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	<title>cases Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>​भारत के न्यायालयों में 5.34 करोड़ मामले लंबित: कभी &#8216;अधिवक्ता&#8217; नहीं, तो कभी &#8216;आरोपी&#8217; फरार, कभी &#8216;गवाह&#8217; गायब तो कभी ​&#8217;सबूत&#8217; नहीं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Feb 2026 13:34:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कानून]]></category>
		<category><![CDATA[cases]]></category>
		<category><![CDATA[high court]]></category>
		<category><![CDATA[jharkhand]]></category>
		<category><![CDATA[juiciary]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली: बात पिछले साल की है। अगस्त के मध्य में भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने झारखंड उच्च न्यायालय से उन मामलों में फैसले देने में देरी पर कड़ी नाराजगी जताई थी, जिसकी सुनवाई बहुत पहले ही पूरी हो चुकी थी। उन दिनों सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों न्यायमूर्ति सूर्यकांत (वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय के [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली: बात पिछले साल की है। अगस्त के मध्य में भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने झारखंड उच्च न्यायालय से उन मामलों में फैसले देने में देरी पर कड़ी नाराजगी जताई थी, जिसकी सुनवाई बहुत पहले ही पूरी हो चुकी थी। उन दिनों सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों न्यायमूर्ति सूर्यकांत (वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश) और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने झारखंड उच्च न्यायालय का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत सिन्हा से कहा कि संबंधित न्यायाधीशों को अपने लंबित फैसले लिखने के लिए मंजूर छुट्टी लेनी चाहिए।</strong></p>
<blockquote><p>मुकदमों की जिरह की समाप्ति और फैसले के नहीं आने से संबंधित तथ्यों (61 मामले लंबित थे) बातों पर अपनी प्रतिक्रिया जताते सर्वोच्च न्यायमूर्तियों की पीठ ने कहा कि &#8220;झारखंड उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से कहिए कि वे 10-12 हफ़्ते की मंज़ूर छुट्टी लें और फैसले लिखें… बस इन मामलों को खत्म करें। लोगों को फैसले चाहिए, उन्हें न्यायशास्त्र या किसी और चीज़ से कोई मतलब नहीं है। राहत दी गई है या नहीं, इस पर तर्क के साथ आदेश दें।” सर्वोच्च न्यायालय ने वरिष्ठ अधिवक्ता से यह सुझाव झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तक पहुंचाने को भी कहा। </p></blockquote>
<p>इस मामले की सुनवाई झारखंड के आदिवासी इलाकों के छात्रों द्वारा दायर याचिकाओं के संबंध में हो रही थी। उन दिनों राज्य सरकार द्वारा होमगार्ड के 1,000 से ज़्यादा पदों पर भर्ती रद्द करने के बाद ये छात्र उच्च न्यायालय गए थे। हालांकि सुनवाई 2023 में पूरी हो गई थी, लेकिन हाई कोर्ट ने अभी तक फैसला नहीं सुनाया था। छात्रों के नाम मेधावी सूची में थे, लेकिन फैसले में देरी से अनिश्चितता बनी हुई थी। </p>
<p>नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के आंकड़ा के अनुसार, 31 जनवरी, 2026 तक झारखंड उच्च न्यायालय में करीब  206,138 लाख से ज़्यादा मामले लंबित हैं। इसमें लगभग 28,116 सिविल मामले और 178,022 आपराधिक मामले शामिल हैं। झारखण्ड एक दृष्टान्त है। देश की अदालतों में लंबित मामलों की संख्या बहुत ज्यादा है। यह एक बड़ी चिंता का विषय है। 25 सितंबर तक के आंकड़ों के अनुसार, कुल 5.34 करोड़ मामले लंबित थे। इन मामलों में से एक बड़ा हिस्सा जिला और निचली अदालतों में है। जिला और निचली अदालतों में 4.7 करोड़ मामले लंबित हैं। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/hc.webp"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/hc.webp" alt="" width="1078" height="810" class="aligncenter size-full wp-image-7324" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/hc.webp 1078w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/hc-300x225.webp 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/hc-1024x769.webp 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/hc-768x577.webp 768w" sizes="(max-width: 1078px) 100vw, 1078px" /></a></p>
<blockquote><p>उच्च न्यायालयों में भी बड़ी संख्या में मामले अटके हुए हैं। उच्च न्यायालयों  में 63.8 लाख मामले लंबित हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत, सर्वोच्च न्यायालय में भी मामले लंबित हैं। सर्वोच्च न्यायालय में 88,251 मामले लंबित हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने इस स्थिति पर खुद भी गहरी चिंता भी जताई है। न्यायालय ने साफ तौर पर कहा है कि तेज सुनवाई हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। यह अधिकार जीवन के अधिकार का एक अटूट हिस्सा है। इसका मतलब है कि हर किसी को जल्द न्याय मिलना चाहिए। </p></blockquote>
<p>नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड द्वारा उपलब्ध निचली अदालतों के आंकड़ों के अनुसार निचली अदालतों के 1.78 करोड़ मामलों में देरी के 15 मुख्य कारण बताए हैं। निचली अदालतों में कुल 4.7 करोड़ मामले लंबित हैं। जिन मामलों के कारणों की जानकारी ग्रिड के पास है, उनमें से ज्यादातर आपराधिक मामले हैं। इन मामलों में 81% आपराधिक मामले हैं। बाकी 19% सिविल मामले हैं। यह दिखाता है कि आपराधिक मामलों में देरी ज्यादा हो रही है। हालांकि, एक बड़ी संख्या ऐसे मामलों की भी है जिनके कारणों का पता नहीं है। लगभग 3 करोड़ मामलों के लिए देरी का कोई कारण नहीं बताया गया है। यह अपने आप में एक बड़ी समस्या है। </p>
<p><strong>ग्रिड ने देरी के कुछ खास कारण बताए हैं। ये कारण न्याय प्रक्रिया को धीमा कर रहे हैं। सबसे बड़ा कारण अधिवक्ताओं का उपलब्ध न होना है। ग्रिड के अनुसार, 62 लाख से ज्यादा मामलों में अधिवक्ता मौजूद नहीं होते। इससे सुनवाई आगे नहीं बढ़ पाती। दूसरा बड़ा कारण आरोपी का फरार होना भी बताया है। ग्रिड के अनुसार 35 लाख से ज्यादा मामलों में आरोपी फरार हैं। जब आरोपी ही नहीं होता, तो केस कैसे चलेगा? इतना ही नहीं, लगभग 27 लाख मामलों में गवाह गायब हैं। गवाहों के बिना सबूत पेश करना मुश्किल हो जाता है। 23 लाख से ज्यादा मामलों पर अलग-अलग अदालतों ने रोक लगा रखी है। यह रोक भी मामलों को आगे बढ़ने से रोकती है। आंकड़ों के अनुसार, 14 लाख से ज्यादा मामलों में &#8216;दस्तावेजों का इंतजार&#8217; होता है। जरूरी कागजात न मिलने से भी देरी होती है। और लगभग 8 लाख मामलों में &#8216;पार्टियों का दिलचस्पी न लेना&#8217; शामिल है। जब पक्षकार ही रुचि नहीं दिखाते, तो मामला कैसे सुलझेगा? ये सभी कारण मिलकर न्याय में देरी करते हैं।</strong></p>
