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	<title>archeology Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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	<description>आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</description>
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		<title>&#8216;गोद भराई&#8217; में 60+% की गिरावट: न &#8216;महिला&#8217;, ना &#8216;पुरुष&#8217; सांसद &#8216;गांवों को गोद&#8217; लेना चाहते; ना ही सरकारी, गैर-सरकारी क्षेत्र के निकाय &#8216;धरोहरों को&#8217;</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/major-downfall-in-adiopt-a-village-and-adopt-ke-heritage</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 29 Apr 2026 04:04:14 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[adopt a village]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली: बारह वर्ष पहले जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री पद के लिए शपथ लिए थे, उन्होंने अक्टूबर महीने के दूसरे सप्ताह में, भारत के संसद के दोनों सदनों के सांसदों से कहा था कि वे अपने और अपनी अर्धांगिनी के गाँव को छोड़कर किसी भी ग्राम पंचायत को आदर्श ग्राम के रूप में [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली: बारह वर्ष पहले जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री पद के लिए शपथ लिए थे, उन्होंने अक्टूबर महीने के दूसरे सप्ताह में, भारत के संसद के दोनों सदनों के सांसदों से कहा था कि वे अपने और अपनी अर्धांगिनी के गाँव को छोड़कर किसी भी ग्राम पंचायत को आदर्श ग्राम के रूप में विकसित कर सकते हैं। मैदानी इलाकों में स्थित होने पर गांव की आबादी 3000-5000 होनी चाहिए, जबकि पहाड़ी इलाकों में स्थित होने पर यह आबादी 1000-3000 होनी चाहिए। लोकसभा सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्र से एक गाँव चुन सकते हैं, और राज्यसभा सांसद उस राज्य से एक गाँव चुन सकते हैं जहाँ से वे चुने गए हैं। मनोनीत सदस्य देश के किसी भी जिले से एक गाँव चुन सकते हैं। शहरी निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद पड़ोसी ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र से एक गाँव चुन सकते हैं।</strong> </p>
<figure id="attachment_7671" aria-describedby="caption-attachment-7671" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-2.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7671" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7671" class="wp-caption-text">दक्षिण दिल्ली के महरौली स्थित एक विरासत। तस्वीर: संजय शर्मा<br /></figcaption></figure>
<p>इस योजना के तहत, सांसदों को 2019 तक तीन-तीन गांवों और 2024 तक कुल आठ-आठ गांवों के सामाजिक-आर्थिक और भौतिक बुनियादी ढांचे के विकास की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पहला आदर्श ग्राम 2016 तक विकसित किया जाना था, और दो और 2019 तक। 2019 से 2024 तक, प्रत्येक सांसद को पांच और आदर्श ग्राम विकसित करने थे। यानी 2,65,000 ग्राम पंचायतों में से कुल 6,433 आदर्श ग्राम 2024 तक बनना तय था। इस योजना के लिए कोई नया कोष आवंटित नहीं किया गया है। कोष जुटाने के लिए इंदिरा आवास योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और पिछड़े क्षेत्रों के अनुदान कोष आदि जैसी मौजूदा योजनाओं से प्राप्त धनराशि का उपयोग करने के साथ-साथ सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीएलएडीएस), ग्राम पंचायत का अपना राजस्व, केंद्रीय एवं राज्य वित्त आयोग अनुदान, और कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व निधि से करना था । </p>
<figure id="attachment_7672" aria-describedby="caption-attachment-7672" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-4.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7672" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7672" class="wp-caption-text">चांदनी चौक स्थित बेगम फरजाना का महल । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<blockquote><p>2014 में शुरू हुई &#8216;सांसद आदर्श ग्राम योजना&#8217; के तहत, सांसदों ने लगभग 3,154 &#8211; 3,390 ग्राम पंचायतों (गाँवों) की पहचान की है या उन्हें गोद लिया है। इस योजना का उद्देश्य आदर्श गांवों का विकास करना था। अगस्त 2023 तक पिछले पांच वर्षों में 1,782 ग्राम पंचायतों को गोद लिया गया । इस योजना का शुरुआती लक्ष्य था कि प्रत्येक सांसद 2016 तक एक गाँव और 2019 तक दो और गाँव गोद ले, और 2024 तक कुल 6,433 आदर्श गांव का निर्माण करें।</p></blockquote>
<figure id="attachment_7673" aria-describedby="caption-attachment-7673" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-5.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7673" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7673" class="wp-caption-text">महरौली स्थित जफ़र महल की दीवारें  । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>एक रिपोर्ट के अनुसार, पहले चरण (2014-2016) में लगभग 703 सांसदों ने गाँव गोद लिए थे। साल 2014–15 से 2022–23 तक सांसदों ने 3,154 ग्राम पंचायतों को गोद लिया। पहले चरण के बाद गोद लेने की दर में काफी गिरावट आई। बाद के चरणों में, फ़रवरी 2018 तक केवल 97 लोकसभा और 27 राज्यसभा सांसदों ने गांवों को गोद लिया। पहले चरण (2014–16) में लगभग 500 लोकसभा और 203 राज्यसभा सांसदों ने हिस्सा लिया। दूसरे चरण में, गोद लेने की संख्या घटकर 326 लोकसभा और 121 राज्यसभा सांसदों तक रह गई। 2024 की शुरुआत तक, नए गांवों को गोद लेने की दर 2014 की तुलना में 60% कम हो गई है। वैसे सरकार का दवा है कि अब तक राज्य सरकारों द्वारा लगभग 1,184 गाँव आदर्श ग्राम घोषित किए जा चुके हैं।</strong> </p>
<figure id="attachment_7674" aria-describedby="caption-attachment-7674" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-6.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-6.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7674" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-6.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-6-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-6-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-6-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-6-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7674" class="wp-caption-text">लालकिले का आतंरिक हिस्सा । तस्वीर: संजय शर्मा </figcaption></figure>
<p>आइये, अब &#8216;गांव को गोद लेने की कहानी को भारत के उपस्थित ऐतिहासिक धरोहरों को गोद लेने की कहानी से जोड़ते हैं। भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने &#8216;अपनी धरोहर &#8211; अपनी पहचान कार्यक्रम के तहत एक विरासत को गोद लें&#8217; परियोजना शुरू किया। यह पर्यटन मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों का एक साझा प्रयास है। इसका मकसद पूरे भारत में फैले ऐतिहासिक / प्राकृतिक / पर्यटन स्थलों पर पर्यटन से जुड़ी सुविधाओं को विकसित करना है, ताकि उन्हें एक योजनाबद्ध और चरणबद्ध तरीके से पर्यटकों के लिए ज्यादा सुविधाजनक बनाया जा सके। </p>
<figure id="attachment_7675" aria-describedby="caption-attachment-7675" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-9.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7675" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-9.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-9-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-9-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-9-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-9-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7675" class="wp-caption-text">सीरी फोर्ट के अवशेषों के बीच खड़ा एक मस्जिद । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>इस परियोजना का लक्ष्य सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र, कॉर्पोरेट नागरिकों, गैर-सरकारी संस्थाओं, व्यक्तियों और अन्य हितधारकों को ‘स्मारक मित्र&#8217; बनने के लिए प्रोत्साहित करना है। ये लोग कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व के तहत एक टिकाऊ निवेश मॉडल के रूप में, अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार, इन स्थलों पर बुनियादी और उन्नत पर्यटन सुविधाओं को विकसित करने और उन्हें बेहतर बनाने की ज़िम्मेदारी उठाने की बात कही गयी। वे इन सुविधाओं के संचालन और रखरखाव की देखरेख भी करेंगे, ऐसा तय किया गया। “एक विरासत को गोद लें&#8217; कार्यक्रम सबसे पहले पर्यटन मंत्रालय द्वारा सितंबर 2017 में शुरू किया गया था। इसका एक नया रूप, जिसका नाम “एक विरासत गोद लें 2.0” है, संस्कृति मंत्रालय द्वारा सितंबर 2023 में शुरू किया।</strong> </p>
<figure id="attachment_7676" aria-describedby="caption-attachment-7676" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-8.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7676" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7676" class="wp-caption-text">हौजखास के अवशेषों के बीच । तस्वीर: संजय शर्मा </figcaption></figure>
<p>इसका मकसद आगंतुकों के अनुभव को बेहतर बनाना और गोद लिए गए स्मारक को आगंतुक-अनुकूल बनाना है। इन सुविधाओं को चार मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है: स्वच्छता, जिसमें शौचालय, पीने का पानी, कचरा प्रबंधन, शिशु देखभाल कक्ष आदि शामिल हैं; पहुंच, जिसमें रास्ते, बाधा-मुक्त पहुंच, बैटरी से चलने वाले वाहन, संकेत, भूनिर्माण, वाई-फाई सुविधा, पार्किंग आदि शामिल हैं; सुरक्षा, जिसमें सीसीटीवी, रोशनी, प्रकाश व्यवस्था, क्लॉक रूम, प्राथमिक उपचार किट आदि शामिल हैं; और ज्ञान, जिसमें प्रकाशन, स्मृति चिन्ह कियोस्क, सांस्कृतिक/लाइट एंड साउंड शो, एआर/वीआर उपकरण, कैफेटेरिया आदि शामिल हैं।</p>
<figure id="attachment_7677" aria-describedby="caption-attachment-7677" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-10.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7677" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-10.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-10-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-10-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-10-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-10-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7677" class="wp-caption-text">दारा शिकोह का पुस्तकालय । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>इस कार्यक्रम के तहत, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार के पुरातत्व विभाग ने पहले ही बर्ड हेरिटेज फाउंडेशन के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया। लोधी रोड फ्लाईओवर के पास स्थित गोल गुंबद को बर्ड हेरिटेज फाउंडेशन ने सितंबर 2019 से सितंबर 2024 तक के लिए गोद लिया है। वसंत विहार स्थित बारा लाओ का गुंबद को बर्ड हेरिटेज फाउंडेशन ने दिसंबर 2019 से दिसंबर 2024 तक के लिए गोद लिया है। कश्मीरी गेट स्थित दारा शिकोह लाइब्रेरी बिल्डिंग को आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज ट्रस्ट और म्यूजियम एंड आर्ट कंसल्टेंसी ने मार्च 2021 से गोद लिया है। अगस्त 2024 तक 19 समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जिनमें पूरे भारत के कुल 66 स्मारक शामिल हैं।</p>
<figure id="attachment_7678" aria-describedby="caption-attachment-7678" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-11.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-11.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7678" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-11.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-11-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-11-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-11-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-11-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7678" class="wp-caption-text">दारा शिकोह का पुस्तकालय का पिछला हिस्सा  । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>इसके अलावा, छात्रों के बीच शहर के प्राचीन स्मारकों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए सीबीएससी ने भी ‘स्मारक गोद लेने&#8217; कार्यक्रम शुरू किया है। विरासत शिक्षा इसलिए महत्वपूर्ण है ताकि सक्रिय शिक्षण के माध्यम से छात्रों के लिए इतिहास और सामाजिक विज्ञान के पाठ्यक्रम को जीवंत बनाया जा सके, और छोटे बच्चों में जागरूकता बढ़ाई जा सके ताकि वे अतीत और वर्तमान की समझ के आधार पर अपना भविष्य गढ़ सकें। यह परियोजना स्कूलों को अपने आस-पास स्थित किसी भी चुने हुए स्मारक को गोद लेने और पूरे वर्ष विभिन्न गतिविधियाँ आयोजित करने में सक्षम बनाती है; इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि छात्रों को 100 वर्ष से अधिक पुराने इन स्मारकों के ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व के बारे में जानकारी मिल सके। </p>
<figure id="attachment_7679" aria-describedby="caption-attachment-7679" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-12.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7679" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-12.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-12-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-12-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-12-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-12-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7679" class="wp-caption-text">पुराना​ किला के अंदर खुदाई  । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>इस परियोजना के तहत, छात्रों को स्मारक के संरक्षण में मदद करने के लिए, स्मारक के अंदर और उसके आस-पास से झाड़ियाँ हटाने, साफ-सफाई और धूल-मिट्टी पोंछने जैसे काम करने की अनुमति दी जाती है। स्मारकों के संरक्षण और सुरक्षा से संबंधित विषयों पर जनता के लिए नाटक या लघु-नाटिकाएँ प्रस्तुत करने जैसी गतिविधियों को बोर्ड द्वारा पहले ही रेखांकित किया जा चुका है। इसके अलावा, अन्य गतिविधियों में चित्रकला प्रतियोगिता, प्रश्नोत्तरी, मिट्टी के मॉडल बनाना, वाद-विवाद और तत्काल भाषण, रचनात्मक लेखन, पोस्टर बनाना, फोटोग्राफी प्रदर्शनी और प्रतियोगिता, पोस्टकार्ड और ब्रोशर बनाने की प्रतियोगिता, स्मारक और उसके परिवेश से संबंधित कहानी सुनाने की प्रतियोगिता, तथा पौधे लगाना आदि शामिल हैं। पुरातत्व विभाग पूर्ण सहयोग प्रदान करता है और स्कूलों को CBSE द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, स्थानीय महत्व के किसी प्राचीन या ऐतिहासिक स्मारक को गोद लेने के लिए प्रोत्साहित करता है।</strong></p>
