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	<title>calender Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>नागार्जुन कहे थे: &#8220;पीढ़ा को घिसकर पीढ़ी बनता है,&#8221; दरभंगा राज में &#8220;पीढ़ी नहीं बन सका&#8221;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 22 May 2026 11:20:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बहिरा नाचे अपने ताल]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>वैसे हमारी क्षमता नहीं है, लेकिन कल की एक घटना को लिखने के लिए हम उन्हें, उनके शब्दों को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं &#8211; तदर्थ दरभंगा के अंतिम राजा, उनका राजपाट और गरिमा के बहाने एक व्यक्ति के बारे में बताता हूँ। दरभंगा के महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह के जन्म के चार वर्ष बाद सन् [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b2/darbhangas-maharaja-on-calender">नागार्जुन कहे थे: &#8220;पीढ़ा को घिसकर पीढ़ी बनता है,&#8221; दरभंगा राज में &#8220;पीढ़ी नहीं बन सका&#8221;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>वैसे हमारी क्षमता नहीं है, लेकिन कल की एक घटना को लिखने के लिए हम उन्हें, उनके शब्दों को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं &#8211; तदर्थ दरभंगा के अंतिम राजा, उनका राजपाट और गरिमा के बहाने एक व्यक्ति के बारे में बताता हूँ। दरभंगा के महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह के जन्म के चार वर्ष बाद सन् 1911 के जून महीने में दरभंगा जिले के सतलखा में एक बालक का जन्म हुआ था। सतलखा उस बालक का ननिहाल था, जबकि उसका पैतृक घर मधुबनी जिले के तरौनी गाँव में था।</strong> </p>
<p>&#8216;मिश्र&#8217; परिवार में जन्म लेने के कारण &#8216;उपनाम&#8217; तो &#8216;मिश्र&#8217; मिला, लेकिन प्रथम नाम &#8216;बैद्यनाथ&#8217; माता-पिता रखे। यानी बैद्यनाथ मिश्र, जो समयान्तराल &#8216;यात्री जी&#8217;, &#8216;बाबा&#8217;, नागार्जुन&#8217; के नाम से विख्यात हुए। कहते हैं कि उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के स्थानीय संस्कृत पाठशाला में हुई थी। बाद में वाराणसी और कलकत्ता भी गए। आज़ादी के कोई 11-वर्ष पहले सन 1936 में, जब दरभंगा के महाराजा रमेश्वर सिंह के बड़े पुत्र दरभंगा राज की गद्दी पर बैठे थे; बैद्यनाथ मिश्र बौद्ध धर्म में दीक्षा प्राप्त करने के लिए श्रीलंका गए और दो वर्ष बाद अपने गाँव लौटे। </p>
<p>सम्मानित श्री बैद्यनाथ मिश्र की आत्मा आज इस ब्रह्माण्ड में जहाँ भी होगी, मेरे शब्दों को अवश्य पड़ेगी, मुझे पूरा विश्वास है। अपने जीवनकाल में वे कई मासिक और साप्ताहिक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किये। अन्य लोगों के बारे में नहीं कह सकता, उनका श्री यात्री जी के साथ जीवन में कैसा सम्बन्ध रहा, लेकिन यात्रीजी अपने जीवन काल में जिसके हुए, उसे अपनी अंतिम सांस तक नहीं छोड़े, चाहे मनुष्य हों या साहित्य। </p>
<p><strong>दरभंगा के अंतिम राजा का अपने पिता महाराजा रमेश्वर सिंह के सम्मानार्थ पटना में स्थापित आर्यावर्त (हिंदी दैनिक), इंडियन नेशन (अंग्रेजी दैनिक) और मिथिला मिहिर (मैथिली साप्ताहिक पत्रिका) के साथ-साथ पटना मुख्य डाकघर के सामने बुद्ध मार्ग पर स्थित &#8216;प्रदीप&#8217; अख़बार का कार्यालय यात्री जी का &#8216;दूसरा घर&#8217; था। पटना में होने पर इन कार्यालयों के वे  नियमित भ्रमण-सम्मेलनकर्ता थे। श्रीकान्तठाकुर विद्यालंकार, दीनानाथ झा, हीरानंद झा शास्त्री, परमानन्दं झा शास्त्री, काशिकान्त झा, सुधांशु शेखर चौधरी, भीमनाथ झा, गोकुलनाथ झा आदि अनेक लोग थे, कुछ उनके हम उम्र थे, कुछ मित्र थे, जिन्हें मिले बिना वे शहर नहीं छोड़ते थे। </strong></p>
