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	<title>मुकेश कुमार सिंह ​, Author at आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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		<title>&#8220;टेलिंग लाईज, नो पापा; ओपन योर मॉउथ &#8211; हा हा हा&#8221; : झूठ को बार-बार फैलाना ही ब्रॉन्ड मोदी की सबसे बड़ी ख़ासियत है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मुकेश कुमार सिंह ​]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 17 Jul 2018 02:55:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली : नरेन्द्र मोदी को अपनी ब्रॉन्डिंग के लिए अपना विज्ञापन करने और अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने के अलावा पुरखों को कोसने की ऐसी बीमारी है, जो उनसे पहले देश के किसी मुखिया की कभी नहीं रही! मोदी के व्यक्तित्व का ये सबसे ख़राब और घातक पहलू है! क्योंकि बीजेपी के नव-निर्मित मुख्यालय [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>नई  दिल्ली : नरेन्द्र मोदी को अपनी ब्रॉन्डिंग के लिए अपना विज्ञापन करने और अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने के अलावा पुरखों को कोसने की ऐसी बीमारी है, जो उनसे पहले देश के किसी मुखिया की कभी नहीं रही! मोदी के व्यक्तित्व का ये सबसे ख़राब और घातक पहलू है! क्योंकि बीजेपी के नव-निर्मित मुख्यालय के अलावा देश में शायद ही कोई ऐसी योजना हो जो अपने निर्धारित वक़्त में पूरी हुई हो! भारत की सरकारी कार्यप्रणाली कई मायने में हमेशा से ही बेहद शर्मनाक रही है। मोदी-युग में भी योजनाओं के समय पर पूरा नहीं होने के सैंकड़ों उदाहरण हैं। इसीलिए जब मोदी पिछली सरकारों पर हमला करते हैं, तब वो ख़ुद अपना और अपने पद की गरिमा की खिल्ली उड़ाते हैं।</p>
<p>मोदी ये क्यों भूल जाते हैं कि उनके दिल्ली आने से पहले मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में सिर्फ़ काँग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल की ही सरकारें नहीं थीं, बल्कि कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, राम प्रकाश गुप्ता, कैलाश चन्द्र जोशी, वीरेन्द्र कुमार सकलेचा, सुन्दर लाल पटवा, उमा भारती, बाबू लाल गौर और शिवराज सिंह चौहान वाली भगवा सरकारें भी सत्ता में रह चुकी हैं। लिहाज़ा, पिछली सरकारों को कोसते वक़्त मोदी ये क्यों नहीं कहते कि पिछली सरकारों में बीजेपी की भी सरकारें भी शामिल हैं! मोदी का ये नहीं कहना ही वो झूठ है, जो उनके भाषणों को विज्ञापन बनाता है। </p>
<p>दरअसल, मोदी को मुफ़्त की वाहवाही बेहद पसन्द है। किस्मत में उन्हें ऐसे कई मेगा-प्रोजेक्ट्स का लोकार्पण करने का सौभाग्य भी मिलता रहा, जिसके लिए सारी जद्दोज़हद पिछली सरकारों ने की। मिसाल के तौर पर, 4 जून 2016 को मोदी, अफ़ग़ानिस्तान को जिस सलमा बाँध का तोहफ़ा देने गये थे, उसकी व्यावहारिकता (Feasibility) रिपोर्ट 1957 में बनी थी और निर्माण 1976 में शुरू हुआ था। इससे पहले 25 दिसम्बर 2015 को मोदी ने अफ़ग़ानिस्तान के नये संसद भवन का लोकार्पण किया, उसका शिलान्यास भी अगस्त 2005 में मनमोहन सिंह ने किया था।</p>
<p>जम्मू-कश्मीर को हर मौसम में सड़क मार्ग से जोड़ने वाली 10 किलोमीटर लम्बी चेनानी-नाशरी (पटनीटॉप) सुरंग का लोकार्पण मोदी ने 2 अप्रैल 2017 को किया। इस हाईटेक प्रोजेक्ट का निर्माण 2011 में शुरू हुआ। लेकिन उद्घाटन के वक़्त सारा श्रेय मोदी ने ऐसे लपक लिया, मानों ये उनकी नोटबन्दी की उपलब्धि रही हो। दूसरी ओर, मोदी राज की कार्यशैली की पोल ज़ोजीला सुरंग की योजना ने खोल दी।</p>
<p>हक़ीक़त ये है कि कश्मीर को लेह से जोड़ने वाली ज़ोजीला सुरंग के निर्माण को मनमोहन कैबिनेट की मंज़ूरी अक्टूबर 2013 में मिली। इसके बावजूद शिलान्यास मई 2018 में हो सका। इसी तरह, असम को अरूणाचल से जोड़ने वाले ब्रह्मपुत्र पर बने जिस सबसे लम्बे ढोला-सादिया या भूपेन हज़ारिका पुल का उद्घाटन नरेन्द्र मोदी ने 26 मई 2017 को किया, उसके सर्वेक्षण का काम 2003 में शुरू हुआ था। जनवरी 2009 में मनमोहन सिंह सरकार ने इस परियोजना को मंज़ूरी दी थी।</p>