<figure id="attachment_7325" aria-describedby="caption-attachment-7325" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/DSC_0772-scaled.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/DSC_0772-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="size-full wp-image-7325" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/DSC_0772-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/DSC_0772-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/DSC_0772-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/DSC_0772-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/DSC_0772-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/DSC_0772-2048x1367.jpg 2048w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7325" class="wp-caption-text">​भारत का सर्वोच्च न्यायालय और बाहर निर्णय की प्रतीक्षा । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>ग्रिड ने देरी के कुछ और भी कारण बताए हैं। इनमें बार-बार अपील करना शामिल है। लोग एक ही मामले में बार-बार अपील करते रहते हैं। इससे भी सुनवाई में लंबा समय लगता है। रिकॉर्ड का उपलब्ध न होना भी एक समस्या है। जब जरूरी रिकॉर्ड नहीं मिलते, तो कार्यवाही रुक जाती है। सुनवाई को रोकने वाले विविध आवेदन भी देरी का कारण बनते हैं। पार्टियां अक्सर सुनवाई रोकने के लिए अलग-अलग तरह के आवेदन देती रहती हैं। पार्टियां द्वारा अतिरिक्त गवाहों की मांग करना भी एक कारण है। इससे भी केस लंबा खींचता है। मृत पार्टियों के कानूनी प्रतिनिधियों का कोर्ट रिकॉर्ड में न होना भी एक बड़ी बाधा है। जब किसी पक्षकार की मृत्यु हो जाती है और उसके कानूनी वारिसों का पता नहीं होता, तो मामला अटक जाता है। इन सभी कारणों से न्याय मिलने में बहुत देर होती है।</p>
<p>ग्रिड के अनुसार, न्यायपालिका में 5,600 से अधिक पद रिक्त हैं। 2006 और 2024 के बीच, हाईकोर्ट्स में रिक्तियों की दर 16% से बढ़कर 30% हो गई है। कम न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात: भारत में प्रति दस लाख लोगों पर केवल 21 न्यायाधीश हैं, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में यह संख्या 150 है। लगभग 50% मुकदमे सरकारी एजेंसियों के कारण होते हैं। इतना ही नहीं, इंडिया जस्टिस रिपोर्ट, 2022 के अनुसार, न्यायालयों में पर्याप्त कोर्ट रूम और प्रशासनिक कर्मचारियों की कमी वजह से मामलों के निपटान में बाधा उत्पन्न होती है। साथ ही, मामलों के निपटान के लिए कोई निर्धारित समय-सीमा नहीं है, बार-बार स्थगन और लंबी छुट्टियां भी देरी का कारण बनती हैं।</p>
<p>और इसका परिणाम यह होता है कि इससे पीड़ितों की पीड़ा बढ़ती है और न्याय के निवारक प्रभाव में कमी आती है। व्यवसाय और आम नागरिक अतिरिक्त बोझ उठाते हैं, सरकार और न्यायपालिका पर दबाव बढ़ता है। उदाहरण के लिए- कॉन्ट्रैक्ट्स लागू करने से जुड़ी कमजोरियों के कारण भारत की ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस रैंकिंग खराब होती है और जेलों में भीड़ भी बहती हैं।इंडियन जस्टिस रिपोर्ट, 2025 के अनुसार, भारत की आधी से अधिक जेलों में क्षमता से अधिक कैदी हैं। इनमें से 76% कैदी विचाराधीन हैं।</p>
<figure id="attachment_7326" aria-describedby="caption-attachment-7326" style="width: 1331px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/Court-1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/Court-1.jpg" alt="" width="1331" height="869" class="size-full wp-image-7326" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/Court-1.jpg 1331w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/Court-1-300x196.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/Court-1-1024x669.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/Court-1-768x501.jpg 768w" sizes="(max-width: 1331px) 100vw, 1331px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7326" class="wp-caption-text">रायसीना हिल पर न्याय के लिए आँखें बैठाये भारत के पांच करोड़ से अधिक लंबित मुकदमों के पीड़ित। तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<blockquote><p>ज्ञातव्य हो कि सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों &#8211; न्यायमूर्ति पारदीवाला और न्यायमूर्ति विश्वनाथन &#8211; की पीठ ने इस स्थिति पर गहरी चिंता जताई थी । पीठ ने कहा भी था, &#8216;यह लगभग एक सामान्य प्रथा और नियमित घटना है कि ट्रायल कोर्ट इस आदेश का खुलेआम उल्लंघन करते हैं। यहां तक कि जब गवाह मौजूद होते हैं, तब भी मामलों को बहुत कम गंभीर कारणों या मामूली आधारों पर स्थगित कर दिया जाता है।&#8217; </p></blockquote>
<p>वैसे, सरकार दावा करती है कि केंद्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मामलों के शीघ्र निपटारे और लंबित मामलों की संख्या को कम करने के लिए प्रतिबद्ध है और उसने न्यायपालिका द्वारा मामलों के त्वरित निपटारे के लिए एक अनुकूल वातावरण प्रदान करने हेतु कई पहल भी शुरू की हैं, जिनमें अन्य बातों के अलावा, ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना के तहत न्याय तक पहुंच बढ़ाने और अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए नवीनतम प्रौद्योगिकियों का एकीकरण और न्यायपालिका के लिए अवसंरचना सुविधाओं के विकास हेतु केंद्र प्रायोजित योजना के तहत जिला और अधीनस्थ न्यायपालिका के लिए उपयुक्त अवसंरचना सुविधाएं प्रदान करने के लिए राज्य सरकारों/केंद्र शासित प्रदेशों के संसाधनों की पूर्ति करना शामिल है।</p>
<p>14वें वित्त आयोग ने 2015-2020 की अवधि के दौरान जघन्य अपराधों, महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगजनों और असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्तियों से जुड़े दीवानी मामलों सहित विशिष्ट श्रेणियों के मामलों के त्वरित निपटारे के लिए 1800 त्वरित न्यायालयों (एफटीसी) की स्थापना की सिफारिश की थी। उच्च न्यायालयों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, 31.10.2025 तक 21 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 866 एफटीसी कार्यरत हैं।</p>
<p><strong>बलात्कार और बाल यौन उत्पीड़न संरक्षण अधिनियम (पीओसीएसओ) से संबंधित लंबित मामलों के समयबद्ध निपटारे के लिए विशेष रूप से गठित फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (एफटीएससी), जिनमें विशेष पीओसीएसओ (ई-पीओसीएसओ) कोर्ट भी शामिल हैं, समर्पित हैं। उच्च न्यायालयों द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, 30 सितंबर 2025 तक 29 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 773 एफटीएससी, जिनमें 400 विशेष पीओसीएसओ कोर्ट शामिल हैं, कार्यरत हैं। केंद्र प्रायोजित योजना की शुरुआत से लेकर अब तक इन न्यायालयों ने सामूहिक रूप से 3,50,685 मामलों का निपटारा किया है, जबकि 2,43,615 मामले वर्तमान में लंबित हैं।</strong></p>
<figure id="attachment_7328" aria-describedby="caption-attachment-7328" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/DSC_3555-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/DSC_3555-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="size-full wp-image-7328" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/DSC_3555-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/DSC_3555-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/DSC_3555-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/DSC_3555-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/DSC_3555-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/02/DSC_3555-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7328" class="wp-caption-text">​दिल्ली के तिहाड़ जेल के बाहर कैदियों के परिजन।   तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>भारत के संविधान के अनुच्छेद 130 में यह प्रावधान है कि सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में या ऐसे अन्य स्थानों पर बैठेगा, जिन्हें भारत के मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति की स्वीकृति से समय-समय पर नियुक्त करें। उच्च न्यायालय की पीठों की स्थापना का प्रस्ताव, भारत सरकार द्वारा राज्य सरकार से पूर्ण प्रस्ताव प्राप्त होने के बाद ही विचार किया जाता है, जिस पर संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और राज्य के राज्यपाल की सहमति ज़रुरी है। राज्य सरकार को उच्च न्यायालय की पीठ की स्थापना के लिए ज़रुरी अवसंरचनात्मक सुविधाएं और साथ ही उच्च न्यायालय और उसकी पीठ का संपूर्ण व्यय वहन करना होगा। जिला और अधीनस्थ न्यायालयों के मामले में, निर्णय राज्य सरकार और संबंधित उच्च न्यायालय द्वारा लिया जाता है।</p>
