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	<title>bihar Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>​&#8217;छठ महापर्व&#8217; Vs &#8216;पूर्वांचल की राजनीति&#8217; : प्रदर्शनी में नहीं आते हैं, वोट के लिए दुर्गन्धित यमुना नदी में छलांग लगाते हैं</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/editorial/chhath-mahaparv-vs-politics-of-purvanchal</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 02 Oct 2026 07:17:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लोधी एस्टेट (नई दिल्ली): राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश के आगमन के अलावे कोई भी वाहन मैक्स मूलर मार्ग से दाहिने हाथ के.के.बिरला के नाम से अंकित सड़क और उस सड़क के बाएं हाथ स्थित इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) मुख्यालय की ओर नहीं मुड़ी। किसी भी वाहनों का &#8216;हूटर&#8217; नहीं [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>लोधी एस्टेट (नई दिल्ली): राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश के आगमन के अलावे कोई भी वाहन मैक्स मूलर मार्ग से दाहिने हाथ के.के.बिरला के नाम से अंकित सड़क और उस सड़क के बाएं हाथ स्थित इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) मुख्यालय की ओर नहीं मुड़ी। किसी भी वाहनों का &#8216;हूटर&#8217; नहीं बजा। प्रदेश की सांस्कृतिक गरिमा पर व्याख्यान देने वाले, तथाकथित रूप से स्वयं को &#8216;गरिमा बचाने का रक्षक&#8217; कहे जाने वालों के लिए इससे &#8216;दुखद&#8217; दृष्टान्त और कुछ नहीं हो सकता है।</strong> </p>
<blockquote><p>चाहिए तो यह था कि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड राज्यों &#8211; जहाँ &#8216;छठ महापर्व&#8217; के रूप में मनाया जाता है &#8211; से निर्वाचित और चयनित होकर लोकसभा और राज्य सभा में बैठने वाले सांसदों के अलावे दिल्ली विधानसभा में &#8216;पूर्वांचल और छठ की राजनीति&#8217; कर कुर्सी से चिपकने वाले विधायकगण, बिहार के कलाकारों द्वारा आयोजित चार-दिवसीय &#8216;अर्घ्य&#8217; प्रदर्शनी अपनी उपस्थिति देकर कलाकारों के साथ-साथ इन्टैक के प्रयास का मनोबल बढ़ाते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। </p></blockquote>
<figure id="attachment_7933" aria-describedby="caption-attachment-7933" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-2.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7933" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7933" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>लोकसभा में बिहार के 40 और राज्य सभा में 16 सांसदों (कुल: 56) का प्रतिनिधित्व है। जबकि उत्तर प्रदेश से लोकसभा में 80 और राज्य सभा में 31 सांसद (कुल: 111 सांसद) हैं। और झारखण्ड से 14 लोकसभा और 6 राज्य सभा (कुल: 20) सांसदों का प्रतिनिधित्व हैं। दिल्ली विधानसभा में कुल 70 स्थानों में कोई 30 स्थानों पर वैसे लोग बैठे हैं जो पूर्वांचल और छठ को आधार मानकर अपने-अपने विधानसभा क्षेत्र में राजनीति करते हैं, मतदाताओं की मानसिकता पर हावी होते हैं। दुर्भाग्य यह है कि 187 सांसदों और 30 विधायकों (कुल: 217 सांसदों/विधायकों) में एक फीसदी, यानी 2.17 फीसदी नेताओं की हूटर बजती गाड़ियां इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज मुख्यालय की ओर नहीं मुड़ी। </p>
<figure id="attachment_7934" aria-describedby="caption-attachment-7934" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-3.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7934" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7934" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p><strong>वैसे दिल्ली का यह इलाका यमुना पार के इलाके की चलता में, क़ुतुब मीनार से भी ऊँची ऊंचाई रखता है, लेकिन शायद लोगों ने छठ महापर्व की सांस्कृतिक गरिमा को नहीं समझ सके। यह अलग बात है कि बंगाल के दुर्गापूजा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निजी तौर पर यह चाहते हैं कि &#8216;छठ महापर्व यूनेस्को के सांस्कृतिक धरोहर सूची में अंकित हो।</strong> </p>
<figure id="attachment_7935" aria-describedby="caption-attachment-7935" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-4.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7935" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7935" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>घनश्याम दास बिरला के पुत्र कृष्ण कुमार बिरला (के.के.बिरला) के नाम अंकित 71-लोधी एस्टेट में विगत 28 सितम्बर से 1 अक्टूबर तक चार दिवसीय &#8216;अर्घ्य&#8217; प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था। भारत में विरासत के प्रति जागरूकता और उसके संरक्षण को बढ़ावा देने को लेकर से 27 जनवरी 1984 में नई दिल्ली में ‘इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज’ के नाम से एक सोसाइटी की स्थापना की गई थी। श्रीमती पुपुल जयकर ने 1984 में राजीव गांधी के साथ मिलकर इस संस्था को बनाने का विचार रखा और इसकी शुरुआत की। राजीव गांधी इस ट्रस्ट के पहले चेयरमैन बने। हालांकि इस पहल के पीछे पुपुल जयकर मुख्य सूत्रधार थीं, लेकिन ट्रस्ट को औपचारिक रूप से भारत की प्रमुख सांस्कृतिक हस्तियों, नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवियों के एक मुख्य संस्थापक समूह के साथ स्थापित किया गया था। इंटैक की पहली गवर्निंग काउंसिल में राजीव गांधी (पहले चेयरमैन), पुपुल जयकर, कपिला वात्स्यायन, एल. के. झा, एम. जी. के. मेनन, मार्तंड सिंह, राजीव सेठी, बी. के. थापर आदि शामिल थे। </p>
<figure id="attachment_7936" aria-describedby="caption-attachment-7936" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7936" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7936" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p><strong>आज इंटैक को दुनिया के सबसे बड़े विरासत संगठनों में से एक माना जाता है, जिसके देश भर में 228 से ज़्यादा चैप्टर हैं। यह सच है कि पिछले 42 सालों में, इंटैक ने न केवल हमारी प्राकृतिक और निर्मित विरासत, बल्कि अमूर्त विरासत के संरक्षण और बचाव में भी अहम भूमिका निभाई है। </strong></p>
<p>और यह भी उतना ही सच है कि इन 42-वर्षों में शायद पहली बार इंटैक के राष्ट्रीय पदाधिकारियों के साथ-साथ बिहार चैप्टर के राज्य संयोजक श्री भैरव लाल दास, सह-संयोजक डॉ. शिव कुमार मिश्र, सुश्री मनीषा झा, सुश्री अलका दास और  सैकड़ों महिला-पुरुष कलाकारों द्वारा एक सकारात्मक प्रयास किया गया जिससे न केवल सांस्कृतिक घरोहर के रूप में छठा महापर्व को यूनेस्को सूचि में अंकित करने की बात की गयी, बल्कि राष्ट्र के लिए एक गौरवशाली प्रयास की शुरुआत भी की गयी।  दुर्भाग्य यह रहा कि एक दर्शक के रूप में भी इन नेताओं, अथवा केंद्र और राज्य सरकार में ऊँचे-ऊँचे सिंहासनों पर बैठे अधिकारी भी अपनी उपस्थिति दर्ज किये। </p>
<figure id="attachment_7937" aria-describedby="caption-attachment-7937" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7937" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7937" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>ज्ञातव्य है कि अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए यूनेस्को का अंतर-सरकारी समिति का इक्कीसवां सत्र 30 नवंबर से 5 दिसंबर 2026 तक चीन के शियामेन में आयोजित होने जा रहा है। इस सत्र की अध्यक्षता पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के संस्कृति और पर्यटन उप-मंत्री, महामहिम श्री गाओ झेंग करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में बिहार के कलाकार और इंटैक के लोग चाहते हैं कि इस सत्र में भारत का महान धार्मिक परंपरागत पर्व छठ यूनेस्को के अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में दर्ज हो जाये। परन्तु नेताओं और अधिकारियों का क्या? वे तो मतदाताओं को &#8216;ज्ञान को बुटी&#8217; पिलाने में पीछे नहीं रहते, खासकर चुनाव के समय। भारत में औसतन 15 करोड़ लोग, महिला-पुरुष इस पर्व को मानते हैं, शामिल होते हैं। </p>
<figure id="attachment_7938" aria-describedby="caption-attachment-7938" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7938" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7938" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p><strong>बिहार अथवा पूर्वांचल के नेताओं पर, जो छठ महापर्व को राजनीतिक बाजार में बेचकर, मतदाताओं की मानसिकता के साथ कबड्डी खेलकर दिल्ली विधानसभा में बैठते हैं, बैठे हैं &#8211; आप तनिक भी भरोसा नहीं कर सकते हैं। दिल्ली के सिकंदर लोधी के नाम से अंकित लोधी एस्टेट परिसर में स्थित इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज मुख्यालय में संपन्न चार-दिवसीय &#8216;अर्घ्य&#8217; प्रदर्शनी समारोह गवाह है। </strong></p>
<figure id="attachment_7939" aria-describedby="caption-attachment-7939" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7939" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7939" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>​दिल्ली में पूर्वांचली वोटरों की संख्या लगभग 40 से 43 लाख से ज़्यादा है, जो दिल्ली के कुल वोटरों का लगभग 25% से 33% (और अनुमानों के अनुसार 40% तक) हिस्सा हैं।​ विगत विधानसभा के चुनाव में, जिसमें करीब दो-दशक बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी, पूर्वांचल के कई उम्मीदवार जीते हैं। चंदन कुमार चौधरी संगम विहार से 344 वोटों से जीते हैं। सतीश उपाध्याय मालवीय नगर से 2131 वोटों से जीते हैं। कपिल मिश्रा करावल नगर से 23355 वोटों से जीते हैं। बीजेपी के अभय वर्मा लक्ष्मी नगर से 11542 वोटों से जीते हैं। बीजेपी उम्मीदवार पंकज सिंह विकासपुरी से 12876 वोटों से जीते हैं।​ संजीव झा बुराड़ी से 20,601 वोटों से जीते हैं। अनिल झा किराड़ी से 21,871 वोटों से जीते हैं। गोपाल राय बाबरपुर से 18,994 वोटों से जीते हैं।</p>
<figure id="attachment_7940" aria-describedby="caption-attachment-7940" style="width: 1366px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1.jpg" alt="" width="1366" height="1843" class="size-full wp-image-7940" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1.jpg 1366w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1-222x300.jpg 222w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1-759x1024.jpg 759w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1-768x1036.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1-1138x1536.jpg 1138w" sizes="auto, (max-width: 1366px) 100vw, 1366px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7940" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>इन 70 सीटों में से लगभग 20 सीटों पर पूर्वांचल के ​मतदाताओं के कारण ही जीते। यही वजह है कि सभी राजनीतिक पार्टियां शुरू से ही पूर्वांचल-बहुल सीटों पर पूर्वांचल के उम्मीदवारों को मैदान में उतारती रही हैं।​ दिल्ली विधानसभा में ऐसी कई सीटें हैं जहां पूर्वांचल के वोटर नतीजों पर बड़ा असर डालते हैं। बुराड़ी, बादली, किराड़ी, नांगलोई, मॉडल टाउन, जनकपुरी, विकासपुरी, उत्तम नगर, द्वारका, मटियाला, पालम, राजेंद्र नगर, देवली, संगम विहार, बदरपुर, पटपड़गंज, लक्ष्मी नगर, सीमापुरी, गोकुलपुरी और करावल नगर ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां पूर्वांचल के लोग राजनीतिक पार्टियों की जीत-हार तय करते हैं।​ </p>
<figure id="attachment_7941" aria-describedby="caption-attachment-7941" style="width: 1365px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-9.jpg" alt="" width="1365" height="1664" class="size-full wp-image-7941" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-9.jpg 1365w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-9-246x300.jpg 246w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-9-840x1024.jpg 840w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-9-768x936.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-9-1260x1536.jpg 1260w" sizes="auto, (max-width: 1365px) 100vw, 1365px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7941" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<blockquote><p>पूर्वांचल के वोटरों में बिहार, बिहार से सटे उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों और झारखंड के लोगों का एक बड़ा समूह दिल्ली की राजनीति को प्रभावित करता है। एक अनुमान के मुताबिक, पूर्वांचल के वोटरों की आबादी 43 लाख से ज़्यादा है। दिल्ली विधानसभा चुनावों में 25 फ़ीसदी से ज़्यादा वोटर पूर्वांचल से हैं।</p></blockquote>
<figure id="attachment_7942" aria-describedby="caption-attachment-7942" style="width: 1362px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-11.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-11.jpg" alt="" width="1362" height="1368" class="size-full wp-image-7942" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-11.jpg 1362w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-11-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-11-1020x1024.jpg 1020w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-11-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-11-768x771.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1362px) 100vw, 1362px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7942" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>दुर्भाग्यवश, पूर्वांचल के नेता अथवा मतदाता, जो छठ के समय मतों की राजनीति करने में कोई कोताही नहीं करते। विश्वास नहीं हो तो आगामी महीने में संपन्न होने वाले छठ पूजा में देख का गवाह बन जाएँ। क्योंकि यमुना नदी खराब हो चुके बहते पानी वाले इकोसिस्टम का एक आम उदाहरण है। इंसानी गतिविधियों और बढ़ते प्रदूषण के कारण दिल्ली-​राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में यह नदी एक सीवेज नाले में बदल गई है। इस नदी में होने वाले कुल प्रदूषण के लिए अकेले दिल्ली 79% ज़िम्मेदार है। नालों से रोज़ाना सैकड़ों टन बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड वाला कचरा नदी में गिरता है। </p>
<figure id="attachment_7943" aria-describedby="caption-attachment-7943" style="width: 1362px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-12.jpg" alt="" width="1362" height="1368" class="size-full wp-image-7943" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-12.jpg 1362w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-12-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-12-1020x1024.jpg 1020w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-12-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-12-768x771.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1362px) 100vw, 1362px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7943" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>प्रदूषण कम नहीं हो पाता क्योंकि मॉनसून के अलावा बाकी महीनों में नदी में पानी का बहाव बहुत कम या बिल्कुल नहीं होता। ​पानी की गुणवत्ता इंडेक्स से पता चलता है कि दिल्ली में घुसने से पहले नदी के पानी की क्वालिटी ठीक-ठाक होती है, लेकिन दिल्ली में यह बहुत ज़्यादा प्रदूषित हो जाती है और इसकी क्वालिटी बहुत खराब हो जाती है, जो आगरा नहर तक ऐसी ही बनी रहती है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की गलत जगह और ट्रीटमेंट क्षमता और असल में पैदा होने वाले सीवेज के बीच तालमेल न होने की वजह से लगभग 60% बिना ट्रीट किया हुआ गंदा पानी यमुना नदी में मिल जाता है। </p>
<figure id="attachment_7944" aria-describedby="caption-attachment-7944" style="width: 1362px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-15.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-15.jpg" alt="" width="1362" height="1368" class="size-full wp-image-7944" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-15.jpg 1362w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-15-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-15-1020x1024.jpg 1020w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-15-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-15-768x771.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1362px) 100vw, 1362px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7944" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>​<strong>परन्तु इतना होने के बाद भी प्रदेश के नेतागण, चाहे मंत्रिमंडल में बैठे हों अथवा नहीं, छठ महापर्व के आगमन के पूर्व से ही छठ के डाले और कोनिया पर राजनीतिक खेला शुरू कर देते हैं। मतदाताओं की मानसिकता को अपने वश में करने के उद्देश्य से इस प्रदूषित यमुना में छलांग लगाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते, ताकि अख़बारों के पन्नों पर, टीवी के स्क्रीनों पर उनका चेहरा चकमकाते रहे। दिल्ली में लगभग 40 लाख पूर्वांचली वोटर हैं, जो राजधानी क्षेत्र के कुल वोटरों का 25 प्रतिशत हैं। गौरतलब है कि बीजेपी का दिल्ली में एक अलग विंग के तौर पर &#8216;पूर्वांचल मोर्चा&#8217; भी है। दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियों में रहने वाले पूर्वांचली वोटरों की अहमियत का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी हालिया चुनावी रैली में उनके मुद्दों का ज़िक्र किया था।</strong></p>
<figure id="attachment_7945" aria-describedby="caption-attachment-7945" style="width: 1362px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-10.jpg" alt="" width="1362" height="1368" class="size-full wp-image-7945" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-10.jpg 1362w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-10-300x300.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-10-1020x1024.jpg 1020w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-10-150x150.jpg 150w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-10-768x771.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1362px) 100vw, 1362px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7945" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>​बहरहाल, ​पूर्वांचल और छठ की राजनीति का गवाह है 1993 में लाल बिहारी तिवारी, कीर्ति आज़ाद और परवेज़ हाशमी विधायक बने। 1998 के विधानसभा चुनावों में परवेज़ हाशमी, मीरा भारद्वाज और महाबल मिश्रा जीते। 2009 के लोकसभा चुनावों में महाबल मिश्रा पश्चिमी दिल्ली से लोकसभा पहुँचे। 2014 से 2024 के लोकसभा चुनावों के बीच, मनोज तिवारी ने बीजेपी की ओर से तीन बार संसदीय चुनाव जीता। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के 2022 के एक लेख में बताया गया है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग (जिन्हें पूर्वांचली कहा जाता है) शहर की 70 विधानसभा सीटों में से 16 पर संख्या के हिसाब से अन्य समुदायों से ज़्यादा हैं और शहर की कुल आबादी का 30% हिस्सा हैं। कई दशकों तक दिल्ली की राजनीति में जाटों, पंजाबी खत्रियों और ब्राह्मणों का दबदबा रहा। संख्या के हिसाब से, सभी जातियों के पंजाबी मूल के लोग दिल्ली की कुल आबादी का कम से कम 35% से 40% हिस्सा माने जाते हैं। इनमें ज़्यादातर हिंदी बोलने वाले पंजाबी हिंदू हैं, जबकि एक बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग पंजाबी बोलने वाले सिखों का है। </p>
<figure id="attachment_7946" aria-describedby="caption-attachment-7946" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7946" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/10/4-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7946" class="wp-caption-text">बिहार चैप्टर के इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) द्वारा ऐतिहासिक छठ महापर्व को यूनेस्को सांस्कृतिक विरासतों की सूची में दर्ज कराने का एक प्रयास दिली में ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बल मिल सके, बिहार की प्रयास को आगे बढ़ा सकें</figcaption></figure>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/editorial/chhath-mahaparv-vs-politics-of-purvanchal">​&#8217;छठ महापर्व&#8217; Vs &#8216;पूर्वांचल की राजनीति&#8217; : प्रदर्शनी में नहीं आते हैं, वोट के लिए दुर्गन्धित यमुना नदी में छलांग लगाते हैं</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>अपनी &#8216;उंगलियों को क्रॉस करके&#8217; रखें, &#8216;छठ महापर्व&#8217; यूनेस्को के &#8216;अमूर्त सांस्कृतिक विरासत&#8217; की सूची में अंकित होने वाला है</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-chhath-mahaparv-is-set-to-be-inscribed-on-unescos-list-of-intangible-cultural-heritage</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 25 Sep 2026 11:12:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[chhth]]></category>
		<category><![CDATA[culture]]></category>
		<category><![CDATA[festival]]></category>
		<category><![CDATA[UNESCO]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना​ / नई दिल्ली : अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए यूनेस्को का अंतर-सरकारी समिति का इक्कीसवां सत्र 30 नवंबर से 5 दिसंबर 2026 तक चीन के शियामेन में आयोजित होने जा रहा है। इस सत्र की अध्यक्षता पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के संस्कृति और पर्यटन उप-मंत्री, महामहिम श्री गाओ झेंग करेंगे। संभव है इस [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-chhath-mahaparv-is-set-to-be-inscribed-on-unescos-list-of-intangible-cultural-heritage">अपनी &#8216;उंगलियों को क्रॉस करके&#8217; रखें, &#8216;छठ महापर्व&#8217; यूनेस्को के &#8216;अमूर्त सांस्कृतिक विरासत&#8217; की सूची में अंकित होने वाला है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना​ / नई दिल्ली : अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए यूनेस्को का अंतर-सरकारी समिति का इक्कीसवां सत्र 30 नवंबर से 5 दिसंबर 2026 तक चीन के शियामेन में आयोजित होने जा रहा है। इस सत्र की अध्यक्षता पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के संस्कृति और पर्यटन उप-मंत्री, महामहिम श्री गाओ झेंग करेंगे। संभव है इस सत्र में भारत का महान धार्मिक परंपरागत पर्व छठ यूनेस्को के अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में दर्ज हो जाये। अपनी-अपनी उंगलियां क्रॉस करके रखें।</strong><br />
 <br />
इसी तैयारी के क्रम में यानी &#8220;छठ&#8221; को यूनेस्को के अमूर्त्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल करने के उद्देश्य से इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज अपने कार्यालय में प्रदर्शनी करने जा रहा है। भारत में औसतन 15 करोड़ लोग, महिला-पुरुष इस पर्व को मानते हैं, शामिल होते हैं। जानकारी के अनुसार बिहार की सभी लोक कलाओं में छठ महापर्व को आधार बनाकर ‘अर्घ्य ’ प्रदर्शनी का आयोजन 28 सितम्बर से 1 अक्टूबर तक होगा। </p>
<blockquote><p>स्थान : इंटेक मुख्यालय, <br />
71 लोधी इस्टे्ट,<br />
के.के.बिड़ला लेन, नई दिल्ली </p></blockquote>
<p>UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में किसी विरासत को शामिल करने के लिए, देशों को मूल्यांकन के लिए एक नॉमिनेशन डॉसियर (नामांकन दस्तावेज) जमा करना होता है। हर देश हर दो साल में एक विरासत को नामांकित कर सकता है। <br />
इंटैक बिहार राज्य  के संयोजक भैरव लाल दास के अनुसार ‘अर्घ्य‘ का शुभारंभ राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश द्वारा 28 सितम्बर को 11 बजे करेंगे। इंटैक के अध्यक्ष अशोक सिंह ठाकुर, सदस्य सचिव रविन्द्र  सिंह एवं क्राफ्ट डिविजन की प्रमुख बिन्दु वन्दना मनचन्‍दा भी उपस्थित रहेंगी। छठ महापर्व को यूनेस्को के अमूर्त्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल करने के उद्देश्य से आयोजित इस प्रदर्शनी की क्युरेटर मिथिला चित्रकला की विदुषी चितेरी मनीषा झा एवं अलका दास हैं। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7871" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>नीषा झा एवं अलका दास के अनुसार 30 सितम्बर को 2.00 बजे से इस प्रदर्शनी में ही छठ की ऐतिहासिकता पर एक विद्वत संगोष्ठी का भी आयोजन किया गया है जिसमें कैलाश कुमार मिश्र, दक्षेस विश्वविद्यालय के प्रो. देवनाथ पाठक, सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद दरभंगा के प्रो. विद्यानाथ झा, दिल्ली  विश्वविद्यालय के प्रो. राधा माधव भारद्वाज एवं रिपुंजय ठाकुर, पटना के डा मनोज कुमार अम्बष्ठ आदि शामिल होंगे। </p>
<p><strong>भारत की अन्य यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासतें हैं &#8211; कुटियाट्टम (संस्कृत थिएटर) (2008), वैदिक मंत्रोच्चार की परंपरा (2008), रामलीला (रामायण का पारंपरिक प्रदर्शन) (2008), रम्माण, भारत के गढ़वाल हिमालय के धार्मिक उत्सव और परंपरा का मंचन (2009, छऊ नृत्य (2010), कालबेलिया लोक गीत और नृत्य (राजस्थान) (2010),मुडियेट्टू (केरल) का अनुष्ठान थियेटर और नृत्य नाटक  (2010), लद्दाख का बौद्ध जप: हिमालयी लद्दाख क्षेत्र, जम्मू और कश्मीर, भारत में पवित्र बौद्ध ग्रंथों का पाठ ((2012), मणिपुर का संकीर्तन, अनुष्ठान गायन, ढोलक बजाना और नृत्य करना (2013), जंडियाला गुरु, पंजाब, भारत के ठठेरों के बीच पारंपरिक तौर पर पीतल और ताँबे के बर्तन बनाने का शिल्प (2014), नवरोज (2016), योग (2016), कुंभ मेला (2017), कोलकाता की दुर्गा पूजा (2021), गुजरात का गरबा (2023), और रोशनी का त्योहार, दीपावली (2024)। </strong></p>
<p>इंटैक बिहार के सह-संयोजक डा शिव कुमार मिश्र के अनुसार बिहार के 35 लोक कलाकारों को इस प्रदर्शनी में स्थान दिया गया है। ये कलाकार छठ व सूर्य पूजा से जुड़ी परंपराओं पर आधारित कलाकृतियाँ प्रदर्शित करेंगे। इन कलाकृतियों और शिल्प के जरिए, यह प्रदर्शनी छठ से जुड़े प्रतीकों, रीति-रिवाजों और मान्यताओं को उजागर करेगी। इसमें यह दिखाने की कोशिश की जाएगी कि कैसे लोक कलात्मक परंपराएँ छठ महापर्व के सांस्कृतिक महत्व को पीढ़ियों तक संजोकर रखती हैं और आगे बढ़ाती हैं। </p>
<figure id="attachment_7872" aria-describedby="caption-attachment-7872" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7872" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7872" class="wp-caption-text">​पटना के गंगा घाट पर छठ</figcaption></figure>
<blockquote><p>अर्घ्य की खास बात यह है कि यहां आने वालों को न सिर्फ़ तैयार कलाकृतियाँ देखने को मिलेंगी बल्कि उन्हें कलाकारों को काम करते हुए देखने, इन परंपराओं से जुड़े लोगों से मिलने, उनकी कार्य-प्रक्रिया को समझने और कला, रीति-रिवाज व समुदाय के बीच के रिश्ते को महसूस करने का मौका भी मिलेगा। यह प्रदर्शनी छठ पर्व के कलात्मक और सांस्कृतिक महत्व पर आधारित है। आयोजकों के अनुसार ‘’अर्घ्य’’ सिर्फ़ एक प्रदर्शनी नहीं है, यह एक अर्पण है। यह कला एवं परंपराओं का मिलन, रीति-रिवाजों और कलात्मक अभिव्यक्तियों का संगम भी है।</p></blockquote>
<p>यह विरासत को सिर्फ़ अतीत से मिली चीज़ के तौर पर नहीं, बल्कि आज भी रची, अपनाई और आगे बढ़ाई जा रही चीज़ के तौर पर देखने का अवसर प्रदान करती है। प्रदर्शनी में मिथिला पेंटिंग, पटना कलम, मंजुषा कला, भोजपुरी, सिक्की , पेपरमेशी, टेराकोटा, सुजनी, बैद्यनाथ सहित बिहार की सभी क्षेत्रों की प्रचलित एवं लोकप्रिय कला विधाओं को स्थान दिया गया है। इस प्रदर्शनी में अर्चना सिन्हा, मृणाल सिंह, मनु मीनाक्षी, साधना देवी, मिंकी दास, सविता कुमारी, प्रो. दिनेश कुमार, तृप्ति रानी, संजु दास, निभा लाभ, ममता भारती, संतोष कुमार, रामू कुमार, जितेन्द्र मोहन, अर्चना चौधरी, विनीता, प्रतीक प्रभाकर, ज्ञानती देवी, चारू वर्मा,  सोमा आनंद, मनोज चौधरी, संजय कुमार जायसवाल, अर्चना कुमारी, कंचन, नूतन लाभ, अमृता शांभवी, अन्नु झा सहित 35 से अधिक कलाकारों की कलाकृतियां प्रदर्शित होंगी। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7873" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>छठ चार दिनों का त्योहार है और इसमें साफ-सफाई का खास ध्यान रखा जाता है। इस त्योहार में गलती की कोई जगह नहीं होती। इस व्रत को करने के नियम इतने कठिन हैं, इस वजह से इसे महापर्व और महाव्रत के नाम से संबोधित किया जाता है। मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर ( तालाब ) के किनारे यह पूजा की जाती है।  मार्कण्डेय पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी ने अपने आप को छह भागों में विभाजित किया है। इनके छठे अंश को सर्वश्रेष्ठ मातृदेवी के रूप में जाना जाता है, जो ब्रह्मा की मानस पुत्री हैं। वो बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को इन्हीं देवी की पूजा की जाती है। इस व्रत को करने से संतान को लंबी आयु का वरदान मिलता है। </strong></p>
<p>कथा के अनुसार प्रियव्रत नाम के एक राजा थे। उनकी पत्नी का नाम मालिनी था। दोनों की कोई संतान नहीं थी। इस बात से राजा और उसकी पत्नी बहुत दुखी रहते थे। उन्होंने एक दिन संतान प्राप्ति की इच्छा से महर्षि कश्यप द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। इस यज्ञ के फलस्वरूप रानी गर्भवती हो गईं। नौ महीने बाद संतान सुख को प्राप्त करने का समय आया तो रानी को मरा हुआ पुत्र प्राप्त हुआ। इस बात का पता चलने पर राजा को बहुत दुख हुआ।  संतान शोक में वह आत्महत्या का मन बना लिया। लेकिन जैसे ही राजा ने आत्महत्या करने की कोशिश की उनके सामने एक सुंदर देवी प्रकट हुईं।  </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-7-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-7-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7874" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-7-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-7-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-7-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-7-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-7-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>देवी ने राजा को कहा कि मैं षष्ठी देवी हूं। मैं लोगों को पुत्र का सौभाग्य प्रदान करती हूं। इसके अलावा जो सच्चे भाव से मेरी पूजा करता है, मैं उसके सभी प्रकार के मनोरथ को पूर्ण कर देती हूं। यदि तुम मेरी पूजा करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करूंगी। देवी की बातों से प्रभावित होकर राजा ने उनकी आज्ञा का पालन किया। राजा और उनकी पत्नी ने कार्तिक शुक्ल की षष्टी तिथि के दिन देवी षष्टी की पूरे विधि-विधान से पूजा की। इस पूजा के फलस्वरूप उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से छठ का पावन पर्व मनाया जाने लगा। छठ व्रत के संदर्भ में एक अन्य कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से उसकी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया। </p>
<p><strong>हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार, छठ पूजा कार्तिक महीने के छठे दिन मनाई जाती है। लोग विशेष प्रसाद और अनुष्ठान करने के लिए गंगा के पानी को अपने घरों में भी ले जाते हैं। इस दिन घरों को अच्छी तरह से साफ किया जाता है। छठ के दूसरे दिन, जिसे खारना के नाम से भी जाना जाता है, में भक्तों को एक दिन का उपवास करना शामिल है, जो देर शाम को पृथ्वी माता की पूजा करने के बाद टूट जाता है। भगवान को चढ़ावे में चावल पुडिंग (खीर) और फल शामिल हैं, जो परिवार के सदस्यों और दोस्तों के बीच वितरित किए जाते हैं। छठ का तीसरा दिन शाम के प्रसाद के लिए प्रसाद (प्रसाद) की तैयारी में जाता है, जिसे संझिया अर्घ्य भी कहा जाता है। चौथे और अंतिम दिन, परिवार के सदस्य और दोस्त सूर्योदय से पहले नदियों के तट पर जाते हैं और उगते सूरज को प्रसाद अर्घ्य देते हैं। इस अनुष्ठान के बाद, भक्त अपना उपवास तोड़ते हैं और पड़ोसियों और रिश्तेदारों को प्रसाद वितरित करते हैं।</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7875" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>ज्ञातव्य हो की विगत वर्ष रोशनी का त्योहार, दीपावली को UNESCO की &#8216;मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत&#8217; (Intangible Cultural Heritage) की सूची में शामिल किया गया था। इसकी घोषणा 8-13 दिसंबर 2025 तक नई दिल्ली के लाल किले में आयोजित UNESCO की अंतर-सरकारी समिति के 20वें सत्र में की गई। यह इस सूची में शामिल होने वाली 16वीं भारतीय विरासत है। इसे 194 सदस्य देशों के प्रतिनिधियों, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और UNESCO के वैश्विक नेटवर्क के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में अपनाया गया। रोशनी का यह त्योहार समुदायों द्वारा आगे बढ़ाई जाने वाली एक जीवंत परंपरा है, जिसे पीढ़ियों से लगातार नया रूप दिया जाता रहा है। यह सामाजिक एकता को बढ़ावा देता है और विकास में योगदान देता है।</p>
<p>भारत के लिए दीपावली सिर्फ़ एक सालाना त्योहार नहीं है; यह करोड़ों लोगों की भावनाओं और संस्कृति से गहराई से जुड़ी एक जीवंत परंपरा है। हर साल, जब शहरों, गांवों और विदेशों में बसे भारतीयों के घरों में दीये जगमगाते हैं, तो दीपावली खुशी, नई शुरुआत और जुड़ाव की जानी-पहचानी भावना को फिर से जगाती है। यह लोगों को रुकने, याद करने और एक साथ आने के लिए प्रेरित करती है ताकि दुनिया को यह बताया जा सके कि क्यों यह त्योहार मानवता की अनमोल सांस्कृतिक परंपराओं में जगह पाने का हकदार है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7876" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/UN-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>दीपावली, जिसे दिवाली भी कहा जाता है, कार्तिक अमावस्या को मनाई जाती है, जो आमतौर पर अक्टूबर या नवंबर में आती है। दीपावली का मूल दर्शन सभी लोगों के लिए समृद्धि, नई शुरुआत और खुशहाली का जश्न मनाना है। इसका समावेशी स्वरूप अलग-अलग लोगों और समुदायों के बीच आपसी सम्मान और विविधता में एकता को बढ़ावा देता है; नतीजतन, इस त्योहार का कोई भी पहलू सामाजिक एकजुटता और सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान के सिद्धांतों के खिलाफ नहीं है। घरों, सड़कों और मंदिरों को ढेरों दीयों से रोशन किया जाता है, जिनसे निकलने वाली सुनहरी रोशनी अंधेरे पर उजाले और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक होती है। बाज़ार रंग-बिरंगे कपड़ों और बारीक कारीगरी वाली हस्तशिल्प की चीज़ों से भरे होते हैं जो रोशनी में चमकते हुए त्योहार के माहौल को और भी शानदार बनाते हैं। शाम होते ही आसमान आतिशबाजी की शानदार रोशनी से जगमगा उठता है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-chhath-mahaparv-is-set-to-be-inscribed-on-unescos-list-of-intangible-cultural-heritage">अपनी &#8216;उंगलियों को क्रॉस करके&#8217; रखें, &#8216;छठ महापर्व&#8217; यूनेस्को के &#8216;अमूर्त सांस्कृतिक विरासत&#8217; की सूची में अंकित होने वाला है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>प्राचीन मूर्तियों को &#8216;चोर और भक्त&#8217; दोनों से &#8216;खतरा&#8217; है, इस खतरे के बीच &#8216;छठ पर्व&#8217; और &#8216;सूर्य पूजा&#8217; पर संगोष्ठी दिल्ली में</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 21 Sep 2026 12:38:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[artist]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[bihar museaum]]></category>
		<category><![CDATA[chhath]]></category>
		<category><![CDATA[cuylture]]></category>
		<category><![CDATA[God Sun]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली: प्राचीन मूर्तियों को &#8216;चोर&#8217; और &#8216;भक्त&#8217; दोनों से खतरा है। बिहार की प्रमुख सूर्य प्रतिमाओं से हज़ारों की संख्या में देवी-देवताओं की मूर्तियां चोरी हो चुकी है। इस खतरे के बीच दिल्ली में शायद पहली बार &#8216;छठ पर्व और सूर्य पूजा&#8217; के इतिहास और महत्व पर एक संगोष्ठी आयोजित की गयी है। संगोष्ठी [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/ancient-idols-face-a-threat-from-both-thieves-and-devotees">प्राचीन मूर्तियों को &#8216;चोर और भक्त&#8217; दोनों से &#8216;खतरा&#8217; है, इस खतरे के बीच &#8216;छठ पर्व&#8217; और &#8216;सूर्य पूजा&#8217; पर संगोष्ठी दिल्ली में</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली: प्राचीन मूर्तियों को &#8216;चोर&#8217; और &#8216;भक्त&#8217; दोनों से खतरा है। बिहार की प्रमुख सूर्य प्रतिमाओं से हज़ारों की संख्या में देवी-देवताओं की मूर्तियां चोरी हो चुकी है। इस खतरे के बीच दिल्ली में शायद पहली बार &#8216;छठ पर्व और सूर्य पूजा&#8217; के इतिहास और महत्व पर एक संगोष्ठी आयोजित की गयी है। संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य बिहार के लोगों के साथ-साथ देश के लगभग 2.68 लाख ग्राम पंचायतों और करीब 7,800 शहरी क्षेत्रों में रहने वाले तक़रीबन 1,479,537,695 लोगों में अपनी विरासत के प्रति जागरूकता पैदा हो सके। </strong></p>
<blockquote><p>वैसे लोग बाग कितने &#8216;जागरूक&#8217; होंगे, यह कहना मुश्किल है, लेकिन बिहार के लोग कोशिश जरूर करते हैं, खासकर जो &#8216;भ्रष्ट&#8217; नहीं हैं। सामाजिक सरोकार रखते हैं। इस संगोष्ठी में विद्वान और कलाकार एक साथ आएंगे। सभी छठ पूजा के कई पहलुओं पर चर्चा करेंगे, जिसमें सूर्य के ऐतिहासिक, मूर्तिकला, स्थापत्य और प्रतिमा-संबंधी चित्रण, जीवंत सूर्य-पूजा और कला, रीति-रिवाजों व सांस्कृतिक स्मृतियों के आपसी संबंधों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। </p></blockquote>
<p>वैसे राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ही नहीं, देश के सभी 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में, जहाँ बिहार के 38 जिलों के 45103 गांव से, झारखंड के 24 जिलों के 32620 गांवों से और उत्तर प्रदेश के 75 जिलों के 106000 गांवों से अपनी रोजी-रोटी की तलाश में लोग प्रवासित हुए हैं, उन राज्यों में उनकी उपस्थिति के मद्दे नजर उनकी संस्कृति, पर्व-त्यौहार का राजनीतिकरण होता आया है और होता रहेगा ताकि मत और मतदाता का विस्थापन नहीं हो, लेकिन इन बातों को दरकिनार करते अगर वास्तव में सांस्कृतिक विकास के लिए यह आयोजन है, तो निश्चित रूप से यह काबिले तारीफ है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-1.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-1.png" alt="" width="475" height="683" class="alignleft size-full wp-image-7833" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-1.png 475w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-1-209x300.png 209w" sizes="auto, (max-width: 475px) 100vw, 475px" /></a></p>
