंबित हैं, जो कुछ दिनों में आ जाएंगी। उन रिपोर्ट के बारे में वह ओपीडी पर अपनी राय देंगे।</p>
<p>वह यह नहीं बता सके कि <strong>एपीनेफ सुई</strong> क्यों लिखी गई थी या क्यों दी गयी। यह आश्चर्यजनक है कि एपिनेफ्रीन जैसी दवा जिसे <strong>इंट्रामस्क्यूलर</strong> या सब <strong>क्यूटेनस</strong> दिया जाता है, उसे किन परिस्थितियों में नसों के माध्यम से दिया गया। यह भी स्पष्ट नहीं है कि ऐसी दवा जो हमेशा एक विशेषज्ञ डॉक्टर की उपस्थिति में या ICU में दी जाती है, उसे अर्ध या गैर-प्रशिक्षित वार्ड नर्स द्वारा देने के लिए कैसे छोड़ दिया गया। यहाँ तक कि प्रभारी नर्स भी उपस्थित नहीं थी। मुझे यह भी आश्चर्य होता है कि जब स्पष्ट रूप से एसओएस का कोई मामला नहीं था तो एसओएस दवा का प्रबंध ही क्यों किया गया। अगर मैंने समय पर विरोध नहीं किया होता और दवा बंद न करा दिया होता, तो शायद मैं कहानी सुनाने के लिए यहां नहीं होता। मैं इस बात से भी हैरान हूं कि इस तरह के ड्रग रिएक्शन केस के बाद भी  मेरी सेहत की पूरी जांच किए बिना मुझे कैसे छुट्टी दे दी गई।</p>
<p>जब लगभग 2.30 बजे अपराह्न में मुझे छुट्टी दी गई, तो मुझे डिस्चार्ज सारांश सौंपा गया। मैंने पाया कि इसमे मेरे लिए लिखे गये पूर्जे और दी गयी दवाओं के विवरण पूरी तरह से गायब थे। चिकित्सा विवरण देने के बजाय, डिस्चार्ज सारांश में गोलमटोल वाक्य लिखे थे। यहां तक कि इसमें  खून चढ़ाने की जानकारी भी गायब थी। मैंने यह भी पाया कि भर्ती के समय मेरे दिल की स्थिति का विवरण भी रिपोर्ट में लिखा नहीं था। मेरे एमआईसीयू में रहने का भी कोई जिक्र नहीं था। एपिनेफ दिये जाने और इसका मेरे ऊपर हुए रियक्सन का भी कोई वर्णन नहीं था।  ऐसा प्रतीत होता है कि जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्यों और विवरणों को रिपोर्ट से छिपाया गया है।  </p>
<p>मैंने जब अस्पताल प्रशासन को इस सम्बन्ध में पूर्ण जानकारी देने के लिए एवं विस्तृत जांच कराने के लिए पत्र लिखा तो मुझे डिस्चार्ज समरी को पुनरीक्षित कर भेजा गया पर उसमें भी एपीनेफ के न तो डॉक्टर द्वारा लिखने का जिक्र था और न उसे मुझे सुई के रूप में देने का। अस्पताल प्रशासन ने इस सम्बन्ध में आतंरिक जांच कराकर उसका प्रतिवेदन साझा करने की बात कही। अस्पताल के डॉक्टर ने इस प्रकरण पर मौखिक रुप से क्षमा जरूर मांगी पर अभी तक अस्पताल प्रशासन ने आंतरिक जांच का कोई प्रतिवेदन मेरे साथ साझा नहीं किया तथा मुझे यह भी नहीं बताया कि व्यवस्था में क्या सुधार की गई है जिससे यह पता चले कि भविष्य में किसी मरीज के साथ इस प्रकार की घटना नहीं होगी । </p>
<p>मैं अभी तक सदमे में हूँ कि यदि एपीनेफ को चिल्लाकर समय से बंद न कराया होता तो क्या हुआ होता। हम अस्पताल में डॉक्टर या नर्स को भगवान का प्रतिरूप मानकर उसकी सभी आज्ञा का पालन करते हैं। यदि कभी शरीर में उसकी प्रतिक्रिया भी हो तो उसे एक अलग घटना माना जाता है दवा देने या दवा देने के तरीके  के कारण हुई प्रतिक्रिया नहीं मानी जाती।जब एपीनेफ के बाद शरीर में प्रतिक्रिया हुई तो मैंने भी शुरू में इसे दवा के कारण हुआ नहीं माना था । मुझे लगा कि शायद शरीर में कोई नयी समस्या हो गयी है &#8211; ब्रेन हेमरेज या ह्रदयघात हो गया है इसलिए मैंने सोचा पहले इस नयी समस्या से निबट लें तब दवा ले लेंगे। यही सोचकर मैंने दवा बंद कराया था। मेरा चिकित्सा व्यवस्था पर हमारे मन में एक विश्वास या यूँ कहूँ कि एक अंधविश्वास जाम गया है  वह मानने के लिए तैयार नहीं था कि कोई डॉक्टर या नर्स कभी ऐसी दवा देंगे जो मेरे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा।   </p>
<p>जब घटना हो भी गयी तो अस्पताल प्रशासन मेरे स्वास्थ्य की चिंता न कर इस बात में व्यस्त रहे कि कैसे यह बात रिकॉर्ड में न आये। मुझे स्वयं अपने इलाज के लिए ब्लड प्रेशर लेना या इ0 सी0 जी0 लेने का आदेश देना पड़ा।  अस्पताल के अधिकारी अस्पताल के दस्तावेजों के प्रबंधन में ही लगे रहे ताकि सच्चाई सामने न आए। नर्स को हटा दिया गया। मेरी फाइल में दवा की विवरणी दर्ज नहीं की गयी । दवा वाली शीशी को दराज से निकाल कर छिपा लिया गया। वास्तव में, वे इस बारे में अधिक चिंतित थे कि रोगी को प्रबंधित करने के बजाय दस्तावेज़ में घटना की रिपोर्टिंग को कैसे प्रबंधित किया जाए। मेरे बार-बार अस्पताल से सच्चाई को  रिपोर्ट में अंकित करने का अनुरोध करने के बावजूद, इसे कभी रिकॉर्ड में नहीं किया गया।</p>
<p><strong>मैं अस्पताल का नाम या डॉक्टर का नाम नहीं देना चाहता था, पर उनका व्यवहार जिस प्रकार रहा उससे मुझे अतिशय पीड़ा हुई है। उन्होंने गलत दवा देने के प्रकरण को रिकॉर्ड करने की परवाह तक नहीं की जो मेरे लिए प्राणघातक हो सकती थी। उन्होंने यह जानते हुए कि मैं एट्रियल फीब्रिलेशन का रोगी हूं और एपिनेफ्रीन जैसी आपातकालीन दवा के अंतःशिरा इंजेक्शन से पल्स रेट अप्रत्याशित रुप से बढ़ सकती थी जिससे शरीर को अपूरणीय क्षति हो सकती थी, दवा की प्रतिक्रिया की दूरगामी प्रभाव की जाँच के लिए भी कोई कदम नहीं उठाया। ऐसी आपात स्थिति से निपटने में अस्पताल की व्यवस्था में गंभीरता का भाव नहीं था। प्रभारी चिकित्सक चार घंटे से अधिक समय के बाद मुझे देखने आए। मैं इससे काफी आहत हूँ। </strong></p>
<p>मेरा मन अभी भी इस बात को मानने को तैयार नहीं है कि अस्पताल में कोई दवा खिलाई जाएगी या इंजेक्शन दिया जाएगा और मेडिसिन लिस्ट में उसे शामिल तक नहीं किया जाएगा। क्या यह जहर था  कि इसे लिखने से बचा जा रहा है? या किसी साजिश के तहत इसे दिया गया था तथा इसका जिक्र सभी जगह से हटा दिया जाय। अस्पताल के सिस्टम का पूरी तरह फेल हो जाने का इससे बड़ा और क्या प्रमाण हो सकता है ।        <br />
 <br />
<strong>प्रश्न यह भी है कि जो दवा लिखी ही नहीं है, वह दवा वार्ड के दराज में कैसे आ गई? डॉक्टर ने कहा कि घटना इसलिए हुई क्योंकि यह दवा अन्य इंजेक्शन के समान है जो मुझे लिखा गया था। पर डॉक्टर के द्वारा जो प्रेसक्रिप्शन मुझे दिया गया उसमें यह कहीं नहीं लिखा था। यह बात इसलिए भी गंभीर है क्योंकि दवाएं अस्पताल के दूकान से ही आती हैं और कई नर्स उसे चेक करते हैं।  मैं एम0 आई0 सी0 यू0 से आया था वहाँ सभी दवाओं को कई नर्स चेक करते थे। </strong></p>
<p>यह प्रश्न भी विचारणीय है कि कैसे ओवर मेडिकेशन से बचा जाय। एक साथ कई एंटीबायोटिक शरीर में दे दिए जाने की अवस्था में मरीज के शरीर पर क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा, यह गंभीरता से विचार करने की जरूरत है । दूसरे कई देशों में मैंने देखा है कि बिना डॉक्टर के पूर्जा  के कोई एंटिबायोटिक खरीद नहीं सकता । डॉक्टर भी अनावश्यक रूप  से एंटिबायोटिक नहीं लिखते हैं । देश के स्वास्थ्य के दूरगामी प्रसंग में यह आवश्यक है कि एंटिबायोटिक का  व्यवहार उचित ढंग से किया जाय।   </p>