<p>आर्यावर्त-इंडियन नेशन-मिथिला मिहिर में ऐसे कोई भी महानुभाव नहीं थे, जो अपने-अपने क्षेत्रों में धनुर्धर तो थे ही, पान के शौक़ीन नहीं थे। मेरे पिताजी भी बहुत पान खाते थे और जब भी दोनों, यानी बाबूजी और यात्री जी, रूबरू होते थे तो पान का पनबट्टी दोनों के बीच स्नेह और प्रेम के साथ उपस्थित अवश्य होता था, पनबट्टी चाहे अल्युमिनियम का ही क्यों नं हो। कभी गांधी कद वाला धोती, तो कभी कम चौड़ाई वाला पैजामा पहने, कंधे पर झोला लटकाये, बड़ी-बड़ी दाढ़ियों के साथ यात्रीजी जब भी आर्यावर्त-इंडियन नेशन-मिथिला मिहिर के कार्यालय परिसर में प्रवेश लेते थे, उनके सम्मानार्थ &#8211; बिना किसी लोभ या चापलूसी के &#8211; लोगों का एकत्रित होना आम बात थी।  </p>
<p>बात सत्तर के दशक की है। यात्री जी की ऊंचाई उतनी अधिक हो गयी थी कि वे दूसरों के कलम से लिखित शब्दों के साथ अख़बारों में प्रकाशित होने लगे थे। कुछ अख़बारों में काम करने वाले संवाददाता लिखते थे तो कुछ &#8216;स्वतंत्र लेखन करने वाले सम्मानित लोग। उसी दौरान, हिंदी और मैथिली साहित्य के घनुर्धर यात्री जी से पटना के तत्कालीन एक पत्रकार, जो उन दिनों अख़बारों में, पत्रिकाओं में &#8216;तमन्ना&#8217; उपनाम से लिखा करते थे, पूछा कि &#8216;कल और आज की पीढ़ी को आप कैसे देखते हैं?&#8221; </p>
<blockquote><p>यात्री जी बिना क्षण व्यर्थ किये कहते हैं: &#8220;पीढ़ा घिस घिस कर पीढ़ी बनती है। आज ही नहीं, आने वाले दिनों में यह घिसाव कम ही नहीं, नगण्य हो जायेगा। चाहे सामाजिक क्षेत्र में हो, शैक्षिक क्षेत्र में हो, बौद्धिक क्षेत्र में हो, सांस्कृतिक क्षेत्र में हो, नैतिक क्षेत्र में हो, आध्यात्मिक क्षेत्र में हो, पारिवारिक क्षेत्र में हो &#8211; पीढ़ा से पीढ़ी नहीं बन पायेगी। हाँ, कहने के लिए लोग  जो भी कह लें।&#8221; </p></blockquote>
<p>यात्रीजी जिस कालखंड में इन शब्दों को कहे थे, उनकी आयु 62-63 वर्ष थी। करीब दो दशक और अधिक समय के बाद सन 1998 के नवम्बर महीने में 87 वर्ष की आयु में जब यात्रीजी अंतिम सांस लिए, तत्कालीन संवाददाता &#8216;तमन्ना जी&#8217; अपने वार्तालाप को पुनः उद्धृत करते श्रद्धांजलि स्वरुप एक लेख दिल्ली के एक अख़बार के लिए लिखे। दिल्ली के अखबार के तत्कालीन संपादक उन शब्दों को पढ़कर &#8216;तमन्ना जी&#8217; को उसी तरह देखे जैसे यात्री जी के पहनावे को देखकर आज के लोग-बाग़ (जो अनभिज्ञ हैं उनकी विद्वता से) देखते थे। संपादक को रहा नहीं गया और पूछ बैठे: &#8220;कहाँ से कॉपी किये हैं?&#8221; अब ऐसे संपादक को कौन समझाए। </p>
<p><strong>सम्मानित श्री बैद्यनाथ मिश्र यानी &#8216;यात्री जी&#8217;, &#8216;नागार्जुन&#8217;, &#8216;बाबा&#8217; का उल्लेख यहाँ इसलिए किया हूँ कि कल, जब दिल्ली विधानसभा द्वारा प्रकाशित &#8216;शताब्दी यात्रा&#8217; काफी टेबुल किताब में महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह और महाराजा रमेश्वर सिंह की तस्वीरें को देखकर; दीवार पर टंगने वाले कैलेण्डर से लेकर टेबुल पर रखने वाले कैलेण्डर में महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह की तस्वीर को प्रकाशित देखकर दरभंगा के लाल चारदीवारी के अंदर सफ़ेद चारदीवारी में रहने वाले महानुभाव कैमरे के सामने हंस रहे थे। उनके दाहिने हाथ दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष भी खड़े थे। सामाजिक क्षेत्र के मीडिया प्लेटफॉर्म पर जान तस्वीरों को देखा, दरभंगा के अख़बारों में प्रकाशित समाचारों को देखा, तो यात्री जी याद आ गए, यात्री जी का &#8216;पीढ़ा&#8217;, पीढ़ा का &#8216;घिसना&#8217;, घिसकर &#8216;पीढ़ी&#8217; का बनना कथन याद आ गया। सोचने पर मजबूर हो गया दरभंगा राज का पीढ़ा घिसकर पीढ़ी नहीं बन सकी। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/Darbhanga-1-scaled.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/Darbhanga-1-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1691" class="aligncenter size-full wp-image-7757" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/Darbhanga-1-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/Darbhanga-1-300x198.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/Darbhanga-1-1024x676.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/Darbhanga-1-768x507.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/Darbhanga-1-1536x1015.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/Darbhanga-1-2048x1353.jpg 2048w" sizes="(max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a></p>
