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	<title>begusarai Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>मिथिला के लोग &#8216;पिछलग्गू&#8217; भी रहते हैं और &#8216;अलग राज्य भी मांगते&#8217; हैं, काश !! दिनकर वाला &#8216;हुंकार&#8217; गंगा-कोसी-बागमती-कमला-बलान-बूढ़ी गंडक-महानंदा पार से उठता</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-people-of-mithila-remain-followers-and-demand-a-separate-state</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Dec 2024 13:30:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सिमरिया (बेगूसराय) : अस्सी के दशक में बेगूसराय के लोगों का ‘अपना’, बुजुर्ग और विधवाओं का ‘बेटा’, ‘शोषितों का &#8216;न्यायकर्ता’ कामदेव सिंह का शरीर पार्थिव हो गया था। छल्ली-छल्ली हो गया था जीवित शरीर पार्थिव होने और गंगा में समाहित होने से पहले। कहते हैं होशियारपुर के सांसद, तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की चहेते [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-people-of-mithila-remain-followers-and-demand-a-separate-state">मिथिला के लोग &#8216;पिछलग्गू&#8217; भी रहते हैं और &#8216;अलग राज्य भी मांगते&#8217; हैं, काश !! दिनकर वाला &#8216;हुंकार&#8217; गंगा-कोसी-बागमती-कमला-बलान-बूढ़ी गंडक-महानंदा पार से उठता</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सिमरिया (बेगूसराय) : अस्सी के दशक में बेगूसराय के लोगों का ‘अपना’, बुजुर्ग और विधवाओं का ‘बेटा’, ‘शोषितों का &#8216;न्यायकर्ता’ कामदेव सिंह का शरीर पार्थिव हो गया था। छल्ली-छल्ली हो गया था जीवित शरीर पार्थिव होने और गंगा में समाहित होने से पहले। कहते हैं होशियारपुर के सांसद, तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की चहेते और भारत के तत्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह के तथाकथित &#8216;निर्देश&#8217; पर पटना सचिवालय में हलचल मचा था। सातवें और आठवें विधान सभा का कालखंड था और मुख़्यमंत्रीद्वय रामसुंदर दास &#8211; जगन्नाथ मिश्र &#8211; दिल्ली के आलाकमान द्वारा एक चक्रव्यूह रचा गया था जिसके केंद्र में कामदेव सिंह थे और चतुर्दिक केंद्रीय रिज़र्व पुलिस और बेगुसराय पुलिस की गोली। </strong></p>
<p>जिस दिन यह ह्रदय विदारक घटना हुई थी बेगूसराय के सिमरिया के श्री ननुआ काका यानी राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर बहुत याद आये थे। गंगा तट के लोग चाहे वे किसी भी जाति थे, किसी भी वर्ग के थे, किसी भी संप्रदाय के थे, किसी भी राजनीतिक पार्टी &#8211; कांग्रेस, सोसलिस्ट, कम्युनिस्ट, शोषित, जनता, जनक्रांति, भूमिगत &#8211; से अपना संबंध रखते थे, श्री ननुआ काका को बहुत याद कर रहे थे। सत्ता और सत्ता वाला अधिकार, चाहे वह बन्दुक की नली से ही क्यों न निकलती हो, आवाम को लहू-लहुआन क्यों न करती हो, झूठी आशा और विश्वास का बाँध क्यों न बांधती हो &#8211; श्री ननुआ काका उन खेलों और खिलाड़ियों को भलीभांति जानते थे, पहचानते थे। कामदेव सिंह भले तत्कालीन शासन, प्रशासन, नेता, राजनीतिक अभिनेता के लिए &#8216;कानून-व्यवस्था&#8217; का &#8216;विषय&#8217; बन गए हों और उन्हें &#8216;राजनीति की वेदी&#8217; पर &#8216;वली&#8217; चढ़ना पड़ा हो, हकीकत तो यही था कि वे अपने क्षेत्र के लोगों के लिए &#8216;मसीहा&#8217; थे, &#8216;दुःखहर्ता&#8217; थे, जैसे श्री ननुआ काका शब्दों के कुरुक्षेत्र के नायक थे। </p>
<p>अस्सी के दशक के कुछ वर्ष पूर्व मटिहानी गाँव में एक नरसंहार हुआ था। करीब 17 अल्प आयु के पुरुषों को मौत के घाट उतारा दिया गया था। यह अलग बात थी कि मटिहानी हत्याकांड में कामदेव सिंह को मुख्य अभियुक्त करार किया गया था, लेकिन उस कालखंड में जब गंगा नदी के तराई क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति को याद करता हूँ तो बेगूसराय से निकलता राष्ट्रीय राजमार्ग 31 किसी महिला के मांग जैसा लगता था। मार्ग के दोनों तरफ जितनी दूर तक नजर जा पाती थी, अरहर दाल के हरे-हरे पौधे या फिर हरी-हरी, लाल-लाल मिर्ची की खेती दिखती थी। लगता था गंगा क्षेत्र के श्रमिकों, किसानों ने अपने लिए लाल और हरे रंग का गलीचा बिछा रहा है &#8211; अपने श्रम के सम्मान में। </p>
<p>भारत ही नहीं, विश्व के बाजार में बेगूसराय का अरहर दाल और मिर्ची विख्यात ही नहीं, कुख्यात भी थी। अरहर दाल जितनी जल्दी पकती थी, मिर्च का तीखापन उतना ही जानलेवा होता था। स्थानीय किसानों का, भू-स्वामियों का एक बहुत बड़ा जरिया था आर्थिक रूप से मजबूत होने का वह अरहर दाल और लाल-हरी मिर्ची। उधर, उन्हीं मिट्टी के एक किनारे बसा सिमरिया से दिनकर की कविताओं का तेज भी हुंकार मारता था। वैसे उस कालखंड तक दिनकर का सूर्यास्त हो गया था, लेकिन नए युग के नए कवि गंगा तट पर शब्दों का नाव चलाना शुरू कर दिए थे। दिनकर का शरीर हृदयगति अवरुद्ध होने के कारण पार्थिव हुए महज छः वर्ष बीते थे, जबकि बेगूसराय का मसीहा कामदेव सिंह पुलिस की गोली से ढ़ेर हुआ था। दिनकर अपने गाँव से हज़ारों मिल दूर दक्षिण भारत में प्राण त्यागे थे, जबकि कामदेव सिंह अपनी भूमि की मिट्टी और पानी में अंतिम सांस लिए थे। </p>
<p>कहते हैं बेगूसराय जिले में स्थित सिमरिया गांव में 23 सितंबर 1908 को बाबू रवि सिंह और श्रीमती मनरूप देवी के घर में जन्म लिया श्री ननुआ काका जो बाद में भारत के साहित्यिक ब्रह्माण्ड पर रामधारी सिंह &#8216;दिनकर&#8217; के नाम से विख्यात हुए, भारतीय राजनीतिक गलियारे में स्वहित में लोगों ने उनकी लेखनी और कविताओं का भरपूर विपरण किया, लेकिन उनके शरीर को पार्थिव होने के पांच दशक बाद भी वह कुछ नहीं हो पाया जिसके लिए उन्होंने लिखा था: </p>
<p>सदियों की ठण्डी-बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;<br />
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ।</p>
<p>आज़ादी के महज़ तीन वर्ष बाद सन 1950 में &#8216;सिंहासन खाली करो की जनता आती है,&#8217; ​जिस वर्ष इस कविता की रचना किये थे दिनकर जी मैं नौ वर्ष बाद सन 1959 में जन्म लिया था। प्रारब्ध देखिये जब सात-आठ वर्ष का हुआ, मेरा शरीर पटना के मछुआटोली स्थित दिनकर भवन के छांव में आ गया। जिस गली के नुक्कड़ पर दिनकर भवन आज भी स्थित है, उसी गली के की अगली छोड़ से पूर्व दाहिने हाथ अपने जीवन का बुनियादी समय के साथ-साथ पत्रकारिता-जीवन की शुरुआत और पटना से प्रवास तक बिताया। वह गली आज भी मानस पटल पर उद्धृत है। खैर। </p>
<p>​पचास के दशक में देश में सामंतवादी मानसिकता भारत के समाज को जकड़े हुए था। शायद दिनकर इस कविता के शब्दों का चयन करते समय, शब्दों का वाक्य में विन्यास करते समय यह सोचे होंगे कि आज़ादी के बाद देश के ​जनता को न केवल सत्ता में भागीदारी मिलेगा, बल्कि उनकी दरिद्री भी ख़त्म हो जाएगी, उन्हें देश के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक विकास में भागीदारी भी मिलेगा । लेकिन &#8216;जनता&#8217; तो उस दिन भी मिट्टी की मूरत थी, आज तो है ही। तभी तो उन्होंने लिखा उस कविता में :  </p>
<p><strong>जनता ? हाँ, मिट्टी की अबोध मूरतें वही, जाड़े-पाले की कसक सदा सहने वाली,<br />
जब अँग-अँग में लगे साँप हो चूस रहे, तब भी न कभी मुँह खोल दर्द कहने वाली । </strong></p>
<p>गलत नहीं थे दिनकर। कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, हुंकार, संस्कृति के चार अध्याय, परशुराम की प्रतीक्षा, हाहाकार रचनाएं दिनकर के नाम के साथ युग-युगांतर तक जीवित रहेगा। कहते हैं कि कोई 22-वर्ष की आयु में जब देश में महात्मा गांधी की अगुआई में सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारम्भ हुआ था, बेगूसराय का ​श्री नेनुआ​ काका कलम के साथ आंदोलन में कूद ​पड़े और देखते-ही देखते अंग्रेजी शासन के ​विरुद्ध विद्रोह और ओजस्वी शब्दों तथा स्वरों के साथ कविताओं की रचना करने लगे। हिंदी साहित्य के ब्रह्माण्ड पर बेगूसराय का श्री ननुआ काका यानी रामधारी सिंह &#8216;दिनकर बनकर उदयमान होने ​लगे। इसे प्रारब्ध ही कहेंगे कि पटना के दिनकर भवन के सामने गली की नुक्कड़ पर &#8216;उदयलाचल&#8217; छापाखाना भी था, फिर श्री छविनाथ पण्डे का घर। उधर दिनकर भवन के आगे पटना विश्वविद्यालय के तत्कालीन हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. रामखेलावन राय का आवास और उनके सामने श्री तारा नन्द झा का मकान, जहाँ मैं सांस लेता था। </p>
<p>आज़ाद भारत में पहली बार आम चुनाव होने जा रहा था और दिनकर की कवितायेँ भारत के आम लोगों को ​ढूंढ रहा था।​ तबकी बात कुछ और थी, आज तो &#8216;आम आदमी&#8217; का दल बन गया है दिल्ली में, भले दिल्ली सल्तनत में आम आदमी आज भी राजनेताओं, अधिकारियों के तलवे तले रौंदे जाएँ। दिनकर ने लिखा भी:</p>
<p><strong>जनता? हाँ, लम्बी-बडी जीभ की वही कसम,&#8221;जनता,सचमुच ही,बडी वेदना सहती है।&#8221;<br />
&#8220;सो ठीक, मगर, आखिर, इस पर जनमत क्या है ?&#8221; &#8216;है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है ?&#8221;</strong></p>
<p>​बहरहाल, पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को दिनकर की रचनाएँ काफी पसंद थी। दिनकर की रचनाओं में, शब्दों में &#8216;हुंकार&#8217; तो था ही, &#8216;आकर्षण&#8217; भी था तभी तो दिनकर और नेहरू दोनों एक दूसरे के पास आये। नेहरू उन्हें राजनीति में ले आये और सन 1952 में रामधारी सिंह दिनकर को राज्यसभा सांसद के रूप में विराजमान हुए। दिनकर और दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ. कामेश्वर सिंह दोनों एक ही कालखंड में राज्यसभा के सदस्य बने। आज की राजनीतिक व्यवस्था में चाहे नेहरू की कितनी भी आलोचना की जाय, दिनकर की रचनाओं और शब्दों के प्रति नेहरू की सहनशीलता उत्कर्ष पर थी। तभी तो दिनकर सत्ता में रहने के बाद भी अपने लाखों-लाख शब्दों का इस कदर विन्यास किये जो प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से नेहरू की सत्ता का छिलका निकलता था। </p>
<p><strong>मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं, जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;<br />
अथवा कोई दूधमुँही जिसे बहलाने के, जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में ।</strong></p>
<p>यह भी कहा जाता है कि एक बार दिल्ली में हो रहे एक कवि सम्मेलन में पंडित नेहरू भी आए और कार्यक्रम की ओर पढ़ रहे थे तभी उनके पैर लड़खड़ा गए। दिनकर उनके साथ चल रहे थे। अपने मित्रवत प्रधानमंत्री को लड़खड़ाते देखे उन्होंने उन्हें संभाले। दिनकर को जैसे ही नेहरू ने धन्यवाद दिए, दिनकर का जवाब हाज़िर था: &#8220;जब जब सत्ता लड़खड़ाती है तो साहित्य ही उसे संभालता है।&#8221; </p>