<p>मैंने पाया है कि बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों में सभी मरीज का अधिक- से-अधिक शल्य चिकित्सा करने, अधिक-से-अधिक टेस्ट करने, अधिक-से-अधिक दवा लिखने का प्रयास रहता है  ताकि अधिक राशि का  बिल बन सके और अधिक मुनाफा हो। इसमें मरीज के स्वास्थ्य से ज्यादा महत्वपूर्ण लाभ में वृद्धि करना रहता है। इस पूरी प्रक्रिया में शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव की कोई चिंता नहीं रहती। यदि कोई दुष्प्रभाव हो तो वह भी मुनाफे का एक नया अवसर बन जाता है। ये  प्रश्न एक अस्पताल या एक डॉक्टर का नहीं वरन पूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था के हैं । आइये हम सब मिलकर सोचें कि इन समस्याओं से कैसे निजात पाया जाय ताकि किसी अन्य व्यक्ति को इस तरह की  समस्या का सामना न करना पड़े।   </p>
<p><strong>विजय प्रकाश<br />
भा.प्र.से. (से.नि.)<br />
पटना</strong></p>
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		<title>नीतीश कुमार तो खुद्दे &#8216;प्रभारी&#8217; हैं, फिर दरभंगा के &#8216;प्रभारी&#8217; वरीय आरक्षी अधीक्षक, दरभंगा के &#8216;कुमार-ब्रदर्स&#8217; से न्याय की क्या उम्मीद करते हैं </title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 Feb 2022 07:30:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>&#8220;प्रभारी&#8221; चाहे &#8216;मुख्यमंत्री&#8217; हो या &#8216;प्रधानमंत्री&#8217;, किसे कितनी शक्ति होती है, यह बिहार के लोग ही नहीं, देश के लोगों को, संविधान के विशेषज्ञों को, विधि के निर्माताओं को मालूम है। &#8220;प्रभारी&#8221; यानी &#8220;छपटकर&#8221; अधिकार। आप कुर्सी पर बैठ सकते हैं, लेकिन कुर्सी के आसान पर कील लगा मिलेगा। आप अपने टेबुल पर पड़े फाइलों को [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/editorial/tale-of-two-officiating-persons">नीतीश कुमार तो खुद्दे &#8216;प्रभारी&#8217; हैं, फिर दरभंगा के &#8216;प्रभारी&#8217; वरीय आरक्षी अधीक्षक, दरभंगा के &#8216;कुमार-ब्रदर्स&#8217; से न्याय की क्या उम्मीद करते हैं </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>&#8220;प्रभारी&#8221; चाहे &#8216;मुख्यमंत्री&#8217; हो या &#8216;प्रधानमंत्री&#8217;, किसे कितनी शक्ति होती है, यह बिहार के लोग ही नहीं, देश के लोगों को, संविधान के विशेषज्ञों को, विधि के निर्माताओं को मालूम है। &#8220;प्रभारी&#8221; यानी &#8220;छपटकर&#8221; अधिकार। आप कुर्सी पर बैठ सकते हैं, लेकिन कुर्सी के आसान पर कील लगा मिलेगा। आप अपने टेबुल पर पड़े फाइलों को देख सकते हैं, लेकिन &#8220;हरे रंग&#8221; के स्याही से अपना निर्णय नहीं लिख सकते, क्योंकि आगे &#8221;लाल कलम&#8221; के साथ कोई आपको देख रहा है। आपसे आपके प्रान्त के लोगबाग, मतदाता मिल सकते हैं अपनी-अपनी समस्यों को लेकर, लेकिन आप समाधान हेतु &#8221;कड़ककर आदेश&#8221; नहीं दे सकते क्योंकि आपको अपने ऊपर के लोगों को जबाब देना होगा। </strong></p>
<p>चलिए आगे बढ़ते हैं। यदि दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह के प्रति मिथिला के लोगों का सम्मान होता तो वे 1952 के चुनाव में हारते नहीं। उनकी अगली पीढ़ियों को मिथिला के प्रति स्नेह होता तो आज मिथिला की यह स्थिति भी नहीं होती। वर्तमान काल में यदि बिहार के ऐतिहासिक मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार को अपने प्रदेश को तरक्की के रास्ते ले जाने, प्रदेश में कानून व्यवस्था दुरुस्त रखने में तनिक भी दिलचश्पी होती, तो सैकड़ों-हज़ारों सरकारी मुलाजिम &#8221;प्रभारी&#8221; के रूप में कार्य नहीं करते। आपको हैरानी होगी कि विधानसभा और विधानपरिषद में कोई प्रभारी सदस्य नहीं हैं। आख़िर सम्मानित नीतीश कुमार ही क्या करेंगे &#8211; वे भी तो वैशाखी पर ही हैं। अब बिहार के मतदाता जब यह नहीं चाहते कि उनके प्रदेश की तरक्की हो, किसी एक व्यक्ति को, किसी एक पार्टी को सत्ता के सिंहासन पर बैठाएं &#8211; भले वह &#8220;एको हम दूजा नास्ति&#8221; में विश्वास करने लगे &#8211; तब तक &#8220;प्रभारी&#8221; शब्द प्रदेश को कोरोना-19, 20-21-22 क्रमशः जैसा दबोचे रहेगा और दरभंगा ही नहीं, प्रदेश के लोग &#8220;चिचियाते&#8221; रहेंगे। </p>
<p><strong>एक राष्ट्रीय रिपोर्ट के आधार पर भारत में करीब 77 लाख लोगों का जीवन उनके घर-खेत-जमीन-पुलिस-वकील और न्यायालय के बीच समाप्त हो जाता है। यह भी कहा जाता है कि भारत का करीब 25 लाख हेक्टेयर भूमि का भविष्य न्यायालय के लाल कपड़ों में बंद है। इतना ही नहीं, देश की निचली अदालतों को छोड़कर, भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जितने मुकदमों के मामले में निर्णय सुनाया जाता है, उसमें तक़रीबन 25 फीसदी मुकदमें और फैसले भूमि विवाद से सम्बंधित होती है। आखिर &#8216;भारत एक कृषि प्रधान देश है&#8217; जहाँ भूमि सम्बन्धी &#8216;दीवानी&#8217; मामले आये दिन &#8216;फौजदारी&#8217; में बदल रहे हैं क्योंकि भूमि पर माफियाओं का साम्राज्य स्थापित हो रहा है। विडंबना यह है कि सिर्फ &#8216;क्रेता&#8217; को ही &#8216;माफिया&#8217; शब्द से अलंकृत किया जाता है, &#8216;विक्रेता&#8217; तो जमींदारी जाने के बाद भी, राजा-महाराजाओं की प्रथा समाप्त होने के बाद आज भी हज़ारों-लाखों बीधा जमीन के स्वामी होने के बाबजूद समाज के &#8216;संभ्रांत&#8217; कहलाते हैं। </strong></p>
<p>रिपोर्ट यह भी कहता है कि भारत के सभी न्यायालयों में, जिला स्तर से लेकर सभी राज्यों के उच्च न्यायालयों सहित दिल्ली के सर्वोच्च न्यायालय तक, 100 फीसदी दीवानी मामलों में 66 फीसदी दीवानी मामले प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से &#8216;भूमि-विवाद&#8217; से संबंधित होते है । और सबसे मजेदार बात तो यह है कि इन दीवानी मामलों के मुकदमे कचहरी में दाखिला से लेकर निर्णय होने तक न्यूनतम दो दशक समय लेता है । यानी माँ के गर्भ से जन्म लेने वाला संतान भी राज्यों और संसद के विधान सभाओं और लोक सभा में मतदान करने लायक हो जाता है। ऐसी स्थिति में उत्तर बिहार के मिथिला क्षेत्र के दरभंगा शहर की क्या औकात है जहाँ &#8216;कथित तौर पर&#8217; एक खास समूह के लोग, जिसमें संभ्रांत भी हैं, बिचौलिए भी हैं, अपराधी भी हैं, खाकी वस्त्रधारी भी हैं, खादी वस्त्रधारी भी हैं, फुलपैंट वाले भी हैं, बेलबॉटम वाले भी है, जीन्स धारी भी हैं, अधिकारी भी हैं, समाजसेवी भी हैं &#8211; शहर और जिले में फैली जमीनों पर अधिपत्य ज़माने के लिए बगुले की तरह पैनी निगाह रखे 24 x 7 x 365 दंड पेलते रहते हैं कि कब मौका मिले और खरीद-बिक्री कर लें, हड़प लें । </p>
