
नई दिल्ली: प्राचीन मूर्तियों को ‘चोर’ और ‘भक्त’ दोनों से खतरा है। बिहार की प्रमुख सूर्य प्रतिमाओं से हज़ारों की संख्या में देवी-देवताओं की मूर्तियां चोरी हो चुकी है। इस खतरे के बीच दिल्ली में शायद पहली बार ‘छठ पर्व और सूर्य पूजा’ के इतिहास और महत्व पर एक संगोष्ठी आयोजित की गयी है। संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य बिहार के लोगों के साथ-साथ देश के लगभग 2.68 लाख ग्राम पंचायतों और करीब 7,800 शहरी क्षेत्रों में रहने वाले तक़रीबन 1,479,537,695 लोगों में अपनी विरासत के प्रति जागरूकता पैदा हो सके।
वैसे लोग बाग कितने ‘जागरूक’ होंगे, यह कहना मुश्किल है, लेकिन बिहार के लोग कोशिश जरूर करते हैं, खासकर जो ‘भ्रष्ट’ नहीं हैं। सामाजिक सरोकार रखते हैं। इस संगोष्ठी में विद्वान और कलाकार एक साथ आएंगे। सभी छठ पूजा के कई पहलुओं पर चर्चा करेंगे, जिसमें सूर्य के ऐतिहासिक, मूर्तिकला, स्थापत्य और प्रतिमा-संबंधी चित्रण, जीवंत सूर्य-पूजा और कला, रीति-रिवाजों व सांस्कृतिक स्मृतियों के आपसी संबंधों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
वैसे राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ही नहीं, देश के सभी 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में, जहाँ बिहार के 38 जिलों के 45103 गांव से, झारखंड के 24 जिलों के 32620 गांवों से और उत्तर प्रदेश के 75 जिलों के 106000 गांवों से अपनी रोजी-रोटी की तलाश में लोग प्रवासित हुए हैं, उन राज्यों में उनकी उपस्थिति के मद्दे नजर उनकी संस्कृति, पर्व-त्यौहार का राजनीतिकरण होता आया है और होता रहेगा ताकि मत और मतदाता का विस्थापन नहीं हो, लेकिन इन बातों को दरकिनार करते अगर वास्तव में सांस्कृतिक विकास के लिए यह आयोजन है, तो निश्चित रूप से यह काबिले तारीफ है।
इस ऐतिहासिक अवसर का आयोजन 28 सितम्बर को दिल्ली में 71, लोधी एस्टेट, केके बिरला लें स्थित इंटक भवन में किया गया है। अर्घ्य के नाम से आयोजित इस प्रदर्शनी में छठ त्योहार से जुड़ी असली मिथिला कलाकृतियों और शिल्प के ज़रिए इस त्योहार के कलात्मक और सांस्कृतिक महत्व को दिखाया जायेगा। प्रदर्शनी का उद्घाटन कल के पत्रकार और आज के नेता राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश करेंगे।
ज्ञातव्य है कि बिहार इंटक के सह-संयोजक डॉ. शिव कुमार मिश्र “बिहार की प्रमुख सूर्य प्रतिमाएं” नामक पुस्तक को इंटक ने प्रकाशित किया है। “बिहार की प्रमुख सूर्य प्रतिमाएँ”” में बिहार से प्राप्त प्रतिमाओं में से 145 प्रतिनिधि प्रतिमाओं का अध्ययन कर प्रकाशित किया है, जो विद्वानों एवं विद्यार्थियों दोनों के लिए लाभप्रद होगा । यह पुस्तक बिहार में सूर्योपासना की लोकप्रियता को भी विश्व पटल पर सामने लाने में सफल होगा ।
