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	<title>के. विक्रम राव, Author at आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</title>
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		<title>फैशन की लहर में नौसेना की पोशाक बह गई ! पसंदीदा हो गई ​कुर्ता पैजामा !!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 16 Feb 2024 13:40:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>एक युगांतकारी निर्णय में भारतीय नौसेना ने अपने भोजन मैस में अफसरों को टाई कोट आदि के ब्रिटिश पोशाक को तजकर पैजामा कुर्ता पहनकर प्रवेश का नियम स्वीकारा है। मगर इस भारतीयकरण में सेना को 75 वर्ष लगे। प्रधानमंत्री का आह्वान था &#8220;गुलाम-मानसिकता से मुक्ति&#8221; का। कुर्ते पर बिना बाहों का जैकेट भी पहन सकेंगे। [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>एक युगांतकारी निर्णय में भारतीय नौसेना ने अपने भोजन मैस में अफसरों को टाई कोट आदि के ब्रिटिश पोशाक को तजकर पैजामा कुर्ता पहनकर प्रवेश का नियम स्वीकारा है। मगर इस भारतीयकरण में सेना को 75 वर्ष लगे। प्रधानमंत्री का आह्वान था &#8220;गुलाम-मानसिकता से मुक्ति&#8221; का। कुर्ते पर बिना बाहों का जैकेट भी पहन सकेंगे।</strong></p>
<p>याद आयी कोलकाता में गोरे साहबों के प्रिय ग्रेट ईस्टर्न होटल की वह घटना। बात आजादी के कुछ सालों बाद की है। स्वाधीनता सेनानी और कांग्रेस नेता पूर्वांचल के अलगू राय शास्त्री को इसी होटल में टांगे और बाहें पकड़ कर, झुला कर होटल से बाहर फुटपाथ पर फेंक दिया गया था। कारण यही कि शास्त्रीजी धोती कुर्ता पहनकर इस ब्रिटिश साम्राज्यवाद की आखिरी निशानी में गए थे। इस होटल में सूट और टाई अनिवार्य पोशाक थी।</p>
<blockquote><p>शास्त्री जी ने दिल्ली पहुँचकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखा कि &#8220;इसी दिन के लिए क्या हम सब अंग्रेजों से लड़े थे।&#8221; खैर नेहरू ने टालने का प्रयास किया। पर मीडिया में बात खूब उछली। इसी परिवेश में नौसेना का वेश भूषा वाला नया नियम स्वागतयोग्य है।</p></blockquote>
<p>यूं राष्ट्रीय पोशाक हर स्वाधीन देश की होती। हर देश की राष्ट्रीयता का ही हिस्सा होती है। हाथ से बनी खादी का पैजामा कुर्ता भारत की जंगे-आजादी की कभी वर्दी हुआ करती थी। मगर अपने गत वर्ष के रायपुर अधिवेशन में सोनिया-कांग्रेस ने सदस्यों द्वारा खादी पहनने की अनिवार्यता समाप्त कर दी। बल्कि शराब पीने की पाबंदी हर कांग्रेसी के लिए खत्म कर दी। अर्थात गांधीवाद से तलाक पूरा हो गया। समाजवादी लोग अभी भी लाल टोपी में दिखते हैं। हालांकि डॉ. राममनोहर लोहिया ने कभी भी लाल टोपी नहीं पहनी। सफेद गांधी टोपी ही धारण करते थे। जयप्रकाश नारायण भी।</p>
<p>यूं हर देश में फैशन डिजाइनिंग, खासकर वस्त्रों के बारे में, काफी विविधता लिए विकसित हुआ है। यह कपड़ों पर डिज़ाइन और सौंदर्य को साकार करने की कला है। सांस्कृतिक और सामाजिक व्यवहार से फैशन प्रभावित होते हैं। कपड़े और उपसाधन डिज़ाइन करने में विभिन्न तरीकों से काम करते हैं। कुछ डिज़ाइनर अकेले या कुछ समूह में काम करते हैं। वे फैशन डिज़ाइनर बनाये हुए कपड़े सिर्फ उपयोगिता की दृष्टी से ही नहीं बल्कि दिखने में भी अच्छे लगें। उन्हें इस बात का ध्यान रखना पड़ता है। वह कपड़ा कौन पहनेगा और उसे किन मौकों पर पहना जायेगा ?</p>
<p>विविध पहनावे, विशेषकर सेना के लिए, परिधान की स्पष्ट रूपरेखा का इतिहास रहा। यह फैशन डिज़ाइन 19 वीं शताब्दी में चार्ल्स फ्रेडरिक वर्थ से शुरू हुआ था। अपने बनाये कपड़ों पर अपने नाम का लेबल लगाने वाला वह पहला डिज़ाइनर था। ड्रेपर, चार्ल्स फ्रेडरिक वर्थ द्वारा पेरिस में अपना मैसन कोचर (फैशन हाउस) स्थापित करने से पहले, कपड़ों का डिज़ाइन एवं निर्माण ज्यादातर अनाम दर्जियों द्वारा किया जाता था। फैशन की अवधारणा शाही दरबार के वस्त्रों से आती थी।<br />
 <br />
पोशाकों की फैशन का आजाद भारत में विकास खूब हुआ है। कभी नेहरू जैकेट और अचकन होती थी। फिर मोरारजी देसाई की तीखी नोकवाली सफेद टोपी आई। धोती भी मराठी और हिंदी प्रदेश की दिखती है। हालांकि राष्ट्रीय पोशाक कई आकर के होते हैं।</p>
<p>यह आम बात है कि पहनावे से उस व्यक्ति की राष्ट्रीयता का भान हो जाता है। भारत में तो प्रदेश का अंदाज भी लग जाता है। मगर यह परिचर्चा मात्र पुरुषों के पहनावे से है। महिलाओं की विविधता और आकर्षक को सीमाबद्ध नहीं किया जा सका है। इसीलिए भारतीय नौसेना का पजामा-कुर्ता वाला अब नये डिजाइन को खूब प्रोत्साहित करेगा।</p>
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		<title>सांसदों के निष्कासन से रोष था ! सांसद की मिमिक्री से उड़ गया !!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 22 Dec 2023 11:35:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>तृणमूल कांग्रेस के 66-वर्षीय नेता कल्याण बनर्जी विगत पंद्रह वर्षों से लोकसभा सदस्य हैं। मगर इतनी चर्चा में कभी नहीं आए जितनी परसों (18 दिसंबर 2023) संसद के बरामदे पर उनकी जोकरी से। मसखरेपन से। उन्होंने 72-वर्षीय उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की मिमिक्री की। नकल उतार कर। बरामदे में जमा निष्कासित सांसदों की वाहवाही भी खूब [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>तृणमूल कांग्रेस के 66-वर्षीय नेता कल्याण बनर्जी विगत पंद्रह वर्षों से लोकसभा सदस्य हैं। मगर इतनी चर्चा में कभी नहीं आए जितनी परसों (18 दिसंबर 2023) संसद के बरामदे पर उनकी जोकरी से। मसखरेपन से। उन्होंने 72-वर्षीय उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की मिमिक्री की। नकल उतार कर। बरामदे में जमा निष्कासित सांसदों की वाहवाही भी खूब लूटी। मनोरंजन किया सो अलग। राहुल गांधी अपने मोबाइल से पूरी फिल्म उतार रहे थे।</strong></p>
<p>इस घटना का पहला परिणाम यह हुआ कि उनका नाम उनकी पार्टी नेता ममता बनर्जी ने प्रतिनिधिमंडल की सूची से काट दिया। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिली थीं। कल्याण बनर्जी के बिना। ममता बनर्जी ने कहा भी कि राहुल गांधी की फिल्म उतराने से ही सारी बात फैली।<br />
कल्याण बनर्जी यूं पेशे से वकील हैं। हाई कोर्ट जाते हैं। वे वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण को “काली नागिन” कह चुके हैं। बोले : “उनके काटने से लोग मर रहे हैं।”</p>
<p>कल्याण बनर्जी राम और सीता पर भी राय व्यक्त कर चुके हैं। अपने सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा था : “सीता ने भगवान राम से कहा कि यह सौभाग्य था कि उन्हें रावण द्वारा त्याग दिया गया। अगर मुझे आपके अनुयायियों द्वारा अपहरण कर लिया गया होता, जो अपने माथे पर भगवा लपेटते हैं और जय श्री राम के नारे लगाते हैं, तो मेरी हालत हाथरस पीड़िता की तरह होती।” हाथरस में 20 सितंबर 2020 में एक 19-वर्षीय दलित युवती के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था। मगर न्यायालय से सभी छूट गए थे। केवल एक को हत्या का दोषी पाया गया था।</p>
<p>कल्याण बनर्जी ने एक बार कोलकाता में आरबीआई क्षेत्रीय मुख्यालय के सामने विरोध सभा के दौरान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को &#8216;चूहा&#8217; कह डाला था। कल्याण ने कहा था : “मोदी के समर्थक उन्हें शेर कहते हैं। लेकिन मैं कहता हूं कि वह समय दूर नहीं है जब मोदी को गुजरात में अपने घर लौटना होगा।&#8221;  </p>
<p>पश्चिम बंगाल के भाजपा नेता दिलीप घोष से कल्याण बनर्जी की तकरार चलती रहती है। एक बार कल्याण बोले : “हम दिलीप घोष से नहीं डरते। वह भाजपा नेताओं को बताएं कि हम चूड़ियां पहनकर घर पर नहीं बैठे हैं, हम मजबूत हैं और हम मैदान में मिलेंगे। यदि आप शारीरिक रूप से लड़ना चाहते हैं, तो हम पीछे नहीं हटेंगे। आप जो गंदी राजनीति कर रहे हैं, हम उसका उचित जवाब देंगे। मैं दिलीप घोष को चुप करा दूंगा और मैं देखना चाहता हूं कि वह कितने बहादुर हैं। दिलीप घोष जैसे व्यक्ति को, जिन्हें 18 सुरक्षा गार्ड की जरूरत है, उन्हें पुरुषों के कपड़े नहीं पहनने चाहिए, उन्हें साड़ी पहननी चाहिए। यहां तक कि साड़ी पहनने वाले लोग भी उनसे ज्यादा मजबूत हैं।&#8221; ऐसी थी इस सांसद की भाषा शैली !</p>