<p>जो &#8216;सत्ता&#8217; में हैं वे सत्ता का धौंस ज़माने में कोई कोताही नहीं करते। जो सत्ता पर कब्ज़ा करने हेतु दिन-रात-आठो पहर मेहनत और मसक्कत करने में थकते नहीं, वे भारतीय जिले के राजनीतिक बाजार के रास्ते प्रदेश के सिंघासन पर स्थापित होने हेतु कोई कसर नहीं छोड़ते। जो खाकी-धारी हैं वे &#8216;अपनी प्रतिभा&#8217; से समाज के लोगों को &#8216;शांत&#8217; करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।  जिनके पास जमीन है वे निमोछिया होने के बाबजूद सुबह-शाम अपनी मूंछ पर घी चिपकाने में नहीं पीछे रहते। जो कभी विद्यालय में स्लेट-पेन्सिल पकड़े नहीं, वे कट्टा पकड़कर रातो-रात गरीब और निर्धन की तगमा को त्यागकर धनाढ्य बनने में कोई कसर नहीं छोड़ते &#8211; वैसी स्थिति में इस समूह विशेष को सिर्फ &#8220;माफिया&#8221; शब्द से अलंकृत करना &#8216;श्रेयस्कर&#8217; नहीं होगा। क्योंकि विगत दो-तीन दशक में मनुष्य के चरित्र में जितनी गिराबट आई है, चाहे मिथिला का हों या पंजाब का, बिहार हो या बंगाल, दिल्ली हो या कश्मीर &#8216;भूमि-मूल्य&#8217; में उतना ही उछाल आया है। कल तक मोहल्ले के लोग जिस डबरे में, पोखर में पौ-फटने से पहले और सूर्यास्त के बाद &#8216;दीर्घ-शंकाओं&#8217; से मुक्त होते थे; जिन दीवारों पर, सड़क के किनारे खाली स्थान में &#8216;लघु-शंकाओं&#8217; से मुक्त होते थे; आज उन स्थानों की कीमत एक आदमी की जिंदगी से अधिक हो गयी है। </p>
<p>अशिक्षा, बेरोजगारी का अदृश्य भरमार हो गया है। गली-कूचियों में कुकुरमुत्तों की तरह नेताओं और अपराधियों का जन्म हो रहा है। ऐसी स्थिति में दरभंगा में पिंकी झा नामक एक गर्भवती महिला के गर्भ में 8-महीने के नौनिहाल सहित संजय नामक भाई की मृत्यु जमीन सम्बन्धी दीवानी मामला फौजदारी मामले में बदल गया, तो क्या हुआ? अगर स्थानीय पुलिस जीएम रोड बंगला संख्या &#8211; 4 में हुए ट्रिपल-मर्डर के मुख्य आरोपी को बिना मधुबनी पुलिस को आधिकारिक तौर पर &#8216;अपने विश्वास&#8217; में लिए शिव कुमार झा को &#8216;गिरफ्तार&#8217; कर देर रात दरभंगा लाती है; और ऐसे संगीन मामले में तहकीकात के लिए &#8216;पुलिस रिमांड&#8217; पर लेने के बजाय, &#8216;जुडिशल रिमांड&#8217; में बेनीपुर जेल भेज देती है &#8211; तो इसमें चौंकाने वाली बात क्या है? </p>
<p><strong>दरभंगा में खाकी-वर्दी में छोटे पुलिस कर्मी से लेकर कप्तान साहब तक &#8216;खुलकर कोई प्रशासनिक कार्य करने में एक नहीं, दस नहीं, सौ बार सोचने पर विवश होते हैं &#8211; कहीं ऊपर से, पटना से, दिल्ली से आला-अधिकारी से लेकर आला-माला नेताओं का, गृह मंत्री कार्यालय से, मुख्यमंत्री कार्यालय से फोन की घंटी ट्रिंग-ट्रिंग नहीं होने लगे। कोई अनुशासनिक फरमान नहीं जारी हो जाए &#8211; बेचारे वे भी क्या करे? तभी तो दरभंगा पुलिस मुख्यालय से लेकर समाहरणालय तक सभी खैनी चुनाते फुसफुसा रहे हैं: &#8220;औ बाबू&#8230;. बबाल शांत करने के लिए अपराधी को पकैड़ कर जेल में बंद कर दिया गया है। इधर मामला शांत हुआ उधर शिव कुमार झा दरभंगा के राम बाग़ से लेकर लाल बाग़ तक, टावर से लेकर विश्वविद्यालय तक मटरगस्ती करेगा। क्योंकि न तो जिला में पुलिस का दल-बल सुदृढ़ है, न कचहरी में पर्याप्त न्यायिक अधिकारी है, न प्रदेश की सरकार को अपने राज्य को राम-राज्य में बदलने का कोई वजह है। फिर काहे को मारा-मारी।&#8221;</strong></p>
<p>क्योंकि विगत 10 फरवरी की शाम और उसके बाद के दिनों में जिस कदर दरभंगा के लोग, दरभंगा का मीडिया, सोशल मिडिया पर दरभंगा के संभ्रांतों की उपस्थिति जीएम रोड बंगला संख्या &#8211; 4 की घटना को उछाले थे, आलोचना किये थे, भत्सर्ना किये थे, अपराधी को गिरफ्तार करने के लिए आवाज बुलंद किये थे, कबीले तारीफ़ थी। लेकिन गिरफ़्तारी के तुरंत बाद जिस कदर आवाज धीमी ही नहीं, शांत हो गयी, यह शुभ संकेत नहीं है। क्योंकि पुलिस खुद &#8216;रो रही&#8217; है इसलिए कि उसे सम्पूर्णता के साथ &#8216;शक्ति&#8217; नहीं है। घटना के बाद जीएम रोड बंगला संख्या &#8211; 4 में पीड़ित को देखने के लिए जिस कदर खादीधारी और स्थानीय नेता पदार्पित हो रहे हैं, पीड़िता को &#8216;द्रव्य&#8217; से &#8216;मदद&#8217; हेतु हाथ बढ़ा रहे हैं, स्थानीय अख़बारों में, सोशल मीडिया पर तस्वीरों की बाढ़ ला रहे हैं; अगर उतना ही समय, सोच स्थानीय प्रशासन को शसक्त करने, अपराधियों को कानून के गिरफ्त में लेकर नकेल कसने में देते, बिना किसी राजनीतिक रोटियों को सेके दरभंगा की सड़कों पर प्रशासन को पूरी शक्ति के साथ अलंकृत करने में, विश्वास स्थापित करने में लगाते, तो शायद जीएम रोड बंगला संख्या &#8211; 4 जैसी ह्रदय विदाराक घटना भी नहीं होती। खैर। </p>
<figure id="attachment_3837" aria-describedby="caption-attachment-3837" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/222.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/222.jpeg" alt="" width="1280" height="719" class="size-full wp-image-3837" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/222.jpeg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/222-300x169.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/222-1024x575.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/02/222-768x431.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3837" class="wp-caption-text">दरभंगा समाहरणालय</figcaption></figure>
<p>&#8220;प्रभारी&#8221; चाहे &#8216;मुख्यमंत्री&#8217; हो या &#8216;प्रधानमंत्री&#8217; किसे कितनी शक्ति होती है, यह बिहार के लोग ही नहीं, देश के लोगों को, संविधान के विशेषज्ञों को, विधि के निर्माताओं को मालूम है। अगर ऐसा नहीं होता तो दिवंगत गुलजारीलाल नंदा का नाम भी पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी जैसा इतिहास के पन्नों में दर्ज होता। छोड़िये देश को, अपने बिहार में भी &#8216;आया-राम-गया-राम&#8217; वाले मुख्यमंत्रियों को, मसलन दीप नारायण सिंह, सतीश प्रसाद सिंह, भोला पासवान शास्त्री, हरिहर सिंह जैसे सम्मानित महानुभावों को प्रदेश के लोग जानते। ऐसी स्थिति में दरभंगा के &#8216;प्रभारी&#8217; वरीय आरक्षी अधीक्षक को कितनी शक्ति होगी, या वे उनमें निहित शक्तियों का कितना पालन कर सकते हैं, ये सबसे बेहतर वे जानते हैं।  इतना ही नहीं, अपराधियों पर नकेल कसने में &#8216;प्रभारी&#8217; के रूप में वे कितना सशक्त हो सकते हैं, हैं या होंगे &#8211; दरभंगा के लोगों से कई लाख गुना बेहतर वे स्वयं जानते हैं। तभी तो मन ही मन मुस्कुराते स्थानीय मीडिया को भी कहते हैं कि वे दरभंगा के सभी थाना प्रभारियों को आदेश दिए हैं कि इस दिशा में कार्रवाई करें। सर्वोच्च न्यायालय की तरह वे भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि  हिंसा की ज्यादातर घटनाएं भूमि विवाद को लेकर होती हैं, इसलिए इस पर नियंत्रण रखना बहुत जरूरी है।</p>
