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	<title>विदेश में बिहारी Archives - आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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		<title>पटना कॉलेज @ 160 वर्ष : एक तस्वीर जो पटना कॉलेज के प्राचार्य-पुत्र-सहकर्मी-सहपाठियों का अनूठा दृष्टान्त है (14)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 24 Apr 2022 11:16:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विदेश में बिहारी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>प्रोफ़ेसर चेतकर झा यानी चेतकर बाबा जब तक पटना कॉलेज के प्राचार्य के कार्यालय वाली कुर्सी पर बैठे थे और हमारे मित्र गिरीश के बाबूजी उनकी सेवा में उपस्थित हए थे, तब तक पटना कालेज क्या, बिहार के समस्त विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की शैक्षिक स्थिति, छात्र-छात्राओं की मानसिक स्थिति &#8216;उबले धान&#8217; जैसा हो गया था। [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रोफ़ेसर चेतकर झा यानी चेतकर बाबा जब तक पटना कॉलेज के प्राचार्य के कार्यालय वाली कुर्सी पर बैठे थे और हमारे मित्र गिरीश के बाबूजी उनकी सेवा में उपस्थित हए थे, तब तक पटना कालेज क्या, बिहार के समस्त विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की शैक्षिक स्थिति, छात्र-छात्राओं की मानसिक स्थिति &#8216;उबले धान&#8217; जैसा हो गया था। समय बीतने के साथ-साथ पटना के डाक बंगला चौराहे पर ही नहीं, दरभंगा के टाबर चौक पर, मुजफ्फरपुर के सूतापट्टी चौक पर, रांची के बिरसा मुंडा चौक पर छोटका-छोटका सफ़ेद पोश नेतागण कुकुरमुत्तों की तरह पनप रहे थे, जिन्हे शिक्षा से दूर-दूर तक कोई नाता-रिस्ता नहीं था। </p>
<p>उन विगत वर्षों में प्रदेश में शिक्षा की जो स्थिति हुई, उसका परिणाम आज की पीढ़ी भी कर रही है। सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था को जिस कदर नेताओं ने, अधिकारियों ने, शिक्षकों ने निस्तोनाबूत किया, सरकारी क्षेत्र के शैक्षिक संस्थाओं को &#8216;अपंग&#8217; बनाया गया, राजनेताओं और आला-अधिकारियों की मिली-भगत से निजी क्षेत्रों में शैक्षिक संस्थाओं को जिस कदर &#8216;दुधारू गाय&#8217; बनाया गया, शिक्षा के नाम पर प्रदेश के लोगों का शोषण किया गया, किया जा रहा है, यह सर्वविदित है। </strong></p>
<p>इतना ही नहीं, इसी पटना कॉलेज से शिक्षा प्राप्त किये विद्यार्थी अपने जीवन-काल में भले विश्व-विजेता के अलंकरण से अलंकृत होकर अंतिम सांस लिए हों, आज भले विश्व में अपना नगारा-ढ़ोल पीटते/पिटबाटे हों; पटना कॉलेज के परिसर, कालेज की कक्षाओं, पुस्तकालयों, शैक्षिक वातावरण को देखकर यह अवश्य कहा जा सकता है, लिखा जा सकता है कि &#8216;उनमें&#8217; और वर्तमान &#8216;राजनीतिक व्यवस्था&#8217; में प्रदेश की शैक्षिक संस्थाओं के प्रति कोई लगाव नहीं था, है। अगर ऐसा नहीं तो कभी शैक्षिक जगत का ऑक्सफोर्ड कहा जाने वाला आज अपनी बिरानीयत पर नहीं रोता। </p>
<p>उन दिनों पटना कॉलेज के सामने किताबों की दुकानों की संख्या भले कम थी, पढ़ने-पढ़ाने वालों की तादात, उनकी गुणवत्ता अपने-अपने उत्कर्ष पर था। आज इस कॉलेज के सामने भले किताबों की दुकानों की संख्या सैकड़ों &#8211; हज़ारों में पहुँच गई हो, वास्तविकता तो यही है कि आज शैक्षिक गुणवत्ता की कमी के कारण पटना कॉलेज की पहचान बक्सर और मुगलसराय से आगे तक नहीं पहुँच पाती है। बिहार के जो भी छात्र-छात्राएं राष्ट्रीय स्तर पर, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आज पंचम लहरा रहे हैं, वे सभी प्रवासित-पक्षी होते हैं । यह अलग बात है कि उन्हें अब्बल होते ही हम बिहार के लोग &#8216;बिहारी है &#8211; बिहारी है&#8217; का ढ़ोल-नगारा पीटकर अपनी कमी को छिपाते हैं। इतना ही नहीं, आज बाबू नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में, प्रदेश की राजनीतिक व्यवस्था में कई लोग ऐसे हैं जो शिक्षा तो दिल्ली से ग्रहण किये, लेकिन अपनी पहचान बनाने, &#8216;तथाकथित&#8217; रूप से प्रदेश की सेवा करने पटना प्रवासित हो गए हैं, पुनः मुस्को भवः हो गए हैं, हो रहे हैं &#8211; राजनीतिक गलियारे से। </p>
<p>हम लोगों के ज़माने में पटना कालेज के छः ऐसे प्राचार्य हुए जो सम्भवतः कालेज प्रांगण के छात्र-छात्राओं को तो जानते ही थे, कॉलेज परिसर के बाहर सड़क पार की गलियों में रहने वाले गरीब-गुरबों के बच्चों को, चाहे रिक्शा चलाने वाले का बच्चा हो या दुकानदार का &#8211; जो कॉलेज परिसर में हुरदंग मचाते थे; नाम से ही नहीं, बाप के नाम से भी जानते थे। हम बच्चों की ही नहीं, हमारे माता-पिता की भी मानसिक और अनुशासनिक क्षमता नहीं होती थी कि वे उन प्राचार्यों के सामने नजर मिलाकर, नजर उठाकर बात कर सकें। उनकी नजरें हमेशा जमीन की ओर ही होती थी, फिर हम बच्चों की क्या औकात।</p>
<p><strong>उन प्राचार्यों में सबसे पहले थे प्रोफ़ेसर परमेश्वर दयाल, प्रोफ़ेसर महेन्द्र प्रताप, प्रोफ़ेसर के पी अम्बष्ठा, प्रोफ़ेसर दामोदर ठाकुर, प्रोफ़ेसर केदार नाथ प्रसाद, और प्रोफ़ेसर चेतकर झा प्रमुख थे। इन सभी प्राचार्यों में एक चीज बहुत ही &#8216;सामान्य&#8217; था &#8211; सबों की शारीरिक ऊंचाई पांच फीट आठ इंच से अधिक नहीं थी &#8211; लेकिन मानसिक ऊंचाई में कौन किससे अधिक है, तुलना करना कठिन ही नहीं, नामुमकिन भी था। </strong></p>
<p>प्रोफ़ेसर परमेश्वर दयाल सन 1971 के मई महीने में पटना कालेज के प्राचार्य बने और सन 1973 के जुलाई महीने तक रहे। प्रोफ़ेसर दयाल साहब का विभाग &#8216;भूगोल&#8217; था जो हम लोगों के घर से 20 कदम पर था। भूगोल विभाग पटना कालेज के मुख्य प्रवेश द्वार के दाहिने हाथ पर था। वहां बाहर बगीचे में फूल-पौधों में पानी देने हेतु नल भी था। हम मोहल्ले के बच्चे उस नल का उपयोग स्वयं नहाने में भी करते थे और घर में पीने के लिए भी। प्रोफ़ेसर दयाल साहब कई मर्तबा हम लोगों को देखते थे, लेकिन कभी डांटते-फटकारते नहीं थे। देखकर मुस्कुरा अवश्य देते थे। उनके पास एक आसमानी रंग का अम्बेसेडर कार था। उन दिनों पटना कालेज ही नहीं, बिहार के सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों में पांच फीसदी लोगों के पास चार-पहिया वाहन नहीं था। जिन महानुभावों के पास चार-पहिया होता था, वे कॉलेज परिसर के ही नहीं, समाज के संभ्रांतों में उनकी गिनती होती थी। उन दिनों क्या व्याख्याता, क्या प्राध्यापक और क्या प्राचार्य &#8211; रिक्शा का भरपूर प्रयोग करते थे।  </p>
<p>प्रोफ़ेसर परमेश्वर दयाल, प्रोफ़ेसर महेन्द्र प्रताप, प्रोफ़ेसर के पी अम्बष्ठा, प्रोफ़ेसर दामोदर ठाकुर, प्रोफ़ेसर केदार नाथ प्रसाद और प्रोफ़ेसर चेतकर झा &#8211; इन पांच प्राचार्यों के कार्यकाल में हम सभी बच्चे सात वर्ष की उम्र से 27 वर्ष की उम्र के हो गए थे। स्कूली शिक्षा से प्रारम्भ कर कॉलेज की शिक्षा के साथ-साथ विश्वविद्यालय की शिक्षा भी समाप्त कर अपने-अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने के दिशा में यात्रा प्रारम्भ कर दिए थे। इनमें प्रोफ़ेसर पी दयाल साहेब और प्रोफ़ेसर महेंद्र प्रताप साहेब को छोड़कर, मेरी माँ को सभी प्राचार्य महोदय, उनकी पत्नियां, उनके बच्चे व्यक्तिगत रूप से भी जानते थे। </p>
<p>प्रोफ़ेसर अम्बष्ठा साहेब पटना कालेज के सामने एनी बेसेंट रोड में, जहाँ हम सभी किराये के मकान में रहते थे, मेरे मकान से तीन घर बाद उनका घर था &#8211; एकदम कुटिया नुमा, लाल रंग का। उनसे पहले ट्रेड यूनियन नेता-सह-अधिवक्ता अशोक त्रिवेदी जी रहते थे। अशोक त्रिवेदी @अशोक भैया के छोटे भाई त्रिवेदी अंबरीश यानी सुग्गन भैया आर्यावर्त अखबार के संवाददाता  भी थे। इसी सड़क के आगे नुक्कड़ पर टी के घोष अकादमी के हिंदी के शिक्षक का &#8216;साइंस एकेडमी&#8217; और मकान के पीछे बहुत बड़ा खेत, जो पीछे पुरन्दरपुर मोहल्ला से जुड़ता था, था । लकड़ी का दरवाजा सीधा सड़क पर खुलता था। उन दिनों सड़क के दोनों तरफ खुली नालियाँ बहती थी। </p>
<p>अम्बष्ठा साहेब के पांच बेटे थे – प्रेम कुमार, कृष्ण कुमार, अशोक कुमार, शशी शेखर और ज्योति शेखर । हम बच्चों का लगाब बड़े (प्रेम कुमार), बीच में शशि बाबू और छोटे (ज्योति शेखर) से ही था। प्रेम बाबू और ज्योति शेखर दोनों पटना विश्वविद्यालय में व्याख्याता ही थे। ज्योति शेखर को जिस दिन नौकरी हुई थी लवन चूस भी खिलाये थे मोहल्ले के बच्चों को। उन दिनों जब भी अम्बष्ठा साहेब से मिलने जाते थे, प्रायः सुबह में, वे अखबार लेकर बैठे होते थे और सम्पूर्ण अखबार को लाल-रंग में रंगे होते थे। कभी-कभार प्रोफ़ेसर प्रेम कुमार, यानि उनके बड़े पुत्र भी, एक छात्र जैसा अपने शिक्षक के सम्मुख खड़े मिलते थे। सेव-जैसा लाल चेहरा। </p>
<p>प्रोफ़ेसर पी दयाल के बाद कोई 13 महीने के लिए प्रोफ़ेसर एस एम  सदरुद्दीन पटना कालेज के प्राचार्य बने। वे सं 1973 के अगस्त महीने में पहली तारीख को प्राचार्य कार्यालय में अपनी उपस्थिति दर्ज किये और एक वर्ष, यानी सन 1974 के सितम्बर महीने में कार्यालय को नमस्कार कर दिए। प्रोफ़ेसर सदरुद्दीन के बाद आये प्रोफ़ेसर दामोदर ठाकुर।  प्रोफ़ेसर ठाकुर महज तीन माह के लिए सितम्बर 9, 1974 से दिसंबर 21, 1974 तक प्राचार्य कार्यालय में रहे। प्रोफ़ेसर ठाकुर के बाद आये प्रोफ़ेसर चंद्रकांत पांडेय जी। प्रोफ़ेसर पांडेय का कार्यकाल भी महज तीन महीने का रहा। वे दिसम्बर 22, 1974 को प्राचार्य बने और अगले वर्ष मार्च 19, 1975 को प्राचार्य की सेवा से मुक्त हो गए। उन दिनों, खासकर प्रोफ़ेसर केदार नाथ प्रसाद के प्राचार्य बनने से पूर्व तक, पटना कालेज प्राचार्य कार्यालय में &#8216;आया-राम-गया राम&#8217; जैसे स्थिति थी। प्राचार्यों का इस कदर आना और जाना प्रत्यक्ष रूप में कालेज परिसर के शैक्षिक वातावरण को गिराबट की ओर ले जा रहा था। </p>
<p>प्रोफ़ेसर केदारनाथ प्रसाद 20 मार्च, 1975 को पटना कालेज के प्राचार्य बने। केदार बाबू के साथ मेरा निजी सम्बन्ध उनके प्राचार्य बनने से कोई पांच वर्ष पूर्व से था। उन दिनों जब हम सभी पटना कॉलेज के अंदर के रास्ते से पटना सांइस कालेज की ओर बढ़ते थे, तो साइंस कालेज के केमेस्ट्री ब्लॉक के पीछे सड़क के बायें तरफ दूसरा बंगला उनका ही था। बंगला के आउट हाउस में पटना विश्वविद्यालय के एक छात्र रहता था। आउट हाउस में छात्रों को रहने/रखने की परंपरा उन दिनों बहुत थी। मैं वर्षों से प्रोफ़ेसर केदार बाबू को पटना से प्रकाशित आर्यावर्त, इण्डियन नेशन, सर्चलाइट, प्रदीप अख़बारों के अलावे दिल्ली से प्रकाशित टाईम्स ऑफ़ इण्डिया भी देता था। उन दिनों टाईम्स ऑफ़ इण्डिया की कमर 40 नए पैसे थे। जब मैं 18 मार्च, 1975 को इण्डियन नेशन अख़बार में पत्रकारिता की सबसे नीचली सीढ़ी &#8216;कॉपी-होल्डर&#8217; की नौकरी की शुरुआत की; केदार बाबू बहुत खुश हुए। इण्डियन नेशन अखबार के तत्कालीन संपादल दीनानाथ झा उनके अभिन्न मित्रों में एक थे। केदार बाबू सुबह-सवेरे उठने वालों में एक थे। वे प्रातः-भ्रमण-सम्मेलन में बहुत विश्वास रखते थे। इस कारण कॉलेज परिसर में जो भी कोई उनके प्रातः भ्रमण काल में सोया दिख जाता था, उसे बिना जगाये वे अपना कदम आगे नहीं करते थे। गजब का आत्मीय रिश्ता था एक प्राचार्य और कॉलेज परिसर में रहने वाले लोगों के बीच।   </p>
<p>वैसे जब प्रोफ़ेसर चेतकर झा पटना कॉलेज के प्राचार्य बने (फरबरी, 1979-1985) हम इनके पूर्व के प्राचार्य डॉ केदार नाथ प्रसाद, जो पटना विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र स्नातकोत्तर विभाग के अध्यक्ष भी थे; के विभाग में प्रवेश ले लिए थे और एम ए में थे।प्रोफ़ेसर चेतकर बाबू तो सम्पूर्ण पटना विश्वविद्यालय के &#8220;बाबा&#8221; थे। साथ ही, क्या शैक्षिक, क्या गैर-शैक्षिक कर्मचारीगण, क्या छात्र, क्या छात्राएं सभी अपनी-अपनी बातों, समस्याओं का समाधान &#8220;बाबा&#8221; के पास आकर ढूंढते थे। पटना कॉलेज के सामने बनारसी पानवाला और उसके बगल में ननकू जी होटल वाले तो उन्हें हनुमान चालीसा के चौपाई से भी सम्बोधित करते थे। वे दोनों कहते थे: &#8220;को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।&#8221;</p>
<p>पटना कॉलेज प्रांगण में स्थित प्राचार्य-निवास में आने से पहले &#8216;बाबा&#8217; पटना विधि महाविद्यालय से भी आगे गंगा के किनारे रानी घाट स्थित प्रोफ़ेसर निवास में रहते थे। उनका निवास एक पंक्ति में पांच दो-तल्ला के मकानों में सबसे पहले वाले मकान में नीचले तल्ले पर था, दाहिने तरफ। इनके बाएं तरफ का आवास प्रोफ़ेसर दिवाकर झा का था। पटका कॉलेज के इतिहास में शहीद यह पहली घटना थी जब प्रोफ़ेसर सी झा और प्रोफ़ेसर डी झा आमने-सामने रहते थे और दोनों के पुत्र का नाम प्रभाकर था और दोनों खेलकूद में बहुत अभिरूच रखते थे। इसी श्रृंखला के अंतिम दो मंजिले मकान में अंतिम निवास पटना कालेज के मैथिली विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर आनन्द मिश्र का था। इन पांच आवासों में मैं अखबार दिया करता था उन दिनों। अंतिम अखबार प्रोफ़ेसर आनन्द मिश्र के घर फेकता था। वे</p>
<p>साठ और सत्तर के दशक में जब चार आने सेर (उन दिनों किलो की प्रथा दुकानों में नहीं के बराबर थी) आटा खरीदने की स्थिति में मेरी मां नहीं रहती थी, चेतकर बाबू की पत्नी किसी न किसी बहाने, चाहे पर्व का बहाना हो या उनके घर में किसी की प्रोन्नति के बहाने; मेरे घर में खाने की किल्लत न रहे, हम बच्चे भूखे नहीं सोएं, अपना हाथ कभी पीछे नहीं करती थीं। न कभी ऐसा महसूस होने देती थीं कि उनके परिवार-परिजनों के तुलना में हम सभी कनिष्ठ हैं। जब &#8216;बाबा&#8217; पटना कालेज परिसर वाले प्राचार्य भवन में आने के बाद तो वह घर जैसे &#8220;बपौती&#8221; लगता था। अक्सरहां, हम अपने माँ के साथ वहां पहुँचते थे। पहली मंजिल पर पोर्टिको के ऊपर एक बेहतरीन छत/बैठकी था। सदी के मौसम में वहां बैठा करते थे। </p>
<p>इस परिसर में अमरुद का बेहतरीन पेड़ था। इस परिसर पश्चिमी दीवार से सटा पटना कॉलेज के शिक्षकेत्तर कर्मचारियों का आवास भी था। उस परिसर में भी अमरुद और आम के काफी पेड़ थे। मेरा एक मित्र गिरीश भी इसी शिक्षकेत्तर कर्मचारियों वाले आवास में रहता था। उन दिनों साग का समय होता था, बातचीत होती थी। लेकिन कभी भी किसी के बारे में नकारात्मक बातें नहीं सुना। सबों का अच्छा हो, यही कहती थीं। महीने-दो महोनों में पटना के बेहतरीन महिलाओं, जैसे इण्डियन नेशन अख़बार के संपादक श्री दीनानाथ झा की पत्नी, प्रोफ़ेसर मित्रनंदन झा की पत्नी, नोवेल्टी एण्ड कम्पनी के मालिक श्री तारबाबू की पत्नी, बहु, या अन्य गणमान्य लोगों का परिवारों का जम घट होता था। ओह !! क्या दिन थे।</p>
<p>सत्तर के दसक में ही एक घटना घटी। मैं बचपन से नोवेल्टी से जुड़ा हूँ, आज भी। उस दिन नोवेल्टी के मालिक श्री तारा बाबू, जिनका प्रोफ़ेसर चेतकर बाबू से दांत-काटी-रोटी वाला प्रेम था, मुझे एक किताब का प्रूफ हाथ में देकर कहे की सामने श्री चेतकर बाबू के विभाग में चले जाओ। इसे उन्हें दे देना और कहना की एक बार सरसरी निगाहों से देख लें। वह प्रूफ एक किताब का था। नोवेल्टी से उनके विभाग पांच मिनट की दूरी पर था। आज भी शायद राजनीती शास्त्र विभाग वहीँ होगा । सामने सड़क पार करते ही प्रोफ़ेसर जगदीश झा (एन्सिएंट हिस्ट्री विभाग और आज के बॉली वुड के प्रख्यात फिल्म समीक्षक श्री आभाष के झा और विश्वबैंक के अधिकारी सुभाष के झा के पिता) के विभाग को लांघते अंग्रेजी विभाग के पीछे वाले हिस्से में पहुँच गया। </p>
<p><strong>विभाग में चेतकर बाबू नहीं थे और कुर्सी पर प्रोफ़ेसर मित्रनन्दन झा बैठे थे। मुझे देखकर आह्लादित करते कहते हैं &#8220;बैस जाऊ&#8221; (बैठ जाओ) &#8211; वे कुछ कार्य कर रहे थे। इतने में पांच-छह लड़कियाँ कमरे में प्रवेश ली। प्रवेश करते ही सभी पूछी : &#8220;सर !! चेतकर बाबू कहाँ हैं?&#8221; प्रोफ़ेसर मित्रनन्दन जी बिना अपना सर उठाये, आलमीरा खोले, ड्रावर खोले, पर्दा के पीछे देखे, टेबुल के नीचे देखे फिर लड़कियों के तरफ देखते कहते हैं: &#8220;चेतकर बाबू तो यहाँ नहीं हैं&#8221; &#8211; आप स्थिति का अंदाजा स्वयं लगाएं, क्या हुआ होगा !</strong></p>
<p>इसी तरह सं 1984 में जब बाबा पटना कालेज के प्राचार्य थे हम अपने बचपन के मित्र गिरीश के साथ पटना कॉलेज कार्यालय के पूर्वी बरामदे पर गप कर रहे थे। गिरीश और उसके पिता पटना कालेज में चपरासी थे। यह बरामदा प्राचार्य-कक्ष के साथ साथ कॉलेज कार्यालय से भी जुड़ा हथा, आज भी होगा। इस बरामदे का एक छोड़ मुख्य मैदान की ओर जाता है, जबकि दूसरा छोड़ ऐतिहासिक &#8220;विल्सन गार्डेन&#8221; के तरफ। विल्सन गार्डन उस ज़माने में गुलाबों के फूल के लिए विख्यात था। किसी का मजाल है कि उस गार्डन से एक भी फूल तोड़ लें। इस बगीचे पर पूर्ण नियंत्रण होता था भोला जी और रामाशीष जी का। दोनों माली जी थे और चेतकर बाबू के चहेते।</p>
<p><strong>तभी स्नातक कक्षा के कुछ लम्बे-चौड़े छात्र ऊपर के तल्ले से वर्ग समाप्त कर इस बरामदे के रास्ते निकल रहे थे। उनमे पांच-छः छात्र रुककर ऊँची आवाज़ में चिल्ला रहे थे। सभी अपने में मस्त थे। हम और गिरीश कोने में खड़े तमाशा देख रहे थे। तभी पांच फीट सात इंच का एक व्यक्ति, अपनी चश्मा को आखों पर सँभालते अचानक बरामदे पर आ गए। फिर क्या था। सन्नाटा। लेकिन सन्नाटा चीरते बाबा कहते हैं: &#8220;तुम लोगों के देह (शरीर) में घोरन (लाल रंग की चींटी जो आम के पेड़ पर होती है) का छत्ता (पत्तों से बना घोसला) बाँध कर मारूंगा। किसी का माँ-बाप कॉलेज आकर शिकायत भी नहीं करेंगे। अनुशासन नाम का चीज नहीं है। पढ़ने के स्थान पर हल्ला करते हो। जब जीवन में बोलने का समय आएगा तो मुंह से आवाज नहीं निकलेगा।&#8221; उनके सभी शब्द &#8220;आत्मीय&#8221; थे। श्री चेतकर बाबा काँप रहे थे और सभी छात्र पथ्थर बने खड़े थे। फिर गिरीश को देखते ही कहते हैं: गिरीश रजिस्टर लाओ। सबों के नाम के सामने लाल निशान लगा देते हैं।&#8221;</strong></p>
<p>कुछ क्षण में बरामदा खाली हो गया। उनके जीते-जी उन्हें इतना गुस्सा कभी नहीं देखा था। शाम में सफेद धोती, बुशर्ट पहने, मुंह में पान दबाए नोवेल्टी के सामने बाबा रिक्शा से उतरते दिखे, मुस्कुराते हुए। </p>
<p><strong>यह तस्वीर कोई पांच दशक पुरानी है। इस तस्वीर को देखकर मुझे उम्मीद है कि जो पटना कालेज के छात्र अथवा छात्रा रहे होंगे, इस स्थान से वाकिफ होंगे जहाँ उन दिनों के ऐतिहासिक छायाकार सन्नी स्टूडियो वाला तस्वीर खींचे थे। कुछ याद आया ? प्रशासनिक भवन के दाहिने हाथ वाला फुलबारी जो विल्सन गार्डन के सामने था। इस तस्वीर की उससे भी बड़ी विशेषता यह है कि इस तस्वीर में तत्कालीन प्राचार्य प्रोफ़ेसर चेतकर झा (बीच में) तो हैं ही, इसमें उनके इकलौते पुत्र प्रभाकर झा, तत्कालीन क्रिकेट के अनमोल रत्न अजय नारायण शर्मा, रणधीर प्रसाद वर्मा, उदय सिंह (लड्डू भैय्या), वीरेंद्र मोहन, प्रोफ़ेसर जे एन तिवारी, ज्योति शेखर और अन्य लोग भी हैं। इस तस्वीर में बहुत महानुभाव आज शरीर से जीवित नहीं है। उनका पार्थिव शरीर अग्नि के रास्ते महादेव के पास पहुँचने के लिए अनंत यात्रा पर निकल गयी है; लेकिन पटना कॉलेज परिसर में आ</strong>ज भी वे जीवित हैं, उनकी आत्मा आज भी जीवित है। आप सबों को नमन। </p>
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		<title>पटना कालेज @ 160 : कभी नहीं भूलने वाले कॉलेज के शिक्षकेत्तर कर्मचारी, आपको याद है यह चेहरा?  (13)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/do-you-remember-thase-faces-the-non-teaching-staffs-of-patna-college</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Apr 2022 05:51:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विदेश में बिहारी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मुन्ना भाई एमबीबीएस फिल्म आपको याद है और इस फिल्म में सम्मानित सुरेंद्र राजन साहब की भूमिका? अरे भाई, वही चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी जो अपने जीवन के दसकों वसंत देखने के बाद, हज़ारों युवाओं को चिकित्सक बनाने के बाद उस दिन भी अपने चिकित्सा महाविद्यालय में पोछा लगाते रहते हैं, तभी एक छात्र का उस [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/do-you-remember-thase-faces-the-non-teaching-staffs-of-patna-college">पटना कालेज @ 160 : कभी नहीं भूलने वाले कॉलेज के शिक्षकेत्तर कर्मचारी, आपको याद है यह चेहरा?  (13)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>मुन्ना भाई एमबीबीएस फिल्म आपको याद है और इस फिल्म में सम्मानित सुरेंद्र राजन साहब की भूमिका? अरे भाई, वही चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी जो अपने जीवन के दसकों वसंत देखने के बाद, हज़ारों युवाओं को चिकित्सक बनाने के बाद उस दिन भी अपने चिकित्सा महाविद्यालय में पोछा लगाते रहते हैं, तभी एक छात्र का उस भींगे सतह से आना होता है। सतह पोछता वह चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी खींझ उठता है और कहता है कि दीखता नहीं? </strong></p>
<p>वह छात्र एक कदम आगे आकर उन्हें अपने सीने में सटा लेता है और कहता भी है कि आप इस चिकित्सा महाविद्यालय को साफ़-सुथरा रखने के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित कर दिए, लेकिन आपको कोई पहचानता तक नहीं &#8230;&#8230;&#8230; एक छात्र का अपने प्रति इतना उत्कर्ष सम्मान देखकर, आत्मीयता देखकर वह कर्मचारी द्रवीभूत हो जाता है और उस दिन से वह उस छात्र का दीवाना हो जाता है। यहाँ तक की जब उस छात्र के विरुद्ध महाविद्यालय प्रशासन की ओर से अनुशासनिक कार्रवाई की जाती है, वह कर्मचारी प्रशासन के सामने चट्टान की तरह खड़ा हो जाता है। </p>
<p><strong>पटना कॉलेज के स्थापना काल से आज तक, यानी विगत सोलह दशकों में इस महाविद्यालय से न जाने कितने लाख छात्र-छात्राओं ने शिक्षा ग्रहण कर, हज़ारों-हज़ार प्राध्यापक अपने जीवन का बहुमूल्य समय बिताकर, सैकड़ों शिक्षकेत्तर कर्मचारी अपने जीवन का एक-एक सांस और एक-एक पल इस महाविद्यालय के विकास में बिताये होंगे &#8211; लेकिन कभी आपने सोचा कि आपके अपने पटना कॉलेज में जब आप अपनी-अपनी कक्षा में जाते थे तो कौन से चतुर्थ-वर्गीय कर्मचारी प्राध्यापकों के साथ उपस्थिति-पुस्तिका लेकर आये थे, कौन से कर्मचारी आपकी कक्षा में उपस्थिति-संख्या कम होने पर कार्यालय में मदद किये थे, समय पर कालेज का शुल्क नहीं जमा करने पर कौन से कर्मचारी प्रशासनिक कार्यालय में बड़े बाबू को कहकर दंड माफ़ कराये थे, प्राचार्य अथवा विभागाध्यक्ष की अत्यधिक व्यस्तता के बाबजूद कौन से कर्मचारी आपको, आपकी बातों को प्राचार्य और विभागाध्यक्ष तक पहंचाए थे? </strong><strong></p>
<p>नहीं न। </p>
<p>कॉलेज से स्नातक करने के बाद 100 में से शायद 98 फ़ीसदी छात्र-छात्राएं कभी मुड़कर पटना कॉलेज परिसर में उन चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों को नहीं देखे होंगे &#8211; यह पक्का है। बिहार ही नहीं, देश का शायद ही कोई विद्यालय अथवा महाविद्यालय होगा जिसके छात्र-छात्राएं “पूर्ववर्ती” होने के बाद भी अपने विद्यालय अथवा महाविद्यालय के शैक्षणिक स्वास्थ और वातावरण के प्रति संवेदनशील रहते होंगे, रहे होंगे, जिससे अगली पीढ़ी को बेहतर शिक्षा प्राप्त हो सके और महाविद्यालय का नाम स्वर्णक्षरों में उद्धृत रह सके।<br />
पटना के जिस विद्यालय &#8211; टी के घोष अकादमी &#8211; से मैं माध्यमिक शिक्षा प्राप्त किया था, उसी विद्यालय से कभी संविधान सभा के डॉ सच्चिदानंद सिन्हा, स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्राध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद, पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री डॉ विधान चंद्र राय प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त किये थे। साठ के दशक के उत्तरार्ध जब मैं इस विद्यालय में प्रवेश लिया था उस समय हमारे स्कूल में तीन प्रमुख चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी थे &#8211; ठाकुर जी, छोटन जी और गुलाब जी । इसमें ठाकुर जी और छोटन जी प्रशासनिक कार्यों में, प्रधानाचार्य के कार्यालय में होते थे, जबकि गुलाब जी सम्पूर्ण विद्यालय को फूल-पौधों से सजाए रखते थे। इस विद्यालय के मुख्य द्वार से कोई पचास वर्ष पूर्व निकला था, सन 1974 में, लेकिन आज भी उस ज़माने के शिक्षक, जिन्होंने मुझे कक्षा में पाठ पढ़ाये थे; शिक्षकेत्तर कर्मचारियों की पीढ़िया मुझे जानते हैं, सम्मान के साथ।  </p>