<p>इसके अलावा, न्याय व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़, सुगम और सुलभ बनाने के मकसद से ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण (2023-2027) को 13.09.2023 को 7,210 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ मंजूरी दी गई। अब तक उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों में 579.53 करोड़ पृष्ठों के न्यायालयी अभिलेखों का डिजिटलीकरण किया जा चुका है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 3.81 करोड़ से अधिक सुनवाई हो चुकी हैं और 11 उच्च न्यायालयों में लाइव स्ट्रीमिंग की सुविधा उपलब्ध है। उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों में ई-सेवा केंद्रों की संख्या बढ़कर 1987 हो गई है।</p>
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		<title>सुनती हो !!! भारत में औसतन 1,99,404.76 लोगों को &#8216;न्याय&#8217; दिलाने का जिम्मा एक अदालत पर है 😢और तुम हो कि &#8216;रुसल&#8217; हो !!!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 Sep 2024 04:20:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बहिरा नाचे अपने ताल]]></category>
		<category><![CDATA[cases]]></category>
		<category><![CDATA[courts]]></category>
		<category><![CDATA[justice]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आप विश्वास नहीं करें, आपकी मर्जी। भारत में तक़रीबन 1,99,404.76 लोगों पर एक अदालत है। अदालतों में हम जिला अदालत से लेकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक मानते हैं। भारत में कुल 25 उच्च न्यायालय हैं और कुछ केंद्र शासित प्रदेशों का न्यायिक भार एक से अधिक उच्च न्यायालयों पर है। देश में तक़रीबन 672 [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b2/on-an-average-a-court-in-india-is-responsible-for-providing-justice-to-199404-76-people">सुनती हो !!! भारत में औसतन 1,99,404.76 लोगों को &#8216;न्याय&#8217; दिलाने का जिम्मा एक अदालत पर है 😢और तुम हो कि &#8216;रुसल&#8217; हो !!!</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आप विश्वास नहीं करें, आपकी मर्जी। भारत में तक़रीबन 1,99,404.76 लोगों पर एक अदालत है। अदालतों में हम जिला अदालत से लेकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक मानते हैं। भारत में कुल 25 उच्च न्यायालय हैं और कुछ केंद्र शासित प्रदेशों का न्यायिक भार एक से अधिक उच्च न्यायालयों पर है। देश में तक़रीबन 672 जिला न्यायालय हैं और एक सर्वोच्च न्यायालय। यानी 698 न्यायालय। </strong></p>
<p>देश की आवादी अगर हम 134 करोड़ माने तो इस संख्या के आधार पर और देश में उपलब्ध न्यायालयों की संख्या के आधार पर देश के कुल 199404.76 लोगों को न्यायिक न्याय दिलाने का भार एक न्यायालय पर है। देश में तक़रीबन 14 लाख &#8216;निबंधित&#8217; सम्मानित अधिवक्तागण हैं। लेकिन दिल्ली में जिस कदर न्यायालय &#8216;सुरक्षा कवच&#8217; के अधीन है, अथवा कुछ ख़ास प्रदेश के मुख्यालयों में स्थित न्यायालयों को जो &#8216;सुरक्षा-कवच&#8217; के अधीन रखा गया हैं; को छोड़कर देश के अन्य न्यायालयों में उपलब्ध सुरक्षा व्यवस्था &#8211; एक शोध का विषय है, आप माने अथवा नहीं। </p>
<p>विगत दिनों रामप्रसाद बिस्मिल, अस्फाकुल्लाह खान, रोशन सिंह, प्रेम कृष्णा खन्ना, बनवारी लाल, हरगोविंद, इंद्रभूषण, जगदीश, बनारसी इत्यादि जैसे क्रांतिकारियों, जिन्होंने मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए कुछ भी कर गुजरने को सज्ज थे, किये; उनके ही शहर <strong>शाहजहांपुर</strong> में एक 57-वर्षीय अधिवक्ता को &#8216;भूमि विवाद&#8217; में अदालत के प्रांगण में ढ़िशूम-ढ़िशूम कर दिया गया। अधिवक्ता मृत्यु को प्राप्त किये। </p>
<p>मोहनदास करमचंद गाँधी के <strong>चम्पारण</strong> में, जहाँ से गाँधी भारत की आज़ादी और अंग्रेजी अफसरानों के अत्याचार के खिलाफ अपना आंदोलन प्रारम्भ किये थे, कुछ अपराधी किस्म के लोग अदालत परिसर में ही एक कर्मचारी को ठांय-ठांय कर मृत्यु को प्राप्त करा दिए। </p>
<p>इसी तरह पंजाब के <strong>सोलान</strong> के एक अदालत में एक कैदी को, जब उसे एक मुकदमें की सुनवाई के लिए अदालत में पेश किया जा रहा था, ढ़िशूम-ढ़िशूम कर दिया और वह वहीँ अंतिम सांस लिया। आपको याद भी होगा कि विगत दिनों दिल्ली के रोहिणी अदालत में दो दिल्ली पुलिसकर्मी सहित एक अधिवक्ता पर बेतहाशा गोलियों की बारिश की गयी। तीन व्यक्ति वहीँ मृत्यु को प्राप्त किये। तीन महिला विधवा हो गई। तीनों के बच्चे अनाथ हो गए। जब घटना घटी, सम्मानित न्यायमूर्ति अदालत में उपस्थित थे। </p>
<p>अगर आप दिल्ली में रहते हैं तो किसी भी दिन आप एक या तो अपनी गाड़ी अथवा तीन-पहिया पर बैठकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ दिल्ली उच्च न्यायालय और दिल्ली के सभी सात जिला न्यायालयों &#8211; तीस हज़ारी, पटियाला हॉउस, करकरडूमा कोर्ट, रोहिणी कोर्ट, द्वारका कोर्ट, साकेत कोर्ट और राउज एवेन्यू कोर्ट का चक्कर लगाएं। आज दिल्ली स्थित अदालतों में चतुर्दिक दिल्ली पुलिस के सुरक्षा कर्मियों के साथ-साथ गृह मंत्रालय के अधीनस्थ वाली संस्थाओं के सुरक्ष कर्मी दीखते हैं। क्या ऐसी ही सुरक्षा व्यवस्था देश के अन्य जिला अदालतों में है? </p>
<figure id="attachment_5778" aria-describedby="caption-attachment-5778" style="width: 1709px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/DSC_9421-2-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/DSC_9421-2-scaled.jpg" alt="" width="1709" height="2560" class="size-full wp-image-5778" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/DSC_9421-2-scaled.jpg 1709w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/DSC_9421-2-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/DSC_9421-2-683x1024.jpg 683w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/DSC_9421-2-768x1151.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/DSC_9421-2-1025x1536.jpg 1025w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/09/DSC_9421-2-1367x2048.jpg 1367w" sizes="auto, (max-width: 1709px) 100vw, 1709px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5778" class="wp-caption-text">नई दिल्ली स्थित भारत के सर्वोच्च न्यायालय परिसर में एक बुजुर्ग वृक्ष का हश्र<br /></figcaption></figure>
<p><strong>एक और भी महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि अगर देश का न्यायिक व्यवस्था स्वयं सुरक्षा-कवच में है तो फिर देश के लोगों के साथ-साथ उन चार करोड़ सात लाख मुकदमों के &#8216;वादियों-प्रतिवादियों&#8217; का क्या होगा जिनके मुकदमें मुद्दत से न्यायालयों में &#8216;लाल वस्त्रों&#8217; में बंधे हैं &#8216;न्याय&#8217; की प्रतीक्षा में ? वैसे, दिल्ली के रोहिणी अदालत की घटना के बाद भारत के सर्वोच्च न्यायालय में, दिल्ली उच्च न्यायालय में एक आवेदन दायर किया गया और न्यायालय से यह गुजारिश किया गया कि न्यायालयों में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था हो। उचित है।</strong> </p>