तभी तो इंटक के अध्यक्ष अशोक सिंह ठाकुर ने लिखा भी की “डॉ. शिव कुमार मिश्रजी से इंटैक को बहुत आशा है। ऐसा लगता है कि उन्होंने अपना पूरा जीवन बिहार की संस्कृति और परम्परा को समृद्ध करने में लगा दिया है। वे इसी तरह लगातार प्रयास करते रहें। डॉ . मिश्र द्वारा बिहार के सूर्य प्रतिमाओं पर प्रकाशित पुस्तक से यूनेस्को में सूर्य पूजा को स्थान दिलाने में सुविधा होगी। सूर्य पूजा पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन एवं इसमें प्रस्तुत शोध लेखों का प्रकाशन, सूर्य पूजा पर आधारित बिहार के लोक कलाओं की अर्घ्य नामक प्रदर्शनी सूर्य प्रतिमाओं पर पुस्तक का प्रकाशन और बिहार के विभिन्न भाषा बोलियों में गाए जाने वाले छठ गीतों का संग्रह कर प्रकाशन करना आदि ऐसे कार्य हैं जिसके लिए इंटैक बिहार की मुक्तकंठ से प्रशंसा की जानी चाहिए।”
पटना संग्रहालय के निदेशक उमेश चंद्र द्विवेदी का कहना है कि “सूर्योपासना की परम्परा संसार के अनेक प्राचीन सभ्यता ओं में प्रचलित रही। सूर्य के दिव्य प्रकाश को देखते हुए एवं अंधकार को विनष्ट करने की शक्ति के कारण मानव ने उन्हें सबसे पहले देवत्व प्रदान किया। भारत में सूर्य की पूजा की परंपरा प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही है। उन संस्कृतियों में प्रचलित विभिन्न प्रतीकों का सूर्य के प्रतीक से तादात्म्य स्थापित कर यह अनुमान किया जाता है कि सूर्योपासना का प्रचलन प्रागैतिहासिक संस्कृति में भी था। प्राचीन गुफा चित्रों में सूर्य का चित्रण हमें देखने को मिलता है, जिनका काल अनेक विद्वानों ने नवपाषाण काल माना है। हड़प्पा संस्कृति में दिखाई देने वाले “स्वास्तिक’, ‘चक्र’, किरण युक्त मण्डल” आदि प्रतीक परवर्ती युग में सूर्य के प्रतीक समझे जाते थे। वैदिक युग में सूर्य से संबंधित अनेक देवताओं की कल्पना की गई थी, जिनमें सविता, पूषण, मित्र, अर्यमन और विष्णु प्रमुख थे। इसी काल में द्वादशादित्य की भी कल्पना की गई । ऋग्वेद में सूर्य के द्वारा रथ पर भ्रमण करने का उल्लेख है, जिनके रथ में एक से अधिक या सात अश्व के द्वारा चला ये जाने का उल्लेख है। परन्तु इस समय तक सूर्य के प्रतिमा का निर्माण प्रारंभ नहीं हुआ था ।
द्विवेदी जी आगे कहते हैं कि “विष्णु धर्मोत्तर पुराण, मत्स्य पुराण, अग्नि पुराण, भविष्य पुराण, वृहत संहिता जैसे ग्रन्थों में सूर्य प्रतिमा के निर्माण का विधान का उल्लेख हमें सर्वप्रथम मिलता है। भारतीय कला में सूर्य के प्रारंभिक चित्रण का श्रेय बिहार को ही जाता है। बोधगया से प्राप्त एक स्तंभ पर रथ पर सवार सूर्य का चित्रण हमें सर्वप्रथम देखने को मिलता है । यहाँ सूर्य एक चक्रवाले रथ पर सवार हैं, जिसे चार घोड़े खींच रहे हैं । सूर्य के हाथ में घोड़ों की रास है। उनके दोनों ओर एकएक नारी प्रतिमा को दिखाया गया है, जिसकी पहचान उषा एवं प्रत्युषा से की गई है। यह प्रतिमा शुंगकालीन है। लगभग इसी समय की मिट्टी की गोलाकार ठीकरा (फलक) पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना ) से प्राप्त है, जिस पर सूर्य चार घोड़ों से जुते हुए रथ पर सवार हैं। उनके साथ उनके सारथी अरुण को भी इस मृण्मू्तिमू् में प्रदर्शित किया गया है। बिहार के इस क्षेत्र में सूर्य पूजा की यह परंपरा आज भी वर्तमान है एवं छठ पूजा इस क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण व्रत है। बिहार के कलाकारों ने सूर्य की लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए इस देवता की अनेकों प्रतिमायें बनाई । इसके साथ बिहार में अनेक सूर्य मंदिरों का भी निर्माण हुआ।
