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	<title>archeological survey of india Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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		<title>&#8216;आई लव यू पिंकी&#8217;, &#8216;स्वीटी लव्स जानू&#8217;, &#8216;कॉल मी एट &#8230;.&#8217; और 18 अप्रैल को &#8217;43 वां विश्व विरासत दिवस&#8217; का जश्न</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 12:14:47 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अरविंदो मार्ग (नई दिल्ली) : आज ही नहीं, आने वाले कल के भी युवापीढ़ी देश के कोने-कोने में स्थित ऐतिहासिक पुरातत्व और ऐतिहासिक विरासतों की दीवारों पर &#8220;आई लव यू पिंकी&#8221;, &#8220;स्वीटी लव्स जानू&#8221;, &#8220;कॉल मी एट &#8230;. &#8221; लिखना बंद कर दें, तो इन विरासतों के रख-रखाव पर होने वाले खर्चों में न्यूनतम 20 फीसदी [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अरविंदो मार्ग (नई दिल्ली) : आज ही नहीं, आने वाले कल के भी युवापीढ़ी देश के कोने-कोने में स्थित ऐतिहासिक पुरातत्व और ऐतिहासिक विरासतों की दीवारों पर &#8220;आई लव यू पिंकी&#8221;, &#8220;स्वीटी लव्स जानू&#8221;, &#8220;कॉल मी एट &#8230;. &#8221; लिखना बंद कर दें, तो इन विरासतों के रख-रखाव पर होने वाले खर्चों में न्यूनतम 20 फीसदी की कमी तो आ ही जाएगी।  इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अभिलाषा &#8211; विरासत सिर्फ इतिहास नहीं, यह मानवता की एक साझा चेतना भी है &#8211; उनके ही काल में पूरा हो जाता। लेकिन &#8216;का पर करब श्रृंगार पिया मोर आन्हर।&#8217; </strong></p>
<p>पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि &#8216;विरासत सिर्फ़ इतिहास नहीं है। बल्कि यह मानवता की एक साझा चेतना है। जब भी हम ऐतिहासिक स्थलों को देखते हैं, तो यह हमारे मन को मौजूदा भू-राजनीतिक कारकों से ऊपर उठा देता है।&#8217; प्रधानमंत्री ने यह भी स्वीकारा कि हमारी विरासत सिर्फ़ पत्थरों, लिपियों या खंडहरों से नहीं बनी है। यह मंदिर की दीवार की हर सरसराहट, प्राचीन किलों पर की गई हर नक्काशी और पीढ़ियों से चले आ रहे हर लोकगीत में जीवित है। यह उन कहानियों को बताती है कि हम कौन थे, हम किन मूल्यों के लिए खड़े थे और हमने कैसे विपरीत परिस्थितियों का सामना किया। विश्व विरासत दिवस एक दिल को छू लेने वाली याद दिलाता है कि ये कालातीत खजाने सिर्फ़ प्रशंसा के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा के लिए भी हैं।</p>
<blockquote><p>बहरहाल, नवाब शुजा-उद-दौला द्वारा अपने पिता मिर्ज़ा मुकीम अबुल मंसूर खान &#8216;सफदरजंग&#8217; के सम्मानार्थ बनाए गए मकबरे के प्रवेश के साथ दाहिने हाथ दूर तक लोहे की बनी कृत्रिम सीढ़ियों के बीच कुछ मजदूर बाहरी दीवारों पर सदियों पुराने पत्थरों, ईंटों के बीच की परत को साफ़ कर रहे थे। छेनी-हथौड़े की चोट से खट-खट ध्वनि आ रही थी। और हम उसी ध्वनि के बीच से 43 वां विश्व विरासत दिवस मनाने के सप्ताह में प्रवेश कर रहे हैं। इस वर्ष &#8216;संघर्षों और आपदाओं के संदर्भ में जीवित विरासत के लिए आपातकालीन प्रतिक्रिया&#8217; विषय को आधार मानकर आगामी 18 अप्रैल, 2026 मनाया जा रहा है। </p></blockquote>
<figure id="attachment_7585" aria-describedby="caption-attachment-7585" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-2.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-2.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7585" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-2.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-2-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-2-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-2-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-2-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7585" class="wp-caption-text">​सफदरजंग मकबरा के बाहरी दीवारों के आंतरिक हिस्सों का जीर्णोद्धार करता एक मजदूर  &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>यह कहा जा रहा है कि यह विषय उन सांस्कृतिक स्थलों और विरासत समुदायों को सुदृढ़ बनाने, उनकी रक्षा करने और उसमें लचीलापन विकसित करने की आवश्यकता पर जोर देता है, जो अचानक आए संकटों और संघर्षों का सामना कर रहे हैं। आगे पचास-पचास कदम पर चारो दिशाओं से सफदरजंग मकबरे को जोड़ने वाली कभी प्रयोग में नहीं आयी सड़कों पर 550/- रूपये प्रतिदिन की दैनिक मजदूरी पर दिल्ली सल्तनत के बाहर के &#8216;भारतीय&#8217; महिला-पुरुष मजदूर उपेक्षित सड़कों पर मौसम के प्रभाव से जमने वाली मिट्टी, उगने वाले घास को खुरपी, छेनी, हथौड़ा, करनी से साफ़ कर रहे थे। </p>
<p>विश्व विरासत दिवस की घोषणा &#8216;स्मारकों और स्थलों पर अंतरराष्ट्रीय परिषद&#8217; ने ट्यूनीशिया में की थी जिसे बाद में यूनेस्को ने मंजूरी दी और सदस्य देशों को इसे अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। इस दिवस का उद्देश्य सांस्कृतिक विरासत की विविधता के बारे में जागरूकता बढ़ाना और इसके संरक्षण तथा बचाव के लिए आवश्यक प्रयासों को बढ़ावा देना है।इसका मकसद मानव विरासत का उत्सव मनाना और उन समूहों को सम्मानित करना है जो इसके संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। यह सभी बातें कागजों और फाइलों पर लिखा है। पुरातत्वों और विरासतों की दीवारों पर तो कुछ और लिखा होता है। इस कहानी में उन बातों को नहीं लिखा जा सकता है। विश्वास नहीं हो तो देश के किसी भी शहर में स्थित पुरातत्वों पर भ्रमण-सम्मेलन का विश्वास अर्जित कर लें।  </p>
<figure id="attachment_7586" aria-describedby="caption-attachment-7586" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-8.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-8.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7586" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-8.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-8-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-8-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-8-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-8-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7586" class="wp-caption-text">​सफदरजंग मकबरा के दाहिने हिस्से के सामने बना पानी का जमावबड़ा  &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>यह तो सर्वविदित है कि भारत, दुनिया के कुछ सबसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक और पुरातात्विक खजानों का घर है। खजुराहो के बारीक नक्काशी वाले मंदिरों और हम्पी के ऐतिहासिक खंडहरों से लेकर पूजनीय सोमनाथ मंदिर तक, यह देश ऐसे स्मारकों की एक विशाल श्रृंखला का दावा करता है जो इसके समृद्ध इतिहास, विविध परंपराओं और स्थापत्य कला की भव्यता को दर्शाते हैं। उत्तरी हिमालय से लेकर कन्याकुमारी के दक्षिणी छोर तक फैले ये स्थल भारत के गौरवशाली अतीत और सांस्कृतिक विरासत के प्रमाण हैं। हालांकि, जलवायु परिवर्तन और मौसम के चरम पैटर्न, जैसे कि समुद्र के बढ़ते जलस्तर, लू, जंगल की आग, मूसलाधार बारिश और तेज़ हवाएँ, इन अमूल्य ऐतिहासिक स्थलों को गंभीर खतरे में डाल रहे हैं। इन कारकों से होने वाला नुकसान चल और अचल, दोनों प्रकार की विरासतों के क्षरण की गति को तेज कर रहा है, जिससे भारत की सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण पर खतरा मंडरा रहा है। इन ऐतिहासिक खजानों के संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय हस्तक्षेप अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि तत्काल सुरक्षा उपायों के अभाव में इनका भविष्य खतरे में बना रहेगा।</strong></p>