<p>कहने के लिए चाहे दिल्ली के क़ुतुब मीनार पर चढ़कर कोई दावा कर ले, लेकिन यथार्थ तो यही है कि दरभंगा के महाराजाओं, राज की संस्कृति, गरिमा, मर्यादा, उदारता का पर्यायवाची सन 1962 के बाद कोई नहीं बना, अब तो बन भी नहीं सकता। लिख लें, गाँठ बाँध लें। दरभंगा राज के वर्तमान लोग इन मामलों का &#8216;पीढ़ा&#8217; घिसकर &#8216;पीढ़ी&#8217; बन ही नहीं सके &#8211;  दुःखद है। क्योंकि संपत्ति से पीढ़ी नहीं बनती। संपत्ति से संस्कृति नहीं बनती, संपत्ति से मर्यादा नहीं बनता, संपत्ति होने से व्यक्ति उदार हो, मानवीय हो, यह भी आवश्यक नहीं है। इतना ही नहीं, आने वाले पचास-सौ वर्षों बाद दिल्ली सल्तनत तो रहेगी ही, शायद दरभंगा के उन चारदीवारी के अंदर रहने वाले आज के महानुभावों की वैसी कोई कीर्ति इतिहास नहीं बनी होगी जो आने वाले दिनों में कैलेण्डर और विकास यात्रा का अंश बन सके। दुखद है।  </p>
<p><strong>जिस दिन महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह अंतिम सांस लिए, उस समय दिल्ली में प्रधानमंत्री कार्यालय में पंडित जवाहरलाल नेहरू थे।  जिस दिन महाराजा की तीसरी और अंतिम पत्नी कामसुन्दरी देवी अंतिम सांस लीं, प्रधानमंत्री कार्यालय में नरेंद्र मोदी विराजमान थे, हैं। इन दोनों के बीच, यानी 1962 से 2026 तक 15 राजनेता &#8211; गुलजारीलाल नंदा, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, पीवी नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी, एचडी देवगौड़ा, आइके गुजराल, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी &#8211; प्रधानमंत्री कार्यालय में आये। लेकिन 1962 के बाद राज दरभंगा का पीढ़ा घिसकर कोई पीढ़ी नहीं बना सका जो प्रधानमंत्री के सामने खड़ा होकर बात कर सके। </strong> </p>
<p>इसी तरह, महाराजा के मृत्यु दिन पटना सचिवालय में बिनोदानंद झा मुख्यमंत्री कार्यालय में थे। बिनोदानंद झा के बाद कृष्ण बल्लभ सहाय, महामाया प्रसाद सिंह, सतीश प्रसाद सिंह, बीपी मंडल, भोला पासवान शास्त्री, हरिहर सिंह, दरोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर, केदार पाण्डे, राम सुंदर दस, जगन्नाथ मिश्र, चंद्रशेखर सिंह, भागवत झा आज़ाद, बिंदेश्वरी दुबे, सत्येंद्र नारायण सिंह, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, नितीश कुमार और जीतन राम मांझी आये और गए। वर्तमान में सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान है।</p>
<blockquote><p>अपवाद छोड़कर, इन वर्षों में दरभंगा राज के किसी भी व्यक्ति को राजनीतिक गलियारे में प्रधानमंत्री अथवा मुख्य मंत्रियों के बगल में खड़े होने सम्बन्धी तस्वीरें नहीं देखा। शायद संपत्ति होने के बाद भी स्वयं को इतना सामर्थ्यवान नहीं बना सके &#8211; यह सच है, और कटु भी। अगर देखा भी तो ऐसे नेताओं के साथ खड़े होकर तस्वीर अवश्य देखा हूँ जो स्वयं पटना और दिल्ली में मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक टकटकी निगाहों से देखते रहते हैं, ताकि उनका कृपा पात्र बने रहें।  यह इस बात का प्रमाण है कि वर्तमान में दरभंगा राज में ऐसी कोई पीढ़ा से पीढ़ी नहीं बन पाया जो दरभंगा राज की गरिमा को आकाश भेदने वाली आवाज में कह सके।</p></blockquote>
<p>कहते हैं कि दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह का जन्म 25 सितंबर 1858 हुआ और वे 16 नवंबर 1898 को अंतिम सांस लिए। उनके अनुज महाराजा रमेश्वर सिंह का जन्म 16 जनवरी 1860 को हुआ था और वे 3 जुलाई 1929 को अंतिम सांस लिए। महाराजा रमेश्वर सिंह के बड़े पुत्र महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह का जन्म 28 नवंबर 1907 को हुआ और 1 अक्टूबर 1962 को वे अंतिम सांस लिए।  </p>