<figure id="attachment_7680" aria-describedby="caption-attachment-7680" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-14.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-14.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7680" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-14.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-14-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-14-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-14-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-14-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7680" class="wp-caption-text">​हुमायूँ किला परिसर के अंदर एक विरासत  । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<blockquote><p>लेकिन, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गोद लेने वाली प्रथा को देखते हैं, चाहे गाँव की बात हो, ग्राम पंचायत की बात हो, ऐतिहासिक धरोहरों की बात हो, उन तमाम लोक सभा, राज्य सभा के सांसदों, भारत के सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्रों के निकायों की मानसिकता और उनके गोद इतने छोटे पर गए हैं कि प्रधानमंत्री की बातों को वे सभी &#8216;राजनीतिक नज़रों&#8217; से ही देखते हैं। अगर औसा नहीं होता तो विगत 12 वर्षों में भारत के गाओं का कितना अधिक उन्नयन हुआ होता, या भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और संस्कृति मंत्रालय के अधिक आने वाले ऐतिहासिक पुरातत्वों और विरासतों का यह हाल नहीं होता &#8211; जो आज है। </p></blockquote>
<figure id="attachment_7682" aria-describedby="caption-attachment-7682" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-16.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-16.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7682" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-16.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-16-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-16-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-16-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-16-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7682" class="wp-caption-text">सफदरजंग का मकबरा । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>भारत सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के ज़रिए, नियमित रूप से 3,685 से ज़्यादा केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारकों का रखरखाव करती है। हाल के वर्षों में संरक्षण पर होने वाले खर्च में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है। 2024-25 तक हर साल ₹300 करोड़ से ज़्यादा खर्च किए जा रहे हैं। 2024-25 में पूरे भारत में केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारकों के संरक्षण, परिरक्षण और रखरखाव पर लगभग ₹313.04 करोड़ खर्च किए गए। साल 2023-24 में खर्च ₹443.53 करोड़, 2022-23 में ₹391.93 करोड़ और 2021-22 में ₹269.57 करोड़ था। जबकि पुरानी दिल्ली में 13 संरक्षित स्मारकों के लिए, 2023-24 में खर्च ₹36.57 करोड़ और 2024-25 में ₹24.95 करोड़ था। पुरानी दिल्ली के 13 संरक्षित स्मारक और उनके हिस्से, जिनमें लाल किले का दीवान-ए-आम, मुमताज महल, दीवान-ए-खास, दिल्ली गेट, अजमेरी गेट और अन्य शामिल हैं। </p>
<figure id="attachment_7683" aria-describedby="caption-attachment-7683" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-22.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-22.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7683" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-22.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-22-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-22-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-22-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-22-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7683" class="wp-caption-text">उग्रसेन की बाउली । तस्वीर: संजय शर्मा </figcaption></figure>
<p>लोकसभा में साझा की गई जानकारी के अनुसार, दिल्ली में संरक्षित स्मारकों के संरक्षण पर खर्च 2020-21 में 24.50 करोड़ था, जो 2021-22 में घटकर 19.09 करोड़ हो गया, और फिर 2022-23 में तेजी से बढ़कर 30.50 करोड़ हो गया। यह 2023-24 में 36.57 करोड़ के शिखर पर पहुँच गया और 2024-25 में घटकर 24.95 करोड़ हो गया। इन सभी वर्षों में खर्च आवंटित राशि का लगभग 100% रहा है। पाँच वर्षों में, पुरानी दिल्ली के संरक्षित स्मारकों के संरक्षण पर कुल 135.61 करोड़ खर्च किए गए हैं। पुरानी दिल्ली की संरक्षित विरासत केवल अलग-अलग लोकप्रिय स्मारकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें किलों, द्वारों, मस्जिदों का एक जाल और यहाँ तक कि शाहजहानाबाद की ऐतिहासिक शहर की दीवार के वे अवशेष भी शामिल हैं, जिन्हें संरक्षित किया गया है। </p>
<figure id="attachment_7684" aria-describedby="caption-attachment-7684" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-24.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-24.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7684" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-24.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-24-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-24-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-24-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-24-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7684" class="wp-caption-text">हुमायूँ का मकबरा  । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>बहरहाल, दिल्ली को एक बहुत ही दुर्लभ और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का वरदान मिला है। इसका कारण यह है कि सदियों से, कई राजवंश दिल्ली में आकर बसे हैं। इतिहास से जुड़ने का एकमात्र असली तरीका वे इमारतें हैं जो अतीत में बनाई गई थीं, और जिन्हें आज &#8216;विरासत इमारतें&#8217; के नाम से जाना जाता है। किसी &#8216;विरासत इमारत&#8217; की पहचान उसके साथ जुड़े समृद्ध इतिहास के कारण करना बहुत ज़रूरी है, न कि उसे केवल एक पुरानी इमारत मान लेना जो सरकार के लिए एक बोझ हो। इसके विपरीत, स्मारकों में पर्यटकों को आकर्षित करने की अपार क्षमता होती है और वे हर मायने में एक राष्ट्र के लिए एक संपत्ति  होते हैं।</strong></p>
<figure id="attachment_7685" aria-describedby="caption-attachment-7685" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-25.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-25.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7685" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-25.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-25-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-25-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-25-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-25-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7685" class="wp-caption-text">तुग़लकाबाद किला का अवशेष  । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>दुर्भाग्य से, दिल्ली में 1300 से ज्यादा ऐसी विरासत इमारतें होने के बावजूद, हमें इनमें से 100 इमारतों के बारे में भी जानकारी नहीं है। केवल कुछ ही इमारतें जिन्हें सरकार ने राष्ट्रीय महत्व का माना था, उन्हें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षण के लिए चुना गया, और बाकी अभी भी &#8216;असुरक्षित&#8217; हैं। यह तर्क दिया जा सकता है कि अतीत में बनी हर एक इमारत की रक्षा करना संभव नहीं है . लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इन विरासत इमारतों में राजस्व कमाने की अपार क्षमता है।<br />
दिल्ली में लगभग 1300 स्मारकों में से, केवल 174 ही केंद्र द्वारा संरक्षित हैं और राज्य पुरातत्व विभाग लगभग 200 स्मारकों को अपने संरक्षण में लेने की योजना बना रहा है। संरक्षित स्मारकों में से, जो स्मारक ज़्यादा लोकप्रिय हैं, उनकी स्थिति तो अच्छी है, लेकिन दुर्भाग्य से, राष्ट्रीय महत्व के कुछ स्मारकों की स्थिति ठीक नहीं है। एएसआई हाल के दिनों में इन स्मारकों की स्थिति सुधारने के लिए कुछ प्रयास कर रहा है, और इस पहल के तहत कुछ काम निजी संस्थाओं को आउटसोर्स किया गया है।</p>
<figure id="attachment_7686" aria-describedby="caption-attachment-7686" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-28.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-28.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7686" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-28.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-28-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-28-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-28-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-28-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7686" class="wp-caption-text">तुग़लकाबाद किला का अवशेष  । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>महत्वपूर्ण बात यह है कि एएसआई केवल उन्हीं स्मारकों का काम आउटसोर्स कर सकता है जो केंद्र द्वारा संरक्षित हैं और जिन पर एएसआई का कानूनी स्वामित्व है। लेकिन कई अन्य महत्वपूर्ण विरासत इमारतें भी हैं जो राष्ट्रीय महत्व की तो नहीं हैं, लेकिन उस स्थान से जुड़े ऐतिहासिक महत्व या अपनी वास्तुकला की उत्कृष्टता के कारण महत्वपूर्ण हैं। यदि इन स्थानों का प्रचार-प्रसार समझदारी से किया जाए और लोगों को ऐसे स्थानों के अस्तित्व के बारे में जागरूक किया जाए, तो इन स्थानों को प्रमुख पर्यटक आकर्षण बनने में ज़्यादा समय नहीं लगेगा।</p>
<figure id="attachment_7687" aria-describedby="caption-attachment-7687" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-29.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-29.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7687" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-29.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-29-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-29-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-29-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-29-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7687" class="wp-caption-text">क़ुतुब मीनार । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>भारत में, संरक्षण का पहला उदाहरण तब देखने को मिला जब सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में वन्यजीवों के संरक्षण का आदेश दिया। फिर 14वीं शताब्दी ईस्वी में, फिरोज शाह तुगलक ने प्राचीन इमारतों की सुरक्षा का आदेश दिया। बाद में, ब्रिटिश शासन के दौरान, 1810 में &#8220;बंगाल रेगुलेशन (XIX)&#8221; और 1817 में &#8220;मद्रास रेगुलेशन (VII)&#8221; पारित किया गया। इन रेगुलेशंस ने सरकार को यह अधिकार दिया कि जब भी सार्वजनिक इमारतों के दुरुपयोग का खतरा हो, तो वह हस्तक्षेप कर सके।</p>
<figure id="attachment_7688" aria-describedby="caption-attachment-7688" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-31pg.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-31pg.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7688" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-31pg.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-31pg-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-31pg-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-31pg-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-31pg-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7688" class="wp-caption-text">दक्षिण दिल्ली में जफ़र महल । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>फिर 1863 में, अधिनियम XX पारित किया गया, जिसने सरकार को &#8220;उन इमारतों को नुकसान से बचाने और संरक्षित करने&#8221; का अधिकार दिया, जो अपनी प्राचीनता या अपने ऐतिहासिक अथवा स्थापत्य मूल्य के लिए उल्लेखनीय थीं। हालाँकि, शाहजहानाबाद में कई ऐतिहासिक संरचनाओं को स्वयं सरकार द्वारा ही नष्ट कर दिया गया। पूरे भारत में ऐतिहासिक संरचनाओं की सुरक्षा के लिए कानूनी प्रावधान शुरू करने हेतु, 1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना की गई। 1904 में &#8220;प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम (VII)&#8221; पारित किया गया, जिसने स्मारकों पर प्रभावी संरक्षण और अधिकार प्रदान किया; और 1905 में पहली बार, दिल्ली में 20 ऐतिहासिक संरचनाओं को संरक्षित करने का आदेश दिया गया।</p>
<figure id="attachment_7689" aria-describedby="caption-attachment-7689" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7689" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7689" class="wp-caption-text">नई सड़क पर (जामा मस्जिद का पिछला हिस्सा) । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>स्वतंत्रता के समय, दिल्ली में 151 इमारतें और परिसर केंद्रीय एएसआई द्वारा संरक्षित थे। 1978 में दिल्ली में राज्य पुरातत्व विभाग की स्थापना की गई, लेकिन उसके पास इमारतों को अधिग्रहित करने या संरक्षित करने की शक्ति का अभाव है, और वह केवल एएसआई द्वारा गैर-अधिसूचित किए गए कुछ स्मारकों की देखरेख करता है। 1984 में, लोगों के बीच सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति जागरूकता जगाने के उद्देश्य से, इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटेक) की स्थापना की गई। भारत का संविधान दो स्तरों पर स्मारकों के संरक्षण का प्रावधान करता है। केंद्र सरकार उन स्मारकों की देखभाल करती है जिन्हें राष्ट्रीय महत्व का माना गया है, और &#8216;अन्य स्मारकों&#8217; की देखभाल संबंधित राज्य सरकारों द्वारा की जाती है। लेकिन चूँकि शहर नियोजन के एक हिस्से के रूप में संरक्षण को शामिल करना अनिवार्य नहीं है, इसलिए विभिन्न शहर नियोजन एजेंसियों ने विरासत इमारतों के प्रति बहुत कम चिंता दिखाई है।</strong></p>
<figure id="attachment_7690" aria-describedby="caption-attachment-7690" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7690" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7690" class="wp-caption-text">लालकिला का आतंरिक हिस्सा।  तस्वीर: संजय शर्मा </figcaption></figure>