<figure id="attachment_7587" aria-describedby="caption-attachment-7587" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-15.jpg"><img decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-15.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7587" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-15.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-15-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-15-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-15-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-15-1536x1026.jpg 1536w" sizes="(max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7587" class="wp-caption-text">​हुमायूँ का मकबरा। तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>1861 में स्थापित, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण 3,698 स्मारकों और पुरातात्विक स्थलों की सुरक्षा और रखरखाव के लिए जिम्मेदार है, जिन्हें राष्ट्रीय महत्व का माना जाता है। ये स्थल &#8216;प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम, 1904&#8217; और &#8216;प्राचीन स्मारक तथा पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958&#8217; के तहत संरक्षित हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण प्रागैतिहासिक शैल-आश्रयों, नवपाषाणकालीन स्थलों, महापाषाणकालीन समाधियों, शैल-उत्कीर्ण गुफाओं, स्तूपों, मंदिरों, चर्चों, मस्जिदों, मकबरों, किलों, महलों और अन्य सहित विरासत की एक विस्तृत श्रृंखला का संरक्षण करता है। ये स्थल भारत के समृद्ध सांस्कृतिक और स्थापत्य इतिहास को दर्शाते हैं।</p>
<p>भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इन चुनौतियों से निपटने के लिए अपने 37 सर्कल कार्यालयों और 1 मिनी सर्कल कार्यालय के माध्यम से काम करता है, जो मुख्य रूप से राज्यों की राजधानियों में स्थित हैं; यहाँ यह संरक्षण प्रयासों और पर्यावरणीय विकास का समन्वय करता है। इसका लक्ष्य इन ऐतिहासिक स्थलों की अखंडता को आने वाली पीढ़ियों के लिए बनाए रखना है, यह सुनिश्चित करते हुए कि वे अपने मूल रूप में संरक्षित रहें और भारत की विरासत को दर्शाते रहें। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत स्मारकों के संरक्षण के लिए आवंटित राजस्व में 70% की वृद्धि हुई है। वर्ष 2020-21 में, आवंटन ₹260.90 करोड़ था और व्यय ₹260.83 करोड़ था, जबकि वर्ष 2023-24 में, आवंटन और व्यय दोनों बढ़कर ₹443.53 करोड़ हो गए। </p>
<figure id="attachment_7588" aria-describedby="caption-attachment-7588" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-1.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-1.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7588" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-1.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-1-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-1-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-1-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-1-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7588" class="wp-caption-text">​पुरानी दिल्ली स्थित अजमेरी गेट का दृश्य । तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>वैसे, भारत ने विश्व धरोहर सूची में अपनी उपस्थिति का लगातार विस्तार किया है। जुलाई 2024 में, असम के &#8220;मोइडाम्स: अहोम राजवंश की टीला-समाधि प्रणाली&#8221; को एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में शामिल करके एक गौरवपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। अक्टूबर 2024 तक, 196 देशों में 1,223 विश्व विरासत स्थल हैं (952 सांस्कृतिक, 231 प्राकृतिक, 40 मिश्रित)। भारत के अब विश्व धरोहर सूची में 43 स्थल हो गए हैं, और 62 अन्य स्थल यूनेस्को की संभावित सूची में शामिल हैं। देश की यह यात्रा 1983 में आगरा किले को सूची में शामिल करने के साथ शुरू हुई थी, जिसके बाद ताजमहल, अजंता गुफाएं और एलोरा गुफाएं भी इस सूची में शामिल हुईं। इन स्थलों को न केवल इतिहास के प्रतीकों के रूप में संरक्षित किया जाता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सीखने के स्थानों के रूप में भी सहेज कर रखा जाता है।</strong></p>
<p>भारत ने अपनी विशाल सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर की रक्षा, जीर्णोद्धार और उसे बढ़ावा देने के लिए कई सार्थक कदम उठाए हैं। ये पहलें देश की शाश्वत परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रखने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं। साथ ही, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण सांस्कृतिक धरोहरों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। सरकार ने वर्ष 1976 से 2024 के बीच विदेशों से 655 प्राचीन वस्तुएँ वापस हासिल की हैं, जिनमें से 642 प्राचीन वस्तुएँ 2014 के बाद वापस लाए गए हैं।</p>
<figure id="attachment_7589" aria-describedby="caption-attachment-7589" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-9.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-9.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7589" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-9.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-9-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-9-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-9-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-9-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7589" class="wp-caption-text">​सफदरजंग मकबरा में प्रवेश के साथ दाहिने हाथ बगीचे के बीच से आती सड़क जो कई दशक से उपकेशित थी &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<blockquote><p>आंकड़ों के अनुसार देश में तकरीबन 3645 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। अगर औसतन भारतीयों से पूछा जाय की वे अपने ही राज्य में स्थित न्यूनतम 10 ऐतिहासिक पुरातत्व और घरोहरों का नाम बताएं, तो उम्मीद है वे पांच अथवा छठे नाम बताते-बताते दम तोड़ देंगे। वजह यह है कि उन्हें उन ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहरों में कोई दिलचस्पी नहीं है (अपवाद छोडकर्) यदि इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो देश के सम्पूर्ण क्षेत्रफल में औसतन प्रत्येक 892 किलोमीटर पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। इनमे सबसे अधिक 743 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर उत्तर प्रदेश में हैं, यानि उत्तर प्रदेश के 324 प्रति किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। </p></blockquote>
<p>उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान कर्णाटक का है जहाँ 506 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। तीसरा स्थान तमिलनाडु का है जहाँ 413 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पांचवा स्थान गुजरात (293 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर); छठा स्थान मध्य प्रदेश (292 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर); सातवां स्थान महाराष्ट्र (285 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर), आठवां स्थान राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली जहाँ 174 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। भौगोलिक क्षेत्रफल के दृष्टि से राजस्थान बहुत बड़ा भूभाग है, लेकिन यहाँ 162 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पश्चिम बंगाल में 136 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; आंध्र प्रदेश में 129 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; हरियाणा में 91 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; ओडिसा में 79 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; बिहार में 70 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; जम्मू-कश्मीर में 56 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; असम में 55 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; छत्तीसगढ़ में 47 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; उत्तराखंड में 42 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; हिमाचल प्रदेश में 40 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; पंजाब में 33 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; केरल में 27 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; गोवा में 21 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर; झारखण्ड में 13 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं और अंत में दमन-दीव में 12 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर स्थित हैं।</p>
