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	<title>दशास्वमेध घाट Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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		<title>काशी में &#8216;उनकी&#8217; सरकार नहीं, &#8216;उनकी सरकार&#8217; है, जिसे विश्व के लोग &#8220;काशी का कोतवाल&#8221; कहते हैं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 14 Dec 2021 13:14:59 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बनारस : सत्तर के दशक के पूर्वार्ध मैं अशोक राजपथ स्थित पटना कॉलेज मुख्य द्वार के सामने वाली गली में रहता था। साल सन 1971 था। मैं नवमीं कक्षा का छात्र था पटना के उसी ऐतिहासिक विद्यालय में जहाँ स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद भी अपने जीवन का कुछ अध्याय शिक्षा ग्रहण किए [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>बनारस : सत्तर के दशक के पूर्वार्ध मैं अशोक राजपथ स्थित पटना कॉलेज मुख्य द्वार के सामने वाली गली में रहता था। साल सन 1971 था। मैं नवमीं कक्षा का छात्र था पटना के उसी ऐतिहासिक विद्यालय में जहाँ स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद भी अपने जीवन का कुछ अध्याय शिक्षा ग्रहण किए थे। बिहार के किसी कोने में जयप्रकाश नारायण आंदोलन प्रदेश की मिटटी में बीजारोपण नहीं हुआ था। सत्तर के ज़माने के विद्वान और विदुषीगण सोचे भी नहीं थे कि देश में एक राजनीतिक भूकंप आने वाला है। वह भूकंप न्यूनतम 12+ रेक्टर स्केल पर आएगा और भूकंप के बाद बिहार की गली-कूचियों में कुकुरमुत्तों की तरह नेताओं का जन्म होगा होगा। </strong></p>
<p>गुरुगोविंद सिंह के पटना सिटी के मालसलामी से लेकर गौतम बुद्ध के बोधगया के रास्ते, शेरशाह सूरी के मकबरे को प्रणाम करते पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण, सभी दिशाओं में विकास तो चतुर्मुख होगा, लेकिन उस विकास का केंद्र बिंदु प्रदेश के लोगों का घर नहीं, बल्कि नेताओं और उनके ससुराल वालों का घर होगा। प्रदेश में विद्यालय तो हर गली-नुक्कड़ पर होगा, लेकिन शैक्षिक-स्तर बढ़ने, बढ़ाने के लिए नहीं, अपितु निरीह, गरीब माता-पिता-अभिभावकों का &#8216;शुल्क के रूप में&#8217; रक्त चूसने के लिए। अगर ऐसा नहीं होता तो शायद बिहार से पढ़ने वाले छात्र/छात्राओं का पलायन भी नहीं होता। काम-काज के लिए, रोजी-रोजगार के लिए लोग बाग़, औरतें अपने &#8216;दूघ मुंहे बच्चे&#8217; को मोटरी में बांधकर पंजाब, बंगाल, दिल्ली, राजस्थान की ओर उन्मुख नहीं होते। परिजनों की अनुपस्थिति में बूढ़े माता-पिता अपने जीवन का अंतिम सांस नहीं लेते। </p>
<p>पटना जंक्शन के कोने पर लाल रंग में रंगे पत्थर-रूपी पवन पुत्र, जिसे लोगों ने स्वहित में भगवान् बना दिए, वे भी नहीं जानते थे कि उनका कल्याण उनके इष्ट अयोध्या वाले नहीं करेंगे, बल्कि पटना के ही हार-मांस वाले मनुष्य उनका कल्याण करेंगे। प्रदेश के मतदाताओं, गरीब-गुरबों का, रिक्शावालों का, रेड़ीवालों का, उनके मंदिर के बगल वाली गली में कचौड़ी-घुघनी बेचने वालों का, आगे जक्कनपुर रेलवे फाटक पर अपनी जान को जोखिम में डालकर तरकारी बेचने वालों का अपना घर &#8211; फुस का ही सही &#8211; बन पाए अथवा नहीं; बजरंगबली जी का घर चार-तल्ला, वातानुकूलित बनेगा। बहुत सारी बातें हैं, उन दिनों का, जिसका जिक्र तो किया जा सकता है, लेकिन यहाँ उचित नहीं होगा। </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/2.jpeg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/2.jpeg" alt="" width="2200" height="1807" class="alignright size-full wp-image-3655" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/2.jpeg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/2-300x246.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/2-1024x841.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/2-768x631.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/2-1536x1262.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/2-2048x1682.jpeg 2048w" sizes="(max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p><strong>हमारे उसी मोहल्ले में एक सज्जन रहते थे। नाम था श्री जगदीश बाबू। जगदीश बाबू की खानदानी बर्तन की दूकान थी। उन्हें अपनी बेटी की शादी के सिलसिले में बनारस जाना था। जगदीश बाबू शाम में बाबूजी को बताये और उनसे मुझे अपने साथ ले जाने का आज्ञा भी मांगे। बाबूजी बनारस का नाम सुने और &#8216;ना&#8217; कहें, यह संभव ही नहीं था। अगली सुबह हम दोनों बनारस रेलवे स्टेशन पर दस्तक दिए। बाबूजी कोई साढ़े तीन दशक पहले बनारस के मणिकर्णिका घाट पर अर्सों रहे थे अपने तंत्र-मन्त्र साधना के क्रम में। आज भी बनारस के मणिकर्णिका घाट पर हज़ामों (नाई) के नामों की जो सूची एक सफ़ेद शिलापट्ट पर लिखा है, उसमें &#8216;गोपालजी&#8217; का नाम लिखा है। इतना ही नहीं, उसके कई वर्षों के बाद एक और नाम लिखा है &#8216;शिवनाथ&#8217; &#8211; सौभाग्य देखिये, उस शिलापट्ट पर लिखा गोपालजी के पुत्र का ही नाम शिवनाथ था। खैर, यह सब विधाता के कारनामे हैं।</strong> </p>