<p>भारतीय इतिहास और संस्कृति पर दिनकर द्वारा रचित पुस्तक &#8220;संस्कृति के चार अध्याय की प्रस्तावना खुद पंडित नेहरू ने लिखी थी। जिसमें उन्होंने लिखा था: &#8220;मेरे मित्र और साथी दिनकर ने जो विषय चुना है, वह बहुत ही मोहक और दिलचस्प है। यह ऐसा विषय है जिससे अक्सर मेरा मन भी ओत-प्रोत रहा है और मैंने जो कुछ भी लिखा है, उस पर इस विषय की छाप अपने आप पड़ गई है। साहित्य की लगभग सभी विधाओं में उनकी लेखनी खूब चली। उनकी कविताओं में ओज, आक्रोश, विद्रोह, क्रान्ति ही नहीं, कोमल शृंगारिक भावनाओं का भी खूबसूरत संयोजन दिखता है।&#8221; उर्वशी रचना में दिनकर का यह रूप दिखता है। वैसे नेहरू की पुत्री इंदिरा गांधी भी दिनकर की कलम की शिकार बनी। लेकिन इसी कालखंड में दिनकर की सांसे भी रुक गयी। </p>
<figure id="attachment_5964" aria-describedby="caption-attachment-5964" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/JOP-Raghu-Rai.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/JOP-Raghu-Rai.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-5964" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/JOP-Raghu-Rai.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/JOP-Raghu-Rai-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/JOP-Raghu-Rai-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/JOP-Raghu-Rai-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/JOP-Raghu-Rai-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5964" class="wp-caption-text">जय प्रकाश नारायण</figcaption></figure>
<p><strong>समय बीत रहा था। दिनकर जी का जीवित शरीर भी पार्थिव हो गया था। 24 अप्रैल, 1974 को सिमरिया में उदय हुए दिनकर का तत्कालिक मद्रास में सूर्यास्त हो गया था। उधर देश में तथाकथित रूप से आज़ादी की दूसरी लड़ाई का शंखनाद हो रहा था। दिल्ली के रामलीला मैदान में लाखों की संख्या में उपस्थित नागरिकों और मंच पर बैठे मदन लाल खुराना तथा प्रकाश सिंह बादल और अन्य नेताओं के सामने जयप्रकाश नारायण सम्पूर्ण क्रांति का बिगुल फूंकते दिनकर की कविता का पाठ भी किया &#8220;सिंहासन खली करो की जनता आ रही है,&#8221; लेकिन कविता के उन सभी शब्दों को समयाभाव के कारण नहीं पढ़ा गया जो जनता का वास्तविक चित्रण करता था। दिनकर की कविता और उनके शब्दों का बाज़ारीकरण राजनीतिक बाजार में शुरू हो गया। और उधर तत्कालीन राजनेताओं के साथ साथ जनता और भारत के &#8216;तेज-तर्राक&#8217; मतदाता भी नई सरकार, नए मंत्री, नए अधिकारी, नए काम-धंधे, नए ठेकेदारी और पैसा कमाने के वे सभी रास्तों का सृजन करने लगे तो उनके लिए तो थे, दिनकर की जनता के लिए नहीं था &#8211; क्योंकि उसे तो वेदना सहने की आदत थी, और है।</strong> </p>
<p>जय प्रकाश नारायण &#8216;लोक नायक&#8217; नहीं बने थे उन दिनों तक। जयप्रकाश की निगाह में इंदिरा गांधी की सरकार भ्रष्ट होती जा रही थी। सन 1975 में निचली अदालत में इंदिरा गांधी पर चुनाव में भ्रष्टाचार का आरोप साबित हो गया। जेपी का कहना था इंदिरा सरकार को गिरना ही होगा। जिस कदर दरभंगा के महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह के पार्थिव शरीर को उनके परिवार वालों ने आनन्-फानन में अग्नि को सुपुर्द किया था, तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आनन-फानन में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर दी। लड़ाई जारी रही। कुकुरमुत्तों की तरह नए-नए नेता जन्म लिए। जैसे-जैसे नेताओं की संख्या सरकारी कार्यालयों में, विधान सभाओं में, लोक सभा, राज्य सभा में बढ़ती गयी, दिनकर की जनता सड़क पर आती गयी। खैर। </p>
<p>विगत 50 वर्षों में देश का क्या हश्र हुआ, भ्रष्टाचार कितना कम हुआ, देश की जनता और आम मतदाता सत्ता के कितने करीब आया, सत्ता में उसकी कितनी भागीदारी मिली, सम्पूर्ण क्रांति से लेकर वर्तमान क्रांति तक कितना बेहतर राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण हो पाया,  राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और अध्यात्मिक क्रांति कितनी आ पायी, महिलाओं को अपना अधिकार कितना मिल पाया, यह तो आज नहीं पचास साल बाद मेरे जैसा कोई मुर्ख पत्रकार फिर लिखेगा &#8211; लेकिन वास्तविक हकीकत यह है कि भारत के करीब साढ़े छः लाख गाँव से लेकर, 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के विधान सभाओं और दिल्ली के संसद तक &#8211; किस कदर के जनता के प्रतिनिधि विराजमान हुए, यह तो देश की जनता भी जानती है, जनता ही जानती है। लेकिन सिंहासन पर बैठे लोग यह नहीं जानते कि दिनकर ने आगे भी लिखा था:</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Indira-1.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Indira-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="aligncenter size-full wp-image-5965" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Indira-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Indira-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Indira-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Indira-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/Indira-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p><strong>लेकिन होता भूडोल, बवण्डर उठते हैं, जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;<br />
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ।</strong></p>
<p>दिनकर की बात इसलिए यहाँ कर रहा हूँ क्योंकि दिनकर का सिमरिया &#8211; बेगूसराय जिला &#8211; भी प्रस्तावित मिथिला राज्य के 24 जिलों में से एक हैं। इधर दिल्ली के रायसीना हिल के अंतिम छोड़ पर इस बात की चर्चा सुनी जा रही है कि &#8220;अगर मिथिला राज्य के निर्माण के लिए बिहार को दो टुकड़े में किया जाता है तो प्रदेश की राजधानी दरभंगा-मधुबनी न बनाकर दिनकर की नगरी बेगूसराय को प्राथमिकता में रखा जाए। मिथिला क्षेत्र को गंगा नदी द्वारा उत्तर और दक्षिण मिथिला में विभाजित किया गया है और मैथिली भाषा भाषी जिले गंगा नदी के दक्षिण और उत्तर दोनों तरफ पड़ते हैं। अंतरराष्ट्रीय मैथिली परिषद् के अध्यक्ष डॉ. धनाकर ठाकुर कहते भी हैं कि &#8220;अब समय आ गया है कि बिहार को नई राजधानी नहीं, बल्कि इसका विभाजन कर छोटे-छोटे राज्यों में &#8211; मिथिला, मगह, भोजपुर &#8211; बांटा जाय।&#8221; </p>
<p><strong>डॉ. ठाकुर का कहना है कि: &#8220;हमरा बिहार स किछु लेबाक नहि। मिथिला राज्य यदि मांगल नक्शा अनुसार भेटल त भागलपुर मुजफ्फरपुर या ओकर बीच राजधानी बरौनी आसपास। यावतसर राजधानी के विकास नहि होइत अति पटना में हेदराबाद, चंडीगढ़ जकां राजधानी रहय।हमर पाई पर पटना , पीएमसीएच बनल अछि, आधा गांधी मैदान, राजेंद्र नगर टर्मिनल हमर। हमरा मिथिला लेल अलग बजटस मतलब अछि जे विकास हो, राजधानी पटना हो या देवघर मतलब नहि। मिथिलाके उपराजधानी के जरुरत नहि हेतैक। सबस बेशी मोकदमा राज्य बनक पांच साल पहिले जतस हाइकोर्ट गेल होयत ओत मिथिला हाइकोर्ट (ओना मांग पूर्णिया, दरभंगासं छैक)! ई हमर व्यक्तिगत मत अछि।&#8221;</strong></p>
<p>डॉ. ठाकुर आगे कहते हैं: &#8220;भावनात्मक मुद्दा तात्कालिक लाभ लेल, यथार्थ एकहि जे बिहार टूटत यूपी संग,कोनहूं हालमे 20स कम संसदीय क्षेत्र पर नहि मानब भनहि ओ मालदा जोडि मेंटर, तखन पूर्णियाक राजधानी दावा बनत। दोसर राज्य पुनर्गठन आयोग बैसक चाही। सब राज्य मे हेर-फेर के जरूरत। जेना जम्मू-कश्मीर हिमाचल प्रदेश उत्तराखंड के मिला एक राज्य। कोनहूं राज्य मे हिंदू मुस्लिम एकता लेल आबादी 4:1स कम नहि। हमरा सन लोक लेल भारत प्रमुख अछि,कोनहूं राज्य एकरहि सुरक्षा लेल। मिथिला हम ओहि दृष्टिकोणसं देखैत छी जतय संस्कृत आओर मैथिली दूनू पल्लवित पुष्पित होयत। ई एकमात्र आंदोलन जे राजनीतिक नहि सांस्कृतिक अछि,जे नेता नहि कार्यकर्ता चला रहल अछि। जाहि प्रमंडल के जनकक मिथिलामे जायसं विरोध ओ जरासंधक मगधमे रहथि, मिथिला त बनबे करत कारण ई चीनसं सुरक्षा लेल सेहो आवश्यक।&#8221;</p>
<figure id="attachment_5932" aria-describedby="caption-attachment-5932" style="width: 954px" class="wp-caption alignleft"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Dhanakar.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Dhanakar.jpg" alt="" width="954" height="1065" class="size-full wp-image-5932" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Dhanakar.jpg 954w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Dhanakar-269x300.jpg 269w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Dhanakar-917x1024.jpg 917w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Dhanakar-768x857.jpg 768w" sizes="(max-width: 954px) 100vw, 954px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5932" class="wp-caption-text">डॉ. धनाकर ठाकुर</figcaption></figure>
<p>वैसे यदि देखा जाय तो मिथिला क्षेत्र का शोषण और दोहन श्रीकृष्ण सिन्हा के कालखंड से ही प्रारम्भ हुआ था। करीब 17 वर्ष 51 दिन मुख्यमंत्री कार्यालय में बैठने वाले श्रीकृष्ण सिन्हा कभी भी मिथिला के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि “उस ज़माने से ही राजनेता, खासकर कांग्रेस पार्टी के लोग, दिल्ली को हमेशा यह कहते रहे कि आप चाहे मिथिला क्षेत्र को कुछ दें अथवा नहीं, वे कांग्रेस के पीछे-पीछे ही रहेंगे। यानि चुनाव के समय उनका मत कांग्रेस पार्टी के पक्ष में भी रहेगा। ऐसा हुआ भी। फरक्का बराज का उदहारण देते वे कहते हैं कि इस बराज का निर्माण बिहार में होना था, लेकिन इसे बंगाल भेज दिया गया। प्रथम आम चुनाव से लेकर आज तक मिथिला क्षेत्र में विकास का दर शून्य रहा। आज भले बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ का नारा देश में गन रहा हो राजनीतिक लाभ के लिए, आज हालात यह है कि मिथिला में कोई माता-पिता (अपवाद छोड़कर) अपनी बेटी का नाम “सीता” नहीं रहते। जिस देवी के नाम से मिथिला है, जिसकी पूजा-अर्चना होती है, उसी मिथिला में आज लोग अपनी बेटी का नाम ‘सीता’ नहीं रखते। सीता को बहुत दर्द सहना पड़ा था। </p>