<p>भारत सरकार के एक आंकड़े के अनुसार भारत के विभिन्न अदालतों में &#8211; सर्वोच्च न्यायालय से जिला न्यायालयों तक &#8211; कुल चार करोड़ सात लाख मुकदमें लाल रंग के वस्त्रों में बंधे हैं। इसमें तक़रीबन 87.4 फीसदी सबॉर्डिनेट कोर्ट्स में लंबित हैं। करीब 12.4 फीसदी उच्च न्यायालयों में लंबित हैं। इसी तरह कुल 71,411 मुकदमें देश के सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं। सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मुकदमों में कुल 56,365 सीविल मुकदमें हैं और 15,076 आपराधिक मुकदमें लंबित हैं। इतना ही नहीं, करीब 10,491 लंबित मुकदमें &#8216;डिस्पोजल&#8217; के लिए दशकों के पड़े हैं। </p>
<p>इसी तरह देश के सभी 25 उच्च न्यायालयों में कुल 59,55,907 मुकदमें, जिसमें 42,99,954 सिविल मुकदमे हैं और 16,55,953 आपराधिक मुकदमे हैं। कई मुकदमे ऐसे हैं जिसमें &#8220;आदेश&#8221; नहीं लिखा गया है और &#8220;लंबित&#8221; हैं। </p>
<p>न्यायिक व्यवस्था से जब भी आवाज उठती है सरकार अपना पल्लू झाड़ने की कोशिश करती है। अगर न्यायिक व्यवस्था यह कहती है कि अन्य कई कारणों के अलावे न्यायमूर्तियों की कमी के कारण अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ रही है, सरकार तुरंत कहती है: &#8220;मैंने सर्वोच्च न्यायालय में 46 न्यायमूर्तियों को नियुक्त किये, उच्च न्यायालयों में 769 न्यायधीशों की नियुक्ति किये और 619 अतिरिक्त न्यायमूर्तियों को पदोन्नति दिए, उच्च न्यायालयों में न्यायधीशों की सख्या बढ़ा दिए हैं, नीचली अदालतों में भी न्यायधीशों की संख्या 24,613 कर दिए, सेंट्रली स्पॉन्सर्ड स्कीमों के निष्पादन के लिए अब तक 9013. 21 करोड़ रुपये आवंटित किये &#8230; इत्यादि-इत्यादि।&#8221; </p>
<p>लेकिन कभी किसी भी न्यायालयों से सम्बंधित कार्यकारिणी के सम्मानित लोग, निजी तौर पर देश की न्यायिक व्यवस्था को किस कदर वादी-प्रतिवादी के बीच &#8216;फ्रेंडली&#8217; बनाया जाय, अपने-अपने कक्षों से बाहर निकलकर देश के न्यायालयों में आये, शायद नहीं। </p>
<p><strong>वैसी स्थिति में आखिर सम्मानित न्यायमूर्ति, सम्मानित न्यायाधीश, सम्मानित अधिवक्तागण क्या कर सकते हैं ? </strong></p>
<p>दिल्ली में तो सिर्फ 9 अदालत है, शेष दिल्ली के बाहर है और यह पक्का है कि जिस कदर की सुरक्षा कवच दिल्ली के न्यायालयों में हैं, वैसी व्यवस्था देश के किसी भी उच्च न्यायालय अथवा जिला न्यायालयों के सम्मानित न्यायाधीशों को, सम्मानित न्यायमूर्तियों को, सम्मानित अधिवक्ताओं को नहीं मिली होगी। वादी-प्रतिवादी और उनके अधिवक्ताओं की बात तो सोच भी नही सकते।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b2/on-an-average-a-court-in-india-is-responsible-for-providing-justice-to-199404-76-people">सुनती हो !!! भारत में औसतन 1,99,404.76 लोगों को &#8216;न्याय&#8217; दिलाने का जिम्मा एक अदालत पर है 😢और तुम हो कि &#8216;रुसल&#8217; हो !!!</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8216;अपवाद छोड़कर&#8217; बिहार के राजाओं की &#8216;गरिमा&#8217; अगली पीढ़ियां &#8216;बरकरार&#8217; नहीं रख सकीं ✍ वैसे समाज में शिक्षा का प्रचुर विकास हुआ, दुःखद 😢 (भाग-3)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/barring-exceptions-the-nest-generations-could-not-maintain</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 09 Oct 2022 06:21:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[banaily]]></category>
		<category><![CDATA[cases]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[judiciary]]></category>
		<category><![CDATA[property]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पूर्णिया / कटिहार : क्या दरभंगा, क्या मधुबनी, क्या डुमरांव, क्या गिद्धौर, क्या रामगढ़, क्या कुर्सेला, क्या बेतिया, क्या टेकारी, क्या जोगनी, क्या शिवहर &#8230;  बिहार ही नहीं, देश के सभी राज्यों में जिस जद्दोजेहद, मसक्कत, सेवा, त्याग, समर्पण के साथ तत्कालीन जमींदारों ने, राजाओं ने अपने-अपने घरानों को मजबूत बनाए, प्रजाओं के हितार्थ सामाजिक [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/barring-exceptions-the-nest-generations-could-not-maintain">&#8216;अपवाद छोड़कर&#8217; बिहार के राजाओं की &#8216;गरिमा&#8217; अगली पीढ़ियां &#8216;बरकरार&#8217; नहीं रख सकीं ✍ वैसे समाज में शिक्षा का प्रचुर विकास हुआ, दुःखद 😢 (भाग-3)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पूर्णिया / कटिहार : क्या दरभंगा, क्या मधुबनी, क्या डुमरांव, क्या गिद्धौर, क्या रामगढ़, क्या कुर्सेला, क्या बेतिया, क्या टेकारी, क्या जोगनी, क्या शिवहर &#8230;  बिहार ही नहीं, देश के सभी राज्यों में जिस जद्दोजेहद, मसक्कत, सेवा, त्याग, समर्पण के साथ तत्कालीन जमींदारों ने, राजाओं ने अपने-अपने घरानों को मजबूत बनाए, प्रजाओं के हितार्थ सामाजिक कल्याण का कार्य कर अपना नाम, शोहरत, धन, सम्पदा एकत्रित किये; उनके देहावसान के बाद (अपवाद छोड़कर) शायद ही कोई घराने के वंशज या घराना ऐसा बचा है, जो संपत्ति के बंटवारे को लेकर प्रदेश के उच्च न्यायालयों के रास्ते जिला न्यायालयों से देश के सर्वोच्च न्यायालय तक अपनी-अपनी अर्जियां नहीं जमा किये होंगे, परन्तु उनकी गरिमाओं को नहीं बरक़रार रख सके । इतिहास इस बात का साक्षी है कि &#8216;राजघराने में संपत्ति के लिए न्यायालयों में मुकदमा दर्ज करना &#8216;खास&#8217; नहीं, &#8216;आम&#8217; बात हो गयी है। </strong></p>
<p>शायद बहुत काम लोग इस बात से भिज्ञ होंगे कि देश में संविधान लागू होने के पूर्व ही &#8216;जमींदारी एबॉलिशन बिल्स&#8217; अपना कार्य करना प्रारम्भ कर दिया था। वैसे इसे स्वतंत्र भारत में महत्वपूर्ण &#8216;कृषि सुधार&#8217; शब्दों से अलंकृत किया गया, और तत्कालीन संघीय प्रोविंसों मसलन: सेन्ट्रल प्रोविंस, युनाइटेड प्रोविंस, बिहार, असम, मद्रास और बम्बई में जमींदारी एबॉलिशन कमिटी के आदेशानुसार लागू कर दिया गया था। यह अलग बात है कि स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई में उन जमींदारों ने तत्कालीन राजनेताओं को, क्रांतिकारियों को सभी तरह से मदद का हाथ बढ़ाये थे। </p>
<p>इस नियम और कानून के बारे में विश्लेषण तो ज्ञानी-महात्मा करेंगे, लेकिन आज़ादी के चार साल बाद यानी सन 1951 में भारत का संविधान लागु होने के 15 दिनों के अंदर पहला संशोधन और फिर 1955 में दूसरा संशोधन कानून पारित किया गया। फिर सन 1956 में &#8216;जमींदारी एबॉलिशन एक्ट&#8217; पारित हुआ। लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकत है कि इस कानून के लागु होने के बाद तत्कालीन जमींदारों, राजाओं को जो &#8216;नुकसान की भरपाई&#8217; की गई वह &#8216;कम&#8217; ही नहीं &#8216;बहुत कम&#8217; था। खैर। </p>
<p><strong>आज़ाद भारत में जमींदारी प्रथा समाप्त होने के बाद, खासकर जमींदारों / राजाओं की प्रथम पीढ़ी अथवा आधिकारिक रूप से उनके उत्तराधिकारियों की मृत्यु के बाद उनकी सम्पत्तियों का (अपवाद छोड़कर) जो हश्र हुआ अथवा हो रहा है, वह सम्बद्ध क्षेत्र के लोग चश्मदीद गवाह रहे हैं, हैं। बिहार ही नहीं, देश के सभी राज्यों में, जमींदारी कानून के तहत जमींदारों / राजाओं / महाराजाओं की सम्पतियों पर आधिपत्य समाप्त हुआ (कानून के तहत छोड़े गए हिस्सों को छोड़कर); लेकिन समयांतराल उनके उत्तराधिकारियों, सम्बन्धियों, दूर-दराज के लोगों, राजनेताओं, दवंगों के द्वारा जिस कदर उनकी सम्पत्तियों को नेश्तोनाबूद किया गया, उनकी गरिमाओं को मिट्टी-पलीद किया, भारत का न्यायालय गवाह है।</strong> </p>