<p>बिहार की राजधानी पटना का 159-साल पुराना पटना कॉलेज अपने पूर्ववर्ती छात्र-छात्राओं की ‘असम्वेदनशीलता’, संस्थान के प्रति उनकी ‘उदासीनता’ का एक जीवंत दृष्टान्त है। नहीं तो अपने ज़माने का “पूर्व का ऑक्सफोर्ड” कहा जाने वाला पटना कालेज को नैक द्वारा सी-ग्रेड में नहीं रखा गया होता। यह अलग बात है कि आज ही नहीं, आज़ाद भारत में भी यह कालेज असंख्य और अनन्त छात्र-छात्राओं को महज एक विद्यार्थी से देश के विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका के सर्वश्रेष्ठ नेता, अधिकारी और न्यायमूर्ति दिया – किसी से पलटकर नहीं देखा, पूछा। </p>
<p>सन 1857 के आज़ादी के आन्दोलन के शंखनाद के कोई पांच साल बाद 1863 को पटना के गंगा नदी के किनारे इस शैक्षणिक संस्थान को स्थापित किया गया था। दुर्भाग्य यह है कि कभी अपने में स्वर्णिम इतिहास समेटे पटना कॉलेज  ने समाज और शिक्षा जगत को काफी कुछ दिया, लेकिन कॉलेज की गौरवशाली परंपरा को बरकरार रखने के लिए छात्र, शिक्षक, सरकार और समाज मिलकर भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा सके। अब पटना कालेज “पूर्व का ऑक्सफोर्ड नहीं रहा। यह अफ़सोस की बात है। </p>
<p>लेकिन, आज हम आपको इस तस्वीर के माध्यम से आपके पटना कॉलेज की यात्रा कराता हूँ। इस तस्वीर में मेरे कुछ प्यारे, बहुत प्यारे कर्मचारी नहीं हैं, जिन्हे उस ज़माने के शिक्षकों-छात्रों का सम्मान मिला था, वे खेल-कूद की दुनिया में अपनी बुजुर्गियत के कारण हस्ताक्षर भी किये थे, नहीं दिखेंगे &#8211; लेकिन हम सभी तहे दिल से उस पांच फुट ऊँचा, आत्मा से हीरा और शरीर के रंग से काला, गोल-मटोल, कछुए की चाल में अटूट विस्वास रखने वाले, सबके चहेते श्री भोला जी को नहीं देख रहे हैं, लेकिन वे हमारे ह्रदय में हैं तभी तो आज पांच दशक बाद भी बोलाजी दिल में अपना स्थान बनाये हुए हैं। आपको याद हैं न भोला जी ?</p>
<p>पटना कॉलेज मेरे और मुझ जैसे उस ज़माने के बच्चों के लिए, जो पटना कॉलेज के सामने वाली गली में, पुरंदर पुर में रहते थे, कभी पटना कॉलेज को महाविद्यालय और शैक्षिक संस्था के रूप में नहीं देखा । पटना कॉलेज हम सभी लोगों के लिए एक घर था जिसे हम सभी बहुत ही संवेदनात्मक तरीके से एक-दूसरे से जोड़े रखते थे। हम सभी बच्चों को पटना कॉलेज के सभी चतुर्थ-वर्गीय कर्मचारी, मसलन रामाशीष जी, मास्टर साहेब, उपेंद्र जी, तनिक लालजी, भोला जी, त्रिभुवन जी, राजेंद्र जी आदि नाम से जानते थे और हम सभी बच्चे भी उन्हें सम्मान के साथ &#8220;चचा&#8221; कहते थे। सन 1975 से 1985 का समय पटना कॉलेज के साथ-साथ सभी शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के लिए और भी &#8216;संवेदनात्मक&#8217; परिसर हो गया था। वजह था &#8211; प्रोफ़ेसर केदार नाथ प्रसाद और प्रोफ़ेसर चेतकर झा का प्राचार्य होना। प्रोफ़ेसर केदार बाबू तो तनिक &#8216;कठोर&#8217;, परन्तु सहृदय स्वाभाव के व्यक्त थे; प्रोफ़ेसर चेतकर बाबू तो सभी व्यावहारिक दृष्टिकोण से सबों के लिए &#8220;बाबा&#8221; थे। </p>
<p>गर्मी के समय रातों को पटना कॉलेज परिसर में रहने वाले शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के साथ-साथ हम मोहल्ले के लोग बाग़, बच्चे भी पटना कॉलेज परिसर में सोया करते थे। स्थान या तो अंग्रेजी विभाग का बरामदा होता था, या फिर मुख्य कॉमन-रूम का कॉरिडोर या फिर प्रशासनिक भवन का गंगा तट वाला बरामदा (विल्सन गार्डेन की और) निश्चित होता था। प्रोफ़ेसर केदार बाबू नित्य पौ फटने से पूर्व ही, जब लोगों की निद्रा &#8216;चीर निद्रा&#8217; की ओर उन्मुख होती थी, अपने डंडा से सबों को उठाने लगते थे। वे प्रातःकालीन भ्रमण करते थे। कहने लगते थे: &#8220;इतनी देर तक सोयेंगे तो जिंदगी में आगे कैसे बढ़ेंगे?&#8221; अब केदार बाबू को तो कोई कुछ कह भी नहीं सकता था, आखिर पटना कॉलेज के प्राचार्य थे और प्रत्येक क्षण अपने कर्मचारियों के हितार्थ संवेदनशील रहते थे।</p>
<p>केदार बाबू को मैं निजी तौर पर भी इसलिए अधिक जानता था कयोंकि सन 1970 से लगातार मैं उन्हें पटना से प्रकाशित &#8216;आर्यावर्त&#8217;, &#8216;इण्डियन नेशन&#8217;, &#8216;सर्चलाइट&#8217;, &#8216;प्रदीप अखबार देते आ रहे थे। साथ ही, दिल्ली से प्रकाशित टाइम्स ऑफ़ इण्डिया अख़बार का आज का संस्करण, जो आम तौर पर पटना में शाम के तीन बजे आता था, अगले सुबह सभी अख़बारों के साथ देते थे। मैं आर्यावर्त-इण्डियन नेशन पत्र समूह में 18 मार्च, 1975 को पत्रकारिता की सबसे नीचली सीढ़ी पर पैर रखा, मन में एक खूबसूरत आत्मविश्वास के साथ 543.60 पैसे की मासिक तन्खाह के साथ और प्रोफ़ेसर केदार बाबू 20 मार्च, 1975 को पटना कॉलेज के प्राचार्य बने। प्रोफ़ेसर केदार बाबू जिस दिन पटना कालेज प्राचार्य कक्ष को छोड़े, हमारे, हम सबके &#8220;बाबा&#8221; प्रोफ़ेसर चेतकर झा 1 फरबरी, 1979 को प्राचार्य कायालय में अपनी उपस्थिति दर्ज किये। इस समय तक मैं फिर पटना विश्वविद्यालय अर्थशास्त्र स्नातकोत्तर विभाग में आ गया था और वहां विराजमान थे प्रोफ़ेसर केदार बाबू विभागाध्यक्ष के रूप में। </p>
<p>बहरहाल, पटना कॉलेज के चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों में हम बच्चे सबसे अधिक भयभीत रहते थे श्री रामाशीष जी से। वे चीता की तरह दौड़ते थे। किसी भी बच्चे को कालेज परिसर में अगर अनुशासन के विरुद्ध हरकत देखते थे, तो डराने के लिए इस कदर दौड़ते थे, गेंद पकड़कर रख लेते थे, ताकि फिर वैसी गलती नहीं दोहराया जाय। वे कॉलेज परिसर में चतुर्दिक उपस्थित रहते थे। क्या व्यायामशाला , क्या पुस्तकालय, क्या परीक्षा कक्ष, क्या कॉमन रम और क्या खुला मैदान। भय वश ही सही, मन में श्री रामाशीष जी का नाम आते ही, सामने दिखने लगते थे।  लेकिन बहुत ही हृदय वाले मनुष्य थे हमारे रामाशीष ही। </p>
<p>भोला जी की तो बात ही नहीं। व्यावहारिक तौर पर भोला जी को पटना कालेज के प्राचार्य भी सम्मान करते थे। आज भले पटना कालेज का वह रोज-गार्डन नहीं है, लेकिन आज भी इन शब्दों को लिखते समय एक-एक शब्द भोला जी के खून-पसीने से सींचित वह रोज गार्डन यानी विल्सन गार्डन याद आ रहा है। प्रशासनिक भवन का वह बरामदा जो गंगा छोड़ की ओर है, उस बरामदे के सामने सैकड़ों किस्म के गुलाब खिले रहते थे। एक तरह से वह एक &#8216;लवर्स स्पॉट&#8217; था गुलाबों की रंग-बिरंगी पंखुड़ियों के कारण।<br />
कॉलेज के समय में भोलाजी बहुत सतर्क रहते थे कहीं उस बगीचे के फूल को कोई तोड़ न ले। आखिर &#8216;मनचले&#8221; तो उस दिन भी थे और पूजा-पाठ के लिए मोहल्ले की महिलाएं वहां तक पहुँचती ही थी। भोजाजी 100 मीटर की दौड़ में कभी द्वितीय स्थान पर नहीं आये। अगर गलती से कोई युवक कर्मचारी आगे भी बढ़ने लगता था, तो उसकी गति को आँखों की नजर से नियंत्रित किया जाता था, ताकि भोला जी का जय-जयजयकार हो। पारितोषिक वितरण के समय उन्हें पीला-लाल धोती पहनाकर, भर गर्दन माला पहनाकर सम्मानित किया जाता था। आज उन दिनों को याद करते आखें भर आती हैं। आपको नमन है भोला जी। </p>
<p>उसी दौड़ में एक थे राजेंद्र जी। इस तस्वीर में ऊपर की पंक्ति में सबसे छोटे कद के, काले, घुंघराले बाल बाले। बहुत बेहतरीन इंसान थे राजेंद्र जी। राजेंद्र जी उस समय के प्राचार्य (प्रोफ़ेसर महेंद्र प्रताप 1966-1971) के बहुत ही चहेते थे। इसलिए उन्हें हंसी-मजाक में अपने सहकर्मी &#8220;महेंद्र प्रताप&#8221; से बह कभी-कभार सम्बोधित कर देते थे। उनकी आवाज में नाक का प्रभाव अधिक रहता था। बोलते समय, बात करते समय हाथ अधिक हिलाते थे। लेकिन हृदय के बहुत नेक आदमी थे।इस तस्वीर में जो सबसे दाहिने बैठे हैं, वे हैं &#8220;मास्टर साहब&#8221; &#8211; एक मायने में मास्टर साहब पूरे पटना कॉलेज के &#8220;प्रमुख&#8221; थे। क्या पुस्तकालय, क्या वाचनालय, क्या खेल का मैदान &#8211; हरेक स्थान पर मास्टर साहब दीखते थे। कभी-कभार हम बच्चों को &#8216;लवणच्युस&#8217; भी देते थे। त्रिभुवन बाबू, झाजी आदि भी पटना कालेज के स्तम्भ ही थे। आज जब उन सबों को याद करता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे पटना कॉलेज परिसर में मस्ती कर रहा हूँ और उन तमाम सम्मानित लोगों की निगाहें हम बच्चों पर टिकी हुई है &#8211; आखिर वे भी सभी तो पिता भी थे। </p>
<p>कहा जाता है कि बिहार में आधुनिक शिक्षा की स्थापना दिवस के अवसर पर 28 अप्रैल 1858 को पटना हाई स्कूल के बदले पटना में एक जिला स्कूल खोलने की योजना बनी और पटना हाई स्कूल का नाम ही पटना जिला स्कूल पड़ा। इस तरह, एक लम्बा सफर तय करने के पश्चात् पटना जिला स्कूल को पटना कॉलेज के रूप में स्थापित करने का सरकारी आदेश 15 नवम्बर 1861 को पास हुआ। इसी आदेश के अनुसार पटना जिला स्कूल अगस्त 1862 में पटना कॉलेजिएट स्कूल का रूप ले लिया। इसी पटना कॉलेजिएट स्कूल को 9 जनवरी 1863, शुक्रवार के दिन कॉलेज का दर्जा प्राप्त हो गया। इसका नाम गाॅवर्नमेंट कॉलेज हो गया। 1862 ईस्वी में शिक्षा निदेशक के आदेश से प्राचार्यों और शैक्षणिक सेवा करने वालों को अधिक वेतनमान निर्धारित किए गए।  1863 से कॉलेज के हेडमास्टर को प्रोफेसर इंचार्ज कहा जाने लगा। पटना कॉलेज में (माह:अप्रैल) 1863 में 312 छात्र पढ़ते थे । 19 फरवरी 1867 से यहाँ केवल कालेज स्तर की पढ़ाई होने लगी और पटना कॉलेज के प्रथम प्राचार्य जे० के० रोजर्स बने। जे० डब्ल्यू० मैक्रिण्डल 1880 तक प्राचार्य के पद पर कार्यरत रहे। </p>
<p>1865 के बाद पटना काॅलेज ने सैकड़ों विद्वान प्रशासक, देशभक्त, अधिकारी, वकील, जज, पत्रकार और लेखक पैदा किया। देखते-देखते, ऐसी स्थिति हो गई कि बिहार का लगभग प्रत्येक बड़ा आदमी पटना कॉलेज का छात्र रहा। बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह, सर्वोदय नेता जय प्रकाश नारायण, महान कवि और साहित्यकार रामधारी सिंह दिनकर, अनुग्रह नारायण सिंह, डॉ सच्चिदानन्द सिन्हा, सर सुल्तान अहमद, प्रसिद्ध इतिहासकार रामशरण शर्मा, सैयद हसन अस्करी, योगेन्द्र मिश्र, जगदीश चन्द्र झा, विष्णु अनुग्रह नारायण, प्रसिद्ध अर्थशास्त्री गोरखनाथ सिंह, केदारनाथ प्रसाद, आदि पटना कॉलेज के छात्र रहे। पटना काॅलेज में पंडित राम अवतार शर्मा (संस्कृत), डाॅ अजीमुद्दीन अहमद (अरबी और फारसी), सर यदुनाथ सरकार (इतिहास), डाॅ सुविमल चन्द्र सरकार (इतिहास), डाॅ डी०एम० दत्त (दर्शन शास्त्र), डाॅ ज्ञानचन्द्र (अर्थशास्त्र), डाॅ एस०एम० मोहसिन (मनोविज्ञान), एस०सी० चटर्जी (भूगोल), परमेश्वर दयाल (भूगोल), विश्वनाथ प्रसाद (हिन्दी), नलिन विलोचन शर्मा (हिन्दी) जैसे राष्ट्र प्रसिद्ध शिक्षक थे। </p>
<p>पटना कॉलेज में बी०ए० की पढ़ाई 1865 से होने लगी।‌ 1864 -1865 में जे०के० रोजर्स और चार शिक्षक थे। प्रोफेसर ए०ओ० बैंक रसायन शास्त्र, भौतिकी और गणित पढ़ाते थे। पटना कॉलेज में इस तरह वकालत, विज्ञान, इंजीनियरिंग और कला की पढ़ाई होती थी। कैलाश चन्द्र बंदोपाध्याय प्रथम प्राइवेट छात्र थे जिन्होंने 1869 में एम०ए० पास किया।‌ वे एमए, मानसिक एवं नैतिक दर्शन, कला में प्रतिष्ठा (Honours of Arts) की उपाधि लेने वाले पहले विद्यार्थी थे जो द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे। 1905 में पटना कॉलेज का महत्व बढ़ने लगा। कलकत्ता विश्वविद्यालय से इसे काफी अनुदान मिलने लगा। इस कॉलेज के प्रोफेसर डी०एन० मल्लिक भौतिकी में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश भेजे गए। शिक्षकों की संख्या बढ़ने लगी। 1907 में पटना कॉलेज में करीब 120 छात्र थे‌ जिनमें से 90 बिहारी थे। 1862-63 में यहाँ एक पुस्तकालय की स्थापना हुई। 1866 में पटना कॉलेज के पुस्तकालय में करीब चार हजार पुस्तकें थीं। 1899 में पटना कालेज पुस्तकालय में पुस्तकालय अध्यक्ष की नियुक्ति की गई। </p>
<p>1919 से भारतीय प्रशासनिक सेवा में भारतीय छात्र भी सम्मिलित होने लगे। 1921 में नीलमणि सेनापति और रशिदुज जमन तथा 1922 में अभय पद मुखर्जी आई०सी०एस० पास किए। ये लोग पटना कॉलेज के ही छात्र थे‌। 1912 में बंगाल से हटकर बिहार और उड़ीसा अलग प्रान्त बना दिए गए। अक्टूबर 1917 को कलकत्ता विश्वविद्यालय से अलग पटना विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। 1913 में ही प्रथम बार पटना कॉलेज के उत्तर में स्थित गंगा घाट पर वायसराय लॉर्ड हार्डिंग आए और इस अवसर पर एक ऐतिहासिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। गांधीजी के नेतृत्व में प्रारम्भिक स्वतंत्रता संघर्ष में इस कॉलेज के छात्रों की भूमिका अति सराहनीय रही। गांधीजी के कहने पर कॉलेज के कुछ छात्रों ने 1920 के आन्दोलन में भाग लिया और जय प्रकाश नारायण उन्हीं छात्रों में से एक थे। </p>
<p>1940 में शिक्षकों के मामले में दूसरे चरण की शुरुआत हुई। इस वर्ष तक पटना कॉलेज के अधिकांश में शिक्षकों का कार्यकाल समाप्त हो गया। कई शिक्षकों की मृत्यु हो गई। इसी समय से विद्वानों के नए झुंड से पटना काॅलेज पुनः विकास की ओर बढ़ चला। इन विद्वानों में प्रमुख थे –  प्रोफेसर वाई०जे० तारापोरेवाला, प्रोफेसर गोरखनाथ सिन्हा, प्रोफेसर काली किंकर दत्ता, श्री जगदीश नारायण सरकार, डाॅ सुधाकर झा, प्रोफेसर एस०के० घोष, के० अहमद, एफ० रहमान, डी०एन० दत्त, कार्तिक नाथ मिश्र, प्रोफेसर महेन्द्र प्रताप, डाॅ ज्ञानचन्द्र, डाॅ इकबाल हुसैन, प्रोफेसर ए० मन्नान, प्रोफेसर टी०बी० मुखर्जी, प्रोफेसर सैयद हसन अस्करी, प्रोफेसर विमान बिहार मजुमदार, नर्मदेश्वर प्रसाद, ए०एस० अल्टेकर, वी०पी० सिन्हा, एच०एन० घोषाल, अजीमुद्दीन अहमद, एस०आर० बोस, रमोला नन्दी, हरिमोहन झा, धर्मेन्द्र ब्रह्मचारी इत्यादि। छात्राओं की संख्या 1932-33 में 2 थी जो बढ़कर 1936 में 15, 1938-39 में 32, 1939-40 में 42 और 1951-52 में 62 थी। </p>
<p>पटना कॉलेज शिक्षा का एक महान केन्द्र बन चुका था। 1937 में इस कॉलेज की लाइब्रेरी में पुस्तकों की संख्या 15000 से ज्यादा थी। छात्रों के लिए एक मैगजीन रूम की व्यवस्था 1939 में की गई। 1950  में पुस्तकालय में पुस्तकों की संख्या 37000 हो गई। 1928 में पटना काॅलेज के स्टाफ-क्लब में चाय मिलने लगी। 1930 से हॉकी-क्रिकेट आदि खेले जाने लगे। 1949 से यहां के छात्र एन०सी०सी० का प्रशिक्षण प्राप्त करने लगे। बाहर से आने वाले छात्रों को रहने के लिए एक छात्रावास की व्यवस्था प्रथम बार की गई जो कॉलेज के पास में ही स्थित था। इसके प्रथम अधीक्षक संस्कृत के प्रोफेसर छोटे राम तिवारी थे। इसमें आवासियों की संख्या 30 थी । पटना काॅलेज के शिक्षा-स्तर को ऊंचा उठाने में छात्रावासों की भूमिका अति प्रशंसनीय रही। मिंटो हिन्दू हॉस्टल का ‘एस्से क्लब’ काफी प्रसिद्ध संस्था थी। सभी छात्रावासों में एक पुस्तकालय की व्यवस्था की गई। छात्रावास के अंतेवासियों की सामाजिक भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। मिंटो मुस्लिम होस्टल में प्राचार्य जैक्सन के नाम पर एक पुस्तकालय की स्थापना 1912 में हुई। इसी पुस्तकालय के कारण 1929 में मिंटो मुस्लिम होस्टल का नाम जैक्सन होस्टल हो गया। </p>
<p>पटना कॉलेज के प्राचीन गौरवमय गाथा को जितना लिखा जाए उतना कम होगा। आज के पटना काॅलेज में शायद ही 1940-50 का पटना कॉलेज दिखाई दे। 1940-50 में कहा जाता था कि “पटना कॉलेज विद्या का पवित्र मंदिर है। इस मंदिर में आकर श्रद्धा और विनय के व्यवहार से अपने व्यक्तित्व को निखारने का सुअवसर नहीं गंवाना चाहिए”। पटना कालेज देश के प्राचीन शिक्षण संस्थानों में से एक है। साथ ही यह सह-शिक्षा का भी बिहार में सबसे पुराना केन्द्र है। इस वर्ष स्थापना का 160 वर्ष पूरा कर रहा हैं । विगत 159 वर्षों में इस कॉलेज ने जो कीर्तिमान स्थापित किया है उसके कारण इसे बिहार एवं बिहार के बाहर देश के दूसरे हिस्से में भी मानक शिक्षण संस्थान के रूप में प्रतिष्ठा मिली है। शिक्षा, न्याय, कला एवं साहित्य, राजनीति, समाज सेवा, प्रशासनिक सेवा इत्यादि विभिन्न क्षेत्रों में इस कॉलेज का योगदान अग्रगण्य रहा है। बिहार के अनेकानेक महान एवं मार्गदर्शक व्यक्तियों का निर्माण इसी कॉलेज से सम्भव हुआ है। विद्वान प्रोफेसरों और मेधावी छात्रों की अटूट परम्परा ही कालेज की स्थायी गरिमा का आधार है।</p>
<p><strong>#बहरहाल, अगर आपके पास भी पटना कालेज के आपके ज़माने के शिक्षकेत्तर कर्मचारियों की तस्वीरें हैं, तो आप उनके बारे में जरूर लिखें &#8211; आज के इस सामाजिक क्षेत्र वाले मीडिया पर अगर के वंशजों की नजर पड़ी और वे भी हम लोगों की तरह ही अपने पूर्वजों को प्यार और स्नेह करते होंगे; तो उन्हें फक्र होगा कि उनके बाबूजी को, दादाजी को, नानाजी को उनके छात्र-छात्राएं आज भी याद करते हैं</strong></p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/do-you-remember-thase-faces-the-non-teaching-staffs-of-patna-college">पटना कालेज @ 160 : कभी नहीं भूलने वाले कॉलेज के शिक्षकेत्तर कर्मचारी, आपको याद है यह चेहरा?  (13)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>पटना कालेज @ 160 : ईंट, पत्थर, लोहा, लक्कड़, कुर्सी, टेबल, प्रोफ़ेसर, छात्र, छात्राएं, माली, चपरासी, प्राचार्य सबके थे रणधीर भैय्या (12)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Apr 2022 05:43:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विदेश में बिहारी]]></category>
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		<category><![CDATA[verma]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>हमारे रणधीर भैया भी गजब का आदमी थे। पटना कॉलेज के ईंट, पत्थर, लोहा, लक्कड़, कुर्सी, टेबल, घास, पत्ता, नल, पानी, गाय, गोरु, प्रोफ़ेसर, छात्र, छात्राएं, माली, चपरासी, प्राचार्य &#8211; किस-किसका नाम गिनाऊँ, वे सबका तो तो थे ही, उनका भी सब था । इस तस्वीर में पीछे बाएं से जो महाशय खड़े हैं, का [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/randhir-verma-and-patna-college">पटना कालेज @ 160 : ईंट, पत्थर, लोहा, लक्कड़, कुर्सी, टेबल, प्रोफ़ेसर, छात्र, छात्राएं, माली, चपरासी, प्राचार्य सबके थे रणधीर भैय्या (12)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हमारे रणधीर भैया भी गजब का आदमी थे। पटना कॉलेज के ईंट, पत्थर, लोहा, लक्कड़, कुर्सी, टेबल, घास, पत्ता, नल, पानी, गाय, गोरु, प्रोफ़ेसर, छात्र, छात्राएं, माली, चपरासी, प्राचार्य &#8211; किस-किसका नाम गिनाऊँ, वे सबका तो तो थे ही, उनका भी सब था । इस तस्वीर में पीछे बाएं से जो महाशय खड़े हैं, का नाम है अजय नारायण शर्मा। पटना कॉलेज और फिर पटना विश्वविद्यालय के क्रिकेट टीम के कप्तान थे। कितने रणजी खेले होंगे, उनको भी याद नहीं होगा। वह तो पटना से प्रकाशित अखबार वाले धन्यवाद के पात्र हैं कि आज भी 62-किलो के इस महामानव को देखते ही पहचान लिए।</strong></p>
<p>इसी तस्वीर में बीच पंक्ति में बैठे है &#8211; बाएं से हमारे रणधीर भैया, बीच में वीरेंद्र भैया (वीरेंद्र मोहन प्रसाद) और उनके बगल में बैठे हैं प्रोफ़ेसर सुरेश बाबू। ऊपर की पंक्ति में अजर नारायण शर्मा के साथ खड़े हैं हमारे सुरेश भैया (सुरेश प्रसाद) और सबसे दाहिने हैं नीलू भैया। यह पटना कालेज का खेलकूद विभाग है। एक पर एक।</p>
<p>इस तस्वीर को देखकर मुझे विश्वास है कि रणधीर वर्मा के जितने चाहने वाले होंगे, जो उनके जीवन काल में उनसे पांच-दस सेकेण्ड के लिए भी रु-ब-रु हुए होंगे, जो दो शब्द उनसे बात किये होंगे &#8211; वे उनका हो गए होंगे।</p>
<p>हमारे रणधीर भैया धनबाद के हीरापुर में बिनोद बिहारी महतो के शॉपिंग कॉम्पेक्स स्थित बैंक ऑफ़ इण्डिया परिसर में वीरगति प्राप्त किये। वीरगति प्राप्त करने से पूर्व धनबाद के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक रणधीर प्रसाद वर्मा बोकारो के डीआईजी के रूप में प्रोनत्ति हो गए हे। उनके जानने वाले तो लाखों-करोड़ों लोग है, जिसमें राजनेताओं की कतार अधिक लम्बी है, वे उन्हें अधिक जानते होंगे। लेकिन यह तस्वीर शायद उनके घर में भी नहीं होगी आज, विश्वास है।</p>
<p>पटना कॉलेज के 160 वर्ष पर आर्यावर्तइण्डियननेशन.कॉम कहानी श्रृंखला में पटना कॉलेज के रणधीर वर्मा की कहानी जो मैं लिख रहा हूँ, वह न केवल मेरी जिन्दगी का अहम् हिस्सा आज भी है, बल्कि रणधीर भैय्या आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हिस्सा हैं । कहानी पढ़कर आप भी चकित हो जायेंगे। रणधीर भैय्या से पटना कालेज के सामने या पटना कालेज परिसर में रहने वाले तत्कालीन लोगों का, जब रणधीर भैय्या कालेज के छात्र थे, और हम सभी &#8220;लड़कन-बुतरू&#8221; &#8211; एक गजबे का रिस्ता था। जैसे ही उन पर नजर पड़ी, हम सब भूखे भी रहते थे तो मुस्कुरा देते थे। उनके चेहरे पर गजब का आकर्षण था। उनमें बड़े-बुजुर्गों, बच्चों के प्रति एक अजब का सम्वेदना था। इस तस्वीर मन मोहतरमाओं को अगर कुछ पल के लिए &#8216;दाएं-बाएं&#8217; कर दें तो सभी तत्कालीन युवा &#8216;युग के युवा&#8217; थे।</p>
<p>हमारे ज़माने में सातवीं कक्षा में बोर्ड परीक्षा होती ही। साल 69 था। उन दिनों दसवीं कक्षा का बोर्ड परीक्षा परिणाम ो स्थानीय अख़बारों में &#8211; आर्यावर्त, इण्डियन नेशन, सर्चलाइट और प्रदीप &#8211; में प्रकाशित होता था, लेकिन सातवीं बोर्ड का परीक्षा फल विद्यालय में आता था। म जिस दिन परीक्षा फल निकला था, हम अपने विद्यालय से परिणाम लेकर घर आ रहे थे। पटना कालेज के सामने शांति कैफे के नीचे रणधीर भैया खड़े थे। वे मझे देखते ही पूछे &#8211; रिजल्ट निकला?</p>
<p>मैं अपना मुंडी हिलाया और कागज आग बढ़ा दिया। वे कागज देखकर एक &#8216;चटकन&#8217; मारे और गोद में उठाकर ननकू जी के होटल में दो गुलाब जामुन खिलाये फिर कमाल बाइंडिंग हॉउस (स्टेशनरी की दूकान) ले गए। यहाँ वे ढाई-रुपये में &#8220;प्रेसीडेंट फाउंटेनपेन खरीदकर, एक चीलपार्क रोशनाई के बोतल के साथ पीठ ठोकते कहते हैं: &#8220;पढ़ना&#8230;. पढ़ाई से कभी लुक्का-छिप्पी नहीं करना। पढ़ोगे तभी माँ-बाबूजी का नाम करोगे और तुम्हारी भी पहचान अपनी बनेगी।&#8221;</p>
<p>अगर कोई &#8220;बुतरू&#8221; (बच्चा) पटना कालेज गेट के सामने वाली गली की नुक्कड़ पर खड़ा होता था और उसके पैंट कमर को धरती के तरफ उन्मुख होता रहता था तो रणधीर भैय्या रूककर पैंट को यथास्थान कर उस बच्चे के दोराडोरी (कमर में बंधे धागे) से फंसा देते थे। उस गली में यादवों की संख्या अधिक थी। इस तस्वीर में भी सुरेश भैया &#8216;यादव&#8217; ही थे। लेकिन क्या &#8216;इंसान&#8217; थे। आज उनका नाम लिखते रोगंटे खड़े हो गए हैं &#8211; सम्मानार्थ।</p>
<p>सभी ननकू जी (गली के नुक्कड़ पर होटल के मालिक) के नाती-नतनी-पोता-पोती होते थे, जो दिनभर गली घूमते-रोते-हँसते-लड़ते-खेलते रहते थे। अगर पैंट पहनाने के क्रम में उस बच्चे की मतारी (माँ) सामने हो गयी, तो भैय्या खैर नहीं उसकी। का-का नहीं कहते थे बच्चे की मतारी को रणधीर भैय्या &#8220;चुटकी&#8221; लेकर। लेकिन मजाल था की कोई पुरुष, यहाँ तक की उस मतारी के पति-भैंसुर-देवर-ससुर चूँ भी कर लें रणधीर भैय्या के सामने-पीछे। यह था अपनापन। ऐसा था स्नेह, प्रेम लोगों में।</p>
<p>रणधीर भैय्या से मेरा ताल्लुकात कुछ अलग था। बात सन 1971-72 की है। मैं पटना के टी के घोष अकादमी विद्यालय में पढ़ता था आठवीं-नवमीं कक्षा में। पटना कॉलेज के सामने वाली श्री ननकूजी वाली गली में ही रहता था। ननकू जी के होटल के ठीक ऊपर पीछे तरफ किराया के मकान में माँ-बाबूजी-भाई-बहन सबों के साथ। सुबह-सवेरे साइकिल से गांधी मैदान अखबार लेने जाता था जिसे गांधी मैदान से पटना लॉ कॉलेज से आगे रानीघाट तक बांटता था। घर वापस आने पर स्कूल और शाम में नोवेल्टी एंड कंपनी में लिफ्ट चलाना। अख़बार बेचने से, लिफ्ट पर काम करने से इतने पैसे हो जाते थे जिससे बड़े इत्मीनान से पढ़ाई करते थे, खाने-पीने में कोई दिक्कत नहीं होती थी किसी को।</p>
<p>रणधीर भैया से नित्य मुलाकात होती थी। कभी कालेज परिसर में, कभी सड़क पर, कभी नोवेल्टी में लिफ्ट पर। जब भी मिलते थे अपने हाथ से माथे के बाल को इधर-उधर कर देते थे। एक अद्भुत आशीष का अनुभव होता था। उन दिनों घर में पढ़ने अथवा सोने का पर्याप्त स्थान नहीं होने के कारण मोहल्ले के बच्चे पटना कालेज के अंग्रेजी विभाग के बरामदे या फिर उसी बरामदे के गंगा छोड़ वाले कोने पर, जहाँ महिला कॉमन रूप था, एक दरी-चादर बिछाकर रात में पढ़ते भी थे और लुढ़क भी जाते थे। रात में रणधीर भैय्या जब सैर करने निकलते थे, तब इस तरफ का भी चक्कर लगाते थे और हम बच्चों को देख लिया करते थे, कुछ पूछना होता था, तो बता भी देते थे।</p>