<p><strong>बिहार में वर्तमान में चौबीस मैथिली भाषी जिले हैं। वे हैं: अररिया, बांका, बेगुसराय, भागलपुर, दरभंगा, पूर्वी चंपारण, जमुई, कठिहार, खगड़िया, किशनगंज, लखीसराय, मधेपुरा, मधुबनी, मोंगहियर, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, सहारासा, समस्तीपुर, शेखपुरा, शिवहर, सीतामढी, सुपौल, वैशाली, पश्चिमी चंपारण। वर्तमान में झारखंड में प्रस्तावित मिथिला राज्य के छह मैथिली भाषी जिले हैं। वे हैं: देवघर, दुमका, गोड्डा, जामताड़ा, पकौर और साहेबगंज। झारखंड में शामिल मिथिला जिले शेष झारखंड से कोई सांस्कृतिक समानता नहीं रखते हैं। हालाँकि, बिहार के जिले मिथिला जिलों से अधिक प्रभावित हैं। प्रस्तावित मिथिला राज्य के तीस जिलों के लोग मैथिली बोलते हैं, जो मौखिक और लिखित दोनों परंपराओं में समृद्ध भाषा है। 1950 के दशक में प्रथम राज्य पुनर्गठन समिति के समय, मैथिली को भारत सरकार की मान्यता प्राप्त भाषाओं की अनुसूची में नहीं रखा गया था। तब से, इसे अनुसूची में पुनः शामिल करने के लिए जोरदार प्रयास किया गया है। 2003 में यह प्रयास सफल रहा और मैथिली को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में मान्यता दी गई और एक बार फिर इसे एक प्रमुख भारतीय भाषा के रूप में उचित दर्जा दिया गया।”</strong></p>
<p>2001 की भारतीय जनगणना में मिथिला की आबादी का केवल एक हिस्सा ही गिना गया था, 12,179,122 मैथिली भाषी लोगों की पहचान की गई, जिससे मैथिली भारत में तेरहवीं सबसे लोकप्रिय बोली जाने वाली भाषा बन गई । भारतीय संघ के 28 राज्यों में से 25 की स्थापना भाषा के आधार पर की गई थी। तीन नए राज्यों की स्थापना आर्थिक पिछड़ेपन और संस्कृति के आधार पर की गई थी। भाषा, संस्कृति और आर्थिक आवश्यकता तीनों मानदंडों के आधार पर मिथिला राज्य के लिए एक मजबूत तर्क दिया जा सकता है। एक मिथिला राज्य एक क्षेत्र को गहरे भाषाई और सांस्कृतिक संबंधों के साथ एक साथ बांधेगा, और साथ ही उन लोगों में गर्व वापस लाएगा जो वर्तमान सरकारों के तहत कई वर्षों से वंचित हैं। मिथिला के अतीत के प्रतीक जैसे अशोक स्तंभ जिससे हमारा राष्ट्रीय प्रतीक बना है और यह तथ्य कि यह क्षेत्र माता सीता का घर था, एक बार फिर नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनेंगे। जनसंख्या और क्षेत्र 2001 की भारतीय जनगणना के अनुसार पहचाने गए मिथिला क्षेत्र की जनसंख्या 5,68,12,422 है, जिसमें से 5,12,20,017 मैथिल बिहार में रहते हैं और 55,92,405 मैथिल वर्तमान में झारखंड में रहते हैं। प्रस्तावित मिथिला क्षेत्र का कुल क्षेत्रफल 66,049 वर्ग किमी है, जिसमें से 54,232 वर्ग किमी बिहार में और 11,817 वर्ग किमी झारखंड में स्थित है।</p>
<figure id="attachment_5966" aria-describedby="caption-attachment-5966" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_2486-fotor-20241222185338-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_2486-fotor-20241222185338-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1709" class="size-full wp-image-5966" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_2486-fotor-20241222185338-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_2486-fotor-20241222185338-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_2486-fotor-20241222185338-1024x683.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_2486-fotor-20241222185338-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_2486-fotor-20241222185338-1536x1025.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/12/DSC_2486-fotor-20241222185338-2048x1367.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5966" class="wp-caption-text">रायसीना हिल</figcaption></figure>
<p>चलिए रायसीना हिल चलते हैं भारत के राष्ट्राध्यक्ष के भवन में। रायसीना हिल पर इस बात की भी चर्चा है कि यदि मिथिला राज्य का निर्माण होता है तो वर्तमान में जनता दल (यूनाइटेड) और लोक जनतांत्रिक पार्टी राष्ट्रीय राजनीतिक दल बन सकती है। वजह का उल्लेख करते रायसीना हिल के जानकारों का कहना है कि राष्ट्रीय राजनीतिक दल होने के लिए  किसी दल को 4 राज्यों में क्षेत्रीय दल का दर्जा मिलना आवश्यक है। एक राजनीतिक पार्टी अगर तीन अलग-अलग राज्यों को मिलाकर लोकसभा की 2 फीसदी सीटें जीतती है या कम से कम 11 सीटें जीते। यहां यह जरूरी होता है कि ये 11 सीटें किसी एक राज्य से न होकर 3 अलग-अलग राज्यों से होनी चाहिए। ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय दल का दर्जा मिल सकता है।यदि कोई पार्टी चार लोकसभा सीटों के अलावा लोकसभा या विधानसभा चुनाव में चार राज्यों में 6 प्रतिशत वोट हासिल करती है तो उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल सकता है। इस दृष्टि से जनता दल या लोक जनतांत्रिक पार्टी राष्ट्रीय दाल होने वाला सभी शर्ते पूरा करता हैं। </p>
<p>बहरहाल, पिछले पांच दिसंबर को अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद्, आदर्श मिथिला पार्टी द्वारा दूसरी महिला राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को एक पत्र लिखा गया है जिसमें मिथिला राज्य के निर्माण के साथ-साथ 37 अन्य विषयों पर मांग की गयी है।पत्र में लिखा गया है कि मिथिला, विदेह का एक प्राचीन राज्य है, जो मुख्यतः बिहार में है और आंशिक रूप से फैला हुआ है झारखंड और पश्चिम बंगाल राज्य। हमारा मिथिला/तिरहुत 1774 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया द्वारा पटना के अधीन कर लिया गया था उस समय के भारतीय शासकों के विरोध के बावजूद कंपनी। ये था 1800 ई. में बादशाह शाह आलम द्वितीय द्वारा विरोध किया गया। हमारा मिथिला/तिरहुत था पुनः बंगाल प्रेसीडेंसी के अधीन कर लिया गया और बिहार के अधीन रखा गया 1912 से उड़ीसा जिससे उड़ीसा और झारखण्ड अब अलग राज्य हैं लेकिन मिथिला को अलग राज्य नहीं बनाया गया। </p>
<p><strong>लोग बाग़ यह कह रहे हैं कि &#8220;मिथिला एक विरासत राज्य के रूप में अपनी पहचान खो रहा है। हालांकि मिथिला राज्य एक विरासत के रूप में अपना गौरव फिर से हासिल करने की क्षमता रखता है। मिथिला राज्य में सांस्कृतिक राजधानी के रूप में अपना गौरव पुनः प्राप्त करने की क्षमता होगी, पत्र में यह कहा गया है कि &#8220;मिथिला राज्य बनाने के लिए भारत के संसद में कानून लाया जाए। उक्त कानून के तहत वर्तमान बिहार से तिरहुत, दरभंगा, कोशी, पूर्णिया, भागलपुर और मुंगेर कमीश्नरियों को मिथिला राज्य में रखा जाए । इसके अलावे झारखण्ड से संथाल परगना का कमिश्नरी जो भागलपुर कमिश्नरी का हिस्सा था, साथ ही, सर जॉर्ज ग्रियर्सन के भाषाई सर्वे के अनुसार अनुसार (1902-28) मैथिली भाषी क्षेत्र, पूर्णिया जिला का वह हिस्सा जो 1950 में छीनकर पश्चिम बंगाल का उत्तरी क्षेत्र प्रस्तावित मिथिला राज्य को वापस दिया जाए। इतना ही नहीं, नेपाली भाषा और मैथिली भाषा के बीच घनिष्ठ और मधुर सम्बन्ध मुद्दत से रहा है, अतः तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा गलती से नेपाल को दिए गए नौ जिलों को मिथिला राज्य में रखा जाए  इससे गोरखालैंड की समस्या भी शांत हो जायेगा।&#8221;</strong> </p>
<p>मिथिला राज्य आज भले ही विशाल होने के कारण एक गरीब राज्य लगता है, लेकिन जल संसाधन और मानव संसाधन होने के कारण यह बहुत जल्द विकसित और आत्मनिर्भर हो सकता है । मिथिला राज्य भारत का शैक्षणिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नगर हो सकता है । पत्र में यह भी लिखा गया है कि मिथिला राज्य से घुसपैठ को कम करने में भी मदद मिलेगी। बांग्लादेश और चीन के खिलाफ एक मजबूत बफर राज्य भी होगा। वर्तमान और पिछली सरकार इस दिशा में पूर्णतः विफल रही है। चूँकि हम मैथिल राष्ट्रीय और अतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने विकासशील मानव संसाधन के कारण (लगभग सात करोड़ की आवादी है) अपने देश के लिए योगदान दे रहे हैं, अतः 24-राज्यों को मिलकर मिथिला राज्य का निर्माण किया जा सकता है। मिथिला को एक राज्य बनाने से बिहार के शेष हिस्सों को भी मदद मिलेगी क्योंकि मौजूदा स्थिति से कम जिलों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलेगी संसाधनों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा और विकास तेज होगा। अब हम आपसे अनुरोध करते हैं कि आप तुरंत सात करोड़ मैथिल लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए कदम उठायें सुधार किया जा सकता है।&#8221;</p>
<p>मिथिला के बारे में महामहिमोपाध्यायों ने लिखा है कि 1326 में जब फिरोजशाह तुगलक ने मिथिला पर भीषण आक्रमण किया तो राज्य पंडित कामेश्वर ठाकुर को सौंपकर महाराजा हरिसिंह देव पंडित चंदेश्वर ठाकुर के साथ नेपाल भाग गए, जहां उनके वंशजों ने कई शताब्दियों तक शासन किया। इतिहासकार डॉ. उपेंद्र ठाकुर के अनुसार हरिसिंह देव के भागने के बाद 27 वर्षों तक मिथिला में अराजकता का माहौल रहा। बाद में 1353 में फिरोज शाह तुगलक ने खुद पंडित कामेश्वर ठाकुर को राजा नियुक्त किया। जब कामेश्वर ठाकुर फिरोज शाह को कर वसूलने और चुकाने में असमर्थ हो गए तो उन्हें मजबूरन उन्हें गद्दी से उतारना पड़ा और अपने वीर पुत्र भोगीश्वर ठाकुर को मित्र बनाकर उन्हें राज्य दे दिया। वे ओइनी गांव (मुजफ्फरपुर) के थे, इसलिए उन्हें ओइनवार राजा कहा जाता था और इस तरह 1326/1353 से ब्राह्मणों ने मिथिला पर शासन करना शुरू कर दिया।</p>
<figure id="attachment_5862" aria-describedby="caption-attachment-5862" style="width: 2200px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/3.jpg" alt="" width="2200" height="1144" class="size-full wp-image-5862" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/3.jpg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/3-300x156.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/3-1024x532.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/3-768x399.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/3-1536x799.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/3-2048x1065.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5862" class="wp-caption-text">दरभंगा में प्रधानमंत्री को देखने आते लोग</figcaption></figure>
<p>कुछ समय बाद भोगीश्वर ठाकुर के छोटे भाई भवेश ठाकुर षड्यंत्र में फंस गए और उन्होंने राज्य में अपना हिस्सा मांगने के लिए विद्रोह शुरू कर दिया। पंडितों ने मध्यस्थता की और भवेश ठाकुर (भावसिंह) सुगौना (राजनगर) राज्य के स्वामी बन गए लेकिन वे इससे संतुष्ट नहीं हुए और षड्यंत्र जारी रखा। भोगीश्वर ठाकुर की मृत्यु के बाद उनके पुत्र गणेश्वर सिंह राजा बने लेकिन एक मुस्लिम सामंत असलान ने षडयंत्रपूर्वक 1361 ई. में उन्हें खंजर से मार डाला। वह उनके दो पुत्रों वीर सिंह और कीर्ति सिंह को भी मारना चाहता था लेकिन वे सुरक्षित रूप से कहीं छिपे हुए थे। कुछ समय बाद दोनों राजकुमार गुप्त रूप से जौनपुर चले गए और बादशाह तुगलक से गुहार लगाई, जिसने उनके साथ सेना की एक टुकड़ी भेजी, उनकी मदद से दोनों राजकुमारों ने असलान के साथ युद्ध किया। असलान और वीर सिंह दोनों युद्ध में मारे गए। कीर्ति सिंह राजा बने। वे अधिक समय तक शासन नहीं कर सके। तीनों भाई निःसंतान थे, इसलिए कीर्ति सिंह की मृत्यु के बाद दादा भाव सिंह के भाई संयुक्त मिथिला के राजा बने और भोगीश्वर वंश का अंत हो गया। भावसिंह के बाद उनके सबसे बड़े पुत्र देवसिंह राजा बने जिन्होंने अपनी नई राजधानी देवकुली (देकुली धाम) बनाई और उनके कार्यकाल में कई मंदिर और तालाब बनाए गए।</p>