<p>पिछले दिनों &#8216;प्रभारी&#8217; वरीय आरक्षी अधीक्षक कहे थे: &#8220;शिवकुमार झा घटना के अगले ही दिन नेपाल भाग गया। मोबाइल सर्विलेंस के आधार पर उसका पता लगाया गया और उसे पकड़ने के लिए जाल बिछाया गया। उसे मधुबनी जिले के सहर घाट में नेपाल से घर जाते समय पकड़ा गया।&#8221; अब सवाल यह है कि अगर मोबाइल सर्विलेंस के आधार पर शिवकुमार झा पुलिस के गिरफ्त में आ सकता है, तो स्वाभाविक है कि दरभंगा पुलिस के पास शहर और जिले में विभिन्न अपराधों में लिप्त और फरार सभी अपराधियों की सूची होगी, उसका मोबाइल नंबर भी होगा (नहीं होने पर ज्ञात भी किया जा सकता है), फिर उन अपराधियों के मोबाइल को सर्विलेंस पर डालकर, उसके आवागमन को जांच-पड़ताल कर उसे क्यों नहीं गिरफ्तार किया जाता है ? उसे न्यायालय के सामने क्यों नहीं प्रस्तुत किया जाता? उसे जेल के अंदर क्यों नहीं डाला जाता है ताकि दरभंगा में पुलिस के द्वारा न्याय की परिभाषा को बेहतरीन तरीके से परिभाषित किया जा सके ? </p>
<p>शिवकुमार झा की गिरफ्तारी और उसे कारावास भेजने को लेकर दरभंगा के एक वरिष्ठ नागरिक कहते हैं: &#8220;मैं नहीं जानता कि स्थानीय पुलिस के कर्मी &#8216;रिमांड&#8217; शब्द से वाकिफ है अथवा नहीं, चाहे &#8216;पुलिस रिमांड&#8217; हो या &#8216;न्यायिक रिमांड&#8217; &#8211; लेकिन शिव कुमार झा को मधुबनी से गिरफ्तार किया जाता है और दरभंगा लाकर कारावास में बंद कर दिया जाता है। कहा जाता है की वह &#8216;जुडिसियल रिमांड&#8217; पर जेल में है। सवाल यह है कि ट्रिपल-मर्डर केस का मुख्य अपराधी को ऐसी स्थिति में पूछ-ताछ के लिए पहले पुलिस रिमांड पर लेनी चाहिए थी, ताकि जिले में मकड़े की जाल की तरह बढ़ रहे भू-सम्बन्धी अपराधियों पर नकेल कसा जा सके। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वजह भी है। जिले में पुलिस की संख्या कितनी है, यह तो जिले के पुलिस कप्तान भी जानते हैं और जिलाधिकारी भी। वैसे दरभंगा में आधिकारिक तौर पर आज &#8216;प्रभारी&#8217; वरीय आरक्षी अधिकारी को छोड़कर कोई भी मोख्तार नहीं हैं। दर्जनों पुलिस थाने में थाना प्रभारी नहीं हैं। पुलिसकर्मियों की किल्लत ही नहीं, सुखाड़ है । वैसी स्थिति में यह क्रिया-प्रक्रिया तो महज वर्तमान हो-हल्ला को शांत करने हेतु किया गया है । कल &#8216;लाइफ गोज ऑन&#8217; हो जायेगा। किसे कितना न्याय मिल पाएगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।&#8221;  </p>
<p>कहते हैं जब &#8220;अंदर का शासन-प्रशासन-अभिभावक नितांत कमजोर रहे, तो बाहर वाले लूट में शामिल होंगे ही। बिहार के घुटने-कद के नेता से लेकर आदम-कद नेता तक, जो अपने जीवन में कभी राज दरभंगा के चौखट पर खड़े होने के काबिल नहीं थे, भौंकना शुरू कर दिए। जो कभी दरभंगा राज को देखा नहीं था, रेवेन्यू-स्टाम्प पर सम्पत्तियों को खरीदने, जमीन को खरीदने का दस्तावेज बनाने लगे।  संस्थान में लोभियों, अवसरवादियोंको &#8220;ईशारा&#8221; करने लगे, जाल बिछाने लगे। कुछ फंस गए, कुछ निकल गए। परन्तु &#8216;फंसने वालों की संख्या&#8217;, निकलने वालों की संख्या पर बहुत भारी पड़ा।  एक समय था जब राजा-महाराजा, उनके परिवार और परिजन अपने राज में, राजधानी में, शहर में निकलते थे तो लोगों की भीड़ उमड़ती थी उनकी एक झलक पाने के लिए। लोग अपने को सौभाग्यशाली समझते थे जब उनकी ओर उन महात्मनों की नजर उठती थी। आज समय बदल गया है। </p>
<p>दरभंगा से पटना के रास्ते देश की राजधानी दिल्ली तक उन राजा, महाराजाओं को, उनके परिवार और परिजनों को देखने वाला, समझने वाला, मिलने के लिए लालायित होने वाला कोई नहीं है। चाहे दरभंगा के रामबाग पैलेस के खुले मैदान में भ्रमण-सम्मलेन करें या पटना के गाँधी मैदान में या फिर दिल्ली के लोदी गार्डन या राजपथ पर सुबह का शेर करें &#8211; समाज के उच्च वर्ग से लेकर माध्यम वर्ग के रास्ते निम्न वर्ग तक कोई नहीं जानता, कोई नहीं पहचानता। आज समय ऐसा हो गया है कि दरभंगा राज के घरों में, कोठियों में अपने सगे-संबधी मृत्यु को प्राप्त करते हैं, अपनी मौसेरी बहन की मृत्यु होती है, लोग-बाग़ अपना दरवाजा खोलने के बजाय बंद कर निकल जाते हैं।</p>
<p><strong>बहरहाल, सन 1960 के अक्टूबर माह के पहली तारीख को महाराजा का असामयिक अंत होता है। महाराजा  के  अंतिम  सांस  के  साथ  ही,  दरभंगा  राज  से  जुड़े  लोग  बाग़,  जो  प्रत्यक्ष  अथवा  परोक्ष  रूप  से  राज  घराने  की  सम्पत्तियों से &#8220;घी&#8221; से स्नान करते थे, &#8220;मूल-सम्पत्तियों&#8221; पर ध्यान केंद्रित करने लगे, सल्तनत की दीवारों से ईंटें खींचने लगे, मुख्य द्वार को खोलने-बंद करने वालों से लेकर तिजोरियों को खोलने, बंद करने और सुरक्षित रखने वालों तक-सभी मृत्युपरांत राज  के  अस्तित्व को सुरक्षित रखने के  बजाय,  महाराजाधिराज के सम्पत्तियों के बंटबारे, उचित हिस्सा प्राप्त करने, मिलने पर केंद्रित हो गए। होना भी स्वाभाविक था । विश्वास नहीं होता की आज के बिहार के कुल 94,163 वर्गकिलोमीटर क्षेत्र में दरभंगा राज का कभी 8380 किलोमीटर क्षेत्र पर आधिपत्य था। दर्जनों सर्किल थे। कोई 4,495 गाँव दरभंगा नरेश के शासन में थे। और आज &#8211; जो शेष है उसे लोग बाग़ बेचने पर आमादा हैं। </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/editorial/tale-of-two-officiating-persons">नीतीश कुमार तो खुद्दे &#8216;प्रभारी&#8217; हैं, फिर दरभंगा के &#8216;प्रभारी&#8217; वरीय आरक्षी अधीक्षक, दरभंगा के &#8216;कुमार-ब्रदर्स&#8217; से न्याय की क्या उम्मीद करते हैं </a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8216;दशरथ दास&#8217; को कोई भी बिहारी मदद वाला हाथ नहीं बढ़ाए, &#8216;स्वहित&#8217; में &#8216;मांझी&#8217; बनाकर बाज़ार में &#8216;बेचे&#8217;, &#8216;व्यापार&#8217; किये (#फोटोवाला श्रृंखला: 11)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 31 Aug 2021 07:38:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[इंटरव्यू]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बलिया / पटना / कानपुर / गया और मुंबई : बात अस्सी के दशक की है। आम तौर पर बाज़ार में अपनी उपस्थिति बनाये रखने के लिए, बाज़ार से विज्ञापनों को झाड़ू से पोछकर अपने पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित करने के लिए, ए.बी.सी.डी. में अपने पत्र-पत्रिकारों की प्रसार-संख्या को क़ुतुब मीनार की ऊंचाई पर बरक़रार रखने [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बलिया / पटना / कानपुर / गया और मुंबई : बात अस्सी के दशक की है। आम तौर पर बाज़ार में अपनी उपस्थिति बनाये रखने के लिए, बाज़ार से विज्ञापनों को झाड़ू से पोछकर अपने पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित करने के लिए, ए.बी.सी.डी. में अपने पत्र-पत्रिकारों की प्रसार-संख्या को क़ुतुब मीनार की ऊंचाई पर बरक़रार रखने के लिए प्रकाशक अपनी पत्रिकाओं को सप्ताह प्रारम्भ होने के एक-दो दिन पहले ही देश की सड़कों पर, गलियों के नुक्कड़ों पर हम जैसे विक्रेताओं के पास पहुंचा देते थे। उन दिनों प्रकाशक जिस भाषा में पत्रिकाएं प्रकाशित करते थे, उस भाषा के प्रति तो सम्मान था ही उनका, एक इक्षा यह भी होती थी कि लेखक को जो भी पैसा मिले, चाहे शब्दों का पहाड़ा पढ़कर या प्रकाशित सामग्रियों को बित्ता से नापकर, समय पर मिले, ताकि उसका भी घर-द्वार चलता रहे। आज जैसे प्रकाशकों और मालिकों जैसी मनोदशा नहीं थी उन दिनों।  आज समाचार से कोई मतलब नहीं है। विज्ञापन छापो, अर्ध-नग्न, नग्न, विभिन्न मुद्राओं में तस्वीर छापो। प्रसार को सम्मुन्नत बनाओ। विज्ञापन लाओ, पैसा कमाओ &#8211; नहीं तो जाओ। आज की पत्रकारिता इससे बेहतर स्थिति में नहीं है।</strong> </p>