<p>इस ऐतिहासिक अवसर का आयोजन 28 सितम्बर को दिल्ली में 71, लोधी एस्टेट, केके बिरला लें स्थित इंटक भवन में किया गया है। अर्घ्य के नाम से आयोजित इस प्रदर्शनी में छठ त्योहार से जुड़ी असली मिथिला कलाकृतियों और शिल्प के ज़रिए इस त्योहार के कलात्मक और सांस्कृतिक महत्व को दिखाया जायेगा। प्रदर्शनी का उद्घाटन कल के पत्रकार और आज के नेता राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश करेंगे। </p>
<p><strong>ज्ञातव्य है कि बिहार इंटक के सह-संयोजक डॉ. शिव कुमार मिश्र &#8220;बिहार की प्रमुख सूर्य प्रतिमाएं&#8221; नामक पुस्तक को इंटक ने प्रकाशित किया है। “बिहार की प्रमुख सूर्य प्रतिमाएँ”” में बिहार से प्राप्त प्रतिमाओं में से 145 प्रतिनिधि प्रतिमाओं का अध्ययन कर प्रकाशित किया है, जो विद्वानों एवं विद्यार्थियों दोनों के लिए लाभप्रद होगा । यह पुस्तक बिहार में सूर्योपासना की लोकप्रियता को भी विश्‍व पटल पर सामने लाने में सफल होगा ।</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-2.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-2.png" alt="" width="473" height="684" class="alignright size-full wp-image-7834" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-2.png 473w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-2-207x300.png 207w" sizes="auto, (max-width: 473px) 100vw, 473px" /></a></p>
<p>तभी तो <strong>इंटक के अध्यक्ष अशोक सिंह ठाकुर</strong> ने लिखा भी की &#8220;डॉ. शिव कुमार मिश्रजी से इंटैक को बहुत आशा है। ऐसा लगता है कि उन्होंने अपना पूरा जीवन बिहार की संस्कृति और परम्परा को समृद्ध करने में लगा दिया है। वे इसी तरह लगातार प्रयास करते रहें। डॉ . मिश्र द्वारा बिहार के सूर्य प्रतिमाओं पर प्रकाशित पुस्तक से यूनेस्को में सूर्य पूजा को स्थान दिलाने में सुविधा होगी। सूर्य पूजा पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन एवं इसमें प्रस्तुत शोध लेखों का प्रकाशन, सूर्य पूजा पर आधारित बिहार के लोक कलाओं की अर्घ्य नामक प्रदर्शनी सूर्य प्रतिमाओं पर पुस्तक का प्रकाशन और बिहार के विभिन्न भाषा बोलियों में गाए जाने वाले छठ गीतों का संग्रह कर प्रकाशन करना आदि ऐसे कार्य हैं जिसके लिए इंटैक बिहार की मुक्तकंठ से प्रशंसा की जानी चाहिए।&#8221;</p>
<p><strong>पटना संग्रहालय के निदेशक उमेश चंद्र द्विवेदी</strong> का कहना है कि &#8220;सूर्योपासना की परम्परा संसार के अनेक प्राचीन सभ्यता ओं में प्रचलित रही। सूर्य के दिव्य प्रकाश को देखते हुए एवं अंधकार को विनष्ट करने की शक्ति के कारण मानव ने उन्हें सबसे पहले देवत्व प्रदान किया। भारत में सूर्य की पूजा की परंपरा प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही है। उन संस्कृतियों में प्रचलित विभिन्न प्रतीकों का सूर्य के प्रतीक से तादात्म्य स्थापित कर यह अनुमान किया जाता है कि सूर्योपासना का प्रचलन प्रागैतिहासिक संस्कृति में भी था। प्राचीन गुफा चित्रों में सूर्य का चित्रण हमें देखने को मिलता है, जिनका काल अनेक विद्वानों ने नवपाषाण काल माना है। हड़प्पा संस्कृति में दिखाई देने वाले “स्वास्तिक&#8217;, &#8216;चक्र&#8217;, किरण युक्त मण्डल” आदि प्रतीक परवर्ती युग में सूर्य के प्रतीक समझे जाते थे। वैदिक युग में सूर्य से संबंधित अनेक देवताओं की कल्पना की गई थी, जिनमें सविता, पूषण, मित्र, अर्यमन और विष्णु प्रमुख थे। इसी काल में द्वादशादित्य की भी कल्पना की गई । ऋग्वेद में सूर्य के द्वारा रथ पर भ्रमण करने का उल्लेख है, जिनके रथ में एक से अधिक या सात अश्व के द्वारा चला ये जाने का उल्लेख है। परन्तु इस समय तक सूर्य के प्रतिमा का निर्माण प्रारंभ नहीं हुआ था । </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-3.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-3.png" alt="" width="470" height="683" class="alignleft size-full wp-image-7835" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-3.png 470w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-3-206x300.png 206w" sizes="auto, (max-width: 470px) 100vw, 470px" /></a></p>
<p>द्विवेदी जी आगे कहते हैं कि &#8220;विष्णु धर्मोत्तर पुराण, मत्स्य पुराण, अग्नि पुराण, भविष्य पुराण, वृहत संहिता जैसे ग्रन्थों में सूर्य प्रतिमा के निर्माण का विधान का उल्लेख हमें सर्वप्रथम मिलता है। भारतीय कला में सूर्य के प्रारंभिक चित्रण का श्रेय बिहार को ही जाता है। बोधगया से प्राप्त एक स्तंभ पर रथ पर सवार सूर्य का चित्रण हमें सर्वप्रथम देखने को मिलता है । यहाँ सूर्य एक चक्रवाले रथ पर सवार हैं, जिसे चार घोड़े खींच रहे हैं । सूर्य के हाथ में घोड़ों की रास है। उनके दोनों ओर एकएक नारी प्रतिमा को दिखाया गया है, जिसकी पहचान उषा एवं प्रत्युषा से की गई है। यह प्रतिमा शुंगकालीन है। लगभग इसी समय की मिट्टी की गोलाकार ठीकरा (फलक) पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना ) से प्राप्त है, जिस पर सूर्य चार घोड़ों से जुते हुए रथ पर सवार हैं। उनके साथ उनके सारथी अरुण को भी इस मृण्मू्तिमू् में प्रदर्शित किया गया है। बिहार के इस क्षेत्र में सूर्य पूजा की यह परंपरा आज भी वर्तमान है एवं छठ पूजा इस क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण व्रत है। बिहार के कलाकारों ने सूर्य की लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए इस देवता की अनेकों प्रतिमायें बनाई । इसके साथ बिहार में अनेक सूर्य मंदिरों का भी निर्माण हुआ। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-4.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-4.png" alt="" width="479" height="688" class="alignright size-full wp-image-7836" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-4.png 479w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-4-209x300.png 209w" sizes="auto, (max-width: 479px) 100vw, 479px" /></a></p>
<p>बहरहाल, <strong>डॉ. जलज कुमार तिवारी, डिप्टी सुपरिटेंडेंट आर्कियोलॉजिस्ट, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया</strong> का कहना है कि &#8220;प्राचीन मूर्तियों को चोर एवं भक्त दोनों से खतरा रहता है। असुरक्षित स्थानों से चोरी का हमेशा खतरा बना रहता है उसी तरह मंदिरों में भक्तों द्वारा पानी, सिन्दूर, मिठाई आदि चढ़ाने से मूर्तियों एवं शिवलिंगों का क्षरण होता रहता है। समुचित रखरखाव हेतु संग्रहालय में पुरावशेषों को रखना आवश्यक होता है। इंडियन ट्रेजर ट्रोव एक्ट 1978 तथा बिहार पुलिस मैनुअल 1978 में इसका प्रावधान भी है कि प्रशासनिक एवं पुलिस पदाधिकारियों का यह दायित्व है कि पुरावशेषों को संग्रहालय में संग्रह गृहीत करे। लेकिन सामान्यता इन नियमों के अनुपालन में उदासीनता बरती जाती है। पोखर उड़ाही, सड़क निर्माण, मिट्टी खुदाई के दौरान प्राचीन मूर्तियाँ अक्सर मिलती रहती हैं। लोग पूजा पाठ आरंभ करते हैं मंदिर निर्माण किया जाता है। प्रशासन उदासीन बना रहता है। सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था नहीं होती जिससे अक्सर चोरी की घटनाएं होती रहती हैं। मूर्तियों की चोरी से हमारे सांस्कृतिक इतिहास के प्रमाण खत्म रहे हैं । </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-5.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-5.png" alt="" width="467" height="688" class="alignleft size-full wp-image-7837" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-5.png 467w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-5-204x300.png 204w" sizes="auto, (max-width: 467px) 100vw, 467px" /></a></p>
<p><strong>बिहार में सूर्योपासना का प्रमाण आरंभिक समय से ही मिलता है। पौराणिक कथानुसार, याज्ञवल्क्य को यजुर्वेद का दर्शन सूर्योपासना से प्राप्त हुआ था। सूर्य के प्रति आर्यों की स्वाभाविक आस्था थी जो अपने प्रकाश और तेज से समस्त जगत एवं जीवों को आलोकित करता था । वह सात हरित अश्व के रथ पर बैठकर गतिमान होता था । उसे द्यौस, मित्र और वरुण का चक्षु माना जाता था । उसकी उपासना पांच रूपों यथा -सूर्य, सविता , मित्र, पूषन एवं विष्णु के रूप में की जाती थी । सूर्य, जिसका पूजन प्राकृतिक और स्वाभाविक रूप से होता था जो दिन में दिखाई पड़ता था और अपने प्रभाव से मार्गदर्शन करता था । सविता , जो सूर्य की प्रेरक शक्ति को अभिव्यक्त करता था तथा जिसकी प्रार्थना में गायत्री मंत्र का उच्चारण किया जाता था। वह स्वर्णिम देवता था। उसके नेत्र, हाथ, जिह्वा एवं भुजाएं स्वर्णिम थीं । सविता में सूर्य का दिन में दिखाई पड़ने वाला रूप और रात्रि में न दिखाई देने वाला रूप दोनों थे । मित्र, सूर्य का ही एक अंश था , जिसकी आराधना ईरान में अधिक की जाती थी । वहाँ वह वरुण के साथ वर्णित किया जाता था । पूषन, सूर्य की ही शक्ति का परिचायक था जो औषधि और वनस्पति जगत के संवर्द्धन में योगदान करता था । विष्णु, जो ऋग्वेद में आकाश में विचरण करने वाला सूर्य का रूप था ।</strong></p>
<p>बिहार की प्रमुख सूर्य प्रतिमाएँ सूर्योपासना के विभिन्न माहात्म्य का उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार, महिलाओं द्वारा सूर्योपासना से विभिन्न प्रकार के पुण्य प्राप्त होने की मान्यता है। वर्तमान काल में छठ पूजा की जो परंपरा है उसमें भी उसी परम्परा का अनुपालन किया जाता है जैसा कि कृत्य रत्नाकर में उल्लिखित है। तेरहवीं , चौदहवीं शताब्दी में छठ पूजा के विषय में समाज के लोगों को पता था इससे ऐसा प्रतीत होता है कि उससे बहुत पहले अर्थात सैकड़ों वर्षों से समाज में महिलाओं द्वारा सूर्योपासना अर्थात् छठ पूजा की परम्परा स्थापित रही होगी । चौदहवीं शताब्दी के विद्वान रूद्रधर द्वारा वर्षकृत्य में सूर्यो पा सना अर्थात् छठ परम्परा का उल्लेख है। बाद में औपनिवेशिक चित्रकला पटना कलम में भी छठ के दृश्यों का अंकन किया गया है। अठारहवीं शताब्दी की अंतिम में पटना कलम में छठ के दृश्यों का अंकन किया गया है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-6.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-6.png" alt="" width="469" height="594" class="alignright size-full wp-image-7838" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-6.png 469w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-6-237x300.png 237w" sizes="auto, (max-width: 469px) 100vw, 469px" /></a></p>
<p>उन्नीसवीं सदी के आरंभ में फ्रांसिस बुकानन ने भी अपने शाहाबाद रिपोर्ट में कहा है कि बिहार के तालाबों एवं नदियों के किनारे महिलाओं द्वारा कार्तिकर्ति मास के छठे एवं सातवें दिन क्रमशः शाम एवं सुबह को सूर्योपासना की जाती है। उनके अनुसार, महिलाएं उपवास रखती हैं तथा एक साथ गीत गाती हुई नदी एवं तालाब को जाती है। सूर्यास्त के समय पूजा करती हैं । जमीन पर बैठकर रात बिताते हैं और दूसरे दिन सूर्योदय के बाद सूर्योपासना के बाद ही भोजन करती हैं। </p>
<p>बुकानन के अनुसार बंगाल के लोगों में यह प्रथा प्रचलित नहीं थी। मिथिला में प्रचलित बर्षकृत्य में रामचन्द्र झा द्वारा छठ पूजा का उल्लेख करते हुए षष्ठी देवी की कथा सुनने की व्यवस्था की गई है। इस कथा में सूर्योपासना के बदले षष्ठी देवी की पूजा करने पर बल दिया गया है। लेकिन महा कवि विद्यापति द्वारा उनके वर्षकृत्य में पुत्र जन्म के छठे दिन षष्ठी देवी पूजा का विधान किया गया है। उनके वर्षकृत्य में छठ पूजा का उल्लेख नहीं है जिससे प्रतीत होता है कि छठ पूजा मध्यकाल में अधिक लोकप्रिय नहीं रही होगी । </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-7.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-7.png" alt="" width="475" height="690" class="alignleft size-full wp-image-7839" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-7.png 475w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-7-207x300.png 207w" sizes="auto, (max-width: 475px) 100vw, 475px" /></a></p>
<p>प्राचीन काल से ही सूर्य का बहुत महत्व रहा है। आदिमानव न केवल सूर्य की भव्यता से बहुत प्रभावित था, बल्कि उसे जीवन और ऊर्जा का एकमात्र स्रोत भी मानता था। प्रागैतिहासिक और आद्य-ऐतिहासिक काल की गुफा-चित्रकारी और मिट्टी के बर्तनों पर सूर्य को चक्र या पहिये के रूप में दिखाए जाने के आधार पर, विद्वानों का मानना है कि उन्हें पवित्र माना जाता था और उनकी पूजा भी की जाती थी। उन्हें न केवल पूरे सौर मंडल और नवग्रहों का प्रमुख माना जाता है, बल्कि सभी मौसमों, प्रकाश, गर्मी, भोजन, वनस्पति और इंसानों के अस्तित्व के लिए ज़रूरी हर चीज़ के लिए भी जिम्मेदार माना जाता है। वैदिक और उत्तर-वैदिक काल में भी उनका बहुत महत्वपूर्ण स्थान था। ऋग्वैदिक काल में, सूर्य उन पांच महान प्राकृतिक शक्तियों में से एक प्रमुख देवता थे जिनकी पूजा की जाती थी। ऋग्वेद में 14 सूक्त हैं जिनमें सूर्य को दृष्टि देने वाला, अग्नि देवता का महान सहायक, अंधापन दूर करने वाला, बीमारियों को नष्ट करने वाला और दुनिया के हर जीव की आत्मा बताया गया है।</p>
<p><strong>उत्तर-वैदिक काल में उन्हें पूरे सौर मंडल और नवग्रहों का नेता माना जाता है। महाकाव्यों और पुराणों में सूर्य को मानवीय रूप दिया गया है और उनके परिवार तथा संतानों का भी वर्णन किया गया है। अपने अनोखे गुणों के कारण, विभिन्न पुराणों में सूर्य की तुलना ब्राह्मण धर्म की त्रिमूर्ति &#8211; ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता), विष्णु (पालनकर्ता) और महेश (संहारकर्ता) &#8211; से की गई है और उनसे उनका गहरा संबंध बताया गया है। स्कंद पुराण के अनुसार, सूर्य देवता ब्रह्मा, विष्णु और शिव का सम्मिलित रूप हैं। भविष्य पुराण कहता है कि सूर्य देवता सर्वोच्च देवता हैं और उन्हें ब्राह्मण धर्म की त्रिमूर्ति से जोड़ता है। मार्कंडेय पुराण हमें बताता है कि सूर्य देवता का शरीर ब्रह्मा, विष्णु और शिव के शरीर के समान ही है; उनके तेजस्वी शरीर का वास्तविक स्वरूप इन्हीं तीन पहलुओं से मिलकर बना है।</strong> </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-8.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-8.png" alt="" width="481" height="681" class="alignright size-full wp-image-7840" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-8.png 481w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-8-212x300.png 212w" sizes="auto, (max-width: 481px) 100vw, 481px" /></a></p>
<p>सूर्य की पूजा सिर्फ़ हिंदू धर्म तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि जैन और बौद्ध धर्मों में भी उन्हें देवता के रूप में पूजा जाता था। सूर्य पूजा का यह क्रम सदियों से चला आ रहा है और भारत में, खासकर बिहार में, आज भी जारी है। यह भी सच है कि पिछले दो दशकों में बिहार में जमीन की खुदाई या तालाबों की सफाई के दौरान गुप्त काल के बाद से लेकर मध्यकाल तक की सूर्य और अन्य देवी-देवताओं की कई पत्थर की मूर्तियाँ मिली हैं, लेकिन ज्यादातर मूर्तियों का ठीक से अध्ययन या प्रकाशन नहीं हुआ है।</p>
<p>कैमूर जिले के चांद ब्लॉक में चट्टानों पर बनी कलाकृतियों (पेट्रोग्लिफ) में सूर्य को किरणों वाली डिस्क के प्रतीकात्मक रूप में दिखाया गया है। चिरांद की खुदाई में नवपाषाण काल (नियोलिथिक) के स्तर के एक मिट्टी के बर्तन के टुकड़े पर सूर्य को सोलह तीलियों वाले पहिये के प्रतीकात्मक रूप में दिखाया गया है। शुरुआती ऐतिहासिक काल के वैशाली से मिले मिट्टी के बर्तनों पर भी सूर्य का प्रतीक और किरणों वाली डिस्क की कलाकृति देखी गई है। वैशाली की खुदाई में उसी काल (200 ईसा पूर्व &#8211; 200 ईस्वी) के बाद के स्तर से पत्ती और पहिये के डिजाइन वाले बर्तन के टुकड़े और लाल मिट्टी के बर्तन के टुकड़े पर संकेंद्रित घेरों के अंदर पत्ती और गोल आकृतियों की मुहर वाली सजावट भी मिली है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-9.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-9.png" alt="" width="476" height="685" class="alignleft size-full wp-image-7841" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-9.png 476w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-9-208x300.png 208w" sizes="auto, (max-width: 476px) 100vw, 476px" /></a></p>
<p><strong>वैशाली से मिले लाल मिट्टी के बर्तन पर सूर्य का प्रतीक और पत्ती की सजावट बनी हुई है और इसे वैशाली संग्रहालय में रखा गया है। पत्ती और सूर्य का प्रतीक प्रकृति और सूर्य के बीच संबंध को दिखाते हैं। ब्लॉक द्वारा खोजी गई टेराकोटा की एक मुहर पर फ़ारसी अग्नि वेदी के चित्रण के साथ &#8220;रविदास&#8221; लिखा हुआ है। उसी काल की एक और मुहर पर सजावटी पहिये के चित्रण के साथ &#8220;रविदत्त स्वामी&#8221; लिखा हुआ है। फ़ारसी अग्नि वेदी और पहिया दोनों ही सूर्य के प्रतीकात्मक रूप हैं। डी. बी. स्पूनर द्वारा बसाढ़ की खुदाई में मिली एक मुहर पर अग्नि वेदी के ऊपर रखे सूर्य डिस्क के चिह्न के साथ &#8220;भगवत आदित्यस्य&#8221; लिखा हुआ है। वैशाली में उगते सूरज के प्रतीक वाली टेराकोटा की सीलिंग भी मिली है और इसे वैशाली संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है। </strong></p>
<p>वैशाली साइट से मिले मिट्टी के बर्तनों पर सूर्य के प्रतीक मिलते हैं। लाल मिट्टी के बर्तन (रेड वेयर) के एक टुकड़े पर सूर्य का प्रतीक बना है, जो लगभग 300-150 ईसा पूर्व का है; और यही प्रतीक लाल स्लिप्ड वेयर के एक टुकड़े पर भी मिलता है, जो लगभग 300-600 ईस्वी का है। वैशाली संग्रहालय में मिट्टी (टेराकोटा) के दो ताबीज या पेंडेंट सुरक्षित हैं, जो गुप्त काल के हैं और लगभग एक ही तरह से बनाए गए हैं । इनमें से एक पर गोल घेरों के अंदर गोल आकृतियों का उभरा हुआ डिजाइन है जो सूर्य का प्रतीक है। चिरांद की खुदाई में काल III (कुषाण-गुप्त काल) से मिट्टी का एक खास ताबीज मिला है, जिस पर दो भुजाओं वाले सूर्य को चार घोड़ों के रथ पर सवार दिखाया गया है और उनके दोनों ओर दो महिला परिचारिकाएं हैं। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-10.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-10.png" alt="" width="471" height="679" class="alignright size-full wp-image-7842" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-10.png 471w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-10-208x300.png 208w" sizes="auto, (max-width: 471px) 100vw, 471px" /></a></p>
<p>वैशाली से जैस्पर पत्थर के बने कान के कई आभूषण भी मिले हैं, जिन पर पूरी तरह खिले कमल का डिज़ाइन है जो सूर्य का प्रतीक है; इन्हें वैशाली संग्रहालय में रखा गया है। पहिया और कमल को भी सूर्य से गहराई से जुड़ा माना जाता है। इसलिए, आभूषणों में सूर्य को बिना मूर्ति के रूप में दिखाने के लिए भी इन प्रतीकों का इस्तेमाल किया जाता था। बिहार में मानव रूप में सूर्य देवता का सबसे पुराना सबूत पटना के कदमकुआं में मौर्य काल के स्तर की खुदाई में मिली मिट्टी की गोल डिस्क पर मिलता है। इसमें सूर्य को चार तेज़ दौड़ते घोड़ों वाले रथ पर खड़े दिखाया गया है और वे धनुष से तीर चला रहे हैं। देवता के दाईं ओर सारथी को दिखाया गया है, जिसने बाएं हाथ से लगाम पकड़ी हुई है और दाएं हाथ में एक छड़ी ले रखी है। कुछ कला इतिहासकारों ने शैली के आधार पर कला के इस नमूने को शुंग काल का माना है। </p>
<p><strong>सारण जिले के चिरांद में खुदाई के दौरान कुषाण-गुप्त काल का एक गोल टेराकोटा ताबीज़ मिला है। इसमें दो समानांतर छेद हैं और बीच में सूर्य की आकृति है जो चार घोड़ों वाले रथ पर सवार हैं और उनके दोनों तरफ़ दो महिला परिचारिकाएँ हैं। बिहार में शुंग काल की शैली में मानव रूप में सूर्य का चित्रण वैशाली और बलिराजगढ़ की टेराकोटा कला में भी मिलता है। बसढ़ (वैशाली) की खुदाई में पंखों वाले देवता की टेराकोटा मूर्ति मिली है। अभी इसे पटना के बिहार संग्रहालय में रखा गया है। इस पट्टिका में एक आकृति कमल के फूलों के बीच खड़ी है और उसने कमर के पास हाथों में दो लंबे डंठल पकड़ रखे हैं। आकृति भारी डिस्क के आकार के झुमके, गले का हार, बाजूबंद, चूड़ियाँ, कमरबंद और पायल पहने हुए है। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-11.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-11.png" alt="" width="466" height="677" class="alignleft size-full wp-image-7843" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-11.png 466w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-11-206x300.png 206w" sizes="auto, (max-width: 466px) 100vw, 466px" /></a></p>
<p>एल. पी. पांडे ने सही ढंग से इस पंखों वाले देवता की पहचान सूर्य के रूप में की, क्योंकि यह कमल के फूल पर खड़ा है और दोनों हाथों में कमल का फूल पकड़े हुए है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि इसके कंधों से दो पंख जुड़े हुए हैं; यह हमें सुपर्ण की याद दिलाता है, जो सूर्य देवता का एक वैदिक नाम है। ऋग्वेद के कुछ भजनों में सूर्य का वर्णन एक पक्षी, विशेषकर चील या बाज़ के रूप में किया गया है, जिसके पंख बहुत अच्छे हैं। इसी तरह की साबुत टेराकोटा पट्टिका जिसमें पंखों वाले सूर्य को दिखाया गया है, राजा विशाल का गढ़ (वैशाली) में भी मिली है और बलिराजगढ़ से पंखों वाले सूर्य की टेराकोटा पट्टिका का ऊपरी हिस्सा मिला है। यह ध्यान देने वाली बात है कि कुषाण काल की सूर्य की सबसे पुरानी मूर्ति, जो मथुरा के सप्त समुद्र कुएँ से निकाली गई थी, उसमें सूर्य को चार तेज़ दौड़ते घोड़ों वाले रथ पर बैठे पंखों वाले देवता के रूप में दिखाया गया है। </p>
<p>बिहार का लगभग पूरा इलाका शुंग काल से लेकर मध्यकाल तक सूर्य की पत्थर की मूर्तियों से भरा हुआ था। बोधगया में मिली पुरानी पत्थर की रेलिंग पर बना रिलीफ (उभरी हुई नक्काशी), जो शुंग काल का है, पत्थर में सूर्य का सबसे पुराना चित्रण है। कुषाण काल की पत्थर की मूर्ति तपोवन (गया जिला) में देखी गई है, जिसे अभी नवादा संग्रहालय में रखा गया है। इस नमूने में सूर्य को खड़े मुद्रा में दिखाया गया है और उनके दोनों तरफ़ कुषाण पोशाक में दंड और पिंगल हैं। दुर्भाग्य से मूर्ति का ऊपरी हिस्सा गायब है। इस इलाके में गुप्त काल के बाद की सूर्य की मूर्तियाँ बहुत कम मिलती हैं और ये नवादा और बिहार शरीफ के म्यूजियम में देखी जा सकती हैं, लेकिन 9वीं सदी के बाद से सूर्य पूजा को बढ़ावा मिला और पाल और कर्नाट काल (9वीं सदी से 14वीं सदी ईस्वी) में यह अपने चरम पर पहुँच गई, जिसकी पुष्टि मूर्तियों के मिलने से होती है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-12.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-12.png" alt="" width="475" height="682" class="alignright size-full wp-image-7844" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-12.png 475w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-12-209x300.png 209w" sizes="auto, (max-width: 475px) 100vw, 475px" /></a></p>
<p>भारत में शुरुआती ऐतिहासिक काल से लेकर शुरुआती मध्यकाल तक ब्राह्मणवादी कला में सूर्य सबसे आम विषय रहे हैं। सूर्य की पूजा अलग-अलग और मिश्रित रूपों में की जाती है। भारतीय संदर्भ में मिश्रित रूपों (सिंक्रेटिज्म) के अध्ययन के लिए बिहार से मिली सूर्य की मिश्रित मूर्तियां बहुत महत्वपूर्ण हैं। बिहार में सूर्य का अन्य देवी-देवताओं के साथ जुड़ाव गुप्त काल से देखा जा सकता है और पाल काल में यह अपने चरम पर पहुंच गया। </p>
<p><strong>बिहार क्षेत्र के कलाकारों ने न केवल सूर्य को ब्राह्मणवादी देवी-देवताओं के साथ, बल्कि बौद्ध देवी-देवताओं के साथ भी दिखाया। बिहार से मिली &#8216;रुद्र-भास्कर&#8217; की मूर्ति को भारतीय संदर्भ में इस तरह की मूर्ति का सबसे शुरुआती उदाहरण माना जा सकता है। तिलकेश्वरगढ़ से मिली &#8216;हरिहरार्क&#8217; की मूर्ति बिहार और पाल कला का एकमात्र ज्ञात उदाहरण है। सूर्य, हरिहर और बुद्ध को दिखाने वाली मूर्ति और एक ही मंच पर सूर्य, ब्रह्मा और कार्तिकेय को दिखाने वाली मूर्ति, साथ ही अन्य बौद्ध देवी-देवताओं के साथ सूर्य की मूर्तियां कला के दुर्लभ नमूने हैं और इस तरह का कोई दूसरा नमूना नहीं मिला है। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-13.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-13.png" alt="" width="482" height="684" class="alignleft size-full wp-image-7845" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-13.png 482w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-13-211x300.png 211w" sizes="auto, (max-width: 482px) 100vw, 482px" /></a></p>
<p>मखपा में मिली सूर्य की मिश्रित मूर्ति, सूर्य की सबसे अनोखी मूर्तियों में से एक है, जो अपनी मौलिकता के लिए उल्लेखनीय है। बिहार से मिली सूर्य नारायण की दो-तरफा (बाइफेशियल) मूर्तियां काफी उल्लेखनीय हैं। भारतीय संदर्भ में सूर्य नारायण की दो-तरफा मूर्तियां मुख्य रूप से बिहार में ही देखी जाती हैं। बिहार के बाहर केवल एक उदाहरण मिलता है जो भारत कला भवन, वाराणसी में संरक्षित है, और हो सकता है कि इसे बिहार से ही लाया गया हो। गुप्त काल के बाद और पाल काल में शिवलिंग, स्तंभ या ओबिलिस्क के चारों ओर सूर्य सहित चार संप्रदाय के देवताओं को दिखाने का चलन लोकप्रिय हुआ। प्रतिमा-विज्ञान संबंधी ग्रंथ हरिहरार्क, मिश्रित शिवलिंग और दो-तरफा सूर्य नारायण रूप के बारे में चुप हैं, लेकिन मूर्तिकला में इस तरह का चित्रण कलाकारों की कलात्मक कल्पना और उस समय के धार्मिक समाज की जरूरतों का परिणाम हो सकता है। </p>
<p><strong>इस तरह, बिहार में मिली सूर्य की मिली-जुली (सिंक्रेटिक) मूर्तियाँ उस इलाके में धार्मिक सहिष्णुता और अलग-अलग धर्मों के मेलजोल के साथ-साथ बिहार के गुप्त-बाद के और पाल काल के मूर्तिकारों की नई सोच और हुनर पर भी रोशनी डालती हैं। बिहार इलाके में नवग्रह पैनल और अष्टादिकपाल पैनल में सूर्य की पूजा का भी चलन था। गया, नालंदा, विक्रमशिला, जयमंगला-गढ़, बीरपुर, चंद्रधारी संग्रहालय (दरभंगा), खपरपुरा (मधुबनी) में नवग्रह पैनल और नालंदा, गया और चेचर आदि जगहों पर अष्टादिकपाल पैनल मिलने से इसकी पुष्टि होती है। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-14.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-14.png" alt="" width="474" height="681" class="alignright size-full wp-image-7846" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-14.png 474w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-14-209x300.png 209w" sizes="auto, (max-width: 474px) 100vw, 474px" /></a></p>
<p>रेवंत, सूर्य के बेटों में से एक हैं। मार्कंडेय पुराण और कालिका पुराण के अनुसार, रेवंत लोगों को कई तरह के दुश्मनों, लुटेरों और जंगलों के खतरों से बचाते हैं और अपने भक्तों को अच्छी सेहत, आराम, खुशी, बुद्धि, अच्छे रिश्ते और ऊँचा पद देते हैं। नालंदा, घोषरावां, गया, बरईपुरा आदि जगहों पर रेवंत की मूर्तियां देखी गई हैं। </p>
<p>बिहार में बारागाँव, अंगारी, पंडारक, देव बरुनारक, उमगा, देव और कंदहा में कई मशहूर सूर्य मंदिर हैं जो ध्यान देने लायक हैं। हालाँकि मंदिरों की बनावट बहुत पुरानी नहीं है, लेकिन सूर्य की मूर्तियां निश्चित रूप से पुरानी हैं। यह कहा जा सकता है कि ये मंदिर सूर्य मंदिरों की पुरानी जगहों पर ही बने हैं। इस तरह, अलग-अलग जगहों पर मिली रॉक आर्ट, सिक्के, मुहरें, मिट्टी के बर्तन के टुकड़े, टेराकोटा के ताबीज, पट्टिकाएँ, पत्थर की मूर्तियाँ और मंदिरों के अवशेष जैसे पुरातात्विक सबूत साफ तौर पर साबित करते हैं कि बिहार इलाके में कम से कम नवपाषाण काल से ही सूर्य पूजा की परंपरा बड़े पैमाने पर प्रचलित थी। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-16.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-16.png" alt="" width="468" height="679" class="alignleft size-full wp-image-7847" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-16.png 468w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/S-16-207x300.png 207w" sizes="auto, (max-width: 468px) 100vw, 468px" /></a></p>
<p><strong>आज भी बिहार में सूर्य पूजा वहाँ की संस्कृति में गहराई से बसी हुई है, खासकर छठ पूजा के त्योहार के ज़रिए। यह सूर्य देवता को समर्पित चार दिनों का त्योहार है, जिसे कड़े नियमों, उपवास और डूबते व उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ मनाया जाता है, जिसमें नदियों, तालाबों या किसी भी जलाशय में पवित्र डुबकी लगाना भी शामिल है। सूर्य देवता को जीवन, ऊर्जा और जीवन-शक्ति का स्रोत माना जाता है और भक्त सेहत, समृद्धि और भलाई के लिए आशीर्वाद मांगते हैं। छठ पूजा कई मायनों में अनोखी है क्योंकि इसमें मूर्तियों या किसी पुजारी की मौजूदगी के बजाय सूर्य देवता की उनके प्राकृतिक रूप में पूजा करने पर ज़ोर दिया जाता है। इस प्रकार, पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर बिहार में सूर्य पूजा की परंपरा को नवपाषाण काल से ही देखा जा सकता है और यह आज भी जारी है।</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/ancient-idols-face-a-threat-from-both-thieves-and-devotees">प्राचीन मूर्तियों को &#8216;चोर और भक्त&#8217; दोनों से &#8216;खतरा&#8217; है, इस खतरे के बीच &#8216;छठ पर्व&#8217; और &#8216;सूर्य पूजा&#8217; पर संगोष्ठी दिल्ली में</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>दरभंगा राज: &#8216;सरकार&#8217; बनाम &#8216;स्वयंभू सरकार&#8217; (भाग-1) ✍ वह &#8216;सरकार&#8217; है, &#8216;कुछ भी&#8217; कर सकती है, &#8216;राजनगर&#8217; क्या &#8216;रामबाग&#8217; पर भी आधिपत्य जमा सकती है &#8211; इतिहास गवाह है</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/government-vs-self-proclaimed-government-part-1</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 15 Sep 2026 11:56:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[heritage]]></category>
		<category><![CDATA[madhubani]]></category>
		<category><![CDATA[maharaja of darbhanga]]></category>
		<category><![CDATA[rajnagar]]></category>
		<category><![CDATA[ruins of mithila]]></category>
		<category><![CDATA[samrat chaudhari]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दरभंगा / पटना : सरकार &#8216;सरकार&#8217; होती है। &#8216;सत्ता&#8217; और &#8216;कानून&#8217; सरकार को &#8216;राष्ट्र के हित&#8217; में कोई भी कार्य करने का सर्वाधिकार देता है। आज़ादी के चौथे वर्ष 1951 में भारत के संविधान में पहला संशोधन किया गया था, जिसमें अन्य बातों के अलावे &#8216;भूमि सुधार&#8217; का मामला प्रमुख था, जो अंततः जमींदारी प्रथा [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/government-vs-self-proclaimed-government-part-1">दरभंगा राज: &#8216;सरकार&#8217; बनाम &#8216;स्वयंभू सरकार&#8217; (भाग-1) ✍ वह &#8216;सरकार&#8217; है, &#8216;कुछ भी&#8217; कर सकती है, &#8216;राजनगर&#8217; क्या &#8216;रामबाग&#8217; पर भी आधिपत्य जमा सकती है &#8211; इतिहास गवाह है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा / पटना : सरकार &#8216;सरकार&#8217; होती है। &#8216;सत्ता&#8217; और &#8216;कानून&#8217; सरकार को &#8216;राष्ट्र के हित&#8217; में कोई भी कार्य करने का सर्वाधिकार देता है। आज़ादी के चौथे वर्ष 1951 में भारत के संविधान में पहला संशोधन किया गया था, जिसमें अन्य बातों के अलावे &#8216;भूमि सुधार&#8217; का मामला प्रमुख था, जो अंततः जमींदारी प्रथा की समाप्ति पर विराम लिया। विगत माह हम जश्ने आज़ादी का 80 वां वर्षगाँठ मनाये है और अब तक देश के संविधान में कुल 106 संशोधन हुए हैं। यानी औसतन प्रतिवर्ष 1.3 का संशोधन अनुपात है &#8211; आप माने या नहीं, आपकी मर्जी। </strong></p>
<blockquote><p>अगर सरकार देश को आज़ाद होने के कुछ समय बाद ही, राष्ट्र हित को सामने लाकर स्वतंत्र भारत के सैकड़ों जमींदारों की जमींदारी &#8216;जब्त&#8217; कर सकती है, बैंकों का &#8216;राष्ट्रीयकरण&#8217; कर सकती है, निजी क्षेत्र के हज़ारों कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर सकती है, बैंको का विलय कर सकती है &#8211; तो दरभंगा के संतानहीन महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह (अब दिवंगत) द्वारा अपने अनुज राजाबहादुर विश्वेश्वर सिंह (अब दिवंगत) को कल के दरभंगा और आज के मधुबनी जिला में स्थित राजनगर परिसर पर कब्ज़ा क्यों नहीं कर सकती? इसमें कौन सी बड़ी बात है ?  वह &#8216;सरकार&#8217; है, कुछ भी कर सकती है &#8211; इतिहास गवाह है। </p></blockquote>
<p>&#8216;सरकार&#8217; और सरकार में बैठे लोग उन दिनों भी &#8216;आर्थिक सत्ता के केन्द्रीयकरण के खिलाफ थे,&#8217; आज समय के साथ-साथ सोच में भी आमूल परिवर्तन हुआ है। आज भी नहीं चाहते कि किसी एक व्यक्ति अथवा ट्रस्ट के अधीन कई हज़ार करोड़ की संपत्ति केंद्रित&#8217; रहे &#8211; चाहे वह पुस्तैनी धन ही क्यों न हो। स्वाभाविक है मधुबनी के राजनगर परिसर पर सत्ता में बैठे लोगों की नजर टिकेगी ही  &#8211; 369 एकड़ जमीन कम नहीं होती और इस जमीन को दरभंगा के वर्तमान “स्वयंभू सरकार” अपनी मेहनत से अर्जित नहीं किए हैं। स्वाभाविक है कुछ नियम भी बनेगा, कुछ नियमों में संशोधन भी होगा और &#8216;स्वयंभू सरकार&#8217;  चापलूसों और चाटुकारों के बीच बैठकर दरभंगा राज की गरिमा की बात, संस्कृति की बात करते रहेंगे &#8211; दुखद है।<br />
 <br />
<figure id="attachment_7821" aria-describedby="caption-attachment-7821" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/a.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/a.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-7821" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/a.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/a-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/a-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/a-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/a-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7821" class="wp-caption-text">राजनगर का अवशेष &#8211; यह मानसिकता का जीवंत दृष्टान्त है</figcaption></figure></p>
<p>श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर सम्राट चौधरी तक मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठे लोग या फिर मिथिला संसदीय क्षेत्रों &#8211;  दरभंगा, मधुबनी, झंझारपुर, समस्तीपुर, मधेपुरा, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, भागलपुर, कटिहार, खगरिया, मुंगेर आदि &#8211; से चुनकर भारत के संसद में या फिर मिथिला क्षेत्र के सैकड़ों विधान सभा क्षेत्रों से चुनकर बिहार के विधान सभा में बैठे सम्मानित विधायकगण अपने-अपने क्षेत्र के मतदाताओं के लिए, क्षेत्र के विकास के लिए, शिक्षा के लिए, उद्योगों की स्थापना के लिए, रोजगार के लिए इन आठ दशकों में क्या किये? यह तो प्रदेश के मतदाता अधिक जानते हैं। </p>
<p><strong>मिथिला विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ प्राध्यापक आर्यावर्तइंडियननेशन(डॉट)कॉम से कहते हैं: &#8220;सनद रहे: अगर कोई मैथिल अथवा गैर-मैथिल मैथिली भाषा में मुस्कुराकर बात कर रहे हैं, राजनेता हैं, तो इस बात से कदापि भ्रमित नहीं हो कि वे वास्तविक रूप से मिथिला का विकास चाहते हैं। वे स्वहित में बरगला रहे हैं। आज मिथिला क्षेत्र में ऐसे लोगों की किल्लत नहीं, बाढ़ है।&#8221;</strong></p>
<p>वे आगे कहते हैं: &#8220;वैसे इस बात से भली भांति परिचित होने के बाद भी की आज न मिथिला में &#8216;पोखर है (अधिकांश बिक गए या भूमाफियाओं ने मिट्टी भरकर मकान बना दिए, न माँछ है (दक्षिण भारत से आयात होता है), मखान अब पोखर में नहीं बल्कि खेतों में व्यवसाय के लिए पैदा होता है, मधुर वाणी की किल्लत हो गयी है; फिर भी &#8220;पग पग पोखर, माछ-मखान,मधुर वाणी, मुख मेँ पान, ई थिक मिथिला के पहचान&#8221; फकरा गाते लोग थक नहीं रहे हैं।&#8221;</p>
<figure id="attachment_7822" aria-describedby="caption-attachment-7822" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/c.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/c.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-7822" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/c.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/c-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/c-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/c-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/c-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7822" class="wp-caption-text">राजनगर का अवशेष &#8211; यह मानसिकता का जीवंत दृष्टान्त है</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, बिहार का पहला मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) तक थे । इसके बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) तक। फिर बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967 तक, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968 तक, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968 तक, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968 तक, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972 तक, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969 तक, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970 तक और कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। </p>
<p>कर्पूरी ठाकुर के बाद आये केदार पांडे जो 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973 तक मुख्यमंत्री थे। इनके बाद अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975 तक, डॉ. जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990 तक, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980 तक, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985 तक, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988 तक, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 तक, सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक, डॉ. जगन्नाथ मिश्रा 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990 तक मुख्यमंत्री रहे।<br />
 <br />