<p>नीतिगत समस्याओं पर विचार करने से पहले, दिल्ली में स्थित स्मारकों की सूची और उनके स्वामित्व के विवरण की जाँच करना महत्वपूर्ण था। स्मारकों की सूची बनाने की ज़रूरत एएसआई को ब्रिटिश काल में ही महसूस हो गई थी, और मौलवी ज़फ़र हसन ने दिल्ली में 1317 इमारतों की एक सूची तैयार की, और 1916 से 1922 के बीच चार खंडों में इस सूची को “दिल्ली की हिंदू और मुस्लिम इमारतें” के रूप में प्रकाशित किया। एएसआई आज भी ज़फ़र हसन की सूची का ही इस्तेमाल करता है, हालाँकि इनमें से कई इमारतें ढह चुकी हैं, गिरा दी गई हैं, या उन पर कब्ज़ा कर लिया गया है।</p>
<figure id="attachment_7691" aria-describedby="caption-attachment-7691" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-27.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-27.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7691" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-27.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-27-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-27-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-27-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-27-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7691" class="wp-caption-text">लोधी गार्डन ।  तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>इंटेक के दिल्ली चैप्टर ने दिल्ली में 1200 इमारतों की एक सूची प्रकाशित की है, जिसका नाम है “दिल्ली &#8211; निर्मित विरासत: एक सूची”। इस सूची में हर इमारत का पूरा विवरण है, जिसमें मालिकाना हक का विवरण, इमारत का महत्व, इमारत की मौजूदा हालत आदि शामिल हैं। दिल्ली के सभी स्मारकों में से, एएसआई का दिल्ली सर्कल 174 स्मारकों को अपनी सूची में रखता है, और हाल ही में छपे एक लेख के अनुसार, 250 ऐसे स्मारकों की एक सूची तैयार की गई है जो अभी सुरक्षित नहीं हैं, और जिनकी देखरेख का काम राज्य पुरातत्व विभाग करेगा। एएसआई के मालिकाना हक वाले सभी स्मारक 1958 के “प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम”  के तहत विनाश या अवैध निर्माण से सुरक्षित हैं।</p>
<figure id="attachment_7692" aria-describedby="caption-attachment-7692" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-18.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-18.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7692" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-18.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-18-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-18-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-18-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-18-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7692" class="wp-caption-text">कमला मार्किट  ।  तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>संक्षेप में कहें तो, दिल्ली में कई ऐसे स्मारक हैं जो ऐतिहासिक और स्थापत्य की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे सुरक्षित नहीं हैं; और इन विरासत इमारतों को विनाश, अवैध निर्माण या अतिक्रमण से बचाने के लिए कोई नीति मौजूद नहीं है। दिल्ली के स्मारकों की खराब हालत के लिए ASI के अधिकारियों ने एक वजह यह बताई कि उनके पास &#8216;कुशल कर्मचारियों&#8217; की कमी है और सरकारी नीतियाँ उनके विस्तार में रुकावट डालती हैं। यही मुख्य वजह है कि एएसआई कुछ स्मारकों के संरक्षण का काम आउटसोर्स कर रहा है। ASI के अनुसार, स्मारकों का संरक्षण एक बहुत ही कुशल काम है और इसके लिए खास तरह की विशेषज्ञता की ज़रूरत होती है। निजी निर्माण कंपनियों के पास इस तरह की विशेषज्ञता नहीं होती, क्योंकि उन्हें स्मारकों के संरक्षण का कोई सीधा अनुभव नहीं होता। </p>
<figure id="attachment_7693" aria-describedby="caption-attachment-7693" style="width: 1367px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-30.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-30.jpg" alt="" width="1367" height="2047" class="size-full wp-image-7693" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-30.jpg 1367w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-30-200x300.jpg 200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-30-684x1024.jpg 684w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-30-768x1150.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/H-30-1026x1536.jpg 1026w" sizes="auto, (max-width: 1367px) 100vw, 1367px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7693" class="wp-caption-text">ऐतिहासिक चौंसठ खम्भा।  तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>स्मारकों के संरक्षण से जुड़ी एक बड़ी समस्या यह है कि इसमें किसी भी तरह की गलती की गुंजाइश नहीं होती, क्योंकि जिन इमारतों पर काम किया जा रहा होता है, वे बहुत पुरानी होती हैं और किसी भी देश की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसी वजह से, निजी कंपनियों को संरक्षण का काम सौंपते समय एएसआई को बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है और इन कंपनियों द्वारा किए जा रहे काम की बारीकी से निगरानी भी करनी पड़ती है। चूँकि ये स्मारक एएसआई के संरक्षण में हैं, इसलिए वह किसी निजी कंपनी को इनकी ज़िम्मेदारी सौंपने में हिचकिचाता है। लेकिन, एक निजी संरक्षण वास्तुकार के अनुसार, अब ASI को यह बात समझ लेनी चाहिए कि स्मारकों के संरक्षण की ज़िम्मेदारी पुरातत्वविदों की नहीं, बल्कि वास्तुकारों की होनी चाहिए।</p>
<p><strong>क्रमशः &#8230;&#8230;.. जिन्होंने ऐतिहासिक स्मारकों को गोद लिए जानते हैं वे कौन हैं?</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/major-downfall-in-adiopt-a-village-and-adopt-ke-heritage">&#8216;गोद भराई&#8217; में 60+% की गिरावट: न &#8216;महिला&#8217;, ना &#8216;पुरुष&#8217; सांसद &#8216;गांवों को गोद&#8217; लेना चाहते; ना ही सरकारी, गैर-सरकारी क्षेत्र के निकाय &#8216;धरोहरों को&#8217;</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<item>
		<title>​बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-3) : ​​साइकिल से 1​.5​ लाख किमी की यात्रा पुरातत्व स्थल ढूंढ़ने ​के लिए, मंत्री​, मंत्रालय​, अधिकारी &#8216;निद्रा&#8217; में</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/1-5-lakh-km-journey-by-bicycle-to-find-archaeological-sites</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 Mar 2026 12:29:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[archeological survey of india]]></category>
		<category><![CDATA[archeology]]></category>
		<category><![CDATA[balirajgarh]]></category>
		<category><![CDATA[bihr]]></category>
		<category><![CDATA[heritag]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बलिराजगढ़ / दरभंगा / पटना / नई दिल्ली : आप माने या न माने, आपकी मर्जी। देश के सम्पूर्ण क्षेत्रफल में औसतन प्रत्येक 892 किलोमीटर पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। इनमे सबसे अधिक 743 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर उत्तर प्रदेश में हैं, यानि उत्तर प्रदेश के 324 प्रति किलोमीटर क्षेत्रफल पर [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बलिराजगढ़ / दरभंगा / पटना / नई दिल्ली : आप माने या न माने, आपकी मर्जी। देश के सम्पूर्ण क्षेत्रफल में औसतन प्रत्येक 892 किलोमीटर पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। इनमे सबसे अधिक 743 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर उत्तर प्रदेश में हैं, यानि उत्तर प्रदेश के 324 प्रति किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। आंकड़ों के अनुसार देश में तकरीबन 3645 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान कर्नाटक का है जहाँ 506 राष्ट्रीय स्तर के ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। तीसरा स्थान तमिलनाडु का है जहाँ 413 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। </strong></p>
<p>आंकड़ों के अनुसार गुजरात में 293, मध्य प्रदेश में 292, महाराष्ट्र में 285, दिल्ली में 174 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। भौगोलिक क्षेत्रफल के दृष्टि से राजस्थान बहुत बड़ा भूभाग है, लेकिन यहाँ 162 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पश्चिम बंगाल में 136, आंध्र प्रदेश में 129, हरियाणा में 91, ओडिसा में 79, बिहार में 70, जम्मू-कश्मीर में 56, असम में 55, छत्तीसगढ़ में 47, उत्तराखंड में 42, हिमाचल प्रदेश में 40, पंजाब में 33, केरल में 27, गोवा में 21, झारखण्ड में 13 और दमन-दीव में 12 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर स्थित हैं।</p>
<p>​<strong>शायद भरत के लोगों को यह ज्ञात नहीं होगा कि देश की आर्कियोलॉजिकल विरासत में 4 लाख से ज़्यादा स्ट्रक्चर और 58 लाख से ज़्यादा पुरानी चीज़ें शामिल हैं, जिनमें से ज़्यादातर सेंट्रल और स्टेट लेवल की अथॉरिटी, म्यूज़ियम, धार्मिक संस्थाएँ वगैरह के नियंत्रण में हैं। हमारी अनोखी और कीमती कल्चरल और आर्कियोलॉजिकल विरासत, पारंपरिक ज्ञान, रीति-रिवाजों और तेज़ी से हो रहे शहरीकरण को देखते हुए, हमारी आर्कियोलॉजिकल विरासत को बचाने के लिए एक खास इंफ्रास्ट्रक्चर और कानूनी ढांचा ज़रूरी है। संस्कृति मंत्रालय भारतीय विरासत और कल्चर के बचाव, संरक्षण और प्रमोशन के लिए जिम्मेदार है। मंत्रालय, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया, म्यूज़ियम, नेशनल मॉन्यूमेंट अथॉरिटी और दूसरी एजेंसियों के ज़रिए, नेशनल इंपॉर्टेंस के सभी सेंट्रली प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट्स की सुरक्षा, हिस्टोरिकल साइट्स की खुदाई, आर्टिफैक्ट्स का कलेक्शन और शोकेसिंग, उनका डॉक्यूमेंटेशन और डिजिटाइजेशन वगैरह के लिए जवाबदेह है।</strong></p>
<figure id="attachment_7439" aria-describedby="caption-attachment-7439" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/6-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/6-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7439" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/6-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/6-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/6-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/6-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/6-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/6-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7439" class="wp-caption-text">​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी</figcaption></figure>
<p>​चार वर्ष पूर्व साल 2022 में भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक द्वारा एक प्रतिवेदन संसद में पेश किया गया था। वह प्रतिवेदन मूल रूप से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के वित्तीय नियंत्रण तंत्र में कमियों, देश में स्मारकों और प्राचीन वस्तुओं के दस्तावेज़ीकरण में अंतराल और केंद्रीय विरासत निकाय द्वारा खुदाई और अन्वेषण गतिविधियों पर बहुत कम खर्च को उजागर किया था। तत्कालीन संसद में प्रस्तुत प्रतिवेदन स्मारकों और प्राचीन वस्तुओं के संरक्षण और संरक्षण पर कैग ने स्मारकों में संरक्षण कार्यों और विरासत उद्यानों के प्रबंधन में कमियों और चयनित स्मारकों के भौतिक निरीक्षण के दौरान सार्वजनिक सुविधाओं जैसे सार्वजनिक शौचालय, पीने का पानी, वाहन पार्किंग के लिए स्थान, रैंप, गाइड, सुरक्षा आदि की अनुपस्थिति को भी इंगित किया। एक मकसद और था कैग की 2013 की रिपोर्ट नंबर 18 में बताए गए चिंता के क्षेत्रों पर की गई कार्रवाई कार्रवाई की जान-पड़ताल करना और पब्लिक अकाउंट्स कमेटी की 25 खास सिफारिशों पर की गई कार्रवाई की सीमा की भी जांच करना था।</p>
<p>​ऑडिट के दौरान शामिल यूनिट्स में संस्कृति मंत्रालय, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया, नेशनल मॉन्यूमेंट अथॉरिटी, नेशनल कल्चर फंड, नेशनल मिशन ऑन मॉन्यूमेंट्स एंड एंटीक्विटीज़ और छह नेशनल-लेवल म्यूज़ियम शामिल थे।<br />
​कैग ने अपने रिपोर्ट में कहा कि PAC की सिफारिश के बावजूद, मिनिस्ट्री/ASI के कंट्रोल में म्यूज़ियम के लिए कोई यूनिफॉर्म प्रोसेस नहीं था। मिनिस्ट्री/ASI ने बताया कि इनमें से ज़्यादातर काम अंडर प्रोसेस थे । नेशनल मॉन्यूमेंट अथॉरिटी​, जिसे  2011 में​, एक कानूनी संस्था के तौर पर बनाई गई थी ताकि स्मारकों के रोके गए/रेगुलेटेड एरिया में कंस्ट्रक्शन के काम करने के लिए नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट दिए जा सकें। इसका असली मकसद हर स्मारक के लिए हेरिटेज बाय-लॉज़ और साइट-प्लान तैयार करके कानूनी नियमों को लागू करना था। लेकिन, 3693 सेंट्रली प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट्स में से, सिर्फ़ 31 स्मारकों के लिए हेरिटेज बाय-लॉज़  नोटिफ़ाई किया गया है, जबकि 210 स्मारकों के लिए हेरिटेज बाय-लॉज़  को फ़ाइनल करने का काम अलग-अलग स्टेज पर था, जैसे नोटिफ़िकेशन, कंसल्टेशन, वगैरह। </p>
<blockquote><p>​रिपोर्ट में यह भी उजागर किया गया था कि ASI के पास अपना काम पूरा करने के लिए कोई स्ट्रैटेजी या रोड-मैप (लॉन्ग टर्म/मीडियम टर्म) नहीं था। कंज़र्वेशन के काम एड-हॉक/सालाना आधार पर किए जा रहे थे। आर्कियोलॉजी से जुड़े मामलों पर ASI को सलाह देने के लिए सबसे बड़ी बॉडी के तौर पर सोची गई सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑन आर्कियोलॉजी मार्च 2018 के बाद से एक्टिव नहीं थी और 2014-18 के दौरान (अक्टूबर 2014 में) इसकी सिर्फ़ एक मीटिंग हुई थी। PAC की सिफारिश के बावजूद, अतिक्रमण की घटनाओं को रोकने के लिए सेंट्रल या सर्कल लेवल पर कोई कोऑर्डिनेशन और मॉनिटरिंग सिस्टम नहीं बनाया गया।</p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/13.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/13.jpg" alt="" width="2047" height="1150" class="aligncenter size-full wp-image-7440" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/13.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/13-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/13-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/13-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/13-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>​<strong>जब बलिराजगढ़ पटना उच्च न्यायालय पहुंचा था </strong></p>
