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	<title>ban Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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		<title>दिल्ली उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी में भीख मांगने को अपराध की श्रेणी से बाहर किया</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Aug 2018 11:04:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कानून]]></category>
		<category><![CDATA[ban]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>​नई दिल्ली: ​दिल्ली उच्च न्यायालय ने आज राष्ट्रीय राजधानी में भीख मांगने को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया और कहा कि इस कृत्य को दंडित करने के प्रावधान असंवैधानिक हैं और उन्हें रद्द किया जाना चाहिए। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और न्यायमूर्ति सी हरि शंकर की एक पीठ ने कहा कि इस [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>​नई दिल्ली: ​दिल्ली उच्च न्यायालय ने आज राष्ट्रीय राजधानी में भीख मांगने को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया और कहा कि इस कृत्य को दंडित करने के प्रावधान असंवैधानिक हैं और उन्हें रद्द किया जाना चाहिए। </p>
<p>कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और न्यायमूर्ति सी हरि शंकर की एक पीठ ने कहा कि इस फैसले का अपरिहार्य नतीजा यह होगा कि इस अपराध के कथित आरोपी के खिलाफ बंबई के भीख मांगना रोकथाम कानून के तहत लंबित मुकदमा रद्द किया जा सकेगा। अदालत ने कहा कि इस मामले के सामाजिक और आर्थिक पहलू पर अनुभव आधारित विचार करने के बाद दिल्ली सरकार भीख के लिए मजबूर करने वाले गिरोहों पर काबू के लिए वैकल्पिक कानून लाने को स्वतंत्र है।</p>
<p><em>अदालत ने 16 मई को पूछा था कि ऐसे देश में भीख मांगना अपराध कैसे हो सकता है जहां सरकार भोजन या नौकरियां प्रदान करने में असमर्थ है। उच्च न्यायालय भीख को अपराध की श्रेणी से हटाने की मांग वाली दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था।</em></p>
<p>केंद्र सरकार ने कहा था कि बंबई के भीख मांगने पर रोकथाम कानून में पर्याप्त संतुलन है। इस कानून के तहत भीख मांगना अपराध की श्रेणी में है। हर्ष मंडर और कर्णिका साहनी की जनहित याचिकाओं में राष्ट्रीय राजधानी में भिखारियों के लिए मूलभूत मानवीय और मौलिक अधिकार मुहैया कराए जाने का अनुरोध किया गया था। याचिकाकर्ताओं ने बंबई के भीख मांगने पर रोकथाम कानून को भी चुनौती दी है।</p>
<p>दिल्ली की सड़कों पर करीब ​७०,००० भिखारी ​हैं। उनमें से एक तिहाई की उम्र 18 साल से कम ​हैं। देश के दूसरे हिस्सों से ग़रीबी से बचने की कोशिश में बच्चे दिल्ली आते हैं और यहां भीख मांगने लग जाते हैं. इनमें से कुछ घर से भाग कर आते हैं और कुछ परिवार के साथ रहकर भीख मांगते ​हैं। ज़्यादातर बाल भिखारी व्यस्त चौराहों, बाज़ारों, धार्मिक स्थलों और रेलवे स्टेशन जैसी जगहों पर होते ​हैं।  व्यस्त जगहों पर भीख मांगने से उन्हें ज़्यादा पैसे मिलने की संभावना बढ़ जाती ​हैं। कई ग़रीब परिवार मानते हैं कि उनके पास बच्चों को भीख मांगने में लगाने के अलावा और कोई चारा नहीं है </p>