<p>अरे, पिछली सरकारों को तो छोड़िए, आपकी सरकार की सैंकड़ों महत्वाकाँक्षी योजनाएँ या तो बेहद देरी से चल रही हैं या फिर उनकी उपलब्धि शर्मनाक है। सच्चाई तो ये है कि आपके मातहत काम कर रहे अलग-अलग मंत्रालय भी अब भी वैसे ही अड़ंगा लगाते हैं, जैसा वो पिछली सरकारों के ज़माने में होता था! ज़ाहिर है कि आप दावे चाहे जितने कर लें, लेकिन आपके राज में भी नौकरशाही का ढर्रा बिल्कुल पहले जैसा ही है। और हाँ, यदि आपको पता हो तो ज़रा देश को बताइएगा कि क्या आपसे पहले किसी सरकार ने कभी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया था या नहीं? या फिर 70 साल में क्या ये पहला मौका है जब किसानों पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वालों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य में क्रान्तिकारी इज़ाफ़ा करके किसानों को निहाल कर दिया है!<br />
इसी तरह, प्रधानमंत्री ने उस वक़्त भी सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ी ही की, जब उन्होंने कहा कि “हम अमीर और ग़रीब के बीच की खाई को कम करना चाहते हैं। इसका परिणाम जल्द ही आपको दिखने लगेगा। क्योंकि पहली बार विकास न सिर्फ़ हो रहा है, बल्कि दिख भी रहा है! [इसी विकास को] ग़रीब अब आपकी आँखों में आँखें डालकर विश्वास से देख सकता है। क्योंकि मोदी ग़रीब को इस लायक बनाने के लिए काम कर रहे हैं।” अरे मोदी जी, जब आप कहते है कि अमीर-ग़रीब की खाई कम होने वाली है तब डर लगता है कि कहीं आप नीरव-मेहुल जैसे कई और दोस्तों पर भी मेहरबान ना हो जाएँ! आपको ये कौन बताएगा कि बैंकों में रखा ग़रीबों का पैसा वहाँ से दिन-दहाड़े लूटकर देश से फ़ुर्र हो जाने से ही अमीर-ग़रीब की खाई मिट नहीं रही, बल्कि और चौड़ी तथा गहरी हो रही है!</p>
<p>दरअसल, नरेन्द्र मोदी की शख़्सियत में एक प्रधानमंत्री या प्रधानसेवक या चौकीदार या एक शिक्षित, समझदार और गरिमावान राजनेता का अक़्स बेहद कम है। उनमें एक विज्ञापन की ख़ूबियाँ कहीं ज़्यादा नज़र आती हैं! मोदी में वो सभी गुण हैं, जो किसी विज्ञापन में होते हैं! विज्ञापनों में जिस तरह से सच के मामूली से अंश को बेहद बढ़ा-चढ़ाकर और आकर्षक ढंग से पेश किया जाता है, वैसे ही मोदी अपनी चौतरफ़ा नाकामी पर पर्दा डालने के लिए अपने मामूली से योगदान को भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं।<br />
मोदी भूल चुके हैं कि सच की महिमा निराली है! सच, निष्कपट होता है। सच जितना होता है, उतना ही नज़र आता है। कम-ज़्यादा नहीं। यही ब्रह्म सत्य है! सच को आप जितना बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना चाहेंगे, आपको उसमें उतना ही झूठ मिलाना पड़ेगा! झूठ को आँख बन्द करके नहीं मिलाया जा सकता। इसीलिए विज्ञापनों में किसी उत्पाद की विशेषताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते वक़्त कई तरक़ीबें अपनायी जाती हैं। जैसे जिंगल, मॉडलिंग, संवाद, अभिनय, फ़ोटोग्राफ़ी, रोशनी, सेट वग़ैरह-वग़ैरह। ये आकर्षण परस्पर मिलकर झूठ का मेकअप या शृंगार करते हैं। झूठ को शृंगार की ज़रूरत इसलिए है, क्योंकि वो बुनियादी तौर पर कुरूप होता है!</p>
<p>नरेन्द्र मोदी का हरेक भाषण, सिर्फ़ उनका विज्ञापन है। बीते पाँच साल में, मोदी देश में हो या विदेश में, लेकिन शायद ही कोई दिन ऐसा बीता हो जब मोदी ने भाषणबाज़ी नहीं की। मौका जो भी हो, लेकिन उनका भाषण हमेशा चुनावी और वीर-रस से ओत-प्रोत ही रहता है। इसीलिए उन्हें हक वक़्त ‘अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने’ की लत पड़ गयी है। जब हमेशा अपना गुणगान करने की लाचारी होगी तो हमेशा विज्ञापन की तरह सच-कम और झूठ-ज़्यादा तो बोलना ही पड़ेगा। अपनी इसी लाचारी की वजह से वो ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्हें फेंकूँ का ख़िताब मिला!<br />
विज्ञापन की तरह झूठ को बार-बार फैलाना ही ब्रॉन्ड मोदी की सबसे बड़ी ख़ासियत है। काश! कोई उन्हें समझा पाता कि झूठ का मोटा पलेथन लगाकर भी सच की छोटी लोई से बड़ी रोटी नहीं बेली जा सकती! काश! कोई उन्हें बता पाता कि सार्वजनिक जीवन में विरोधियों पर हमला करने से पहले हमेशा तथ्यों को ठोक-बजाकर देख लेना चाहिए। वर्ना, आपको जितना सियासी फ़ायदा होगा, उससे कहीं ज़्यादा आप हँसी के पात्र बनेंगे। शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के लिए व्यंग्य और मसख़रापन में मामूली फ़र्क़ ही होता है!</p>