डॉ. मिश्र कांग्रेस युग के अंतिम कड़ी थे। उनके बाद आ गए लालू प्रसाद यादव 10 मार्च 1990 से 25 जुलाई 1997 तक, राबड़ी देवी 25 जुलाई 1997 से 2 मार्च 2000 फिर 11 मार्च 2000 से 6 मार्च 2005 तक, नितीश कुमार बीच में आठ दिन के लिए (3 &#8211; 11 मार्च  2000) फिर 24 नवम्बर 2005 से 20 मई 2014 फिर 22 फरवरी 2015 से 15 अप्रैल 2026 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रहे। हां बीच में 20 मई 2014 से 22 फरवरी 2015 तक जीतन राम मांझी भी मुख्यमंत्री बने। विगत 15 अप्रैल 2026 से सम्राट चौधरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के कृपा से मुख्यमंत्री कार्यालय में उपस्थित हुए। इस बात से कटाई इंकार नहीं किया जा सकता है कि बिहार विधानसभा की कुल 243 की संख्या में भारतीय जनता पार्टी (89 विधायक) और जनता दल &#8211; यूनाइटेड के (85-विधायक) के कुल 174 विधायकों में कई ऐसे विधायक हैं जो मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। खैर। </p>
<figure id="attachment_7823" aria-describedby="caption-attachment-7823" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/e.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/e.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-7823" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/e.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/e-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/e-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/e-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/e-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7823" class="wp-caption-text">राजनगर: मानसिकता का दृष्टान्त </figcaption></figure>
<p>समयांतराल सत्ता के गलियारे में बैठे लोग टकटकी निगाहों देख रहे हैं अथवा दरभंगा राज की सम्पत्तियों पर मालिकाना हक़ रखने वाले अवसर की तलाश में हैं। कुमार शुभेश्वर सिंह के कालखंड में दरभंगा राज का क्या हश्र हुआ, मिथिला के लोग देखे हैं और उनकी मृत्यु के बाद क्या हश्र हुआ, हो रहा है &#8211; यह भी मिथिला के लोग गवाह बन रहे हैं। </p>
<p><strong>विगत दिनों जब प्रदेश के मुख्यमंत्री राजनगर आये थे, यह जानते हुए भी कि &#8216;यह संपत्ति और रास्ता आम नहीं है,&#8217; संपत्ति के वर्तमान मालिक को बुलाने के बारे में सोचे भी नहीं। कहते हैं कि स्थानीय नेता उनके भ्रमण के अंतिम क्षण में राजनगर के एक अधिकारी को फोन कर सूचना दिए कि &#8216;आप आ जाएँ&#8217; &#8211; यह मानसिकता को भी दर्शाता है और यह भी बताता है कि आपकी संपत्ति होने के बाद भी सत्ता के गलियारे में आपका क्या महत्व है। यह इस बात का द्योतक है कि राजनगर परिसर के मालिक से प्रदेश की नेताओं की क्षमता अधिक है। जिला प्रशासन, जानकारी के वावजूद सरकार के सामने कुछ नहीं कर सकती है।</strong></p>
<blockquote><p>दिवंगत राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह के पौत्र और कुमार शुभेश्वर सिंह के पुत्र कपिलेश्वर सिंह को इस कहानी को लिखने से पहले कई संवाद उनके मोबाइल पर दिए, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। रत्नेश्वर सिंह से जब पूछा की क्या वे राजनगर संपत्ति के मामले में वे कुछ सोच रहे हैं? उनका कहना था की उनमें उतनी शक्ति नहीं है कि वे वे इस दिशा में कोई पहल कर सकें। कुछ समय पहले वे न्यायालय में एक मुकदमा किए थे, लेकिन बाद में उसे निष्क्रिय कर दिए। वैसे दरभंगा राज और उसकी सम्पत्तियों पर महाराजा की अंतिम सांस से कोई दो महीने पहले से ही तत्कालीन राजनेताओं की नजर अटक गयी थी। आज महाराजा की मृत्यु के 62 साल बाद अगर दरभंगा के रास्ते पटना और दिल्ली तक के नेताओं की नजर टिकी है तो इसमें नया क्या है? </p></blockquote>
<figure id="attachment_7824" aria-describedby="caption-attachment-7824" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/g.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/g.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-7824" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/g.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/g-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/g-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/g-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/g-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7824" class="wp-caption-text">राजनगर: मानसिकता का दृष्टान्त </figcaption></figure>
<p>उन दिनों भी दरभंगा राज परिवार के लोगों के साथ-साथ मिथिला के लोग, जो दरभंगा राज के करीबी कहते थे, दरभंगा के राजा के नहीं हुए थे, आज तो हैं ही नहीं। उन दिनों भी दरभंगा राज में, महाराजा के आसपास चापलूसों, चाटुकारों, हामी भरने वालों की लम्बी कतार थी; आज तो फ़ौज बनी है। सवाल कई हज़ार करोड़ का यह है कि क्या संतानहीन दिवंगत महाराजा के अनुज राजाबहादुर विश्वेश्वर सिंह के पौत्र और कुमार शुभेश्वर सिंह के पुत्र द्वय सत्ता से लड़कर राजनगर स्थित ऐतिहासिक परिसर को बचाने की क्षमता रखते हैं? या फिर बंद कमरे में राजनेताओं के साथ हाथ मिलकर राजनगर की संपत्ति को सुपुर्द करने की योजना बनाकर समाज और लोगों के बीच &#8216;घड़ियाली आंसू&#8217; बहाकर &#8216;सांत्वना बटोरने का प्रयास कर रहे हैं? मिथिला के लोग अधिक ज्ञानवर्धन करेंगे क्योंकि अन्य सम्पत्तियों के अलावे महाराजा द्वारा स्थापित &#8216;आर्यावर्त&#8217; और &#8216;इंडियन नेशन&#8217; अखबारों का नामोनिशान मिटना, भवन को बिल्डर के हाथ बेचकर सैकड़ों लोगों को सड़क पर लाने का दृष्टान्त भी बहुत पुराना नहीं है।  </p>
<p>आज़ाद भारत के तीसरे, बाइसवें, चौब्बीसवें, और छब्बीसवें वर्षों में जब भारत की सरकार कानून के तहत जमींदारी प्रथा को समाप्त की, बैंकों का, कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण की तो देश के लोग क्या कर लिए? या जब जमींदारी प्रथा की समाप्ति हुई तो दरभंगा के राजा भले न्यायालय में मुकदमा लड़े, लेकिन दरभंगा अथवा मिथिला के कितने लोग आगे आये जमींदारी बचने के लिए? शायद कोई नहीं। और अंततः महाराजा की मृत्यु होने के बाद, और फिर उनकी पत्नियों की मृत्यु होने के बाद दरभंगा राज का क्या हश्र हुआ, हो रहा है &#8211; सबों के सामने है। </p>
<p><strong>भारत की आजादी के बाद, राज्य सरकार ने जमींदारी व्यवस्था को खत्म करने के लिए बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 लागू किया। 25 सितंबर, 1950 को बिहार सरकार ने इस अधिनियम के तहत एक आधिकारिक अधिसूचना जारी की, जिससे दरभंगा राज की विशाल ज़मीनें तुरंत राज्य के अधिकार में आ गईं। तत्कालीन और अंतिम महाराजा कामेश्वर सिंह ने इस ज़ब्ती को ज़ोरदार तरीके से चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने शुरू में इस अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जिसके बाद भारतीय संसद ने 1951 में भारत के संविधान का पहला संशोधन पारित किया (जिसमें भूमि सुधार कानूनों की सुरक्षा के लिए नौवीं अनुसूची जोड़ी गई)। यह कानूनी लड़ाई 27 मई, 1952 को खत्म हुई, जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने &#8216;बिहार राज्य बनाम दरभंगा के महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह&#8217; के ऐतिहासिक मामले में भूमि सुधारों को सही ठहराया। </strong></p>
<figure id="attachment_7825" aria-describedby="caption-attachment-7825" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/f.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/f.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-7825" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/f.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/f-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/f-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/f-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/f-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7825" class="wp-caption-text">राजनगर: अवशेष मानसिकता को बताता है </figcaption></figure>
<p>हालांकि 1950 के दशक की शुरुआत में ही उनके राजस्व इकट्ठा करने के अधिकार खत्म हो गए थे, लेकिन अक्टूबर 1962 में बिना किसी उत्तराधिकारी के महाराजा कामेश्वर सिंह के निधन के साथ ही &#8216;राज&#8217; की बची-खुची निजी संपत्ति और ढांचागत विरासत भी पूरी तरह खत्म हो गई। इसके बाद दशकों तक पारिवारिक विवाद चले और सरकार ने धीरे-धीरे उनके बचे हुए महलों और संपत्तियों को अपने कब्जे में ले लिया। </p>
<p>आज़ादी से पहले सं 1921 में बैंक ऑफ बंगाल, बैंक ऑफ बॉम्बे और बैंक ऑफ मद्रास का विलय होकर इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया बना, जो बाद में  1955 में भारतीय स्टेट बैंक के नाम से विख्यात हुआ। 1 जनवरी, 1949 को भारत के केंद्रीय बैंकिंग संस्थान, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया का राष्ट्रीयकरण &#8216;रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (सार्वजनिक स्वामित्व में हस्तांतरण) अधिनियम, 1948&#8217; के तहत किया गया। 1 जुलाई, 1955 को &#8216;स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया अधिनियम, 1955&#8217; के तहत इंपीरियल बैंक ऑफ़ इंडिया का राष्ट्रीयकरण किया गया और इसका नाम बदलकर स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (SBI) कर दिया गया। 19 जुलाई, 1969 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 14 बड़े कमर्शियल बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। पुनः, 15 अप्रैल, 1980 को दूसरा बड़ा दौर आया और 6 अन्य कमर्शियल बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया।</p>
<p>चौदह बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया, और बाद में छह और बैंकों को इसमें शामिल किया गया। ये ज़्यादातर बड़े बैंक थे जिनका पूरे भारत में ब्रांच नेटवर्क फैला हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इन बैंकों का नियंत्रण अपने हाथ में लेने के लिए एक अध्यादेश जारी किया। उन बैंकों को चुना गया जिनका कुल जमा कारोबार ₹50 करोड़ से ज़्यादा था। इस कदम का मकसद वित्तीय समावेश को बेहतर बनाना, खेती को बढ़ावा देना और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को लोन देना था। उस समय देश में कुल बैंक जमा का लगभग 80% से 85% हिस्सा इन्हीं 14 बैंकों के पास था। कोई पचपन+ साल बाद बैंकिंग क्षेत्र में 1 अप्रैल 2017, 1 अप्रैल 2019 और 1 अप्रैल 2020 कोफिर एक भूचाल आया। </p>
<figure id="attachment_7826" aria-describedby="caption-attachment-7826" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/i.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/i.jpg" alt="" width="1200" height="1600" class="size-full wp-image-7826" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/i.jpg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/i-225x300.jpg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/i-768x1024.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/i-1152x1536.jpg 1152w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7826" class="wp-caption-text">राजनगर: अवशेष मानसिकता को बताता है </figcaption></figure>
<p>सन 1993 में न्यू बैंक ऑफ इंडिया का पंजाब नेशनल बैंक के साथ विलय हुआ। 1 अप्रैल 2017 को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के 5 सहयोगी बैंकों (स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला, स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर) और भारतीय महिला बैंक के साथ विलय हुआ। 1 अप्रैल 2019 बैंक ऑफ बड़ौदा का देना बैंक और विजया बैंक के साथ विलय हुआ। ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया का 1 अप्रैल 2020 को पंजाब नेशनल बैंक के साथ विलय हुआ। इसी तरह, केनरा बैंक का सिंडिकेट बैंक के साथ विलय हुआ। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया का आंध्रा बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक के साथ विलय हुआ। इंडियन बैंक का इलाहाबाद बैंक के साथ विलय हुआ। लोग क्या कर लिए?</p>
<p>भारत ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में 1971 और 1973 के बीच दो बड़े चरणों में अपनी कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण किया, ताकि श्रमिकों की सुरक्षा बेहतर हो सके, उनका शोषण रोका जा सके और उत्पादन बढ़ाया जा सके।पहला चरण (कोकिंग कोल) अक्टूबर 1971 में शुरू हुआ जब सरकार ने कोकिंग कोल खदानों का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया। 1 मई 1972 को &#8216;कोकिंग कोल माइन्स (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972&#8217; के तहत औपचारिक रूप से राष्ट्रीयकरण किया गया। दूसरे चरण (नॉन-कोकिंग कोल) की शुरुआत जनवरी 1973 में हुई, जब नॉन-कोकिंग कोयला खदानों का प्रबंधन अपने हाथ में लिया गया। इसे औपचारिक रूप से 1 मई, 1973 को &#8216;कोल माइन्स (नेशनलाइज़ेशन) एक्ट, 1973&#8217; के तहत राष्ट्रीयकृत किया गया। इस राष्ट्रीयकरण के साथ भारत कोकिंग कोल् लिमिटेड का गठन किया गया। लोग क्या कर लिए सरकार की ?</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="aligncenter size-full wp-image-7827" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a></p>
<p>राष्ट्रीयकरण से पहले, भारत में 226 प्राइवेट कोकिंग कोल खदानें और 711 प्राइवेट नॉन-कोकिंग कोल खदानें थी, यानी कुल 937 प्राइवेट कोयला खदानें थीं। IISCO, TISCO और DVC की कैप्टिव खदानों को छोड़ कर सभी निजी खदानों का इस आधार पर राष्ट्रीयकरण कर दिया गया क्योंकि उनमें अवैज्ञानिक तरीके से खनन हो रहा था, भंडार का संरक्षण ठीक से नहीं हो रहा था, मजदूरों की सुरक्षा और रहने की स्थिति खराब थी, और प्राइवेट मालिकों की ओर से पूंजी निवेश की कमी थी।<br />
आइये फिर वापस दरभंगा चलते हैं। अपनी मृत्यु से 52-दिन पहले दरभंगा के अंतिम राजा महाराजाधिराज सर कामेश्वर सिंह अपने कलकत्ता निवास से 9 अगस्त, 1962 को बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह को एक पत्र लिखे थे। पत्र में महाराजाधिराज सत्येंद्र नारायण सिंह से अनुरोध किये थे कि इस पत्र की कृपया अपने पत्रांक 1945, दिनांक 11 जुलाई, 1962 का निर्देश करें। </p>
<p><strong>महाराजाधिराज लिखते हैं: “यह बात अपने कानों तक पहुंची है कि कुछ ऐसे कॉलेजों को जो संस्कृतेतर विषयों के अध्यापन करते हैं और राज्य में कार्य करने वाले क्षेत्रीय विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र में उचित रूप से हैं, संस्कृत विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र में लाकर इसके रूप में परिवर्तन करने की चेष्टा की जा रही है। मेरी समझ से संस्कृत विश्वविद्यालय का मुख्य उद्देश्य, पाली और प्राकृत के साथ संस्कृत का विशिष्ट ज्ञान देना होना चाहिए जिससे की प्राचीन विद्वता की रक्षा हो और यथा-संभावदयातन बनाया जा सकते। इस विश्वविद्यालय की विशिष्ट स्वरूप में रक्षा अवश्य ही होनी चाहिए। मैंने इस विश्वविद्यालय के लिए  जो दान दिया है वह इसलिए दिया कि मेरे पूज्य पिताजी की इक्षा को इससे पूर्ति होती थी।  “यदि इस विश्वविद्यालय को क्षेत्रीय सामान्य विश्वविद्यालय का रूप दिया जाएगा तो मैं समझूंगा कि मेरा दिया हुआ दान बर्बाद हो गया।” </strong></p>
<p>महाराजाधिराज आगे लिखते हैं: यदि सरकार मिथिला में एक क्षेत्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करे तो मैं इसका स्वागत करूँगा किन्तु उसे संस्कृत विश्वविद्यालय के साथ किसी भी रूप में मिलाना नहीं चाहिए जो कि एक निश्चित उद्देश्य और निश्चित विचार से स्थापित किया गया है। वह विश्वविद्यालय इससे सर्वथा पृथक रहना चाहिए। इतना ही नहीं, सम्भवतः जिस लिफ़ाफ़े में महाराजाधिराज को पत्र-प्रेषित किया गया था, अथवा पत्र में सावधान किया गया था, उसमें “श्व” के स्थान पर “स्व” लिखा था। यह महाराजाधिराज को अच्छा नहीं लगा। इसलिए शिक्षा मंत्री के जवाबी पत्र में उन्होंने बहुत ही “शालीनता” के साथ लिखे: “मेरे नाम का शुद्ध विवरण ‘कामेश्वर सिंह’ है न कि ‘कामेस्वर सिंह।” मेरे पास भेजे गए विधेयक के प्रारूप पर मुझे सामान्यतः कोई टिप्पणी नहीं करनी है। किन्तु यदि इसमें कोई परिवर्तन हुआ तो स्थिति भिन्न हो जाएंगी –भवदीय, कामेश्वर सिंह। सरकार और सरकार में बैठे लोग ऐसे ही होते हैं जो &#8216;श्व&#8217; और &#8216;स्व&#8217; में फर्क नहीं समझते, साथ ही, &#8216;क्षेत्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना सम्बन्धी विचार को कूड़ेदान में फेंक देते हैं। </p>
<figure id="attachment_7827" aria-describedby="caption-attachment-7827" style="width: 1600px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k.jpg" alt="" width="1600" height="1200" class="size-full wp-image-7827" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k.jpg 1600w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/k-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7827" class="wp-caption-text">राजनगर: अवशेष मानसिकता को बताता है </figcaption></figure>
<p>सन 1960 के 30 मार्च को महाराजाधिराज द्वारा पटना में स्थापित दि इण्डियन नेशन समाचार पत्र में “लक्ष्मी-वर-विलास-प्रसाद” को दान-स्वरुप देने के उपलक्ष्य में वहां उपस्थित महामानवों के सम्मुख, सर कामेश्वर सिंह अश्रुपूरित आखों से जो भाषण दिए थे, उस भाषण के शब्द कुछ ऐसे थे : </p>
<p><strong>डॉ जाकिर हुसैन साहब, बिहार केसरी, महिलाओं और सज्जनों !</strong></p>
<p>“जिस वस्तुओं को किसी ने अपने बाल्यकाल से ही न केवल प्यार किया हो बल्कि समादर भी किया हो, उससे अलग होना सामान्यतः दुःखद होता है, किन्तु राज्यपाल जी ने और मुख्यमंत्री महोदय ने जो संस्कृत विश्वविद्यालय का केंद्र बनाने के लिए उसे ग्रहण करने की कृपा कर, स्वयं यहां पधारने का कष्ट किया है, इससे मुझे प्रसन्नता है। </p>
<p>डॉ जाकिर हुसैन साहब, मैं आपका अत्यंत कृतज्ञ हूँ, जो स्वयं आपने कृपापूर्वक आज के अपरान्ह में यहाँ पधारने का कष्ट किया। मैं अपने मुख्यमंत्री महोदय का भी आभारी हूँ, जिन्होंने न केवल मेरे अनुरोध को स्वीकार ही किया, बल्कि मिथिला में संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना में गहरी दिलचस्पी ली। यदि हमारे शिक्षा मंत्री महोदय का उनके पदभार ग्रहण करने के समय से ही लगातार समर्थन और सहयोग नहीं प्राप्त होता, तो शायद यह स्वप्न साकार नहीं हो पाता। संस्कृत की विद्वता के सम्मान में आज से चार सौ वर्ष पहले हमारे पूर्वज महामहोपाध्याय महाराज महेश ठाकुर को बादशाह अकबर ने तिरहुत का राज्य दिया था। इसलिए यह बिलकुल उचित है कि हमारा संस्कृत पुस्तकालय, जिसको हमारे पूर्वजों ने वंश परंपरा से विगत शताब्दी में संघटित किया है, वह संस्कृत विश्वविद्यालय के पुस्तकालय का केंद्र बने।&#8221; </p>
<figure id="attachment_7828" aria-describedby="caption-attachment-7828" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m.jpg" alt="" width="1200" height="1600" class="size-full wp-image-7828" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m.jpg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m-225x300.jpg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m-768x1024.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m-1152x1536.jpg 1152w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7828" class="wp-caption-text">राजनगर: अवशेष मानसिकता को बताता है </figcaption></figure>
<p>&#8220;यह भी उचित है कि लक्ष्मीश्वर विलास प्रसाद जो कि केवल हमलोगों का घर ही नहीं था, बल्कि वह स्थान था, जहाँ अनेक वर्षों तक राज के अनेक प्रकार के उत्सव होते रहे, वह संस्कृत विश्वविद्यालय का स्थान बने। मुझे पूर्ण विश्वास है कि संस्कृत विश्वविद्यालय केवल जीवित ही नहीं रहेगा बल्कि इस प्राचीन भूमि में जो कुछ भी उत्तम तत्व है, उसको प्रोत्साहित करेगा और उसका उद्धार करेगा। इसी विश्वास के साथ मैं आपके हाथों में वह बहुमूल्य खजाना सौंप रहा हूँ, जो मैंने पैतृक संपत्ति के रूप में पाया है, और विश्वास करता हूँ कि आपके छत्र-छाया में संस्कृत शिक्षा की श्री-वृद्धि होगी। संस्कृत सदा अमर रहे।” </p>
<p>बहरहाल, दिनांक 30-03-1960 को बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री के नाम लिखे गए पत्र में महाराजाधिराज ने लिखा कि दरभंगा नगर में अवस्थित ‘लक्ष्मीश्वर – विलास’ नामक अपना प्रसाद उसके आस-पास की सम्बद्ध भूमि के साथ ‘संस्कृत विश्वविद्यालय’ के लिए दान स्वीकार किया है बशर्ते कि वह विश्वविद्यालय दरभंगे में स्थापित और अवस्थित किया जाय और चूँकि बिहार विधान सभा द्वारा दरभंगे में  इस तरह के एक विश्वविद्यालय को स्थापित करने के लिए एक अधिनियम पारित किया जा चुका है, जिसको बिहार के राज्यपाल की स्वीकृति भी प्राप्त हो चुकी है  और चूँकि बिहार राज्यपाल ने दरभंगे में इस प्रकार का एक विश्वविद्यालय अगले सत्र से स्थापित करने का प्रस्ताव किया है और चूँकि सम्बद्ध भूमि के साथ अपने उपर्युक्त भवन को दरभंगे में “संस्कृत विश्वविद्यालय के उपयोग के लिए” दान देने को इच्छुक हैं, और चूंकि दान-ग्रहीता उपर्युक्त दान को स्वीकार करने को इच्छुक हैं और चुंकि एक उचित दान पात्र लिख देना आवश्यक है, अतः यह दान-पात्र प्रमाणित करता है कि :</p>
<figure id="attachment_7828" aria-describedby="caption-attachment-7828" style="width: 1200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m.jpg" alt="" width="1200" height="1600" class="size-full wp-image-7828" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m.jpg 1200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m-225x300.jpg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m-768x1024.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/09/m-1152x1536.jpg 1152w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7828" class="wp-caption-text">राजनगर: अवशेष मानसिकता को बताता है </figcaption></figure>
<p>दरभंगा नगर में अवस्थित लक्ष्मी-वर-विलास-प्रसाद” नामक भवन, उससे सम्बद्ध भूमि जिसका सम्पूर्ण विवरण परिशिष्ट ‘ए’ में दिया गया है तथा भूमि के नक़्शे में जिसे लाल और पीले रंगों में पृथक कर दिया गया है और जिसे ‘बी’ से चिन्हित किया गया है और जो इस दान पत्र का अंग है, उसे कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय अधिनियम, 1960 के उपबंधों के अनुसार स्थापित संस्कृत विश्वविद्यालय के उपयोग के लिए डाटा इसके दान ग्रहीता को हस्तान्तरित और पत्यर्पित करते हैं। दान ग्रहीता इस दान को स्वीकार करते हैं और कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय अधिनियम, 1960 के अनुसार स्थापित संस्कृत विश्वविद्यालय के लिए दान-पत्र के द्वारा प्रदत भवन और भूमि का उपयोग करने को सहमत होते हैं। </p>
<p>दाता को नरगौना स्थित अपने आवासीय प्रसाद में आने जाने के मार्ग के उपयोग को अधिकार रहेगा जो मार्ग लक्ष्मीश्वर विलास-प्रसाद के सटे पूर्व से निकलता है और जिसे “बी” चिन्हित नक़्शे में पीले रामनग से पृथक दिखया गया है और उनके यातायात के अधिकार का उपयोग दाता और उनके कार्यकर्त्ता नरगौना प्रसाद में जाने-आने में कर सकते हैं। लक्ष्मीश्वर विलास प्रसाद के सटे पश्चिम में अवस्थित तलाबन के सटे दक्षिण में पश्चिम से पूर्व की ओर जाने वाली सड़क, जिसे पृथक कृत तथा बी चिन्हित नक़्शे में हरे रंग में दिखलाया गया है, विश्वविद्यालय में आने जाने वाले लोगों के उपयोग में आयेगी, किन्तु सामान्य जनता या अन्य कार्य के लिए खुली नहीं रहेगी। लक्ष्मीश्वर विलास प्रासाद के सटे पूर्व से जाने वाली सड़क पर, जहाँ दान में दी गयी भूमि का  अंत होता है, दाता एक फाटक बनवा सकते हैं। जिनके प्रमाण के रूप में यह दान पात्र लिख दिया है और दान ग्रहीता ने दान स्वीकार करने के प्रमाण में अपना हस्ताक्षर कर दिया है। </p>
<p><strong>क्रमशः&#8230;.. </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/government-vs-self-proclaimed-government-part-1">दरभंगा राज: &#8216;सरकार&#8217; बनाम &#8216;स्वयंभू सरकार&#8217; (भाग-1) ✍ वह &#8216;सरकार&#8217; है, &#8216;कुछ भी&#8217; कर सकती है, &#8216;राजनगर&#8217; क्या &#8216;रामबाग&#8217; पर भी आधिपत्य जमा सकती है &#8211; इतिहास गवाह है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<item>
		<title>बिहार को 400000 लाख करोड़+ का &#8216;ऋणी&#8217; बनाकर नीतीश दिल्ली गए; अब नेता, ठेकेदार कहने लगे &#8216;ठेका खोलो-ठेका खोलो&#8217; (नीतीश के बाद बिहार-2)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/after-plunging-bihar-into-debt-exceeding-%e2%82%b94-lakh-crore-nitish-headed-to-delhi</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 11:27:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[debt]]></category>
		<category><![CDATA[development]]></category>
		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
		<category><![CDATA[samrat chaudhari]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है कि बिहार में 5 अप्रैल 2016 से पूर्ण शराबबंदी के बाद प्रदेश की महिलाओं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कमी आयी और तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा महिलाओं की सुरक्षा और उनके सशक्तिकरण की दिशा में [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/after-plunging-bihar-into-debt-exceeding-%e2%82%b94-lakh-crore-nitish-headed-to-delhi">बिहार को 400000 लाख करोड़+ का &#8216;ऋणी&#8217; बनाकर नीतीश दिल्ली गए; अब नेता, ठेकेदार कहने लगे &#8216;ठेका खोलो-ठेका खोलो&#8217; (नीतीश के बाद बिहार-2)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है कि बिहार में 5 अप्रैल 2016 से पूर्ण शराबबंदी के बाद प्रदेश की महिलाओं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कमी आयी और तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा महिलाओं की सुरक्षा और उनके सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम था। लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि इन प्रतिबंधित कालखंड में प्रदेश में गैर-क़ानूनी ढंग से &#8216;देशज-विदेशज शराबों को बोतलों का जितना आयात हुआ, वह भी प्रदेश सरकार की क़ानूनी व्यवस्था को प्रश्न चिन्ह आज भी लगाए बैठा है। आज बिहार के 38 जिलों, 8406 पंचायतों, 534 ब्लॉकों और 45103 गावों एक तरफ जहाँ चिल्लम, चरस, स्मैक, ब्राउन शुगर, अफीम की भूसी जैसी मादक पदार्थों के गिरफ्त में है, वहीँ बिहार करीब चार लाख करोड़ कर्ज में डूबा है। </strong></p>
<p>नीतीश कुमार भले &#8216;विकास पुरुष&#8217; के अलंकरण से अलंकृत हों, इन वर्षों में प्रदेश को उन्होंने आर्थिक रूप से &#8216;दिव्यांग&#8217; बना दिया गया है। बिहार के &#8216;विकास पुरुष&#8217; जाते-जाते प्रदेश के ऊपर लगभग 400000 लाख करोड़ रुपये से अधिक का ऋण का बोझ छोड़कर गए हैं। आशा है यह उनके राज्यसभा में बैठने की शुरूआती दिनों में बढ़कर करीब 4.06 करोड़ पहुँच जाएगी। प्रदेश के कोषागार पर प्रतिमाह 30000 &#8211; 35-000 हज़ार करोड़ का बोझ महज ऋणों के ब्याज पर खर्च होता है। आप प्रतिव्यक्ति आय की गणना जितना भी कर लें, विकास पुरुष प्रदेश के प्रतिव्यक्ति पर तक़रीबन 27000 रुपये का कर्ज बोझ डालकर पटना से अगले छह वर्ष के लिए दिल्ली विस्थापित हुए हैं। यह एक गहन शोध का विषय है। </p>
<p>आप मानें अथवा नहीं। बिहार एक जटिल वित्तीय स्थिति का सामना कर रहा है, जिसमें उच्च आर्थिक विकास के साथ-साथ नकदी की गंभीर कमी भी है। सरकारी कागज पर जहाँ 2025–26 में अर्थव्यवस्था 13.1% की दर से बढ़ी (जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है) और डीएसडीपी ₹9.9 लाख करोड़ के पार पहुँच गई है, वहीँ नकदी की गंभीर कमी  के कारण सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों के वेतन और पेंशन विलंबित हो रहे हैं। इतना ही नहीं, विभिन्न क्षेत्रों में जितने भी कार्य कराये गए हैं, उसमें ठेकेदारों के ₹12,000–15,000 करोड़ के भुगतान रुके पड़े हैं। अनुमान है कि सरकार को केवल वेतन और पेंशन के भुगतान के लिए हर महीने लगभग 9,000-10,000 करोड़ रुपये का इंतजाम करना पड़ता है। </p>
<blockquote><p>आंकड़ों के आधार पर 2010-11 में वित्तीय देनदारी ₹62,858 करोड़ थी जो बढ़कर 2014-15 में ₹99,055 करोड़ हो गईं। 2021-22 (असल) में फिर बढ़कर ₹1,84,377 करोड़ हो गया। अगले वर्ष, यानी 2022-23 वर्ष में यह देनदारी की राशि ₹2,17,553 करोड़ हुआ और फिर 2023-24 में ₹3,32,740.90 करोड़ हो गया। 2024-25 वित्तीय वर्ष में संशोधित अनुमान के मुताबिक यह राशि ₹3,48,000 करोड़ हुआ। 2025-26 वित्तीय वर्ष ₹3,88,554 करोड़ देनदारी का बजट अनुमान था जो सार्वजनिक खाता और देनदारी सहित यथार्थ में बढ़कर ₹4,46,326.07 करोड़ हो गया। बिहार के मामले में इस राशि को देखकर चावार्क ऋषि का भौतिकवादी श्लोक याद आ गया &#8211; यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः &#8211; बस इतना समझ लें कि विकास पुरुष नीतीश कुमार अपने उत्तराधिकारी को एक ऐसा राज्य देकर गए हैं जो गहरे आर्थिक संकट से गुजर रहा है।</p></blockquote>
<figure id="attachment_7621" aria-describedby="caption-attachment-7621" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7621" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7621" class="wp-caption-text">मुख्यमंत्री बनेंगे तो कर्ज समेत बिहार का नेता बनना होगा</figcaption></figure>
<p>वित्त वर्ष 2024-25 के लिए बिहार का कुल सालाना बजट लगभग 2.78 लाख करोड़ रुपये था । वैसे राज्य सरकार कर और अन्य स्रोतों से करीब 60,000-65,000 करोड़ रुपये एकत्रित कर पाती है, लेकिन लगभग 70 फ़ीसदी हिस्सा बाहरी स्रोतों पर निर्भर करता है। राजनीतिक लाभ उठाने के लिए जिस कदर सामाजिक कल्याण योजनाओं पर सरकार खर्च करती आ रही है, मसलन , महिलाओं को आर्थिक मदद, स्कॉलरशिप, पेंशन और मुफ़्त राशन योजनाओं जैसी पहल, जो &#8216;उत्पादक&#8217; नहीं है, के कारण भी  हालत खास्ता हुआ है। </p>
<p><strong>वैसे देश के कई शैक्षणिक और शोध संस्थाएं इस दिशा में कार्य कर रही हैं, लेकिन ऐसी आशा की जा रही है कि भारतीय जनता पार्टी सभी राज्यों में समान कानून के तहत बिहार से भी शराबबंदी समाप्त करने की दिशा में पहल करें। वैसे बिहार के प्रशासनिक व्यवस्था से नीतीश कुमार को निकलते ही प्रदेश में शराब के क्षेत्र में कार्य करने वाले &#8216;व्यापारी&#8217;, जिन्हे कथित रूप से &#8216;राजनीतिक संरक्षण&#8217; भी प्राप्त है, शराबबंदी समाप्त करने के लिए भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मिलना-जुलना, ज्ञापन देने का कार्य शुरू कर दिए हैं। कहा जाता है कि प्रदेश में जितने भी शराब के देशज/विदेशज ठेके थे, अधिकांश राजनेताओं द्वारा परोक्ष रूप से नियंत्रित हैं। </strong></p>
<p>इस बीच, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के विधायक माधव आनंद दृष्टान्त हैं। वे मुख्यमंत्री को सुझाव दिए हैं कि प्रतिबंध से राजस्व का नुकसान हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि शराबबंदी सिर्फ कागज पर है, धरातल पर नहीं। वैसे प्रदेश के राजनीतिक समीक्षक इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं कि अन्य भाजपा शासित प्रदेशों की तरह बिहार में तत्काल प्रभाव से शराबबंदी समाप्त किया जायेगा। अगर ऐसा होता है तो यह गलत संदेश जाएगा, साथ ही, वर्तमान सरकार में अभी भी नीतीश कुमार के जनता दल के सदस्यों की संख्या कम नहीं है। लेकिन राजनीति में कब क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता है। </p>
<p>वैसे शराबबंदी हटाने की मांग कई बार उठाई गई है। पिछले चुनावों के दौरान, कई नेताओं और पार्टियों ने इस नीति की समीक्षा करने या इसे पूरी तरह खत्म करने का वादा किया था। सरकार भी इस बात को स्वीकार करती होगी कि प्रतिबंध को लागू करने का काम पूरी तरह से प्रभावी नहीं रहा।  आलोचकों का तर्क है कि शराब के सेवन को खत्म करने के बजाय, इसने इस व्यापार को &#8216;अंडरग्राउंड&#8217; धकेल दिया है। वैसे सम्राट चौधरी यह स्वीकार किया है कि शराबबंदी के कारण राज्य के राजस्व को भारी नुकसान हुआ है। दूसरी तरफ, उन्होंने इस नीति की सराहना करते हुए इसे नीतीश कुमार के सबसे महत्वपूर्ण फैसलों में से एक बताया। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7622" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>नीतीश कुमार के जाते ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के कुछ दलों ने भी यह सुझाव दिया है कि अब इस नीति की समीक्षा करने का समय आ गया है। नेताओं का तर्क है कि लगभग एक दशक बीत जाने के बाद, सरकार को यह आकलन करना चाहिए कि क्या यह कानून अपने तय मकसद के अनुसार काम कर रहा है, या इसमें कुछ बदलावों की ज़रूरत है। हालाँकि, इस प्रतिबंध पर पुनर्विचार करने या इसे वापस लेने के संबंध में अभी तक सरकार की ओर से कोई आधिकारिक कदम आसार नहीं दिखता है, लेकिन राजनीति में कभी भी, कुछ भी हो सकता है। </p>
<p><strong>जब नीतीश कुमार ने शराब की बिक्री और सेवन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया, उस समय महिलाओं ने बड़े पैमाने पर समर्थन किया, क्योंकि इसका मकसद घरेलू हिंसा को कम करना और घर की कमाई को शराब पर खर्च होने से रोकना था। इस कदम से नीतीश कुमार को अपना राजनीतिक समर्थन मजबूत करने में मदद मिली, खासकर महिला मतदाताओं के बीच। जहाँ एक तरफ इस प्रतिबंध के सामाजिक फायदे थे, वहीं इसने कुछ चुनौतियां भी खड़ी कीं। शराबबंदी के कारण राज्य में अवैध शराब के व्यापार में बढ़ोतरी हुई और बार-बार जहरीली शराब से जुड़ी त्रासदियां हुईं। साथ ही, सरकार को एक्साइज ड्यूटी से होने वाले राजस्व का भारी नुकसान हुआ। इतना ही नहीं, इस प्रक्रिया में, सरकार के सबसे अहम समर्थकों में से एक माने जाने वाले &#8216;महा-दलित&#8217; (दलित समूहों में सबसे गरीब तबका) ही सरकार से दूर हो गए। यह समुदाय अपनी ज्यादातर कमाई देसी शराब बनाकर ही करता था; शराबबंदी की वजह से उनकी कमाई का एक बहुत बड़ा ज़रिया ही खत्म हो गया है। </strong></p>
<p>बिहार का नुकसान उसके पड़ोसी राज्यों का फायदा बन गया है। बिहार की सीमाएँ पश्चिम बंगाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल जैसे राज्यों से लगती हैं। जहाँ एक तरफ़ बिहार हर साल होने वाले 4000 करोड़ रुपये के राजस्व के नुकसान की भरपाई करने में जुटा है, वहीं दूसरी तरफ़ झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के आबकारी राजस्व में जबरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिली है। उदाहरण के लिए, झारखंड का राजस्व 2015-2016 में 912 करोड़ रुपये से बढ़कर 2017-2018 में 1600 करोड़ रुपये हो गया। पश्चिम बंगाल में तो और भी चौंकाने वाली बढ़ोतरी हुई है; 2015-2016 में 4014 करोड़ रुपये से बढ़कर 2017-2018 में यह 5781 करोड़ रुपये हो गया। </p>
<figure id="attachment_7625" aria-describedby="caption-attachment-7625" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7625" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7625" class="wp-caption-text">अब तो केंद्र सरकार पर ही भरोसा है, कर्जा चुकाने में मदद करें या कर्ज में और डूबा दे। तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, जब मोहनदास करमचंद गांधी के जन्म स्थान गुजरात में शराबबंदी के कारण राज्य के कोषागार को हो रहे राजस्व नुकसान की कमी पूर्ति के लिए राज्य सरकार वित्त आयोग के सामने हाथ फैला सकती है, तो बिहार में तो मोहनदास करम चंद गाँधी को &#8216;महात्मा की उपाधि&#8217; मिली थी, यहाँ इस दिशा में कुछ विशेष पहल होने चाहिए ताकि प्रदेश आर्थिक रूप से स्वस्थ रहे। क्योंकि प्रदेश स्वस्थ रहेगा तभी तो मतदाता और महिलाएं भी स्वस्थ और सुरक्षित रहेंगी। इस वर्ष की शुरुआत में भारतीय जनता पार्टी अब तक उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, असम, हरियाणा, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, गोवा, मणिपुर और त्रिपुरा में स्वयं अथवा गठबंधन में सरकार का नेतृत्व कर रही हैं। गुजरात छोड़कर, किसी भी राज्यों में शराब बंदी नहीं है। </p>
<blockquote><p>विशेषज्ञ का कहना है कि &#8216;हम यह नहीं कहते कि बिहार में शराबबंदी जारी रहेगा। अभी भाजपा की पूरी निगाह स्वयं को मजबूत करने के साथ-साथ अकेले सरकार बनाने पर ध्यान केंद्रित है। नीतीश कुमार के जाने के बाद, प्रदेश में राजनीतिक समीकरण में बदलाव आना स्वाभाविक है। आज जनता दल यूनाइटेड में कई (दो-तीन दर्जन भी मान सकते हैं) विधायक और सांसद ऐसे हैं जो &#8216;समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं&#8217;, झंडा बदलने के लिए। आप जिन्हें नीतीश कुमार का अनुयायी आप मान रहे हैं, कल कई लोगों को साथ लेकर भाजपा के अनुयायी हो सकते हैं। जनता दल में भी भाजपा के लोग बैठे हैं। राजनीति और सत्ता में शराब से भी अधिक तेजी से नशा चढ़ता है और अभी नशा चढ़ने का वक्त है। राजनेता, विधायक, सांसद भले नीतीश कुमार को सांत्वना दें कि वे उनके सपने को साकार करेंगे; हकीकत यह है कि सभी का अपना-अपना सपना है और वे अपने सपने को साकार करने में कोई कसार नहीं छोड़ेंगे।&#8217; </p></blockquote>
<figure id="attachment_7623" aria-describedby="caption-attachment-7623" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7623" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7623" class="wp-caption-text">हम चले, अब कर्जा चुकाते रहिये</figcaption></figure>
<p>2025 के इंडस्ट्री अनुमानों के अनुसार, भारत में लगभग 80,000 लाइसेंस्ड शराब की दुकानें हैं। आबादी के हिसाब से रिटेल सेक्टर में अभी भी कम पहुंच मानी जाती है, जहाँ हर 1 लाख ग्राहकों पर लगभग 5.2 दुकानें हैं। सबसे ज़्यादा दुकानों वाले राज्यों में महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में है। देश में राज्य सरकारें शराब से भारी राजस्व कमाती है जो लगभग ₹30,000–₹40,000 करोड़ के आसपास होती है। </p>
<p>पहले दिल्ली की बात। दिल्ली की वर्तमान आबादी 32,941,000 में शराब पीने वालों की संख्या उम्मीद से अधिक है। यह बात भी अलग है कि सरकार शराब की बोतलों पर अंग्रेजी में, हिंदी में, पंजाबी में, उर्दू में, चाहे जिस भाषा में लिखकर चिपकाती रहे – शराब पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। दिल्ली सल्तनत में कुल 573+12 = 585 शराब के ठेके हैं। कुछ ठेके/दुकानें दिल्ली के मॉलों में भी स्थित है। शराब की बिक्री से दिल्ली सरकार की कमाई 2025-26 वित्त वर्ष की पहली छमाही में एक्साइज रेवेन्यू लगभग ₹4,192.86 करोड़ तक पहुँच गयी, जो कि 2023-24 वित्त वर्ष में लगभग ₹5,164 करोड़ था। </p>
<p>जबकि, बिहार में शराब पर पूरी तरह से रोक लगने से पहले राज्य में लगभग 6,000 शराब की दुकानें (जिनमें भारतीय-निर्मित विदेशी शराब और देसी शराब की दुकानें शामिल थीं) चल रही थीं। 2006 और 2013 के बीच, लाइसेंसी दुकानों की संख्या 3,436 से बढ़कर 5,467 हो गई, जिससे आबकारी राजस्व में काफ़ी बढ़ोतरी हुई। शराबबंदी के बाद दुकानें तो बंद हुई है, शराब के कारोबार में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से काम करने वाले लगभग 25,000 से 35,000 लोगों पर इसका असर पड़ा।</p>