<p>उनकी मृत्यु के बाद उनके सबसे बड़े बेटे शिव सिंह राजा बने, जिनके मित्र महाकवि विद्यापति थे, जिन्हें खेलन कवि कहा जाता था। शिव सिंह ने गजरथगढ़ को अपनी नई राजधानी बनाया। वह इतने प्रभावशाली राजा थे कि स्वतंत्र राज्य घोषित करने के बाद उन्होंने सम्राट को कर देना बंद कर दिया। 1412 ई. में उन्होंने विद्यापति को बिस्फी दानपत्र के रूप में दे दिया और उन्हें जमींदार का सम्मान दिया। यह सब जानकर बादशाह इब्राहीम शाह तुगलक क्रोधित हो गया और 1416 में उसने एक शक्तिशाली सेना के साथ मिथिला पर हमला कर दिया। मिथिला के लोगों ने वीरतापूर्वक युद्ध लड़ा। भयंकर युद्ध हुआ- दोनों पक्षों को बहुत नुकसान हुआ। </p>
<p>मिथिला के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण था कि महाराजा शिव सिंह मारे गए और उनके शव को भी दुश्मनों ने कहीं छिपा दिया। लोगों ने सोचा कि महाराजा शिव सिंह हिमालय में कहीं भाग गए हैं और इसलिए लखिमा रानी ने द्रोणवार राजा पुरादित्य (गढ़ बनैली) के यहाँ 12 साल तक रहकर प्रतीक्षा की और सम्राट को कर का भुगतान किया जाता रहा। समय पूरा होने पर वह महाराजा की जलती हुई चिता पर सती हो गई। महाराजा शिव सिंह निःसंतान थे और इसलिए उनकी मृत्यु के बाद उनके छोटे भाई पद्म सिंह 1428 में करदाता राजा (करद राजा) बने लेकिन वे भी ज़्यादा दिन जीवित नहीं रह सके। 1431 में उनकी मृत्यु के बाद उनकी रानी बिश्वास देवी ने राजगद्दी संभाली। वह रानी भी निःसंतान थी और इसलिए उनकी मृत्यु के बाद शिव सिंह के छोटे भाई (शिव सिंह के दादा के भाई) हरि सिंह गद्दी पर बैठे और उनकी मृत्यु के बाद हरि सिंह राजा बने और उनकी मृत्यु के बाद नर सिंह राजा बने जिनकी मृत्यु 1461 में हुई।</p>
<p>महाकवि विद्यापति ने अपने लंबे जीवन (1350-1450) में मिथिला के दस राजा और रानियों (भोगीश्वर ठक्कुर से हरि सिंह तक) को देखा। राजा नरसिंह की मृत्यु से एक वर्ष पूर्व सन् 1460 में उनके पुत्र धीर सिंह ने राज्य की बागडोर संभाली थी। धीर सिंह की मृत्यु के पश्चात उनके छोटे भाई भैरव सिंह राजा बने। वे प्रजा के बीच बहुत लोकप्रिय राजा थे। उनके कार्यकाल में साहित्य के विकास के साथ-साथ मिथिला का समग्र विकास हुआ, जिसमें अनेक तालाब, कुएँ, मंदिर, सड़कें आदि बनवाई गईं। लगभग 35 वर्षों तक शासन करने के पश्चात सन् 1515 में उनकी मृत्यु हो गई। फिर उनके बेटे रामभद्र सिंह देव राजा बने। अपने आकर्षक व्यक्तित्व के कारण उन्हें महाराजा शिव सिंह के नाम से रूपनारायण कहा जाता था। उनके समय में मिथिला बंगाल की सीमा से लेकर उत्तर प्रदेश तक फैला हुआ था। दुर्भाग्य से उनके बेटे लक्ष्मीनाथ सिंह देव उनके जैसे वीर नहीं थे, जो उनकी मृत्यु के बाद राजा बने और ओइनवार वंश के अंतिम राजा थे।</p>
<p>1526 ई. के बाद &#8211; कबीले के आपसी ईर्ष्या और सिकंदर लोधी के मिथिला पर आक्रमण के कारण 1526 में लक्ष्मीनाथ की हत्या कर दी गई। विजय के बाद सिकंदर लोधी ने अपने दामाद अलाउद्दीन को इस क्षेत्र का शासक बना दिया। उस समय तक दिल्ली में मुगल साम्राज्य भी स्थापित हो चुका था। अब 50 वर्षों तक मिथिला में मुस्लिम शासन और शोषण चलता रहा जिसके कारण वहाँ अराजकता और जंगल राज कायम हो गया। उस समय बड़ी संख्या में मैथिलों को मुसलमान बना दिया गया। कई महत्वपूर्ण पुस्तकें जला दी गईं। विद्यापति के दीह बिस्फी को हिंदूविहीन कर दिया गया और उनके वंशज सौराठ चले गए। डर के कारण मिथिला के कई विद्वान और साहित्यकार पुस्तकों के साथ नेपाल, बंगाल, यूपी, एमपी, राजस्थान, गुजरात और असम भाग गए या काशीवास के लिए चले गए। </p>
<figure id="attachment_5672" aria-describedby="caption-attachment-5672" style="width: 2048px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/292766564_10224736816980863_3364127479289744199_n.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/292766564_10224736816980863_3364127479289744199_n.jpg" alt="" width="2048" height="1536" class="size-full wp-image-5672" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/292766564_10224736816980863_3364127479289744199_n.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/292766564_10224736816980863_3364127479289744199_n-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/292766564_10224736816980863_3364127479289744199_n-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/292766564_10224736816980863_3364127479289744199_n-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/08/292766564_10224736816980863_3364127479289744199_n-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5672" class="wp-caption-text">बिहार का एक बाढ़ प्रभावित गाँव। तस्वीर अजय कुमार कोशी बिहार</figcaption></figure>
<p>जब अकबर 50 साल बाद दिल्ली की गद्दी पर बैठा तो उसने मिथिला में शांति स्थापित करने की कोशिश की। वह इस नतीजे पर पहुंचा कि मैथिल ब्राह्मण को राजा बनाने से ही मिथिला में शांति स्थापित हो सकती है और लगान वसूला जा सकता है। इसलिए उसने गढ़ मंगला (मध्य प्रदेश) से राजपंडित चंद्रपति ठाकुर (श्रौतिया) को दिल्ली बुलाया और उनसे एक पुत्र मांगा। चंद्रपति ठाकुर ने अपने मझले बेटे पंडित महेश ठाकुर को मिथिला का शासक बनाने के लिए कहा। बादशाह अकबर ने पंडित महेश ठाकुर को मिथिला का शासक घोषित कर दिया। </p>
<p>सन् 1499 ई. में रामनवमी के दिन अर्थात् 1577 ई. में पं. महेश ठक्कुर मिथिला के राजा बने। लेकिन कई वर्षों तक मिथिला में व्याप्त अराजकता के कारण वे लगान वसूलने और दिल्ली भेजने में असमर्थ रहे, जिससे क्रोधित होकर अकबर ने उनका राज्य छीन लिया। तब पंडित महेश ठाकुर के प्रिय शिष्य और प्रतिभाशाली विद्वान पंडित रघुनंदन दिल्ली गए और सम्राट को संतुष्ट कर उन्हें पुनः राज्य लौटा दिया। पं. महेश ठाकुर मूलतः खरौरे भौर वंश के थे, इसलिए उस वंश को &#8216;खंडवाला कुल&#8217; कहा गया तथा राजधानी सरिसब-पाही और राजग्राम के उत्तर-पश्चिम में बनाई गई। महेश ठाकुर की मृत्यु के बाद उनके सबसे बड़े बेटे गोपाल ठाकुर राजा बने। वे अल्पायु थे, इसलिए उनके छोटे भाई परमानंद ठाकुर राजा बने। जब उनकी भी मृत्यु हो गई, तो महेश ठाकुर के पांचवें बेटे शुभंकर ठाकुर राजा बने, जिनकी मृत्यु 1617 ई. में हुई। फिर उनके बेटे पुरुषोत्तम ठाकुर राजा बने, लेकिन 1623 में उन्हें एक साजिश में मार दिया गया। फिर उनके सौतेले भाई नारायण ठाकुर राजा बने, जिनकी मृत्यु 1645 में हुई और फिर उनके बेटे सुंदर ठाकुर राजा बने। उनकी मृत्यु के बाद महिनाथ ठाकुर राजा बने, तब तक औरंगजेब बादशाह बन चुका था।</p>
<p>महिनाथ ठाकुर के बाद उनके बेटे नरपति ठाकुर राजा बने जिन्होंने अपनी राजधानी राजग्राम से दरभंगा स्थानांतरित की और वहां एक किला बनवाया, जिसे आज भी रामबाग पैलेस कहा जाता है। जब नरपति बूढ़े हो गए तो वे काशी चले गए और राज्य अपने जैसे वीर पुत्र राघव सिंह को सौंप दिया। राघव सिंह एक महान योद्धा और कुशल प्रशासक थे। उन्होंने कई युद्ध जीतकर मिथिला के गौरव में चार चांद लगा दिए। 1739 में उनकी मृत्यु के बाद उनके सबसे बड़े बेटे विष्णु सिंह राजा बने जो केवल चार साल ही शासन कर पाए क्योंकि मकवानपुर (नेपाल) के जमींदार ने उन्हें जनकपुरधाम बुलाकर धोखे से मार डाला था। ऐसे में उनके छोटे भाई नरेंद्र सिंह को दरभंगा का राजा बनाया गया। नरेंद्र सिंह को योद्धा युवराज भी कहा जाता था और उन्होंने जल्द ही अपने बड़े भाई की हत्या का बदला ले लिया। 1760 में उनकी मृत्यु के बाद उनके चचेरे भाई प्रताप सिंह को राजा बनाया गया, जिनकी मृत्यु के बाद माधव सिंह राजा बने, तब तक अंग्रेजों ने भारत में अपने पैर जमा लिए थे।</p>
<p>अंग्रेजों को मिथिला में कोई भी शक्तिशाली शासक पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने कई जगहों पर कई विद्वान/छोटे राजा बनाए। मिथिला के लोग इतने भोले थे कि वे उस षड्यंत्र को समझ नहीं पाए। पूर्वी मिथिला को अलग प्रशासन दिया गया। दरभंगा के महाराज माधव सिंह की मृत्यु 1807 में हुई। उसके बाद उनके पुत्र छत्र सिंह राजा बने, जिनकी मृत्यु के बाद रुद्र सिंह राजा बने और उनकी मृत्यु के बाद महेश्वर सिंह गद्दी पर बैठे। महेश्वर सिंह की मृत्यु 1860 ई. में हो गई। उस समय तक उनके पुत्र लक्ष्मीश्वर सिंह नाबालिग थे, इसलिए ब्रिटिश सरकार ने दरभंगा राज को &#8216;कोर्ट ऑफ वार्ड्स&#8217; के अधीन कर दिया। ब्रिटिश षडयंत्र का शिकार होकर पश्चिमी मिथिला ने मातृभाषा मैथिली के स्थान पर उर्दू-फारसी और अंग्रेजी को अपनी अदालती और प्रशासनिक भाषा के रूप में अपना लिया। जब लक्ष्मीश्वर सिंह 21 वर्ष के हुए तो लिखित दावे के आधार पर उनकी संपत्ति उन्हें वापस कर दी गई, लेकिन 1912 में बंगाल के विभाजन के बाद मिथिला एक राज्य नहीं बन सका और बिहार के अधीन रह गया &#8211; यहीं से मिथिला का दुर्भाग्य शुरू होता है। महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह की मृत्यु के बाद रामेश्वर सिंह महाराजा बने और उनकी मृत्यु के बाद कामेश्वर सिंह अंतिम महाराजा बने। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के साथ ही उनका शासन भी समाप्त हो गया।</p>
<p><strong>अब सवाल यह है कि मिथिला से अधिक सांस्कृतिक विरासत तो देश के किसी भी राज्य में नहीं है, फिर ऐसी कौन सी बात है जो मिथिला को अलग राज्य होने से रोक रहा है ? वैसे यह निर्विवाद सत्य है कि मिथिला में मैथिल भाषा भाषी स्वयं एक-दूसरे का दुश्मन हैं। एक-दूसरे का टांग खींचने में तनिक भी कोताही नहीं करते। नेताओं का पिछलग्गू बनना आधी श्रेयस्कर समझते हैं, भले नेता अनपढ़ हो, लालची हो, अपराधी हो, जनता का भक्षक हो। अलग राज्य बनाने में, चाहे झारखण्ड हो या तेलंगाना, छत्तीसगढ़ हो या उत्तराखंड, वहां के लोगों ने एक बद्ध, एक सूत्र होकर जिस कदर पिछले दशकों में अपने विरासत और अस्तित्व की रक्षा के लिए लड़ाई लड़े &#8211; मिथिला के लोग कोसों दूर हैं। सोच से परे हैं तभी तो दिनकर भी लिख चुके हैं</strong> </p>
<blockquote><p>&#8220;समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,<br />