<p>बहरहाल, भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का भारतीयऐतिहासिक स्मारकों, पुरातत्वों और विरासतों के संरक्षण के बारे में क्या कहना है यह तो गहन शोध का विषय है ही, लेकिन मुगलकालीन अवध के गर्वनर मिर्ज़ा मुक़ीम अबुल मंसूर खान &#8216;सफदरजंग&#8217; का मकबरा और उसका परिसर इस साल के अंत तक भव्य अवश्य दिखेगा &#8211; बशर्ते ऐतिहासिक विरासतों के रखवालों की नियत साफ़ रहे। अगर सरकारी कोष से निकली राशि का कुछ अंश खर्च कर, दीवारों को लाल-पीला कर, चुना लेप कर, शेष राशियों को मुनाफा में तब्दील करने की सोच होगी तो शायद विरासतों का हाल भी दयनीय ही रहेगा। क्योंकि मुद्दत बाद सफदरजंग मकबरा के साथ-साथ परिसर में चारो तरफ इसके रख-रखाव को बेहतर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। </p>
<figure id="attachment_7590" aria-describedby="caption-attachment-7590" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-4.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-4.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7590" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-4.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-4-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-4-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-4-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-4-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7590" class="wp-caption-text">​​सफदरजंग मकबरा &#8211; उपेक्षित दीवारों की मरम्मति का अभियान &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>मुहम्मद मुकीम, जिन्हें सफदरजंग के नाम से ज़्यादा जाना जाता है, अवध के दूसरे नवाब (शासनकाल: 1539-54) और मुग़ल दरबार के एक अहम व्यक्ति थे। उन्होंने मुगल दरबार में प्रधानमंत्री के तौर पर काम किया और मुग़ल शासक मुहम्मद शाह (शासनकाल: 1719-48) ने उन्हें ‘सफदरजंग’ की उपाधि दी। मुहम्मद शाह, जिन्हें रंगीला (रंगीन मिज़ाज वाला) के नाम से ज़्यादा जाना जाता था, दरबार के बजाय हरम में ज़्यादा समय बिताना पसंद करते थे। उन्हें अपना साम्राज्य सफदरजंग के हाथों में सौंपने में बहुत खुशी होती थी। रंगीला की मौत के बाद भी यह परंपरा जारी रही, क्योंकि उनके उत्तराधिकारी अहमद शाह बहादुर (शासनकाल: 1748-54) ने अपने पिता के नक्शेकदम पर ही चले। इससे सफदरजंग और भी ज़्यादा ताकतवर हो गए। 1753 में, सफदरजंग ने अपनी योजना में कुछ ज़्यादा ही दांव लगा दिया और मराठों की मदद से उन्हें मुग़ल दरबार से बाहर निकाल दिया गया। वे भागकर अवध चले गए और अपनी मौत के समय ही दिल्ली लौटे, जब उनके बेटे शुजा-उद-दौला ने अपने पिता का मकबरा दिल्ली में बनवाने की इजाज़त मांगी।</strong></p>
<figure id="attachment_7591" aria-describedby="caption-attachment-7591" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-5.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-5.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7591" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-5.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-5-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-5-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-5-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-5-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7591" class="wp-caption-text">सफदरजंग मकबरा &#8211; दाहिने तरफ का उपेक्षित स्थान &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा </figcaption></figure>
<p>सफदरजंग का मकबरा, ऐसा माना जाता है कि हुमायूँ के मकबरे से प्रेरित है। यह मकबरा परिसर के केंद्र में स्थित है और चारों ओर से बगीचों से घिरा हुआ है। पहली नज़र में यह ताज महल का बलुआ पत्थर वाला रूप लग सकता है, लेकिन करीब से देखने पर पता चलता है कि इस मकबरे में ताज महल जैसा अनुपात नहीं है; इसकी ऊंचाई कुछ ज़्यादा ही सीधी है और इसमें पिरामिड जैसा एहसास नहीं है, जिसकी वजह से इसका संतुलित स्वरूप कहीं खो सा गया है। विलियम डेलरिम्पल अपनी किताब, *सिटी ऑफ़ जिन्स* में लिखते हैं: “दुनिया भर का हर स्कूली बच्चा ताज के स्वरूप को जानता है, और जहाँ तक सफदरजंग के मकबरे की बात है, तो पहली नज़र में यह कुछ अलग और गलत सा लगता है: इसकी रेखाएं कहीं न कहीं दोषपूर्ण और खटकने वाली हद तक गलत लगती हैं।” वे आगे कहते हैं, “&#8230;आप इसे जितनी देर तक देखते हैं, इस मकबरे के गुण और इसका चरित्र उतने ही ज़्यादा स्पष्ट होते जाते हैं, और यह बात भी उतनी ही साफ हो जाती है कि इसका वास्तुकार सिर्फ़ ताज की नकल करने की कोशिश नहीं कर रहा था, और न ही वह इसमें नाकाम रहा।” </p>
<figure id="attachment_7592" aria-describedby="caption-attachment-7592" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-7.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-7.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7592" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-7.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-7-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-7-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-7-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-7-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7592" class="wp-caption-text">सफदरजंग मकबरा &#8211; पिछले हिस्से में मरम्मत हेतुर सामग्रियों का जमाव &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा </figcaption></figure>
<p><strong>सफदरजंग का मकबरा एक ऊंचे चबूतरे पर बना है, जिस तक जुड़वां सीढ़ियों से पहुंचा जा सकता है। मकबरे के ऊपर एक बड़ा, गोल गुंबद बना हुआ है। इस चौकोर मकबरे के कोनों पर बहुभुजी मीनारें बनी हैं, जिनके ऊपर छतरियां लगी हैं। मकबरे का बीच वाला कमरा चौकोर आकार का है और इसमें सफदरजंग की संगमरमर से बनी एक सुंदर और नक्काशीदार कब्र है। इसके नीचे स्थित निचले कमरे (जो आम जनता के लिए खुला नहीं है) में दो कब्रें हैं; माना जाता है कि दूसरी कब्र सफदरजंग की पत्नी की है। बीच वाले कमरे के चारों ओर आठ छोटे कमरे बने हैं, जिनमें से कोनों वाले कमरे अष्टभुजी आकार के हैं। इन सभी कमरों को नक्काशीदार और रंगीन प्लास्टर के काम से सजाया गया है। आज, सफदरजंग का मकबरा रात के समय रोशनी से जगमगा उठता है, जिससे यह एक भव्य और शानदार नज़ारा पेश करता है। कहते हैं इस मकबरे को बनाने में लगभग तीन लाख रुपये खर्च हुए थे।</strong></p>
<figure id="attachment_7593" aria-describedby="caption-attachment-7593" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-12.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7593" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-12.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-12-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-12-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-12-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-12-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7593" class="wp-caption-text">सफदरजंग मकबरा &#8211; प्रवेश के साथ दाहिने हाथ स्थित मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए आये लोग &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा<br /></figcaption></figure>