<p>मगर कल विवाद को व्यापक होते देखकर कल्याण बनर्जी ने तेवर ढीले किए। कोलकता में वे बोले : “मेरा इरादा किसी को भी ठेस पहुंचाने का नहीं था। मैं लोकसभा का सदस्‍य हूं और मैंने कभी राज्यसभा की कार्यवाही या राज्यसभा टीवी नहीं देखा। मैं धनखड़ जी की नकल कैसे कर सकता हूं ? मैं हैरान हूं। उन्होंने इसे व्यक्तिगत रूप से ले लिया। क्या इसका मतलब यह है कि वह इस तरह का व्यवहार करते हैं ? यह एक कला है, उन्हें इसे खेल के तौर पर लेना चाहिए।” </p>
<p>दरअसल कल्याण बनर्जी को राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ की नकल करने पर गंभीर आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। वे अपनी पार्टी और बंगाल भर में एक विचित्र घटना के लिए याद रखे जाते हैं। बात 2021 के विधानसभा चुनाव की है। पार्टी की प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। सांसद साहब ने एक महिला के गाल सबके सामने खींच दिए। मगर बाद में माफी मांग ली।</p>
<p>कल्याण बनर्जी की फूहड़ हरकत से राष्ट्रपति द्रोपति मुर्मू ने अत्यंत दुख व्यक्त किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के व्यवहार पर निराशा जतायी, क्रोध भी। फिलहाल पुलिस पूरे प्रकरण की तहकीकात कर रही है।</p>
<p>हालांकि 143 सांसदों के सदन से निष्कासन पर पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार लोकतंत्र का गला घोट रही है। मगर जो भी जनाक्रोश इस घटना से उपजा वह कल्याण बनर्जी की इस मसखरीभरी हरकत से काफूर हो गया। मुद्दा अब यह बन गया कि क्या ऐसी अश्लीलता क्षम्य है ? वह भी एक वरिष्ठ सांसद-वकील द्वारा ? </p>
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		<title>अपनी विलक्षण बालिंग से मोहम्मद शमी ने कई जटिल प्रश्न, कुछ अनबुझी पहेली को जन्माया है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Nov 2023 12:43:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>अपनी विलक्षण बालिंग (15 नवंबर 2023) से मोहम्मद शमी ने कई जटिल प्रश्न, कुछ अनबुझी पहेली को जन्माया है। खासकर भारतीय क्रिकेट टीम के चयनकर्ताओं की सूझ और समझ की बाबत। ऐसा क्यों ? सिर्फ इसलिए कि शमी को इस बार विश्व कप टीम में शामिल करना केवल इत्तेफाक था। वर्ना वे भी रविचंद्रन अश्विन [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अपनी विलक्षण बालिंग (15 नवंबर 2023) से मोहम्मद शमी ने कई जटिल प्रश्न, कुछ अनबुझी पहेली को जन्माया है। खासकर भारतीय क्रिकेट टीम के चयनकर्ताओं की सूझ और समझ की बाबत। ऐसा क्यों ? सिर्फ इसलिए कि शमी को इस बार विश्व कप टीम में शामिल करना केवल इत्तेफाक था। वर्ना वे भी रविचंद्रन अश्विन की भांति पेवेलियन और मैदान पर सबको पानी पिलाते रहते। विश्व कप में अब तक सर्वाधिक विकेट (23 विकेट, छः मैच में) लेने वाला शमी महज एक संयोग की देन है, नकि सुविचारित प्रयास के। </strong></p>
<p>इस विवेकहीन त्रुटि पर सुनील गावस्कर ने हैरानी व्यक्त की थी। सांसद गौतम गंभीर ने भी। मोहम्मद शमी ने साबित कर दिया कि पहले एकदिवसीय मैचों में उन्हें शामिल न करना चयनकर्ताओं की भारी भूल थी। मगर ऐसा हादसा शमी के साथ दूसरी बार हुआ है। तब फरवरी 2012 में नागालैंड के तेज बालर 35-वर्षीय अबू नेचम खेल में घायल हो गए थे। शमी की लॉटरी लग गई थी। उन्होंने दलीप ट्रॉफी खिताब जीतने में मदद की। मैच में आठ विकेट लिए। उन्हें &#8220;उत्कृष्ट, लगातार अच्छी लेंथ से कुछ ही दूरी पर उछाल और ज़िप प्राप्त करने वाला&#8221; बालर बताया गया था। तब से शमी बुलंदी पर रहे। वेस्टइंडीज के दौरे पर तो वे “सरप्राइज” आइटम थे। यदि हार्दिक पांड्या चोटिल न हुए होते तो ? शमी घर बैठे रहते।</p>
<p>नरेंद्र मोदी ने कल शमी की श्लाघा की। यह भाजपायी प्रधानमंत्री बोले: “शमी की बालिंग को पीढ़ियां याद रखेंगे। हमारी टीम के लिए फाइनल भी अब पक्का हो गया है।” आगे बढ़कर पाकिस्तान के दिग्गज़ क्रिकेटर और तेज़ गेंदबाज़ वक़ार यूनिस ने ट्वीट किया, &#8220;धैर्य ताक़त है, आप &#8216;जुनून और भूख&#8217; को नहीं हरा सकते। एक सच्चे फ़ाइटर मोहम्मद शमी बहुत सी तालियों के हक़दार हैं।&#8221;</p>
<p>हालांकि पाकिस्तानी पूर्व क्रिकेटर रहे हसीन रजा को कुछ भी यकीन ही नहीं हो रहा है। उन्होंने एक शो में पूछे गए सवाल पर गेंद में ही खोंट निकाल दी। हसन रजा ने कहा : “हमारे जमाने में एक ही बॉल हुआ करती थी। लेकिन यहां लगता है कि बॉल पर एक और लेयर दी गई है। आगे पड़ने वाला बॉल गायब हो जाता है। मुझे लगता है कि बॉल की जांच होना चाहिए।”</p>
<p>इस पर गुस्साये शमी ने वीडियो शेयर करते हुए इंस्टाग्राम स्टोरी पर लिखा : “शर्म करो यार, गेम पर फोकस करो, न की फालतू बकवास पर। कभी तो दूसरों की तारीफ करो। छी यार। ये आईसीसी वर्ल्ड कप है, आपका लोकल टूर्नामेंट नहीं। वसीम भाई ने समझाया था। उन पर ही भरोसा नहीं आपको ?” </p>
<p>मगर बड़ौदावासी इरफान पठान ने अपने इस हमवतनी के बारे में कहा : “शमी फेरारी रोमा (इतालवी मोटर कार) है, जो हर किस्म की ऊबड़ खाबड़ सड़क पर दौड़ सकती है।”</p>
<figure id="attachment_5171" aria-describedby="caption-attachment-5171" style="width: 977px" class="wp-caption aligncenter"><a href="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/11/iMAGE-2023-11-03T103314.202.jpg"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="https://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/11/iMAGE-2023-11-03T103314.202.jpg" alt="" width="977" height="550" class="size-full wp-image-5171" srcset="http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/11/iMAGE-2023-11-03T103314.202.jpg 977w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/11/iMAGE-2023-11-03T103314.202-300x169.jpg 300w, http://www.aryavartaindiannation.com/wp-content/uploads/2023/11/iMAGE-2023-11-03T103314.202-768x432.jpg 768w" sizes="(max-width: 977px) 100vw, 977px" /></a><figcaption id="caption-attachment-5171" class="wp-caption-text">मोहम्मद शमी</figcaption></figure>
<p>हालांकि शमी की एक भयंकर भूल पर करोड़ों दर्शक आक्रोशित हो गए थे जब केन विलियमसन का कैच उनकी हथेली से छूट गया था। जसप्रीत बुमराह की गेंद थी। तब इस न्यूजीलैंड के बैटर ने 52 रन मात्र बनाए थे। बाद में 17 रन और जोड़े। बड़े महंगे रहे। फिर एक उचकती गेंद शमी ने फेकी। छक्का मारने की लालच में विलियमसन ने बैट उठाया, बाउंड्री पर गिद्ध की भांति खड़े सूर्यकुमार यादव ने कैच लपका। शमी ने अपनी क्षति पूर्ति कर दी।</p>
<p>अपनी उत्कृष्ट बालिंग के लिए शमी जरूर कोरोना रोग को धन्यवाद देते होंगे। वर्ष 2019-20 में अमरोहा (यूपी) के किसान का यह बेटा शमी अपने कृषि फार्म में ही सीमित रहे। वहीं रोज रिवर्स स्विंग गेंद फेंकने का अभ्यास करते रहे। नतीजा भुगतना पड़ा न्यूजीलैंड और बाकी टीमों को।</p>
<p>शमी की बालिंग से उनका दांपत्य जीवन शायद अब पटरी पर आ जाए। अपने शौहर से दूर रह कर बेगम हसीन जहान ने न्यूज़ चैनल न्यूज़ नेशन से कहा : “कुछ भी हो, अच्छा परफॉर्म कर रहा है। अच्छा खेलेगा, टीम में बना रहेगा। अच्छा कमाएगा तो हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा। मैं टीम इंडिया को शुभकामनाएं दूंगी।” मोहम्मद शमी का दक्षिण अफ्रीका दौरे (2018 में) से लौटने के बाद हसीन जहान से विवाद हुआ था। तब हसीन जहान ने अपने फेसबुक पर कई फोटो और वॉट्सअप के स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए शमी पर लड़कियों के साथ अवैध संबंध रखने का आरोप लगाया था। शमी की मुलाकात उनकी इस शरीके-हयात हसीन जहान से 2012 में कोलकता में हुई थी। वह कोलकता नाइट राइडर्स के लिए वे चीयर लीडर्स थी। उनमें प्यार हो गया। मगर जीवन का जहाज तूफान को झेल नही पाया।</p>