<p>इस बरामदे के अनन्त कहानियां हैं उनमें एक कहानी यह भी है कि इसी बरामदे के नीचे मुख्य मैदान का अशोकराज पथ छोड़ का कोना होता था, आज भी है जहाँ क्रिकेट मैच के दौरान स्कोर-बोर्ड हुआ करता था, सभी खिलाड़ी यही बैठते थे। वजह भी था गर्ल्स कॉमन रूम। उन्ही खिलाडियों में एक &#8220;सबा करीम&#8221; भी थे जो खजान्ची रोड में रहते थे और दोनों-भाई इस मैदान को जीवन में अन्तरण कर लिए थे। जिस दिन रणधीर भैया का भारतीय पुलिस सेवा में नौकरी हुई, पटना कॉलेज के गेट पर, ननकू जी के होटल के सामने, बनारसी पान दूकान के सामने, शांति कैफे के सामने फटाका छोड़ा गया था। नानकु जी के होटल में जलेबी और गुलाब जामुन हम बच्चों को मुफ्त में।</p>
<p>बहरहाल, सन 1988 में मैं धनबाद पहुंचा। उस समय धनबाद से प्रकाशित आवाज समूह के न्यू रिपब्लिक अखबार में आया। पटना में आर्यावर्त-इन्डियन नेशन समाचारपत्र को छोड़कर, शायद विधाता यही चाहता था। न्यू रिपब्लिक में कोई एक वर्ष काम किया था, तभी कलकत्ता से प्रकाशित दी टेलीग्राफ में दाना-पानी शुरू हो गया। धनबाद संवाददाता और साथ ही बिहार-बंगाल क्षेत्र की सीमावर्ती इलाकों में भी ढुकने की स्वतंत्रता थी &#8211; बस कहानी होनी चाहिए।</p>
<p>अब तक रणधीर प्रसाद वर्मा धनबाद के पुलिस अधीक्षक के पद पर विराजमान हो गए थे। अक्सरहां, छोटे-बड़े शहरों में किसी नए व्यक्ति के अभिवादन के लिए लोगों का तांता लग जाता है। यह तो धनबाद था और आये थे नए पुलिस अधीक्षक जो मिज़ाज से बड़े खतरनाक थे &#8211; यह बात स्थानीय लोगों की खोपड़ी में था।</p>
<p>उनके आये कोई दो महीना से अधिक हो गया था। मैं अब तक नहीं गया था। मैं जानता था की उन्हें खबर है कि मैं यहाँ हूँ। मैं उस समय हीरापुर मुख्य सड़क से उनके आवास की और जाने वाली सड़क (बिजली कार्यालय) पर उनके आवास से दो भवन पूर्व धनबाद के ही एक वरिष्ठ अधिकारी श्री सूर्यनारायण मिश्र के ऑउट-हॉउस में रहता था। यह ऑउट हॉउस गुल्लड़ पेड़ के नीचे था और सामने विशाल खुला क्षेत्र जिसमें हम सभी जबरदस्त गुलाब, गोभी, करैला, लौकी, भिंडी, आलू, प्याज, बथुआ साग, पालक साग, कद्दू, धनिया और न जाने कितनी सब्जियां &#8211; फूल लगाए थे। यह खेती उस रास्ते जाने वाले सबों को आकर्षित करता था, विशेषकर एस एस एल एन टी कालेज की सुन्दर-सुन्दर छात्राएं।</p>
<p>एक दिन मैं उस खेत में मिटटी खोद रहा था, पानी दे रहा था तभी एस पी साहेब की गाड़ी निकली। हम नजर उठाये ही थे की एस पी साहेब नजर &#8220;ढिशूम&#8221; से टकरायी । गाड़ी अपनी गति से निकल गयी और मैं सम्मानार्थ अपनी आखें नीचे किये खड़ा रहा। अभी कुछ मिनट ही हुए होंगे, एक सिपाही जी हाँफते-हाँफते आये और बोले &#8220;सर !! साहेब बुला रहे हैं।&#8221; मैं समझ गया &#8211; आज तो कितने रसीद कटेंगे क्योंकि मैं अभी तक गया ही नहीं था मिलने। उनके घर पहुंचा तो सामने सफ़ेद टी-शर्ट और हाफ़-पैंट में रणधीर भैय्या खड़े थे। देखते ही बोले: &#8220;आइये!! आपके स्वागत में खड़े हैं।&#8221; मैं डरते-डरते ऊपर चढ़ा, पैर छूकर प्रणाम किया। वे सभी गुस्सा भूल गए।</p>
<p>एक रात हम सभी पत्रकार बधुगण धनबाद रेलवे स्टेशन के सामने चाय की दूकान पर चाय पी रहे थे तभी कुछ महिलाएं सामने आयी। सभी परिचित थीं। छोटे शहर की यह सबसे बड़ी ताकत होती है, सभी एक-दूसरे को पहचानते हैं। ये महिलाएं &#8220;ताली बजाने वाली&#8221; &#8220;थर्ड जेण्डर&#8221; थीं। मैं बहुत ही शांति से कहा &#8220;छोटे साहेब पिता बने हैं&#8221; (छोटे साहेब यानि एस पी साहेब, बड़े साहेब यानि डिप्टी कमिश्नर साहेब) &#8211; साथ खड़े तत्कालीन सभी रिपोर्टर्स मेरी ओर टकटकी निगाह से देखने लगे। किससे झगड़ा (उस जमाने में पन्गा नहीं कहते थे) मोल ले लिया शिवनाथ !!!</p>
<p>दूसरे दिन सुवह-सुवह प्रचुर मात्रा में मोहतरमा लोग छोटे साहब के घर पहुँच गयीं। छोटे साहब अभी तक प्रातः व्यायाम से वापस नहीं आये थे। आते ही, जैसे ही उनकी जिप्सी लगी, सभी उछलने-कूदने लगीं, ताली बजाने लगीं, आशीष देने लगीं, स्वाभाविक भी है &#8211; साहब अभी अभी व्यायाम करके आये थे, गोरा-चिट्टा जवान, मांसपेशियां तनी हुई, किस महिला को अच्छा नहीं लगेगा। छोटे साहब को अब तक समझ नहीं आ रहा था &#8211; मामला क्या है ? फिर एक को बुलाये और पूछे। वह भी &#8220;विस्तार&#8221; से &#8220;व्याख्यान&#8221; दी &#8211; सिपाही जी दौड़ पड़े मेरे झोपड़ी के तरफ।</p>
<p>इस बार मैं पहले से ही तैयार था और अपना चेहरा नीचे किये, भयभीत दशा में पहुंचा। उस समय सरदार दरबारा सिंह (पंजाब के नेता मुख्य मंत्रीं) के पुत्र जो बैंकमोड़ स्थित स्काई लार्क होटल के मालिक भी थे, बैठ थे। मुझे देखते ही रणधीर भैय्या उठे और दाहिने हाथ से मेरे बाएं गाल पर एक थप्पड़ रसीद दिए। मैं चुपचाप चेहरा नीचे किये मुस्कुरा रहा था। बाहर &#8220;संभ्रांत महिलाएं&#8221; देखकर मुस्कुरा रही थीं। छोटे साहब तो गुस्सा में तमताये हुए थे, बोली भी नहीं निकल रहा था &#8211; लेकिन अन्दर से मोम थे। वे घर के अन्दर गए और फिर कुछ रुपये लाकर सम्मानित महिलाओं को दिए &#8211; साथ ही, अपने दोनों छोटे-छोटे बेटों दिखाकर कहते हैं : यही है मेरा बेटा, नया नहीं है, दस साल हो गया और आगे उम्मीद भी नहीं रखना।</p>
<p>अब तक गुस्सा रफुचक्कर हो गया था। मैं मन्द-मन्द मुस्कुरा रहा था। फिर मुझे बोले: तुम कहानी कैसे लिखते हो? भेजते हो?&#8221; मैंने कहा: पहले हाथ से लिखता हूँ घर पर या पोस्ट ऑफिस में, फिर टेलीप्रिंटर से भेजता हूँ। फिर पूछते हैं: टेलीप्रिंटर पर टाईप करते हो तो घर पर टाइप करो जैसे प्रेम कुमार (डॉ प्रेम कुमार उन दिनों पटना विश्वविद्यालय के वाणिज्य महाविद्यालय में अंग्रेजी के व्याख्याता थे और इण्डियन नेशन अखबार में स्पोर्ट्स समाचार लिखा करते थे) करते हैं। मैं सकुचाते हुए कहा: गोदरेज टाईप राईटर की कीमत 5600/- है, एक बार पूछा था बैंक मोड़ में। फिर कहते हैं, &#8220;अच्छा&#8221; जाओ, लेकिन आगे कभी गलत हरकत नहीं करना। मैं चुपचाप पीछे मुड़ &#8211; तेज चल; भाग हो गया।</p>
<p>उसी शाम कोई आठ बजे एक बड़ा सा डब्बा घर आया। डब्बे के ऊपर गोदरेज प्राईम लिखा था और टाईपराईटर की तस्वीर छपी थी। लाने वाला मुस्कुरा रहा था। वह वही सिपाहीजी थे जो दौड़-दौड़ कर बुलाने आते थे। वे हँस रहे थे और मैं अश्रुपात हो रहा था &#8211; वे इस भावनात्मक तार को शायद लपेटकर छोटे साहेब को बताये भी थे।</p>
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		<title>पटना कालेज @ 160 : जब बादशाह खान पटना कॉलेज मैदान में कहे थे &#8220;बुद्ध को मत भूलो&#8230;.गाँधी को मत भूलो&#8221;, साल 1969 था (11)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Apr 2022 05:35:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विदेश में बिहारी]]></category>
		<category><![CDATA[address]]></category>
		<category><![CDATA[badshah khan]]></category>
		<category><![CDATA[meeting]]></category>
		<category><![CDATA[pana college]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>शायद बहुत कम लोगों को याद होगा आज जब पटना कॉलेज के प्रशासनिक भवन के ठीक सामने से जाती हुई सड़क, जब वाणिज्य महाविद्यालय के रास्ते गंगा की ओर मुड़ती है, कॉलेज के मुख्य मैदान के दाहिने कोने पर स्थित मिट्टी और बालू की उस विशाल ढ़ेर के बगल में बने मंच से खान अब्दुल [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/when-badshah-khan-said-in-patna-college-ground-dont-forget-buddha-dont-forget-gandhi">पटना कालेज @ 160 : जब बादशाह खान पटना कॉलेज मैदान में कहे थे &#8220;बुद्ध को मत भूलो&#8230;.गाँधी को मत भूलो&#8221;, साल 1969 था (11)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>शायद बहुत कम लोगों को याद होगा आज जब पटना कॉलेज के प्रशासनिक भवन के ठीक सामने से जाती हुई सड़क, जब वाणिज्य महाविद्यालय के रास्ते गंगा की ओर मुड़ती है, कॉलेज के मुख्य मैदान के दाहिने कोने पर स्थित मिट्टी और बालू की उस विशाल ढ़ेर के बगल में बने मंच से खान अब्दुल गफ्फार खान यानी सीमांत गाँधी यानी फ्रोंटियर गांधी यानी बादशाह खान तत्कालीन युवाओं को, छात्रों को, छात्राओं को, शिक्षकों को, शिक्षार्थियों को, गरीबों को, धनाढ्यों को यानी पटना कॉलेज के प्रशासनिक भवन वाले छोड़ पर गंगा पार सिद्धार्थ और महावीर के जन्मस्थली से आने वाली हवाओं के बीच खड़े होकर मंच से सम्बोधित कर रहे थे : बुद्ध को मत भूलो&#8230;.गाँधी को मत भूलो। साल था सन 1969 । </strong></p>
<p>पटना कालेज के आज के शिक्षक, छात्र-छात्राएं, शिक्षकेत्तर कर्मचारी भले इस बात से अनभिज्ञ हों, लेकिन पटना कालेज का प्रशासनिक भवन वाला यह मैदान और इस मैदान का दाहिना किनारा, वहां की मिट्टी, वहां के ईंट-पथ्थर, वहां की हवाएं आज भी इस बात का गवाही देते हैं कि इसी स्थान पर कोई पौने-सात फीट लम्बा एक सामाजिक प्रवर्तक आया था । अपने प्रवास के दौरान सीमांत गांधी रो-रो कर, बिलख-बिलखकर, अवरुद्ध कंठ से  बार-बार यह बात दोहराते रहे, कहते रहे: आज़ाद भारत के लोग &#8220;गौतम बुद्ध&#8221; को भी भूल गए और &#8220;महात्मा गाँधी&#8221; को भी याद नहीं रख पाए। जबकि बिहार में ही मोहन दास करमचंद गांधी &#8216;महात्मा गांधी&#8217; बने और नेपाल की तराई में स्थित लुम्बिनी में जन्म लिए &#8216;सिद्धार्थ&#8217; को बिहार में ही &#8216;बोधित्व&#8217; प्राप्त हुआ और वे &#8220;गौतम बुद्ध&#8221; बने।<br />
हमारी पीढ़ी के लोग महात्मा गाँधी को नहीं देखा होगा, यह पक्का है। लेकिन &#8216;सीमांत गांधी&#8217; को भी शायद बहुत कम लोग &#8216;साक्षात्&#8217; देखे होंगे। उन्हें स्पर्श किये होंगे। उनकी बातों को सुने होंगे और आज तक याद भी रहे होंगे, भले समय अपनी गति से 53 वर्ष निकल गया हो। मैं बहुत भाग्यशाली हूँ। </p>
<p>हमारे लिए दस वर्ष की आयु में, पटना के एक ऐतिहासिक विद्यालय &#8211; टी के घोष अकादमी &#8211; के छात्र के रूप में सीमांत गांधी के लिए बनाए जाने वाले मंच के लिए &#8216;बांस&#8217; के टुकड़ों को दो-तीन मित्रों के साथ खींच-खींच कर लाना, रस्सी कम हो जाने पर एनी बेसेंट रोड स्थित श्री बद्री साहू की दूकान से दौड़कर लाना, पीने का पानी दौड़कर या तो इक़बाल हॉस्टल के फुलबारी में लगे नल से या फिर प्रशासनिक भवन के सामने वाले फुलबारी में लगे नल से लाना, मनोविज्ञान के प्राध्यापक प्रोफ़ेसर शमशाद हुसैन के आदेश पर गरमा-गरम सिंघारा, पूड़ी-कचौड़ी और जलेबी लाना, पटना कॉलेज के तत्कालीन चतुर्थ-वर्गीय कर्मचारी श्री रामाशीष जी और श्री भोलाजी (माली) का प्रिय-पात्र होना  &#8211; एक इतिहास के पन्ने पर हस्ताक्षर करने से कम नहीं था।</p>
<p>क्योंकि अगर वैसा नहीं होता तो आज पांच दशक के बाद भी वो सभी बातें इस कदर याद नहीं आते और पटना कॉलेज के 160 वे वर्ष पर अपने महाविद्यालय के सम्मानार्थ, वहां की मिट्टी के सम्मानार्थ, तत्कालीन शिक्षकों के सम्मानार्थ या फिर व सभी जिन्होंने हमारे जीवन-निर्माण में गिलहरी की तरह ही सही, अपनी-अपनी भूमिका निभाए थे, उनके सम्मानार्थ आज ये शब्द नहीं दोहराता, नहीं लिखता। यह भाग्य और प्रारब्ध की ही तो बात है। </p>
<p>संभव है आज भी पटना कॉलेज के अनन्य छात्र-छात्राएं-शिक्षक भारत देश के विभिन्न स्थानों पर अपना-अपना जीविकोपार्जन कर जीवित होंगे, लेकिन सन 1969 में सीमांत गांधी का पटना कॉलेज में पदार्पण शायद भूल गए होंगे। या फिर उसे याद रखना उनके लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं रहा होगा। </p>
<p>लेकिन आज 53-वर्ष बाद भी बिहार के एक शिक्षक को, एक सामाजिक प्रवर्तक को, हिंदी-उर्दू साहित्य के दर्जनों किताबों के लेखक, विधानसभा पत्रिका &#8216;साक्ष्य&#8217; के संपादक, &#8216;दोआबा&#8217; पत्रिका के संपादक, उर्दू कथा डायरी &#8216;रेत पर खेमा&#8217; के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से अलंकृत, &#8216;छोटा सा एक पुल&#8217;, &#8216;पहाड़ मेरे सखा है&#8217;, &#8216;रेत से आगे&#8217;, &#8216;चाक पर रेत&#8217;, &#8216;जिन्दा होने का सबूत&#8217;, अतीत का चेहरा&#8217; जैसे दर्जनों रचनाओं के हस्ताक्षर, महान राजनीतिज्ञ, विधान सभा के पूर्व अध्यक्ष श्री जाबिर हुसैन साहेब को जब कल फोन किया और पूछा कि &#8220;सर&#8230;. शिवनाथ झा बोल रहा हूँ&#8230; पटना कॉलेज में श्रद्धेय सीमांत गांधी किस वर्ष आये थे? सभी बातें याद है लेकिन साल याद नहीं आ रहा है&#8230;&#8221; सम्मानित जाबिर हुसैन साहब, इससे पहले कि मैं अगली सांस लूँ, कहते हैं &#8220;1969&#8221; &#8211; मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। </p>
<p>और फिर याद आ गया &#8220;वह दो चवन्नी&#8221; जो मंच के पास दूसरे दिन मिला था जब हम सभी छोटे-छोटे बच्चे फिर बांस के टुकड़ों को खींच-खींचकर एक जगह एकत्रित कर रहे थे। दरियों को खींच-खिंच कर मोड़ रहे थे ताकि उसे फिर सामने व्यायामशाला-सह-परीक्षा कक्ष में रखा जा सके। जिस समय &#8216;दो चवन्नी&#8217; मिला था, पटना कॉलेज के एक मित्र &#8216;गिरीश&#8217; जो हमारे साथ स्कूल में पढता भी था और जिसके पिता पटना कॉलेज के चतुर्थ-वर्गीय कर्मचारी भी थे, बहुत खुश हुआ था। उन दिनों पटना कॉलेज के सामने ननकू जी के होटल में पांच पैसे में सिघाड़ा (समोसा) और बारह पैसे में काला-काला बड़ा-बड़ा गुलाब जामुन मिलता था। </p>
<p>पूर्णिया (गढ़बनैली) के रास्ते गाँव (दरभंगा) से मगध की राजधानी पटना कुछ वर्ष पहले ही आया था। बाबूजी पटना के एक मशहूर प्रकाशक और पुस्तक विक्रेता नोवेल्टी एंड कंपनी में एक मामूली कर्मी के रूप में काम करते थे। आखिर खुद सांस लेने के लिए और बाल-बच्चों के परवरिश के लिए काम तो करना ही पड़ेगा &#8211; चाहे आपकी योग्यता के अनुसार हो अथवा नहीं। नोवेल्टी के मालिक बाबूजी का बहुत सम्मान करते थे उनके व्यवहार और योग्यता को मद्दे नजर रखकर। बाबूजी संस्कृत के विद्वान थे, लेकिन जो कार्य करते थे, उसका संस्कृत से कोई लेना-देना नहीं था। खैर। </p>
<p>लोग आज भले ही &#8216;हिंदी&#8217; और &#8216;संस्कृत&#8217; की उन्नत्ति के लिए विभिन्न प्रकार के नारे लगाएं, चाहे सरकारी-स्तर पर हो या गैर-सरकारी-स्तर पर; लेकिन सच तो यही है कि आज जब सम्पूर्ण देश हिंदुस्तान की आज़ादी के 75 वर्ष पर आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, हमारी अपनी भाषा, हिंदी भाषा, अभी तक &#8216;राष्ट्रभाषा&#8217; नहीं बन पाई। राष्ट्र उसे सम्मान नहीं दे सका, जिसका वह &#8216;हकदार&#8217; है। देश हिंदी को अपना नहीं बना सका। साल के 365 दिनों में 15 दिन &#8216;पखबाड़े&#8217; के रूप में हिंदी को समर्पित करता है। अब जब देश के लोग 365 दिनों में 350 दिन &#8216;इंग्लिश&#8217;, &#8216;हिंगलिश&#8217; और लठमार भाषाओँ का प्रयोग कर अपनी बातों का आदान-प्रदान करते हैं, तो बेचारी हिंदी पंद्रह दिनों में क्या कर लेगी ?</p>
<p>पढ़े-लिखे विद्वान-विदुषियों की बात करने की क्षमता मुझमें नहीं है, लेकिन आज भी अंग्रेजी हुकूमत के दौरान बनाये गए नियम, कानून चल रहे हैं। हिंदी को आज भी वह स्थान नहीं मिला पाया, जो मिलना चाहिए था। बड़े-बड़े विद्वानों-विदुषियों, समाज के संभ्रांतों के बीच जैसे ही हम हिंदी में बोलना शुरू करते हैं, सामने वाले अपनी कान और नाक की खुदाई करने लगते हैं। कहते हैं समाज के उन संभ्रांतों के सामने जब तक &#8216;कमर नहीं हिले&#8217;, &#8216;कंधे पर बेवजह लकवा नहीं मारे &#8211; हिलता-डुलता नहीं रहे&#8217;, &#8216;बेवजह हाथ दंड-बैठकी नहीं करे&#8217;, बात-बात में &#8216;सीट-सीट&#8217; नहीं बोले  &#8211; समझ लें हम संभ्रांतों के समूह में रहने लायक नहीं हैं, चाहे संभ्रांतों में महिलाएं हों या पुरुष। &#8216;तीसरे तबके&#8217; के लोगों को तो समाज अभी तक हृदय से लगाया ही नहीं है। खैर। </p>
<p>कारण यह भी है कि जिला में जिलाधिकारी राज करते हैं, पुलिस अधीक्षक शासन करते हैं। प्रदेश से लेकर सम्पूर्ण देश में, यानी पटना के अशोक राज पथ से दिल्ली के राजपथ तक नौकरशाहों का साम्राज्य है जो भारतीय आवाम द्वारा &#8216;चयनित&#8217; 4121 विधान सभा और 426 विधान परिषदों के विधायकों, 245 राज्यसभा और 545 लोकसभा के सांसदों और विभिन्न मंत्रालयों के मंत्रियों और राष्ट्राध्यक्षों के द्वारा &#8216;निष्पादित&#8221; किये जाने  वाले कार्यों में &#8216;अंग्रेजी शब्दों के विन्यास के सामने बेचारी हिंदी जो वैशाख और जेठ महीने में भी पूस और माघ महीने जैसी ठिठुरती ही नजर आती है। खैर। </p>
<p>उस दिन पटना कॉलेज के इस ऐतिहासिक मैदान में सीमांत गांधी और उनके साथ जितने भी लोग थे, अंग्रेजी शब्दों को अपने जिह्वा पर नहीं आने दिया। आखिर अंग्रेजों को भारत से भगाए तो महज 22 साल ही हुए थे और इन 22 सालों में जो 15 अगस्त, 1947 की रात को जन्म लिए थे, उनकी मूंछों की रखाएँ स्वतः खींचनी शुरू हो गई थी और अनवरत बढ़ रही थी। उस युग में &#8216;फ़ास्ट-फ़ूड&#8217; का भारतीय चौहद्दी में नामोनिशान नहीं था, इसलिए युवाओं और युवतियों में &#8216;यावनारम्भ&#8217; भी देर से दस्तक देता था।</p>
<p>सीमांत गांधी को मुंगेर के आर डी एंड डी जे कॉलेज में भाषण देना था। वे एक पोटली हाथ में लिए दिल्ली हवाई अड्डा पर उतरे थे फिर वहां से पटना के लिए रवाना हुए। दिल्ली हवाई अड्डे पर अन्य गणमान्यों के अलावे श्रीमती इंदिरा गांधी स्वयं उनकी आगुआई में कड़ी थी। आखिर श्रीमती गांधी अपना बचपन भी तो उनके सानिग्ध में बिताई थी। सीमांत गांधी दिल्ली से पटना आये।</p>
<p>पटना कॉलेज में तत्कालीन छात्र-छात्राओं को, समाज के लोगों को संबोधित किये। फिर यहाँ से मुंगेर। उन दिनों बिहार के कई जिलों में छोटी-मोटी साम्प्रदायिक दंगे हो रहे थे। अपने संबोधन में बार-बार अवरुद्ध कंठ से सीमांत गांधी कहते रहे: &#8220;हम बुद्ध को भी भूल गए और गांधी को भी याद नहीं रख सके।&#8221; उनका सीधा निशाना था &#8220;देश में अमन शांति हो, चैन हो। सबों में भाईचारा हो।&#8221; सम्मानित जाबिर हुसैन साहब सीमांत गांधी के लिए गठित स्वागत समिति का नेतृत्व कर रहे थे। कहते हैं जिस दिन सीमांत गांधी मुंगेर के  आर डी एंड डी जे कॉलेज में अपनी उपस्थिति दर्ज किये थे, वह कालेज अपने छः दशक पुराना अस्तित्व से प्रसन्नचित था। आज वह कॉलेज कोई 120 वर्ष पुराना हो गया है। </p>
<p>हम अपने माता-पिता के साथ उन दिनों पटना कॉलेज के सामने ननकू जी के होटल वाली गली के नुक्कड़ वाले मकान में रहते थे। वह मकान आज तो नहीं है, अब वहां चार-मंजिला भवन बन गया है, लेकिन गली की नुक्कड़ आज भी अपने स्थानसे पटना कालेज के मैदान का वह कोना देखता है और इतिहास के पन्नों में सिमटे, परत-दर-परत धूल जमी बातों को याद कर कभी प्रसन्न होता है तो कभी अश्रुपूरित। </p>
<p>गली के नुक्कड़ का वह ईंट आज भी सीमांत गांधी की उस बात को सुनकर अश्रुपूरित हो जाता है जब पटना कॉलेज के दर्जनों पीपल, बरगद, अशोक, आम के पेड़ों पर बंधे &#8216;लाउडस्पीकर से आवाज गूंज रही थी : &#8220;आज़ाद भारत के लोग &#8220;गौतम बुद्ध&#8221; को भी भूल गए और &#8220;महात्मा गाँधी&#8221; को भी याद नहीं रख पाए। जबकि बिहार में ही मोहन दास करमचंद गांधी &#8216;महात्मा गांधी&#8217; बने और नेपाल की तराई में स्थित लुम्बिनी में जन्म लिए &#8216;सिद्धार्थ&#8217; को बिहार में ही &#8216;बोधित्व&#8217; प्राप्त हुआ और वे &#8220;गौतम बुद्ध&#8221; बने।&#8221; उपस्थित हज़ारों हज़ार लोगों में किसी न ताली नहीं ठोका। सबों की नजर जमीन में गरी थी। कहते हैं जब शर्म उत्कर्ष पर होती है तो नजर जमीन के अंदर धंस जाती है। </p>
<p>लेकिन सन 1969 के ठीक दस वर्ष बाद 1979 में पटना कॉलेज के स्थान पर पटना के बांस घाट का दृश्य बहुत ही अमानवीय था। गंगा के किनारे बांस घाट (राजेंद्र प्रसाद घाट) पर लाखों लोगों का सैलाब था। पटना के छुटभैये नेताओं से लेकर दिल्ली और विदेशों के नेताओं और के सामने जब लोक नायक जयप्रकाश नारायण के पार्थिव शरीर को मुखाग्नि दिया जा रहा था, कोई सम्मानित महानुभाव अपने तलहत्थी पर तम्बाकू ठोक दिए। आखिर पटना के लोग थे। ज्ञानी-महात्मा-विद्वता तो पराकाष्ठा पर थी ही। बगल में खड़े सम्मानित महानुभाव भी तलहथ्थी ठोके। </p>
<p>लोग बाग़ समझे &#8220;ताली बजी&#8221; और फिर गंगा के इस पार से गंगा के उस पार तक तालियों की गरगराहट &#8211; श्रीमती इंदिरा गाँधी अपने दोनों हाथों को अपने कपार पर रखकर शर्म से जमीन के अंदर समां रही थी। चिल्ला-चिल्लाकर कह रही थी &#8211; शर्म करो, यह समय ताली बजाने का नहीं है। लेकिन कौन सुनता है। देश की राजनितिक आज़ादी मिले 32 साल हो गए थे। कहीं मूछें घनघोर हो रही थी, तो कहीं मूंछें कट रही थी &#8211; कहते सुनते थे फैशन बदल रहा है। खैर। </p>
<p>साठ के दशक से लेकर जय प्रकाश नारायण की &#8216;सम्पूर्ण क्रांति&#8217; तक पटना कॉलेज परिसर में सामने की गलियों में रहने वाले हम बच्चों की उपस्थिति, सहयोग के बिना संभव ही नहीं था। उन दिनों के छात्र, चाहे हॉस्टल में रहते हों यह अपने-अपने घरों से कॉलेज आते थे, मोहल्ले के बच्चों की टोली से गर्दन भर परिचित होते थे। आज समय और परिवेश के साथ-साथ कालेज की हवाएं भी बदल गई है, बदलना भी स्वाभाविक है। बादशाह खान 20 जनवरी 1988 को अंतिम सांस लिए। पटना कॉलेज की मिट्टी और उस दस वर्षीय बच्चा का नमन स्वीकार करें बादशाह खान साहब</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/when-badshah-khan-said-in-patna-college-ground-dont-forget-buddha-dont-forget-gandhi">पटना कालेज @ 160 : जब बादशाह खान पटना कॉलेज मैदान में कहे थे &#8220;बुद्ध को मत भूलो&#8230;.गाँधी को मत भूलो&#8221;, साल 1969 था (11)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>पटना कालेज @ 160 : पटना विश्वविद्यालय के दो समाजशास्त्री जिन्होंने समाज शास्त्र को पुनः परिभाषित किये (10)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/two-sociologists-of-patna-university-who-redefined-sociology</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Apr 2022 05:26:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विदेश में बिहारी]]></category>
		<category><![CDATA[bindeshwar]]></category>
		<category><![CDATA[hetukar]]></category>
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		<category><![CDATA[pana college]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना विश्वविद्यालय के दो महान समाजशास्त्री जिन्होंने समाज शास्त्र को पुनः परिभाषित किये सामाजिक सरोकार के मद्दे नजर &#8211; डॉ हेतुकर झा अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी कृतियां आज भी अमर है &#8211; सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक और पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के मेधावी समाजशास्त्री डॉ बिंदेश्वर पाठक को [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>पटना विश्वविद्यालय के दो महान समाजशास्त्री जिन्होंने समाज शास्त्र को पुनः परिभाषित किये सामाजिक सरोकार के मद्दे नजर &#8211; डॉ हेतुकर झा अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी कृतियां आज भी अमर है &#8211; सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संस्थापक और पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के मेधावी समाजशास्त्री डॉ बिंदेश्वर पाठक को 80वें जन्मदिन पर भारतीय समाज की ओर से शुभकामनाएं ।</p>
<p>माँ कहती थी &#8216;जब मनुष्य के शरीर की हड्डी से मांस लटकने लगे, त्वचाओं में झुर्रियां और शिराएं दिखने लगे, तो यह मत समझना कि वह मनुष्य वृद्ध हो गया है । यह सोचकर समझने के कोशिश करना कि वह अपने जीवन के कितने वसंतों की पीड़ाओं को सहकर, स्वयं को उस मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक, शैक्षिक और मानवीय उत्कर्ष पर पहुंचा पाया है, जहाँ समाज के बिरले लोग पहुंच पाते हैं। उसके शरीर के एक-एक नश, एक-एक शिराएं, त्वचा की झुर्रियां जीवन-पर्यन्त उसका चश्मदीद गवाह होता है।</p>