बहरहाल, डॉ. जलज कुमार तिवारी, डिप्टी सुपरिटेंडेंट आर्कियोलॉजिस्ट, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया का कहना है कि “प्राचीन मूर्तियों को चोर एवं भक्त दोनों से खतरा रहता है। असुरक्षित स्थानों से चोरी का हमेशा खतरा बना रहता है उसी तरह मंदिरों में भक्तों द्वारा पानी, सिन्दूर, मिठाई आदि चढ़ाने से मूर्तियों एवं शिवलिंगों का क्षरण होता रहता है। समुचित रखरखाव हेतु संग्रहालय में पुरावशेषों को रखना आवश्यक होता है। इंडियन ट्रेजर ट्रोव एक्ट 1978 तथा बिहार पुलिस मैनुअल 1978 में इसका प्रावधान भी है कि प्रशासनिक एवं पुलिस पदाधिकारियों का यह दायित्व है कि पुरावशेषों को संग्रहालय में संग्रह गृहीत करे। लेकिन सामान्यता इन नियमों के अनुपालन में उदासीनता बरती जाती है। पोखर उड़ाही, सड़क निर्माण, मिट्टी खुदाई के दौरान प्राचीन मूर्तियाँ अक्सर मिलती रहती हैं। लोग पूजा पाठ आरंभ करते हैं मंदिर निर्माण किया जाता है। प्रशासन उदासीन बना रहता है। सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था नहीं होती जिससे अक्सर चोरी की घटनाएं होती रहती हैं। मूर्तियों की चोरी से हमारे सांस्कृतिक इतिहास के प्रमाण खत्म रहे हैं ।
बिहार में सूर्योपासना का प्रमाण आरंभिक समय से ही मिलता है। पौराणिक कथानुसार, याज्ञवल्क्य को यजुर्वेद का दर्शन सूर्योपासना से प्राप्त हुआ था। सूर्य के प्रति आर्यों की स्वाभाविक आस्था थी जो अपने प्रकाश और तेज से समस्त जगत एवं जीवों को आलोकित करता था । वह सात हरित अश्व के रथ पर बैठकर गतिमान होता था । उसे द्यौस, मित्र और वरुण का चक्षु माना जाता था । उसकी उपासना पांच रूपों यथा -सूर्य, सविता , मित्र, पूषन एवं विष्णु के रूप में की जाती थी । सूर्य, जिसका पूजन प्राकृतिक और स्वाभाविक रूप से होता था जो दिन में दिखाई पड़ता था और अपने प्रभाव से मार्गदर्शन करता था । सविता , जो सूर्य की प्रेरक शक्ति को अभिव्यक्त करता था तथा जिसकी प्रार्थना में गायत्री मंत्र का उच्चारण किया जाता था। वह स्वर्णिम देवता था। उसके नेत्र, हाथ, जिह्वा एवं भुजाएं स्वर्णिम थीं । सविता में सूर्य का दिन में दिखाई पड़ने वाला रूप और रात्रि में न दिखाई देने वाला रूप दोनों थे । मित्र, सूर्य का ही एक अंश था , जिसकी आराधना ईरान में अधिक की जाती थी । वहाँ वह वरुण के साथ वर्णित किया जाता था । पूषन, सूर्य की ही शक्ति का परिचायक था जो औषधि और वनस्पति जगत के संवर्द्धन में योगदान करता था । विष्णु, जो ऋग्वेद में आकाश में विचरण करने वाला सूर्य का रूप था ।