<p>इस मैच में दिलचस्प बात यह रही कि इन क्रिकेटरों के कुटुंबीजन भी उपस्थित थे, विजेताओं का अभिनंदन करने के लिए। अपना पचासवां शतक पूरा कर पिच से ही विराट कोहली ने अंगूठा और तर्जनी से ओंठ पकड़कर फ्लाइंग किस फेका। पेवेलियन में बैठी अनुष्का ने उसी तरह चुंबन से जवाब भी दिया। आमिर खान की फिल्म “पीके” में अनुष्का नायिका थीं। रीतिका खुश थी कि पति कप्तान रोहित शर्मा की टीम जीत गई। विकेटकीपर केएल राहुल की पत्नी अथिया शेट्टी तो पति के नाबाद 39 रन पर प्रमुदित थी। टीवी स्टार संजना गणेशन को जरूर रंज हुआ होगा कि तेज बालर पति जसप्रीत बुमराह ज्यादा सफल नहीं हो पाए।</p>
<p>इस पूरे नजारे से याद आया गत वर्ष (अगस्त 2022) का दुबई में टी-20 मैच जब भारत ने पाकिस्तान को हराया था। तब खुशी से सर्वाधिक विभोर हुयी थी मुम्बई की फिल्मी अदाकारा सर्बिया गणराज्य (पूर्व युगोस्लोकिया) की नताशा स्तानकोविच। मगर इस बार हमदर्दी हुई उनसे। कारण ? उनके 28-वर्षीय गुजराती पति हार्दिक हिमांशु पांड्या (बड़ौदावाले) टीम से बाहर हैं। मगर तब दो हजार किलोमीटर दूर अरब सागर पार दुबई में आखिरी गेंदों पर दो चौके तथा एक छक्का लगाकर हार्दिक ने तिरंगा लहराया था। गत वर्ष शारजाह में पाकिस्तान से खाई हार का प्रतिशोध ले लिया था। अब बेसब्री से प्रतीक्षा है फाइनल (रविवार, 19 नवंबर 2023) की जब अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में भारत दांव लगाएगा विश्व कप पर।</p>
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		<title>सरकारी बलात्कारी, लुटेरे दंडित ! नन्हें गांव की महाविजय गाथा !!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 Oct 2023 00:59:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[high court]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>दिया टकराये तूफान से ! न बुझे ? तो चमत्कार कहलाएगा। विस्मयजनक ! ठीक ऐसा ही हुआ (29 सितंबर 2023) गत सप्ताह। मद्रास हाईकोर्ट ने यही कर दिखाया। केवल 565 निर्धन अनुसूचित आदिवासी ग्रामीण जन तमिलनाडु के चार महाबली मुख्यमंत्रियों से 31 साल तक भिड़े। न्यायार्थ ! अंततः विजयी हुए। इन जुल्मी मुख्यमंत्री में हैं, [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>दिया टकराये तूफान से ! न बुझे ? तो चमत्कार कहलाएगा। विस्मयजनक ! ठीक ऐसा ही हुआ (29 सितंबर 2023) गत सप्ताह। मद्रास हाईकोर्ट ने यही कर दिखाया। केवल 565 निर्धन अनुसूचित आदिवासी ग्रामीण जन तमिलनाडु के चार महाबली मुख्यमंत्रियों से 31 साल तक भिड़े। न्यायार्थ ! अंततः विजयी हुए। इन जुल्मी मुख्यमंत्री में हैं, एमके स्टालिन, उनके पिता एम. करुणानिधि, स्व. जे. जयललिता, ओ. पन्नीरसेल्वम तथा ई. पलनिस्वामी। सभी हार गए। मगर इन सभी ने अपने अत्याचारी अफसरों का समर्थन किया, बेशर्मी से। न्याय पाया जनजाति वालों ने, 31 साल बाद। अनवरत संघर्ष के फलस्वरुप।</strong></p>
<p>यह शौर्यगाथा है तमिलनाडु के पूर्वी घाट के खंड में स्थित मनोरम चितेरी पहाड़ियों के वनाच्छादित गांव वचथी की। जनपद धर्मपुरी के इस नन्हे से गांव का किस्सा शुरू होता है 20 जून 1992 की शाम को। गोधूलि पर। पुलिसवाले कुख्यात तस्कर मुनिस्वामी वीरप्पन की तलाशी में आए थे। यह आतंकी और डाकू चंदन के पेड़ काटकर बेचने के अलावा, राजनेताओं का अपहरण करना और फिरौती बटोरने में लिप्त रहा। पुलिस और राजस्व अधिकारियों ने वाचथी गांव पर छापा मारा। घरों में अंधाधुंध तोड़फोड़ की। वृद्धों, महिलाओं और बच्चों को बेरहमी से पीटा गया। उनके घरेलू सामान और कृषि उपकरण नष्ट कर डाले। करीब 18 महिलाओं को एक सुनसान जगह पर ले जाया गया। उनके साथ बलात्कार किया गया। </p>
<p>“द हिंदू” दैनिक ने फोटो भी छापी थी। यह आदिवासी गांव तालुक मुख्यालय हरूर से 17 किमी दूर स्थित है। गांव की कुल जनसंख्या 1992 में 655 थी, केवल 12 लोग अन्य जाति के थे। केंद्र के एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम के तहत बनाए गए 120 समूह आवास सहित लगभग 200 घर थे। गाँव में केवल 261.18 हेक्टेयर खेती योग्य क्षेत्र है। लगभग 190 लोगों के पास ज़मीन थी। बाकी 466 भूमिहीन मजदूर थे। पहाड़ियों की तलहटी में स्थित यह थोम्बक्कल रिजर्व फॉरेस्ट और पल्लीपट्टी रिजर्व फॉरेस्ट इसके निकट है। आदिवासी जंगलों से लघु वन उपज और जलाऊ लकड़ी भी एकत्र करते थे। गाँव में उपलब्ध भूमि पर वे मुख्य रूप से रागी, टैपिओका, चावल और अन्य अनाज की खेती करते थे। यहां कुल 250 परिवार रहते हैं। गाँव की जनसंख्या 1032 है, जिसमें 517 पुरुष हैं, जबकि 515 महिलाएँ हैं।</p>
<p><strong>वचथी का आपराधिक मामला 20 जून 1992 का है। एक आधिकारिक दल जिसमें 155 वनकर्मी, 108 पुलिसकर्मी और छह राजस्व अधिकारी शामिल थे चंदन की तस्करी और वीरप्पन के बारे में पता करने के लिए वचथी गाँव में दाखिल हुए थे। खोज के बहाने इस दल ने ग्रामीणों की संपत्ति की तोड़फोड़ की, उनके घरों को नष्ट कर दिया, मवेशियों तक को मार डाला, ग्रामीणों पर हमला किया और 18 महिलाओं के साथ बलात्कार किया</strong>।</p>
<p>राज्य विधानसभा में कई दफा मामला उठा, पर दबी आवाज से ही। फिर हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने इसकी जांच की थी। मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जांच पड़ताल से भी गुज़रा। प्रदेश की एक विशेष अदालत ने 29 सितंबर 2011 को दलितों पर अत्याचार की सभी 269 आरोपी अधिकारियों को सजा सुनाई और बलात्कार के लिए 17 आरोपियों को सजा सुनाई। आरोपियों में से 54 लोगों की उस समय तक मृत्यु हो गई थी; शेष 215 आरोपियों को जेल की सजा सुनाई गई थी। </p>
<p><strong>निचली अदालत ने इन लोगों को दोषी ठहराया था। इस आदेश के खिलाफ आरोपियों ने मद्रास हाईकोर्ट में अपील की थी। शुक्रवार (29 सितंबर) को हाईकोर्ट ने निचली अदालत के कोर्ट का फैसला बरकरार रखा। पुलिस और सरकारी अधिकारियों ने गांव के लोगों को चंदन तस्कर वीरप्पन का समर्थक बताते हुए तीन दिन तक उनके साथ बर्बरता की थी। इन 269 दोषियों में से 126 फॉरेस्ट ऑफिसर, 84 पुलिसवाले और 5 रेवेन्यू अधिकारी थे। जब निचली कोर्ट का आदेश आया, तब तक 54 दोषियों की मौत हो चुकी थी।</strong></p>
<p>अपने फैसले में निचली कोर्ट ने सभी दोषियों को 1 से 10 साल तक की जेल की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही हर दोषी को 10 लाख रुपए देने आदेश दिया गया था, जो 18 पीड़िताओं को दिए जाते। इनमें से हर दोषी पांच लाख रुपए जमा कर चुका है, जबकि पांच लाख बकाया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिया कि पीड़ितों को नौकरी या उनके और उनके परिवारों को स्व-रोजगार के अवसर मुहैया कराए जाएं। कोर्ट ने सरकार को ये निर्देश भी दिया था कि तत्कालीन जिला कलेक्टर, सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस और डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर दोषियों के खिलाफ एक्शन ले क्योंकि उन्होंने आरोपियों के खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं कर थी।</p>
<p>मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पी. वेलमुरुगन ने गत शुक्रवार को इस मामले में फैसला सुनाया। जज ने यह भी आदेश दिया कि जो बलात्कार के दोषी पाए गए हैं, उन सब से मुआवजे की 50 प्रतिशत रकम वसूली जाए। ऐतिहासिक निर्णय देने वाले हैं डिंडीगुलवासी न्यायमूर्ति पेरुमल वेलमुरुगन, जो एक पंचायत शिक्षक के पुत्र हैं। उनकी सहधर्मिणी डॉ. आर. सुधा, एमडी, त्रिची मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर हैं। </p>
<p>न्यायमूर्ति पी. वेलमुरुगन ने कहा : “सभी आपराधिक अपीलों को खारिज किया जाता है।” वाचथी गाँव के लोगों के खिलाफ तस्करी का जो आरोप लगाया गया था, मद्रास उच्च न्यायालय ने उसे भी खारिज कर दिया। पुलिस तीस साल तक मामले को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी। तत्कालीन राज्य मंत्री केए सेनगोट्टैयन ने टिप्पणी की कि ग्रामीण चंदन की तस्करी में सहायता कर रहे थे। ग्रामीणों को लंबे समय तक मुआवजे से वंचित रखा गया था। अंततः विजय पीड़ितों और वंचितों की हुई।</p>