<p>बहरहाल, 27 अक्टूबर, 2024 को गुजरात सरकार ने 16वें वित्त आयोग से राज्य की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने का अनुरोध किया था। साथ ही, राज्य के अधिकारियों ने शराबबंदी नीति के कारण हुए भारी राजस्व नुकसान को उजागर किया था, जिसके कारण उत्पाद शुल्क संग्रह में काफी कमी आई है। गुजरात सरकार ने राज्य के लिए आवंटित होने वाले फंड में  काफी बढ़ोतरी की मांग भी की थी। वजह था उत्पाद शुल्क राजस्व में लगभग 12,000 करोड़ रुपये के सालाना नुकसान होता है। तदर्थ शराबबंदी के कारण हुई राजस्व की कमी की भरपाई के लिए वित्त आयोग से अधिक फंड हासिल किया जाए। </p>
<figure id="attachment_7626" aria-describedby="caption-attachment-7626" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7626" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7626" class="wp-caption-text">कुर्सी की हालत इससे बेहतर नहीं है। तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>बिहार सरकार भी, शराब बंदी के कारण राज्य के खजाने को होने वाले राजस्व घाटे की बार वित्त आयोग के सामने अनेकों बार उठाया और मुआवजे की मांग की। बिहार सरकार के अनुसार, शराबबंदी पूर्णरूपेण लागू होने के बाद प्रदेश को आबकारी शुल्क से होने वाली लगभग 3000 से 4000 करोड़ की वार्षिक आय बंद हो गयी। बिहार सरकार ने बार-बार यह तर्क दिया कि सामाजिक सुधार/महिलाओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए शराबबंदी लागू की गयी, जिससे राजस्व में कमी आयी। साथ ही, केंद्र सरकार और वित्त आयोग से विशेष सहायत की मांग की।  इन वर्षों में एक अनुमान के मुताबिक बिहार को करीब 30000 से 40000 करोड़ राजस्व का नुकसान हुआ है। </p>
<p>शराबबंदी का एक और बुरा नतीजा यह निकला कि लोग शराब छोड़कर नशीले पदार्थों (ड्रग्स) के आदी होने लगे। जहाँ एक तरफ़ सारा ध्यान शराब पर ही केंद्रित था—और अब भी है—वहीं दूसरी तरफ़ नशीले पदार्थों की आसान उपलब्धता पर किसी का ध्यान नहीं गया और नशे के आदी लोगों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया। 2017 में तीन डॉक्टरों की एक टीम ने एक पायलट स्टडी की थी, जिसमें पाया गया कि बैन के बाद 25% से ज़्यादा पक्के शराबी ताड़ी, गांजा (मारिजुआना), चरस जैसी चीज़ों की तरफ मुड़ गए। नशीली दवाओं के बढ़ते चलन और फैलाव को समझने का नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो से बेहतर कोई तरीका नहीं है। </p>
<p>इतना ही नहीं, बिहार में अधिकारियों द्वारा जब्त की गई नशीली दवाओं में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है, जो शराब से नशीली दवाओं के गलत इस्तेमाल की तरफ़ बदलाव का संकेत है। गांजे की ज़ब्ती में 2700 परसेंट की बढ़ोतरी हुई है; 2015 में यह 14 किलो था, जो 2016 में बढ़कर 10,800 किलो और 2021 में 27,395 किलो हो गया। हशीश की बरामदगी भी 2015 में 0 किलो से बढ़कर 2016 में 115 किलो और 2021 में 363 किलो हो गई। शराब के साथ-साथ बिहार में तंबाकू का इस्तेमाल भी काफ़ी ज्यादा है। </p>
<p>राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, जहां पूरे देश में औसतन 38 प्रतिशत पुरुष तंबाकू का सेवन करते हैं, वहीं बिहार में यह आंकड़ा 49 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश में यह 44 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 46 प्रतिशत, राजस्थान में 42 प्रतिशत और महाराष्ट्र में 34 प्रतिशत है। आंकड़ों से पता चलता है कि तंबाकू के व्यापक इस्तेमाल के कारण बिहार में टीबी (तपेदिक) के मामले काफ़ी ज़्यादा हैं। जहां पूरे देश में हर एक लाख की आबादी पर 229 लोग टीबी से पीड़ित हैं, वहीं बिहार में यह आंकड़ा 450 है। NFHS-5 के आंकड़ों के अनुसार, केवल कम आबादी वाले राज्यों में ही टीबी का बोझ बिहार से ज़्यादा है।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7624" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Sharab-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>कुल समय पहले एक टेलीविजन के आर्थिक पत्रकार मयंक मिश्रा ने कहा था कि भारत में हर पांच में से लगभग एक पुरुष शराब पीता है। शराब-मुक्त राज्य बिहार में, यह हिस्सा थोड़ा कम है, लेकिन उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की तुलना में ज़्यादा है। हालांकि, बिहार के विपरीत, इन तीनों राज्यों में शराब की बिक्री और सेवन पर कोई रोक नहीं है। नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, तेलंगाना, अरुणाचल प्रदेश, असम के कुछ हिस्सों, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के पुरुषों में शराब का सेवन व्यापक रूप से प्रचलित है। इन राज्यों में, यह दर 40 प्रतिशत या उससे अधिक है। हालांकि, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और बिहार जैसे अधिक आबादी वाले राज्यों में, शराब पीने वाली आबादी का अनुपात राष्ट्रीय औसत के बराबर या उससे कम है।</strong></p>
<p>बिहार में, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के 15 प्रतिशत से अधिक पुरुषों के शराब का सेवन करने का अनुमान है, जबकि राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के लिए ये आँकड़े क्रमशः 11 प्रतिशत, 13.9 प्रतिशत और 14.5 प्रतिशत हैं। बिहार में, 2016 में शराबबंदी लागू हुई थी। रिपोर्टों के अनुसार, अक्टूबर 2021 तक, बिहार निषेध और आबकारी कानून के तहत लगभग 3.5 लाख मामले दर्ज किए गए और चार लाख से अधिक गिरफ्तारियां की गईं। बताया जाता है कि शराबबंदी के कारण राज्य को हर साल राजस्व में 10,000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। आँकड़े दिखाते हैं कि कड़े उपायों के बावजूद, बिहार में शराब का सेवन अभी भी ज़्यादा है। नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, गुजरात में, जो एक और शराब-मुक्त राज्य है, छह प्रतिशत से भी कम पुरुष शराब पीते हैं। देश के अन्य हिस्सों की तरह ही, बिहार के ग्रामीण इलाकों में भी शराब का सेवन ज्यादा है। और महिलाओं में इसका प्रचलन कम है।</p>
<p>पूरे देश के लिए, पिछले 15 वर्षों में शराब के सेवन का रुझान यह दिखाता है कि अब इसका प्रचलन कम हो गया है। उदाहरण के लिए, 2005-06 में, 35-49 आयु वर्ग के हर दस में से चार पुरुष (39 प्रतिशत) शराब का सेवन करते थे। यह 2015-16 में घटकर 36.8 प्रतिशत हो गया और 2019-21 में और घटकर 27.4 प्रतिशत रह गया। बिहार में भी 2005-06 से शराब की खपत में कमी का ऐसा ही रुझान देखने को मिला है। 15-49 आयु वर्ग के पुरुषों में शराब की खपत में कमी 2005-06 से 2015-16 के बीच लगभग 17 प्रतिशत और उसके बाद के पाँच वर्षों में 41 प्रतिशत रही। पूरे देश के लिए यह कमी क्रमशः 8.5 प्रतिशत और 23 प्रतिशत थी। इससे पता चलता है कि शराबबंदी लागू होने से पहले भी बिहार में शराब की खपत तेज़ी से घट रही थी।</p>
<p><strong>जिंदल स्कूल ऑफ़ गवर्नमेंट एंड पब्लिक पॉलिसी की शोधकर्ता आयुश्री खेत्री के अनुसार, 1 अप्रैल 2016 को बिहार सरकार ने राज्य के इलाके में शराब और नशीले पदार्थों के बनाने, बेचने, जमा करने और इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगा दी। यह घोषणा सरकार की अपनी 2005 की आबकारी नीति से बिल्कुल अलग थी। 2005 वह साल था जब राज्य का बजट सिर्फ़ 27,000 करोड़ रुपये था और आमदनी के साधन भी बहुत कम थे। उस समय सरकार का हाल यह था कि पंचायतों में दुकानों की संख्या बढ़ाकर शराब की बिक्री बढ़ाई जाए। इस पहल की वजह से दुकानों की संख्या 2006-07 में 3,436 से बढ़कर 2012-13 में 5,467 हो गई, और गाँवों में 200 प्रतिशत से भी ज़्यादा की बढ़ोतरी देखी गई। यह राज्य के बजट के लिए एक वरदान साबित हुआ, क्योंकि आबकारी से होने वाली आमदनी 2006 में 500 करोड़ रुपये से बढ़कर 2015 में 6,000 करोड़ रुपये हो गई।</strong></p>
<figure id="attachment_7627" aria-describedby="caption-attachment-7627" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7627" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Nitish-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7627" class="wp-caption-text">पानी में डुबोकर रोटी खाने को मजबूर हो गया हूँ नीतीश बाबू प्रदेश को इतना कर्ज में डुबो दिए। तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>आमदनी में यह तेज़ी से हुई बढ़ोतरी ज़्यादा समय तक नहीं रही, क्योंकि बिहार में नए चुनावों के साथ ही सोच में भी बदलाव आ गया। बिहार में अब एक नया कानून लागू किया जाना था, जो &#8216;राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों&#8217; और गांधीवादी विचारों के सिद्धांतों पर आधारित था, और इसका नाम &#8216;बिहार मद्यनिषेध और उत्पाद अधिनियम&#8217; रखा गया। इस कानून में सज़ा के बहुत कड़े प्रावधान थे, जैसे कि पूरे समुदाय पर जुर्माना लगाना और अगर परिवार का कोई एक सदस्य शराब पीते हुए पकड़ा जाता है, तो पूरे परिवार को गिरफ़्तार कर लेना। तब से इस कानून में तीन बार बदलाव किए जा चुके हैं, और अब पहली बार अपराध करने वालों को 2,000 से 5,000 रुपये का जुर्माना देकर छोड़ा जा सकता है।</p>
<p><strong>2016 से लेकर अब तक, इस कानून को सख्ती से लागू करने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, और विधानसभा में हुई चर्चाओं से इसकी कमियाँ भी सामने आई हैं। कानूनों में लगातार होने वाले बदलाव और मेरे हिसाब से उनका ज़्यादा से ज़्यादा नरम होते जाना, मौजूदा समर्थित विचारधारा से &#8216;यू-टर्न&#8217; लेने का एक और तरीका है, जैसा कि 2005 से साफ तौर पर देखा जा सकता है। गठबंधन में अनिश्चितता और राजनीतिक उथल-पुथल इस बात की ओर इशारा कर सकती है कि यह चुनाव जीतने के लिए उठाया गया एक पूरी तरह से राजनीतिक कदम हो सकता है। विचारधाराओं में इस बदलाव की जांच हम अकेले में नहीं कर सकते। 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव JDU के लिए दोबारा चुने जाने के लिहाज़ से एक मुश्किल साल था। जहाँ RJD और BJP ने वोटों के लिए जाति समूहों पर भरोसा किया, वहीं JDU ने, जिसके पीछे कोई खास जाति नहीं थी, महिला मतदाताओं पर भरोसा करने का फैसला किया।</strong></p>
<p>शुरुआत में, शराबबंदी को दो चरणों में लागू किया जाना था—शराबबंदी का पहला चरण ग्रामीण इलाकों में शराब की सभी दुकानों को बंद करने पर केंद्रित था, और दूसरा चरण वह था जिसमें वे पहले चरण के पूरा होने के छह महीने के भीतर इसे पूरे राज्य में लागू कर देते। लेकिन यह चरणबद्ध और सोच-समझकर बनाया गया प्लान तब तेज़ी से खत्म हो गया, जब राज्य की महिलाओं ने इस फैसले का स्वागत किया; दूसरा चरण तय समय से पहले ही लागू कर दिया गया। लागू करने की प्रक्रिया को दो चरणों में बाँटने से लागू करने वाली संस्था को दी गई नीति का मूल्यांकन करने और उसमें सुधार करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह एक जल्दबाजी में लिया गया फैसला था या फिर दूरदर्शिता की कमी का नतीजा।</p>
<p>अब बात करते हैं एक्साइज और टैक्स की; शराब से मिलने वाला टैक्स हमेशा से ही राज्य की अर्थव्यवस्था को बनाए रखने का एक मुख्य ज़रिया रहा है। असल में, ज़रूरत के समय, जब अर्थव्यवस्था में मंदी आती है, तो राज्य इसी शराब का सहारा लेते हैं। लेकिन शराबबंदी के फैसले से बिहार का पहले से ही छोटा खज़ाना खतरे में पड़ गया। साल 2015-16 में इसका एक्साइज़ राजस्व 3,142 करोड़ रुपये था। अगले ही साल, यह गिरकर 46 करोड़ रुपये रह गया। और, 2017-18 में तो यह बिल्कुल शून्य हो गया।</p>
<p><strong>क्रमशः&#8230;&#8230;</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/after-plunging-bihar-into-debt-exceeding-%e2%82%b94-lakh-crore-nitish-headed-to-delhi">बिहार को 400000 लाख करोड़+ का &#8216;ऋणी&#8217; बनाकर नीतीश दिल्ली गए; अब नेता, ठेकेदार कहने लगे &#8216;ठेका खोलो-ठेका खोलो&#8217; (नीतीश के बाद बिहार-2)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>लालू यादव के &#8216;चरवाहा विद्यालय&#8217; के छात्र को &#8216;भाजपा&#8217; बिहार का &#8216;मुख्यमंत्री&#8217; बनाया, &#8216;पैरवी&#8217; नीतीश कुमार किये, भाजपा में &#8216;कलह&#8217; शुरू (नीतीश के बाद बिहार-1)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/a-student-of-lalu-yadavs-charwaha-vidyalaya-become-the-chief-minister-of-bihar</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Apr 2026 07:00:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली: आज इंडियन नेशन अख़बार के पूर्व संपादक ब्रजनन्दन आज़ाद, दीनानाथ झा, आर्यावर्त के संपादक श्रीकांत ठाकुर विद्यालंकार, ब्रज किशोर झा &#8216;भास्कर&#8217;, हीरानंद झा &#8216;शास्त्री&#8217;, परमाननद झा &#8216;शास्त्री&#8217;, रामजी मिश्र &#8216;मनोहर&#8217;, सर्चलाइट के महेश प्रसाद, मुरारी मोहन प्रसाद, टीजेएस जॉर्ज, आरके मुक्कर, प्रदीप अख़बार के संपादक रामसिंह भारतीय, हरिओम पांडे, पारसनाथ सिंह, [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/a-student-of-lalu-yadavs-charwaha-vidyalaya-become-the-chief-minister-of-bihar">लालू यादव के &#8216;चरवाहा विद्यालय&#8217; के छात्र को &#8216;भाजपा&#8217; बिहार का &#8216;मुख्यमंत्री&#8217; बनाया, &#8216;पैरवी&#8217; नीतीश कुमार किये, भाजपा में &#8216;कलह&#8217; शुरू (नीतीश के बाद बिहार-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली: आज इंडियन नेशन अख़बार के पूर्व संपादक ब्रजनन्दन आज़ाद, दीनानाथ झा, आर्यावर्त के संपादक श्रीकांत ठाकुर विद्यालंकार, ब्रज किशोर झा &#8216;भास्कर&#8217;, हीरानंद झा &#8216;शास्त्री&#8217;, परमाननद झा &#8216;शास्त्री&#8217;, रामजी मिश्र &#8216;मनोहर&#8217;, सर्चलाइट के महेश प्रसाद, मुरारी मोहन प्रसाद, टीजेएस जॉर्ज, आरके मुक्कर, प्रदीप अख़बार के संपादक रामसिंह भारतीय, हरिओम पांडे, पारसनाथ सिंह, हरिनारायण निगम याद आ गए। उनकी धारदार कलम याद आ गया। आज अगर वे सभा होते तो देश के महान ज्ञाता, संविधान के निर्माता बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के 135 वें जन्मदिवस पर बिहार की राजनीति में जो भूचाल आया उस पर सम्पादकीय अवश्य लिखते कि &#8220;स्वतंत्रता के 80 साल बाद भी, कागज पर प्रदेश का शैक्षिक दर भले 74 प्रतिशत (पुरुष-82% और महिला-66%) दीखता हो, लालू प्रसाद यादव द्वारा स्थापित चरवाहा विद्यालय का छात्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बना।&#8221;</strong></p>
<p>कहने-सुनने में यह शब्द बहुत कटु लगता है, लेकिन देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 16 नवम्बर, 1968 को जन्म लिए 57-वर्षीय राकेश कुमार या सम्राट चौधरी में ऐसा क्या दिखा जो पहले समता पार्टी, फिर राष्ट्रीय जनता दल, फिर जनता दल यूनाइटेड और अंत में भारतीय जनता पार्टी का दामन पकड़ने वाले सकुनी चौधरी के पुत्र के हाथों प्रदेश का कमान सौंप दिया। उधर, दो दशक से मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठे नीतीश कुमार, जो बाद में तथाकथित विकास पुरुष&#8217; के प्रत्यय से अलंकृत हुए, के समक्ष ऐसी कौन सी &#8216;मज़बूरी&#8217; थी जो &#8220;सत्ता का हस्तानांतरण&#8217; इस कदर किये कि 4 जून, 1947 को वायसराय माउंटबेटेन द्वारा देश को सम्बोधित किये गए संवादों को भी पीछे छोड़ गए। </p>
<p>भारतीय हाथों में सत्ता के हस्तांतरण से सम्बंधित अपने अंतिम प्रसारण में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन कहा था: &#8220;आज रात आपको एक बयान पढ़कर सुनाया जाएगा, जिसमें महामहिम की सरकार का वह अंतिम फैसला बताया जाएगा कि किस तरीके से सत्ता ब्रिटिश हाथों से भारतीय हाथों में सौंपी जाएगी। लेकिन ऐसा होने से पहले, मैं भारत की जनता को एक निजी संदेश देना चाहता हूँ, और साथ ही उन चर्चाओं के बारे में भी संक्षेप में बताना चाहता हूँ जो मैंने राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ की हैं, और जिनके आधार पर मैंने लंदन की अपनी हालिया यात्रा के दौरान महामहिम की सरकार को अपनी सलाह दी थी। मार्च के आखिर में भारत आने के बाद से, मैंने लगभग हर दिन ज़्यादा से ज़्यादा समुदायों और हितों के नेताओं और प्रतिनिधियों के साथ बातचीत करने में बिताया है। मैं यह कहना चाहता हूँ कि उन्होंने मुझे जो भी जानकारी और उपयोगी सलाह दी है, उसके लिए मैं उनका कितना आभारी हूँ। पिछले कुछ हफ्तों में मैंने जो कुछ भी देखा या सुना है, उससे मेरी यह पक्की राय ज़रा भी नहीं बदली है कि अगर समुदायों के बीच थोड़ी-बहुत भी सद्भावना हो, तो एक एकीकृत भारत ही इस समस्या का सबसे बेहतरीन हल होगा।</p>
<p><strong>वायसराय माउंटबेटन आगे कहे थे: &#8220;सौ साल से भी ज़्यादा समय से, आप 40 करोड़ लोग एक साथ रहते आए हैं, और इस देश का शासन एक ही इकाई के तौर पर चलाया गया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि संचार, रक्षा, डाक सेवाएँ और मुद्रा व्यवस्था एकीकृत हो गई हैं; टैरिफ और सीमा-शुल्क की रुकावट खत्म हो गई है; और एक एकीकृत राजनीतिक अर्थव्यवस्था की नींव रखी गई है। मेरी सबसे बड़ी उम्मीद यही थी कि सांप्रदायिक मतभेद इस एकता को नष्ट नहीं करेंगे भारतीय लोगों का फ़ैसला चाहे जो भी हो, मुझे पूरा भरोसा है कि जिन भी ब्रिटिश अधिकारियों या अफसरों से कुछ समय के लिए रुकने को कहा जाएगा, वे उस फैसले को लागू करने में अपनी पूरी ताकत लगा देंगे। हिज़ मैजेस्टी और उनकी सरकार, दोनों ने ही मुझसे आप सभी को भारत में आपके भविष्य के लिए अपनी दिली शुभकामनाएं और अपने निरंतर सद्भाव का भरोसा देने को कहा है। मुझे भारत के भविष्य पर पूरा भरोसा है और इस ऐतिहासिक समय में आप सबके साथ होने पर मुझे गर्व है। उम्मीद है कि आपके फैसले समझदारी से लिए जाएंगे और उन्हें गांधी-जिन्ना की अपील की शांतिपूर्ण और मैत्रीपूर्ण भावना के साथ लागू किया जाएगा।&#8221;</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/s.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/s.jpg" alt="" width="1280" height="854" class="aligncenter size-full wp-image-7607" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/s.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/s-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/s-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/s-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a></p>
<p>लेकिन, नीतीश कुमार, जो पिछले दो दशक से प्रदेश मुख्यमंत्री पद पर काबिज रहे, करीब छह मिनट तक अपने मंत्रिमंडल के लोगों के समक्ष विदाई भाषण तो दिए, यह भी कहा कि वे अपने सामर्थ्य और क्षमता के अनुरूप कार्य करने की अनवरत कोशिश किये, उनके कुछ खास लोग भाव विह्वल भी हुए, वे अपने मंत्रिमंडल के लोगों से पूछे भी कि क्या उनका फैसला सबों को मंजूर है अथवा नहीं? सभी हामी भी भरे, सभी यह भी कहे कि उनकी कमी खलेगी &#8211; लेकिन अपने इस निर्णय को लेने से पहले अथवा निर्णय लेने के बाद प्रदेश की जनता से, चाहे उसकी शैक्षिक दर औसतन 74 फीसदी ही हो, एक बड़ा समुदाय भले पढ़ना-लिखना नहीं जानता हो, लेकिन बहरा कोई नहीं है, सुन सकता था, उसे अपने बात न जाते-जाते अथवा जाने के बाद भी नहीं कहे &#8211; जिसने इन 21 वर्षों में अपना बहुमूल्य मत देकर उन्हें और उनके जनता दल यूनाइटेड को सूत्रबद्ध रखा। यह तो उनकी &#8216;कुछ निजी&#8217; और &#8216;कुछ राजनीतिक कमजोरी&#8217; रही होगी, जिसके कारण अपने दर्जनों  विधानसभा क्षेत्र, जिस पर वे जीतते आये, भारतीय जनता पार्टी को शनै-शनै सौंपते आये और अंततः स्वयं के साथ-साथ प्रदेश की सत्ता को भी जनता के विचार को पूछे बिना सौंपकर दिल्ली की ओर कूच कर गए। आने वाले दिनों में बिहार के भाजपा में और जनता दल यूनाइटेड के नेताओं के बीच क्या-क्या होगा, यह नेपथ्य में लिखा जा रहा है।  </p>
<p>सम्राट चौधरी को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा और जनता दल यूनाइटेड के दर्जनों नेताओं का गाल, मुंह सभी फुले हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बको ध्यानम लगाए रखने वाले नौजवान नेतागण कभी विधानसभा की ओर, तो कभी मंत्रालय की ओर त्यों कभी दिल्ली की ओर देखते नजर आ रहे हैं। कई नेता तो नेपथ्य में बैठे, अवकाशप्राप्त नेताओं से भी तालमेल जुटा रहे हैं। शायद यही राजनीति है। अगर आपकी पहुँच विधानसभा और मंत्रालय तक है तो साक्षात्आ देखें अन्यथा तस्वीरों का अवलोकन कर उनकी शारीरिक भाषाओँ को पढ़ें। खैर। </p>
<blockquote><p>सत्तर-अस्सी के दशक के सम्पादकों की याद आज इसलिए आ रही है कि आज से 51-वर्ष पहले 25 जून, 1975 को देश में आपातकाल लगा था। आपातकाल की घोषणा के साथ ही प्रदेश की राजधानी पटना से प्रकाशित सभी अख़बारों के दफ्तरों में सरकारी मुलाजिम तैनात हो गए थे। अख़बारों में क्या प्रकाशनीय है और क्या नहीं, अपने-अपने कलम की लाल स्याही से निशान लगाने लगे थे। लोगों कह रहे थे कि अंग्रेजी हुकूमत के बाद स्वतंत्र भारत में शायद पहली बार &#8216;कलम की गिरफ़्तारी&#8217; हुयी थी। पत्रकारों के चेहरों पर &#8216;सूजन&#8217; दिखने लगा था। होठों के साथ-साथ कलम के स्याही में सूखने लगे थे। कागज पर कलम चले कोई 30 &#8211; घंटा से अधिक समय निकल गया था। </p></blockquote>
<p><strong>इंडियन नेशन के तत्कालीन संपादक दीनानाथ झा, जिस सम्पादकीय को लिख कर गए थे और सम्पादकीय पृष्ठ पर अपने स्थान – बाएं पृष्ठ, बायां हाथ, सबसे ऊपर – पर लगा हुआ था, तत्काल हटा दिया गया। कुछ काल बाद वे स्वयं दफ्तर पहुंच गए थे। उनके आने का अर्थ था सम्पादकीय विभाग के सभी कर्मियों की उपस्थिति, वह भी प्रेस में। मशीन के आस-पास बाएं हाथ ‘इंडियन नेशन’ और दाहिने हाथ ‘आर्यावर्त’ अख़बारों का जहाँ पृष्ठ बन रहा था, मेला जैसा दिख रहा था। उन दिनों लोगों कह रहे थे कि प्रेस के अंदर ऐसी भीड़ शायद जंगे आज़ादी के बाद पहली बार हुई थी। </strong></p>
<p>दूसरे दिन अखबार का प्रातः संस्करण प्रकाशित हुआ। कितने अखबार प्रकाशित हुए थे, कितने बिके, न मुद्रक को मालूम था और ना ही मानदाता सिंह (अखबार के एजेंट थे) को। कुछ काल दोनों अख़बारों का सम्पादकीय विभाग खाली रहा, लेकिन जैसे ही घड़ी की सूई 10 की ओर बढ़ रही थी, लोगों का आना प्रारम्भ हो गया। सम्पूर्ण दफ्तर में सुई रखने का जगह नहीं था। पटना विश्वविद्यालय, मगध विश्वविद्यालय, बिहार विश्वविद्यालय, भागलपुर विश्वविद्यालय, मिथिला विश्वविद्यालय के छात्र नेताओं से लेकर शिक्षक और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के नेताओं का आना-जाना शुरू हो गया था। </p>
<p>कोई साढ़े दस बजे रिक्शा पर बैठे, कागजों का अम्बार लिए दीना नाथ झा परिसर में पधारे। मैं प्रथम द्रष्टा था। उनके चेहरे को देखकर ऐसा लग रहा था आज कुछ होने वाला है। इसी बीच, सरकारी प्रतिनिधि में अपनी-अपनी गाड़ियों से पटना से प्रकाशित सभी समाचार पत्रों के दफ्तरों में आना-जाना शुरू कर दिए थे ‘अधिसूचना’ के साथ – कोई भी सामग्री बिना सरकारी मुलाजिमों को दिखाए अख़बार में प्रकाशित नहीं होगा। दीना बाबू, ज्वाला नंदन सिंह,गजेंद्र नारायण चौधरी, रिपूर्णानंद पांडे, दुर्गानाथ झा, मिथिलेश मैत्रा, केशव कुमार, सीता शरण झा, सुरपति झा, राजकुमार झा (आज सभी दिवंगत)और अन्य सभी सम्पादकीय विभाग के लोग कक्ष में उपस्थित थे। बीच-बीच में स्थानीय नेताओं का आना-जाना लगा था। जो आम तौर पर संध्याकाळ आते थे, जून के महीने में तपती धुप में आ रहे थे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aalu_baigan.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aalu_baigan.jpg" alt="" width="1874" height="1053" class="aligncenter size-full wp-image-7608" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aalu_baigan.jpg 1874w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aalu_baigan-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aalu_baigan-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aalu_baigan-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Aalu_baigan-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1874px) 100vw, 1874px" /></a></p>
<p><strong>शाम में जब लाइनो विभाग के प्रमुख मोहम्मद सुभान खान को दीना बाबू का ‘पहला सम्पादकीय’ मिला तो उसे पढ़कर वह जोर से चिल्लाये, ठहाका लगाए, और सबों को अपने पास आने को कहे। अपने जीवनकाल में वे शायद पहली बार दीना बाबू लिखित ऐसे सम्पादकीय को पढ़े थे। सभी आश्चर्य चकित थे – लेकिन सभी उस सम्पादकीय में शब्दों के प्रयोग, वाक्यों के विन्यास और भाव से यह जान गए थे कि तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की इस हरकत के प्रति बिहार के लोगों की क्या राय है। 27 जून, 1975 का सम्पादकीय था – ‘आलू-बैगन की सब्जी कैसे बनाएं – क्योंकि लिखने के लिए कुछ था ही नहीं।  जो लिखते उसे सरकारी अधिकारी प्रकाशन में जाने ही नहीं देते। </strong></p>
<p>आज 51-वर्ष बाद जिस तरह कांग्रेस के तर्ज पर भाजपा के &#8216;आला कमान&#8217; (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह/सहकारिता मंत्री अमित शाह) के निर्णय के आधार पर बिहार में 24 वें मुख्यमंत्री के रूप में सातवीं कक्षा पास सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाया गया, आज भी अब लिखने को कुछ बचा नहीं है। जिस तरह पूर्व-मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रदेश के मतदाताओं के साथ &#8216;स्वहित&#8217; में छल किया यह जानते हुए भी की विगत 21 वर्षों में जिस तरह बिहार का मतदाता उनके साथ खड़ा रहा और वे कुर्सी पर बैठे रहे, उसे बिना बताये, उसकी राय बिना लिए सत्ता को लालू यादव के चरवाहा विद्यालय के छात्र के हाथों सौंपकर दिल्ली सल्तनत की ओर कुछ किये &#8211; वेवजह नहीं हो सकता है। आज नीतीश कुमार भले उन तथ्यों का उजागर नहीं करें, कल समय स्वयं उसे सार्वजनिक कर देगा। </p>
<p>2005 में भाजपा के 55 और जनता दल यूनाइटेड के 88 विधायक थे बिहार विधानसभा में। 2010 में भाजपा विधायकों की संख्या 91 हुई और जनता दाल यूनाइटेड की संख्या 115 हो गयी। पांच साल बाद जनता दाल यूनाइटेड की संख्या अचानक गिरकर 71 हो गयी और भाजपा की संख्या भी 53 पर लुढ़की। 2015 के बाद, यानी जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनी, नीतीश कुमार भाजपा के अधीन वशीकरण होते गए। जिसका दृष्टान्त 2020 विधानसभा चुनाव में दिखा। एक तरफ भाजपा की संख्या जहाँ 53 से 74 हो गयी, वहीं जनता दल यूनाइटेड की संख्या 53 से 43 हो गयी। विगत 2025 के चुनाव में भाजपा 74 से 89, जनता दल यूनाइटेड 43 से 85 और राष्ट्रीय जनता दल 75 से 25 पर आ गयी। वैसे राजनीतिक विशेषज्ञ यह कि नीतीश कुमार जयप्रकाश नारायण आंदोलन के सहकर्मी रहे लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक मन्त्र को &#8211; मुस्लिम यादव समीकरण, जिसके बल पर राष्ट्रीय जनता दल कई वर्षों तक शासन में रहा &#8211; नष्ट कर आगरा-पिछड़ा एक ऐसा समीकरण बनाए जिसके दम पर वह 21 वर्षों तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/nitish.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/nitish.jpg" alt="" width="1920" height="1079" class="aligncenter size-full wp-image-7609" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/nitish.jpg 1920w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/nitish-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/nitish-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/nitish-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/nitish-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1920px) 100vw, 1920px" /></a></p>
<p><strong>बिहार के राजनीतिक विशेषज्ञ इस बात को मानते हैं कि प्रदेश में राजनीतिक सियासत में सामाजिक और जातीय समीकरण अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दो वर्ष पूर्व 2 अक्टूबर, 2023 को बिहार में कराई गई जाति आधारित गणना के आंकड़े सार्वजनिक किये थे।बिहार विधानमंडल ने 18 फरवरी 2019 को राज्य में जाति आधारित जनगणना (सर्वे) कराने का प्रस्ताव पारित किया था। रिपोर्ट के मुताबिक अति पिछड़ा वर्ग 27.12 प्रतिशत, अत्यन्त पिछड़ा वर्ग 36.01 प्रतिशत, अनुसूचित जाति 19.65 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति 1.68 प्रतिशत और अनारक्षित यानी सवर्ण 15.52 प्रतिशत हैं। इस जातिगत सर्वे से बिहार में आबादी का धार्मिक आधार भी पता चला। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में हिंदू 107192958 (कुल आबादी का 81.9%) है, जबकि मुसलमानों 23149925 (कुल आबादी 17.7%), ईसाई 0.05 प्रतिशत, बौद्ध 0.08 प्रतिशत, जैन 0.009 प्रतिशत है। </strong></p>
<p>जिस कालखंड में जेपी अंतिम सांस लिए, प्रदेश की आवादी करीब साढ़े पांच करोड़ के आस-पास थी। प्रदेश में शैक्षिक दर करीब 34-36 फीसदी तक आयी थी, जिसमें पुरुषों का शैक्षिक दर तक़रीबन 45 फीसदी आँका गया था और महिलाओं की शैक्षिक दर 22 फीसदी। आज जयप्रकाश नारायण की मृत्यु के साढ़े चार दशक बाद प्रदेश में शैक्षिक दर कागज पर भले 74+ फीसदी लिखा हो, पुरुषों (82+%) की तुलना में महिलाएं (66+%) आज भी 20 फीसदी पीछे हैं। और 20 फीसदी अशिक्षित महिला मतदाताओं को  को चुनाबी मैदान में ठगना कोई बड़ी बात नहीं है। खासकर जब प्रदेश का नेतृत्व देने वाला स्वयं सातवां पास हो। आज भी भाजपा का विधानमंडल में इतनी संख्या नहीं है कि वह अपने दम पर सरकार बना सके। वैसे आज किसी भी राजनीतिक पार्टी प्रदेश में अकेले सरकार बनाने के काबिल नहीं हैं। इस दृष्टि आला-कमान ने यह निर्णय लिया कि राजनीतिक तालमेल को बनाये रखने के लिए, प्रदेश की सभी जातियों को कमोवेश राजनीतिक गलियारे में स्थान बरकरार रखने के लिए जनता दल यूनाइटेड के कोटे से विजय कुमार चौधरी और विजेंद्र यादव को डिप्टी सीएम बनाया जाय। </p>
<blockquote><p>डॉ. भीमराव आंबेडकर के 135 वे जन्मदिवस पर भारतीय जनता पार्टी के &#8216;कल के उप-मुख्यमंत्री&#8217;, सम्राट चौधरी, आज के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। वह इस पद पर बैठने वाले भाजपा के पहले नेता हैं। राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (रिटायर्ड) ने चौधरी को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन में भाजपा, जनता दल (यूनाइटेड) और अन्य तीन पार्टियां शामिल हैं। चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार में जनता दल यूनाइटेड की तरफ से दो उपमुख्यमंत्रियों ने शपथ ली। उल्लेखनीय है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में भाजपा के दो उप-मुख्यमंत्री थे, चौधरी की सरकार में जनता दल यूनाइटेड के दो उपमुख्यमंत्री हैं। संसदीय बोर्ड ने शिवराज सिंह चौहान को इस बदलाव के लिए &#8220;केंद्रीय पर्यवेक्षक&#8221; नियुक्त किया था। </p></blockquote>
<p>आपको याद हो अथवा नहीं, लेकिन भारत सरकार के दस्तावेजों के साथ-साथ इंटरनेट और विभिन्न टीवी चैनलों, सोशल मीडिया पर आज भी उपस्थित है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार को सार्वजनिक मंच से बिहार में उनके राज में भ्रष्टाचार के घोटाले उजागर किये थे। जिस दिन मंच से प्रधानमंत्री यह बोल रहे थे, बिहार के लोगों में, खासकर मतदाताओं में एक आशा की किरण जगी – शायद प्रदेश का कुछ अच्छा होने वाला है। लेकिन समय बदलते गया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक होते गए। इतना ही नहीं, आने वाले दिनों में भी शायद उन घोटालों से पर्दा कभी नहीं उठ पायेगा। </p>
<p><strong>ग्यारह साल पहले 30 अक्टूबर, 2015 को चुनाव प्रचार-प्रसार के दौरान लालू प्रसाद यादव के जन्मस्थान गोपालगंज से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सार्वजनिक रूप से कहे थे : “नीतीश बाबू …. अरे चुनाव में तो हार जीत होती रहती है, ऐसा क्यों कर रहे हो? नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा था कि “दिल्ली में भी रोजाना भ्रष्टाचार के मामले आते थे। टूजी हो या कोयला, सब में पैसा खाया। लेकिन 16 महीनों से मुझ पर भ्रष्टाचार को कोई आरोप नहीं है।  नीतीश पर हमला करते हुए मोदी ने कहा, “हालत तो देखिए, नीतीश के मंत्री कैमरे के सामने पैसे लेते पकड़े गए, ये कम बड़ा अपराध है क्या? लेकिन उन्हें कोई शर्म है क्या? नीतीश ने कहा था जो भ्रष्टाचार में पकड़ा जाएगा उसके घर में गरीबों के लिए स्कूल खोला जाएगा। लालू को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल हुई, उनके घर को जब्त किया क्या? किसे पागल बना रहे हो नीतीश बाबू? इतना ही नहीं उनके मंत्री बिहार को बेच रहे हैं। नीतीश बाबू आपने अपने मंत्रियों के घर जब्त किए क्या? कोई कार्रवाई की क्या? अभी तो आपकी सरकार है। इन 25 सालों में इन्होंने जो किया है उसकी सूची है।” गोपालगंज की सभा में 84 सेकेंड तक महागठबंधन के नेताओं के समय की घोटालों की सूची लगातार 80 सेकेंड में उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार के समय के 25 और लालू यादव के समय के 7 घोटाले गिनाए। फिर 4 सेकेंड में बोले- मैं महागठबंधन के महाशय के चारा घोटाले को तो गिन ही नहीं रहा हूं। उसके बाद वे प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार और जंगलराज पर बोले।</strong> </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2.jpg" alt="" width="1280" height="853" class="aligncenter size-full wp-image-7610" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/2-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a></p>
<p>नितीश कुमार के कालखंड में हुए घोटालों को गिनाते, मसलन दवा खरीद घोटाला, ट्रांसफाॅर्मर खरीद घोटाला, एस्टीमेट घोटाला, फर्टिलाइजर सब्सिडी घोटाला, मस्टर रोल घोटाला, राशन-किरासन घोटाला, शराब घोटाला, इंदिरा आवास घोटाला, मनरेगा घोटाला, शौचालय घोटाला, कोसी केनाल निर्माण घोटाला, मिड डे मील घोटाला, आंगनबाड़ी घोटाला, कुलपति घोटाला, पथ निर्माण घोटाला, पुल निर्माण घोटाला, शिक्षा अभियान घोटाला, टेक्स्टबुक छपाई घोटाला, परिवहन घोटाला, वायरलेस बैटरी खरीद घोटाला, बियाडा जमीन घोटाला, बुद्ध स्मृति पार्क घोटाला और चावल घोटाला, प्रधानमंत्री सांस भी नहीं लिए। लेकिन दुर्भाग्य है कि इन विगत वर्षों में कौन किसकी आलोचना क्यों किये यह तो वे भी जानते हैं और नितीश कुमार – लालू यादव एंड कंपनी तो जानते ही हैं।  </p>
<p>बिहार का पहला मुख्यमंत्री बने श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) तक।  इसके बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) तक। बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970, कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979, केदार पांडे 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973, अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975, जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 और सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक। </p>
<p><strong>जहाँ तक प्रदेश में भाजपा का नेतृत्व और लोगों पर उसकी पकड़ का प्रश्न है, वह अभी 20 फीसदी से अभी अधिक नहीं है। अगर इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा नहीं होता तो औसतन 60 फीसदी से अधिक अभ्यर्थी मुंह के बल गिरते। कैलाशपति मिश्र (1980-81/1984-87), इन्दर सिंह नामधारी (1988-90), ताराकांत झा (1990-93), अश्वनी कुमार (1994-96), यशवंत सिन्हा (1997-98), नन्द किशोर यादव (1998-2003), गोपाल नारायण सिंह (2003-05), सुशील कुमार मोदी (2005-06), राधा मोहन सिंह (2006-10), सी.पी. ठाकुर (2010-13), मंगल पांडे (2013-16), नित्यानंद राय (2016-19), संजय जायसवाल (2019-23), सम्राट चौधरी (2023-24), दिलीप कुमार जायसवाल (2024 -दिसंबर 2025 तक)  और संजय सराओगी (दिसंबर 2025 से अब तक) ये सभी पिछले 46 वर्षों में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने। लेकिन बिहार में अब तक बने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष में शायद सम्राट चौधरी का कालखंड सबसे कम है (24 मार्च, 2023 को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बने और 26 जुलाई, 2024 को दिलीप कुमार जायसवाल को कुर्सी पद देकर हटे) &#8211; कुल 489 दिन। अब इन दिनों को आधार मानकर अगर भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व उन्हें प्रदेश के मुख्यमंत्री के काबिल समझ लिया, तो इस बात से इंकार नहीं कर सकते हैं कि आने वाले दिनों में राजनीति शास्त्र के देशज और विदेशज छात्र-छात्राएं इन विषय पर शोध अवश्य करेंगे। यह भी शोध का विषय मानेंगे की आखिर ऐसा क्या हुआ कि बिहार में भाजपा को पहचान देने वाला सुशील कुमार मोदी को भाजपा का  केंद्रीय आला कमान कभी आए आने नहीं दिया?</strong> </p>
<p>बिहार के लोग जब नरेंद्र मोदी का नाम नहीं सुने थे, बिहार में सुशील मोदी का नाम घरेलू हो गया था। अगर राजनीति नहीं हो और राज नेता के अनुयायी ‘निष्पक्ष निर्णय लेने लायक हो, तो आज ही नहीं, आने वाले काल खंडों में भी आधुनिक बिहार (जय प्रकाश नारायण आंदोलन के बाद) में अगर किसी भी ‘शिक्षित’, ‘तथ्यगत जानकारी रखने वाला’, ‘स्पष्टवक्ता’ राजनेताओं का नाम लिया जाएगा तो वह नाम ‘एक वचन” से बहुवचन नहीं हो पाएगा और सुशील मोदी के नाम पर पूर्ण विराम भी लग जाएगा। आज बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गुलबंद बांधकर भले भारतीय जनता पार्टी के आला नेता के संग बैठकर कुर्सी का मज़ा लें, ठहाका-पर-ठहाका लगाएं, आला नेता भले यह स्वीकार नहीं करें, लेकिन हक़ीक़त यही है कि बिहार में सन् सत्तर के दशक के बाद पहले ‘दीपक’ को ‘बुझने’ से बचाये रखने, जलाये रखने और फिर कमल को खिलने-खिलाने में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया तो वह पटना के राजेंद्र नगर रोड नंबर 8 के निवासी सुशील कुमार मोदी के अलावे कोई नहीं था। यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री जगत प्रकाश नड्डा भी सुशील मोदी के सामने बौने हैं। भले वे गोल-मटोल होकर, गोल-मटोल बातें कर सत्ता के सिंहासन पर विराजमान हों।</p>
<p>हम सभी प्रथम द्रष्टा हैं। सुशील मोदी जेपी आंदोलन की उपज माने जाते थे। जयप्रकाश आंदोलन से रामजनम सिन्हा, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, नरेंद्र सिंह, सुशील मोदी, शिवानंद तिवारी जैसा राजनीतिक नेताओं का जन्म हुआ। सुशील मोदी की छात्र राजनीति की शुरुआत साल 1971 में हुई जब वे पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ की पांच सदस्यीय कैबिनेट के सदस्य निर्वाचित हुए। 1973 में वो महामंत्री चुने गए। उस वक़्त पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और संयुक्त सचिव रविशंकर प्रसाद चुने गए थे। भारतीय जनता पार्टी के सिद्धांतकार और संघ विचारक रहे केएन गोविंदाचार्य को सुशील कुमार मोदी का राजनीतिक गुरु माना जाता है।</p>
<p>तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा लागू आपातकाल के दौरान मोदी बिहार की राजनीतिक वातावरण में उभर कर आए। अपनी वाक्पटुता, स्पष्ट विचार के कारण वे पटना के मजदूरों से लेकर शिक्षाविदों तक सभी के पसंदीदा रहे। आपातकाल के दौरान वे 19 महीने जेल में रहे। सन 1977 से 1986 तक वो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में महत्वपूर्ण पदों पर रहे। बिहार की राजनीति में सुशील मोदी अपना नाम अपने दम पर लिखा। सन 1968 में वे राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और आजीवन आरएसएस के कार्यकर्त्ता बने रहे। सन 1974 आंदोलन के दौरान वे बिहार प्रदेश छात्र संघर्ष समिति के सदस्य बने। सन 1983 आते-आते वे विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय महासचिव के पद पर आसीन हुए। 1990 में सुशील कुमार मोदी ने पटना केन्द्रीय विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े और विधानसभा पहुंचे। 1995 और 2000 का भी चुनाव वो इसी सीट से जीते। साल 2004 में उन्होंने भागलपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीता था। साल 2005 में उन्होंने संसद सदस्यता से इस्तीफा दिया और विधान परिषद के लिए निर्वाचित होकर उपमुख्यमंत्री बने। साल 2005 से 2013 और फिर 2017 से 2020 के दौरान वो बतौर उपमुख्यमंत्री अपनी भूमिका निभाते रहे। इस दौरान वो पार्टी में भी अलग-अलग दायित्व संभालते रहे। दिसंबर, 2020 में उन्हें पार्टी ने राज्यसभा भेजा। </p>