<p>दरभंगा के अंतिम राजा कामेश्वर सिंह की तीन पत्नियां थीं, लेकिन संतानहीन मृत्यु को प्राप्त किये। उनकी तीन पत्नियों में मझली महारानी की मृत्यु उनके जीवनकाल में ही हुई, जबकि बड़ी महारानी और छोटी महारानी महाराजा के मरणोपरांत कई वर्षों बाद अनंत यात्रा पर निकली। छोटी महारानी की मृत्यु इसी वर्ष 12 जनवरी को हुई । उनकी मृत्यु के साथ दरभंगा राज का महाराजा से जुड़ी समस्त बातें उनकी अग्नि संस्कार के साथ ही समाप्त हो गयी। </p>
<p>इतना ही नहीं, आलोचक और विश्लेषक चाहे कुछ भी कहें, लिखें, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि दरभंगा के अंतिम राजा की वसीयत में संपत्ति के बारे में किसका अधिकार हो, कौन कर्तव्य निभाएगा, जो भी लिखा जाए, कहा जाए, दरभंगा राज का उत्तराधिकारी किसी को नहीं बनाये। आज जो भी दावा करते हैं महज उनके नाम की राजनीति है &#8211; स्वहित में, अपने-अपने लाभार्थ। शब्द कटु हैं, लेकिन विचार जरूर करें। </p>
<figure id="attachment_7759" aria-describedby="caption-attachment-7759" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/Nagarjun-Kavi1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/Nagarjun-Kavi1.jpg" alt="" width="2048" height="1352" class="size-full wp-image-7759" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/Nagarjun-Kavi1.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/Nagarjun-Kavi1-300x198.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/Nagarjun-Kavi1-1024x676.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/Nagarjun-Kavi1-768x507.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/Nagarjun-Kavi1-1536x1014.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7759" class="wp-caption-text">महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह और उनकी सबसे छोटी महारानी काम सुंदरी देवी (दोनों दिवंगत)</figcaption></figure>
<p><strong>दरभंगा के लाल किले के परिसर में रहने वाले महानुभाव में इतनी क्षमता नहीं थी (आज भी नहीं होगी) कि जिस महाराजाओं ने भारतीय शैक्षिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, बौद्धिक विकास में देश के किसी भी राजा-महाराजाओं की तुलना में अधिक योगदान किया हो, उस राज की अंतिम महारानी को राजकीय सम्मान के साथ अग्नि संस्कार करा पाते। आप सभी प्रत्यक्षदर्शी भी रहे हैं। यह अलग बात है कि महारानी अधिरानी कामसुन्दरी जी की मृत्यु के बाद पूरे शहर को सजाना, लाल-हरा कालीन बिछाना, आगंतुकों के पैरों में मिट्टी न लगे, गुलाब की पंखुड़ियों से सजाना &#8211; यह दरभंगा राज और राज की गरिमा का सम्मान नहीं, बल्कि अपनी छवि को महारानी की मृत्यु के साथ जोड़ना था। दरभंगा राज की गरिमा तो महारानी की मृत्यु के साथ ही समाप्त हो गयी, चाहे कुछ भी कहा जाए। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि महारानी के जीवनकाल में उनके विरुद्ध कई मुकदमें भी किए गए थे। आज भी भारत के न्यायालयों में लाल वस्त्रों में बंधा होगा । </strong></p>
<p>अगर महाराजाधिराज &#8216;संतानहीन&#8217; नहीं होते तो आज दिल्ली ही नहीं, दरभंगा में भी जो दृश्य दिख रहा है, नहीं दीखता। महाराजा अधिराज के भाई दिवंगत राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के परिवार के आज के लोग दरभंगा राज का कोई सौ-वर्ष पुराना ऐतिहासिक विरासत दिल्ली सल्तनत में नहीं बचा सके। हाँ, 168-वर्ष पहले 25 सितम्बर, 1858 को जन्म लिए महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह की &#8216;स्टाम्प&#8217; आकार की तस्वीर को देख फुले नहीं समा रहे हैं। दिल्ली सल्तनत में स्थित 100 वर्ष पुराना दरभंगा के महाराजों द्वारा हस्ताक्षरित ऐतिहासिक महल और परिसर पर &#8216;दरभंगा राज&#8217; का अब कोई आधिपत्य नहीं रहा। </p>