बिहार की प्रमुख सूर्य प्रतिमाएँ सूर्योपासना के विभिन्न माहात्म्य का उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार, महिलाओं द्वारा सूर्योपासना से विभिन्न प्रकार के पुण्य प्राप्त होने की मान्यता है। वर्तमान काल में छठ पूजा की जो परंपरा है उसमें भी उसी परम्परा का अनुपालन किया जाता है जैसा कि कृत्य रत्नाकर में उल्लिखित है। तेरहवीं , चौदहवीं शताब्दी में छठ पूजा के विषय में समाज के लोगों को पता था इससे ऐसा प्रतीत होता है कि उससे बहुत पहले अर्थात सैकड़ों वर्षों से समाज में महिलाओं द्वारा सूर्योपासना अर्थात् छठ पूजा की परम्परा स्थापित रही होगी । चौदहवीं शताब्दी के विद्वान रूद्रधर द्वारा वर्षकृत्य में सूर्यो पा सना अर्थात् छठ परम्परा का उल्लेख है। बाद में औपनिवेशिक चित्रकला पटना कलम में भी छठ के दृश्यों का अंकन किया गया है। अठारहवीं शताब्दी की अंतिम में पटना कलम में छठ के दृश्यों का अंकन किया गया है।
उन्नीसवीं सदी के आरंभ में फ्रांसिस बुकानन ने भी अपने शाहाबाद रिपोर्ट में कहा है कि बिहार के तालाबों एवं नदियों के किनारे महिलाओं द्वारा कार्तिकर्ति मास के छठे एवं सातवें दिन क्रमशः शाम एवं सुबह को सूर्योपासना की जाती है। उनके अनुसार, महिलाएं उपवास रखती हैं तथा एक साथ गीत गाती हुई नदी एवं तालाब को जाती है। सूर्यास्त के समय पूजा करती हैं । जमीन पर बैठकर रात बिताते हैं और दूसरे दिन सूर्योदय के बाद सूर्योपासना के बाद ही भोजन करती हैं।
बुकानन के अनुसार बंगाल के लोगों में यह प्रथा प्रचलित नहीं थी। मिथिला में प्रचलित बर्षकृत्य में रामचन्द्र झा द्वारा छठ पूजा का उल्लेख करते हुए षष्ठी देवी की कथा सुनने की व्यवस्था की गई है। इस कथा में सूर्योपासना के बदले षष्ठी देवी की पूजा करने पर बल दिया गया है। लेकिन महा कवि विद्यापति द्वारा उनके वर्षकृत्य में पुत्र जन्म के छठे दिन षष्ठी देवी पूजा का विधान किया गया है। उनके वर्षकृत्य में छठ पूजा का उल्लेख नहीं है जिससे प्रतीत होता है कि छठ पूजा मध्यकाल में अधिक लोकप्रिय नहीं रही होगी ।
प्राचीन काल से ही सूर्य का बहुत महत्व रहा है। आदिमानव न केवल सूर्य की भव्यता से बहुत प्रभावित था, बल्कि उसे जीवन और ऊर्जा का एकमात्र स्रोत भी मानता था। प्रागैतिहासिक और आद्य-ऐतिहासिक काल की गुफा-चित्रकारी और मिट्टी के बर्तनों पर सूर्य को चक्र या पहिये के रूप में दिखाए जाने के आधार पर, विद्वानों का मानना है कि उन्हें पवित्र माना जाता था और उनकी पूजा भी की जाती थी। उन्हें न केवल पूरे सौर मंडल और नवग्रहों का प्रमुख माना जाता है, बल्कि सभी मौसमों, प्रकाश, गर्मी, भोजन, वनस्पति और इंसानों के अस्तित्व के लिए ज़रूरी हर चीज़ के लिए भी जिम्मेदार माना जाता है। वैदिक और उत्तर-वैदिक काल में भी उनका बहुत महत्वपूर्ण स्थान था। ऋग्वैदिक काल में, सूर्य उन पांच महान प्राकृतिक शक्तियों में से एक प्रमुख देवता थे जिनकी पूजा की जाती थी। ऋग्वेद में 14 सूक्त हैं जिनमें सूर्य को दृष्टि देने वाला, अग्नि देवता का महान सहायक, अंधापन दूर करने वाला, बीमारियों को नष्ट करने वाला और दुनिया के हर जीव की आत्मा बताया गया है।