<p>जगदीश बाबू को कोतवालपुरा जाना था। हम दोनों रिक्शा पर बैठे और कोतवालपुरा पहुँच गए। कोतवालपुरा से बाबा विश्वनाथ का मंदिर कुछ साँसों की दूरी पर था। ऐसा प्रतीत हुआ, बाबा विश्वनाथ ही बुलाये हैं, जगदीश बाबू की बेटी की शादी तो महज एक बहाना है। कुछ क्षण बातचीत के बाद हम दोनों लाहौरी टोला के लिए रवाना हुए, जहां उनके एक सम्बन्धी रहते थे। जगदीश बाबू से इजाजत लेकर हम पहले दशाश्वमेध घाट की ओर उन्मुख हुए फिर बाबा विश्वनाथ के दरबार में हाजरी लगाने पहुंचे। जीवन में पहली बार बनारस की धरती पर आया था, बाबा विश्वनाथ के मंदिर में दस्तक दिया था और फिर मणिकर्णिका घाट पर धधकती चिताओं से चट-चट-फट-फट-फुट-फ़टाक आवाज के बीच बैठा था। कुछ भी अनजान नहीं लग रहा था। सभी परिचित लग रहे थे। वहां के लोग, वहां का वातावरण, वहां की हवा, मणिकर्णिका घाट के प्रवेश के ठीक दाहिने तरफ महादेव का विशालकाय शिवलिङ्ग, लकड़ी बेचने वाला, हजाम सभी परिचित लग रहे थे। इस यात्रा के बाद सन 1989 में धनबाद से बनारस पहुंचे थे, अपने एक अभिन्न मित्र के माँ का अस्थि लेकर। पहले इलाहाबाद संगम में प्रवाह किये और फिर बनारस। इस यात्रा में भी वही अनुभव हुआ जो पहली बार हुआ था। </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2.jpeg"><img decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2.jpeg" alt="" width="2200" height="1354" class="aligncenter size-full wp-image-3656" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2.jpeg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2-300x185.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2-1024x630.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2-768x473.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2-1536x945.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2-2048x1260.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/3-2-356x220.jpeg 356w" sizes="(max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>वापस पटना आने पर अपने बाबूजी को वृतांत में सभी बातें बताया और पूछा भी &#8211; ऐसा क्यों? वे मुझे देखे और मुस्कुरा दिए। उन्होंने कहाँ कि संभव है बनारस से, मणिकर्णिका से, विश्वनाथ मंदिर से तुम्हारा कोई पूर्व जन्म का सम्बन्ध रहा हो। उन्होंने यह भी कहा कि तुम बहुत भाग्यशाली हो कि बनारस को ना तुम भूले हो और ना ही बनारस तुम्हे। इस &#8216;पहचान&#8217; को जीवित रखना। बनारस तो जीवित रहेगा ही। इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते कि आने वाले समय में कुछ ऐसी घटना हो, कुछ ऐसी बातें हो, जो ऐतिहासिक हो और बनारस के साथ तुम और अधिक नजदीक हो जाओ। बाबूजी 1992 महादेव के शरण में अपनी उपस्थिति दर्ज कर दिए। </p>
<p><strong>बाबूजी की मृत्यु के कोई दस साल बाद, यानी 2002 में जब देश का बागडोर सम्मानित अटलबिहारी वाजपेजी जी के हाथों में था, बिस्मिल्लाह खान के बहाने बनारस से फिर जुड़े। जीवन के अंतिम वसंत में बिहार के लाल, भारत के रत्न, शहनाई के सम्राट और इंसानियत के मसीहा उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के लिए मदद का हाथ बढ़ाना। हम जैसा दीन, निर्धन, अर्थ से अपाहिज़ ब्राह्मण भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को क्या मदद कर सकते हैं? लेकिन त्रिनेत्रधारी महादेव, कशी का कोतवाल और उनका मणिकर्णिका घाट जब मुझे ही चुने, फिर क्या विद्वान, क्या विदुषी, गया ज्ञानी, क्या महात्मा, क्या धनाढ्य, क्या भिखमंगा, क्या कमजोर, क्या पहलवान, क्या राजा, क्या महाराजा &#8211; सभी शून्य थे महादेव चयन के सामने। तभी तो बिस्मिल्लाह खान अपने जीवन के अंतिम &#8216;जन्मदिन&#8217; पर 90 किलो का केक काटे, तीन किलो चांदी की शहनाई हस्तगत किये, मेरी पत्नी, पुत्र के सर पर हाथ रखकर आशीष दिए। महीना मार्च का था और तारीख 25 तथा साल 2006 &#8211; इस तारीख के पांचवे महीने में, यानी 21 अगस्त, 2006 को उस्ताद भी महादेव के शरण में उपस्थित हो गए। यूट्यूब, कैसेट्स, पेनड्राइव से भले उनकी बजाई शहनाई आज भी बजती है, लेकिन बनारस का शहनाई शांत हो गया।</strong> </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/4-1.jpeg"><img decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/4-1.jpeg" alt="" width="2200" height="1724" class="aligncenter size-full wp-image-3657" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/4-1.jpeg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/4-1-300x235.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/4-1-1024x802.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/4-1-768x602.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/4-1-1536x1204.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/4-1-2048x1605.jpeg 2048w" sizes="(max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>लेकिन, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अपनी अंतिम सांस के साथ हमारे लिए जो छोड़ गए, भारत के 135 करोड़ लोगों के नसीब में शायद नहीं था । बिस्मिल्लाह खान की मृत्यु-लेख, जिसे भारत का श्रेष्ठ्तम संवाद एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया ने निर्गत किया, उस 770 शब्द वाले मृत्युलेख में 92 शब्द हमारे बारे में था। हमारे कार्यों के बारे में था। शायद इसे ही गरीबों का प्रारब्ध करते हैं। बिस्मिल्लाह खान अपनी मृत्यु से पहले &#8220;शहीद&#8221; शब्द का इस्तेमाल किये। वे अपनी इक्षा जाहिर किए कि मरने से पहले दिल्ली के इण्डिया गेट पर अपनी शहनाई से शहीदों की आत्मा को आमंत्रित करेंगे और फिर शहनाई की धुन से ही उन्हें विसर्जित करेंगे। हमने कोशिश की &#8211; लेकिन &#8216;शहीद&#8217; शब्द का बीजारोपण कर वे बनारस से विसर्जित हो गए, सदा के लिए। उनकी मृत्यु के दस वर्ष होते-होते भारतीय स्वाधीनता संग्राम के गुमनाम क्रांतिकारियों, शहीदों के 75 वंशजों को ढूंढा। छः किताबों से छः परिवारों का जीवन बदला, कामयाब रहा। </p>