<p>जिस सल्तनत की बुनियाद 25/25 A दरभंगा हाउस और परिसर तथा 7 मानसिंह रोड के रूप में दरभंगा के तत्कालीन महाराजा रामेश्वर सिंह सं 1923 में रखे थे; जिस बुनियाद को उनके पुत्र महाराज अधिराज सर कामेश्वर सिंह अपने शरीर को पार्थिव होने के पूर्व अंतिम सांस तक सीचें थे; महाराजा की तीसरी और अंतिम महारानी भी अपने जीवन की अधिकांश सांसे यहाँ ली थीं, दरभंगा के सैकड़ों सीपा-सलाहकारों से लेकर चापलूसों का विशाल साम्राज्य अकबर रोड और मानसिंह रोड वाले महलों में जीवन जीने का तरकीब सीखे थे, कोई एक कदम भी नहीं बढ़ाये और अंततः दरभंगा राज का वह ऐतिहासिक इतिहास अब दरभंगा राज का नहीं, बल्कि भारत सरकार का हो गया। </p>
<p><strong>दरभंगा की अंतिम संतानहीन महारानी की मृत्यु 12 जनवरी, 2026 को हुई। आज 22 मई है। यानी 131  दिन। कल फेसबुक पर 21 मई 2026 को दरभंगा संस्करण के कुछ हिंदी अख़बारों में प्रकाशित खबरों के साथ-साथ दरभंगा लाल किले परिसर में सफ़ेद चारदीवारी के अंदर वाले मकान में रहने वाले एक सज्जन की तस्वीर दिल्ली सल्तनत के एक नेता के साथ देखा। उस कहानी में तस्वीर के साथ यह भी लिखा देखा कि दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह की तस्वीर दिल्ली सरकार के कैलेंडर में प्रकाशित देख सज्जन फुले नहीं समा रहे हैं। बिडम्बना यह है कि जिस महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह अपने भाई महाराजा रमेश्वर सिंह को, फिर महाराजा रमेश्वर सिंह अपने बड़े पुत्र महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह को तत्कालीन भारत के किसी भी राजा-महाराजाओं से अधिक धन-सम्पत्तियों का अपार भण्डार छोड़कर अननत यात्रा पर निकले, काश &#8216;ज्ञान&#8217;, &#8216;विज्ञान&#8217;, पारिवारिक संस्कार, गरिमा का महत्व का ज्ञान भी देकर जाते। यह भी बता जाते कि दरभंगा साम्राज्य को किस कदर स्थापित किया गया था। दरभंगा राज अपने प्रदेश के लोगों के लिए कितना वचनबद्ध था। काश।</strong> </p>
<p>इतना ही नहीं, आज जब तस्वीर में दरभंगा वाले सज्जन के सर पर सतपुरा के जंगल जैसा काला बाल देखा तो सोचने पर विवश हो गया कि महारानी की मृत्यु के बाद मुंडन हुआ था और इन 130 दिनों में सर पर सतपुरा के जंगल जैसा बाल होना &#8211; मजाक नहीं है। माथे पर बालों का इतना विकास दर को देखकर एक और ख्याल आया कि काश दरभंगा राज का भी इसी तरह विकास हुआ होता !!! </p>
<p>Delhi, F. No. 4/2/2009/UD/l 6565 अधिसूचना के अनुसार दिल्ली के 141 पुरातत्व भवनों की सूची में 32वें स्थान पर 25/25A, दरभंगा हॉउस और परिसर तथा 7, मानसिंह रोड, नई दिल्ली का नाम लिखा था। लोगों से आपत्ति और विचार माँगा गया था। अब इन ऐतिहासिक धरोहरों पर भारत सरकार का आधिपत्य हो गया &#8211; ऑफिसियली। जिस बोर्ड पर &#8220;दरभंगा हाउस लेन&#8221; लिखा होता था, अब &#8220;दरभंगा लेन&#8221; हो गया। साथ ही, अब &#8220;नगर पालिका प्राथमिक विद्यालय&#8221; के साथ बोर्ड का &#8220;बंटवारा&#8221; भी हो गया। इस बोर्ड का इस कदर बंटवारा देखकर आने वाले दिनों का भी एहसास कोई कर सकता है। क्योंकि दिल्ली किसी की नहीं हुई। दिल्ली सल्तनत में &#8220;नामकरण&#8221; रातोंरात होता है।</p>
<p>दिल्ली के इण्डिया गेट से जब अकबर रोड के लिए रुख करते हैं अभी तक, चाहे &#8216;पैदल&#8217; हो अथवा &#8216;चार-पहिए&#8221; वाहन से, अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी के कार्यालय के बाएं हाथ पर कोई 75 डिग्री के कोण पर नई दिल्ली नगर पालिका द्वारा एक छोटे से बोर्ड पर उल्लिखित &#8220;दरभंगा हाउस लेंन&#8221; लिखा यह बोर्ड दीखता अब तक बचा है। वैसे हिस्सेदारी प्रारम्भ हो गयी है। यह कहना अब बहुत मुश्किल है कि आने वाले समय में इस बोर्ड पर किसका नाम लिखा होगा।  </p>