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		<title>जन्मदिन मंगलमय हो &#8216;पोस्टकार्ड&#8217; बाबू !!!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 01 Jul 2023 11:50:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चुटकुलानन्द की चिठ्ठी]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>एक दौर होता था उसका भी कभी। आतुरता से उसका इंतजार था। उत्कंठा भरा। उतावलेपन की हद तक। व्याकुलता समाए। तब अभिसार फिर परिरंभन की उत्फुल्ल्ता होती थी। क्या था वह ? बस पत्र की प्रतीक्षा ! उसी युग का सादा, सीधा, सरल माध्यम था सूचना व समाचार का। एक अदना पोस्टकार्ड ! उस पाती [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>एक दौर होता था उसका भी कभी। आतुरता से उसका इंतजार था। उत्कंठा भरा। उतावलेपन की हद तक। व्याकुलता समाए। तब अभिसार फिर परिरंभन की उत्फुल्ल्ता होती थी। क्या था वह ? बस पत्र की प्रतीक्षा ! उसी युग का सादा, सीधा, सरल माध्यम था सूचना व समाचार का। एक अदना पोस्टकार्ड ! उस पाती में ही समूची बाती होती थी। भली या बुरी। अब यह आयताकार गत्ते का टुकड़ा दिखता कम है। अधिकतर सिर्फ स्मृतियों में। आज के इंटरनेट का युग, एसटीडी, वाहट्सएप में। टेलीग्राम ही अदृश्य हो गया है। बेतार भी नही है। मोबाइल तक पुराना पड़ गया, स्मार्टफोन के आते। न चिट्ठी, न संदेश ! कौन सा देश ? अलबत्ता फुर्सत बढ़ गई। बिना लुत्फ वाली। मगर तब वह सब कुछ सुगम होता था। बोधगम्य भी।</strong></p>
<p>आजकल तो डाकघर भी छूट गए। पोस्ट बॉक्स पर ताला झूलता रहता है, धूल धूसरित। यदा-कदा खाकी पहने पोस्टमैन दिख जाता है। कभी वही अपेक्षित विषय होता था हाईस्कूल की परीक्षा में निबंध लिखने हेतु। दिलचस्प होता था, बहुधा रटा रटाया।</p>
<p>संवाद तथा सूचना का यह सर्वाधिक सस्ता, लोकप्रिय और जनसाधारण की अभिव्यक्ति का यह साधन पोस्टकार्ड भले ही आजकल चलन में न रहा हो, पर बाजार में है अभी भी। हां मुहावरा जैसा बन गया। कहां टि्वटर ! कहां पोस्टकार्ड !! </p>
<p>तो आखिर जन्मा कैसे यह सर्वसाधारण का संदेशवाहक ? इसे पहले डेन्यूब तटीय ऑस्ट्रिया में सांसद प्रतिनिधि कोल्बेंस्टीनर ने इसे रूपित किया था। उन्होंने ही वीनर न्योस्टॉ में सैन्य अकादमी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. एमैनुएल हर्मेन को सुझाया। उन्हें यह विचार काफी आकर्षक लगा और 26 जनवरी 1869 को एक अखबार में इसके बारे में लेख भी लिखा था। ऑस्ट्रिया के डाक मंत्रालय ने इस विचार पर बहुत तेजी से काम किया और पोस्टकार्ड की पहली प्रति एक अक्टूबर 1869 में जारी की गई। यहीं से पोस्टकार्ड के लंबे सफर की शुरुआत हुई। दुनिया का यह प्रथम पोस्टकार्ड पीले रंग का था।  इसका आकार 122 मिलीमीटर लंबा और 85 मिलीमीटर चौड़ा था। इसके एक तरफ पता लिखने के लिए जगह छोड़ी गई थी, जबकि दूसरी तरफ संदेश लिखने के लिए।</p>
<p>अपनी पैदाइश के पहले महीने में ही 1869 में ऑस्ट्रिया में इसका इस्तेमाल पंद्रह लाख उपभोक्ता करने लगे। लोकप्रियता दिनोंदिन बढ़ती गई। इसके बाद ब्रिटेन में 1872 में जारी होने के बाद, पोस्टकार्ड भारत में 1879 को अस्तित्व में आया।      </p>
<p>पोस्टकार्ड के परिष्कृत आकार का आविष्कार अमेरिका मे हुआ था। अमेरिकी कांग्रेस ने 27 फरवरी, 1861 को, एक अधिनियम पारित किया, जिसमें एक औंस या उससे कम वजन वाले निजी तौर पर मुद्रित कार्ड को मेल में भेजने की अनुमति दी गई। उसी वर्ष जॉन पी. चार्लटन (अन्य स्थानों पर कार्लटन के रूप में देखा जाता है) ने अमेरिका में पहले पोस्टकार्ड का कॉपीराइट किया। </p>
<p>भारत में पोस्टकार्ड का चलन 15 जुलाई 1879 से शुरू हुआ। तब पहली जुलाई 1879 को जारी पहला पोस्टकार्ड ईस्ट इंडिया पोस्टकार्ड के नाम से जाना जाता था। इस पर रानी विक्टोरिया की छवि थी। कालचक्र के इस पोस्टकार्ड पर किंग जॉर्ज पंचम (1912) और जॉर्ज छठे (1939) को भी स्थान मिला। इस बीच 1935 में पहली बार देश में नॉर्थ वेस्टर्न रेलवे के चार पिक्चर पोस्टकार्ड जारी हुए जिन पर स्वर्ण मंदिर और दरबार साहिब डेरा बाबा नानक को भी स्थान मिला। आजाद भारत में 7 सितंबर 1947 को जारी नौ पाई के पोस्टकार्ड पर हरे रंग में त्रिमूर्ति की छवि अंकित की गई। गांधी जयंती पर 1951 में गांधीजी की चार पिक्चर पोस्टकार्ड देखने को मिले। </p>
<p>एक प्रकरण याद आया। पोस्टकार्ड की एक प्रतिलिपि मिली थी गांधी संग्रहालय में। उस पर केवल बापू की आकृति बनी थी। पता लिखा था “भारत में किसी स्थान पर।” वह सेवाग्राम (वार्धा) आश्रम पहुंचा दी गई। पहले पोस्टकार्ड की कीमत तीन पैसे रखी गई थी। मगर व्यवसायिक दृष्टि से यह लाभकारी नहीं था। पचास पैसे का जब यह बिका था तो लागत आई थी छः रुपए। हालांकि अंतर्देशीय पत्र की लागत रही ढाई रुपए। डाकघर के कर्मचारियों ने बताया कि अंतर्देशीय पत्र के लिए महीने में दो-चार भूले-भटके चले आते हैं। यही हालात लगभग सभी डाकघरों में है। वहीं ज्यादातर न्यायालय, एंप्लॉयमेंट, पावती, कस्टमर को जोड़ने, मंत्री और राजनेता को बधाई देनी, श्राद्ध कर्म की सूचना देने वाले ही पोस्टकार्ड का इस्तेमाल करते हैं। थोक में अधिकतर पोस्टकार्ड ही बिकते हैं।</p>
<p>आजकल पिक्चर पोस्टकार्ड के आकार में यह जीवित है। बहुधा पर्यटक लोग हर ऐतिहासिक स्थल से डाक से अपनी यात्रा का चिन्ह भेजते रहते हैं। यह लोकप्रिय भी काफी है। डाकघर का स्त्रोत भी। मगर इतना तो अहसास होता है कि आधुनिकता और नई संचार तकनीको के ईजाद होने के फलस्वरूप ऐसी जनसयोंगी माध्यम अब मात्र संग्रहालय में ही पाये जाएंगे। इतिहास को शायद यही बदा है।</p>
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		<title>अटल बिहारी वाजपेई के महाप्रस्थान के साथ ही भाजपा में शुष्कता, कर्कषता उग आई है। कटाक्ष, फबती, छींटाकशी, दिल्लगी, ठिठोली, चुटकियां सब खत्म हो गए</title>
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		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 28 Apr 2023 14:01:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मुखियाजी उवाच]]></category>
		<category><![CDATA[bjp]]></category>
		<category><![CDATA[congress]]></category>
		<category><![CDATA[leaders]]></category>
		<category><![CDATA[modi]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>भाजपाइयों में व्यंगबोध ओझल हो रहा है। कल (27 अप्रैल 2023) जब कर्नाटक चुनाव अभियान में कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खड़गे ने नरेंद्र मोदी को नाग कह दिया तो बिफर कर निर्मला सीतारमन ने बवाल मचाया। अरे ! उसी लहजे में वे कह देतीं कि “सोनिया गांधी नागिन है।” शाब्दिक हिसाब बराबर हो जाता। जोड़ीदारी भी। [&#8230;]</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/head-prowess/with-the-great-departure-of-atal-bihari-vajpayee-dryness-harshness-has-increased-in-bjp">अटल बिहारी वाजपेई के महाप्रस्थान के साथ ही भाजपा में शुष्कता, कर्कषता उग आई है। कटाक्ष, फबती, छींटाकशी, दिल्लगी, ठिठोली, चुटकियां सब खत्म हो गए</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>भाजपाइयों में व्यंगबोध ओझल हो रहा है। कल (27 अप्रैल 2023) जब कर्नाटक चुनाव अभियान में कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खड़गे ने नरेंद्र मोदी को नाग कह दिया तो बिफर कर निर्मला सीतारमन ने बवाल मचाया। अरे ! उसी लहजे में वे कह देतीं कि “सोनिया गांधी नागिन है।” शाब्दिक हिसाब बराबर हो जाता। जोड़ीदारी भी। मगर मोदी का खड़गे को जवाब उम्दा व्यंग है। खड़गे बोले कि वे कांग्रेस सरकार की गारंटी लेते हैं, मतलब पक्का वादा। व्यापारी प्रदेश गुजरात के मोदी बोले : “आपकी तो वारंटी ही खत्म हो गई। गारंटी का सवाल कहां रहा है ?” लेकिन प्रतीत होता है कि अटल बिहारी वाजपेई के महाप्रस्थान के साथ ही भाजपा में शुष्कता, कर्कषता उग आई है। कटाक्ष, फबती, छींटाकशी, दिल्लगी, ठिठोली, चुटकियां सब खत्म हो गए।</strong></p>