<p>जब सातवें वंशज की बात आई तब बनारस पर एक अद्वितीय किताब का डमी बनकर तैयार हुआ। इस डमी को मणिकर्णिका घाट के डोम राजा के परिवार के सदस्यों ने जलती, धधकती चिताओं के बीच पुष्पांजलि के साथ महादेव को प्रस्तुत किये। किताब अपने अगले चरण में उन्मुख होने के लिए तैयार था। लेकिन महादेव कुछ और चाहते थे। उस दिन तक बनारस का, बाबा विश्वनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के बारे में केदारनाथ से बद्रीनाथ तक, जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी तक कोई सुगबुगाहट भी नहीं थी। &#8216;रीविजिटिंग बनारस&#8217; किताब का नाम था और शायद महादेव यह चाहते थे कि एक नए तेवर के साथ इस ऐतिहासिक किताब में वह सभी बातें, वह सभी तस्वीरें &#8216;हस्ताक्षर&#8217; स्वरूप उपस्थित रहे। उन बातों की चर्चा आज ही नहीं आने वाले सैकड़ों सालों बाद भी उसी तरह हो जिस तरह कल, यानी 13 दिसंबर विक्रम संवत् दो हजार अठहत्तर, मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष, दशमी तिथि को किया गया &#8211; भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र दामोदर मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उस इतिहास को दोहराते, नवनिर्मित इतिहास पर हस्ताक्षर किये। </p>
<p><strong>कल रात काशी का कोतवाल और महादेव स्वप्न में मुस्कुरा रहे थे। कह रहे थे &#8211; वत्स !!! इसलिए हवा का रुख बदल दिया था। अब तुम्हारे द्वारा रचित इतिहास में वह सभी ऐतिहासिक बातों का, ऐतिहासिक तस्वीरों का, ऐतिहासिक शब्दों का समावेश होगा तो आने वाले समय में, आने वाली पीढ़ियों के लिए, धर्माथियों के लिए लाभकारी होगा। वे यह भी कह रहे थे कि अपने कर्म के प्रति मलिन नहीं होना। हम तुम्हारे साथ हैं। तुम्हारे कर्मों के पीछे खड़े रहेंगे। क्योंकि तुम अपने किताब से भारत ही नहीं, देश-दुनिया के लोगों को बनारस की पुनः यात्रा (रीविजिटिंग बनारस) करा रहे हो &#8211; तथास्तु। मैं निःशब्द महादेव के समक्ष खड़ा था और मेरी आखों से अश्रुधारा गंगा की अविरल धारा की तरह कशी के कोतवाल का, महादेव के पैरों को धो रहा था ।</strong></p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-2.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-2.jpeg" alt="" width="2200" height="1322" class="aligncenter size-full wp-image-3658" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-2.jpeg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-2-300x180.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-2-1024x615.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-2-768x461.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-2-1536x923.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/5-2-2048x1231.jpeg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p><strong>कल, एक इतिहास की रचना हुई।</strong> यह सत्य है। प्राचीन काल में भारत के धार्मिक संस्थाओं के साथ, स्थानों के साथ, पीठों के साथ क्या हुआ, क्या नहीं हुआ &#8211; यह इतिहास के पन्नों में दर्ज है। लेकिन स्वतंत्र भारत में, विगत 75 वर्षों में, जो भी हुआ, वह भारत के लोगों के मानस-पटल पर उद्धृत हैं। बनारस और बनारस का विश्वनाथ मंदिर इसका जीता-जागता गवाह है। हमारे पुराणों में कहा गया है कि जैसे ही कोई काशी में प्रवेश करता है, सारे बंधनों से मुक्त हो जाता है। भगवान विश्वेश्वर का आशीर्वाद, एक अलौकिक ऊर्जा यहाँ आते ही हमारी अंतर-आत्मा को जागृत कर देती है। और आज, आज तो इस चिर चैतन्य काशी की चेतना में एक अलग ही स्पंदन है! कल आदि काशी की अलौकिकता में एक अलग ही आभा थी ! कल शाश्वत बनारस के संकल्पों में एक अलग ही सामर्थ्य दिख रहा था ! प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कहा भी कि &#8220;हमने शास्त्रों में सुना है, जब भी कोई पुण्य अवसर होता है तो सारे तीर्थ, सारी दैवीय शक्तियाँ बनारस में बाबा के पास उपस्थित हो जाती हैं। कुछ वैसा ही अनुभव आज मुझे बाबा के दरबार में आकर हो रहा है। ऐसा लग रहा है कि,  हमारा पूरा चेतन ब्रह्मांड इससे जुड़ा हुआ है। वैसे तो अपनी माया का विस्तार बाबा ही जानें, लेकिन जहां तक हमारी मानवीय दृष्टि जाती है, ‘विश्वनाथ धाम’ के इस पवित्र आयोजन से इस समय पूरा विश्व जुड़ा हुआ है।&#8221; </p>
<p>उन्होंने यह भी कहा कि विश्वनाथ धाम का ये पूरा नया परिसर एक भव्य भवन भर नहीं है, ये प्रतीक है, हमारे भारत की सनातन संस्कृति का! ये प्रतीक है, हमारी आध्यात्मिक आत्मा का! ये प्रतीक है, भारत की प्राचीनता का, परम्पराओं का! भारत की ऊर्जा का, गतिशीलता का! आप यहाँ जब आएंगे तो केवल आस्था के ही दर्शन होंगे ऐसा नहीं है। आपको यहाँ अपने अतीत के गौरव का अहसास भी होगा। कैसे प्राचीनता और नवीनता एक साथ सजीव हो रही हैं, कैसे पुरातन की प्रेरणाएं भविष्य को दिशा दे रही हैं,  इसके साक्षात दर्शन विश्वनाथ धाम परिसर में हम कर रहे हैं।&#8221; जो मां गंगा, उत्तरवाहिनी होकर बाबा के पाँव पखारने काशी आती हैं, वो मां गंगा भी कल बहुत प्रसन्न थीं। अब जब हम भगवान विश्वनाथ के चरणों में प्रणाम करेंगे, ध्यान लगाएंगे, तो माँ गंगा को स्पर्श करती हुई हवा हमें स्नेह देगी, आशीर्वाद देगी। और जब माँ गंगा उन्मुक्त होंगी, प्रसन्न होंगी, तो बाबा के ध्यान में हम ‘गंग-तरंगों की कल-कल’ का दैवीय अनुभव भी कर सकेंगे। बाबा विश्वनाथ सबके हैं, माँ गंगा सबकी हैं। उनका आशीर्वाद सबके लिए हैं। लेकिन समय और परिस्थितियों के चलते बाबा और माँ गंगा की सेवा की ये सुलभता मुश्किल हो चली थी, यहाँ हर कोई आना चाहता था,  लेकिन रास्तों और जगह की कमी हो गई थी। बुजुर्गों के लिए, दिव्यांगों के लिए यहाँ आने में बहुत कठिनाई होती थी। जो मंदिर क्षेत्र केवल तीन हजार वर्ग फीट में था, वो अब करीब करीब 5 लाख वर्ग फीट का हो गया है। अब मंदिर और मंदिर परिसर में 50, 60, 70  हजार श्रद्धालु आ सकते हैं। </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/6-2.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/6-2.jpeg" alt="" width="2200" height="1737" class="aligncenter size-full wp-image-3659" /></a></p>