<p>आज आज़ादी के 75-वर्ष बाद (अपवाद छोड़कर) प्रदेश के जमींदारों के आज की पीढ़ियों को देखकर, उनकी सम्पत्तियों को देखकर, उनकी कीर्तियों को नेश्तोनाबूद होते देखकर मन और आत्मा अश्रुपूरित हो जाता है। कल जिन चौखटों पर समाज के लोगों के कल्याणार्थ राजा, महाराजाओं, जमींदारों की मानवता और मानवीयता चौबीसो-घंटे तत्पर रहता था, आज वह चौखट कराह (अपवाद छोड़कर) रहा है। संपत्ति के बंटबारे को लेकर देश के न्यायालयों में लाल वस्त्र में बंधे लाखों-लाख दस्तावेज बिलख रहे हैं। </p>
<p>इस बात से सभी अवगत है कि राजघराने में संपत्ति के लिए जिला न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय तक मुकदमा दायर करना &#8216;खास&#8217; नहीं, &#8216;आम&#8217; बात है। वजह यह है कि संपत्ति एक निर्जीव वस्तु होने के बावजूद, स्वयं इतना सामर्थ्यवान होता है कि पृथ्वी के सभी &#8216;सजीवों&#8217; को, विशेषकर मनुष्य जाति की प्रजाति को अपनी ओर बिना किसी रंग, जाति, धर्म का भेद-भाव के अपनी ओर आकर्षित करने की बेशुमार कूबत रखता है। यह बात भारत के संभ्रांत और धनाढ्य अधिक समझेंगे। </p>
<p>भारत में, खासकर मिथिला क्षेत्र में, शायद ही कोई महामानव होंगे, महिला होंगी जो अपने पूर्वजों के देहावसान के बाद उनकी संपत्ति में अपने हिस्से की बात नहीं किये हों। आम तौर पर मिथिला के समाज में परिवार के मुखिया के देहावसान के बाद संपत्ति का बंटवारा जिस द्रुत गति से होता है, शायद संपत्ति बनाने में परिवार के मुखिया को अपना जीवन निकाल देना होता है और इस वेदना तथा संवेदना को &#8216;मुफ्त में मिलने वाली संपत्ति के मालिक भी नहीं समझते हैं । शब्द बहुत कटु है, लेकिन सत्य यही है।  </p>
<p><strong>इतना ही नहीं, संपत्ति के लिए पुत्र को पिता के खिलाफ, भाई को भाई के खिलाफ, बहन को भाई के खिलाफ, माँ-दादी को बेटे-पोते के खिलाफ, बेटे-पोते को माँ-दादी के खिलाफ, भतीजे हो चाचा के खिलाफ जाने में मिनट की देरी नहीं होती। अगर ऐसा नहीं होता तो आज देश के न्यायालयों में तक़रीबन 10848584 दीवानी मुकदमें, जिसमें अधिकांश भूमि/संपत्ति विवाद से सम्बंधित है, लंबित नहीं होता। वैसे मिथिला राज्य के प्रस्तावित जिलाओं के न्यायालयों को देखें, तो भूमि और संपत्ति से सम्बंधित विवाद लाखों में मिलेंगे। इसका जीवंत दृष्टान्त है दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह की मृत्यु के बाद दरभंगा राज का, राज की संपत्ति का &#8216;विनाशकारी हश्र&#8217; है । वैसे संपत्ति के बंटवारे के मामले में &#8216;न्यायालयों का शरण लेना&#8217; &#8216;अपने-अपने सम्बन्धियों पर मुकदमा करना&#8217; मिथिला के मिथिलेश के परिवारों के सदस्यों का जवाब नहीं। खैर।</strong>  </p>
<figure id="attachment_4546" aria-describedby="caption-attachment-4546" style="width: 1194px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Lilanand-singh.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Lilanand-singh.jpeg" alt="" width="1194" height="1600" class="size-full wp-image-4546" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Lilanand-singh.jpeg 1194w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Lilanand-singh-224x300.jpeg 224w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Lilanand-singh-764x1024.jpeg 764w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Lilanand-singh-768x1029.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Lilanand-singh-1146x1536.jpeg 1146w" sizes="auto, (max-width: 1194px) 100vw, 1194px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4546" class="wp-caption-text">राजाबहादुर लीलानंद सिंह (1816-1883)</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, बनैली राज के गिरिजानंद सिंह, जो अपने पूर्वजों के धरोहर, उनकी कीर्तियों को, जनहित में उनके द्वारा सम्पादित कार्यों को सुरक्षित और संरक्षित रखने के साथ-साथ भरसक आगे बढ़ाने का अनवरत कोशिश कर रहे है, <strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> से कहते है कि &#8220;बनैली राज में राजा लीलानंद सिंह की मृत्यु के कुछ वर्ष बाद ही उनकी पत्नी रानी सीतावती देवी ने 1888 ई में अपने नाबालिग बेटों की तरफ से पद्मानन्द सिंह के विरुद्ध बंटबारे का मामला दायर किया। पद्मावती ने रानी सीतावती को इस्टेट में हिस्सा देने से साफ़ इंकार कर दिया था, परन्तु बाद में अपनी पत्नी पद्मावती के दवाब में आकर संधि के लिए राजी हो गए। कुँवर कलानंद और कुँवर कीर्त्यानंद को राज बनैली में 9 आना का हिस्सा मिला और पद्मानंद 7 आना लेकर अलग हो गए।&#8221; </p>
<p>गिरिजानंद सिंह के अनुसार, &#8220;राजा पद्मानंद सिंह पिता की भांति दान शील तो थे ही, भगवान शिव के अनन्य भक्त भी थे। देवघर के बैद्यनाथ मंदिर के सिंह द्वार का निर्माण राजा पद्मानंद सिंह ने कराया था। सन 1902 ई. में पांच बीघा जमीन और प्रचुर धन देकर उन्होंने पूर्णिया में &#8216;विक्टोरिया मेमोरियल टाउन हॉल&#8217; का निर्माण भी करवाया। उनके बड़े बेटे कुँवर चन्द्रानन्द सिंह मानसिक रूप से अविकसित थे और यही कारण था कि एक योग्य वारिस के आभाव में पद्मानंद भौतिक मूल्यों के प्रति अति असावधान हो गए और अत्यधिक खर्च करते हुए गले तक कर्ज में धंस गए।&#8221;  </p>
<p>सन 1908 ई में कुँवर चन्द्रानन्द सिंह की मृत्यु के बाद उनकी विधवा रानी चन्द्रावती देवी, 7 आना इस्टेट की मालकिन बनी। बाद में, रानी चन्द्रावती ने 3 आना हिस्सा अपने दायाद कीर्त्यानंद, रमानन्द और कृष्णानंद के हाथों बेचकर अपने ससुर द्वारा लिए गए कर्जों की चुकती कीं । रानी चन्द्रावती की मृत्यु के बाद 4 आना इस्टेट में से डेढ़ आना राजा कीर्त्यानंद को, और ढ़ाई आना उनकी ननद राजकुमारी मोती दाईजी के बेटों को मिला।&#8221; </p>
<p>गिरिजानन्द सिन्हा आगे कहते हैं कि &#8220;राजा पद्मानन्द सिंह के दूसरे पुत्र कुमार सूर्यानंद सिंह बड़े होनहार और ओजस्वी थे। परन्तु दुर्भाग्यवश वे किशोरावस्था में ही चल बसे और राजकुमारी मोती दाई के वंशज बनैली राज की रामनगर शाखा के रूप में जाने गए।&#8221; सिन्हा साहब के अनुसार, &#8220;राजा पद्मानंद की पत्नी पद्मावती देवी द्वारा 1912 ई. में और उनकी पुत्रवधू रानी चंद्रावती देवी द्वारा 1924 ई. में बनारस में तारा मंदिर ट्रस्ट और श्यामा मंदिर ट्रस्ट की स्थापना की गई। श्यामा मंदिर ट्रस्ट के अंतर्गत 1927 में &#8216;आदर्श रानी चंद्रावती श्यामा महाविद्यालय&#8217; खोला गया जिसे आज भी बनारस के संस्कृत शिक्षा संस्थानों में अग्रणी माना जाता है।&#8221;</p>
<figure id="attachment_4547" aria-describedby="caption-attachment-4547" style="width: 953px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Padmanand-singh.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Padmanand-singh.jpeg" alt="" width="953" height="1600" class="size-full wp-image-4547" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Padmanand-singh.jpeg 953w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Padmanand-singh-179x300.jpeg 179w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Padmanand-singh-610x1024.jpeg 610w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Padmanand-singh-768x1289.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/Raja-bahadur-Padmanand-singh-915x1536.jpeg 915w" sizes="auto, (max-width: 953px) 100vw, 953px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4547" class="wp-caption-text">राजाबहादुर पद्मानन्द सिंह (मृत्यु: 1912)</figcaption></figure>