<p>सूत्रों के अनुसार, 25/25A दरभंगा हाउस/कल्याणी निवास और 7, मानसिंह रोड स्थित भवन और परिसर भारत सरकार द्वारा पुरातत्व भवन / पुरातत्व परिसर के रूप में अधिग्रहण कर लिया गया है । मानसिंह रोड स्थित 7-नंबर भवन और परिसर पर भारत सरकार का पूर्व से ही अधिपत्य था। 25/25A दरभंगा हाउस/कल्याणी निवास से सभी वस्तुओं को हटा दिया गया है। </p>
<p><strong>कोई 100 -वर्ष पूर्व परतंत्र भारत (दिल्ली) केे तत्कालीन चीफ़ कमिश्नर दिल्ली के साथ दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह के साथ सम्पन्न एक दस्तावेज के अनुसार : &#8220;This Indenture made ninth day of August, 1923 between the Secretary of State for India in Council, hereinafter called the Lessor of the one part, and The Hon&#8217;ble Bahadur Sir Rameshwar Singh, G.C.I.E, Maharaja of Darbhanga hereinafter called the Lessee of the other part.&#8221; दस्तावेज में आगे लिखा है: &#8220;Whereas under the instruction of the Government of India relating to the disposal of building sites in the New Capital the Chief Commissioner, Delhi has agreed on behalf of the Secretary of State to demise the plot of Nazul land hereinafter described to the Lessee in the manner hereinafter appearing.&#8221;</strong></p>
<blockquote><p>इन शब्दों को लिखते समय आखें अश्रुपूरित है। जिस इतिहास की रचना के लिए, मिथिलांचल के लोगों की गरिमा और प्रतिष्ठा को सातवें आसमान तक पहुँचाने में दरभंगा राज के 20 राजा-महाराजाओं ने अपनी-अपनी भूमिका निभाए; जिस दरभंगा राज की संस्कृति, गरिमा को परतंत्र भारत से स्वतंत्र भारत तक बेदाग़ बनाये रखने में महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह, उनके अनुज महाराजा रमेश्वर सिंह, उनके पुत्र महाराज अधिराज सर कामेश्वर सिंह ने अहम भूमिका अदा किये; महाराजाधिराज की मृत्यु के 64 वर्ष आते-आते दरभंगा राज का 400+ वर्ष पुराना इतिहास नेश्तोनाबूद हो गया। 25/25A दरभंगा हाउस /कल्याणी निवास और 7, मानसिंह रोड भी उसी इतिहास का हिस्सा था।</p></blockquote>
<figure id="attachment_7760" aria-describedby="caption-attachment-7760" style="width: 1440px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2-1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2-1.jpg" alt="" width="1440" height="960" class="size-full wp-image-7760" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2-1.jpg 1440w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2-1-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/05/K-2-1-768x512.jpg 768w" sizes="(max-width: 1440px) 100vw, 1440px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7760" class="wp-caption-text">दरभंगा के राजबहादुर विश्वेश्वर सिंह (दिवंगत) के पुत्र कुमार शुभेश्वर सिंह (दिवंगत) के छोटे पुत्र कपिलेश्वर सिंह दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता के साथ विधानसभा द्वारा प्रकाशित कैलेण्डर को पकड़े। इसी कैलेण्डर में दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह की तस्वीर छपी है। जिस राज का छापाखाना था, दो-दो अखबार थे, आज कैलेण्डर में चपटे देख खुश हो रहे हैं। नागार्जुन ने ठीक ही कहा था &#8221; पीढ़ा को घिसने से पीढ़ी बनता है।</figcaption></figure>
<p>ज्ञातव्य हो कि सन 1911 में तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली लाया । महाराजा रमेश्वर सिंह का रुतबा इतना बलिष्ठ था की वे सत्ता के पास हमेशा रहते थे और सत्ता उन्हें हमेशा अपने पास रखती थी । आज के परिपेक्ष में यदि देखा जाए तो दिल्ली में तत्कालीन राजा-महाराजाओं का निवास स्थान जहाँ अवस्थित है, आज भी विभिन्न रूपों में स्थित है। परन्तु, दरभंगा के महाराजा रमेश्वर सिंह और महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह के समय काल से प्रारम्भ होने वाली आधिपत्य ठीक सौवें साल आते-आते अपना अधिकार वाला आधिपत्य समाप्त कर दिया है।  </p>