<p><strong>जब मैं बनारस आया था तो एक विश्वास लेकर आया था। विश्वास अपने से ज्यादा बनारस के लोगों पर था, आप पर था। आज हिसाब-किताब का समय नहीं है लेकिन मुझे याद है, तब कुछ ऐसे लोग भी थे जो बनारस के लोगों पर संदेह करते थे। लेकिन काशी तो काशी है! काशी तो अविनाशी है। काशी में एक ही सरकार है, जिनके हाथों में डमरू है, उनकी सरकार है। जहां गंगा अपनी धारा बदलकर बहती है, उस काशी को भला कौन रोक सकता है? काशीखण्ड में भगवान शंकर ने खुद कहा है- “विना मम प्रसादम् वै, कः काशी प्रति-पद्यते”। अर्थात्, बिना मेरी प्रसन्नता के काशी में कौन आ सकता है, कौन इसका सेवन कर सकता है? काशी में महादेव की इच्छा के बिना न कोई आता है, और न यहाँ उनकी इच्छा के बिना कुछ होता है। बाबा के साथ अगर किसी और का योगदान है तो वो बाबा के गणों का है। “इदम् शिवाय, इदम् न मम्”</strong></p>
<p>वाराणसी ने युगों को जिया है, इतिहास को बनते बिगड़ते देखा है, कितने ही कालखंड आए, गए! कितनी ही सल्तनतें उठीं और मिट्टी में मिल गईं, फिर भी, बनारस बना हुआ है, बनारस अपना रस बिखेर रहा है। बाबा का ये धाम शाश्वत ही नहीं रहा है, इसके सौन्दर्य ने भी हमेशा संसार को आश्चर्यचकित और आकर्षित किया है। पुराणों में प्राकृतिक आभा से घिरी काशी के ऐसे ही दिव्य स्वरूप का वर्णन किया गया है। अगर हम ग्रंथों को देखेंगे, शास्त्रों को देखेंगे। इतिहासकारों ने भी वृक्षों, सरोवरों, तालाबों से घिरी काशी के अद्भुत स्वरूप का बखान किया है। लेकिन समय कभी एक जैसा नहीं रहता। आततायियों ने इस नगरी पर आक्रमण किए, इसे ध्वस्त करने के प्रयास किए! औरंगजेब के अत्याचार, उसके आतंक का इतिहास साक्षी है। जिसने सभ्यता को तलवार के बल पर बदलने की कोशिश की, जिसने संस्कृति को कट्टरता से कुचलने की कोशिश की! लेकिन इस देश की मिट्टी बाकी दुनिया से कुछ अलग है। यहाँ अगर औरंगजेब आता है तो शिवाजी भी उठ खड़े होते हैं! अगर कोई सालार मसूद इधर बढ़ता है तो राजा सुहेलदेव जैसे वीर योद्धा उसे हमारी एकता की ताकत का अहसास करा देते हैं। और अंग्रेजों के दौर में भी, वारेन हेस्टिंग का क्या हाल काशी के लोगों ने किया था, ये तो काशी के लोग समय समय पर बोलते रहतें हैं और काशी की जुबान पर निकलता है। घोड़े पर हौदा और हाथी पर जीनजान लेकर भागल वारेन हेस्टिंग।</p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/7-2.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/7-2.jpeg" alt="" width="2200" height="2379" class="aligncenter size-full wp-image-3661" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/7-2.jpeg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/7-2-277x300.jpeg 277w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/7-2-947x1024.jpeg 947w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/7-2-768x830.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/7-2-1420x1536.jpeg 1420w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/7-2-1894x2048.jpeg 1894w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>आज समय का चक्र देखिए, आतंक के वो पर्याय इतिहास के काले पन्नों तक सिमटकर रह गए हैं! और मेरी काशी आगे बढ़ रही है, अपने गौरव को फिर से नई भव्यता दे रही है। काशी शब्दों का विषय नहीं है, काशी संवेदनाओं की सृष्टि है। काशी वो है- जहां जागृति ही जीवन है, काशी वो है- जहां मृत्यु भी मंगल है! काशी वो है- जहां सत्य ही संस्कार है! काशी वो है- जहां प्रेम ही परंपरा है।हमारे शास्त्रों ने भी काशी की महिमा गाते, और गाते हुये आखिर में, आखिर में क्या कहा, ‘नेति-नेति’ ही कहा है। यानी जो कहा, उतना ही नहीं है, उससे भी आगे कितना कुछ है! हमारे शास्त्रों ने कहा है- “शिवम् ज्ञानम् इति ब्रयुः, शिव शब्दार्थ चिंतकाः”। अर्थात् शिव शब्द का चिंतन करने वाले लोग शिव को ही ज्ञान कहते हैं। इसीलिए, ये काशी शिवमयी है, ये काशी ज्ञानमयी है। और इसलिए ज्ञान, शोध, अनुसंधान, ये काशी और भारत के लिए स्वाभाविक निष्ठा रहे हैं। भगवान शिव ने स्वयं कहा है- “सर्व क्षेत्रेषु भू पृष्ठे, काशी क्षेत्रम् च मे वपु:”। अर्थात्, धरती के सभी क्षेत्रों में काशी साक्षात् मेरा ही शरीर है। इसीलिए, यहाँ का पत्थर, यहां का हर पत्थर शंकर है। इसलिए, हम अपनी काशी को सजीव मानते हैं, और इसी भाव से हमें अपने देश के कण-कण में मातृभाव का बोध होता है। हमारे शास्त्रों का वाक्य है- “दृश्यते सवर्ग सर्वै:, काश्याम् विश्वेश्वरः तथा”॥ यानी, काशी में सर्वत्र, हर जीव में भगवान विश्वेशर के ही दर्शन होते हैं।  इसीलिए, काशी जीवत्व को सीधे शिवत्व से जोड़ती है। हमारे ऋषियों ने ये भी कहा है- “विश्वेशं शरणं, यायां, समे बुद्धिं प्रदास्यति”। अर्थात्, भगवान विश्वेशर की शरण में आने पर सम बुद्धि व्याप्त हो जाती है। बनारस वो नगर है जहां से जगद्गुरू शंकराचार्य को श्रीडोम राजा की पवित्रता से प्रेरणा मिली, उन्होंने देश को एकता के सूत्र में बांधने का संकल्प लिया। ये वो जगह है जहां भगवान शंकर की प्रेरणा से गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस जैसी अलौकिक रचना की है।</p>