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		<title>लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक़ बन चुकी मोदी-शाह की बीजेपी से यशवन्त का अलविदा!</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/politics/goodbye-of-yashvant-from-modi-shah-bjp-becomes-dangerous-for-democracy</link>
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		<dc:creator><![CDATA[मुकेश कुमार सिंह ​]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Apr 2018 02:55:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[democracy]]></category>
		<category><![CDATA[अरूण शौरी]]></category>
		<category><![CDATA[कीर्ति आज़ाद]]></category>
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		<category><![CDATA[लोकतंत्र]]></category>
		<category><![CDATA[शत्रुघ्न सिन्हा]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आख़िरकार, यशवन्त सिन्हा ने बीजेपी को अलविदा कह दिया! घटा तो महीनों से छायी हुई थी! नोटबन्दी के बाद से मेघ, जब-तब गरज तो रहे थे, लेकिन बरसे आज! आज मोदी-शाह के अन्ध-भक्तों ने राहत की साँस ली होगी! आज भक्तों से ज़्यादा ख़ुश तो शायद ही कोई और हुआ होगा! बहुतों का मन-मयूरा ख़ुशी [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>आख़िरकार, यशवन्त सिन्हा ने बीजेपी को अलविदा कह दिया! घटा तो महीनों से छायी हुई थी! नोटबन्दी के बाद से मेघ, जब-तब गरज तो रहे थे, लेकिन बरसे आज! आज मोदी-शाह के अन्ध-भक्तों ने राहत की साँस ली होगी! आज भक्तों से ज़्यादा ख़ुश तो शायद ही कोई और हुआ होगा! बहुतों का मन-मयूरा ख़ुशी से झूम रहा होगा! बहुतेरे संघी तो दिवाली भी मना रहे होंगे! उच्च कोटि के भक्तों ने तो घी के दीपक भी जलाये होंगे! क्योंकि यशवन्त सिन्हा लम्बे अरसे से, ख़ासकर नोटबन्दी के मूर्खतापूर्ण फ़ैसले के बाद से अपनी आलोचनात्मक टिप्पणियों की वजह से मोदी-शाह-भागवत वाली मौजूदा बीजेपी के लिए आँखों की किरकिरी बने हुए थे!</p>
<p>उम्र के 80 बसन्त देख चुके वयोवृद्ध नेता यशवन्त सिन्हा अब भी वैसे ही स्वस्थ हैं, जैसे उनकी पीढ़ी वाले लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अरूण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा वग़ैरह हैं। मोदी-शाह-भागवत के राज में घर में ही तिरस्कार तो सबका हो रहा था, लेकिन सिन्हा साहब की अन्तर्आत्मा ने उन्हें जितना कचोटा, वैसा अन्य नेताओं के साथ अभी तक नहीं हुआ है। शायद, औरों में बर्दाश्त करने की शक्ति ज़्यादा हो। लेकिन इस ‘अलविदा’ में ‘न दैन्यम्, न पलायनम्’ का भाव है। यानी, न तो दासता स्वीकार करूँगा और ना ही पलायन करूँगा, बल्कि युद्ध करूँगा! वो भी किसी राज-पाट को पाने की ख़ातिर नहीं, बल्कि उस लोकतंत्र की रक्षा की ख़ातिर, जिसकी बुनियाद गाँधी-नेहरू-पटेल-आम्बेडकर जैसे महापुरुषों ने बनायी थी, और जिसे पतित संघी विचारधारा तथा उसके प्रवर्तक तार-तार करने पर आमादा हैं!</p>
<p>बीजेपी को अलविदा कहने के साथ ही यशवन्त सिन्हा ने साफ़ कर दिया कि मोदी-शाह-जेटली-राजनाथ-सुषमा-गडकरी-पीयूष-सीतारामन-प्रभु वग़ैरह की काली छाया में पल रहा भारतीय लोकतंत्र ख़तरे में है! ये कोई साधारण टिप्पणी नहीं है। इसे ‘डेथ वारंट’ भी कह सकते हैं। इसका साफ़ मतलब है कि मौजूदा बीजेपी और इसका मस्तिष्क यानी संघ, भारतीय लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक हैं, विनाशकारी हैं! विपक्ष तो सवा करोड़ भारतवासियों को आगाह करता ही रहा है, लेकिन अफ़ीम के नशे में झूम रहे मन्दबुद्धि हिन्दुओं को सच्चाई समझ में आती होती तो आज देश को ऐसे दिन क्यों देखने पड़ते!</p>
<p>यशवन्त सिन्हा का भगवा को अलविदा कहना वैसा ही है, जैसे हस्तिनापुर के राजदरबार से महामंत्री विदुर का बहिर्गमन! अब सिर्फ़ यही प्रश्न अनुत्तरित है कि बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आज़ाद जैसे लोग यशवन्त सिन्हा के नक्श-ए-क़दम को अपनाते हुए कब नज़र आएँगे! सिन्हा साहब के इस्तीफ़े ने लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वयोवृद्ध नेताओं को भी अघोषित तौर पर लताड़ लगायी है। उन्होंने अव्यक्त शब्दों में ये कौतूहल ज़ाहिर किया है कि क्या वो लोग, पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य की तरह भरे दरबार में चल रहे द्रौपदी के चीरहरण यानी लोकतंत्र के पतन को निगाहें नीची करके ही यूँ ही देखते रहेंगे, जैसा कि वो अभी तक करते आये हैं! अब वो नीति और नैतिकता में से किसे तरज़ीह देंगे! क्या वो भी यशवन्त सिन्हा की तरह ये ऐलान करने की हिम्मत दिखाएँगे कि कलियुग में द्वापर वाली धूर्तताएँ अब और बर्दाश्त नहीं की जाएँगी!</p>