<p>पुलिस और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि हर साल हज़ारों बच्चों को घर से अगवा कर लिया जाता है और उन्हें भीख मांगने पर मजबूर किया जाता ​हैं। बाल अधिकार कार्यकर्ता कहते हैं कि इन बच्चों को भूखा रहने पर मजबूर किया जाता है ताकि वो कमज़ोर दिखें और उन्हें सहानुभूति मिल सके. बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि &#8216;भीख माफ़िया&#8217; बच्चों को विकलांग बना देता है क्योंकि विकलांग बच्चों को ज़्यादा भीख मिलती ​है। सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक इनमें से कई बच्चे नशीली दवाओं के आदी बन जाते हैं और यौन शोषण के भी शिकार होते ​हैं। इन बच्चों की सुरक्षा और इनकी हालत में सुधार के लिए केंद्र सरकार ने कोई क़ानून नहीं बनाया ​है।  </p>
<p>​बहरहाल, ​भारत के संविधान में भीख मांगने को अपराध कहा गया है। फिर देश की सड़कों पर एक करोड़ बच्चे भीख आखिर कैसे मांगते हैं? बच्चों का भीख मांगना केवल अपराध ही नहीं है, बल्कि देश की सामाजिक सुरक्षा के लिए खतरा भी है। हर साल कितने ही बच्चों को भीख मांगने के ‘धंधे’ में जबरन धकेला जाता है। ऐसे बच्चों के आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होने की काफी आशंका होती है। बहुत से बच्चे मां-बाप से बिछड़कर या अगवा होकर बाल भिखारियों के चंगुल में पड़ जाते हैं। फिर उनका अपने परिवार से मिलना बेहद मुश्किल हो जाता है। पुलिस रेकॉर्ड के अनुसार, हर साल 44 हजार बच्चे गायब होते हैं। उनमें से एक चौथाई कभी नहीं मिलते। कुछ बच्चे किसी न किसी वजह से घर से भाग जाते हैं। कुछ को किसी न किसी वजह से उनके परिजन त्याग देते हैं। ऐसे कुल बच्चों की सही संख्या किसी को नहीं मालूम!</p>
<p>ये तो पुलिस में दर्ज आंकड़े हैं। इनसे कई गुना केस तो पुलिस के पास पहुंचते ही नहीं। फिर भी, हर साल करीब 10 लाख बच्चों के अपने घरों से दूर होकर अपने परिजन से बिछड़ने का अंदेशा है। उन बच्चों में से काफी बच्चे भीख मंगवाने वाले गिरोहों के हाथों में पड़ जाते हैं। यानी हर साल हजारों गायब बच्चे भीख के धंधे में झोंक दिये जाते हैं। इन बच्चों का जीवन ऐसी अंधेरी सुरंग में कैद होकर रह जाता है, जिसका कोई दूसरा छोर नहीं होता। इनसे जीवन की सारी खुशियां छीन ली जाती हैं। भारत में ज्यादातर बाल भिखारी अपनी मर्जी से भीख नहीं मांगते। वे संगठित माफिया के हाथों की कठपुतली बन जाते हैं। तमिलनाडु, केरल, बिहार, नई दिल्ली और ओडिशा में यह एक बड़ी समस्या है। हर आर्थिक पृष्ठभूमि के बच्चों का ऐसा हश्र होता है। इन बच्चों के हाथों में स्कूल की किताबों की जगह भीख का कटोरा आ जाता है। </p>
<p>भारत के मानवाधिकार आयोग की रपट के मुताबिक, हर साल जो हजारों बच्चे चुराये जाते हैं या लाखों बच्चे गायब हो जाते हैं, वे भीख मांगने के अलावा अवैध कारखानों में अवैध बाल मजदूर, घरों या दफ्तरों में नौकर, पॉर्न उद्योग, वेश्यावृत्ति के जाल में फंस जाते हैं। समाज को सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर काम करना होगा। तब बाल भिखारियों के पुनर्वसन की जरूरत होगी। उनकी शिक्षा, सेहत और आर्थिक जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी निभानी होगी।​ (भाषा के सहयोग से)  ​</p>
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		<title>सर्वोच्च न्यायालय : धार्मिक परम्पराएं और रीति -रिवाज संविधान के सिंद्धान्तो के अनुरूप होनी चाहिए</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 Jul 2018 11:21:43 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[कानून]]></category>
		<category><![CDATA[ban]]></category>