<p>भाव विह्वलित शब्दों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि यहीं की धरती सारनाथ में भगवान बुद्ध का बोध संसार के लिए प्रकट हुआ। समाजसुधार के लिए कबीरदास जैसे मनीषी यहाँ प्रकट हुये। समाज को जोड़ने की जरूरत थी तो संत रैदास जी की भक्ति की शक्ति का केंद्र भी ये काशी बनी।ये काशी अहिंसा और तप की प्रतिमूर्ति चार जैन तीर्थंकरों की धरती है। राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा से लेकर वल्लभाचार्य और रमानन्द जी के ज्ञान तक, चैतन्य महाप्रभु और समर्थगुरु रामदास से लेकर स्वामी विवेकानंद और मदनमोहन मालवीय तक, कितने ही ऋषियों और आचार्यों का संबंध काशी की पवित्र धरती से रहा है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने यहां से प्रेरणा पाई। रानीलक्ष्मी बाई से लेकर चंद्रशेखर आज़ाद तक, कितने ही सेनानियों की कर्मभूमि-जन्मभूमि काशी रही है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेमचंद, पंडित रविशंकर, और बिस्मिल्लाह खान जैसी प्रतिभाएं, इस स्मरण को कहाँ तक लेते जायें, कितना कहते जायें! भंडार भरा पड़ा है। जिस तरह काशी अनंत है वैसे ही काशी का योगदान भी अनंत है। काशी के विकास में इन अनंत पुण्य-आत्माओं की ऊर्जा शामिल है। इस विकास में भारत की अनंत परम्पराओं की विरासत शामिल है। इसीलिए, हर मत-मतांतर के लोग, हर भाषा-वर्ग के लोग यहाँ आते हैं तो यहाँ से अपना जुड़ाव महसूस करते हैं।</p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/8.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/8.jpeg" alt="" width="2048" height="1826" class="aligncenter size-full wp-image-3662" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/8.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/8-300x267.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/8-1024x913.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/8-768x685.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/8-1536x1370.jpeg 1536w" sizes="auto, (max-width: 2048px) 100vw, 2048px" /></a></p>
<p>काशी हमारे भारत की सांस्कृतिक आध्यात्मिक राजधानी तो है ही, ये भारत की आत्मा का एक जीवंत अवतार भी है। आप देखिए, पूरब और उत्तर को जोड़ती हुई यूपी में बसी ये काशी, यहाँ विश्वनाथ मंदिर को तोड़ा गया तो मंदिर का पुनर्निमाण, माता अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया। जिनकी जन्मभूमि महाराष्ट्र थी, जिनकी कर्मभूमि इंदौर-माहेश्वर और अनेक क्षेत्रों में थी। उन माता अहिल्याबाई होल्कर को आज मैं इस अवसर पर नमन करता हूं। दो सौ-ढाई सौ साल पहले उन्होंने काशी के लिए इतना कुछ किया था। तब के बाद से काशी के लिए इतना काम अब हुआ है। बाबा विश्वनाथ मंदिर की आभा बढ़ाने के लिए पंजाब से महाराजा रणजीत सिंह ने 23 मण सोना चढ़ाया था, इसके शिखर पर सोना मढ़वाया था। पंजाब से पूज्य गुरुनानक देव जी भी काशी आए थे, यहाँ सत्संग किया था। दूसरे सिख गुरुओं का भी काशी से विशेष रिश्ता रहा था। पंजाब के लोगों ने काशी के पुनर्निर्माण के लिए दिल खोलकर दान दिया था। पूरब में बंगाल की रानी भवानी ने बनारस के विकास के लिए अपना सब कुछ अर्पण किया। मैसूर और दूसरे दक्षिण भारतीय राजाओं का भी बनारस के लिए बहुत बड़ा योगदान रहा है। ये एक ऐसा शहर है जहां आपको उत्तर, दक्षिण, नेपाली, लगभग हर तरह की शैली के मंदिर दिख जाएंगे। विश्वनाथ मंदिर इसी आध्यात्मिक चेतना का केंद्र रहा है, और अब ये विश्वनाथ धाम परिसर अपने भव्य रूप में इस चेतना को और ऊर्जा देगा।</p>
<p>दक्षिण भारत के लोगों की काशी के प्रति आस्था, दक्षिण भारत का काशी पर और काशी का दक्षिण पर प्रभाव भी हम सब भली-भांति जानते हैं। एक ग्रंथ में लिखा है- तेनो-पयाथेन कदा-चनात्, वाराणसिम पाप-निवारणन। आवादी वाणी बलिनाह, स्वशिष्यन, विलोक्य लीला-वासरे, वलिप्तान। कन्नड़ भाषा में ये कहा गया है, यानि जब जगद्गुरु माध्वाचार्य जी अपने शिष्यों के साथ चल रहे थे, तो उन्होंने कहा था कि काशी के विश्वनाथ, पाप का निवारण करते हैं। उन्होंने अपने शिष्यों को काशी के वैभव और उसकी महिमा के बारे में भी समझाया। सदियों पहले की ये भावना निरंतर चली आ रही है। महाकवि सुब्रमण्य भारती, काशी प्रवास ने जिनके जीवन की दिशा बदल दी, उन्होंने एक जगह लिखा है, तमिल में लिखा है- &#8220;कासी नगर पुलवर पेसुम उरई दान, कान्जिइल के-पदर्कोर, खरुवि सेवोम&#8221; यानि &#8220;काशी नगरी के संतकवि का भाषण कांचीपुर में सुनने का साधन बनाएंगे&#8221; काशी से निकला हर संदेश ही इतना व्यापक है, कि देश की दिशा बदल देता है। वैसे मैं एक बात और कहूंगा। मेरा पुराना अनुभव है। हमारे घाट पर रहने वाले, नाव चलाने वाले कई बनारसी साथी तो रात में कभी अनुभव किया होगा तमिल, कन्नड़ा, तेलुगू, मलयालम, इतने फर्राटेदार तरीके से बोलते हैं कि लगता है कहीं केरला-तमिलनाडू या कर्नाटक तो नहीं आ गए हम! इतना बढ़िया बोलते हैं!  </p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-1.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-1.jpeg" alt="" width="2200" height="1385" class="aligncenter size-full wp-image-3663" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-1.jpeg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-1-300x189.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-1-1024x645.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-1-768x483.