<p>दस वर्ष पहले पटना उच्च न्यायालय के एक अधिवक्ता सुनील कुमार कर्ण​ बलिराजगढ़ खुदाई ो लेकर पटना उच्च न्यायालय पहुंचे थे। आज कहते हैं &#8220;आखिर कर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली ी नींद दस वर्ष बाद ही साई, खुली तो।&#8221; आर्यावर्तइंडियननेशन कॉम स बट करते अधिवक्ता कारण कहते हैं कि &#8220;मिथिला में बलिराजगढ़ का किला अत्यंत प्रसिद्ध है तथा देश के विशालतम पुरातात्विक स्थलों में से एक है। मान्यता है कि यह दानवराज बली का किला था जो हजारों साल से जमीन के नीचे दबा हुआ है। इतिहासकार इसे मिथिला की प्राचीन राजधानी कहते हैं जिसके उत्खनन के बाद ही मिथिला की गौरवशाली इतिहास एवं संस्कृति उजागर होगी।​ इस स्थल की महत्ता को देखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा 1962 ई में उत्खनन कराया गया था। पुनः बिहार सरकार के पुरातत्व निदेशालय द्वारा 1972-73 एवं 1974-75 में सांकेतिक उत्खनन कराया गया तथा 2013-14 में पुनः भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा एक सांकेतिक एवं अल्पकालिक उत्खनन कराया गया। यद्यपि प्रत्येक सांकेतिक एवं अल्पकालिक उत्खनन में हजारों साल पुरानी संस्कृति के महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त होते रहे फिर भी कोई न कोई बहाना बनाकर उत्खनन रोक दिया गया।​&#8221;</p>
<p>उनके अनुसार, &#8220;भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण,​ नयी दिल्ली की उपेक्षापूर्ण रवैए से परेशान हो कर 16-2-2015 को संस्कृति मंत्री,​ भारत सरकार, सचिव, संस्कृति मंत्रालय,​ भारत सरकार तथा महानिदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को आवेदन पत्र भेजकर बलिराजगढ़ के पुरातात्विक उत्खनन कराने के लिए आग्रह किया था। मेरे आवेदन पत्र कोई निर्णय नहीं लिया गया उसके बाद मैंने माननीय पटना उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका 9026/2015 दायर किया। जिसका निष्पादन माननीय मुख्य न्यायाधीश एवं न्यायमूर्ति श्री मती अंजना मिश्रा द्वारा 20-6-2016 को कर दिया गया। केंद्र सरकार द्वारा जवाब दिया गया कि अभी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अन्य पुरातात्विक स्थलों के उत्खनन में व्यस्त है इसलिए अभी बलिराजगढ़ का उत्खनन संभव नहीं है।​&#8221; यह आर्य दस वर्ष पहले होनी चाहिए थी। लेकिन ढुलमुल नीति के कारण दस वर्ष आगे बढ़ गयी। विगत कई दशकों से लगातार बलिराजगढ़ पर अनुसंधान करने एवं पुरातात्विक उत्खनन के लिए यथासंभव प्रयास करने के लिए पुराविद् ​डॉ शिव कुमार मिश्र​ धन्यवाद के पात्र हैं। </p>
<blockquote><p>अधिवक्ता कर्ण का कहना है कि &#8220;अब तक बलिराजगढ़ का चार बार पुरातात्विक उत्खनन कराया जा चुका है लेकिन सभी सांकेतिक एवं अल्पकालिक उत्खनन ही कराया गया जिससे इस स्थल की संस्कृति एवं इतिहास उजागर नहीं हो सका। आशा है कि बिहार के अन्य प्रमुख पुरास्थलों नालंदा, विक्रमशिला, कोल्हुआ आदि की तरह विस्तृत परियोजना बनाकर बलिराजगढ़ का संपूर्ण एवं लगातार उत्खनन कराया जाएगा। उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों से साइट म्यूजियम स्थापित किया जायेगा तथा उत्खनन प्रतिवेदन भी प्रकाशित किया जायेगा।&#8221;</p></blockquote>
<figure id="attachment_7441" aria-describedby="caption-attachment-7441" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/10.jpg" alt="" width="2047" height="1150" class="size-full wp-image-7441" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/10.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/10-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/10-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/10-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/10-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7441" class="wp-caption-text">​साईकिल वाला शोधार्थी : मिथिला विश्वविदयालय, दरभंगा​ के प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के ​शोधार्थी मुरारी कुमार झा</figcaption></figure>
<p>​<strong>साईकिल वाला शोधार्थी  </strong></p>
<p>विगत दिनों पूर्व में कोसी से आरम्भ होकर पश्चिम में गंडक तक 24 योजन और दक्षिण में गंगा से आरम्भ होकर उत्तर में हिमालय की तराई तक 16 योजन में फैले मिथिला इलाके को अपनी साइकिल के पहियों से नापने वाले ललित नारायण मिथिला विश्वविदयालय, दरभंगा​ के प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के ​शोधार्थी मुरारी कुमार झा से बात हुई। झा अपने नाम के आगे ‘पुरातत्व’ लिखते हैं। मुरारी​ जी शायद देश का पहला शोधार्थी है जो साइकिल को अपने शोध का हिस्सा बनाकर मिथिलांचल के ऐतिहासिक पुरातत्वों को ढूंढकर दस्तावेज बना रहे हैं। पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर उनके मंत्रिमंडल के आला मंत्री-संत्री-अधिकारीगण दांत निपोड़ रहे हैं, कह रहे हैं “अच्छा !!!! वह आर्यन काल का है…. अच्छा गुप्ता काल का है, अच्छा वह…. क्योंकि न उन्हें पुरा से मतलब है और ना ही तत्व से। फिर मिथिला का इतिहास बचेगा कैसे?</p>
<p>स्वतंत्र भारत में, खासकर मिथिला क्षेत्र में मुरारी जी शायद पहला शोधार्थी है जो साइकिल से ही पुरास्थलों को खोजने हेतु दूर-दूर तक जाते हैं।​ ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के स्थलों को खोजने के लिए अपने साइकिल से ये अभी तक दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, वैशाली, पटना आदि जिलों के लगभग 400 से 500 पुरास्थलों का भ्रमण कर चुके हैं। इससे संबंधित इनके दर्जन भर से अधिक आलेख भी प्रकाशित हैं। इनके सहयोग से देकुली (बहादुरपुर, दरभंगा) से एक शिवलिंग, ओझौल (बहादुरपुर, दरभंगा) से विष्णु प्रतिमा, भटौरा मठ (शिवाजीनगर, समस्तीपुर) से विष्णु प्रतिमा को दरभंगा जिला स्थित महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में संगृहीत किया जा​ चुका है। धरोहर संरक्षण हेतु, इन्हें चंद्रगुप्त साहित्य महोत्सव के दौरान ‘पुरातत्व भूषण सम्मान-2023′ से सम्मानित किया गया।</p>
<figure id="attachment_7442" aria-describedby="caption-attachment-7442" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/1-1-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/1-1-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7442" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/1-1-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/1-1-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/1-1-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/1-1-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/1-1-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/1-1-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7442" class="wp-caption-text">​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी</figcaption></figure>
<p><strong>झा का जन्म 15 फरवरी 1994ई० को दरभंगा जिले के ही बेनीपुर प्रखंड अंतर्गत आने वाले लवानी गाँव के एक साधारण किसान परिवार में हुआ और इनका लालन-पालन एवं सम्पूर्ण पढाई जिले के ही बहादुरपुर प्रखंड अंतर्गत देकुली गाँव स्थित नाना-नानी के घर से हुआ।​ ​स्नातकोत्तर के दौरान ही 02 दिसंबर 2015 को तत्कालीन विभागाध्यक्ष डॉ मदन मोहन मिश्र, शिक्षक डॉ अयोध्या नाथ झा और विभागीय कर्मचारी श्री कैलाश प्रसाद के समक्ष प्राचीन इतिहास विभाग​(मोतीमहल परिसर) से प्राप्त हुए 1341ई० के “मोती महल स्तंभ लेख” के ऐतिहासिक खोज के साथ ही इन्होंने पुरातत्व के दुनिया में अपना पहला कदम रखा। किंतु, आगे की खोज जारी रखने हेतु इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में साधन और संसाधन का अभाव था, बावजूद इसके; इन्होंने अपना खोज-कार्य जारी रखा। चूंकि, नवीन खोज करना इनका प्रथम पसंद था; इसीलिए तत्काल इन्होंने भ्रमण हेतु अपने साइकिल को ही साधन के रूप में उपयोग किया।</strong></p>
<p>​मुरारी जी कहते हैं: “आज तक में मैं अपने साइकिल से लगभग 1.5 लाख किलोमीटर सफ़र तय करते हुए पुरास्थल, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व के गाँव, प्राकृतिक सम्पदा आदि के अन्वेषण के उद्देश्य से लगभग 600 से अधिक यात्रा किया हूँ, एक दिन में सबसे अधिकतम 202 किमी की दूरी थी, जो अब एक दिन में लगातार बीस घंटा पचास मिनट की साइकिल यात्रा करते हुए 310 किमी हो चुकी है​ साइकिल यात्रा में लगभग 3000 से अधिक पुरास्थल, प्राचीन मंदिर, प्राकृतिक धरोहर, क्षेत्रीय आयूर्वेद, गाँव, नदी, नहर, पोखर, झील, पक्षी अभ्यारण, कृषि, पशुपालन सहित अन्य महत्त्वपूर्ण स्थलों का विवरण और सूचीकरण किया ​हूँ । इस परियोजना के अंतर्गत प्रकाशित होने वाली पुस्तक में इन सभी स्थलों का विवरण और चित्रण सहित उनसे जुड़ी सांस्कृतिक व्याख्या सम्मिलित होगी। यह परियोजना मिथिला की धरोहर और संस्कृति को संरक्षित और प्रचारित करने के साथ ही आम जनमानस को धरोहर संरक्षण के प्रति जागरूक करने हेतु एक व्यापक प्रयास का हिस्सा है।”</p>
<p>जब परियोजना का उद्देश्य​ पूछा तो मुरारी जी कहते हैं कि “इस परियोजना का उद्देश्य एक साइकिल यात्रा के माध्यम से मिथिला क्षेत्र के पुरास्थलों, प्राचीन मंदिरों, प्राकृतिक धरोहरों और सांस्कृतिक विरासतों का गहन अध्ययन और उनका सूचीकरण के साथ ही इस वृत्तांत को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करना है, ताकि इन धरोहरों के बारे में शोधपूर्ण जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक​ पहुंचना है ताकि लोगों में अपने क्षेत्र के सांस्कृतिक विरासतों के बारे में पता चले। इससे स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर धरोहर और संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।​”</p>
<figure id="attachment_7443" aria-describedby="caption-attachment-7443" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/2-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/2-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7443" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/2-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/2-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/2-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/2-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/2-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/2-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7443" class="wp-caption-text">​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी</figcaption></figure>
<p>​<strong>जब उनसे पूछा कि इस यात्रा, शोध और पुस्तक की छपाई के लिए आर्थिक श्रोत क्या है? मुरारजी जी कुछ क्षण रुके, लम्बी सांस लिए और फिर कहते हैं: “यही बिडम्बना है। यही हमारा दुर्भाग्य है। हम वीरसातों की महत्ता को तो समझते हैं, उसे उजागर करने के लिए सतत ​प्रयत्नशील हैं और चाहते हैं कि वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक दस्तावेज छोड़े जो उनके ​गांव, प्रखंड, अंचल, जिला, क़स्बा के धरोहरों का जिवंत दृष्टान्त होगा। अर्थ के मामले में हम हैं कमजोर जो जाते हैं। हम एक शोधार्थी हैं। हम जानते हैं कि जिस कार्य को हम कर रहे हैं वह न केवल जिला प्रशासन के लिए, प्रदेश की सरकार के लिए या फिर केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है, इस कार्य से करोड़ों रूपये कमाए जा सकते हैं। हम अपने प्रदेश के, देश के लोगों से, जो देश से बाहर रहते हैं, उसने प्रार्थना कर रहे हैं कि इस कार्य में वे सभी हमारा हाथ पकड़ें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि मिथिला में लोग हाथ पकड़ते नहीं, हाथ झटक देते हैं।”</strong></p>
<p>मुरारी​ जी ​का कहना कि “केवल दरभंगा जिला को ही लें तो, शंकरपुर डीह, खैरा-सिरुआ, कुर्सों-नदियामी, इनाई, महथावन आदि पुरास्थलों से प्राचीन सिक्के, भच्छी, कोर्थू, पिपरौलिया, पंचोभ, तिलकेश्वर मठ, दरभंगा राज परिसर आदि पुरास्थलों से अभिलेख, बहेरा, बरई, शंकरपुर डीह, देवकुली, रतनपुर, ब्रह्मपुर, हावीडीह, कोर्थू आदि पुरास्थलों से प्राचीन भवनों मंदिरों के प्रमाण, रमौली, हरहच्चा, कोइलवाड़ा, महथावन, वाराही आदि पुरास्थलों से टेराकोटा और समस्त दरभंगा जिला से सैकड़ों प्रतिमाएं प्राप्त हुए हैं और समय-समय प्राप्त होते रहते हैं। इस जिले के 300 से अधिक ऐसे पुरास्थल और गांव हैं, जहां विभिन्न प्रकार के पुरावशेष बिखरे पड़े हैं। ये सभी पुरावशेष ईस्वी पूर्व से आधुनिक काल तक के हैं, जिसका वैज्ञानिक परीक्षण और अध्ययन होना अति आवश्यक है।​ मेरी कोशिश है कि अपनी यात्रा के दौरान ऐतिहासिक धरोहर, प्राकृतिक धरोहर, मानव स्वास्थ्य, जल संचयन एवं संरक्षण, संस्कृति के संरक्षण, जैविक कृषि आदि के महत्व को बताते हुए स्थानीय लोगों को जागरूक ​करते रहें क्योंकि जीवन में निरंतरता, लगन, एकाग्रता, सहनशीलता और बुद्धिमता सबसे आवश्यक है।’</p>
<p>मिथिला की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली और कृषि पद्धतियों का भी मुरारी ने गहन अध्ययन किया है। वे आयुर्वेद, कृषि, और पशुपालन में पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय की वकालत करते हैं। उन्होंने स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर आयुर्वेदिक पौधों और पारंपरिक कृषि तकनीकों का संरक्षण और प्रोत्साहन किया है। मुरारी कुमार झा एक कुशल लेखक भी हैं। उन्होंने मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर, पुरातात्विक स्थलों, और स्थानीय परंपराओं पर आधारित कई आलेख का लेखन किया है। अभी इससे संबंधित पुस्तक का लेखन कर रहे हैं।। उनकी लेखनी में गहराई और स्पष्टता है, जो पाठकों को मिथिला की समृद्ध धरोहर के प्रति आकर्षित करती है। इसके अलावा, कला में उनकी रुचि, खासकर मिथिला पेंटिंग्स और अन्य पारंपरिक कलाओं में, उन्हें एक बहु-आयामी व्यक्तित्व बनाती है।</p>
<figure id="attachment_7444" aria-describedby="caption-attachment-7444" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/12.jpg" alt="" width="2047" height="1150" class="size-full wp-image-7444" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/12.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/12-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/12-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/12-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/12-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7444" class="wp-caption-text">​बलिराजगढ़​</figcaption></figure>
<p>​<strong>मुरारी जी के अनुसार बलिराजगढ़ </strong></p>
<p>हालांकि मिथिलांचल बहुत बड़ा इलाका नहीं है, लेकिन अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और शानदार इतिहास की वजह से भारतीय संस्कृति में इसकी एक बहुत खास जगह है। मिथिला, जिसे मिथिलांचल भी कहा जाता है, भारतीय महाद्वीप में मौजूद एक भौगोलिक और सांस्कृतिक इलाका है। इसमें भारत के उत्तरी बिहार के कुछ हिस्से और नेपाल के पूर्वी तराई के आस-पास के जिले शामिल हैं। नेपाल का बॉर्डर इस इलाके के ऊपरी किनारे से होकर गुजरता है। गंडक और कोसी नदियां मिथिला की पश्चिमी और पूर्वी सीमाएं हैं। यहां की भाषा मैथिली है और इसे बोलने वालों को मैथिल कहा जाता है।मिथिला का ज़्यादातर इलाका आज के भारत में आता है, खासकर बिहार राज्य में। मिथिला उत्तर में हिमालय से और दक्षिण, पश्चिम और पूर्व में गंगा, गंडकी और महानंदा नदियों से घिरा है। यह नेपाल के दक्षिण-पूर्वी तराई तक फैला हुआ है। इस इलाके को तिरहुत का पुराना नाम तिरभुक्ति भी कहा जाता था। रामायण में अयोध्या के राजकुमार राम और मिथिला के राजा जनक की बेटी सीता के बीच एक शाही शादी का ज़िक्र है। </p>