उत्तर-वैदिक काल में उन्हें पूरे सौर मंडल और नवग्रहों का नेता माना जाता है। महाकाव्यों और पुराणों में सूर्य को मानवीय रूप दिया गया है और उनके परिवार तथा संतानों का भी वर्णन किया गया है। अपने अनोखे गुणों के कारण, विभिन्न पुराणों में सूर्य की तुलना ब्राह्मण धर्म की त्रिमूर्ति – ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता), विष्णु (पालनकर्ता) और महेश (संहारकर्ता) – से की गई है और उनसे उनका गहरा संबंध बताया गया है। स्कंद पुराण के अनुसार, सूर्य देवता ब्रह्मा, विष्णु और शिव का सम्मिलित रूप हैं। भविष्य पुराण कहता है कि सूर्य देवता सर्वोच्च देवता हैं और उन्हें ब्राह्मण धर्म की त्रिमूर्ति से जोड़ता है। मार्कंडेय पुराण हमें बताता है कि सूर्य देवता का शरीर ब्रह्मा, विष्णु और शिव के शरीर के समान ही है; उनके तेजस्वी शरीर का वास्तविक स्वरूप इन्हीं तीन पहलुओं से मिलकर बना है।
सूर्य की पूजा सिर्फ़ हिंदू धर्म तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि जैन और बौद्ध धर्मों में भी उन्हें देवता के रूप में पूजा जाता था। सूर्य पूजा का यह क्रम सदियों से चला आ रहा है और भारत में, खासकर बिहार में, आज भी जारी है। यह भी सच है कि पिछले दो दशकों में बिहार में जमीन की खुदाई या तालाबों की सफाई के दौरान गुप्त काल के बाद से लेकर मध्यकाल तक की सूर्य और अन्य देवी-देवताओं की कई पत्थर की मूर्तियाँ मिली हैं, लेकिन ज्यादातर मूर्तियों का ठीक से अध्ययन या प्रकाशन नहीं हुआ है।
कैमूर जिले के चांद ब्लॉक में चट्टानों पर बनी कलाकृतियों (पेट्रोग्लिफ) में सूर्य को किरणों वाली डिस्क के प्रतीकात्मक रूप में दिखाया गया है। चिरांद की खुदाई में नवपाषाण काल (नियोलिथिक) के स्तर के एक मिट्टी के बर्तन के टुकड़े पर सूर्य को सोलह तीलियों वाले पहिये के प्रतीकात्मक रूप में दिखाया गया है। शुरुआती ऐतिहासिक काल के वैशाली से मिले मिट्टी के बर्तनों पर भी सूर्य का प्रतीक और किरणों वाली डिस्क की कलाकृति देखी गई है। वैशाली की खुदाई में उसी काल (200 ईसा पूर्व – 200 ईस्वी) के बाद के स्तर से पत्ती और पहिये के डिजाइन वाले बर्तन के टुकड़े और लाल मिट्टी के बर्तन के टुकड़े पर संकेंद्रित घेरों के अंदर पत्ती और गोल आकृतियों की मुहर वाली सजावट भी मिली है।
वैशाली से मिले लाल मिट्टी के बर्तन पर सूर्य का प्रतीक और पत्ती की सजावट बनी हुई है और इसे वैशाली संग्रहालय में रखा गया है। पत्ती और सूर्य का प्रतीक प्रकृति और सूर्य के बीच संबंध को दिखाते हैं। ब्लॉक द्वारा खोजी गई टेराकोटा की एक मुहर पर फ़ारसी अग्नि वेदी के चित्रण के साथ “रविदास” लिखा हुआ है। उसी काल की एक और मुहर पर सजावटी पहिये के चित्रण के साथ “रविदत्त स्वामी” लिखा हुआ है। फ़ारसी अग्नि वेदी और पहिया दोनों ही सूर्य के प्रतीकात्मक रूप हैं। डी. बी. स्पूनर द्वारा बसाढ़ की खुदाई में मिली एक मुहर पर अग्नि वेदी के ऊपर रखे सूर्य डिस्क के चिह्न के साथ “भगवत आदित्यस्य” लिखा हुआ है। वैशाली में उगते सूरज के प्रतीक वाली टेराकोटा की सीलिंग भी मिली है और इसे वैशाली संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है।