<p>माँ यह भी कहती थी तुम्हें तुम्हारे जीवन काल में समाज में वैसे जीतने भी जीवित प्राणी दिखें, उन्हें अन्तः मन से सम्मान करना क्योंकि वैसे मनुष्यों की माताएं &#8216;अशिक्षित&#8217;, &#8216;अनपढ़&#8217;, &#8216;निरक्षर&#8217; ही मिलेंगी, मेरी तरह। वे सभी माताएं अपने बच्चों को शिक्षा के उत्कर्ष पर देखने के लिए खुद अशिक्षित रहना श्रेयस्कर समझीं। वे अपनी भाषाओँ को छोड़कर, किसी भी अन्य भाषाओँ को नहीं जानती हैं; नहीं पहचानती, नहीं पढ़ पाती। लेकिन अपने बच्चों के होठों की गतियों को, शारीरिक हलचलों को पढ़ना जानती हैं और समझ जाती हैं की आखिर उनका संतान क्या चाहता है। आने वाले समय में ऐसे मनुष्यों की किल्लत होगी। समाज में दृष्टान्त देना तो मुश्किल होगा ही।</p>
<p>बहरहाल, यह तस्वीर माँ की समस्त बातों को समेटे हुए है। ये दो महामानव पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के हस्ताक्षर हैं। उच्चतर शिक्षा के प्रारंभिक वर्षों में दोनों सहपाठी थे, मित्र थे। एक ही कक्षा में पढ़ते थे स्नातक तक । लेकिन समय के आगे किसका चला है। समाज को बेहतर बनाने हेतु समय दोनों को दो धाराओं की ओर उन्मुख किया और समयांतराल जो सम्मान कर रहे हैं (सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन के संथापक डॉ बिंदेश्वर पाठक), वे छात्र हो गए और जो सम्मानित हो रहे हैं (डॉ हेतुकर झा) वे शिक्षक ।</p>
<p>पाटलिपुत्र के गंगा तट पर स्थित वाणिज्य महाविद्यालय के द्वितीय तल्ले में पटना विश्वविद्यालय का समाजशास्त्र विभाग, उसके दीवारें, ईंट-पत्थर, ब्लेक-बोर्ड, कक्षाओं की कुर्सी-टेबल सभी इनकी अद्वितीय मित्रता, एक दूसरे के प्रति सम्मान, आदर, विश्वास का चश्मदीद गवाह है। जीवन में उस अद्भुत मित्रता की डोर न कभी कमजोर हुई और न ही टूटी। जब तक शिक्षक महोदय अपनी जीवन की अंतिम सांस लेकर इस लोक से अपनी अनंत यात्रा पर निकले, मित्र हताश अवश्य हुए, आज भी हैं, लेकिन प्रकृति और प्रारब्ध के नियमों के किसका चला है यह तस्वीर महज एक तस्वीर नहीं है, बल्कि माँ की बातों का शायद &#8216;अंतिम दृष्टान्त&#8217; भी है हमारे समाज में। डॉ पाठक विगत 2 अप्रैल को अपना 80 जन्मोत्सव मनाए हैं। हम सभी कामना करते हैं कि वे स्वस्थ रहें, मुस्कुराते रहे, सुलभ के आगंतुकों को कहते हैं &#8220;मुस्कुराइए &#8230; आप सुलभ में हैं।&#8221;</p>
<p>विगत सप्ताह कबीर खान द्वारा निर्देशित और रणवीर सिंह, दीपिका पादुकोण, पंकज त्रिपाठी, बोमन ईरानी, ताहिर राज भसीन, जीवा, साकिब सलीम, जतिन सरना जैसे कलाकारों द्वारा अभिनीत &#8220;फिल्म 83&#8221; देखा। इस फिल्म को देखकर मैं अश्रुपूरित था। कपिल देव की गेंद मुझे अपने जीवन के चालीस वर्ष पीछे लेकर चला गया। वह दिन एक तरह से मेरे जीवन का मार्मिक दिन अवश्य था, लेकिन &#8216;सकारात्मक&#8217; समय की शुरुआत के लिए &#8211; कपिल देव की तरह।</p>
<p>सन 1983 के जून महीने में 9 जून से 25 जून तक इंग्लैंड और वेल्स में वर्ल्ड कप के लिए मैच हो रहा था। सेमी फ़ाइनल में इंग्लैंड, पाकिस्तान, वेस्ट इंडीज और भारत आया था और 25 जून को लॉर्ड्स में भारत और वेस्ट इंडीज के बीच फ़ाइनल मैच खेले जाने वाला था। उन दिनों मैं पटना से प्रकाशित आर्यावर्त-इण्डियन नेशन अखबार में कार्य करता था। इण्डियन नेशन के सम्पादकीय विभाग में उप-संपादक के रूप में कार्यरत था। दफ्तर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी थी। कर्मचारियों को वेतन हेतु कैशियर के काउंटर पर पहुंचे महीनों बीत गए थे। कई लोगों के घरों में चूल्हे की आंच धीमी हो गयी थी। कई कर्मचारियों की बेटियों का विवाह तय होने के बाद भी, टूट गया था। बच्चों के विद्यालयों में शुल्क शैक्षिक-शुल्क की राशि भी उत्तरोत्तर बढ़ रही थी। पटना की सड़कों पर तापमान एक ओर जहाँ आसमान छू रहा था, हमारे दफ्तर में सामान्य कर्मचारियों का जीवन जमीन के अंदर दबा जा रहा था।</p>
<p>उन दिनों हमारे दफ्तर में थे सुधाकर भाई (सुधाकर झा) जो संवाददाता तो थे ही, खेल-कूद, विशेषकर क्रिकेट में उन्हें बहुत अभिरुचि थी। उन दिनों अख़बारों में इलस्ट्रेशन दिल्ली से &#8216;केबीके&#8217; का छपता था जो डाक से आने के कारण औसतन तीन दिन बाद आता था। उस दिन बृहस्पतिवार था और तारीख 23 जून। मैं 9 जून से उस तारीख तक वर्ल्ड कप में खेले गए सभी देशों की अंक-तालिका बना लिया था। मेरी इक्षा थी की जब फ़ाइनल मैच हो, उस दिन उस तालिका को प्रकाशित करेंगे &#8216;केबीके&#8217; के आने से पहले। फ़ाइनल मैच में विजय देश का स्थान छोड़कर, एक बेहतरीन अंक तालिका बनाया। यह सोच लिया था जैसे ही खेल ख़त्म होगा, विजय देश का नाम लिखकर अंक तालिका का ब्लॉक बनाकर प्रकाशित करेंगे।</p>
<p>इस पूरे कार्य में सुधाकर भाई का पूरा सहयोग था। उन दिनों पटना के दो-पहिये वाहन जैसे स्कूटर, मोटर साईकिल आदि के अगले और पिछले हिस्से पर नंबर लिखा होना &#8216;बाध्यकारी&#8217; हो गया था। ट्रैफिक डीएसपी थे बनबारी बाबू। एक बेहतरीन इंसान, लेकिन अनुशाषित। मैं 10 रुपये में अनंत लोगों की गाड़ियों पर नंबर लिखा। पैसे आने से घर में चूल्हे जलने में मदद मिलता था। सुधाकर भाई हमेशा हमारे कार्य में पीछे खड़े होते थे। जब तालिका बना लिया तब सोचा कि अगर कोई इसे &#8216;स्पॉन्सर&#8217; कर दे तो &#8216;दो पैसे की आमदनी&#8217; मुझे भी हो जाएगी और संस्थान को तो होगी ही। मैं तत्कालीन विज्ञापन व्यवस्थापक और मुद्रक तथा प्रकाशक गिरीन्द्र मोहन भट्ट (अब दिवंगत) के पास पहुंचा। तालिका दिखाया और मार्गदर्शन के लिए याचना किया। भट्ट जी मेरी आंखों में मेरी भावना को पढ़ लिए। आखिर वे भी तो एक पिता थे और भूख से होने वाली पेट-पीड़ा से वे भी अवगत थे। उन्होंने एक रास्ता बताया &#8211; &#8216;आप सुलभ शौचालय के बिंदेश्वर पाठक जी के पास चले जाएँ, उन्हें दिखाएँ और कहें की भट्ट जी भेजे हैं।&#8217; उन दिनों सुलभ &#8216;शौचालय&#8217; ही था।</p>
<p>23 जून। वर्ल्ड कप फ़ाइनल से 48 घंटा पूर्व। पटना की सड़कों पर तापमान कोई 48+ डिग्री। और मैं उन्मुख था पाटलिपुत्र कॉलोनी स्थित बिंदेश्वर पाठक के आवास की ओर। सड़कों पर मुझ जैसे &#8216;अभागा&#8217; ही चलते-फिरते दिख रहा था। कहीं कोई रिक्शावाला, तो कहीं ठेला पर सामन लिए मजदूर। बीच-बीच में अपने चेहरे को छुपाए स्कूटर, मोटर साईकिल पर लोग दिख रहे थे। सूर्यदेव सर के कुछ डिग्री पश्चिम गाल को सेक रहे थे। माँ-बाबूजी कहते थे: &#8220;समय परीक्षा की घोषणा नहीं करता। वह जीवन में कभी भी समय परीक्षा ले सकता है। इसलिए हमेशा सज्ज रहना।&#8221; माँ-बाबूजी की बातें हमारे लिए &#8216;ब्रह्मवाक्य&#8217; था और हम भी सज्ज थे। मन में कई तरह की बातें आ रही थी लेकिन साईकिल अपनी दिशा की ओर उन्मुख थी।</p>
<p>पाटलिपुत्र कालोनी में प्रवेश के बाद सड़क की बायीं ओर एक छोटे-मैदान के पास बिंदेश्वर पाठक का घर था। बाहर एक पेड़ में साईकिल को सिक्कड़ से बांधकर, चेहरे को पोछते, हनुमान चालीसा पढ़ते मैं दरवाजे पर दस्तक दिया। प्रवेश द्वार के दाहिने कोने पर स्थित &#8216;कॉल-बेल&#8217; को दबाया &#8211; ट्रिंग &#8211; ट्रिंग। कुछ ही क्षण में दरवाजा खुला। दरवाजा खुलते ही अंदर से आलू-परवल की सब्जी, बासमती चावल, अरहर दाल और अन्य भोज्य पदार्थों का सुगंध एक ही बार नाक के रास्ते मस्तिष्क तक पहुंचा। माँ कहती थी &#8216;चाहे तुम कितना भी भूखा रहो, चेहरे पर शिकन नहीं आने देना।&#8217;</p>
<p>सामने एक सज्जन आये और उनके पीछे घर के अंदर डाइनिंग टेबल के पास हाथ पोछते बिंदेश्वर पाठक साहब दिखे। मैं सज्जन को कहा कि &#8216;मैं शिवनाथ हूँ और भट्ट जी भेजे हैं।&#8217; पाठक जी तक्षण बाहर निकले और अंदर आने को कहा। मैं कोने पर ही खड़े-खड़े उन्हें पूरी बातें बताया, तालिका दिखाया और कहा कि &#8216;परसो विश्व कप का फ़ाइनल मैच है। यह तालिका उसी से सम्बंधित है। जो जीतेगा उसका नाम लिखकर, ब्लॉक बनाकर इसे दोनों अखबार में प्रकाशित करेंगे।&#8217;</p>
<p>पाठक जी आर्यावर्त-इण्डियन नेशन संस्थान की स्थिति से अवगत थे। वे वहां के कर्मचारियों की स्थिति को भली-भांति जानते थे। मेरी भावना और उस गर्मी में सड़क नापने का उद्देश्य वे जानते थे। आखिर वे भी वे पिता थे। पाठक जी फिर पूछते हैं: &#8220;कौन जीतेगा?&#8221; मैं सहज शब्दों में कहा: कपिल देव। मेरे तालिका के पीछे उन्होंने हस्ताक्षर कर दिए और कहे कि भट्ट जी को कहियेगा कि बिल दफ्तर में भेज देंगे।&#8217; फिर अपने कुर्ता के जेब में हाथ दिए और जो भी द्रव्य था (1600/- रुपये) वे मेरे हाथ में रखते कहते हैं: &#8216;यह आपकी मेहनत और सोचने की अलग दृष्टि का पुरस्कार है।&#8221; मैं भी उसे अपनी जेब में रखा लिया और उन्हें धन्यवाद देते, प्रणाम करते विदा लिया। बाहर आते ही जब सूर्यदेव पर नजर गयी तो ऐसा लगा कि सूर्यदेव मुस्कुरा रहे हैं। शायद उनकी नजर में मैं उत्तीर्ण था। मैं साईकिल का पैडल मारते सीधा अपने घर की ओर उन्मुख हो गया।</p>
<p>उन दिनों मैं पटना के भीखना पहाड़ी मोहल्ला के सैदपुर छात्रावास के सामने रहता था। सामने एक स्कूल और स्कुल परिसर में एक विशाल पीपल का बृक्ष और उस बृक्ष के नीचे हनुमान की प्रतिमा। सूर्यदेव अस्ताचल की ओर उन्मुख थे। तेज और तप दोनों कम हो गया था। माँ बीच वाले कमरे के दरवाजे का ओट लिए बैठी थी। दरवाजा खुला था। सूर्य की किरणें उसके चेहरे के साथ क्रीड़ा कर रही थी। पीपल के पेड़ के पत्तों के बीच से सूर्य की किरणें कभी-कभी छनकर आती थी। माँ मेरी साईकिल की घंटी से अवगत थी। उसे चिंता थी कि मुझे दफ्तर जाने का समय हो रहा है और मैं अब तक वापस नहीं आया हूँ। तभी साईकिल की ट्रिंग-ट्रिंग घंटी बजी। गली के नुक्कड़ से दरवाजे की दूरी महज 20 कदम था। माँ मेरे चेहरे को पढ़ ली। &#8216;नाउम्मीद&#8217; मन आकाशमात उम्मीदों से भर गया। माँ समझ गई &#8211; कुछ अच्छा हुआ है। मैं साइकिल लगाकर माँ के हाथों में 1600/- रुपये रखा। अपनी आँचल की खूंट से अपनी आंखों को पोछते वे कहती हैं: &#8220;जुग-जुग जीबैथ बिंदेश्वर बाबू।&#8221; उस द्रव्य से कोई तीन महीने हम सभी &#8216;भर-पेट खाना खाये।</p>
<p>उस घटना के कोई तीन दशक बाद जब भारत के पूर्व कप्तान और विश्व कप &#8211; 1983 के विजेता कपिल देव से नोयडा स्थित उनके नवनिर्मित गगनचुम्बी अट्टालिका में भारतीय स्वाधीनता संग्राम के गुमनाम क्रांतिकारियों का वीर-गति प्राप्त सेनानियों के आज के वंशजों की खोज से संबंधित प्रयास को लेकर मिला और उन्हें पटना की उस घटना को बताया, बिंदेश्वर पाठक जी के बारे में बताया। मेरी बातों को वे बहुत धैर्य के साथ सुने। वे निःशब्द थे। लगता था वे मेरी भावना को पढ़ रहे हैं। उन दिनों मैं ऑस्ट्रेलिआ से उदघोषित स्पेशल ब्रॉडकास्टिंग सर्विस (एसबीएस रेडियो, हिंदी सेवा) के लिए कार्य करता था। मेरी बातों को सुनने के बाद भारत के कप्तान कहते हैं: &#8220;हमें उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिए। न मैं खेल के मैदान में उस दिन उम्मीद छोड़ा था और ना ही आज। आपकी बातें एक पाठ है आज को युवाओं के लिए। आप बहुत बेहतरीन कार्य कर रहे हैं। इस कार्य को सभी नहीं समझेंगे। मैं पाठक जी को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ। पाठक जी बहुत बेहतरीन इंसान हैं। आज़ाद भारत में वे एकमात्र व्यक्ति हैं जिन्होंने सफाई के समाजशात्र को पुनः परिभाषित किया। उन्होंने जो किया, आज तक किसी ने नहीं किया। आप भी उम्मीद नहीं छोड़ें। कोई नहीं जानता आपका अंतिम प्रयास ही आपको विश्वव्यापी बना दे।&#8221; खैर।</p>
<p>आज ही नहीं, कल भी “मेरी आवाज ही पहचान है” – ये पांच शब्द सुनते ही दिवंगत लता मंगेशकर जी याद आएँगी। “मिसाईल” सुनते ही महान वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत ए पी जे अब्दुल कलाम साहब याद आएंगे। क्रिकेट के मैदान में जब भी वर्ल्ड कप की चर्चा होगी पहले कपिल देव ही नाम लिया जायेगा। उसी तरह आज ही नहीं, कल भी और आने वाले समय में भी, जब भारत में स्वच्छता और भंगी-मुक्ति आंदोलन, यानी “सामाजिक बदलाव” और “मानवीय विकास” के अग्रणी का नाम लिया जायेगा, तो सबों के जुबान पर एक ही नाम आएगा &#8216;सुलभ&#8217; और उनके संस्थापक डॉ बिन्देश्वर पाठक &#8211; और जब डॉ बिंदेश्वर पाठक अपने आप से पूछेंगे तो शायद अपने परम मित्र, सहपाठी, शिक्षक और प्राथमिक सलाहकार डॉ हेतुकर झा को कभी नहीं भूलेंगे।</p>
<p>जब भी &#8216;सोशियोलॉजी ऑफ़ सेनिटेशन&#8217; पर चर्चा की जाएगी डॉ पाठक के साथ-साथ उनके मित्र-सह-शिक्षक-सह-सलाहकार डॉ हेतुकर झा का नाम स्वतः मुख पर आ जायेगा। यही कारण है कि डॉ पाठक की तुलना इब्राहिम लिंकन से भी लोगों ने किया। जिस तरह लिंकन अमेरिका में काले-गोरों में भेदभाव को मिटाने के लिए याद किये जाते हैं, डॉ पाठक भारत में समाज के दबे-कुचले, समाज से उपेक्षित सर पर मैला ढोने वाले महिला-पुरुषों को समाज की मुख्यधाराओं में जोड़ने के लिए याद किये जायेंगे। और उन्ही यादों में &#8216;सोसिओलोजी ऑफ़ सेनिटेशन&#8217; के रचयिता डॉ हेतुकर झा का नाम भी आएगा। यदि सही कहा जाय तो पटना में डॉ पाठक और उनके मित्र डॉ हेतुकर झा पटना के रास्ते, अपने प्रदेश, देश और विश्व में सोसिओलोजी ऑफ़ सेनिटेशन&#8217; की बुनियाद को मजबूत किये।</p>
<p>साठ के दशक के मध्य की बात है। हेतुकर बाबू पटना के राजेंद्र नगर इलाके में रोड नंबर 16 में रहते थे। पटना के ऐतिहासिक मोइनुल हक़ स्टेडियम के ठीक सामने। इनका आवास दूसरे तल्ले पर था। उसी मकान में नीचे बेचन बाबू रहते थे। आम तौर पर उन दिनों हेतुकर बाबू अपने आवास से विश्वविद्यालय रिक्शा से जाते थे। यदि रास्ता ठीक-ठाक रहा तो रिक्शा सैदपुर स्थित राष्ट्रभाषा परिषद् कार्यालय से होते हुए भिखना पहाड़ी स्थित डॉ कमला आचारी के घर के सामने से या तो रमना रोड होते विश्वविद्यालय परिसर आती थी अथवा साइंस कालेज के सामने निकल कर अशोकराज पथ से विभाग पहुँचते थे। वे अपने छात्र-जीवन में वे पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव भी लड़े थे । पद था उपाध्यक्ष।</p>
<p>26 जनवरी, 1968 को पटना विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति के.के.दत्ता का लिखा और हस्ताक्षरित यह पत्र हेतुकर बाबू के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का दृष्टान्त देता है। के.के.दत्ता लिखता हैं: &#8221; Shri Hetukar Jha has been intimately known to me as a student of the Patna University. I have been favourably impressed with all that I have seen of him. With good academic record he has developed a liberal and cultural outlook. He is intelligent, industrious and conscientious. What I liked most in him is his genuine interest of creative activities and as Vice-President of the Patna University Students Union he has rendered valuable services to me in fostering a feeling of fellowship in the University campus. Hias manners and conducts are excellent. I wish him all success in his life.&#8221;</p>
<p>हेतुकर बाबू से हमारा रिश्ता पारिवारिक था। साथ ही, नोवेल्टी एंड कंपनी के कारण पटना विश्वविद्यालय के लगभग सभी प्राध्यापकों को जानते थे। उन दिनों पाठक जी साइकिल से हेतुकर बाबू के घर राजेंद्र नगर आते थे। एक मित्र के रूप में दोनों ढ़ेर सारी बातें करते थे। बातों का ध्रुवीकरण सामाजिक क्षेत्र के कार्यों से जुड़ा होता था। पाठक जी के मन में प्रारम्भ से ही समाज में एक बदलाव लाने की तम्मन्ना थी और उस कार्य में हेतुकर बाबू की भूमिका को आज तक पाठक साहब भी नहीं भुला पाए। जैसे-जैसे समय में बदलाव आ रहा था, पाठक जी पहले एक पुरानी मोटरसाइकिल (राजदूत) की सवारी करने लगे फिर एक पुराना एम्बेसेडर कर। उन दिनों भी हेतुकर बाबू के पास एक आसमानी रंग फिएट (DHA 6200) हुआ करता था । दोनों की मित्रता एक शिक्षक-छात्र से अधिक एक अद्वितीय मित्र के रूप में था। पटना कालेज ही नहीं, पटना विश्वविद्यालय के ही नहीं, बल्कि बिहार से दिल्ली तक, जहाँ भी सामाजिक सरोकार पर, स्वच्छता पर, अछूतों के उत्थान पर, उन्हें समाज के मुख्य धाराओं में जोड़ने की बात पर चर्चा होती थी; पाठक जी और हेतुकर बाबू का नाम अवश्य आता था। यदि कहा जाय तो दोनों की मित्रता, सम्मान, सम्बन्ध बहुत ही उत्कर्ष का था। उसे शब्दों में नहीं लिखा जा सकता है।</p>
<p>जब डॉ. पाठक ने 1970 में बिहार में सुलभ शौचालय संस्थान के नाम से एक स्वयंसेवी और लाभ निरपेक्ष संस्था की आधारशिला रखी, पटना विश्वविद्यालय के समाज शास्त्र विभाग के अध्यापक हेतुकर बाबू उनके पीछे खड़े थे। हेतुकर बाबू को अपने मित्र पर अटूट विश्वास था और उन्हें यह भी विश्वास था कि आने वाले समय में पाठक जी न केवल पटना, बिहार या भारत, अपितु विश्व के अन्य देशों में, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर &#8216;समाजशात्र&#8217; की परिभाषा को पुनः लिखेंगे। वे गाँधी की विचारधाराओं, जिससे वे अधिक प्रभावित थे, को अक्षरसः व्यवहार में अनुवाद करेंगे । आज भी याद है इन महान समाजशास्त्रियों के सुयोग्य नेतृत्व में कमाऊ शौचालयों को कम लागत वाले फ्लश शौचालयों अर्थात् ‘सुलभ शौचालयों’ में बदलने का एक क्रान्तिकारी अभियान शुरू किया। उन दिनों परम्परागत कमाऊ शौचालय पर्यावरण को प्रदूषित करते थे और दुर्गन्ध फैलाते थे। साथ ही, उन्हें साफ करने के लिए सफाई कर्मियों की आवश्यकता पड़ती थी। कम लागत वाले सुलभ शौचालय उपयोग की दृष्टि से व्यावहारिक थे, आज भी हैं और उन्हें साफ करने के लिए सफाई कर्मियों की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस प्रकार यह एक व्यवहार्य विकल्प है जो इसका उपयोग करने वालों के साथ ही सफाई कर्मियों के लिए भी वरदान सिद्ध हुआ है।</p>
<p>उन दिनों पटना विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रोफ़ेसर मुसी राजा साहब, प्रोफ़ेसर सरदार देवनंदन सिंह साहब, प्रोफ़ेसर सतीश कुमार साहब, प्रोफ़ेसर आनंद कुमार साहब, प्रोफ़ेसर (श्रीमती) फुलोरा सिंह, प्रोफ़ेसर ज़ियाउद्दीन अहमद जैस समाजशात्र के महान हस्ताक्षर थे। प्रोफ़ेसर हेतुकर बाबू की हमेशा इक्षा होती थी की समाज में उनके द्वारा, उनके सहयोग से कुछ ऐसी संस्थागत व्यवस्था हो जो आने वाली पीढ़ियों के लिए, खासकर उनकी शिक्षा-शोध में लाभकारी हो। परिणाम यह हुआ कि हेतुकर बाबू-पाठक जी के सहयोग से मिथिला में पंजीकरण व्यवस्था पर शोध कर कार्य करने की बात हुई। इस सिलसिले में देश के कई विश्वविद्यालयों से भी वार्तालाप हुई। इतना ही नहीं, पटना में समाजशास्त्र और सामाजिक व्यवस्था पर उच्चस्तरीय शोध के लिए दोनों ने सुलभ इंस्टीटूट ऑफ़ सोसल स्टडीज की स्थापना की गई जिसका कोई ढ़ाई साल तक हेतुकर बाबू ऑर्जेनाइजिंग डाइरेक्टर भी थे। दोनों यह चाहते थे कि पटना में एक ऐसे संस्थान की स्थापना की जाय जो भविष्य में सामाजिक क्षेत्र के कार्यों पर शोध करने वाले शोधार्थी को मदद मिल सके &#8211; एक केंद्रीय संस्था के रूप में। लेकिन तत्कालीन व्यवस्था और हुकुमनानों के साथ &#8216;तालमेल नहीं बैठने के कारण पटना में स्थापित होने वाला वह संस्था दिल्ली आ गया।</p>
<p>समयांतराल हेतुकर बाबू &#8220;सोसिऑलोजी ऑफ़ सेनिटेशन&#8221; नामक मुलभुत किताब की रचना किये जिसे पाठक जी ने प्रकाशित भी किया। यह किताब वस्तुतः &#8216;सेनिटेशन&#8217; के मामले में एक इन्साइक्लोपीडिया है जो किसी भी शोधार्थी के लिए महत्वपूर्ण है। इन तमाम कार्यों में डॉ पाठक की भूमिका अद्वितीय है। यही कारण है कि जब सत्तर के दशक का सुलभ शौचालय समयांतराल सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन बना, सामाजिक क्षेत्र में हेतुकर बाबू की भूमिका के सम्मानार्थ डॉ पाठक नजरअंदाज नहीं किये।</p>
<p>कहते हैं डॉ पाठक का जन्म 1943 में बिहार के वैशाली जिले के एक गांव में एक रूढि़वादी ब्राह्णण परिवार में हुआ था। विगत चार दशकों और अधिक समय में पाठक जी से अनेकों बार सुना: “जब मैं 6 वर्ष का था तो मैंने एक कथित अस्पृश्य महिला को छू दिया और रूढि़वादी अस्पृश्यता को मानने वाली मेरी दादी ने शुद्ध करने की बात कहकर जबरन मुझे गाय का गोबर और गौ मूत्र पिलाया , जिसका कड़वा स्वाद आज भी मेरे मुंह में है।” डॉ पाठक के अनुसार वे जिस घर में पीला-बढे उसमे वैसे नौ कमरे तो थे, परन्तु एक भी शौचालय नहीं था। जब वे सोते थे तो सुबह-सवेरे अर्धनिद्रा में कुछ आवाजें सुनते थे, कोई बाल्टी उठा रहा होता था, कोई पानी भर रहा होता था और महिलाएं सूर्योदय से पहले शौच के लिए बाहर जा रही होती थीं। कोई महिला बीमार पड़ जाती तो उसे एक मिट्टी के बर्तन में ही शौच करना पड़ता था। कई महिलाओं के सिर में दर्द रहता क्योंकि उन्हें दिनभर अपने शौच को रोककर रखना पड़ता था। यह कहानी महज उनके घर या गाँव की नहीं बल्कि यही कहानी भारत के 7,00,000 गांवों और सैकड़ों शहरों की थी। उनकी शिक्षा चार स्कूलों में हुई और दुर्भाग्यवश किसी में भी शौचालय नहीं था।</p>
<p>पटना विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में स्नातक करने के बाद उन्हें 1968-69 में बिहार गांधी जन्म शताब्दी समारोह समिति के भंगी मुक्ति विभाग में काम करने का मौका मिला। समिति ने उन्हें सुरक्षित और सस्ती शौचालय तकनीक विकसित करने और दलितों के सम्मान के लिए काम करने को कहा ताकि उन्हें मुख्यधारा में शामिल किया जाय। ब्राह्मण परिवार के जन्म लिए एक व्यक्ति के लिए यह सबसे “नीच कार्य” समझा जाता था, परन्तु डॉ पाठक इसे सहर्ष स्वीकार किया – यह स्वीकार्यता न केवल उनके व्यक्तित्व में बदलाव लाया परन्तु उनके जीवन को एक नयी दिशा भी दिया। डॉ पाठक के जीवन में नया मोड़ तब आया, जब वे बेतिया की दलित बस्ती में तीन महीने के लिए उनके बीच रहने गए।</p>
<p>उस समय देश में जाति-प्रथा उत्कर्ष पर थी। उनके साथ रहते हुए डॉ पाठक ने जो देखा-सीखा-पीड़ा का अनुभव किया, वह सभी बातें इन्हे अपने जीवन को स्कैवेंजरों के लिए समर्पित करने की ओर उन्मुख कर दिया – पश्चिमी देशों में इस्तेमाल हो रही महंगी कलश और सीवर व्यवस्था के विकल्प के रूप में प्रभावी और सस्ती शौचालय व्यवस्था का विकास कैसे किया जाए, ताकि स्कैवेंजिंग प्रथा रोकी जा सके और उन्हें किसी दूसरे कार्य में पुनर्वासित किया जा सके। आज उन्होंने मानवीय सिद्धांतों के साथ तकनीकी नवाचार को मिलाकर संगठन शिक्षा के माध्यम से मानव अधिकारों, पर्यावरण स्वच्छता, ऊर्जा के गैर-पारंपरिक स्रोतों, अपशिष्ट प्रबंधन और सामाजिक सुधारों को बढ़ावा देने के लिए काम करता है। संगठन 50,000 स्वयंसेवकों की गिनती करता है।</p>
<p>पटना विश्वविद्यालय का यह समाजशात्री आज भारत सरकार के पद्मभूषण से अलंकृत है। उनका नाम ग्लोबल 500 रोल ऑफ़ ऑनर, स्टॉकहोम जल पुरस्कार, लीजेंड ऑफ़ प्लेनेट पुरस्कार, इंडियन अफेयर्स सोशल रिफॉर्मर ऑफ द ईयर 2017 का पुरस्कार, ऑर्डर पटेल अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार, न्यूयॉर्क शहर के मेयर बिल डी ब्लासियो ने 14 अप्रैल को बिंदेश्वर पाठक दिवस के रूप में घोषित किये। आज प्रोफेसर हेतुकर बाबू नहीं हैं, लेकिन दोनों समाजशास्त्रियों की स्वच्छता सम्बन्धी सोच ने भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में एक मिसाल कायम कर दी। करीब पांच दशक जिस अभियान को शुरू किया गया था, वह एक विशाल आंदोलन के रूप में, सामाजिक क्रांति के रूप में, सामाजिक चेतना के रूप में विश्व में अवतरित हुआ।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/two-sociologists-of-patna-university-who-redefined-sociology">पटना कालेज @ 160 : पटना विश्वविद्यालय के दो समाजशास्त्री जिन्होंने समाज शास्त्र को पुनः परिभाषित किये (10)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>पटना कालेज @ 160 : प्रोफ़ेसर अमृत धारी सिंह, जिन्होंने सन 1948 में स्नातकोत्तर श्रम और समाज कल्याण विभाग स्थापित किये थे (9)</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/prof-amrit-dhari-singh-who-established-the-postgraduate-labor-and-social-welfare-departments-in-1948</link>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Apr 2022 05:18:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विदेश में बिहारी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आज ही नहीं आने वाले शताब्दी में भी, आजाद भारत में जब भी पटना कॉलेज का जिक्र किया जायेगा, पटना विश्वविद्यालय का जिक्र किया जाएगा, भारत में औद्योगिक क्रांति में श्रम-श्रमिकों की बात की जाएगी, श्रमिक-प्रबंधन के सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध और कल्याण के बारे में जिक्र होगा, पटना विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों पर चर्चा होगी, नए पाठ्यक्रमों [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आज ही नहीं आने वाले शताब्दी में भी, आजाद भारत में जब भी पटना कॉलेज का जिक्र किया जायेगा, पटना विश्वविद्यालय का जिक्र किया जाएगा, भारत में औद्योगिक क्रांति में श्रम-श्रमिकों की बात की जाएगी, श्रमिक-प्रबंधन के सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध और कल्याण के बारे में जिक्र होगा, पटना विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों पर चर्चा होगी, नए पाठ्यक्रमों के बारे जिक्र होगा &#8211; पटना कॉलेज के तत्कालीन प्राध्यापक प्रोफ़ेसर अमृत धारी सिंह और उनके द्वारा दरभंगा हॉउस स्थित गंगा के किनारे वह विशाल बरगद का बृक्ष, पीपल का बृक्ष, काली-मंन्दिर में स्थापित माँ काली की प्रतिमा इस बात का प्रत्यक्षदर्शी होंगे कि इसी भवन के बरामदे वाले कक्ष में प्रोफ़ेसर अमृतधारी सिंह आज़ाद भारत के पहले वर्ष में पटना विश्वविदयालय में स्नातकोत्तर &#8216;श्रम और समाज-कल्याण विभाग (लेबर एंड सोसल वेलफेयर डिपार्टमेंट) की स्थापना किये थे। अपने स्थापना काल से आज तक उनके द्वारा स्थापित यह विभाग भारतीय उद्योगों को, कारखाओं को हज़ारों हज़ार दक्ष अधिकारियों को उत्पन्न किया जो कभी भी उन उद्योगों में, कारखानों में श्रमिकों और प्रबंधन के बीच तनाब नहीं होने दिया।</strong></p>