<p>नब्बे में जिस पटना केंद्रीय विधानसभा क्षेत्र (अब कुम्हरार विधानसभा क्षेत्र) से सुशील मोदी चुनाव जीते थे, कोई साढ़े तीन दशक बाद आज तक उस विधानसभा क्षेत्र में ‘मोदी के पग के निशान’ दीखते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस स्थान से भारतीय जनता पार्टी का कोई भी अभ्यर्थी चुनावी मैदान में अपनी टोपी उछालेगा, वह सुशील मोदी के नाम से विजय हो जायेगा। राजनीतिक विचारधाराओं में विविधता के वावजूद इस विधानसभा क्षेत्र के सभी लोग सुशील मोदी का बहुत सम्मान करते हैं। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से जन्म लिए किसी भी राजनेताओं को, यहाँ तक की वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार या अन्य केंद्रीय मंत्रियों को वह सम्मान नहीं प्राप्त हुआ।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1.jpg" alt="" width="1280" height="853" class="aligncenter size-full wp-image-7611" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1-1024x682.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/1-768x512.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a></p>
<blockquote><p>लेकिन सम्राट चौधरी का तो दूर-दूर तक कभी न तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ सम्बन्ध रहा, न देश के किसी शाखा में वे कसरत किये, न भाजपा के लिए झंडा उठाया, फिर ऐसी क्या बात हुयी कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह (क्योंकि इन दोनों के अलावे भाजपा में आज कोई है ही नहीं जो निर्णय ले सके, चाहे पार्टी की हो या सरकार  की) के इतने प्रियपात्र हो गए, विश्वासी हो गए कि उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी गयी। </p></blockquote>
<p>वैसे <strong>पटना के वरिष्ठ पत्रकार कमलाकांत पांडे</strong> कहते हैं: &#8220;बिहार की राजनीति में इस बदलाव के संकेत पिछले वर्ष नवंबर में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान ही मिल गए थे, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तारापुर के चुनावी सभा में कहा था कि उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को &#8220;बड़ा आदमी&#8221; बनाया जायेगा। सम्राट चौधरी के पिता शकुनी चौधरी एक पूर्व सैनिक हैं। शकुनी चौधरी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की थी और बाद में अलग-अलग समय में लालू प्रसाद तथा नीतीश कुमार के साथ जुड़े। जबकि सम्राट चौधरी ने साल 2017 में भाजपा का दामन थामा। इससे पहले वह एक दशक से अधिक समय तक लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल में थे फिर दो वर्ष तक नीतीश कुमार के पार्टी जदयू में भी रहे। साथ ही, लोजपा और हम के भी राही रहे। सम्राट चौधरी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत राबड़ी देवी के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री भी रहे। राजद के वर्ष 2005 में सत्ता से बाहर होने के बाद भी वह लंबे समय तक इस पार्टी के साथ बने रहे, लेकिन 2014 में एक बागी धड़े के साथ जद(यू) में शामिल हो गए, जब जीतन राम मांझी राज्य के मुख्यमंत्री थे। तीन वर्ष बाद उन्होंने जद(यू) छोड़कर भाजपा का रुख किया। </p>
<blockquote><p>बिहार के एक वरिष्ठ नेता (अपना नाम नहीं लिखना चाहते हैं) कहते हैं: &#8220;आज के राजनीतिक माहौल में चाहे किसी भी पार्टी का हो, सत्तारूढ़ हो या विपक्ष, सभी पार्टियों में कांग्रेस के तर्ज पर &#8216;आला कमान हो गया है। आला कमान शब्द की शुरुआत इंदिरा गाँधी के कालखंड से हुआ। उन दिनों भी जो मैडम के विरुद्ध गया, वह कभी फिर से राजनीती की मुख्यधारा में नहीं आ सका। सीताराम केसरी जी से बड़ा दृष्टान्त और क्या हो सकता हैं। उसी तरह, जयप्रकाश नारायण आंदोलन के बाद प्रदेश में जितने भी नेता जन्म लिए, वे सभी पारम्परिक राजनेता या खानदानी राजनेता नहीं हुए, थे या हैं; बल्कि अर्थ, सामर्थ्य, शिक्षा, व्यवसाय, दबंगता, व्यापार, व्यवसाय का राजनीतिकरण कर राजनेता बने। </p></blockquote>
<p><strong>वे कहते हैं: &#8220;किसी अन्य का दृष्टान्त देने के बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही लीजिये। सत्तर के दशक में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पहले अंशकालीन, बाद में पूर्णकालिक प्रचारक बने। करीब सत्रह-अट्ठारह साल बाद 1985 में भाजपा में कार्य कार्य करने का जवाबदेही मिला। सन 1987 में वे गुजरात यूनिट के महासचिव बने। महासचिव बनने के कोई 15-साल बाद 7 अक्टूबर, 2001 को वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने। करीब 12 साल 227 दिन मुख्यमंत्री कार्यालय में रहने के बाद 26 मई, 2014 को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लिए। अब सवाल यह है कि पहले राबड़ी-लालू के साथ, फिर नितीश के साथ और फिर भाजपा में, आखिर नरेंद्र मोदी-अमित शाह को इनमें कुछ तो दिखा होगा जो भाजपा में 9-वर्ष होते-होते भारत के दूसरे सबसे बड़े जनसँख्या बाहुल्य, जाति-बाहुल्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिए। इस दृष्टि से सम्राट चौधरी महज एक रबर-स्टाम्प होंगे। केंद्र के इशारे पर कार्य करेंगे। कल आप लालू यादव की आलोचना करते थे, आज लालू यादव के चरवाहा विद्यालय का छात्र ही प्रदेश का मुख्यमंत्री बन गया। आज न भाजपा और ना ही जनता दल यूनाइटेड के किसी भी नेता अथवा विधायक में इतनी क्षमता है कि वे कुछ बोल सकें। सभी अंदर से भयभीत हैं। अगर मुंह खोले तो मंत्रालय से बाहर। </strong></p>
<p>इतना ही नहीं, दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर इस बात की चर्चा आम है कि भाजपा का केंद्रीय आला कमान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसा कर्मठ, जुझारू मुख्यमंत्री नहीं चाहते हैं बिहार में। बिहार में भाजपा का एक ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो सिर्फ उनकी बात सुने और वही करे जो वे चाहते हैं। यह कि सुशील मोदी बिहार के लिए सबसे सबल व्यक्ति थे जो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते, लेकिन आज वे नहीं हैं, और उनके बाद भाजपा में जो भी व्यक्ति हैं शायद केंद्रीय आला कमाल की बातों को प्रदेश में पूर्णतः लागू नहीं भी करते, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। एक बात की चर्चा और है कि नीतीश कुमार के शासनकाल में बिहार में जो भी हुए हैं, उन बातों पर कल अगर जांच-पड़ताल करने की बात आये, या फिर, जनतादल यूनाइटेड को &#8216;डिवाइडेड&#8217; कर विधजायकों को भाजपा के छतरी तले लाने की बात हो, या फिर लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार तथा परिजनों पर शिकंजा कसने की बात आये तो सम्राट चौधरी ही एक मात्र मुख्यमंत्री होंगे हो पीछे नहीं हटेंगे। यह भी तय है। </p>
<figure id="attachment_7612" aria-describedby="caption-attachment-7612" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/radhamohan-singh.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/radhamohan-singh.jpg" alt="" width="2048" height="1151" class="size-full wp-image-7612" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/radhamohan-singh.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/radhamohan-singh-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/radhamohan-singh-1024x576.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/radhamohan-singh-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/radhamohan-singh-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7612" class="wp-caption-text">पूर्व डिप्टी सीएम विजय सिन्हा का राधामोहन सिंह से मिलना बीजेपी के अंदर की राजनीति के अलग हवा दे रहा है।</figcaption></figure>
<p><strong>बीबीसी के पूर्व पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते </strong>हैं: &#8220;नीतीश कुमार डरपोक हैं। बीस साल से अधिक समय तक मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठने वाला व्यक्ति इतना कमजोर हो जायेगा, इतना डरपोक हो जायेगा, यह बिहार का मतदाता कभी सोचा नहीं होगा। अगर नीतीश कुमार अपने कार्यकाल में सच में विकास पुरुष थे, तो उन्हें केंद्र को चैलेंज करना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं किया उन्होंने। वे धीरे-धीरे बिना किसी पदचाप के सत्ता का बागडोर भाजपा के हाथों सौंपते गए। वे प्रदेश के उन मतदाताओं के साथ न्याय नहीं किये जिन्होंने पिछले 21 वर्षों से उन्हें देखकर, उनकी पार्टी या उनके पार्टी के लोगों के पक्ष में मतदान किया था। प्रदेश का मुख्यमंत्री को छोड़कर कोई राज्यसभा की कुर्सी पकड़ता है। उन्हें तो चाहिए था मंत्रिमंडल को भंग कर जनमत की बात करते। जनता अगर चाहती उसे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक लाती। इतना ही नहीं, समाजवाद के पक्ष में, परिवारवाद के विरुद्ध बोलने वाला व्यक्ति अपने राजनीतिक जीवन के अंत में धृतराष्ट्र बन गया। पुत्र मोह में जकड़ गया। पुत्र को उप-मुख्यमंत्री बनाने की बात करने लगा। फिर तो वे लालू यादव, आनंद मोहन सिंह, जीतन राम मांझी, शकुनि चौधरी, उपेंद्र कुशवाहा, राम विलास पासवान, जगन्नाथ मिश्र, प्रभुनाथ सिंह जैसे नेताओं के साथ पंक्तिबद्ध हो गए। </p>
<p><strong>आज भी बिहार में सभी जातियों के लोगों को चाहे अगारी हो &#8211; भूमिहार हो, ब्राह्मण हो, राजपूत हो, कायस्थ हो, शेख हो, पठान हो, या पिछड़ी ओबीसी/ईबीसी) में यादव हो, कोइरी हो, कुशवाहा हो, कुर्मी हो, बनिया हो, कुम्हार हो, तेली हो, धानुक हो, मल्लाह हो, ततवा हो, कनु हो या फिर अनुसूचित जाति में चमार हो, रविदास हो, दुसाध हो, पासवान हो, मुसहर हो, धोबी हो, डोम हो, पासी हो, भुईंया हो या फिर अनुसूचित जनजाति में संथाल हो, गोंड हो, मुंडा हो, अपवाद छोड़कर जो आज से तीस-साल पहले थे, आज भी वहीँ हैं, जहाँ तक उनका या उनके परिवार का विकास का सवाल है। क्या आज कोई चमार, या दुसाध, या डोम या पासी, यहाँ तक की सवर्ण में भी चाहे राजपूत या भूमिहार समाज के निर्धन, अशिक्षित व्यक्ति अपने-अपने समुदायों के तथाकथित रूप से &#8216;नेता&#8217; कहलाने वाले लोग उन्हें अपने साथ, अपनी कुर्सी पर बैठाकर बात करेंगे, खाना खिलाएंगे ? सब कागज पर है या चुनाव के समय होता है। </strong></p>
<figure id="attachment_7613" aria-describedby="caption-attachment-7613" style="width: 1920px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/mrit.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/mrit.jpg" alt="" width="1920" height="1079" class="size-full wp-image-7613" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/mrit.jpg 1920w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/mrit-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/mrit-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/mrit-768x432.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/mrit-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1920px) 100vw, 1920px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7613" class="wp-caption-text">सातवां पास वनाम प्रदेश का मुख्य सचिव ​: इस दृश्य को देखकर लालू प्रसाद यादव की याद आना स्वाभाविक है। कुछ भी हो लालू यादव पटना विश्वविद्यालय से विधि स्नातक थे।</figcaption></figure>
<p>एक राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि सम्राट चौधरी का यह सफर भाजपा के पारंपरिक ढांचे से थोड़ा अलग नजर आता है। महज कुछ वर्षों पहले पार्टी में आए इस नेता का अचानक शीर्ष पर पहुंचना कई लोगों के लिए आश्चर्य है, तो कई के लिए असहजता भी। पार्टी के भीतर ही कई वरिष्ठ चेहरे इस उभार से सहज नहीं हैं। कहा जाता है कि शीर्ष नेतृत्व की पसंद कोई और थी, संघ की अपनी सोच थी, लेकिन अंततः राजनीति वही करवाती है, जो जमीन तय करती है। और जमीन ने इस बार सम्राट चौधरी के नाम पर मुहर लगा दी। मुझे तो लगता है कि जाते जाते नीतीश जी ने भाजपा की नहीं चलने दी, और लव कुश समीकरण को ध्यान में रखते हुए साथ ही साथ कुर्मी कोयरी वोट बैंक को बनाए रखने के लिए सम्राट का चयन किया गया, निजी विश्वसनीयता भी पैमाना हो सकती है। कुल मिलाकर सम्राट भाजपा के मुख्यमंत्री तो है मगर मात्र नाममात्र के।</p>
<p>उनका कहना है कि यह वही बिहार है, जहाँ भाजपा दो दशकों तक सत्ता में साझेदार रही, लेकिन अपना एक सर्वमान्य मुख्यमंत्री चेहरा खड़ा नहीं कर पाई। यह सवाल आज भी हवा में तैर रहा है—इतना बड़ा संगठन, इतनी मजबूत विचारधारा, फिर भी नेतृत्व “आयातित” क्यों? भाजपा को बिहार में स्थापित करने वाले स्वर्गीय कैलाशपति मिश्र ओर माननीय गोविंदाचार्य आज क्या सोच रहे होंगे ये तो वही जान रहे होंगे ? क्या बिहार में राजनीति अब भी व्यक्ति आधारित है, न कि विचार आधारित? या फिर यह मान लिया जाए कि यहाँ जीत उसी की होती है, जो पहले से तैयार खिलाड़ी हो—चाहे वह किसी भी पाठशाला से आया हो। विडंबना देखिए, जिस लालू यादव की “पॉलिटिकल पाठशाला” को खत्म करने की कसमें कभी भाजपा नेताओं ने खाई थीं, आज उसी पाठशाला का एक “छात्र” भाजपा के सबसे बड़े चेहरे के रूप में सामने खड़ा है। यह बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा ट्विस्ट है—यहाँ लड़ाई भले विचारों की होती हो, लेकिन जीत अक्सर व्यक्तियों की होती है। </p>
<p><strong>कमलाकांत पांडे</strong> कहते हैं कि &#8220;सम्राट चौधरी कोइरी समुदाय से आने वाले बिहार के दूसरे मुख्यमंत्री है। इससे पहले 1968 में सतीश प्रसाद सिंह इस समुदाय से मुख्यमंत्री बने थे, जिनका कार्यकाल मात्र पांच दिन का रहा था। अब शीर्ष पद पर पहुंचने के बाद सम्राट चौधरी के सामने बिहार में भाजपा को एक मजबूत राजनीतिक आधार के रूप में स्थापित करने की चुनौती होगी।&#8221; कभी नित्यानंद राय के संरक्षण में भाजपा में आए सम्राट चौधरी ने अपने राजनीतिक कौशल और पार्टी के &#8216;कास्ट कार्ड&#8217; के सटीक समीकरण से न केवल विपक्षी दलों को, बल्कि अपनी ही पार्टी के दिग्गज नेताओं नित्यानंद राय, मंगल पांडेय, प्रेम कुमार, राजीव प्रताप रूडी और विजय सिन्हा जैसे चेहरों को भी रेस में काफी पीछे छोड़ कर मुख्यमंत्री बन गए। कहते हैं एक समय सम्राट चौधरी मुरेठा (साफा) बांधकर, दाढ़ी-बाल बढाकर प्रतिज्ञा लिए कि इसे तब तक नहीं हटाऊँगा जब तक नीतीश कुमार को सत्ता से बाहर नहीं कर दूंगा। समय का खेल देखिये अयोध्या में प्रतिज्ञा तोड़ दिए जब नीतीश कुमार की सरकार में उप-मुख्यमंत्री बने। एक समय था जब नित्यानंद राय को बिहार भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा माना जाता था और वे मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। नित्यानंद राय के प्रयासों से चौधरी भाजपा में शामिल हुए थे। उस समय शायद राय भी नहीं सोचे कि आने वाले दिनों में यह खुद नित्यानंद राय और अन्य वरिष्ठ नेताओं के लिए ही बड़ी चुनौती बन जायेंगे। </p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;.. </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/a-student-of-lalu-yadavs-charwaha-vidyalaya-become-the-chief-minister-of-bihar">लालू यादव के &#8216;चरवाहा विद्यालय&#8217; के छात्र को &#8216;भाजपा&#8217; बिहार का &#8216;मुख्यमंत्री&#8217; बनाया, &#8216;पैरवी&#8217; नीतीश कुमार किये, भाजपा में &#8216;कलह&#8217; शुरू (नीतीश के बाद बिहार-1)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>पटना का UNI: 1959 में एक कमरा में था, आज बेसमेंट के एक कमरे में आ गया, जबकि प्रदेश के नेता, मंत्री अरबपति, खरबपति (भाग-4)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 04 Apr 2026 12:28:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[journalism]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना / नई दिल्ली : श्रीकृष्ण सिंह से लेकर नीतीश कुमार तक, बिहार में अब तक 23 मुख्यमंत्री बने। चौबीसवें अभी राजनीतिक गर्भ में अदृश्य हैं। सौभाग्य की बात यह है कि इन 23 मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल को प्रदेश के दो महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित समाचार एजेंसियां &#8211; प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (पीटीआई) तथा यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/in-1959-uni-was-housed-in-a-single-room-today-it-has-moved-to-a-room-in-the-basement">पटना का UNI: 1959 में एक कमरा में था, आज बेसमेंट के एक कमरे में आ गया, जबकि प्रदेश के नेता, मंत्री अरबपति, खरबपति (भाग-4)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना / नई दिल्ली : श्रीकृष्ण सिंह से लेकर नीतीश कुमार तक, बिहार में अब तक 23 मुख्यमंत्री बने। चौबीसवें अभी राजनीतिक गर्भ में अदृश्य हैं। सौभाग्य की बात यह है कि इन 23 मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल को प्रदेश के दो महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित समाचार एजेंसियां &#8211; प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (पीटीआई) तथा यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया (यूएनआई) ने शब्दों से इतिहास लिखता आया। मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान होने से लेकर, उनके मंत्रिमंडल के निर्माण और फिर कार्यालय से विदाई के साथ-साथ उनके अंतिम साँस तक, उनके बारे में लिख-लिखकर देश-प्रदेश के लोगों को उनकी कीर्तियों, यश-अपयशों के बारे में जानकारी देते आया है। </strong></p>
<p>लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इन एजेंसियों के बारे में अब तक कोई भी चाहे &#8216;तथाकथित विकास पुरुष नीतीश कुमार हों या भारत रत्न से अलंकृत कर्पूरी ठाकुर हों, न उनके मंत्रिमंडल के लोग, नहीं सोचे। अगर सोचे होते तो शायद आज 65-70 साल बाद आज भी ये दो एजेंसियां किराये के मकान में भटकती नहीं होती। जबकि, तत्कालीन मुख्यमंत्रियों, राजनेताओं के &#8216;आशीष&#8217; से पत्रकारों के नाम से &#8216;पत्रकार नगर&#8217; बन गया, लेकिन इन एजेंसियों को अपने टेलीप्रिंटर का सर छुपाने के लिए जगह नहीं मिला। विचार जरूर करें। <br />
अगर अब तक बने 22-मुख्यमंत्री एक निश्चित स्थान आवंटित किये होते तो शायद खानाबदोश की तरह इन एजेंसियों को साल-दो साल-पांच साल पर घर नहीं बदलना होता। वैसे &#8216;घर बदलने में क्या मानसिक तकलीफ होती है, यह नेताओं को नहीं मालूम होगा।</p>
<blockquote><p>पटना में पीटीआई और यूएनआई कार्यालय खुलने के बाद आज भी दोनों एजेंसियां &#8216;किराये के मकान में कार्यालय चला रहे हैं। पीटीआई अब तक पांच से अधिक मकानों में अपना पनाह ढूंढा है, जबकि यूएनआई आर्यावर्त-इंडियन नेशन परिसर (1959) से निकलने के बाद फ़्रेज़र रोड स्थित &#8216;प्रकाश होटल&#8217; के दो कमरों के रास्ते आज अपने दसवें किराये के मकान में, वह भी एक कमरे में (बेसमेंट) में पहुँच गया है। टेलीप्रिंटर की आवाज थम गयी है। टेलीप्रिंटर में लगे कागज फटने लगे हैं, रिबन के नीचे प्रकाशित होने वाले अक्षर धूमिल होते गए हैं। कहते हैं बिहार में उद्योगों का विकास हो रहा है।</p></blockquote>
<p>इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि यूएनआई संस्था को इस कगार तक लाने में प्रबंधन और शेयरधारकों सहित, प्रदेश के कई संभ्रांत लोगों का प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हाथ है। अगर ऐसा नहीं होता तो दिल्ली स्थित 9-रफ़ी मार्ग को खाली कराने का आदेश न्यायालय से नहीं लाया गया होता। कहते हैं जिस कारण से 9-रफ़ी मार्ग को खाली कराया गया (सरकार द्वारा आवंटित भूमि में 45-वर्ष में मकान नहीं बना पाने के कारण), उस कारण का निदान तो शायद तत्कालीन महाप्रबंधक जी.जी. मीरचंदानी के कार्यकाल में ही हो गया होता। लेकिन &#8216;आंतरिक कलह&#8217;, &#8216;शेयर धारकों की लापरवाही&#8217; के कारण ऐसा नहीं हो सका। मीरचंदानी के बाद जैसे ही नरेश मोहन (अब दिवंगत) का आगमन यूएनआई परिसर में हुआ, यूएनआई का अधोमुख यात्रा का सूचक बन गया। वजह आज भी शोध का विषय है। </p>
<figure id="attachment_7567" aria-describedby="caption-attachment-7567" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7567" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7567" class="wp-caption-text">पटना का डाक बंगला चौराहा</figcaption></figure>
<p><strong>आइये, पहले आज की तारीख को देखते हैं। </strong></p>
<p>आज 2026 साल का 4 अप्रैल है। भारतीय राजनीति के अलावे भारतीय पत्रकारिता और भारतीय साहित्य में 4 अप्रैल का अपना अलग महत्व है, जिसे न तो बीते हुए कल, न आज और ना ही आने वाला कल अपना स्थान ले सकता है। आज से 137-वर्ष पहले मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में बाबई ग्राम में श्री नन्दलाल चतुर्वेदी जी के घर में एक बालक का जन्म हुआ था। माता-पिता नाम रखे था <strong>&#8216;माखनलाल&#8217;</strong> और वंश का उपनाम <strong>&#8216;चतुर्वेदी&#8217; </strong>आगे जुड़ गया । श्री नन्दलाल चतुर्वेदी गाँव के एक प्राथमिक विद्यालय में एक शिक्षक थे। स्वाभाविक है अपने पुत्र को एक बेहतर नागरिक बनाने के लिए एक पिता और एक शिक्षक की भूमिका निभाने में कोई कोताही नहीं किये। हिंदी, संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी, गुजराती और कई अन्य भाषाओं पर अपना आधिपत्य जमाने वाला माखनलाल चतुर्वेदी 16 वर्ष की आयु में एक शिक्षक हो गए। साल 1905 आ गया था। </p>
<p>उसी वर्ष <strong>1905 में ही, 4 अप्रैल को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा</strong> जिले और घाटी में करीब 7.8 + की तीव्रता पर भूकंप आया। उस भूकंप ने कांगड़ा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज के अलावे हिमाचल की घाटियों के रास्ते जम्मू-कश्मीर की घाटियों को भी तवाह कर दिया। अनुमानतः 20,000 से भी अधिक लोग अंतिम सांस लिए। इस भूकंप के कोई 20 साल बाद 4 अप्रैल, 1925 को एक आह्वान के साथ &#8211; &#8220;आइए, गरीब और अमीर, किसान और मजदूर, उच्च और नीच, जित और पराजित को ठुकराइए, प्रदेश में राष्ट्रीय ज्वाला जगाइए और देश तथा संसार के सामने अपनी शक्तियों को ऐसा प्रमाणित कीजिये, जिसका आने वाली संतानें स्वतंत्र भारत के रूप में गर्व करे &#8211; खंडवा से &#8216;कर्मभूमि&#8217; का पुनः प्रकाशन शुरू हुआ। सम्पादन का कार्य माखनलाल चतुर्वेदी के सर पर था। वह माखनलाल चतुर्वेदी ही थे जिन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में महाकोशल अंचल से पहली गिरफ़्तारी दी थी। वे एक सफल पत्रकार थे और &#8216;प्रभा&#8217;, &#8216;कर्मवीर&#8217; तथा &#8216;प्रताप&#8217; का संपादन भी किये थे। </p>
<p><strong>आज से अस्सी साल पहले <strong>4 अप्रैल, 1946 को ब्रिटिश कैबिनेट मिशन</strong> ने तत्कालीन मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना के साथ बातचीत प्रारम्भ किया था। वैसे ब्रिटिश कैबिनेट मिशन, जिसमें लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस, सर स्टैफ़ोर्ड क्रिप्स और ए.वी. अलेक्जेंडर शामिल थे, सत्ता के हस्तांतरण पर चर्चा करने के लिए 24 मार्च, 1946 को भारत आये, लेकिन उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को 4 अप्रैल, 1946 को पूछा था कि एक अलग पाकिस्तान से उन्हें क्या फायदा होगा?  </strong></p>
<p>साल 1973 में वैसे दिसंबर महीने में अहमदाबाद के एल.डी. कालेज ऑफ़ इंजीनियरिंग और मोरबी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रावासों में लगभग 20 से 25 फीसदी शुल्क में वृद्धि हुई। इस वृद्धि के परिणामस्वरुप छात्र उग्र हुए और कालेज परिसर से सड़क पर आ गए। इस घटना क्रम में कई छात्रों का निलंबन भी हुआ और आंदोलन का स्वरुप भी उत्तरोत्तर बदलते गया था।कालेज छात्रावास के खाने की शुल्क में वृद्धि का राजनीतिकरण शुरू हो गया। दिन, सप्ताह, और महीना बदल रहा था और आंदोलन का स्वरुप भी। छात्रों की मांग उत्तरोत्तर गुजरात के लोगों की मांग बन गयी। करीब 63-दिनों के आंदोलन के बाद 9 फरवरी, 1974 को तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को मुख्यमंत्री कार्यालय से बाहर आना पड़ा। गुजरात विधानसभा को भंग हो गया । </p>
<figure id="attachment_7569" aria-describedby="caption-attachment-7569" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7569" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7569" class="wp-caption-text">पटना के फ़्रेज़र रोड पर आकाशवाणी भवन के प्रवेश द्वार पर आज जहाँ जूते की यह दूकान है, कल यहाँ यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया-यूनीवार्ता का दफ्तर हुआ करता था</figcaption></figure>
<p>गुजरात की घटना की कहानी यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया के साथ-साथ प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया समाचार एजेंसी भी प्रेषित कर रहा था, जो पटना के अख़बारों के पन्नों को रंग रहा था। जैसे-जैसे पटना से प्रकाशित तत्कालीन अखबारें &#8211; आर्यावर्त, इंडियन नेशन, सर्चलाइट और प्रदीप &#8211; क्रांतिकारी शब्दों से रंग रहे थे, पटना के तत्कालीन विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं भी गुजरात के छात्रों के समर्थन में सड़क पर उतर रहे थे। उन दिनों समाचार एजेंसियों से प्रसारित अक्षरों का रंग और अख़बारों में प्रकाशित समाचारों के अक्षरों का रंग दोनों &#8220;काला&#8221; ही था। वह तो तत्कालीन नेतागण थे, कुछ सत्ता में बैठे तो कुछ सत्ता पर कब्ज़ा करने को तत्पर, जो काले अक्षरों को राजनीतिक रंगों में रंगकर स्वार्थलाभ के लिए दण्ड बैठकी कर रहे थे। </p>
<p><strong>बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों, विशेषकर पटना विश्वविद्यालय के छात्रों की ख़बरें भी स्थानीय अख़बारों के पन्नों पर छपना शुरू हो गया था। शैक्षिक स्तर में गिरावट, महंगाई, बेकारी, शासकीय अराजकता और राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण के मुद्दों को घसीटकर पटना के डाक बंगला चौराहे पर लाया जा रहा था। नेतृत्वहीन आंदोलन कभी फ़्रेज़र रोड पर कुस्ती लड़ता था तो कभी गाँधी मैदान में। कभी विश्वविद्यालय प्रांगण में तो कभी रेलवे पटरियों पर। </strong></p>
<p>बाद में, कई छात्रों ने जयप्रकाश नारायण से अनुरोध किया कि वह आंदोलन का नेतृत्व करें। साल 1902 में जन्में जयप्रकाश नारायण भी सत्तर वसंतों को पार कर 72-वर्ष की आयु में सांस ले रहे थे। इस अवस्था में वे यह जानते थे कि वे &#8216;हिंसक आंदोलन&#8217; का नेतृत्व नहीं कर सकते हैं। तदर्थ उन्होंने शर्त रखा कि वे तभी आंदोलन का नेतृत्व करेंगे जब आंदोलन पूर्णरूपेण &#8216;अहिंसक&#8217; होगा। कोई भी राजनीतिक दल इसमें शरीक होकर रोटियां नहीं सकेंगे। छात्रों को सभी शर्तें मंजूर थी। कहने के लिए भले &#8216;राजनीतिक पार्टियों का प्रवेश इस आंदोलन में निषेध था, लेकिन नेता कब किसी का हुआ है, अपनों को छोड़कर।  बिहार के नेता तो इसके गवाह है ही, चाहे जगन्नाथ मिश्र हों, लालू यादव हों, नीतीश कुमार हों, उपेंद्र कुशवाहा हो &#8211; आज सभी अपने-अपने परिवारों को प्रदेश की राजनीती में पनाह दे रहे हैं। खैर, जैसे-जैसे आंदोलन देशव्यापी होता गया, चंद्रशेखर, मोहन धारिया, हेमवती नंदन बहुगुणा, जगजीवन राम, रामधन, रामकृष्ण हेगड़े जैसे दर्जनों लोग आंदोलन का हिस्सा बनते गए। </p>
<p>18 मार्च 1974 को पटना में छात्रों और युवाओं द्वारा आंदोलन हुआ। उसी दिन बिहार विधानसभा का संयुक्त अधिवेशन होना तय था। तत्कालीन राज्यपाल आर.डी. भंडारे संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करने वाले थे। वे किसी भी हाल में दोनों सदनों के संयुक्त बैठक को संबोधित करने के लिए विधानसभा पहुंचना चाहते थे। लेकिन आंदोलनकारियों के सामने भंडारी का कहाँ चलना था। रणनीति यह बनी थी कि आंदोलनकारी छात्र राज्यपाल को विधानमंडल भवन में जाने से रोकेंगे और उनका घेराव करेंगे। उस दिन सत्ताधारी विधायक सुबह 6 बजे ही विधानमंडल पहुंच गए थे। दूसरी तरफ विपक्षी विधायकों ने राज्यपाल के अभिभाषण का बहिष्कार किया। लेकिन भंडारे की गाड़ी को रास्ते में रोक लिया। पुलिस को लाठियों का प्रयोग करना पड़ा। आंसू गैस के गोले भी छोड़े गए। कई छात्र हताहत भी हुए। </p>
<figure id="attachment_7570" aria-describedby="caption-attachment-7570" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7570" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7570" class="wp-caption-text">पटना संग्रहालय (पुराना) के पास यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया का दफ्तर था</figcaption></figure>
<p>और यहीं जन्म हो गया जयप्रकाश नारायण के करीबी छात्र नेता लालू प्रसाद यादव जो &#8216;समाजवाद&#8217; की लड़ाई लड़ते-लड़ते, समाजवाद को पीछे धकेल कर, नब्बे के दशक के मध्य में 950-करोड़ रूपये वाला चारा घोटाला में मुख्य अभियुक्त तो बने ही, राजनीति में परिवारवाद का विरोध करने वाले लालू यादव अपने और अपने ससुराल के सभी प्रमुख लोगों को राजनीति में न केवल प्रवेश दिए, बल्कि विधायक, सांसद, मंत्री, उप-मुख्यमंत्री भी बना दिए। पटना स्थित यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया यानी यूएनआई समाचार एजेंसी इन तमाम घटनाओं का चश्मदीद गवाह रहा। </p>
<p>अब तक लालू यादव के साथ-साथ सुशील मोदी और अन्य तत्कालीन छात्र नेता अब तक &#8216;छपास रोग&#8217; से ग्रसित हो गए थे। यूएनआई, पीटीआई दफ्तरों में बैठना शुरू कर दिए थे। कहानियों का रंग कैसे बदलता है, सीखना शुरू कर दिए थे। जय प्रकाश नारायण का आंदोलन तूल पकड़ रहा था। तभी <strong>शायद उस दिन 4 अप्रैल ही था, साल 1974</strong> का जब तत्कालीन छात्र नेता लालू यादव अख़बारों की सुर्खियों में बने रहने के लिए स्वयं को भूमिगत कर बाजार में &#8216;अपहरण&#8217; का अफवाह फैला दिए थे। लालू यादव के अपहरण की खबर न केवल प्रदेश के अख़बारों में, बल्कि देश दुनिया में भी प्रकाशित हुआ था। खैर। </p>
<p>स्वतंत्र भारत में जब बिहार को पहला मुख्यमंत्री बने श्री कृष्ण सिन्हा (26 जनवरी, 1950 से 31 जनवरी, 1961) के रूप में मिला, यूएनआई पटना में उपस्थित था &#8216;आर्यावर्त&#8217; और &#8216;दी इंडियन नेशन&#8217; समाचार पत्रों के कार्यालय परिसर में। साल 1959 में यूएनआई के स्थापना के बाद आर्यावर्त और इंडियन नेशन अख़बारों के संस्थापक दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. सर कामेश्वर सिंह ने तत्कालीन प्रबंधक उपेंद्र आचार्य और तत्कालीन संपादक ब्रजनंदन आज़ाद को यूएनआई के विस्तार और प्रसार के लिए सम्पूर्ण जिम्मेदारी दी। महाराजा ने कहा कि जब तक यूएनआई पटना में &#8216;स्थापित&#8217; नहीं हो जाता, यह &#8216;हमारे परिसर&#8217; से कार्य करेगा &#8211; बिना किसी किराये के। और इस तरह मजहरुल हक़ पथ पर यूएनआई अवतरित हुआ। </p>
<p>श्रीकृष्ण सिंह के बाद आये दिप नारायण सिंह (1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961) आए । बिनोदानंद झा 18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में रहे। कृष्ण बल्लभ सहाय 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967 तक, महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968 तक, सतीश प्रसाद सिंह 28 जनवरी 1968 से 1 फरवरी 1968 तक, बी.पी. मंडल 1 फरवरी 1968 से 22 मार्च 1968 तक, भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च 1968 से 29 जून 1968 / 22 जून 1969 से 4 जुलाई 1969 / 2 जून 1971 से 9 जनवरी 1972 तक, सरदार हरिहर सिंह 29 जून 1968 से 26 फरवरी 1969 तक, दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970 तक, कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 / 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979 तक, केदार पांडे 19 मार्च 1972 से 2 जुलाई 1973 तक, अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975 तक, जगन्नाथ मिश्र 11 अप्रैल 1975 से 30 अप्रैल 1977 / 8 जून 1980 से 14 अगस्त 1983 / 6 दिसंबर 1989 से 10 मार्च 1990 तक, राम सुन्दर दास 21 अप्रैल 1979 से 17 फरवरी 1980 तक, चंद्रशेखर सिंह 14 अगस्त 1983 से 12 मार्च 1985 तक, बिंदेश्वरी दुबे 12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988 तक, भागवत झा आज़ाद 14 फरवरी 1988 से 10 मार्च 1989 तक और सत्येंद्र नारायण सिन्हा 11 मार्च 1989 से 6 दिसंबर 1989 तक मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए । </p>
<p>बहरहाल, अनुग्रह नारायण सिन्हा इंस्टीट्यूट के एक वरिष्ठ प्राध्यापक, जो बिहार के अखबारी दुनिया के लोगों से विशेष ताल्लुक रखते थे, एक शर्त पर कि हम उनका नाम नहीं लेंगे, कहते हैं:  &#8220;श्रीकृष्ण सिन्हा के बाद नीतीश कुमार तक प्रदेश से प्रकाशित अख़बारों में 22 मुख्यमंत्रियों का नाम प्रकाशित हुआ है। अब 23 वां नाम भी प्रकाशित होने वाला है। श्रीकृष्ण सिन्हा को अगर छोड़ भी दें तो अब तक मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठे मुख्यमंत्रियों ने स्थानीय अख़बारों और संवाद एजेंसियों का जितना अपने हित में इस्तेमाल किया, यह एक गहन शोध का विषय है। अपवाद छोड़कर, शायद ही कोई मुख्यमंत्री होंगे या उनके मंत्रिमंडल के सदस्य होंगे, प्रदेश के अधिकारी, पदाधिकारी, नेताओं द्वारा संरक्षित और सम्पोषित ठेकेदार, अपराधी होंगे, जिनका प्रदेश के बाहर दिल्ली में, नोएडा में, गाजियाबाद में, लखनऊ में, कानपुर में, कोलकाता में,चेन्नई में, मुंबई में, राजस्थान में, मध्यप्रदेश में, उत्तराखंड में सम्पत्तियों का साम्राज्य है । लेकिन यूएनआई और पीटीआई के लिए अपना एक कमरा भी नहीं मुहैय्या हुआ। </p>
<blockquote><p>जय प्रकाश नारायण आंदोलन से जन्म लिए नेता जो प्रदेश की सत्ता में हिस्सेदार रहे, की बात ही नहीं करें। चाहे बाहुबली हों या नेता, सबों ने मिलकर बिहार का चतुर्दिक लुटे और लूट रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि किसी ने भी यहाँ से प्रकाशित, या बिहार का अपना अख़बार या एजेंसी, जिसमें छप छप कर सभी चवन्नी छाप से आदमकद के नेता बने, इसके प्रति ध्यान नहीं दिए। अगर ध्यान दिए होते तो इन 65 वर्षों में यूएनआई जैसे प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी की भी अपनी एक जमीन होती जहाँ उसकी जमीर की तूती बोली जाती। यूएनआई का अंत सिर्फ उस संस्थान के प्रबंधन या कर्मचारी यूनियन को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। इसके इस अंत के लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रदेश सरकार के साथ-साथ दिल्ली के सिंहासन पर बैठे लोग भी हैं।&#8221;</p></blockquote>
<p>वे आगे कहते हैं: &#8220;श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर नीतीश कुमार तक के वर्षों मे आधे कालखंड में लालू प्रसाद यादव-राबड़ी देवी और नीतीश कुमार कुल 35 वर्षों तक सत्ता में विराजमान रहे, मुख्यमंत्री रहे, शेष 35 वर्षों में कांग्रेस पार्टी के नेताओं के साथ-साथ अन्य राजनीतिक पार्टियों के नेताओं ने मुख्यमंत्री पद संभाले। लेकिन श्रीकृष्ण सिन्हा से लेकर डॉ. जगन्नाथ मिश्र (1990) तक 35 वर्षों में विभिन्न मुख्यमंत्री के कालखंड में बिहार का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक क्षेत्रों की सेवाओं में जितना पतन हुआ, 1990 में लालू यादव का बिहार के राजनीतिक पटल पर अभ्युदय के बाद, उनकी पत्नी और अंततः नीतीश कुमार के कालखंड में बिहार रसातल की ओर चला गया, जा रहा है।&#8221;</p>
<p><strong>अगर पत्रकारिता की दृष्टि से देखें तो प्रदेश में पत्रकारिता के अंत की शुरुआत तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के बिहार प्रेस बिल से हो गया था। लालू यादव, नीतीश कुमार शिक्षित होते हुए भी पत्रकारिता को नेश्तोनाबूद कर दिया। राबड़ी देवी तो अशिक्षित थी। इससे भी अधिक दुखद बात यह है कि सत्तर, अस्सी, नब्बे के ज़माने में बिहार में, खासकर प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया या फिर यूनाइटेड  न्यूज ऑफ़ इंडिया के जो कर्ताधर्ता थे, जितने सम्मानित वे थे, आज उस सम्मान के एक फीसदी के भी लोग पत्रकारिता के क्षेत्र में नहीं हैं। कल तक प्रदेश की पत्रकारिता में प्रदेश के लोग थे। आज प्रदेश का अपना कोई भी अखबार नहीं है। सभी बाहरी व्यापारियों ने अपने-अपने उत्पाद को बेचने के लिए, लाभ कमाने के लिए यहाँ आये हैं। उन्हें यूएनआई जैसी शब्दों की जरुरत नहीं है।&#8221; </strong></p>
<p>यूनीवार्ता के प्रमुख रहे (अब अवकाश प्राप्त) महेश सिन्हा कहते हैं कि &#8220;अपनी स्थापना से लेकर 2000 साल तक यूएनआई और यूनीवार्ता का रुतबा इतना मजबूत था कि प्रदेश के मुख्यमंत्री स्वयं कार्यालय आते थे। वे न केवल पत्रकारों का सम्मान करते थे, बल्कि उनकी नज़रों में पत्रकारिता सम्मानित थी। दो मुख्यमंत्रियों &#8211; अब्दुल गफूर और कर्पूरी ठाकुर &#8211; का आना-जाना आम था। उन दिनों पत्रकारों की इतनी अधिक अहमियत थी कि संस्थान के मालिक भी मंत्रियों, चाहे केंद्रीय मंत्री हों या प्रदेश के मुख्यमंत्री, से मिलने के लिए पत्रकारों से मिन्नत किया करते थे। आज समय बदल गया है। आज मंत्री और मुख्यमंत्री का राजनीतिक स्वरूप भी बदल गया है, पत्रकार और पत्रकारिता तो बदला ही है। </p>
<figure id="attachment_7571" aria-describedby="caption-attachment-7571" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7571" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7571" class="wp-caption-text">किदवईपुरी आईएएस कालोनी में आया यूएनआई का कार्यालय</figcaption></figure>
<p><strong>यूएनआई, पटना कार्यालय की यात्रा </strong></p>
<p><strong>इंडियन नेशन &#8211; आर्यावर्त </strong>परिसर से जब यूएनआई अपना दफ्तर फ़्रेज़र रोड पर ही माड़वाड़ी वासा के सामने वाली गली में, जिसमें कई होटल कल भी थे, आज भी हैं, के एक प्रकाश होटल में दो कमरे में गया, उस कालखंड में यूएनआई एक तरफ जहाँ अपने शब्दों के वजूद को मजबूत कर रहा था, वहीँ प्रदेश की पत्रकारिता से राष्ट्र की पत्रकारिता को नया आयाम देने को संकल्पित था। प्रकाश होटल से यूएनआई अपना कार्यालय पटना जंक्शन की ओर से आती सड़क फ़्रेज़र रोड जब आकाशवाणी के पास से दाहिने मुड़कर गाँधी मैदान की ओर निकलती है, यहीं बाएं हाथ मंजीत सिंह होटल के आगे स्थित एक मकान के पहली मंजिल पर यूएनआई का कार्यालय खुला कई सारे टेलीप्रिंटर्स के साथ। इस भवन के नीचले हिस्से में एक मंगोलिया नामक बार खुला था। </p>
<p>उस कालखंड में, डाक बांग्ला चौराहे के नुक्कड़ के बाएं हाथ कोने पर शराब की एक दूकान के अलावे, या फिर न्यू डाक बांग्ला रोड में सेन्ट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया के सामने शराब की दूकान के अलावे कहीं अन्यत्र को अड्डा नहीं था। परिणाम यह हुआ की मैंगोलिया बार और उसका अगला हिस्सा प्रदेश के सम्मानित, शिक्षित लोगों का अड्डा बन गया। इस स्थान पर संध्याकाळ में प्रदेश के नेताओं के अलावे अधिकारियों, पदाधिकारियों, लेखकों, रंगकर्मियों की भीड़ एकत्रित होती थी। विभिन्न विषयों पर चर्चाएं होती थी। प्रेस ट्रस्ट का कार्यालय उन दिनों बन्दर बगीचा के नुक्कड़ पर था और वहां भी प्रदेश के संभ्रांत एकत्रित होते थे, लेकिन यूएनआई की बात ही कुछ अलग थी। </p>