<p>भारत के दार्शनिक उद्भव के साथ सांस्कृतिक और साहित्यिक विकास के क्षेत्र में मिथिला का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। मिथिला का इतिहास निःसंदेह गौरवमय रहा है, किन्तु इस क्षेत्र के पुरातात्त्विक अवशेषों के अन्वेषण, विश्लेषण में पाषाण कालीन अवशेषों को प्रकाश में आना अभी तक बाकी है। इस तिरभूक्ति क्षेत्र में पुरातात्विक दृष्टिकोण से वैशाली पुरास्थल के बाद अगर कोई दूसरा महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल प्रकाश में आया तो, वह है; बलिराजगढ़, जिसे डी.आर. पाटिल बलराजपुर लिखते हैं। बलिराजगढ़ हिमालय की तराई क्षेत्र में भारत-नेपाल के सीमा से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर बिहार राज्य के मधुबनी जिला अन्तर्गत बाबूबरही प्रखण्ड में अवस्थित है। प्राचीन मिथिला के लगभग मध्य भाग में मधुबनी जिला मूख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर है। यहां पहुंचने के लिए रेल और सड़क मार्ग दोनों की सुविधाएँ उपलब्ध है। बलिराजगढ़ की स्थिति कमला बलान नदी से 09 किमी पूरब, भूतही नदी से 15 किमी पश्चिम और कोसी नदी से 45 किमी पश्चिम में है। बलिराजगढ़ का महत्व देखते हुए कुछ विद्वान् इसे प्राचीन मिथिला की राजधानी के रूप में संबोधित करते हैं। यहां का विशाल दुर्ग रक्षा प्राचीर से रक्षित पुरास्थल निश्चित रूप से तत्कालीन नगर व्यवस्था में सर्वोत्कृष्ट स्थान रखता होगा। </p>
<figure id="attachment_7445" aria-describedby="caption-attachment-7445" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/9-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/9-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7445" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/9-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/9-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/9-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/9-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/9-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/9-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7445" class="wp-caption-text">​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी</figcaption></figure>
<p>175 (मेरे पैमाइस से मात्र 136 बिग्घा) एकड़ भू-भाग में फैले इस विशाल भू-खंड को बलिराजगढ़, बलराजगढ़ या बलिगढ़ भी कही जाती है। स्थानीय लोगों का मानना है की ये महाकाव्यों और पुराणों में वर्णित दानव राज बलि की राजधानी के ध्वंषावशेष हैं। स्थानीय लोगों में यह मान्यता है कि आज भी राजा बलि अपने सैनिकों के साथ इस किले में निवास करते हैं। सम्भवतः इसी वजह से कोई भी खेती के लिए जोतने की हिम्मत नहीं करता है। इसी मान्यता के कारण इस भूमि और किले की सुरक्षा अपने आप होती रही है।  बुकानन के अनुसार वेणु, विराजण और सहसमल का चौथा भाई बलि एक राजा था। यह बंगाल के राजा बल का किला था, जिसका शासनकाल कुछ दिनों के लिए मिथिला पर भी था। बुकानन के अनुसार ही वे लोग दोमकटा ब्राह्मण थे, जो महाभारत में वर्णित राजा युधिष्ठिर के समकालीन थे। किन्तु, डी.आर. पाटिल इसे ख़ारिज करते हुए कहते हैं, कि वेणुगढ़ तथा विरजण गढ़ के किले से बलिराजगढ़ की दूरी अधिक है, इसीलिए यह उनसे संबंधित नहीं हो सकती। </p>
<p>कुछ अन्य विद्वान् इस गढ़ को विदेह राज जनक के अंतिम सम्राट द्वारा निर्मित मानते हैं। उनके अनुसार जनक राजवंश के अंतिम चरण में आकर वंश कई शाखाओं में बंट गया और उन्हीं में से एक शासक द्वारा किले का नाम बलिगढ़ रखा गया होगा। प्रो उपेन्द्र ठाकुर ने बलिराजगढ़ का उल्लेख करते हुए लिखा है, कि प्रख्यात चीनी यात्री ह्वेनसांग ने तीरभुक्ति भ्रमण करते हुए वैशाली गए थे। वैशाली (चेन-सुन-ना) से संभवतः बलिगढ़ गए और वहां से बड़ी नदी अर्थात कोसी (वर्तमान महानन्दा) के निकट गए। बलिराजगढ़ के ऐतिहासिक महत्व के लिए एक तर्क यह भी है कि विदेह राज जनक की राजधानी अर्थात रामायण में वर्णित मिथिलापुरी यहीं स्थित रही होगी। यद्यपि मिथिलापुरी की पहचान आधुनिक जनकपुर (नेपाल) से की गयी है, किन्तु पुरातात्विक सामग्रियों के आभाव में इसे सीधे मान लेना कठिन है। </p>
<blockquote><p>रामायण के अनुसार राम, लक्ष्मण और विश्वामित्र गौतम आश्रम से ईशाण कोण की ओर चलकर मिथिला के यज्ञ मण्डप पहुंचे। गौतम आश्रम की पहचान दरभंगा जिले के ब्रह्मपुर गांव से की गयी है, जिसका उल्लेख स्कन्द पुराण में भी मिलता है। आधुनिक जनकपुर गौतम आश्रम अर्थात ब्रह्मपुर से ईशाण कोण न होकर उत्तर दिशा में है। इस तरह गौतम आश्रम से ईशाण कोण में बलिराजगढ़ के अलावा और कोई ऐतिहासिक स्थल दिखाई नहीं देता है, जिस पर प्राचीन मिथिलापुरी होने की सम्भावना व्यक्त की जा सके। अतः बलिराजगढ़ के पक्ष में ऐसे तर्क दिए जा सकते हैं, की मिथिलापुरी इस स्थल पर स्थित थी। </p></blockquote>
<p>पाल साहित्य में कहा गया है कि अंग की राजधानी आधुनिक भागलपुर से मिथिलापुरी साठ योजन की दूरी पर थी। महाउम्मग जातक के अनुसार नगर के चारों द्वार पर चार बाजार थे, जिसे यवमज्क्ष्क कहा जाता था, बलिराजगढ़ से प्राप्त पुरावशेष इस बात की पुष्टि करती है। बौद्धकालीन मिथिलानगरी का ध्वंशावशेष भी बलिराजगढ़ ही है। बलिराजगढ़ के पुरातात्विक महत्व को सर्वप्रथम 1884 में प्रसिद्ध प्रसाशक, इतिहासकार और भाषाविद् जार्ज ग्रीयर्सन ने उत्खनन के माध्यम से उजागर करने का प्रयास किया, किन्तु बात यथा स्थान ही रह गयी। ग्रियर्सन के उल्लेख के बाद भारत सरकार के द्वारा 1938 ई. में इस महत्वपूर्ण पुरास्थल को राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया गया। </p>
<figure id="attachment_7446" aria-describedby="caption-attachment-7446" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/7-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/7-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7446" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/7-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/7-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/7-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/7-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/7-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/7-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7446" class="wp-caption-text">​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी</figcaption></figure>
<p><strong>क्या होना चाहिए</strong> </p>
<p>सर्वप्रथम इस पुरास्थल का उत्खनन 1962-63 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के रघुवीर सिंह के निर्देशन में संपादित हुई। इस उत्खनन से ज्ञात हुआ की जो इस विशाल सुरक्षा दीवाल के निर्माण में पक्की ईंट के साथ मध्य भाग में कच्ची ईंट का भी प्रयोग किया गया है। सुरक्षा प्राचीर के दोनों ओर पक्की ईंटों का प्रयोग सुरक्षा दीवार को मजबूती प्रदान करती है। सुरक्षा दीवार की चौड़ाई सतह पर 8.18 मी. और 3.6 मी. तक है। सुरक्षा दीवार का निर्माण लगभग तीसरी शताब्दी ई. पू. से लेकर लगातार पाल काल लगभग 12वीं-13वीं शताब्दी तक में समय-समय पर होती रही है। यहां से प्राप्त पुरावशेषों में सुंदर रूप से गढ़ित मृण्मूर्ति महत्वपूर्ण है। </p>
<p>इसके बाद 1972-73 और 1974-75 में बिहार सरकार द्वारा उत्खनन कार्य करवाई गई। इस उत्खनन कार्य में बी.पी. सिंह के सामान्य निर्देशन में सीता राम रॉय द्वारा के.के. सिन्हा, एन. सी.घोष, एल. पी. सिन्हा तथा आर.पी. सिंह के सहयोग से की गई। उक्त खुदाई में कई पुरावशेषों के साथ भवनों के अवशेष भी प्राप्त हुए। इस उत्खनन में उत्तर कृष्ण मर्जित मृद्भाण्ड परम्परा से लेकर पाल काल तक के मृद्भांड मिले। यहां से प्राप्त सुंदर मृण्मूर्ति सैकडों की संख्या में मिले थे, इसके अलावे अर्ध्यमूल्य वाला पत्थर से बनी मोती, तांबे के सिक्के, मिट्टी से निर्मित मुद्राएं भी प्राप्त हुई। अभी कुछ वर्ष पूर्व में 2013-14 में एक बार फिर उत्खनन कार्य भरतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, पटना मण्डल के मदन सिंह चौहान, सुनील कुमार झा और उनके सहयोगी के द्वारा उत्खनन कार्य किया गया। इस स्थल के उत्खनन में मुख्य रूप से चार संस्कृति काल प्रकाश में आए।</p>
<p><em>1. उत्तर कृष्ण मर्जित मृदभांड<br />
2. शुंग कुषाण काल<br />
3. गुप्त उत्तर गुप्तकला<br />
4. पालकालीन अवशेष</em></p>
<p><strong>इस स्थल से अभी तक प्राप्त पुरावशेषों में तस्तरी, थाली, पत्थर से निर्मित वस्तुएं, हड्डी एवं लोहे, बालुयुक्त महीन कण, विशाल संग्रह पात्र, सिक्के, मनके, मंदिर के भवनावशेष प्राप्त हुए हैं और एक महिला की मूर्ति भी प्राप्त हुई है, जो अपने गोद में बच्चे को स्तन से लगायी हुई है। यहाँ सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य में प्राचीन सुरक्षा दीवार है, जो पक्की ईंटों से बनी हुई है और अभी तक सुरक्षित अवस्था में है दीवार में कहीं-कहीं कच्ची ईटों का भी प्रयोग किया गया है। इसमें प्रयोग की गई प्रायः ईंटों की लंबाई 20 से 25 ईंच और चौड़ाई 10 से 14 ईंच तक है। पाल या सेन काल के अंत समयावधि में भीषण बाढ़ के दौरान पानी के साथ आए मिट्टी के जमाव कहीं-कहीं 3 से 5 फीट तक है। इससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है, कि बलिराजगढ़ में जिन किन्हीं का भी शासन रहा हो, किन्तु उनके पतन का प्रमुख कारण बाढ़ ही रही होगी। वर्तमान समय तक मिथिला परिक्षेत्र में इससे विशाल पुरास्थल प्राप्त नहीं हुई है। कुछ विद्वानों के द्वारा इस पुरास्थल की पहचान प्राचीन मिथिला नगरी के राजधानी के रूप में की गई है। ये पुरास्थल मिथिला की राजधानी है या नहीं इस विषय में और अधिक अध्ययन और विस्तृत पुरातात्विक उत्खनन एवं अन्वेषण की आवश्यकता है।</strong></p>
<figure id="attachment_7447" aria-describedby="caption-attachment-7447" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/3-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/3-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7447" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/3-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/3-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/3-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/3-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/3-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/3-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7447" class="wp-caption-text">​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी</figcaption></figure>
<p><strong>शोधार्थी मुरारी के अनुसार: </strong></p>
<p><strong>1.⁠ </strong>⁠सम्पूर्ण पुरास्थल का विस्तृत उत्खनन हो, जिससे तत्कालीन लोगों की सांस्कृतिक विशिष्टता यथा- राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक स्थितियों के साथ ही स्थापत्य कला, रहन-सहन, खान-पान, कृषि-पशुपालन, व्यापार, शिल्प, विभिन्न राज्यों से अन्तर्सम्बन्ध आदि स्पष्ट होंगे।</p>
<p><strong>2.⁠</strong> ⁠उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों को संरक्षित कर उक्त पुरास्थल पर ही संग्रहालय(Site Museum) स्थापित कर संगृहित/प्रदर्शित किए जाएं। इससे मिथिला की सांस्कृतिक विविधताओं एवं धरोहरों के प्रति आमजनों में जागरूकता आने के साथ ही स्थानीय पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।</p>
<p><strong>3.⁠</strong> ⁠विभिन्न स्तरों के सांस्कृतिक विविधताओं का वैज्ञानिक शोधपरक विश्लेषण करते हुए अब तक के उत्खनन का विस्तृत प्रतिवेदन प्रकाशित किए जाएं, जिससे तत्कालीन शासक या समुदाय की पहचान संभव हो पाएगी।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/1-5-lakh-km-journey-by-bicycle-to-find-archaeological-sites">​बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-3) : ​​साइकिल से 1​.5​ लाख किमी की यात्रा पुरातत्व स्थल ढूंढ़ने ​के लिए, मंत्री​, मंत्रालय​, अधिकारी &#8216;निद्रा&#8217; में</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-1): &#8216;अन्वेषण और उत्खनन&#8217; के नाम पर बहुत बड़ा खेल, अधिकारियों की निगाहें &#8216;निदेशक&#8217; की कुर्सी पर, मिथिला के नेताओं की नजर &#8216;कोषागार&#8217; पर, कहानियां अख़बारों के पन्नों पर और इतिहास पर गोबर पाथने की परम्परा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Mar 2026 11:58:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[archeology]]></category>
		<category><![CDATA[balirajgrh]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
		<category><![CDATA[excavation]]></category>
		<category><![CDATA[mithila]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बाबू बरही (झंझारपुर)/दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: ये दो तस्वीरें काफी है बिहार के लोगों की मानसिकता को दर्शाने के लिए। आप माने या न माने, आपकी मर्जी। यह महज दो तस्वीरें नहीं है, बल्कि प्रदेश के लोगों की मानसिकता, चाहे वे शिक्षित हो, विद्वान हों, विदुषी हों, अशिक्षित हों, नेता हों, अभिनेता हो, समाजसेवी हो, अधिकारी हों, पदाधिकारियों [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/balirajgarh-a-big-game-in-the-name-of-exploration-and-excavation-part-1">बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-1): &#8216;अन्वेषण और उत्खनन&#8217; के नाम पर बहुत बड़ा खेल, अधिकारियों की निगाहें &#8216;निदेशक&#8217; की कुर्सी पर, मिथिला के नेताओं की नजर &#8216;कोषागार&#8217; पर, कहानियां अख़बारों के पन्नों पर और इतिहास पर गोबर पाथने की परम्परा</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बाबू बरही (झंझारपुर)/दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: ये दो तस्वीरें काफी है बिहार के लोगों की मानसिकता को दर्शाने के लिए। आप माने या न माने, आपकी मर्जी। यह महज दो तस्वीरें नहीं है, बल्कि प्रदेश के लोगों की मानसिकता, चाहे वे शिक्षित हो, विद्वान हों, विदुषी हों, अशिक्षित हों, नेता हों, अभिनेता हो, समाजसेवी हो, अधिकारी हों, पदाधिकारियों हों, ठेकेदारों हों, धनाढ़्य हों, दरिद्र हों, नेता हों, मंत्री हों । यह दो तस्वीरें प्रदेश के नेताओं और अधिकारियों की, खासकर जो सत्ता के गलियारे में स्वयं को शक्तिहीन होने से अनवरत बचाने का प्रयास करते हैं, का जीता-जागता दृष्टान्त है, आप मानें या नहीं मानें आपकी मर्जी। </strong></p>