वैशाली साइट से मिले मिट्टी के बर्तनों पर सूर्य के प्रतीक मिलते हैं। लाल मिट्टी के बर्तन (रेड वेयर) के एक टुकड़े पर सूर्य का प्रतीक बना है, जो लगभग 300-150 ईसा पूर्व का है; और यही प्रतीक लाल स्लिप्ड वेयर के एक टुकड़े पर भी मिलता है, जो लगभग 300-600 ईस्वी का है। वैशाली संग्रहालय में मिट्टी (टेराकोटा) के दो ताबीज या पेंडेंट सुरक्षित हैं, जो गुप्त काल के हैं और लगभग एक ही तरह से बनाए गए हैं । इनमें से एक पर गोल घेरों के अंदर गोल आकृतियों का उभरा हुआ डिजाइन है जो सूर्य का प्रतीक है। चिरांद की खुदाई में काल III (कुषाण-गुप्त काल) से मिट्टी का एक खास ताबीज मिला है, जिस पर दो भुजाओं वाले सूर्य को चार घोड़ों के रथ पर सवार दिखाया गया है और उनके दोनों ओर दो महिला परिचारिकाएं हैं।
वैशाली से जैस्पर पत्थर के बने कान के कई आभूषण भी मिले हैं, जिन पर पूरी तरह खिले कमल का डिज़ाइन है जो सूर्य का प्रतीक है; इन्हें वैशाली संग्रहालय में रखा गया है। पहिया और कमल को भी सूर्य से गहराई से जुड़ा माना जाता है। इसलिए, आभूषणों में सूर्य को बिना मूर्ति के रूप में दिखाने के लिए भी इन प्रतीकों का इस्तेमाल किया जाता था। बिहार में मानव रूप में सूर्य देवता का सबसे पुराना सबूत पटना के कदमकुआं में मौर्य काल के स्तर की खुदाई में मिली मिट्टी की गोल डिस्क पर मिलता है। इसमें सूर्य को चार तेज़ दौड़ते घोड़ों वाले रथ पर खड़े दिखाया गया है और वे धनुष से तीर चला रहे हैं। देवता के दाईं ओर सारथी को दिखाया गया है, जिसने बाएं हाथ से लगाम पकड़ी हुई है और दाएं हाथ में एक छड़ी ले रखी है। कुछ कला इतिहासकारों ने शैली के आधार पर कला के इस नमूने को शुंग काल का माना है।
सारण जिले के चिरांद में खुदाई के दौरान कुषाण-गुप्त काल का एक गोल टेराकोटा ताबीज़ मिला है। इसमें दो समानांतर छेद हैं और बीच में सूर्य की आकृति है जो चार घोड़ों वाले रथ पर सवार हैं और उनके दोनों तरफ़ दो महिला परिचारिकाएँ हैं। बिहार में शुंग काल की शैली में मानव रूप में सूर्य का चित्रण वैशाली और बलिराजगढ़ की टेराकोटा कला में भी मिलता है। बसढ़ (वैशाली) की खुदाई में पंखों वाले देवता की टेराकोटा मूर्ति मिली है। अभी इसे पटना के बिहार संग्रहालय में रखा गया है। इस पट्टिका में एक आकृति कमल के फूलों के बीच खड़ी है और उसने कमर के पास हाथों में दो लंबे डंठल पकड़ रखे हैं। आकृति भारी डिस्क के आकार के झुमके, गले का हार, बाजूबंद, चूड़ियाँ, कमरबंद और पायल पहने हुए है।
एल. पी. पांडे ने सही ढंग से इस पंखों वाले देवता की पहचान सूर्य के रूप में की, क्योंकि यह कमल के फूल पर खड़ा है और दोनों हाथों में कमल का फूल पकड़े हुए है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि इसके कंधों से दो पंख जुड़े हुए हैं; यह हमें सुपर्ण की याद दिलाता है, जो सूर्य देवता का एक वैदिक नाम है। ऋग्वेद के कुछ भजनों में सूर्य का वर्णन एक पक्षी, विशेषकर चील या बाज़ के रूप में किया गया है, जिसके पंख बहुत अच्छे हैं। इसी तरह की साबुत टेराकोटा पट्टिका जिसमें पंखों वाले सूर्य को दिखाया गया है, राजा विशाल का गढ़ (वैशाली) में भी मिली है और बलिराजगढ़ से पंखों वाले सूर्य की टेराकोटा पट्टिका का ऊपरी हिस्सा मिला है। यह ध्यान देने वाली बात है कि कुषाण काल की सूर्य की सबसे पुरानी मूर्ति, जो मथुरा के सप्त समुद्र कुएँ से निकाली गई थी, उसमें सूर्य को चार तेज़ दौड़ते घोड़ों वाले रथ पर बैठे पंखों वाले देवता के रूप में दिखाया गया है।