<p><strong>पटना साइंस कॉलेज में तक़रीबन 41-वर्ष &#8216;भूगर्भ शास्त्र&#8217; पढ़ाने और सांइस कालेज के प्राचार्य पद से अवकाश ग्रहण करने वाले डॉ. बसंत मिश्र</strong> का पटना की पत्रकारिता से विशेष लगाव रहा है, जहाँ तक उच्चतर शिक्षा का रिपोर्टिंग का प्रश्न है। साढ़े पांच दशक से अधिक समय तक वे शिक्षा के क्षेत्र का रिपोर्टिंग पहले इंडियन नेशन और बाद में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के लिए करते आये हैं। बसंत मिश्र कहते हैं: &#8220;देश के विख्यात पत्रकार फ़रज़न्द अहमद सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्षों में इंडियन नेशन के लिए विश्वविद्यालय संवाददाता थे। उन दिनों ब्रजनन्दन आज़ाद इंडियन नेशन के संपादक और दीनानाथ झा सहायक संपादक हुआ करते थे। जब फ़रज़न्द जी यूएनआई का संवाददाता बन गए तो मैं इंडियन नेशन में विश्वविद्यालय का समाचार लिखने लगा। उस समय छात्र था, लेकिन लिखने का बहुत शौक था। ब्रजनन्दन आज़ाद और दीनानाथ झा मुझे इंडियन नेशन में विश्वविद्यालय और शिक्षा संबधी समाचार लिखने को कहे और मेरी यात्रा शुरू हो गयी। बाद में पटना विश्वविद्यालय के साइंस कालेज में व्याख्याता बनने के बाद भी मैं लिखने का काम नहीं छोड़ा जो मेरी पहचान और व्यक्तित्व का एक अभिन्न हिस्सा बन गया। </p>
<figure id="attachment_7572" aria-describedby="caption-attachment-7572" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-5.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7572" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-5.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-5-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-5-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-5-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-5-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7572" class="wp-caption-text">कृष्णानगर, रोड नंबर &#8211; 6 में किराये के मकान में आया यूएनआई कार्यालय </figcaption></figure>
<p>ज्ञातव्य हो कि राजू भरतन ने द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया (जनवरी 1992) में &#8216;चित्रगुप्त सहाय @चित्रगुप्त&#8217; के बारे में लिखते कहा था कि असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण 1930 में जेल में बंद ब्रज नंदन &#8216;आजाद&#8217; एक उच्च सम्मानित पत्रकार थे, जो पटना से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी दैनिक &#8216; इंडियन नेशन&#8217; और इसके हिंदी संस्करण &#8216;आर्यावर्त&#8217; में लिखे गए अपने तीखे संपादकीय लेखों के लिए जाने जाते थे। चित्रगुप्त श्रीवास्तव उनके अपने छोटे भाई थे। चित्रगुप्त पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर किये थे, साथ ही, पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की थी। चित्रगुप्त की बेटी सुधा श्रीवास्तव, जो मुंबई विश्वविद्यालय से प्रोफ़ेसर के पद से अवकाश प्राप्त की थी, कही थी,  चित्रगुप्त को गायन में अधिक रुचि थी और अपने भाई को बिना बताए, वे पेशेवर गायक बनने की गुप्त इच्छा रखते थे। अपनी दो डिग्रियों के बल पर चित्रगुप्त को पटना विश्वविद्यालय में नौकरी मिल गई। लेकिन जब उनके मित्र मदन सिन्हा (जो बाद में एक प्रसिद्ध छायाकार बने और 1974 में विनोद खन्ना अभिनीत फिल्म &#8216; इम्तिहान&#8217; का निर्देशन भी किया ) ने उन्हें मुंबई जाकर फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाने का सुझाव दिया, तो चित्रगुप्त मान गए। यह निर्णय उनके भाई को पसंद नहीं आया।</p>
<blockquote><p>बसंत मिश्र कहते हैं: &#8220;उन दिनों जब फरजंद साहब यूएनआई गए, मैं अक्सर यहां आया-जाया करता था। वहां धैर्यानन्द झा पहले से थे। बाद में श्री बीएन झा प्रबंधक के रूप में आये। चंद्रमोहन मिश्र का मेरे परिवार से बहुत मधुर सम्बन्ध था। उनकी पत्नी के कहने पर बीएन झा कुछ कुछ समय के लिए, जब तक वे पटना में स्थिर न हो जाएँ, मेरे घर में किराये पर रहे। यूएनआई को पिछले 55 से अधिक वर्षों से देखता आया हूँ। यूएनआई के द्वारा लिखे गए, भेजे गए संवादों को देखता आया हूँ, उसकी गरिमा को भी देखा हूँ; लेकिन आज जब उसकी स्थिति के बारे में अख़बारों में पढ़ता हूँ, देखता हूँ, मन दुखी हो जाता है।&#8221;</p></blockquote>
<p>कोई तीन दशक तक <strong>पटना यूएनआई का चीफ ऑफ़ ब्यूरो रहने वाले शिवाजी सिंह आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम</strong> को कहते हैं कि &#8220;आकाशवाणी के प्रवेश द्वार के बाएं हाथ नुक्कड़ पर कल जहाँ यूएनआई का कार्यालय था, उस भवन के नीचे मैंगोलिया बार था। आज वहां जूते का शो रूम हैं। इस स्थान से यूएनआई का कार्यालय पटना म्यूजियम (पुराना) के सामने आया। कुछ वर्ष यहाँ से सेवा देने के बाद यूएनआई का कार्यालय किदवईपुरी स्थित आईएएस कालोनी में आ गया। यह कालखंड नब्बे के दशक का प्रारंभिक वर्ष था। सं 1995 आते-आते श्रीकृष्ण नगर रोड नंबर आठ पर यूएनआई कार्यालय का बोर्ड टंगा। यह सभी किराये का मकान था। यहाँ  1998-1999 तक था। </p>
<figure id="attachment_7573" aria-describedby="caption-attachment-7573" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-6.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7573" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-6.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-6-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-6-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-6-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/Patna-6-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7573" class="wp-caption-text">डॉ. जीडीएन सिंह परिसर में यूएनआई का कार्यालय</figcaption></figure>
<p>शिवाजी सिंह कहते हैं: &#8220;यह कड़वा सच है कि UNI में ‘जिस किसी’ को भी (कुछ अपवादों को छोड़कर) पद या थोड़ी-सी शक्ति मिली, उसने खुद को ‘खुदा’ समझने में देर नहीं लगाई। चाहे प्रबंधन हो या यूनियन, इस प्रवृत्ति से कोई भी अछूता नहीं रहा। अहंकार इतना बढ़ गया कि संस्था के हितों की चिंता वे भूल गए । ऐसे लोगों ने अपनी ऊर्जा, समय और मेहनत संस्था को आगे बढ़ाने या बचाने के बजाय व्यक्तिगत बदले, हिसाब बराबर करने और असहमति रखने वालों या ‘सलाम’ नहीं करने वालों को सबक सिखाने में लगा दी । ऐसे लोगों को “साहब” बनने का बड़ा शौक़ था । सच है ख़ाली बर्तन ज़्यादा शोर मचाता है।&#8221;</p>
<blockquote><p>इधर दिल्ली स्थित यूएनआई मुख्यालय में प्रशासन के साथ साथ प्रबंधन में भी &#8216;गिरावट&#8217; आने लगा, वित्तीय स्थिति दयनीय होने लगी। यह नरेश मोहन का कार्यकाल था। शिवाजी सिंह कहते हैं कि &#8220;उन दिनों साज सज्जा पर करीब पंद्रह से बीस लाख रुपये खर्च किए गए थे । उस समय कार्यालय के एक हॉल और तीन कमरे थे। आप अंदाजा लगाएं कि इन जगहों में 8 एसी, 15 कंप्यूटर, 50 से भी अधिक ट्यूबलाईट, रिवॉल्विंग चेयर, रेफ़्रिजरेटर, वाटर कूलर आदि लगाए गए थे जबकि उस समय पीटीआई के दफ्तर में एक कंप्यूटर और एक एसी से काम चल रहा था। पटना में उस समय किसी मीडिया हाउस का कार्यालय यूएनआई जैसा नहीं था। </p></blockquote>
<p>पटना के ही एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि &#8216;वह दृश्य देखकर आज भी मन खिन्न हो जाता है कि कैसे दिल्ली कार्यालय में प्रशासनिक बदलाव होने के बाद आर्थिक लूट प्रारम्भ हुआ था। यूएनआई के पास उस कालखंड में जो भी पैसे एकत्रित थे, उसे धीरे-धीरे समाप्त करने की दिशा में लोग लग गए। यहाँ पटना कार्यालय में इतने अधिक विस्तार के साथ ही कार्यालय में बिजली का अत्यधिक लोड होने के कारण एक स्पेशल ट्रांसफार्मर भी यूएनआई के लिए लगाया गया था जिसका किराया 45 हज़ार के क़रीब देना पड़ता था। उस समय ट्रांसफार्मर का रेंट समेत बिजली बिल क़रीब 70 हज़ार रुपया के आस पास आता था।</p>
<p>श्रीकृष्णापुरी से यूएनआई का कार्यालय 2010 में जब बोरिंग रोड स्थित डाक्टर जी.एन. सिंह के तीन कमरे के मकान में शिफ्ट हुआ तब किराया 12,000 और बिजली का बिल दो से ढाई हज़ार रुपया हो गया। यहाँ किसी कमरे में एसी नहीं लगा था। दस साल में जब किराया बढ़ते बढ़ते 31 हजार हो गया और किराया समय पर नहीं दिया जा रहा था तब मकान मालिक ने मकान ख़ाली करने को कहा। दिल्ली हेड ऑफिस का निर्देश जारी किया कि पांच से दस हज़ार रुपये किराया का मकान ढूंढा जाए। इतना कम किराया पर यूएनआई जैसी प्रतिष्ठित संस्था के लिए अच्छे स्थान पर मकान मिलना असंभव था। कहते हैं कि यूएनआई में जो भी कर्मचारी बचे थे वे पुराने मकान मालिक से काफ़ी मिन्नत के बाद उसी परिसर में एक गराजनुमा कमरा में पाँच हज़ार रुपये मासिक किराया पर ऑफिस को 2020 में शिफ्ट कर दिया गया। इस स्थान पर शौचालय था और ना ही पीने के पानी की व्यवस्था । अमानवीय स्थिति में लोग वहां काम करने को मजबूर थे ।  </p>
<p><strong>कोरोना काल में लोग जब घर से काम कर रहे थे तो बहुत ज़्यादा मुश्किल पत्रकारों को नहीं थी लेकिन ग़ैर पत्रकार ज्यादा परेशानी में थे उन्हें हर दिन दफ़्तर आना होता था। इस गराजनुमा कार्यालय में यूएनआई के लोग पांच साल से अधिक रहे। विगत 31 मार्च 2026 को यूएनआई कार्यालय को एक नया पता मिला। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद के घर से दस कदम दूर स्थित एक मकान के बेसमेंट में स्थित एक छोटे से कमरे में। </strong></p>
<p>ओह !!</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/in-1959-uni-was-housed-in-a-single-room-today-it-has-moved-to-a-room-in-the-basement">पटना का UNI: 1959 में एक कमरा में था, आज बेसमेंट के एक कमरे में आ गया, जबकि प्रदेश के नेता, मंत्री अरबपति, खरबपति (भाग-4)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>बिहार में &#8216;स्कूल आओ &#8211; खिचड़ी खाओ&#8217;, &#8216;मेडल लाओ-नौकरी पाओ&#8217;, &#8216;तुम करो-हम कुच्छो नहीं करेंगे&#8217; नारा बुलंद, खेल-खिलाड़ियों का विकास फाइलों में हो रहा है</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/sports/sports-became-victim-of-politics-in-bihar</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 15 Mar 2026 04:17:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[खेल]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम, नई दिल्ली / शाखा मैदान, राजेंद्र नगर, पटना : सांख्यिकी कहता है कि भारत में तक़रीबन 36+ करोड़ युवा 14 वर्ष और कम के आयु के हैं। इस अल्प आयु में देश का प्रधानमंत्री अगर एक युवा के कंधे पर हाथ रखकर उसकी हुनर की तारीफ करें, तो इससे बड़ी बात [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/sports/sports-became-victim-of-politics-in-bihar">बिहार में &#8216;स्कूल आओ &#8211; खिचड़ी खाओ&#8217;, &#8216;मेडल लाओ-नौकरी पाओ&#8217;, &#8216;तुम करो-हम कुच्छो नहीं करेंगे&#8217; नारा बुलंद, खेल-खिलाड़ियों का विकास फाइलों में हो रहा है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम, नई दिल्ली / शाखा मैदान, राजेंद्र नगर, पटना : सांख्यिकी कहता है कि भारत में तक़रीबन 36+ करोड़ युवा 14 वर्ष और कम के आयु के हैं। इस अल्प आयु में देश का प्रधानमंत्री अगर एक युवा के कंधे पर हाथ रखकर उसकी हुनर की तारीफ करें, तो इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है उस युवक के लिए। या फिर बिहार के मुख्यमंत्री उस युवक को प्रदेश का सम्मान बढ़ने के लिए पचास लाख रूपये का चेक हस्तगत कराये तो उसके मन में क्या हो सकता है? समस्तीपुर (बिहार) के 14-वर्षीय आईपीएल सनसनी वैभव सूर्यवंशी के साथ कुछ ऐसा ही हुआ था विगत दिनों जब भारत के युवा खिलाड़ियों को सन्देश देते प्रधानम्नत्री नरेंद्र मोदी पटना स्थित जय प्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर वैभव सूर्यवंशी और उसके माता-पिता से मिलकर युवा क्रिकेटर की प्रशंसा की, जिनके बल्लेबाजी कौशल ने पुरे देश में प्रशंसक बटोरे हैं। और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (अब पूर्व-मुख्यमंत्री) चेक दिए थे कैमरे में मुस्कुराते तस्वीरक खिंचाए थे उस बच्चे के साथ। यह उसकी हुनर की बात थी &#8211; जो उसकी &#8216;अपनी&#8217; थी, मेहनत का परिणाम था और इसमें सरकार, शासन का कोई योगदान नहीं था। यह बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जानते थे और मुख्यमंत्री (अब पूर्व) नीतीश कुमार तो जानते ही थे। </strong></p>
<p>प्रधानमंत्री के साथ साथ नीतीश कुमार का भी सोशल मीडिया पर तस्वीरों के साथ प्रचार-प्रसार हुआ। प्रधानमंत्री अपने ‘X’ पोस्ट पर लिखे भी : “पटना एयरपोर्ट पर युवा क्रिकेट सनसनी वैभव सूर्यवंशी और उनके परिवार से मुलाकात की। उनके क्रिकेट कौशल की पुरे देश में प्रशंसा हो रही है। उनके भविष्य के प्रयासों के लिए मेरी शुभकामनाएं। ” उसी महीने की शुरुआत में, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए सातवें खेलो इंडिया यूथ गेम्स के उद्घाटन समारोह के दौरान, मोदी ने वैभव की सफलता के पीछे की कड़ी मेहनत को उजागर किया था। उन्होंने कहा था, “मैंने आईपीएल में बिहार के बेटे वैभव सूर्यवंशी का शानदार प्रदर्शन देखा है। इतनी कम उम्र में वैभव ने इतना बड़ा रिकॉर्ड बनाया है। वैभव के प्रदर्शन के पीछे कड़ी मेहनत है।” </p>
<p><a href="https://youtu.be/OG_A6O_7fcc">बिहार में सभी खिलाड़ियों का भाग्य तो श्रेयसी सिंह जैसा नहीं होगा</a></p>
<p>भारत सरकार के खेल मंत्रालय के अनुसार, 2016-17 में शुरू की गई खेलो इंडिया – राष्ट्रीय खेल विकास कार्यक्रम, का उद्देश्य ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में जन भागीदारी और खेल उत्कृष्टता को बढ़ावा देना है। इस योजना को 2021 में 3,790.50 करोड़ रु के परिव्यय के साथ पाँच वर्षों के लिए विस्तार दिया गया। प्रमुख उपलब्धियों में शामिल हैं। मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार,  इन वर्षों में  3,124.12 करोड़ रु की लागत वाली 326 नई खेल अवसंरचना परियोजनाओं को मंज़ूरी दी गयी है, साथ ही, जमीनी स्तर पर प्रशिक्षण और सहायता के लिए 1,045 खेलो इंडिया केंद्रों (केआईसी) की स्थापना की गयी है। इतना ही नहीं, देश में खेल-कूद के विकास के लिए, ताकि भारतीय प्रतियोगी वैश्विक स्तर पर अपनी मेधा का बहुगामी प्रदर्शन कर देश का नाम उज्जवल कर सकें। </p>
<figure id="attachment_7473" aria-describedby="caption-attachment-7473" style="width: 1709px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0542-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0542-scaled.jpg" alt="" width="1709" height="2560" class="size-full wp-image-7473" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0542-scaled.jpg 1709w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0542-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0542-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0542-768x1151.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0542-1025x1536.jpg 1025w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0542-1367x2048.jpg 1367w" sizes="auto, (max-width: 1709px) 100vw, 1709px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7473" class="wp-caption-text">दिल्ली में मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम के प्रवेश मार्ग पर भारतीय खेल प्राधिकरण के इस बोर्ड पर &#8216;भारतिय&#8217; इस कदर लिखा देख खेल और खिलाड़ियों का भविष्य दीखता है (तस्वीर: संजय शर्मा)<br /></figcaption></figure>
<p>लेकिन दिल्ली में जब प्रधानमंत्री कार्यालय से कोई दो किलोमीटर दूर मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम के प्रवेश द्वार पर &#8216;भारतिय&#8217; खेल प्राधिकरण इस कदर लिखा दिखा और पटना के खेल मैदानों को खिलाड़ियों के पैरों के लिए तरसते देखा तो खेल के प्रति सत्ता के गलियारे में बैठे नेताओं, अभिनेताओं, अधिकारियों, पदाधिकारियों, बिचौलियों का खेल के प्रति उनकी मानसिकता को चीत्कार लेते भी महसूस किया, सरकारी फाइलों में खेल और खिलाड़ियों के लिए सरकारी प्रयास को कागज पर दौड़ते, सफलता प्राप्त करते देखा। बिहार में राजनीतिक पहुँच होने पर &#8216;कांस्य&#8217; और &#8216;रजत&#8217; (स्वर्ण नहीं) विजेता खेल मंत्री बनते हैं और खिलाड़ी मैदान के लिए तरसते हैं। </p>
<p>खेल मंत्रालय के अनुसार, भारत में दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है, जिसमें लगभग 65% लोग 35 वर्ष से कम आयु के हैं। इस जनसांख्यिकीय लाभांश की क्षमता को पहचानते हुए, युवा मामले और खेल मंत्रालय युवा विकास और खेल प्रोत्साहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह विभिन्न पहलों के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण, कौशल वृद्धि और राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करता है। </p>
<p>आंकड़ों के अनुसार, भारत के खेल भविष्य को बढ़ावा देने के लिए, सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए युवा मामले और खेल मंत्रालय को 3794 करोड़ रु का रिकॉर्ड आवंटन किया है। इसका एक बड़ा हिस्सा, यानी 2,191.01 करोड़ रु, केंद्र की योजनाओं को आवंटित किया गया है, जिसमें प्रमुख खेलो इंडिया कार्यक्रम को 1,000 करोड़ रु मिले हैं। वित्त वर्ष 2014-15 में मंत्रालय को बजट आवंटन 1643 करोड़ रु था, जो 2025-26 में 130.9% की वृद्धि दर्शाता है। लेकिन देश के खेलों के मैदानों में खिलाड़ियों का हुनक बनाते, संवारते प्रशिक्षकों को अर्थ के लिए, सरकारी सहायता के लिए, खेल और खिलाड़ियों के वास्तविक विकास के लिए रोते भी देखा। खैर। </p>
<p><strong>​मोइनुलहक स्टेडियम में जब अभिनेत्रियों की घुंघरू बजने वाली थी</strong> </p>
<p>जब अविभाजित बिहार में भारत के पूर्व क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी पांच-छह वर्ष के थे और क्रिकेट की दुनिया में बिहार या बिहारी ​खिलाड़ियों का &#8216;बाजारीकरण&#8217; नहीं ​हुआ था, सभी &#8216;खेल को खेल की भावना से खेलते&#8217; थे, उस समय पटना के मोइनुल हक़ स्टेडियम में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। मसला था कला-संस्कृति को मंच पर लाकर अर्थ एकत्रित करना जिसका उपयोग पटना में एक कैंसर अस्पताल बनाना था। </p>
<p>इस कार्यक्रम के कर्ताधर्ता थे आजादी के 13-माह पूर्व भुवनेश्वर प्रसाद सिन्हा और श्रीमती श्यामा देवी सिन्हा के घर में जन्म लिए शत्रुघ्न सिन्हा। बाद में लोगबाग उन्हें &#8216;शॉटगन&#8217; के नाम से या फिर &#8216;खामोश&#8217; के उपनाम से जानने लगे। शत्रुघ्न सिन्हा को मुंबई फिल्म जगत में गए कोई 17 वर्ष हुए थे और सिनेमा की दुनिया में अपना नाम स्थापित कर चुके थे। शत्रुघ्न सिन्हा पटना में अपने पिता के नाम पर एक कैंसर अस्पताल बनाना चाहते थे। उन दिनों बिहार में कैंसर के मरीजों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ना शुरू हो गया था। अगर आज की सांख्यिकी को देखें तो आज कोई दो लाख के आसपास पास लोग, विभिन्न उम्र के, इन भयंकर बीमारी से प्रदेश में ग्रसित हैं, मृत्यु प्राप्त करने के लिए जीवन की सांसे गिन रहे हैं। </p>
<p>शत्रुघ्न सिन्हा के अभिन्न मित्र सुनील दत्त इनके इस अदम्य कार्य में मदद कर रहे थे। इसका वजह भी था क्योंकि सुनील दत्त की मोहतरमा नरगिस दत्त पैनक्रियाटिक कैंसर (अग्नाशय कैंसर) के कारण 3 मई, 1981 को 51-वर्ष की आयु में मुंबई के ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली थी। सुनील दत्त और शत्रुघ्न सिन्हा की असीम इच्छा थी कि प्रदेश के किसी भी कैंसर से पीड़ित मरीज को तत्कालीन बम्बई (अब मुंबई) टाटा कैंसर अस्पताल में इलाज के लिए नहीं भागना पड़े। </p>
<figure id="attachment_7474" aria-describedby="caption-attachment-7474" style="width: 2044px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-3.jpg" alt="" width="2044" height="1246" class="size-full wp-image-7474" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-3.jpg 2044w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-3-300x183.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-3-1024x624.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-3-768x468.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-3-1536x936.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2044px) 100vw, 2044px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7474" class="wp-caption-text">दिल्ली में मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम के प्रवेश के साथ दाहिने हाथ एक छोटा सा मैदान (तस्वीर: संजय शर्मा)</figcaption></figure>
<p><strong>भारत में तवायफों का योगदान </strong></p>
<p>पिछले दिनों जब पुरानी दिल्ली सहित देश के अन्य भागों में तवायफों की स्वाधीनता संग्राम में योगदान पर कहानी कर रहा था, उस समय जामा मस्जिद के पिछले हिस्से में नई सड़क के बाएं हाथ तत्कालीन तवायफ गौहर जान की हवेली के चौखट पर बैठा था। गौहर जान की हवेली उन दिनों दो मंजिला हुआ करती थी, मुगलकालीन साज-सज्जा से श्रृंगारित थी, झरोखों से बीबी गौहर जान से रूबरू होने के लिए गलियों में समाज के संभ्रांतों से लेकर धनाढ्यों की लम्बी कतार हुआ करती थी।उन दिनों के इतिहास को समेटे सत्रहवीं शताब्दी में उनकी हवेली के नीचे बाएं कोने पर स्थापित शिवलिंग आज भी गवाही दे रहा है। शिवलिंग के बगल में कभी जहाँ बाउली हुआ करता था, आज उसे मिट्टी-पत्थर से भरकर पांच-सात मंजिला भवन बन गया है और बीबी गौहर जान की हवेली आज एक बाजार में तब्दील हो गया है। </p>
<p>कहते हैं गौहर जान आर्थिक तंगी के दौरान मोहनदास करमचंद गाँधी को 12,000 रूपये की मदद की थी अपनी गीत-गानों और घुंघरू की कमाई से। वैसे यह घटना आज से कोई 124+ वर्ष पहले की है, लेकिन आज भी भारत ही नहीं, विश्व की संगीत की दुनिया में बीबी गौहर जान अपनी आवाज से जीवित है। जंगे आज़ादी के दिनों में देश में असंतोष बढ़ रहा था और इस विद्रोह का सीधा असर पड़ा था दिल्ली सल्तनत की इन गलियों के अलावे देश की विभिन्न प्रांतो की तवायफों पर, उनकी संस्कृति पर, नाच-गानों पर, कलाओं पर, नृत्यों पर, वाद्ययंत्रों पर, सारंगी और संतूर की तारों पर। घुंघरुओं की आवाज धीमी होने लगी थी। गले का स्वर कमजोर होने लगा था। अन्य वाद्य यंत्रों से भी आवाज निकालना समय के साथ-साथ कमजोर होने लगा था। यानी तवायफों की कलाओं के लिए मौत की घंटी थी बज चुकी थी ।</p>
<p>इस चौखट पर बैठे-बैठे बीबी गौहर जान के नाम से गलियों में लटके दुकानों के साइन बोर्डों पर &#8220;गली बीबी गौहर जान&#8221; लिखा देख रहा था। इसी बीच अनायास रूपमती, अनारकली, राणा दिल, लाल कुंवर नूर बाई, चमानी राम जानी, उत्तम बाई, फिरदौस जान, अद बेगम, अल्फिना, पुन्ना बाई और जद्दन बाई जैसी नामी तवायफों का नाम मानस पटल पर आने लगा। जद्दनबाई सुनील दत्त की सास और नरगिस की माँ थी। बॉलीवुड की पहली महिला संगीतकार थीं। वह एक गायिका, संगीतकार, नर्तकी, अभिनेत्री, फिल्म निर्माता और भारतीय सिनेमा की शुरुआती हस्तियों में से एक थीं। वह अख्तर हुसैन, अनवर हुसैन और मशहूर हिंदी अभिनेत्री नरगिस की माँ थीं, और प्रिया दत्त व संजय दत्त की नानी थीं। </p>
<figure id="attachment_7484" aria-describedby="caption-attachment-7484" style="width: 960px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/11.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/11.jpeg" alt="" width="960" height="1280" class="size-full wp-image-7484" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/11.jpeg 960w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/11-225x300.jpeg 225w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/11-768x1024.jpeg 768w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7484" class="wp-caption-text">पटना के राजेंद्र नगर स्थित शाखा मैदान में अपने छोटे-छोटे खिलाड़ियों को हुनर सिखाते प्रशिक्षक संतोष कुमार</figcaption></figure>
<p>कहते हैं कि जद्दनबाई को अपनी ज़िंदगी में तीन बार प्यार हुआ और उन्होंने तीन बार शादी की। उनकी पहली शादी एक अमीर गुजराती व्यापारी, नरोत्तमदास खत्री से हुई थी। इस शादी से उन्हें एक बेटा हुआ, जिसका नाम अख्तर हुसैन था। उनकी दूसरी शादी उस्ताद इरशाद मीर खान से हुई, जिनसे उन्हें दूसरा बेटा, अभिनेता अनवर हुसैन हुआ। इसके बाद जद्दनबाई ने तीसरी शादी मोहनचंद उत्तमचंद त्यागी से की, जिन्होंने शादी के बाद इस्लाम अपना लिया और अपना नाम बदलकर अब्दुल राशिद रख लिया। फिल्म अभिनेत्री नरगिस उन्हीं की बेटी थीं। </p>
<p><strong>खेल के मैदानों और खिलाड़ियों के साथ उपेक्षा </strong></p>
<p>आइये, वापस मोइनुलहक स्टेडियम आते हैं। अंतरष्ट्रीय मुद्रा बाज़ार में भारतीय मुद्रा का मोल एक अमेरिकन डालर=12.23 रुपये था । लेकिन लोगों की मानसिकता, खासकर जो सत्ता के गलियारे में बैठकर &#8216;स्वहित की राजनीति करते थे/हैं&#8217;, का मोल उस दिन भी ढुलमुल नीति के गिरफ्त में थी, आज तो है ही। उन दिनों देश की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी अपने ही अंगरक्षक की गोलियों का शिकार हो चुकी थी और प्रधानमंत्री कार्यालय में राजीव गाँधी बैठे थे। </p>
<p>इधर पटना सचिवालय में मुख्यमंत्री कार्यालय में आठवीं विधान सभा के कालखंड के दो मुख्यमंत्रियों &#8211; डॉ जगन्नाथ मिश्र और चन्द्रशेखर सिंह &#8211; से आगे निकलकर नवमी विधानसभा कालखंड में श्रमिक नेता बिंदेश्वरी दुबे आ गए थे। इस विधानसभा में भागवत झा आज़ाद, सत्येंद्र नारायण सिन्हा और डॉ जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री कार्यालय में रखे पुस्तिका पर अपना-अपना हस्ताक्षर किये थे। प्रदेश में सत्ता के गलियारे में राजनीतिक चमचों का जन्म, संरक्षण तेजी से होने लगा था। नेता किसी भी पार्टी के हों, अपनी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को सज्ज हो रहे थे। </p>
<p>इधर शत्रुघ्न सिन्हा द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का मूल उद्देश्य &#8216;चैरिटी शो&#8217; करना था। उस कार्यक्रम में मुंबई के लगभग सभी अभिनेता, अभिनेत्रियां, गीतकार, संगीतकार, गायक, गायिका, नर्तकियां अपनी उपस्थिति दर्ज करने को सज्ज हो रहे थे। कार्यक्रम का तारीख तय हो गया था। मंच बन गए थे। लाउडस्पीकर पर हेल्लो-हेल्लो का भी टेस्टिंग हो गया था। यह सभी बातें शत्रुघ्न सिन्हा के निजी देखरेख में हो रहा था। </p>
<figure id="attachment_7475" aria-describedby="caption-attachment-7475" style="width: 1254px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-7.jpg" alt="" width="1254" height="1193" class="size-full wp-image-7475" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-7.jpg 1254w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-7-300x285.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-7-1024x974.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-7-768x731.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-7-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1254px) 100vw, 1254px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7475" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार और खेलकूद विशेषज्ञ दीपक कोचगवे</figcaption></figure>
<p>उधर, सचिवालय में सत्ता के गलियारे में बैठे लोग पटना से लेकर दिल्ली में राजीव गांधी का कान फूंकना शुरू कर दिए थे। उस समय तत्कालीन कांग्रेस के लोग ही नहीं, बल्कि डॉ. सीपी ठाकुर भी नहीं चाहते थे कि यह कार्यक्रम नहीं हो। उन सभी लोगों का मानना था कि अगर ऐसा हुआ और कार्यक्रम सफल हुआ, पैसे एकत्रित हुए, कैंसर अस्पताल बने तो कांग्रेस का नामोनिशान समाप्त हो जायेगा। राजीव गांधी को पत्र भी लिखा गया। यह कहा गया कि अगर ऐसा होता है तो कांग्रेस का बंटाधार हो जायेगा। चमचे, वह भी राजनीति में, दशकों से जन्म लेते आये हैं, परंपरा जारी रहेगा। </p>
<p>दिल्ली में बैठे राजीव गांघी शायद यह समझ नहीं पा रहे थे की बिहार में कांग्रेस का जीवन काल पांच वर्ष से भी कम बचा है। नवमी विधान सभा में बिंदेश्वरी दुबे (1988), भागवत झा आज़ाद (1989), सत्येंद्र नारायण सिन्हा (1989) और डॉ. जगन्नाथ मिश्र अपने-अपने हाथों कांग्रेस का गला घोंटते, मृत्यु की ओर उन्मुख करते, प्रदेश की सत्ता का बागडोर 10 मार्च 1990 को लालू प्रसाद यादव को सौंप दिए। शायद वह दौर कांग्रेस के लिए अंतिम दौड़ थी। खैर। </p>
<p>कार्यक्रम प्रारम्भ होने के चार दिन पूर्व हमारे एक मित्र वरिष्ठ पत्रकार दीपक कोचगवे, जो उन दिनों पटना से प्रकाशित &#8216;आज&#8217; अखबार में &#8216;हरफन मौला संवाददाता&#8217; थे, खेलकूद में महारत हासिल कर चुके थे, मोइनुलहक स्टेडियम विषय को लेकर शत्रुघ्न सिन्हा से मिले। कोचगवे का सिन्हा के साथ बहुत मधुर सम्बन्ध था। </p>
<p>आर्यावर्तइंडियननेशन कॉम से बात करते दीपक कोचगवे कहते हैं: &#8220;शत्रुघ्न सिन्हा बहुत ही गंभीर मुद्रा में बैठे थे। मुझे देखते ही वे भावविह्वल हो गए और अवरार अल्वी की कहानी पर बनी फिल्म, जिसमें गुरुदत्त, माला सिन्हा, वहीदा रहमान, जॉनी वाकर और रेहमान अभिनय किये थे, शाहिर लुधियानवी के गीत थे, जिसमें संगीत दिया था सचिनदेव वर्मन और गायक थे हेमंत कुमार &#8211; इसको ही जीना कहते हैं, तो यूँही जी लेंगे, उफ़ न करेंगे लब सी लेंगे, आँसू पी लेंगे; ग़म से अब घबराना कैसा, ग़म सौ बार मिला; हमने तो जब कलियाँ माँगी, काँटों का हार मिला; जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला &#8211; गुनगुनाकर, अश्रुपूरित आँखों से सम्पूर्ण कहानी का निचोड़ कह डाले।&#8221; </p>
<p>अगले दिन आज के प्रातः कालीन संस्करण में प्रथम पृष्ठ पर एक संवेदनशील कहानी मेरे नाम (दीपक कोचगवे) से प्रकाशित हुयी।&#8221; &#8216;आज&#8217; अखबार में प्रकाशन के दो-चार दिन बाद दिल्ली से प्रकाशित &#8216;जनसत्ता&#8217; अखबार में पटना के संवाददाता सुरेंद्र किशोर की भी कहानी प्रकाशित हुई। </p>
<p><strong>कांस्य, रजत पदक और खेल मंत्री </strong></p>
<p>चार दशक बाद उस घटना की, मोइनुलहक़ स्टेडियम के बहाने पटना स्थित खेल के मैदानों की चर्चा इसलिए कर रहा हूँ कि आज से चार ही नहीं सात दशक पहले भी पटना में खेल, खिलाड़ियों की जो स्थिति थी, मैदानों की जो हालत और हालात थी, उसमें कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ है। परिवर्तन सिर्फ यह हुआ श्रेयसी सिंह की। 2014 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स में निशाने बाजी के डबल ट्रैप स्पर्धा में क्रमशः &#8216;रजत&#8217; और &#8216;कांस्य&#8217; पदक जीतने वाली खिलाड़ी श्रेयसी सिंह छह साल बाद, यानी 2020 भारतीय जनता पार्टी की सदस्य बनती है और 2025 के अंत में विधान सभा की चुनाव में भाजपा के टिकट पर जमुई विधानसभा से जीतकर विधानसभा आती है और फिर स्वतंत्र रूप से खेल मंत्रालय का खेल मंत्री बन जाती है। आजाद भारत, और फिर बिहार में आज़ादी के बाद अब तक कौन सा खिलाड़ी खेल मंत्री बना है, सांख्यिकी नहीं है। या इसे यूँ भी कह सकते हैं कि बिहार के वर्तमान खेल मंत्री जैसा भाग्य प्रदेश के किसी भी खिलाड़ी को अब तक नहीं प्राप्त हो सका। </p>
<p>वैसे 1983 में कपिल देव के नेतृत्व में विश्वकप जीतने वाले टीम में बिहार में जन्म लिए कीर्ति वर्धन आज़ाद भी थे, उन्हें तो वह सम्मान नहीं दिया प्रदेश के लोगों ने। जिस वर्ष कपिल देव विश्व कप लाये थे, उस दिन से दो वर्ष पूर्व तत्कालीन बिहार के रांची में देश का एक दूसरा क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का जन्म हो गया था। धोनी दस वर्ष तक भारतीय क्रिकेट का कप्तान रहे थे और 2007 &#8211; 2017 के दौरान 332 मैच खेले थे। एक रिकार्ड आज भी है। टी-20 विश्वकप, 2011 ओडीआई विश्वकप के साथ-साथ 2013 में भारत को चैम्पियन ट्रॉफी भी दिए थे &#8211; बिहार के लोग कभी उन्हें न तो बिहार में, ना ही झारखण्ड में और ना दी दिल्ली में खेल मंत्री बनाने के लिए, भारत रत्न दिलाने के लिए सामाजिक क्षेत्र के मीडिया पर ही सही, दो शब्द लिखे थे। </p>
<p>अलबत्ता, खेल और खिलाडी का महत्व उतना ही रह गया है जितना स्कूल में बच्चों को बुलाने के लिए खिचड़ी पर न्योता, साईकिल का लोभ, पैसे का प्रलोभन दिया जाता रहा है। विश्वास नहीं होता तो वर्तमान में बिहार सरकार का स्लोगन देख लें। &#8220;मेडल लाओ-नौकरी पाओ&#8221; योजना के बाद बिहार खेल छात्रवृति योजना शुरू की जा रही है जिसके तहत प्रति वर्ष तीन, पांच और 20 लाख रुपये तक की राशि 725 प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को राष्ट्रीय खेल दिवस के मौके पर दी जाएगी। पैसे पर नजर नेताओं की एक बार जो टिकी, ख़त्म किये नहीं हटी, चाहे खेल और खिलाड़ियों की स्थिति बत्तर क्यों न हो जाय। </p>
<figure id="attachment_7471" aria-describedby="caption-attachment-7471" style="width: 927px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-8-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-8-1.jpg" alt="" width="927" height="1050" class="size-full wp-image-7471" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-8-1.jpg 927w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-8-1-265x300.jpg 265w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-8-1-904x1024.jpg 904w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-8-1-768x870.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 927px) 100vw, 927px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7471" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार सुधाकर झा</figcaption></figure>
<p>यही कारण है कि आज खेल के लिए प्रदेश का बजट 680 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इतना ही नहीं, विगत वर्ष कला, संस्कृति व युवा विभाग से खेल विभाग का अलग गठन किया गया है। वैसे सरकार दावा करती है कि इसका उद्देश्य प्रदेश में खेल का बेहतर माहौल बनाना है, प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की खोज कर ओलंपिक जैसी प्रतियोगिता के लिए तैयार करना है, लेकिन सच क्या है यह खेल विभाग के अधिकारी, पदाधिकारी, नेता, अभिनेता, दलाल, बिचौलिए सभी जानते हैं क्योंकि प्रदेश का खेल जगत, खिलाडी लम्बे समय से खस्ताहाल वाले बुनियादी ढांचे, भ्रष्टाचार और राजनीति का शिकार होते आ रहा है। </p>
<p>जबकि, <strong>वरिष्ठ पत्रकार सुधाकर झा</strong> का कहना है कि यह पहली बार है जब बिहार को एक विशेष खेल मंत्री (श्रेयसी सिंह, अंतर्राष्ट्रीय निशानेबाज) मिला है। राजगीर में एक खेल विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है, और राजगीर स्टेडियम में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के हॉकी टूर्नामेंट खेले गए हैं। पिछले एक साल से बिहार ने खिलाड़ियों को नौकरियां भी दी हैं। अब राजेंद्र नगर में एक और एस्ट्रोटर्फ बनाया जा रहा है। लोगों को यह आश्वासन दिया गया है कि मोइनुल हक स्टेडियम की जगह एक बड़ा और सुंदर स्टेडियम बनाया जाएगा। नए उभरते हुए खिलाड़ी दूसरों को प्रेरित करेंगे।</p>
<p><strong>मोइनुलहक &#8211; मेवालाल, और शिवनाथ सिंह  </strong></p>
<p>वैसे, पटना में जन्में सैय्यद मोइन-उल-हक़ एक भारतीय कोच थे जिनका खेल और शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान रहा। वह भारत में ओलंपिक आंदोलन के अग्रणी रहें। उन्होंने जीवन भर खेलों के लिए संघर्ष किया और बिहार में खेल क्रांति की शुरुआत की। मोइन उल हक जी ने क्रमशः लंदन और हेलसिंकी में आयोजित 48वें और 52वें संस्करण के दौरान भारतीय ओलंपिक दल का मुख्य प्रतिनिधि के रूप में प्रतिनिधित्व किया। वह वर्ष 1951 में नई दिल्ली में आयोजित एशियाई खेलों के उद्घाटन के मुख्य आयोजकों में से एक थे। खेल के क्षेत्र में उनके अपार योगदान के लिए सम्मान के प्रतीक के रूप में, उनकी मृत्यु के उपरांत 1970 के दशक में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर जी के द्वारा पटना के राजेंद्र नगर स्टेडियम का नाम बदला कर &#8216;मोइन उल हक&#8217; स्टेडियम कर दिया गया। तब से आज तक यह स्टेडियम इसी नाम से जाना जाता रहा है। लेकिन पटना के लोगों सेवक बार पूछ कर देखिए कि मोइनुलहक कौन थे ?</p>
<p>इसी तरह, साहू मेवालाल का जन्म बिहार के गया जिले (अब नवादा जिले ) के चितरघाटी पंचायत के दौलतपुर में साहू महादेवराम और कुसुमी देवी के घर वर्ष 01 जुलाई 1926 में हुआ था। साहू मेवालाल भारतीय फुटबॉल टीम के लिए स्ट्राइकर के रूप में काफी प्रसिद्ध थें। मेवालाल का पहला बड़ा टूर्नामेंट लंदन में आयोजित 1948 का ग्रीष्मकालीन ओलंपिक था । ओलंपिक की तैयारी के हिस्से के रूप में, वह जुलाई में राष्ट्रीय टीम के साथ यूरोप गए, जिसने पिनर एफसी, हेस एफसी और एलेक्जेंड्रा पार्क एफसी जैसी अंग्रेजी टीमों के खिलाफ मैचो में जीत दर्ज की। ओलंपिक में भारतीय टीम, फ्रांस से 1-2 से हार गई । ओलंपिक के बाद डच क्लब एएफसी अजाक्स के खिलाफ 5-1 से गेम जीता । इन खेलों में साहू मेवालाल शीर्ष स्कोरर बनकर उभरे । मार्च 1951 में, नई दिल्ली में एशियाई खेलों में, वह चार गोल के साथ शीर्ष स्कोरर रहें, जिसमें भारत ने स्वर्ण पदक जीता। </p>
<p>मेवालाल और उनकी टीम ने स्वर्ण पदक जीत मैच में ईरान को 1-0 से हराकर देश को पहली ट्रॉफी दिलाया था। इसके साथ ही वह हेलसिंकी में 1952 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में भाग लेने वाली टीम का भी हिस्सा भी रहें । वह उस राष्ट्रीय टीम का भी हिस्सा थे जिसने 1940 के दशक के अंत में कई यूरोपीय देशों का दौरा किया और डेनमार्क, ऑस्ट्रिया, स्विट्जरलैंड जैसी टीमों के खिलाफ खेला, जिसमें उन्होंने छह गोल किए। बाद में उन्होंने टीम के बांग्लादेश दौरे में भाग लिया, 1950 के दशक के दौरान अफगानिस्तान, म्यांमार और थाईलैंड। आजादी के बाद 1952 के कोलंबो चतुष्कोणीय टूर्नामेंट में बर्मा पर 4-0 की जीत में भारत के लिए हैट्रिक बनाने वाले मेवालाल जी पहले खिलाड़ी थे। आज मेवालाल को कोई जानता नहीं। </p>
<p>इसी तरह, बिहार के बक्सर जिले में 11 जुलाई 1946 को जन्में शिवनाथ सिंह भारत के एक अद्भुत धावक थे। उन्होंने वर्ष 1976 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया और 1976 के ओलंपिक पुरुष मैराथन में 11 वें स्थान पर रहे। शिवनाथ सिंह ने अपने पूरे करियर के दौरान नंगे पैर प्रतिस्पर्धा की। इसके साथ ही उन्होंने सर्वश्रेष्ठ समय के साथ भारतीय राष्ट्रीय मैराथन रिकॉर्ड भी स्थापित किया। यह उपलब्धि उन्होंने वर्ष 1978 में जालंधर में हासिल किया था। शिवनाथ सिंह के द्वारा बनाया गया एथलेटिक्स रिकॉर्ड सबसे लंबे समय तक कायम रहने वाला रिकॉर्ड में से एक है।</p>
<p>अर्जुन पुरस्कार विजेता चद्रेश्वर प्रसाद सिंह भारतीय फुटबॉल टीम के पूर्व कप्तान थे। 1965 में जापान में खेलते हुए भारत की जूनियर फुटबॉल टीम की कप्तानी की। 1966 और 1970 में एशियाई खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया बैंकोक में जहां भारतीय टीम ने कांस्य पदक जीता। उन्होंने 1971 में सीनियर भारतीय फुटबॉल टीम की कप्तानी की और महाद्वीप के प्रमुख फुटबॉलरों वाली एशिया ऑल स्टार टीम में जगह बनाई।</p>