<p>इस मकबरे के गुंबद के संगमरमर के काम में पिछले दो सालों में दरारें और खाली जगहें आ गई थी, जिसे बाद में संगमरमर के बीच की दरारों और खाली जगहों को भरा गया था। इस कार्य पर ₹45 लाख खर्च हुआ था। गुंबद के चारों ओर अलग-अलग हिस्सों में भी दरारें भरी गयी थी। मरम्मत के अलावा, संगमरमर को चमकाया गया था ताकि पर्यटन की दृष्टि से यह अधिक आकर्षक लग सके। चूंकि 18वीं सदी के इस मकबरे का गुंबद सफ़ेद संगमरमर से बना है, इसलिए इस कार्य के लिए कच्चा माल राजस्थान के मकराना और धौलपुर से मंगाया गया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक अधिकारी का कहना है कि &#8220;हमारी पूरी कोशिश होती है कि हम न केवल सफदरजंग मकबरा, बल्कि हमारे अधिक के सभी ऐतिहासिक पुरातवों और विरासतों को उनकी मूल विशेषताओं को बनाए रखकर उसे बनाए रखें। दिल्ली में खासकर ऐसे स्थानों पर उनके बगीचे सबसे अधिक आकर्षक होते हैं, यहाँ भी हैं, इसलिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने सफदरजंग मकबरा उप-सर्कल में पुरातात्विक उद्यानों के वार्षिक रखरखाव और देखभाल के लिए 29 अगस्त 2025 को (संदर्भ संख्या 15/36/2025-W (गार्डन) 4594445/- रुपये का एक ई-टेंडर निकाला गया था। आप बगीचे की स्थिति देख सकते हैं।&#8221;</p>
<figure id="attachment_7594" aria-describedby="caption-attachment-7594" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-10.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7594" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-10.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-10-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-10-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-10-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-10-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7594" class="wp-caption-text">​सफदरजंग मकबरा &#8211; पिछला हिस्सा  &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p><strong>विगत वर्ष 18 सितम्बर 2015 को केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा था कि देश में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकार क्षेत्र में 3685 केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारक/स्थल हैं। इन केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारकों और स्थलों का संरक्षण, परिरक्षण और रखरखाव एक सतत प्रक्रिया है, और संरक्षण के लिए राष्ट्रीय नीति के अधीन, आवश्यकता और संसाधनों की उपलब्धता के अनुसार कार्य किए जाते हैं। आवश्यकतानुसार, स्मारक/स्थल की मरम्मत, जीर्णोद्धार और संरचनात्मक स्थिरीकरण कार्यों के लिए LiDAR मैपिंग, GIS और ड्रोन-आधारित सर्वेक्षण जैसे आधुनिक उपकरणों को अपनाया जाता है। ज्ञातव्य हो कि देश में केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारकों और स्थलों के संरक्षण पर 2020-21 में 260.83 करोड़, 2021-22 में 269.57 करोड़, 2022-23 में 391.93 करोड़, 2023-24 में 443.53 करोड़ और 2024-25 में 313.04 करोड़ खर्च हुए थे।</strong> </p>
<figure id="attachment_7595" aria-describedby="caption-attachment-7595" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-19.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-19.jpg" alt="" width="2047" height="1367" class="size-full wp-image-7595" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-19.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-19-300x200.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-19-1024x684.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-19-768x513.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/04/S-19-1536x1026.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7595" class="wp-caption-text">​सफदरजंग मकबरा सामने से &#8211; तस्वीर: संजय शर्मा</figcaption></figure>
<p>बहरहाल, भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना एक निरंतर और बहुआयामी प्रयास है, जिसके लिए पर्यावरणीय, कानूनी और सुरक्षा चुनौतियों से निपटने हेतु सक्रिय उपायों की आवश्यकता होती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, विभिन्न एजेंसियों के सहयोग से, राष्ट्र के स्मारकीय खजानों की निगरानी, सुरक्षा और संरक्षण का कार्य जारी रखे हुए है। निरंतर समर्पण के साथ, ये प्रयास यह सुनिश्चित करते हैं कि भारत का समृद्ध इतिहास आने वाली पीढ़ियों के अनुभव और सराहना के लिए सुरक्षित रहे।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/i-love-you-pinky-sweetie-loves-janu-and-the-43rd-world-heritage-day">&#8216;आई लव यू पिंकी&#8217;, &#8216;स्वीटी लव्स जानू&#8217;, &#8216;कॉल मी एट &#8230;.&#8217; और 18 अप्रैल को &#8217;43 वां विश्व विरासत दिवस&#8217; का जश्न</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>​बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-3) : ​​साइकिल से 1​.5​ लाख किमी की यात्रा पुरातत्व स्थल ढूंढ़ने ​के लिए, मंत्री​, मंत्रालय​, अधिकारी &#8216;निद्रा&#8217; में</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/1-5-lakh-km-journey-by-bicycle-to-find-archaeological-sites</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 Mar 2026 12:29:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[archeological survey of india]]></category>
		<category><![CDATA[archeology]]></category>
		<category><![CDATA[balirajgarh]]></category>
		<category><![CDATA[bihr]]></category>
		<category><![CDATA[heritag]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बलिराजगढ़ / दरभंगा / पटना / नई दिल्ली : आप माने या न माने, आपकी मर्जी। देश के सम्पूर्ण क्षेत्रफल में औसतन प्रत्येक 892 किलोमीटर पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। इनमे सबसे अधिक 743 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर उत्तर प्रदेश में हैं, यानि उत्तर प्रदेश के 324 प्रति किलोमीटर क्षेत्रफल पर [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बलिराजगढ़ / दरभंगा / पटना / नई दिल्ली : आप माने या न माने, आपकी मर्जी। देश के सम्पूर्ण क्षेत्रफल में औसतन प्रत्येक 892 किलोमीटर पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। इनमे सबसे अधिक 743 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर उत्तर प्रदेश में हैं, यानि उत्तर प्रदेश के 324 प्रति किलोमीटर क्षेत्रफल पर एक न एक ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर है। आंकड़ों के अनुसार देश में तकरीबन 3645 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान कर्नाटक का है जहाँ 506 राष्ट्रीय स्तर के ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। तीसरा स्थान तमिलनाडु का है जहाँ 413 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। </strong></p>
<p>आंकड़ों के अनुसार गुजरात में 293, मध्य प्रदेश में 292, महाराष्ट्र में 285, दिल्ली में 174 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। भौगोलिक क्षेत्रफल के दृष्टि से राजस्थान बहुत बड़ा भूभाग है, लेकिन यहाँ 162 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर हैं। पश्चिम बंगाल में 136, आंध्र प्रदेश में 129, हरियाणा में 91, ओडिसा में 79, बिहार में 70, जम्मू-कश्मीर में 56, असम में 55, छत्तीसगढ़ में 47, उत्तराखंड में 42, हिमाचल प्रदेश में 40, पंजाब में 33, केरल में 27, गोवा में 21, झारखण्ड में 13 और दमन-दीव में 12 ऐतिहासिक पुरातत्व और धरोहर स्थित हैं।</p>
<p>​<strong>शायद भरत के लोगों को यह ज्ञात नहीं होगा कि देश की आर्कियोलॉजिकल विरासत में 4 लाख से ज़्यादा स्ट्रक्चर और 58 लाख से ज़्यादा पुरानी चीज़ें शामिल हैं, जिनमें से ज़्यादातर सेंट्रल और स्टेट लेवल की अथॉरिटी, म्यूज़ियम, धार्मिक संस्थाएँ वगैरह के नियंत्रण में हैं। हमारी अनोखी और कीमती कल्चरल और आर्कियोलॉजिकल विरासत, पारंपरिक ज्ञान, रीति-रिवाजों और तेज़ी से हो रहे शहरीकरण को देखते हुए, हमारी आर्कियोलॉजिकल विरासत को बचाने के लिए एक खास इंफ्रास्ट्रक्चर और कानूनी ढांचा ज़रूरी है। संस्कृति मंत्रालय भारतीय विरासत और कल्चर के बचाव, संरक्षण और प्रमोशन के लिए जिम्मेदार है। मंत्रालय, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया, म्यूज़ियम, नेशनल मॉन्यूमेंट अथॉरिटी और दूसरी एजेंसियों के ज़रिए, नेशनल इंपॉर्टेंस के सभी सेंट्रली प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट्स की सुरक्षा, हिस्टोरिकल साइट्स की खुदाई, आर्टिफैक्ट्स का कलेक्शन और शोकेसिंग, उनका डॉक्यूमेंटेशन और डिजिटाइजेशन वगैरह के लिए जवाबदेह है।</strong></p>