<p>इन दो तस्वीरों में एक तस्वीर 11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने के क्रम में अंग्रेजों की गोलियों से मृत्यु को प्राप्त किये क्रांतिकारी राम गोविन्द सिंह के पैतृक घर का दीवार है। राम गोविन्द सिंह दशरथ्था (पटना जिला) गांव के रहने वाले थे और पुनपुन हाई स्कूल के नौवीं कक्षा के छात्र थे। पटना सचिवालय के सामने स्थित सात-मूर्ति में एक राम गोविन्द सिंह भी हैं। पटना के तत्कालीन जिलाधिकारी डब्ल्यू जी आर्चर ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने  आदेश दिया था।मुझे उम्मीद है बिहार के 90 से अधिक फीसदी लोग, युवापीढ़ी, इस नाम से परिचित नहीं होंगे। दीवारों की दशा की बात छोड़िये। दूसरी तस्वीर झंझारपुर लोकसभा क्षेत्र के बलिराजगढ़ ब्लॉक में स्थित मिथिला ही नहीं, बिहार ही नहीं, सम्पूर्ण राष्ट्र की संस्कृति से जुड़े और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन बलिराजगढ़ किले का दीवार है। दोनों बिहार में ही है और दोनों दीवारों पर गोबर पाथने की परंपरा कल भी था, आज भी है और कल भी जारी रहेगा। </p>
<p><strong>हो भी कैसे ? आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण भले बिहार में शैक्षिक दर 74+ फीसदी पर हस्ताक्षर करे, प्रदेश के शिक्षा विभाग के अधिकारी, मंत्री राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर बिहार से प्रवासित और पलायित लोगों की उपलब्धियों पर अपना ठप्पा और मुहर लगाकर, बिहारी है-बिहारी है, कहकर केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को लुभाकर राशियों का आवंटन कराने में सफल हो जाए;  हकीकत में बिहार का शैक्षिक दर क्या है? महिला और पुरुषों के शैक्षिक दर के बीच कितने का फासला है? उनकी सोच के बीच कितना बड़ा खाई है? प्रदेश के इतिहास और ऐतिहासिक स्थलों का महत्व उनकी नज़रों में, चाहे नेता हों, अभिनेता हों, अधिकारी हो, पदाधिकारी हों, मतदाता हों, कितना है &#8211; इस बात का साक्षात् दृष्टान्त यह दो तस्वीरें हैं। आप मानें या नहीं। </strong></p>
<figure id="attachment_7407" aria-describedby="caption-attachment-7407" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7407" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2343-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7407" class="wp-caption-text">बलिराजगढ़ का प्रवेश द्वार और कुत्ता -तस्वीर: श्री राज झा</figcaption></figure>
<p>श्रीकृष्ण सिन्हा को छोड़ दीजिये, सन 1961 से 2026 तक, विगत 65 वर्षों में बिहार का मुख्यमंत्री कार्यालय और कक्ष में 21 व्यक्तियों &#8211; बिनोदानंद झा, कृष्ण बल्लभ सहाय, महामाया प्रसाद सिन्हा, सतीश प्रसाद सिंह, बीपी मंडल, भोला पासवान  शास्त्री,हरिहर सिंह, दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर, केदार पांडे, अब्दुल गफूर, जगन्नाथ मिश्र, राम सुन्दर दास, चंद्रशेखर सिंह, बिंदेश्वरी दुबे, भागवत झा &#8216;आज़ाद&#8217;, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, जीतनराम मांझी और नीतीश कुमार &#8211; को कक्ष में आते, मंत्रिमंडल बनाते, फिर जाते देखा है। अपवाद को छोड़कर, किसी का भी, चाहे मुख्यमंत्री हों या मंत्रिमंडल के लोग, प्रदेश की ऐतिहासिक गरिमा को बचाने, सुरक्षित और संरक्षित रखने में &#8216;निजी अभिरुचि&#8217; नहीं दिखा। </p>
<blockquote><p>&#8216;आधिकारिक अभिरुचि&#8217; के अनेकानेक कारण हो सकते हैं। प्रदेश की राजनीतिक गलियारे में अपने-अपने वजूद को कायम रखने के लिए तमाम लोगों ने, कुछ मंच से, तो कुछ नेपथ्य से, वे सभी कार्य किये जिसकी जरुरत नहीं थी, जहाँ तक प्रदेश के विकास का, वजूद का सवाल था, और आज भी है। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो आज बाबूबरही विधानसभा क्षेत्र और झंझारपुर लोकसभा क्षेत्र में आने वाला बलिराजगढ़ भी नालंदा, राजगीर, पावापुरी, बोधगया, विक्रमशिला जैसे स्थानों की सूची में दर्ज होता। </p></blockquote>
<p>बाबूबरही विधान सभा क्षेत्र से 1977 से 2024 तक नौ विधायक चुनकर प्रदेश के विधानसभा की कुर्सी पर बैठे। उसी तरह झंझारपुर लोकसभा क्षेत्र से 1971 से 2024 तक नौ सांसद चुनकर गए। यह क्षेत्र मिथिला का क्षेत्र हैं जहाँ आज़ादी के बाद अभी तक शैक्षिक-दर मगध और भोजपुर क्षेत्र के शैक्षिक दरों से न्यूनतम नौ फीसदी कम है। मिथिला में जहाँ सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 55.18 फीसदी शैक्षिक दर है, वहीँ भोजपुर में 66.19 फीसदी और मगध में 64.92 फीसदी है। </p>
<p>बिहार के 38 जिलों से प्रदेश के विधानसभा में बैठने वाले कुल 243 विधायकों में 130-135 सम्मानित विधायकगण गंगा के उस पार, यानी मिथिला क्षेत्र से आते हैं; जबकि देश के संसद में बिहार से आने वाले 40 सांसदों में 24-25 सांसद मिथिला क्षेत्र से ही हैं। अब सवाल यह है कि जब ये सम्मानित विधायक और सम्मानित सांसदगण &#8216;जनहित&#8217; से अधिक &#8216;स्वहित&#8217; में विश्वास रखते हों, फिर बाबूबरही ब्लॉक स्थित बलिराजगढ़ ऐतिहासिक स्थल का यह हश्र होना, लाजिमी है। </p>
<p>विगत दिनों भारत के विज्ञापन-जगत के हस्ताक्षर और मधुबनी के विख्यात पत्रकार राज झा, जो बलिराजगढ़ का भ्रमण किये थे, उनके यह शब्द सम्पूर्ण गाथा का निचोड़ है। उन्होंने कहा: अभी वहां कुछ भी नहीं है। धूल उड़ रही है। चारो तरफ मिट्टी का पहाड़ है। बीच-बीच में खोदा हुआ है। कुछ दिखता नहीं है। थोड़ा बहुत ईंट पत्थर दीखता हैं। लोग क्रिकेट खेलने, गाय भैंस चराने, गाय-बैल-भैंस को नहलाने, गाडी धोने के लिए तालाब का इस्तेमाल करते हैं। हालाँकि बॉउण्टरी वाल है, लेकिन कई जगह से टूटी हुयी है। एक गेट है उसमें ताला लगा है और बंद है, जहाँ पुरातत्व का साइन बोर्ड लगा हुआ है। बाकी जगह से भी प्रवेश है। मंन्दिर के पास से आप प्रवेश कर सकते हैं। अंदर गए थे। उबड़ खाबड़ है। लोगों का कहना है कि खुदाई को रातो रात बंद कर दिया गया था। उसमें क्या मिला था, या नहीं मिला था लोगों को नहीं मालूम। मिटटी उबड़ खाबड़ है, समतल से बंद नहीं किया गया है। स्थानीय लोगों को कुछ भी जानकारी नहीं है इसके बारे में।&#8221; खैर। </p>
<figure id="attachment_7408" aria-describedby="caption-attachment-7408" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1437" class="size-full wp-image-7408" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-300x168.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-1536x862.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2348-fotor-2026030117484-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7408" class="wp-caption-text">बलिराजगढ़ परिसर में दशकों पहले हुए उत्खनन से बने तालाब, तालाब में जमा पानी और पानी में नाहते भैंस।  इससे बेहतर स्थिति नहीं हैं बिहार में ऐतिहासिक पुरातत्वों की। दुःखद। तस्वीर: श्री राज झा</figcaption></figure>
<p><strong>पिछले दिनों जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भारत सरकार के अन्वेषण और उत्खनन विभाग, धरोहर भवन, नई दिल्ली के  पत्रांक F.No. T-17033/9/2020-EE (13926)/26 फरवरी, 2026  में बिना किसी दीर्घकालीन स्थिरता वाली परियोजना बनाये भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक ने मंज़ूरी दी, साथ ही यह भी कहा कि यह मंज़ूरी इस पत्र के जारी होने की तारीख से एक साल के लिए वैद्य है, मन में सैकड़ों सवालों का उठना स्वाभाविक सा लगा। सबसे पहले यह लगा कि &#8220;कहीं यह आदेश सांकेतिक और राजनीतिक लाभ के लिए तो नहीं है ?&#8221; शायद बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि डॉ. हरिओम शरण जो अभी सुपरिन्टेन्डेन्ट आर्कियोलॉजिस्ट हैं, निदेशक की कुर्सी पर नजर लगाए हैं। लोगों का यह भी कहना है कि शायद बलिराजगढ़ के अवशेषों की खुदाई उनके प्रोफ़ाइल में एक ईंट का कार्य करेगा। </strong></p>
<p>पत्र में लिखा गया: &#8220;आर्कियोलॉजिकल वर्क्स कोड के पैरा 12.9.1 के तहत, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक की मंज़ूरी दी जाती है। यह मंजूरी बिहार के मधुबनी ज़िले के बलिराजगढ़ में राजा बलि का गढ़ नाम से मशहूर पुराने किले के अवशेषों पर खुदाई करने के लिए है। खुदाई की जाने वाली जगह को साथ में दिए गए साइट प्लान पर लाल रंग से मार्क किया गया है।</p>
<p>यह खुदाई डॉ. हरिओम शरण, सुपरिंटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, पटना सर्कल के डायरेक्शन में की जाएगी। आर्कियोलॉजिकल वर्क्स कोड के पैरा 12.9.1 से 12.15 के अनुसार, जहाँ भी ज़रूरत हो, खर्च की मंज़ूरी ली जा सकती है। खुदाई के दौरान मिली पुरानी चीज़ों की पूरी लिस्ट इस ऑफिस को दी जानी चाहिए। ऑफिसर को इस बारे में समय-समय पर जारी नियमों और निर्देशों का सख्ती से पालन करना चाहिए। खुदाई के नतीजों की एक डिटेल्ड रिपोर्ट फील्डवर्क पूरा होने के तीन महीने के अंदर डायरेक्टर जनरल को जमा करनी होगी। खुदाई का काम कब शुरू किया जाए और कब बंद किया जाए, इसकी जानकारी इस ऑफिस को दी जा सकती है। यह मंज़ूरी इस लेटर के जारी होने की तारीख से एक साल के लिए वैलिड है।&#8221; </p>
<blockquote><p>आप माने अथवा नहीं, आपकी मर्जी, लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आला अधिकारी भी इस बात को स्वीकार करेंगे जिस आनन्-फानन में, बिना किसी दीर्घकालीन स्थिरता वाली परियोजना पर अध्ययन किये अन्वेषण और उत्खनन विभाग द्वारा यह पत्र निर्गत किया गया, &#8216;राजनीति से प्रेरित&#8217; है। यह आदेश किसी &#8216;अदृश्य इरादे&#8217; से भी निर्गत किया गया हो, नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है । भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में अधिकारीगण सिर्फ &#8216;ऊपर के आदेश&#8217; को मानते हैं और ऊपर का आदेश कहाँ से आता है, कब आता है &#8211; यह सभी जानते हैं। </p></blockquote>
<p>भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कार्यालय में &#8216;अपवाद को  छोड़कर&#8217;, शायद ही कोई अधिकारी हैं जो वास्तविक रूप से इन अन्वेषण और उत्खनन में विश्वास रहते हैं। सभी (अपवाद छोड़कर) की निगाहें &#8216;निदेशक&#8217; बनने अथवा अवकाश प्राप्ति से पूर्व सुरक्षित और सुसज्जित पदों पर आसीन होने का स्वप्न होता है। अब सवाल यह है कि अगर उत्खनन का आदेश बिना किसी दीर्घकालीन स्थिरता वाली परियोजना बनाये ही जारी किया गया है तो यकीन मानिये, यह राजनीति ही है मिथिला की भूमि के साथ। क्योंकि मिथिला क्षेत्र से राजनीतिक गलियारे में धोती सिटने वाले या फिर रंग-बिरंगे पाग पहनने वाले मिथिला की संस्कृति और गरिमा को बचाने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को तैयार करने के लिए करते हैं। </p>
<figure id="attachment_7409" aria-describedby="caption-attachment-7409" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7409" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2363-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7409" class="wp-caption-text">बलिराजगढ़ अवशेष : तस्वीर &#8211; राज झा</figcaption></figure>
<p>इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते हैं कि इस मद में कई सौ करोड़ राशि सरकारी खजाने से निकल जाय और बलिराजगढ़ में अब तक हुए चार खुदाइयों जैसा ही पाँचवाँ भी हो, और फिर मिट्टी से ढंक दिया जाय। विश्वास नहीं हो तो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आला अधिकारियों से पूछकर देखिये, मांगकर देखिये की पिछले एक-डेढ़ दशक में बिहार में सम्पन उत्खनन और एंटिक्विटी की उपलब्धिता से सम्बंधित कार्यों का प्रतिवेदन प्रकाशित हुआ है या नहीं? उत्तर ना ही मिलेगा। यकीन नहीं होता तो देश में 2022-2023/2023-2024/2024-2025 में सरकारी खजाने से केंद्रीय संरक्षित स्मारक/स्थल के संरक्षण और रखरखाव (अन्वेषण और उत्खनन नहीं) पर कितना आवंटन हुआ और क्या खर्च हुआ। </p>
<p><strong>विगत दिनों (12 फरवरी, 2026) केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने राज्यसभा में लिखित उत्तर बताया कि देश भर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधीन 3686 केंद्रीय संरक्षित स्मारक/स्थल हैं। इनके संरक्षण एवं रखरखाव की नियमित प्रक्रिया है जो राष्ट्रीय संरक्षण नीति के अनुसार स्मारक/स्थलों की आवश्यकता और संसाधनों की उपलब्धता के अनुसार की जाती है। पिछले तीन वर्षों के दौरान इन स्मारक/स्थलों के लिए 2022-23 में 392.71 करोड़ का आवंटन (खर्च: 391.93 करोड़),  2023-24 में 443.53 का आवंटन (खर्च:  443.53 अरोड रूपए)  और 2024-25 में 313.43 करोड़ रुपये का आवंटन (खर्च: 313.04 करोड़ रूपये) हुआ। खैर। </strong></p>
<p>वैसे, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का इतिहास भारत के पुराने अतीत को बचाने की कहानी है, जो इसके औपचारिक रूप से बनने से बहुत पहले 1784 शुरू हुई थी। भारत के इतिहास को सही तरीके से पढ़ने की दिशा में पहला कदम सर विलियम जोन्स ने 1784 में उठाया था। उन्होंने कलकत्ता में एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना की। इस ग्रुप ने संस्कृत और फ़ारसी में पुराने ग्रंथों की पढ़ाई को बढ़ावा दिया। 1837 में एक बड़ी कामयाबी मिली जब जेम्स प्रिंसेप ने पुरानी ब्राह्मी लिपि को सफलतापूर्वक समझ लिया। इससे चट्टानों और खंभों पर लिखे पुराने लेखों को पढ़ना मुमकिन हो गया। सं 1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना स्थापना हुई। </p>
<figure id="attachment_7410" aria-describedby="caption-attachment-7410" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7410" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2359-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7410" class="wp-caption-text">बलिराजगढ़ अवशेष : तस्वीर &#8211; राज झा</figcaption></figure>
<p>यह कहा जाता है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की औपचारिक स्थापना एक आदमी की पूरी कोशिशों का नतीजा थी। इसे अलेक्जेंडर कनिंघम ने शुरू किया था। वह एक ब्रिटिश आर्मी इंजीनियर थे जिन्हें आर्कियोलॉजी में बहुत दिलचस्पी थी। कनिंघम कई सालों से ज़रूरी बौद्ध जगहों का सर्वे कर रहे थे। उन्हें एहसास हुआ कि इस काम की देखरेख के लिए एक परमानेंट सरकारी संस्था की ज़रूरत है। वह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले डायरेक्टर-जनरल बने।</p>
<p><strong>वित्त की कमी की वजह से 1865 और 1871 के बीच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कुछ समय के लिए बंद हो गया था। लेकिन, भारत के वायसराय लॉर्ड लॉरेंस ने 1871 में सर्वे को फिर से शुरू किया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को बनाने में अहम भूमिका के लिए अलेक्जेंडर कनिंघम को अक्सर &#8216;इंडियन आर्कियोलॉजी का पिता&#8217; कहा जाता है। 1902 के सदी की शुरुआत में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को नई अहमियत और ताकत मिली। 1902 में, लॉर्ड कर्जन ने डायरेक्टर-जनरल का पद फिर से बहाल किया, जो पुराने स्मारकों को बचाने में पक्का यकीन रखते थे। सर जॉन मार्शल को 1902 में डायरेक्टर-जनरल बनाया गया। उन्होंने खुदाई और बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाली टेक्निक को मॉडर्न बनाया। मार्शल के समय की सबसे बड़ी कामयाबी 1921 और 1922 के बीच हड़प्पा और मोहनजो-दारो जैसी सिंधु घाटी सभ्यता की जगहों की खोज थी। इस खोज ने भारत के पुराने इतिहास की समझ को पूरी तरह से बदल दिया। बाद में, 1940 के दशक में, मॉर्टिमर व्हीलर ने भारत में आर्कियोलॉजी के लिए और ज्यादा साइंटिफिक तरीके शुरू किए।</strong></p>