<p>अटलजी का ही एक उदाहरण है। तब (मई 1975) में गुजरात विधानसभा का मध्यावर्ती निर्वाचन हो रहा था। कांग्रेस बनाम अन्य के बीच संग्राम था। अटल बिहारी वाजपेई ने तब बरगद के वृक्ष (सोशलिस्ट पार्टी) के लिए वोट मांगे, तो जॉर्ज फर्नांडिस दीपक (जनसंघ) के लिए। दोनों मिलकर सूत-कातती महिला (संस्था कांग्रेस) के लिए। उस समय अहमदाबाद के रूपाली सिनेमा के सामने ही एक जनसभा हुई। जनता मोर्चा वाली, 1977 की जनता पार्टी का प्रथम अवतार थी। अटल जी के भाषण के अंत में मैंने पूछा : “कुछ संजय गांधी की मारुति छोटी कार्य योजना पर बोलिए।” तब मैं “टाइम्स ऑफ इंडिया” का रिपोर्टर था। </p>
<p>अपने चिरपरिचित शैली में अटलजी बस तीन शब्द बोले : “मां रोती है।” सारे श्रोता हंस दिये। यह पैना, अर्थभरा कटाक्ष था। मिलता जुलता एक और वाकया हुआ जब 2014 के संसदीय चुनाव में कांग्रेस की संख्या घट कर 44 रह गई थी। तो एक भाजपायी नेता ने कहा : “सिर्फ एक वोल्वो लायक रह गये।” इस बस में 45 ही बैठ सकते हैं। उसी चुनावी दौर में कांग्रेस अध्यक्षा तथा प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी अभियान पर गुजरात आईं। एक सभा में बोलीं : “मैं गुजरात की बहू हूं।” आधार था कि उनके पति स्व. फिरोज जहांगीर गांधी दक्षिण गुजरात के नवसारी शहर से इलाहाबाद बसने आए थे। इस पर सोशलिस्ट नेता मधु लिमए ने पूछा : “तो आप रोम जाएंगी चुनाव प्रचार में, तो दावा करेंगी कि आप इटली की सास हैं ?” जसपाल भट्टी इसीलिए कहा करते थे : “व्यंग बड़ा गंभीर विषय है। दिमाग की कारीगरी।”</p>
<p>हास्य, विडंबना, अतिशयोक्ति या लोगों की मूर्खता और कुरीतियों को उजागर करने और उनकी आलोचना करने के लिए उपहास का ही उपयोग व्यंग में होता है। “राजनीतिक परिदृश्य में तो व्यंग्य में विडंबना उग्रवादी होती है”, साहित्यिक आलोचक नॉर्थरोप फ्राइ ने कहा था। उदाहाणार्थ (मनमोहन सिंह के दौर में) कांग्रेसी मंत्रियों से घरेलू नाई अक्सर पूछते थे स्विस बैंक और काले धन के बारे में। एक बार किसी मंत्री ने डांटा, तो नाई बोला : “सर आपके रोयें खड़े हो जाते हैं तो उस्तुरा चलाने में सुभीता होता है।” </p>
<p>किसी गुजराती ने बंगाली से पूछा कि प्रधानमंत्री और बंगाल की मुख्यमंत्री में क्या फर्क है ? जवाब में बंगाली बोला : “बस सूती साड़ी और रेशमी कुर्ता पैजामा का।” भोपाल के एक पत्रकार ने दिग्विजय सिंह की तुलना गांधार नरेश शकुनी से की थी क्योंकि दोनों खानदानी सत्ता के हिमायती रहे और युवराज को राज दिलाने के पक्षधर रहे। यूपी के एक वोटर से एक मलयाली पत्रकार ने पूछा कि राहुल गांधी वायनाड में जीते, अमेठी से हारे क्यों ? तो जवाब मिला : “यही तो अंतर है साक्षरता में और समझ में।” किसी ने पूछा कि मुख्यमंत्री बनने पर भगवंत सिंह मान में क्या परिवर्तन दिखा ? जवाब था : “पहले वे जोकर के रोल में मजाक करते थे। अब मुख्यमंत्री के रूप में।” </p>
<p>ऑस्कर फिल्म एवार्ड के लिए एक भारतीय राजनेता का नामांकन मांगा गया। सरदार मनमोहन सिंह का नाम प्रस्तावित हुआ। कारण ? वे दस वर्ष तक प्रधानमंत्री का अभिनय करते रहे। तो किसी ने पूछा कि राजनेता और डाइपर (शिशुओं वाला) में क्या समानता है ? बताया गया कि दोनों को बदलते रहना चाहिए। किसी सुनसान स्थान पर एक रहजन ने किसी व्यक्ति को छूरा दिखाकर कहा : “सारे रूपये दे दो।” वह व्यक्ति बोला : “मैं सांसद हूं।” तो उस लुटेरे ने कहा : “तो अब तक हमसे लूटे गए रूपये वापस करो।”</p>
<p>श्रेष्ठतम राजनीतिक कटाक्ष था अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पर। वे बड़े रूपवान और पौरुषग्रंथि वाले रहे। दुबारा नामांकन कर रहे थे। एक सर्वेक्षण में महिलाओं से पूछा गया कि “क्लिंटन के साथ कौन-कौन यौनाचार करना चाहेंगी।” नब्बे प्रतिशत महिलाओं का (इस मोनिका लेविंस्की के प्रेमी के बारे में) जवाब था : “अब दुबारा नहीं।” </p>
<p>कर्नाटक के ताजा आरोप-प्रत्यारोप के संदर्भ में एक खासियत है। कांग्रेस और भाजपा के विचार में विलक्षण समानता है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ही बने रहें। पार्टी में वंशावली बनी रहेगी। भाजपा के लिए भी माकूल रहेगा। दूसरा  कूटनीतिक वृतांत। रोमानिया के निर्दयी कम्युनिस्ट तानाशाह निकोलाई चेचेस्कू फ्रेंच अभिनेत्री ब्रिगेटा वार्दोत के गहरे इश्क में पड़ गए। एक आत्मीय क्षण में अभिनेत्री ने अर्चना की : “राष्ट्रपति जी आप अपनी जनता को विदेश जाने की अनुमति दे दीजिए।” इस पर चेचेस्कू बोले : “प्रिये तुम कितनी रोमांटिक हो ! तुम्हारी इच्छा है कि रोमानिया में केवल तुम और मैं ही एकाकी रहें ?”</p>
<p>अब कर्नाटक चुनाव के संदर्भ में एक और वाकया। तब जोसेफ स्टालिन का युग था। एक रूसी मतदाता ने किसी अमेरिकी वोटर से कहा : “तुम्हारे देश में तो तुम लोगों को महीनों लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती है चुनाव परिणाम के लिए। सोवियत रूस में हम मतदान के पूर्व ही जान जाते हैं कि परिणाम क्या है।” अर्थात भारत में अभी लोकतंत्र हैं, परमात्मा उसे सलामत रखे !	</p>
<p>The post <a href="http://www.aryavartaindiannation.com/head-prowess/with-the-great-departure-of-atal-bihari-vajpayee-dryness-harshness-has-increased-in-bjp">अटल बिहारी वाजपेई के महाप्रस्थान के साथ ही भाजपा में शुष्कता, कर्कषता उग आई है। कटाक्ष, फबती, छींटाकशी, दिल्लगी, ठिठोली, चुटकियां सब खत्म हो गए</a> appeared first on <a href="http://www.aryavartaindiannation.com">आर्यावर्तइण्डियननेशन - aryavartaindiannation</a>.</p>
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		<title>ग्राहम बेल के टेलीफोन से आज के मोबाइल तक: यात्रा ट्रिंग-ट्रिंग, हेल्लो हेल्लो, रॉन्ग नंबर की</title>
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		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 10 Mar 2023 13:11:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[mobile]]></category>
		<category><![CDATA[telephone]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सोचिए यदि टेलीफोन न होता तो ? दुनिया दूरियों में खो जाती। पृथकता गहराती। फासले लंबाते। मानवता बस चिंदी चिंदी ही रह जाती। मगर आज ही के दिन (10 मार्च) ठीक 146 साल पूर्व एक घटना ने सब कुछ बदल डाला। तभी 29-वर्षीय एलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने टेलीफोन को इजाद किया। उनका तुक्का भिड़ गया। [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>सोचिए यदि टेलीफोन न होता तो ? दुनिया दूरियों में खो जाती। पृथकता गहराती। फासले लंबाते। मानवता बस चिंदी चिंदी ही रह जाती। मगर आज ही के दिन (10 मार्च) ठीक 146 साल पूर्व एक घटना ने सब कुछ बदल डाला। तभी 29-वर्षीय एलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने टेलीफोन को इजाद किया। उनका तुक्का भिड़ गया। उनकी टोपी में तुर्रा तभी से लग गया। एकदा वे तार का एक सिरा पकड़े अलग कमरे में दूसरा छोर पकड़े मित्र से बोले : “वाटसन मैं मिलना चाहता हूं।” चंद लम्हों में ही वाटसन आ गए और हर शब्द दुहराये जो उन्होंने सुने थे। बस दूरभाष अवतीर्ण हो गया। वह आज के मोबाइल का पहला रूप था। ग्राहम बेल की विवशता थी कि उसकी मां और पुत्री बधिर थीं। एक वाणी चिकित्सक होने के नाते ग्राहम बेल बहरों से संकेतों द्वारा बातें करने का प्रयास करते थे। यही इस युगांतरकारी अविष्कार की जननी रही।</strong></p>
<p>ग्राहम ने “बेल कंपनी” स्थापित की। सफर मीलों चला। पेटेंट मिला। मगर अमेरिका के विधि अधिकारियों ने अड़चने पैदा की। अंततः कामयाबी मिल ही गई। तेरह साल की आयु में ही ग्रेजुएट बनने वाले ग्राहम बेल तीन साल बाद मशहूर संगीत अध्यापक भी बन गए। अर्थात ध्वनि, वाणी और संचार के निष्णात। उन्होंने कम्युनिकेशन तकनीक में भी दूरगामी और लाभकारी अविष्कार किए। संचार क्रांति के जनक कहलाये। उन्हें बधिरों पर दया आती थी। उनसे लगाव था। कारण ? उनकी मां, पत्नी और घनिष्ठ मित्र सभी कान की अपंगता से ग्रसित थे। पर ग्राहम बेल ने अपंगता को अभिशाप नहीं बनने दिया। दूरसंचार यंत्र उसी के परिणाम हैं।</p>