<figure id="attachment_7476" aria-describedby="caption-attachment-7476" style="width: 1254px" class="wp-caption alignright"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-6.jpg" alt="" width="1254" height="1193" class="size-full wp-image-7476" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-6.jpg 1254w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-6-300x285.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-6-1024x974.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-6-768x731.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-6-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1254px) 100vw, 1254px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7476" class="wp-caption-text">खेलकूद विशेषज्ञ और क्रिकेट के महान खिलाड़ी अजय नारायण शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>क्या कहते हैं अजय नारायण शर्मा </strong></p>
<p>76-वर्षीय अजय नारायण शर्मा, जिन्होंने अपना सात दशक का जीवन क्रिकेट को दे दिया, आर्यावर्तइंडियन नेशन कॉम से बात करते कहते हैं &#8220;बिहार में खेल का माहौल नहीं है। मैदान नहीं है। सरकार के तरफ से जितनी भी बातें इन दशकों में कही गयी है, कही जा रही है, सभी फरेब हैं। खेल के प्रति न तो सरकार को, न मंत्रालय में बैठे मंत्रियों को, अधिकारियों को, पदाधिकारियों को, किसी को भी कोई प्रेम नहीं है। आज जो भी खिलाड़ी प्रदेश, राष्ट्रीय अथवा अंतराष्ट्रीय स्टार पर उभर कर आ रहे हैं, वह सम्पूर्ण रूप से उनकी अपनी मेहनत, परिवार, माता-पिता का बलिदान और प्रशिक्षकों के सहयोग के कारण ही है। आप सोचिये न!! खेल के प्रति संवेदनशील व्यवस्था अगर यह कहती है कि “मैडल लाओ-नौकरी पाओ” तो यह नारा कितना वीभत्स लगता है। व्यवस्था खेल और खिलाड़ियों के लिए बिना कुछ किये मेडल की बात सोच्तिओ है, इससे बड़ा शर्म की बात क्या हो सकता।&#8217;</p>
<p>अजय नारायण शर्मा आगे कहते हैं कि आज भी मेवालाल साहू, शिवनाथ सिंह, चंद्रेश्वर प्रसाद जैसे प्रतिभावान खिलाड़ी बिहार के गाँव में एक नहीं, सैकड़ों हैं; लेकिन अर्थ की किल्लत के कारण, खेल की सुविधा के कारण अपने गाँव की आड़ को भी लाँघ नहीं पाते।&#8217; </p>
<p>ज्ञातव्य हो की अजय नारायण शर्मा बिहार क्रिकेट एसोसिएशन में सही तौर से काम- काज किये जाने को लेकर एक एडहॉक अर्थात तदर्थ कमेटी बनाने हेतु एक जनहित याचिका पटना हाई कोर्ट में दायर किये थे ताकि प्रदेश में खेल और खिलाडी के लिए एक बेहतरीन माहौल बने।याचिका में आगे यह भी आरोप लगाया गया था कि कुर्सी पर कथित रूप से अवैध तौर पर बैठे लोग प्रतिभावान क्रिकेट खिलाड़ियों के दावों को हतोत्साहित कर और खिलाड़ियों के बेजा औऱ अनुचित तौर से चयन कर क्रिकेट को बेचने पर उतारू हैं, इसलिए राज्य में खिलाड़ियों की स्थिति और भी खराब होते जा रही है। जिसकी वजह से खिलाड़ी घरेलू टूर्नामेंट जितने में भी कामयाब नहीं हो रहे हैं।</p>
<p>इतना ही नहीं, अजय नारायण शर्मा अपनी याचिका के जरिये चयनकर्ताओं/ सपोर्ट स्टाफ व बी सी सी आई द्वारा संचालित घरेलू टूर्नामेंट में विभिन्न उम्र के राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाडियों को सही तौर से चयन करने को लेकर आदेश देने का आग्रह भी याचिका में किया गया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रबंधन कमेटी में अवैध रूप से कुर्सी पर विराजमान व्यक्तियों द्वारा ऐसा नहीं किया जा रहा है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट द्वारा बोर्ड ऑफ कंट्रोल फोर क्रिकेट इन इंडिया एंड अदर्स बनाम क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार व अन्य के मामले में सिविल अपील संख्या – 4235 में 9 अगस्त, 2018 को दिये गए फैसले के अनुसार जस्टिस आर एम लोढ़ा कमेटी द्वारा की गई अनुशंसा के आलोक में खिलाड़ियों का सही तौर से चयन करने हेतु क्रिकेट एडवाइजरी कमेटी के गठन करने को लेकर आदेश देने का आग्रह भी किया गया है। खैर। </p>
<p><strong>क्या आप इन्हें जानते हैं ?</strong></p>
<p>महेंद्र सिंह धोनी, प्रतिक नारायण, मनीष कुमार, पवन कुमार, जीशान अली, सैयद सब्बा करीम, प्रमोद कुमार, राजू वाल्स, प्रभात कुमार, राजीव रंजन, धीरज कुमार, राम कुमार. अशोक कुमार, विष्णु शंकर, नीरज कुमार, सुनील कुमार, देवकी नंदन दस, सूरज नारायण लाल, तारिक-उर-रहमान, अमीकर दयाल, राजीव कुमार, अजय नारायण शर्मा, निखिलेश रंजन, तरुण कुमार, कीर्तिवर्धन आज़ाद, ईशान किशन, मुककेश कुमार, सौरभ तिवारी, अपूर्व आनंद, निखिल आनंद, अनुनय सिंह, सरफराज असरफ, सुते बनर्जी, सुब्रतो बनर्जी, अनजान भट्टाचार्य, उत्कर्ष, चिरंजीवी कुमार, सुब्रो दस, बेनु दस, अजय झा, कमलेश कुमार, रोबिन मुखर्जी, सुबित मुखर्जी आदि जैसे सैकड़ों क्रिकेट के खिलाड़ी आये, कुछ पल के लिए रुके, उभरे और गायब हो गए। किसी ने पूछा तक नहीं ऐसा क्यों हुआ? </p>
<p>अपवाद छोड़कर जो अपने घरों से अर्थ से कमजोर नहीं थे, घर में खाना और अन्य स्वस्थ वर्धक वस्तुएं मिलते थे, वे तो कहते गए, आगे बढ़ते गए; ल;यकीन शेष सभी गुमनाम हो गए। दुर्भाग्य यह है कि सरकार को, मंत्रीजी को,  अधिकारी-पदाधिकारी को मैडल तो चाहिए, लेकिन सरकारी कोष से निकलने वाले पैसे खेल और खिड़ाइयों पर खर्च नहीं करना पड़े । आज वैभव सूर्यवंशी या ईशान किशन को लेकर बिहार में सत्ता के गलियारे में बैठे लोग जितना भी &#8216;राजनीतिक कबड्डी खेल लें,&#8217; हकीकत यही है कि इन दोनों को वैश्विक पटल पर पहुँचने में शासन, प्रशासन, व्यवस्था का कोई योगदान नहीं है। </p>
<p><strong>क्या कहते हैं प्रेम बल्लभ सहाय </strong></p>
<p>बिहार के विख्यात क्रिकेट विशेषज्ञ प्रेम बल्लभ सहाय कहते हैं &#8220;पटना में अभी मोइनुलहक़ स्टेडियम, सचिवालय मैदान, गर्दनीबाग मैदान, पटना हाई स्कूल मैदान, पटना साइंस कॉलेज का मैदान, केमेस्ट्री ग्राउंड, फुलवारी सरीफ का ऊर्जा स्टेडियम, जगजीवन राम स्टेडियम कभी यहाँ के खिलाड़ियों के लिए खेल का मैदान था, आज सभी मैदान समाप्त हो गए हैं। क्या खिलाड़ी इन नेताओं के माथे पर बैठकर खेलेगा, बॉलिंग और बैटिंग करेगा? क्या कभी इन नेताओं ने, अधिकारियों ने इस विषय के बारे में सोचा, समस्याओं का समाधान किया? नहीं। </p>
<figure id="attachment_7477" aria-describedby="caption-attachment-7477" style="width: 1254px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-8.jpg" alt="" width="1254" height="1193" class="size-full wp-image-7477" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-8.jpg 1254w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-8-300x285.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-8-1024x974.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-8-768x731.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-8-24x24.jpg 24w" sizes="auto, (max-width: 1254px) 100vw, 1254px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7477" class="wp-caption-text">खेलकूद विशेषज्ञ और क्रिकेट खिलाड़ी और कोच प्रेम बल्लभ सहाय</figcaption></figure>
<p>सहाय आगे कहते हैं &#8220;आज अगर कोई भी खिलाड़ी राज्य, राष्ट्रीय अथवा अंतराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचता है तो इसमें सरकार  या व्यवस्था का कोई योगदान नहीं होता है। केंद्र के साथ-साथ बिहार सरकार के कोषागार से खेल के नाम पर करोड़ों, अरबों, खरबों रुपयों का आवंटन हो रहा था, लेकिन पटना के मोइनुलहक स्टेडियम सहित अविभाजित बिहार के सभी राज्यों के खेल के मैंदानों में जमीन बंजर हो गई थी। बिहार को छोड़कर, देश में कई राज्य ऐसे हैं जहाँ खेल और खिलाड़ियों को आगे बढ़ने के लिए सरकार सुविधाएँ जमीन पर दिखती है, जबकि बिहार में यह नदारत है। हाँ, नेताओं और अधिकारियों के मुख से लच्छेदार शब्दों का माला गूंथने में कोई कमी नहीं करते। </p>
<p>इन बातों का जिक्र यहाँ इसलिए कर रहा हूँ कि बिहार के सचिवालय से कोई 120 किलोमीटर दूर समस्तीपुर के ताजपुर इलाके में रहने वाले सूर्यवंशी परिवार को पिछले दो साल पहले तक कोई नहीं जानता था। यहाँ तक कि प्रदेश के राजनीतिक गलियारे में कुर्सी में चिपके दर्जनों नहीं, सैकड़ों नहीं, बल्कि हज़ारों-हज़ार शुतुरमुर्ग जैसा स्वेत-वस्त्रघारी राजनेता, महामहिम, मुख्यमंत्री, उप-मुख्यमंत्री, खेल मंत्री कोई भी नहीं जानते-पहचानते थे। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि बिहार ही नहीं, भारत में रहने वाले 10 और 19 साल के करोड़ों बच्चों में ताजपुर ठाकुरबाड़ी की गली का यह बच्चा अचानक क्षितिज पर सूर्य जैसा चमक उठा। और इसका एक मात्र कारण था ‘एक पिता का जिद’, ‘एक पिता का अपनी असफलता को पुत्र की सफलता में बदलना, और बहुत सी बातें जो माता-पिता और संतान के बीच मानसिक, प्राकृतिक, मनोवैज्ञानिक संबंधों के समीकरण को निर्धारित करता था। अब अगर सूर्यवंशी की सफलता का यश बिहार सरकार स्वयं ले तो इससे अधिक नीच मानसिकता और क्या हो सकता है। </p>
<p><strong>निजी क्रिकेट कोचिंग की बाढ़ </strong></p>
<p>आज शहर में सैकड़ों निजी क्षेत्र के क्रिकेट कोचिंग केंद्र खुल रहे हैं, सैकड़ों नहीं, हज़ारों खिलाड़ी न्यूनतम 600 रूपये से हजारों रूपये देकर प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। मैं कभी नहीं कहूंगा की यह गलत है, लेकिन अगर यही सुविधा सरकारी स्तर पर, बेहतरीन कोचों के द्वारा, सभी सुविधाओं के साथ उपलब्ध कराया जाता तो आज प्रदेश में मेडलों का भरमार लग जाता।कलेकिन ऐसा नहीं है। आज शहर में जितने कोचिंग केंद्र हैं, अपवाद छोड़कर, किसी भी केंद्र में कोई प्रशिक्षित प्रशिक्षक नहीं हैं, यह ईशान किशन के वर्तमान कोच का संतोष कुमार का मानना है।  </p>
<figure id="attachment_7470" aria-describedby="caption-attachment-7470" style="width: 573px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/rsz_abhijit.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/rsz_abhijit.jpg" alt="" width="573" height="776" class="size-full wp-image-7470" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/rsz_abhijit.jpg 573w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/rsz_abhijit-222x300.jpg 222w" sizes="auto, (max-width: 573px) 100vw, 573px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7470" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार अभिजीत घोष</figcaption></figure>
<p>विगत दिनों <strong>वरिष्ठ पत्रकार अभिजीत घोष टाइम्स ऑफ़ इंडिया</strong> में लिखे हैं: क्या बिहार क्रिकेट का पावरहाउस बन सकता है? उनका कहना है कि पिछले महीने, जब ईशान किशन ने T20 वर्ल्ड कप में कोलंबो में पाकिस्तान के खिलाफ एक ज़बरदस्त पारी खेलकर पूरे भारत को रोशन कर दिया था, तो सामाजिक क्षेत्र के मीडिया पर यह खबर खूब वायरल हुआ था: ‘एक बिहारी सब पे भारी’ । रविवार रात न्यूज़ीलैंड के खिलाफ, जब इस “पॉकेट रॉकेट” ने एक और शानदार प्रदर्शन किया – एक धमाकेदार अर्धशतक और आउटफील्ड में कुछ बेहतरीन कैच। </p>
<p>फिर भी, इस मैसेज में एक विडंबना भी छिपी है। ईशान का जन्म पटना में हुआ था, जहाँ उनके पिता – जो एक रियल एस्टेट कारोबारी हैं – और उनका बाकी परिवार रहता है। लेकिन यह विकेटकीपर-बल्लेबाज़ घरेलू क्रिकेट पड़ोसी राज्य झारखंड के लिए खेलता है, जिसे साल 2000 में दक्षिण बिहार से अलग करके बनाया गया था। असल में, इसी साल उन्होंने कप्तान के तौर पर सैयद मुश्ताक अली टूर्नामेंट में अपनी टीम को जीत दिलाई थी। ईशान का क्रिकेट के लिए ‘पलायन’ – बिहार में मुश्किल हालात में दूसरे राज्यों में जाने के लिए इस्तेमाल होने वाला एक स्थानीय शब्द – कोई अकेला उदाहरण नहीं है।हाल के सालों में, दो तेज गेंदबाजों – उत्तर-पश्चिमी जिला गोपालगंज के मुकेश कुमार और दक्षिण-पश्चिमी जिला रोहतास के आकाश दीप – ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपनी जगह बनाई है। ये दोनों ही घरेलू क्रिकेट बंगाल के लिए खेलते हैं।</p>
<figure id="attachment_7478" aria-describedby="caption-attachment-7478" style="width: 2044px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-4.jpg" alt="" width="2044" height="1246" class="size-full wp-image-7478" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-4.jpg 2044w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-4-300x183.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-4-1024x624.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-4-768x468.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Patna-4-1536x936.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2044px) 100vw, 2044px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7478" class="wp-caption-text">दिल्ली में मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम। तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>दूसरे राज्यों में जाने की इन घटनाओं की मुख्य वजह बिहार क्रिकेट एसोसिएशन का खराब कामकाज है। बीसीसीआई ने 2004 में बीसीए को निलंबित कर दिया था, और 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद ही इसे दोबारा बहाल किया गया। यहाँ तक कि राष्ट्रीय जनता दल नेता तेजस्वी यादव ने भी अपना एकमात्र फ़र्स्ट-क्लास मैच बिहार के लिए नहीं, बल्कि झारखंड के लिए खेला था (2009 में)। बीसीए के अंदरूनी झगड़े अभी भी खत्म नहीं हुए हैं। जनवरी 2024 में, दो अलग-अलग गुटों ने रणजी मैच के लिए खिलाड़ियों की अलग-अलग लिस्ट सौंपी थीं। हालाँकि, इस सीजन में कुछ अच्छे संकेत ज़रूर दिखे हैं। बिहार ने रणजी ट्रॉफी और विजय हज़ारे ट्रॉफी, दोनों के ‘प्लेट डिवीज़न’ में जीत हासिल की है, और अब वह वापस ‘एलीट ग्रुप’ में पहुँच गया है – जहाँ बड़े-बड़े खिलाड़ी खेलते हैं। भारत के दूसरे सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य के लिए यह एक नई शुरुआत है।</p>
<p>लेकिन जिस चीज़ ने बिहार क्रिकेट को सचमुच सुर्खियों में ला दिया है, वह है वैभव सूर्यवंशी का उदय – एक असाधारण और बिहार में ही तराशा गया टैलेंट। इस महीने की शुरुआत में, वैभव ने U-19 वर्ल्ड कप के फाइनल में 80 गेंदों पर 175 रन बनाकर इंग्लैंड को पूरी तरह से पस्त कर दिया। यह बच्चा, जिसकी उम्र अभी 15 साल भी नहीं हुई है, उसने 15 छक्के और 15 चौके जड़े। &#8216;द गार्डियन&#8217; ने उसकी तारीफ़ करते हुए लिखा, &#8220;खेल जगत में हमेशा ही कोई न कोई विलक्षण प्रतिभा सामने आती रहती है, लेकिन यह बच्चा सचमुच सबसे अलग है।&#8221; वैभव ने अपनी IPL टीम, राजस्थान रॉयल्स की ओर से खेलते हुए गुजरात टाइटंस के खिलाफ महज़ 35 गेंदों में शतक जड़ दिया; यह इस टूर्नामेंट का दूसरा सबसे तेज़ शतक है। मोहम्मद सिराज, इशांत शर्मा, राशिद ख़ान और प्रसिद्ध कृष्णा जैसे गेंदबाज़ों को उसके बल्ले का कहर झेलना पड़ा। अगर वह इसी तरह अपना ध्यान केंद्रित रखता है, तो यकीनन वह &#8216;व्हाइट-बॉल क्रिकेट&#8217; (सीमित ओवरों के क्रिकेट) का एक महान बल्लेबाज़ बनेगा।</p>
<p>क्रिकेट की यह नई विलक्षण प्रतिभा ताजपुर नामक एक छोटे से कस्बे से आती है। ऐसे छोटे और साधारण से परिवेश से निकलकर इस मुकाम तक पहुँचना, उसकी असाधारण यात्रा को और भी ज़्यादा विस्मयकारी बना देता है। वैभव अभ्यास करने के लिए अपने घर (राजपूत टोला) से निकलकर शहर के &#8216;पटेल मैदान&#8217; तक का सफ़र तय करता था; यह मैदान ज़िला मुख्यालय समस्तीपुर में स्थित है और उसके घर से लगभग 10 किलोमीटर दूर है। उसके पहले कोच बृजेश झा, जो खेल का सामान बेचने वाली एक दुकान भी चलाते हैं, बताते हैं, &#8220;जब वह पहली बार मेरे पास आया था, तब उसकी उम्र महज़ छह साल थी और गेंद उसके हाथों से भी ज़्यादा बड़ी लगती थी।&#8221; झा आगे कहते हैं, &#8220;लेकिन 8-9 साल की उम्र से ही उसने दिन में 8 घंटे अभ्यास करना शुरू कर दिया था—4 घंटे घर पर और 4 घंटे मैदान पर।&#8221;</p>
<p>वैभव और ईशान, दोनों ही अपने करियर के अलग-अलग पड़ावों पर खड़े हैं। बहुत कम लोगों को यह बात याद होगी कि U-19 भारतीय टीम की कप्तानी ईशान ने ही की थी; उस टीम में ऋषभ पंत, सरफ़राज़ ख़ान और वॉशिंगटन सुंदर जैसे दिग्गज खिलाड़ी शामिल थे। वर्ष 2016 में, उस टीम को वेस्ट इंडीज़ के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। उस टूर्नामेंट में बल्लेबाज़ के तौर पर ईशान का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा था। लेकिन इस बल्लेबाज-विकेटकीपर ने अपनी कमियों पर काम किया और अपने खेल में सुधार किया; इसके बाद उसे IPL में खेलने का मौका मिला, जहाँ उसने करोड़ों रुपये कमाए और फिर भारतीय टीम के लिए क्रिकेट के तीनों प्रारूपों (टेस्ट, वनडे और T20) में खेलने का गौरव भी हासिल किया।</p>
<p>हालाँकि, बाद में उसका फॉर्म भी बिगड़ गया। इसके अलावा, पिछले दो वर्षों के दौरान बीसीसीआई के नियमों का पालन न करने के कारण चयनकर्ताओं की नजर में उसकी अहमियत भी कम हो गई थी। लेकिन इस T20 वर्ल्ड कप में उसने अपने शानदार प्रदर्शन के दम पर एक बार फिर अपनी खोई हुई साख और जगह वापस हासिल कर ली है। ईशान के करियर में आए उतार-चढ़ावों और उसकी सफलताओं से वैभव भी कुछ अहम सबक सीख सकता है। और ऐसा ही पृथ्वी शॉ भी कर सकते हैं, जो बिहार से जुड़ाव रखने वाले एक और प्रतिभाशाली क्रिकेटर हैं, और जिन्होंने भारत को U-19 विश्व कप की ट्रॉफी जिताई थी। ईशान, वैभव, मुकेश और आकाश दीप इस बात को साबित करते हैं कि बिहार प्रतिभाओं से भरा हुआ है। लेकिन क्या यह राज्य घरेलू क्रिकेट का एक बड़ा केंद्र बन सकता है?</p>
<p>पिछले डेढ़ दशक में, नीतीश कुमार के नेतृत्व में राज्य में बहुत सारा इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचा) तैयार किया गया है—हालांकि अब उनका कार्यकाल समाप्त होने वाला है। बिहार में चारों ओर बेहतरीन सड़कें (हाईवे) फैली हुई हैं। शहरों का विस्तार भी बहुत तेज़ी से हो रहा है। और इसके बावजूद, खेलों से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर भारत के बाकी हिस्सों के मुकाबले काफी पीछे है। निजी क्रिकेट अकादमियां तो कुकुरमुत्तों की तरह उग आई हैं। लेकिन राज्य सरकार और BCA—जिनकी वेबसाइट भी काफी पुरानी और अव्यवस्थित है—को भी अपनी ज़िम्मेदारी निभानी होगी। बिहार में आखिरी बार कोई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच 1996 में खेला गया था। उम्मीद है कि राजगीर में बना नया-नवेला स्टेडियम और स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स इस बदलाव की शुरुआत करेंगे।</p>
<p>वैभव &#8216;नए बिहार&#8217; का प्रतिनिधित्व करते हैं—एक ऐसा बिहार जो अनगिनत संभावनाओं से भरा हुआ है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि अगर आप अपनी प्रतिभा और कड़ी मेहनत को एक साथ मिला लें, तो आप अपने आस-पास के माहौल की सीमाओं को तोड़कर आगे बढ़ सकते हैं। उनकी सफलता, और साथ में ईशान की सफलता, बिहार—और पूरे भारत—में क्रिकेट के लिए एक &#8216;गेम-चेंजर&#8217; (पासा पलटने वाली घटना) साबित हो सकती है।</p>
<p>बहरहाल जब <strong>ईशान किशन के कोच संतोष कुमार</strong> से पूछा तो उनका कहना था कि किशन प्रतिभाशाली है, जिस तरह खेलते हैं, कैच पकड़ते हैं आने वाले दिनों में वे &#8216;हरफनमौला; बन सकते हैं। किसी भी खिलाड़ी को यहाँ तक पहुँचने में कोच के योगदान के बारे में जब पूछा तो संतोष कुमार का कहना है कि &#8216;कोच तो एक गाइड के रूप में कार्य करता है। एक खिलाडी किस कदर खेलेगा पिच पर यह तो तत्कालीन सूझ-बच पर निर्मभर करता है। हमारी कोशिश होती है कि सैद्धांतिक रूप से एक खिलाड़ी को बताएं, अभ्यास कराएं जिससे खेल के मैदान में वह उसे व्यावहारिक रूप वह दे सके। पहले खेल था, खेल को खेलने की भावना से खेला जाता था। आज समीकरण बदल गया है। आज खेल में पैसा का बोलबाला हो गया है। परिणाम यह हुआ है कि अर्थ से कमजोर खिलाडी इस दौड़ में पिछड़ रहा है अन्यथा बिहार में टैलेंट की किल्लत नहीं है। इतना ही नहीं, आज एक अथवा दो सफलता के बाद से ही खिलाड़ियों में ैटिचुड़ आ जाता है, उनकी भाषा, चाहे मौखिक हो या शारीरिक बदल जाती है। पैसा बोलने लगता है। अगर ऐसा नहीं होता तो आज खिलाड़ी बिकते नहीं। </p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;.. खिलाड़ियों के पैरों के लिए तरसता पटना का मैदान, खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देते रोते-बिलखते प्रशिक्षक &#8211; कौन देखेगा?</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/sports/sports-became-victim-of-politics-in-bihar">बिहार में &#8216;स्कूल आओ &#8211; खिचड़ी खाओ&#8217;, &#8216;मेडल लाओ-नौकरी पाओ&#8217;, &#8216;तुम करो-हम कुच्छो नहीं करेंगे&#8217; नारा बुलंद, खेल-खिलाड़ियों का विकास फाइलों में हो रहा है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8220;​इतिहास गवाह है: 7-जंतर-मंतर पिछले 50 वर्षों में किसी का नहीं हुआ है, &#8216;अभिशप्त है यह इमारत&#8217;, नीतीश कुमार का भी नहीं होगा&#8221; &#8211; लिख लीजिये</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/7-jantar-mantar-a-cursed-building</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Mar 2026 00:58:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[7-jantar mantar]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[janta dal (united)]]></category>
		<category><![CDATA[Nitish Kumar]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>7-जंतर मंतर (नई दिल्ली) : आप माने या नहीं माने, आपकी मर्जी । लेकिन 7-जंतर मंतर स्थित जनता दल &#8211; यूनाइटेड का ऐतिहासिक इमारत का इतिहास अगर गलत नहीं है, तो आगामी आने वाले दिनों में जनता दल &#8211; यूनाइटेड का &#8216;दिवाइटेड&#8217; होना भी तय है, यही नियति है। कांग्रेस का आधिपत्य रहने वाले इस भवन का स्वामित्व सन 1969 में [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/7-jantar-mantar-a-cursed-building">&#8220;​इतिहास गवाह है: 7-जंतर-मंतर पिछले 50 वर्षों में किसी का नहीं हुआ है, &#8216;अभिशप्त है यह इमारत&#8217;, नीतीश कुमार का भी नहीं होगा&#8221; &#8211; लिख लीजिये</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>7-जंतर मंतर (नई दिल्ली) : आप माने या नहीं माने, आपकी मर्जी । लेकिन 7-जंतर मंतर स्थित जनता दल &#8211; यूनाइटेड का ऐतिहासिक इमारत का इतिहास अगर गलत नहीं है, तो आगामी आने वाले दिनों में जनता दल &#8211; यूनाइटेड का &#8216;दिवाइटेड&#8217; होना भी तय है, यही नियति है। कांग्रेस का आधिपत्य रहने वाले इस भवन का स्वामित्व सन 1969 में कांग्रेस विभाजन के बाद कांग्रेस (ओ) को मिला। सन 1977 में जब कांग्रेस (ओ) जनता पार्टी में विलय हो गया,  जनता पार्टी का राष्ट्रीय कार्यालय 7-जंतर मंतर बना। तब से लेकर आज तक, पिछले पचास वर्षों से यह &#8216;अभिशप्त भवन&#8217; यहाँ दर्जनों राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को उछलते, मुस्कुराते आते तो देखा, लेकिन कोई मुस्कुराते नहीं गए, यह भी सत्य है। इन पांच दशकों में यह कार्यालय “जनता” उपसर्ग और प्रत्यय वाली पार्टियों को चकनाचूर होते देखा है, स्वाभाविक है जनता दल &#8211; यूनाइटेड भी अछूता नहीं रह पाएगा। यही यहाँ की मिट्टी का प्रारब्ध है। आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी। </strong></p>
<p>वैसे कोई तीस सीढ़ियों के ऊपर पहली मंजिल पर जनता दल यूनाइटेड का आलीशान कार्यालय है, जहाँ कीमती लकड़ी के फर्नीचर और कुर्सियां भी लगे हैं, सफेद संगमरमर का गलीचा  नुमा सतह भी है, लेकिन लोगों का कहना है कि &#8220;नीतीश कुमार प्रदेश के मतदाताओं के साथ विश्वासघाती राजनीति किए। प्रदेश का मतदाता उन्हें और जनता दल &#8211; यूनाइटेड के नेतृत्व को मत दिया था। अपने हित में, या अपने पुत्र के हित में मतदाताओं के अधिकार को कैसे हस्तांतरित कर सकते हैं नीतीश कुमार ? मतदाताओं के पास कल भी विकल्प था, आज भी है, वैसी स्थिति में प्रदेश का मतदाता ही नहीं, पार्टी का एक बड़ा भाग जंतर मंतर से दीनदयाल उपाध्याय मार्ग अथवा अन्य रास्ता निकल सकता है। और इस बात को हल्के में नहीं लिया जाय। पार्टी के दर्जनों वरिष्ठ नेता जो गणित को बिगाड़ सकते हैं, नीतीश के निशांत को आशीष तो दे सकते, उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर सकते, यह भी तय है। खैर। </p>
<blockquote><p>भारत के संसद से कोई पौने किलोमीटर दूर जंतर मंतर रोड पर ऐतिहासिक जंतर मंतर (जिसके नाम से यह इलाका है) के बाद अगर कोई स्थान बहुत मशहूर है तो दिल्ली पुलिस की आज की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच मुद्दत से चलने वाली &#8216;सांभर-बड़ा&#8217; की दूकान, जहाँ नित्य लाखों का व्यवसाय होता है। कल इसी मार्ग पर खड़े होकर, 7-जंतर मंतर ईमारत की  ओर मुख किये सोच रहा था कि राजनीतिक पार्टियों में &#8216;विचारवान&#8217;, &#8216;प्रबुद्धजनों&#8217; की किल्लत क्यों हो गयी है। यह भी सोचने को विवश हो गया कि कैसे तीन दशक पहले एक छोटी से चूक तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनके समर्थकों को &#8216;वास्तु विज्ञानं&#8217; का अध्ययन करने, निर्णय लेने पर मजबूर किया था। निर्णय लिया गया और फिर इतिहास भी रचा गया। </p></blockquote>
<p>आइये, इसी बहाने पहले 11-अशोक रोड चलते हैं। कभी जीवंत रहने वाला यह बंगला आज भले बिल्कुल शांत दिखा, बिलकुल वीरान दिखा, लेकिन तीन दशक पहले उस रात क्या हुआ था, शायद आज के गणमान्यों को नहीं मालूम होगा। आज भी जीवित हैं गोविन्द आचार्य जी, मन करे तो पूछ लेंगे। आज मुख्य प्रवेश द्वारा पर सुरक्षाकर्मी दिखे। उसके बाएं हाथ लकड़ी का एक और दरवाजा दिखा, जो एक कक्ष में खुल रहा था। सुरक्षाकर्मी महोदय उस दरवाजे की ओर इशारा किये और मैं अपनी पहचान बताते प्रवेश लिया। सामने &#8216;ट्रिंग-ट्रिंग&#8217; करने वाला यंत्र लगा था जिसके रास्ते अंदर आना बाध्यकारी होता है &#8211; सुरक्षा जांच के लिए । कभी यह भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय कार्यालय हुआ करता था, 11 &#8211; अशोक रोड । कभी जीवंत होता था यह बंगला। आज मुश्किल से चार-पांच गाड़ियां इस बंगले के सामने बायीं ओर खड़ी दिखाई दी। कोई बैनर नहीं, कोई झंडा-पताखा नहीं। भाजपा के किसी भी नेता की कहीं कोई तस्वीर नहीं। कहीं भी जिन्दावाद-जिन्दावाद लिखा नहीं दिखाई दिया। लगभग 99 फीसदी नामोनिशान नहीं था। खैर। आज के लोगबाग़ नहीं समझेंगे आखिर ऐसा क्या हुआ कि 11 अशोक रोड तिरस्कृत हो गया। यहाँ आज कोई कर्यालय हैं, लेकिन किसका करयलय है, सभी चुप थे।  </p>
<figure id="attachment_7454" aria-describedby="caption-attachment-7454" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7454" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7454" class="wp-caption-text">7​-जंतर मंतर, जनता दल-यूनाइटेड का राष्ट्रीय कार्यालय और अंदर दीवारों पर सजे नेताओं का पोस्टर । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>11-अशोक रोड भवन के पास आज की इस विरानीयत की बुनियाद सन 1996 में पड़ गई थी, जब दो सप्तक 13 दिन (मई 16, 1996 से जून 1, 1996) प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठने के बाद, राष्ट्र का नेतृत्व करने के बाद, भारतीय जनता पार्टी के स्तम्भ सम्मानित अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री कार्यालय से बाहर आना पड़ा, भारी मन से। आज बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार किसी &#8216;अदृश्य कारणवश&#8217; मुख्यमंत्री की कुर्सी को त्यागकर 250-संख्या वाली राज्यसभा में रखी कुर्सियों की क़तार में छह वर्ष के लिए एक कुर्सी के मालिक बने हैं। लेकिन कल क्या होगा उनके राजनीतिक जीवन में, यह वे भी नहीं जानते, भले उनके सहयोगी, सहकर्मी यह दावा करें कि नीतीश कुमार का अंतरी कई मीलों का है, शरीर मैं कहाँ कहाँ दांत है, कोई नहीं जानता । खैर । </p>
<p><strong>उस ऐतिहासिक, परन्तु, भारतीय राजनीतिक पटल के उस काला दिवस के कुछ ही दिनों के बाद भारत के बड़े-बड़े वास्तुशास्त्र विशेषज्ञ, ज्ञानी, महात्मा, अंक-दिशा के ज्ञाता इस 11 अशोक रोड बंगला, बंगला की स्थिति की जांच-पड़ताल हुयी थी। कुछ परिस्थितियां भयंकर बाधक थी जो भाजपा के तत्कालीन समय और भविष्य के लिए अपसकुन था, प्रतिकूल था । उन तमाम विशेषज्ञों की एक बैठक हुई थी। पूरी रात, तक़रीबन छः घंटा का मनन-चिंतन किया गया था। उस बैठक में उपस्थित सभी महात्मनों के मुख से निकलने वाले शब्दों को भाजपा के, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सभी सज्जन एकांत-चित होकर सुन रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे उन महात्मनों, विद्वानों, ज्ञानियों, विशेषज्ञों के जिह्वा पर माँ सरस्वती विराजमान हों।</strong> </p>
<p>फिर यह निर्णय लिया गया कि संसद की दिशा से जब हम अपने बाएं हाथ कार्यालय परिसर में प्रवेश लेते हैं, प्रवेश के साथ ही विशालकाय नीम का वह वृक्ष सामने खड़ा दीखता है। कोई भी आगंतुक उस वृक्ष को नजर अंदाज नहीं कर सकता, चाहे पार्टी के नेता हों या पार्टी के कार्यकर्त्ता अथवा देश के मतदाता, जो भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान और भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात थी। सभी विशेषज्ञों का एक मत हुआ &#8211; या तो प्रवेश द्वार बदला जाय अथवा उस नीम के वृक्ष का &#8216;कतरन&#8217; किया जाए। वाजपेयी जी &#8216;सजीव&#8217; थे जीवन पर्यन्त और जीवों की पीड़ा जानते थे, महसूस किये थे। स्वाभाविक है वे वृक्ष के कतरन के विरुद्ध थे। हां, द्वार अलग किया जा सकता है, स्वीकार्य था उन्हें। </p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=Fw5OhZZ707U" target="_blank">​@अखबारवाला001 यूट्यूब पर सुनें जरूर &#8211; 7-जंतर मंतर:  एक अभिशप्त भवन, जेडी (यू) का राष्ट्रीय कार्यालय​ और नीतीश कुमार का दिल्ली आना </a></p>
<p>वास्तु-विशेषज्ञों, विद्वानों, महात्मनों का यह फैसला हुआ कि इस अवरोध के बाद भारतीय जनता पार्टी का स्थान देश के मतदाताओं के हृदय में अनमोल होगा, लिख लीजिये। अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में बनी और बिगड़ी वह 13 दिन की सरकार भाजपा के भविष्य का केंद्र बिंदु बन गया। 16 मई, 1996 से 1 जून, 1996 तक की सरकार और उनकी सरकार के विरोधी में, पार्टी के विरोध में जन्म ले रही अन्य पार्टियों की विचारधाराएं वाजपेयी जी के ह्रदय को छल्ली कर दिया था। फिर सरकार बनी और 19 मार्च, 1998 से 13 अक्टूबर, 1999 तक वाजपेयी जी प्रधानमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए। बहरहाल, 11 अशोक रोड का वह मनहूस, वास्तु-विरोधी प्रवेश द्वार टूटना प्रारम्भ हो गया था और एक दूसरा रास्ता कोई 20 कदम दूर आगे सुरक्षित कर दिया गया था।   </p>
<blockquote><p>मैं सन 1996 में उस दिन अपने एक मित्र सुश्री अदिति कौल (अब दिवंगत) के साथ 11-अशोक रोड गोविंद आचार्य जी से मिलने आया था। कहानी की तलाश कर रहा था। लिखने के लिए कुछ भी नहीं था। दोपहर के एक बज गया था। उन दिनों गोविन्द जी 11 &#8211; अशोक रोड परिसर वाले भवन में पीछे दाहिने हाथ स्थित एक रसोई युक्त कमरे में रहते थे। हम दोनों को देखकर खुश हो गए। खाना नहीं बना था। फिर खिचड़ी-चोखा बना और बात-बात में बात निकल गई विगत रात की बैठक की, मंथन की, निर्णय की, भाजपा की वर्तमान मांगलिक-दशा की और वास्तु-दोष निवारण हेतु देश के महात्मनों द्वारा सुझाये उपायों की। मैं उस समय इण्डियन एक्सप्रेस का एक छोटा सा रिपोर्टर था। कोई पांच सौ शब्दों की कहानी लिखा गया जिसे प्रथम पृष्ठ पर प्राथमिकता के साथ प्रकाशित किया गया ।</p></blockquote>
<figure id="attachment_7455" aria-describedby="caption-attachment-7455" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0105-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0105-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="size-full wp-image-7455" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0105-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0105-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0105-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0105-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0105-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/DSC_0105-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7455" class="wp-caption-text"><br />7​-जंतर मंतर, जनता दल-यूनाइटेड का राष्ट्रीय कार्यालय और सन्नाटा । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>अगली सुबह दिल्ली सल्तनत के पत्रकार मित्र-मित्राणी मेरी कहानी का मज़ाक उड़ाए। वे कटाक्ष में हंस रहे थे और मैं यथार्थ में स्वीकार कर रहा था। कुछ दिन बाद 11-अशोक रोड का वह द्वार बंद हो गया। नीम के पेड़ का जीवन बच गया। इधर यह सब हो रहा था, उधर समय बदल रहा था। &#8216;वास्तु&#8217; अपना करवट ले रहा था। भाजपा की भाग्य रेखाएं बदल रही थी। &#8216;कुंडली&#8217; के घरों में बैठे तत्कालीन नेताओं का स्थान परिवर्तित हो रहा था। कहीं आकर्षण हो रहा था तो कहीं विकर्षण। 13 अक्टूबर, 1999 से 22 मई, 2004 तक वाजपेयी भारत के प्रधानमंत्री के रूप में अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा किये। लेकिन देश में एक नए राजनेता का अभ्युदय अब तक हो गया था। समय और वास्तु अपने-अपने तरह से उसे संरक्षित, सम्पोषित कर रहा था। दस वर्ष बाद &#8216;वास्तु&#8217; और भाजपा की कुंडली में बैठे सभी नेताओं (अपवाद छोड़कर) के घरों में बेतहाशा परिवर्तन हुआ। एक आंधी चली। कई उस तूफ़ान में दूर अदृश्य हो गए। वास्तु-मंथन के बाद कई नए चेहरे अवतरित हुए।</p>
<p><strong>आज, 7-जंतर मंतर ईमारत के सामने सड़क के दूसरे तरफ चाय की दुकान पर, दिल्ली पुलिस और अन्य तैनात सुरक्षा कर्मियों के बीच चाय की चुस्की लेते, 7-जंतर मंतर मुख्य प्रवेश जंग लगा द्वार पर विशालकाय कूड़ा करकट का अम्बार, कुत्ते को विचरण करते, विशालकाय नीम का वृक्ष से सूखे पत्तों को गिरते देख तीन दशक पूर्व 11-अशोक रोड याद आ गया। कुछ कदम आगे बढ़ने, सड़क के दूसरे तरफ दिल्ली पुलिस द्वारा स्थापित लोहे के बड़े-बड़े पीले रंग के विरोधक के बाद जीर्ण-शीर्ण अवस्था में दूसरा प्रवेश द्वार के पास बिलखती हुई मिटटी, ऊपर ईंट-से-ईंट अलग होते दीवार के ऊपर जंग लगा लोहे का एक नाम पट्टिका, जिसपर लिखा था &#8216;सरदार वल्लभ भाई पटेल स्मारक ट्रस्ट (निबंधित)&#8217; को देखकर मन बिचलित हो गया। कहने को तो वल्लभ भाई पटेल के नाम की राजनीति उनके मरने के बाद से आज तक हो ही रही है, दिल्ली में भी उनके नाम से पटेल चौक, पटेल चेस्ट अस्पताल, पटेल भवन, आदि हैं; लेकिन सरदार पटेल को दिल्ली में वह सम्मान नहीं मिला, जिसका वे हकदार थे &#8211; 7, जंतर मंतर ईमारत के दूसरे प्रवेश द्वार पर जंग लगा बोर्ड गवाह है। </strong></p>
<p>आइये इमारत के अंदर चलते हैं। आप माने या नहीं मान आपकी मर्जी। भारत के संसद से पौने किलोमीटर दूर एक तरफ संसद मार्ग और दूसरे तरफ रायसीना रोड के बीच स्थित है 7-जंतर मंतर इमारत है । जंतर मंतर रोड का एक छोड़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कालखंड में निर्मिग नए संसद भवन के एक द्वार से मिलने वाला रायसीना रोड से मिलता है, जबकि दूसरा छोड़ सवई मानसिंह &#8211; II द्वारा निर्मित ऐतिहसिक जंतर मंतर को अपने दाहिने हाथ छोड़ते कनॉट प्लेस से संसद की ओर जाने वाला संसद मार्ग से मिलता है। वैसे इस भवन में इसके स्थापना काल से अनेकानेक राजनीतिक पार्टियां शरणागत हुई, लेकिन सबों ने इसका &#8216;शोषण&#8217; ही किया। परिणामस्वरूप यह भी किसी का भी नहीं हुआ। आज यह एक अभिशप्त इमारत के रूप में जाना जाता है, यह अलग बात है कि नई दिल्ली में इस भवन की, यहाँ की जमीन और मिटटी की कीमत कई सौ नहीं, बल्कि कई हज़ार करोड़ की होगी। </p>
<figure id="attachment_7456" aria-describedby="caption-attachment-7456" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7456" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7456" class="wp-caption-text">7​-जंतर मंतर, जनता दल-यूनाइटेड का राष्ट्रीय कार्यालय का पिछला हिस्सा । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>वर्तमान में 7-जंतर मंतर रोड इमारत में जनता दल यूनाइटेड का दफ्तर है, भले पार्टी के अंदर लोगों का मन अपने नेतृत्व के विरुद्ध हो, उनके प्रति खटास हो, मन और आत्मा से लोग &#8216;डिवाइडेड&#8217; हों। जनता दल यूनाइटेड के संस्थापक नीतीश कुमार हैं । अब यह बंगला बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश से राजनीतिक पलायन लिए नीतीश कुमार के लिए कितना &#8216;फलीभूत&#8217; होगा, यह तो समय बताएगा। लेकिन इस भवन का इतिहास यही कहता है कि यह भवन &#8216;अभिशप्त भवन&#8217; है और यह अपने स्थापना काल से किसी का नहीं हुआ है। जो भी इस भवन में आया वह राजनीतिक दृष्टि से अंततः नीचे गिरा ही है &#8211; नीतीश कुमार तरोताजा दृष्टान्त हैं। </p>
<p>7-जंतर मंतर को पिछले साढ़े तीन दशक से देखता आया हूँ। भारत के संसद से कोई पौने किलोमीटर दूर सर इडविन  लुट्येन्स द्वारा डिजाइन की गयी दिल्ली में करीब 950 ऐतिहसिक भवनों, जिसक निर्माण 1920-1940 के बीच हुआ, 7-जंतर मंतर भवन भी उसी भवनों में एक है। यह भवन अपने अंदर इतिहास के पन्नों को समेटे साँस ले रहा है। प्रवेश के साथ ही परिसर का अतिक्रमण दिखने लगता है। जो एक बार उन दिनों इस परिसर में प्रवेश ले लिए, निकलने का नाम नहीं ले रहे हैं। प्रवेश के साथ दाहिने हाथ कोई 105 डिग्री के कोण पर &#8216;पुस्तकालय&#8217; लिखा देख मन खुश तो हो गया। </p>
<p><strong>लेकिन दो कदम आगे बढ़ते ही मन उतना ही खिन्न हो गया जितना इस भवन में आने-जाने वाले राजनेताओं, राजनीतिक पर्टियों का भूत के बारे में सोचकर। इस पुस्तकलय में काम करने वाले कर्मचारियों के साथ साथ, दीवारों पर टंगी नेताओं की तस्वीरों के साथ-साथ जो असहाय, दर्दनाक हाल किताबों, दस्तावेजों का देखा, वही हाल जनता दल &#8211; यूनाइटेड और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नितीश कुमार की तस्वीरों के साथ साथ पार्टी कार्यालय का। पार्टी कार्यालय के प्रवेश के सामने पान के पीक और अन्य गंदगियों के साथ सफ़ेद संगमरमर &#8216;काला रंग&#8217; का दिखा। चूहे मरने की बदबू भी आ रही थी। अगल-बगल दीवारों के साथ-साथ पेड़ों की टहनियों पर पार्टी के नेताओं की तस्वीरें भी लटके दिखे। परिसर में गंदगियों का अम्बार देखा।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वच्छ भारत अभियान को निःसहाय परिसर में चतुर्दिक देखा।  </strong></p>