<p>सत्तर के दशक की बात है। मेरे बाबूजी श्री गोपालदत्त झा (श्री गोपालजी) पटना के नोवेल्टी एंड कंपनी (प्रकाशक और पुस्तक विक्रेता) में बहुत ही छोटे मुलाजिम के रूप में कार्य करते थे। सब्जी बाग के सामने स्थित पोस्ट ऑफिस से नित्य डाक लाना, डाक द्वारा किताब या अन्य सामग्री प्रेषित करना, बैंक का कार्य करना, पटना विश्वविद्यालय के तत्कालीन शिक्षकों, लेखकों के दफ्तर अथवा घर पर किताबों का प्रूफ पहुँचाना/लाना और अन्य छोटे-छोटे कार्य का संपादन उनके रोजमर्रे काम था। उससे भी एक महत्वपूर्ण कार्य था किताबों के बण्डल को उत्तर बिहार के पुस्तक विक्रेतों को आगे रेल मार्ग द्वारा भेजने के लिए उन्हें पहले महेन्द्रू घाट से नित्य पानी वाला जहाज की सेवा से भेजना।</p>
<p>महेन्द्रू घाट से बण्डल पहलेजा घाट पहुंचा था, फिर आगे ट्रेनों से उसकी यात्रा शुरू होती थी । उन दिनों उत्तर बिहार को पटना से जोड़ने के लिए गंगा में बच्चा बाबू का जहाज ही एक मात्र साधन था। जाड़ा हो, गर्मी हो, बरसात हो, पटना की सड़कों पर तापमान चाहे आकाश छूता हो या पाताल, बाबूजी नित्य अपरान्ह काल 4 बजे किताबों का बण्डल लेकर महेन्द्रू घाट के लिए रवाना होते थे और मैं उनके पिछलग्गू।</p>
<p>छोटे-छोटे दो-तीन बंडल होने पर वे कन्धा पर उठाकर चल देते थे। बहुत अधिक बण्डल होने पर, या अधिक वजन होने पर रिक्शा ले लेते थे। उन दिनों नोवेल्टी से महेंद्रू घाट का किराया अधिकतम चालीस पैसे और दूरी दो किलोमीटर से अधिक नहीं। देखते ही देखते मखनियां कुआं, गोविन्द मित्र रोड, पटना मार्किट पार कर जैसे ही अलंकार ज्वेलर्स से आगे सब्जीबाग की ओर बढ़ते थे, दाहिने हाथ पीरबहोर थाना के दाहिने दीवार के साथ मुड़कर महेन्द्रू घाट के लिए चल देते थे। यह रास्ता महेन्द्रू घाट परिसर में ही प्रवेश करता था।</p>
<p>उन दिनों सड़कों पर साईकिल, रिक्शा और पैदल चलने वालों की ही जनसँख्या अधिक होती थी। सड़क पर वाहन वाले, मसलन स्कूटर वाले, मोटर साईकिल वाले, अम्बेस्डर वालों की संख्या अप्ल्संख्यक में थी। हाँ, तांगे वाले और टमटम वाले भी सड़कों पर अपनी उपस्थिति बनाये रखते थे। बीच बीच में टेंपो वाले दीखते थे। बाबूजी कहते थे कि सन 1950 में भारती भवन, जो आज का एक मशहूर प्रकाशक और पुस्तक विक्रेता है, इसी महेंद्रू घाट के इलाके से एक गुमटी से प्रकाशन की दुनिया में प्रवेश किया था।<br />
मैं बाबूजी के साथ ऊँगली पकड़कर चलता रहता था। जीवन का महत्व और जीवन का रहस्य दोनों का पाठ पढ़ते रहता था, सीखते रहता था। इस ब्रह्माण्ड में एक अनपढ़, अशिक्षित माता-पिता भी अपने बच्चों के लिए विभागाध्यक्ष &#8211; कुलपति &#8211; कुलाधिपति &#8211; शिक्षाविद &#8211; शिक्षामंत्री से कम नहीं होते हैं। यह बात पढ़े लिखे माता-पिता नहीं समझेंगे।</p>
<p>बाबूजी औसतन रविवार को छोड़कर, महीने में कम से कम बीस दिन आवक-जावक 40-50 पैसे, यानी एक रूपया बचाने के लिए कंधे पर किताबों का बण्डल रखकर कोई 2 किलोमीटर का रास्ता पैदलतय करते थे। मैं टेनिया जैसा, कंधे में अपनी लम्बाई का कपड़े का एक झोला लिए,बाबूजी का कभी बाएं तो कभी दाहिने तरफ कमीज पकड़े, कदम ताल करते उनके पदचिन्हों पर चला करता था।उन दिनों माँ गाँव में रहती थी।</p>
<p>बाबूजीजबशाममेंदिन-भर के खर्च का हिसाब मालिक के सामने रखते थे, तो उसमें “रिक्शा किराया”जुड़ा होता था और एक श्रेणी था“ अन्य खर्च” जिसमें चाय और मेरे लिए बिस्कुट, लवणच्युस सम्मिलित होता था। यदि देखा जाय तो इस तरह वे महीने में 22 से 25 रुपये का बचत करते थे। यह बात मालिक (श्री तारा नन्द झा) तो जानते ही थे, उनके घर के सभी सदस्य भी बाद में अवगत हो गए थे; खासकर उस दिन से जब मालिक की पत्नी श्रीमती जमुना देवी (अब दिवंगत) और उनके बड़े बेटे नरेंद्र कुमार झा की पत्नी श्रीमती इन्दु देवी हम दोनों बाप-बेटे को रंगे हाथ महेन्द्रू घाट के बाहर सब्जी बाजार में पकड़ीं जब बाबूजी अपने कंधे पर बंडल उठाये थे । खैर।</p>
<p>कहते हैं एक पिता, चाहे गरीब का हो या जमींदार का, राजा-महाराजाओं का, अपने संतानों के लिए &#8216;ब्रह्माण्ड&#8217; होता है। धनाढ्यों के पिता-संतान के बारे में जो सुना और जो विगत पांच दशकों देखा, उससे मन में एक सवाल उत्पन्न हो रहा है और उस प्रश्न का उत्तर सदैव ढूंढ रहे हैं &#8211; क्या धनाढ्यों का, जमींदारों का, राजा-महाराजाओं का, या यूँ कहें कि जिस संतान को अपनी जीवन-रेखा लिखने के लिए खुद कोई मसक्कत नहीं करना पड़े, पसीने को आँखों से नहीं निकालना पड़े, पिता और पुरखों की अपार संपत्ति प्राप्त हो &#8211; क्या वैसे पिता और संतान का संवेदनात्मक, भावात्मक सम्बन्ध वैसा ही होता है जैसे एक निर्धन का ? मेरा मानना है &#8216;नहीं&#8217; । खैर।</p>
<p>बाबूजी कहते थे:“किताब का वजन बहुत भारी नहीं होता।बशर्ते तुम किताब को भारी नहीं समझो। यह सिद्धांत किताबों की खरीद-बिक्री से अधिक किताबों को पढ़ने-पढ़ाने में लागु होता है।तुम जैसे ही किताब को अपने जीवन से, अपने भविष्य से भारी मान लोगे; वैसे ही तुम उन अनन्त-लोगों की लम्बी कतार में स्वयं को खड़े पाओगे, जहाँ तुम्हे अपनी परछाई भी नहीं दिखेगी।तुम्हारी अपनी ही परछाई लोगों की परछाई के साथ गुम हो जाएगी।”</p>
<p>पटना के अशोक राजपथ पर अपने कंधे पर किताबों का बोझ उठाये और प्रत्येक अगले कदम पर जीवन का पाठ पढ़ाते बाबूजी कहते थे : &#8220;मैं इस किताब के बण्डल को अपने कंधे पर लेकर तुम्हारे साथ इसलिए नित्य चलता हूँ ताकि तुम्हे किताब का वजन मालूम हो सके, तुम्हे किताब का महत्व मालूम हो सके। इसलिए किताबों को सूंघने की आदत डालो। कागज का गंध एक बार अगर नाक के रास्ते मष्तिष्क में जगह बना लिया, मैं समझूंगा मेरे साथ तुम्हारा आना-जाना सार्थक हो गया। मैं उस दिन तक नहीं रहूँगा, लेकिन तुम्हारे किताबों के प्रत्येक पन्नों में मैं स्वयं को पाउँगा, मुझे बहुत ख़ुशी होगी।&#8221;</p>
<p>नोवेल्टी में किताबों का, खासकर प्राथमिक और माध्यमिक किताबों का अम्बार इसलिए भी था क्योंकि जब बिहार स्टेट टेक्स्ट बुक कमिटी की पैदाइश हुई ताकि बिहार के स्कूली बच्चों को सस्ते दामों पर और आसानी से किताबें उपलब्ध हो सके, तब नोवेल्टी एण्ड कम्पनी एक सिस्टर कन्सर्न नोवेल्टी इंटरप्राइजेज खोला था और बिहार के‌ 9 वितरकों का भी वह सबसे पहला वितरक था। अन्य वितरक थे: रांची (सुबोध ग्रंथमाला)चक्रधरपुर (चाईबासा), हजारीबाग (खंडेलवाल बुक डिपो व ‌माध्यमिक शिक्षक संघ), जमशेदपुर सेन बुक स्टोर्स / अग्रवाल बुक डिपो), भागलपुर (भारत बुक डिपो),धनबाद (विद्या भवन), पटना(बिहार स्टोर्स) ।</p>
<p>इस बीच टेक्स्ट बुक कमेटी की सभी पुस्तकों की टिप्पणी (नोट) के लिए सन 1970 में नोवेल्टी एक और सिस्टर कंसर्न खोला &#8216;छात्रोपयोगी प्रकाशन&#8217; और इस प्रकाशनके माध्यमसे सुबोध ग्रंथमाला, राॅची के मालिक स्व.प्रेम नारायण शर्मा को एक तरहसे बतौर सी एण्ड एफ अधिकारी बनाकर उनका भी विकास किया गया। छात्रोपयोगी प्रकाशनने बहुतों को रोजगार दिया। छात्रोपयोगी प्रकाशन की पुस्तकों का प्रकाशन नोवेल्टी कलर प्रिंटिंग वर्क्स में होता था जो नया टोला में धरहरा कोठी गली में अवस्थित था। उस प्रेस को श्री गणनाथ मिश्रा चलाते थे। गणनाथ मिश्रा की खजांची रोड में जनता होमियो हॉल दवा दूकान के सामने एक तबला, हारमोनियम की भी दूकान थी, जो उन दिनों उस क्षेत्र का एकलौता प्रतिष्ठान था ।</p>
<p>लेकिन विश्वविद्यालय क्षेत्र में होने के साथ-साथ किताबों की बढ़ती मांग के मद्दे नजर &#8216;तबले&#8217; का थाप बंद हो गया और प्रकाशन की गति तीब्र करने के लिए अजन्ता प्रेस खुला। समय बदल रहा था और किताबों, कागजों की दुनिया में भी बदलाव आ रहा था। इधर पटना कालेज भवन की दीवारों पर, बॉउंड्री वालों को कहीं सफ़ेद तो कहीं लाल किया जा रहा था। परिसर में छात्र-छात्राओं की संख्या, प्राध्यापकों की संख्या और गुणवत्ता में भी परिवर्तन हो रहा था। उधर नोवेल्टी ने कागज डिस्ट्रीब्यूटर टीटागढ़ पेपर मिल्स के सी एण्ड एफ एजेंसी रामनारायण-बद्रीदास के मालिक पुरुषोत्तम बाबू को एक और फर्म‌ &#8216;नोवेल्टी इंटरप्राइजेज (पी)&#8217; खोलकर टीटागढ़ के बाद हिंदुस्तान के सबसे बड़े पेपर मिल ईस्ट एंड वेस्ट पेपर इंडिया लिमिटेड, बम्बई की पैदाइश पर मालिकाना हक़ दिया। यह सम्भतः 1968-1969 का कालखंड था।</p>
<p>उस ज़माने में पटना में कुकुरमुत्तों की तरह प्रकाशक और पुस्तक विक्रेता नहीं पनपे थे। चाहे स्कूली छात्र-छात्राएं हों या कालेज के, विश्वविद्यालय के मूल किताब पढ़ते थे। अपने-अपने कालेजों में सभी कक्षाओं में शत -प्रतिशत उपस्थिति देते थे। पुस्तकालयों में खचाखच भीड़ होती थी। इस दृष्टि से पटना कालेज का पुस्तकालय &#8211; जिसके पुस्तकालय अध्यक्ष श्री महेंद्र प्रसाद जी थे &#8211; हमेशा अब्बल रहता था। जिस तरह उत्तर बिहार के प्रमुख शहरों, मसलन अररिया, बेगूसराय, मधेपुरा, समस्तीपुर, दरभंगा, सीवान, सुपौल, सहरसा, मुजफ्फरपुर, मधुबनी मुंगेर, हाजीपुर इत्यादि शहरों में पटना से किताबें प्रचुर मात्रा में जाते थे; वहीँ उन शहरों से पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं पटना विश्वविद्यालय में नामांकन के लिए आते थे।</p>
<p>पटना कॉलेज में नामांकन होना अपने आप में एक सामाजिक प्रतिष्ठा की बात होती थी। नोवेल्टी के अलावे पुस्तक भण्डार, भारती भवन, लक्ष्मी पुस्तकालय, मगध राजधानी प्रकाशन, साइंटिफिक बुक कंपनी, मोतीलाल बनारसी दास, राजकमल प्रकाशन, स्टूडेंट्स फ्रेंड्स, भी किताब भेजा करते थे।</p>
<p>#बहरहाल, सत्तर के दशक में जिस स्थान पर श्रीमती जमुना देवी और श्रीमती इंदु देवी हम दोनों बाप-बेटे को देखी थी, जब बाबूजी अपने कंधे पर किताबों का बण्डल लिए महेन्द्रू घाट पार्सल करने जा रहे थे और मैं एक छोटा बच्चा अपने पिता की ऊँगली पकड़कर जीवन का मार्ग प्रशस्त कर रहा था; अस्सी के दशक में उसी स्थान से सौ कदम आगे गंगा के किनारे एक बार फिर दोनों सम्मानित महिलाओं से मुलाक़ात हुई। उस दिन बाबू जी नहीं, बल्कि माँ के साथ मैं था और स्थान था पटना विश्वविद्यालय में &#8216;लेबर एंड सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट के संस्थापक, पटना कालेज के अर्थशास्त्र विभाग के पूर्व-प्राध्यापक, वरिष्ठ अर्थशात्री, टिस्को के अवकाश प्राप्त निदेशक और हथुआ राज द्वारा स्थापित, संरक्षित और संचालित &#8216;हथुआ मेटल्स एंड ट्यूब्स लिमिटेड&#8217; के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक सम्मानित प्रोफ़ेसर अमृत धारी सिंह का आधिकारिक आवास &#8211; हथुआ हॉउस।</p>
<p>उस दिन मैं पटना से प्रकाशित आर्यावर्त-दी इण्डियन नेशन समाचार पत्र समूह में पत्रकारिता की नीचली सीढ़ी पर अपना पैर जमा लिया था और पटना विश्वविद्यालय से अर्थशात्र विषय में ही स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त कर परीक्षा-परिणाम की प्रतीक्षा में था। कुछ सप्ताह बाद परीक्षा परिणाम भी निकला और मुझे मेरा नाम विश्वविद्यालय सूचना पट्ट पर आठवें स्थान पर दिखाई दिया।</p>
<p>प्रोफ़ेसर अमृत धारी सिंह मधुबनी ड्योढ़ी के राजा परिवार से थे। शिक्षा से समुद्र की गहराई के बराबर लगाब था। जिस दिन उन्हें यह मालूम हुआ कि मैं अब आर्यावर्त &#8211; इण्डियन नेशन अख़बार में प्रूफ-रीडर की नौकरी की शुरुआत किया हूँ, घर को संरक्षण मिलेगा, पढ़ने में अब कोई दिक्कत नहीं होगी, वे बहुत खुश हुए थे। उनसे मुलकात हम जैसे लोगों के लिए मुश्किल तो अवश्य था, लेकिन नामुमकिन नहीं था। उनकी पत्नी (दाई जी) उनकी बेटी श्रीमती माया झा, पुत्र श्री इंदुधारी सिंह, बिंदुधारी सिंह, बड़ी बहु श्रीमती रीता सिंह मुझे ही नहीं, मेरे सभी भाई-बहनों को बहुत स्नेह करती थीं। आज भी उन लोगों का प्यार और सम्मान बरकरार है।</p>
<p>प्रोफ़ेसर अमृत धारी सिंह की बहुत इक्षा रहती थी की समाज का प्रत्येक बच्चा शिक्षित हो, चाहे वह किसी भी जाति, समुदाय का हो। उसके पिता अथवा अभिभावक किसी भी प्रकार का कार्य कर जीवन यापन करता हो। वे कहते थे कि आज अथवा कल, भारतीय अथवा विदेशी मुद्राओं की कीमत चाहे कितनी भी अधिक हो जाए, चाहे कितना भी कम हो जाए, समाज में &#8211; चाहे सभ्य हो अथवा असभ्य &#8211; शिक्षा और शिक्षित व्यक्ति का मोल कभी कम नहीं होगा। एक धनाढ्य (परन्तु अशिक्षित) व्यक्ति जब भी अपने आपको देखेगा, उसका सर हमेशा एक शिक्षित व्यक्ति के सामने झुका रहेगा चाहे वह शिक्षित व्यक्ति समाज के किसी भी निम्न वर्ग का ही क्यों न हो।</p>
<p>अपने जीवन काल में उन्होंने न जाने कितने गरीबों को, निरीहों हो, असहायों को शिक्षा प्राप्त करने में, शिक्षा के माध्यम से अपने जीवन को सफल बनाने में मदद किए हैं। यह बात अलग है कि आज भले ही मदद प्राप्त कर्ता उन बातों को अपने ह्रदय में दफ़न कर दिए हों। लेकिन मुझे सार्वजानिक रूप से यहाँ लिखने में तनिक भी संकोच नहीं हो रहा है कि प्रोफ़ेसर अमृत धारी सिंह के सम्पूर्ण परिवार का हम लोगों पर कितना उपकार था, आज भी है। आखिर &#8216;शिक्षा का महत्व भी तो तभी है जब हम सच लिखें भी।&#8217;</p>
<p>स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त करने के पश्चात प्रोफ़ेसर अमृत धारी सिंह पटना कालेज के अर्थशात्र विभाग में प्राध्यापक के रूप में अपनी सेवा की शुरुआत किये। देश आज़ादी की ओर उन्मुख था। भारत के लोगों, युवाओं के साथ-साथ वे भी स्वतंत्र भारत में होने वाले सूर्योदय और आकाश की लालिमा को देख रहे थे, अनुभव कर रहे थे। तभी उनके मन में एक ख्याल आया कि आज़ाद भारत में युवकों के लिए, युवतियों के लिए रोजगार के अवसर तो खुलेंगे ही, देश में उद्योगों की स्थापना तो होगी ही &#8211; अगर उन युवकों को एक विशेष दिशा में, विशेष विषय में दक्ष किया जाय तो शायद अन्य कामगारों की तुलना में प्रतिष्ठान में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी, उद्योगों का भी विकास होगा और देश का विकाश तो स्वतः होना ही है।</p>
<p>दशकों पहले उनकी पत्नी दाई जी कही थी: &#8220;वे चाहते थे कि समाज में शिक्षित व्यक्तियों का भरमार तो हो ही, उनमें दक्षता की किल्लत नहीं हो। जिस विषय में वे पारंगत हैं, उस विषय का वास्तविक ज्ञान होना भी नितांत आवश्यक है। इसलिए वे चाहते थे कि पहले खुद ज्ञान अर्जित करूँ, उसे अमल में लाएं और फिर उस दिशा की ओर युवाओं को भी उन्मुख करें। पटना विश्वविद्यालय का लेबर एंड सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट उसी सोच का परिणाम था।&#8221;</p>
<p>पटना कॉलेज से &#8216;शिक्षा के लिए छुट्टी&#8221; लेकर प्रोफ़ेसर अमृत धारी सिंह अमेरिका गए जहाँ उन्होंने &#8216;श्रमिकों और सामाजिक कल्याण&#8217; पर बेहतर से बेहतर ज्ञान अर्जित किये।</p>
<p>उनकी बहु, श्रीमती रीता सिंह जो आज जमशेदपुर में एक प्रतिष्ठित संस्था में कार्यरत हैं, कहती है: &#8220;अमेरिका जाने के पीछे दादा जी (ससुर) का शायद यह मकशद था कि अंग्रेजी हुकूमत के दौरान, या फिर प्रथम विश्व युद्ध और उसके भी पहले, भारत से लाखों लोगों का प्रवास हुआ था विश्व के अन्य देशों में, खासकर श्रमिकों के रूप में। सभी प्रवासित यह चाहते थे कि आने वाली पीढ़ियां अर्थ से, ज्ञान से कमजोर नहीं हो। वे विदेशों में रहकर अपने जीवन में, परिवार के जीवन में विभिन्न प्रकार के बदलाव लाये। अनेकानेक प्रयोग किये । नौकरी से व्यापार तक, चाहे किसी भी तरह का काम हो, सभी में मन लगाकर कार्य किये, अनुभव प्राप्त किये और फिर अपने-अपने जीवन में बदलाव लाये। मुझे लगता है दादाजी को यह बात बहुत प्रभावित किया। वे इस बात को ह्रदय से लगाए होंगे की एक व्यक्ति अपनी मेहनत, सोच और शिक्षा से अपने जीवन में परिवर्तन ला सकता है। वे कालेजों में, शैक्षिक संस्थाओं में युवाओं की एक नई पीढ़ी तैयार करना चाहते थे जो आज़ाद भारत में तत्काल आवश्यकता होने वाली थी। पटना विश्वविद्यालय का लेबर एंड सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट की स्थापना दादाजी की उन्ही सोच का परिणाम था।</p>
<p>प्रोफ़ेसर अमृत धारी सिंह सन 1947 में, जब देश में आज़ादी की क्रांति अपने शिखर पर थी और एक नए सवेरा का उदय होने वाला था, भारत के युवाओं को ध्यान में रखकर दो वर्ष के लिए अमरीका गए थे। दो वर्ष पर उच्च शिक्षा प्राप्त कर सं 1949 में जब भारत वापस आये तो सबसे पहले अपने कॉलेज में पुनः शिक्षण कार्य प्रारम्भ किये। उस समय श्री सी पी एन सिन्हा पटना विश्वविद्यालय के कुलपति थे। वे पहली जनवरी, 1945 से जून 20, 1949 तक कार्यालय में थे। श्री सीपीएन सिन्हा से पूर्व डॉ सच्चिदानंद सिन्हा पटना विश्वविद्यालय के कुलपति थे। उन दिनों शैक्षिक संस्थाओं में राजनीतिक डंडे नहीं चलते थे। शिक्षकों और गुरुजन का बहुत महत्व था। वापस आने के बाद प्रोफ़ेसर अमृत धारी सिंह बिहार में श्रमिकों के हितों और उनके कल्याण से सम्बंधित अध्ययन के लिए पटना विश्वविद्यालय में एक नए विभाग खोलने के महत्व के बारे में चर्चा किये &#8211; श्रम और समाज कल्याण विभाग (लेबर एंड सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट)। प्रोफ़ेसर सीपीएन सिन्हा सहित पटना विश्वविद्यालय के तत्कालीन शैक्षिक अधिष्ठाता प्रोफ़ेसर अमृतधारी सिंह की बातों को बहुत सी महत्व दिया। सभी इस बात पर सहमत थे कि आने वाले समय में बिहार ही नहीं, देश के अन्य राज्यों में औद्योगीकरण के साथ ऐसे दक्ष अभ्यर्थियों की जरुरत होगी जो श्रमिकों और प्रबंधन के बीच एक मजबूत कड़ी के रूप में कार्य करे।</p>
<p>प्रोफ़ेसर अमृत धारी सिंह की बड़ी बेटी श्रीमती माया झा कहती हैं: &#8220;ददाजी (अपने पिता को कहती थीं) एक जमींदार परिवार से होने के बाबजूद, अन्तः मन से एक शिक्षित, संवेदनशील श्रमिक थे, जो अपने समाज में, अपने वर्गों (श्रमिकों) के लोगों के हितों की रक्षार्थ, उनके कल्याण के प्रति हमेशा प्रतिबद्ध रहते थे। राजा-महाराजाओं की किल्लत उस ज़माने में नहीं थी। बिहार में जमींदारों का आभाव नहीं था। रैयतों की किल्लत नहीं थी। दुर्भिक्ष था तो पर्याप्त शिक्षा की, सकारात्मक सोच की, युवाओं और युवतियों का सार्थक मार्गदर्शन की &#8211; और ददाजी में वह सभी बातें कूट-कूट कर भरा था। यही कारण है कि उन दिनों कोई भी व्यक्ति पटना विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर स्तर पर श्रम और समाज कल्याण विभाग खोलने में आपत्ति नहीं किये। और अंततः आज़ाद भारत के प्रथम वर्षगांठ से पहले उनका विभाग खुल गया। आज 74-वर्ष बाद भी उनका नाम इस विभाग से जुड़ा है।&#8221;</p>
<p>पहली अक्टूबर, 1917 से आज तक, यानि विगत 105 वर्षों में पटना विश्वविद्यालय में अब तक 53 कुलपतियों का आगमन हुआ। डॉ के के दत्ता, जो पटना विश्वविद्यालय के 15वें कुलपति थे, से अब तक के कुलपतियों को जानता हूँ &#8211; सत्तर-अस्सी के दशक वाले कुलपति मुझे भी जानते थे &#8211; कुछ नाम से, कुछ निजी तौर पर। लेकिन जब भी सीपीएन सिंह का नाम आएगा, प्रोफ़ेसर अमृत धारी सिंह का और उनके श्रम और समाज कल्याण विभाग का नाम आएगा ही।</p>
<p>बहरहाल कुछ वर्ष पटना विश्वविद्यालय में अध्ययन-अध्यापन करने-करने के बाद प्रोफ़ेसर अमृत धारी सिंह जमशेदपुर (टिस्को) आ गए जहाँ वे शीर्षस्थ पद तक (निदेशक) पहुंचकर सन 1980 में अवकाश प्राप्त किये। अवकाश के बाद वे हथुआ मेटल्स एंड ट्यूब्स लिमिटेड में अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक बने। प्रोफ़ेसर अमृत धारी सिंह कोई तीस वर्ष पहले सं 1992 में अंतिम सांस लिए (मेरे पिता का देहांत भी इसी वर्ष हुआ था) । उनकी पत्नी उनके देहावसान के 18 साल बाद 2010 में उनके पास पहुंची (मेरी माँ भी 18 वर्ष प्रतीक्षा करने के बाद 2010 में मृत्यु को प्राप्त की) ।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/prof-amrit-dhari-singh-who-established-the-postgraduate-labor-and-social-welfare-departments-in-1948">पटना कालेज @ 160 : प्रोफ़ेसर अमृत धारी सिंह, जिन्होंने सन 1948 में स्नातकोत्तर श्रम और समाज कल्याण विभाग स्थापित किये थे (9)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>पटना कालेज @ 160 : अपने दशकों पुराने किसी भी परिचित को देखकर पटना कालेज की मिट्टी, नोवेल्टी एंड कंपनी की सीढियाँ जीवंत हो उठती हैं (8)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Apr 2022 05:11:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विदेश में बिहारी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आज अपने दशकों पुराने किसी भी परिचित को देखकर पटना कालेज की मिट्टी, नोवेल्टी एंड कंपनी की सीढियाँ, दीवारें, यहाँ की मिट्टी, कुर्सियां, बैठकी मानो जीवंत हो उठती हैं, सम्वेदना की पराकाष्ठा पर पहुँच जाती हैं – जैसे एक दूसरे से बातचीत करती हों &#8211; मेरे जन्म के तीन साल बाद, यानी 1962 में बिरेन [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आज अपने दशकों पुराने किसी भी परिचित को देखकर पटना कालेज की मिट्टी, नोवेल्टी एंड कंपनी की सीढियाँ, दीवारें, यहाँ की मिट्टी, कुर्सियां, बैठकी मानो जीवंत हो उठती हैं, सम्वेदना की पराकाष्ठा पर पहुँच जाती हैं – जैसे एक दूसरे से बातचीत करती हों &#8211; मेरे जन्म के तीन साल बाद, यानी 1962 में बिरेन नाग के निर्देशन में हेमंत कुमार एक फिल्म बनाये थे। नाम था &#8220;बीस साल बाद।&#8221; इस फिल्म में वहीदा रहमान, बिश्वजीत चटर्जी, मनमोहन कृष्णा, असित सेन मुख्य किरदार की भूमिका निभाए थे । उस ज़माने में शायद &#8221;बीस साल बाद&#8221; पहली फिल्म थी जिसकेनिर्माता, निर्देशक, गीतकार और गायक/गायिका को फिल्फेयर पुरस्कार से नबाजा गया था।आज छः दशक बीत गए &#8221;बीस साल बाद&#8221; फिल्म के बड़े-बड़े पोस्टरों को सिंनेमा घरों मेंचढ़े और उतरे। लेकिन आज भी भारत के हरेक तबके के लोगों के होठों पर, चाहे मर्द हों या महिला, बच्चे हों या बूढ़े, उस फिल्म के कम से कम तीन बेहतरीन गीत बार बार आते हैं। जैसे गीतकार शकील बदायुनी साहब कल ही लिखें हों और लता मंगेशकर, हेमंत कुमार कल ही गीत को गाये हों ।</strong></p>
<p>हमें ख़ुशी है कि वहीदा जी और बिश्वजीत बाबू आज स्वस्थ हैं और हमारे बीच हैं। पटना कॉलेज के 160 वर्ष के उपलक्ष में मैं इस कहानी के माध्यम से शकील बदायुनी (20 April 1970), हेमंत कुमार (26 सितम्बर, 1989), असित सेन (25 August 2001) और लता मंगेशकर (6 February 2022) को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ क्योंकि &#8220;सपने सुहाने लड़कपन के &#8211; मेरे नैनो में डोले बहार बन के&#8221;, जरा नजरों से कह दो जी निशाना चूक न जाए&#8221; और &#8220;बेक़रार करके हमें यूँ न जाइये आपको हमारी कसम लौट आइये) पटना कालेज में ही नहीं, पटना विश्वविद्यालय में ही नहीं, भारत के सभी शैक्षिक संस्थानों में जहाँ &#8220;प्यार&#8221; जीवित है, चाहे &#8220;निर्जीव पाठ्य-पुस्तकों&#8221; से हो या &#8220;सजीव आत्मा&#8221; से। क्योंकि हमारा शैक्षिक संस्थान निर्जीव होते हुए भी हमें आत्मबोध कराता है। अब सवाल यह है कि हम सजीव होते हुए भी ईंट-पत्थर से बनी उस निर्जीव संस्थान को कितना सम्मान देते हैं, याद रखते हैं &#8211; अपने अंतिम सांस तक।</p>