<p>पिता यशवन्त सिन्हा ने अपने बेटे और लोकतंत्र की हत्यारिन मोदी सरकार में मंत्री बने बैठे जयन्त सिन्हा के सामने भी भारी धर्म-संकट पैदा कर दिया है! बेचारे जयन्त को अब ये तय करना होगा कि वो कब तक अपने तुच्छ स्वार्थों की ख़ातिर दुर्योधनों की चाकरी करना जारी रखना चाहेंगे, वो भी राष्ट्रहित और लोकतंत्र की क़ीमत पर! जयन्त को राजनीति में जो भी जगह मिली है, वो उसी पिता की विरासत की बदौलत है जो आज संन्यास के नैतिक बल से आलोकित है! पिता ने उस महल का परित्याग कर दिया, जिसे वो चार दशकों तक अपने ख़ून-पसीने से वैभवशाली बनाते रहे। वो इस ऐलान के साथ कि अब वो किसी भी सियासी तालाब में डुबकी नहीं लगाएँगे, बल्कि सीधे सामाजिक क्षेत्र में काम करके लोकतंत्र को बचाने के लिए काम करेंगे।</p>
<p>दलगत राजनीति से संन्यास लेने का सीधा-सीधा मतलब है कि अब वो मोदी-शाह के चंगुल से भारतीय लोकतंत्र को मुक्त करवाने के लिए अपना जीवन ख़पाना चाहेंगे। चुनावी राजनीति से तो उन्होंने 2014 में विदा ले लिया था। लेकिन इसके बावजूद भक्तों ने उन पर लाँछन लगाया कि वो दरकिनार किये जाने से आहत होकर विपक्ष की कठपुतली बन गये हैं! सिन्हा ने साबित कर दिया कि अन्तर्आत्मा की हत्या करके वो सियासी नहीं बने रह सकते! इसमें कोई शक़ नहीं हो सकता कि बीजेपी में अपने योगदान की वजह से यशवन्त सिन्हा को ‘शानदार-विदाई’ का हक़दार होना चाहिए था, लेकिन उनके नसीब में तो ‘शर्मनाक-विदाई’ लिखी थी। आख़िर, नसीब का लेखा कभी कोई बदल पाया है! फिर भी उनकी ऐसी गति को देख, यदि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की निग़ाहों में ज़रा भी शर्म-ओ-हया हो तो उन्हें चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।</p>
<p>विदाई से पहले मोदी-शाह की शह पर भगवा अन्ध भक्तों ने अपने ही परिवार के बुज़ुर्ग पर ऐसे-ऐसे लाँछन लगाये कि उनका ज़िक्र करना भी अफ़सोसनाक है। सिन्हा ने उस दौर में राजनीति और सत्ता से जुड़ी शीर्षस्थ ऊँचाईयों को हासिल किया जब मोदी-शाह की टके भर की भी औक़ात नहीं थी! दौर बदला तो अगली पीढ़ी के पतित नेताओं ने सिन्हा साहब के प्रति वैसा ही सलूक किया, जैसे कुछ लोग अपने माता-पिता का तिरस्कार करते हुए उन्हें वृद्धाश्रम के सहारे छोड़ देते हैं! सिन्हा साहब, जैसे लोगों की अहमियत के बारे में महर्षि वेद व्यास ने महाभारत (5-35-58) में लिखा है:> आख़िरकार, यशवन्त सिन्हा ने बीजेपी को अलविदा कह दिया! घटा तो महीनों से छायी हुई थी! नोटबन्दी के बाद से मेघ, जब-तब गरज तो रहे थे, लेकिन बरसे आज! आज मोदी-शाह के अन्ध-भक्तों ने राहत की साँस ली होगी! आज भक्तों से ज़्यादा ख़ुश तो शायद ही कोई और हुआ होगा! बहुतों का मन-मयूरा ख़ुशी से झूम रहा होगा! बहुतेरे संघी तो दिवाली भी मना रहे होंगे! उच्च कोटि के भक्तों ने तो घी के दीपक भी जलाये होंगे! क्योंकि यशवन्त सिन्हा लम्बे अरसे से, ख़ासकर नोटबन्दी के मूर्खतापूर्ण फ़ैसले के बाद से अपनी आलोचनात्मक टिप्पणियों की वजह से मोदी-शाह-भागवत वाली मौजूदा बीजेपी के लिए आँखों की किरकिरी बने हुए थे!</p>
<p>उम्र के 80 बसन्त देख चुके वयोवृद्ध नेता यशवन्त सिन्हा अब भी वैसे ही स्वस्थ हैं, जैसे उनकी पीढ़ी वाले लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अरूण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा वग़ैरह हैं। मोदी-शाह-भागवत के राज में घर में ही तिरस्कार तो सबका हो रहा था, लेकिन सिन्हा साहब की अन्तर्आत्मा ने उन्हें जितना कचोटा, वैसा अन्य नेताओं के साथ अभी तक नहीं हुआ है। शायद, औरों में बर्दाश्त करने की शक्ति ज़्यादा हो। लेकिन इस ‘अलविदा’ में ‘न दैन्यम्, न पलायनम्’ का भाव है। यानी, न तो दासता स्वीकार करूँगा और ना ही पलायन करूँगा, बल्कि युद्ध करूँगा! वो भी किसी राज-पाट को पाने की ख़ातिर नहीं, बल्कि उस लोकतंत्र की रक्षा की ख़ातिर, जिसकी बुनियाद गाँधी-नेहरू-पटेल-आम्बेडकर जैसे महापुरुषों ने बनायी थी, और जिसे पतित संघी विचारधारा तथा उसके प्रवर्तक तार-तार करने पर आमादा हैं!</p>