<p>आज़ादी के बाद, सरकार ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को एक सही कानूनी ढांचा दिया। 1958 में, प्राचीन स्मारक और आर्कियोलॉजिकल साइट और अवशेष एक्ट (AMASR एक्ट) पास हुआ। इस एक्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को पूरे देश में सांस्कृतिक विरासत वाली जगहों को आधिकारिक तौर पर बचाने और सुरक्षित रखने की ताकत दी। आज, ASI संस्कृति मंत्रालय के तहत अपना काम जारी रखे हुए है, और UNESCO वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स समेत हज़ारों जगहों को मैनेज कर रहा है।</p>
<p>बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब देश का प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने 12 जुलाई 2018 को नई दिल्ली के तिलक मार्ग पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नए मुख्यालय &#8211; धरोहर भवन का उद्घाटन किया। उन्होने कहा भी कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने पिछले लगभग 150 सालों में बहुत बड़ा काम किया है। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री ने इतिहास और समृद्ध पुरातत्व विरासत पर गर्व करने के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि लोगों को अपने कस्बों, शहरों और इलाकों के स्थानीय इतिहास और पुरातत्व के बारे में जानने में आगे आना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्थानीय पुरातत्व के पाठ स्कूल के सिलेबस का हिस्सा बन सकते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भारत में आर्कियोलॉजी के लिए सबसे बड़ा संगठन है। यह देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की देखरेख करती है। यह देश भर में 3,600 से ज़्यादा स्मारकों और ऐतिहासिक जगहों की देखभाल करता है, जिन्हें राष्ट्रीय महत्व का माना जाता है। </p>
<figure id="attachment_7411" aria-describedby="caption-attachment-7411" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7411" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG_2337-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7411" class="wp-caption-text">बलिराजगढ़ : तस्वीर &#8211; राज झा</figcaption></figure>
<p>वापस फिर बलिराजगढ़ चलते हैं। कोई 61 वर्ष पहले रघुबीर सिंह के नेतृत्व में सर्वे के मिड-ईस्टर्न सर्कल ने एस. मुखेरी की मदद से दरभंगा से 80 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में बलिराजगढ़ में छोटे पैमाने पर खुदाई की। चार कटिंग की गईं, दो-दो डिफेंस-वॉल के आर-पार और दो-दो हैबिटेशन-एरिया में। इलाके में वॉटर-टेबल ज़्यादा होने की वजह से, कुदरती मिट्टी तक नहीं पहुँचा जा सका। फिर भी, खुदाई से किले की बनावट की डिटेल्स पर रोशनी पड़ी। डिफेंस-वॉल (प्लस X A) में मिट्टी-ईंटों का कोर था जिसके ऊपर ईंटों का कवर था, बाहरी कवर अंदर वाले कवर से चार गुना चौड़ा था। दीवार टूटी-फूटी थी और नीचे 5.18m और ऊपर 3-65m चौड़ी थी। मरम्मत समेत कंस्ट्रक्शन के तीन फेज़ पहचाने गए। सबसे शुरुआती फेज़ में मिट्टी की ईंटों का कोर (pl. XB) था, जिस पर पक्की ईंटों की दीवारें थीं, जिसके बाहरी हिस्से की चौड़ाई मिट्टी के प्लेटफॉर्म से लगभग तीन गुना थी, जिसमें मिट्टी के टुकड़े मिले हुए थे, जो किले के अंदरूनी हिस्से के सामने बने थे। भारी बाढ़ के कारण मज़बूती की ज़रूरत पड़ी, जैसा कि गाद के जमाव से पता चलता है। बचाव से पहले के जमाव से, उत्तरी काले पॉलिश किए हुए बर्तनों के टुकड़े मिले थे। </p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA.jpg" alt="" width="2047" height="1150" class="aligncenter size-full wp-image-7412" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/AAAA-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>ऐसा लगता है कि किलेबंदी दूसरी सदी B.C. में कहीं बनाई गई थी और पाल काल तक इस्तेमाल में रही; जुड़े हुए लेवल से मिली दूसरी चीज़ों में मोती, सिक्के, शुंग टेराकोटा पट्टिकाएँ (pl. XI), हड्डी की चीज़ें वगैरह शामिल थीं; इसके अलावा, साइट के अलग-अलग हिस्सों में BRG-2 से BRG-4 लेबल वाली तीन और कटिंग भी की गईं। इनमें से BRG-2 एक डंप पाया गया और उसमें कोई कब्ज़ा जमा नहीं था, लेकिन इस इलाके से सुंदर टेराकोटा पट्टिकाएँ मिलीं। BRG-3 में एक मंदिर के अवशेष मिले और BRG-4, जो दक्षिणी सुरक्षा पर था, ने BRG-1 जैसी ही जानकारी दी। बेड-रॉक; पीली मिट्टी, कंकड़-पत्थर के साथ मिली हुई; बोल्डर-जमाव; और लाल मिट्टी। उन्हें नदी के तल से शुरुआती पाषाण युग के कुछ औज़ार मिले, साथ ही पीली मिट्टी और ऊपर पड़े पत्थरों के अलग-अलग हिस्सों से भी। इसके अलावा, भीम-का-बांध और रेहाना जैसे आस-पास के इलाकों से भी मध्य और बाद के पाषाण युग के औज़ार इकट्ठा किए गए। इसके अलावा, रिंग या हैमर-स्टोन के दो टुकड़े और एक छोटे साइज़ का पॉलिश किया हुआ सेल्ट भी मिला। यह बात 61 साल पहले की है। </p>
<blockquote><p>बहरहाल, तिलक मार्ग के नुक्क्ड़ पर स्थित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के कार्यालय में बिहार के नेताओं को लेकर, जो इस प्रकरण के साथ राजनीतिक लाभ उठा रहे हैं, पर चर्चाएं आम हो रही हैं। कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि मिथिला के एक सांसद को तो यह भी मालूम नहीं था कि बलिराजगढ़ मिथिला में कहाँ है ? वे किसी भी विषय को लिखकर मांगते हैं और मंच पर उसे पढ़कर वाह-वाही लूटने में, ताली बजबाने में और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ तस्वीर &#8216;कपड़े पर बिना किसी सिकुड़न के&#8217; फोटो खिंचवाने पर कोई कसर नहीं छोड़ते। लोगों का तो यह भी कहना है कि संस्कृति मंत्रालय, बिहार के उच्च नेताओं, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आला अधिकारियों के बीच एक बड़ा खेल चल रहा है। बलिराजगढ़ उत्खनन इ नाम पर प्रचुर मात्रा में पैसा तो खर्च किया जायेगा (कागज पर) और अंततः इसका भी वही हश्र होगा जो पिछले चार उत्खनन में हुआ है।&#8221; &#8230;&#8230;.. </p></blockquote>
<p><strong>आगे जारी भाग-2 </strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/balirajgarh-a-big-game-in-the-name-of-exploration-and-excavation-part-1">बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-1): &#8216;अन्वेषण और उत्खनन&#8217; के नाम पर बहुत बड़ा खेल, अधिकारियों की निगाहें &#8216;निदेशक&#8217; की कुर्सी पर, मिथिला के नेताओं की नजर &#8216;कोषागार&#8217; पर, कहानियां अख़बारों के पन्नों पर और इतिहास पर गोबर पाथने की परम्परा</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>आप मिथिला के हैं तो आप अपने गाँव के पांच ऐतिहासिक स्थल और पुरातत्वों का नाम बताएं जिस पर आपको नाज हो ✍ सर !!! हें..हें&#8230;हें&#8230;.हैं !!!!! नहीं जानते हैं 😢</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 27 Nov 2024 04:03:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: आज ही नहीं, आने वाले समय में जब देश के बच्चों, नौजवानों से पूछा जायेगा की भारत के तीसरे प्रधान मन्त्री कौन थे? तब बच्चे गर्दन घुमाकर गुगुल करेंगे। अगर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित भारतीय प्रशासनिक सेवा के अन्तर्वीक्षा में टेबुल के दूसरे तरफ बैठे महानुभाव अभ्यर्थी से पूछ बैठें की [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/others/name-five-historical-sites-and-archaeological-sites-of-your-village-of-which-you-are-proud">आप मिथिला के हैं तो आप अपने गाँव के पांच ऐतिहासिक स्थल और पुरातत्वों का नाम बताएं जिस पर आपको नाज हो ✍ सर !!! हें..हें&#8230;हें&#8230;.हैं !!!!! नहीं जानते हैं 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दरभंगा/पटना/नई दिल्ली: आज ही नहीं, आने वाले समय में जब देश के बच्चों, नौजवानों से पूछा जायेगा की भारत के तीसरे प्रधान मन्त्री कौन थे? तब बच्चे गर्दन घुमाकर गुगुल करेंगे। अगर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा संचालित भारतीय प्रशासनिक सेवा के अन्तर्वीक्षा में टेबुल के दूसरे तरफ बैठे महानुभाव अभ्यर्थी से पूछ बैठें की &#8220;यौ !! अहाँक गामक पांच टा ऐतिहासिक स्थान/पुरातत्वक नाम की? (अपने गाँव या जिला का कोई ऐतिहासिक पुरातत्व का नाम बताएं), तो अभ्यर्थी कहीं गलती से किसी पूर्ववर्ती – मृत नेता का नाम न बता बैठें। सुनने में अटपटा लगता है, पढ़ने में तो बुरा लगेगा ही; परन्तु जब आराम से सोचेंगे तो “यथार्थ” लगने लगेगा। क्योंकि मिथिलांचल में घर-घर नेता पनपते हैं, पंचायत से विधानसभा, विधान परिषद् के रास्ते संसद में बैठने के लिए, लेकिन प्रदेश के रक्षार्थ, सम्मानार्थ बिरले कोई कदम बढ़ाते हैं। </strong></p>
<p>आंकड़ों के अनुसार देश में तक़रीबन 3645 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। अगर औसतन भारतीयों से पूछा जाय की वे अपने ही राज्य में स्थित न्यूनतम 10 ऐतिहासिक पुरातत्व और घरोहरों का नाम बताएं, तो उम्मीद है वे पांच अथवा छठे नाम बताते-बताते दम तोड़ देंगे। वजह यह है कि उन्हें उन ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहरों में कोई दिलचस्पी नहीं है (अपवाद छोडकर्) यदि इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो देश के सम्पूर्ण क्षेत्रफल में औसतन प्रत्येक 892 किलोमीटर पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। इनमे सबसे अधिक 743 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर उत्तर प्रदेश में हैं, यानि उत्तर प्रदेश के 324 प्रति किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। </p>
<p><strong>उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान कर्णाटक का है जहाँ 506 राष्ट्रीय स्तर के ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। तीसरा स्थान तमिलनाडू का है जहाँ 413 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पांचवा स्थान गुजरात (293 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर); छठा स्थान मध्य प्रदेश (292 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर); सातवां स्थान महाराष्ट्र (285 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर), आठवां स्थान राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली जहाँ174 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। भौगोलिक क्षेत्रफल के दृष्टि से राजस्थान बहुत बड़ा भूभाग है, लेकिन यहाँ 162 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पश्चिम बंगाल में 136 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; आंध्र प्रदेश में 129 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; हरियाणा में 91 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; ओडिसा में 79 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; बिहार में 70 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; जम्मू-कश्मीर में 56 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; असम में 55 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; छत्तीसगढ़ में 47 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; उत्तराखंड में 42 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; हिमाचल प्रदेश में 40 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; पंजाब में 33 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; केरल में 27 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; गोवा में 21 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; झारखण्ड में 13 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं और अंत में दमन-दीव में 12 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर स्थित हैं। </strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527.png"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527.png" alt="" width="1280" height="869" class="alignleft size-full wp-image-5920" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527.png 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527-300x204.png 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527-1024x695.png 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari4-fotor-202411279527-768x521.png 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a></p>
<p>औसतन वैसे ऐतिहासिक पुरातत्वों को छोड़कर, जो “दुधारू गाय” है, देश के हज़ारों-हज़ार पुरातत्वों की स्थिति, “सोचनीय” ही नहीं, “निंदनीय” भी है। ​वर्तमान वित्तीय वर्ष में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को लगभग 1273.91 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ था ताकि देश में ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थानों को, पुरातत्वों को सुरक्षित और संरक्षित रखा जा सके। पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में यह राशि 142.83 करोड़ अधिक थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय का एक हिस्सा है जिसका अहम् कार्य ऐतिहासिक स्थानों और पुरातत्वों को बचाना है। यह तो केंद्रीय स्तर की बात हुई देश में प्रत्येक राज्यों का संस्कृति मंत्रालयों के साथ साथ देश के कुल 787 जिलों के जिलाधिकारियों का भी यह दायित्व है कि स्थानीय रूप से उनके अपने-अपने क्षत्रों के ऐसे स्थानों और पुरातत्वों की देखभाल करे। </p>
<p>विगत दिनों पूर्व में कोसी से आरम्भ होकर पश्चिम में गंडक तक 24 योजन और दक्षिण में गंगा से आरम्भ होकर उत्तर में हिमालय की तराई तक 16 योजन में फैले मिथिला इलाके को अपनी साइकिल के पहियों से नापने वाले ललित नारायण मिथिला विश्वविदयालय, दरभंगाके प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के ​शोधार्थी मुरारी कुमार झा से बात हुई। झा बाबू अपने नाम के आगे &#8216;पुरातत्व&#8217; लिखते हैं । मेरे बाबूजी कहते थे कि अगर एक मनुष्य अपने जीवन काल में अपने नाम का ही अर्थ समझ लिया, अथवा अपने नाम का सार्थकता सिद्ध करने का यत्न-प्रयत्न किया, तो इससे बेहतर जीवन ​उद्देश्य और कुछ नहीं हो सकता है। मुरारी बाबू अपने जीवन के इस अल्पायु में अपने नाम का सार्थकता लगभग 90 फीसदी सिद्ध कर लिए हैं।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3.jpg" alt="" width="1280" height="799" class="alignright size-full wp-image-5921" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3.jpg 1280w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3-300x187.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3-1024x639.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari3-768x479.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /></a></p>