<p>हम भाग्यशाली हैं कि जहाँ हमने माध्यमिक शिक्षा ग्रहण किया (टी के घोष अकादमी, पटना), हमारा महाविद्यालय उस प्रवेश द्वार के सामने स्थित था, आज भी है और कल भी रहेगा। यह अलग बात है कि हमारा विद्यालय, हमारे महाविद्यालय से 19 वर्ष छोटा है। होना भी चाहिए क्योंकि यहाँ हमें माध्यमिक तक शिक्षा मिलती थी, तो छोटा भाई; और पटना कालेज में उच्चतर शिक्षा प्राप्त होती थी, इसलिए बड़ा भाई। पटना ही नहीं, संभवतः बिहार और भारत में ऐसा शायद ही कोई स्थान होगा जहाँ विद्यालय और महाविद्यालय आमने-सामने एक दूसरे को अपने स्थापना काल से निहार रहे हों। कल ही की तो बात थी अपने विद्यालय के प्रवेश द्वार पर खड़ा था और सोच रहा था कि दोनों संस्थाएं एक-दूसरे से क्या-क्या बात करती होंगी। पहला सवाल आया कि शायद वे एक दूसरे से पूछती होंगी की तुम्हारे संस्थान से उत्तीर्ण छात्र &#8211; छात्राएं परिसर से बाहर निकलने के बाद कभी विद्यालय/महाविद्यालय के दीवारों से, मैदाओं से, कक्षाओं से, ब्लेक बोर्डों से हाल-चाल पूछने ये या नहीं ? इस प्रश्न को मन में लेते ही आखें अश्रुपूरित हो गयी क्योंकि 99.5 फीसदी मामलों में उत्तर &#8220;नकारात्मक&#8221; ही होता होगा। खैर। आज समय है कि हम एक बार स्वयं से पूछें। खैर।</p>
<p>पटना कॉलेज के स्थापना काल से न जाने कितने लाख छात्र-छात्राएं शिक्षा ग्रहण कर यहाँ से निकले होंगे अपने-अपने जीवन के निर्माण में। लेकिन पटना कॉलेज का एक छात्र अपने जीवन के अंतिम सांस तक पटना कॉलेज की दीवारों से खुद को अलग नहीं कर सके। यही कारण है कि स्वयं को किताबों की दुनिया में समर्पित कर अपना रिश्ता पटना कॉलेज से, यहाँ के छात्र-छात्राओं से, प्राध्यापकों से, गैर-शैक्षिक कर्मचारियों से जोड़े रहे। और जब मैं अपने पिता के पास पटना आया तो उस समर्पित व्यक्ति के सानिग्ध में अपने पिता को देखा।</p>
<p>पटना कालेज के पत्र संख्या 557 के अनुसार, जो 12 अप्रैल, 1944 के लिखा गया था, पटना कॉलेज के तत्कालीन प्राचार्य हसानन्द राधा कृष्णा बठेजा लिखते हैं: &#8220;This is to certify that Tara Nand Jha (of 1st year class) hasbeen a student of this college since June 1943 and has during this periodprosecuted studies for the I.A. Examination. He bears good moralcharacter and his conduct has been satisfactory. His application in his studieshas been satisfactory. He took part in theextra-curricular activities of the college.&#8221;</p>
<p>एक साल बाद, यानी 2 मई, 1945 को पटना कॉलेज के एथलेटिक क्लब के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर एस. के. घोष लिखते हैं: &#8220;I am glad to certify that Mr. T. N. Jha has been a student of mycollege for two years and was a prominent figure in the Athletic Club of the college.He happened to be one of the regular players in thefirst eleven of the college football team taking anactive part in the Annual sports of the college. He is really a very goodsportsman with smart and healthy habits. I wish him success in life.&#8221;</p>
<p>समय बदल रहा था। तारा बाबू की मेहनत और विश्वास रंग लाने लगी थी। पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के बैचलर क्वाटर्स के ठीक सामने दो-तल्ला का एक मकान खरीदकर आ गए। इस दो मंजिले मकान में कुछ वर्ष दूकान चलाई गई थी। मैं उस मकान से अपनी जीवन यात्रा अपने पिता, ताराबाबू, उनके बेटा-बेटियों के परिवार के बीच किताब की सुगंध को सूंघते जीवन यात्रा शुरू किया था। साल सं 1965 था। अगले वर्ष 1966 के जनवरी महीने से पुराने को मकान तोड़ना प्रारम्भ हो गया था। हम सभी उस स्थान से पीछे वली मंजिल (बेगम साहेब) स्थित एक गैरेज में आ गए थे।</p>
<p>नोवेल्टी उसी गैरेज में चल रहा था और हम अपने पिता के साथ उस गैरेज के बगल एक छोटे से कमरे में रहता था। तारा बाबू बहुत ही अनुशासित व्यक्ति थे, पटना कॉलेज के प्रशासन की तरह। कोई 12 महीने के भीतर तारा भवन बन कर तैयार हो गया। पूरा मकान सीमेंट के रंग का और बॉर्डर मैरून रंग का। उस ज़माने में वह एकलौता मकान था उतना ऊँचा। फिर उसी मकान में नोवेल्टी ला हाउस 1967 में ही खोला गया और वृहस्पतिवार 4 जनवरी 1968 को पटना लाॅ जर्नल रिपोर्ट्स PLJR का उद्घाटन करवाया गया। नोवेल्टी लाॅ हाऊस से कानूनी पुस्तकें भी प्रकाशित की गई थी।‌</p>
<p>उन दिनों पटना अशोक राज पथ के बाएं तरफ पटना विश्वविद्यालय के कॉलेजों, जैसे पटना कालेज, साइन्स कालेज, मेडिकल कॉलेज का पिछले बॉउंड्री गंगा के किनारे समाप्त होता था। सम्पूर्ण इलाक़ा खुला-खुला था। पटना कालेज मुख्य द्वार से कोई दो सौ कदम आगे बाएं तरफ अशोक राज पथ से नीचे निकलती थी खजांची रोड, जो जो अशोक राज पथ के समानांतर बारी पथ से मिलती थी। इसी बारी पथ (अब नया टोला) पर जहाँ खजांची रोड बारी पथ से मिलती थी, बाएं हाथ पर नोवेल्टी स्टेशनर्स दूकान थी। यह दूकान, आज की काजीपुर आवासीय मोहल्ला में प्रवेश लेने वाली गली के ठीक सामने स्थित नालंदा ब्लॉक सेन्टरथी।</p>
<p>आज की पीढ़ी शायद खजांची रोड का भारत के राजनीतिक मानचित्र पर क्या महत्वहै, नहीं जानते होंगे। इसी खजांची रोड के बीचो-बीच (आधी दूरी अशोक राज पथ और आधीदूरी बरी पथ) दाहिने तरफ एक दो माजिला मकान पश्चिम बंगाल के द्वितीय मुख्य मंत्री श्री विधान चंद्र रॉय का जन्मस्थान है।</p>
<p>विधान चंद्र रॉय का जन्म 1 जुलाई, 1882 को पिता प्रकाश चंद्र रॉय और माता अघोर कामिनी देवी के घर में हुआ था। आज भी वह स्थान बिधान चंद्र रॉय की माता “अघोर” को समर्पित है और वहां एक बच्चों का विद्यालय है – अधोर शिशु विद्या मंदिर। विधान चंद्र रॉय की प्रारम्भिक शिक्षा पटना के अशोक राज पथ पर स्थित, या यूँ कहें कि आज के नोवेल्टी एंड कंपनी दूकान से कोई पांच सौ गज की दूरी पर स्थित टी के घोष अकादमी और पटना कॉलेजिएट स्कूल में 1897 तक हुआ था। बाद में, उन्होंने आईए प्रेसिडेंसी कालेज कलकत्ता से और बी ए (गणित में सम्मान के साथ) पटना कालेज से किये। श्री रॉय जनबरी 1948 से जुलाई 1962 तक कोई साढ़े बारह वर्ष तक पश्चिम बंगाल के मुख्य मंत्री रहे।</p>
<p>बाबूजी कहते थे सन 1937-38 में नोवेल्टी स्टेशनरी को श्री जय नाथ मिश्र चलाते थे। श्री तारा बाबू उस समय, यानि 1940-41 से 1944-45 तक काॅलेज में पढ़ते थे। उन दिनों वे अपने नित्य के समय से न्यूनतम एक घंटा समय निकाल कर और अवकाश के दिनों 5 &#8211; 6 घंटा श्री जयनाथ बाबू को उनके कार्यों में सहयोग करते थे। तारा बाबू सं 1945 में स्नातक करने के बाद स्नातकोत्तर वर्ग में प्रवेश तो लिए, परन्तु, महज 5-6 महीना ही पढाई को आगे बढ़ा पाए।</p>
<p>बारी पथ में &#8216;नोवेल्टी स्टेशनर्स&#8217; की दूकान मकान के नीचे थी और ऊपर मालिक सपरिवार रहते भी थे। बाद में वह स्थान बिहार स्टोर्स (तेज नारायण झा) को दिया गया जब मालिक खजान्ची रोड स्थित राजा राम मोहन रॉय सेमिनरी स्कूल के सामने आ गए ।‌ कुछ समय बाद, यह स्थान उस ज़माने के विख्यात दशरथ बाइंडर को देकर नोवेल्टी स्टेशनर्स के साथ-साथ मालिक भी सपरिवार अशोक राज पथ पर स्थित खुदा बख्श खां लाइब्रेरी के सामने पेट्रोल पम्प के ठीक बगल में आ गए।</p>
<p>यह पेट्रोल पम्प उन दिनों अशोक राज पथ का लैंड मार्क था। कारण यह था की अशोक राज पथ पर गुलजार बाग़-पटना सिटी से लेकर गाँधी मैदान तक कोई भी पेट्रोल पम्प नहीं था। यह तत्कालीन वाहन मालिकों का एक पसंदीदा स्थान भी हुआ करता था। इसके दोनों तरफ दवाई की दूकानें हुआ करती थी और सामने बिहार यंग मैन्स इंस्टीच्यूट का दफ्तर। इस स्थान पर कुछ वर्ष रहने के बाद यहीं बगल में एक दूसरी दूकान सेन्ट्रल स्टोर्स वाले, जो लवणच्युस बेचते थे, को 1960 में दे दिया गया।</p>
<p>उस ज़माने में श्री जयनाथ बाबू लहेरियासराय पुस्तक भंडार में मैनेजर बनकर चले गए। उसी समय तारा बाबू ने उसे नोवेल्टी एण्ड कम्पनी बनाकर स्वयं पुस्तकों को By A Professor लेखक बनकर ‌लिखना प्रारम्भ किया। उन्होंने कई पुस्तकों का नोट भी लिखा था जो बहुत बिकता था। उदाहरण: फ्री इंडिया बुक फोर का नोट भी उन्होंने लिखा था जो प्रकाशित होने के बाद एक लाख से दो-तीन लाख प्रतियों तक बिकता था। इन्हीं प्रकाशनों ने नोवेल्टी एण्ड कम्पनी को बाद में एक हद तक अजन्ता प्रेस प्राइवेट लिमिटेड को बनाया जिसके दो प्रबन्ध निदेशक थे: एक जयनाथ मिश्र दूसरे श्री तारा बाबू के अपने चाचा थे।</p>
<p>बहरहाल, उस दिन मैं अपने पिता के पीछे गलियारे से दूकान में प्रवेश-द्वार के पास दरवाजे का ओट लिए खड़ा था। पिता की सम्पूर्ण शरीर हमारे शरीर को ढंके हुए था। हमारे बाएं हाथ पर तारा भवन के ऊपर वाले तल्ले पर जाने के लिए लिफ्ट था, जो अक्सर हां हम उम्र में बहुत छोटे होने के बाद भी चलते थे, पेट भरके लिए। लिफ्ट में चढ़ने वाले महानुभाव लोग मुझे अपने दाहिने-बाएं हाथों से सर पर हाथ रखते चले जाते थे। मेरी निगाह पिता के सामने कोई पांच फिर की दूरी पर बैठे उस भवन के स्वामी पर थी। वे दिखाई तो नहीं दे रहे थे, लेकिन उनकी आवाज उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को, शारीरिक हाव-भाव को आखों के सामने आईने के तरह साफ़-साफ़ दिखता था।</p>
<p>हमारे पीछे से गंगा छोड़ से आने वाली हवा जली दूध की खुसबू वाली चाय का सुगंध ला रहा था। दूकान पर जगना बैठा था और सामने फुटपाथ पर कई ग्राहक खड़े थे। कोई चाय की चुस्की ले रहे थे, तो कोई अपनी पाली की प्रतीक्षा में टुकुर-टुकुर उबलती चाय के वर्तन को देख रहे थे। मैं भी मालिक की बातों का, उनके मुख से निकलने वाले प्रत्येक शब्दों की प्रतीक्षा कर रहा था। मन ही मन सोच भी रहा था कि क्या होगा ?</p>
<p>मालिक बाबूजी को आवाज देकर बुलाये थे। इससे पहले वे मुझे दूकान में चहलकदमी करते देखे थे। वे बहुत ही मृदुल परन्तु कठोर व्यक्तित्व के मानव थे। अनुशासन उनके जीवन का अस्त्र था। समय के बहुत बहुत पावंद थे। घडी की सूई भी अपना समय दूकान में उनके प्रवेश से मिलती थी। बाबूजी वहीँ खड़े थे। मालिक अब तक सामने मेज पर रखे कुछ कागजातों को देख रहे थे। उन दिनों औसतन उनके मेज पर किताबों का प्रूफ रखा होता था जो वे खुद भी देखा करते थे। अचानक वे अपनी गर्दन उठाये, सामने बाबूजी खड़े थे। वे अपना दोनो हाथ आगे एक-दूसरे के ऊपर रखकर चुपचाप खड़े थे। बाबूजी के तरफ देखते और फिर अपनी आँखों को दाहिने-बाएं घुमाते, बाबूजी से पूछते हैं:</p>
<p>गोपालजी, आप अपने बच्चे को स्कूल में अब तक दाखिला नहीं कराया है? बाबूजी लम्बी साँसे लेते कहते हैं: नाम लिखाया था मालिक खजांची रोड में। लेकिन दो महीने से फ़ीस नहीं देने के कारण नाम कट गया। स्कूल में कुछ शिक्षक नगर निगम के विद्यालय में पढ़ने को कहा, यह बात उसे अच्छी नहीं लगी।&#8221; कुछ और बातें बाबूजी कह रहे थे। मालिक अपने दाहिने हाथ में पेन्सिल को घूमा रहे थे। बाएं हाथ का तलहथ्थी गाल पर था। वे टकटकी निगाहों से बाबूजी की बातों को सुन रहे थे। मैं मालिक और बाबूजी की बातों को सुन रहा था। दूकान में उपस्थित सभी लोग शांत थे। किसी भी कोने से चूं की आवाज नहीं आ रही थी। ऐसा लग रहा था की भगवान् कृष्ण अपने गलों पर हाथ रखकर, अपने चक्र को उंगलियों पर घुमा रहे थे। सम्पूर्ण वातावरण शांत था।</p>
<p>इसी बीच मालिक अपने सामने रखे काले रंग के फोन के रिसीवर को उठाए। दाहिने हाथ की पहली उंगली से पांच अंकों को पांच बार घुमाए। दूसरे छोड़ से कुछ घंटी बजने के बाद आवाज आया। इससे पहले की दूसरे छोड़ वाले कुछ बोलते, मालिक कहते हैं: &#8220;हेल्लो !! आचार्यजी हैं क्या? मैं नोवेल्टी से तारा बाबू बोल रहा हूँ।&#8221; दूसरे छोड़ पर टी के घोष अकादमी के प्राचार्य ही थे। मालिक उनसे कहते हैं: &#8220;प्राचार्य जी, गोपाल झा को आप जानते ही हैं। उनका एक छोटा बच्चा है। उसे छठे वर्ग में प्रवेश दे देते तो उपकार होता।&#8221; फिर दोनों के बीच कुछ बातें हुई और बाबूजी को आदेश हुआ कल विद्यालय जाकर प्रवेश दिलाना। ख़ुशी तो उन्हें बहुत थी, मैं भी बहुत चहक रहा था। लेकिन मन में हिन्दमहासागर जैसा तूफ़ान उठ रहा था।</p>
<p>बाबूजी पैसा कहाँ से लाएंगे ? तभी मालिक अपनी जेब से 30 रुपये निकालकर मुस्कुराते बाबूजी के हाथ में दिए। दृश्य ह्रदय-विदारक था। ऐसा लग रहा था कि जीवन के इस युद्ध को किसी भी हालत में जीतना है और इसके लिए कृष्ण अंततः संकल्प ले चुके। बाबूजी धोती के खूंट से अपनी आँखों को पोछते जैसे ही पीछे मुड़े, मुझे देखकर बिलखने लगे और रो दिए। पिता-पुत्र एक दूसरे को देखते, समय के महत्व को समझते मालिक के तरफ देखते दृश्य से अदृश्य हो गए। साल था 1968 और मैं दूसरे दिन मैं बन गया टी के घोष अकादमी स्कूल का छात्र – कभी अंत नहीं होने वाली एक शैक्षिक जीवन की शुरुआत। इस जीवन की शुरुआत अशोक राज पथ, पटना का पांच-मंजिला मकान &#8220;तारा भवन&#8221; के नीचले तल्ले पर किताबों के विभिन्न गंधों से सुगन्धित नोवेल्टी एण्ड कम्पनी (प्रकाशक और पुस्तक विक्रेता) से ही हुयी। बाबूजी कहते थे जीवन में जब भी मेहनतकश इन्शान का उदाहरण देने की आवश्यकता पड़े, मालिक का उद्धरण देना।&#8221;</p>
<p>मालिक के उपकार का दृष्टान्त देते एक रात बाबूजी कहे थे: &#8220;उस दिन मालिक तुम्हे विद्यालय में प्रवेश के लिए हमसे पूछे थे। कौन पूछता है किसी को ? वह भी जो अर्थ से दीन हो। हम आज के युग की शिक्षा ग्रहण नहीं किये हैं परन्तु जो शिक्षा मेरे पास है, उसका कद्र करना मालिक जानते हैं। इसलिए तुम्हारे प्रवेश के लिए हमें 30 रुपये दिए। तुम आधुनिक शिक्षा से खुद को सज्ज करना। आने वाले समय में अपने संतानों को भी तत्कालीन शिक्षा से सज्ज रखना। शिक्षा ही समस्त समस्यों का अंत है।</p>
<p>आधुनिक बिहार के प्रकाशकों और पुस्तक विक्रेताओं को शायद यान मालूम नहीं होगा कि पटना के मशहूर प्रकाशक और पुस्तक विक्रेता नोवेल्टी एण्ड कम्पनी के संस्थापक उस ज़माने के एक बेहतरीन फुटबॉल खिलाडी थे। वे बेहतरीन गोलकीपर थे। उन्हें अपने जीवन में बहुत उम्दा अवसर मिला जीवन को संवारने के लिए। कभी पुलिस कस्टम विभाग से नियुक्ति पात्र आये तो कभी मुंसिफ़ मजिस्ट्रटेट के पद पर नियुक्ति हेतु। लेकिन जीवन तो किसी और तरफ जाना था, खासकर किताबों की खुसबू की ओर, किताबों से भारत के भविष्य को संवारने का जबाबदेही की ओर। वही हुआ, जो प्रारब्ध था।</p>
<p>कहते हैं इस दूकान और दूकान की पुस्तकों की छाया में पटना ही नहीं, अविभाजित बिहार के लाखों-करोड़ों छात्र-छात्राएं विद्यार्थी-अवस्था से वयस्क हुए, और फिर वृद्ध भी।जिस तरह नए किताब के सफ़ेद पन्ने समय और उम्र के साथ अपना रंग बदलते, एक गजब की खुसबू छोड़ते सफ़ेद से सीपिया रंग का हो जाता है, जो इस बात का गवाह होता है की उसने अपने रंग यूँ ही नहीं बदले, बल्कि लोगों को जीने का सबक सीखाते बड़ा हुआ है – पटना कॉलेज प्रांगण से और पटना के अशोक राज पथ पर स्थित नोवेल्टी की सीढ़ियों पर बैठकर न जाने कितने लोग महज मनुष्य से इन्शान बने और इतिहास में अपना नाम हस्ताक्षरित किये।</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/the-stairs-of-patna-college-soil">पटना कालेज @ 160 : अपने दशकों पुराने किसी भी परिचित को देखकर पटना कालेज की मिट्टी, नोवेल्टी एंड कंपनी की सीढियाँ जीवंत हो उठती हैं (8)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>पटना कॉलेज@160:  कोई भी प्राध्यापक, व्याख्याता, प्राचार्य,  रजिस्ट्रार, कुलपति, चपरासी नहीं होंगे जो हरिहर की दूकान पर लस्सी नहीं पिये होंगे  (7)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Apr 2022 05:02:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विदेश में बिहारी]]></category>
		<category><![CDATA[Banaras]]></category>
		<category><![CDATA[paan]]></category>
		<category><![CDATA[Patna]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पटना विश्वविद्यालय, पटना कॉलेज, साइंस कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज के कोई भी छात्र, कोई भी छात्राएं, कोई भी प्राध्यापक, कोई भी व्याख्याता, कोई भी प्राचार्य, कोई भी रजिस्ट्रार, कोई भी कुलपति, कोई भी चपरासी, कोई भी रिक्शावाला, कोई भी नेता, कोई भी पिछलग्गु, कोई भी पंडित, कोई भी पुजारी, कोई भी मुसलमान, कोई भी [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/there-shall-be-no-professor-lecturer-principal-who-has-not-had-lassi-at-harihars-shop">पटना कॉलेज@160:  कोई भी प्राध्यापक, व्याख्याता, प्राचार्य,  रजिस्ट्रार, कुलपति, चपरासी नहीं होंगे जो हरिहर की दूकान पर लस्सी नहीं पिये होंगे  (7)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पटना विश्वविद्यालय, पटना कॉलेज, साइंस कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज के कोई भी छात्र, कोई भी छात्राएं, कोई भी प्राध्यापक, कोई भी व्याख्याता, कोई भी प्राचार्य, कोई भी रजिस्ट्रार, कोई भी कुलपति, कोई भी चपरासी, कोई भी रिक्शावाला, कोई भी नेता, कोई भी पिछलग्गु, कोई भी पंडित, कोई भी पुजारी, कोई भी मुसलमान, कोई भी सिख, यानी पटना की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा, जो पटना सिटी से ऐतिहासिक गांधी मैदान जाने वाली उम्र से लम्बी सड़क &#8211; अशोक राजपथ &#8211; से यात्रा किये होंगे, कभी-न-कभी हरिहर की दूकान पर लस्सी अवश्य पिए होंगे और फिर मगही पान, बनारसी पान, मीठा पान अवश्य खाये होंगे ।</strong></p>
<p>बनारस के बाबू बिश्वनाथ मुखर्जी साहेब कहते हैं कि बनारस में पान की खेती नहीं होती, लेकिन हज़ारों-हज़ार पान की दुकानें हैं। इसके अलावा ‘डलिया’ में बेचने वालों की संख्या कम नहीं है। प्रत्येक चार दुकान या चार मकान के बाद आपको पान की दुकानें मिलेंगी। मोहल्ला के मकानों, गलियों और सारे शहर की सड़कों पर पान की पीक की मानो होली खेली जाती थी। वैसे अब भी होती होगी, लेकिन सुनते हैं सिपाही जी तुरंत दण्डित कर देते हैं। वैसे यहाँ के दुकानदार अपनी दुकान में किसी किस्म की गंदगी रखना पसन्द नहीं करते, सिवाय अपने हाथ और कपड़ों को कत्थे के रंग से रंग कर रखने के, वह सभी सामान खूब साफ रखता है। आदमकद शीशा, कत्थे का बर्तन, चूने की कटोरी, सुपारी का बर्तन और पीतल की चौकी माँज-धोकर वह इतना साफ रखता है कि बड़े-बड़े कर्मकांडी पंडित के पानी पीने का गिलास भी उतना नहीं चमक सकता।</p>
<p>लगभग सभी किस्मों के पान यहाँ आते हैं जैसे जगन्नाथ जी से, गया से और कलकत्ता आदि स्थानों से आते हैं। पान का जितना बड़ा व्यावसायिक केन्द्र बनारस है, शायद उतना बड़ा केन्द्र विश्व का कोई नगर नहीं है। काशी में इसी व्यवसाय के नाम पर दो मोहल्ले बसे हुए हैं। सुबह सात बजे से लेकर ग्यारह बजे तक इन बाजारों में चहल-पहल रहती है। केवल शहर के पान विक्रेता ही नहीं, बल्कि दूसरे शहरों के विक्रेता भी इस समय इस जगह पान खरीदने आते हैं। यहाँ से पान ‘कमाकर’ विभिन्न शहरों में भेजा जाता है। ‘कमाना’ एक बहुत ही परिश्रम पूर्ण कार्य है &#8211; जिसे पान का व्यवसायी और उसके घर की महिलाएं करती हैं, यह ‘कमाने’ की क्रिया ही बनारसी पान की ख्याति का कारण है। इस समय भी बनारस में दस हजार से अधिक पुरुष और स्त्रियां ‘कमाने’ का कार्य करते हैं।</p>
<p>वैसे बनारस की जनता मगही पान के आगे अन्य पान को ‘घास’ या ‘बड़ का पत्ता’ संज्ञा देती है, किन्तु मगही पत्ता के अभाव में उसे जगन्नाथी पान का आश्रय लेना पड़ता है, अन्यथा प्रत्येक बनारसी मगही पान खाता है। इसके अलावा साँची-कपूरी या बंगला पान की खपत यहाँ नाम मात्र की होती है। हो भी कैसे &#8211; ममता बनर्जी के राज्य से आने वाला पत्ता कहीं नरेंद्र मोदी जी के राज में बिके। विश्वनाथ मुखर्जी साहब कहते हैं कि ‘बंगला पान’ बंगाली और मुसलमान ही अधिक खाते हैं। मगही पान इसलिए अधिक पसन्द किया जाता है कि वह मुंह में जाते ही घुल जाता है।</p>
<p>धुलने का अर्थ है पान मुँह में रखकर लार को इकट्ठा करना और यह लार जब तक मुँह में भरी रहती है, पान घुलता है। कुछ लोग उसे नाश्ते की तरह चबा जाते हैं। पान की पहली पीक फेंक दी जाती है ताकि सुर्ती की निकोटिन निकल जाए। इसके बाद घुलाने की क्रिया शुरू होती है। अगर आप किसी बनारसी का मुँह फूला हुआ देख लें तो समझ जाइए कि वह इस समय पान घुला रहा है। पान घुलाते समय वह बात करना पसंद नहीं करता। अगर बात करना जरूरी हो जाए तो आसमान की ओर मुँह करके आपसे बात करेगा ताकि पान का, जो चौचक जम गया होता है, मज़ा किरकिरा न हो जाए। शायद ही ऐसा कोई बनारसी होगा जिसके रूमाल से लेकर पजामे तक पान की पीक से रँगे न हों। गलियों में बने मकान कमर तक पान की पीक से रंगीन बने रहते हैं। भोजन के बाद तो सभी पान खाते हैं, लेकिन कुछ बनारसी पान जमाकर निपटने (शौच करने) जाते हैं, कुछ साहित्यिक पान जमा कर लिखना शुरू करते हैं और कुछ लोग दिन-रात गाल में पान दबाकर रखते हैं।</p>
<p>बनारसी पान में कत्था विशेष ढंग से बनाकर प्रयोग किया जाता है। पहले कत्थे को पानी में भिगो देते हैं। अगर उसका रंग अधिक काला हुआ तो उसे दूध में भिगोते हैं। फिर उसे पकाकर एक चौड़े बर्तन में फैला दिया जाता है। कुछ घंटे बाद जब कत्था जम जाता है तब उसे एक मोटे कपड़े में बाँधकर सिल या जाँता जैसे वजनी पत्थर के नीचे दबा देते हैं। इससे कसैलापन और गरमी निकल जाती है। इसके पश्चात सोंधापन लाने तथा बाकी कसैलापन निकालने के लिए उसे गरम राख में दबा दिया जाता है। इतना करने पर वह कत्था थक्का-सा हो जाता है। बनारसी पान में जिस प्रकार कत्था-सुपारी अपने ढंग की होती है, उसी प्रकार चूना भी। ताजा चूना यहाँ कभी प्रयोग में नहीं लाते। याद रखिए कोई भी बनारसी पान विक्रेता अपने पान की दुकान की चौकी पर हाथ लगाने नहीं देता और न लखनऊ, दिल्ली, कानपुर, आगरा की तरह चूना माँगने पर चौकी पर चूना लगा देगा कि आप उसमें से उंगली लगाकर चाट लें। आप सुर्ती खाते हैं तो आपको अलग से सुर्ती देगा &#8211; यह नहीं कि जर्दा पूछा और अपनी इच्छा के अनुसार जर्दा छोड़ दिया। यहाँ तक कि चूना भी आपको अलग से देगा। आप उसकी दुकान छू दें, यह उसे कतई पसन्द नहीं, चाहे आप कितने बड़े अधिकारी क्यों न हों!</p>
<p>बनारस की पान की बात इसलिए यहाँ कर रहा हूँ क्योंकि पचास के दशक से कोई 2010 तक पटना विश्वविद्यालय, पटना कॉलेज, साइंस कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज के कोई भी छात्र, कोई भी छात्राएं, कोई भी प्राध्यापक, कोई भी व्याख्याता, कोई भी प्राचार्य, कोई भी रजिस्ट्रार, कोई भी कुलपति, कोई भी चपरासी, कोई भी रिक्शावाला, कोई भी नेता, कोई भी पिछलग्गु, कोई भी पंडित, कोई भी पुजारी, कोई भी मुसलमान, कोई भी सिख, यानी पटना की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा, जो पटना सिटी से ऐतिहासिक गांधी मैदान जाने वाली उम्र से लम्बी सड़क &#8211; अशोक राजपथ &#8211; से यात्रा किये होंगे, कभी-न-कभी हरिहर की दूकान पर लस्सी अवश्य पिए होंगे और फिर मगही पान, बनारसी पान, मीठा पान अवश्य खाये होंगे।</p>
<p>आप विश्वास नहीं करेंगे (मत करें) लेकिन सच यह है कि पटना मेडिकल कालेज के प्राचार्य से लेकर, पटना कॉलेज के प्राचार्य और कुलपति तक, संध्याकाळ अपने घर से रिक्शा पर बैठ कर आते थे, हरिहर की दूकान पर लस्सी पीते थे और फिर एक बर्तन में अपने बच्चों के लिए भी ले जाते थे। इतना ही नहीं, रविवार के दिन देर संध्याकाल सज-धज कर अपनी पत्नी, बच्चों के साथ घूमते-टहलते हरिहर की दूकान तक आते थे, जैसे पिकनिक पर जा रहे हों, लस्सी पीते थे, पान खाते थे और फिर मुस्कुराते घर जाते थे। एक और बात बताता हूँ &#8211; भारत के मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी शब्बा करीम, जो पटना के खजांची रोड में रहते थे, और हरिहर की दूकान से उनके घर की दूरी महज एक &#8220;सिक्सर&#8221; वाली दूरी थी, गर्मी के दिनों में दोनों भाई लगभग रोज हरिहर की दूकान पर लस्सी का आनंद लेते थे। उससे भी अधिक मजेदार बात यह है कि सप्ताह में दो बार बनारस की यात्रा करते थे &#8211; वजह: बर्फ लाने के लिए, पान लाने के लिए ।</p>