बिहार का लगभग पूरा इलाका शुंग काल से लेकर मध्यकाल तक सूर्य की पत्थर की मूर्तियों से भरा हुआ था। बोधगया में मिली पुरानी पत्थर की रेलिंग पर बना रिलीफ (उभरी हुई नक्काशी), जो शुंग काल का है, पत्थर में सूर्य का सबसे पुराना चित्रण है। कुषाण काल की पत्थर की मूर्ति तपोवन (गया जिला) में देखी गई है, जिसे अभी नवादा संग्रहालय में रखा गया है। इस नमूने में सूर्य को खड़े मुद्रा में दिखाया गया है और उनके दोनों तरफ़ कुषाण पोशाक में दंड और पिंगल हैं। दुर्भाग्य से मूर्ति का ऊपरी हिस्सा गायब है। इस इलाके में गुप्त काल के बाद की सूर्य की मूर्तियाँ बहुत कम मिलती हैं और ये नवादा और बिहार शरीफ के म्यूजियम में देखी जा सकती हैं, लेकिन 9वीं सदी के बाद से सूर्य पूजा को बढ़ावा मिला और पाल और कर्नाट काल (9वीं सदी से 14वीं सदी ईस्वी) में यह अपने चरम पर पहुँच गई, जिसकी पुष्टि मूर्तियों के मिलने से होती है।
भारत में शुरुआती ऐतिहासिक काल से लेकर शुरुआती मध्यकाल तक ब्राह्मणवादी कला में सूर्य सबसे आम विषय रहे हैं। सूर्य की पूजा अलग-अलग और मिश्रित रूपों में की जाती है। भारतीय संदर्भ में मिश्रित रूपों (सिंक्रेटिज्म) के अध्ययन के लिए बिहार से मिली सूर्य की मिश्रित मूर्तियां बहुत महत्वपूर्ण हैं। बिहार में सूर्य का अन्य देवी-देवताओं के साथ जुड़ाव गुप्त काल से देखा जा सकता है और पाल काल में यह अपने चरम पर पहुंच गया।
बिहार क्षेत्र के कलाकारों ने न केवल सूर्य को ब्राह्मणवादी देवी-देवताओं के साथ, बल्कि बौद्ध देवी-देवताओं के साथ भी दिखाया। बिहार से मिली ‘रुद्र-भास्कर’ की मूर्ति को भारतीय संदर्भ में इस तरह की मूर्ति का सबसे शुरुआती उदाहरण माना जा सकता है। तिलकेश्वरगढ़ से मिली ‘हरिहरार्क’ की मूर्ति बिहार और पाल कला का एकमात्र ज्ञात उदाहरण है। सूर्य, हरिहर और बुद्ध को दिखाने वाली मूर्ति और एक ही मंच पर सूर्य, ब्रह्मा और कार्तिकेय को दिखाने वाली मूर्ति, साथ ही अन्य बौद्ध देवी-देवताओं के साथ सूर्य की मूर्तियां कला के दुर्लभ नमूने हैं और इस तरह का कोई दूसरा नमूना नहीं मिला है।
मखपा में मिली सूर्य की मिश्रित मूर्ति, सूर्य की सबसे अनोखी मूर्तियों में से एक है, जो अपनी मौलिकता के लिए उल्लेखनीय है। बिहार से मिली सूर्य नारायण की दो-तरफा (बाइफेशियल) मूर्तियां काफी उल्लेखनीय हैं। भारतीय संदर्भ में सूर्य नारायण की दो-तरफा मूर्तियां मुख्य रूप से बिहार में ही देखी जाती हैं। बिहार के बाहर केवल एक उदाहरण मिलता है जो भारत कला भवन, वाराणसी में संरक्षित है, और हो सकता है कि इसे बिहार से ही लाया गया हो। गुप्त काल के बाद और पाल काल में शिवलिंग, स्तंभ या ओबिलिस्क के चारों ओर सूर्य सहित चार संप्रदाय के देवताओं को दिखाने का चलन लोकप्रिय हुआ। प्रतिमा-विज्ञान संबंधी ग्रंथ हरिहरार्क, मिश्रित शिवलिंग और दो-तरफा सूर्य नारायण रूप के बारे में चुप हैं, लेकिन मूर्तिकला में इस तरह का चित्रण कलाकारों की कलात्मक कल्पना और उस समय के धार्मिक समाज की जरूरतों का परिणाम हो सकता है।