<figure id="attachment_7457" aria-describedby="caption-attachment-7457" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-3.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7457" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-3.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-3-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-3-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-3-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-3-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7457" class="wp-caption-text">वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विशेषज्ञ अरविन्द कुमार सिंह</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, <strong>पटना से दिल्ली तक नीतीश कुमार और जनता दल &#8211; यूनाइटेड के भविष्य पर चर्चा करने के लिए दिल्ली सल्तनत के वरिष्ठ और राजनीतिक गलियारे में अपना बेदाग़ हस्तक्षर कायम रखने वाले पत्रकार अरविन्द कुमार सिंह से बातचीत किया</strong>। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि &#8220;इतिहस गावह है कि यह ईमारत अभिशप्त है। अपने स्थापना काल से आज तक, अपवाद छोड़कर, यह ईमारत इसमें पनाह लेने वालों का कभी नहीं हुआ है। पिछले 50 वर्षों का ही इतिहास अगर देखें तो सन 1977 के बाद, जो भी यहाँ आये, सीढ़ी से ऊपर नहीं चढ़े, अलबत्त नीचे ही गिरते गए। 1947 से 1971 तक इंडियन नेशनल कांग्रेस का मुख्यालय था। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और मौलाना आज़ाद जैसे बड़े नेता अक्सर इस जगह आते थे।जब 1969 में कांग्रेस में विभाजन हुआ, समय एक तरफ इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस (आर) बनी, वहीँ जो पुराने कांग्रेसी, मसलन के. कामराज , मोरारजी देसाई वाली काँग्रेस (ओ) बनी। उस कालखंड में इस भवन पर आधिपत्य कांग्रेस (ओ ) की हो गयी। </p>
<p><strong>इस भवन का एक ऐतिहासिक महत्व और भी है। 12 नवंबर, 1969 को, उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी से निकाल दिया गया था, क्योंकि कांग्रेस पार्टी के अंदर उनके और “सिंडिकेट” ग्रुप के बीच तनाव खुलकर सामने आ गया था। पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा, जो “सिंडिकेट” के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे, ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को “एक तरह की पर्सनालिटी को बढ़ावा देने” के लिए पार्टी से निकाल दिया। इंदिरा को निकालने की वजह से आखिरकार कांग्रेस पार्टी में फूट पड़ गई। यह कहा जाता है कि सिंडिकेट ने फैसला किया कि विपक्षी जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार सी.डी. देशमुख को दूसरी प्रायोरिटी का वोट दिया जाए। लेकिन इंदिरा गांधी ने अपनी बात मनवा ली और यह पक्का किया कि कांग्रेस के ऑफिशियल उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी, बागी कांग्रेस उम्मीदवार वी.वी. गिरी से हार जाएं। राष्ट्रपति चुनाव के बाद, इंदिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी पर सिंडिकेट की पकड़ कमजोर करने के लिए एक बड़ा कैंपेन शुरू किया। उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों का दौरा किया और सिंडिकेट को ताकत दिखाने के लिए कांग्रेसियों को इकट्ठा किया।</strong></p>
<p>यह भी इतिहास के पन्नों पर दर्ज है कि इंदिरा गांधी के समर्थक अपनी ही पार्टी के खिलाफ चले गए, और नए राष्ट्रपति को चुनने के लिए एक स्पेशल कांग्रेस सेशन की मांग की। उन्हें यकीन था कि सिंडिकेट के पास मेजोरिटी नहीं है और वह गलत तरीकों से सत्ता पर काबिज है। इंदिरा गांधी और उनके समर्थकों से नाराज होकर, निजलिंगप्पा ने एक खुला पत्र  लिखा, जिसमें प्रधानमंत्री और उनके साथियों पर पार्टी की अंदरूनी प्रजातंत्र को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया गया। पत्र  के जवाब में, इंदिरा गांधी ने निजलिंगप्पा की बुलाई मीटिंग में जाना बंद कर दिया।</p>
<p>अरविन्द जी कहते हैं कि &#8220;फिर 12 नवंबर 1969 को, कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग दो जगहों पर हुई — एक प्रधानमंत्री के घर पर और दूसरी इसी 7-जंतर मंतर में कांग्रेस के पास थी । 7-जंतर-मंतर कार्यालय में हुई मीटिंग में, निजलिंगप्पा ने अनुशासन के आधार पर इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया। इंदिरा के निकाले जाने से कांग्रेस पार्टी में फूट पड़ गई, जिसमें 705 कांग्रेस सदस्यों में से 446 इंदिरा के साथ चले गए। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले गुट को कांग्रेस (आर)  के नाम से जाना जाता था और इसे “इंडिकेट” भी कहा जाता था, जबकि सिंडिकेट नेताओं के नेतृत्व वाले गुट को कांग्रेस (O) या “सिंडिकेट” के नाम से जाना जाने लगा।&#8221;</p>
<figure id="attachment_7458" aria-describedby="caption-attachment-7458" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7458" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7458" class="wp-caption-text">7-जंतर मंतर: एक हिस्से में सरदार पटेल क नाम से  पुस्तकालय । तस्वीर: संजय शर्मा </figcaption></figure>
<p><strong>आर्यावर्तइंडियननेशन.कॉम</strong> से बात करते अरविन्द जी कहते हैं कि &#8220;1947 में इस भवन को मुंबई कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एस के पाटिल कोई सात लाख रुपये में खरीदकर कांग्रेस पार्टी को दिए थे। वैसे इस भवन पर सरकार भी अपना आधिपत्य जमाती है, लेकिन इस भवन का असली मालिक कौन है, यह भी आज शोध का  विषय बना है। मंत्रालय  के पास यह दिखाने के लिए कोई रिकॉर्ड नहीं है। कुछ दिन पहले भारत के अखबारों में सबसे अधिक पत्र प्रकाशित होने के लिए गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराने वाले 76-वर्षीय सूचना का अधिकार कार्यकर्त्ता सुभाष अग्रवाल को सिर्फ यह बताया गया कि यह प्रॉपर्टी 1969 में अविभाजित कांग्रेस पार्टी को दी थी।  </p>
<p>अरविन्द जी आगे कहते हैं कि &#8220;जब 1977 में कांग्रेस (ओ) जनता पार्टी में विलय हो गयी, इस भवन पर जनता पार्टी का आधिपत्य हुआ । सन 1977 में जन्म लिए जनता पार्टी अगले 12-वर्षों में एक नहीं, सहस्त्र खण्डों में विभाजित हो गया और सभी अपने अपने नाम के साथ अलग होते गए। सबसे पहले 1979 में राज नारायण के नेतृत्व में जनता पार्टी (सेकुलर) बनी। यह पहला, लेकिन महत्वपूर्ण खंडन था। सन 1980 में तत्कालीन जनसंघ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ भागीदारी सम्बन्धी दोहरी सदस्यता के कारण जनता पार्टी से अलग होकर &#8216;भरतीय जनता पार्टी&#8217; के रूप में राजनीतिक गलियारे में खड़ी हुयी। इसके आठ साल बाद सन 1988 में जनता दल बना। सं 1990 में जनता पार्टी के कभी अग्रणी रहे नेता, जो प्रधानमंत्री भी बने, चंद्रशेखर समाजवादी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) बनाये। फिर पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह, जो जनता पार्टी में अहम् भूमिका निभाए थे, के पुत्र अजित सिंह राष्ट्रीय लोकदल बनाये।</p>
<p>सल 1992 में जनता दल का एक और खंड हुआ समाजवादी पार्टी के रूप में जिसका नेतृत्व मुलायम सिंह यादव किये। और इसी क्रम में 1997 में सम्पूर्ण क्रांति में अहम् भूमिका निभाने वाले लालू यादव जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल बनाये। उसी वर्ष अपने पिता के सम्मानार्थ नवीन पटनायक ने अपने पिता के नाम पर बीजू जनता दल का गठन किया और 24 वर्षों तक ओड़िसा में स्थायी सरकार दिए। आज प्रतिपक्ष में बैठे हैं। 1999 में पूर्व प्रधनमंत्री एच डी देवेगौड़ा के नेतृत्व में जनता दाल का एक खंड जनता दल (स्कुलर) बना। </p>
<p><strong>अरविन्द सिंह कहते हैं कि साल 2003 में नितीश कुमार की अगुवाई में जनता दल (युनाइट्ड) का गठन हुआ। संख्या नहीं होने के बाद भी अपने तीर-कमान से अवसरवादियों का लाभ उठाते नितीश कुमार 20 वर्ष तक बिहार में रहे, लेकिन ऐसा क्या हुआ कि मुख्यमंत्री कार्यालय को त्यागकर दिल्ली आ गए। कांग्रेस से लकर जनता पार्टी के रास्ते जनता दल यूनाइटेड तक, सभी पार्टियों और पार्टी के नेताओं, चाहे वे आदमद के हों या घुटने और तलबे के कद के, सभी की तस्वीरें यहां दीवारों पर, पेड़ों  टहनियों पर लटके &#8211; लेकिन अंततः सभी का क्या हश्र हुआ, इस विषय पर एक पुस्तक लिखी जा सकती है। यह अभिशप्त इमारत है। मैं नहीं समझता कि 20 वर्ष तक मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठने के बाद नीतीश कुमार राज्यसभा में बैठकर कोई ऐतिहासिक कार्य कर देंगे। लेकिन यह भी तय है कि यह भवन जनता दल यूनाइटेड एक नेताओं को कितना संरक्षण देगा, यह कहना कठिन है। यदि इतिहास देखें तो संरक्षण नहीं दिया है, अतः इतिहास दोहराने की सम्भावना अधिक है। खैर।</strong> </p>
<p>अरविन्द सिंह कहते हैं कि यहां नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स का लंबे समय तक कार्यालय रहा है। आज भी उसका बोर्ड लटका है। इस भवन में जनता दल (यूनाइटेड), अखिल भारतीय सेवा दल (ऑल इंडिया सर्विसेज पार्टी) और इंडियन फ्रीडम फाइटर्स सक्सेसर्स ऑर्गनाइजेशन के ऑफिस भी हैं। सिंह का कहना है कि 1952 में पंडित नेहरू ने सोचा था की संसद के आस-पास कार्यालय होने से आम कार्यकर्ताओं के अलावे पार्टी को भी विचार-विमर्श करने का स्थान मिल जायेगा। यहाँ महात्मा गांधी भी आये हैं, नेहरू, पटेल और अन्य लोगों का भी आना-जाना तो होता ही था। जब पहला लोकसभा चुनाव हुआ था, जिसके कर्ताधर्ता लाल बहादुर शास्त्री थे, इसी भवन में बैठकर चुनाव संबधी रणनीति बनाये थे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7459" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>आज पुस्तकालय में प्रवेश के साथ अध्ययन कक्ष में सफेद दीवारों पर कांग्रेस के राष्ट्रवादी नेताओं की फ्रेम की हुई तस्वीरें लगी हैं जो इस बात का सबूत है कि उन दिनों यहाँ अलग-अलग विचारधारा वाले कई कांग्रेसी नेता, जिनमें नरमपंथी दादाभाई नौरोजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, कट्टरपंथी लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, एनी बेसेंट का सेल्फ-रूल गुट, चित्तरंजन दास, गोपाल कृष्ण गोखले, कंजर्वेटिव राजेंद्र प्रसाद, मदन मोहन मालवीय और गांधी, नेहरू, बोस, अबुल कलाम आज़ाद और पट्टाभि सीतारमैया जैसे दूसरे देशभक्त शामिल हैं, आते थे। आज इस भवन पर सरकार के अलावे, दिल्ली सल्तनत ही नहीं, भारत के अन्य राज्यों के बड़े-बड़े भू-माफियाओं का, बड़े-बड़े बिल्डरों की नजर टिकी है। </strong></p>
<p>लाइब्रेरी में 23,000 से ज़्यादा किताबें हैं, जिनमें पॉलिटिक्स, बायोग्राफी, इकोनॉमिक्स, स्वतंत्रता संग्राम और इतिहास से जुड़ी किताबें शामिल हैं। ओरिजिनल रिकॉर्ड का यह अनदेखा खजाना ही लाइब्रेरी को शहर की किसी भी दूसरी पब्लिक लाइब्रेरी से अलग बनाता है। लाइब्रेरी में रखे भाषणों का एडिट किया हुआ कलेक्शन, मशहूर नेताओं के लेटर, शोधकर्ताओं को सच में कीमती जानकारी देता है। लाइब्रेरी के आर्काइवल सेक्शन में 1929 से 1974 तक राष्ट्रीय कांग्रेस के सभी ओरिजिनल रिकॉर्ड पड़े हैं। इसमें कांग्रेस के सभी प्रेसिडेंट के भाषण, प्रस्ताव, अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठकों की कार्यवाही और कांग्रेस के बड़े नेताओं के भाषणों के 400 टेप शामिल हैं। इसके अलावा, कांग्रेस बुलेटिन का कलेक्शन और द जर्नल ऑफ़ इंडियन नेशनल कांग्रेस (1891-1921 के दौरान लंदन से पब्लिश हुआ) के 55 वॉल्यूम का एक सेट भी है, जो मॉडर्न इंडियन हिस्ट्री के किसी भी शोधकर्ता के लिए बहुत खुशी की बात होगी। लेकिन पुस्तकालय की दीवारों को, छतों को, अलमारी को, किताबों को, रखरखाव को देखकर मन दुःखी हो जाता है।  खैर, शायद यही प्रारब्ध है। </p>
<p>वैसे, सरदार वल्लभभाई पटेल स्मारक ट्रस्ट, प्रॉपर्टी का होल्डर होने का दावा करता है। इसमें दावा किया गया है कि 30 अप्रैल, 1977 को, इंडियन नेशनल कांग्रेस के उस समय के प्रेसिडेंट अशोक मेहता, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी और चार अन्य लोगों ने सरदार वल्लभभाई पटेल स्मारक ट्रस्ट के पक्ष में डीड बनाई थी, जिसमें 1959 में हुए समझौते के अनुसार सरकार से उस प्रॉपर्टी पर सुविधा पाने के अपने सभी अधिकार और हित ट्रांसफर कर दिए गए थे। सरदार पटेल के नाम पर बने एक ट्रस्ट द्वारा मैनेज की जाने वाली यह लाइब्रेरी गांधी, पटेल और आज़ादी की लड़ाई के दूसरे बड़े नेताओं के आदर्शों और सोच को बढ़ावा देने की कोशिश करती है। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-10.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-7460" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-10.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-10-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-10-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-10-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/Jan-10-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>अरविन्द सिंह का कहना है कि धर्म सिंह का बनाया घर बाद में कांग्रेस हेडक्वार्टर बना। कुछ सालों तक, यह नवाब अब्दुल हसन खान के पास था, लेकिन 1947 के बंटवारे के बाद जब नवाब पाकिस्तान चले गए तो यह खाली प्रॉपर्टी बन गई। यह भी कहा जाता है कि धर्म सिंह को राष्ट्रपति भवन, साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक बनाने के लिए धौलपुर, राजस्थान और आगरा से पत्थर सप्लाई करने का काम सौंपा गया था। शोभा सिंह ने धर्म सिंह के बंगले के बगल वाली ज़मीन पर अपना बंगला बनवाया, जो बाद में केरल हाउस बन गया। शोभा सिंह ने जंतर मंतर में अपने बंगले का डिज़ाइन वाल्टर जॉर्ज को सौंपा, जिन्होंने मिरांडा हाउस, सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी के सबसे पुराने हॉस्टल ग्वायर हॉल और सुजान सिंह पार्क को भी डिजाइन किया था। </p>
<p><strong>अरविंद कुमार सिंह कहते हैं कि “अगर नीतीश कुमार जनता दल यूनाइटेड को मिले जनादेश को कायम रखते तो इतिहास रचते। लेकिन जनादेश मिलने के बाद उन्होंने जो विश्वासघाती राजनीति प्रदेश के मतदाताओं से किए, ग़लत किये। मैं पिछले पांच और अधिक दशकों में बीच की राजनीति कई बार देखा हूँ। अनुग्रह नारायण सिन्हा मुख्यमंत्री बनने के लिए काफ़ी लॉबिंग किये, लेकिन बन नहीं पाए। यह अलग बात है कि आज बीजेपी कभी भी किसी भी राजनेता को, चाहे अपनी पार्टी का क्यों न हो, इतिहास लिखने नहीं देगा, शायद नीतीश कुमार भी उस चक्रव्यूह में फँस गए। कुछ तो कारण अवश्य है। लेकिन जब 7-जंतर-मंतर का यह इमारत देखता हूँ, तो यह स्पष्ट दिखता है कि यह भवन, यहाँ की मिट्टी इस बात का गवाह है कि यहाँ कोई ऊपर नहीं चढ़ा। अगर नीतीश कुमार राज्य सभा में पहली पंक्ति में भी बैठते हैं जहाँ सोनिया गांधी, मल्लिका अर्जुन, देवगौड़ा या फिर जेपी नड्डा बैठे हैं, उस राज्यसभा में वे क्या कर लेंगे? क्या बोलेंगे क्योंकि हरिवंश और आर सी पी सिन्हा पहले से मौजूद हैं। वैसी स्थिति में मौन द्रष्टा ही रह सकते हैं।” </strong></p>
<p>बहरहाल, नीतीश कुमार को अभी सात दिन भी नहीं हुए हैं बिहार के मुख्यमंत्री कार्यालय से निकले, यकीन मानिए बिहार के मतदाता, जनता दल यूनाइटेड के अनुयायी या फिर उनके पार्टी के लोग भले उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे हैं, यथार्थ यह है कि सभी उन्हें भूलकर अपना अपना रास्ता देख रहे हैं, मनन मंथन कर रहे हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्रदेश में आधिकारिक रूप से शराबबंदी कर समाजवादी धारा को मजबूत बनाया, लेकिन राजनीति के अंतिम वसंत में लोहिया के समाजवाद को उनकी तस्वीर के साथ दीवार पर लटका कर भाजपा के आदेशानुसार पटना से दिल्ली का प्रयास उन्हें राजनीति में कहीं का नहीं रखेगा। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/7-jantar-mantar-a-cursed-building">&#8220;​इतिहास गवाह है: 7-जंतर-मंतर पिछले 50 वर्षों में किसी का नहीं हुआ है, &#8216;अभिशप्त है यह इमारत&#8217;, नीतीश कुमार का भी नहीं होगा&#8221; &#8211; लिख लीजिये</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-1): &#8216;अन्वेषण और उत्खनन&#8217; के नाम पर बहुत बड़ा खेल, अधिकारियों की निगाहें &#8216;निदेशक&#8217; की कुर्सी पर, मिथिला के नेताओं की नजर &#8216;कोषागार&#8217; पर, कहानियां अख़बारों के पन्नों पर और इतिहास पर गोबर पाथने की परम्परा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Mar 2026 11:58:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[archeology]]></category>
		<category><![CDATA[balirajgrh]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[excavation]]></category>
		<category><![CDATA[mithila]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बाबू बरही (झंझारपुर)/दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: ये दो तस्वीरें काफी है बिहार के लोगों की मानसिकता को दर्शाने के लिए। आप माने या न माने, आपकी मर्जी। यह महज दो तस्वीरें नहीं है, बल्कि प्रदेश के लोगों की मानसिकता, चाहे वे शिक्षित हो, विद्वान हों, विदुषी हों, अशिक्षित हों, नेता हों, अभिनेता हो, समाजसेवी हो, अधिकारी हों, पदाधिकारियों [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/balirajgarh-a-big-game-in-the-name-of-exploration-and-excavation-part-1">बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-1): &#8216;अन्वेषण और उत्खनन&#8217; के नाम पर बहुत बड़ा खेल, अधिकारियों की निगाहें &#8216;निदेशक&#8217; की कुर्सी पर, मिथिला के नेताओं की नजर &#8216;कोषागार&#8217; पर, कहानियां अख़बारों के पन्नों पर और इतिहास पर गोबर पाथने की परम्परा</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बाबू बरही (झंझारपुर)/दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: ये दो तस्वीरें काफी है बिहार के लोगों की मानसिकता को दर्शाने के लिए। आप माने या न माने, आपकी मर्जी। यह महज दो तस्वीरें नहीं है, बल्कि प्रदेश के लोगों की मानसिकता, चाहे वे शिक्षित हो, विद्वान हों, विदुषी हों, अशिक्षित हों, नेता हों, अभिनेता हो, समाजसेवी हो, अधिकारी हों, पदाधिकारियों हों, ठेकेदारों हों, धनाढ़्य हों, दरिद्र हों, नेता हों, मंत्री हों । यह दो तस्वीरें प्रदेश के नेताओं और अधिकारियों की, खासकर जो सत्ता के गलियारे में स्वयं को शक्तिहीन होने से अनवरत बचाने का प्रयास करते हैं, का जीता-जागता दृष्टान्त है, आप मानें या नहीं मानें आपकी मर्जी। </strong></p>
<p>इन दो तस्वीरों में एक तस्वीर 11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने के क्रम में अंग्रेजों की गोलियों से मृत्यु को प्राप्त किये क्रांतिकारी राम गोविन्द सिंह के पैतृक घर का दीवार है। राम गोविन्द सिंह दशरथ्था (पटना जिला) गांव के रहने वाले थे और पुनपुन हाई स्कूल के नौवीं कक्षा के छात्र थे। पटना सचिवालय के सामने स्थित सात-मूर्ति में एक राम गोविन्द सिंह भी हैं। पटना के तत्कालीन जिलाधिकारी डब्ल्यू जी आर्चर ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने  आदेश दिया था।मुझे उम्मीद है बिहार के 90 से अधिक फीसदी लोग, युवापीढ़ी, इस नाम से परिचित नहीं होंगे। दीवारों की दशा की बात छोड़िये। दूसरी तस्वीर झंझारपुर लोकसभा क्षेत्र के बलिराजगढ़ ब्लॉक में स्थित मिथिला ही नहीं, बिहार ही नहीं, सम्पूर्ण राष्ट्र की संस्कृति से जुड़े और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन बलिराजगढ़ किले का दीवार है। दोनों बिहार में ही है और दोनों दीवारों पर गोबर पाथने की परंपरा कल भी था, आज भी है और कल भी जारी रहेगा। </p>
<p><strong>हो भी कैसे ? आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण भले बिहार में शैक्षिक दर 74+ फीसदी पर हस्ताक्षर करे, प्रदेश के शिक्षा विभाग के अधिकारी, मंत्री राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर बिहार से प्रवासित और पलायित लोगों की उपलब्धियों पर अपना ठप्पा और मुहर लगाकर, बिहारी है-बिहारी है, कहकर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को लुभाकर राशियों का आवंटन कराने में सफल हो जाए;  हकीकत में बिहार का शैक्षिक दर क्या है? महिला और पुरुषों के शैक्षिक दर के बीच कितने का फासला है? उनकी सोच के बीच कितना बड़ा खाई है? प्रदेश के इतिहास और ऐतिहासिक स्थलों का महत्व उनकी नज़रों में, चाहे नेता हों, अभिनेता हों, अधिकारी हो, पदाधिकारी हों, मतदाता हों, कितना है &#8211; इस बात का साक्षात् दृष्टान्त यह दो तस्वीरें हैं। आप मानें या नहीं। </strong></p>
<figure id="attachment_7407" aria-describedby="caption-attachment-7407" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7407" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7407" class="wp-caption-text">बलिराजगढ़ का प्रवेश द्वार और कुत्ता -तस्वीर: श्री राज झा</figcaption></figure>
<p>श्रीकृष्ण सिन्हा को छोड़ दीजिये, सन 1961 से 2026 तक, विगत 65 वर्षों में बिहार का मुख्यमंत्री कार्यालय और कक्ष में 21 व्यक्तियों &#8211; बिनोदानंद झा, कृष्ण बल्लभ सहाय, महामाया प्रसाद सिन्हा, सतीश प्रसाद सिंह, बीपी मंडल, भोला पासवान  शास्त्री,हरिहर सिंह, दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर, केदार पांडे, अब्दुल गफूर, जगन्नाथ मिश्र, राम सुन्दर दास, चंद्रशेखर सिंह, बिंदेश्वरी दुबे, भागवत झा &#8216;आज़ाद&#8217;, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, जीतनराम मांझी और नीतीश कुमार &#8211; को कक्ष में आते, मंत्रिमंडल बनाते, फिर जाते देखा है। अपवाद को छोड़कर, किसी का भी, चाहे मुख्यमंत्री हों या मंत्रिमंडल के लोग, प्रदेश की ऐतिहासिक गरिमा को बचाने, सुरक्षित और संरक्षित रखने में &#8216;निजी अभिरुचि&#8217; नहीं दिखा। </p>
<blockquote><p>&#8216;आधिकारिक अभिरुचि&#8217; के अनेकानेक कारण हो सकते हैं। प्रदेश की राजनीतिक गलियारे में अपने-अपने वजूद को कायम रखने के लिए तमाम लोगों ने, कुछ मंच से, तो कुछ नेपथ्य से, वे सभी कार्य किये जिसकी जरुरत नहीं थी, जहाँ तक प्रदेश के विकास का, वजूद का सवाल था, और आज भी है। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो आज बाबूबरही विधानसभा क्षेत्र और झंझारपुर लोकसभा क्षेत्र में आने वाला बलिराजगढ़ भी नालंदा, राजगीर, पावापुरी, बोधगया, विक्रमशिला जैसे स्थानों की सूची में दर्ज होता। </p></blockquote>
<p>बाबूबरही विधान सभा क्षेत्र से 1977 से 2024 तक नौ विधायक चुनकर प्रदेश के विधानसभा की कुर्सी पर बैठे। उसी तरह झंझारपुर लोकसभा क्षेत्र से 1971 से 2024 तक नौ सांसद चुनकर गए। यह क्षेत्र मिथिला का क्षेत्र हैं जहाँ आज़ादी के बाद अभी तक शैक्षिक-दर मगध और भोजपुर क्षेत्र के शैक्षिक दरों से न्यूनतम नौ फीसदी कम है। मिथिला में जहाँ सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 55.18 फीसदी शैक्षिक दर है, वहीँ भोजपुर में 66.19 फीसदी और मगध में 64.92 फीसदी है। </p>
<p>बिहार के 38 जिलों से प्रदेश के विधानसभा में बैठने वाले कुल 243 विधायकों में 130-135 सम्मानित विधायकगण गंगा के उस पार, यानी मिथिला क्षेत्र से आते हैं; जबकि देश के संसद में बिहार से आने वाले 40 सांसदों में 24-25 सांसद मिथिला क्षेत्र से ही हैं। अब सवाल यह है कि जब ये सम्मानित विधायक और सम्मानित सांसदगण &#8216;जनहित&#8217; से अधिक &#8216;स्वहित&#8217; में विश्वास रखते हों, फिर बाबूबरही ब्लॉक स्थित बलिराजगढ़ ऐतिहासिक स्थल का यह हश्र होना, लाजिमी है। </p>
<p>विगत दिनों भारत के विज्ञापन-जगत के हस्ताक्षर और मधुबनी के विख्यात पत्रकार राज झा, जो बलिराजगढ़ का भ्रमण किये थे, उनके यह शब्द सम्पूर्ण गाथा का निचोड़ है। उन्होंने कहा: अभी वहां कुछ भी नहीं है। धूल उड़ रही है। चारो तरफ मिट्टी का पहाड़ है। बीच-बीच में खोदा हुआ है। कुछ दिखता नहीं है। थोड़ा बहुत ईंट पत्थर दीखता हैं। लोग क्रिकेट खेलने, गाय भैंस चराने, गाय-बैल-भैंस को नहलाने, गाडी धोने के लिए तालाब का इस्तेमाल करते हैं। हालाँकि बॉउण्टरी वाल है, लेकिन कई जगह से टूटी हुयी है। एक गेट है उसमें ताला लगा है और बंद है, जहाँ पुरातत्व का साइन बोर्ड लगा हुआ है। बाकी जगह से भी प्रवेश है। मंन्दिर के पास से आप प्रवेश कर सकते हैं। अंदर गए थे। उबड़ खाबड़ है। लोगों का कहना है कि खुदाई को रातो रात बंद कर दिया गया था। उसमें क्या मिला था, या नहीं मिला था लोगों को नहीं मालूम। मिटटी उबड़ खाबड़ है, समतल से बंद नहीं किया गया है। स्थानीय लोगों को कुछ भी जानकारी नहीं है इसके बारे में।&#8221; खैर। </p>
<figure id="attachment_7408" aria-describedby="caption-attachment-7408" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1437" class="size-full wp-image-7408" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-300x168.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-1536x862.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7408" class="wp-caption-text">बलिराजगढ़ परिसर में दशकों पहले हुए उत्खनन से बने तालाब, तालाब में जमा पानी और पानी में नाहते भैंस।  इससे बेहतर स्थिति नहीं हैं बिहार में ऐतिहासिक पुरातत्वों की। दुःखद। तस्वीर: श्री राज झा</figcaption></figure>
<p><strong>पिछले दिनों जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भारत सरकार के अन्वेषण और उत्खनन विभाग, धरोहर भवन, नई दिल्ली के  पत्रांक F.No. T-17033/9/2020-EE (13926)/26 फरवरी, 2026  में बिना किसी दीर्घकालीन स्थिरता वाली परियोजना बनाये भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक ने मंज़ूरी दी, साथ ही यह भी कहा कि यह मंज़ूरी इस पत्र के जारी होने की तारीख से एक साल के लिए वैद्य है, मन में सैकड़ों सवालों का उठना स्वाभाविक सा लगा। सबसे पहले यह लगा कि &#8220;कहीं यह आदेश सांकेतिक और राजनीतिक लाभ के लिए तो नहीं है ?&#8221; शायद बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि डॉ. हरिओम शरण जो अभी सुपरिन्टेन्डेन्ट आर्कियोलॉजिस्ट हैं, निदेशक की कुर्सी पर नजर लगाए हैं। लोगों का यह भी कहना है कि शायद बलिराजगढ़ के अवशेषों की खुदाई उनके प्रोफ़ाइल में एक ईंट का कार्य करेगा। </strong></p>
<p>पत्र में लिखा गया: &#8220;आर्कियोलॉजिकल वर्क्स कोड के पैरा 12.9.1 के तहत, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक की मंज़ूरी दी जाती है। यह मंजूरी बिहार के मधुबनी ज़िले के बलिराजगढ़ में राजा बलि का गढ़ नाम से मशहूर पुराने किले के अवशेषों पर खुदाई करने के लिए है। खुदाई की जाने वाली जगह को साथ में दिए गए साइट प्लान पर लाल रंग से मार्क किया गया है।</p>
<p>यह खुदाई डॉ. हरिओम शरण, सुपरिंटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, पटना सर्कल के डायरेक्शन में की जाएगी। आर्कियोलॉजिकल वर्क्स कोड के पैरा 12.9.1 से 12.15 के अनुसार, जहाँ भी ज़रूरत हो, खर्च की मंज़ूरी ली जा सकती है। खुदाई के दौरान मिली पुरानी चीज़ों की पूरी लिस्ट इस ऑफिस को दी जानी चाहिए। ऑफिसर को इस बारे में समय-समय पर जारी नियमों और निर्देशों का सख्ती से पालन करना चाहिए। खुदाई के नतीजों की एक डिटेल्ड रिपोर्ट फील्डवर्क पूरा होने के तीन महीने के अंदर डायरेक्टर जनरल को जमा करनी होगी। खुदाई का काम कब शुरू किया जाए और कब बंद किया जाए, इसकी जानकारी इस ऑफिस को दी जा सकती है। यह मंज़ूरी इस लेटर के जारी होने की तारीख से एक साल के लिए वैलिड है।&#8221; </p>
<blockquote><p>आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी, लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आला अधिकारी भी इस बात को स्वीकार करेंगे जिस आनन्-फानन में, बिना किसी दीर्घकालीन स्थिरता वाली परियोजना पर अध्ययन किये अन्वेषण और उत्खनन विभाग द्वारा यह पत्र निर्गत किया गया, &#8216;राजनीति से प्रेरित&#8217; है। यह आदेश किसी &#8216;अदृश्य इरादे&#8217; से भी निर्गत किया गया हो, नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है । भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में अधिकारीगण सिर्फ &#8216;ऊपर के आदेश&#8217; को मानते हैं और ऊपर का आदेश कहाँ से आता है, कब आता है &#8211; यह सभी जानते हैं। </p></blockquote>
<p>भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कार्यालय में &#8216;अपवाद को  छोड़कर&#8217;, शायद ही कोई अधिकारी हैं जो वास्तविक रूप से इन अन्वेषण और उत्खनन में विश्वास रहते हैं। सभी (अपवाद छोड़कर) की निगाहें &#8216;निदेशक&#8217; बनने अथवा अवकाश प्राप्ति से पूर्व सुरक्षित और सुसज्जित पदों पर आसीन होने का स्वप्न होता है। अब सवाल यह है कि अगर उत्खनन का आदेश बिना किसी दीर्घकालीन स्थिरता वाली परियोजना बनाये ही जारी किया गया है तो यकीन मानिये, यह राजनीति ही है मिथिला की भूमि के साथ। क्योंकि मिथिला क्षेत्र से राजनीतिक गलियारे में धोती सिटने वाले या फिर रंग-बिरंगे पाग पहनने वाले मिथिला की संस्कृति और गरिमा को बचाने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को तैयार करने के लिए करते हैं। </p>
<figure id="attachment_7409" aria-describedby="caption-attachment-7409" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7409" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7409" class="wp-caption-text">बलिराजगढ़ अवशेष : तस्वीर &#8211; राज झा</figcaption></figure>
<p>इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते हैं कि इस मद में कई सौ करोड़ राशि सरकारी खजाने से निकल जाय और बलिराजगढ़ में अब तक हुए चार खुदाइयों जैसा ही पाँचवाँ भी हो, और फिर मिट्टी से ढंक दिया जाय। विश्वास नहीं हो तो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आला अधिकारियों से पूछकर देखिये, मांगकर देखिये की पिछले एक-डेढ़ दशक में बिहार में सम्पन उत्खनन और एंटिक्विटी की उपलब्धिता से सम्बंधित कार्यों का प्रतिवेदन प्रकाशित हुआ है या नहीं? उत्तर ना ही मिलेगा। यकीन नहीं होता तो देश में 2022-2023/2023-2024/2024-2025 में सरकारी खजाने से केंद्रीय संरक्षित स्मारक/स्थल के संरक्षण और रखरखाव (अन्वेषण और उत्खनन नहीं) पर कितना आवंटन हुआ और क्या खर्च हुआ। </p>
<p><strong>विगत दिनों (12 फरवरी, 2026) केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने राज्यसभा में लिखित उत्तर बताया कि देश भर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधीन 3686 केंद्रीय संरक्षित स्मारक/स्थल हैं। इनके संरक्षण एवं रखरखाव की नियमित प्रक्रिया है जो राष्ट्रीय संरक्षण नीति के अनुसार स्मारक/स्थलों की आवश्यकता और संसाधनों की उपलब्धता के अनुसार की जाती है। पिछले तीन वर्षों के दौरान इन स्मारक/स्थलों के लिए 2022-23 में 392.71 करोड़ का आवंटन (खर्च: 391.93 करोड़),  2023-24 में 443.53 का आवंटन (खर्च:  443.53 अरोड रूपए)  और 2024-25 में 313.43 करोड़ रुपये का आवंटन (खर्च: 313.04 करोड़ रूपये) हुआ। खैर। </strong></p>
<p>वैसे, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का इतिहास भारत के पुराने अतीत को बचाने की कहानी है, जो इसके औपचारिक रूप से बनने से बहुत पहले 1784 शुरू हुई थी। भारत के इतिहास को सही तरीके से पढ़ने की दिशा में पहला कदम सर विलियम जोन्स ने 1784 में उठाया था। उन्होंने कलकत्ता में एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना की। इस ग्रुप ने संस्कृत और फ़ारसी में पुराने ग्रंथों की पढ़ाई को बढ़ावा दिया। 1837 में एक बड़ी कामयाबी मिली जब जेम्स प्रिंसेप ने पुरानी ब्राह्मी लिपि को सफलतापूर्वक समझ लिया। इससे चट्टानों और खंभों पर लिखे पुराने लेखों को पढ़ना मुमकिन हो गया। सं 1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना स्थापना हुई। </p>
<figure id="attachment_7410" aria-describedby="caption-attachment-7410" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7410" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7410" class="wp-caption-text">बलिराजगढ़ अवशेष : तस्वीर &#8211; राज झा</figcaption></figure>
<p>यह कहा जाता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की औपचारिक स्थापना एक आदमी की पूरी कोशिशों का नतीजा थी। इसे अलेक्जेंडर कनिंघम ने शुरू किया था। वह एक ब्रिटिश आर्मी इंजीनियर थे जिन्हें आर्कियोलॉजी में बहुत दिलचस्पी थी। कनिंघम कई सालों से ज़रूरी बौद्ध जगहों का सर्वे कर रहे थे। उन्हें एहसास हुआ कि इस काम की देखरेख के लिए एक परमानेंट सरकारी संस्था की ज़रूरत है। वह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले डायरेक्टर-जनरल बने।</p>
<p><strong>वित्त की कमी की वजह से 1865 और 1871 के बीच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कुछ समय के लिए बंद हो गया था। लेकिन, भारत के वायसराय लॉर्ड लॉरेंस ने 1871 में सर्वे को फिर से शुरू किया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को बनाने में अहम भूमिका के लिए अलेक्जेंडर कनिंघम को अक्सर &#8216;इंडियन आर्कियोलॉजी का पिता&#8217; कहा जाता है। 1902 के सदी की शुरुआत में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को नई अहमियत और ताकत मिली। 1902 में, लॉर्ड कर्जन ने डायरेक्टर-जनरल का पद फिर से बहाल किया, जो पुराने स्मारकों को बचाने में पक्का यकीन रखते थे। सर जॉन मार्शल को 1902 में डायरेक्टर-जनरल बनाया गया। उन्होंने खुदाई और बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाली टेक्निक को मॉडर्न बनाया। मार्शल के समय की सबसे बड़ी कामयाबी 1921 और 1922 के बीच हड़प्पा और मोहनजो-दारो जैसी सिंधु घाटी सभ्यता की जगहों की खोज थी। इस खोज ने भारत के पुराने इतिहास की समझ को पूरी तरह से बदल दिया। बाद में, 1940 के दशक में, मॉर्टिमर व्हीलर ने भारत में आर्कियोलॉजी के लिए और ज्यादा साइंटिफिक तरीके शुरू किए।</strong></p>
<p>आज़ादी के बाद, सरकार ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को एक सही कानूनी ढांचा दिया। 1958 में, प्राचीन स्मारक और आर्कियोलॉजिकल साइट और अवशेष एक्ट (AMASR एक्ट) पास हुआ। इस एक्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को पूरे देश में सांस्कृतिक विरासत वाली जगहों को आधिकारिक तौर पर बचाने और सुरक्षित रखने की ताकत दी। आज, ASI संस्कृति मंत्रालय के तहत अपना काम जारी रखे हुए है, और UNESCO वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स समेत हज़ारों जगहों को मैनेज कर रहा है।</p>
<p>बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब देश का प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने 12 जुलाई 2018 को नई दिल्ली के तिलक मार्ग पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नए मुख्यालय &#8211; धरोहर भवन का उद्घाटन किया। उन्होने कहा भी कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने पिछले लगभग 150 सालों में बहुत बड़ा काम किया है। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री ने इतिहास और समृद्ध पुरातत्व विरासत पर गर्व करने के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि लोगों को अपने कस्बों, शहरों और इलाकों के स्थानीय इतिहास और पुरातत्व के बारे में जानने में आगे आना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्थानीय पुरातत्व के पाठ स्कूल के सिलेबस का हिस्सा बन सकते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भारत में आर्कियोलॉजी के लिए सबसे बड़ा संगठन है। यह देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की देखरेख करती है। यह देश भर में 3,600 से ज़्यादा स्मारकों और ऐतिहासिक जगहों की देखभाल करता है, जिन्हें राष्ट्रीय महत्व का माना जाता है। </p>
<figure id="attachment_7411" aria-describedby="caption-attachment-7411" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7411" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7411" class="wp-caption-text">बलिराजगढ़ : तस्वीर &#8211; राज झा</figcaption></figure>
<p>वापस फिर बलिराजगढ़ चलते हैं। कोई 61 वर्ष पहले रघुबीर सिंह के नेतृत्व में सर्वे के मिड-ईस्टर्न सर्कल ने एस. मुखेरी की मदद से दरभंगा से 80 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में बलिराजगढ़ में छोटे पैमाने पर खुदाई की। चार कटिंग की गईं, दो-दो डिफेंस-वॉल के आर-पार और दो-दो हैबिटेशन-एरिया में। इलाके में वॉटर-टेबल ज़्यादा होने की वजह से, कुदरती मिट्टी तक नहीं पहुँचा जा सका। फिर भी, खुदाई से किले की बनावट की डिटेल्स पर रोशनी पड़ी। डिफेंस-वॉल (प्लस X A) में मिट्टी-ईंटों का कोर था जिसके ऊपर ईंटों का कवर था, बाहरी कवर अंदर वाले कवर से चार गुना चौड़ा था। दीवार टूटी-फूटी थी और नीचे 5.18m और ऊपर 3-65m चौड़ी थी। मरम्मत समेत कंस्ट्रक्शन के तीन फेज़ पहचाने गए। सबसे शुरुआती फेज़ में मिट्टी की ईंटों का कोर (pl. XB) था, जिस पर पक्की ईंटों की दीवारें थीं, जिसके बाहरी हिस्से की चौड़ाई मिट्टी के प्लेटफॉर्म से लगभग तीन गुना थी, जिसमें मिट्टी के टुकड़े मिले हुए थे, जो किले के अंदरूनी हिस्से के सामने बने थे। भारी बाढ़ के कारण मज़बूती की ज़रूरत पड़ी, जैसा कि गाद के जमाव से पता चलता है। बचाव से पहले के जमाव से, उत्तरी काले पॉलिश किए हुए बर्तनों के टुकड़े मिले थे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA.jpg" alt="" width="2047" height="1150" class="aligncenter size-full wp-image-7412" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>ऐसा लगता है कि किलेबंदी दूसरी सदी B.C. में कहीं बनाई गई थी और पाल काल तक इस्तेमाल में रही; जुड़े हुए लेवल से मिली दूसरी चीज़ों में मोती, सिक्के, शुंग टेराकोटा पट्टिकाएँ (pl. XI), हड्डी की चीज़ें वगैरह शामिल थीं; इसके अलावा, साइट के अलग-अलग हिस्सों में BRG-2 से BRG-4 लेबल वाली तीन और कटिंग भी की गईं। इनमें से BRG-2 एक डंप पाया गया और उसमें कोई कब्ज़ा जमा नहीं था, लेकिन इस इलाके से सुंदर टेराकोटा पट्टिकाएँ मिलीं। BRG-3 में एक मंदिर के अवशेष मिले और BRG-4, जो दक्षिणी सुरक्षा पर था, ने BRG-1 जैसी ही जानकारी दी। बेड-रॉक; पीली मिट्टी, कंकड़-पत्थर के साथ मिली हुई; बोल्डर-जमाव; और लाल मिट्टी। उन्हें नदी के तल से शुरुआती पाषाण युग के कुछ औज़ार मिले, साथ ही पीली मिट्टी और ऊपर पड़े पत्थरों के अलग-अलग हिस्सों से भी। इसके अलावा, भीम-का-बांध और रेहाना जैसे आस-पास के इलाकों से भी मध्य और बाद के पाषाण युग के औज़ार इकट्ठा किए गए। इसके अलावा, रिंग या हैमर-स्टोन के दो टुकड़े और एक छोटे साइज़ का पॉलिश किया हुआ सेल्ट भी मिला। यह बात 61 साल पहले की है। </p>
<blockquote><p>बहरहाल, तिलक मार्ग के नुक्क्ड़ पर स्थित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के कार्यालय में बिहार के नेताओं को लेकर, जो इस प्रकरण के साथ राजनीतिक लाभ उठा रहे हैं, पर चर्चाएं आम हो रही हैं। कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि मिथिला के एक सांसद को तो यह भी मालूम नहीं था कि बलिराजगढ़ मिथिला में कहाँ है ? वे किसी भी विषय को लिखकर मांगते हैं और मंच पर उसे पढ़कर वाह-वाही लूटने में, ताली बजबाने में और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ तस्वीर &#8216;कपड़े पर बिना किसी सिकुड़न के&#8217; फोटो खिंचवाने पर कोई कसर नहीं छोड़ते। लोगों का तो यह भी कहना है कि संस्कृति मंत्रालय, बिहार के उच्च नेताओं, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आला अधिकारियों के बीच एक बड़ा खेल चल रहा है। बलिराजगढ़ उत्खनन इ नाम पर प्रचुर मात्रा में पैसा तो खर्च किया जायेगा (कागज पर) और अंततः इसका भी वही हश्र होगा जो पिछले चार उत्खनन में हुआ है।&#8221; &#8230;&#8230;.. </p></blockquote>
<p><strong>आगे जारी भाग-2 </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/balirajgarh-a-big-game-in-the-name-of-exploration-and-excavation-part-1">बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-1): &#8216;अन्वेषण और उत्खनन&#8217; के नाम पर बहुत बड़ा खेल, अधिकारियों की निगाहें &#8216;निदेशक&#8217; की कुर्सी पर, मिथिला के नेताओं की नजर &#8216;कोषागार&#8217; पर, कहानियां अख़बारों के पन्नों पर और इतिहास पर गोबर पाथने की परम्परा</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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