<p>उन दिनों भारतीय स्वाधीनता संग्राम के गुमनाम क्रांतिकारियों के वंशजों, जो स्वतंत्र भारत के समाज से उपेक्षित हैं, आज की पीढ़ियां जिन्हे जानती नहीं है, पहचानने की बात तो कोसों दूर, से मिलने के क्रम में पिछले दिनों रघुनाथ पाण्डेय जी के घर गया था। मेरे साथ मेरा पुत्र भी था और कैमरा गर्दन में लटका था । पाण्डेय जी सरकारी विद्यालय में गणित के शिक्षक थे। अपनी लम्बी सेवा के बाद अवकाश प्राप्त कर गांव, गली, मोहल्ले के बच्चों को गणित की शिक्षा मुफ्त में देते थे। पाण्डेय जी का मानना था और है भी कि &#8216;गणित&#8217; चाहे जीवन का हो या &#8216;जीवन की कमाई&#8217; का &#8211; अगर दुरुस्त नहीं रहा, तो दशमलव के बाद एक अंक का अंतर होने पर भी &#8220;जय&#8221; के स्थान पर &#8220;क्षय&#8221; निश्चित होना निश्चित है। कोई पांच फीट दस इंच लम्बाई, सुडौल शरीर, भारी-भरकम आवाज वाले रघुनाथ पाण्डेय जी भारत के 134 करोड़ लोगों में गुमनाम होने वाले व्यक्ति नहीं हैं, जिन्हे भारत के लोगों को नहीं जानना चाहिए। अगर वे नहीं जानते उन्हें तो यह भारत के लोगों का दुःर्भाग्य है। रघुनाथ पाण्डेय अपने दादा के ऊपर बनी फिल्म &#8220;मंगल पाण्डेय- द राइजिंग&#8221; से सम्बंधित कोई पांच किलो से अधिक दस्तावेज हाथ में लिए कहते हैं कि फिल्म बनना, या बनाना अच्छी बात है &#8211; लेकिन तथ्यों के साथ छेड़खानी गलत है। रघुनाथ पाण्डेय जी भारत के शहीद मंगल पाण्डेय जी की चौथी पीढ़ी के वंशज हैं और मुंबई के आमिर खान को कचहरी में घसीटने की हिम्मत भी किये थे। </p>
<figure id="attachment_3371" aria-describedby="caption-attachment-3371" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/1-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/1-7.jpg" alt="" width="1600" height="2137" class="size-full wp-image-3371" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/1-7.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/1-7-225x300.jpg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/1-7-767x1024.jpg 767w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/1-7-768x1026.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/1-7-1150x1536.jpg 1150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/1-7-1533x2048.jpg 1533w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3371" class="wp-caption-text">दशरथ दास वाला धर्मयुग &#8211; महीना: जनवरी और साल 1989</figcaption></figure>
<p>उस घटना के कुछ दिन बाद मैं कानपुर शहर से कोई 30 किलोमीटर दूर गंगा तट पर स्थित बाजीराव पेशवा &#8211; II के भव्य किला से पूर्व एक विशालकाय पीपल के वृक्ष के नीचे झोपड़ी-नुमा मकान में पहुंचा। मेरे साथ मेरी पत्नी और पुत्र दोनों थे। यह स्थान किसी आम भारतीय ग्रामीण इलाकों जैसा ही था। सरकारी दस्तावेजों में यह स्थान अभी तक &#8220;स्मार्ट सीटीज&#8221; के रूप में दर्ज नहीं हुआ था। यह अलग बात थी कि यह स्थान जब अविभाजित भारत की आवादी मात्र 27 करोड़ थी तब इस स्थान पर तीन ऐसे लोगों का बचपन बीता, जबानी बीती, जब भारत के लोग ब्रितानिया सरकार के साँसे खींच रहे थे। उन 27 करोड़ लोगों में मातृभूमि की आज़ादी के लिए न तो कमर में ताकत थी और न मानसिक रूप से वे सज्ज थे। लेकिन तीन व्यक्ति औरों से अलग थे। आज देश की आवादी 136 करोड़ है &#8211; आज भी वे अलग हैं। जानते हैं उनका नाम क्या था &#8211; रामचंद्र पांडुरंग राव यानी तात्या टोपे, मनु यानी लक्ष्मी बाई और पेशवा। आज भी उस जगह पर तात्या टोपे की चौथी पीढ़ी के वंशज रहते हैं। आज़ाद भारत में तात्या टोपे, लक्ष्मी बाई पर अनंत कहानियां लिखी जा चुकी हैं। दर्जनों फिल्म और बॉयोपिक बन गए हैं। लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी की आज से 14-वर्ष पूर्व, यानी 2007 हम जब तात्या टोपे के प्रपौत्र श्री विनायक राव टोपे को स्थानीय अधिकारी से एक पत्र लाने को कहे, जिनके कार्यालय में उन्होंने दर्जनों दस्तावेज और ऐतिहासिक वस्तुएं जमा किये थे जो तात्या टोपे की, उनकी माँ की थी; सम्बद्ध अधिकारी अपने चपरासी से कहकर उन्हें कक्ष से तत्काल बाहर निकलने को कहा और वे निकाले गए। </p>
<p>कानपुर यात्रा के कुछ दिन बाद पश्चिम बंगाल के मिदनीपुर इलाके गया था। यह इलाका सन 1857-1947 आज़ादी के प्रथम आंदोलन के दौरान सैकड़ों वीरों को जन्म दिया था, जिन्होंने समयांतराल मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने-अपने प्राणों को भी उत्सर्ग किये थे। इसी इलाके में जन्म हुआ था खुदीराम बोस का और उनके गुरु सत्येन्द्रनाथ बोस का। खुदीराम बोस को मुजफ्फरपुर कॉन्सपिरेसी केस के तहत 11 अगस्त 1908 को फांसी लगी थी। जबकि उनके गुरु सत्येन्द्रनाथ बोस को अलीपुर बम्ब ब्लास्ट केस में उसी वर्ष, यानी 21 नवम्बर, 1908 को अलीपुर जेल में फांसी पर लटकाया गया था। सत्येन बोस के पोते की पत्नी श्रीमती अनीता बोस जब हम पति-पत्नी और पुत्र को देखी, इस विषय पर बात करते सुनी, अश्रुपूरित हो गई। मेरी पत्नी को पकड़कर कहती हैं: &#8220;आज तक किसी ने इस तरह परिवार का दर्द नहीं पूछा। देश तो कब आज़ाद हो गया था। अब तो हमारे पूर्वजों को, जिन्होंने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए आंदोलन किये, फांसी पर लटके, कोई पूछता भी नहीं है। </p>
<figure id="attachment_3372" aria-describedby="caption-attachment-3372" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/2-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/2-4.jpg" alt="" width="1600" height="2038" class="size-full wp-image-3372" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/2-4.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/2-4-236x300.jpg 236w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/2-4-804x1024.jpg 804w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/2-4-768x978.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/2-4-1206x1536.jpg 1206w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3372" class="wp-caption-text">दशरथ दास वाला धर्मयुग &#8211; महीना: जनवरी और साल 1989</figcaption></figure>