<p>बीजेपी को अलविदा कहने के साथ ही यशवन्त सिन्हा ने साफ़ कर दिया कि मोदी-शाह-जेटली-राजनाथ-सुषमा-गडकरी-पीयूष-सीतारामन-प्रभु वग़ैरह की काली छाया में पल रहा भारतीय लोकतंत्र ख़तरे में है! ये कोई साधारण टिप्पणी नहीं है। इसे ‘डेथ वारंट’ भी कह सकते हैं। इसका साफ़ मतलब है कि मौजूदा बीजेपी और इसका मस्तिष्क यानी संघ, भारतीय लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक हैं, विनाशकारी हैं! विपक्ष तो सवा करोड़ भारतवासियों को आगाह करता ही रहा है, लेकिन अफ़ीम के नशे में झूम रहे मन्दबुद्धि हिन्दुओं को सच्चाई समझ में आती होती तो आज देश को ऐसे दिन क्यों देखने पड़ते!</p>
<p>यशवन्त सिन्हा का भगवा को अलविदा कहना वैसा ही है, जैसे हस्तिनापुर के राजदरबार से महामंत्री विदुर का बहिर्गमन! अब सिर्फ़ यही प्रश्न अनुत्तरित है कि बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आज़ाद जैसे लोग यशवन्त सिन्हा के नक्श-ए-क़दम को अपनाते हुए कब नज़र आएँगे! सिन्हा साहब के इस्तीफ़े ने लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वयोवृद्ध नेताओं को भी अघोषित तौर पर लताड़ लगायी है। उन्होंने अव्यक्त शब्दों में ये कौतूहल ज़ाहिर किया है कि क्या वो लोग, पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य की तरह भरे दरबार में चल रहे द्रौपदी के चीरहरण यानी लोकतंत्र के पतन को निगाहें नीची करके ही यूँ ही देखते रहेंगे, जैसा कि वो अभी तक करते आये हैं! अब वो नीति और नैतिकता में से किसे तरज़ीह देंगे! क्या वो भी यशवन्त सिन्हा की तरह ये ऐलान करने की हिम्मत दिखाएँगे कि कलियुग में द्वापर वाली धूर्तताएँ अब और बर्दाश्त नहीं की जाएँगी!</p>
<p>पिता यशवन्त सिन्हा ने अपने बेटे और लोकतंत्र की हत्यारिन मोदी सरकार में मंत्री बने बैठे जयन्त सिन्हा के सामने भी भारी धर्म-संकट पैदा कर दिया है! बेचारे जयन्त को अब ये तय करना होगा कि वो कब तक अपने तुच्छ स्वार्थों की ख़ातिर दुर्योधनों की चाकरी करना जारी रखना चाहेंगे, वो भी राष्ट्रहित और लोकतंत्र की क़ीमत पर! जयन्त को राजनीति में जो भी जगह मिली है, वो उसी पिता की विरासत की बदौलत है जो आज संन्यास के नैतिक बल से आलोकित है! पिता ने उस महल का परित्याग कर दिया, जिसे वो चार दशकों तक अपने ख़ून-पसीने से वैभवशाली बनाते रहे। वो इस ऐलान के साथ कि अब वो किसी भी सियासी तालाब में डुबकी नहीं लगाएँगे, बल्कि सीधे सामाजिक क्षेत्र में काम करके लोकतंत्र को बचाने के लिए काम करेंगे।</p>
<p>दलगत राजनीति से संन्यास लेने का सीधा-सीधा मतलब है कि अब वो मोदी-शाह के चंगुल से भारतीय लोकतंत्र को मुक्त करवाने के लिए अपना जीवन ख़पाना चाहेंगे। चुनावी राजनीति से तो उन्होंने 2014 में विदा ले लिया था। लेकिन इसके बावजूद भक्तों ने उन पर लाँछन लगाया कि वो दरकिनार किये जाने से आहत होकर विपक्ष की कठपुतली बन गये हैं! सिन्हा ने साबित कर दिया कि अन्तर्आत्मा की हत्या करके वो सियासी नहीं बने रह सकते! इसमें कोई शक़ नहीं हो सकता कि बीजेपी में अपने योगदान की वजह से यशवन्त सिन्हा को ‘शानदार-विदाई’ का हक़दार होना चाहिए था, लेकिन उनके नसीब में तो ‘शर्मनाक-विदाई’ लिखी थी। आख़िर, नसीब का लेखा कभी कोई बदल पाया है! फिर भी उनकी ऐसी गति को देख, यदि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की निग़ाहों में ज़रा भी शर्म-ओ-हया हो तो उन्हें चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।</p>
<p>विदाई से पहले मोदी-शाह की शह पर भगवा अन्ध भक्तों ने अपने ही परिवार के बुज़ुर्ग पर ऐसे-ऐसे लाँछन लगाये कि उनका ज़िक्र करना भी अफ़सोसनाक है। सिन्हा ने उस दौर में राजनीति और सत्ता से जुड़ी शीर्षस्थ ऊँचाईयों को हासिल किया जब मोदी-शाह की टके भर की भी औक़ात नहीं थी! दौर बदला तो अगली पीढ़ी के पतित नेताओं ने सिन्हा साहब के प्रति वैसा ही सलूक किया, जैसे कुछ लोग अपने माता-पिता का तिरस्कार करते हुए उन्हें वृद्धाश्रम के सहारे छोड़ देते हैं! सिन्हा साहब, जैसे लोगों की अहमियत के बारे में महर्षि वेद व्यास ने महाभारत (5-35-58) में लिखा है:</p>
<blockquote><p>न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा, वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम्।<br />
धर्म स नो यत्र न सत्यमस्ति, सत्यं न तद् यद् छलमभ्युपैति॥</p></blockquote>