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।&#8221;</p></blockquote>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/the-people-of-mithila-remain-followers-and-demand-a-separate-state">मिथिला के लोग &#8216;पिछलग्गू&#8217; भी रहते हैं और &#8216;अलग राज्य भी मांगते&#8217; हैं, काश !! दिनकर वाला &#8216;हुंकार&#8217; गंगा-कोसी-बागमती-कमला-बलान-बूढ़ी गंडक-महानंदा पार से उठता</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>&#8216;जानकारी&#8217; और &#8216;सतर्कता&#8217; जरूरी है क्योंकि &#8216;पग-पग पोखर, माँछ, मखान, मधुर बोल, मुस्की, मुख पान&#8230;&#8230;&#8230;&#8217; कविता &#8216;अब दृष्टान्त नहीं रहा मिथिला का&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 May 2022 12:15:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मनीगाछी / दरभंगा / समस्तीपुर / बेगूसराय : जिस महामहोपाध्याय ने मिथिला का चित्रण &#8216;पग-पग पोखर, माँछ, मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या, वैभव, शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक&#8217; इन शब्दों में किये थे, वे बहुत दूरदर्शी थे। लगता है वे सरस्वती के वरद पुत्र थे और उन्हें ज्ञात था कि आने [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/threat-to-mithila-culture">&#8216;जानकारी&#8217; और &#8216;सतर्कता&#8217; जरूरी है क्योंकि &#8216;पग-पग पोखर, माँछ, मखान, मधुर बोल, मुस्की, मुख पान&#8230;&#8230;&#8230;&#8217; कविता &#8216;अब दृष्टान्त नहीं रहा मिथिला का&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मनीगाछी / दरभंगा / समस्तीपुर / बेगूसराय : जिस महामहोपाध्याय ने मिथिला का चित्रण &#8216;पग-पग पोखर, माँछ, मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या, वैभव, शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक&#8217; इन शब्दों में किये थे, वे बहुत दूरदर्शी थे। लगता है वे सरस्वती के वरद पुत्र थे और उन्हें ज्ञात था कि आने वाले समय में मिथिला के लोग उनकी कविता को मिथिला के चौराहों पर &#8216;पाठ&#8217; करके, मिथिला का गुणगान करके अपने-अपने हिस्से की मिथिला अपने नाम लिखाएँगे। प्रदेश के लेखाकार में &#8216;एक खास किस्म के लोग&#8217; दरभंगा राज का &#8216;मुहर&#8217; लेकर तैयार भी रहेंगे जो आतंरिक-बाहरी माफिआओं के साथ मिलकर मिथिला (दरभंगा राज और उसकी गरिमा) को बेचकर, उसे मिट्टी पलीद करेंगे और स्वयं &#8216;संभ्रांत&#8217; और &#8216;धनाढ्यों&#8217; की श्रेणी में सूचीबद्ध हो जायेंगे, नेता, अभिनेता भी हो सकते हैं। </strong></p>
<p>कवि महोदय यह भी जानते थे इस कविता में वे जिस &#8216;संज्ञा&#8217;, &#8216;सर्वनाम&#8217;, &#8216;विशेषण&#8217; &#8216;क्रिया&#8217; का इस्तेमाल कर रहे हैं, आने वाले दिनों में वह &#8216;अपभ्रंश&#8217; ही नहीं, &#8216;विध्वंस&#8217; का रूप ले लेगा। मानसिक रूप से समाज के कुछ सम्मानित लोगों के लिए यह शब्द बाजार अवश्य देगा, उनकी &#8216;रोजी-रोटी&#8217; का साधन अवश्य बनेगा। वे यह भी जानते थे कि मिथिला के समाज में &#8216;विद्या&#8217; महत्वहीन हो जायेगा। &#8216;वैभव&#8217;, &#8216;लक्ष्मी&#8217; को प्राप्त करने, उन पर अपना-अपना अधिपत्य ज़माने की होड़ में &#8216;विद्या&#8217;, &#8216;विद्यालय,&#8217;, &#8216;गुरुकुल&#8217;, &#8216;गुरुजन&#8217;, जो समाज का पथ-प्रदर्शक थे, मिथिला की सड़कों पर उनकी वही स्थिति होगी जैसी भारत के नगरों, महानगरों में मुख्य सड़क के दाहिने-बाएं &#8216;पगडण्डी&#8217; नुमा सड़क होती है और जहाँ लिखा होता है &#8216;साईकिल और पैदल चलने वालों का रास्ता। यानी &#8216;साईड लाईन&#8217; हो जायेंगे। इतना ही नहीं,  दुर्भाग्य का पराकाष्ठा तब होगा जब उस रास्ते को भी समाज के &#8216;वैभवशाली&#8217;, &#8216;बाहुबली&#8217;, &#8216;पहलवान&#8217;, &#8216;दबंग&#8217;, &#8216;लाठीधारी&#8217;, &#8216;बंदूकधारी&#8217;, &#8216;कट्टाधारी&#8217; व्यक्ति, जो तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था से संरक्षित, पोषित रहेंगे (इसमें मिथिला वासी भी सम्मिलित रहेंगे),  कब्ज़ा किये बैठे होंगे। समाज में &#8216;अशिक्षा&#8217; के कारण मूक-बधिर लोगों का, चापलूस-चाटुकारों का बोलबाला हो जायेगा। </p>
<p><strong>अगर ऐसा नहीं होता तो आज मिथिला की सड़कों से लेकर पटना के सर्कुलर रोड, सरपेंटाइन रोड के रास्ते दिल्ली के राजपथ और जंतर-मंतर तक इस कविता का पाठ नहीं किया जाता &#8211; &#8216;पग-पग पोखर, माँछ, मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या, वैभव, शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक'&#8221; । लोगों को स्वयं समझने की, सोचने की, मंथन करने की, विवेचना करने की, विश्लेषण करने की शक्ति होते हुए भी, वह &#8216;दिग्भ्रमित&#8217; होना, &#8216;गुमराह&#8217; होना, &#8216;बरगलाना&#8217; अधिक श्रेयस्कर समझता है तो हम क्या कर सकते हैं। </strong></p>
<p>आज़ादी से पहले प्रकाशित &#8216;आर्यावर्त&#8217;, &#8216;इण्डियन नेशन&#8217; अख़बारों को ढूढ़ना, पढ़ना आज की तारीख में तो मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है जिससे यह आँका जाए कि उन दिनों उन अख़बारों में तत्कालीन विद्वान और विदुषी लोग मिथिला के भविष्य के बारे में क्या चर्चा किये थे। इसका कारण यह भी है कि सन 1960 के अक्टूबर महीने में जब दरभंगा के महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह का निधन हुआ, उसके बाद औरों के बारे में तो नहीं कह सकता, यह दोनों अखबार &#8216;टुगर&#8217;, &#8216;अनाथ&#8217; &#8216;पितृहीन&#8217; अवश्य हो गया। और इसका जीवंत उदाहरण यही दिया जा सकता है कि महाराजाधिराज के मरणोंपरांत यह अख़बार क्या, सम्पूर्ण दरभंगा राज ही रसातल की ओर उन्मुख हो गया। क्योंकि &#8216;धन&#8217; होने से &#8216;गरिमा&#8217; बरक़रार रहेगा ही, यह &#8216;चापलूस-चाटुकारों&#8217; की नजर में &#8216;सच&#8217; हो सकता है। &#8216;निर्धन&#8217;, &#8216;प्रतिष्ठित&#8217;, &#8216;चरित्रवान&#8217; मनुष्य के लिए यह सिद्धांत &#8216;गलत&#8217; है क्योंकि दूसरे का धन उसके लिए मिट्टी स्वरुप होता है। </p>
<p><strong>मिथिला के किसी भी स्थान पर खड़े होकर मिथिला के बाबू, बबुआइन और बौआसिन लोग अगर &#8220;पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या  वैभव शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक&#8221; कविता पाठ करते मिल जायँ, तो समझ लीजिये वे &#8216;सरेआम झूठ&#8217; बोल रहे हैं। अपने-अपने हितों के रक्षार्थ वे स्थानीय लोगों को बरगला रहे हैं। इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते हैं कि वे राजनीति में प्रवेश करने के लिए मिथिला की कविता पाठ करना प्रारम्भ कर दिए हों जो उनके अनेकानेक प्रयासों में, एक यह भी प्रयास हो। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि जिस समय इस कविता की रचना हुई होगी, उस कवि के नजर में मिथिला और उसकी गरिमा अपने उत्कर्ष पर रहा होगा। मिथिला के सभी क्षेत्रों में, प्रत्येक कदम पर, प्रत्येक घरों के सामने-पीछे छोटा-बड़ा पोखर रहा होगा। तत्कालीन राजा-महाराजा-महाराजाधिराज स्थानीय लोगों के सम्मानार्थ, तत्कालीन पानी की समस्याओं के निदानार्थ अपने खर्च पर पोखर, तालाब बनबाये होंगे। यह सच भी है। </strong></p>
<p>अब जब मिथिला में असंख्य पोखर / तालाब रहा होगा तो उसके महार (इम्बैंकमेंट) पर पान की खेती, मखान की खेती होती होगी, जिसका उपयोग अपने-अपने घरों में, आगंतुकों के लिए, सगे-सम्बन्धियों के लिए किया जाता होगा। कोई सौ वर्ष पहले तक मिथिला में &#8216;शिक्षा&#8217; चाहे &#8216;प्राथमिक&#8217; हो, &#8216;माध्यमिक&#8217; हो या &#8216;उच्च शिक्षा हो &#8211; पढ़ने वालों के साथ-साथ पढ़ाने वालों की किल्लत नहीं थी। अपने-अपने क्षेत्र के अनेकानेक आचार्य, प्राचार्य, महामहोपाध्याय समाज में उपलब्ध थे। शिक्षा के मामले में बनारस और इलाहाबाद की दूरियां मिथिला से अधिक नहीं थी। पाटलिपुत्र में भी मिथिला के लोग आकर शिक्षित होते थे। लेकिन, दुर्भाग्य यह रहा कि शिक्षा प्राप्ति के बाद उन्हें समाज को जो वापस करना था, वह नहीं कर सके। मिथिला के ग्रामीण इलाकों से खेतिहर-परिवारों से लेकर विद्वानों के परिवारों तक, जो भी शिक्षा के लिए शहर की ओर उन्मुख हुए, कभी वापस नहीं आये। और वापस भी आये तो वृद्धावस्था में। परिणाम यह हुआ कि मिथिला की जो अपनी पारम्परिक शिक्षा और शिक्षा पद्धति थी, उसका सर्वनाश हो गया। </p>
<p>समय बदल रहा था। समाज बदल रहा था। सोच बदल रहे थे। स्वाभाविक है शिक्षा का स्वरूप भी में बदलेगा ही। लेकिन तकलीफ इस बात की है कि आज भी हम उसी कविता पाठ को दोहरा रहे हैं और कहते थक भी नहीं रहे है कि &#8220;पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या  वैभव शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक&#8221; &#8211; खासकर तब जब <strong>बिहार के ग्रामीण इलाकों में शैक्षिक दर पुरुषों में 57 फीसदी और महिलाओं में 29 फीसदी है।</strong> बिहार का यह ग्रामीण इलाका, चाहे गंगा के उस पार का हो या गंगा के इस पार का। मिथिला भी इसी आकंड़े के अधीन है। पूरे प्रदेश में औसतन शैक्षिक दर 69 फीसदी है। इसमें पुरुषों के हिस्से 70 फीसदी और महिलाओं के हिस्से 53 फीसदी है। यानी दोनों के बीच आज भी 17 फीसदी का फासला है और यही 17 फीसदी का फासला, चाहे मिथिला में पंचायत का चुनाव हो, दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय, भागलपुर, मुंगेर, आदि शहरों में जिला परिषद् का चुनाव हो या बिहार के विधान सभा और विधान परिषद का चुनाव हो &#8211; निर्णायक होता है। &#8216;वे&#8217; विजय &#8216;घोषित&#8217; हो जाते हैं और &#8216;आप&#8217; अपनी किस्मत को कोसते जीवन पर्यन्त &#8216;हार&#8217; का सामना करते &#8220;पग-पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या  वैभव शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक&#8221; कविता पाठ सुनते रहते हैं। </p>
<p>इतना ही नहीं, इस कविता में <strong>&#8220;मधुर बोल और मुस्की&#8221;</strong> शब्द का इस्तेमाल भी किया गया है। आधुनिक समाज शास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि &#8220;मधुर बोली और मुस्कराहट&#8221; हमेशा &#8216;सकारात्मक&#8217; नहीं होता, यह &#8216;प्राणघातक&#8217; भी होता है।  इतिहास गवाह है अगर ऐसा नहीं होता तो आज कोई 20 राजा-महाराजाओं वाला दरभंगा राज का चार शताब्दी पुराना सल्तनत भी मिट्टी में नहीं मिलता। अगर <strong>&#8216;मधुर बोली और मुस्कराहट&#8217; बेहतर के लिए होता</strong>, तो प्रदेश की नीचली अदालतों में (उत्तर बिहार सहित) कोई <strong>सोलह लाख मुकदमें लंबित</strong> नहीं होते। उन मुकदमों में अस्सी से अधिक फीसदी &#8216;दीवानी&#8217; मुकदमें हैं, जो परिवार-दर-परिवार पैतृक संपत्ति पर, किसी और की संपत्ति पर कब्ज़ा करने के मामले से सम्बंधित है। कहीं मुकदमा &#8216;दीवानी&#8217; है तो कहीं &#8216;फौजदारी&#8217;, कहीं कोई पुत्र अपनी माँ पर मुकदमा किये हुए है, तो कहीं कोई पौत्र अपनी दादी पर। कहीं कोई भाई अपने दूसरे सगे भाई पर मुकदमा ठोके हुए हैं तो कहीं कोई पुत्र अपने वृद्ध पिता पर। कहीं वृद्ध माता-पिता प्रत्येक पल परमात्मा से अपनी अंतिम सांस की गुहार लगा रहे हैं तो कहीं कोई सास-ससुर अपनी बेटी-पतोह-पुत्र-दामाद पर। इसलिए &#8220;मधुर बोली और मुस्कराहट&#8221; शक के दायरे में आ जाता है। </p>