<figure id="attachment_7439" aria-describedby="caption-attachment-7439" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/6-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/6-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7439" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/6-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/6-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/6-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/6-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/6-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/6-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7439" class="wp-caption-text">​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी</figcaption></figure>
<p>​चार वर्ष पूर्व साल 2022 में भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक द्वारा एक प्रतिवेदन संसद में पेश किया गया था। वह प्रतिवेदन मूल रूप से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के वित्तीय नियंत्रण तंत्र में कमियों, देश में स्मारकों और प्राचीन वस्तुओं के दस्तावेज़ीकरण में अंतराल और केंद्रीय विरासत निकाय द्वारा खुदाई और अन्वेषण गतिविधियों पर बहुत कम खर्च को उजागर किया था। तत्कालीन संसद में प्रस्तुत प्रतिवेदन स्मारकों और प्राचीन वस्तुओं के संरक्षण और संरक्षण पर कैग ने स्मारकों में संरक्षण कार्यों और विरासत उद्यानों के प्रबंधन में कमियों और चयनित स्मारकों के भौतिक निरीक्षण के दौरान सार्वजनिक सुविधाओं जैसे सार्वजनिक शौचालय, पीने का पानी, वाहन पार्किंग के लिए स्थान, रैंप, गाइड, सुरक्षा आदि की अनुपस्थिति को भी इंगित किया। एक मकसद और था कैग की 2013 की रिपोर्ट नंबर 18 में बताए गए चिंता के क्षेत्रों पर की गई कार्रवाई कार्रवाई की जान-पड़ताल करना और पब्लिक अकाउंट्स कमेटी की 25 खास सिफारिशों पर की गई कार्रवाई की सीमा की भी जांच करना था।</p>
<p>​ऑडिट के दौरान शामिल यूनिट्स में संस्कृति मंत्रालय, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया, नेशनल मॉन्यूमेंट अथॉरिटी, नेशनल कल्चर फंड, नेशनल मिशन ऑन मॉन्यूमेंट्स एंड एंटीक्विटीज़ और छह नेशनल-लेवल म्यूज़ियम शामिल थे।<br />
​कैग ने अपने रिपोर्ट में कहा कि PAC की सिफारिश के बावजूद, मिनिस्ट्री/ASI के कंट्रोल में म्यूज़ियम के लिए कोई यूनिफॉर्म प्रोसेस नहीं था। मिनिस्ट्री/ASI ने बताया कि इनमें से ज़्यादातर काम अंडर प्रोसेस थे । नेशनल मॉन्यूमेंट अथॉरिटी​, जिसे  2011 में​, एक कानूनी संस्था के तौर पर बनाई गई थी ताकि स्मारकों के रोके गए/रेगुलेटेड एरिया में कंस्ट्रक्शन के काम करने के लिए नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट दिए जा सकें। इसका असली मकसद हर स्मारक के लिए हेरिटेज बाय-लॉज़ और साइट-प्लान तैयार करके कानूनी नियमों को लागू करना था। लेकिन, 3693 सेंट्रली प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेंट्स में से, सिर्फ़ 31 स्मारकों के लिए हेरिटेज बाय-लॉज़  नोटिफ़ाई किया गया है, जबकि 210 स्मारकों के लिए हेरिटेज बाय-लॉज़  को फ़ाइनल करने का काम अलग-अलग स्टेज पर था, जैसे नोटिफ़िकेशन, कंसल्टेशन, वगैरह। </p>
<blockquote><p>​रिपोर्ट में यह भी उजागर किया गया था कि ASI के पास अपना काम पूरा करने के लिए कोई स्ट्रैटेजी या रोड-मैप (लॉन्ग टर्म/मीडियम टर्म) नहीं था। कंज़र्वेशन के काम एड-हॉक/सालाना आधार पर किए जा रहे थे। आर्कियोलॉजी से जुड़े मामलों पर ASI को सलाह देने के लिए सबसे बड़ी बॉडी के तौर पर सोची गई सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑन आर्कियोलॉजी मार्च 2018 के बाद से एक्टिव नहीं थी और 2014-18 के दौरान (अक्टूबर 2014 में) इसकी सिर्फ़ एक मीटिंग हुई थी। PAC की सिफारिश के बावजूद, अतिक्रमण की घटनाओं को रोकने के लिए सेंट्रल या सर्कल लेवल पर कोई कोऑर्डिनेशन और मॉनिटरिंग सिस्टम नहीं बनाया गया।</p></blockquote>
<p><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/13.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/13.jpg" alt="" width="2047" height="1150" class="aligncenter size-full wp-image-7440" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/13.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/13-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/13-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/13-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/13-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a></p>
<p>​<strong>जब बलिराजगढ़ पटना उच्च न्यायालय पहुंचा था </strong></p>
<p>दस वर्ष पहले पटना उच्च न्यायालय के एक अधिवक्ता सुनील कुमार कर्ण​ बलिराजगढ़ खुदाई ो लेकर पटना उच्च न्यायालय पहुंचे थे। आज कहते हैं &#8220;आखिर कर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली ी नींद दस वर्ष बाद ही साई, खुली तो।&#8221; आर्यावर्तइंडियननेशन कॉम स बट करते अधिवक्ता कारण कहते हैं कि &#8220;मिथिला में बलिराजगढ़ का किला अत्यंत प्रसिद्ध है तथा देश के विशालतम पुरातात्विक स्थलों में से एक है। मान्यता है कि यह दानवराज बली का किला था जो हजारों साल से जमीन के नीचे दबा हुआ है। इतिहासकार इसे मिथिला की प्राचीन राजधानी कहते हैं जिसके उत्खनन के बाद ही मिथिला की गौरवशाली इतिहास एवं संस्कृति उजागर होगी।​ इस स्थल की महत्ता को देखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा 1962 ई में उत्खनन कराया गया था। पुनः बिहार सरकार के पुरातत्व निदेशालय द्वारा 1972-73 एवं 1974-75 में सांकेतिक उत्खनन कराया गया तथा 2013-14 में पुनः भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा एक सांकेतिक एवं अल्पकालिक उत्खनन कराया गया। यद्यपि प्रत्येक सांकेतिक एवं अल्पकालिक उत्खनन में हजारों साल पुरानी संस्कृति के महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त होते रहे फिर भी कोई न कोई बहाना बनाकर उत्खनन रोक दिया गया।​&#8221;</p>
<p>उनके अनुसार, &#8220;भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण,​ नयी दिल्ली की उपेक्षापूर्ण रवैए से परेशान हो कर 16-2-2015 को संस्कृति मंत्री,​ भारत सरकार, सचिव, संस्कृति मंत्रालय,​ भारत सरकार तथा महानिदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को आवेदन पत्र भेजकर बलिराजगढ़ के पुरातात्विक उत्खनन कराने के लिए आग्रह किया था। मेरे आवेदन पत्र कोई निर्णय नहीं लिया गया उसके बाद मैंने माननीय पटना उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका 9026/2015 दायर किया। जिसका निष्पादन माननीय मुख्य न्यायाधीश एवं न्यायमूर्ति श्री मती अंजना मिश्रा द्वारा 20-6-2016 को कर दिया गया। केंद्र सरकार द्वारा जवाब दिया गया कि अभी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अन्य पुरातात्विक स्थलों के उत्खनन में व्यस्त है इसलिए अभी बलिराजगढ़ का उत्खनन संभव नहीं है।​&#8221; यह आर्य दस वर्ष पहले होनी चाहिए थी। लेकिन ढुलमुल नीति के कारण दस वर्ष आगे बढ़ गयी। विगत कई दशकों से लगातार बलिराजगढ़ पर अनुसंधान करने एवं पुरातात्विक उत्खनन के लिए यथासंभव प्रयास करने के लिए पुराविद् ​डॉ शिव कुमार मिश्र​ धन्यवाद के पात्र हैं। </p>
<blockquote><p>अधिवक्ता कर्ण का कहना है कि &#8220;अब तक बलिराजगढ़ का चार बार पुरातात्विक उत्खनन कराया जा चुका है लेकिन सभी सांकेतिक एवं अल्पकालिक उत्खनन ही कराया गया जिससे इस स्थल की संस्कृति एवं इतिहास उजागर नहीं हो सका। आशा है कि बिहार के अन्य प्रमुख पुरास्थलों नालंदा, विक्रमशिला, कोल्हुआ आदि की तरह विस्तृत परियोजना बनाकर बलिराजगढ़ का संपूर्ण एवं लगातार उत्खनन कराया जाएगा। उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों से साइट म्यूजियम स्थापित किया जायेगा तथा उत्खनन प्रतिवेदन भी प्रकाशित किया जायेगा।&#8221;</p></blockquote>