<p>आश्चर्य तो यह है कि मिथिला के घुटने कद के नेता से लेकर आदम कद के नेता तक, कभी किसी ने &#8220;चूं&#8221; तक नहीं किये।  यह अलग बात है कि बिहार ही नहीं दिल्ली तक के जिन राजनेताओं को दरभंगा के तत्कालीन महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह, महाराजा रमेश्वर सिंह या महाराज अधिराज सर कामेश्वर सिंह &#8220;उपकृत&#8221; किये; आज जीवित नहीं हैं। और जो आधुनिक राजनेता हैं, वे उपकृत होने की भाषा और महत्व को नहीं समझते। तभी तो किसी ने भी दरभंगा राज की इस ऐतिहासिक पुरातत्व भवन या पुरातत्व परिसर के लिए आवाज तक नहीं उठाये।  </p>
<p>सन 1923 के दस्तावेज में लिखा है : &#8220;Now this INDENTURE WITNESSETH that in consideration of the premium of Rs 1487/8 (Rupees One Thousand Four Hundred and Eighty Seven and anna 8 paid before the execution of these present the receipt whereof the Lessor hereby acknowledges and of the rent hereinafter reserved and of the covenants on the part of the Lessee hereinafter contained, the Lessor both hereby demise unto the Lessee all that plot of land containing by measurement 3.58 acres situated at Delhi in the site acquired from the erection of the New Capital which said plot of land is more particularly described in the schedule hereunder written and with the boundaries thereof has of greater clearness&#8230;&#8230;.to hold the premises hereby demised unto the Lessee in perpetuity from the ninth day of august 1923&#8230;&#8221;</p>
<p>इसी तरह, प्लाट नंबर 7, ब्लॉक नंबर 15, 25-अकबर रोड नई दिल्ली के मामले में 3 मार्च, 1959 के दस्तावेज के अनुसार: PERPETUAL LEASE: THIS INDENTURE made the 3rd March 1959, day of &#8230;.between the President of India (hereinafter called the Lesser) of the one part, and Maharaj Adhiraaj Kameshwar Singh of Darbvhanga (hereinafter called the Lessee) of the other part. WHEREAS under the instruction of the Government of India relating to disp[osal of building sites in the New capital of Delhi, the Chief Commissioner of Delhi has agreed on behalf of the Lessor to demise the plot of Nazul land hereinafter described to the Lessee in the manner hereinafter appearing.   </p>
<p>AND WHEREAS in the pursuance of the agreement dated the second day of June One thousand nine hundred and twenty eight (hereinafter referred to as the said agreement) the Lessee has completed the construction of the buildings in accordance with the Clause 11 of the said agreement and has duly observed the other conditions of the said agreement. AND WHEREAS in pursuance of an agreement dated the thirty-first day of July 1952, and made between  the Lessor therein described as the party of the first part and the Lessee there in described as the party of the second part (hereinafter referred to as the Supplement Agreement), the Lessee has also constructed another building on Plot No. 7, Block Nop. 15, 25-Akbar Road, New Delhi, and has agreed to provide the accommodation required by the lessor on the terms and conditions stated in the said Supplemental Agreement&#8230;..NOW THIS INDENTURE WITNESSETH that in consideration of the premium of Rs. 9,950/- paid before the execution of these present &#8230;&#8230;ALL THAT plot of land containing by measurement 1.99 acre or thereabout situated at Akbar Road New Delhiin the site acquired for the erection of the New Capital  of Delhi &#8230;&#8230;..the first of such payments to be made on the fifteenth day of July 1928.&#8221; </p>