<p><strong>गली के नुक्कड़ पर दो मूर्तियां लगी दिखाई दी। उन मूर्तियों के ऊपर स्थानीय लोग कपड़े सुखा रहे थे । कारपोरेट उत्पादनों का बड़ा-बड़ा बोर्ड लगा था, जिसके नीचे खुदीराम और सत्येन बोस छीप गए थे । कौन सुनता है ? यह अलग बात है कि खुदीराम बोस पर, सत्येन बोस पर या उस समय के अनेकानेक क्रांतिकारियों पर, मिदनापुर जिले पर दर्जनों फिल्म और बॉयोपिक बने हैं। किसी ने किसी भी वंशज के परिवारों से बात नहीं किये, अपना हाथ नहीं बढ़ाये, दो पैसे की मदद तो दूर, दो शब्द भी नहीं कहे। रघुनाथ पाण्डेय, विनायक राव टोपे या श्रीमती अनीता बोस महज एक दृष्टान्त हैं आज भी, जो स्वतंत्र भारत के लोगों की मानसिकता को दर्शाता है, और भारत के मुंबई फिल्म नगरी में बॉयोपिक बनाने वाले, फिल्म में काम करने वाले लोग बाग़ भी तो इसी समाज के लोग हैं। खैर।</strong> </p>
<p>भारत में &#8220;बॉयोपिक&#8221; पर फिल्म बनाना और क़ुतुब मीनार की ऊंचाई के बराबर पैसे कमाना मुंबई फिल्म जगत  का पर्यायवाची हो गया है। संविधान के निर्माता से लेकर संविधान का धज्जी उड़ाने वाले, सबों पर आज कल मुंबई में फिल्म बनायी जाती है। गुगुल महाशय के आगमन के बाद देश-विदेश के लेखकों ने उनका उसी तरह स्वागत किये, जिस तरह &#8216;ससुराल में नए दामाद&#8217; का या &#8216;बहनोई की उपस्थिति में विवाहोपरांत छोटी साली का मइके में आगमन&#8217; पर होता है । जिस तरह  गुसलखाने के बराबर भी रसोईखाने का अनुभव नहीं होने पर मोहतरमा और मोहतरम गैस के चूल्हे पर कराही चढ़ाकर उसमें चाय छौंकते हैं, आधुनिक भारत में फिल्म के लेखक चतुर्दिक गुगुल महाशय के आँगन से हल्दी, धनिया, जीरा, गोलकी, लाल मिर्च थोड़ी-थोड़ी मात्रा में निकाल कर हींग के साथ छौंका लगाते हैं और फिर थाली में परोसते हैं। इस रसोईखाने में निर्मित इस पदार्थ को अपना कहकर फिल्म बनाते हैं। </p>
<p><strong>भारत के समीक्षा बाजार में फिल्म समीक्षकों की किल्लत ही नहीं, बाढ़ सी है। आज स्थिति ऐसी है कि भारत के युवक और युवतियां, भारत में निर्मित बॉयोपिक फिल्म के निर्माताओं और लेखकों पर शोध करने की आवश्यकता है। आज हालात ऐसी है कि &#8220;बच्चों के स्वास्थ्यवर्धक पेय पदार्थों को मानसिक रूप से बीमार भारतीय बाजार में बेचने के लिए शहीदों के नाम से गिनती सिखाया जा रहा है, पहाड़ा पढ़ाया जा रहा है । औसतन स्कूल जाते बच्चों को, उनके माता-पिताओं को अगर मंगल पाण्डेय जी के बारे में पूछ लें की कौन थे, तो अपनी बत्तीसी बाहर निकालकर कहने में तनिक भी शर्मिंदगी महसूस नहीं करेंगे कि आमिर खान। अगर &#8216;स्मार्ट-सिटीज&#8217; के बच्चों से पूछ ले भगत सिंह कौन थे, तो मुंबई की अदाकारा &#8216;काजोल&#8217; के पति का नाम ले लेंगे या फिर लोकसभा के एक सांसद का नाम ले लेंगे। साथ में उनके पिता और माता का भी नाम ठोक देंगे। स्थिति इससे बेहतर नहीं है। विश्वास नहीं हो तो आजमाकर देखिये। </strong>  </p>
<p>भारत को ब्रितानिया सरकार के शरणागत होने से मुक्ति के बाद शायद भारतीय समाज का कोई ही ऐसा क्षेत्र, वर्ग, समुदाय, विद्वान, विदुषी, क्रांतिकारी, शहीद, राजनेता, अपराधी, चोर, डकैत, बलात्कारी, धार्मिक, सामाजिक लोग-बाग़ होंगे जिनपर बॉयोपिक नहीं बना होगा। मसलन: &#8216;डॉ भीमराव अम्बेडकर&#8217; पर ही दर्जनों बॉयोपिक बने हैं। इसी तरह &#8216;शहीद भगत सिंह&#8217; पर इन्किलाब बना, शहीद बना, दी लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह बना। &#8216;पान सिंह तोमर&#8217; पर बायोपिक बना। कहीं कबड्डी पर बायोपिक बना तो, कहीं क्रिकेट के खिलाड़ी पर। कहीं हॉकी के खिलाडी पर बायोपिक बना, तो कहीं कुस्ती पर। कहीं &#8216;मंगल पांडेय&#8217; पर बना तो कहीं &#8216;फूलन देवी&#8217; पर। सभी बायोपिक फिल्म्स भारत ही नहीं विश्व के दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया गया। झोला में नहीं, बल्कि रेल के कंटेनरों में भरकर पैसे एकत्रित किये गए। सम्मान एकत्रित किये जा रहे हैं । फिल्म के निर्माताओं से लेकर निवेशकों तक भारत के बैंकों से विदेशी बैंको तक अपने-अपने खातों में अंकों के आगे &#8220;शून्य&#8221; की संख्या बढ़ाते जा रहे हैं । लेकिन विगत 75 वर्षों में &#8216;अपवाद&#8217; को छोड़कर, शायद ही किसी भी बॉयोपिक फिल्म के निर्माताओं से लेकर फिल्म अदाकार और अदाकारा तक, जिस व्यक्ति-विशेष की कहानी पर बन रही है, जिस फिल्म में वे अपनी भूमिका निभा रहे हैं; उस व्यक्तिविशेष को जानते होंगे, उसके परिवार और परिजनों को, वंशजों को जानते होंगे। शब्द बहुत कटु है लेकिन मेरी जाणार में सत्यता की पराकाष्ठा पर है, इसलिए लिख रहा हूँ। </p>
<p><strong>बहरहाल, ये हैं अरुण सिंह। पटना के हैं। दशरथ दास पर &#8216;पहली कहानी&#8217; के लेखक यही है। &#8216;धर्मयुग&#8217; में प्रकाशित हुआ था। साल था 1989 और अंक था 1-7 जनवरी। आप तो नवाजुद्दीन सिद्दीकी को जानते होंगे &#8216;दशरथ मांझी&#8217; के रूप में और इस दाढ़ी वाले बाबा अरुण सिंह का नाम भी नहीं सुने होंगे। अरुण सिंह एक दृष्टान्त हैं &#8211; भारत में लेखकों के शोषण का। भारत में ऐसे लाखों लेखक मिल जायेंगे जिनके बल पर भारत में &#8220;बॉयोपिक फिल्म&#8221; बनती है और वे सभी आर्थिक रूप से किल्लत की जिंदगी जी रहे हैं। यह आर्थिक शोषण सिर्फ लेखकों के साथ ही नहीं, बल्कि &#8220;विषय&#8221; के साथ भी आर्थिक बलात्कार होता आ रहा है। तकलीफ इस बात की है कि समाज में अनपढ़ों से लेकर शिक्षित विद्वान और विदुषी तक की मानसिकता इतनी कुंठित है कि वे वस्त्र में लगे इत्र और परफ्यूम के सुगंध के &#8220;फॉलोवर्स&#8221; हो जाते हैं, &#8220;ऑटोग्राफ&#8221; लेने के लिए क्या-क्या नहीं कर लेते। </strong></p>
<p>दशरथ दास थे पहाड़ तोड़ने वाले। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी पत्नी के लिए पहाड़ तोड़कर रास्ता नहीं बनाया, अलबत्ता, वे चाहते थे कि उनके गाँव, पंचायत में, अंचल में, प्रखंड में रहने वाले सभी लोग, चाहे चन्दनधारी, टीक धारी, जेनऊ धारी ब्राह्मण हों या तलवार उठाने वाल राजपूत या फिर मजदूरी कर पेट पालने वाले, अपने परिवार को जीवित रखने वाले समाज के अन्य लोग &#8211; सभी उस रास्ते का उपयोग करें। दूरी को कम करें। लेकिन सफ़ेद वस्त्रधारी नेता उसे &#8220;मांझी&#8217; बना दिए और केतन मेहता तो प्रेम कहानी लिखकर 16 करोड़ रुपये एकत्रित कर लिए। दशरथ दास अपनी जीवन का अंतिम सांस लेकर ईश्वर के पास, अपनी पत्नी के पास इतिहास रचकर कूच कर गए। </p>
<figure id="attachment_3373" aria-describedby="caption-attachment-3373" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/3-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/3-4.jpg" alt="" width="1600" height="2072" class="size-full wp-image-3373" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/3-4.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/3-4-232x300.jpg 232w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/3-4-791x1024.jpg 791w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/3-4-768x995.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/3-4-1186x1536.jpg 1186w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/3-4-1581x2048.jpg 1581w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3373" class="wp-caption-text">दशरथ दास वाला धर्मयुग &#8211; महीना: जनवरी और साल 1989</figcaption></figure>