<p>अर्थात्, “वह सभा नहीं हो सकती जहाँ वृद्ध या विवेकशील व्यक्ति मौजूद न हों। उन्हें वृद्ध नहीं माना जा सकता जो न्याय की बात नहीं करें। वह न्याय नहीं है जो सत्य पर आधारित नहीं हो। और, वो सत्य नहीं है जिसकी उत्पत्ति छल से हुई हो।”</p>
<p>किसी सभा के सदस्यों की विशेषता को बताने वाले इस सूक्ति वाक्य को भारतीय संसद के मुख्य भवन के गेट नम्बर-2 के पास मौजूद लिफ़्ट नम्बर-1 के गुम्बद पर भी उकेरा गया है। लेकिन मोदी-शाह वाली बीजेपी में इन बातों को जानने-समझने और अपनाने वाला चाल-चरित्र और चेहरा तो कभी दिखा ही नहीं। याद है ना कि जून 2013 में नरेन्द्र मोदी को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाने के बाद आडवाणी ने भी बीजेपी के हरेक पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। बीजेपी, किस तरह से लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक़ बनती गयी, इसका ज़िक्र आडवाणी के इस्तीफ़े में था। बहरहाल, ग़नीमत है कि आस्तीन के साँपों ने जैसी गति आडवाणी की की, वैसे दिन यशवन्त सिन्हा को नहीं देखने पड़े! फ़िलहाल, सिन्हा साहब ने जो आग़ाज़ किया है, वो 2019 में अंज़ाम पर पहुँचकर ही शान्त होगा। धीरे-धीरे कई नेताओं को बीजेपी से विदा लेने के लिए आगे आना पड़ेगा! वैसे भी सिन्हा साहब ने अपने एक ताजा लेख में भविष्यवाणी ​की है कि बीजेपी के आधे से ज़्यादा सांसद 2019 में संसद नहीं पहुँच पाएँगे!</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/politics/goodbye-of-yashvant-from-modi-shah-bjp-becomes-dangerous-for-democracy">लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक़ बन चुकी मोदी-शाह की बीजेपी से यशवन्त का अलविदा!</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>संघ- बी.जे.पी. के लिए अब नीतीश और जेडीयू की बलि लेना ज़रूरी हो गया है…!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मुकेश कुमार सिंह ​]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 22 Apr 2018 05:38:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[नरेन्द्र मोदी]]></category>
		<category><![CDATA[नीतीश]]></category>
		<category><![CDATA[नीतीश और नरेन्द्र मोदी]]></category>
		<category><![CDATA[संघ-बीजेपी]]></category>
		<category><![CDATA[सुशासन बाबू]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नरेन्द्र मोदी की शान में नीतीश कुमार चाहे जितने क़सीदें पढ़ें, उन्हें 2019 के लिए चाहे जैसे अपराजेय बताते रहे, लेकिन बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री की हैसियत अब उस बकरे जैसी हो चुकी है, जिसकी माँ कब तक ख़ैर मनाएगी! अब तो राजनीतिक क्षितिज पर ये लिखा दिखायी दे रहा है कि नीतीश और उनकी [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>नरेन्द्र मोदी की शान में नीतीश कुमार चाहे जितने क़सीदें पढ़ें, उन्हें 2019 के लिए चाहे जैसे अपराजेय बताते रहे, लेकिन बिहार के मौजूदा मुख्यमंत्री की हैसियत अब उस बकरे जैसी हो चुकी है, जिसकी माँ कब तक ख़ैर मनाएगी! अब तो राजनीतिक क्षितिज पर ये लिखा दिखायी दे रहा है कि नीतीश और उनकी जनता दल यूनाइटेड (JDU) को 2019 के आम चुनाव से पहले ही इतिहास बना दिया जाएगा! संघ के रणनीतिकारों के सामने अब ऐसे ‘मिशन बिहार’ का कोई विकल्प नहीं हो सकता। इसीलिए, यही उनका अगला लक्ष्य भी रहेगा।</p>
<p>राजनीति में जिस बात का महत्व सबसे अधिक है, उसे छवि यानी Perception कहते हैं। हरेक नेता अपनी छवि के सहारे जीता है। हालाँकि, अक्सर छवि झूठी ही होती है! लेकिन नेतागिरी में छवि ही सर्वोपरि होती है। हरेक पार्टी और नेता अपनी छवि को बढ़िया और विरोधियों की छवि को घटिया साबित करने के अन्तहीन सिलसिले से जुड़े होते हैं। इस काम को जो ज़्यादा सफलतपूर्वक कर लेता है, वो सत्ता पाता है। जबकि पिछड़ने वाले को विपक्ष में रहना पड़ता है। 2013 के उत्तरार्ध से अभी तक नरेन्द्र मोदी और उनका संघ भी तरह-तरह के झूठ फैलाकर जहाँ अपनी ज़ोरदार ब्रॉन्डिंग करने में सफल रहा है, वहीं विरोधियों की छवि का मर्दन करने में भी उसे भरपूर क़ामयाबी मिली है। वैसे इतिहास गवाह है कि झूठा छवि-निर्माण जब अपनी सीमा को पार करता हुआ घोर अविश्वसनीय हो जाता है, तो सारी छवि और समूची नेतागिरी भरभराकर ढह जाती है।</p>