<p><strong>कहते हैं कि तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद का दरभंगा के महाराज अधिराज से बहुत घनिष्ठता ही। दोनों में बहुत अपनापन था।  दोनों का एक दूसरे के प्रति सम्मान और स्नेह उत्कर्ष पर था। देश में बदलती राजनीतिक वातावरण के कारण महाराज अधिराज डॉ राजेन्द्र प्रसाद से मिले और उन्हें तत्कालीन स्थिति से अवगत कराया। उस समय सरकार की नीतियां बदल रही थी देश के राजवारों के प्रति, उनकी सम्पत्तियों के प्रति। सरकार 7 मानसिंह रोड और 25/25A अकबर रोड पर अधिपत्य जमाना चाहती थी। अगर ऐसा हो जाता तो दरभंगा राज का दोनों भवन और परिसर उसी दिन सरकार के कब्जे में आ जाती। डॉ राजेंद्र प्रसाद &#8220;दो-टूक&#8221; बात महाराज अधिराज से कहे।  डॉ राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि वे राष्ट्राध्यक्ष होने के नाते प्रत्यक्ष रूप से इस मामले में दखल नहीं देंगे। फिर भी उनकी कोशिश होगी कि वे अधिक से अधिक इस क्षेत्र में महाराज अधिराज की मदद कर सकें। तभी एक &#8216;प्रस्ताव&#8217; का अभ्युदय हुआ कि अकबर रोड पर ही एक भवन बनाकर दे दें, जिससे तत्कालीन समस्याओं का समाधान भी हो जाय और महाराज अधिराज को दिल्ली में रहने में कोई तकलीफ भी नहीं हो। इसी 1.99 एकड़ भूमि, जहाँ आज एडीसी क्वार्टर्स है, मकान मनाकर सरकार को सुपुर्द कर दिया गया।</strong>  </p>
<p>दिल्ली के दरभंगा हॉउस और 7 &#8211; मानसिंह रोड के बारे में यह भी कहा जाता है कि लॉर्ड इरविन 7- मानसिंह बनने के बाद एक दिन महाराज अधिराज के साथ उनके महल में थे और लॉन टेनिस खेल रहे थे। जब लार्ड इरविन ने बॉल मारा तो स्थान छोटा  होने के कारण खेल में व्यवधान महसूस किया । इस पर लार्ड इरविन ने महाराजा से कहा कि &#8220;जगह बहुत कम है&#8221; और तत्काल सम्बद्ध अधिकारियों को आस-पास में रिक्त पड़े स्थान को ढूंढने तथा महाराजा को देने के लिए कहा। ए डी सी का वर्तमान भवन के साथ 2 . 4 एकड़ भूमि उसी समय मिला था। जब इंदिरा गाँधी देश की प्रधान मंत्री बनी, उस समय भी एक बार सरकारी आधिपत्य की बात हुई थी। लेकिन उस समय महारानी अधिरानी श्रीमती गांधी से अपनी बात कहीं थी।</p>
<p>ज्ञातव्य हो कि सं 1925 में लॉर्ड इरविन को भारत का वायसराय नियुक्त किया था। यह कहा जाता है कि इरविन का भारत से आनुवंशिक सम्बन्ध था क्योंकि उनके दादा ने भारत में सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फॉर इण्डिया के तौर पर काम किया था।  इरविन एक धार्मिक व्यक्ति थे और ऐसा कहा जाता हैं कि शायद इस कारण ही उन्हें भारत में नियुक्त किया गया था। सन 1929 के 31 अक्टूबर को लार्ड इरविन ने ब्रिटिश सरकार की तरफ से भारत में एक महत्वपूर्ण घोषणा की जिसे इरविन डिक्लेरेशन भी कहा जाता है। इस घोषणा में कहा गया कि ब्रिटिश सरकार भारत को स्वतंत्र-उपनिवेश बनाने के लिए तैयार है। पांच पंक्ति की इस घोषणा ने ब्रिटेन और भारत दोनों जगह हलचल कर दी थी। ब्रिटेन में जहां इसका विरोध हुआ था, वहीँ भारत में राष्ट्रवादी नेताओं ने इसका स्वागत किया और बाद में पूर्ण स्वराज की मांग तेज हुई। </p>
<p>इतिहास में यह बात भी अमिट है कि 5 मार्च 1931 को इरविन और गाँधी के बीच एक संधि हुयी और गांधी-इरविन पैक्ट के नाम से मशहूर हुआ। इस संधि के आधार पर यह भी तय हुआ था कि  कांग्रेस को राउंड टेबल कांफ्रेंस में भाग लेना होगा और कांग्रेस असहयोग आंदोलन समाप्त करेगी।सरकार कांग्रेस नेताओं पर चलाए सभी मुकदमे और अभियोग समाप्त करेगी और उन्हें जेल से मुक्त करेगी।  गाँधी-इरविन पैक्ट के एक महीने बाद ही इरविन सेवानिवृत्त हो गए गए।  इरविन महात्मा गांधी का सम्मान करते थे और देश छोड़ने से पहले कई औपचारिक जगहों पर उन्होंने गांधीजी के प्रति सम्मान जताया था। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b2/darbhangas-maharaja-on-calender">नागार्जुन कहे थे: &#8220;पीढ़ा को घिसकर पीढ़ी बनता है,&#8221; दरभंगा राज में &#8220;पीढ़ी नहीं बन सका&#8221;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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