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-1-1536x967.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/9-1-2048x1289.jpeg 2048w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>भारत की हजारों सालों की ऊर्जा, ऐसे ही तो सुरक्षित रही है, संरक्षित रही है। जब अलग-अलग स्थानों के, क्षेत्रों के एक सूत्र से जुड़ते हैं तो भारत ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के रूप में जाग्रत होता है।इसीलिए, हमें ‘सौराष्ट्रे सोमनाथम्’ से लेकर ‘अयोध्या मथुरा माया, काशी कांची अवंतिका’ का हर दिन स्मरण करना सिखाया जाता है। हमारे यहाँ तो द्वादश ज्योतिर्लिंगों के स्मरण का ही फल बताया गया है- “तस्य तस्य फल प्राप्तिः, भविष्यति न संशयः”॥ यानी, सोमनाथ से लेकर विश्वनाथ तक द्वादश ज्योतिर्लिंगों का स्मरण करने से हर संकल्प सिद्ध हो जाता है, इसमें कोई संशय ही नहीं है। ये संशय इसलिए नहीं है क्योंकि इस स्मरण के बहाने पूरे भारत का भाव एकजुट हो जाता है। और जब भारत का भाव आ जाए, तो संशय कहाँ रह जाता है, असंभव क्या बचता है?</p>
<p><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10.jpeg"><img loading="lazy" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10.jpeg" alt="" width="2200" height="1601" class="aligncenter size-full wp-image-3664" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10.jpeg 2200w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10-300x218.jpeg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10-1024x745.jpeg 1024w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10-768x559.jpeg 768w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10-1536x1118.jpeg 1536w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10-2048x1490.jpeg 2048w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2021/12/10-324x235.jpeg 324w" sizes="auto, (max-width: 2200px) 100vw, 2200px" /></a></p>
<p>ये भी सिर्फ संयोग नहीं है कि जब भी काशी ने करवट ली है, कुछ नया किया है, देश का भाग्य बदला है। बीते सात वर्षों से काशी में चल रहा विकास का महायज्ञ, आज एक नई ऊर्जा को प्राप्त कर रहा है। काशी विश्वनाथ धाम का लोकार्पण, भारत को एक निर्णायक दिशा देगा, एक उज्जवल भविष्य की तरफ ले जाएगा। ये परिसर, साक्षी है हमारे सामर्थ्य का, हमारे कर्तव्य का। अगर सोच लिया जाए, ठान लिया जाए, तो असंभव कुछ भी नहीं है। नए भारत में अपनी संस्कृति का गर्व भी है और अपने सामर्थ्य पर उतना ही भरोसा भी है। नए भारत में विरासत भी है और विकास भी है। आज का भारत अपनी खोई हुई विरासत को फिर से संजो रहा है। यहां काशी में तो माता अन्नपूर्णा खुद विराजती हैं। मुझे खुशी है कि काशी से चुराई गई मां अन्नपूर्णा की प्रतिमा, एक शताब्दी के इंतजार के बाद, सौ साल के बाद अब फिर से काशी में स्थापित की जा चुकी है। माता अन्नपूर्णा की कृपा से कोरोना के कठिन समय में देश ने अपने अन्न भंडार खोल दिए, कोई गरीब भूखा ना सोए इसका ध्यान रखा, मुफ्त राशन का इंतजाम किया। गुलामी के लंबे कालखंड ने हम भारतीयों का आत्मविश्वास ऐसा तोड़ा कि हम अपने ही सृजन पर विश्वास खो बैठे। आज हजारों वर्ष पुरानी इस काशी से, मैं हर देशवासी का आह्वान करता हूं- पूरे आत्मविश्वास से सृजन करें और बार-बार, अनेकानेक बार बनारस आते रहें, बाबा विश्वनाथ का दर्शन करते रहें, इतिहास पर गवाह स्वरूप हस्ताक्षर करते रहें। </p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/vishwnath-temple-banaras-dedicated-to-people">काशी में &#8216;उनकी&#8217; सरकार नहीं, &#8216;उनकी सरकार&#8217; है, जिसे विश्व के लोग &#8220;काशी का कोतवाल&#8221; कहते हैं</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>यह मणिकर्णिका है ​,​ यहाँ तराजू पकड़ने वालों की आखों पर काली-पट्टी नहीं होती। यहाँ न्याय से अधिक न्याय मिलता है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 May 2018 14:38:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[दशास्वमेध घाट]]></category>
		<category><![CDATA[बनारस]]></category>
		<category><![CDATA[मणिकर्णिका घाट]]></category>
		<category><![CDATA[विश्वनाथ मन्दिर]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बनारस पर ​&#8221;रीविजिटिंग बनारस&#8221; बनाने के क्रम में उस दिन सुवह-सुवह विश्वनाथ मन्दिर के प्रवेश द्वार के ठीक सामने चाय पी रहा था। एक-एक चुस्की के साथ सोच रहा था बाएं जाऊँ या दाहिने। बायीं ओर मणिकर्णिका था और दाहिने अस्सी। इस बीच एक वृद्ध महिला सामने आयीं। वे मुझे देखीं, मैं उन्हें देखा और [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/varanasi-maniknirka-ghat">यह मणिकर्णिका है ​,​ यहाँ तराजू पकड़ने वालों की आखों पर काली-पट्टी नहीं होती। यहाँ न्याय से अधिक न्याय मिलता है</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>बनारस पर ​&#8221;रीविजिटिंग बनारस&#8221; बनाने के क्रम में उस दिन सुवह-सुवह विश्वनाथ मन्दिर के प्रवेश द्वार के ठीक सामने चाय पी रहा था। एक-एक चुस्की के साथ सोच रहा था बाएं जाऊँ या दाहिने। बायीं ओर मणिकर्णिका था और दाहिने अस्सी।</p></blockquote>
<p>इस बीच एक वृद्ध महिला सामने आयीं। वे मुझे देखीं, मैं उन्हें देखा और एक कप चाय के साथ दो बिस्कुट उनके तरफ बढ़ाया। वे मुस्करायीं जैसे मैंने कोई जमीन्दारी उन्हें लिख दिया हो। लेकिन प्रारब्ध तो यही था। हम दोनों का उस स्थान पर मिलना, उन्हें मेरे द्वारा चाय पीना, बिस्कुट खाना। इसे कौन मिटा सकता है। उसके बाद बनारस दर्जनों बार गया, वे फिर नहीं दिखीं।</p>