<p>ग्राहम बेल को न केवल टेलीफोन, बल्कि ऑप्टिकल-फाइबर सिस्टम, फोटोफोन, बेल और डेसिबॅल यूनिट, मेटल-डिटेक्टर आदि के आविष्कार का श्रेय भी जाता है। ये सभी ऐसी तकनीक पर आधारित हैं, जिसके बिना संचार-क्रंति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। अलेक्जेंडर ग्राहम बेल को शायद अंदाजा नहीं रहा होगा जब उस जमाने की अपेक्षाकृत कम चर्चित उनकी दूसरी खोज मेटल डिटेक्टर आने वाले समय में आतंकवाद सहित अन्य प्रकार के अपराधों से लड़ने में कारगर उपकरण साबित होने वाली है। पुलिसिया जांच में आज बड़ी कारगर है। टेलीफोन की खोज के बाद बेल उसमें सुधार के लिए प्रयासरत रहे और 1915 में पहली बार टेलीफोन के जरिए हजारों किलोमीटर की दूरी से बात की। “न्यूयार्क टाइम्स” ने इस घटना को काफी प्रमुखता देते हुए इसका ब्यौरा प्रकाशित किया था। इसमें न्यूयार्क में बैठे बेल ने सैनफ्रांसिस्को में बैठे अपने सहयोगी वाटसन से बातचीत की थी। </p>
<p>उनकी विभिन्न खोजों पर उनके निजी अनुभवों का भी प्रभाव रहा। मसलन जब उनके नवजात पुत्र की सांस की समस्याओं के कारण मौत हो गयी तो उन्होंने एक मेटल वैक्यूम जैकेट तैयार किया जिससे सांस लेने में आसानी होती थी। उनका यह उपकरण 1950 तक काफी लोकप्रिय रहा और बाद के दिनों में इसमें और सुधार किया गया। अपने आसपास कई लोगों को बोलने एवं सुनने में कठिनाई होते देख उन्होंने इस दिशा में भी अपना ध्यान दिया और सुनने की समस्या के आकलन के लिए आडियोमीटर की खोज की। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों के अलावा वैकल्पिक ऊर्जा और समुद्र के पानी को मीठा बनाने की दिशा में भी काम किया।</p>
<p>ग्राहम बेल की जीवनी लिखने वाले कैरलोट ग्रे के अनुसार बेल के नाम 18 पेटेंट दर्ज हैं। इसके अलावा 12 पेटेंट उनके सहयोगियों के साथ दर्ज हैं। इन पेटेंटों में टेलीफोन, फोटोफोन, फोनोग्राफ और टेलीग्राफ शामिल हैं। उन्होंने आइसबर्ग का पता लगाने वाला एक उपकरण भी बनाया था। जिससे समुद्री यात्रा करने वाले नाविकों को खासकर अत्यधिक ठंडे प्रदेशों में विशेष मदद मिली।</p>
<p>अक्सर पत्रकारी नजरिए से हमें ख्याल आता है कि यदि ग्राहम बेल के ईजाद न होते तो मीडिया दुनिया ही विकलांग रहती। यही सवाल मेरी यांत्रिकी इंजीनियर बेटी (रेलवे बोर्ड में राष्ट्रीय धरोहर विभाग की कार्यकारी निदेशिका) विनीता ने वर्षों पूर्व मुझसे पूछा था : “पिताजी यदि ग्राहम बेल न होते तो ?” मेरा खरा जवाब था : “आज वैश्विक मीडिया गूंगी रहती।” मगर संचार क्रांति में निरंतर विकास देखकर आह्लादित होना हर पत्रकार के लिए स्वाभाविक है।  </p>
<p>एलेक्जेंडर ग्राहम बेल को सलाम। पेशेवर दृष्टि से टेलीफोन से जुड़े दो कार्टून याद आते हैं। एक में दिखा : दूसरी छोर से चोगा उठाने वाले का जवाब रहा : “गलत नंबर है।” तो फोन करने वाले ने पूछा : “आपने उठाया ही क्यों ?” (न्यूयार्क टाइम का कार्टून : 5 जून 1937)। दूसरा प्रसिद्ध कार्टून पत्रिका “पंच” (लंदन) का है। पति चोगा पकड़े पत्नी पर चिल्लाता है : “किसने इस टेबल की धूल पोछी ? मैंने उस पर एक नंबर नोट लिखा था।” फोन और अखबार का रिश्ता प्राचीन है, अटूट है। आज भी।</p>
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		<title>प्रतिद्वंदी रहे &#8216;मायावती&#8217; व &#8216;अखिलेश&#8217;, भ्रष्टाचारी यादव सिंह की मदद में !!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 06 Feb 2023 13:27:21 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[मुखियाजी उवाच]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>फिर सुर्खियों में आ गए अरबों रुपयों के घोटालेबाज यादव सिंह। इस बार सपत्नीक ! उनके कदाचार में साझीदार रही कुसुमलता। पर अगले सप्ताह के बाद (20 फरवरी 2023) लखनऊ जिला जज संजय पाण्डेय श्रीमतीजी आरोप पर तय करेंगे। फिलवक्त वे जेल से ही कोर्ट में पेश की गईं थीं। यादव सिंह तो बच निकले [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><strong>फिर सुर्खियों में आ गए अरबों रुपयों के घोटालेबाज यादव सिंह। इस बार सपत्नीक ! उनके कदाचार में साझीदार रही कुसुमलता। पर अगले सप्ताह के बाद (20 फरवरी 2023) लखनऊ जिला जज संजय पाण्डेय श्रीमतीजी आरोप पर तय करेंगे। फिलवक्त वे जेल से ही कोर्ट में पेश की गईं थीं। यादव सिंह तो बच निकले थे। उत्तर प्रदेश कृतज्ञ है काषाय-परिधानधारी योगी आदित्यनाथ का, जिन्होंने यादव सिंह की फाइल पुनः खुलवायी और मुकदमा दुबारा चलवाया (27 जुलाई 2021)।</strong></p>
<p>परस्पर शत्रु रहे मुख्यमंत्री-द्वय (मायावती और अखिलेश यादव) यादव सिंह पर खूब कृपा लुटाते रहे थे। उसकी भरपूर रक्षा करते रहे। मायावती के व्यवहार से अचरज तनिक भी नहीं हुआ। वे तो भ्रष्टाचार में विश्वकप जीतने की सदैव दावेदार रहीं। यूं भी यादव सिंह दलित है, मुख्यमंत्री के सवर्णीय ! पर लोहिया के चेले, अखिलेश यादव भी इस सिंह के आखेट बन गये !! </strong></p>
<p>राममनोहर लोहिया कहते थे कि खूंटी गाड़ो ताकि फिसलन कही तो थमें। वर्ना रसातल जा पहुंचेंगे। अर्थात सिद्धान्तों से डिगने तथा समझौता करने का अधोबिन्दु तय करो। इसीलिए लखनऊ उच्च न्यायालय द्वारा यादव सिंह पर दिये गये सीबीआई द्वारा जांच के निर्देश के संदर्भ में उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार को राजधर्म की कसौटी पर कसें। तब अखिलेश यादव द्वारा नामित लखनऊ के उच्च न्यायालय में सरकारी वकील पचहत्तर-वर्षीय महाधिवक्ता विजय बहादुर सिंह ने जनहित याचिका का विरोध करते हुये यादव सिंह के भ्रष्टाचार की सीबीआई जांच की मांग को खारिज करने का तर्क दिया। सर्वाधिक अचरज की बात यह थी कि इलाहाबाद उच्चतम न्यायालय ने जुलाई 2015 को प्रबुद्ध नागरिक नूतन नूतन ठाकुर की जनहित याचिका पर सीबीआई जांच के आदेश दे दिए थे। तब अखिलेश यादव सरकार ने उच्चतम न्यायालय से कहा था कि सीबीआई जांच की आवश्यकता नहीं है। वाह ! सरकार अपराधी की तरफदार बन गई !! मगर उच्च न्यायालय ने सीबीआई जांच का आदेश दे ही दिया। उस वक्त मुख्यमंत्री थे स्वनामधन्य यह महान लोहियावादी !</p>
<p>आखिर यह &#8220;यादव सिंह पुराण&#8221; है क्या ? एक तीसरे-दर्जे का सरकारी कारिन्दा नॉएडा में जूनियर इंजिनियर से पन्द्रह वर्षों में ही मुख्य मेंटेनेंस इंजीनियर बन गया बाद में इंजीनियर-इन-चीफ। अरबों रूपयों से खेलने लगा। उसकी मोटरकार के डिक्की में दस करोड़ पाये गये थे। उसके विरूद्ध जांच हुई। पर हर मुख्यमंत्री ने उसे रफा दफा करा दिया। यादव सिंह का सिक्का चलता रहा, खासकर बसपा तथा सपा राज में। उन पर इनकम टैक्स का शिकंजा कसता रहा, लेकिन न तो नोएडा अथॉरिटी ने और न ही अखिलेश सरकार ने कोई बड़ा कदम उठाया। जब जांच सीबीआई को सौंपी गई तो लंबी छानबीन के बाद उन्हें गिरफ्तार कर ही लिया। </p>
<p>करीब 900 करोड़ की संपत्ति के मालिक यादव सिंह पर इनकम टैक्स विभाग ने छापा मारा था। छापेमारी में दो किलो सोना, 100 करोड़ के हीरे, 10 करोड़ कैश के अलावा कई दस्तावेज मिले। इसके अलावा 100 करोड़ रुपए कीमत की डायमंड ज्वेलरी जब्त किए गए थे। इनका वजन करीब दो किलो था। बारह लाख रुपये सालाना की सैलरी पाने वाले यादव सिंह और उनका परिवार 323 करोड़ की चल अचल संपत्ति का मालिक बन बैठा। यादव सिंह डिप्लोमा धारक इंजीनियर था और उसे अथॉरिटी में नौकरी मिल गई। सन 1995 तक उन्हे दो प्रमोशन मिल चुके थे यानी वो पहले जूनियर इंजीनियर से असिस्टेंट इंजीनियर और असिस्टेंट इंजीनियर से प्रोजेक्ट इंजीनियर बन चुके थे, बिना किसी इंजिनियरिंग डिग्री के।  </p>
<p>उनके कई मॉल भी निर्माणाधीन हैं। प्रोजेक्ट्स में यादव सिंह की हिस्सेदारी बताई जाती है। इस चीफ इंजीनियर और उनके परिवार के सदस्यों के पास कुल करीब एक हजार करोड़ रुपए कीमत की संपत्ति का अनुमान रहा। इनकम टैक्स विभाग के एक वरिष्ठ अफसर के मुताबिक, पूरा मामला यादव सिंह की पत्नी कुसुमलता और उनके पार्टनरों द्वारा 40 कंपनियां बनाकर हेराफेरी करने का है। बोगस शेयर होल्डिंग के बूते सिर्फ नाम के लिए कंपनियां बनाकर नोएडा डेवलपमेंट अथॉरिटी से प्लॉट अलॉट करवाए गए। इसके बाद प्लॉट कंपनी समेत बेच दिए। दस्तावेजों में न दिखा कर बड़े पैमाने पर आयकर चोरी की गई।&#8217; </p>