<p>आज की पीढ़ी विस्वास नहीं करेगी कि खजांची रोड जिस स्थान पर पटना के अशोक राजपथ से मिलती है, वहां से और उसके सौ कदम आगे जो रास्ते महाराजाधिराज डॉ सर कामेश्वर सिंह का दरभंगा हॉउस होते गंगा की ओर जाती है, उन दोनों सड़कों के मध्य, सड़क की दाहिने तरफ वली मंजिल के प्रवेश द्वार पर श्री हरिहर एक आना प्रति गिलास (750 एमएल) लस्सी बेचते थे और पटना विश्वविद्यालय, खासकर पटना मेडिकल कॉलेज तथा पटना कॉलेज के तत्कालीन छात्र-छात्राओं-प्राध्यापकों के अनुरोध पर वह &#8216;बनारस&#8217; से वर्फ के सिल्ले लाते थे ताकि लस्सी ठंढा रहे और मजा बरकरार रहे। उन दिनों पटना में अथवा पटना के आसपास किसी भी शहर में वर्फ ज़माने का उद्योग नहीं था। हरिहर अपने लस्सी को एक आना से दस वर्ष पूर्व जब वे अंतिम सांस लिए, पच्चीस रुपये प्रति गिलास तक बेचे और अपने उपभोक्ताओं को अन्तःमन तक संतुष्ट किये । एक आने से पच्चीस रूपये की यात्रा कोई सत्तर वर्ष से भी अधिक का रहा जब वह अपनी दूकान, अपने मित्रमंडली, अपने हज़ारो-हज़ार शुभचिंतकों, हज़ारों प्राध्यापकों, हज़ारों अधिकारियों, हज़ारों चिकित्सकों को छोड़कर अपनी अनंत यात्रा पर निकले।</p>
<p>हरिहर को मैं कभी गुस्सा में नहीं देखा। इतना ही नहीं, उसके मुख पर हमेशा खुशियाँ और मुस्कान रहता था। उन दिनों पटना कॉलेज के साथ-साथ पटना मेडिकल कालेज के छात्र-छात्राएं-प्राध्यापक उससे अक्सरहां पूछते थे कि &#8220;इस मुस्कान का राज क्या है?&#8221; और हरिहर मुस्कुरा देता था। इस कहानी में जिस तस्वीर को आप देख रहे हैं वह हरिहर का छोटा बेटा अरुण है जो पिताजी के साथ उन दिनों अपनी दुकान पर एक छोटे टेबल पर बैठा होता था और चम्मच से पिताजी द्वारा बनाये लस्सी में &#8220;मलाई&#8221; डालता था। उन दिनों लस्सी पीने वाले ग्राहक हरिहर और गिलास में रखे लस्सी को कम, इसके हाथों की चम्मच को अधिक देखते थे। शायद में सोचते भी होंगे की &#8220;बच्चा है मलाई अधिक डालेगा।&#8221; हरिहर दस वर्ष पूर्व कोई नब्बे + वर्ष की आयु में मृत्यु को प्राप्त किया। हरिहर का बड़ा बेटा अरविन्द, जो अपने पिता के साथ कंधे-से-कंधे मिलाकर पटना विश्वविद्यालय के छात्रों को, छात्रों को खुश रखता था, अपने पिता के पास ही है।</p>
<p>उस पान की दूकान पर हरिहर अपनी जिंदगी की शुरुआत उस समय किये जब पटना कालेज का परिसर विद्यार्थियों से धीरे-धीरे भर रहा था। परिसर में किताबों के पन्नों की खुसबू उत्तरोत्तर बढ़ रही थी। साल पचास के दशक से पूर्व का है, लेकिन मैं हरिहर को सन 1965 से जानता हूँ जब मैं बाबूजी के पास तत्कालीन दो तल्ला नोवेल्टी एंड कंपनी में आया था अपनी जिंदगी की शुरुआत करने, पढ़ने के लिए, जीवन पथ पर आगे पढ़ने के लिए। हरिहर की खूबसूरत दूकान से नोवेल्टी की दूरी पांच सांस के बराबर भी नहीं थी। हरिहर की दूकान बेहतरीन लकड़ी के मोटे-मोटे धुमावदार आकृति में बने खम्भे से बनी थी। सामने कोको-कोला, फंटा आदि की बोतलें सजी रहती थी। नीचे फर्स और गद्दी पर सफ़ेद चादर बिछा होता था। गर्मी के दिनों में शाम होते ही सड़कों की सफाई हो जाती थी। पानी का छिड़काव भी होता था। सुगन्धित अगरबत्ती से सम्पूर्ण इलाका खुशबु मय होता था और उस खुशबु में लस्सी में मिलाये जाने वाला गुलाब जल &#8211; ओह।<br />
अरुण, उन दिनों भी और आज भी हमारा अच्छा दोस्त है। उसके पिता, उसके बड़े भाई और वह मुझे बेहद स्नेह करते थे क्योंकि मैं पंडित जी का बेटा था और बाबूजी को अशोक राजपथ पर स्थित तत्कालीन के मालिक, चाहे किताब वाले हों या पान वाले, चाहे साईकिल वाले हों या सब्जी वाले, सभी बहुत पसंद करते थे, सम्मान देते थे। मैं उनको मिलने वाले उसी सम्मान के तले जीवन की शुरुआत किया था।</p>
<p>सैद्धांतिक रूप से पटना में मेडिकल स्कूल (पटना मेडिकल कॉलेज) का इतिहास 23 जून 1874 से गिना जा सकता है। पटना के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉ. डी. बी.स्मिथ सहित पांच शिक्षकों और 20 छात्रों के साथ पटना मेडिकल कॉलेज प्रारम्भ हुआ था। उन दिनों बंगाल के लिफ़्टीनेट गवर्नर थे सर रिचर्ड मंदिर। कहा जाता है कि मेडिकल स्कूल को मंदिर स्कूल ऑफ मेडिसिन के रूप में उन्हीं के नाम पर नामित किया गया था। यह भी कहा जाता है कि मेडिकल स्कूल को अपनी पुरानी स्थान बांकीपुर डिस्पेंसरी (जहां अब बीएन कॉलेज हॉस्टल है) उसे स्थानांतरित कर दिया गया था। इस स्थान को मुराद बाग के नाम से भी जाना जाता था। यह भी कहा जाता है कि मुराद के पूर्वज मिर्ज़ा रुस्तम सफ़वी 16वीं शताब्दी में सम्राट जहाँगीर के शासनकाल में बिहार के राज्यपाल थे।</p>
<p>समयांतराल यह महसूस किया गया कि प्रमाण पत्र धारक चिकित्सक उस समय की चुनौतियों का सामना करने की स्थिति में नहीं थे जब मलेरिया, टाइफाइड, पेट संबंधी विकार, उच्च प्रसवपूर्व और मातृ मृत्यु दर, प्लेग और हैजा के लगातार प्रकोप के कारण सरकार और समाज परेशानियों का सामना कर रही थी। परिणाम यह हुआ कि चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में उच्च स्तर के चिकित्सा प्रशिक्षण के बारे में तत्कालीन व्यवस्था विचार करने लगी। लेकिन उस समय की राजनीतिक स्थिति अनुकूल नहीं थी। पहली अप्रैल 1912 को बंगाल से बिहार और उड़ीसा के अलग होने के साथ, स्वयं का एक मेडिकल कॉलेज बनाने की आवश्यकता और अधिक तीव्र हो गई। बिहार सरकार द्वारा चयनित 18 छात्रों को डिग्री कोर्स और मेडिकल ट्रेनिंग के लिए कलकत्ता मेडिकल कॉलेज भेजकर एक अस्थायी समाधान निकाला गया। विश्व युद्ध (1914-1919) के प्रकोप ने एक बार फिर पटना में एक पूरी तरह से सुसज्जित मेडिकल कॉलेज की संभावनाओं को प्रभावित किया।</p>
<p>बाबूजी कहते थे बिहार विधानमंडल ने एक प्रस्ताव पारित करके सरकार को पटना में एक मेडिकल कॉलेज की तत्काल स्थापना करने के लिए कहा और 1919 के अधिनियम के तहत बिहार में बाबू गणेश दत्त सिंह स्थानीय मंत्री बन गए। स्वशासन (चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग की एक शाखा के रूप में) जिन्होंने इस योजना में गहरी रुचि ली। पटना विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति सर सैयद सुल्तान अहमद ने भी अपने अच्छे पद का उपयोग किया। दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह पटना में दरभंगा हाउस को पटना विश्वविद्यालय को दान कर दिया। साथ ही, पटना मेडिकल कॉलेज की स्थापना के लिए पांच लाख रुपये का योगदान भी किया। समय बीतता जा रहा था और गंगा के किनारे बसा पटना शहर में शैक्षिक वातावरण के साथ-साथ, शैक्षिक संस्थाएं भी उत्तरोत्तर मजबूत हो रहीं थी, उनका विस्तार हो रहा था।</p>
<p>आज के मेडिकल छात्र-छात्राएं शायद यह सुनकर बेहोश हो जायेंगे कि 30 छात्र-छात्राओं के साथ जिस वर्ष &#8220;टेम्पल मेडिकल स्कूल&#8221; की स्थापना हुई थी, उस समय उन छात्र-छात्राओं का पूरे शैक्षिक-सत्र के लिए शैक्षिक-शुल्क मात्र दो रुपये था। यह परंपरा शायद 1925 तक चली। तत्पश्चात टेम्पल मेडिकल स्कूल का स्थानांतरण दरभंगा हो गया और पटना में दी प्रिंस ऑफ़ वेल्स मेडिकल कॉलेज की स्थापना हुई। दिन था फरवरी महीना का 25 तारीख और साल 1925 था। उसी वर्ष मेडिकल कालेज बंगाल से 35 छात्रों को दी प्रिंस ऑफ़ वेल्स मेडिकल कॉलेज भेज दिया गया।</p>
<p>यदि देखा जाय तो वे ही 35 छात्र पटना में चिकित्सा व्यवस्था के लिए &#8220;मसाल -वाहक&#8221; थे। उन दिनों के हरिहर की दूकान स्थापना और चलन में दी प्रिंस ऑफ़ वेल्स मेडिकल कॉलेज के छात्र-छात्राओं, प्राध्यापकों, गैर-शैक्षिक कर्मचारियों का बहत्वपुर्ण स्थान है। इधर गंगा के तट से अशोक राज पथ के बीच के इलाके में दी प्रिंस ऑफ़ वेल्स मेडिकल कॉलेज की अनेकानेक भवन, विभाग, छात्रावास, प्रशासनिक भवन &#8211; मसलन: ऑर्थोपेडिक्स, फिसिओलॉजी, गाइनेकोलोजी, रेडिओलॉजी, बच्चा-वार्ड आदि &#8211; बन रहे थे। पटना के मेडिकल साइंस की दुनिया में बिहार के राजाओं ने, जमींदारों ने अधिकाधिक आर्थिक मदद कर इतिहास का निर्माण किया। वहीँ दी प्रिंस ऑफ़ वेल्स मेडिकल कॉलेज के साथ साथ पटना विश्वविद्यालय, पटना कॉलेज के छात्र-छात्राएं, प्राध्यापक हरिहर को अपनी जिंदगी की एक शुरुआत और उसे स्थायित्व देने के लिए सज्ज थे।</p>
<p>आज अशोक राजपथ का भूगोल बिलकुल बदल गया है। उन दिनों जब दो-तल्ला और फिर बाद में पांच-तल्ला नोवेल्टी में टेनिया के रूप में रहता था, वहां के लोगों का छोटा-छोटा कार्य कर देता था। कोई दो पैसे देते थे, तो कोई चवन्नी। किसी को किताब बांधने के लिए रस्सी ला देता था, तो रामचंद्र जी (आज भी नोवेल्टी में हैं) के लिए दौड़कर, कूदक कर हरिहर की दूकान पान लाने जाता था, तो दो कदम में त्रिवेदी स्टूडियो, चौथे कदम में शंकर सिलाई मशीन प्रशिक्षण केंद्र, सामने फुटपाथ पर देवकीजी की साईकिल का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, फिर मोहम्मद मल्लिक की छोटी से एक दूकान, फिर वली मंजिल (बेगम साहेब का महल) और कोने पर हरिहर की दूकान। आगे बढ़ते ही अब्दुल कलाम की चश्मे की दूकान, फिर बंगाल लॉ हॉउस, फिर एवन साईकिल, फिर मोतीलाल बनारसी दास किताब की दूकान, फिर मस्जिद और अंदर पॉपुलर नर्सिंग होम।</p>
<p>आज पटना के अशोक राज पथ पर गणित, विज्ञान, नागरिक शास्त्र, भूगोल, समाजशास्त्र, सभी बदल गया है । आज सड़कों पर किताबों की हर सांस पर एक दुकान तो हैं, लेकिन सड़कों पर किताबों के पन्नों की खुशबु की किल्लत है। आज दी प्रिंस ऑफ़ वेल्स मेडिकल कॉलेज में हज़ारों-हज़ार छात्र-छात्राएं, चिकित्सक और न जाने कौन-कौन भरे पड़े हैं; लेकिन हरिहर जैसे लोगों को हिम्मत और साहस देने वाले छात्र-छात्राओं की किल्लत हैं। कभी दो-दर्जन से कम छात्र-छात्राओं की संख्या से प्रारम्भ होने वाला पटना कॉलेज में आज कितने हज़ार विद्यार्थी हैं, प्राध्यापक हैं &#8211; लेकिन हरिहर जैसे लोगों की मानसिकता को मजबूत बनाने वालों की किल्लत है।</p>
<p>कुछ दिन पहले अचानक अरुण के दूकान पर पहुंचा। साथ में पत्नी जी और पुत्र दोनों थे। मैं एक पान खाने के लिए और दो जोड़ी पान रामचंद्र जी के लिए बाँधने को कहा। उसकी दूकान सिमट कर पहले की दूकान से दसवां हिस्सा हो गयी थी। मुझे देखकर कुछ पल वह रुका और फिर कहा: &#8220;आप पंडित जी का बेटा हैं न ?&#8221; हमारी मुलाक़ात कोई चालीस वर्ष बाद थी। अगली ही सांस में मैं पूछा&#8221; &#8220;तुम लस्सी में मलाई मिलाने वाला अरुण?&#8221; दोनों ठहाका के साथ कुछ ही पल में सत्तर के दशक में चले गए।</p>
<p>इस वर्ष हम पटना कालेज का 160 वां स्थापना वर्ष मनाने जा रहे हैं &#8211; हम चाहते हैं कि वह पुराने दिन पुनः दोहराया जाये। क्योंकि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं &#8220;सोच बदलो &#8211; देश बदलेगा&#8221;</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/there-shall-be-no-professor-lecturer-principal-who-has-not-had-lassi-at-harihars-shop">पटना कॉलेज@160:  कोई भी प्राध्यापक, व्याख्याता, प्राचार्य,  रजिस्ट्रार, कुलपति, चपरासी नहीं होंगे जो हरिहर की दूकान पर लस्सी नहीं पिये होंगे  (7)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>पटना कॉलेज@160: यह गली सन 1974 की सम्पूर्ण क्रांति का साक्षी है, लालू, सुशिल मोदी, अश्विनी चौबे इत्यादि उभरते नेता यहाँ &#8216;लघुशंका&#8217; किया करते थे (6)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Apr 2022 04:46:53 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विदेश में बिहारी]]></category>
		<category><![CDATA[1974]]></category>
		<category><![CDATA[bihar]]></category>
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		<category><![CDATA[leaders]]></category>
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		<category><![CDATA[patnacollege]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सन 1974 के 12मार्च, मंगलवार को पटना कॉलेज मुख्य द्वार के अंदर कक्षाओं और प्रशासनिक भवन की ओर जाती हुई उम्र से लम्बी सड़क पर जब सीआरपीएफ के जवानों को शैक्षिक परिसर में आंदोलनकारी छात्रों की भीड़ को समाप्त करने के लिए आंसू गैस के गोले फेंकने पड़े, जबाब में आंदोलनकारी छात्र अपने अपने घरों [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/this-street-is-a-witness-to-the-1974-total-revolution">पटना कॉलेज@160: यह गली सन 1974 की सम्पूर्ण क्रांति का साक्षी है, लालू, सुशिल मोदी, अश्विनी चौबे इत्यादि उभरते नेता यहाँ &#8216;लघुशंका&#8217; किया करते थे (6)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सन 1974 के 12मार्च, मंगलवार को पटना कॉलेज मुख्य द्वार के अंदर कक्षाओं और प्रशासनिक भवन की ओर जाती हुई उम्र से लम्बी सड़क पर जब सीआरपीएफ के जवानों को शैक्षिक परिसर में आंदोलनकारी छात्रों की भीड़ को समाप्त करने के लिए आंसू गैस के गोले फेंकने पड़े, जबाब में आंदोलनकारी छात्र अपने अपने घरों और कमरों में जाने के वजाय, उस आंसू गैस के गोले पर पेशाब कर, पानी डालकर उसकी तीब्रता को कम करने की अथक परिश्रम कर, उसे उठाकर पुनः सीआरपीएफ पर फेंखने लगे &#8211; उस क्षण देश के ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित सुरक्षा एजेंसी के जवानों को, जिसमें कई अभिभावक भी थे, कई पिता भी थे, कई बड़े भाई भी थे और जिनके ऊपर अपने-अपने संतानों को पढ़ाने का जबाबदेही भी था &#8211; आंदोलन की शुरुआत को देखकर एक अभिभावक के रूप में प्रदेश ही नहीं, बल्कि आने वाले समय में सम्पूर्ण देश में शिक्षा और शैक्षिक संस्थाओं की धज्जी उड़ते देख रहे थे। शिक्षा और शैक्षिक संस्थाओं का राजनीतिकरण हो गया था। छात्र भटक गए थे। आज तक उस मार को देश का 99.5+ फीसदी भोक्ता उठ नहीं पाया, जबकि उस दिन के आंदोलनकारी देश &#8211; प्रदेश के सत्ता पर कब्ज़ा भी किये और सत्यानाश भी </strong></p>
<p><strong>यह गली और यह नुक्कड़ सन 1974 की सम्पूर्ण क्रांति का प्रथम द्रष्टा है, साक्षी है। आज जहाँ यह पानी गिरा देख रहे हैं, सत्तर के दशक में इस गली के प्रवेश के साथ (इसी स्थान पर) बाएं हाथ एक लकड़ी का बना &#8216;गुमटी&#8217; (दूकान) रखा होता था। उस गुमटी के पीछे लालू प्रसाद यादव, सुशिल कुमार मोदी, नरेंद्र सिंह, बशिष्ठ नारायण सिंह, अश्विनी चौबे, चंद्रदेव प्रसाद वर्मा और पटना कालेज के सैकड़ों छात्र, सैकड़ों मूंछ की रेखाओं जैसी उभरते नेताओं के &#8216;अगलग्गू&#8217; से &#8216;पिछलग्गू&#8217; तक &#8216;लघुशंका&#8217; किया करते थे। उन दिनों जो नेता &#8216;बेलबाटम&#8217; अथवा पैंट पहनते थे, उनके लिए तो सहज था; लेकिन लालू प्रसाद यादव, अश्विनी चौबे, सुशील कुमार मोदी जैसे महानुभावों के लिए लघु-शंका से &#8216;निवृत&#8217; होना बहुत कठिन कार्य होता था। वे सभी पैजामा-कुर्ता घारी होते थे। और पैजामा-कुर्ता में &#8216;शंका&#8217; से निवृत होना प्रत्येक पल सशंकित ही रहना पड़ता था। बिना अर्ध-नग्न हुए &#8216;लघुशंका&#8217; से भी निवृत नहीं हो सकते थे।</strong></p>
<p>कई मर्तबा तो पटना विश्वविद्यालय के ये सभी महानुभाव शंकाओं से निवृत होते समय ऊपर-दाएं-बाएं यह भी देखते रहते थे कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा है। सबसे अधिक डर उस गली में रहने वाले बुजुर्गों से होता था। क्योंकि उन दिनों पटना नगर निगम के कर्मचारी औसतन 365-दिनों में 52 रविवारों को छोड़कर शेष 313 दिन हड़ताल पर ही रहते थे। नालियां खुली होती थी। इस गली में भी बाएं हाथ लम्बी और गहरी खुली नाली थी, जिससे मुद्दत से जमा पानी धीरे-धीरे आगे की ओर उन्मुख होता रहता था। गली के बच्चे सुबह-सवेरे इस ऐतिहासिक गली की नाली का परंपरागत रूप से इस्तेमाल करते थे &#8211; लघु और दीर्घ शंकाओं से निवृत होने के लिए। बच्चे तो बच्चे होते थे और घर में &#8216;कमाऊ शौचालय&#8217; था, जिसका निकास भी इसी गली के तरफ था। आम तौर पर शौचालय जाने के बाद मन सशंकित रहता था, कहीं अधिक तेज से &#8216;आवाज&#8217; नहीं निकल जाय। ऐसी स्थिति में गली में आवक-जावक लोग बाग़ कभी-कभार आवाज भी लगा देते थे &#8211; अरे झाजी संभल के।</p>
<p>गली के नुक्कड़ के दाहिने हाथ वाले तीन-तल्ला मकान पर सम्मानित श्री जगदीश प्रसाद जी रहते थे। यह उनका पुस्तैनी घर था। आज भी है लेकिन जगदीश बाबू अब नहीं हैं। उनकी पत्नी भी अब नहीं हैं। उनके माता-पिता भी अब नहीं हैं। जगदीश बाबू की पत्नी श्रीमती शांति जी हिंदी साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री जी की मुंहबोली साली थीं। शास्त्रीजी जब भी पटना प्रवास करते थे, यहीं रुकते थे। हम सभी बच्चे, उनके घर के लोग &#8216;मौसाजी&#8217; की सेवा करने में हरदम तत्पर रहते थे।</p>
<p>जगदीश जी की एक दूकान थी &#8216;शांति कैफे&#8217; जो उनके मकान के सबसे नीचले तल्ले में थी। उसका रास्ता तो गली से भी था, लेकिन दूकान के मद्दे नजर मुख्य प्रवेश अशोक राजपथ से था। इसलिए प्रातःकाल दूकान खुलने के साथ-साथ इस गली के दो महत्वपूर्ण व्यक्ति &#8211; श्री जगदीश बाबू और श्री ननकू जी (यादव) &#8211; साफ़ सफाई पर विशेष ध्यान रखते थे। ननकूजी का होटल गली के दाहिने तरफ नुक्कड़ पर थी &#8211; चाय, नास्ता, जलेबी, सिंघाड़ा, गुलाब जामुन इत्यादि। इसलिए इस गली के नुक्कड़ वाले कोने को कोई शौचालय नहीं बना दे, दोनों बहुत तत्पर रहते थे।</p>
<p>उन दिनों महामहीम गूगल झा धरती पर अवतरित नहीं हुए थे, यानी, सामाजिक क्षेत्र का &#8216;कैमरे वाला मिडिया (मोबाईल फोन) का ब्रह्मास्त्र भी जन्म नहीं लिया था। पटना की सड़कों पर कंधे पर कैमरा लटकाये साईकिल से, मोपेड से, स्कूटर से दाहिने लटके/झुके जो भी कैमरामैन अवलोकित होते थे उनमें सत्यनारायण दूसरे, कृष्ण मुरारी किशन और राजीव कांत सर्वाधिक चर्चित थे। इनके अलावे कभी-कभार श्री बीरजी अपने ब्लू रंग के स्कूटर से मोटा शरीर लिए दिखाई देते थे। बीर जी की दूकान अशोक राजपथ पर स्थित पटना विश्वविद्यालय पुस्तकालय के दाहिने प्रवेश द्वार (आप निकासी कह सकते हैं) के ठीक सामने इलाहाबाद बैंक के सामने &#8216;सन्नी स्टूडियो&#8221; के नाम से विख्यात था।</p>
<p>वह तो सिर्फ बीर जी ही हैं जो पटना के वर्तमान में &#8220;नेता&#8221;, जो फिल्म जगत में &#8220;खामोश&#8221; के नाम से कुख्यात हैं, नाम हैं शत्रुघ्न सिन्हा की पहली तस्वीर खींचे थे। बीर जी की वह तस्वीर मुंबई के फिल्म जगत में अमित छाप छोड़ा था। बाबू शत्रुघ्न सिन्हा उन दिनों पटना साइंस कॉलेज के छात्र थे और फिल्म उद्योग में चेहरे पर दाग लिए किस्मत आजमा रहे थे। आगे क्या हुआ यह तो मुंबई ही नहीं, पूरा विश्व जानता है। इसलिए चेहरे के दाग को छिपाएं नहीं, हर दाग बुरे नहीं होते &#8211; बाबू शत्रुघ्न सिन्हा साहेब साबित कर दिए हैं।</p>
<p>ननकू जी की दूकान के ऊपर वाले तल्ले में राजेंद्र बाबू अपनी विधवा माँ, पत्नी, तीन पुत्र और एक नई नवेली बहु के साथ रहते थे। उनका निवास सड़क की ओर वाले कमरों में था। इस घर से कोई दस कदम आगे एनीबेसेन्ट रोड की ओर आने पर कमाल बाइंडिंग स्टोर्स &#8211; स्टेशनरी विक्रेता &#8211; के पास राजेंद्र बाबू की पान की दूकान थी। कभी खुद बैठते थे, कभी माँ, तो कभी तीनों पुत्र समयानुसार। उनका छोटा बेटा बहुत शरारती था। जैसे ही किसी को नीचे नुक्कड़ पर ओट लिए लघुशंका से निवृत होते देख लेता था, झटपट ऊपर से एक मग, एक गिलास पानी निशाना साध कर फेकता था। इस मकान के पीछे वाले हिस्से में एक कमरा ऊपर और एक कमरा नीचे किराये पर मेरे बाबूजी लिए थे। बाबूजी उस समय नोवेल्टी में काम करते थे। घर और कार्यस्थल की दूरी अधिक नहीं थी। हम दसवीं कक्षा में पढ़ते थे ऐतिहासिक टी के घोष अकादमी में।</p>
<p>ननकु जी के होटल के आगे फुटपाथ पर पटना नगर निगम का एक नल होता था। जो अपने निश्चित समय पर सुबह-दोपहर-शाम में &#8216;सीटी&#8217; बजता था। सीटी बजाना इस बात का संकेत होता था कि सरकारी पानी का आगमन होने वाला है। आज भी वह ऐतिहासिक नल अपने स्थान पर है। इस नल के 105 डिग्री कोण पर ननकू जी का होटल था और 75 डिग्री कोण पर गौरी शंकर जी का ऐतिहासिक पान की दूकान। आज की तारीख में भी वह दूकान अपने अस्तित्व में बरकरार है।</p>
<p>सम्मानित गौरी शंकर जी का देहावसान 1969 में हो गया। वे अपनी दूकान से कोई पांच मिनट के रास्ते पर पुरन्दरपुर मोहल्ला में संयुक्त परिवार प्रथा को जीवित रखते रहते थे। गौरीशंकर जी पटना कॉलेज के स्थापना के पचासवें वर्ष के आस-पास किराये पर दूकान खोले थे &#8211; बनारसी पान वाला । आज उनकी दूकान उनका सबसे छोटा बेटा श्री टुनटुन जी चलाते हैं। टुनटुन जी की आयु भी कोई 70+ में है। टुनटुन जी तीन भाई &#8211; जगदीश जी, लालजी बाबू और वे &#8211; थे। उनकी दूकान से सटी एक दर्जी की दूकान होती थी, जो उस ज़माने में पटना कालेज के छात्रों का एक बैठक भी होता था।</p>
<p>टुनटुन जी बात करते कहते हैं: &#8220;बाबूजी के समय में मैं उनकी हाथ पकड़कर आता था। जैसे जैसे बड़ा हुआ पढाई भी करता रहा। कालेज में आने पर पटना कालेज परिसर में गंगा किनारे स्थित वाणिज्य महाविद्यालय में प्रवेश लिया। बाबूजी के समय से लेकर आज के ज़माने तक पटना कॉलेज के ही नहीं, पटना विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले, पढ़ाने वाले शायद ही कोई छात्र (यहाँ तक कि छात्राएं भी) और प्राध्यापक होंगे, जो हमारी दूकान से पान खाकर अपना होठ लाल नहीं किये होंगे।&#8221;</p>
<p>टुनटुन जी आगे कहते हैं: &#8220;उन दिनों के बने गंहकी (ग्राहक) की पीढ़ियां जैसे जैसे आगे बढ़ती गई, इस दूकान के गद्दी (जो पान लगाते थे, पैसे लेते थे) पर बैठने वाले भी बदलते गए &#8211; लेकिन भगवान का कृपा है कि आज भी सम्बन्ध बने हुए हैं। पान का सम्बन्ध ही कुछ ऐसा होता हैं। कई गंहकी तो ऐसे थे कि महेन्द्रू से, सुल्तानगंज से, पटना सिटी से रिक्शा से, गाड़ी से, टमटम से पान खाने आते थे। उन दिनों रात के कम से कम बारह बजे तक दुकानें खुली होती थी, खासकर जब पटना विश्वविद्यालय में परीक्षा का समय होता था। देर रात झुण्ड में लड़के चाय पीने, पान खाने, सिगरेट पीने आते थे &#8211; मन तो तड़ोताजा करने के लिए। सन 1974 के आंदोलन या उससे पहले भी, पटना कॉलेज या पटना विश्वविद्यालय के शायद ही कोई नेता होंगे (नहीं ही माने) जो इस दूकान पर बाबूजी के हाथों, हमारे बड़े भाइयों &#8211; जगदीश जी और लालजी भैया &#8211; पान नहीं खाये होंगे।&#8221;</p>
<p>टुनटुन जी कहते हैं: &#8220;लालू यादव हों या सुशील मोदी हों, राम विलास पासवान हों, अश्विनी चौबे हों, या फिर आज के भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा हो &#8211; सभी ननकू होटल, बनारसी पान वाला और शांति कैफे दुकानों को आज भी जानते हैं। मुद्दत तक यहाँ जमघट लगाते थे। पान खाते थे।&#8221;</p>
<p>बहरहाल, उस दिन शायद मंगलवार था और सन 1974 साल का 12 मार्च। देश में राजनीतिक सत्ता के बदलाव के लिए बिहार के छात्र &#8211; युवा वर्ग सड़क पर आ गए थे। वैसे आंदोलन में नेतृत्व की किल्लत थी क्योंकि जयप्रकाश नारायण का अभ्युदय नहीं हुआ था। स्थानीय शासन, व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन प्रारम्भ हो गया था। उस दिन सुबह-सवेरे पटना कॉलेज के मुख्य द्वार पर आंदोलनकारी छात्र सड़क पर आ गए थे। यत्र-तत्र तोड़-फोड़ की घटना प्रारम्भ हो गयी थी। सभी सरकारी वाहन (वैसे उन दिनों कितने वहां चलते ही थे सिवाय पटना वीमेंस कॉलेज/मगध महिला कॉलेज की ऑनर्स की छात्राओं को उनके कॉलेज से पटना कालेज लाना) ऑफ दी रोड थी। लेकिन सरकारी कार्यालय, चाहे विश्वविद्यालय का उनका अपना ही दफ्तर/भवन क्यों न हो, में तोड़फोड़ के कारण भय का वातावरण था। ईंट वाजी, पत्थर वाजी प्रारम्भ हो गया था स्थानीय पुलिस पर। पटना के गांधी मैदान से महेन्द्रू मोहल्ला तक, आगे भी सभी दुकानों का दरवाजा नीचे गिरा दिया गया था। कुछ दुकानदार, खासकर राशन दूकान वाले, अपने दरवाजे को बंद कर भी अंदर से जरूरतमंदों को आटा, चावल, दाल, तेल आदि की आपूर्ति कर रहे थे। किसी को कुछ पता नहीं था कि आगे पल, अथवा आने वाले दिनों में क्या होने वाला है।</p>