		<category><![CDATA[court]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से १७५ किमी की दूरी ​पर पम्पा है और वहाँ से चार किमी की दूरी पर पश्चिम घाट से सह्यपर्वत श्रृंखलाओं के घने वनों के बीच, समुद्रतल से लगभग १००० मीटर की ऊंचाई पर​ प्रसिद्द शबरीमला मंदिर है। ​इस मंदिर में 10-50 साल के आयुवर्ग की महिलाओं का प्रवेश वर्जित ​है। [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से १७५ किमी की दूरी ​पर पम्पा है और वहाँ से चार किमी की दूरी पर पश्चिम घाट से सह्यपर्वत श्रृंखलाओं के घने वनों के बीच, समुद्रतल से लगभग १००० मीटर की ऊंचाई पर​ प्रसिद्द शबरीमला मंदिर है। ​इस मंदिर में 10-50 साल के आयुवर्ग की महिलाओं का प्रवेश वर्जित ​है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि प्रवेश वर्जित ​करने जैसे रीति रिवाज अथवा धार्मिक प्रथाओं को संविधान के सिद्धांतों के अनुरूप होना होगा।</strong> </p>
<p>प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का हवाला देते हुये कहा कि किसी भी व्यक्ति को सिर्फ &#8220;सार्वजनिक स्वास्थ,सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता&#8221; के आधार पर रोका जा सकता है। </p>
<p>संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ भी शामिल हैं। पीठ ने टिप्पणी की कि 1950 में संविधान लागू होने के बाद सभी कुछ संविधान के दायरे में है।</p>
<p>कंब रामायण, महाभागवत के अष्टम स्कंध और स्कंदपुराण के असुर कांड में जिस शिशु शास्ता का जिक्र है, अयप्पन उसी के अवतार माने जाते हैं। कहते हैं, शास्ता का जन्म मोहिनी वेषधारी विष्णु और शिव के समागम से हुआ था। उन्हीं अयप्पन का मशहूर मंदिर पूणकवन के नाम से विख्यात 18 पहाडि़यों के बीच स्थित इस धाम में है, जिसे सबरीमला श्रीधर्मषष्ठ मंदिर कहा जाता है। यह भी माना जाता है कि परशुराम ने अयप्पन पूजा के लिए सबरीमला में मूर्ति स्थापित की थी। कुछ लोग इसे रामभक्त शबरी के नाम से जोड़कर भी देखते हैं।​ मक्का-मदीना के बाद यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है, जहां हर साल करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं।​ शबरीमला शैव और वैष्णवों के बीच की अद्भुत कड़ी है। </p>
<p>न्यायालय ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब 800 साल पुराने भगवान अय्यप्पा मंदिर का संचालन करने वाले त्रावंकोर देवास्वम बोर्ड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि न्यायालय को यह परखना होगा कि क्या यह प्रथा सही विश्वास पर आधारित है जो एक समुदाय में सदियों से चली आ रही है। लोगों का मानना है श्री अयप्पन ब्रह्माचारी थे। इसलिए यहां वे छोटी बच्चियां आ सकती हैं, जो रजस्वला न हुई हों या बूढ़ी औरतें, जो इससे मुक्त हो चुकी हैं। </p>
<p>उन्होंने कहा कि देश की मस्जिदों में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति नहीं है और आस्था पर आधारित इन परंपराओं के परखने से मुद्दों का पिटारा खुल जायेगा। पीठ ने सिंघवी से कहा कि देवस्वाम बोर्ड को यह स्थापित करना होगा कि एक निश्चित आयु वर्ग की महिलाओं का प्रवेशन वर्जित करना धार्मिक परपंरा का आवश्यक और अनिवार्य हिस्सा है। </p>
<p>पीठ ने केरल उच्च न्यायालय में बोर्ड के कथन में अंतर्विरोध की ओर ध्यान आकर्षित किया और कहा कि यह स्वीकार्य स्थिति थी कि तीर्थयात्रा शुरू होने पर पहले पांच दिन सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्गो की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति होती थी और इसके बाद भीड़ बढ़ने की वजह से उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया था। </p>