<p>नीतीश की छवि यानी उनके दीये का तेल अब समाप्ति पर है। उनके दीये का तेल कई तत्वों से मिलकर बना था। जैसे, <strong>सुशासन बाबू!</strong> अब ये छवि बहुत खोखली हो चुकी है। इसका जायज़ा उनके <strong>नये मंत्रियों के दाग़ी चेहरों की तादाद को देखकर आसानी से लिया जा सकता है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR)</strong> की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़, नीतीश के नव-नियुक्त 29 मंत्रियों में से 22 के ख़िलाफ़ गम्भीर आपराधिक मामले दर्ज़ हैं। ख़ुद नीतीश भी हत्या जैसे सबसे बड़े अपराध के आरोपी हैं। वैसे दाग़ी मंत्रियों की कमी महागठबन्धन सरकार में भी नहीं थी। अलबत्ता, अब ये कलंक नये शिखर पर जा पहुँचा है।</p>
<p>नीतीश के तेल का अगला तत्व है, उनकी ‘सेक्यूलर’ छवि। 17 साल तक बीजेपी के साथ रहने के बावजूद वो किसी न किसी तरह से इस छवि संजोये रहे। इस दौरान लालू को जंगलराज का प्रतीक बताकर उनका राज चलता रहा। उधर, 2015 में बिहार में मुँह की खाने के बावजूद देश में संघ-बीजेपी का फैलाव होता रहा। इससे उत्साहित होकर बीजेपी ने नीतीश से भी दो-दो हाथ करने की रणनीति बनायी। बीजेपी को लगा कि यदि वो नीतीश की सुशासन बाबू वाली छवि पर ज़ोरदार हमला करेगी, वो इससे पूरे महागठबन्धन पर एक ही तीर से निशाना साधा जा सकता है। लिहाज़ा, सुशासन के विलोम भ्रष्टाचार को फिर से मुद्दा बनाकर इसे ज़ोरदार हवा दी गयी। नीतीश को भी धमकाया गया कि महागठबन्धन तोड़कर वापस आ जाओ, वर्ना भ्रष्टाचार के आरोपों से छलनी-छलनी कर दिये जाओगे।</p>
<p>नीतीश में बहादुर नेता की तरह डटकर चुनौतियों का मुक़ाबला करने वाला ज़ज़्बा कभी नहीं रहा। संघ-बीजेपी को नीतीश के डरपोक और सत्ता के लालची होने के बारे में अच्छी तरह से पता था। दोनों एक-दूसरे के साथ 17 साल तक हम-बिस्तर रहे हैं। लिहाज़ा, संघ ने बिहार को मुट्ठी में करने की व्यापक रणनीति बनायी। उसी पटकथा पर क़रीब साल भर से काम चल रहा था। इससे उपजा पहला बड़ा संकेत नोटबन्दी के वक़्त सामने आया। तब भी अपनी जान बचाने के लिए, अपने ख़ेमे से दग़ाबाज़ी करके नीतीश, नोटबन्दी का गुणगान करने लगे। फिर जीएसटी की दरें और राष्ट्रपति चुनाव के मोर्चे पर भी बेसुरा राग ही आलापा। ये सब कुछ अनायास नहीं था! इसी पटकथा के मुताबिक, सुशील मोदी को आये दिन लालू यादव को निशाना बनाने की भूमिका दी गयी। ताकि नीतीश के लिए महागठबन्धन से बाहर आने का उपयुक्त अवसर पैदा किया जा सके। अब उसी पटकथा का ‘क्लाईमेक्स’ है कि 2019 के आम चुनाव से पहले नीतीश कुमार और उनके जनता दल यूनाइटेड का ख़त्म होना तय है। संघ-बीजेपी ज्यादा दिनों तक बिहार में जूनियर पार्टनर बनकर नहीं रहना चाहता। इसीलिए नीतीश और जेडीयू की बलि ली जाएगी!</p>
<p>संघ-बीजेपी की ओर से जल्द ही जेडीयू में बाग़ी तत्वों को हवा दी जाएगी। बाग़ियों को भारी-भरकम थैलियों और टिकट की गारंटी देकर वैसा ही खेल खेला जाएगा, जैसा अभी हमने गुजरात और उत्तर प्रदेश में देखा है! या जैसा असम के चुनाव के वक़्त हुआ था, या जैसा अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड और मणिपुर में हम देख चुके हैं! थैलियों और टिकट के अलावा सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग जैसे सरकारी लठैतों के बल पर विधायकों और सांसदों का होश ठिकाने लगाया जाएगा। राजनीति में ‘साम-दाम-भेद-दंड’ का दस्तूर भी यही है। फ़िलहाल, बीजेपी इन्हीं हथकंडों को वैसे ही अपनाएगी जैसे मध्यकाल में तैमूर लंग और मोहम्मद ग़ोरी जैसे लुटेरों को क़त्लेआम से कोई गुरेज़ नहीं होता था। लोकलाज़ और नैतिकता को ये अरसे पहले ताक़ पर रख चुके हैं।</p>
<p><strong>नीतीश की नयी सरकार बमुश्किल साल भर भी नहीं चल पाएगी कि जनता दल में बाग़ी तत्वों को हवा दी जाएगी।</strong><br />
पटकथा के मुताबिक़, पहले तो नीतीश को जेडीयू का बीजेपी में विलय कर लेने के लिए कहा जाएगा। ना-नुकुर हुई तो फ़ौरन बाग़ियों और सरकारी लठैतों के ज़रिये उन पर धावा बोल दिया जाएगा। जैसे ही बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी वैसे ही नीतीश को सत्ता से बाहर करके भगवा मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। यदि नीतीश ज़्यादा नहीं फ़नफ़नाएँगे तो उनको बाक़ी ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए किसी भी राजभवन में भेज दिया जाएगा। बिहार ही नहीं, ऐसे मिशन उड़ीसा और तमिलनाडु में भी चलाये जाएँगे। सरकारी लठैतों का ख़ौफ़ दिखाकर अन्नाद्रमुक को एनडीए में लाने का काम तो इन दिनों अपने आख़िरी दौर में है। किसी भी इसका ऐलान सामने आने वाला है। उड़ीसा में बीजू जनता दल को भी तोड़ने का अभियान छेड़ दिया गया है। वहाँ भी सही वक़्त पर नतीज़े सामने आ जाएँगे। ममता के मामले में भी खेल तो यही होना है, लेकिन फ़िलहाल, बंगाल में धीरे-धीरे आगे बढ़ा जाएगा। 2019 से पहले बंगाल पर तगड़ा हमला नहीं किया जाएगा क्योंकि ऐसा होने से विपक्ष एकता को फ़ायदा हो सकता है।</p>