<p>दशरथ दास एक बेहद पिछड़े इलाके से आते थे । वे जिस गांव में रहते थे वहाँ से पास के कस्बे जाने के लिए एक पूरा पहाड़ (गहलोर पर्वत) पार करना पड़ता था। उनके गाँव में उन दिनों न बिजली थी, न पानी। ऐसे में छोटी से छोटी जरूरत के लिए उस पूरे पहाड़ को या तो पार करना पड़ता था या उसका चक्कर लगाकर जाना पड़ता था। रास्ता बहुत संकीर्ण था। एक दिन फाल्गुनी देवी, उनकी पत्नी,  अपने पति के लिए खाना ले जा रही थी, रास्ते में उसे चोट लगी, जिसके कारण मिट्टी के बर्तन में रखा पानी गिर गया। अपने पति से कही आज आप खाने के बाद पानी नहीं पी पाएंगे। यह बात दशरथ दस के ह्रदय को बेध दिया। दशरथ दास जैसे खेत में कार्य करने वाले अनेकानेक श्रमिक थे और लगभग सभी &#8220;श्रमिक जाति&#8221; के ही थे। सबों की पत्नियां, बच्चे अपने श्रमिक पिता, चाचा, दादा, भाई के लिए खाना-पानी लाते थे। अपनी पत्नी को बिना कुछ बताए वे पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाने लगे। फाल्गुनी देवी, इस घटना के सात साल बाद ईश्वर को प्राप्त हुई, बीमारी, उपचार और भर-पेट भोजन की किल्लत के कारण। </p>
<p>जिस दिन उनकी पत्नी इस पृथ्वी पर अंतिम साँस ली, दशरथ दास का गहलौर पहाड़ पर रास्ता का भविष्य दिखने लगा था। अपनी पत्नी की मृत्यु के अगले 15-16 साल तक गहलौर पहाड़ पर हथौड़ी-छेनी चलता रहा, पहाड़ कटते रहे, रास्ता बनता रहा। इस पुरे कार्य को करने में दशरथ दस को कोई 22+ वर्ष लगा जब वे सन 1982 में अत्रि और वजीरगंज की दूरी 40 किलोमीटर कम कर 55 किलोमीटर से 15 किलोमीटर कर दिए। कहते हैं बिना पागलपन से कोई काम नहीं हो सकता, खासकर जब हम-आप समाज में क्रांति लाने की बात करते हैं। दशरथ दास को भी गया के लोगों के अलावे मध्य बिहार के लोग बाग &#8220;पागल&#8221; कहते थे। स्वाभाविक भी है। लेकिन इस बात को लिखते समय न तो मैं हिचकी ले रहा हूँ, न मेरी कलम थरथरा रही है, न मैं तुतला रहा हूँ कि &#8220;बिहार के लोगों की मानसिकता स्वहित के लिए चाहे क़ुतुब मीनार जैसी हो, सामाजिक हित, सार्वजनिक हित की जब बात होती है तब सभी मानसिक रूप में दिव्यांग हो जाते हैं &#8211; चाहे नेता हों, अधिकारी हों, मंत्री हों संत्री हों। दशरथ दास कोई 78 वर्ष की आयु में मृत्यु को प्राप्त किये। </p>
<figure id="attachment_3374" aria-describedby="caption-attachment-3374" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/4-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/4-4.jpg" alt="" width="1600" height="2092" class="size-full wp-image-3374" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/4-4.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/4-4-229x300.jpg 229w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/4-4-783x1024.jpg 783w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/4-4-768x1004.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/4-4-1175x1536.jpg 1175w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/4-4-1566x2048.jpg 1566w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3374" class="wp-caption-text">दशरथ दास वाला धर्मयुग &#8211; महीना: जनवरी और साल 1989</figcaption></figure>
<p><strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> से बात करते अरुण सिंह कहते हैं: &#8220;बहुत तकलीफ होती है जब समाज में ऐसे दृष्टान्त देखता हूँ। दशरथ &#8216;दास&#8217; थे वे, न कि दशरथ &#8216;मांझी&#8217;। लोगों ने, नेताओं ने उन्हें &#8216;मांझी&#8217; बना दिया। जिस पहाड़ को अपनी छेनी-हथौड़ी से तोड़कर समाज के लोगों को एक नया रास्ता दिया, एक नया वजूद दिया, अपनी मेहनत से यह सिद्ध कर दिया कि हम अकेले भी समाज में परिवर्तन ला सकते हैं, समाज में अपनी मेहनत से, अपनी परिश्रम से, अपनी सोच से एक नया मिशाल कायम कर सकते हैं, एक बदलाव ला सकते हैं; बिहार सरकार गहलौर में तीन किलोमीटर पक्की सड़क का नाम दशरथ &#8216;मांझी&#8217; के नाम पर करने का प्रस्ताव रखी। यह भी कही उनके नाम पर (मांझी शब्द जोड़कर) अस्पताल बनाएंगे &#8211; जबकि वह व्यक्ति मांझी था ही नहीं। यह राजनिति है। बिहार के पूर्व मुख़्यमंत्री जीतनराम &#8216;मांझी&#8217; उन्हें अपने &#8216;समुदाय&#8217; में जोड़ लिए। लेकिन बहुत विश्वास के साथ कह सकते हैं कि जीतनराम मांझी कभी दशरथ दास से मुखातिब भी नहीं हुए होंगे। उन्हें देखे भी नहीं होंगे। उन्हें जानते भी नहीं होंगे। सब राजनीति है। दशरथ दास की पत्नी उनके पहाड़ तोड़ने के संकल्प लेने के सात साल बात मृत्यु को प्राप्त की। उनका बेटा शरीर से लाचार था, अपाहिज था।  बेटी विधवा थी। किसी ने इन बातों को देखा भी नहीं। यह दुःखद है।&#8221;</p>
<p>अरुण सिंह आगे कहते हैं: &#8220;आम तौर पर कोई भी व्यक्ति अगर बहुत लगन से कोई काम करता है तो समाज के लोग उसे पागल करार कर देते हैं। दशरथ दास के साथ भी यही हुआ। दशरथ दास के इस ऐतिहासिक कार्य को लोगों ने उसकी पत्नी की प्रेमगाथा से जोड़ दिया। उसकी पत्नी की मृत्यु सात साल बाद हुई। उन्होंने अपने कार्य को कभी नहीं छोड़ा। लोग कहते रहे और वह अनसुना करता रहा। उसकी सोच न केवल तत्कालीन समाज के, प्रदेश के लोगों से बहुत ऊँचा था; बल्कि आज भी लोग उसकी सोच को नहीं आंक सकते हैं। &#8220;मांझी: दी माउंटेन मैन&#8221; फिल्म बनाकर केतन मेहता ने जिस तरह समाज एक व्यक्ति का अपने परिवार, समाज, प्रदेश और मानवीयता के प्रति सम्मान और दायित्व का मजाक उड़ाए, यह केतन मेहता की सोच से परे हैं। लोगों ने दशरथ दास की सोच को &#8216;बहुत सीमित&#8217; कर दिया। मेरा मानना है कि लोग दशरथ दास जैसी सोच के उत्कर्ष के बराबर सोच ही नहीं सकते हैं। वह कभी भी अपनी पत्नी, या अपने परिवार के बारे में नहीं सोचा &#8211; और लोगों की कुंठित सोच ने उसे पत्नी-प्रेम के साथ जोड़ दिया। आमिर खान तो हद ही कर दिए। ख्याति के लिए विश्व को क्या-क्या नहीं कहा, दशरथ दास के परिवार, परिजनों को क्या-क्या नहीं भरोसा दिलाया, उनका विश्वास जीता &#8211; सत्यमेव जयते के प्रसारण के बाद सभी बातें समाप्त हो गयी। यह अच्छी बात नहीं है।&#8221; सबसे बड़ा सवाल यह है कि लोगबाग मृत्युशय्या पर पड़े लोगों का भी स्वहित के लिए व्यापार करना, उसके नाम और यश को भारत के बाज़ारों में बेचना अब ओछपन की श्रेणिओ में नहीं मानते। उन्हें इसके लिए निर्लज्जता नहीं होती। </p>