<figure id="attachment_688" aria-describedby="caption-attachment-688" style="width: 300px" class="wp-caption alignnone"><img decoding="async" src="http://www.sundaypost.in/wp-content/uploads/2018/07/rsz_1c-300x164.jpg" alt="शबरीमला मंदिर परिसर में श्रद्धालुगण " width="300" height="164" class="size-medium wp-image-688" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/07/rsz_1c-300x164.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/07/rsz_1c-768x420.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/07/rsz_1c-1024x561.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/07/rsz_1c-910x498.jpg 910w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/07/rsz_1c-696x381.jpg 696w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/07/rsz_1c-1068x585.jpg 1068w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/07/rsz_1c-767x420.jpg 767w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2018/07/rsz_1c-1920x1051.jpg 1920w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /><figcaption id="caption-attachment-688" class="wp-caption-text">शबरीमला मंदिर परिसर में श्रद्धालुगण</figcaption></figure>
<p>इससे पहले, 19 जुलाई को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने केरल के इस प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर में 10-50 आयु वर्ग की महिलाओं का प्रवेश वर्जित करने के औचित्य पर सवाल उठाया था। पीठ का कहना था कि महिलाओं में दस वर्ष की आयु से पहले भी मासिक धर्म शुरू हो सकता है।  इस मामले में न्याय मित्र की भूमिका में वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचन्द्रन का कहना था कि एक विशेष आयु वर्ग की महिलाओं को अलग करना उन्हें अछूत मानने जैसा है जो संविधान के अनुच्छेद 17 में निषिद्ध है। </p>
<p>पीठ इस तर्क से सहमत नहीं थी और उसका कहना था कि संविधान का अनुच्छेद 17 इस मामले में शायद लागू नहीं हो सके क्योंकि मंदिर में प्रवेश से वंचित की जा रही महिलाओं में सवर्ण वर्ग की भी हो सकती हैं और यह प्रावधान सिर्फ अनुसूचित जातियों से संबंधित है। केरल सरकार ने पहले न्यायालय से कहा था कि वह इस मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में है। </p>
<p>सबरीमला मंदिर में दस से पचास आयु वर्ग की महिलाओं का प्रवेश वर्जित होने की व्यवस्था को &#8216;इंडियन यंग लायर्स एसोसिएशन’ और अन्य ने चुनौती दे रखी है। </p>
<p>बहरहाल, कुछ लोगों का कहना है कि करीब 700-800 साल पहले दक्षिण में शैव और वैष्णवों के बीच वैमनस्य काफी बढ़ गया था। तब उन मतभेदों को दूर करने के लिए श्री अयप्पन की परिकल्पना की गई। दोनों के समन्वय के लिए इस धर्मतीर्थ को विकसित किया गया। आज भी यह मंदिर समन्वय और सद्भाव का प्रतीक माना जाता है। यहां किसी भी जाति-बिरादरी का और किसी भी धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति आ सकता है। यह मंदिर स्थापत्य के लिहाज से तो खूबसूरत है ही, यहां एक अजीब किस्म की शांति का अहसास भी होता है। जिस तरह यह 18 पहाडि़यों के बीच स्थित है, उसी तरह मंदिर के प्रांगण में पहुंचने के लिए भी 18 सीढि़यां पार करनी पड़ती हैं। मंदिर में अयप्पन के अलावा मालिकापुरत्त अम्मा, गणेश और नागराजा जैसे उप देवताओं की भी मूर्तियां हैं।</p>
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