<p>इधर सुवह-सुवह ९ बजे तक दशास्वमेध घाट से गदौलिया मोड़ तक गाडी के आने-जाने पर स्थानीय प्रशासन का कोई प्रतिबन्ध नहीं होता और खाकीधारी भी अपने-अपने कपाल पर स्वेत-चन्दन लगाकर मस्तष्क को ठंढा किये होते हैं। कोई हंगामा नहीं। कोई वसूली नहीं। कोई छल नहीं। कोई प्रपञ्च नहीं। कभी-कभी तो लोगों को राह भी दिखाते देखे जाते हैं, तो कभी वृद्ध महिला-पुरुष को हाथ पकड़कर सड़क पार करते। परन्तु अचानक ९ बजे के बाद सब कुछ बदलने लगता है। प्रतिबन्ध भी लग जाता है और माथा भी गर्म होने लगता है।</p>
<p>तीसरी प्याली चाय खत्म करने के बाद अपने झोले को सँभालते गंगा की ओर निकल पड़ा। पैर मणिकर्णिका की ओर बढ़ा । मैं मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। बाबूजी कहते थे &#8220;पुरुष का बायाँ पैर पहले उठता है और वह कभी गलत नहीं होता।&#8221; पिता तो स्वयं एक ब्रह्माण्ड होता है, वह गलत हो ही नहीं सकता।</p>
<p>बाबूजी कहते थे जीवित मणिकर्णिका देखना सबों के भाग्य में नहीं होता। चट &#8211; चट &#8211; पट &#8211; पट &#8211; फटाक &#8211; फाटक आवाज के बीच जलती चिताओं से जो ऊर्जा निकलता है, सभी जलते पार्थिव शरीर की ऊर्जाएं एक-दूसरे से मिलकर जो समग्र ऊर्जा का निर्माण करते हैं; उसे ग्रहण करना सबों के वश की बात नहीं होती। उनकी बातें सत्य का पराकाष्ठा।</p>
<p>गंगा किनारे चलते-चलते मैं अब तक मणिकर्णिका पहुँच गया था। शरीर मणिकर्णिका पर। आत्मा महादेव के प्रति समर्पित और मन में दिवंगत पिता की बातें। मेरे पिताजी मणिकर्णिका में वर्षों साधना किये थे कामाख्या जाने से पूर्व।</p>
<p>मैं इस तस्वीर वाले स्थान पर आकर रुक गया। सामने सुखी-भींगी लकड़ियों का अम्बार। एक रंगीन तराजू जिसका रंग आसमान और पानी दोनो से मिलता-जुलता था। तराजू पर कोई &#8216;काली-पट्टी&#8217; नहीं यानि &#8216;सम्पूर्ण न्याय&#8217; &#8211; मैं उसे देख भी रहा था और मुस्कुरा भी रहा था।</p>
<p>इस बीच कोई नब्बे से अधिक वर्षीय सज्जन, झुकी कमर, हाथ में लाठी, कंधे पर गमछा लिए मेरे कंधे को थपथपाते बोले: &#8220;बाबूजी !! क्या देख रहे हो ? उनकी आवाज में गूँज थी जैसे कोई लाउडस्पीकर पर बोल रहा हो। कंधे पर रहे हाथ में वजन था और नब्बे बसंत देखने के बाद आँखों में तेज।</p>
<p>यह मणिकर्णिका है बाबूजी। यहाँ तराजू पकड़ने वालों की आखों पर काली-पट्टी नहीं होती। ऐसी बात आपके समाज में कुख्यात है। यहाँ न तो जीवित शरीर से और न ही पार्थिव से &#8211; अन्याय नहीं किया जाता। सम्पूर्ण न्याय और वह भी बराबर।</p>
<p>वे बोले: &#8220;यहाँ बट्टी मारने (गलत माप, गलत न्याय) की प्रथा नहीं है। यहाँ वजन (मृतक के पार्थिव शरीर) से अधिक वजन (लकड़ी का वजन) दिया जाता है। यानि, अगर लकड़ी का वजन कुछ अधिक भी हो गया, तो कम नहीं किया जाता। यहाँ की न्यायिक व्यवस्था बहुत ही सख्त और बहुत ही उदार है।&#8221;</p>
<p>वे फिर बोले: &#8220;इसका वजह यह है कि यहाँ पढ़े-लिखे-विद्वानों का राज नहीं, हम डोमों का साम्राज्य है। हम अशिक्षित हैं। अज्ञानी है। इसलिए हम लोग न तो जीवित शरीर से और न ही पार्थिव शरीर से छल-प्रपञ्च करते हैं। सात मन में पार्थिव शरीर मिटटी में और उनकी आत्मा महादेव के शरण में.। अनंत बार बनारस और मणिकर्णिका जाने के बाद भी उस पुण्यात्मा से अब तक नहीं मिल पाया हूँ।</p>
<p>तस्वीर लेकर मैं पीछे बने चबूतरे पर बैठ गया और सामने के द्वार को देखने लगा जो गँगा नदी में खुलती है &#8211; मन में कोई हलचल नहीं था, शांत पानी की तरह। </p>
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		<title>इस जन्म में ​अगर ​बनारस की गलियों में नहीं घूमे तो जीवन व्यर्थ और दूसरा जन्म मनुष्य योनि में ही होगा, इसका गारण्टी तो ​है नहीं ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 16 May 2018 14:40:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[संस्कृति]]></category>
		<category><![CDATA[अस्सी ​घाट]]></category>
		<category><![CDATA[काशी]]></category>
		<category><![CDATA[दशास्वमेध घाट]]></category>
		<category><![CDATA[बनारस]]></category>
		<category><![CDATA[​बाबा विश्वनाथ मन्दिर]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>बनारस: यह तो बनारस ही है जहाँ दो दीवारों भी इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है एक-दूसरे के प्रति। लोगबाग के प्रेम और स्नेह को तो शब्दों में लिखा ही नहीं जा सकता। बस बनारस आइये तभी समझ पाएंगे असली प्रेम की परिभाषा। और गलियों में घूमना भूलेंगे नहीं। क्योंकि यदि बनारस की गलियों का आनन्द नहीं [&#8230;]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>बनारस:  यह तो बनारस ही है जहाँ दो दीवारों भी इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है एक-दूसरे के प्रति। लोगबाग के प्रेम और स्नेह को तो शब्दों में लिखा ही नहीं जा सकता। बस बनारस आइये तभी समझ पाएंगे असली प्रेम की परिभाषा। और गलियों में घूमना भूलेंगे नहीं। क्योंकि यदि बनारस की गलियों का आनन्द नहीं लिए, तो जीवन व्यर्थ। </p>
<p>लेकिन एक बात कबहुँ नहीं भूलियेगा &#8211; इस प्रेम के लिए किसी राजनेता को धन्यवाद नहीं देंगे। ऊ तो आते रहेंगे &#8211; जाते रहेंगे। बनारस की गलियों और दीवारों का प्रेम तो अनन्तकाल तक रहेगा। </p>