<p>गिरिजानन्द सिन्हा के अनुसार, &#8220;राजा लीलानंद सिंह के दूसरे पुत्र राजा कलानंद सिंह बहादुर का जन्म 1880 ई. में हुआ। जन्म के 30 वें वर्ष के जनवरी माह में, यानी 1910 में ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें &#8216;राजा&#8217; की उपाधि मिली। राजा लीलानंद सिंह के तीसरे पुत्र, राजा बहादुर कीर्त्यानंद सिंह का जन्म 1883 (23 सितम्बर) को हुआ और ब्रिटिश सरकार ने इन्हे 1914 में &#8216;राजा&#8217; और पुनः 1919 में &#8216;राजा बहादुर&#8217; की पदवी से सम्मानित किया। कलानंद और कीर्त्यानंद में बड़ी मैत्री थी। रानी पद्मावती देवी की मदद से इन दोनों ने राजा पद्मानन्द के हिस्से के 7 आने को ठीका प्रबंध पर ले लिया और यह व्यवस्था 1936 तक चलती रही। सन 1919 तक दोनों भाई साथ-साथ ड्योढ़ी बनैली चंपानगर में रहे और वह काल राज बनैली का स्वर्णिम काल रहा।&#8221;</p>
<p>राजा कलानंद सिंह के पुत्र कुमार रामानंद सिंह अपने पिता के सम्मान और स्मृति में गढ़बनैली में एक अंग्रेजी माध्यम उच्च विद्यालय की स्थापना किये और उसका नाम &#8220;कलानंद उच्च विद्यालय&#8217; रखा। इसी तरह, पूर्णियां बालिका उच्च विद्यालय को उन्होंने तीन बिधा जमीन और प्रचुर धन देकर जिले में स्त्री शिक्षा के प्रति अपना कर्तब्य निभाया। इतना ही नहीं, गढ़बनैली में अपना निजी अतिथि भवन देकर &#8216;रामानंद मध्य विद्यालय&#8217; खुलवाया। जलालाबाद (मुंगेर) में स्थित &#8216;रामानंद हाई स्कूल&#8217; भी उन्हीं की देन है। पूर्णिया में चिकित्सा सुविधा में विकास लाने की दिशा में कुमार रामानंद सिंह द्वारा की गई सेवा को भुलाया नहीं जा सकता। एक लाख रुपयों का दान देकर अस्पताल परिसर में उन्होंने एक भवन बनवाया जिसे आज भी &#8216;रामानंद ब्लॉक&#8217; के नाम से जाना जाता है। साथ ही, अस्पताल के विकास के लोइये आर्थिक सहायता की गई। उन्होंने गढ़बनैली में &#8216;कलावती दातव्य औधालय&#8217; की स्थापना की जो उनकी माता की स्मृति में है। </p>
<p>कुमार रमानन्द सिंह के छोटे भाई कुमार कृष्णानंद सिंह बड़े सुदर्शन व्यक्तित्व के मालिक थे और प्रजाजनों के बीच उनका बड़ा ही सम्मान था।बाद  में  वे सुलतानगंज जा बसे। गढ़बनैली के महल और उद्यान अपने सौंदर्य, भव्यता और स्थापत्य कला के लिए मशहूर थे। &#8216;नबका पक्का&#8217; नामक महल रामानंद सिंह की कलात्मक रुचियों का प्रमाण है। सन 1936 ई इस महल का निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ परन्तु उनकी असामयिक मृत्यु के कारण वह आज भी अधूरा ही रहा । वैसे तो समुच गढ़बनैली ही एक सुन्दर, सुनियोजित नक़्शे के अनुसार बना था, परन्तु &#8216;सिंह दरवाजे&#8217; के सामने एक सौ बीघे में फैला हुआ उद्यान और सफ़ेद सीमेंट से बनाया गया नक्काशीदार नाट्यशाला अपनी सुंदरता के लिए प्रख्यात था। कला भवन नाम से प्रसिद्द वहां के राजप्रासाद को जिले का  सर्वाधिक विशाल भवन होने का गौरव प्राप्त था। परन्तु दुर्भाग्यवश रामानंद के वंशज उसे संभल नहीं सके। फिर भी ड्योढ़ी के कुछ बचे हुए अंश आज भी दर्शनीय हैं। </p>
<figure id="attachment_4548" aria-describedby="caption-attachment-4548" style="width: 1226px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/G1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/G1.jpg" alt="" width="1226" height="1192" class="size-full wp-image-4548" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/G1.jpg 1226w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/G1-300x292.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/G1-1024x996.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/G1-768x747.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/G1-24x24.jpg 24w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/10/G1-48x48.jpg 48w" sizes="auto, (max-width: 1226px) 100vw, 1226px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4548" class="wp-caption-text">गिरिजानंद सिन्हा</figcaption></figure>
<p>गिरिजानंद सिन्हा आगे कहते हैं कि &#8220;राजा कृत्यानंद सिंह के बड़े पुत्र कुमार श्यामनन्द सिंह के समय में बनैली का नाम शास्त्रीय संगीत के संरक्षक और प्रचारक के रूप में उभरा और 1938 से 1965 तक चम्पानगर ड्योढ़ी में भारतीय शास्त्रीय संगीत का भव्य आयोजन होता रहा। इस कालखंड में भारत के लगभग सभी महान कलाकारों ने यहाँ अपनी प्रस्तुति की। इन संगीत सम्मेलनों के फलस्वरूप ही पूर्णियां की जनता शास्त्रीय संगीत के प्रति अधिक जागरूक होती गई और पूर्णियां की संस्कृति के साथ संगीत का नाम सदा के लिए जुड़ गया। कुमार श्यामानन्द सिंह स्वयं भी एक उच्च कोटि के संगीतज्ञ थे और ख्याल तथा बंदिश गाने में उन्हें महारत हासिल थी। कलकत्ता के पंडित भीष्मदेव चटर्जी, आगरा के उस्ताद बाचू खाँ, दिल्ली के उस्ताद मुज़फ़्फ़र खाँ, इलाहाबाद के पंडित भोलानाथ भट्ट सरीखे संगीत के दिगज्जों से कुमार श्यामानंद सिंह ने प्रशिक्षण लिया था। </p>
<p>चंपानगर-पूर्णिया में लोग आज भी इस बात को भूले नहीं हैं की कुमार श्यामानंद सिंह एक उच्च कोटि के खिलाड़ी भी थे। फुलबॉल के क्षेत्र में जिला स्तर पर और बिलियर्ड्स के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें ख्याति प्राप्त थी। बनैली की चंपानगर शाखा की तरफ से उन्होंने जिला खेलकूद संघ को अपना निजी मैदान देकर पूर्णिया खेलकूद जगत को एक अमूल्य उपहार दिया। अखिल भारतीय संगीत नाटक अकादमी में उन्होंने बिहार का प्रतिनिधित्व भी किया और 1948 ई. में प्रयाग संगीत समिति द्वारा आयोजित अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन में दीक्षांत भाषण भी दिया था। सन 1966 के बाद वे पूर्णिया के निकटवर्ती क्षेत्र में भक्ति संगीत के प्रचार-प्रसार के प्रति समर्पित रहे। सन 1994 ई. में वे महादेव के पास कूच कर गए। </p>
<p>यह कहने में तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं है कि बनैली चंपानगर की ड्योढ़ी और महल आदि पुराने भवन स्थापत्य कला की दृष्टि से दर्शनीय तो है ही, तत्कालीन जमींदार-राजाओं के आवासीय संरचना के मॉडल के रूप में भी विद्यमान है। सन 1869-70 ई. में रानी चण्डेश्वरी देवी द्वारा स्थापित देवघरा और 1897 ई. में रानी सीतावती देवी द्वारा निर्मित सीतेश्वर महादेव और राधा-कृष्ण मंदिर यहाँ के मुख्य आकर्षण हैं। </p>
<p><strong>क्रमशः </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/barring-exceptions-the-nest-generations-could-not-maintain">&#8216;अपवाद छोड़कर&#8217; बिहार के राजाओं की &#8216;गरिमा&#8217; अगली पीढ़ियां &#8216;बरकरार&#8217; नहीं रख सकीं ✍ वैसे समाज में शिक्षा का प्रचुर विकास हुआ, दुःखद 😢 (भाग-3)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>Kiren Rijiju : Parliament is changing law but the interpretation will be done by the courts: Result: Over 11.4 lakh cases pending in family courts</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/law/kiren-rijiju-parliament-is-changing-law-but-the-interpretation-will-be-done-by-the-courts-result-over-11-4-lakh-cases-pending-in-family-courts</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 27 Jul 2022 06:20:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कानून]]></category>
		<category><![CDATA[cases]]></category>
		<category><![CDATA[family courts]]></category>
		<category><![CDATA[judgment]]></category>