<p>नोएडा अथॉरिटी में तैनाती का फायदा उठाते हुए अपनी पत्नी के नाम रजिस्टर्ड फर्म को सरकारी दर पर बड़े-बड़े व्यावसायिक प्लॉट अलॉट करा देता था। यादव सिंह के नोएडा स्थित सेक्टर 51 की कोठी पर तकरीबन सौ मीटर के हिस्से में बनी ग्रीन बेल्ट में ईको फ्रेंडली शौचालय, फुट लाइट, चार्जिंग प्वॉइंट, कबूतरों का पिंजड़ा और रंग-बिरंगे झूले और बेंच थे। ग्रीन बेल्ट में ही यादव सिंह के घर के लिए जनरेटर और एक ट्रांसफामर रखा हुआ था। अथॉरिटी के चीफ इंजीनियर होने के नाते यादव सिंह की एक जिम्मेदारी ग्रीन बेल्ट पर अवैध कब्जे को हटाना भी था, लेकिन वह खुद ऐसी पट्टी पर कब्जा किए हुए था। इनकम टैक्स डायरेक्टर जनरल (जांच) ने बताया कि ये सारा खेल &#8216;शेल&#8217; कंपनियों के जरिए होता था। शेल कंपनियां बस नाम की कंपनियां होती हैं। व्यावहारिक रूप में इनका कोई वजूद नहीं होता। जांच के दौरान यह बात सामने आई है कि रजिस्टर्ड कंपनियां बनाकर नोएडा से प्लॉट अलॉट किए जाते थे। बाद में इनके शेयर शेल कंपनियों को बेचे जाते थे। इससे यह नहीं पता चल पाता था कि इनपर कैपिटल गेन कितना बना। इस तरह टैक्स की चोरी की जाती थी।</p>
<p>मायावती सरकार के दौरान भी यादव सिंह पर नोएडा में कई परियोजनाओं में धांधली के आरोप लगे थे। उनकी हैसियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उसने नियमों को ताक पर रखकर 954 करोड़ रुपये के ठेके अपने करीबियों को बांट दिए थे। इसके बाद अखिलेश सरकार ने यादव सिंह के खिलाफ विभागीय जांच बिठाकर उन्हें सस्पेंड कर दिया था। बाद में उनका सस्पेंशन वापस ले लिया गया था। इसीलिए योगी आदित्यनाथ ने परंपरा तोड़ी और नोयडा गये। भ्रष्टाचार से मुकाबला किया। तो ऐसी रही यह दस्ताने-बदउनमानी, पूर्णतया बेजोड़, बेमिसाल ! </p>
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		<title>फिर बला टली मोदी सरकार की !</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/editorial/narendra-modi-is-safe-demonatisation-ok</link>
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		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 02 Jan 2023 11:25:18 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[banking]]></category>
		<category><![CDATA[demonatisation]]></category>
		<category><![CDATA[finance]]></category>
		<category><![CDATA[India]]></category>
		<category><![CDATA[narendra modi]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>आज (2 जनवरी 2023) मोदी सरकार नववर्ष में महासंकटग्रस्त होने से बाल-बाल बच गई। अकथनीय वित्तीय अराजकता और गंभीर वैधानिक संकट टल गया। सोनिया-कांग्रेस सरकार के वित्त मंत्री रहे पलनिअप्पन चिदंबरम अपनी याचिका द्वारा इतनी विकराल सियासी तबाही सर्जा देते जितना स्व. राजनारायण जी द्वारा इंदिरा गांधी को अपस्थ करने वाली याचिका (12 जून 1975) [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>आज (2 जनवरी 2023) मोदी सरकार नववर्ष में महासंकटग्रस्त होने से बाल-बाल बच गई। अकथनीय वित्तीय अराजकता और गंभीर वैधानिक संकट टल गया। सोनिया-कांग्रेस सरकार के वित्त मंत्री रहे पलनिअप्पन चिदंबरम अपनी याचिका द्वारा इतनी विकराल सियासी तबाही सर्जा देते जितना स्व. राजनारायण जी द्वारा इंदिरा गांधी को अपस्थ करने वाली याचिका (12 जून 1975) से भी नहीं हुआ था। राजनारायण की याचिका यदि नारायण अस्त्र था, तो चिदंबरम की याचिका ब्रह्मास्त्र हो जाता, जो अमोघ होता है।</strong></p>
<p>कानूनी संयोग यह रहा कि चिदंबरम के सभी बिंदुओं और तर्कों को न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना द्वारा स्वीकारे गये। मसलन नोटबंदी का अधिकार रिजर्व बैंक को है, न कि केंद्र सरकार को। मनमोहन काबीना के इस पूर्व वित्त मंत्री का आग्रह था कि नोटबंदी की रीति उचित होती यदि उसकी रिजर्व बैंक सिफारिश करता और संसद में उस पर विस्तृत चर्चा होती। चिदंबरम कैसे इस आशंका से अनभिज्ञ रहे कि प्रधानमंत्री द्वारा नोटबंदी की शाम ढले घोषणा के बाद भी कांग्रेसी लांछन लगते रहे कि दोनों बड़े नोट (पांच सौ और हजार रूपए वाले) भाजपाइयों द्वारा भुना लिए गये थे। उन्हें पूर्व सूचना थी अर्थात काले धन को सफेद बना लिया गया था। </p>
<p>नोटबंदी से सरकार के तीन लक्ष्य थे : (1) जाली नोट का चलन थमता, (2) काले धन पर अंकुश लग जाता, और (3) मादक द्रव्य तथा आतंकवादियों को आर्थिक मदद का उन्मूलन हो जाता। खुली संसदीय चर्चा से यह महत्वपूर्ण निर्णय तो पूर्णतया फिस हो जाता और कई अपराधियों को अवसर भरपूर मिल जाता। प्रधानमंत्री ने घोषणा (8 बजे), मंगलवार, 8 नवंबर 2016 को की थी। रिजर्व बैंक का निर्णय ठीक ढाई घंटे पूर्व किया गया था। कानो कान खबर नहीं हुई थी।</p>
<p>चार जजों ने पूर्ण सहमति व्यक्त की। सिवाय एक अकेली (न्यायमूर्ति नागरत्ना) के। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि : “नोटबंदी से पहले केंद्र और आरबीआई के बीच सलाह-मशविरा हुआ था। इस तरह के उपाय को लाने के लिए दोनों पक्षों में बातचीत हुई थी। इसलिए हम मानते हैं कि नोटबंदी आनुपातिकता के सिद्धांत से प्रभावित नहीं हुई थी।” जस्टिस बी. आर. गवई ने सरकार के पक्ष में की टिप्पणी की और कहा कि केंद्र की निर्णय लेने की प्रक्रिया में कोई भी खामी नहीं हो सकती, क्योंकि आरबीआई और सरकार के बीच सलाह-मशविरा हुआ था। इसलिए यह कहना प्रासंगिक नहीं है कि लक्ष्य हासिल हुआ या नहीं।”</p>
<p>नोटबंदी को गलत और त्रुतिपुर्ण बताने वाली 58 याचिकाओं को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि केंद्र के इस निर्णय में कुछ भी गलत नहीं था। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि ये फैसला RBI की सहमति और गहन चर्चा के बाद लिया गया है। इस बीच कोर्ट ने इस फैसले में कई बड़ी टिप्पणियां भी की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये निर्णय एकदम सही था। कोर्ट ने इसी के साथ कहा कि 8 नवंबर 2016 को लाई गई नोटबंदी की अधिसूचना वैध थी और नोटों को बदलने के लिए दिया गया 52 दिनों का समय भी एकदम उचित था। नोटबंदी के फैसले को खारिज या बदला नहीं जा सकता है।</p>
<p>ठीक एक ऐसे वक्त पर विश्व बैंक की राय आयी कि भारत की अर्थव्यवस्था में 6.9 प्रतिशत होने वाली है। आज के इस फैसले से राष्ट्रीय अर्थनीति पटरी पर ही रहेगी। सर्वोच्च न्यायालय ने ही 24 जून 2022 को इसी भांति नरेंद्र मोदी के विरूद्ध एक संवेदनशील याचिका खारिज कर दी थी। यदि तब वह अदालत स्वीकार कर लेती तो तभी, छः माह पूर्व ही भाजपा को नए प्रधानमंत्री की तलाश करनी पड़ती। वह थी, पत्रकार तीस्ता सीतलवाड द्वारा पेश श्रीमती जाकिया अहसान जाफरी की याचिका में आरोपी नरेन्द्र दामोदरदास मोदी 2002 के गुजरात दंगों के दोषी माने जाने की। यदि मोदी दण्ड के भागी बन जाते तो ? </p>
<p>अत: उसी दिन राष्ट्रपति पद के लिये द्रौपदी मुर्मू के नामांकन प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने से वे कट जाते। नये भाजपा संसदीय नेता की खोज चालू हो जाती। मोदी के सार्वजनिक जीवन की सर्वथा इति हो जाती। राष्ट्र की प्रगति थम सी जाती। अर्थात ठीक वहीं दास्तां दोहरायी जाती जो 12 जून 1975, सैंतालीस साल पूर्व इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा इंदिरा गांधी के लोकसभा निर्वाचन को निरस्त करने से उपजी थी। फिलहाल ऐसी दुरभिसंधि से मोदी महफूज रहे। </p>
<p>तब जजों के लिखा था कि तीस्ता ने न्यायालय के सामने झूठे आरोप लगा कर पीठ को भ्रमित करने की कोशिश की। एक अवसर पर तीस्ता चाहती थी कि अदालत उसके समर्थक पुलिस अफसर संजय भट्ट का बयान मान ले क्योंकि वह &#8221;सत्यवादी&#8221; हैं। यही भट्ट आजकल (पालनपुर) जेल में बंद हैं क्योंकि हिरासत में उन्होंने एक कैदी की हत्या करा दी थी। इसी भट्ट का वक्तव्य था कि 27 फरवरी 2002 के दिन मुख्यमंत्री (मोदी) ने गांधीनगर में अफसरों के बैठक में कहा था : &#8221;मुसलमानों को सबक सिखाना है।&#8221; जजों ने कहा कि : तीस्ता का यह बयान भी बिलकुल झूठा निकला। तो यह है किस्साये-तीस्ता जिसने गणतंत्र के माननीय प्रधानमंत्री के विरुद्ध एक घिनौनी साजिश की थी। विफल हुयी। देश बच गया था। जैसे आज दोबारा !</p>