<figure id="attachment_7441" aria-describedby="caption-attachment-7441" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/10.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/10.jpg" alt="" width="2047" height="1150" class="size-full wp-image-7441" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/10.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/10-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/10-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/10-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/10-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7441" class="wp-caption-text">​साईकिल वाला शोधार्थी : मिथिला विश्वविदयालय, दरभंगा​ के प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के ​शोधार्थी मुरारी कुमार झा</figcaption></figure>
<p>​<strong>साईकिल वाला शोधार्थी  </strong></p>
<p>विगत दिनों पूर्व में कोसी से आरम्भ होकर पश्चिम में गंडक तक 24 योजन और दक्षिण में गंगा से आरम्भ होकर उत्तर में हिमालय की तराई तक 16 योजन में फैले मिथिला इलाके को अपनी साइकिल के पहियों से नापने वाले ललित नारायण मिथिला विश्वविदयालय, दरभंगा​ के प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के ​शोधार्थी मुरारी कुमार झा से बात हुई। झा अपने नाम के आगे ‘पुरातत्व’ लिखते हैं। मुरारी​ जी शायद देश का पहला शोधार्थी है जो साइकिल को अपने शोध का हिस्सा बनाकर मिथिलांचल के ऐतिहासिक पुरातत्वों को ढूंढकर दस्तावेज बना रहे हैं। पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर उनके मंत्रिमंडल के आला मंत्री-संत्री-अधिकारीगण दांत निपोड़ रहे हैं, कह रहे हैं “अच्छा !!!! वह आर्यन काल का है…. अच्छा गुप्ता काल का है, अच्छा वह…. क्योंकि न उन्हें पुरा से मतलब है और ना ही तत्व से। फिर मिथिला का इतिहास बचेगा कैसे?</p>
<p>स्वतंत्र भारत में, खासकर मिथिला क्षेत्र में मुरारी जी शायद पहला शोधार्थी है जो साइकिल से ही पुरास्थलों को खोजने हेतु दूर-दूर तक जाते हैं।​ ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के स्थलों को खोजने के लिए अपने साइकिल से ये अभी तक दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, वैशाली, पटना आदि जिलों के लगभग 400 से 500 पुरास्थलों का भ्रमण कर चुके हैं। इससे संबंधित इनके दर्जन भर से अधिक आलेख भी प्रकाशित हैं। इनके सहयोग से देकुली (बहादुरपुर, दरभंगा) से एक शिवलिंग, ओझौल (बहादुरपुर, दरभंगा) से विष्णु प्रतिमा, भटौरा मठ (शिवाजीनगर, समस्तीपुर) से विष्णु प्रतिमा को दरभंगा जिला स्थित महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में संगृहीत किया जा​ चुका है। धरोहर संरक्षण हेतु, इन्हें चंद्रगुप्त साहित्य महोत्सव के दौरान ‘पुरातत्व भूषण सम्मान-2023′ से सम्मानित किया गया।</p>
<figure id="attachment_7442" aria-describedby="caption-attachment-7442" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/1-1-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/1-1-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7442" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/1-1-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/1-1-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/1-1-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/1-1-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/1-1-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/1-1-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7442" class="wp-caption-text">​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी</figcaption></figure>
<p><strong>झा का जन्म 15 फरवरी 1994ई० को दरभंगा जिले के ही बेनीपुर प्रखंड अंतर्गत आने वाले लवानी गाँव के एक साधारण किसान परिवार में हुआ और इनका लालन-पालन एवं सम्पूर्ण पढाई जिले के ही बहादुरपुर प्रखंड अंतर्गत देकुली गाँव स्थित नाना-नानी के घर से हुआ।​ ​स्नातकोत्तर के दौरान ही 02 दिसंबर 2015 को तत्कालीन विभागाध्यक्ष डॉ मदन मोहन मिश्र, शिक्षक डॉ अयोध्या नाथ झा और विभागीय कर्मचारी श्री कैलाश प्रसाद के समक्ष प्राचीन इतिहास विभाग​(मोतीमहल परिसर) से प्राप्त हुए 1341ई० के “मोती महल स्तंभ लेख” के ऐतिहासिक खोज के साथ ही इन्होंने पुरातत्व के दुनिया में अपना पहला कदम रखा। किंतु, आगे की खोज जारी रखने हेतु इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में साधन और संसाधन का अभाव था, बावजूद इसके; इन्होंने अपना खोज-कार्य जारी रखा। चूंकि, नवीन खोज करना इनका प्रथम पसंद था; इसीलिए तत्काल इन्होंने भ्रमण हेतु अपने साइकिल को ही साधन के रूप में उपयोग किया।</strong></p>
<p>​मुरारी जी कहते हैं: “आज तक में मैं अपने साइकिल से लगभग 1.5 लाख किलोमीटर सफ़र तय करते हुए पुरास्थल, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व के गाँव, प्राकृतिक सम्पदा आदि के अन्वेषण के उद्देश्य से लगभग 600 से अधिक यात्रा किया हूँ, एक दिन में सबसे अधिकतम 202 किमी की दूरी थी, जो अब एक दिन में लगातार बीस घंटा पचास मिनट की साइकिल यात्रा करते हुए 310 किमी हो चुकी है​ साइकिल यात्रा में लगभग 3000 से अधिक पुरास्थल, प्राचीन मंदिर, प्राकृतिक धरोहर, क्षेत्रीय आयूर्वेद, गाँव, नदी, नहर, पोखर, झील, पक्षी अभ्यारण, कृषि, पशुपालन सहित अन्य महत्त्वपूर्ण स्थलों का विवरण और सूचीकरण किया ​हूँ । इस परियोजना के अंतर्गत प्रकाशित होने वाली पुस्तक में इन सभी स्थलों का विवरण और चित्रण सहित उनसे जुड़ी सांस्कृतिक व्याख्या सम्मिलित होगी। यह परियोजना मिथिला की धरोहर और संस्कृति को संरक्षित और प्रचारित करने के साथ ही आम जनमानस को धरोहर संरक्षण के प्रति जागरूक करने हेतु एक व्यापक प्रयास का हिस्सा है।”</p>
<p>जब परियोजना का उद्देश्य​ पूछा तो मुरारी जी कहते हैं कि “इस परियोजना का उद्देश्य एक साइकिल यात्रा के माध्यम से मिथिला क्षेत्र के पुरास्थलों, प्राचीन मंदिरों, प्राकृतिक धरोहरों और सांस्कृतिक विरासतों का गहन अध्ययन और उनका सूचीकरण के साथ ही इस वृत्तांत को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करना है, ताकि इन धरोहरों के बारे में शोधपूर्ण जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक​ पहुंचना है ताकि लोगों में अपने क्षेत्र के सांस्कृतिक विरासतों के बारे में पता चले। इससे स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर धरोहर और संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।​”</p>
<figure id="attachment_7443" aria-describedby="caption-attachment-7443" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/2-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/2-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7443" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/2-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/2-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/2-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/2-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/2-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/2-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7443" class="wp-caption-text">​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी</figcaption></figure>
<p>​<strong>जब उनसे पूछा कि इस यात्रा, शोध और पुस्तक की छपाई के लिए आर्थिक श्रोत क्या है? मुरारजी जी कुछ क्षण रुके, लम्बी सांस लिए और फिर कहते हैं: “यही बिडम्बना है। यही हमारा दुर्भाग्य है। हम वीरसातों की महत्ता को तो समझते हैं, उसे उजागर करने के लिए सतत ​प्रयत्नशील हैं और चाहते हैं कि वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक दस्तावेज छोड़े जो उनके ​गांव, प्रखंड, अंचल, जिला, क़स्बा के धरोहरों का जिवंत दृष्टान्त होगा। अर्थ के मामले में हम हैं कमजोर जो जाते हैं। हम एक शोधार्थी हैं। हम जानते हैं कि जिस कार्य को हम कर रहे हैं वह न केवल जिला प्रशासन के लिए, प्रदेश की सरकार के लिए या फिर केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है, इस कार्य से करोड़ों रूपये कमाए जा सकते हैं। हम अपने प्रदेश के, देश के लोगों से, जो देश से बाहर रहते हैं, उसने प्रार्थना कर रहे हैं कि इस कार्य में वे सभी हमारा हाथ पकड़ें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि मिथिला में लोग हाथ पकड़ते नहीं, हाथ झटक देते हैं।”</strong></p>