		<category><![CDATA[judiciary]]></category>
		<category><![CDATA[Kiran Rijiju]]></category>
		<category><![CDATA[law]]></category>
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		<category><![CDATA[parliament]]></category>
		<category><![CDATA[pendency]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>NEW DELHI: According to Legal Service of India, the Family Courts’ main purpose is to assist the smooth and effective disposal of cases relating to family matters. However, like any other system there are certain issues which become a matter of concern when it comes to the working of these courts. Lok Sabha MPs on [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>NEW DELHI:  According to Legal Service of India, the Family Courts’ main purpose is to assist the smooth and effective disposal of cases relating to family matters. However, like any other system there are certain issues which become a matter of concern when it comes to the working of these courts. </p>
<p>Lok Sabha MPs on Tuesday flagged that over 11.4 lakh cases are pending in family courts across the country and called for their speedy settlement. The issue came up during a debate in the Lok Sabha on the Family Courts (Amendment) Bill, 2022, which was moved for consideration by Law Minister Kiren Rijiju.</strong></p>
<p>Participating in the discussion, Kaushalendra Kumar of the Janata Dal (United) said the number of pending cases in family courts is increasing and stands at over 11.4 lakh. He called for a speedy settlement of the cases. Bhartruhari Mahtab of the Biju Janata Dal also echoed his views and said the government should say what it is doing to settle the pending cases in the family courts.</p>
<p>Setting up of Family Courts and its functioning lies within the domain of State Government in consultation with their respective High Courts. The Family Courts Act, 1984 provides for the establishment of Family Courts by the State Governments in consultation with the High Courts to promote conciliation and secure speedy settlement of disputes relating to marriage and family affairs. The Family Courts Act, 1984 was part of the trends of legal reforms concerning women. Because of the building pressure from various institutions lobbying for the welfare of women all over the country, the Act was expected to facilitate satisfactory resolution of disputes concerning the family through a forum expected to work expeditiously in a just manner and with an approach ensuring maximum welfare of society and dignity of women. </p>
<p>As per the Act, it is mandatory for the State Government to set up a Family Court for every city or a town whose population exceeds one million. In other areas of the States, the Family Courts may be set up if the State Governments deems it necessary. The 14th Finance Commission had recommended setting up 235 Family Courts during 2015-2020 in districts where the same were not available. The Commission also urged State Governments to utilize enhanced fiscal space available through tax devolution (32% to 42%) for this purpose. </p>
<figure id="attachment_4233" aria-describedby="caption-attachment-4233" style="width: 1280px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/07/kkkkk.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/07/kkkkk.jpeg" alt="" width="1280" height="720" class="size-full wp-image-4233" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/07/kkkkk.jpeg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/07/kkkkk-300x169.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/07/kkkkk-1024x576.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2022/07/kkkkk-768x432.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a><figcaption id="caption-attachment-4233" class="wp-caption-text">Law Minister Kiren Rijiju in Parliament</figcaption></figure>
<p>Law Minister Kiren Rijiju said that &#8220;there are 715 family courts in the country in 26 states and Union territories&#8230;. Parliament is supreme in changing law and giving it effect but the interpretation will be done by the courts. Which court will decide that the application would be retrospective should also be laid down,&#8221; he said. When such courts are being opened, is it not the duty of the Centre to find out whether a notification has been done, Mahtab asked.</p>
<p>Initiating the discussion, Sunita Duggal of the Bharatiya Janata Party (BJP) said more appointments should be made in family courts so that the cases are resolved expeditiously. </p>
<p>The Family Courts Act was enacted in 1984 to set up family courts to promote conciliation and secure a speedy settlement of disputes related to marriage and family affairs. There are 715 family courts functioning across 26 states and Union territories. Two family courts were established in Nagaland in 2008 and three in Himachal Pradesh in 2019 through notifications issued by the respective state governments. The issue of lack of jurisdiction of the family courts in Himachal Pradesh came to the fore during proceedings of the Himachal Pradesh High Court last year.</p>
<p>Another petition in the Himachal Pradesh High Court stated that the central government had not issued any notification extending the Family Court Act to Himachal Pradesh and the state government directives to establish such courts were without any legal authority. The family courts in Nagaland too were operating without any legal authority since 2008.</p>
<p>The Family Courts (Amendment) Bill seeks to insert a provision in sub-section 3 of section 1 to provide for the establishment of family courts in Himachal Pradesh with effect from February 15, 2019 and in Nagaland with effect from September 12, 2008. The Bill also seeks to insert a new section 3A to retrospectively validate all actions under the said Act taken by the governments of Himachal Pradesh and Nagaland and the family courts of those states. Setting up family courts and their functioning fall within the domain of the state governments in consultation with the respective high courts.</p>
<p>Meanwhile, a major drawback of the Family Courts Act happens to be that it doesn’t explicitly empower Courts to grant injunctions to prevent domestic violence. While there has been progress, viz the enactment of the Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 which now extends to punishing women for acts of violence as well; there are still issues of jurisdiction to be tackled. It must be understood that the Family Courts Act has to be read in totality i.e. in accordance with the provisions in other laws, for example, the Civil Procedure Code on matters of jurisdiction.</p>