<p>सबसे महत्वपूर्ब बात तो माँछ (मछली) से सम्बंधित है। माँछ की कथा-व्यथा बनारसी पान जैसी है। बनारस में पान की खेती नहीं होती, लेकिन हज़ारों-हज़ार पान की दुकानें हैं। प्रत्येक चार दुकान या चार मकान के बाद पान की दुकानें मिलेंगी। लगभग सभी किस्मों के पान यहाँ, जगन्नाथ जी, गया और कलकत्ता आदि स्थानों से आते हैं। पान का जितना बड़ा व्यावसायिक केन्द्र बनारस है, शायद उतना बड़ा केन्द्र विश्व का कोई नगर नहीं है। काशी में इसी व्यवसाय के नाम पर दो मुहल्ले बसे हुए हैं। केवल शहर के पान विक्रेता ही नहीं, बल्कि दूसरे शहरों के विक्रेता भी इस समय इस जगह पान खरीदने आते हैं। </p>
<p>बस इतना ही समझ लें कि आज मिथिला में माँछ का उपलब्धता जितना है वह मिथिला के दो फीसदी लोगों की आवश्यकता पूरी नहीं कर सकता। मिथिला के बाज़ारों में जो माँछ आप देख रहे हैं वह सन 1911 से पहले देश की राजधानी जिस प्रदेश में थी, वहां से और आंध्र प्रदेश से आती है। मिथिला में महज &#8216;ठप्पा&#8217; लगता है। अब सोचिये खाते हैं बंगाल की &#8211; आंध्र की मछली और आज भी कविता पाठ किये हैं &#8220;पग-पग पोखर माँछ ,,,,&#8221; जब इस कविता की रचना की गयी थी माछ, पान और मखान मिथिला की शान, पहचान अवश्य थी। लेकिन समय के साथ मिथिला अपनी इस पहचान को न सिर्फ खो दिया है, बल्कि इन सभी चीजों पर अब दूसरे प्रदेशों द्वारा कब्जा भी हो गया है। इस दृष्टि से मिथिला की पहचान खतरे में है और लोग बाग़ है कि इस खतरे में भी खतरा उठाना चाहते हैं &#8216;मिथिला को अलग राज्य का दर्जा दो&#8221; &#8211; गजब है। </p>
<p><strong>पूरे मिथिला में स्थित पोखरों की संख्या को अगर तनिक बाद में अध्ययन करें तो सिर्फ दरभंगा के महाराजा के साम्राज्य में तक़रीबन 9113 पोखर और तालाब थे। इसमें दरभंगा शहर में ही 350 के आस-पास थे। आज अगर अवकाश है (वैसे मिथिला के लोग वेवजह व्यस्त होते हैं। मोबाईल पर घंटी आज बजायेंगे तो तीसरे दिन हेल्लो ट्यून सुनाई देदा) तो शहर में धूम लें और पोखरों, तालाबों की संख्या, उसकी स्थिति, उसमें दौड़ती मछलियों से, खिलते माखन से, महारों पर लगे पानों की खेती की स्थिति से अवगत हो लें। यकीन मानिए &#8216;भोकार&#8217; नहीं, &#8216;चीत्कार&#8217; मारकर रोने लगेंगे, अगर आखों में पानी होगा तो। </strong></p>
<p>वास्तविकता यह है कि मिथिला की पहचान पर, माँछ पर, पान पर, मखान पर ग्रहण लग गया है और &#8216;अवसरवादी&#8217; लोगों का हाल यह है कि दिन-रात-सुबह-शाम अपने-अपने हितों के लिए &#8216;पग-पग पोखर, पान , मखान ..&#8221; कविता पाठ करते थक नहीं रहे हैं। इन कविता वाचकों को शायद यह मालूम भी नहीं होगा कि पान की खेती करने के लिए दो-रस मिट्टी की जरूरत होती है। न ज्यादा पानी और न ज्यादा धूप की जरूरत होती। पानी इतना हमेशा चाहिए, ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे। यहां तो लोगों की आखों में नमी नहीं है, बेचारी मिट्टी क्या करे। यही कारण है कि कलकत्तिया पान दरभंगिया बनाकर मिथिला के बाज़ार पर अधिपत्य जमा लिया है, कब्ज़ा कर लिया है यानी &#8216;सुतल छी आ वियाह होईत अछि&#8217; वाली कहावत सिद्ध हो रही है और कविता वाचक पाठ करते नहीं थक रहे हैं &#8220;पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या  वैभव शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक&#8221; &#8211;  पूरी मिथिला की सांख्यिकी आप निकालें, यहाँ दरभंगा जिले में रोज तकरीबन 8 टन मछली की खपत है, लेकिन दरभंगा ज़िले से मात्र 500 किलो तक भी मछली बाजार में नहीं पहुंच पाती है। </p>
<p>एक बात गर्दन से नीचे नहीं उतरता वह यह कि जब पोखर और तालाबों की संख्या उत्तरोत्तर शून्य की ओर अग्रसर है, फिर पानी में पैदा होने वाला मखान कहाँ से आ रहा है? मखान को सुपर फूड का दर्जा मिला है। &#8216;जी-टैग&#8217; भी मिला है। कई तरह के कंपनियां अपने अपने नाम की ब्रांडिंग भी कर लिए हैं। कहा जाता है कि मल्लाह जाति के लोग ही मखाना की खेती करते थे/हैं। आंकड़ों के अनुसार, बिहार में निषाद समाज की करीब 21 उपजातियां हैं। करीब चार दर्जन &#8216;सरनेम&#8217; लगाए बैठे हैं। प्रदेश की सम्पूर्ण आबादी में करीब एक करोड़ 70 लाख लोग निषाद जाति के हैं। लेकिन सवाल यह है कि जो समाज के लोग, उनका परिवार, बाल-बच्चा बिहार के, तालाबों-पोखरों में पहले गर्दन भर पानी में डूब कर मखान की खेती करने में अपना सौभाग्य समझते थे, आज ठेंघुने और घुटने पर पानी नहीं है उन तालाबों और पोखरों में। स्थानीय लोगों के कूड़ों &#8211; कचरों से भरा उन तालाबों और पोखरों पर आज आलीशान भवन और धन अर्जित करने वाले अन्य &#8216;निर्जीव&#8217; संस्थानें बन गयी है। लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं। रोजी-रोटी-शिक्षा-चिकित्सा की तलाश में लोग पलायन कर रहे हैं और मिथिला के लोग बाग़ हैं की कविता पाठ कर रहे हैं &#8220;पग-पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या, वैभव, शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक&#8221; ।</p>
<p>बहरहाल, मिथिला में स्थित पोखरों, तालाबों की वर्तमान स्थिति को देखते यह कह सकते हैं कि &#8220;पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान । विद्या  वैभव शांति प्रतीक, सरस नगर मिथिला थींक&#8221; महज एक ढोंग है और इन कहावतों को व्यापारीकरण कर रहे हैं। इतना ही नहीं, अब तो मिथिला के पाग पर भी धावा बोल दिया गया है। &#8216;पाग&#8217; तो अब रंगबिरंगा हो गया। सफ़ेद पाग कहीं दीखता नहीं। लाल-पाग और हल्दी-रंग नुमा पाग महज अवसर पर ही लोग माथे पर रखते हैं। अब तो &#8216;पान&#8217;, मखान, माँछ, मुस्की, आम, लताम (अमरुद), लीची सभी मिथिला के पाग पर दिखेंगे और राष्ट्रीय ही नहीं, अंतराष्ट्रीय बाजार में मिथिला पेंटिंग के नाम पर बेचे जा रहे हैं, जाएंगे और फिर कहते भी नहीं थकेंगे  &#8220;पग पग पोखर माछ मखान, मधुर बोल मुस्की मुख पान&#8230;..&#8221; ।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/chutkulanands-letter/threat-to-mithila-culture">&#8216;जानकारी&#8217; और &#8216;सतर्कता&#8217; जरूरी है क्योंकि &#8216;पग-पग पोखर, माँछ, मखान, मधुर बोल, मुस्की, मुख पान&#8230;&#8230;&#8230;&#8217; कविता &#8216;अब दृष्टान्त नहीं रहा मिथिला का&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>दरभंगा के &#8216;उजान&#8217; गाँव के &#8216;कनकपुर&#8217; टोला में स्थित कोई 200 साल से अधिक पुराना यह कुआं &#8216;जीवंत&#8217; होने वाला है, लिख लें&#8230;..</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 14 May 2022 04:43:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[begusarai]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दरभंगा: कल रात स्वप्न देखा कि सृष्टि के रचयिता त्रिनेत्र धारी महादेव अपने लाखों गणों के साथ, सर्पों के साथ हमारे गाँव उजान, रेलवे स्टेशन &#8211; लोहना रोड, टोल &#8211; कनकपुर, जिला &#8211; दरभंगा स्थित इस शताब्दी-पुराने कुएं पर बैठकर स्नान कर रहे हैं। उनके इर्द-गिर्द लाखों &#8216;गण&#8217; एकत्रित हैं। चतुर्दिक नाग-सर्प प्रसन्न मुद्रा में [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/this-darbhanga-well-is-going-to-be-lively">दरभंगा के &#8216;उजान&#8217; गाँव के &#8216;कनकपुर&#8217; टोला में स्थित कोई 200 साल से अधिक पुराना यह कुआं &#8216;जीवंत&#8217; होने वाला है, लिख लें&#8230;..</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा: कल रात स्वप्न देखा कि सृष्टि के रचयिता त्रिनेत्र धारी महादेव अपने लाखों गणों के साथ, सर्पों के साथ हमारे गाँव उजान, रेलवे स्टेशन &#8211; लोहना रोड, टोल &#8211; कनकपुर, जिला &#8211; दरभंगा स्थित इस शताब्दी-पुराने कुएं पर बैठकर स्नान कर रहे हैं। उनके इर्द-गिर्द लाखों &#8216;गण&#8217; एकत्रित हैं। चतुर्दिक नाग-सर्प प्रसन्न मुद्रा में नाच रचे हैं। कुछ बुजुर्ग नाग सर्प स्वयं बाल्टी से पानी निकाल कर महादेव के शरीर पर डाल रहे हैं। हमारे घर के परिसर में स्थित गगनचुम्बी &#8216;सुपारी&#8217; के वृक्ष पर बैठकर, श्री छत्रनाथ झा के दालान पर स्थित एक विशाल नारियल के वृक्ष पर, श्रीमन्त बाबू के बाहरी बाड़ी में स्थित एक आम के पेड़ पर बैठकर गण-सर्प पुष्प वर्षा कर रहे हैं। नंदी महाराज महामहोपाध्याय श्री दिगम्बर झा के बास-डीह से शंखनाद के साथ हर-हर-महादेव कह रहे हैं। आकाश में हर-हर महादेव की गूंज हो रही है। हमारा यह &#8216;इनार&#8217; जीवंत हो गया है। स्वर्ण जैसा चमक रहा है। इसके चतुर्दिक हमारे पूर्वज, जो प्रेत-विवाह के पद्धतिकार भी थे, तंत्र-मन्त्र विद्या में महामहोपाध्याय भी थे, अपने सभी सात-वंशजों के साथ महादेव का जय-जयकार कर रहे हैं। सबों के चेहरों पर प्रसन्नता थी। सबों की पत्नियां &#8211; कुछ परिचित चेहरे भी जो दशकों पहले अग्नि के रास्ते महादेव के पास गए थे &#8211; उनके साथ महादेव के प्रति अपना समर्पण, आभार व्यक्त कर रहे हैं। ऐसा लग रहा था कि सभी अपने-अपने बास-डीहों पर जीवंत हो गए हों। सभी एक दूसरे को पहचान रहे हों। हो भी कैसे नहीं &#8211; आखिर सभी तो एक ही पिता के वंशज थे और परमपिता महादेव उनके साथ स्नान कर रहे थे।</strong> </p>
<p>आज लोग विश्वास नहीं करेंगे लेकिन मिथिला के बड़े-बुजुर्ग, विद्वान, महामहिमोपाध्याय इस बात का निरादर भी नहीं करेंगे कि हमारे आठवीं पीढ़ी के पूर्वज &#8216;प्रेत विवाह पद्धतिकार थे। महामहोपाध्याय श्री गोकुल नाथ उपाध्याय के सबसे प्रिय शिष्य थे महामहोपाध्याय श्री रामेश्वर उपाध्याय। श्री रामेश्वर उपाध्याय के तीन पुत्र थे &#8211; महामहोपाध्याय श्री गंगा दत्त झा, महामहोपाध्याय लक्ष्मीदत्त झा &#8216;मनबोध&#8217; और महामहोपाध्याय श्री भवानी दत्त झा &#8216;सुबोध&#8217; । महामहोपाध्याय श्री लक्ष्मी दत्त झा के आठ पुत्र हुए  &#8211; महामहोपाध्याय श्री जगद्धर झा, महामहोपाध्याय श्री रुद्रधर झा &#8216;श्याम&#8217;,  महामहोपाध्याय श्री विद्याधर झा &#8216;ठेंगनी&#8217;,  महामहोपाध्याय श्री पखिया झा, महामहोपाध्याय श्री केशव झा, महामहोपाध्याय श्री किशोर झा, महामहोपाध्याय श्री कृष्णदत्त झा और महामहोपाध्याय श्री बाल कृष्ण झा । </p>