<p>मेरा मानना है पढ़ना-लिखना, नौकरी-पेशा करना, घर-परिवार होना, घन कामना यह सभी जीवन का एक दूसरा पक्ष है जो पहले (उपरोक्त) पक्ष की तुलना में द्वितीय स्थान पर है। मुरारी बाबू अपने सामर्थ्य भर मिथिला क्षेत्र में गुमनाम ऐतिहासिक स्थलों, पुरातत्वों को न केवल ढूंढ रहे हैं, बल्कि वर्तमान ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों को भी दस्तावेज के रूप में उन खोजों को, तस्वीरों के साथ, फिल्मों के साथ समर्पित करेंगे। मिथिला में मुझे अभी तक ऐसे कोई भी युवक अथवा युवती नहीं दिखे हैं। श्री मुरारी बाबू और उनका कार्य अद्वितीय हैं।</p>
<p>आज अगर दरभंगा के महाराजा डॉ. कामेश्वर सिंह जीवित होते तो शायद मुरारी बाबू को अपने सर पर बैठाकर  सम्मानित करते &#8211; अर्थ से, सामर्थ्य से, महाराजा मुरारी बाबू के पीछे खड़े हो जाते क्योंकि उस काल खंड में मिथिला में विचारवान लोगों की किल्लत नहीं थी। आज राज परिवार में उस सोच के लोग नहीं हैं, अतः उनसे उम्मीद करना मूर्खता होगी। मिथिला में आज &#8216;सामर्थ्यवान&#8217; लोगों की तो बाढ़ है, गली-कूचियों में नेताओं का जमघट है, प्रत्येक नेता अरबपति, खरबपति है; परन्तु दुर्भाग्यवश &#8216;विचारवान&#8217;, &#8216;संवेदनशील&#8217;, &#8216;पुरातत्वों के प्रति प्रेम&#8217; लोगों की सुखाड़ है। खैर। </p>
<p><strong>मुरारीजी शायद देश का पहला शोधार्थी है जो साइकिल को अपने शोध का हिस्सा बनाकर मिथिलांचल के ऐतिहासिक पुरातत्वों को ढूंढकर दस्तावेज बना रहे हैं। उधर राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए 55 फीसदी शैक्षिक दर वाले मिथिलांचल में मैथिली भाषा भाषी मतदाताओं को अपनी भाषा में संविधान का ज्ञान प्राप्त करने के लिए संविधान दिवस पर मैथिली भाषा में संविधान का लोकार्पण किया गया और पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर उनके मंत्रिमंडल के आला मंत्री-संत्री-अधिकारीगण दांत निपोड़ रहे हैं, कह रहे हैं &#8220;अच्छा !!!! वह आर्यन काल का है&#8230;. अच्छा गुप्ता काल का है, अच्छा वह&#8230;. क्योंकि न उन्हें पुरा से मतलब है और ना ही तत्व से। फिर मिथिला का इतिहास बचेगा कैसे?</strong></p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2.jpg" alt="" width="1313" height="720" class="alignleft size-full wp-image-5922" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2.jpg 1313w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2-300x165.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2-1024x562.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/1-2-768x421.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1313px) 100vw, 1313px" /></a></p>
<p>मुरारी जी कहते हैं कि वे मूलतः मिथिला परिक्षेत्र के दरभंगा जिला स्थित लवानी गाँव(बिहार) के निवासी हैं और वर्तमान समय में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा से पुरातत्त्व विषय में Ph.D. उपाधि हेतु शोध कार्य कर रहे हैं।  वे कहते हैं कि आज से नौ वर्ष पूर्व जब वे पुरातत्त्व के क्षेत्र में शोध के उद्देश्य से भ्रमण का योजना बनाये, तब साधन और संसाधन का अभाव सामने था। किंतु, उन्होंने भ्रमण हेतु अपने साइकिल को साधन के रूप में प्रयोग में लाना आरंभ किया।मुरजी जी कहते हैं: &#8220;आज तक में मैं अपने साइकिल से लगभग 1.5 लाख किलोमीटर सफ़र तय करते हुए पुरास्थल, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व के गाँव, प्राकृतिक सम्पदा आदि के अन्वेषण के उद्देश्य से लगभग 600 से अधिक यात्रा किया हूँ, जिसमें एक दिन में सबसे लम्बी दूरी 202 किमी. रही है। इस बार लगभग 300 किमी. दूरी तय करते हुए एक शोधपूर्ण यात्रा वृत्तांत प्रकाशित कराने की योजना है।&#8221;</p>
<p><strong>उनका मानना है कि &#8220;मिथिला, भारत के सबसे प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्रों में से एक है, जिसे ऐतिहासिक, धार्मिक और प्राकृतिक धरोहरों का केंद्र माना जा सकता है। इस क्षेत्र में प्राचीन मंदिरों, पुरास्थलों, नदियों, झीलों और सांस्कृतिक धरोहरों का भंडार है। हमारी कोशिश है कि सभी स्थलों तक पहुंचकर उसका व्यापक रूप से शोध और दस्तावेज़ीकरण किया जाय।&#8221; </strong></p>
<p>मुरारी जी कहते हैं: &#8220;मेरी साइकिल यात्रा (300किमी) दिसंबर 2024 के प्रथम सप्ताह में होगी और इसमें लगभग 3000 से अधिक पुरास्थल, प्राचीन मंदिर, प्राकृतिक धरोहर, क्षेत्रीय आयूर्वेद, गाँव, नदी, नहर, पोखर, झील, पक्षी अभ्यारण, कृषि, पशुपालन सहित अन्य महत्त्वपूर्ण स्थलों का विवरण और सूचीकरण किया जाएगा। इस परियोजना के अंतर्गत प्रकाशित होने वाली पुस्तक में इन सभी स्थलों का विवरण और चित्रण सहित उनसे जुड़ी सांस्कृतिक व्याख्या सम्मिलित होगी। यह परियोजना मिथिला की धरोहर और संस्कृति को संरक्षित और प्रचारित करने के साथ ही आम जनमानस को धरोहर संरक्षण के प्रति जागरूक करने हेतु एक व्यापक प्रयास का हिस्सा है।&#8221;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2.jpg" alt="" width="2048" height="1536" class="alignright size-full wp-image-5923" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2.jpg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2-300x225.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2-1024x768.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2-768x576.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/2-2-1536x1152.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a></p>
<p>​<strong>आर्यावर्तइण्डियननेशन(डॉट)कॉम</strong> जब परियोजना का उद्देश्य​ पूछा तो मुरारी जी कहते हैं कि &#8220;इस परियोजना का उद्देश्य एक साइकिल यात्रा के माध्यम से मिथिला क्षेत्र के पुरास्थलों, प्राचीन मंदिरों, प्राकृतिक धरोहरों और सांस्कृतिक विरासतों का गहन अध्ययन और उनका सूचीकरण के साथ ही इस वृत्तांत को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करना है, ताकि इन धरोहरों के बारे में शोधपूर्ण जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक​ पहुंचना है ताकि लोगों में अपने क्षेत्र के सांस्कृतिक विरासतों के बारे में पता चले।  इससे स्थानीय  और राष्ट्रीय स्तर पर धरोहर और संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।​&#8221;</p>
<p><strong>​जब उनसे पूछा कि इस यात्रा, शोध और पुस्तकी की छपाई के लिए आर्थिक श्रोत क्या है? मुरारजी जी कुछ क्षण रुके, लम्बी सांस लिए और फिर कहते हैं: &#8220;यही बिडम्बना है। यही हमारा दुर्भाग्य है। हम वीरसातों की महत्ता को तो समझते हैं, उसे उजागर करने के लिए सतत प्रयन्तशील हैं और चाहते हैं कि वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक दस्तावेज छोड़े जो उनके गान, प्रखंड, अंचल, जिला, क़स्बा के धरोहरों का जिवंत दृष्टान्त होगा। अर्थ के मामले में हम हैं कमजोर जो जाते हैं। हम एक शोधार्थी हैं। हम जानते हैं कि जिस कार्य को हम कर रहे हैं वह न केवल जिला प्रशासन के लिए, प्रदेश की सरकार के लिए या फिर केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है, इस कार्य से करोड़ों रूपये कमाए जा सकते हैं। हम अपने प्रदेश के, देश के लोगों से, जो देश से बाहर रहते हैं, उसने प्रार्थना कर रहे हैं कि इस कार्य में वे सभी हमारा हाथ पकड़ें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि मिथिला में लोग हाथ पकड़ते नहीं, हाथ झटक देते हैं।&#8221;</strong></p>
<p>झा का जन्म 15 फरवरी 1994ई० को दरभंगा जिले के ही बेनीपुर प्रखंड अंतर्गत आने वाले लवानी गाँव के एक साधारण किसान परिवार में हुआ और इनका लालन-पालन एवं सम्पूर्ण पढाई जिले के ही बहादुरपुर प्रखंड अंतर्गत देकुली गाँव स्थित नाना-नानी के घर से हुआ।​ ​स्नातकोत्तर के दौरान ही 02 दिसंबर 2015 को तत्कालीन विभागाध्यक्ष डॉ मदन मोहन मिश्र, शिक्षक डॉ अयोध्या नाथ झा और विभागीय कर्मचारी श्री कैलाश प्रसाद के समक्ष प्राचीन इतिहास विभाग(मोतीमहल परिसर) से प्राप्त हुए 1341ई० के &#8220;मोती महल स्तंभ लेख&#8221; के ऐतिहासिक खोज के साथ ही इन्होंने पुरातत्व के दुनिया में अपना पहला कदम रखा। किंतु, आगे की खोज जारी रखने हेतु इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में साधन और संसाधन का अभाव था, बावजूद इसके; इन्होंने अपना खोज-कार्य जारी रखा। चूंकि, नवीन खोज करना इनका प्रथम पसंद था; इसीलिए तत्काल इन्होंने भ्रमण हेतु अपने साइकिल को ही साधन के रूप में उपयोग किया।</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7.jpeg" alt="" width="1159" height="1600" class="aligncenter size-full wp-image-5924" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7.jpeg 1159w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7-217x300.jpeg 217w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7-742x1024.jpeg 742w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7-768x1060.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari7-1113x1536.jpeg 1113w" sizes="auto, (max-width: 1159px) 100vw, 1159px" /></a></p>
<p>स्वतंत्र भारत में, खासकर मिथिला क्षेत्र में मुरारी जी शायद पहला शोधार्थी है जो साइकिल से ही पुरास्थलों को खोजने हेतु दूर-दूर तक जाते हैं। दरभंगा के आनंदपुर से विदा होकर चार घंटे  पुरास्थल (गिरिजा स्थान फुलहर) पर कार्य करने के उपरांत कुल 13 घंटे में पुनः आनंदपुर आ गए थे, यानी कि 202 किमी की दूरी अपने साइकिल से 9 घंटे में तय किए। ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के स्थलों को खोजने के लिए अपने साइकिल से ये अभी तक दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, वैशाली, पटना आदि जिलों के लगभग 400 से 500 पुरास्थलों का भ्रमण कर चुके हैं। इससे संबंधित इनके दर्जन भर से अधिक आलेख भी प्रकाशित हैं। इनके सहयोग से देकुली (बहादुरपुर, दरभंगा) से एक शिवलिंग, ओझौल (बहादुरपुर, दरभंगा) से विष्णु प्रतिमा, भटौरा मठ (शिवाजीनगर, समस्तीपुर) से विष्णु प्रतिमा को दरभंगा जिला स्थित महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में संगृहीत किया जा चूका है। धरोहर संरक्षण हेतु, इन्हें विगत वर्ष मार्च महीने में चंद्रगुप्त साहित्य महोत्सव के दौरान &#8216;पुरातत्व भूषण सम्मान-2023&#8242; से सम्मानित किया गया।</p>
<p>​मुरारीजी कहते हैं: &#8220;केवल दरभंगा जिला को ही लें तो, शंकरपुर डीह, खैरा-सिरुआ, कुर्सों-नदियामी, इनाई, महथावन आदि पुरास्थलों से प्राचीन सिक्के, भच्छी, कोर्थू, पिपरौलिया, पंचोभ, तिलकेश्वर मठ, दरभंगा राज परिसर आदि पुरास्थलों से अभिलेख, बहेरा, बरई, शंकरपुर डीह, देवकुली, रतनपुर, ब्रह्मपुर, हावीडीह, कोर्थू आदि पुरास्थलों से प्राचीन भवनों मंदिरों के प्रमाण, रमौली, हरहच्चा, कोइलवाड़ा, महथावन, वाराही आदि पुरास्थलों से टेराकोटा और समस्त दरभंगा जिला से सैकड़ों प्रतिमाएं प्राप्त हुए हैं और समय-समय प्राप्त होते रहते हैं। इस जिले के 300 से अधिक ऐसे पुरास्थल और गांव हैं, जहां विभिन्न प्रकार के पुरावशेष बिखरे पड़े हैं। ये सभी पुरावशेष ईस्वी पूर्व से आधुनिक काल तक के हैं, जिसका वैज्ञानिक परीक्षण और अध्ययन होना अति आवश्यक है।​ मेरी कोशिश है कि अपनी यात्रा के दौरान ऐतिहासिक धरोहर, प्राकृतिक धरोहर, मानव स्वास्थ्य, जल संचयन एवं संरक्षण, संस्कृति के संरक्षण, जैविक कृषि आदि के महत्व को बताते हुए स्थानीय लोगों को जागरूक ​करते रहें क्योंकि जीवन में निरंतरता, लगन, एकाग्रता, सहनशीलता और बुद्धिमता सबसे आवश्यक है।&#8217;</p>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari5.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari5.jpeg" alt="" width="667" height="591" class="aligncenter size-full wp-image-5925" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari5.jpeg 667w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2024/11/Murari5-300x266.jpeg 300w" sizes="auto, (max-width: 667px) 100vw, 667px" /></a></p>
<p>मुरारी ​जी एक समर्पित और बहु-आयामी शोधकर्ता और पुरातत्वविद हैं, जो मिथिला क्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, और प्राकृतिक धरोहरों को संरक्षित करने में गहरी रुचि रखते हैं। मुरारी ​जी का मुख्य शोध मिथिला क्षेत्र की पुरातात्विक धरोहर पर केंद्रित है। उनके शोध का उद्देश्य दरभंगा जिले और इसके आस-पास के क्षेत्रों में छिपी प्राचीन धरोहरों और स्थलों की पहचान करना और उन्हें संरक्षित करना है। उन्होंने कई अज्ञात और अपरिचित स्थलों का अन्वेषण किया है, जिन्हें अब तक नजरअंदाज किया गया था।</p>
<p>उनके शोध कार्य का सबसे अनोखा पहलू यह है कि उन्होंने किसी विशेष साधन के बजाय अपनी साइकिल का उपयोग करके हजारों किलोमीटर की यात्रा की। उन्होंने अपनी साइकिल को &#8216;हवाई जहाज&#8217; नाम दिया और अब तक लगभग 1,50,000 किलोमीटर की दूरी तय की है। इस यात्रा के दौरान उन्होंने मिथिला की सांस्कृतिक धरोहरों का गहन अध्ययन किया और उन्हें संरक्षित करने का प्रयास किया। इतिहास और पुरातत्व के अलावा, मुरारी कुमार झा भूगोल और प्रकृति में भी गहरी रुचि रखते हैं। उन्होंने मिथिला के भौगोलिक परिदृश्य, नदियों, झीलों, और प्राकृतिक संसाधनों का अध्ययन किया है। वे इन प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण और संवर्धन के प्रति भी समर्पित हैं, खासकर जल प्रबंधन और पारिस्थितिक संतुलन के क्षेत्रों में।</p>
<p>मिथिला की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली और कृषि पद्धतियों का भी मुरारी ने गहन अध्ययन किया है। वे आयुर्वेद, कृषि, और पशुपालन में पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय की वकालत करते हैं। उन्होंने स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर आयुर्वेदिक पौधों और पारंपरिक कृषि तकनीकों का संरक्षण और प्रोत्साहन किया है। मुरारी कुमार झा एक कुशल लेखक भी हैं। उन्होंने मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर, पुरातात्विक स्थलों, और स्थानीय परंपराओं पर कई लेख और पुस्तकों का लेखन किया है। उनकी लेखनी में गहराई और स्पष्टता है, जो पाठकों को मिथिला की समृद्ध धरोहर के प्रति आकर्षित करती है। इसके अलावा, कला में उनकी रुचि, खासकर मिथिला पेंटिंग्स और अन्य पारंपरिक कलाओं में, उन्हें एक बहु-आयामी व्यक्तित्व बनाती है।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/others/name-five-historical-sites-and-archaeological-sites-of-your-village-of-which-you-are-proud">आप मिथिला के हैं तो आप अपने गाँव के पांच ऐतिहासिक स्थल और पुरातत्वों का नाम बताएं जिस पर आपको नाज हो ✍ सर !!! हें..हें&#8230;हें&#8230;.हैं !!!!! नहीं जानते हैं 😢</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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