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		<title>&#8216;अनीता गेट्स बेल&#8217; यानि भारतीय न्यायिक-व्यवस्था का कच्चा चिठ्ठा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संजय कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Jul 2018 02:28:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[किताब]]></category>
		<category><![CDATA[arun]]></category>
		<category><![CDATA[book]]></category>
		<category><![CDATA[cases]]></category>
		<category><![CDATA[corruption]]></category>
		<category><![CDATA[dates.]]></category>
		<category><![CDATA[judiciary]]></category>
		<category><![CDATA[pending]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अरुण शौरी की किताब, अनीता गेट्स बेल (अनीता को जमानत मिली) ​में ​भारतीय न्याय व्यवस्था का कच्चा चिट्ठा खोला गया है तो इस किताब में दिलचस्पी जगी। जैसा कि अब सार्वजनिक है, अनीता &#8211; अरुण शौरी की बीमार पत्नी हैं और फरीदाबाद की एक अदालत में हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने उनके खिलाफ एक [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>अरुण शौरी की किताब, अनीता गेट्स बेल (अनीता को जमानत मिली) ​में ​भारतीय न्याय व्यवस्था का कच्चा चिट्ठा खोला गया है तो इस किताब में दिलचस्पी जगी। जैसा कि अब सार्वजनिक है, अनीता &#8211; अरुण शौरी की बीमार पत्नी हैं और फरीदाबाद की एक अदालत में हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने उनके खिलाफ एक ऐसे प्लॉट पर अवैध निर्माण करने का मुकदमा किया था जो उनका था ही नहीं और जिसपर उन्होंने कभी कोई निर्माण किया ही नहीं। असल में यह प्लॉट 31 मई 2007 को उनके नाम दर्ज हुआ था जिसे उन्होंने ने 27 मार्च 2008 को बेच दिया था। यह देखे बगैर कि प्लॉट की क्या हालत है उसे “फार्म हाउस” कहा जाता रहा और बाद वाले खरीदार को भी अभियुक्त बना लिया गया।</p>
<p>इस संबंध में 2005 में एक कारण बताओ नोटिस आया था और 15 दिन के अंदर जवाब मांगा गया था। जवाब दिया गया पर आगे कुछ नहीं हुआ। 2007 में फिर चिट्ठी आई। इसका भी जवाब दे दिया गया और 27 मार्च 2008 को उन्होंने यह प्लॉट बेच दिया। इस बीच अरुण शौरी ने हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी को फोन पर सारी जानकारी दी और उनके कहने पर बिक्री से संबंधित सूचना और दस्तावेज जनवरी 2009 में उन्हें भेज दिया। पर इसका कोई फायदा नहीं हुआ और जुलाई 2014 में ऐसा ही एक नोटिस फिर आया। इसका भी जवाब अगले ही दिन दे दिया गया। इस सूचना के साथ कि 2005 से पत्र आ रहे हैं, जवाब दिया जाता रहा है पर लगता है कोई ध्यान नहीं दे रहा है और अब विशेष पर्यावरण अदालत, फरीदाबाद में मामला दर्ज हो गया है।</p>
<p>यह शिकायत 28 अक्तूबर 2009 को दाखिल हुई थी जब अरुण शौरी प्लॉट बेच चुके थे। कोई एक साल पहले। इसके बाद अदालत के समन जारी होते रहे जो उन्हें नहीं मिले और एक ही बार पता चला कि उनके लिए गिरफ्तारी वारंट है। कहने की जरूरत नहीं है कि अरुण शौरी अपने पिता के बनाए घर में वर्षों से रह रहे हैं और उनके पिता भी एक जानी-मानी हस्ती थे और दिल्ली में शौरी नाम ही (हालांकि एक नोटिस में नाम भी गलत लिखा है) उनके घर तक पहुंचने के लिए पर्याप्त है और पता न भी हो तो मामूली पूछताछ से भी पता लगाया जा सकता है कि वे कहां रहते हैं। फिर भी अदालत के समन उन्हें तामील नहीं हुए और एक ही बार वारंट आया।</p>
<figure id="attachment_676" aria-describedby="caption-attachment-676" style="width: 300px" class="wp-caption alignnone"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/07/2-300x224.jpg" alt="" width="300" height="224" class="size-medium wp-image-676" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/07/2-300x224.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/07/2-80x60.jpg 80w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/07/2-265x198.jpg 265w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/07/2-485x360.jpg 485w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/07/2-563x420.jpg 563w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/07/2.jpg 670w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /><figcaption id="caption-attachment-676" class="wp-caption-text">अरुण शौरी</figcaption></figure>
<p>अरुण शौरी ने बताया है कि तमाम प्रयासों को बावजूद उन्हें अपनी बीमार पत्नी को लेकर अदालत जाना पड़ा। हालांकि, बाद में उन्हें कुछ लोग मिले जिन्होंने कहा कि वे उनकी सहायता कर सकते थे पर अरुण शौरी ने लिखा है कि उस समय कैसे पता चलता कि कहां कौन मेरी मदद कर सकता है। मैं तो उसी अदालत में गया जहां मामला था औऱ जो लोग सहायता कर सकते थे किया भी। पर कई तारीखों के बाद जमानत मिल पाई औऱ इस तरह अनीता उनके परिवार की पहली सदस्य बनी जो जमानत पर हैं। जिन्होंने जो समन कभी आए ही नहीं उन्हें प्राप्त नहीं किया। और ये समय उस घर के लिए थे जो हमने बनाए ही नहीं और उस प्लॉट पर बने घर के लिए थे जो हमारा है ही नहीं। इस पर मुझे याद आया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कांग्रेस पार्टी के बारे में कहते हैं कि यह उन लोगों की पार्टी है जो बेल (जमानत) पर हैं।</p>
<p>पुस्तक में कई अन्य प्रमुख मामलों की चर्चा है। इसमें मोर के आंसू से बच्चा होने का ज्ञान देने वाले जज साब से लेकर जजों के अंग्रेजी ज्ञान और एक जज साहिबा के 15 लाख रुपए मिलते नाम वाले किसी दूसरे जज साब के पास पहुंच जाने, जजों के भ्रष्टाचार और उसपर कार्रवाई के मामले, जयललिता के पास आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में उनकी संपत्ति की गणना के फार्मूले से लेकर पूरे मामले की चर्चा जस्टिस डन, अनडन, रीडन (न्याय किया गया, पलटा और फिर किया गया) के नाम से एक अध्याय में की गई है। इसमें मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त जैसे हिन्दी के मुहावरे की चर्चा तो है ही एक अध्याय, “बने हैं अहले हवस मुद्दई भी मुंसिफ भी … ” है। यह सातवां अध्याय है इसमें अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री खलिको पुल की आत्महत्या और 60 पेज का हाथ का लिखा सुसाइड नोट, उसपर अदालती कार्रवाई, शोहराबुद्दीन की मुठभेड़ में हत्या, अमित शाह और जज लोया की हत्या से इसके संबंध आदि का भी उल्लेख है। और इसमें, “कैदी का दिल बहलाने को दरबान बदलते जाते हैं &#8230;. ” का भी जिक्र है।</p>
<p>पुस्तक में निचली अदालतों के हाल से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में मामलों पर क्या और कैसे कार्रवाई होती है का दिलचस्प चित्रण है। मीडिया के लिए पहले ही अध्याय में सलाह है कि सुप्रीम कोर्ट में जिन बड़े मामलों की चर्चा होती है उनकी जगह महीने में एक दिन किसी भी अदालत में रिपोर्ट भेजकर वहां उस दिन क्या सब हुआ कि रिपोर्ट करनी चाहिए ताकि पाठकों को देश में न्याय की दशा की सही तस्वीर मिल सकेगी। और शायद इससे कुछ सुधार हो सके। पर गोदी मीडिया को ऐसे सुझावों से क्या लेना-देना अभी तो किताब की चर्चा भी न के बराबर है। अरुण शौरी ने लिखा है कि उनसे लोगों ने कहा कि जब उन्हें इस तरह परेशान होना पड़ा तो आम लोगों की क्या हालत होगी। और उन्होंने लिखा भी है कि काफी कुछ उन्होंने स्वयं देखा। </p>
<p>“बने हैं अहले हवस मुद्दई भी मुंसिफ भी … ”</p>
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