<p>महामहोपाध्याय पंडित केशव झा के दो पुत्र हुए &#8211; पंडित श्री लोक नाथ झा यानी &#8216;लान्हि झा&#8217; और पंडित श्री जीवनाथ झा। पंडित लोक नाथ झा को चार पुत्र &#8211; महामहोपाध्याय श्री दिगम्बर झा, वैयाकरण श्री पीताम्बर झा, महामहोपाध्याय श्री नीलाम्बर झा, पंडित श्री सीताम्बर झा और एक कन्या महामहोपाध्याय बालकृष्ण मिश्र तथा मही मिश्र की माँ श्रीमती कर्पूरी मिश्राइन (जिनका नाम इस इनार पर लिखा है जीर्णोद्धार करने वाले में)। श्री पीताम्बर झा के एक पुत्र श्री गोपाल दत्त झा और श्री गोपाल दत्त झा के तीन पुत्र &#8211; श्री काशीनाथ झा, श्री शिवनाथ झा, श्री गंगा नाथ झा और पांच बेटी। आज श्री गोपाल दत्त झा, उनकी पत्नी श्रीमती राधा देवी और उनकी चार बेटियां इस पृथ्वी पर नहीं हैं। महामहोपाध्याय श्री दिगम्बर झा, वैयाकरण श्री पीताम्बर झा, महामहोपाध्याय श्री नीलाम्बर झा, पंडित श्री सीताम्बर झा और श्रीमती कर्पूरी मिश्राइन की चौथी-पांचवी-छठी पीढ़ियों के वंशज आज अपने-अपने पूर्वजों के आशीष से खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं। यह इनार निश्चित रूप से हमारे पूर्वज महामहिमोपाध्याय श्री रामेश्वर उपाध्याय के समय का होगा। </p>
<p><strong>बाबूजी कहते थे इस &#8216;इनार&#8217; से कोई 135 डिग्री पर एक विशालकाय कृष्ण भोग आम का वृक्ष था जहाँ अक्सर नाग और नागिन सर्प का मिलन होता था। बाबूजी के पूर्वज और गाँव के अन्य लोग जो तंत्र-मन्त्र विद्या में महारथ थे, अक्सर नाग सर्प के मिलन काल में लाल-वस्त्र का प्रयोग करते थे, जिसे उस सर्प के ऊपर मंत्रोच्चारण के साथ रख दिया जाता था। वह वस्त्र मानव-कल्याण के लिए एक अचूक वाण होता था। बाबूजी के अलावे हमारे पूर्वजों में लगभग सभी लोग इस विद्या का वरण किये थे। एक बार बाबूजी भी सन 1932 के भूकंप के बाद, जब गाँव में भीषण अग्नि-कांड हुआ था, अपने पैतृक और तंत्र-मन्त्र विद्या परंपरा का निर्वाह करते वह कार्य किये थे। बाबूजी कहते थे कि सर्प उनका पीछा भी किया था, लेकिन कभी कष्ट नहीं दिया। बाबूजी जीवन पर्यन्त उस वस्त्र से कई लोगों की जिंदगी बदले थे। माँ-बाबूजी और गाँव के बुजुर्ग सगे-सम्बन्धी आज भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि उस क्षेत्र में स्थित लोगों के डीहों पर, जहाँ उनका पुस्तैनी घर है, नाग-नागिन सर्पों की पीढ़ियां भी बस रही है। अक्सर &#8216;नाग-पंचमी&#8217; के दिन अथवा की भी शुभ दिनों में लोग दूध और धान का लावा बाहर, अँगने में रखते हैं एक विश्वास के साथ। बड़े-बुजुर्ग कहते हैं &#8216;विश्वास में बहुत ताकत है। संभव है यह कुछ सकारात्मक संकेत हो।&#8221;</strong></p>
<p>आज से कोई 57-वर्ष पहले गांव से रोजी-रोटी के साथ-साथ शिक्षा की तलाश में अ-आ-इ-ई-क-ख-ग सीखने के लिए पूर्णिया रवाना हुआ था, अपने सबसे बड़े मामा के पास गढ़बनैली। वहां दो माह से अधिक नहीं रुक सका। कहते हैं जब एक माँ अपने संतान को बचपन में अपनी छाती से अलग कर देती है, तो बच्चे की आत्मा कलपती है, अन्तःमन से रुदाली होता है, माँ के स्तन से दूध का बहाव होने लगता है। एक गरीब का संतान होने के नाते माँ की बहुत इक्षा थी की मैं पढ़ लूँ, किसी भी तरह, किसी का भी पैर पकड़कर। गढ़बनैली जाना उसी प्रयास का एक हिस्सा था। </p>
<p>तत्कालीन प्रवास के दौरान अपने मामा के घर गढ़बनैली में मुझे जिस मानसिक और शारीरिक यातनाओं से गुजरना पड़ा, ईश्वर न करे किसी गरीब के बच्चे के साथ, चाहे वह किसी भी जाति अथवा संप्रदाय का क्यों न हो, गुजरना पड़े। हे महादेव किसी को अर्थ से दीन नहीं बनाना क्योंकि मानसिक रूप से इस संसार में दरिद्रों की किल्लत नहीं है। इस कहानी को भी लिखूंगा अगले क्रम में। &#8216;महादेव&#8217; और &#8216;समय&#8217; की नजर में मैं पहली कतार में था। तभी मामा की पत्नी का देहांत हो गया। उनकी मृत्यु के साथ मेरा वहां से प्रवास करने का मार्ग प्रशस्त हो गया और मैं पटना की ओर उन्मुख हो गया। साल साठ के दशक का मध्य था। </p>
<p>जिस साल गाँव से निकला गाँव में यह कुआं हमारे घर से कोई 20 कदम पर था, आज भी है। उन दिनों कपड़े को बक्से में रखने की औकात नहीं थी, यात्रा के दौरान भी। अतः एक झोले में अपना एक-दो हाफ पैंट, बुशर्ट ले लिया था और एक किताब भी &#8211; मनोहर पोथी, बाबूजी पटना से लाये थे। जब घर से बाहर ट्रेन पकड़ने लोहना रोड स्टेशन की ओर अग्रमुख था, अपने शरीर के बाएं तरफ स्थित यह &#8216;इनार (कुआं)&#8217; टकटकी निगाह से देख रहा था। उन दिनों पानी लबालब भरा हुआ था। मेरी आंखों में भी पानी सूखा नहीं था। &#8216;इनार&#8217; को देखकर मैं अश्रुपात हो रहा था। पिता स्वरुप एक ब्रह्माण्ड के रूप में वह कुआं जानता था कि अगर हम गाँव में रह गया तो सांसों की गिनती सिमटने लगेगी। वह यह भी जानता था कि वह अपने आँगन का पानी पिलाकर मुझे सप्ताह, महीना पाल सकता है, मैं जीवित रह सकता था, लेकिन मष्तिष्क की भूख को बढ़ाने के लिए पेट में अन्न का दाना होना नितांत आवश्यक है और गाँव में, मेरे घर में अन्न का दाना मानो अजायबघर का वस्तु थी उन दिनों मेरे लिए। भात देखें / खाये मुद्दत हो जाता था। गेहूं की रोटी देखे महीनों बीत जाते थे। हाँ, सब्जियां प्रचुर मात्रा में मिल जाती थी। यह सभी बातें यह &#8216;इनार&#8217; जानता था, चश्मदीद गवाह भी था मेरे जन्म काल से, इसलिए अपने ह्रदय पर पत्थर रखकर मुझे &#8216;विदा&#8217; किया, लेकिन &#8216;अलविदा&#8217; नहीं किया एक विश्वास के साथ &#8211; न खुद और ना ही मुझे। </p>
<p><strong>उन दिनों गाँव में एक रुपये में बारह-कनमा (16 कनमा/छटाक का एक सेर होता है) चावल मिलता था। लेकिन मडुआ, जौ, मकई भरपूर मिलता था। वजह भी था। वह सभी खाद्यान्न एक रुपये में न्यूनतम पांच सेर मिलता था। स्वाभाविक है, मकई, मड़ुआ की  रोटियों को ईश्वर का प्रसाद समझकर माँ देती थी और कहती भी थी आज यह रोटियां खा लो, अपने &#8216;इनार (कुएं)&#8217; का पानी पी कर मन की तृप्त कर लो। कभी-कभी वह मकई को मोटा-मोटा दररकर उसे भात-नुमा बना देती थी। आज शहर में संभ्रांत लोग उसे &#8216;दलिया&#8217; कहते हैं और यह भी कहते नहीं थकते कि वह &#8216;बहुत पौष्टिक&#8217; होता है। माँ अपने ज़माने में गेहूं, मकई, बाजरा के दर्रा (दलिया) में सभी सब्जियां भी मिला देती । बेहतरीन स्वाद होता था। कहती थी, यह बहुत ताकत भी देगा और पेट भी बहुत देर तक भरा रहेगा। माँ कहती थी तो गलत तो हो नहीं सकती थी।</strong> </p>
<p>उस उम्र में हम बच्चे इस &#8216;इनार&#8217; से दो छोटे-छोटे बाल्टी में पानी भरकर घर ले जाते थे और यह भी ध्यान रखते थे कि किसी के बाल्टी से एक बून्द पानी छलक कर नीचे नहीं गिरे। उन दिनों मेरे दो दिन भतीजे थे &#8211; भुन्नी, गुन्नी, सुशील, बेचन, जो हमउम्र के थे और वे जब तक गाँव में रहा, &#8216;भात&#8217; के लिए, &#8216;अरहर&#8217; दाल के लिए कभी कलपने नहीं दिया। उसकी माँ हमेशा इस बात का ध्यान रखती थी। मैं सबों का चहेता भी था। भुन्नी-गुन्नी की माँ मुझे अपना दूध भी पिलाई थी जब भोजन नहीं मिलने के कारण माँ को दूध नहीं होता था। जागब की जिंदगी थी। लेकिन माँ हमेशा कहती थी खाने के लिए, अन्न के लिए हमेशा महादेव को धन्यवाद देना। आज जो मिलता है, खा लो, मन को तृप्त कर लो, पेट की क्षुधा शांत कर लो। देखना एक दिन तुम्हारे पास खाने के रंगबिरंगे, स्वादिष्ट पकवान होंगे, तुम भी खाना और लोगों को भी भूखा नहीं रहने देना। लेकिन ध्यान रहे &#8216;मस्तिष्क की भूख कभी शांत नहीं होने देना, मेहनत करने में, मसक्कत करने में कभी कोताही नहीं करना। कामचोर कभी नहीं होना और बहुत सारी बातें हिदायत स्वरुप समझाती थी ।&#8221; </p>
<p>आज पांच दशक बाद जब दिल्ली के मदर डेयरी का &#8216;मिक्स्ड वेजिटेबल&#8217; का पैकेट देखता हूँ, बड़े-बड़े कंपनियों के मुहर लगे रंगबिरंगे पैकेटों में दलिया (गेहूं, मकई, बजरा) देखता हूँ, सोने के भाव में बिकते तो न केवल माँ याद आती है, बल्कि यह &#8216;इनार&#8217; भी याद आता है। आज इसका याद आना शायद किसी &#8216;नेक वजह&#8217; के कारण, कुछ अच्छा होने के कारण हुआ है, ऐसा आभास हो रहा है। उस दिन गाँव से निकलते समय इस &#8216;इनार&#8217; के पास आकर कुछ देर रुका था। आज भी याद है। दोनों एक दूसरे को देख रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे यह &#8216;इनार&#8217; बिलखते हुए कह रहा हो, &#8216;मैं तुम्हें पाताल की गहराई से, अपने अस्तित्व (पानी) की कसम खाकर कहता हूँ, मैं तुम्हें अन्तःमन से आशीष देता हूँ, तुम अपने जीवन में सफल हो। जिस यात्रा के लिए तुम आज पहला कदम उठा रहे हो, अपने मकसद को जरुर हासिल करोगे। जीवन में बहुत मित्र मिलेंगे जो मित्रता निभाने में कभी कोताही नहीं करेंगे, जैसे मैं। जब तुम मनुष्य हो जाओ, मुझे मत भूलना। मुझे अभी बहुत दिन जीवित रहने की चाहत है। मैं तुम्हारे पूर्वजों को भी देखा हूँ। तुम्हें भी देख रहा हूँ। गाँव के, टोले के बच्चों के साथ खेलना-कूदना है, हंसना-मुस्कुराना है मुझे अभी। समाज के लोग भले मुझे, मेरे अस्तित्व (पानी) को &#8216;अछूत समझकर तिरस्कृत कर दें, लोग अपने-अपने घरों में पानी का बंदोबस्त भले कर लें; लेकिन उस दिन तक मैं अपने अंदर पानी की बुँदे समेट कर रखूँगा &#8211; एक विश्वास के साथ।&#8221; मुद्दत बाद शायद उसकी बातें सच होने वाला है। साठ-साल पहले इसका जीर्णोद्धार मेरे दादाजी की इकलौती बहन की थी, साल 1964 था। हम इसे एक नई जिंदगी देना चाहते हैं ताकि आज ही नहीं, आने वाली पीढ़ियां भी इसके मीठे पानी का स्वाद लेकर अपनी आत्मा को तृप्त कर सके।&#8221;</p>
<p>कुछ समय पूर्व &#8216;जागरण&#8217; समाचार पत्र में एक कहानी पढ़ा था जिसमें लिखा था &#8216;मिथिला में एक कहावत मशहूर है &#8211; पग-पग पोखरि माछ मखान&#8217; &#8211; लेकिन यह आज महज एक इतिहास के पन्नों में है और अगर मिथिला के लोग आज भी इन कहावतों को दुहरा रहे हैं तो हमें स्पष्ट रूप से समझना चाहिए कि &#8216;वे झूठ बोल रहे हैं, लोगों को अपने लाभ के लिए बरगला रहे हैं। क्योंकि किसी ज़माने में भले मिथिला क्षेत्र के गाँव-जिले-प्रखंड तालाबों, पोखरों, कुओं के लिए विश्वविख्यात रहा हो, वर्तमान काल में यह विशिष्ट पहचान खतरे में है। आज जिस कदर लोगों की आखों में पानी सुख रहा है, लोगों की संवेदना समाप्त हो रही है, तालाब, पोखर, कुएं, इनारों की स्थिति &#8216;ह्रदय विदारक&#8217; है। कई ऐतिहासिक तालाब आज समतल हो गए हैं। गाँव की आर्थिक उन्नति का स्त्रोत लगभग सूख सा गया है। </p>
<p><strong>दिल्ली के जंतर-मंतर पर मिथिला के लोग भले स्वयं को &#8216;अपने प्रदेश के तालाब-पोखरों की मछली&#8217; की संस्कृति के साथ जोड़कर राजनीतिक गलियारे में कहावतों का बाजारीकरण करते हों, हकीकत यह है कि आज मिथिला में जितनी मछली उपलब्ध है, वह अपने क्षेत्र के दो-फीसदी लोगों का उदर नहीं भर सकती है। और यही कारण है कि आज मिथिला के लोगों को आंध्र प्रदेश और बंगाल की मछलियों पर, समुद्री मछलियों पर निर्भर होना पड़ता है। कहते हैं उन दिनों यहां तालाबों की संख्या अधिक रहने के कारण एक साथ कई तरह के पैदावार होते थे। लोगों का जीवन खुशहाल था। तालाबों से आर्थिक उन्नति का गणित इसे सबसे अलग करता था। तालाब खुदवा कर उसके मुहाने पर पान की खेती, तालाब में मछली व मखान व कहीं -कहीं मुहाना पर आम की खेती करते थे। तालाब के पानी से खेतों में सचाई भी करते थे। लेकिन अब वैसी बात नहीं है। </strong></p>