इस तरह, बिहार में मिली सूर्य की मिली-जुली (सिंक्रेटिक) मूर्तियाँ उस इलाके में धार्मिक सहिष्णुता और अलग-अलग धर्मों के मेलजोल के साथ-साथ बिहार के गुप्त-बाद के और पाल काल के मूर्तिकारों की नई सोच और हुनर पर भी रोशनी डालती हैं। बिहार इलाके में नवग्रह पैनल और अष्टादिकपाल पैनल में सूर्य की पूजा का भी चलन था। गया, नालंदा, विक्रमशिला, जयमंगला-गढ़, बीरपुर, चंद्रधारी संग्रहालय (दरभंगा), खपरपुरा (मधुबनी) में नवग्रह पैनल और नालंदा, गया और चेचर आदि जगहों पर अष्टादिकपाल पैनल मिलने से इसकी पुष्टि होती है।
रेवंत, सूर्य के बेटों में से एक हैं। मार्कंडेय पुराण और कालिका पुराण के अनुसार, रेवंत लोगों को कई तरह के दुश्मनों, लुटेरों और जंगलों के खतरों से बचाते हैं और अपने भक्तों को अच्छी सेहत, आराम, खुशी, बुद्धि, अच्छे रिश्ते और ऊँचा पद देते हैं। नालंदा, घोषरावां, गया, बरईपुरा आदि जगहों पर रेवंत की मूर्तियां देखी गई हैं।
बिहार में बारागाँव, अंगारी, पंडारक, देव बरुनारक, उमगा, देव और कंदहा में कई मशहूर सूर्य मंदिर हैं जो ध्यान देने लायक हैं। हालाँकि मंदिरों की बनावट बहुत पुरानी नहीं है, लेकिन सूर्य की मूर्तियां निश्चित रूप से पुरानी हैं। यह कहा जा सकता है कि ये मंदिर सूर्य मंदिरों की पुरानी जगहों पर ही बने हैं। इस तरह, अलग-अलग जगहों पर मिली रॉक आर्ट, सिक्के, मुहरें, मिट्टी के बर्तन के टुकड़े, टेराकोटा के ताबीज, पट्टिकाएँ, पत्थर की मूर्तियाँ और मंदिरों के अवशेष जैसे पुरातात्विक सबूत साफ तौर पर साबित करते हैं कि बिहार इलाके में कम से कम नवपाषाण काल से ही सूर्य पूजा की परंपरा बड़े पैमाने पर प्रचलित थी।
आज भी बिहार में सूर्य पूजा वहाँ की संस्कृति में गहराई से बसी हुई है, खासकर छठ पूजा के त्योहार के ज़रिए। यह सूर्य देवता को समर्पित चार दिनों का त्योहार है, जिसे कड़े नियमों, उपवास और डूबते व उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ मनाया जाता है, जिसमें नदियों, तालाबों या किसी भी जलाशय में पवित्र डुबकी लगाना भी शामिल है। सूर्य देवता को जीवन, ऊर्जा और जीवन-शक्ति का स्रोत माना जाता है और भक्त सेहत, समृद्धि और भलाई के लिए आशीर्वाद मांगते हैं। छठ पूजा कई मायनों में अनोखी है क्योंकि इसमें मूर्तियों या किसी पुजारी की मौजूदगी के बजाय सूर्य देवता की उनके प्राकृतिक रूप में पूजा करने पर ज़ोर दिया जाता है। इस प्रकार, पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर बिहार में सूर्य पूजा की परंपरा को नवपाषाण काल से ही देखा जा सकता है और यह आज भी जारी है।





