<p>​बाबा विश्वनाथ मन्दिर मुख्य द्वार से दशास्वमेध घाट की ओर चल रहा था। दाहिने कंधे पर कैमरा बाबू लटक रहे थे। निकलने से पहले कैमरा बाबू से गुफ़्तगू हो चूका था विषय पर और उस दिन बनारस की गलियों में घूमना था तस्वीरों के लिए। सामने बनारस पुलिस की गाडी खड़ी थी। समय सुवह का कोई आठ बजा होगा। पुलिस बाबू की गाड़ी से पांच कदम पर एक गोलगप्पा बेचने वाला खड़ा था। यह भी कोई गोलगप्पा बेचने का समय है, लेकिन कुछ बच्चे सुवह-सुवह गोलगप्पा का आनन्द ले रहे थे। गोलगप्पा बेचने वाला बोलने में उस्ताद था। ​वैसे भी बनारस तो उस्तादों से ही भरा पड़ा है। ​लगातार बोलते जा रहा था ​शिवगंगा ट्रेन की तरह। ​और अगल-बगल के लोगबाग सुन भी रहे थे। तभी पहलवान के तरह एक नौजवान वहां आया और दूकानदार को खिलाने के लिए इशारा किया। पलक अभी नीचे भी नहीं हुआ था तभी गोलगप्पा बेचने वाला कहता है:<br />
<strong>​&#8221;​मर्दाना जाय खटाई से​ &#8211; जनाना जाय मिठाई से​&#8221;​</strong></p>
<p>यह सुनते ही पुलिस बाबू ठहाका लगाए और उनके साथ बगल में खड़े कुछ और लोग भी हँस दिए। इस दसक में पहली बार किसी पुलिस बाबू को इतना खुलकर ठहाका लगाते देखा था। पहलवान जी का गोलगप्पा मूंह में ऐसा पचका की गंजी (बनियान) का अगला भाग मटमैला हो गया। वे पैसा देकर अपना रास्ता ले लिए। पुलिस बाबू मेरे कंधे पर कैमरा देखकर कहते हैं &#8216;पत्रकार बाबू इसका मतलब समझे?&#8221; मैं हँसते हुए कहा: &#8216;तभी तो पहलवान जी निकल पड़े।&#8221; </p>
<p>यही है बनारस और इस बनारसी कहावत का मतलब है यदि पुरुष अधिक खट्टा खाये तो उसका पुरुषत्व लुढ़कने लगेगा, कम होता जायेगा और जब महिला मिठाई का अधिक सेवन करें तो मासिक धर्म में बिघ्न-बाधाएं आने लगेगी। अब अईसन &#8211; अईसन कहावत कहाँ सुनियेगा ?</p>
<p>बनारस प्राचीन जीवंत शहरों में एक है। &#8216;वामन पुराण&#8217; के अनुसार वरूणा और असि नदियां काल के प्रारंभ में स्वत: ही आद्य पुरूष के शरीर से निकली हैं। इन दोनो नदियों के मध्य की भूमि ही ​बनारस है। </p>
<p>अँग्रेजी के प्रख्यात साहित्यकार मार्क ट्वेन बनारस की पवित्रता और मिथकीय विश्वास से अभिभूत थे। एक बार उन्होंने लिखा-&#8220;बनारस इतिहास से प्राचीन है, परंपरा से प्राचीन है, मिथकों से भी प्राचीन है और इतना प्राचीन दिखता है, जैसे इन सभी को एक साथ रख दिया गया हो।&#8221; </p>
<p>विश्वनाथ मुखर्जी​ (बना रहे बनारस) ​के अनुसार ​शैतान की आंत की भांति यह भूल-भुलैया संसार का एक आश्चर्यजनक दर्शनीय स्थान है। इन गलियों में कितनी आजादी है। नंगे​ घूमें, गमच्छा ​पहनकर चलें, जहां जी में ​आये बैठ जाएँ, जहां जी आए सो ​जाएँ । कोई बिगड़ेगा नहीं, भगाएगा नहीं और न ही डांटेगा। गावटी का गमच्छा या सिल्क का कुरता पहने बनारसी रईस भी इन गलियों में छाता लगाए चलते हैं। शायद आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जिस गली में सूर्य की रोशनी नहीं पहुंचती, बरसात का मौसम नहीं है, फिर भी लोग वहां छाता लगाकर क्यों चलते हैं? कारण है​ ​- गंदगी। </p>
<p>मान लीजिए आप बाजार से लौट रहे हैं, अचानक ऊपर से कूड़े की बरसात हो गई। यह बात अच्छी तरह जान लीजिए-बनारसी तीन मंजिले या चार मंजिले पर से बिना नीचे झांके थूक सकता है, पानी फेंक सकता है और कूड़ा गिरा सकता है। दुकान झाड़ बटोरकर आपके चेहरे पर सारा गर्द फेंक सकता है। यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है, नीचे इस सत्कार्य से घायल व्यक्ति जब गालियां देता है तब सुनकर भाई लोग प्रसन्न हो उठते हैं। उनका रोम-रोम गाली देनेवाले को साधुवाद देगा। अगर कहीं वे सज्जन चुपचाप चले गए तो इसका उन्हें अपार दुख होगा और उस दुख को मिटाने के लिए मुख से अनायास ही निकल जाएगा- ‘मुर्दार निकसल!’</p>
<p>किसी-किसी गली में बनारसी रईसों का पनाला इस अदा से चूता है कि फुहारे का मजा आ जाता है। गर्मी के दिनों में रात को ऐसी गलियों से गुजरना और खतरनाक होता है। सोते समय ‘शंका समाधान’ के लिए बनारसी अपने को अधिक कष्ट नहीं देगा। परिणाम स्वरुप छत के पनाले से आप पर ‘शुद्ध गंगाजल’ बरस सकता है। गुस्सा उतारने के लिए ऐसे घरों में आप घुसने की हिम्मत नहीं कर सकते। एक तो बाहर का भारी दरवाजा बंद है, दूसरे भीतर जाने पर भी यह पता चलना मुश्किल है कि यह सत्कार्य किसने किया है। मुंह आपका है, गालियां बक लीजिए और राह लीजिए, बस! खासकर नंगे पैर चलना तो और भी मुश्किल है। घर के बच्चे ‘ दीर्घशंका’ गलियों में रात को कर देते हैं।</p>
<p>अगर इन गलियों में भगवान शंकर के किसी मस्ताने वाहन से भेंट हो गई अर्थात उसने नाराज होकर आपको हुरपेटा तो जान बचाकर भागना मुश्किल हो जाएगा। खासकर उन गलियों में जो आगे बंद मिलती है। क्योंकि आप पीछे भाग नहीं सकते, आगे रास्ता बंद है, बगल के सभी मकानों में भीतर से भारी सांकल लगी है और इधर सांड महाराज हुरपेटे आ रहे हैं! ​ ​साल में दो एक व्यक्ति इन सांडों के कारण काशी-लाभ करते हैं। लगे हाथ एक उदाहरण सुन लीजिए। लिंकन के बाद जनरल ग्रांट अमेरिका के राष्ट्रपति हुए थे। एक बार जब वे हिंदुस्तान में दौरे पर आए तब बनारस भी आए थे। उन्होंने इस शहर को ‘एक सिटी ऑफ लेंस’ अर्थात गलियों का शहर कहा है। कहा जाता है कि उनकी पत्नी को शंकर भगवान के वाहन ने अपने सींग पर उठा लिया था।</p>
<p>​<strong style="text-align:center; display:block">बहरहाल,</strong></p>
<blockquote><p>&#8220;काशी कबहुँ न छोड़िये, विश्वनाथ को धाम,<br />
मरने पर गंगा मिले, जियते लंगड़ा आम !!&#8221; </p></blockquote>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/culture/varanasi-street">इस जन्म में ​अगर ​बनारस की गलियों में नहीं घूमे तो जीवन व्यर्थ और दूसरा जन्म मनुष्य योनि में ही होगा, इसका गारण्टी तो ​है नहीं ?</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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