<p>मुरारी​ जी ​का कहना कि “केवल दरभंगा जिला को ही लें तो, शंकरपुर डीह, खैरा-सिरुआ, कुर्सों-नदियामी, इनाई, महथावन आदि पुरास्थलों से प्राचीन सिक्के, भच्छी, कोर्थू, पिपरौलिया, पंचोभ, तिलकेश्वर मठ, दरभंगा राज परिसर आदि पुरास्थलों से अभिलेख, बहेरा, बरई, शंकरपुर डीह, देवकुली, रतनपुर, ब्रह्मपुर, हावीडीह, कोर्थू आदि पुरास्थलों से प्राचीन भवनों मंदिरों के प्रमाण, रमौली, हरहच्चा, कोइलवाड़ा, महथावन, वाराही आदि पुरास्थलों से टेराकोटा और समस्त दरभंगा जिला से सैकड़ों प्रतिमाएं प्राप्त हुए हैं और समय-समय प्राप्त होते रहते हैं। इस जिले के 300 से अधिक ऐसे पुरास्थल और गांव हैं, जहां विभिन्न प्रकार के पुरावशेष बिखरे पड़े हैं। ये सभी पुरावशेष ईस्वी पूर्व से आधुनिक काल तक के हैं, जिसका वैज्ञानिक परीक्षण और अध्ययन होना अति आवश्यक है।​ मेरी कोशिश है कि अपनी यात्रा के दौरान ऐतिहासिक धरोहर, प्राकृतिक धरोहर, मानव स्वास्थ्य, जल संचयन एवं संरक्षण, संस्कृति के संरक्षण, जैविक कृषि आदि के महत्व को बताते हुए स्थानीय लोगों को जागरूक ​करते रहें क्योंकि जीवन में निरंतरता, लगन, एकाग्रता, सहनशीलता और बुद्धिमता सबसे आवश्यक है।’</p>
<p>मिथिला की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली और कृषि पद्धतियों का भी मुरारी ने गहन अध्ययन किया है। वे आयुर्वेद, कृषि, और पशुपालन में पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय की वकालत करते हैं। उन्होंने स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर आयुर्वेदिक पौधों और पारंपरिक कृषि तकनीकों का संरक्षण और प्रोत्साहन किया है। मुरारी कुमार झा एक कुशल लेखक भी हैं। उन्होंने मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर, पुरातात्विक स्थलों, और स्थानीय परंपराओं पर आधारित कई आलेख का लेखन किया है। अभी इससे संबंधित पुस्तक का लेखन कर रहे हैं।। उनकी लेखनी में गहराई और स्पष्टता है, जो पाठकों को मिथिला की समृद्ध धरोहर के प्रति आकर्षित करती है। इसके अलावा, कला में उनकी रुचि, खासकर मिथिला पेंटिंग्स और अन्य पारंपरिक कलाओं में, उन्हें एक बहु-आयामी व्यक्तित्व बनाती है।</p>
<figure id="attachment_7444" aria-describedby="caption-attachment-7444" style="width: 2047px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/12.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/12.jpg" alt="" width="2047" height="1150" class="size-full wp-image-7444" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/12.jpg 2047w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/12-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/12-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/12-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/12-1536x863.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2047px) 100vw, 2047px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7444" class="wp-caption-text">​बलिराजगढ़​</figcaption></figure>
<p>​<strong>मुरारी जी के अनुसार बलिराजगढ़ </strong></p>
<p>हालांकि मिथिलांचल बहुत बड़ा इलाका नहीं है, लेकिन अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और शानदार इतिहास की वजह से भारतीय संस्कृति में इसकी एक बहुत खास जगह है। मिथिला, जिसे मिथिलांचल भी कहा जाता है, भारतीय महाद्वीप में मौजूद एक भौगोलिक और सांस्कृतिक इलाका है। इसमें भारत के उत्तरी बिहार के कुछ हिस्से और नेपाल के पूर्वी तराई के आस-पास के जिले शामिल हैं। नेपाल का बॉर्डर इस इलाके के ऊपरी किनारे से होकर गुजरता है। गंडक और कोसी नदियां मिथिला की पश्चिमी और पूर्वी सीमाएं हैं। यहां की भाषा मैथिली है और इसे बोलने वालों को मैथिल कहा जाता है।मिथिला का ज़्यादातर इलाका आज के भारत में आता है, खासकर बिहार राज्य में। मिथिला उत्तर में हिमालय से और दक्षिण, पश्चिम और पूर्व में गंगा, गंडकी और महानंदा नदियों से घिरा है। यह नेपाल के दक्षिण-पूर्वी तराई तक फैला हुआ है। इस इलाके को तिरहुत का पुराना नाम तिरभुक्ति भी कहा जाता था। रामायण में अयोध्या के राजकुमार राम और मिथिला के राजा जनक की बेटी सीता के बीच एक शाही शादी का ज़िक्र है। </p>
<p>भारत के दार्शनिक उद्भव के साथ सांस्कृतिक और साहित्यिक विकास के क्षेत्र में मिथिला का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। मिथिला का इतिहास निःसंदेह गौरवमय रहा है, किन्तु इस क्षेत्र के पुरातात्त्विक अवशेषों के अन्वेषण, विश्लेषण में पाषाण कालीन अवशेषों को प्रकाश में आना अभी तक बाकी है। इस तिरभूक्ति क्षेत्र में पुरातात्विक दृष्टिकोण से वैशाली पुरास्थल के बाद अगर कोई दूसरा महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल प्रकाश में आया तो, वह है; बलिराजगढ़, जिसे डी.आर. पाटिल बलराजपुर लिखते हैं। बलिराजगढ़ हिमालय की तराई क्षेत्र में भारत-नेपाल के सीमा से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर बिहार राज्य के मधुबनी जिला अन्तर्गत बाबूबरही प्रखण्ड में अवस्थित है। प्राचीन मिथिला के लगभग मध्य भाग में मधुबनी जिला मूख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर है। यहां पहुंचने के लिए रेल और सड़क मार्ग दोनों की सुविधाएँ उपलब्ध है। बलिराजगढ़ की स्थिति कमला बलान नदी से 09 किमी पूरब, भूतही नदी से 15 किमी पश्चिम और कोसी नदी से 45 किमी पश्चिम में है। बलिराजगढ़ का महत्व देखते हुए कुछ विद्वान् इसे प्राचीन मिथिला की राजधानी के रूप में संबोधित करते हैं। यहां का विशाल दुर्ग रक्षा प्राचीर से रक्षित पुरास्थल निश्चित रूप से तत्कालीन नगर व्यवस्था में सर्वोत्कृष्ट स्थान रखता होगा। </p>
<figure id="attachment_7445" aria-describedby="caption-attachment-7445" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/9-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/9-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7445" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/9-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/9-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/9-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/9-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/9-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/9-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7445" class="wp-caption-text">​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी</figcaption></figure>
<p>175 (मेरे पैमाइस से मात्र 136 बिग्घा) एकड़ भू-भाग में फैले इस विशाल भू-खंड को बलिराजगढ़, बलराजगढ़ या बलिगढ़ भी कही जाती है। स्थानीय लोगों का मानना है की ये महाकाव्यों और पुराणों में वर्णित दानव राज बलि की राजधानी के ध्वंषावशेष हैं। स्थानीय लोगों में यह मान्यता है कि आज भी राजा बलि अपने सैनिकों के साथ इस किले में निवास करते हैं। सम्भवतः इसी वजह से कोई भी खेती के लिए जोतने की हिम्मत नहीं करता है। इसी मान्यता के कारण इस भूमि और किले की सुरक्षा अपने आप होती रही है।  बुकानन के अनुसार वेणु, विराजण और सहसमल का चौथा भाई बलि एक राजा था। यह बंगाल के राजा बल का किला था, जिसका शासनकाल कुछ दिनों के लिए मिथिला पर भी था। बुकानन के अनुसार ही वे लोग दोमकटा ब्राह्मण थे, जो महाभारत में वर्णित राजा युधिष्ठिर के समकालीन थे। किन्तु, डी.आर. पाटिल इसे ख़ारिज करते हुए कहते हैं, कि वेणुगढ़ तथा विरजण गढ़ के किले से बलिराजगढ़ की दूरी अधिक है, इसीलिए यह उनसे संबंधित नहीं हो सकती। </p>
<p>कुछ अन्य विद्वान् इस गढ़ को विदेह राज जनक के अंतिम सम्राट द्वारा निर्मित मानते हैं। उनके अनुसार जनक राजवंश के अंतिम चरण में आकर वंश कई शाखाओं में बंट गया और उन्हीं में से एक शासक द्वारा किले का नाम बलिगढ़ रखा गया होगा। प्रो उपेन्द्र ठाकुर ने बलिराजगढ़ का उल्लेख करते हुए लिखा है, कि प्रख्यात चीनी यात्री ह्वेनसांग ने तीरभुक्ति भ्रमण करते हुए वैशाली गए थे। वैशाली (चेन-सुन-ना) से संभवतः बलिगढ़ गए और वहां से बड़ी नदी अर्थात कोसी (वर्तमान महानन्दा) के निकट गए। बलिराजगढ़ के ऐतिहासिक महत्व के लिए एक तर्क यह भी है कि विदेह राज जनक की राजधानी अर्थात रामायण में वर्णित मिथिलापुरी यहीं स्थित रही होगी। यद्यपि मिथिलापुरी की पहचान आधुनिक जनकपुर (नेपाल) से की गयी है, किन्तु पुरातात्विक सामग्रियों के आभाव में इसे सीधे मान लेना कठिन है। </p>