<p>मिथिला क्षेत्र में प्राचीन काल से ही बड़े-बड़े तालाब खुदवाने की परंपरा थी। जिसे मध्यकाल ले दरभंगा महाराज ने बरकरार रखा। जिले में उनके द्वारा अनेकानेक तालाब खुदवाए गए जो आज भी विद्यमान हैं। हमारे गाँव उजान का शंकड़ी पोखर, महाशय झा पोखर, चंदा झा पोखर, दुर्गा-स्थान का पोखर, अवाम गाँव का भिखिया झा पोखर, लखनौर, रहिका, कपिलेश्वर, अररिया संग्राम, चनौरागंज, वीरसायर, मंगरौनी, बासोपट्टी का बभनदेई तालाब, सतलखा का पद्मसागर तालाब इसका ज्वलंत उदहारण है। </p>
<p>परन्तु, मिथिला क्षेत्र में तालाब का रख रखाव नहीं होने से कालांतर में यह अपना अस्तित्व समाप्त करने लगा। यह भी कहा जाता है कि जिसने भी इन पोखरों और तालाबों का सरकार से बंदोवस्ती ली वह सिर्फ उसका दोहन ही किया। इसके रखरखाव पर न तो सरकार और न ही बंदोवस्ती वालों ने ध्यान दिया। जिस कारण तालाबों की दशा दिन प्रतिदिन खराब होती चली गई। इसके सूखने से पानी की कमी के कारण मुहाना पर पान की खेती भी समाप्त सी हो गई। नए वृक्ष लगाने की ओर नई पीढी ने ध्यान नहीं दिया। जिस कारण तालाबों-मछलियों-पानों-मखानों के जरिए मिथिला को मिली पहचान पर भी ग्रहण लग गया। इतना ही नहीं, आज जिस कदर मिथिला के लोग &#8216;मिथिला के पाग&#8217; का &#8216;व्यापारीकरण&#8217; और &#8216;राजनीतिकरण&#8217; कर रहे हैं, आने वाले दिनों में इसकी स्थिति वैसी ही होगी, जैसी पोखरों की, तालाबों की, कुओं की, इनारों की। </p>
<p>मिथिला को तालाबों की भूमि कहा जा सकता है। कागजों पर दरभंगा जिले में 9115 और मधुबनी जिले में 10,746 तालाब हैं। इसी तरह, उत्तरी बिहार के सुपौल, सीतामढ़ी, समस्तीपुर और अन्य जिलों में तालाबों की संख्या 5000 से 9000 तक है। लेकिन तालाब का अस्तित्व, एक बहुमूल्य जल संसाधन, भूमि/तालाब माफियाओं, अपराधियों, लालची और भ्रष्ट व्यक्तियों के बीच गठजोड़ के कारण खतरनाक खतरे में है। डॉ. एस एच बज्मी की रिपोर्ट के अनुसार, 1989-90 में दरभंगा शहर में 213 तालाब थे। उल्लेखनीय है कि 50 से अधिक तालाबों को पूरी तरह से समतल कर दिया गया है, और उन पर मकान, होटल, दुकानें, व्यावसायिक परिसर, निजी अस्पताल, कोचिंग सेंटर और कार्यालय बनाए गए हैं। आज भी, माननीय उच्च न्यायालय और भारत के सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न आदेशों की घोर अवहेलना करते हुए तालाब के क्षेत्र और उसके पानी के बिस्तर पर अतिक्रमण और कब्जा किया जा रहा है।</p>
<p><strong>तालाब अपने इतिहास की शुरुआत से ही भारतीय संस्कृति से जुड़ा हुआ है। तालाब और जल निकाय के निर्माण और रखरखाव के लिए विस्तृत निर्देश और मानदंड हैं। ऋग्वेद में हमें इसके बारे में सबसे प्रारंभिक जानकारी मिलती है। गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र के संकलन के दौरान, 800 से 300 ईसा पूर्व के बीच, तालाब की खुदाई और संरक्षण ने धार्मिक महत्व प्राप्त किया। इन धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति, पुरुष या महिला, जाति, पंथ या वर्ग के बावजूद, तालाब की खुदाई और समाज और सभी प्रजातियों की भलाई के लिए संबंधित यज्ञ (धार्मिक अनुष्ठान) करने के लिए सराहना की जाती है। विष्णुधर्मसूत्र ऐसे व्यक्तियों को आशीर्वाद और वरदान के योग्य मानता है। एक प्रख्यात संस्कृत कवि, बन्न भट्ट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक कादंबरी (700 ईस्वी) में तालाब को सबसे पवित्र कार्यों में से एक माना है।</strong></p>
<p>संस्कृत विद्वानों के साथ चर्चा पर आधारित तथ्यों के आधार पर डॉ. सदा नंद झा, डॉ. विद्याेश्वर झा, डॉ. विश्वेश्वर झा, और डॉ. हेतुकर झा द्वारा &#8216;मिथिला के ग्रामीण जीवन में तालाब का महत्व&#8217; से सम्बंधित एक प्रकाशन के आधार पर कहा जा सकता है कि किसी को अपनी परंपरा और संस्कृति की अच्छी प्रथाओं और महान विचारों को संरक्षित, अनुकूलित और बढ़ावा देना चाहिए। वर्धमान उपाध्याय ने तालाब के धार्मिक अनुष्ठानों (यज्ञ) के लिए 11 वीं और 12 वीं ईस्वी के बीच कहीं दो किताबें, अर्थात् तारगमृतलता और जलाशायदिवस्तुपधाति लिखीं। इन पुस्तकों का मुख्य संदेश इस प्रकार है &#8220;त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश नाम के तीन देवता) की उपस्थिति में, मैं (तालाब-निर्माता) इस तालाब को सभी जीवित प्राणियों (मानव, पशु, पक्षी कहते हैं) को प्रस्तुत करता हूं। और कीट) पीने, नहाने, जीवित रहने और ताकत के लिए पानी की उनकी विभिन्न जरूरतों को पूरा करने के लिए। धार्मिक अनुष्ठानों की प्रक्रिया के दौरान, धातु से बनी मछली, घोंघा, केकड़ा, कछुआ, सांप और मगरमच्छ को उनके पानी की स्वच्छता (निर्मल जल) बनाए रखने के लिए विनम्र अनुरोध के साथ नव निर्मित तालाब में विसर्जित किया जाता है। पुस्तक में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि जब एक तालाब निर्माता अपने तालाब को सभी जीवित प्राणियों को प्रस्तुत करता है, तो वह तालाब पर स्वामित्व का दावा नहीं कर सकता है। तालाब बनाने वाले को तालाब का लाभ प्राप्त करने का उतना ही अधिकार है जितना कि अन्य व्यक्ति या जीवित प्राणी को।</p>
<p>बहरहाल, माननीय सर्वोच्च न्यायालय भी देश झीलों और अन्य सार्वजनिक तालाबों, पोखरों, कुओं या जल के अन्य साधनों की रक्षा करने की भयानक स्थिति को पीड़ा के साथ देख रहा है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने लगातार यह माना है कि वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लाभ के लिए हमें इन प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित और संरक्षित रखना होगा। ताकि सभी के लिए जल सुरक्षा का निर्माण किया जा सके और पारंपरिक आजीविका का समर्थन करने और जैव विविधता के संरक्षण के लिए भी।  </p>
<p>ज्ञातव्य हो कि &#8216;हिंच लाल तिवारी बनाम कमला देवी व अन्य (अपील (नागरिक) 2001 का 4787) में माननीय न्यायालय ने आदेश दिया था कि &#8216;यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि समुदाय के भौतिक संसाधन जैसे जंगल, तालाब, तालाब, पहाड़ी, पहाड़ आदि प्रकृति की देन हैं। वे नाजुक पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं। उन्हें एक उचित और स्वस्थ वातावरण के लिए संरक्षित करने की आवश्यकता है जो लोगों को एक गुणवत्तापूर्ण जीवन का आनंद लेने में सक्षम बनाता है जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत अधिकार का सार है।&#8217; इसी तरह &#8216;जगपाल सिंह और अन्य&#8217; बनाम पंजाब राज्य और अन्य (सिविल अपील संख्या 1132/2011) में माननीय न्यायालय ने झीलों/तालाबों के प्रबंधन और संरक्षण के संबंध में कानून और व्यवहार की व्याख्या को सार्वजनिक रूप से मौलिक रूप से निर्धारित किया। इसके अलावा, वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लाभ के लिए ऐसे जल निकायों के संरक्षण के कार्य पर विचार करते हुए, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निम्नानुसार निर्देश दिया है: &#8220;इस आदेश की एक प्रति भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सभी मुख्य सचिवों को भेजी जाए जो इस आदेश का कड़ाई से और शीघ्र अनुपालन सुनिश्चित करेंगे और समय-समय पर इस न्यायालय को अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/this-darbhanga-well-is-going-to-be-lively">दरभंगा के &#8216;उजान&#8217; गाँव के &#8216;कनकपुर&#8217; टोला में स्थित कोई 200 साल से अधिक पुराना यह कुआं &#8216;जीवंत&#8217; होने वाला है, लिख लें&#8230;..</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>अबोध बच्चों का कसूर: वे गरीब हैं, उनके माता पिता भी बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य की मांग किसी से नहीं कर सकते, नीतीश कुमार से भी नहीं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Desk Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 29 Apr 2022 11:51:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>बिहार के बेगूसराय जिला से डॉ रमन झा लिखते हैं: ये है भारत के विकास की असली रफ्तार और ये है सामाजिक न्याय का टूटा हुआ वह मंदिर जिसके दम पर हम सबके साथ-सबका विकास और एक समृद्ध व विकसित भारत देश का स्वप्न देख रहे हैं&#8230; जी हाँ यह है 1988 में स्थापित प्राथमिक [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बिहार के बेगूसराय जिला से डॉ रमन झा लिखते हैं: ये है भारत के विकास की असली रफ्तार और ये है सामाजिक न्याय का टूटा हुआ वह मंदिर जिसके दम पर हम सबके साथ-सबका विकास और एक समृद्ध व विकसित भारत देश का स्वप्न देख रहे हैं&#8230; जी हाँ यह है 1988 में स्थापित प्राथमिक विद्यालय सुग्गा मुसहरी, बखरी बेगूसराय जो जन्म से ही  विकलांग है। </strong></p>
<p>गरीबी व बदहाली के बीच अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा से भी महरूम  महादलितों की इस वस्ती के अधिकांशतः लोग वर्त्तमान में नशापान को ही अपनी जिंदगी का कीमती वक्त सौंप चुके हैं। ना जाने किनके और कितने सद्प्रयासों के बाद आज से 40 वर्ष पूर्व इस प्रारंभिक पाठशाला की नींव आजादी के बाद पहली बार इस गाँव में पड़ी थी ताकि यहाँ का भी समाज बदले। परन्तु दुर्भाग्य है कि अपने जन्म से ही यह उपेक्षा का शिकार ही हमेंशा होता रहा है। </p>
<p>जानकारी तो यह है कि 1988 से 2020 तक तो यह सिर्फ कागजों पर ही चला। अब जाकर कुछेक शिक्षक बिना दरवाजे व खिड़कियों के इस अधूरे व जीर्ण-शीर्ण सामुदायिक भवन में नौकरी बजाने का काम करने लगे हैं। अभावग्रस्त महादलितों की इस वस्ती के अबोध बच्चों का सिर्फ यही कसूर है कि वे गरीब हैं और उनके माता पिता वोट के बदले अपने नौनिहालों के बेहतर शिक्षा व स्वास्थ्य की माँग किसी से नहीं कर सकते और शराब तारी व नशा को ही अपने जीवन के साथ जोड़ने को विवश हैं। </p>
<p>विश्वमाया चैरिटेबल ट्रस्ट ने इस विद्यालय के बच्चों के सपनो को नई उड़ान देने के लिये यहाँ कार्यरत शिक्षकों, टोला सेवकों,समुदाय के लोगों,शिक्षा विभाग के अधिकारियों व अपने स्वयंसेवकों को साथ लेकर नये सिरे से एक पहल शुरू करने की कोशिश शुरू की है और उम्मीद है कि कुछ वर्षों तक काम करने के पश्चात इस वस्ती में शिक्षा का दीप अनवरत जले और यहाँ की दुनिया बदले&#8230;.!</p>
<p>आओ कुछ करें &#8211; उनके लिए  </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/public-voice/poor-cant-demand-foe-better-education">अबोध बच्चों का कसूर: वे गरीब हैं, उनके माता पिता भी बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य की मांग किसी से नहीं कर सकते, नीतीश कुमार से भी नहीं</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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