<figure id="attachment_3375" aria-describedby="caption-attachment-3375" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/5-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/5-3.jpg" alt="" width="1600" height="2072" class="size-full wp-image-3375" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/5-3.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/5-3-232x300.jpg 232w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/5-3-791x1024.jpg 791w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/5-3-768x995.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/5-3-1186x1536.jpg 1186w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/5-3-1581x2048.jpg 1581w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3375" class="wp-caption-text">दशरथ दास वाला धर्मयुग &#8211; महीना: जनवरी और साल 1989</figcaption></figure>
<p>भारत की बात छोड़े, तो शायद बिहार के कोई 12 + करोड़ लोगों को यह नहीं मालूम होगा (वैसे भी मालूम क्यों करेंगे) कि धर्मयुग के 1-7 जनवरी, 1989 के अंक में दशरथ दास की कहानी के प्रकाशन के बाद महाराष्ट्र टाईम्स के बासुदेव दशपुत्रे एक पत्र के माध्यम से पहले अरुण सिंह से अनुमति मांगे और फिर उस कहानी को मराठी भाषा में अनुवाद कर महाराष्ट्र टाइम्स में प्रकाशित किये थे। उस कहानी का अंग्रेजी अनुवाद कर &#8216;दी हिन्दू&#8217; समूह के तत्कालीन &#8220;दी वीक&#8221; पत्रिका में भी प्रकाशन हुआ था। इस विषय पर जब अरुण सिंह से पूछे तो वे कुछ पल रुके, एक लम्बी सांस लेते कहते हैं: &#8220;बासुदेव दशपुत्रे की चिठ्ठी आयी थी। वे चाहते थे कि उस कहानी का प्रकाशन मराठी भाषा में भी हो। वह कहानी महाराष्ट्र टाइम्स में बृहत् पैमाने पर प्रकाशित हुई। आप जानकार, सुनकर, देखकर हैरान हो जायेंगे की महाराष्ट्र टाइम्स में कहानी के प्रकाशन के बाद, धर्मयुग से और वासुदेव जी से मेरे घर का पता महाराष्ट्र के लोगों ने लेना प्रारम्भ किया। महाराष्ट्र का शायद ही कोई जिला अछूता रहा होगा, जहाँ से मुझे पत्र नहीं आया था, जहाँ से मुझे दशरथ दास के लिए आर्थिक मदद नहीं आया था हर महीने। आर्थिक मदद पांच रुपये की भी थी, और 10, बीस, पच्चीस, पचास. सौ रुपये की भी। दशरथ दास महीने में एक बार अथवा दो महीने में एक बार अवश्य आते थे। जब उनके हाथों मैं महाराष्ट्र के दूर-दरस्त इलाकों से प्रेषित मनीऑर्डर का रसीद देता था, पैसा उनके हाथों में रखता था, वे अश्रुपूरित हो जाते थे। मैं उस वेदना और संवेदना को शब्दों में नहीं कह सकता। फिर कुछ पल के लिए अरुण सिंह शांत हो गए &#8230;. आगे कहते हैं&#8230;.लेकिन बिहार के किसी कोने से एक व्यक्ति का भी हाथ नहीं उठा। दशरथ दास तो मध्य बिहार के गया जिले के ही तो रहने वाले थे।&#8221;</p>
<figure id="attachment_3376" aria-describedby="caption-attachment-3376" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/Manjhi.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/Manjhi.png" alt="" width="1600" height="726" class="size-full wp-image-3376" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/Manjhi.png 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/Manjhi-300x136.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/Manjhi-1024x465.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/Manjhi-768x348.png 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/Manjhi-1536x697.png 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3376" class="wp-caption-text">कमाई 16 करोड़ की</figcaption></figure>
<p>अरुण जी आगे कहते हैं: &#8220;इस कहानी के प्रकाशन के बाद कलकत्ता से राजकमल भारती ने संपर्क साधा। वे चाहते थे कि एक फिल्म बनायें और वे इस कार्य में मेरी मदद चाहते थे। वे कलकत्ता से दशरथ दास के गाँव गए और उन्हें लेकर पटना आ गए। वे पूरी कहानी सुने। वे पूरी कहानी को हूबहू रखकर फिल्म बनाना चाहते है। कोई भी फेरबदल, मिर्च-मसाला मिलाये बिना &#8211; एक मानवीय कहानी। दशरथ दास और राजकमल जी के साथ करारनामा बना, हस्ताक्षर हुए। उन दिनों में दशरथ दास को 50,000 नगद देने को तैयार हुए, साथ ही, 10,000 रुपये अग्रिम भी दिए। पुनः वापस आने के एक विश्वास के साथ वे दशरथ दास से बिदा लिए। लेकिन आज तक फिर कभी नहीं आए।  उनके द्वारा बताए गए पते पर कई बार पत्राचार किये, लेकिन जबाब नहीं मिला। </p>
<figure id="attachment_3377" aria-describedby="caption-attachment-3377" style="width: 1076px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/MO.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/MO.jpg" alt="" width="1076" height="682" class="size-full wp-image-3377" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/MO.jpg 1076w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/MO-300x190.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/MO-1024x649.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/08/MO-768x487.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1076px) 100vw, 1076px" /></a><figcaption id="caption-attachment-3377" class="wp-caption-text">मानवता और मानवीयता का एक दृष्टान्त</figcaption></figure>
<p><strong>अरुण सिंह की कथा-व्यथा सुनकर भारतीय पत्रकारिता और वर्तमान काल के मूर्धन्य पत्रकारों, संस्थान के मालिकों पर हंसी आ गयी। आम तौर पर जनवरी और अगस्त के प्रथम सप्ताह में मुझे सैकड़ों पत्रकारों के फॉर आते हैं। सुबह, शाम मोबाईल की घंटी टनटनाता है। सभी कहते हैं कि : &#8220;शिवनाथ जी आपने जो शहीदों के वंशजों को ढूंढा है, आप उन सबों का संपर्क नंबर और पता व्हाट्सएप आकर दें, प्लीज। हम सभी उन पर सीरीज में कहानी करना चाहते हैं। नए तरीके से उन्हें दिखाना चाहते हैं। पहले की सरकार के समय काल में उनकी बहुत उपेक्षा हुई है&#8230;&#8230; इत्यादि-इत्यादि।&#8221; मैं भी मूक-बधिर होकर उनकी बातों को सुनता रहता हूँ। जैसे ही उनकी सांस रूकती है अगले वाक्य को पकड़ने के लिए, मैं बीच में कुदककर कहता हूँ की आप अपने संपादक अथवा मालिक से कहें की वे सभी वंशजों के बैंक लेखा में न्यूनतम पांच-पांच लाख जमा करबा दें, मैं सभी का नाम आपको तत्काल प्रेषित कर दूंगा। फोन काट देती हैं। क्या समझे ?</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/interview/dashrath-das-mauntain-man">&#8216;दशरथ दास&#8217; को कोई भी बिहारी मदद वाला हाथ नहीं बढ़ाए, &#8216;स्वहित&#8217; में &#8216;मांझी&#8217; बनाकर बाज़ार में &#8216;बेचे&#8217;, &#8216;व्यापार&#8217; किये (#फोटोवाला श्रृंखला: 11)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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