<p>दरअसल, संघ को अच्छी तरह से पता है कि 2019 में मोदी सरकार की छवि को तगड़ा झटका लगेगा। क्योंकि चुनावी वादों को निभाने, उम्दा सरकार देने और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर इसकी उपलब्धियाँ बेहद मायूसी भरी रही हैं। हालाँकि, संघ को अपने अफ़वाह फ़ैलाने वाले तंत्र की बदौलत, मन्द-बुद्धि हिन्दुओं को लगातार अफ़ीम चटाने में सफलता अब भी मिल रही है। लेकिन चुनावी इतिहास ये कहता है कि 2014 में जिन-जिन राज्यों में बीजेपी ने तक़रीबन पूर्ण विजय पायी थी, वहाँ 2019 में सत्ता-विरोधी भावना (Anti incumbency factor) अपना असर ज़रूर दिखाएगी।</p>
<p>2019 में यदि जनता का मोदी राज की झूठी छवि और ब्रॉन्डिंग से मोहभंग हो गया तो इन्हें भी वैसे ही सत्ता से बाहर होना होगा, जैसे 2004 में इंडिया शाइनिंग का झूठ, जनता को हज़म नहीं हुआ था। संघ-बीजेपी भी इस पहलू को अच्छी तरह समझते हैं। उन्हें पता है कि यदि 2014 जैसी मोदी लहर 2019 में भी रही, तो भी गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, हिमाचल, झारखंड और बिहार जैसे राज्यों में उसे कुछ न कुछ सीटों का नुकसान तो झेलना ही पड़ेगा। क्योंकि हरेक चुनाव में पार्टियाँ जहाँ कुछ नयी सीटें जीतती हैं, वहीं कुछ मौजूदा सीटें गँवाती भी हैं। फिर, यदि किसी राज्य में आप सर्वाधिक या सारी सीटें जीत चुके हैं, तो अगली बार उसमें कमी आना तय है। इसके अलावा, हरेक चुनाव में सबसे ज़्यादा मंत्री ही हारते हैं। कई उलटफेर भी होते हैं।</p>
<p>लिहाज़ा, सत्ता पक्ष के लिए जहाँ हारने वाली सीटों की भरपायी नयी सीटों को जीतकर करने की होती है, वहीं विपक्ष अपनी पुरानी साख को फिर से पाने के लिए जूझता है। इस हिसाब से 2019 में बिहार में एनडीए की दशा बहुत पेंचीदा होने वाली है। नीतीश की वापसी से पहले एनडीए में बीजेपी के साथ, राम विलास पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम माँझी अपनी-अपनी पार्टियों के साथ मौजूद थे। इन सबके बीच सबसे ज़बरदस्त टकराव सीटों के बँटवारे के वक़्त होगा। नीतीश यदि अपना क़द सबसे बड़ा रखना चाहेंगे तो उन्हें कितनी सीटों का लक्ष्य रखना होगा? 2014 में जेडीयू ने राज्य की सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ा था। लेकिन खाते में आयी सिर्फ़ 2 सीट। जबकि बीजेपी ने 22, पासवान ने 6 और कुशवाहा ने 3 सीटें जीती थीं। बाक़ी 9 सीटें यूपीए को मिलीं।</p>
<p>अब सवाल ये है कि ऐसी क्यों होगा कि बीजेपी सभी सहयोगियों की सीटों की माँग को पूरा करके सिर्फ़ बचा-खुचा से सन्तोष कर लेगी? एनडीए का हर सहयोगी चाहेगा कि उसे पिछली बार से ज़्यादा सीट मिलें। जबकि बाँटने के लिए तो सिर्फ़ 9 सीटें ही होंगी। इसी बात को लेकर ज़ोरदार टकराहट होगी। इसलिए भी यदि वैसी नौबत आने से पहले जेडीयू का बीजेपी में विलय हो जाए और नीतीश को दरकिनार कर दिया जाए तो सारा का सारा खेल बीजेपी की मुट्ठी में बना रहेगा! जेडीयू का बीजेपी में विलय इसलिए भी सहज और आसान होगा कि अब जेडीयू के विधायकों के पास विचारधारा नाम का कोई तत्व बचा नहीं है। जेडीयू के पास अब ऐसा कुछ भी नहीं रहा जिससे वो ख़ुद को बीजेपी से अलग पार्टी की तरह पेश कर सकें। ऐसी जो भी गुंज़ाइश है, उस जगह को पासवान, कुशवाहा और माँझी भी घेरकर बैठे हैं। कुलमिलाकर, अगले कुछ महीनों में जेडीयू के विधायकों की मानसिकता ऐसी बना दी जाएगी कि उन्हें लगेगा कि जब गूँ ही खाना है तो कुत्ते का क्यों खायें, हाथी का क्यों नहीं! जब साम्प्रदायिकता और दग़ाबाज़ी का ही कलंक झेलना है कि नीतीश के पीछे खड़े रहने से अच्छा है मोदी के पीछे खड़े रहना! नीतीश और जेडीयू के ख़ात्मे के लिए ये सब पर्याप्त आधार हैं।<br />
​(सौजन्य: मुकेश ओपाइंस) ​</p>
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