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		<title>बहनों और भाइयों &#8230;&#8230;&#8230;🎤🎧🎼🎹 जन्म दिन मुबारक हो 🎤🎧🎼🎹</title>
		<link>http://www.aryavartaindiannation.com/special-story/happy-birthda-aamin-sahani-bahnon-aur-bhaiyon</link>
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		<dc:creator><![CDATA[के. विक्रम राव]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Dec 2022 10:54:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[विशेष कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[aamin sahahani]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली : उन दिनों अमूमन अखबारों के दफ्तर में देर शाम फोन की घंटी बजती थी (तब मोबाइल नहीं जन्मा था), तो अंदेशा होता था कि “कुछ तो हुआ होगा।” मसलन ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु (तड़के तीन बजे), जान कैनेडी की हत्या (आधी रात), याहया खान द्वारा भारतीय वायुसेना स्थलों पर [&#8230;]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली : उन दिनों अमूमन अखबारों के दफ्तर में देर शाम फोन की घंटी बजती थी (तब मोबाइल नहीं जन्मा था), तो अंदेशा होता था कि “कुछ तो हुआ होगा।” मसलन ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु (तड़के तीन बजे), जान कैनेडी की हत्या (आधी रात), याहया खान द्वारा भारतीय वायुसेना स्थलों पर बांग्लादेश युद्ध पर प्रथम रातवाला हवाई हमला, इत्यादि। उस रात (दिसम्बर, 1966) में मुंबई “टाइम्स ऑफ इंडिया” दफ्तर में अचानक फोन की घंटी बजी। तीसरी  मंजिल के रिपोर्टर कक्ष में बैठा, मैंने फोन उठाया। कोई पूछ रहा था : “सिटी डायरी” के लिए फलां कार्यक्रम भेजा था, छाप दीजिएगा।” खोजकर मैने उन्हे बताया कि आइटम दे दिया है।</strong></p>
<p>उधर से वह व्यक्ति अपना नाम बताने ही वाला था कि बीच में मैंने टोका। कह दिया : “आपको कौन नहीं पहचानता ? आपकी आवाज ही आपकी पहचान है” ! वे थे अमीन सयानी। कल (22 दिसंबर 2022) उनका 90वां जन्मदिन है। उनकी दिलकश वाणी सुनकर ही मेरी स्कूली पीढ़ी वयस्क हुई थी। तभी रेडियो सीलोन पर बिनाका गीतमाला शुरू हो गई थी। बुधवार की शाम हुई कि आठ बजते बजते रेडियो से सभी कान सटाकर बैठते थे। हिंदुस्तान ठहर जाता था। </p>
<p><strong>“बहनों और भाइयों,”&#8230;&#8230;&#8230;&#8230; “अमीन सयानी&#8230;&#8230;।” </strong></p>
<p>उनकी उद्घोषणा का अंदाज भी निराला था। मानो श्रोता के सामने बैठकर संवाद कर रहे हों। बीन बजा रहे हों ! उस दौर में फिल्मी गीतों की लोकप्रियता भी खूब थी। कारण था कि नवस्वतंत्र भारत सरकार की रेडियो नीति। सूचना और प्रसारण मंत्री थे उत्तर प्रदेश में बसे मराठी विप्र डॉ बालकृष्ण विश्वनाथ केसकर जो शास्त्रीय संगीत को ही सब कुछ मानते थे। फिल्म संगीत को वे अपसंस्कृति समझते थे, बाजारू ! वह पूर्णतया प्रतिबंधित था रेडियो पर। डा. केसकर दस वर्ष नेहरू सरकार के सूचना मंत्री रहे। आलमगीर औरंगजेब से वे थोड़ा ही बेहतर थे। इस मुगल बादशाह ने तो संगीत कला को ही दफना दिया था। उनके मजहब की प्रथा के अनुसार। मगर डॉ केसकर शास्त्रीय संगीत के पक्षकार तथा कट्टर प्रचारक रहे। उनके मददगारों में ठा. जयदेव सिंह, श्रीमती वाणीबाई राम जैसे अफसर थे। मंत्रीजी की दृढ़ मान्यता थी कि फिल्मी गानों से जनरुचि ओछी, हरजाई टाइप होती है। नतीजा वही हुआ। जिसे जितना दबाया जाता है वह उतना ही उछलता है, रबड़ की गेंद की मानिन्द। फिल्मी म्यूजिक भी।</p>
<p><strong>अतः लाजमी है कि रेडियो सीलोन का फिल्मी प्रोग्राम अपार सफलता पा गया। प्रारंभ हुआ 3 दिसंबर 1952 को, सात गानों की सीरीज का पहला शो रिले किया गया था। काफी कामयाब रहा। एक साल के भीतर अमीन सयानी के कोलाबा ऑफिस में हर हफ्ते 65,000 चिट्टियां आने लगीं। बाद में इस शो में गानों की संख्या सात से बढ़कर 16 हो गई। बुधवार को प्रसारित होने वाले इस शो के लिए पिछले शनिवार को ही रिकॉर्डिंग की जाती थी। सन 1952 में आई हिंदी फिल्म “आसमान” का गाना “पोम पोम बाजा बोले” काफी मशहूर हुआ। इसे ओपी नय्यर द्वारा ट्यून किया गया है। ये “जिंगल बेल, जिंगल बेल” पर आधारित है। गीत माला की यही सिग्नेचर ट्यून थी।</strong> </p>
<p>पायदानों पर गीत का स्थान तय कौन करें ? इसकी पद्धति निर्धारित थी। शो में कौन से गाने जाने चाहिए ? इसके लिए देशभर के प्रमुख रिकॉर्ड डीलरों से रिपोर्ट मांगी जाती थी। पहले दो दशकों तक नौशाद अली, सी. रामचंद्र, हेमंत कुमार, रोशन और मदन मोहन साप्ताहिक हिट परेड में प्रमुखता से शामिल रहे। वहीं 1960 के दशक में शंकर-जयकिशन, ओपी नय्यर और एसडी बर्मन आए। फिर लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी और आरडी बर्मन ने उनकी जगह ले ली। प्रसिद्ध लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जोड़ी के प्यारेलाल ने कहा : “मैं और लक्ष्मीभाई दोनों बिनाका गीतमाला के प्रबल प्रशंसक थे। मुंबई के रिकॉर्डिंग स्टूडियो में जूनियर संगीतकार के रूप में संघर्ष करते हुए, हमने एक दिन का सपना देखा था जब हमारे गीत गीत माला चार्ट-बस्टर होंगे।” </p>
<p>यूं पहले दिन से ही विज्ञापनों के मार्फत रेडियो सीलोन पर धन बरसना शुरू हो गया था। उसके पूर्व तक अमीन सयानी का साप्ताहिक परिश्रमिक केवल 25 रूपये थे। उस वक्त आठ आने सेर शक्कर बिकती थी। चावल एक रुपये सेर। उन्होने वह भी जमाना देखा जब वे आकाशवाणी के हिन्दी प्रभाग के लिए ऑडिशन देने गए थे। उनसे कहा गया कि उनके उच्चारण में अंग्रेजी और गुजराती का आभास आता है। मगर वे हतोत्साहित नहीं हुये। उन्होने कई विदेशी रेडियों कार्यक्रमों के लिए भी अपनी आवाज दी है। वह अब तक बढ़ते गये वो 50 हजार से ज्यादा कार्यक्रमों और करीब 20 हजार जिंगल कर चुके है। सन 1992 में उन्हे लिमका बुक ऑफ रिकॉर्ड ने “पर्सन ऑफ द ईयर” के खिताब से उन्हे नवाजा गया। उन्हे पद्मश्री से 2009 में सम्मानित किया गया। रेडियो का पर्याय वे बन गये थे। भाग्य देखिये कभी वे गायक बनना चाहते थे, लेकिन बाद में जाने-माने ब्रॉडकास्टर हो गए। उनकी मान्यता है कि अच्छी हिन्दी बोलने के लिए थोड़ा-सा उर्दू का ज्ञान भी ज़रूरी है।</p>
<p>एकदा बॉलीवुड में किस्मत आजमाने से पहले अमिताभ बच्चन रेडियो उद्घोषक बनना चाहते थे। इसके लिए वह &#8216;ऑल इंडिया रेडियो&#8217; के मुंबई के स्टूडियो में ऑडिशन देने भी गए थे अमीन सयानी के पास। तब अमिताभ से मिलने का समय नहीं था, क्योंकि अभिनेता ने वॉयस ऑडिशन के लिए पहले से समय नहीं लिया था। अमीन सयानी को याद कभी हुआ, कि “जब मैं एक हफ्ते में 20 कार्यक्रम करता था तो हर दिन मेरा अधिकतर समय साउंड स्टूडियो में गुजरता था। मैं रेडियो प्रोग्रामिंग की हर प्रक्रिया में शामिल रहता था।” </p>
<p><strong>सयानी याद करते हैं कि एक दिन अमिताभ बच्चन नाम का एक युवक बिना समय लिए वॉयस ऑडिशन देने आया। मेरे पास उस पतले-दुबले व्यक्ति के लिए बिल्कुल समय नहीं था। उसने इंतजार किया और लौट गया। इसके बाद भी वह कई बार आया, लेकिन मैं उससे नहीं मिल पाया और रिसेप्शनिस्ट के माध्यम से यह कहता रहा कि वह पहले समय ले, फिर आए।&#8221;</strong></p>
<p>हालांकि 1970 के दशक में निजी टीवी चैनलों के आने और फिल्मी गीतों की गुणवत्ता में लगातार गिरावट के कारण गीत माला ने अपनी चमक खोनी शुरू कर दी थी। आज जो विविध भारती चमक रही है, उसमें भी अमीन सयानी को ही श्रेय देना चाहिए। आकाशवाणी के संचालक समझ गये कि फिल्मी गीत धनोपार्जन का अजेय स्रोत हैं। उसे परिमार्जित कर चलाया गया। आज वह शीर्ष पर है। उम्र के तकाजे से सयानी साहब पर भी सीमाएं आ गई। पर उन्होंने राष्ट्र के जनजीवन में अपार अमरत्व तो कायम कर ही दिया है। अगला दशक वे पूरा करें। सेंचुरी लगायें। इंशाल्लाह ! </p>
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