<blockquote><p>रामायण के अनुसार राम, लक्ष्मण और विश्वामित्र गौतम आश्रम से ईशाण कोण की ओर चलकर मिथिला के यज्ञ मण्डप पहुंचे। गौतम आश्रम की पहचान दरभंगा जिले के ब्रह्मपुर गांव से की गयी है, जिसका उल्लेख स्कन्द पुराण में भी मिलता है। आधुनिक जनकपुर गौतम आश्रम अर्थात ब्रह्मपुर से ईशाण कोण न होकर उत्तर दिशा में है। इस तरह गौतम आश्रम से ईशाण कोण में बलिराजगढ़ के अलावा और कोई ऐतिहासिक स्थल दिखाई नहीं देता है, जिस पर प्राचीन मिथिलापुरी होने की सम्भावना व्यक्त की जा सके। अतः बलिराजगढ़ के पक्ष में ऐसे तर्क दिए जा सकते हैं, की मिथिलापुरी इस स्थल पर स्थित थी। </p></blockquote>
<p>पाल साहित्य में कहा गया है कि अंग की राजधानी आधुनिक भागलपुर से मिथिलापुरी साठ योजन की दूरी पर थी। महाउम्मग जातक के अनुसार नगर के चारों द्वार पर चार बाजार थे, जिसे यवमज्क्ष्क कहा जाता था, बलिराजगढ़ से प्राप्त पुरावशेष इस बात की पुष्टि करती है। बौद्धकालीन मिथिलानगरी का ध्वंशावशेष भी बलिराजगढ़ ही है। बलिराजगढ़ के पुरातात्विक महत्व को सर्वप्रथम 1884 में प्रसिद्ध प्रसाशक, इतिहासकार और भाषाविद् जार्ज ग्रीयर्सन ने उत्खनन के माध्यम से उजागर करने का प्रयास किया, किन्तु बात यथा स्थान ही रह गयी। ग्रियर्सन के उल्लेख के बाद भारत सरकार के द्वारा 1938 ई. में इस महत्वपूर्ण पुरास्थल को राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया गया। </p>
<figure id="attachment_7446" aria-describedby="caption-attachment-7446" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/7-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/7-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7446" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/7-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/7-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/7-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/7-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/7-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/7-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7446" class="wp-caption-text">​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी</figcaption></figure>
<p><strong>क्या होना चाहिए</strong> </p>
<p>सर्वप्रथम इस पुरास्थल का उत्खनन 1962-63 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के रघुवीर सिंह के निर्देशन में संपादित हुई। इस उत्खनन से ज्ञात हुआ की जो इस विशाल सुरक्षा दीवाल के निर्माण में पक्की ईंट के साथ मध्य भाग में कच्ची ईंट का भी प्रयोग किया गया है। सुरक्षा प्राचीर के दोनों ओर पक्की ईंटों का प्रयोग सुरक्षा दीवार को मजबूती प्रदान करती है। सुरक्षा दीवार की चौड़ाई सतह पर 8.18 मी. और 3.6 मी. तक है। सुरक्षा दीवार का निर्माण लगभग तीसरी शताब्दी ई. पू. से लेकर लगातार पाल काल लगभग 12वीं-13वीं शताब्दी तक में समय-समय पर होती रही है। यहां से प्राप्त पुरावशेषों में सुंदर रूप से गढ़ित मृण्मूर्ति महत्वपूर्ण है। </p>
<p>इसके बाद 1972-73 और 1974-75 में बिहार सरकार द्वारा उत्खनन कार्य करवाई गई। इस उत्खनन कार्य में बी.पी. सिंह के सामान्य निर्देशन में सीता राम रॉय द्वारा के.के. सिन्हा, एन. सी.घोष, एल. पी. सिन्हा तथा आर.पी. सिंह के सहयोग से की गई। उक्त खुदाई में कई पुरावशेषों के साथ भवनों के अवशेष भी प्राप्त हुए। इस उत्खनन में उत्तर कृष्ण मर्जित मृद्भाण्ड परम्परा से लेकर पाल काल तक के मृद्भांड मिले। यहां से प्राप्त सुंदर मृण्मूर्ति सैकडों की संख्या में मिले थे, इसके अलावे अर्ध्यमूल्य वाला पत्थर से बनी मोती, तांबे के सिक्के, मिट्टी से निर्मित मुद्राएं भी प्राप्त हुई। अभी कुछ वर्ष पूर्व में 2013-14 में एक बार फिर उत्खनन कार्य भरतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, पटना मण्डल के मदन सिंह चौहान, सुनील कुमार झा और उनके सहयोगी के द्वारा उत्खनन कार्य किया गया। इस स्थल के उत्खनन में मुख्य रूप से चार संस्कृति काल प्रकाश में आए।</p>
<p><em>1. उत्तर कृष्ण मर्जित मृदभांड<br />
2. शुंग कुषाण काल<br />
3. गुप्त उत्तर गुप्तकला<br />
4. पालकालीन अवशेष</em></p>
<p><strong>इस स्थल से अभी तक प्राप्त पुरावशेषों में तस्तरी, थाली, पत्थर से निर्मित वस्तुएं, हड्डी एवं लोहे, बालुयुक्त महीन कण, विशाल संग्रह पात्र, सिक्के, मनके, मंदिर के भवनावशेष प्राप्त हुए हैं और एक महिला की मूर्ति भी प्राप्त हुई है, जो अपने गोद में बच्चे को स्तन से लगायी हुई है। यहाँ सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य में प्राचीन सुरक्षा दीवार है, जो पक्की ईंटों से बनी हुई है और अभी तक सुरक्षित अवस्था में है दीवार में कहीं-कहीं कच्ची ईटों का भी प्रयोग किया गया है। इसमें प्रयोग की गई प्रायः ईंटों की लंबाई 20 से 25 ईंच और चौड़ाई 10 से 14 ईंच तक है। पाल या सेन काल के अंत समयावधि में भीषण बाढ़ के दौरान पानी के साथ आए मिट्टी के जमाव कहीं-कहीं 3 से 5 फीट तक है। इससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है, कि बलिराजगढ़ में जिन किन्हीं का भी शासन रहा हो, किन्तु उनके पतन का प्रमुख कारण बाढ़ ही रही होगी। वर्तमान समय तक मिथिला परिक्षेत्र में इससे विशाल पुरास्थल प्राप्त नहीं हुई है। कुछ विद्वानों के द्वारा इस पुरास्थल की पहचान प्राचीन मिथिला नगरी के राजधानी के रूप में की गई है। ये पुरास्थल मिथिला की राजधानी है या नहीं इस विषय में और अधिक अध्ययन और विस्तृत पुरातात्विक उत्खनन एवं अन्वेषण की आवश्यकता है।</strong></p>
<figure id="attachment_7447" aria-describedby="caption-attachment-7447" style="width: 2560px" class="wp-caption aligncenter"><a href="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/3-scaled.jpg"><img loading="lazy" decoding="async" src="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/3-scaled.jpg" alt="" width="2560" height="1438" class="size-full wp-image-7447" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/3-scaled.jpg 2560w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/3-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/3-1024x575.jpg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/3-768x431.jpg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/3-1536x863.jpg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2026/03/3-2048x1150.jpg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2560px) 100vw, 2560px" /></a><figcaption id="caption-attachment-7447" class="wp-caption-text">​बलिराजगढ़​-तस्वीर राज झा / मधुबनी</figcaption></figure>
<p><strong>शोधार्थी मुरारी के अनुसार: </strong></p>
<p><strong>1.⁠ </strong>⁠सम्पूर्ण पुरास्थल का विस्तृत उत्खनन हो, जिससे तत्कालीन लोगों की सांस्कृतिक विशिष्टता यथा- राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक स्थितियों के साथ ही स्थापत्य कला, रहन-सहन, खान-पान, कृषि-पशुपालन, व्यापार, शिल्प, विभिन्न राज्यों से अन्तर्सम्बन्ध आदि स्पष्ट होंगे।</p>
<p><strong>2.⁠</strong> ⁠उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों को संरक्षित कर उक्त पुरास्थल पर ही संग्रहालय(Site Museum) स्थापित कर संगृहित/प्रदर्शित किए जाएं। इससे मिथिला की सांस्कृतिक विविधताओं एवं धरोहरों के प्रति आमजनों में जागरूकता आने के साथ ही स्थानीय पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।</p>
<p><strong>3.⁠</strong> ⁠विभिन्न स्तरों के सांस्कृतिक विविधताओं का वैज्ञानिक शोधपरक विश्लेषण करते हुए अब तक के उत्खनन का विस्तृत प्रतिवेदन प्रकाशित किए जाएं, जिससे तत्कालीन शासक या समुदाय की पहचान संभव हो पाएगी।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/1-5-lakh-km-journey-by-bicycle-to-find-archaeological-sites">​बलिराजगढ़ पुरातत्व (भाग-3) : ​​साइकिल से 1​.5​ लाख किमी की यात्रा पुरातत्व स्थल ढूंढ़ने ​के लिए, मंत्री​, मंत्रालय​, अधिकारी &#8216;निद्रा&#8217; में</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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