<p>बिहार का राजनीतिक कमान अब्दुल गफूर साहब के हाथों था। सत्तर के दशक में गफूर साहब बहुत ही भाग्यशाली राजनेता थे जो एक साल 283 दिनों तक मुख्यमंत्री के सिंहासन पर बैठे रहे। अन्यथा दरोगा प्रसाद राय (310 दिन), भोला पासवान शास्त्री (222 दिन) केदार पांडेय (एक साल 105 दिन), रामसुंदर दास (302 दिन) ही रहे। हाँ, कर्पूरी ठाकुर और डॉ जगन्नाथ मिश्र अधिक दिनों तक कुर्सी पर विराजमान रहे। पांचवा, छठा और सातवां विधान सभा का समय था। प्रशासन का कमान एफ अहमद के हाथों था। अहमद साहब बेहद खूबसूरत दीखते थे। कोई छह फुट लंबे थे। स्मार्ट तो थे ही। पटना कालेज की छात्राओं की नजरों में बहुत सम्मानित भी थे। छात्राएं उन्हें &#8216;तिरछी नजर&#8221; से बहुत ही सम्मान के साथ देखती थी। अब तक पटना कालेज के आस-पास का वातावरण गर्म हो गया था। बीच बीच में कृष्ण मुरारी किशन, सत्यनारायण दूसरे और राजीव जी (सभी फोटोग्राफर्स) दीखते थे। उन्हें देखते वातावरण और भी गर्म हो जाता था &#8211; आखिर अख़बारों में छपने का सवाल था।</p>
<p>अब तक स्थानीय पुलिस (पटना पुलिस) के स्थान पर इधर केंद्रीय रिजर्व पुलिस फ़ोर्स (सीआरपीएफ) कमान संभाल लिया था। उन दिनों सीआरपीएफ के सज्ज जवानों की उपस्थिति इस बात का द्योतक होता था कि स्थिति सामान्य नहीं है और स्थानीय प्रशासन कुछ भी नहीं कर सकती है। सीआरपीएफ की अहमियत प्रदेश अथवा केंद्र के गृह मंत्री से भी अधिक होता था &#8211; जहाँ तक सम्मान का सवाल है।</p>
<p>सीआरपीएफ की उपस्थिति देखते ही पटना कालेज के आंदोलन कारी छात्रों ने मुख्य द्वार पर लोहे के सिक्कड़ के साथ ताला लटका दिया, ताकि वह अंदर नहीं प्रवेश ले सके। हम सभी जगदीश बाबू के छत से दृश्य देख रहे थे। गोली चलने की नौबत नहीं थी, फिर भी सीआरपीएफ के जवान हम सबों को वहां से हटने को कहते थे। इसी बीच एक महिला प्रशासनिक अधिकारी के आदेश पर आंसू के गोले पटना कालेज परिसर में फेंकना प्रारम्भ हो गया। इधर मुख्य द्वार के दरवाजे को गोली से तोड़ा गया। दुर्भाग्यवश, उस दिन हवा का रुख आंदोलनकारी छात्रों के पक्ष में था। गंगा छोड़ से आने वाली हवा आंसू गैस को उड़ाते मुख्य सड़क की ओर आने लगी। सीआरपीएफ के जवान अपनी आखों के सामने शीशे वाली पट्टी लगाने के बाद भी अपनी आखों को जेब में रखे रुमाल से पोछने से रोक नहीं सके।</p>
<p>उस आंदोलन में पहली बार सीआरपीएफ के जवानों को हताश देखे थे। उन जवानों में कई के संतान पटना विश्वविद्यालय या बिहार के अन्य विश्वविद्यालयों के छात्र &#8211; छात्राएं थे। शायद पटना कालेज के सामने अशोक राज पथ पर सं 1974 की आंदोलन की शुरुआत को देखकर एक अभिभावक के रूप में सीआरपीएफ के जवान प्रदेश ही नहीं, बल्कि आने वाले समय में सम्पूर्ण देश में शिक्षा और शैक्षिक संस्थाओं की धज्जी उड़ते देख रहे थे। शिक्षा और शैक्षिक संस्थाओं का राजनीतिकरण हो गया था। छात्र भटक गए थे। आज तक उस मार को देश का 99.5+ फीसदी भोक्ता उठ नहीं पाया, जबकि उस दिन के आंदोलनकारी देश &#8211; प्रदेश के सत्ता पर कब्ज़ा भी किये और सत्यानाश भी&#8230;..</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/bihari-abroad/this-street-is-a-witness-to-the-1974-total-revolution">पटना कॉलेज@160: यह गली सन 1974 की सम्पूर्ण क्रांति का साक्षी है, लालू, सुशिल मोदी, अश्विनी चौबे इत्यादि उभरते नेता यहाँ &#8216;लघुशंका&#8217; किया करते थे (6)</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>पटना कॉलेज@160: छः ऐसे प्राचार्य हुए जो गलियों में रहने वाले गरीब-गुरबों के बच्चों को नाम से ही नहीं, बाप के नाम से भी जानते थे (5)</title>
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		<dc:creator><![CDATA[शिवनाथ झा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 23 Apr 2022 04:26:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विदेश में बिहारी]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>प्रोफ़ेसर के पी अम्बष्ठा साहेब पटना कालेज के सामने एनी बेसेंट रोड में, जहाँ हम सभी किराये के मकान में रहते थे, मेरे मकान से तीन घर बाद रहते थे &#8211; एकदम कुटिया नुमा, लाल रंग का। मकान के पीछे खेत। लकड़ी का दरवाजा सीधा सड़क पर खुलता था।उन दिनों जब भी अम्बष्ठा साहेब से [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>प्रोफ़ेसर के पी अम्बष्ठा साहेब पटना कालेज के सामने एनी बेसेंट रोड में, जहाँ हम सभी किराये के मकान में रहते थे, मेरे मकान से तीन घर बाद रहते थे &#8211; एकदम कुटिया नुमा, लाल रंग का। मकान के पीछे खेत। लकड़ी का दरवाजा सीधा सड़क पर खुलता था।उन दिनों जब भी अम्बष्ठा साहेब से मिलने जाते थे, वे अखबार लेकर बैठे होते थे और सम्पूर्ण अखबार को लाल-रंग में रंगे होते थे। कभी-कभार प्रोफ़ेसर प्रेम कुमार एक छात्र जैसा अपने शिक्षक के सम्मुख खड़े मिलते थे। सेव-जैसा लाल चेहरा और उस पर गुस्सा, यानि कुल टमाटर जैसा लाल ।</strong></p>
<p>पूर्णिया से बाद मगध की राजधानी, जहाँ चन्द्रगुप्त मौर्य राजा हुआ करते थे, चाणक्य जैसे उनके गुरु थे – मैं इस राजधानी में पहली बार अपना सर पिता-रूपी ब्रह्माण्ड के नीचे श्री तारा बाबू की दुनिया में अपना सरछुपाया। श्री तारा बाबू को हम सभी “मालिक” कहते थे। बहुत कड़क-मिजाज के थे।अनुशासन उनके जीवन में बहुत महत्व रखता था। समय के बहुत पाबंद थे। मेहनतउनके जीवन का मूल-मंत्र था, गायत्री मन्त्र जैसा। मुझे दूकान केअलावे मछुआ टोली स्थित उनके घर पर आने-जाने की पूरी स्वतंत्रता थी। घर पर हमारे उम्र के उनके पोते-पोतियाँ-नतनियां मुझे अपने घर का हिस्सा ही समझते थे। मुझे आज तक ऐसी कोई घटना याद नहीं है जिसमें हमें उन लोगों की बातों से, व्यवहारों से कोई कष्ट हुआ हो, आत्मा दुखी हुआ हो।</p>
<p>मैं उस दिन नहीं जानता था कि नोवेल्टी की भूमि पर और पटना कालेज परिसर में ही त्रिनेत्रधारी महादेव मेरे जीवन की रेखाएं खींचने का एपिसेंटर बनाएंगे। लेकिन आज साढ़े – पांच दसक बाद भी उन तमाम बातों का याद रहना इस बातका गवाह है कि महादेव को मैं कभी धोखा नहीं दिया। मालिक और उनके परिवार, परिजनोंको दिए जाने वाले सम्मान में कोई कटौती नहीं किया। तभी तो आज भी मालिक की तीसरी पीढ़ी भी मुझे उतना ही सम्मानित नजर से देखता हैं, जितने सम्मान के साथ हम सभी बचपन में घर पर खेला कहते थे।</p>
<p>उन दिनों पटना कालेज हम जैसे मोहल्ले के बच्चों के लिए मूलतः घर जैसा था। यहाँ अध्ययन करने शहर के विभिन्न कोनों से छात्र-छात्राएं आते थे। जबकि हम सभी बच्चे पटना कॉलेज परिसर की मिट्टी को अन्तःमन से प्रणाम करते थे। समय और माँ सरस्वती से कामना करते थे कि जीवन में शिक्षा के प्रति भूख कभी कम नहीं हो। परिणाम यह होता था कि चाहे प्रोफ़ेसर चन्द्रिका जी हों या प्रोफ़ेसर शमशाद हुसैन या फिर प्रोफ़ेसर सहाय जी। सबों का हाथ आशीर्वाद स्वरुप हमेशा सर पर होता था।</p>
<p>अगर ऐसा नहीं होता तो मुझ जैसा गरीब का बेटा, अर्थ से दीन, पटना की सड़कों पर, पटना कालेज के छात्रावासों में, प्राध्यापकों के निवासों पर सुबह-सवेरे अखबार फेकने वाला वह बालक आगे चलकर पटना के अशोक राज पथ से कलकत्ता की चौरंगी के रास्ते, दिल्ली के राजपथ होते हुए लन्दन, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देशों में अपनी मेहनत का, अपनी सोच का, अपनी हुनर का, अभी पेशा का ध्वज कैसे लहराएगा &#8211; पत्रकारिता को पुनः परिभाषित कैसे करता। यह शब्द एक श्रद्धांजलि स्वरुप हैं उन महात्मनों को जो मेरी जीवन को संवारने में भूमिका निभाए। दिल्ली के राजपथ तक आते आते कई लोग ईश्वर को प्यारे हो गए, उनमें मेरे ब्रह्माण्ड (पिताजी) और नोवेल्टी एण्ड कम्पनी के मालिक और पटना कॉलेज के दर्जनों प्राध्यापक भी थे। लेकिन आज भी वे सभी मेरे इर्द-गिर्द ही हैं और मैं महसूस भी करता हूँ।</p>
<p>साठ के दशक के उत्तरार्ध पटना के एक विद्यालय से शिक्षण-शुल्क नहीं देने के कारण मेरा नाम कट गया था। मैं चौथी कक्षा में पढता था। यह बात मैं बाबूजी को नहीं बताया था। वजह था &#8211; बाबूजी की तनखाह उतनी अधिक नहीं थी की वे तक्षण फ़ीस जमा कर पाते या किसी दूसरे विद्यालय में नाम लिखाते । मैं चुपचाप रहता था। उस समय हम अपने पिता के साथ अशोक राज पथ पर बेगम साहेब की कोठी के अहाते में दाहिने तरफ एक छोटी सी कोठरी में रहते थे। उस समय नोवेल्टी एण्ड कम्पनी का पुराना एक-मंजिला मकान टूट रहा था और नए बहु-मंजिला इमारत बनने की तैयारी हो रही थी।</p>
<p>बेगम साहिब का यह अहाते काफी खुला था। अहाते के बाएं तरफ उनके कर्मचारियों के लिए क्वॉर्टर्स था। इस परिसर में हमारे उम्र के छोटे-छोटे बच्चे रहते थे। हम सभी एक साथ खेलते-कूदते थे। लेकिन सुबह-सवेरे जब वे बच्चे अपने-अपने विद्यालयों के लिए युनिफ़ॉर्म पहनकर जाने लगते थे, मैं मकान के दीवार या खम्भे का ओट लेकर उन्हें टकटकी निगाह से देखा करता था। कभी-कभी अपनी गंजी के निचले हिस्से को उठाकर अपनी आँखों को पोछ लिया करता था। आख़िर रोना कौन चाहता था।</p>
<p>बाबूजी सुबह दस बजते-बजते दूकान चले जाते थे। मन में पढ़ने की लालसा हिन्द महासागर में उठने वाले तूफ़ान जैसा उठता था। समय के आगे जैसे लाचार हो गए थे। बाबूजी के जाने के बाद मैं इधर-उधर भटकता रहता था। संध्या के करीब चार बज रहे थे। भगवान सूर्य अस्ताचल की ओर उन्मुख थे। सूर्य की रौशनी में लालिमा थी। बेगम साहिब के महल में गली की ओर से जाने वाले रास्ते पर सूर्य की लाल किरणें कार्पेट जैसा बिछा दिख रहा था।</p>
<p>कहते हैं &#8216;खाली दिमाग शैतान का&#8217; &#8211; मैं अपने छोटे से कमरे में प्रवेश लिया। कमरे का आकार दस फिट लम्बा-चौड़ा से अधिक नहीं था। कमरे के अंदर बाएं तरफ दीवार से सटकर पुआल बिछा था, जिसके ऊपर एक बड़ी दरी को चार तह में मोड़कर बिछा दिए थे बाबूजी। उसके ऊपर एक चादर बिछा था। कमरे में एक रस्सी के ऊपर पहनने के कुछ वस्त्र टंगे थे। उसी के नीचे एल्युमिनियम के बर्तन में चावल-दाल रखा था। प्रभात स्टोव भी वही रखा था। जब खाना बनाने का समय होता था, पीतल वाला प्रभात स्टोव और अन्य सामग्री को लेकर कमरे बाहर एक छोटे से बरामदे पर चले जाते थे। इस बरामदे के दस कदम आगे एक बहुत गहरा पानी से भरा कुआं था।</p>
<p>मैं कुछ देर बाबूजी का बक्सा जो कमरे में किनारे रखा था, टकटकी निगाह से देख रहा था। बाबूजी साल में एक बार बड़ा-दिन की छुट्टी में (दिसंबर महीने) में गाँव जाते थे। वे अपनी कमाई में से पैसे बचाकर रखते थे ताकि गाँव जाते समय मदद मिल सके। उन पैसों में सभी के सभी एक-एक रूपये के नए-नए नोट होते थे, जिसे बाबूजी पेपर क्लिप में लगाए हुए थे। मेरी मूर्खता अपनी पराकाष्ठा पर थी। मुझे यह अंदाजा नहीं था कि बाबूजी जितने रुपये यहाँ रखे हुए हैं, उसे गिनती कर ही रखे होंगे और उन्हें ज्ञान अवश्य होगा की बक्से में कितने रुपये हैं। मैं तो एक-एक रुपये के नोटों की मोटाई देखकर यह सभी बातें सोच रखा था।</p>
<p>मैं धीरे से बक्सा खोला। थरथराते हाथों से उन रुपयों में से एक-एक रुपये का पांच नोट निकला। बक्सा को बिना छेड़छाड़ किये पुनः बंद कर दिया। सांस की गति बहुत तेज थी। शरीर में रक्तचाप बहुत अधिक लग रहा था। स्वयं पर काबू का मन को इधर-उधर बहला रहा था। अब तक रात हो गयी थी। बाबूजी घर आने वाले थे, इसलिए खाना बनाने का सभी सामग्रियां बरामदे पर रख दिया था। बाबूजी अधिकांश समय दाल-सब्जी और भात बनाते थे। उन्हें रोटी बनाना नहीं आता था। रात में खाना खाने के बाद तुरंत सो गया। बाबूजी सर पर हाथ रखकर पूछे भी की कहीं बुखार तो नहीं है? मैं भयभीत था।</p>
<p>लेकिन अपनी सम्पूर्ण जीवन दिख रहा था, शिक्षा का महत्व दिख रहा था, स्कूल जाते बच्चे दिख रहे थे, किताबों के कागजों का सुगंध महसूस हो रहा था। साथ ही, यह भी महसूस कर रहा था की अगर बाबूजी के दैनिक क्रियाकलाप में मदद नहीं किया, अर्थ उपार्जित नहीं किया, माँ, छोटी बहनों का देखभाल नहीं किया तो जीवन जीना दूभर हो जायेगा। बहरहाल, मैं चुपचाप अपने जेब में उस पैसे को रखकर सो गया।</p>
<p>उस रात नींद नहीं हुई। घडी की छोटी सूई 3 पर और बड़ी सूई बारह पर जैसे ही पहुंची, मैं धीरे से उठकर, एक झोला कंधे में लटकाकर बाबूजी को सोया छोड़कर, महादेव को साक्षी मानकर पहली बार कमाने के लिए, पढ़ने के लिए कुछ करने के लिए दरवाजे से बाहर निकलकर अशोकराज पथ पर अपने पैरों का निशान बनाते, कदमताल करते पटना के ऐतिहासिक गांधीमैदान बस अड्डा पहुंचा। उस दिन से आज तक मैं जीवन में किसी भी कार्य को करने के क्रम में हमेशा बायां पैर ही उठता हूँ। लोग कहते हैं, मैं बाम-मार्गी हूँ। परन्तु मैं कहता हूँ की :शरीर के बाएं अंग को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए, उसे दाहिने अंग का सहायक बनने के लिए, हमेशा महत्व देना होगा &#8211; इसलिए पहले आप चलें।</p>
<p>पटना के गाँधी मैदान बस अड्डे के प्रवेश द्वार के कोने पर दाहिने तरफ एक चाय की दूकान होती थी उन दिनों। अब तक घड़ी की छोटी सूई चार पर पहुँचने वाली थी और बड़ी सूई 10 पर पहुंची थी। बस अड्डा के प्रवेश द्वार के बाएं तरफ एक विशालकाय बरामदा था। जहाँ यात्रीगण अपने-अपने गंतव्य के लिए टिकट लेते थे। साथ ही, उसी बरामदे पर पटना से प्रकाशित आर्यावर्त, इण्डियन नेशन, सर्चलाईट, प्रदीप और जनशक्ति अखबार का बंडल उतरता था। ये सभी अखबार धनबाद, रांची, डाल्टेनगंज, दरभंगा, पलामू, पूर्णिया, बिहार शरीफ और अन्य शहरों के लिए होती थी। साथ ही, यहाँ यात्रीगणों के लिए भी अखबार बेचा जाता था।</p>
<p>मैं अपनी जेब से बाबूजी के बक्से से चोरी किये गए पांच रूपये का नोट निकाला और अपने पास 40 नए पैसे खुदरा था. यह खुदरा पैसा नोवेल्टी में किसी के लिए चाय, तो किसी के लिए पान या अन्य कोई कार्य करने के एवज में मिला था। उसे मिलाकर यानि, यथायोग्य पूंजी 5 रुपये 40 पैसे से आर्यावर्त, इण्डियन नेशन, सर्चलाईट, प्रदीप और जनशक्ति अखबार ख़रीदा। उन दिनों इन्डियन नेशन अखबार की कीमत 12 पैसे, आर्यावर्त की कीमत 10 पैसे, सर्चलाईट की कीमत 8 पैसे और प्रदीप &#8211; जनशक्ति की कीमत पांच पैसे थे। मैं अपनी पूंजी से जो अखबार ख़रीदा था, उसे वहीँ के यात्रियों के हाथों बेचा। यह काम कोई चार घंटे तक चला। मन में सोच रहा था जब घर पहुंचू, तब तक बाबूजी दूकान चले गए हों। ऐसा ही हुआ।</p>
<p>चार घंटे बाद उसी चाय की दूकान के बाहर रखे लम्बे टेबल पर बैठकर झोला से पैसे निकाल कर गिनना शुरू किया। दो नए पैसे, तीन नए पैसे, पांच नए पैसे, बीस नए पैसे, चौवन्नी, अठन्नी सबों को अलग-अलग रखा, जोड़ा तो चार घंटों में पांच रुपये चालीस पैसे कुल नौ रुपये साठ पैसे में बदल गए थे। मन में व्याकुलता के स्थान पर प्रसन्नता स्थान बना लिया था। यह बिस्वास हो गया था की हम आगे पढ़ सकते हैं।</p>
<p>दूसरे-तीसरे दिन भी यह क्रिया जारी रहा। तीसरे दिन देर शाम में बाबूजी कमरे से आवाज दिए। आवाज में &#8220;पिता का स्वर&#8221; था। मेरा रक्त चाप बढ़ गया। सांसे चढ़ने लगी। अब तक बाबूजी पांच बार आवाज लगा चुके थे। मैं कमरे के दरवाजे पर दस्तक दिया। मुझे देखते बाबूजी पूछे: &#8220;बक्से से पैसा निकाले हो?&#8221; मैं नकारात्मक जबाब दिया। जब एक बार सत्य को छुपाने के लिए झूठ बोला, फिर पांच बार और झूठ बोला। पांचवी बार &#8216;नहीं&#8217; इधर मुख से निकला, उधर बाबूजी का तमाचा गाल पर रसीद हो गया। फिर क्या था अनेकानेक थप्पड़, छड़ी, लात कोई चालीस किलो के शरीर पर गिरने लगा। कहते हैं जब किसी को मार लगती है, मोहल्ले वाले भी अपना-अपना हाथ साफ़ कर लेते हैं। मुझे पैर में रस्सी बांधकर उस कुएं में लटका दिया गया। उस रात पिता दुश्मन जैसा दिख रहे थे। मेरे सर के बाल पानी के पास था।</p>
<p>मन में एक विस्वास जरूर था कि बाबूजी पानी में डुबाकर मारेंगे तो नहीं, लेकिन ऊपर लोगों के मुख से सुन अवश्य रहा था की &#8220;बड़ा होकर चोर बनने से बेहतर है बचपन में ही मर जाय&#8221; &#8211; वह आवाज द्वारिका बाबू का था। द्वारिका बाबू भी नोवेल्टी में ही कार्य करते थे। वे बाबूजी को बारम्बार कह रहे थे, &#8216;चोर पुत्र होने से बेहतर है उसकी मृत्यु को जाय। इसे सबक सीखना जरुरी है &#8230;&#8230;&#8221; कुछ पल बाद मैं लगभग बेहोश अवस्था में ऊपर था और चारो तरफ लोग रखे थे।</p>
<p>उस भीड़ में अब तक उस परिसर की मालकिन बेगम साहिबा आ गई थी। बेगम साहिबा के मुख्य मकान में इण्डिया बुक हॉउस खुला था। नोवेल्टी उन दिनों बेगम साहिबा के गैरेज में चलता था। बेगम साहिबा उम्र में सबों से बड़ी थे। वे सबों को डांटती मुझे उठायीं और अपने घर लेकर चली गयीं।बेगम साहेब का मकान बहुत विशालकाय था। सफ़ेद रंग का मकान था।परिसर में पेड़-पौधे भी थे। सामने एक बेहतरीन पोर्टिको था जहाँ काली रंग की एकहेरिटेज मोटर गाड़ी लगी होती थी। उस माकन में ही उस समय का सबसे बड़ा पब्लिशर्स का पटना ब्रांच इंडिया बुक हाउस था जिसका मुख्य कार्यालय कलकत्ता में था, जबकि तारा भवन बनते समय नोवेल्टी एण्ड कम्पनी नवाब-बेगम के गैरेज में 12 महीना किरायेदार था।</p>
<p>बेगम साहेब अपने हाथों से पहले मेरा मुँह पोछीं फिर अपने घर के किसी बच्चे के वस्त्र मुझे पहना दीं। अपने घर में ही उन्होंने खाना कहलायीं, कपडा दीं और अपने पास रखने लगीं। बाबूजी से तीन दिनों तक मुलाकात नहीं थी। चौथे दिन मैं शाम में उसी स्थान पर खड़ा था जहाँ अस्थाचल गामी सूर्य की किरणें मुझे ढंककर आगे निकल रही थी। मेरी परछाई बहुत बड़ी हो गयी थी। लोग कहते हैं जब परछाई बड़ी होने लगे, समझाना चाहिए सूर्यास्त हो रहा है। लेकिन उस शाम मेरे जीवन का अंतिम सूर्यास्त था अगले दिन बेहतरीन सूर्योदय के लिए।</p>
<p>बाबूजी की नजर मुझ पर पड़ी। वे आगे आकर बुलाये। मैं सहमे-सहमे आगे बढ़ा। उस घटना के बाद मैं जीवन में कभी भी, उनकी अंतिम सांस तक, उन्हें &#8220;ना&#8221; नहीं कहा । बाबूजी वहीँ मैदान में बैठ गए और मुझसे फिर वही सवाल पूछे: क्यों पैसा निकाला था? अब तक मैं चीत्कार लेकर रोने लगा। रोने की आवाज सुनकर पुनः लोग एकत्रित होने लगे। मैं फफक-फफक कर रो रहा था। सांस भी रुक रुक कर आ रही थी। इतने में बाबूजी मुझे पहले अपने सीने में सटाये, अपने हाथ से मुझे दबाकर रखा, अपनी साँसों से मेरी साँसों को नियंत्रित किये।</p>
<p>कुछ देर बाद जब मैं सामान्य हुआ, अपनी जेब से सभी पैसे 16 रुपये तीस पैसे निकालकर उनके हाथों में रख दिए। वे अचंभित थे। फिर मैं कहा: &#8220;मैं आपके बक्से से पांच रुपये निकला था। चोरी नहीं किया था। सुवह-सुवह बच्चों को स्कूल जाते देखकर पढ़ने की ईक्षा होती है। मैं पढ़ना चाहता हूँ। इसलिए उस पांच रुपये में नोवेल्टी में जो पैसे मिले थे वह चालीस पैसे मिलाया।फिर सुवह-सुवह आपको बिना बताये गाँधी मैदान पैदल चलकर गया। वहां बनर्जी बाबू (बनर्जी बाबू सर्चलाइट और प्रदीप के एजेंट थे) से, पाठक जी (पाठक जी आर्यावर्त और इण्डियन नेशन के एजेंट थे) से अखबार ख़रीदा। फिर वहीं बसों में जाने वाले यात्रियों के हाथों बेचा। पहले दिन चार रुपये का मुनाफा हुआ था। उन दिनों पटना में अख़बारों का क्रय-बिक्रय के लिए मुख्य एजेंट थे मानदाता सिंह।</p>
<p>मैं लम्बी सांस खींचते फिर कहा: मैं अखबार बेचना चाहता हूँ, आपको मदद करना चाहता हूँ। पढ़ना चाहता हूँ। मेरे बाबूजी भी बच्चों की तरह रोने लगे थे। सामने दाहिने &#8211; बाएं रहने वाले सभी लोग, बच्चे, बृद्ध खड़े थे। बेगम साहिब भी अब तक पहुँच गयीं थी। फिर बेगम साहिब बाबूजी को कहती हैं &#8211; पंडितजी अल्लाह आपको बहुत बेहतरीन बच्चा दिया है। यह आपके जीवन की सभी मुरादें पूरा करेंगे, इंशाल्लाह।</p>
<p>1968 से 1975 तक पटना कॉलेज के इक़बाल हॉस्टल, जैक्शन हॉस्टल, मिंटू हॉस्टल, न्यू हॉस्टल, जी डीएस हॉस्टल, फैराइड होटल के सैकड़ों छात्र-छात्राओं के साथ साथ दर्जनों प्राध्यापकों, दर्जनों प्रकाशक और पुस्तक विक्रेताओं (मसलन पुस्तक भण्डार, भारती भवन, लक्ष्मी पुस्तकालय) में आर्यावर्त, इण्डियन नेशन, सर्चलाइट, प्रदीप अख़बारों को फेंका करता था। विगत दिनों जब पुस्तक भण्डार के श्री रामबाबू जी से बात किया, अपने बारे में बताया तो सबसे पहले यही कहे: &#8220;आप तो नोवेल्टी वाले गोपाल बाबू का बेटा हैं न। आपको आज भी वह दिन याद है, यह सिर्फ विधाता का आशीर्वाद है।&#8221;</p>
<p>हम लोगों के ज़माने में पटना कालेज के छः ऐसे प्राचार्य हुए जो सम्भवतः कालेज प्रांगण के छात्र-छात्राओं को तो जानते ही थे, कॉलेज परिसर के बाहर सड़क पार की गलियों में रहने वाले गरीब-गुरबों के बच्चों को, चाहे रिक्शा चलाने वाले का बच्चा हो या दुकानदार का &#8211; जो कॉलेज परिसर में हुरदंग मचाते थे; नाम से ही नहीं, बाप के नाम से भी जानते थे।</p>
<p>उन प्राचार्यों में सबसे पहले थे प्रोफ़ेसर परमेश्वर दयाल (पी दयाल साहेब), प्रोफ़ेसर महेन्द्र प्रताप साहेब, प्रोफ़ेसर के पी अम्बष्ठा साहेब, प्रोफ़ेसर दामोदर ठाकुर साहेब, प्रोफ़ेसर केदार नाथ प्रसाद साहेब और प्रोफ़ेसर चेतकर झा साहेब । इन पांच प्राचार्यों के कार्यकाल में हम सभी बच्चे सात वर्ष की उम्र से 27 वर्ष की उम्र के हो गए थे। स्कूली शिक्षा से प्रारम्भ कर कॉलेज की शिक्षा के साथ-साथ विश्वविद्यालय की शिक्षा भी समाप्त कर अपने-अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने के दिशा में यात्रा प्रारम्भ कर दिए थे। इनमें प्रोफ़ेसर पी दयाल साहेब और प्रोफ़ेसर महेंद्र प्रताप साहेब को छोड़कर, मेरी माँ को, मेरे बाबूजी को अन्य सभी प्राचार्य महोदय, उनकी पत्नियां, उनके बच्चे व्यक्तिगत रूप से भी जानते थे।</p>
<p>प्रोफ़ेसर अम्बष्ठा साहेब पटना कालेज के सामने एनी बेसेंट रोड में, जहाँ हम सभी किराये के मकान में रहते थे, मेरे मकान से तीन घर बाद प्रोफ़ेसर अम्बष्ठा साहेब का घर था &#8211; एकदम कुटिया नुमा, लाल रंग का। मकान के पीछे खेत। लकड़ी का दरवाजा सीधा सड़क पर खुलता था। उन दिनों सड़क के दोनों तरफ खुली नालियाँ बहती थी। अम्बष्ठा साहेब के पांच बेटे थे &#8211; प्रेम कुमार, कृष्ण कुमार, अशोक कुमार, शशी शेखर और ज्योति शेखर । हम बच्चों का लगाब बड़े (प्रेम कुमार), बीच में शशि बाबू और छोटे (ज्योति शेखर) से ही था। प्रेम बाबू और ज्योति शेखर दोनों पटना विश्वविद्यालय में व्याख्याता ही थे। ज्योति शेखर की नौकरी तो हम लोगों के सामने लगी थी। लवनचूस भी खिलाये थे मोहल्ले के बच्चों को।</p>
<p>प्रोफ़ेसर प्रेम कुमार वाणिज्य महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक थे । उन दिनों ज्योति शेखर जब भी दिल्ली आते थे, जनपथ अथवा चांदनी चौक से मुहल्लों के बच्चों के लिए, टी-शर्ट्स, स्वेटर्स जरूर लाते थे। उनका एक लेब्रेटा था। जबकि प्रेम कुमार साहेब के पास स्कूटर, जो अक्सरहां, वे बाएं झुक कर चलते थे, 20 किलोमीटर की गति से। प्रेम कुमार पटना से प्रकाशित दी इण्डियन नेशन अखबार के स्पोर्ट्स संवाददाता भी थे। उन दिनों, अक्सर हां, विश्वविद्यालय के शिक्षक ही पटना से प्रकाशित अख़बारों में खेल अथवा शैक्षिक संवाददाता का कार्य करते थे। आखिर &#8220;भाषा&#8221; का प्रश्न था। विगत दिनों ज्योति शेखर हम सबों को छोड़कर चले गए।</p>
<p>उन दिनों जब भी अम्बष्ठा साहेब से मिलने जाते थे, प्रायः सुवह में, वे अखबार लेकर बैठे होते थे और सम्पूर्ण अखबार को लाल-रंग में रंगे होते थे। कभी-कभार प्रोफ़ेसर प्रेम कुमार एक छात्र जैसा अपने शिक्षक के सम्मुख खड़े मिलते थे। सेव-जैसा लाल चेहरा और उस पर गुस्सा, यानि कुल टमाटर जैसा लाल प्रोफ़ेसर अम्बष्ठा साहेब को कहते सुनते थे: &#8220;यु पीपुल आर प्रोस्टीच्यूटिंग विथ इंग्लिश ग्रामर।&#8221; मजाल था की कोई जुवान भी हिला ले। अगर दरवाजा खुला रहा और प्रेम कुमार देख लिए आते हुए, इशारा से मना कर देते थे। हम भी &#8220;पीछे मुड़ -तेज चल&#8221; हो जाते थे।</p>
<p>वैसे जब प्रोफ़ेसर चेतकर झा पटना कॉलेज के प्राचार्य बने (फरबरी, 1979-1985) हम इनके पूर्व के प्राचार्य डॉ केदार नाथ प्रसाद, जो पटना विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र स्नातकोत्तर विभाग के अध्यक्ष भी थे; के विभाग में प्रवेश ले लिए थे और एम ए में थे। लेकिन यहाँ मेरी एक विशेषता यह थी की अब तक मैं उस अखबार के सम्पादकीय विभाग में टेनियाँ पत्रकार हो गया था, जिन अखबारों को हम सन 1968 से 1975 तक केदार बाबू को उनके साइन्स कालेज स्थित आवास पर दिया करता था। हमें बहुत सम्मानित और कर्मठ छात्र मानते थे वे।</p>
<p>प्रोफ़ेसर चेतकर बाबू तो सम्पूर्ण पटना विश्वविद्यालय के &#8220;बाबा&#8221; थे। साथ ही, क्या शैक्षिक, क्या गैर-शैक्षिक कर्मचारीगण, क्या छात्र, क्या छात्राएं सभी अपनी-अपनी बातों, समस्याओं का समाधान &#8220;बाबा&#8221; के पास आकर ढूंढते थे। पटना कालेज के सामने बनारसी पानवाला और उसके बगल में ननकू जी होटल वाले तो उन्हें हनुमान चालीसा के चौपाई से भी सम्बोधित करते थे। वे दोनों कहते थे: &#8220;को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो।&#8221;</p>
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